Extramarital Affair Murder : घरपरिवार से दुखी सुनीता ने सुख की खातिर विकास को अपना बनाया था. लेकिन विकास का अपना घरपरिवार था. वह सुनीता को कैसे अपनी बना सकता था. जब सुनीता उस के लिए गले की हड्डी बनी तो उस ने उसे दूर तो कर दिया, लेकिन…
प्रकाश आहिरे अपने परिवार के साथ महानगर मुंबई के उपनगर घाटकोपर (पश्चिम) में भीमनगर वी.वी.एस. पवार की चाल में रहता था. उस के परिवार में पत्नी सुनीता, 2 बेटियां और एक बेटा था. प्रकाश एक नंबर का शराबी था. अधिक शराब पीने की ही वजह से उसे टीबी हो गई थी. इसलिए परिवार की देखभाल की जिम्मेदारी सुनीता पर आ गई थी.
सुनीता के लिए इस से भी ज्यादा दुख की बात यह थी कि बेटा भी बाप की राह पर चल पड़ा था. वह जो भी कमाता था, शराब पी जाता था. परिवार के भूखों मरने की नौबत आ गई तो सुनीता को कमाने की जरूरत महसूस हुई. उस ने जानपहचान वालों से कहीं नौकरी दिलाने की बात की तो किसी ने उसे दादर स्थित एक नल की टोंटी बनाने वाली फैक्ट्री में नौकरी दिला दी.
सुनीता को वहां वेतन तो कोई ज्यादा नहीं मिल रहा था, फिर भी इतना मिल जाता था कि पेट को रोटी और तन को कपड़ा मिल जाता था. जैसेतैसे दिन बीत रहे थे, लेकिन समय कब बदल जाए, कोई नहीं जानता. अचानक सुनीता एक बार फिर आर्थिक संकट में घिर गई.
वह जिस नल की टोंटी बनाने वाली फैक्ट्री में काम करती थी, वह एकाएक बंद हो गई थी. इस के बाद सुनीता ही नहीं, वहां काम करने वाले सभी लोग बेरोजगार हो गए थे. इस तरह सुनीता के सामने एक बार फिर वही समस्या खड़ी हो गई, जो पहले थी. वह नौकरी के लिए फिर भटकने लगी.
उसी बीच उस की मुलाकात प्रवीण धाड़ी से हुई. प्रवीण सुनीता के साथ दादर की नल की टोंटी बनाने वाली कंपनी में काम करता था. दोनों में पटती भी थी, इसलिए सुनीता ने जब उसे घर की स्थिति बता कर नौकरी के बारे में कहा तो उस ने उसे नौकरी दिलाने का आश्वासन ही नहीं दिया, बल्कि दिला भी दी.
प्रवीण का एक दोस्त था विकास म्हात्रे, जिस की थाणे के कल्याण के पास दिवा में प्लास्टिक के तार बनाने की एक छोटी सी फैक्ट्री थी. उसे एक ईमानदार मेहनती महिला कर्मचारी की जरूरत थी. सुनीता को उस ने वेतन 4 हजार रुपए देने की ही बात कही थी. लेकिन मरता क्या न करता. सुनीता ने विकास म्हात्रे के यहां नौकरी कर ली थी.
वह सुबह लोकल ट्रेन से दिवा तक जाती तो रात 8 बजे तक घर लौटती थी. काम ज्यादा होने पर कभीकभी देर भी हो जाती थी. उसे विकास म्हात्रे के यहां काम करते कुछ ही महीने हुए थे कि एक दिन अचानक वह गायब हो गई. उस के इस तरह अचानक गायब होने से घर में मातम छा गया, क्योंकि उसी की वजह से घर चल रहा था.
सुनीता के भाई देवीदास और बेटी श्रद्धा ने सुनीता को काफी खोजा, जब वह कहीं नहीं मिली तो घाटकोपर जा कर उस की गुमशुदगी दर्ज करा दी. यह 10 जून, 2015 की बात थी. थाना घाटकोपर के थानाप्रभारी इंसपेक्टर व्यंकटेश पाटील ने अधिकारियों तथा पुलिस कंट्रोल रूम को सूचना दे कर मामले की जांच शुरू कर दी.
सुनीता विकास म्हात्रे की फैक्ट्री में नौकरी करती थी और सुबह वहीं जाने की बात कह कर घर से निकली थी, इसलिए पुलिस का ध्यान उसी पर जम गया था. उसे थाने बुला कर पूछताछ की गई तो उस ने खुद को सुनीता के मामले में एकदम अनभिज्ञ बताया. जब इस से कोई जानकारी नहीं मिली तो पुलिस ने उस का मोबाइल नंबर ले कर उसे छोड़ दिया.
