Love Marriage Tragedy. यह कहानी प्रेम, संदेह और दर्द की है. यह कहानी उस अंजलि की है, जो बस प्यार और विश्वास चाहती थी. यह कहानी उस समीर की है, जिस की असुरक्षाओं ने उस के भीतर एक राक्षस को जन्म दिया और यह कहानी उन अनकहे शब्दों की है, जो अगर कह दिए जाते तो शायद जिंदगी कुछ और होती.
एक समय था जब अंजलि और समीर एकदूसरे की पूरी दुनिया थे. वारजे, पुणे (महाराष्ट्र) का शांत सा इलाका, जहां शामें कोमल थीं और सड़कों पर हवा धीरेधीरे बहा करती थी. इन्हीं सड़कों पर कभी चलते थे हाथ में हाथ डाले हुए समीर जाधव और अंजलि.
दोनों ही बहुत साधारण थे, लेकिन एक मधुर प्रेम कथा थे. अंजलि उस वक्त एक छोटे से प्राइवेट स्कूल में टीचर थी. उस का स्वभाव बहुत ही विनम्र था. मुसकराहट में अपनापन, बातों में सादगी. समीर औटोमोबाइल में डिप्लोमा कर के अपना एक छोटा सा गैराज चलाता था. जिंदगी में बड़ी आकांक्षाएं नहीं थीं, पर छोटीछोटी खुशियों को जीना उसे आता था.
एक दिन बारिश में भीगते हुए समीर स्कूल के सामने रुका. अंजलि ने हंसते हुए कहा, ”इतना क्यों भीग गए? थोड़ा पहले ही कहीं रुक जाते, बारिश में भीगने की क्या जल्दी थी?’’
समीर ने बस मुसकरा दिया. फिर आहिस्ता से बिना झिझके बोला, ”शायद आप को देखने की जल्दी थी.’’
समीर के इस तरह के जवाब से पहले तो अंजलि चौंकी, फिर मुसकरा दी. आगे चल कर यही मुसकान समीर की दुनिया बन गई. उन का रोज का सिलसिला बन गया. कभी कौफी हाऊस तो कभी सड़क किनारे बर्गर, कभी बस यूं ही किसी पार्क में बैठ कर गप्पें करते. उन का प्यार साधारण था, पर बेहद सच्चा.
समीर कहता, ”शायद मैं बहुत बड़ा आदमी तो नहीं बन पाऊंगा, पर तुम्हें दुखी भी नहीं होने दूंगा.’’
जवाब में अंजलि कहती, ”मुझे कोई बड़ी चीजें नहीं चाहिए, बस तुम साथ रहना.’’
ऐसी ही बातें करतेकरते साल 2017 में दोनों ने विवाह कर लिया. घर छोटा था, पर खुशियां बड़ी थीं. कमरे में रोशनी जरूर कम थी, पर दिलों में उजाला बहुत था. लेकिन समय हमेशा एक जैसा नहीं रहता. शुरुआत के दिन बहुत अच्छे गुजरे.
साथ खाना, साथ घूमना, साथ सपने. उसी बीच 2 बच्चे भी हो गए. अंजलि बच्चों में व्यस्त हो गई तो समीर अपने काम में. फिर जिंदगी की असलियत ने दस्तक दी. खर्चे बढ़े. काम का दबाव बढ़ा. रिश्तेदारों की दखलंदाजी शुरू हुई और सब से बड़ी बात यह हुई कि अपनेअपने काम में व्यस्त होने की वजह से उन के बीच बातें कम होने लगीं.
समीर अकसर देर से घर आता, अंजलि चुपचाप बच्चों को खिलापिला कर सुला कर बैठी उस का इंतजार करती रहती. सवाल नहीं करती थी, क्योंकि प्यार में सवाल कहां होते हैं, सिर्फ विश्वास होता है.
लेकिन जहां मौन लंबा होने लगे, वहां गलतफहमियां जन्म लेने लगती हैं. शक वह जहर है, जो धीमेधीमे नसों में उतरता है. एक दिन समीर ने अंजलि के मोबाइल में किसी का मैसेज देखा. मैसेज तो साधारण था, पर समीर का मन साधारण नहीं था उस दिन. मैसेज था, ‘आज औफिस में बहुत तनाव था, अच्छा हुआ तुम ने बात कर ली. थोड़ा अच्छा लगा.’ —सतेज पाटिल.
