Makeup Artist Kidnapping. कुछ अपराधियों को लगता है कि अपहरण कर के फिरौती वसूलना आसान काम है, इसलिए योजना बना कर वे अपहरण तो कर लेते हैं, पर यह भूल जाते हैं कि अब पुलिस भी हाईटेक हो चुकी है.
पश्चिमी दिल्ली का रहने वाला अभिषेक खेत्रपाल भोजपुरी फिल्मों का अभिनेता ही नहीं, बल्कि एक जानामाना मेकअप आर्टिस्ट था. सन 2012 में उसे भोजपुरी फिल्म ‘छबीली’ में सैकेंड लीड रोल मिला था. इस के बाद पता नहीं उसे क्या सूझा कि उस ने अभिनय के बजाय अपने लिए दूसरा ही क्षेत्र चुना. वह अभिनय का मोह छोड़ कर मेकअप के क्षेत्र में उतर गया. वह मौडलों से ले कर तमाम मशहूर हस्तियों का मेकअप करने लगा. जल्दी ही वह फिल्मी कलाकारों का चहेता मेकअप आर्टिस्ट बन गया. इस क्षेत्र में उन का इतना नाम हुआ कि उसे सन 2015 में बेस्ट एयरब्रश मेकअप आर्टिस्ट का अवार्ड मिला. यह खिताब उसे अभिनेत्री सोहा अली खान के हाथों दिया गया था.
इस के बाद अभिषेक ने दिल्ली के जनकपुरी क्षेत्र में ‘ए.के. ब्यूटी वर्ल्ड’ के नाम से मेकअप स्टूडियो खोल लिया. अपने स्टूडियो में सहायक के रूप में उस ने 4-5 लड़कियों को रख लिया था. उस के स्टूडियो में ब्राइडल मेकअप के लिए महिलाओं का भी आना शुरू हो गया. चूंकि अभिषेक एक फेमस मेकअप आर्टिस्ट था, इसलिए अधिकतर युवतियों की यही ख्वाहिश रहती थी कि वह अपना ब्राइडल मेकअप अभिषेक से ही कराएं.
20 अक्तूबर, 2016 की बात है. अभिषेक खेत्रपाल अपने स्टूडियो में थे, तभी उन के मोबाइल पर किसी का फोन आया. अभिषेक ने मोबाइल स्क्रीन देखा तो नंबर अनजान था. उन्होंने इस अनजान नंबर से आई काल को रिसीव किया तो दूसरी ओर से आवाज आई, ‘‘मैं द्वारका से बोल रहा हूं. आज मेरी दिव्यांग बहन की शादी है. उस की इच्छा है कि वह अपना मेकअप आप से कराए.’’
‘‘देखिए, मेरा शेड्यूल बड़ा बिजी है. मेरे पास पहले से कई अपौइंटमेंट हैं. मैं पहले उन से फ्री होऊंगा, उस के बाद समय मिलेगा तो देखा जाएगा.’’ अभिषेक ने कहा. ‘‘सर, कोशिश कीजिए.’’ उस व्यक्ति ने कहा. ‘‘नहीं, मेरे पास समय नहीं है.’’ कह कर अभिषेक अपने काम में जुट गया.
करीब 2 घंटे बाद उसी व्यक्ति ने अभिषेक के मोबाइल पर फिर से फोन कर के वही रिक्वेस्ट की. अभिषेक ने उस व्यक्ति को समझा दिया कि उस के पास टाइम नहीं है. कुछ देर बाद उस व्यक्ति ने अभिषेक को फोन कर के अनुरोध करते हुए कहा, ‘‘सर, मेरी बहन ने जिद पकड़ रखी है कि वह शादी का मेकअप आप से ही कराएगी.’’
उस की बात सुन कर अभिषेक को भी लगा कि जब एक दिव्यांग युवती इतनी जिद कर रही है तो क्यों न वह उस के लिए समय निकाले. उस दिव्यांग युवती के लिए सहानुभूति दिखाते हुए अभिषेक ने उस का मेकअप करने का मन बना लिया. अभिषेक ने उस व्यक्ति से कहा, ‘‘मैं रात 10 बजे के करीब आप के यहां आ सकता हूं. आप अपना एड्रेस दे दीजिए.’’
