Agra Kidnapping Case : इलाउल हक ने 2 करोड़ रुपए के लालच में मशहूर व्यापारी प्रतीक वार्ष्णेय के बेटे दिव्य का अपने साथियों की मदद से अपहरण तो कर लिया, लेकिन इस से पहले कि वह फिरौती वसूल पाते, पुलिस के हत्थे चढ़ गए.
पिछले कुछ दिनों से दिव्य को साइकिल चलाने का शौक लगा था. रोज शाम को उस की दादी शशि और मम्मी निशा उर्फ मोना बाहर आ कर बैठ जातीं तो वह कोठी गेट के बाहर साइकिल चलाता. उस दिन भी वह रोज की तरह साइकिल चला रहा था कि अचानक एक आदमी आया और दिव्य को उठा कर कोठी के बाहर खड़ी मोटरसाइकिल पर सवार हो कर चला गया. मोटरसाइकिल उसी का कोई साथी चला रहा था.
यह सब इतना अचानक हुआ था कि शशि और निशा की समझ में ही नहीं आया कि यह क्या हो रहा है. मामला समझ कर जब तक उन्होंने शोर मचाया, तब तक वे लोग दिव्य को ले कर इतनी दूर निकल गए थे कि शोर सुन कर उन के पीछे दौड़ने वाले भी उन्हें पकड़ नहीं पाए. जिस तरह यह सब हुआ था, साफ था कि वे दिव्य का अपहरण कर के ले गए थे.
दिव्य के अपहरण की सूचना तुरंत उस के दादा लव कुमार को दी गई उन्होंने तुरंत इस की जानकारी अपने शुभचिंतकों को देने के साथ एसएसपी डा. प्रीतिदंर सिंह को भी दे दी. मामला एक प्रतिष्ठित परिवार से जुड़ा था, इसलिए एसएसपी के आदेश पर पूरे आगरा शहर की पुलिस हरकत में आ गई. थोड़ी ही देर में लव कुमार वार्ष्णेय की कोठी पुलिस छावनी में तब्दील हो गई. एसएसपी डा. प्रीतिंदर सिंह खुद पूछताछ के लिए उन की कोठी पर पहुंच गए. शहर के तमाम गणमान्य लोग भी वहां आ गए थे.
मामला हाइप्रोफाइल था, इसलिए एसएसपी ने घटना की जानकारी डीजीपी जावीद अहमद को भी दे दी थी. इस के बाद बात मुख्यमंत्री तक पहुंच गई थी. आगरा ही नहीं, पूरे प्रदेश में तेजाब न जाने कितने बच्चे रोजाना लापता होते हैं, पुलिस उन्हें खोजना तो दूर, कुछ की रिपोर्ट तक दर्ज नहीं करती. लेकिन यह मामला एक बड़े आदमी से जुड़ा था, इसलिए पूरे शहर की पुलिस सक्रिय थी.
यादिफ कटरा निवासी लव कुमार का आगरा की सेठ गली में पेपर का कारोबार है. वहीं उन की हजारों वर्गगज में शानदार कोठी है. कोठी परिसर में ही जूतों का एक कारखाना है, जिसे 11 सालों से इलाउल हक उर्फ बब्लू चला रहा है. इस के अलावा वहीं पर किताबों का एक गोदाम किराए पर दे रखा है. इस की वजह से कोठी में काम करने वालों की आवाजाही लगी रहती है. ऐसे में कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था कि इस तरह कोई बच्चे को उठा ले जाएगा.
