Adoption Rights Case. गोद लिए बच्चे पर कानूनी हक पाने के लिए शबनम हाशमी ने सर्वोच्य न्यायालय में 17 सालों तक जंग लड़ी. लंबी सुनवाई के बाद माननीय न्यायालय ने जो फैसला सुनाया, वह ऐतिहासिक था.
सोशल एक्टिविस्ट शबनम हाशमी के पास 9 साल का एक बेटा था साहिर. इस के बावजूद भी उन्हें एक बेटी की जरूरत महसूस हुई. उस समय उन की उम्र 39 साल थी. उन के पति गौहर रजा पेशे से एक वैज्ञानिक हैं इस के अलावा वह सामाजिक कार्यकर्ता और एक कवि भी हैं. शबनम हाशमी ने बेटी के बारे में पति से बात की. चूंकि दोनों ही खुली विचारधारा के थे, इसलिए उन्होंने सलाहमशविरा कर के फैसला लिया कि किसी एडाप्शन सेंटर से बच्ची गोद ली जाए.
बच्ची एडाप्ट करने के लिए वे दोनों कई संस्थाओं में गए. लेकिन उन संस्थाओं ने उन्हें यह कह कर बच्ची गोद नहीं दी कि वे अल्पसंख्यक हैं. इस बात का उन्हें बड़ा दुख हुआ कि क्या अल्पसंख्यक होना कोई गुनाह है जो उन से इस तरह की बात की जा रही है. इस बारे में उन्होंने संस्थाओं के संचालकों से तर्क किए तो संस्थाओं ने उन्हें टका सा जवाब दिया कि मुसलिम पर्सनल ला बोर्ड भी मुसलिमों को बच्चा गोद लेने की इजाजत नहीं देता.
शबनम हाशमी और गौहर रजा मुसलिम पर्सनल ला बोर्ड वाली बात जानते थे. उन का कहना था कि मान लो कि उन के मजहबी कानून में बच्चा गोद लेने की इजाजत नहीं है तो भारतीय संविधान में तो पक्षपात नहीं होना चाहिए. जब भारतीय कानून हिंदुओं को बच्चा एडाप्शन का अधिकार देता है तो अल्पसंख्यकों को क्यों नहीं?
बहरहाल, अभी वह इस मामले में उलझना नहीं चाहते थे. उन्होंने अपनी कोशिश जारी रखी और एक दिन पहुंच गए दिल्ली के सिविललाइंस क्षेत्र स्थित एक सामाजिक संस्था में.
उस संस्था की डाइरैक्टर ने बच्ची एडाप्शन से पहले उन्हें कुछ औपचारिकताएं पूरी करने के लिए कहा. उन्हें एक फार्म भरने को दिया गया. उस फार्म में एक कालम धर्म का भी था. शबनम हाशमी ने जब बताया कि वह मुसलिम धर्म से ताल्लुक रखती हैं तो डाइरैक्टर ने कहा कि नान हिंदू कैटेगरी मसलन मुसलिम, ईसाई, पारसी आदि बच्ची को गोद नहीं ले सकते. वे केवल बच्ची के गार्जियन रह सकते हैं और बच्ची के 21 साल के होने पर गार्जियन का हक भी उन से छिन जाएगा. यानी इस संस्था में भी उन के सामने वही बात आई जो अन्य संस्थाओं में आई थी.
खैर, उन्होंने उस समय उस संस्था से 6 महीने की एक बच्ची मौजूदा कानून के तहत ही एडाप्ट कर ली. लेकिन उन्होंने उसी समय मन में ठान लिया कि गोद लेने के मामले में जो पक्षपाती कानून है, उस कानून को बदलवाने के लिए वे संघर्ष करेंगे. जिस बच्ची को वे संस्था से गोद ले कर आए थे, उस का नाम उन्होंने सहर रखा.
शबनम हाशमी जानेमाने नाटककार, अभिनेता, निर्देशक, गीतकार, पत्रकार और कम्युनिस्ट विचारक सफदर हाशमी की छोटी बहन हैं. सफदर हाशमी नुक्कड़ नाटकों के जरिए व्यवस्था पर कुठाराघात करते थे. इसी वजह से उन्हें अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था.
बात पहली जनवरी, 1989 की है. वह नगर निगम चुनाव के दौरान गाजियाबाद जिले के साहिबाबाद इलाके में अपनी मंडली के साथ नुक्कड़ नाटक कर रहे थे. उसी समय कुछ लोगों ने उन पर जानलेवा हमला किया. इस हमले में सफदर हाशमी को गंभीर चोटें आईं और अगले दिन 2 जनवरी, 1989 को उन्होंने दम तोड़ दिया. उन की मौत पर हाशमी परिवार को ही नहीं बल्कि नाट्य और कला संस्कृति से जुड़े लोगों को भी बड़ा दुख हुआ.
