Honey Trap: दिल्ली होमगार्ड में कंपनी कमांडर रह चुके जगतिंदर सिंह को एक मामले में जेल जाना पड़ा. जेल से बाहर आने के बाद उसे मोटी कमाई का एक नया आइडिया सूझा और उस ने कुछ साथियों के साथ मिल कर गरम गोश्त की कंपनी खोल ली.

दक्षिणपश्चिमी दिल्ली के द्वारका के रहने वाले अशोक शर्मा एक निजी एयरलाइन में पायलट थे. उन के परिवार में पत्नी के अलावा 2 बच्चे थे, जो द्वारका के ही एक नामी पब्लिक स्कूल में पढ़ते थे. वह जिस पद पर नौकरी कर रहे थे, उस से उन्हें अच्छीखासी सैलरी मिलती थी, जिस से घर में सभी तरह की सुखसुविधाएं मौजूद थीं. परिवार में हंसीखुशी थी, लेकिन अक्तूबर, 2015 में उन के साथ एक ऐसी घटना घटी, जिस से उन की खुशियों में ग्रहण लग गया.

हुआ यह कि पायलट अशोक शर्मा अपने खास दोस्तों के साथ बैठे थे, तभी उन के एक दोस्त ने अपने अनुभव शेयर करते हुए कहा, ‘‘एडल्ट फ्रैंड फाइंडर साइट पर एकाउंट बनाने का अलग ही मजा है. उस पर एकाउंट बनाते ही तमाम लड़कियों की फ्रैंड रिक्वैस्ट आ जाती है. इस के बाद मनपसंद लड़की से दोस्ती कर लो.’’

स्मार्ट फोन आने के बाद सोशल साइट्स का क्रेज कुछ ज्यादा ही बढ़ गया है. स्मार्ट फोन प्रयोग करने वाले ज्यादातर लोग वाट्सऐप, फेसबुक या किसी अन्य सोशल साइट से जुड़े होते हैं. अशोक को भी जब कभी समय मिलता, वह वाट्सऐप का उपयोग कर लेते थे. एडल्ट फ्रैंड फाइंडर साइट का नाम सुनने के बाद उन की भी जिज्ञासा इस साइट को देखने की हुई. वह देखना चाहते थे कि आखिर इस साइट में है क्या? वैसे साइट के नाम से ही उन्हें लग रहा था कि इस से जुड़े लोग मैच्योर ही होंगे.

अक्तूबर, 2015 में अशोक शर्मा ने एडल्ट फ्रैंड फाइंडर साइट पर अपना एकाउंट बना लिया. साइट पर रजिस्टर होते ही उन के पास अनेक लड़कियों की फ्रैंड रिक्वैस्ट आ गई. उन में से अशोक ने सिया की फ्रैंड रिक्वैस्ट स्वीकार कर ली. उस की आईडी भी सिया नाम से ही बनी थी. दोनों में चैटिंग होने लगी. उसी दौरान दोनों ने एकदूसरे को अपने फोन नंबर दे दिए तो जबतब उन की फोन पर बातें भी होने लगीं.

बातचीत में सिया ने बताया था कि वह दिल्ली के बुद्धविहार इलाके में रहती है और एक ब्यूटीपार्लर में नौकरी करती है. अशोक शर्मा ने भी अपने बारे में बता दिया था कि वह एक निजी एयरलाइन में पायलट हैं और अपनी बीवी एवं बच्चों के साथ द्वारका में रहते हैं.

सिया काफी खूबसूरत थी. उस की मीठीमीठी बातें अशोक को बहुत अच्छी लगती थीं. सिया ने उन से कई बार मिलने का अनुरोध किया, लेकिन व्यस्तता की वजह से वह उस से मिल नहीं पा रहे थे.

फोन पर अशोक की सिया से बातें जरूर होती रहती थीं, लेकिन उन का मन उस से मिलने को व्याकुल था.

24 अक्तूबर, 2015 को शनिवार होने की वजह से अशोक की छुट्टी थी. वह अपने परिवार के साथ नाश्ता कर रहे थे, तभी सिया का फोन आ गया. औपचारिक बातचीत के बाद सिया ने उस दिन भी उन से मिलने को कहा तो उन्होंने कहा,  ‘‘ठीक है सिया, आज हम मिल ही लेते हैं. बताओ, कहां पहुंचना है?’’