दिव्य के अपहरण की रिपोर्ट थाना हरिपर्वत में अज्ञात लोगों के खिलाफ दर्ज कर ली गई. मौके का दौरा करने के बाद पुलिस को लगा कि इस अपहरण में कोठी के अंदर आनेजाने वाले किसी आदमी का हाथ हो सकता है, डा. प्रीतिंदर सिंह ने इस केस को खोलने की जिम्मेदारी सीओ (ताजगंज) असीम चौधरी को सौंप दी. सीओ असीम चौधरी ने सब से पहले कोठी के आसपास की बिल्डिंगों में लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज की जांच कराई. फुटेज में एक आदमी दिव्य को ले जाते दिखा. जितनी निर्भीकता से वह आदमी दिव्य को ले जा रहा था, उस से यही अनुमान लगाया गया कि यह काम किसी बड़े गिरोह का है, यह भी अंदाजा लगाया गया कि हो सकता है इस में जेल में बंद किसी बड़े सरगना का हाथ हो, जिस के गुर्गे बाहर रह कर उस के लिए काम कर रहे हैं. क्योंकि दिव्य को उठाते समय बदमाशों ने मुंह पर कपड़ा नहीं बांध रखा था.
इस बात से अपहर्त्ताओं के बाहर के होने की उम्मीद थी. पुलिस ने जिले के अलावा दूसरे थानों के ऐसे बदमाशों को भी पूछताछ के लिए उठाना शुरू कर दिया, जो पहले अपहरण जैसे मामलों में संलिप्त रहे थे. पुलिस को काररवाई करते हुए 3 दिन हो चुके थे. आश्चर्य की बात यह थी कि अभी तक अपहर्त्ताओं ने दिव्य के घर वालों से संपर्क नहीं किया था.
पुलिस भी अभी तक किसी नतीजे पर नहीं पहुंची थी. घर वालों का रोरो कर बुरा हाल था. अब वे पुलिस वालों से दूरी बनाने लगे थे, क्योंकि वे किसी भी तरह बच्चे को वापस पाना चाहते थे. जबकि पुलिस मुस्तैदी से अपने काम में लगी थी. जूते के कारखाने और किताब के गोदाम में काम करने वाले दर्जनों कर्मचारियों से पूछताछ की जा चुकी थी. आसपास के इलाकों से भी 20 से ज्यादा लोगों को थाने ला कर पूछताछ की गई थी.
दिव्य के मामले में पुलिस से यह लापरवाही जरूर हुई थी कि बच्चे का अपहरण होने के तुरंत बाद नाकाबंदी नहीं की गई थी, जिस से अपहर्त्ता भागने में सफल हो गए थे. जिस मोटरसाइकिल से उसे ले जाया गया था, उस पर नंबर प्लेट भी नहीं थी. अपहर्त्ताओं ने फिरौती के लिए फोन तो नहीं किया, लेकिन उन की कोठी में किसी ने न मालूम कब एक लेटर जरूर फेंक दिया, जिस में लिखा था कि प्रतीक (दिव्य के पिता) तुम्हारा बच्चा हमारे पास है. तुम 2 करोड़ रुपए का इंतजाम कर लो. हम आगरा आ कर बताएंगे कि पैसा कहां देना है. और हां, पुलिस को सूचना मत देना. उस में तुम्हारा ही नुकसान होगा.
दिव्य के घर वालों ने पैसों का इंतजाम कर लिया और वह अपहर्त्ता की सूचना का इंतजार करने लगे. उसी दिन 17 मार्च को प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को आगरा आना था. पुलिस की कोशिश यही थी कि उन के आने से पहले किसी भी तरह बच्चे को सहीसलामत बरामद कर लिया जाए. वैसे यह चुनौती भरा काम था, लेकिन पुलिस हर संभव कोशिश में लगी थी.
लव कुमार के घर फेंका गया पत्र पुलिस को मिल चुका था. पत्र किस ने फेंका था, पुलिस इस का पता लगा रही थी. पुलिस ने पूरे शहर के मुखबिरों को सक्रिय कर दिया था. इसी का नतीजा था कि पुलिस को पता चला कि थाना ताजगंज के दिगनेर नहर के पास बेहरा गांव में कुछ बदमाश एक बोलेरो जीप में मौजूद हैं. इसी सूचना के आधार पर सीओ असीम कुमार चौधरी पुलिस बल के साथ वहां पहुंचे और घेर कर 4 लोगों को पकड़ लिया. इत्तफाक से उसी जीप में दिव्य भी डरासहमा बैठा था. असीम चौधरी ने जब उस से कहा कि ‘डरो मत हम पुलिस वाले हैं’ तो वह उन से लिपट गया.