22 जून, 2015 को नवी मुंबई के निलजे गांव की लोढा हैवन इमारत के रहने वाले एलआईसी एजेंट संतोष व्हटकर किसी काम से नवी मुंबई महापे जा रहे थे तो रास्ते में उन्हें पेशाब लगी. महापे रोड के टीवीएमटी नाले के पास मोटरसाइकिल रोक कर वह पेशाब करने नाले के किनारे गए तो वहां लगे मिट्टी के ढेर पर महिला की लाश देख कर उन के होश उड़ गए. वह पेशाब करना भूल गए और मोटरसाइकिल उठा कर सीधे महापे टोल नाका पहुंचे, जहां ड्यूटी पर तैनात पुलिस वालों को लाश के बारे में बताया.
पुलिस वालों ने इस की जानकारी थाना एमआईडीसी पुलिस को दी तो थानाप्रभारी इंसपेक्टर चंद्रसेन देशमुख अपने साथ इंसपेक्टर चंद्रकांत काटकर, अरुण पवार, प्रवीण शेडके, एसआई प्रदीप श्राफ, हैडकांस्टेबल आशीष महाडिक, दिगंबर आंजे, प्रकाश सालुके और दीपक कांबले को ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए.
बरसात की वजह से लाश फूल गई थी. लाश पर जो नाइटी थी, वह जगहजगह से फटी हुई थी. उस के हाथ पीछे की तरफ मजबूत रस्सी से बंधे थे. साफ लग रहा था कि हत्या कर के लाश यहां सुनसान में ला कर फेंकी गई थी. लाश फेंकने वाले ने यह सोच कर लाश यहां फेंकी थी कि बरसात में लाश बह कर दूर निकल जाएगी.
चंद्रसेन देशमुख ने लाश और घटनास्थल का निरीक्षण कर के लाश को पोस्टमार्टम के लिए वाशी अस्पताल भिजवा दिया. इस के बाद अज्ञात के खिलाफ मामला दर्ज कर के जांच शुरू कर दी. जांच में सब से बड़ी समस्या शिनाख्त की थी, बिना शिनाख्त के जांच आगे नहीं बढ़ सकती थी.
इस के लिए पुलिस ने नवी मुंबई, थाणे, रायगढ़, पालघर और कोंकण के सभी थानों से संपर्क किया. इस के अलावा लाश के फोटो दैनिक अखबारों में छपवाए गए. जब इस सब से भी कोई लाभ नहीं हुआ तो लाश के पैंफ्लेट छपवा कर पूरे शहर में चस्पा करवाए गए. लेकिन पुलिस को इस का भी कोई लाभ नहीं मिला. जब लाश की शिनाख्त ही नहीं हो सकी तो जांच कैसे आगे बढ़ती?
धीरेधीरे 4 महीने बीत गए. 27 सितंबर, 2015 को थाना घाटकोपर के सिपाही रावत और पानसरे किसी काम से तुर्दे गए तो वहां उन्होंने कई जगहों पर सुनीता की लाश के पैंफ्लेट लगे देखे. वे जिस गुमशुदा महिला की तलाश 4 महीने से कर रहे थे, उस की तो हत्या हो चुकी थी. उन्होंने यह बात तुरंत वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को बताई और थाना एमआईडीसी जा कर सुनीता की लाश मिलने के बारे में जानकारी जुटाई.
इस के बाद उन्होंने वह लाश सुनीता की ही थी, इस की पुष्टि के लिए उस के घर वालों को वहीं बुला लिया. घर वालों को जब थाने में रखे सुनीता के सामान और फोटो दिखाए गए तो सुनीता के भाई देवीदास और बेटी श्रद्धा ने बताया कि फोटो और सामान सुनीता के ही हैं.
चूंकि थाना घाटकोपर पुलिस की नजर में विकास म्हात्रे संदिग्ध था, इसलिए उसे गिरफ्तार कर लिया गया. पूछताछ मे इस बार भी वह पहले की ही तरह नाटक करता रहा. पुलिस उस के साथ सख्ती न कर सके, इस के लिए वह कभी बेहोश हो जाता तो कभी दीवार पर सिर पटकने लगता, साथ ही धमकी देता कि अगर उसे परेशान किया गया तो वह आत्महत्या कर लेगा.