‘‘सर, ऐसा कीजिए, आप दोपहर के समय रोहिणी में एमटूके सिनेमा के पास आ जाइए. मैं वहां पहुंच जाऊंगी.’’ सिया खुश हो कर बोली.

अशोक शर्मा अपनी कार से दोपहर एक बजे के करीब एमटूके सिनेमा हौल के नजदीक पहुंच गए. सिया उन से पहले वहां पहुंच चुकी थी. बीचबीच में वह अशोक को फोन कर के पूछ भी रही थी कि वह कहां पहुंचे हैं, उस ने उन्हें बता दिया था कि वह सिनेमाहाल की बुकिंग विंडो के पास खड़ी है, इसलिए अशोक को सिया को तलाशने में कोई परेशानी नहीं हुई. वह सीधे बुकिंग विंडो के पास पहुंच गए.

एकदूसरे से मिल कर दोनों बहुत खुश हुए. अशोक ने सिया का जो फाटो देखा था, वह उस से कहीं ज्यादा खूबसूरत थी. कुछ देर की बातचीत के बाद अशोक ने उस से किसी रेस्टोरेंट में चलने को कहा तो वह बोली,   ‘‘रेस्टोरेंट में नहीं, चलो मेरे घर चलते हैं, क्योंकि मेरी एक दोस्त आने वाली है. वहीं बातचीत करेंगे. लंच का टाइम हो रहा है, इसलिए आप 2-3 लोगों का लंच पैक करा लीजिए. घर पर ही लंच करेंगे.’’

अशोक शर्मा ने खाना पैक करा लिया. सिया औटो में आई थी, इसलिए वह अशोक की कार में बैठ गई. सिया बुद्धविहार में रहती थी, इसलिए अशोक बुद्धविहार की तरफ चल दिए. सिया बराबर वाली सीट पर बैठी रास्ता बता रही थी.

कार विजयविहार पहुंची तो सड़क किनारे एक पेड़ के नीचे एक लड़की खड़ी दिखाई दी तो सिया ने उस के पास कार रुकवा ली. सिया ने बताया कि यह उस की सहेली सलोनी है. इसे भी उस के साथ कमरे पर चलना है. अशोक भले आदमी थे. उन्होंने सोचा कि जब वह सिया के कमरे पर जा रहे हैं तो इस की सहेली को भी कार से लेते चलते हैं. उन्होंने कार का दरवाजा खोल दिया तो सलोनी कार की पिछली सीट पर बैठ गई. सिया ने सलोनी का परिचय अशोक से करा दिया.

सिया अशोक को बुद्धविहार के फेज वन के ए ब्लौक स्थित अपने फ्लैट पर ले गई. उस का फ्लैट पहली मंजिल पर था. फ्लैट के दरवाजे पर ताला लगा देख कर अशोक ने पूछा,  ‘‘यहां और कोई नहीं रहता क्या? मेरा मतलब तुम्हारे परिवार के अन्य लोग?’’

‘‘नहीं, मैं यहां अकेली ही रहती हूं. परिवार के बाकी लोग दूसरी जगह रहते हैं. मेरी नौकरी वाली जगह यहां से नजदीक है, इसलिए मैं यहां अकेली ही रहती हूं.’’

उस फ्लैट में अशोक, सिया और उस की सहेली सलोनी थी. सभी इधरउधर की बातें करते रहे. थोड़ी देर में सलोनी रेस्टोरेंट से लाया खाना थालियों में निकाल कर ले आई. तीनों ने गपशप करते हुए खाना खाया. अशोक को सिया और उस की सहेली का व्यवहार काफी अच्छा लगा. दोनों उस के साथ इस तरह से व्यवहार कर रही थीं, जैसे वे उन की रिश्तेदार या परिवार की सदस्य हों.

अशोक शर्मा इस बात को नहीं जान रहे थे कि वह किसी बड़ी विपत्ति में फंसने जा रहे हैं. उन्होंने उन दोनों पर आंखें मूंद कर विश्वास कर लिया था. खाना खाने के बाद सलोनी सिया से बोली,  ‘‘दीदी, मैं ने छत पर कुछ कपड़े सुखाने के लिए डाले थे, उन्हें लेने जा रही हूं.’’ ‘‘ठीक है, तुम जाओ.’’ सिया ने कहा.

