National Bravery Awards. बड़े हमेशा बच्चों को नादान समझते हैं. लेकिन कभीकभी यही बच्चे ऐसा कारनामा कर जाते हैं कि बड़े दांतों तले अंगुली दबाने के लिए मजबूर हो जाते हैं. भारत के ऐसे ही 25 बच्चों ने धैर्य और अदम्य साहस दिखाते हुए ऐसे कारनामे कर दिखाए कि उन्हें राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया गया.

दिल्ली के यमुना विहार के रहने वाले दीपक गुप्ता अपने परिवार के साथ केदारनाथ की यात्रा पर गए थे. लेकिन 16 जून, 2013 को वहां अचानक आई बाढ़ का पानी इतना बढ़ गया कि लोग अपनी जान बचाने के लिए इधरउधर भागने लगे. दीपक गुप्ता उस समय मंदिर में थे. बाढ़ का पानी मंदिर तक में घुस गया था. पानी का बहाव इतना तेज था कि लोग उस की चपेट में आ कर बहने लगे. इस अफरातफरी में दीपक गुप्ता के परिवार के लोग अलगअलग हो गए. वह नाम ले कर उन्हें आवाज दे रहे थे. पत्नी और बच्चों की चिंता में दीपक गुप्ता बहुत परेशान हो रहे थे.

इसी बीच उन का 4 साल का बेटा पानी में बहने लगा. साढ़े 8 साल की बेटी महिका गुप्ता ने जब भाई को बहते देखा और उस की चीख सुनी तो वह उसे बचाने के लिए उस की ओर बढ़ी. हालांकि वह तैरना नहीं जानती थी, लेकिन उस ने अपनी जान की परवाह न करते हुए भाई को बचाने की ठान ली. बाढ़ का पानी उस के नाकमुंह तक पहुंच गया था, लेकिन उस ने हिम्मत नहीं हारी. उस ने कोशिश कर के उस के कपड़े पकड़ लिए. फिर एक हाथ से भाई को पकड़ कर किनारे की तरफ लाने लगी.

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बाढ़ में पत्थर वगैरह भी बह कर आ रहे थे. महिका किसी तरह खुद को और भाई को उन से बचा रही थी. पानी के तेज बहाव के बावजूद भी उस ने भाई को कस कर पकड़े रखा. महिका थक चुकी थी. तभी सहायता के लिए उस ने हाथ हिलाया. दोनों बच्चों को मुसीबत में देख कर एक आदमी उन की सहायता के लिए आगे आया और उन्हें सुरक्षित जगह ले गया. फिर मातापिता भी दोनों बच्चों के पास पहुंच गए.

बाढ़ की वजह से केदारनाथ में सब कुछ अस्तव्यवस्त हो गया था. वहां जो लोग फंसे थे. उन्हें खाना और पानी मयस्सर नहीं हो रहा था. दीपक गुप्ता का परिवार भी 3 दिनों तक भूखाप्यासा रहा. इस के बाद वह किसी तरह घर पहुंचे.

अपनी जान की परवाह न करते हुए महिका गुप्ता ने अपने छोटे भाई की जान बचाई थी. इस की मीडिया सहित सभी लोगों ने प्रसंशा की. महिका के अदम्य साहस को देखते हुए भारतीय बाल कल्याण परिषद ने उसे वीरता के भरत पुरस्कार से नवाजा है.

दिल्ली में हुए निर्भया बलात्कार कांड के बाद देश भर में आंदोलन हुए. सभी की एक ही आवाज थी कि बलात्कारियों के खिलाफ सख्त कानून बने. उस समय चूंकि देश में माहौल ऐसा बन गया था, जिस की वजह से सरकार को भी महिलाओं की सुरक्षा को देखते हुए कई कानून बनाने पड़े. बहरहाल निर्भया बलात्कार कांड के बाद यूथ जेनरेशन में जागृति आई. लड़कियां और महिलाएं खुद ही समझने लगीं कि अपनी सुरक्षा के लिए वे क्या करें.

महिलाओं के पक्ष में कानून चाहे कितना भी सख्त क्यों न बन गया हो, लेकिन महिलाओं के प्रति गलत सोच रखने वालों पर कोई खास फर्क नहीं पड़ा. जयपुर के निर्माणनगर की रहने वाली मलाईका सिंह टाक महारानी गायत्री देवी स्कूल में 10वीं कक्षा में पढ़ती थी. उस के पिता प्रौपर्टी डीलर थे.