वह व्यक्ति खुश हो कर बोला, ‘‘आप द्वारका में होटल रेडिसन ब्लू के पास पहुंच जाइए. मैं वहीं गाड़ी भेज दूंगा. मेरा ड्राइवर आप को घर ले आएगा.’’
‘‘मैं गोल्डन कलर की आई-20 कार डीएल10सी ए8261 से ठीक 10 बजे होटल के पास पहुंच जाऊंगा.’’ अभिषेक ने बता दिया.
‘‘ठीक है सर, वहीं पर मेरा ड्राइवर डीएल 1जेड ए 4314 नंबर की कार के साथ मिलेगा.’’ उस व्यक्ति ने कहा.
अपने ब्यूटी स्टूडियो से निपटने के बाद अभिषेक खेत्रपाल निर्धारित समय पर उस दिव्यांग युवती का ब्राइडल मेकअप करने के लिए निकल गए.
अभिषेक जब कभी शाम को घर नहीं लौटता था तो घर वाले समझ जाते थे कि वह काम में व्यस्त होगा. कई बार अपने व्यस्त होने की बात वह अपने घर वालों को बता भी देता था. 20 अक्तूबर को जब वह रात 12 बजे तक घर नहीं पहुंचा तो मां पूपला खेत्रपाल ने उसे फोन किया. उस का फोन स्विच्ड औफ मिला. इस से वह समझ गईं कि बेटा कहीं व्यस्त होगा, इसलिए उस ने अपना फोन बंद कर रखा है.
अभिषेक नादान तो था नहीं, जो घर वाले उस की ज्यादा चिंता करते. वह उच्चशिक्षित और बहुत समझदार था, इसलिए उस की तरफ से वे निश्चिंत रहते थे. बस उन्हें यह लगा रहता था कि उस ने समय पर खाना खाया या नहीं? अगले दिन मां ने अभिषेक को फिर फोन मिलाया. उस का फोन इस बार भी बंद मिला.
21 अक्तूबर, 2016 की रात करीब साढ़े 9 बजे पूपला खेत्रपाल अपने पति सुभाषचंद्र खेत्रपाल के साथ घरेलू बातें कर रही थीं, तभी उन के फोन पर 8506053333 नंबर से फोन आया. फोन करने वाले ने बिना कोई भूमिका बांधे सीधे कहा, ‘‘अभिषेक अब हमारे कब्जे में है. अगर उसे जिंदा देखना चाहते हो तो 2 करोड़ रुपए का इंतजाम कर लो.’’
इतना कर उस ने फोन काट दिया. जवान बेटे के अपहरण की बात सुन कर पूपला खेत्रपाल घबरा उठीं. यह बात उन्होंने अपने पति सुभाषचंद्र को बताई तो वह भी परेशान हो उठे. जिस नंबर से पत्नी के पास फिरौती की काल आई थी, उस नंबर को उन्होंने अपने फोन से मिलाया, पर वह नंबर स्विच्ड औफ मिला. वह पश्चिमी दिल्ली के जनकपुरी के ए-वन ब्लौक में रहते थे. आननफानन में सुभाषचंद्र पत्नी को ले कर थाना जनकपुरी पहुंच गए.
थानाप्रभारी रिछपाल सिंह को सुभाषचंद्र ने बेटे अभिषेक के अपहरण और 2 करोड़ रुपए फिरौती मांगे जाने की बात बताई. थानाप्रभारी को मामला गंभीर लगा. उन्होंने उन से वह फोन नंबर हासिल किया, जिस से उन के पास फिरौती की काल आई थी.
अभिषेक एक धनाढ्य परिवार से था, ऊपर से वह खुद एक जानीमानी शख्सियत था, इसलिए थानाप्रभारी ने इस की सूचना डीसीपी विजय कुमार को दे दी. तब डीसीपी ने इस मामले की रिपोर्ट दर्ज कर तुरंत काररवाई करने के निर्देश दिए.