पुलिस ने जिन 4 लोगों को पकड़ा था, उन के नाम थे इलाउल हक, मुबीन, अज्जू और समीर. पुलिस को देख कर 2 लोग भाग गए थे. इस तरह मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के आगरा आने से पहले पुलिस ने दिव्य को सहीसलामत बरामद कर लिया था. मुख्यमंत्री को जब यह खबर मिली तो उन्होंने दिव्य को बरामद करने वाली टीम से एयरपोर्ट पर मुलाकात की और 5 लाख रुपए इनाम देने की घोषणा की. इस के अलावा डीजीपी जावीद अहमद ने भी पुलिस टीम को 50 हजार रुपए इनाम देने की घोषणा की.
गिरफ्तार अभियुक्तों से की गई पूछताछ में आगरा के हिंदुस्तान पेपर के कारोबारी लव कुमार वार्ष्णेय के पोते दिव्य के अपहरण और उस की वापसी की जो कहानी निकल कर आई, वह इस प्रकार है. लव कुमार वार्ष्णेय आगरा के बड़े कारोबारियों में से एक हैं. उन का एक ही बेटा है प्रतीक, जिस की शादी निशा उर्फ मोना से हुई थी. उन के 2 बेटे हैं, 7 साल का दिव्य और 3 साल का कवीश. अभी कारोबार लव कुमार के हाथों में है तो घर की जिम्मेदारी उन की पत्नी शशि संभालती हैं.
लव कुमार की कोठी परिसर में ही इलाउल हक जूता बनाने का कारखाना चलाता था. करीब 6 महीने पहले थाना शमसाबाद के अंतर्गत रहने वाला उस का परिचित मुबीन उस से मिलने आया तो लव कुमार की आलीशान कोठी देख कर उस का दिमाग चकरा गया. संयोग से उस समय दिव्य कोठी में ही साइकिल चला रहा था. उस के दिमाग में तुरंत आया कि अगर इस बच्चे का अपहरण कर लिया जाए तो करोड़ों की फिरौती आसानी से मिल सकती है.
इस के बाद उस ने झांसी के रहने वाले समीर उर्फ शम्मी से बात की. वह झांसी में कोचिंग सेंटर चलाता था. इस के बाद उन्होंने बल्लू और नसीम से बात कर के उन्हें दिव्य को उठाने की जिम्मेदारी सौंप दी, साथ ही सैयद पाड़ा के रहने वाले अज्जू पहलवान को रेकी का काम सौंप दिया. सभी का सोचना था कि इस अपहरण में 2 करोड़ की फिरौती तो मिल ही जाएगी. इस अपहरण कांड में शामिल सभी लोगों के संबंध किसी न किसी रूप से अपराध से थे. अपहरण कांड का मास्टरमाइंड मुबीन पहले बसपा में था. बाद में वह सपा में आ गया. वह सपा नेताओं की सरपरस्ती में था.
शमसाबाद नगर पालिका से 2 बार पार्षद रह चुका मुबीन कुख्यात मोहन डान का साथी था. जुएसट्टे का हफ्ता उस के घर पहुंच जाता था. लूटडकैती और हत्या जैसे संगीन अपराधों में वह जेल जा चुका था. दिल्ली की तिहाड़ जेल में भी वह रहा है. नगर पालिका के पिछले चुनाव में उस ने चेयरमैन के लिए चुनाव लड़ा. लेकिन हार गया था. दिव्य के अपहरण में समीर का पिता इकबाल उर्फ डाक्टर भी मोहन डान के साथ रह चुका है. पढ़ालिखा होने के कारण समीर ने कोचिंग सेंटर खोल लिया था. दिमाग से वह अपराधी प्रवृत्ति का ही था. वह सर्विलांस का माहिर होने के साथ अच्छा ड्राइवर भी है. अपराध करते समय वह अपने साथ मोबाइल नहीं रखता.
