Human Tree Story. अफ्रीका के जंगलों में मानववृक्ष के पाए जाने की चर्चाएं हमेशा होती रही हैं. प्रोफैसर तांबुतू ने अपनी खोज के लिए मानववृक्ष को ही चुना था. सालों भटकने के बाद उन्होंने मानववृक्ष को खोज भी निकाला, लेकिन…
अफ्रीका के कस्बा नोगांबा के रहने वाले जोमो तांबुतू जानेमाने वनस्पति वैज्ञानिक थे. कस्बे में उन की बहुत इज्जत थी. करीब साल भर पहले उन के कस्बे में एक ऐसी सभा का आयोजन हुआ, जिस में उन्हें अविश्वसनीय लगने वाली विभिन्न खोजों पर प्रेरित करने के लिए भाषण देना था. तांबुतू उस सभा में किसी ऐसे विषय पर भाषण देना चाहते थे, जिस की किसी ने कभी कल्पना तक न की हो.
ऐसे कसी विषय की खोज में उन्होंने रात में अपनी लाइब्रेरी की तमाम किताबें पलट डालीं. आखिर उन्हें ‘फौरेस्ट्स औफ अफ्रीका’ नामक एक किताब मिली. कुछ साल पहले यह किताब उन्हें उन के एक मित्र ने भेंट की थी. उस किताब में एक जगह लिखा था कि अफ्रीका के जंगलों में ऐसे वृक्ष भी पाए जाते हैं, जो देखने में आदमी जैसे होते हैं. इन वृक्षों को मानववृक्ष कहा जाता है. ये वृक्ष आदमी की ही तरह अपने हाथ हिलाते हैं.
वृक्ष की जो विशेषताएं लिखी थीं, वे भी विचित्र थीं. लिखा था, इन वृक्षों की मानव हाथों जैसी डालें थोड़ा आगे की ओर झुक जाती हैं और सामने पड़ी चीज को उठा लेती हैं. अगर चीज खाने वाली हुई तो उसे अपने आप में समेट कर खा जाती हैं. अगर कोई इन पेड़ों को हानि पहुंचाने की कोशिश करता है या उन के पास जा कर उन से छेड़छाड़ करता है, तो उन की लंबी मजबूत डालें उसे लपेट कर तब तक भींचे रहती हैं, जब तक वह मर नहीं जाता.
इन वृक्षों पर किसी तरह का फल नहीं लगता. इन वृक्षों की लंबाई आदमी के बराबर ही होती है, उन के पूरे तने पर हरे रंग के छोटेछोटे पत्ते होते हैं. न वह अपनी जगह से हिल सकते हैं और न किसी तरह की आवाज निकाल सकते हैं. ये वृक्ष भले ही बाहों की तरह अपनी शाखाओं को हिला सकते हैं, नीचे की ओर थोड़ा झुक सकते हैं, लेकिन जंगल के अन्य वृक्षों की तरह ये भी एक ही जगह पर खड़े रहते हैं.
मानववृक्ष को पिछले काफी समय से न तो किसी ने देखा था और न ही उस के बारे में किसी को ठीक से जानकारी थी. किताब में यह भी लिखा था कि अभी तक मानववृक्ष को तलाश करने में किसी ने कोई विशेष दिलचस्प्ी नहीं दिखाई है. लेकिन अगर कोई साहसी व्यक्ति हिम्मत कर के उस की तलाश में लग जाए तो उसे खोजा जा सकता है. यह विषय जोमो तांबुतू को जंच गया.
अगले दिन सभा में जब उन्होंने अपने भाषण में मानववृक्ष की बात शुरू की तो सब की आंखें आश्चर्य से खुली रह गईं. उन्होंने उस किताब की भी चर्चा की, जिस में इस अविश्वसनीय वृक्ष के बारे में लिखा था. इसी विषय पर बात करते हुए उन्होंने आगे कहा, ‘‘हो सकता है, आप लोगों में से किसी ने इस मानववृक्ष के बारे में सुना हो, लेकिन इसे ढूंढ़ने की अभी तक किसी ने कोशिश नहीं की.