डीसीपी के निर्देश पर थानाप्रभारी ने अज्ञात अपहर्त्ताओं के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली और केस को सुलझाने के लिए एक पुलिस टीम बनाई. इस टीम में एसीपी (विकासपुरी) सोमेंद्रपाल, एसीपी (औपरेशन) पंकज सूद, इंसपेक्टर नरेश हुडा, थानाप्रभारी (जनकपुरी) रिछपाल सिंह, एसआई लक्ष्मण कुमार चौधरी, एसआई मनोहरलाल, हैडकांस्टेबल सनेज, कांस्टेबल राजेश, भारत सिंह, मनिंदर आदि को शामिल किया गया.
पुलिस ने सब से पहले अपहर्त्ता के उक्त फोन नंबर को सर्विलांस पर लगा दिया. उस फोन की लोकेशन लखनऊ की आ रही थी. पुलिस ने यह पता लगाने की कोशिश की कि यह सिमकार्ड किस के नामपते पर खरीदा गया था. पता चला कि आइडिया कंपनी का यह सिम फरजी नामपते पर लिया गया था. इस से पुलिस समझ गई कि अपहर्त्ता बेहद शातिर हैं, उन्होंने अपने बचने का रास्ता पहले ही खोज लिया है.
पुलिस को यह जानकारी मिली कि आइडिया कंपनी का वह सिमकार्ड पश्चिमी दिल्ली के विकासपुरी के आदिनाथ एंटरप्राइजेज से डिस्ट्रीब्यूट हुआ था. वहां पूछताछ से पता चला कि वह सिम उत्तमनगर स्थित हर्षित कम्युनिकेशन को दिया गया था. हर्षित कम्युनिकेशन पर जतिन और उस का बड़ा भाई बैठता था. पुलिस ने दोनों भाइयों से पूछताछ की तो जतिन ने बताया कि उस ने इस नंबर का सिम सुमित यादव नाम के व्यक्ति को बेचा था.
पुलिस को जांच सही दिशा में जाती लग रही थी. जतिन सुमित यादव को व्यक्तिगत रूप से जानता था. वह उत्तमनगर, विकास नगर के सैनिक एनक्लेव में रहता था. जतिन के सहारे पुलिस सुमित के घर पहुंच गई. वह घर पर ही मिल गया.
सुमित ने बताया कि वह सिम उस ने मोहन गार्डन के डिफेंस एनक्लेव के रहने वाले दीपक उर्फ दीपू को दिया था. उस ने पुलिस को दीपक का घर दिखा दिया.
पुलिस दीपक के घर नहीं गई. उस ने मुखबिर के द्वारा दीपक के बारे में जानकारी जुटाई तो पता चला कि वह घर से गायब है. वह कहां गया है, इस बात का पता नहीं लग सका. मुखबिर ने पुलिस को यह बात भी बता दी कि दीपक का एक घनिष्ठ मित्र है विनोद कुमार उर्फ लंगड़ा, जो डिफेंस कालोनी की गली नंबर-1 में रहता है.
पुलिस टीम विनोद के घर पहुंची. वह घर पर नहीं मिला. घर पर उस के पिता श्रीपाल मिले. उन्होंने बताया कि वह अपने दोस्तों के साथ कहीं घूमने गया है. विनोद के गायब होने से पुलिस को विश्वास हो गया कि विनोद और दीपक साथसाथ हैं. पुलिस ने श्रीपाल से पूछताछ की तो पता चला कि वह मूलरूप से उत्तर प्रदेश के जिला हरदोई के गांव महुआ डांडा के रहने वाले हैं.
पूपला खेत्रपाल के पास फिरौती की जो काल आई थी, उस की लोकेशन लखनऊ की थी और विनोद का पैतृक गांव महुआ डांडा भी लखनऊ के नजदीक था. इस से पुलिस का माथा ठनका कि कहीं ये लोग अभिषेक का अपहरण कर के लखनऊ की ओर तो नहीं ले गए. 24 घंटे बीत चुके थे. पुलिस जल्द से जल्द अपहर्त्ताओं के पास पहुंचने की कोशिश में लगी थी. उधर पूपला खेत्रपाल और सुभाषचंद्र को बेटे की चिंता खाए जा रही थी. वह बारबार पुलिस से संपर्क कर बेटे के बारे में पूछ रहे थे. पुलिस टीम 2 गाडि़यों में सवार हो कर शाम को ही लखनऊ के लिए रवाना हो गईं.