विकास को रास्ते पर आते न देख चंद्रसेन देशमुख ने वरिष्ठ अधिकारियों से सलाह कर के उस से सच्चाई उगलवाने की एक नई युक्ति निकाली. संयोग से उन की वह युक्ति सफल भी हो गई. उसी युक्ति से विकास ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया.
18 जनवरी, 2016 को चंद्रसेन देशमुख ने अपने एक तेजतर्रार पुलिस अधिकारी को वकील के रूप में विकास के पास भेजा. उस अधिकारी ने विकास से कहा कि उसे उस की पत्नी ने उस के पास भेजा है. उसे पूरा भरोसा है कि वह उसे बचा लेगा. लेकिन वह उसे तभी बचा सकेगा, जब वह शुरू से ले कर अंत तक की पूरी कहानी उसे बता दे. आखिर विकास उस के झांसे में आ गया और सुनीता की हत्या का सारा सच उगल दिया. उस ने सुनीता की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी.
42 वर्षीय विकास म्हात्रे महानगर मुंबई के उपनगर अंधेरी (पूर्व) में करीम की चाल में अपने परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी के अलावा 4 बेटियां थीं. उस की प्लास्टिक के तार बनाने की छोटी सी फैक्ट्री थी. शुरू में वह अपना यह काम घर से ही करता था. लेकिन कुछ दिनों बाद उस ने अपनी तार बनाने वाली मशीन मुंबई से दूर थाणे के दिवा के गांव दानीवाली की चाल में लगा ली थी.
काम अच्छा चलने लगा तो विकास को सहयोगी की जरूरत महसूस हुई. उस की नजर में पुरुष की अपेक्षा महिला सहयोगी ज्यादा अच्छी लगी. उसे लगता था कि औरतें कम पैसे में भी मेहनत और ईमानदारी से काम करती हैं. इस बारे में उस ने अपने दोस्त प्रवीण धाड़ी से बात की तो उस ने सुनीता की नौकरी उस के यहां लगवा दी. सुनीता को नौकरी की जरूरत थी ही, इसलिए कम वेतन पर भी उस ने विकास के यहां नौकरी कर ली.
इस तरह सुनीता विकास को एक सहयोगी के रूप में मिल गई. विकास सुनीता का काफी ध्यान रखता था. उस का ध्यान रखना सुनीता को अच्छा भी लगता था. परिणामस्वरूप वह विकास के करीब आती गई. उस के करीब आने के बाद सुनीता बीमार पति, शराबी बेटे और अविवाहित बेटी तथा घर के झंझटों से मुक्त रहने लगी.
सुनीता का अपनी ओर झुकाव देख कर विकास भी सुनीता के करीब आने की कोशिश करने लगा. एक दिन सुनीता के दिल की बात भांपने के लिए उस ने कहा, पता नहीं क्यों, आज मेरा काम में मन नहीं लग रहा है. सुनीता ने हंसते हुए कहा, लगता है, पत्नी की याद आ रही है. पत्नी को याद करने सेक्या फायदा? मेरी पत्नी बीमारी की वजह से इतनी कमजोर है कि वह मेरे किसी काम की नहीं है. विकास ने ठंडी सांस लेते हुए कहा. तुम चाहो तो मैं तुम्हारी मदद कर सकती हूं. सुनीता विकास की आंखों में आंखें डाल कर बोली. विकास सुनीता से क्या चाहता है, इस बात से वह अंजान नहीं थी. इसीलिए उस ने उस से इस तरह कहा था.
इस मामले में तुम मेरी क्या मदद कर सकती हो? विकास ने पूछा. तुम मुझे 5 सौ रुपए दो. उस के बाद देखो मैं तुम्हारी कैसे मदद करती हूं. सुनीता ने हंस कर अपना हाथ आगे बढ़ा दिया.
विकास ने जेब से 5 सौ रुपए का नोट निकाल कर सुनीता के हाथ पर रख दिया. उस ने नोट को मुट्ठी में दबाया और बाथरूम में चली गई. कुछ देर बाद जब वह बाहर आई तो उस के बदले रूप को देख कर विकास दंग रह गया.
सुनीता के बदन पर सिर्फ पेटीकोट ब्लाऊज था. विकास जो चाहता था, सुनीता उस के लिए तैयार थी. वहां उन दोनों के अलावा और कोई नहीं था, इसलिए मर्यादा तोड़ कर उन दोनों ने एक नया रिश्ता कायम कर लिया. एक बार मर्यादा टूटी तो उन का जब मन करता, वे एक हो जाते. जब से सुनीता का विकास से संबंध बना था, वह खुश रहने लगी थी. अब उस का मन घर में बिलकुल नहीं लगता था. इस की वजह यह थी कि उस के घर का जो माहौल था, उस में उस का दम घुटता था.