मलाईका सिंह पढ़ाई में बहुत होशियार थी. पढ़ाई में उसे किसी तरह की परेशानी न हो, इसलिए पिता ने उस का ट्यूशन भी लगा दिया. स्कूल से लौटने के बाद शाम को वह पैदल ही ट्यूशन पढ़ने जाती थी. जहां वह ट्यूशन पढ़ती थी, वह जगह उस के घर से एक-डेढ़ किलोमीटर दूर थी. 15 फरवरी, 2013 की शाम को भी वह ट्यूशन पढ़ने जा रही थी. रास्ते में उस ने सड़क के दूसरे छोर पर एक लड़के को खड़े देखा. वह उसे घूर रहा था.

मलाईका उसे अनदेखा करते हुए आगे बढ़ गई. वह कुछ ही आगे बढ़ी थी कि उस ने देखा कि जो युवक उसे घूर रहा था, वह एकदम उस के करीब आ गया और साथसाथ चलने लगा. मलाईका को उस की नीयत पर शक होने लगा. तभी उस ने उस युवक को किसी दूसरे युवक को इशारा करते देखा. वह घबरा गई. अब दोनों लड़के उस का पीछा करने लगे. मौका मिलते ही दोनों लड़कों ने मलाईका के हाथ पकड़ लिए. मलाईका की चीख निकल गई.

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भीड़भाड़ वाली जगह होने के बावजूद कोई भी उस की मदद के लिए आगे नहीं आया. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि इन बदमाशों से वह कैसे बचे. इसी बीच एक युवक वहां कार ले कर आ गया. जिन 2 युवकों ने उस के हाथ पकड़ रखे थे, उन में से एक कार में बैठ गया और दूसरा मलाईका को कार में धकेलने लगा. उस ने उन बदमाशों से खुद को छुड़ाने की कोशिश की तो उन्होंने मलाईका की पिटाई करनी शुरू कर दी.

बदमाशों ने मलाईका को कार में खींच लिया. लेकिन उस ने किसी तरह खुद को छुड़ा कर कार से बाहर छलांग लगा दी. गाड़ी से तीनों बदमाश भी बाहर आ गए. गुस्से में वे उसे पीटने और अभद्र व्यवहार करने लगे.

इसी दौरान मलाईका के कंधे से उस का बैग गिर गया. उसी बैग में पैन रूपी चाकू रखा हुआ था, जो बैग गिरने से बाहर निकल आया. मलाईका ने हिम्मत कर के उस चाकू को उठा लिया और बदमाशों को डराते हुए अपना बैग ले कर भाग निकली. बदमाशों ने गाड़ी से उस का पीछा किया. एक बुजुर्ग उधर से गाड़ी ले कर आ रहे थे. उन्होंने लड़की को परेशान देखा तो उस ने उसे अपनी गाड़ी में बिठा कर उसे उस के ट्यूशन सेंटर तक पहुंचा दिया.

मलाईका के पिता मुकेश टाक को जब बेटी के साथ घटी घटना की जानकारी हुई तो उन्होंने श्यामनगर थाने में अज्ञात बदमाशों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई, लेकिन पुलिस उन बदमाशों को आज तक नहीं पकड़ सकी. मलाईका सिंह टाक की बहादुरी की भारतीय बाल कल्याण परिषद ने सराहना करते हुए उसे वीरता के गीता चोपड़ा पुरस्कार से सम्मानित किया है.

11 अगस्त, 2012 की बात है. भुसावल (महाराष्ट्र) के महेशनगर के रहने वाले संतोष नारायण चौधरी का करीब 17 साल का बेटा शुभम संतोष चौधरी स्कूल वैन से घर वापस आ रहा था. अपनीअपनी निश्चित जगहों पर वैन से शुभम चौधरी के अलावा अन्य बच्चे उतर गए. उन के उतरने के बाद वैन में ड्राइवर के अलावा 6 साल की रुचि चौधरी और 10 साल की प्राजक्ता चौधरी ही रह गई थीं.