22 अक्तूबर की रात करीब 9 बजे पूपला खेत्रपाल के मोबाइल की घंटी बजी. उत्सुकता से उन्होंने स्क्रीन पर देखा तो वह खुश हुईं, क्योंकि वह नंबर उन के बेटे का था. पर जैसे ही उन्होंने काल रिसीव की, दूसरी ओर से आवाज आई, ‘‘पैसों का इंतजाम हुआ या अभी नहीं?’’
‘‘देखिए, अभी हमारे पास 2 करोड़ तो हैं नहीं, पर हम जल्द ही इंतजाम कर लेंगे. अगर आप एक बार हमारे बेटे से बात करा दें तो बड़ी मेहरबानी होगी. हमारे दिल को तसल्ली हो जाएगी.’’
‘‘आप बात करने को कह रही हैं, हम तो उसे रिहा करना चाहते हैं. लेकिन इस से पहले जो हम ने कहा है, वह पूरा कर दो.’’ कह कर अपहर्त्ता ने फोन काट दिया.
सुभाषचंद्र ने अपहर्त्ता द्वारा किए गए इस फोन की जानकारी पुलिस को दे दी. सर्विलांस टीम ने जांच की तो पता चला कि यह काल उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर के पास से की गई थी.
2 कारों में सवार हो कर जो पुलिस टीम लखनऊ जा रही थी, वह मुरादाबाद ही पहुंची थी कि उसे थाने से जानकारी मिली कि फिरौती के लिए अपहर्त्ता का फिर से फोन आया था. उस के फोन की लोकेशन कानपुर शहर के नजदीक की है. इस से यह स्पष्ट हो गया कि अपहर्त्ता लखनऊ क्षेत्र में ही हैं.
पुलिस टीम ने सब से पहले विनोद के गांव महुआ डांडा जाने का निश्चय किया. पुलिस टीम सुबह के समय हरदोई पहुंच गई. वहां जा कर पता चला कि महुआ डांडा वहां से करीब 25 किलोमीटर दूर था. वह अतरौली थाने के अंतर्गत आता था. दिल्ली पुलिस ने थाना अतरौली पहुंच कर लोकल पुलिस से संपर्क किया. इस के बाद पुलिस टीम विनोद के गांव महुआ डांडा की तरफ चल दी.
लोकल पुलिस से दिल्ली पुलिस को पता चला कि महुआ डांडा गांव बेहद पिछड़ा हुआ है. आज भी वहां अधिकांश घर कच्चे हैं. गांव में शायद ही किसी के पास कार हो. अगर वहां कोई कार वाला पहुंचता है तो ज्यादातर लोगों को उस की जानकारी हो जाती है.
लोकल पुलिस ने किसी बहाने से उस गांव के प्रधान के बेटे को फोन कर के गांव के बाहर बुलवाया. उसे विश्वास में ले कर कहा कि तुम यह पता लगा कर आओ कि इस समय विनोद के घर में कोई बाहरी व्यक्ति तो नहीं है.
प्रधान के बेटे ने पुलिस को उसी समय बता दिया कि विनोद के घर 2 दिन से एक गाड़ी बारबार आजा रही है. इस से दिल्ली पुलिस की उम्मीद और बढ़ गई. प्रधान का बेटा किसी बहाने से गांव में विनोद के घर गया. दिल्ली पुलिस के एसआई लक्ष्मण कुमार और मनोहरलाल भी सादे कपड़ों में उस के साथ गांव तक पैदल गए, पर वे विनोद के घर नहीं गए.
कुछ देर बाद प्रधान के बेटे ने बताया कि घर में विनोद लंगड़े के अलावा 3 और लोग हैं. वे कौन हैं, वह नहीं जानता. एसआई मनोहरलाल ने फोन द्वारा यह जानकारी गांव के बाहर इंतजार कर रही पुलिस टीम को दे दी. विनोद के घर के आसपास वह गाड़ी नजर नहीं आई, जिस से वह गांव आया था.
इसलिए पुलिस ने उस के घर रेड डालनी जरूरी नहीं समझी. पुलिस ने सोचा कि ऐसा न हो कि अपहर्त्ताओं में से कोई अपहृत किए गए अभिषेक को कार से कहीं और ले गया हो. विनोद के घर में रेड डालने की खबर पा कर अपहर्त्ता अभिषेक को नुकसान पहुंचा सकते थे. यही सोच कर पुलिस ने रेड नहीं डाली, बल्कि पुलिस उस गाड़ी का विनोद के घर आने का इंतजार करने लगी.