इसीलिए उस का घर से मोह भंग हो गया था. अब उसे विकास ज्यादा अच्छा लगने लगा था. शायद यही वजह थी कि वह उस के साथ विवाह कर के साथ रहने का सपना देखने लगी थी. जबकि विकास के मन में ऐसा कुछ नहीं था. उस का अपना घरपरिवार था. वह अपने परिवार के साथ खुश भी था.
सन 2015 के जून महीने के पहले सप्ताह में एक दिन सुनीता बिना किसी को कुछ बताए अपना सारा सामान ले कर विकास की फैक्ट्री में हमेशाहमेशा के लिए आ गई. उस ने विकास पर शादी के लिए जोर डाला तो दोनों में जम कर झगड़ा हुआ.
विकास ने उसे कंपनी से बाहर जाने के लिए कहा तो उस ने उसे धमकाते हुए कहा, ‘‘अगर तुम ने मुझे यहां से निकाला तो मैं सीधे थाने जा कर तुम्हारे खिलाफ दुष्कर्म का मुकदमा दर्ज करवा दूंगी. उस के बाद तुम जेल तो जाओगे ही, तुम्हारी बदनामी भी खूब होगी.’’
सुनीता की इस धमकी से विकास बुरी तरह डर गया. उस ने सोचा कि अगर सुनीता ने सचमुच ऐसा कर दिया तो वह कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रह जाएगा. अब वह उस से छुटकारा पाने के उपाय सोचने लगा. काफी सोचनेविचारने के बाद उसे लगा कि अब सुनीता से छुटकारा मार कर ही मिल सकता है. बस उस ने खतरनाक फैसला ले लिया.
सुनीता किसी भी तरह अपने घर जाने को तैयार नहीं हुई तो विकास और उस में कहासुनी होने लगी. इसी कहासुनी के बीच विकास को गुस्सा आ गया तो उस ने सुनीता को धक्का दे कर जमीन पर गिरा दिया और प्लास्टिक की थैलियों से उस का मुंह और नाक दबा दिया. जब उस की मौत हो गई तो तसल्ली के लिए उस ने लाश को 2-3 बार उठा कर पटका.
जब उसे पूरा विश्वास हो गया कि सुनीता मर चुकी है तो उस ने उस के दोनों हाथों को पीछे कर के रस्सी से बांध दिए और उसे उठा कर ड्रम में डाल दिया. इस के बाद उसे ऊपर से सीमेंट डाल कर पैक कर दिया और उसे उठा कर बाथरूम में रख दिया. यह 4 जून, 2015 की बात थी.
सुनीता को ठिकाने लगा कर विकास परिवार के साथ शिर्डी चला गया. दूसरी ओर सुनीता घर लौट कर नहीं आई तो उस के घर वाले उस की तलाश करने लगे. 10 जून, 2015 को विकास घूमफिर कर लौटा तो उसे सुनीता की लाश की चिंता हुई. लाश को ठिकाने लगाना बहुत जरूरी था. ड्रम को उठा कर वह दानीवाली नाका ले आया और वहां से टैंपो द्वारा महापे रोड ले गया. उस समय तक रात के 11 बज चुके थे. उस समय तक सड़क सूनी हो चुकी थी.
उस ने टीवीएमटी नाले के पास टैंपो रुकवा कर ड्रम को उतारा और उसे तोड़ कर लाश को बाहर निकाला. इस के बाद लाश को नाले में ले जा कर फेंक दिया और अपने घर आ कर आराम से सो गया. लेकिन वह सुबह उठा तो पुलिस उस के सामने खड़ी थी.
सुनीता की हत्या की पूरी कहानी सुना कर विकास ने वकील के कागज पर दस्तखत कर दिए. अगले दिन जब उसे पता चला कि वह उस की पत्नी द्वारा भेजा गया कोई वकील नहीं, पुलिस अधिकारी था तो उस ने अपना सिर पीट लिया. लेकिन अब क्या हो सकता था. उस ने तो अपना अपराध स्वीकार कर लिया था. पूछताछ के बाद पुलिस ने उसे अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. Extramarital Affair Murder
—कथा पुलिस सूत्रों पर आधा