कमरे से निकलते समय सलोनी ने फ्लैट का दरवाजा भिड़ा दिया था. उस के जाते ही सिया उठ कर अशोक की गोद में बैठ गई और गले में बांहें डाल कर उन के चेहरे को चूमने लगी. अशोक आश्चर्यचकित रह गए, क्योंकि उन्हें उस से ऐसी उम्मीद नहीं थी. उन्होंने कहा भी,  ‘‘यह तुम क्या कर रही हो?’’

‘‘आप मुझे बहुत अच्छे लग रहे हैं. मैं खुद को रोक नहीं पाई और फिर यह सब मैं अपनी मरजी से कर रही हूं.’’

अशोक अभी जवान ही थे. उन्हें एकांत में खुला आमंत्रण मिल रहा था, इसलिए वह भी खुद पर नियंत्रण नहीं रख सके. वह सिया की हरकतों का जो थोड़ाबहुत विरोध कर रहे थे, उसे उन्होंने बंद कर दिया. इस के बाद सिया ने एकएक कर के अपने सारे कपड़े उतार दिए.

सिया के उस रूप को देख कर अशोक मारे उत्तेजना के पागल हो उठे. इस के बाद सिया ने ही उन के भी सारे कपड़े उतार दिए. दोनों ही प्राकृतिक अवस्था में आ चुके थे. इस के बाद दोनों ही एकदूसरे में समा गए. उन का खेल खत्म होता, तभी दरवाजा खोल कर 3 लोग अंदर आ गए. उन में से एक आदमी मोबाइल फोन से उस स्थिति की वीडियो फिल्म बनाने लगा. उन के साथ सलोनी भी थी.

उन लोगों को देख कर सिया अपने कपड़े ले कर तेजी से किचन में चली गई. अशोक भी घबरा गए. उन्होंने जल्दी से अपने कपड़े पहन लिए. कमरे में जो 3 लोग आए थे, उन्होंने खुद को दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच का बताते हुए कहा, ‘‘हमें काफी दिनों से गोपनीय खबर मिल रही थी कि इस फ्लैट में गलत काम होता है. आज रंगेहाथों पकड़े जाने के बाद आखिर सच्चाई सामने आ ही गई.’’

‘‘सर, मैं ने कुछ नहीं किया. सच्चाई तो यह है कि मेरे साथ जबरदस्ती की जा रही थी.’’ अशोक शर्मा ने कहा. ‘‘तुम दोनों जिस हालत में थे, उस का सबूत हमारे पास यह वीडियो फिल्म है. तुम्हारे खिलाफ रेप का केस दर्ज किया जाएगा.’’

उन तीनों में से एक आदमी ने अशोक की तलाशी ले कर उन का पर्स और मोबाइल फोन अपने कब्जे में ले लिया. पर्स में 20 हजार रुपए, कई बैंकों के क्रैडिट और डेबिट कार्ड थे. उसी बीच सलोनी दरवाजे के पीछे खड़ी हो कर रोने लगी.

अशोक ने उन लोगों को अपना परिचय भी दिया, लेकिन उन्होंने उन की एक न सुनी. उन में से एक ने पुलिस स्टाइल में अशोक की कलाई पकड़ कर कहा, ‘‘चलो, तुम लोगों की डाक्टरी करानी पड़ेगी.’’

अशोक उन के सामने गिड़गिड़ाते रहे, लेकिन उन्होंने उन की एक न सुनी. खुद को क्राइम ब्रांच का बताने वाले वे तीनों पायलट अशोक शर्मा की कार में बैठ गए. एक ने ड्राइविंग सीट संभाल ली. सिया और अशोक को उन्होंने अपने पैरों में बैठा लिया. अशोक काफी असमंजस में थे. वह तो केवल दोस्त से मिलने आए थे, उन्हें क्या पता था कि वह इतनी बड़ी मुसीबत में फंस जाएंगे.

तीनों उन्हें रोहिणी के एक सरकारी अस्पताल ले गए. अशोक को घबराहट हो रही थी. उन्हें चिंता इस बात की थी कि अगर यह बात उन के घर वालों को पता चल गई तो वह जीतेजी मर जाएंगे. उन की और उन के परिवार की बड़ी बदनामी होगी. वह किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहेंगे.