दोपहर बाद डीएल1जेड ए 4314 नंबर की एक टैक्सी विनोद के घर आई. प्रधान के बेटे ने बताया कि यही टैक्सी यहां 2 दिनों से चक्कर लगा रही है. एसआई मनोहरलाल ने तुरंत इस की सूचना गांव के बाहर ठहरी पुलिस टीम को दे दी. 10 मिनट के अंदर पुलिस टीम गांव महुआ डांडा स्थित विनोद के घर पहुंच गई. उस के घर को चारों तरफ से घेर कर दबिश दी गई. पुलिस ने वहां से 5 युवकों को हिरासत में ले लिया, जिन में विनोद लंगड़ा भी था.
उन से पूछताछ के बाद पुलिस अंदर के तीसरे कोठे में पहुंची. वहीं पर अभिषेक एक खटिया से बंधा पड़ा था. वह हलके नशे में था, लेकिन पुलिस को देखते ही उस की जान में जान आ गई. पुलिस ने उस के रस्सी से बंधे हाथपैर खोले. हाथपैर खुलते ही वह पुलिस वालों से लिपट कर रोने लगा.
पूछताछ में उन युवकों ने अपने नाम विनोद कुमार, दीपक कुमार निवासी डिफेंस एनक्लेव, उत्तमनगर; नासिर अली, गली नंबर 7, उत्तमनगर; नीरज शर्मा निवासी निकट लक्ष्मीनारायण मंदिर, उत्तमनगर और वसीम अंसारी, निवासी हस्तसाल कालोनी, उत्तमनगर, नई दिल्ली बताया.
अभिषेक खेत्रपाल को सुरक्षित बरामद करने की सूचना डीसीपी विजय कुमार को मिली तो उन्होंने राहत की सांस ली. उन्होंने अभिषेक के मातापिता को भी यह खबर दे दी. वे मारे खुशी के फूले नहीं समा रहे थे.
पांचों अभियुक्तों को हिरासत में ले कर पुलिस टीम दिल्ली लौट आई. सभी से पूछताछ करने पर अभिषेक के अपहरण की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी—
सुभाषचंद्र खेत्रपाल पश्चिमी दिल्ली के जनकपुरी में अपनी पत्नी पूपला खेत्रपाल और बेटे अभिषेक के साथ रहते थे. सुभाषचंद्र सरकारी अधिकारी थे, जबकि उन की पत्नी जुपिटर नाम से बुटीक चलाती थीं. बेटे को उन्होंने दिल्ली के जानेमाने निजी स्कूल में पढ़ाया था. पढ़ाई के दौरान ही उस का रुझान फिल्मों की तरफ हो गया था. उस के रुझान को देखते हुए उन्होंने उसे नोएडा की फिल्म सिटी स्थित एशियन एकेडमी औफ फिल्म ऐंड टेलीविजन में पढ़ाई की इजाजत दे दी थी. वहां से सन 2010 में कोर्स पूरा करने के बाद वह फिल्म इंडस्ट्री में अपनी जगह बनाने में जुट गया.
शुरुआत में अभिषेक को कई फिल्मों और नाटकों में छोटेछोटे रोल मिले. दूरदर्शन के कई कार्यक्रमों में भी वह शामिल हुआ. हिंदी फिल्मों के अलावा उस के पास भोजपुरी फिल्मों में काम करने के औफर आए. उसे सन 2012 में भोजपुरी फिल्म ‘छबीली’ में सैकेंड लीड रोल मिला.
अभिनय के दौरान ही उस का रुझान मेकअप की ओर हो गया. वह शूटिंग के दौरान फिल्मी कलाकारों का मेकअप करने लगा. उस का मेकअप वर्क सभी को पसंद आने लगा. इस के बाद तो वह केवल हिंदी फिल्मों के ही नहीं, बल्कि भोजपुरी फिल्म कलाकारों का भी चहेता मेकअप आर्टिस्ट बन गया. फिल्मी हस्तियों के अलावा मशहूर मौडल्स भी उस से मेकअप कराने लगीं.