वैसे शबनम हाशमी के पिता की लाइफ में भी तमाम उतारचढ़ाव आए थे. इन के पिता हनीफ हाशमी मूलरूप से दिल्ली के कूचा चालान के ही रहने वाले थे. दादा इदरीस हाशमी का यहां फर्नीचर का बहुत बड़ा बिजनैस था. लेकिन देश विभाजन के समय उन का शोरूम लुट गया और एक तरह से वह बरबाद हो गए थे. जब भारत से अलग हो कर पाकिस्तान बना तो दादा इदरीस हाशमी अपने 2 भाइयों के साथ पाकिस्तान चले गए.
जब भारत में आजादी की लड़ाई लड़ी जा रही थी, उस समय हनीफ हाशमी छात्र नेता थे. उन्होंने भी आजादी के आंदोलन में बढ़चढ़ कर भाग लिया. उस दौरान उन्हें 4 साल ब्रिटिश जेल में भी रहना पड़ा था.
चूंकि देश विभाजन के समय हनीफ हाशमी का जमाजमाया बिजनैस तबाह हो चुका था इसलिए उन के सामने उस समय आर्थिक समस्या खड़ी हो गई थी. उन के जाकिर हुसैन (जो बाद में भारत के राष्ट्रपति बने) से अच्छे संबंध थे. जाकिर हुसैन उन्हें अलीगढ़ ले गए और वहां अलीगढ़ मुसलिम यूनिवर्सिटी में उन की नौकरी लग गई. बाद में वह अपनी पत्नी कमर हाशमी को भी अलीगढ़ ले गए.
इस दौरान सफदर हाशमी और शबनम हाशमी का जन्म हुआ. कमर हाशमी अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाना चाहती थीं इसलिए वह 1964 में बच्चों को ले कर अलीगढ़ से दिल्ली चली आईं. दिल्ली के एक स्कूल में उन्होंने प्रधानाचार्या के पद पर नौकरी कर ली तो हनीफ हाशमी भी दिल्ली में एक पत्रिका में संपादक के रूप में नौकरी करने लगे. लेकिन 1967 में कैंसर की वजह से हनीफ हाशमी की मौत हो गई.
चूंकि उन के बच्चे पढ़ रहे थे. पिता की मौत पर घर में फिर से आर्थिक परेशानी खड़ी हो गई जिस से बच्चों की पढ़ाई भी प्रभावित हुई.
1981 में शबनम हाशमी जब केवल 24 साल की थीं, तो उन्हें यूएसएसआर (तत्कालीन सोवियत संघ) सरकार की ओर से कल्चरल एक्सचेंज स्कालरशिप के तहत 6 साल तक सोवियत संघ की एक यूनिवर्सिटी में पढ़ने का मौका मिला. बेटी को विदेश में पढ़ाई का मौका मिलने पर कमर हाशमी बहुत खुश हुईं.
लेकिन सोवियत संघ की जिस यूनिवर्सिटी में शबनम पढ़ रही थीं, उस की छुट्टियां होने पर जब वह दिल्ली आईं तो उस के बाद वह वापस सोवियत संघ नहीं गईं.
दरअसल सोवियत संघ से दिल्ली आने पर खाली समय में वह मुसलिम बस्तियों में रहने वाली लड़कियों और महिलाओं को पढ़ाने लगीं. तब उन्होंने महसूस किया कि परदे के पीछे रहने वाली इन महिलाओं को शिक्षा की बहुत जरूरत है. अपनी आगे की पढ़ाई की चिंता छोड़ वह अपना ज्यादातर समय समाजसेवा में ही खर्च करने लगीं. समाजसेवा से उन्हें ऐसा लगाव हुआ कि वह सोवियत संघ नहीं गईं और खुद को समाजसेवा में झोंक दिया. उन्होंने अनहद (एक्ट नाउ फार हारमनी ऐंड डेमोक्रेसी) नाम की एक संस्था बनाई और उस की मार्फत सामाजिक उत्थान के कार्य में जुट गईं.
इसी बीच उन की मुलाकात गौहर रजा से हुई. मूलरूप से अलीगढ़ के रहने वाले गौहर रजा ने अलीगढ़ मुसलिम यूनिवर्सिटी से बीएससी करने के बाद 1979 में आईआईटी दिल्ली से एमटेक किया था. उच्चशिक्षित होने के बाद भी वह समाजसेवा से जुड़े हुए थे. फिर सन 1985 में गौहर रजा और शबनम हाशमी की शादी हो गई और बाद में शबनम हाशमी एक बेटे की मां बनीं जिस का नाम साहिर रखा. वर्तमान में गौहर रजा नेशनल इंस्टीट्यूट औफ साइंस, टेक्नोलौजी ऐंड डेवलपमेंट स्टडीज में वैज्ञानिक हैं.
साहिर जब 9 साल का था उसी दौरान उन्होंने परिवार में एक बेटी की जरूरत महसूस की. एक सामाजिक संस्था से उन्हें जो बच्ची (सहर) मिली उस पर उन का केवल गार्जियन का ही अधिकार था और यह अधिकार भी बच्ची के 21 साल की उम्र तक ही सीमित था. यह बात शबनम को बहुत अखरी.