अस्पताल पहुंचने पर क्राइम ब्रांच के कथित कर्मचारियों में से एक सिया को कार से उतार कर अस्पताल ले गया. बाकी सभी लोग कार में ही बैठे रहे. करीब 10 मिनट बाद वह लौट कर आया और अपने साथियों से बोला, ‘‘लड़की को डाक्टरी के लिए लेडी कांस्टेबल के हवाले कर दिया है. मैडिकल कराने के बाद वह उसे ले आएगी.’’

कार में बैठे पायलट अशोक शर्मा उन लोगों से खुद के बेकसूर होने की बारबार दुहाई देते रहे थे. जबकि उन लोगों का जो सीनियर था, उस का कहना था, ‘‘तुम्हारे ऊपर अब रेप का केस बनेगा. तुम तो लंबे टाइम के लिए अंदर जाओगे ही, तुम्हारी फैमिली भी बरबाद होगी. लड़की के घर वाले तुम्हारे ऊपर रेप का केस दर्ज करा देंगे. भले ही तुम बेकसूर हो, पर तुम्हारी सुनेगा कोई नहीं, क्योंकि मामला लड़की का है.’’

‘‘सर, जैसे भी हो, मुझे इस परेशानी से मुक्त कराइए. मैं आप का यह एहसान कभी नहीं भूलूंगा.’’ अशोक ने कहा.

इस के बाद तीनों एकदूसरे को देखने लगे. आंखों ही आंखों में उन्होंने कोई बात की. इस के बाद उन का सीनियर बोला, ‘‘देखो जी पायलट साहब, अगर तुम 20 लाख रुपए खर्च कर सकते हो तो मामला रफादफा किया जा सकता है.’’ ‘‘20 लाख..?’’ अशोक चौंके, ‘‘यह तो बहुत ज्यादा हैं. मैं इतने रुपए नहीं दे पाऊंगा.’’

‘‘ये कोई ज्यादा नहीं हैं. तुम्हें पता होना चाहिए कि इस में से हमें ऊपर भी पहुंचाना होगा. हमारे ऊपर भी तमाम अधिकारी हैं. उन सभी को इन में से हिस्सा जाएगा. फिर जिस लड़की के साथ तुम पकड़े गए हो, उस का मुंह बंद करने के लिए भी तो रुपए देने होंगे. उसे मनाना बहुत जरूरी होगा. तुम्हारे पास पैसों की कहां कमी है, पायलट हो, अच्छाखासा कमाते हो.’’ उस ने कहा.

‘‘सैलरी तो ठीक मिलती है, लेकिन उसी के हिसाब से खर्च भी तो होता है. मां की बीमारी पर भी काफी पैसा खर्च हो जाता है, इसलिए अभी मेरी हालत ऐसी नहीं है कि मैं 20 लाख रुपए दे सकूं.’’ अशोक ने कहा.

काफी बातचीत के बाद मामला 10 लाख रुपए में फाइनल हो गया. 20 हजार रुपए अशोक के पर्स में रखे थे. वे रुपए निकाल कर उन्होंने पर्स लौटाते हुए कहा कि बाकी रुपए एटीएम से निकाल कर दें.

‘‘मेरे खाते में केवल एक लाख रुपए ही हैं. लगभग 50 हजार रुपए मेरे घर पर हैं. इसलिए इस समय मैं केवल डेढ़ लाख रुपए ही दे सकता हूं, बाकी पैसे इंतजाम कर के दूंगा.’’ अशोक ने कहा तो उन लोगों ने रोहिणी सैक्टर-9 स्थित एक एटीएम से एक लाख रुपए निकलवा कर ले लिए.

जो 50 हजार रुपए अशोक ने घर पर होने की बात कही थी. उन्हें लेने के लिए क्राइम ब्रांच के कथित तीनों अफसर द्वारका स्थित उन के घर गए. अशोक ने घर वाले 50 हजार रुपए भी उन्हें दे दिए. पैसे लेने के बाद उन्होंने कहा, ‘‘ऐसा करो, अपनी गाड़ी से हमें द्वारका सेक्टर-22 के मैट्रो स्टेशन तक छोड़ दो, वहां से हम अपने औफिस चले जाएंगे.’’

