Bride Scam. निर्मल के बातबात में गुस्से से तंग आ कर उस की पत्नी दीप्ति दोनों बच्चों को ले कर मायके चली गई थी. निर्मल जैसेतैसे अपने दिव्यांग बेटे भरत को ले तो आया, पर उस की देखभाल के लिए उस ने 2 शादियां की. पहली बीवी उस के गुस्से को बरदाश्त नहीं कर सकी, जबकि दूसरी ने ऐसा खेल खेला कि…
उत्तर प्रदेश के शहर आगरा के थाना शाहगंज के गांव सहारा मिठाकुर के रहने वाले हरीसिंह सोलंकी सेना में नौकरी करते थे. उन का परिवार गांव में ही रहता था. इस परिवार में पत्नी के अलावा 3 बेटे और 3 बेटियां थीं. बड़ा बेटा रणवीर एयरफोर्स में था और अपने परिवार के साथ गुड़गांव में रहता था. उस से छोटा दर्शन सिंह बैंक में था और गाजियाबाद में रहता था. सब से छोटा निर्मल सिंह सौफ्टवेयर इंजीनियर था, जो दिल्ली की किसी कंपनी में नौकरी करता था.
शादी के बाद निर्मल सिंह ने आगरा के सेक्टर 4 स्थित आवासविकास कालोनी में छोटी बहन विशेष के पड़ोस में मकान खरीद लिया था और पत्नी दीप्ति के साथ उसी में रहने लगा था. दीप्ति बीए तक पढ़ी थी. वह आगरा के ही मुरली विहार की रहने वाली थी. उस के पिता एयरफोर्स में नौकरी करते थे.
शुरूशुरू में तो निर्मल का दांपत्य सुखद रहा. दीप्ति ने बीएड की इच्छा जाहिर की तो निर्मल ने अनुमति दे दी. जब दीप्ति बीएड कर रही थी, तभी वह गर्भवती हो गई. समय आने पर उस ने बेटी को जन्म दिया, जिस का नाम हिलोरी रखा गया. बेटी के पैदा होने के बाद दीप्ति का बीएड पूरा हो गया.
निर्मल की नौकरी दिल्ली में थी और वह रहता आगरा में था. नौकरी के लिए वह रोजाना आगरा से दिल्ली आताजाता था. इस की वजह यह थी कि वह पत्नी को बहुत प्यार करता था. हिलोरी 2 साल की हुई तो दीप्ति एक बार फिर गर्भवती हो गई, इसी बीच निर्मल को कंपनी की ओर से अमेरिका जाने का औफर मिला तो उस ने अमेरिका जाने की तैयारी शुरू कर दी. संयोग से जिस दिन उसे अमेरिका जाना था, उसी दिन दीप्ति ने बेटे को जन्म दिया.
निर्मल को बेटा जरूर पैदा हुआ, लेकिन उस के पैदा होने की किसी को खुशी नहीं हुई. इस की वजह यह थी कि बच्चा अपाहिज था. पैदा होते ही उसे आईसीयू में भर्ती कराना पड़ा था. एक ओर पत्नी और विकलांग बच्चा अस्पताल में भर्ती था, दूसरी ओर निर्मल को अमेरिका जाना था. स्थिति बहुत ही अजीब और संकट वाली थी.
निर्मल ने काफी सोचाविचारा, दीप्ति और बच्चे की देखभाल के लिए तो पूरा परिवार था, जिस से आराम से उन की देखभाल हो सकती थी. लेकिन अगर वह अमेरिका नहीं गया तो पता नहीं दोबारा मौका मिले या न मिले, यही सोच कर वह पत्नी और बेटे को उन की हालत पर छोड़ कर अमेरिका चला गया.
दीप्ति को पति का यह फैसला उचित नहीं लगा. पति का यह रवैया उसे मन में फांस की तरह चुभ गया. अपाहिज बच्चे को जन्म दे कर वह अपना दर्द पति के साथ सांझा करना चाहती थी, पर पति 7 समंदर पार चला गया था. बेटे का नाम भरत रखा गया.
अमेरिका से निर्मल फोन द्वारा बेटे और पत्नी का हालचाल लेता रहता था. एक साल बाद निर्मल अमेरिका से लौट आया. उस के आने से घर में खुशी छा जानी चाहिए थी. लेकिन हालात कुछ ऐसे थे कि घर में खुशहाली नहीं आई.
इस की वजह एक तो पतिपत्नी के बीच विकलांग बच्चा था, दूसरे निर्मल का गुस्सा. बच्चे की जैसेजैसे उम्र बढ़ रही थी, उसी के साथसाथ उस की विकलांगता भी बढ़ती जा रही थी. बच्चा बिस्तर से उठ नहीं पाता था. उसे ले कर पतिपत्नी तनाव में रहते थे. बातबात में दोनों के बीच लड़ाईझगड़ा होना आम बात हो गई थी.
