Family Crime Story. आदमी भले ही बेवफाई कर सकता है, लेकिन जानवर हमेशा अपना फर्ज पूरा करते हैं. लूटपाट के लिए भांजे ने मामी को मौत के घाट उतारा तो मालकिन को बचाने में जहां कुत्ते ने जान दे दी, वहीं तोते ने पुलिस को हत्यारे तक पहुंचा दिया. 

उत्तर प्रदेश के आगरा के बल्केश्वर स्थित सेंट एंड्रूज स्कूल परिसर में ही विजय शर्मा परिवार के साथ रहते थे. वह आगरा से प्रकाशित होने वाले दैनिक अखबार स्वराज टाइम्स के संपादक थे. यह अखबार उन के पिता आनंद शर्मा ने 1956 में निकाला था. वह बूढ़े हो गए तो उन की जिम्मेदारी उन के बेटों, विजय शर्मा और अजय शर्मा ने संभाल ली थी. उन के इस अखबार का औफिस बेलनगंज में था.

अखबार के मालिक होने के साथसाथ विजय शर्मा अपने मकान के भूतल पर एक जूनियर हाईस्कूल भी चलाते थे, जिस की जिम्मेदारी उन की बेटी निवेदिता संभालती थी. उन का भरापूरा खुशहाल परिवार था. उन के परिवार में 4 बेटियां और एक बेटा था. उन की पत्नी नीलम शर्मा बुलंदशहर के जानेमाने वकील नरेशचंद्र शर्मा की बेटी थीं.

विजय शर्मा की बहन कल्पना की शादी आगरा के ही अर्जुननगर के रहने वाले गोपालशरण शर्मा के साथ हुई थी. वह रेलवे में गार्ड थे. दूसरी बहन विजयलक्ष्मी की शादी एक बिजनैसमैन से हुई थी. छोटे भाई अजय ने अखबार को तरक्की पर ले जाने में उन की पूरी मदद की थी. वह अपनी पत्नी मृदु शर्मा और बच्चों के साथ बेलनगंज में रहते थे.

विजय शर्मा ने अपनी 3 बेटियों— नीति, पल्लवी और नूपुर की शादी कर दी थी. अब घर में छोटी बेटी निवेदिता और बेटा अजेश रह गया था. अजेश दिमागी रूप से थोड़ा कमजोर तो था ही, सन 2014 में उस की दोनों किडनियां खराब हो गई थीं. तब बेटे को बचाने के लिए नीलम ने अपनी एक किडनी उसे दे दी थी. इस के बाद बेटा तो स्वस्थ हो गया था, लेकिन वह थोड़ा अस्वस्थ रहने लगी थीं.

आनंद शर्मा के बूढ़े होने के बाद घरपरिवार की ही नहीं, अखबार की भी ज्यादातर जिम्मेदारी विजय शर्मा पर ही आ पड़ी थी. परिवार के सभी लोग खुश थे, लेकिन कल्पना परेशान रहती थी. इस की वजह पति था. हालांकि उस के पति गोपालशरण की सरकारी नौकरी थी, लेकिन उस की आदतें कुछ ऐसी थीं कि घरपरिवार में हमेशा क्लेश बना रहता था. कल्पना के 2 बेटे आशुतोष उर्फ आशू और अश्विनी उर्फ गोलू के अलावा एक बेटी अनुराधा थी. परिवार के प्रति बहनोई की लापरवाही को देखते हुए बहन और उस के बच्चों को ले कर विजय शर्मा काफी चिंतित रहते थे. उन्होंने कई बार अपने बहनोई को समझाने की कोशिश भी की, लेकिन उस में कोई सुधार नहीं आया. परिणामस्वरूप बहन के घर के हालात धीरेधीरे बिगड़ते ही चले गए.

मांबाप के झगड़ों का असर बच्चों पर भी पड़ा. उन पर ठीक से ध्यान नहीं दिया जा सका, इसलिए बेटे बेलगाम हो गए. बच्चे बड़े हो गए थे, इसलिए मनमर्जी करने लगे थे. उसी दौरान एक महिला का पर्स लूटने के आरोप में आशुतोष को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ में जब उस ने बताया कि वह स्वराज टाइम्स के संपादक विजय शर्मा का भांजा है तो पुलिस ने इस बात की जानकारी उन्हें दी.

विजय शर्मा को लगा कि अगर पुलस ने आशुतोष को जेल भेज दिया तो उस का भविष्य खराब हो जाएगा. इसलिए वह तुरंत थाने पहुंचे और अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए उसे अपनी जिम्मेदारी पर पुलिस से छुड़ा कर अपने घर ले आए.

उस समय आशुतोष की उम्र 15-16 साल थी. अब वह मामामामी के साथ बल्केश्वर में ही रहने लगा. नीलम शर्मा आशुतोष को भी उतना ही प्यार करती थीं, जितना अपने बच्चों को. उस के खानेपीने पर ही नहीं, पढ़ाईलिखाई पर भी पूरा ध्यान दिया जाता था. मामा के साथ रहते हुए आशुतोष काफी खुश रहता था. विजय शर्मा चाहते थे कि पढ़लिख कर वह किसी काबिल बन जाए. कुछ दिनों बाद गोपालशरण को आशुतोष का मामा के यहां रहना बुरा लगने लगा. कल्पना को भी यह अच्छा नहीं लग रहा था. इसलिए दोनों कहने लगे थे कि विजय शर्मा ने उन के बेटे को नौकर बना कर रखा है.