उन के कहने पर अशोक ने उन्हें द्वारका सेक्टर-22 के मैट्रो स्टेशन पर छोड़ दिया. उन्हें छोड़ कर अशोक ने जैसे ही अपने घर के लिए कार घुमाई, तीनों मैट्रो से जाने के बजाय औटोरिक्शा से निकल गए. अशोक ने इस घटना के बारे में अपने घर वालों को कुछ नहीं बताया.

अशोक के दूसरे खाते में पैसे तो थे, लेकिन वे 2 दिन बाद निकाले जा सकते थे, क्योंकि उस दिन शनिवार था. उस समय तक बैंक में ग्राहकों के साथ लेनदेन बंद हो चुका था और अगले दिन रविवार की छुट्टी थी. वे 2 दिन उन के लिए बड़े मुश्किल थे. वह बहुत ज्यादा परेशान थे, साथ ही उन्हें सिया से दोस्ती करने का अफसोस भी हो रहा था.

सोमवार को वह बैंक पहुंचे और साढ़े 8 लाख रुपए निकाले. इस बीच क्राइम ब्रांच के उन कथित पुलिसकर्मियों की उन से बात होती रही. वह उन से पैसों के बारे में पूछते रहे. जब उन्हें पता चला कि अशोक ने बैंक से पैसे निकाल लिए हैं तो वे पैसे लेने के लिए द्वारका सेक्टर-22 पहुंच गए और सड़क किनारे एक जगह बुला कर उन से साढ़े 8 लाख रुपए ले लिए.

इस से पहले उन्होंने 2-3 सादे पेपरों पर उन के हस्ताक्षर भी करा लिए थे. इस के बाद उन्होंने अशोक को भरोसा दिया कि अब वह किसी तरह की चिंता न करें. इस केस को वह अपने स्तर से निपटा देंगे. पैसे दे कर अशोक शर्मा ने राहत की सांस ली. सोशल साइट पर सिया की दोस्ती मानसिक परेशानी के साथसाथ सवा 10 लाख रुपए का चूना लगा गई थी. उन्होंने तौबा कर लिया कि किसी लड़की से दोस्ती तो दूर की बात, किसी लड़की से बात तक नहीं करेंगे. उन के साथ जो हुआ था, उस से उन्हें सीख मिल गई थी.

वह अपने रूटीन के कामों में लग कर इस बात को भुलाने की कोशिश कर रहे थे. लेकिन यह ऐसा हादसा था कि अकसर उन्हें याद आ ही जाता था. इसी तरह धीरेधीरे साढ़े 5 महीने बीत गए. 9 मार्च, 2016 को अशोक शर्मा उत्तरपश्चिम जिले के पीतमपुरा में रहने वाले किसी परिचित के पास गए थे. वह पावरहाउस के नजदीक पहुंचे थे कि उन के मोबाइल पर फोन आया.

फोन करने वाले ने अपना नाम राजेश बताते हुए कहा कि वह क्राइम ब्रांच रोहिणी से बोल रहा है. उस ने आगे कहा, ‘‘सिया वाला जो मामला था, उस में आप के बयान लेने हैं. आप को औफिस आना होगा.’’ ‘‘वह मामला तो खत्म हो चुका है.’’ अशोक ने कहा.

‘‘हम ने तो खत्म करने की कोशिश की थी, लेकिन वह लड़की नहीं मान रही है. वह 2 लाख रुपए और मांग रही है. लड़की ने कोर्ट में बयान दिया है कि पुलिस ने आरोपी को छोड़ दिया है. अब हमारे ऊपर कोर्ट का दबाव है. ऐसे में आप का बयान लेना जरूरी हो गया है. इसलिए आप यहां आ जाएं और मामले को निपटा दें.’’ राजेश ने कहा.

यह सुन कर अशोक परेशान हो गए. उन्होंने कहा, ‘‘अब मेरे पास पैसे नहीं हैं, इसलिए मैं एक पैसा नहीं देने वाला.’’ ‘‘पायलट साहब, इस बात को सीरियसली लीजिए, वरना आप परेशानी में फंस सकते हैं. लड़की ने रिपोर्ट दर्ज करा दी तो जेल जाने से कोई नहीं रोक पाएगा. वह लड़की बहुत जिद्दी है. इसलिए मामले को उलझाने के बजाय सुलझा लीजिए.’’ उस ने डराते हुए कहा.