अफ्रीका के भयंकर और खतरनाक जंगलों में इस वृक्ष को ढूंढ़ना मुश्किल ही नहीं लगभग असंभव सा है क्योंकि यह काम बहुत ही चुनौती भरा है. फिर भी मैं इस चुनौती को स्वीकार करता हूं. इस वृक्ष को ढूंढ़ निकालने के लिए मैं अपनी पूरी जिंदगी लगा दूंगा. मैं कल ही से इस वृक्ष की खोज में निकल पड़ूंगा.’’
भाषण खत्म होते ही सभी ने तांबुतू का स्वागत तालियों से किया, साथ ही उन के साहस की सराहना भी की. सभी का कहना था कि प्रोफेसर साहब को अपने इस प्रयास में सफलता मिल गई तो वह तो पूरी दुनिया में मशहूर होंगे ही उन की वजह से उन का कस्बा नोगांबा भी पूरी दुनिया भर में मशहूर हो जाएगा.
तांबुतू पहले से ही इस विषय पर गंभीर थे. अब उन का उत्साह भी देखने लायक था. उन के भीतर का आत्मविश्वास उन से एक ही बात कह रहा था कि अगर वह कोशिश करेंगे तो उन्हें सफलता जरूर मिलेगी.
घर आ कर तांबुतू ने उस किताब में दिए गए उन सभी जंगलों की सूची तैयार की, जहांजहां मानववृक्ष के होने की संभावना थी. खोज के लिए उन्होंने पहला स्थान नोगांबा के पास का जंगली इलाका चुना. अगले ही दिन उस जंगल के किनारे कैंप लगा कर प्रोफैसर तांबुतू मानववृक्ष की खोज में निकल पड़े. उन की मदद के लिए हथियारों के साथ और भी तमाम लोग आए थे. उन का एक विश्वस्त नौकर भी साथ था. उन्होंने जंगल का चप्पाचप्पा छान मारा पर कहीं मानववृक्ष नहीं मिला.
उस जंगल में मानववृक्ष नहीं मिला तो तांबुतू ने दूसरे जंगल में उस की खोज शुरू की. सुबह 6 बजे वह अपनी टीम के साथ निकलते तो दिन भर जंगल में भटकने के बाद शाम तक वापस लौटते. एक दिन वह अपने साथियों से अलग हो कर एक घनी जगह पर पहुंच गए, वहां उन्हें अपनी पूंछ पर खड़ा एक काला फनियर नाग नाचता दिखाई दिया. इस तरह का सांप उन्होंने पहले कभी नहीं देखा था. वह मंत्रमुग्ध हो कर उसे देखने लगे. उन्हें पता ही न चला कि नाचता हुआ वह सांप कब उन के करीब आ गया.
तांबुतू ने अचानक सांप को अपने पास देखा तो बंदूक तान कर उस पर गोली चला दी. गोली की आवाज से जंगल गूंज उठा. उन के साथी चौकन्ने हो कर गोली चलने की दिशा की ओर भागे. उन्हें लगा कि प्रोफेसर साहब अवश्य किसी मुसीबत में फंस गए हैं. उधर तांबुतू का निशाना चूक गया तो सांप उन पर हमला करने के लिए तैयार हो गया.
तांबुतू दोबारा गोली चलाते, इस से पहले सांप ने पूंछ के सहारे खड़े हो कर फुंफकार कर अपना फन तांबुतू के हाथ पर मारा. तांबुतू ने अपना हाथ बचा लिया. लेकिन सांप उन के पीछे पड़ गया. सांप उन्हें नुकसान पहुंचाता, उन के साथी आ गए और सांप को पकड़ लिया. तांबुतू को तो मानो नया जीवन मिल गया. उन्होंने सांप के जहरीले दांत निकाल कर उसे अपने पास संभाल कर रख लिया.