भेजने वाला कोई पुराना दोस्त था. अंजलि ने यह बात छिपाई नहीं थी. पर समीर के मन में उस पल एक दरार पड़ गई. रिश्ते में पडऩे वाली दरार कभी आवाज नहीं करती, पर वह धीरेधीरे गहरी होती चली जाती है.
शक बढ़ता गया. अब हर चीज मुद्ïदा बन गया. देर से जवाब देना. फोन का पासकोड होना. किसी कौल पर धीमी आवाज में बात करना. समीर को लगता कि अंजलि बदल गई है, जबकि अंजलि हमेशा की तरह थी. बस, थकी हुई थी जीवन से.
इन परिस्थितियों में किसी से थोड़ी सहानुभूति पा लेना अपराध नहीं था. लेकिन शक का कोई इलाज नहीं है, क्योंकि यह दिल को नहीं, अहं को चोट पहुंचाता है. इस बात को ले कर दोनों में झगड़ा होने लगा.
अंजलि ने कई बार कोशिश की कि वह समीर से बात करे कि क्या उसे उस पर भरोसा नहीं है? वह जब समीर से कोई बात करने की कोशिश करती, उस का हमेशा एक ही जवाब होता कि वह बदल गई है. इसलिए वह उस से बात न करे. और वह अंजलि से बात नहीं करता था, क्योंकि अब वह उस की कोई बात सुनना नहीं चाहता था.
अंजलि परेशान रहने लगी थी. मौन बरदाश्त नहीं हो रहा था. अपनी बात वह किसी से कह नहीं पाती थी, इसलिए अकेले में रोती थी. उसे खुद से ज्यादा चिंता अपने दोनों बच्चों की थी. वह चुप रहती, न किसी से शिकायत, न किसी से चर्चा. क्योंकि उस ने समीर को अपनाया था, त्यागा नहीं था. वह उसे खोना भी नहीं चाहती थी. लेकिन कभीकभी किसी एक की चुप्पी, दूसरे की जिंदगी ले लेती है.
समीर के मन का अंधेरा बढ़ता गया. अब उसे हर चीज बनावटी लगने लगी. हंसी, खयाल, साथ और प्यार भी बनावटी लगने लगा. और जब आदमी यह मान ले कि उसे धोखा दिया जा रहा है तो उस के पास 2 रास्ते बचते हैं, एक बात कर के सच जानना और दूसरा बिना पूछे सजा सुना देना.
दुर्भाग्य से समीर ने पहला नहीं, दूसरा रास्ता चुना. उस ने दुनिया को नहीं, अपनी ही पत्नी को अपराधी मान लिया.
फिर कोई शिकायत नहीं, गुस्सा नहीं, बस ठंडा, शांत और योजनाबद्ध निर्णय. समीर ने किसी को कुछ नहीं बताया. किसी दोस्त, परिवार में किसी को, किसी परिचित को भी नहीं. उस ने गोगलवाड़ी इलाके में 18 हजार रुपए महीने के किराए पर एक गोदाम लिया, जहां एकदम सुनसान रहता था. आनेजाने वाले कम, देखने वाले कम और बोलने वाले लोग भी कम. सवाल करने वाले तो और भी कम.
उस ने उसी गोदाम में बनाई लोहा गलाने की भट्ठी. भट्ठी में आग नहीं थी अभी, लेकिन इच्छा जल रही थी. जहां प्रेम समाप्त होता है, वहां मौन हत्या शुरू हो जाती है. समीर के मन में एक ऐसा तूफान चल रहा था, जो किसी को दिखाई नहीं दे रहा था.
वह बाहर से जरूर सामान्य सा दिखाई देता था, रोज की तरह काम पर भी जाता था, हंसता, बोलता, पड़ोसियों से मुसकरा कर मिलता, लेकिन उस के भीतर का दिमाग एकएक बिंदु सोच चुका था.
उस की आंखों में अब प्रेम नहीं था, सिर्फ आरोप थे. उस के भीतर दर्द नहीं था, सिर्फ प्रतिशोध था. और सब से डरावनी बात यह थी कि वह पूरी तरह शांत था.