उन का मानना था कि 6 महीने की जिस बच्ची को वह संस्था से लाई हैं, जाहिर है उस की परवरिश, पढ़ाई आदि वह अपनी बेटी मान कर ही करेंगी. लेकिन कानून के अनुसार उन का उस बच्ची से मांबेटी का रिश्ता नहीं होगा. वह केवल गार्जियन ही रहेंगी. अब उस नन्हीं सी बच्ची को क्या पता कि जिस परिवार में उस की परवरिश की जा रही है, वह हिंदू है या फिर कोई और.
सहर नाम की जिस बच्ची की शबनम परवरिश कर रही थीं, उस के साथ वह हमेशा के लिए मांबेटी का रिश्ता चाहती थीं. मगर यह इतना आसान काम नहीं था. इस के लिए सब से पहले कानून में संशोधन करने की जरूरत थी. कानून में संशोधन तभी हो सकता था जब संसद में इस मुद्दे को उठाया जाए.
शबनम हाशमी ने जिस डगर पर चलने का फैसला लिया था, उस में तमाम तरह की अड़चनें थीं. उन्हें भी लग रहा था कि मुकाम उन्हें आसानी से हासिल नहीं होगा. उन्होंने एडाप्शन कानून में संशोधन करने की बात को ले कर अनेक सांसदों से मुलाकात की. उन का कहना है कि उन की बात किसी भी सांसद ने संसद में नहीं उठाई.
इस के बाद भी शबनम हाशमी ने हिम्मत नहीं हारी. वह चाहती थीं कि एडाप्टेड बच्चे को भी मांबाप का हक मिले. उसे भी फंडामेंटल राइट्स मिलें. लेकिन इस में धर्म, जाति का भेदभाव नहीं होना चाहिए. धर्म का भेद दूर करने के लिए सामाजिक कार्यकत्री शबनम हाशमी ने सुप्रीम कोर्ट में सन 2005 में एक जनहित याचिका दायर की.
उन्होंने कहा कि किसी भी बच्चे को गोद लेने के बाद वह बच्चा अपने बायोलौजिकल मांबाप से अलग हो जाता है. वह बच्चा पूरी तरह से उन्हीं पर निर्भर हो जाता है जो उस का लालनपालन करते हैं. उस को पालने वाले ही सही मायने में मांबाप होते हैं. तो मुसलिम, ईसाई, पारसी जैसे धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए गोद ली गई संतान को कानूनी मान्यता क्यों नहीं?
वह इस जनहित याचिका के जरिए तमाम लोगों के लिए भी रास्ता खुलवाना चाहती थीं. उन्होंने मांग की कि अल्पसंख्यकों द्वारा गोद लिए बच्चे को भी मां की कोख से पैदा हुए बच्चे के अधिकार की तरह अधिकार मिलें.
गोद लिए बच्चे को क्या पता कि वह किस मजहब का है. मौजूदा कानून बच्चों या उन्हें गोद लेने वाले दंपतियों के साथ धार्मिक भेदभाव करता है. सेक्युलर देश में किसी पर धार्मिक पाबंदियां थोपना गैरवाजिब है.
इस जनहित याचिका के बाद 17 सालों तक यह मामला न्यायालय में चला. इस बीच सरकार ने भी माननीय न्यायालय के समक्ष अपना पक्ष रखा.
आखिरकार 19 फरवरी, 2014 को सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस पी. सथशिवम, जस्टिस रंजन गोगोई और जस्टिस शिव कीर्ति सिंह की खंडपीठ ने जब इस मामले में फैसला सुनाया तो शबनम हाशमी और उन के वैज्ञानिक शौहर गौहर रजा की खुशी का ठिकाना नहीं रहा.
माननीय न्यायाधीशों की खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि शबनम हाशमी ने संस्था से सहर नाम की जो बच्ची गोद ली थी, वह अब उन तमाम अधिकारों की हकदार है जो मां की कोख से जन्मे बच्चे को मिलते हैं. यानी शबनम हाशमी और गौहर रजा सहर के कानूनी रूप से मांबाप हैं.
माननीय न्यायालय के इस फैसले के बाद अब तमाम बच्चों और उन्हें गोद लेने वाले ऐसे पेरैंट्स को भी लाभ मिलने की संभावना है जिन के बीच में धार्मिक भेदभाव रुकावट बन कर खड़ा था. शबनम हाशमी का कहना है कि अभी उन की लड़ाई खत्म नहीं हुई है. वह बच्चा गोद लेने के कानून में संशोधन के लिए जंग जारी रखेंगी. Adoption Rights Case
— इसके बाद अदालती कार्रवाई में क्या हुआ यह ज्ञात नहीं है.
— 2014 में प्रकाशित