अभिषेक खेत्रपाल के काम की ही बदौलत उसे सन 2015 में बेस्ट एयरब्रश मेकअप आर्टिस्ट का अवार्ड मिला. इस के बाद अभिषेक ने दिल्ली के जनकपुरी में ए.के. ब्यूटी वर्ल्ड नाम से एक मेकअप स्टूडियो खोल लिया. अपने स्टूडियो में वह ब्राइडल मेकअप स्पैशलिस्ट का काम करने लगा. ब्राइडल मेकअप के लिए उस के पास पहले से ही अपौइंटमेंट फिक्स रहते थे.
अभिषेक की मां पूपला खेत्रपाल का जो बुटीक था, उस पर वसीम अंसारी नाम का एक युवक टेलरिंग का काम करता था. वसीम उत्तमनगर की हस्तसाल कालोनी में रहता था. यह बात सन 2011-12 की है. यहां से काम छोड़ कर वसीम जनकपुरी के ही रेडरौक नाम के रेस्टोरेंट में काम करने लगा. कुछ दिनों बाद यह रेस्टोरेंट बंद हो गया तो उसे उत्तमनगर के मोहन गार्डन में बिरयानी की एक जानीमानी दुकान में नौकरी मिल गई.
वहीं पर वसीम की मुलाकात दीपक उर्फ दीपू, नीरज शर्मा और विनोद कुमार से हुई. ये दोनों मोहन गार्डन के ही डिफेंस एनक्लेव में रहते थे. विनोद की कपड़ों पर प्रैस करने की दुकान थी. इन के बीच दोस्ती बढ़ी तो अपने काम से निपटने के बाद देर शाम को सब विनोद की दुकान पर महफिल जमाने लगे.
वसीम हमेशा ज्यादा पैसे कमाने की सोचता रहता था. इसी के चलते उस ने सन 2014 में कपड़े सिलने की एक फैक्ट्री खरीदी थी. चूंकि उसे इस क्षेत्र का अनुभव था, इसलिए उस ने किसी एक्सपोर्ट फर्म से संपर्क कर के उस के और्डर पर अपनी फैक्ट्री में कपड़े सिलवाने का काम शुरू किया. पर कुछ दिनों बाद ही उस का यह धंधा बंद हो गया. मजबूरन उसे सन 2015 में अपनी फैक्ट्री बंद करनी पड़ी.
बाद में उस ने एक बुटीक खोला. पर यह भी नहीं चला, जिस से उसे बुटीक भी बंद करना पड़ा. लगातार घाटा होने से उस पर काफी कर्ज हो गया था. लोग उस के पास अपने पैसों का तकादा करने आने लगे. उस के पास देने के लिए पैसे थे नहीं, इसलिए उसे उन की बातें भी सुननी पड़ती थीं. वह काफी तनाव में रहने लगा था. कोई ऐसा धंधा भी उसे नजर नहीं आ रहा था, जहां से मोटी आमदनी हो सके.
एक दिन वह अपने दोस्तों विनोद, नीरज और दीपक के साथ अपनी समस्या को ले कर बात कर रहा था, तभी उन्होंने उसे किसी का अपहरण करने का सुझाव दिया. सुझाव तो सही था, पर यह बात समझ में नहीं आ रही थी कि अपहरण किस का किया जाए. उसी दौरान उस के दिमाग में पूपला खेत्रपाल के एकलौते बेटे अभिषेक का ध्यान आया. वह पैसे वाला था. उस का अपहरण करने पर मोटी रकम मिल सकती थी, इसलिए दोस्तों से सलाह करने के बाद वह अभिषेक के ही अपहरण की योजना बनाने लगा.
वसीम अभिषेक के स्वभाव आदि से परिचित था. उस के पास उस का मोबाइल नंबर पहले से ही था. वसीम ने अपने साथियों के साथ अभिषेक की करीब 15 दिनों तक रेकी की. भूमिका तो बंध गई, लेकिन समस्या यह आई कि अभिषेक को अपहरण के बाद रखा कहां जाए. इस समस्या का समाधान विनोद ने कर दिया.