अंजलि को पता भी नहीं था कि उस के पति ने क्या तय कर लिया है. पता भी कैसे होता. वह न कभी लड़ताझगड़ता था न ताने मारता था. कभी कोई शिकायत भी नहीं करता था. न कभी किसी तरह की धमकी देता था. इसलिए उसे कैसे पता चलता कि उस के जीवन का अंत आ गया है.
समीर गोदाम किराए पर ले ही चुका था. देखने में यह जगह चीजों की मरम्मत करने और फैब्रिकेशन का वर्कशाप जैसी लगती थी. लोगों को लगा कि समीर ने इसे फैब्रिकेशन के काम के लिए लिया है. अच्छा है, उन्नति कर रहा है और जीवन आगे बढ़ा रहा है. लेकिन उस गोदाम के बंद दरवाजों के पीछे, एक चुप्पी उबल रही थी.
उस ने बाजार से लोहे की मोटीमोटी चादरें खरीदीं. उन्हें काट कर और मोड़ कर एक छोटी लेकिन बेहद गर्म होने वाली भट्ठी बनाई. लकडिय़ां जमा कीं, कोयला रखा और एक ड्रम भर कर पेट्रोल. एक लोहे का चिमटा, कुछ औजार और एक अलग सी फुरती, जो हर सामान्य व्यक्ति में नहीं होती.
यह काम वह महीनों से कर रहा था. यह सब देख कर यही लगता था कि वह सिर्फ तैयारी कर रहा है. पर असल में वह अपने भीतर के इंसान को मार रहा था.
अंजलि अभी भी प्रेम में जिए जा रही थी. घर में वह हमेशा की तरह ही रह रही थी. सुबह उठती, अलमारी के ऊपर रखे छोटे से मंदिर में दीप जलाती, फिर रसोई में चाय बनाती. खाना बनाती, बच्चों को तैयार करती, समीर को नाश्ता कराती, सब के लिए लंच बौक्स तैयार करती और समय से स्कूल के लिए निकल पड़ती. उसे उम्मीद थी कि एक न एक दिन समीर फिर से पहले जैसा हो जाएगा.
एक दिन उस ने समीर से धीरे से कहा भी कि अगर उसे उस पर शक है तो दिल खोल कर उस से पूछ ले, वह सब समझा देगी. सत्य सामने आ जाएगा तो वे फिर से पहले जैसे हो जाएंगे.
समीर ने उस समय उस की आंखों में नहीं देखा. शायद इसलिए कि अगर वह देख लेता तो उस का मन बदल जाता. उस ने बस इतना ही कहा, ”अब कुछ भी ठीक नहीं हो सकता अंजलि, क्योंकि अब मेरा मन नहीं बदल सकता.’’
अंजलि चुप रही. कभीकभी यह चुप्पी जानलेवा हो जाती है. उस रोज वह बहुत देर तक रोई थी. उस की सिसकियां धीमी थीं, ताकि बच्चों को सुनाई न दें. समीर भी परेशान न हो. लेकिन समीर के दिल पर अब उस के आंसुओं का कोई असर नहीं होने वाला था. उस ने तो कुछ और ही ठान लिया था, जिस के लिए वह मौका तलाश रहा था. उस ने जो ठान रखा था, उसे पूरा करने के लिए उस ने बच्चों को अपनी ससुराल यानी नानानानी के पास भेज दिया.
एक दिन की शाम कुछ अलग ही कहानी लिखने वाली थी. सूरज अस्त होने वाला था. नीला आसमान हल्का खूनी हो गया था. हवा में कुछ ठंडक आ गई थी और शहर की सड़कों पर भीड़ का शोर बढ़ गया था. उसी तरह समीर की धड़कनें बढ़ गई थीं. मन में उथलपथल मची थी, पर ऊपर से वह शांत था.
उस ने अंजलि की ओर इस तरह देखा, जैसे कि कुछ हुआ ही न हो. उस ने धीमे से कहा, ”चलो, बाहर चलते हैं. बहुत दिन हो गए कहीं बाहर गए. वैसे ही अपना नया गोडाउन भी देख लेंगे और घूम भी लेंगे. रात का खाना भी बाहर ही खा लेंगे.’’
अंजलि ठिठकी. उस के चेहरे पर आश्चर्य और राहत के भाव एक साथ आ गए थे. उस ने हैरानी वाले लहजे में पूछा, ”सच में?’’