अशोक सवा 10 लाख रुपए दे चुके थे. उन्होंने सोचा कि अगर एक लाख रुपए देने से मामला खत्म होता है तो ठीक ही रहेगा. उन्होंने कहा, ‘‘अब मैं सिर्फ एक लाख रुपए दे सकता हूं.’’

‘‘एक लाख नहीं, ऐसा कीजिए, आप डेढ़ लाख रुपए दे दीजिए. ये पैसे लड़की को दे कर उसे समझा देंगे. पर एक बार आप मिल जरूर लीजिए. रोहिणी पहुंच कर फोन कर देना, जिस से मैं किसी को आप के पास भेज दूं.’’ अशोक ने कहा, ‘‘अभी मैं दिल्ली से बाहर हूं, लौट कर आप से मिलता हूं.’’

राजेश से बात करने के बाद अशोक शर्मा को शक हुआ कि शायद वह किसी ब्लैकमेलर गैंग के चक्कर में फंस गए हैं. उन के दिमाग में तुरंत पुलिस से शिकायत करने का विचार आया. हालांकि वह जानते थे कि पुलिस के पास जाने से उन्हीं की बदनामी होगी, लेकिन दूसरी ओर उन्हें इस बात की भी आशंका थी कि अगर  शिकायत न की गई तो वे उन्हें इसी तरह आगे भी ब्लैकमेल करते रहेंगे.

इस बारे में उन्होंने अपने एक मित्र से सलाह ली तो उस ने तुरंत थाने जा कर शिकायत करने का सुझाव दिया. 14 मार्च, 2016 को अशोक शर्मा उत्तरपश्चिम दिल्ली के थाना मौर्य एन्क्लेव पहुंचे और थानाप्रभारी मुकेश कुमार शर्मा को आपबीती सुना कर लिखित शिकायत दे दी.

शिकायती पत्र मिलने के बाद थानाप्रभारी ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों से बात कर के 16 मार्च, 2016 को भादंवि की धारा 384/388/120बी/34 के तहत रिपोर्ट दर्ज कर जरूरी काररवाई शुरू कर दी. लेकिन 2 महीने बाद भी थाना पुलिस अभियुक्तों के बारे में पता नहीं लगा सकी. इस के बाद डीसीपी विजय सिंह ने 28 मई, 2016 को यह केस स्पैशल स्टाफ को सौंप दिया.

डीसीपी ने औपरेशन सेल के एसीपी सुरेंद्र दहिया के नेतृत्व में पुलिस की एक टीम बनाई, जिस में इंसपेक्टर अरुण कुमार, एसआई राममनोहर, हैडकांस्टेबल सुरेश कुमार, अशोक कुमार, कांस्टेबल धीरज, संजय कुमार, सोमवीर, शैलेंद्र आदि को शामिल किया गया.

यह पुलिस टीम अशोक शर्मा को ले कर बुद्धविहार स्थित उस फ्लैट पर गई, जहां सिया उन्हें ले गई थी. जांच में पता चला कि वह फ्लैट किसी पूजा ने अक्तूबर, 2015 में किराए पर लिया था. पड़ोसियों ने बताया कि पूजा का अपने पति से अकसर झगड़ा होता रहता था. वह 25-26 मार्च, 2016 को फ्लैट खाली कर के चली गई थी.

यहां पुलिस को नई जानकारी यह मिली कि सिया का एक नाम पूजा भी था. इस के बाद पुलिस ने उन फोन नंबरों की जांच की, जिन से अशोक शर्मा को फोन किए गए थे. लेकिन वे सभी फोन नंबर बंद पाए गए. दिक्कत यह थी कि वे फोन नंबर फरजी आईडी पर लिए गए थे. इस के बाद टीम ने साइबर टीम का सहयोग लिया.

साइबर टीम ने उन फोन नंबरों की गहराई से जांच की तो पता चला कि हनीट्रैप के जाल में फांस कर ब्लैकमेलिंग करने वाला यह पूरा एक गैंग था, जिस का मुखिया जगतिंदर सिंह उर्फ जिम्मी था, जो दिल्ली होमगार्ड में कंपनी कमांडर रह चुका था. उस के जो भी साथी थे, वे दिल्ली होमगार्ड के जवान थे.