अपहरण की योजना बन गई और सभी को काम सौंप दिए गए. सभी अपनेअपने काम पर लग गए. पहले उन्होंने अपहरण की तारीख 10 मार्च तय की थी, लेकिन उस दिन समीर समय पर ग्वालियर से वहां नहीं आ सका, जिस से उस दिन मामला टल गया. 13 मार्च को समीर लौटा तो योजना पर काम शुरू हुआ. बच्चे को उठाने का काम बल्लू और नसीर का था. बल्लू का खर्च मुबीन उठाता था. उसे पूरा विश्वास था कि कोठी के अंदर से बच्चे को उठाने का साहस सिर्फ बल्लू ही कर सकता है. बल्लू मुबीन का दायां हाथ था. इस काम के लिए उसे 5 लाख रुपए मिलने थे.
बल्लू शमसाबाद के गोपालपुरा मोहल्ले का रहने वाला था. उस का भाई राजा शहीदनगर में रहता था. दिव्य का अपहरण करने के बाद मुबीन ने उसे इंदौर भेज दिया था, लेकिन उस के पीछेपीछे वहां पुलिस पहुंच गई तो वह भाग कर आगरा आ गया. लेकिन दिव्य की बरामदगी के बाद वह फरार हो गया. आखिर पुलिस ने उसे 19 मार्च को ताजगंज मुतिला मोड़ पर गिरफ्तार किया.
दिव्य को कोठी से उठा कर बल्लू और नसीम बाइक से ले गए और उन्होंने उसे बोलेरो कार में मौजूद मुबीन को सौंप दिया. बोलेरो वही चला रहा था. मुबीन उसे ले कर निर्मल वाले रास्ते से बोदला गया, जहां खड़ी कार में दिव्य को ले कर बैठ गया. इस के बाद वे दिव्य को ले कर रोहतास नहर होते हुए ग्वालियर से झांसी पहुंचे, जहां बबीना रोड पर समीर रहता था. दिव्य को ले कर सभी समीर के घर रुक गए. इस के बाद के वे 3 दिन तक दिव्य को ले कर जयपुर, धौलपुर, और मुरैना और राजा खेड़ा घूमते रहे.
अपहर्त्ताओं को जब पता चला कि पुलिस की घेराबंदी बढ़ती जा रही है और वे फंसते जा रहे हैं तो वे दिव्य को ले कर धौलपुर के बीहड़ों में शिफ्ट हो जाना चाहते थे. आलीशान कोठी में रहने वाला दिव्य 4 दिनों तक अंधेरी कोठरी में रहा. जब वह रोता तो उसे गोली मार देने की धमकी दे दी जाती. अपहर्त्ता उसे चिप्स और चौकलेट खिलाते रहे और उस के साथ लूडो भी खेलते रहे. एसएसपी प्रीतिंदर सिंह ने 17 मार्च को सुबह 9 बजे दिव्य के घर वालों को अपनी कोठी पर बुलाया और उन्हें बधाई देते हुए कहा कि उन का बच्चा मिल चुका है. कुछ देर में वह यहां आ जाएगा. थोड़ी ही देर में सीओ असीम चौधरी पुलिस बल के साथ बच्चे को ले कर आए तो प्रीतिंदर सिंह ने दिव्य को उन्हें सौंप दिया.
17 मार्च को ही पकडे गए चारों आरोपियों को विशेष न्यायाधीश (दस्यु प्रभावित क्षेत्र) श्री संतोष राय की अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें न्यायिक अभिरक्षा में 31 मार्च तक के लिए जेल भेज दिया गया. 19 मार्च को बल्लू को और नसीम को भी गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया गया.
—कथा पुलिस सूत्रों पर आधा