उस जंगल में तांबुतू को तरहतरह के अनुभव हासिल हुए पर मानववृक्ष नहीं मिला. तीसरे जंगल में खोज शुरू हुई. इस जंगल में उन्हें अनेक खतरों का समाना करना पड़ा. कई बार वह मौत के मुंह में जातेजाते बचे, लेकिन मानववृक्ष नहीं मिला.
कई महीने बीत गए. तांबुतू अब तक 9 जंगलों में मानववृक्ष की खेज कर चुके थे, पर उन्हें सफलता नहीं मिली थी. अब उन्हें दसवें जंगल में खोज करनी थी. अगर इस जंगल में भी मानववृक्ष नहीं मिलता तो उन की बहुत बड़ी हार होती. उस किताब में इन्हीं 10 जंगलों का जिक्र था. अब इस अंतिम जंगल में मानववृक्ष को ढूंढ निकालना बहुत जरूरी था. क्योंकि उस के न मिलने पर उन की बड़ी बदनामी होती.
तांबुतू की इस खोज के बारे में अफ्रीका के लगभग सभी अखबारों में लगातार समाचार छप रहे थे, इसलिए उन के नाम से रोज ढेर सारे पत्र आते थे, जिन में लोग उन्हें इस खोज के लिए उत्साहित करते थे. तमाम लोगों ने जंगलों से संबंधित तमाम किताब भी भेजी थीं, जो प्रोफेसर के लिए काफी सहायक सिद्ध हुई थीं.
अपने बारे में इस तरह की चर्चा होते देख तांबुतू सोचते कि अगर वह मानववृक्ष की खोज नहीं कर पाए, तो उन की बड़ी बदनामी होगी. इसलिए जैसे भी हो, हर हालत में उन्हें मानववृक्ष की तलाश करनी ही होगी. प्रोफेसर तांबुतू को मानववृक्ष की तलाश करते एक साल 2 महीने बीत गए. अब तक वह काफी निराश हो चुके थे.
इस के बावजूद उन्हें हलकी सी आशा की किरण अब भी नजर आ रही थी. लेकिन कुछ दिनों की खोज के बाद उन्होंने महसूस किया कि अब शायद मानववृक्ष नहीं मिलेगा. इस से उन्हें लगा कि अब उन का जीना बेकार है. लोग उन पर हसेंगे. उन की सारी शोहरत व इज्जत मिट्टी में मिल जाएगी. ऐसी जिंदगी से तो मौत अच्छी है.
यही सोचते हुए वह थकेहारे कैंप में पहुंचे तो अंधेरा घिर चुका था. उन्होंने अपने साथियों को वापस भेज दिया. कैंप में वह अकेले ही रह गए. अब वह आत्महत्या के बारे में सोच रहे थे. ऐसे ही विचारों के बीच वह रात बीत गई. सुबह सैकड़ों लोग प्रोफैसर तांबुतू के कैंप में पहुंचे तो तांबुतू अपने बिस्तर पर इत्मीनान से सो रहे थे.
शोरगुल सुन कर उन की आंख खुली तो प्रोफैसर ने रहस्योद्घाटन किया कि उन्होंने मानववृक्ष की खोज कर ली है. इस के बाद वह सभी को जंगल में उस जगह ले गए, जहां मानववृक्ष था. मानववृक्ष को देख कर वहां आए लोग रोमांचित हो उठे. वे मानववृक्ष के पास जाने की कोशिश करने लगे, तो तांबुतू ने उन्हें रोकते हुए कहा, ‘‘मानववृक्ष के बारे में आप लोगों को जो भी जानना है मुझ से पूछें. वहां जाना ठीक नहीं है.’’
‘‘क्या यह मानववृक्ष हमेशा यहीं खड़ा रहेगा?’’ किसी ने पूछा.
‘‘क्या यह अपने हाथ हिलाता है?’’
‘‘करीब जा कर देख लो, अभी तुम्हारे शरीर का ढांचा हिला कर रख देगा.’’ कहने के बाद प्रोफेसर तांबुतू ने जेब से ब्रैड का एक टुकड़ा निकाल कर मानववृक्ष के ठीक सामने फेंक दिया.