पुलिस ने जगतिंदर सिंह की खोज की तो 7 जुलाई, 2016 को वह कृष्णाविहार स्थित अपने घर पर ही मिल गया. उस से पूछताछ के बाद पुलिस ने उसी दिन उस के साथियों सुंदरलाल और जितेंद्र सिंह उर्फ प्रिंस को भी गिरफ्तार कर लिया. इन सभी से पूछताछ में उन के गैंग की जो कारगुजारी सामने आई, वह इस प्रकार थी.

मूलरूप से जम्मू का रहने वाला जितेंद्र उर्फ पिं्रंस दिल्ली के मौडलटाउन स्थित एक जिम में इंस्ट्रक्टर था. इस से पहले वह नोएडा के एक नामी नाइटक्लब में बाउंसर था. वह दिल्ली के सुलतानपुरी में रहता था. उस की दोस्ती सिया उर्फ पूजा से थी. वह शादीशुदा थी, लेकिन उस की अपने पति से नहीं बनती थी, इसलिए वह जितेंद्र से शादी करना चाहती थी.

जितेंद्र की दोस्ती दिल्ली होमगार्ड में नौकरी कर चुके जगतिंदर सिंह उर्फ जिम्मी, सुनील और अमित से थी. अमित सुलतानपुरी थाने में एक साप्ताहिक अखबार देने जाता था. वहीं ड्यूटी करने के दौरान जगतिंदर और सुनील से उस की दोस्ती हो गई थी. ये तीनों सन 2014 में दिल्ली के थाना बिंदापुर में दर्ज एक केस में बंद हुए थे.

मामला यह था कि बिंदापुर की रहने वाली रीमा का पति विकलांग था. घर का खर्च चलाने के लिए वह जिस्मफरोशी करती थी. सब कुछ जानते हुए मजबूरी में उस का पति विरोध नहीं करता था. सुनील अकसर रीमा के घर जाता रहता था.

एक दिन सुनील अपने साथ जगतिंदर उर्फ जिम्मी और अमित को भी ले गया. रीमा ने कहा कि जब उसे पैसे एक आदमी के मिले हैं तो वह एक के साथ ही कमरे में जाएगी. पर वे तीनों उस के साथ कमरे में जाना चाहते थे. रीमा के साथसाथ उस के पति ने भी उन का विरोध किया. इस पर गुस्से में अमित ने रीमा के पति की पिटाई कर दी.

फिर क्या था, यहीं से बात बिगड़ गई. रीमा उन तीनों से भिड़ गई. यही नहीं, उस ने फोन कर के पुलिस बुला ली. पुलिस के आने से पहले वे तीनों भाग गए. रीमा ने पुलिस को बताया था कि 3 लड़के उस के यहां लूट करने आए थे. उन्होंने उस के और उस के पति के साथ मारपीट भी की थी.

उस की शिकायत पर पुलिस ने भादंवि की धारा 354, 392, 323, 506, 34 के तहत रिपोर्ट दर्ज कर तीनों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था. बाद में ये तीनों जमानत पर जेल से बाहर आए थे.

जगतिंदर उर्फ जिम्मी और सुनील दिल्ली होमगार्ड में थे. जगतिंदर तो दिल्ली होमगार्ड में सन 2007 से 2012 तक कंपनी कमांडर भी रह चुका था. थानों वगैरह में उसे जो ड्यूटी मिलती थी, जेल जाने के बाद वह बंद हो गई थी. वे बेरोजगार हो गए थे. दूसरे उन पर जो केस चल रहा था, उस के खर्चे के लिए भी वे परेशान थे. वे कोई ऐसा धंधा करना चाहते थे, जिस में अच्छी आमदनी हो.

तभी उन्हें अपने केस के बारे में सोच कर ध्यान आया कि किस तरह रीमा ने उन के खिलाफ फरजी केस बनवाया था. उन्हें लगा कि क्यों न लोगों को हनीट्रैप में फांस कर उन से मोटी रकम वसूली जाए. जितेंद्र उर्फ प्रिंस का एक दोस्त था धीरज, जो दिल्ली के विकासपुरी में रहता था.

धीरज पहले से हनीट्रैप का धंधा कर रहा था. जगतिंदर ने होमगार्ड सुंदरलाल को भी योजना में शामिल कर लिया. सुंदरलाल भी सुलतानपुरी में रहता था. जितेंद्र और जगतिंदर ने धीरज से बात की तो उस ने बताया कि जिस समय लड़की किसी शिकार के साथ आपत्तिजनक स्थिति में हो, वे कमरे में पहुंच कर खुद को दिल्ली पुलिस क्राइम ब्रांच का अधिकारी बता कर उस से मोटी रकम ऐंठ सकते हैं.