दरअसल विनोद मूलरूप से उत्तर प्रदेश के जिला हरदोई के महुआ डांडा गांव का रहने वाला था. उस के गांव वाले घर में केवल उस की दादी रहती थी, जो कुछ दिनों पहले दिल्ली आ गई थी. अब वह मकान एकदम खाली था. वसीम और दीपक एक दिन विनोद के घर जा कर उस का गांव वाला मकान देख आए. अभिषेक को वहां रखने के लिए उन्हें वह जगह पसंद आई.
वहां से लौटने के बाद ये लोग फरजी नामपते पर 3 सिमकार्ड और एक कार की व्यवस्था में जुट गए. वसीम का एक दोस्त नासिर डीएल 1जेड ए 4314 नंबर की टैक्सी चलाता था. पैसों के लालच में नासिर भी उन की योजना में शरीक हो गया. दीपक ने इस बारे में उत्तमनगर में मोबाइल फोन की दुकान चलाने वाले जतिन से बात की. जतिन अपने बडे़ भाई के साथ हर्षित कम्युनिकेशंस नाम से मोबाइल दुकान चलाता था. हर्षित ने 500 रुपए में दीपक को आइडिया कंपनी के 3 सिमकार्ड दे दिए. वे सिम फरजी नामपते पर खरीदे गए थे.
वसीम की बुआ का एक बेटा था रिजवान, जो दिल्ली के सिविललाइंस इलाके में मंगलम मैडिकेयर सेंटर नाम के अस्पताल में नौकरी करता था. इन सब का प्लान अपहरण के बाद अभिषेक को बेहोशी की हालत में रखने का था. बेहोशी के इंजेक्शन रिजवान ठीक से लगा सकता था, इसलिए वसीम ने रिजवान को पूरी योजना समझा कर उसे भी अपने साथ ले लिया.
यह सब इंतजाम हो जाने के बाद अब अभिषेक के अपहरण की बारी थी. चूंकि वह ब्राइडल मेकअप करने अपने स्टूडियो से बाहर भी जाता था, इसलिए नासिर ने फरजी कस्टमर बन कर उस से अपनी दिव्यांग बहन का ब्राइडल मेकअप करने का अनुरोध किया. शुरू में तो अभिषेक ने खुद के व्यस्त होने की वजह से मना कर दिया, पर बाद में जब उसे उस की विकलांग बहन पर तरस आ गया तो उस ने हां कर दी.
अभिषेक अपनी गोल्डन कलर की आई-20 कार नंबर डीएल10सी ए8261 से 20 अक्तूबर, 2016 की रात करीब 10 बजे द्वारका के होटल रेडिसन ब्लू के पास पहुंचा तो वहां पर विनोद, नासिर, नीरज, दीपक और वसीम पहले से तैयार थे. वसीम को अभिषेक जानता था, इसलिए वह वहां से थोड़ा साइड में खड़ा हो गया था.
अभिषेक की कार जैसे ही उस होटल के नजदीक पहुंची, नासिर ने उसे इशारा किया. अभिषेक अपनी कार नासिर की टैक्सी के नजदीक ले गया. अभिषेक जैसे ही नासिर से बात करने के लिए कार से उतरा, नीरज और दीपक ने उसे जबरदस्ती नासिर की कार में बैठा लिया. दोनों उसे डराधमका कर पिछली सीट पर दबोचे रहे.
तभी रिजवान ने अभिषेक की बांह पर बेहोशी का इंजेक्शन लगा दिया. विनोद और वसीम अभिषेक की कार में सवार हो गए. ये सब लोग वहां से आईजीआई एयरपोर्ट पहुंचे. वहां इन्होंने अभिषेक की कार पार्किंग में खड़ी कर दी और नासिर की टैक्सी से विनोद, दीपक और रिजवान अभिषेक को ले कर हरदोई की तरफ रवाना हो गए. जब भी अभिषेक को होश आता, रिजवान उसे नशे का इंजेक्शन लगा देता. उधर वसीम और नीरज रात में ही बस से हरदोई के लिए निकल गए थे.