ड्राइवर इन दोनों बच्चियों को भी उन की जगह पर उतारने जा रहा था, तभी अचानक वैन में आग लग गई. गाड़ी में अचानक लगी आग से ड्राइवर घबरा गया.

खुद को आग से घिरा देख कर दोनों बच्चियां चिल्लाने लगीं. राष्ट्रीय राजमार्ग पर शुभम चौधरी ने जब वैन को जलते देखा तो वह वैन की तरफ दौड़ा. ऐसी बात नहीं थी कि जलती हुई वैन पर किसी और की निगाह नहीं पड़ी. आग देख कर लोग वैन के पास पहुंच गए, लेकिन वे असहाय हो कर जलती वैन को देखते रहे. किसी की भी हिम्मत नहीं हो सकी कि वह जलती वैन से बच्चों को निकाल सके.

लेकिन शुभम संतोष जलती वैन के नजदीक पहुंच गया. बच्चियों को वैन से बाहर निकालने के लिए उस ने कार के दरवाजे को खोलने की कोशिश की, लेकिन दरवाजा नहीं खुला. इस कोशिश में दरवाजे का हैंडल टूट गया. उस ने फिर प्रयास किया. दरवाजा अत्यधिक गरम हो जाने की वजह से वह उसे खोल नहीं पाया.

कार के अंदर बच्चियों के चिल्लाचिल्ला कर गले सूख चुके थे. उसी दौरान शुभम ने अपनी बुद्धि का परिचय देते हुए किसी तरह वैन की खिड़की का शीशा तोड़ कर अंदर से दरवाजा खोल दिया. इस के बाद उस ने दोनों लड़कियों को आग की लपटों से बाहर निकाल कर सुरक्षित जगह पर ले गया. इस के बाद उस ने फायर ब्रिगेड औफिस फोन कर के इस की सूचना दी.

बच्चियां आग से झुलस गई थीं और उन्हें बचाने में शुभम चौधरी के हाथ भी जल गए थे. लोगों ने तुरंत उन्हें अस्पताल पहुंचाया. कुछ दिनों इलाज के बाद वे ठीक हो गए. शुभम की सूझबूझ और साहस की वजह से 2 लड़कियों की जान बच गई. भारतीय बाल कल्याण परिषद ने शुभम के इस अदम्य साहस के लिए उसे बहादुरी के संजय चोपड़ा पुरस्कार से सम्मानित किया गया है.

उत्तर प्रदेश के लखनऊ जिले के गांव टीकरी कला के रहने वाले रामस्वरूप कश्यप के परिवार में पत्नी विधाना कश्यप के अलावा 2 बेटे व 3 बेटियां थीं. वह मेहनतमजदूरी कर के जैसेतैसे परिवार को पाल रहे थे. बात पहली मई, 2013 की है. उन की पौने 11 साल की बेटी मौसमी कश्यप गांव की ही 11 साल की केशकली और 8 साल की सोनिया के साथ गोमती नदी के किनारे जानवर चराने गई थी.

उसी दौरान केशकली नदी में नहाने चली गई. नदी में उस समय 20 फुट गहरा पानी था. केशकली को नदी की गहराई का पता नहीं था और न ही वह तैरना जानती थी. इसलिए वह डूबने लगी. सोनिया और मौसमी ने जब केशकली को डूबते देखा तो वे घबरा गईं. मौसमी ने केशकली को बचाने के लिए 20 फुट गहरे पानी में छलांग लगा दी.

उस ने केशकली का दुपट्टा पकड़ लिया और उसे बचाने की कोशिश करने लगी. खुद को बचाने की कोशिश करते हुए केशकली ने मौसमी को कस कर पकड़ लिया, जिस से वह भी डूबने लगी.

सोनिया ने यह देखा तो वह गांव की तरफ शोर मचाते हुए भागी, लेकिन जब तक गांव वाले नदी तक पहुंचे दोनों लड़कियों की डूब कर मौत हो चुकी थी. केशकली को बचाने की कोशिश में मौसमी कश्यप को भी अपनी जान गंवानी पड़ी. मौसमी के हौसले को सलाम करते हुए भारतीय बाल कल्याण परिषद ने उसे मरणोपरांत वीरता के बापू गयाधानी पुरस्कार से सम्मानित किया.