होमगार्ड में होने की वजह से वे पुलिस की कार्यशैली और बोलचाल से वाकिफ थे. इसलिए धीरज को भी लगा कि अगर इन के साथ काम किया जाए तो शिकार से रकम झटकने में आसानी रहेगी. इस तरह इन लोगों ने योजना बना कर काम शुरू कर दिया.

योजना के अनुसार, इन्होंने कंप्यूटर एक्सपर्ट एक लड़के मनोज को नौकरी पर रख लिया. उसे एक लैपटौप खरीद कर दे दिया. मनोज का काम सोशल साइट पर लड़कियों के नाम से फरजी एकाउंट बना कर लोगों से दोस्ती करना था. उस ने एक एकाउंट एडल्ट फ्रैंड फाइंडर साइट पर सिया के नाम से बना दिया. लड़की के नाम से प्रोफाइल बना कर उस ने लोगों को फांसना शुरू कर दिया.

इसी साइट पर पायलट अशोक शर्मा ने भी अपना एकाउंट बना रखा था. जब उन के पास सिया की फ्रैंड रिक्वैस्ट आई तो उन्होंने रिक्वैस्ट स्वीकार कर ली. मनोज प्रिया के नाम से अशोक से चैटिंग करने लगा. बात करने के लिए उस ने जितेंद्र उर्फ प्रिंस की प्रेमिका सिया उर्फ पूजा का फोन नंबर दे दिया.

इन लोगों ने योजना को अंजाम देने के लिए बुद्धविहार में एक फ्लैट किराए पर ले लिया था. अब यह सिया की जिम्मेदारी थी कि वह पायलट अशोक शर्मा को फ्लैट तक कैसे लाए? अपनी चिकनीचुपड़ी बातों से सिया उर्फ पूजा ने अशोक को ऐसा फांसा कि वह 24 अक्तूबर, 2015 को उस से मिलने एमटूके सिनेमा हाल के पास पहुंच गए.

सिया के साथ धीरज, जगतिंदर और सुंदरलाल वहां पहले ही पहुंच चुके थे. सिया से मिलने के बाद जब अशोक रेस्टोरेंट से खाना खरीद रहे थे, उसी समय उन लोगों ने अशोक को भलीभांति देख लिया था. योजना के अनुसार, सिया की एक सहेली सलोनी को भी अशोक के साथ कार में बैठना था, इसलिए सिया ने सलोनी को फोन कर के विजय विहार के पास खड़े रहने को कहा था.

सिया अशोक शर्मा की कार में बैठ कर बुद्धविहार स्थित अपने फ्लैट के लिए चली तो विजय विहार में उसे सलोनी खड़ी मिली. कार रुकवा कर उस ने उसे भी कार में बिठा लिया. इस के बाद अशोक को अपने फ्लैट में ले जा कर उन्हें हनीट्रैप में ऐसा फांसा कि वह निकल न सके.

जगतिंदर उर्फ जिम्मी, सुंदरलाल और जितेंद्र सिंह खुद को दिल्ली पुलिस क्राइम ब्रांच का अधिकारी बता कर शिकार को इतना डराते थे कि वह उन्हें मुंहमांगी रकम देने को मजबूर हो जाता था.

पूछताछ में पता चला कि यह गैंग अब तक करीब सौ लोगों को अपना शिकार बना कर उन से लाखों रुपए ऐंठ चुका था. पुलिस ने जगतिंदर सिंह, सुंदरलाल और जितेंद्र उर्फ पिं्रस को गिरफ्तार कर रोहिणी न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

धीरज, सिया उर्फ पूजा और सलोनी की तलाश में पुलिस ने उन के संभावित ठिकानों पर छापे मारे, लेकिन उन का पता नहीं चल सका. पुलिस यह भी जानने की कोशिश कर रही है कि उन के गैंग में और कौनकौन लोग शामिल थे, केस की तफ्तीश एसआई मनोहरलाल कर रहे हैं. Honey Trap

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. अशोक शर्मा और रीमा परिपवर्तित नाम है.

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