निर्मल की सब से बड़ी कमजोरी यह थी कि उसे गुस्सा बहुत जल्दी आ जाता था. गुस्से में वह इस तरह आक्रामक हो जाता था कि दीप्ति पर हाथ तक उठा देता था. जल्दी ही निर्मल का यह व्यवहार दीप्ति के लिए असहनीय हो गया. तंग आ कर उस ने निर्मल को चेतावनी दे दी कि अगर उस का यही रवैया रहा तो वह घर छोड़ कर चली जाएगी. इस के बावजूद निर्मल खुद पर काबू नहीं रख पाया. इस की वजह शायद यह थी कि उसे लगता था कि दिव्यांग बच्चा दीप्ति की गलती से पैदा हुआ है.
धीरेधीरे हालात बेकाबू होते जा रहे थे. पति की हरकतों से तंग आ कर दीप्ति ने अपने मांबाप से भी कह दिया कि अब वह निर्मल के साथ नहीं रह सकती. मांबाप ने भी दामाद को समझाया, लेकिन निर्मल की आदतों में कोई सुधार नहीं आया. जब बात बरदाश्त के बाहर हो गई तो दीप्ति दोनों बच्चों को ले कर मायके चली गई. निर्मल ने सोचा कि 2-4 दिनों में गुस्सा शांत हो जाएगा तो दीप्ति वापस आ जाएगी. लेकिन दिन क्या, महीने गुजर गए, वह लौट कर नहीं आई.
निर्मल को अभी भी उम्मीद थी कि एक न एक दिन दीप्ति जरूर आ जाएगी. लेकिन उस की उम्मीद तब टूट गई, जब उस की ओर से तलाक का नोटिस आ गया. नोटिस आने से वह हैरान तो रह ही गया, उस की उम्मीद भी टूट गई. उस ने सपने में भी नहीं सोचा था कि दीप्ति ऐसा भी कर सकती है. अब वह यह सोचने को मजबूर हो गया कि क्या उन के संबंध इतने खराब हो गए थे कि सुधर नहीं सकते थे.
निर्मल ने पत्नी को मनाने की काफी कोशिश की, लेकिन दीप्ति ने उस से मिलने से साफ मना कर दिया. अब दोनों की मुलाकात अदालत की सीढि़यों पर अजनबियों की तरह होती थी. पत्नी तो गई ही थी, अपने साथ बच्चों को भी ले गई थी. इसलिए वह एकदम अकेला पड़ गया था.
दिन भर का थकामांदा वह घर लौटता तो घर में अंधेरा होता. कोई उजाला करने वाला तक नहीं था. इस सब से उसे दुनिया वीरान सी लगने लगी. वह हमेशा तनाव में रहता. जिंदगी उसे किस ओर ले जा रही है, उसे पता ही नहीं था. नौकरी में भी उस का मन नहीं लगता था. हर तरह से संपन्न होने के बावजूद उस के हाथ खाली थे.
गृहस्थी का सुख शायद निर्मल के हिस्से में था ही नहीं. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि तलाक के बाद वह क्या करेगा? उस के अन्य भाईबहन अपनीअपनी दुनिया में मस्त थे. किसी को उस के दर्द का अहसास नहीं था. सन 2012 में उस का दीप्ति से तलाक हो गया तो सारी उम्मीद खत्म हो गईं. इस बीच दीप्ति को अध्यापिका की नौकरी मिल गई थी. अब वह आर्थिक रूप से सक्षम हो गई थी और अपने दोनों बच्चों को आराम से पालपोस सकती थी.
बच्चों के साथ होने की वजह से दीप्ति निर्मल से ज्यादा खुश थी. निर्मल की तरह वह अकेली नहीं थी. निर्मल बच्चों को अपने घर लाना चाहता था, लेकिन इस के लिए न तो उस के पास समय था, न समझदारी. फिर भी एक दिन वह जबरदस्ती बेटे को उठा लाया. लाना तो वह बेटी को भी चाहता था, लेकिन उसे ला नहीं पाया. बेटे के बहाने अब उसे जीने का मकसद मिल गया था.
कुछ दिनों तक दिव्यांग भरत की देखभाल निर्मल की बहन करती रही, पर निर्मल को लगा कि यह ठीक नहीं है. उसे इस बात का डर सताता रहता था कि उस के बाद विकलांग भरत का क्या होगा? वह भरत को इस लायक बनाना चाहता था कि वह बिना किसी सहारे के अपनी जिंदगी जी सके.