यह देख कर लोगों की आंखें खुली की खुली रह गईं कि मानववृक्ष थोड़ा सा नीचे झुका और बै्रड का वह टुकड़ा उठा कर मुंह में डाल लिया. उस के हाथ इस तरह काम कर रहे थे, जैसे वह लकड़ी का बड़ा सा खिलौना हो.
‘‘क्या यह बोल भी सकता है? रोता, हंसता भी है?’’
‘‘नहीं, यह न बोल सकता है, न हंस या रो सकता है.’’ प्रोफैसर ने कहा.
तभी एक युवक ने अपनी बंदूक संभालते हुए कहा, ‘‘अगर इसे गोली मार दी जाए, तो क्या यह मर जाएगा?’’
प्रोफेसर तांबुतू ने उस युवक को गहरी नजरों से देखा, उस के बाद एकएक शब्द पर जोर देते हुए बोले, ‘‘देखने में यह वृक्ष है, लेकिन यह बहुत ही खतरनाक और मानवजाति को नुकसान पहुंचानेवाला है. इस के करीब जाने का मतलब है मौत के मुंह में जाना. चूंकि यह वृक्ष है, इसलिए इस पर बंदूक की गोली का कोई असर नहीं होगा. इसलिए इस पर गोली बरबाद करनेकी जरूरत नहीं है.’’
वह युवक अपने मित्र के पास जा कर बोला, ‘‘यार, जब मानववृक्ष जमीन से खाने वाली चीज उठा कर मुंह में डाल सकता है तो गोली लगने पर मुंह फाड़ कर चिल्लाने में इस का क्या जाएगा?’’
‘‘अगर मानववृक्ष के बारे में तुम्हें अभी भी तसल्ली नहीं हुई, तो उस पर गोली चला कर देख लो.’’ दोस्त ने कहा.
‘‘मैं तो गोली चलाने ही आगे आया था, लेकिन प्रोफैसर नाराज हो गए.’’
‘‘छोटीछोटी चिडि़यों के शिकार में न जाने कितनी गोलियां बेकार कर दीं, यह तो 60-70 किलोग्राम का होगा. तुम चलाओ गोली, कुछ नहीं कहेंगे वह.’’
फिर क्या था, मित्र के कहने पर युवक ने अपनी बंदूक संभाली और मानववृक्ष के सीने का निशाना साध कर गोली चला दी.
लेकिन यह क्या?
धायं की आवाज के साथ जंगल इंसानी चीत्कार से गूंज उठा. मानववृक्ष धड़ाम से जमीन पर गिरा और उस के सीने से खून निकल कर जमीन पर फैलने लगा. प्रोफैसर तांबुतू उस की ओर भागे और मानववृक्ष पर गिर कर जोरजोर से रोने लगे. लोगों ने देखा, वह कथित मानववृक्ष सचमुच का एक मानव था, जिस के सारे जिस्म पर हरे पत्ते चिपके हुए थे. उस का चेहरा ऊपर किया गया तो सब की आंखें हैरानी और अफसोस से खुली की खुली रह गईं.
वह मानववृक्ष कोई और नहीं, प्रोफैसर तांबुतू का अपना एकलौता 26 साल का जवान बेटा लोमो तांबुतू था. बाद में पता चला कि लोमो डाक्टरी की परीक्षा दे कर अपने पिता से मिलने आया था. उस समय तांबुतू आत्महत्या करने की तैयारी कर रहे थे. सारी बात जानने के बाद पिता की समस्या दूर करने के लिए लोमो ने मेकअप कर के कुछ समय के लिए खुद को मानववृक्ष बनने का निर्णय किया था. इस के लिए प्रोफैसर तांबुतू भी मान गए थे.
परिणाम इस तरह दुखद होगा, इस की उन्होंने कल्पना ही नहीं की थी. Human Tree Story