इन लोगों ने अभिषेक को विनोद के पैतृक घर में एक खटिया से बांध दिया. उसे वहां सुरक्षित रख कर वसीम और दीपक लखनऊ चले गए. वहीं से वसीम ने अभिषेक की मां पूपला खेत्रपाल को फोन कर के अभिषेक के अपहरण की जानकारी देते हुए 2 करोड़ रुपए की फिरौती मांगी. इस के बाद उन्होंने फिरौती की अगली काल कानपुर से अभिषेक के फोन से की. अभिषेक के घर वाले उन्हें बराबर पैसे देने का आश्वासन देते रहे. उधर अपहर्त्ताओं द्वारा फरजी आईडी पर लिए गए फोन नंबरों के सहारे पुलिस उन तक पहुंचने की कोशिश कर रही थी.
आखिर 23 अक्तूबर को पुलिस को सफलता मिल ही गई. पुलिस ने अपहृत अभिषेक को गांव महुआ डांडा से मुक्त करा कर अभियुक्त दीपक, विनोद, नासिर, नीरज और वसीम को गिरफ्तार कर लिया.
पुलिस ने पांचों अभियुक्तों को दिल्ली की द्वारका कोर्ट के महानगर दंडाधिकारी डा. जगमिंदर सिंह की अदालत में पेश कर के 3 दिनों के पुलिस रिमांड पर लिया. पुलिस ने सभी से विस्तार से पूछताछ कर जरूरी सबूत जुटाए.
इन के मुख्य साथी रिजवान की तलाश की जा रही थी. पता चला कि वह मूलरूप से उत्तर प्रदेश के सीतापुर का रहने वाला था. वसीम को साथ ले कर एसआई लक्ष्मण कुमार, हैडकांस्टेबल सनेज और कांस्टेबल परमिंदर की टीम सीतापुर उस के घर पहुंची. पर वह घर पर नहीं मिला. घर पर उस की मां मिली. उस ने उस के बारे में कुछ भी नहीं बताया.
मां कहीं रिजवान को फोन न कर दे, इसलिए पुलिस ने उस का मोबाइल फोन ले लिया. पड़ोसियों से बात करने पर पता चला कि वह यहां नहीं है तो दिल्ली में होगा या फिर लखनऊ में अपनी बहन के पास मिलेगा. उस की बहन लखनऊ में कहां रहती है, पुलिस के पास उस का पता नहीं था. इसलिए पुलिस लखनऊ कोतवाली के सामने अस्पताल के पास रेडीमेड कपड़े बेचने वाले उस के पिता शफीकुद्दीन के पास पहुंची. दिल्ली पुलिस ने शफीकुद्दीन को पूरी बात बताई. अपहरण के मामले में बेटे के शामिल होने पर शफीकुद्दीन को बहुत दुख हुआ.
पुलिस के कहने पर शफीकुद्दीन ने किसी बहाने से बेटे को अपने पास बुलवाया. आने पर पुलिस ने उसे हिरासत में ले लिया. रिजवान को हिरासत में ले कर पुलिस टीम दिल्ली लौट आई. पुलिस ने रिजवान से भी पूछताछ कर जानकारी हासिल की कि उस ने नशे के इंजेक्शन कहां से जुटाए थे.
फरजी आईडी पर मोबाइल सिम उपलब्ध कराने वाले सुमित यादव और जतिन (नाबालिग) को भी हिरासत में ले कर पूछताछ की गई. जतिन को बाल न्यायालय में पेश कर बालसुधार गृह भेज दिया गया, जबकि अन्य सातों अभियुक्तों को न्यायालय में पेश कर के जेल भेज दिया गया.
जल्दी अमीर बनने का लालच इन युवाओं को अपराध के रास्ते पर ले गया. जितनी उत्साह से उन्होंने इस अपराध को अंजाम दिया, उतने उत्साह से यदि ये सभी मिल कर कोई काम करते तो उस में सफलता मिल सकती थी. काश वे इस बात को समझ पाते कि अपराध चाहे कितनी भी चालाकी से क्यों न किया जाए, पुलिस अपराधियों तक पहुंच ही जाती है. बहरहाल, कथा लिखने तक सातों अभियुक्त जेल में बंद थे. मामले की तफ्तीश एसआई लक्ष्मण कुमार चौधरी कर रहे हैं. Makeup Artist Kidnapping
—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. जतिन परिवर्तित नाम है.