उस ने अच्छे से अच्छे डाक्टरों से उस का इलाज कराने के साथसाथ लाखों रुपए के उस की जरूरत के सामान खरीद दिए. यही नहीं, उस ने शास्त्रीनगर के एक अच्छे इंग्लिश मीडियम स्कूल में उस का दाखिला भी करा दिया. भरत स्कूल वैन से स्कूल जाने लगा. लेकिन कुछ दिनों बाद स्कूल प्रशासन ने भरत को स्कूल ले आने और घर पहुंचाने की जिम्मेदारी से हाथ खींच लिए तो निर्मल खुद उसे स्कूल पहुंचाने और घर लाने लगा.
लेकिन इस के लिए निर्मल को नौकरी छोड़नी पड़ी. अब वह घर पर ही रह कर काम करते हुए बेटे की देखभाल करने लगा. ऐसी स्थिति में उसे पत्नी की कमी महसूस होने लगी. उस के पास किसी चीज की कमी तो थी नहीं, इसलिए उस की शादी अभी भी आराम से हो सकती थी. पत्नी की जरूरत महसूस हुई तो निर्मल ने अपने मथुरा वाले बहनोई राकेश से बात की. राकेश से उस की कुछ ज्यादा ही पटती थी.
राकेश को भी लगा कि अगर घर में एक औरत आ जाएगी तो निर्मल की बहुत सारी समस्याओं का निदान हो जाएगा. वह बेटे की जिम्मेदारी से मुक्त हो जाएगा तो कहीं नौकरी कर लेगा.
इस के बाद वैवाहिक विज्ञापन देखे जाने लगे. कई जगहों पर बातचीत करने के बाद निर्मल ने मेघालय की अंजना (बदला हुआ नाम) को पसंद कर लिया. दोनों की शादी हो गई. अंजना दुलहन बन कर निर्मल के घर आ गई. शादी से पहले निर्मल ने अंजना को अपने दिव्यांग बेटे के बारे में बता दिया था, इसलिए भरत को ले कर उस के मन में कोई दुराव नहीं था.
लेकिन अंजना ने खुशियां पाने के लिए शादी की थी. जबकि जिस घर में वह दुलहन बन कर आई थी, वहां एक तो दिव्यांग बच्चा था, दूसरे बातबात पर गुस्से में लाल होने वाला पति. अंजना को जल्दी ही अहसास हो गया कि उस के अरमानों पर पानी फिर गया है. ऐसे पति और बच्चे के साथ उसे जीवन काटना मुश्किल लगने लगा.
अंजना समझ गई कि निर्मल का तलाक उस के इसी स्वभाव की वजह से हुआ था. अंजना को उस घर में घुटन सी होने लगी. निर्मल ने उस के साथ भी मारपीट शुरू कर दी थी. जब अंजना को लगा कि वह न तो भरत को मां का प्यार दे सकती है और न ही निर्मल को पत्नी का तो एक दिन वह निर्मल और भरत को छोड़ कर मेघालय लौट गई.
बापबेटा एक बार फिर अकेले पड़ गए. इस के बाद भरत की देखभाल की जिम्मेदारी निर्मल की मां रत्ना देवी ने संभाल ली. लेकिन जल्दी ही उन की भी मौत हो गई. निर्मल के सामने एक बार फिर वही समस्या आ गई. निर्मल की समझ में नहीं आ रहा था कि भरत की देखभाल कैसे करे? वैसे तो मां की मौत के बाद बहन ने भरत की देखभाल की जिम्मेदारी ले ली थी, लेकिन इस तरह कब तक चल सकता था.
निर्मल ने एक बार फिर अपने बहनोई राकेश से बात की तो वह उस के लिए पत्नी की तलाश में लग गए. क्योंकि उस के दिव्यांग बेटे की देखभाल के लिए एक मां जरूरी थी. लेकिन ऐसे आदमी से कोई मजबूर लड़की ही शादी कर सकती थी. इसीलिए वह गरीब और मजबूर लड़की ढूंढने लगे.
अब तक भरत 16 साल का हो गया था. किशोर बच्चे की देखभाल के लिए किसी अच्छे घर की लड़की तो मिल नहीं सकती थी. इसलिए राकेश ने ऐसे लोगों से बात करनी शुरू की, जो गरीब और मजबूर लड़कियों की शादी लेदे कर कराते थे.
राकेश को कहीं से पता चला कि पटलोनी का कोई पंडित उत्तराखंड से कोई लड़की लाया था और उस के साथ सुख से जीवन बिता रहा था. उस ने बिचौलियों के माध्यम से और भी कई लड़कों की शादी कराई थी. सभी अपनीअपनी पत्नियों के साथ सुख से रह रहे थे. एक बिचौलिया देवेंद्र के माध्यम से राकेश ने उत्तराखंड के बिचौलिए से बातचीत शुरू की तो उस ने कई लड़कियों की जानकारी और फौटो भेजे.