मौसमी कश्यप की ही तरह उत्तर प्रदेश के फैजाबाद के रहने वाले आर्यन राज शुक्ला को भी दोस्तों को बचाने में अपनी जान से हाथ धोना पड़ा. फैजाबाद के नया पुरवा, नियावान का रहने वाला आर्यन राज शुक्ला 13 मई, 2013 को अपने 4 दोस्तों के साथ गुप्ताघाट पर गया. उस के तीनों दोस्त वहां सरयू नदी में नहाने लगे, जबकि आर्यन नदी किनारे बनी सीढ़ी पर बैठ कर उन्हें देख रहा था.

आर्यन के जो 3 दोस्त नदी में नहा रहे थे, वे ज्यादा तैरना नहीं जानते थे. जबकि नदी का पानी 8 फुट  गहरा था. वे नदी की गहराई को समझ नहीं पाए और डूबने लगे. साढ़े 13 साल के आर्यन ने जब दोस्तों की जान संकट में देखी तो उस ने शोर मचाते हुए उन्हें बचाने के लिए नदी में छलांग लगा दी. हालांकि वह तैरना नहीं जानता था. इस के बावजूद भी वह नदी में कूद गया.

शोर सुन कर कुछ लोग वहां पहुंच गए. उन्होंने तुरंत एक बांस आर्यन की तरफ बढ़ा दिया. आर्यन ने डूबते हुए दोस्तों को एकएक कर के बांस के सहारे किनारे तक पहुंचा दिया. अपने साहस और जज्बे से आर्यन अपने तीनों दोस्तों को तो बचाने में सफल हो गया, लेकिन वह खुद डूब गया. उसे अपनी जान गंवानी पड़ी. भारतीय बाल कल्याण परिषद ने आर्यन राज शुक्ला के जज्बे को देखते हुए बहादुरी के बापू गयाधानी पुरस्कार से सम्मानित किया है.

अगर बियाबान में आप को कोई तेंदुआ मिल जाए और भागने का आप को कोई मौका न मिले तो सोचिए कि आप का क्या हाल होगा? और यदि वही तेंदुआ आप पर अटैक कर दे तो कल्पना कीजिए कि आप की क्या दशा होगी? लेकिन 13 साल के एक लड़के ने तेंदुए से जो गुत्थमगुत्था की, उसे सुन कर लोगों ने दांतों तले अंगुली दबा ली.

बात महाराष्ट्र के थाणा जिले के उंमरखंड इलाके की है. थाणा जिले के ही एंबीवैली का रहने वाला अक्षय जयराम रोज रक्षाबंधन के मौके पर उंमरखंड में रहने वाले अपने मामा नवसु नभु सुतार के यहां गया हुआ था.  30 जुलाई, 2012 को अक्षय अपने 17 वर्षीय संजय नवसु सुतार के साथ जंगल में जानवर चराने गया था. पास में ही बाग था. अक्षय उस बाग से फूल तोड़ने के लिए निकल गया.

जब वह फूल तोड़ रहा था, उसी समय एक तेंदुए ने अचानक उस पर अटैक कर दिया. अक्षय की चीख निकल गई और वह उस तेंदुए से खुद को बचाने की कोशिश करने लगा. तेंदुए ने पंजों से उस का चेहरा बुरी तरह घायल कर दिया. अक्षय के चीखने की आवाज सुन कर संजय नवसु सुतार बाग की तरफ गया. उस ने जब अक्षय को तेंदुए से मुकाबला करते देखा तो वह चौंका. उस के हाथ में हंसिया था. शोर मचाते हुए संजय ने भी हंसिए से तेंदुए के ऊपर प्रहार करने शुरू कर दिए.

अक्षय के प्रतिरोध और संजय के आक्रमण से तेंदुआ घबरा कर वहां से भाग खड़ा हुआ. तेंदुए ने अक्षय को काफी घायल कर दिया था. इस अवस्था में भी हिम्मत रखते हुए अक्षय और संजय घर पहुंचे, तब घर वाले अक्षय को अस्पताल ले गए. दोनों बच्चों की हिम्मत और बहादुरी की भारतीय बाल कल्याण परिषद ने भी भूरिभूरि प्रशंसा करते हुए दोनों बच्चों को बहादुरी के बापू गयाधानी पुरस्कार से सम्मानित किया है.