समीर ने ‘हां’ में सिर हिलाया. अंजलि ने जल्दी से अपना दुपट्टा ठीक किया, थोड़ी लिपस्टिक लगाई और घर से निकलते समय मन ही मन सोचा कि शायद अब सब ठीक हो रहा है.
यह सोच कर उस के चेहरे पर वही पुरानी वाली मुसकान आ गई थी. जिस मुसकान ने एक समय समीर को दीवाना बनाया था, लेकिन उस दिन वह मुसकान समीर को चुभ रही थी. रास्ते में वह शांत था, अंजलि को भ्रमित कर रहा था. कार हवा को चीरते हुए आगे बढ़ रही थी. अंजलि बगल में बैठी थी.
उस ने अपने हाथ धीरे से समीर की कमर पर रखे. फिर धीमे से मुसकरा कर बोली, ”समीर, जानते हो, मैं अब भी तुम्हें पहले जैसा ही प्यार करती हूं.’’
समीर ने कोई जवाब नहीं दिया. उस ने सिर्फ स्पीड बढ़ा दी. अंजलि ने यह बदलाव महसूस किया, लेकिन वह चुप रही, क्योंकि उसे लगा था कि आज शायद वह सिर्फ समय चाहता है. वह नहीं जानती थी कि समीर
अब समय नहीं चाहता था. वह अंत चाहता था.
कार गोदाम के बाहर रुकी. समीर ने धीमे से कहा, ”हम आ गए, तुम गोदाम के अंदर चलो, मैं कार किनारे खड़ी कर के आता हूं.’’
अंजलि के पास ही गोदाम की चाभी थी. ताला खोल कर वह अंदर घुसी. गोदाम में अंधेरा था. समीर ने पीछे से आ कर लाइट जलाई. अंदर धूल और कटे हुए लोहे की गंध भरी थी.
वातावरण में एक ठंडी खामोशी थी. अंजलि को हल्की बेचैनी सी महसूस हुई. उस ने कहा, ”यह जगह कुछ अजीब सी नहीं लग रही है?’’
समीर ने कहा, ”आओ इधर बैठो, मैं पानी ले आता हूं.’’
अंजलि वहीं पड़ी एक प्लास्टिक की कुरसी पर बैठ गई. वह थोड़ी थकी हुई लग रही थी. और फिर उसी समय समीर उस के पीछे आ कर खामोशी से खड़ा हो गया. अंजलि कुछ समझ पाती, उस ने दोनों
हाथों से उस का गला पकड़ कर दबाना शुरू कर दिया.
अंजलि समझ ही नहीं पाई कि यह क्या हो रहा है. उस की आंखें हैरानी से फैल गई थीं, क्योंकि समीर जिस तरह गला दबा रहा था, वह तुरंत समझ गई थी, वह मजाक नहीं कर रहा है.
उस के हाथपैर फडफ़ड़ाने लगे. जान बचाने के लिए वह छटपटाई. समीर की कलाई पकडऩे की कोशिश की, जिस से उस के नाखून समीर की चमड़ी में धंस गए. पर समीर तो पत्थर बन चुका था. वह पूरी ताकत से अंजलि का गला दबाता रहा.
अंजलि की आंखों में सिर्फ एक ही सवाल था कि वह ऐसा क्यों कर रहा है? इस क्यों का कोई जवाब नहीं था. क्योंकि यह अपराध तर्क से नहीं, घायल अहंकार से जन्मा था.
लगभग 10 मिनट तक अंजलि जान बचाने के लिए संघर्ष करती रही. और फिर धीरेधीरे अंजलि शांत हो गई. उस की सांसें थम गईं, शरीर ढीला पड़ गया और आंखें फटी रह गईं, जैसे वे अब भी पूछ रही हों कि उस ने तो उस से सिर्फ प्यार किया था, क्या यही उस की गलती थी?
समीर का चेहरा शांत था. न कोई घबराहट, न रोना और न पछतावा. सिर्फ एक भयानक सन्नाटा. वह अंजलि की मृत देह को घसीट कर भट्ठी तक ले आया. लोहे की भट्ठी पहले से ही तैयार थी. उस ने लकडिय़ों पर पेट्रोल डाला और आग लगा दी. भट्ठी की लपटें धीरेधीरे उठने लगीं. जिन के रंग पीले से लाल और फिर लाल से नीले होते गए.