राकेश और निर्मल 21 मई को देवेंद्र के साथ लड़की देखने उत्तराखंड गए, जहां देवेंद्र ने उन्हें 32 साल की एक तलाकशुदा अध्यापिका को दिखाया. लेकिन उस का 10 साल का बेटा था, जिस की वजह से निर्मल ने उस से शादी करने से मना कर दिया, जबकि वह उस के साथ शादी को तैयार थी. उस से शादी तो निर्मल भी करना चाहता था, लेकिन उस के बेटे की जिम्मेदारी नहीं लेना चाहता था.
इस के बाद उत्तराखंड के बिचौलिया ने एक लाख 25 हजार में तारा नाम की एक लड़की से निर्मल की शादी तय करा दी. तारा पांचवीं पास थी. बिचौलिए का कहना था कि तारा की मां पर काफी कर्ज हो गया है, इसीलिए वह रुपए ले कर बेटी की शादी कर रही है.
बिचौलिए ने निर्मल को 22 मई, 2016 को रुद्रपुर के सरकारी अस्पताल में तारा को दिखाया. तारा निर्मल को पसंद आ गई. लेकिन निर्मल को डर था कि कहीं विचौलिया पैसा और लड़की ले कर भाग न जाए, इसलिए उस ने 22 मई की दोपहर रुद्रपुर और किच्छा के बीच किसी मंदिर में तारा से शादी कर के रुद्रपुर से 25 किलोमीटर दूर आ कर बिचौलिए को पैसे दिए.
बिचौलिए ने ही निर्मल को रुद्रपुर की एक धर्मशाला में कमरा दिलाया था, क्योंकि उस के पास अपना कोई पहचान पत्र नहीं था. चूंकि बिचौलिया धर्मशाला के मैनेजर को जानता था, इसलिए उस के कहने पर मैनेजर ने उसे कमरा दे दिया था.
उसी दिन निर्मल अपनी नई दुलहन को ले कर घर आ गया. पत्नी के आ जाने से निर्मल काफी खुश था. उसी दिन भरत का जन्मदिन था, इसलिए पूरे परिवार ने दोहरी खुशी मनाई. पूरे घर ने तारा का बनाया खाना खाया.
रात को निर्मल और भरत तारा का दिया दूध पी कर सोए तो घर आई नईनवेली दुलहन तारा घर में रखे लाखों रुपए के गहने और नकद रकम ले कर गायब हो गई. जाते समय उस ने दरवाजे पर बाहर से ताला लगा दिया था. रात में उस के साथी गाड़ी ले कर आए थे, वह उन्हीं के साथ सारा माल ले कर भाग गई थी.
सुबह भरत की नींद टूटी तो देखा उस के पापा बिस्तर पर मुंह फैलाए पड़े थे, उन के मुंह से खून भी निकल रहा था. भरत किसी तरह मेन गेट पर पहुंचा और चिल्लाने लगा. उस की आवाज सुन कर पड़ोसी इकट्ठा हो गए और ताला तोड़ कर अंदर पहुंचे तो देखा निर्मल मरा पड़ा था.
पुलिस को सूचना दी गई तो थाना जगदीशपुरा के थानाप्रभारी तेजबहादुर सिंह, सीओ राजेंद्र यादव पुलिस टीम के साथ निर्मल सिंह के घर पर पहुंच गए. हालात का जायजा ले कर तारा के खिलाफ हत्या और लूट का मुकदमा दर्ज कर के जांच शुरू कर दी गई. पुलिस को तारा और बिचौलियों की तलाश थी.
बिचौलिए के 3 नंबर राकेश के पास थे, वे बंद हो चुके थे. काफी भागदौड़ के बाद पुलिस ने काशीपुर की आवासविकास कालोनी से तारा को ढूंढ निकाला, जो सीमा बन कर अपने भाई और प्रेमी के साथ रह रही थी. भाई और प्रेमी तो पुलिस को देख कर भाग निकले, लेकिन तारा पकड़ी गई .
तारा को आगरा ला कर पूछताछ की गई तो पता चला कि वह काशीपुर के गांव बैलजुड़ी निवासी मोहम्मद अली की बेटी रुबीना थी. पता चला कि वह लुटेरों के गिरोह की सदस्य थी. पहले भी ऐसी कई वारदातों को उस ने अंजाम दिया था.
उस ने माना कि जिस दुर्गा को पैसे देने की बात की गई थी, वह उस की नकली मौसी थी, जिसे मां का किरदार निभाने के लिए 5 हजार रुपए दिए गए थे.
रुबीना से पुलिस को पता चला कि उत्तराखंड के शहरों में रुबीना जैसी तमाम लुटेरी दुलहनें इसी तरह ब्याह कर लोगों को लूट रही हैं. Bride Scam