भारतीय बाल कल्याण परिषद हर साल देश के ऐसे बालवीरों को सम्मानित करती है, जिन्होंने अपनी सूझबूझ, धैर्य और अदम्य साहस दिखाते हुए औरों की जान बचाने के लिए अपनी जान की बाजी लगा दी. इस साल ऐसे 25 बच्चों को राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार दिए गए. इन 25 बहादुरों में 9 लड़कियां और 16 लड़के थे. इन में से 5 बच्चे ऐसे भी थे, जिन्हें दूसरों की जान बचाने में अपनी जान से भी हाथ धोना पड़ा.

दरअसल भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की प्रेरणा से सन 1952 में भारतीय बाल कल्याण परिषद की स्थापना हुई थी, तभी से परिषद देश में बहादुरी का अद्भुत काम करने वाले बच्चों को राष्ट्रीय बहादुरी पुरस्कार से सम्मानित करती आ रही है.

गीता चोपड़ा और संजय चोपड़ा पुरस्कार सन 1978 से शुरू किए गए थे. रंगा और बिल्ला नाम के अपराधियों ने दिल्ली के बुद्ध गार्डन में गीता चोपड़ा और संजय चोपड़ा नाम के भाईबहनों की हत्या कर दी थी. उन्हीं की स्मृति में एक बहादुर लड़के को संजय चोपड़ा और बहादुर लड़की को गीता चोपड़ा पुरस्कार से सम्मानित किया जाता है. इस पुरस्कार के तहत दोनों वीर बच्चों को 40-40 हजार रुपए नकद, स्वर्ण पदक और वीरता प्रमाण पत्र दिया जाता है.

बहादुरी के जोखिम भरे काम को करने वाले एक बच्चे को भरत पुरस्कार दिया जाता है. इसे वीरता का सर्वोपरि पुरस्कार माना जाता है. यह पुरस्कार 1987-88 में शुरू किया गया था. तब से अब तक ये पुरस्कार 5-6 बच्चों को ही मिला है. इस पुरस्कार के तहत बच्चे को 50 हजार रुपए नकद गोल्ड मैडल और प्रमाण पत्र दिया जाता है.

भारतीय मूल के एक डाक्टर लंदन में रहते थे. इन के एक चाचा थे बापू गयाधानी, जो गुजरात के बड़ौदा शहर में रहते थे. वह एक समाजसेवी थे. उन्होंने अपने जीवन में अनेक बच्चों की जान बचाई थी. सन 1988 में बापू गयाधानी की मृत्यु हो गई.

अपने चाचा की स्मृति में लंदन में रहने वाले डाक्टर ने बाल कल्याण परिषद के सहयोग से 1988 से बापू गयाधानी पुरस्कार देना शुरू कराया. इन पुरस्कारों के तहत हर बच्चे को 24 हजार रुपए नकद, वीरता पदक और प्रमाण पत्र दिया जाता है. सामान्य वीरता पुरस्कार के लिए हर बच्चे को 24-24 हजार रुपए नकद, वीरता पदक और प्रमाण पत्र दिए जाता है. भारतीय बाल कल्याण परिषद सन 1952 से अब तक 618 बालकों और 253 बालिकाओं को राष्ट्रीय बहादुरी पुरस्कार से सम्मानित कर चुकी है.

अपनी बुद्धि, हिम्मत और सूझबूझ से दूसरों की जान बचाने वाले बच्चों के शौर्य को देखते हुए भारतीय बाल कल्याण परिषद बाल शौर्यवीरों को हर साल सम्मानित करती है. राष्ट्रीय स्तर पर ऐसे बच्चों का चयन करने के लिए परिषद की तरफ से एक चयन समिति बनाई जाती है. चयन समिति में विभिन्न सरकारी विभागों, मंत्रालयों और गैर सरकारी संगठनों के 28 सदस्य शामिल होते हैं.

समिति के पास पूरे देश से तमाम प्रतिष्ठियां पहुंचती हैं. समिति के सदस्य सभी प्रतिष्ठियों का बारीकी से अवलोकन करते हैं, फिर आपस में विचारविमर्श के बाद पुरस्कार देने के लिए बच्चों का चयन किया जाता है. चयन की प्रक्रिया 14 नवंबर यानी बाल दिवस को होती है.