अंजलि की देह उन लपटों में समा गई. धीरेधीरे बिना सांस के, बिना आवाज के वह समाप्त होती गई. एक लड़की, जो एक समय में लाखों सपनों की धड़कन थी, आंखों में दुनिया बसाए थी, हंसी में जिंदगी थी, उस दिन उस समय राख बन रही थी.
वह आग कई घंटे तक जलती रही. यह कोई साधारण जलना नहीं था, यह रिश्ते की मौत का अनुष्ठान था. भोर होने से पहले समीर ने चिमटे से बची हुई राख इकट्ठा की. उस में कुछ टुकड़े धातु जैसे थे, शायद वे हड्ïिडयों के थे. लेकिन उस के चेहरे पर कोई भाव नहीं था, क्योंकि उस का दिल पहले ही मर चुका था. उस ने राख समेटी और उसे एक थैले में भर कर पास की नदी में फेंक आया.
राख पानी में घुल गई, जैसे अंजलि कभी थी ही नहीं.
सुबह 6 बजे के करीब समीर ने गोदाम खोल कर भट्ठी को तोड़ दिया.
लोहे के टुकड़े स्क्रैप की दुकान पर बेच दिए. कुछ हजार रुपए मिले. और इस तरह प्रेम का साक्ष्य, अपराध का प्रमाण, दोनों स्क्रैप बन कर बिक गए.
इतना सब कुछ करने के बाद समीर को यही लगा कि उसे नहीं पता कि अंजलि कहां है? लेकिन सत्य कहां छिपता है. वह बस सामने आने में समय लेता है.
2 दिन बाद समीर साफसुथरे कपड़े पहन कर थाना वारजे पहुंचा, जहां उस ने इंसपेक्टर विश्वजीत से रुआंसी आवाज में कहा, ”सर, मेरी पत्नी 2 दिन से घर नहीं लौटी है. मैं ने उसे बहुत तलाशा, पर वह नहीं मिली. वह आखिरी बार श्रीराम मिसल हाऊस, गोगलवाड़ी फाटा, शिंदेवाड़ी के आसपास देखी गई थी. कृपया उसे ढूढने में मेरी मदद कीजिए.’’
उस के चेहरे पर बनावटी चिंता और उदासी थी. उस की आंखें सूखी थीं, पर आवाज कांपती हुई लग रही थी. उस ने पत्नी की गुमशुदगी दर्ज करा दी थी. गुमशुदगी दर्ज होने के बाद इस मामले की जांच एसआई नितिन गायकवाड़ को सौंपी गई.
गुमशुदगी दर्ज कराने के बाद समीर रोजाना थाने आता और एक ही बात पूछता कि उस की पत्नी का कुछ पता चला? क्या उस की पत्नी मिली?
उस की आवाज में दिखावटी बेचैनी होती थी, जो पुलिस की नजरों से बच नहीं पाई. यही अभिनय समीर के लिए सब से बड़ी भूल थी. और फिर जो सत्य का विस्फोट हुआ तो शहर को हिला गया.
समीर रोज थाने आता था. धीरेधीरे हर पुलिसकर्मी उस का चेहरा पहचान गया था. पर उस के व्यवहार का असामान्य पैटर्न नजरों से नहीं बच सका. वह बेहद संयमित रहता था.
उस में घबराहट नहीं होती थी. और सब से अजीब बात यह थी कि उस ने कभी रोने की या दुखी दिखने की कोशिश नहीं की. एक पति, जिस की पत्नी और उस के 2 छोटेछोटे बच्चों की मां अचानक गायब हो जाए तो वह परेशान होगा, बेचैन होगा, मदद मांगेगा, हर जगह खोज करेगा.
लेकिन समीर, वह पत्नी के बारे में पता करने न अपनी ससुराल गया था, न अंजलि के दोस्तों से मिला था, न उन जगहों पर गया था, जहां अंजलि जा सकती थी.
वह सिर्फ थाने आता था और एक ही वाक्य बोलता था कि उस की पत्नी का कुछ पता चला क्या?
यह एक रटे हुए संवाद जैसा हो गया था. और यहीं से पुलिस को समीर पर शक गहरा गया.
पुलिस को शक हुआ तो उस ने सब से पहले समीर के घर के आसपास के और उस के घर की ओर आने वाले सभी रास्तों के सीसीटीवी फुटेज निकलवाए. पर उन में अंजलि कहीं नजर नहीं आई.
जबकि समीर एक फुटेज में दिखाई दिया गोगलवाड़ी की ओर से जाते हुए. उस में अंजलि उस के साथ थी. पर वापस लौटते हुए वह अकेला ही था. वह फुटेज समीर के गुमशुदगी दर्ज कराने के 2 दिन पहले की थी. 2 दिन से उस की पत्नी घर नहीं आई है. जबकि फुटेज में दोनों साथ जा रहे थे, लेकिन समीर अकेला ही घर लौटा था.
यही संदेह पत्थर की तरह जमीन पर गिरा. इस जांच में पुलिस को पता चला कि समीर कार से निकला था अंजलि के साथ. दोनों मरीआई घाट तक गए थे. वहां से लौटते समय एक होटल में दोनों ने नाश्ता भी किया. उस के बाद गोदाम पर पहुंचे थे.
इस के बाद इंसपेक्टर विश्वजीत ने जांच में कुछ और तेजतर्रार पुलिसकर्मियों को लगा दिया.
पुलिस ने समीर को थाने बुलाया. उसे सामने बैठा कर इंसपेक्टर विश्वजीत ने पूछा, ”समीर, जिस दिन तुम्हारी पत्नी लापता हुई थी, उस दिन तुम अपनी पत्नी से कितनी देर अलग रहे थे?’’
”बस कुछ देर अलग रहा,’’ समीर ने कहा.
”कहां गए थे?’’
”ऐसे ही घूमने गया था.’’
”सीसीटीवी में तो दिखाई दे रहा है कि तुम मरीआई घाट गए थे. वहां कोई काम था क्या?’’
समीर पलभर चुप रहा. कभीकभी अपराध इसी एक पल में पकड़ा जाता है. समीर धीमे से बोला, ”हां, वहां हम गए थे.’’
इतना कह कर वह चुप हो गया था. पुलिस को बस इतना ही चाहिए था. पुलिस ने दबाव बढ़ाया. बारबार घुमाफिरा कर उस से वही सवाल पूछा जाता रहा, लेकिन हर बार उन सवालों के जवाब बदलते रहे.
पहले तो उस ने कहा कि मरीआई घाट का रास्ता उन्होंने सिर्फ घूमने के लिए लिया था. फिर कहा कि वे वहां किसी जानकार से मिलने गए थे. अंत में कहा कि उसे याद नहीं.
सही बात तो यह है कि अपराध करने वाले को या सच बोलने वाले को सब याद रहता है. लेकिन झूठ बोलने वाले को कुछ भी याद नहीं रहता. समीर के माथे पर पहली बार पसीना दिखाई दिया. पुलिस ने उसे रात को घर नहीं जाने दिया. एक तरह से उसे हिरासत में ले लिया.
रात में पूछताछ शुरू हुई. इस बार उसे कुरसी पर नहीं जमीन पर बैठाया गया. इंसपेक्टर विश्वजीत ने उस की आंखों में आंखें डाल कर कहा, ”समीर, सच बोल दो, अंजलि कहां है? वह जिंदा है या उसे मार दिया है? सच बोलने में जितना देर करोगे, दर्द उतना ही बढ़ेगा.’’
समीर ने सिर झुका लिया. पर वह टूटा नहीं. उस की आंखें खाली थीं. उस का चेहरा निर्जीव. मानो वह जो करना चाहता था, कर चुका था और अब परिणाम से उसे कोई डर नहीं था.
पुलिस जानती थी कि अपराध स्वीकार कराने के लिए आवाज नहीं, चुप्पी में सवाल पूछने होते हैं. इंसपेक्टर ने धीरे से कहा, ”समीर, तुम्हें तो पता ही है कि अंजलि तुम्हें अब भी प्यार करती थी?’’
ये शब्द सीधे उस हिस्से पर गिरे, जहां उस का दिल कभी हुआ करता था. समीर की सांस अटक गई. उस ने पहली बार आंखें उठाईं और बस एक ही वाक्य बोला, ”उस ने मुझे छोड़ दिया था, मेरे लिए नहीं, किसी और के लिए, वह बेवफा हो गई थी.’’