बहादुरी केवल बड़ों की ही बपौती नहीं होती. कई बार छोटे बच्चे भी ऐसा काम कर जाते हैं कि बड़े भी आश्चर्यचकित रह जाते हैं. देश में ऐेसे बालबीरों की कमी नहीं है. हर शहर और गांव में ऐसे बच्चे मिल जाते हैं, जो मौका मिलने पर अपनी बहादुरी का परिचय दे देते हैं. महाराष्ट्र के पुणे शहर के दत्तावाडी की रहने वाली तनवी नंदकुमार ओव्हाल 20 अगस्त, 2012 को एक निर्माणाधीन इमारत में लुकाछिपी का खेल खेल रही थी.

खेलते समय तनवी की 4 साल की बहन निर्मीती इमारत की सीढ़ी के पास छिपने चली गई. जीने के पास ही 7 फुट गहरा एक टैंक था, जिस में पानी भरा हुआ था. लेकिन अंधेरा होने की वह से निर्मीती को टैंक नहीं दिखा. निर्मीती का अचानक पैर फिसल गया और वह पानी के टैंक में गिर गई. साढ़े 7 साल की तनवी ने जब यह देखा तो बहन को बचाने के लिए वह भी उस टैंक में कूद गई.

उसी समय निर्मीती का हाथ तनवी के पैर को छू गया और उस ने निर्मीती को उठा कर अपने कंधों पर रख लिया. उसी दौरान उस इमारत में काम करने वाला एक मजदूर टैंक की तरफ आया, बच्चों को टैंक में देख कर उसे माजरा समझते देर नहीं लगी. तब उस ने दोनों बच्चों को टैंक से बाहर निकाला. तनवी के साहस की वजह से निर्मीती की जान बच गई.

इसी तरह मणिपुर की रहने वाली साढ़े 8 साल की खरीबम गुनीचांद देवी ने साहस व सूझबूझ से एक 9 साल के बच्चे की जान बचाई. बात 24 अक्तूबर, 2012 की है. मणिपुर का रहने वाला 9 वर्षीय माईसान सिंह घर पर अकेला था. उस के घर के पास ही एक तालाब था. तालाब के किनारे ही ट्यूबवेल लगा था. उसी ट्यूबवेल से तालाब में पानी भरा जाता था.

माईसान सिंह ट्यूबवेल चला कर तालाब में पानी भरने की कोशिश कर रहा था कि उस के दाएं हाथ की अंगुली पर करंट आ गया. बिजली के झटके से वह तालाब में गिर गया. 8 फुट गहरे तालाब में गिरने से वह डूबने लगा. उस की आवाज सुन कर उस की चचेरी बहन खरीबम गुनीचांद देवी तालाब की तरफ भागी.

उस ने सब से पहले ट्यूबवेल को बंद किया और मदद को चिल्लाते हुए तुरंत पानी में छलांग लगा दी और डूबते हुए माईसान के बाल और हाथ पकड़ कर किनारे की तरफ लाने लगी.

शोर सुन कर परिवार के सदस्य और अन्य लोग भी वहां पहुंच गए. माईसान की हालत ठीक न होने की वजह से उसे अस्पताल ले जाया गया और उस की जान बच गई. गुनीचांद देवी के वीरतापूर्ण कार्य से उस के भाई माईसान की जान बच गई.

मिजोरम की ही 9 साल की रेमलाल रुहातुआंगी ने 12 अप्रैल, 2013 को नदी में डूबते हुए एक छात्र की जान बचाई थी. भारतीय बाल कल्याण परिषद ने तनवी नंदकुमार ओव्हाल, रेमलाल रुहातुआंगी और खरीबम गुनीचांद देवी को उन के अदम्य साहस को देखते हुए राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया है.

4 मई, 2013 को मणिपुर का रहने वाला साढ़े 12 साल का एम. खयांगथेई अपने 5 दोस्तों के साथ उखरूल जिले की माटक नदी में नहाने गया था. सभी नदी में तैराकी करने लगे. बारिश की वजह से नदी में पानी का स्तर कुछ ज्यादा था, जिस से खयांगथेई और उस के 3 दोस्त जल्दी से नहा कर बाहर आ गए. लेकिन 2 दोस्त नदी में तैराकी करने में मस्त थे.