विश्वजीत ने धीरे से बेहद शांत स्वर में कहा, ”उस ने क्या कहा था?’’
समीर चुप रहा. फिर उस के होंठ कांपे. आंखें नम हो गईं, पर आंसू नहीं निकले. उस ने भर्राई आवाज में कहा, ”मैं उसे खोना नहीं चाहता था. पर वह किसी और से मुसकराए, मैं यह भी नहीं सह सकता था. किसी और से बात करे, किसी और को अपना कहे, किसी और को चाहे, यह मुझ से बरदाश्त नहीं हुआ.’’
”इसलिए तुम ने उसे सदा के लिए खो दिया?’’ इंसपेक्टर विश्वजीत ने कहा.
कमरे में एक लंबा मौन फैल गया.
और उसी मौन में समीर टूट गया. उस ने धीरेधीरे टूटी हुई आवाज में सत्य उगलना शुरू किया. उस ने स्वीकार कर लिया कि उसी ने अपने ही हाथों से अपना घरसंसार जला कर नदी में बहा दिया. इस के बाद उस ने पत्नी अंजलि की सारी कहानी बता दी.
पूछताछ करने वाले कमरे में बैठे सभी पुलिस अधिकारियों के चेहरे कठोर हो गए. नफरत से या गुस्से से नहीं, बल्कि एक बेहद गहरी पीड़ा से, क्योंकि इंसान जानवर क्यों बन जाता है?
समीर द्वारा अपराध स्वीकार करने के बाद पुलिस टीम उसे ले कर उस के गोदाम पहुंची, जहां अपराध किया गया था. मिट्टी खोदी गई, कोनों में फंसी राख इकट्ठा की गई. नदी के किनारे जा कर नमूने लिए गए, जिन्हें फोरैंसिक जांच के लिए भेज दिया गया.
फोरैंसिक जांच रिपोर्ट आई तो राख में मानव अस्थियों के अंश पाए गए. अब अपराध पूरी तरह सत्य बन गया था. क्योंकि हत्या करने और लाश जलाने के सबूत मिल गए थे.
अपराध का खुलासा होने के बाद पड़ोसी, रिश्तेदार, पहचान वाले यही कर रहे थे कि औरतें घर बरबाद कर देती हैं. मर्द बेचारा कितना सहन करे? घर देखे या बाहर का देखे. लेकिन किसी ने यह नहीं कहा कि झगड़ा समाधान की भाषा है, हत्या का नहीं. किसी ने यह भी नहीं कहा कि एक रिश्ता 4 लोगों से बनता है, पर टूटता एक मन के भीतर है.
समीर कानून की हथकडिय़ों में बंध गया था. चेहरा शांत, शायद पछतावा हुआ था, पर बहुत देर से.
उस की आंखें अब खाली नहीं थीं. वे थकी हुई थीं. मानो वह हर रात उस पल को फिर से जीना चाहता था, जब अंजलि की आंखों में सवाल थे.
अंजलि के मातापिता उस की एक फोटो लिए बैठे थे. एक मधुर मुसकान, गुलाबी चुन्नी और आंखों में सपने, लेकिन अब वह फोटो ही उस के होने का प्रमाण थी.
एक जीवन, जो प्यार की तलाश में जिया, संदेह की आग में मर गया. मारने वाला भी अब अपने किए की सजा भोगने जेल चला गया था, अपने बच्चों को खुद ही अनाथ कर के.
सच है, रिश्ते मौत से नहीं मरते. वे मौन, अभियोग और शक में मरते हैं. प्रेम कभी अचानक खत्म नहीं होता, वह धीरेधीरे रोज मरता है, जब संवाद बंद हो जाता है.
अंजलि दोषी नहीं थी. वह सिर्फ थोड़ी सी समझ, कुछ शब्द और थोड़ा विश्वास चाहती थी. लेकिन समीर अपने भीतर के तूफान को कोई नाम नहीं दे पाया, सिवाय विनाश के. हत्या कभी अचानक नहीं होती. पहले दिल मरता है, फिर इंसान. Love Marriage Tragedy