उसी दौरान उस का एक दोस्त भंवर में फंस कर डूबने लगा. खयांगथेई ने जब दोस्त को डूबते देखा तो उसे बचाने के लिए वह नदी में कूद गया और उसे भंवर से निकाल लाया. एम. खयांगथेई दोस्त की जान बचाने में तो कामयाब हो गया, लेकिन नदी के तेज बहाव में वह खुद बह गया और उस की मौत हो गई. भारतीय बाल कल्याण परिषद ने एम. खयांगथेई की बहादुरी को देखते हुए उसे मरणोपरांत राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया है.

मणिपुर के ही 10 साल के एक और बालक कंगलईनान्वा खेत्रीमयूम को तालाब में डूबते 2 बच्चों की जान बचाने के लिए राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया गया है. खेत्रीमयूम ने 7 दिसंबर, 2012 को 3 साल की लीसा और 2 साल की सानु को एक तालाब में डूबने से बचाया था.

12 साल के सागर कश्यप ने अपने अदम्य साहस के बूते 3 युवाओं की जान बचा कर हैरतअंगेज कारनामा कर दिखाया. दक्षिणपूर्व दिल्ली के गांव मदनपुर खादर का रहने वाला सागर कश्यप पास में स्थित राजकीय सर्वोदय बाल विद्यालय में कक्षा 8 में पढ़ता था. स्कूल की छुट्टी हो जाने के बाद वह पिता भोला कश्यप को रोटी देने आगरा नहर पर जाता था. भोला कश्यप आगरा नहर में मछलियां पकड़ने का ठेका लेते थे.

15 जुलाई, 2012 को भी सागर पिता को रोटी देने आगरा नहर पर गया हुआ था. तभी उस ने 4 युवकों को नहर में डूबते देखा. सागर कश्यप एक अच्छा तैराक था. इसलिए वह तुरंत 12 फुट गहरी नहर में कूद गया और डूबते हुए युवकों को एकएक कर के निकालने लगा. 3 युवकों को तो वह बचाने में सफल हो गया, लेकिन चौथे युवक दीपक को वह नहीं बचा पाया. सागर के पिता भोला कश्यप भी इसी नहर से 100 सेअधिक लोगों की जान बचा चुके हैं. सागर 6 साल की उम्र में ही तैराकी सीख गया था.

सागर की इस उपलब्धि पर उसे विद्यालय के प्रधानाचार्य ने भी सम्मानित किया. भारतीय बाल कल्याण परिषद ने भी 3 युवकों की जान बचाने वाले सागर कश्यप को राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया है. सागर का सपना है कि वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तैराकी की प्रतियोगिताओं में हिस्सा ले कर देश के लिए गोल्ड मैडल लाए.

कर्नाटक के जिला मैसूर के 12 वर्षीय एस.एस. मनोज ने 2 सितंबर, 2012 को कावेरी नदी में डूबती हुई 42 साल की एक विकलांग महिला मनचाम्मा की जान बचाई.

मिजोरम की रहने वाली 12 वर्षीया मलसामतुआंगी अपने भाई और 4 दोस्तों के साथ खेत से सब्जी लेने गई थी. एकदूसरे का हाथ थामे वे नदी पार कर रहे थे. अचानक मलसामतुआंगी का भाई और एक मित्र पानी में गिर गए और फिर पानी के तेज बहाव की वजह से वे नदी में गहराई में पहुंच गए. मलसामतुआंगी डूबते बच्चों को बचाने के लिए उन की तरफ कूद गई.

वह तैरना नहीं जानती थी, इसलिए वह पानी में डूब गई. मलसामतुआंगी के साथ चल रही उस की दोस्त हनी नूरदिनथरी ने उस के छोटे भाई को किसी तरह बचा लिया. भारतीय बाल कल्याण परिषद ने मलसामतुआंगी को मरणोपरांत राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया और एस.एस. मनोज व हनी नूरदिनथरी को भी बहादुरी का पुरस्कार दिया.

14 साल की शिल्पा शर्मा नाम की एक लड़की ने जिस तरह निहत्थे होते हुए एक तेंदुए के चंगुल से अपने छोटे भाई को बचाया, लोगों दांतों तले अंगुली दबा ली. बात 27 अक्तूबर, 2012 की है. हिमाचल प्रदेश के वीसलपुर जिले की रहने वाली शिल्पा अपने छोटे भाई अंशुल के साथ स्कूल जा रही थी. उन्हें स्कूल जाने के लिए जंगल के एक संकरे रास्ते से गुजरना पड़ता था. अंशुल बहन से करीब 20 कदम पीछे चल रहा था.

तभी अचानक एक तेंदुए ने अंशुल पर हमला कर दिया. अंशुल चीखा. तेंदुए ने हमला करने के बाद उसे जमीन पर गिरा कर अपने पंजों में जकड़ रखा था.

भाई की चीख सुन कर शिल्पा ने पीछे की तरफ देखा तो उसे अंशुल दिखाई न दिया, बल्कि तेंदुआ दिखा. तभी उस की नजर तेंदुए के नीचे भाई के जूतों पर गई. यानी तेंदुए ने उसे पूरी तरह अपने नीचे दबा रखा था. हिम्मत कर के शिल्पा तेंदुए की तरफ दौड़ी.

चीखतेचिल्लाते हुए उस ने अपने स्कूल बैग से तेंदुए पर लगातार वार करने शुरू कर दिए. अचानक इस हमले और चीखों को सुन कर तेंदुआ झाडि़यों की तरफ भाग गया.

तेंदुए के हमले से अंशुल की गरदन, सिर और हाथ पर गहरे जख्म हो गए थे. खून से लथपथ भाई को शिल्पा 200 मीटर दूर एक घर में ले गई, जहां से उस के मातापिता को फोन कर के सूचना दी गई. अंशुल को अस्पताल पहुंचाया गया. एक महीने इलाज के बाद वह ठीक हो सका. भारतीय बाल कल्याण परिषद ने अदम्य साहस दिखाने वाली 14 साल की शिल्पा शर्मा को राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार दिया है.

वीरता पुरस्कार पाने वालों में केरल के कोट्टायम जिले के रहने वाले बालक सुबिन मैथ्यू, अखिल बीजू, यधुकृष्णनन वी.एस., मध्य प्रदेश के जिला छिंदवाड़ा के सौरभ चंदेल, छत्तीसगढ़ के अभिषेक एक्का, महाराष्ट्र के रोहित रवि जन्मंची और नागालैंड के एल. मानियो छाछे भी शामिल हैं. इन  सभी ने पानी में डूबते हुए लोगों की जान बचाईं थी.

ऐसा नहीं है कि वीरता पुरस्कार पाने वाले बच्चों को भारतीय बाल कल्याण परिषद भूल जाती है, बल्कि वह वीरता पुरस्कार पाने वाले बच्चों की शिक्षा का भी प्रबंध करती है. शिक्षा अध्ययन के समय सभी बच्चों को पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की स्मृति में मासिक छात्रवृत्ति भी दी जाती है.

इस के अलावा मैडिकल, इंजीनियरिंग, पौलिटेक्निक में प्रवेश के लिए इन्हें विशेष सुविधा दी जाती है. वीर बालकों को उचित सम्मान दिलाने के लिए भारतीय बाल कल्याण परिषद के अलावा दूसरी संस्थाएं भी आगे आ रही हैं.

गणतंत्र दिवस की पूर्वसंध्या पर जब प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने इन बहादुर बच्चों को राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया तो वहां मौजूद उन अभिभावकों की आंखों से आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे, जिन के बच्चों को अन्य बच्चों की जान बचाने में अपनी जान गंवानी पड़ी.

उन का कहना था कि अगर उन के बच्चे भी जीवित होते तो खुशी और ज्यादा होती. फिर भी उन्हें इस बात का फख्र है कि उन के बच्चों ने दूसरों की जान बचा कर ऐसा काम तो कर ही दिया, जिस की पूरा राष्ट्र प्रशंसा कर रहा है. बच्चों को खुली जीपों में बैठा कर सम्मान के साथ गणतंत्र दिवस की परेड में भी शामिल किया गया. इस के बाद एक सप्ताह तक इन्हें बड़े नेताओं से मिलवाया गया और दिल्ली के पर्यटन स्थलों की सैर कराई गई. National Bravery Awards

– मनोहर कहानियां, 2014 में प्रकाशित

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