विजय शर्मा आशुतोष की जिंदगी बनाना चाहते थे, लेकिन जब उन्होंने देखा कि बहनबहनोई एहसान मानने के बजाय आरोप लगा रहे हैं तो उन्होंने यह सोच कर आशुतोष को उस के घर भेज दिया कि पराए बच्चे को अपने घर रखना ठीक नहीं है. कुछ उलटासीधा हो गया तो बदनामी ही होगी.

आशुतोष भले ही अपने घर चला गया था, लेकिन इतने दिनों तक साथ रहने से उसे मामा के परिवार से जो मोह हो गया था, वह उसी तरह बना रहा.

घर आ कर आशुतोष फिर अपने पुराने माहौल में लौट आया. घर में आर्थिक तंगी रहती ही थी, क्योंकि गोपालशरण ने रिटायरमेंट ले लिया था. वेतन मिलने पर जब उन्होंने कभी घरपरिवार की ओर ध्यान नहीं दिया तो पेंशन में कहां से ध्यान देते. फंड और ग्रेच्युटी का जो पैसा उन्हें मिला था, उसे उन्होंने अपनी लतों पर खर्च कर दिया था. इसलिए मजबूरी में आशुतोष अपने खर्च के लिए नौकरी करने लगा.

विजय शर्मा आशुतोष को किसी काबिल बनाना चाहते थे, इसलिए बीकौम करने के बाद उन्होंने उस का दाखिला एलएलबी में करा दिया था.

कभीकभी आशुतोष को लगता कि मामा के घरवाले कितने ठाठबाट से रहते हैं, जबकि एक वह है, पाईपाई के लिए मोहताज रहता है. उस के ये हालात जल्दी बदलने वाले भी नहीं हैं. प्राइवेट नौकरी में काम बहुत करना पड़ता है, जबकि वेतन कितना कम मिलता है. इसलिए वह अपनी नौकरी से खुश नहीं था. बहन अनुराधा की शादी हो जाने की वजह से खानेपीने की भी परेशानी होने लगी थी. मन में असंतोष रहने लगा था. इस की वजह यह थी कि उसे लगता था कि गरीब होने की वजह से रिश्तेदार उस पर ध्यान नहीं देते.

पढ़ाई की वजह से आशुतोष को नौकरी छोड़नी पड़ी तो वह और ज्यादा परेशान रहने लगा. अब वह सोचने लगा कि अगर कहीं से उसे मोटी रकम मिल जाती तो उस के भी दिन लौट आते. लेकिन पैसे सड़क पर तो मिल नहीं सकते थे. इस के लिए वह कहीं चोरीडकैती करता या किसी के साथ ठगी करता.

20 फरवरी को विजय शर्मा की बेटी नूपुर के देवर की फिरोजाबाद में शादी थी. इस शादी में उन्हें वहां जाना था. आशुतोष का भी निमंत्रण था. लेकिन उस ने खुद जाने के बजाय छोटे भाई गोलू से कहा कि इस निमंत्रण में वह चला जाए. विजय शर्मा निवेदिता और अजेश के साथ फिरोजाबाद जाने के लिए तैयार हुए. नीलम इसलिए नहीं गई, क्योंकि एक तो उन की तबीयत ठीक नहीं थी, दूसरे बूढ़े ससुर की देखभाल के लिए भी एक आदमी का रहना जरूरी था.

7 बजे के आसपास विजय शर्मा अपनी गाड़ी से फिरोजाबाद जाने के लिए निकलने लगे तो सीढि़यों का दरवाजा बंद कर के बाहर से ताला लगा दिया. चाबी उन्होंने ऊपर खड़ी नीलम के पास फेंक दी थी. अब कोई आने वाला नहीं था, क्योंकि जाने से पहले विजय शर्मा ने गाय का दूध निकालने वाले मनोज को बुला कर दूध निकलवा लिया था. सब के जाने के बाद नीलम ने ससुर को खाना खिला दिया तो वह अपने कमरे में जा कर लेट गए. इस के बाद नीलम ने खुद खाना खाया और साड़ी उतार कर सिर्फ पेटीकोट ब्लाऊज में अपने बैड पर बैठ कर टीवी देखने लगीं.

घर से निकलने के बाद विजय शर्मा बल्केश्वर चौराहे पर पहुंचे तो उन की भांजी अनुराधा अपने पति और भाई अश्विनी उर्फ गोलू के साथ इंतजार कर रही थी. वहां पहुंच कर विजय शर्मा ने गोलू से कहा कि उन की कार वही चला कर ले चले.

गोलू मामा की कार चलाने लगा तो अनुराधा पति के साथ अपनी गाड़ी से चल पड़ी. गाड़ी में बैठे विजय शर्मा सोच रहे थे कि सुबह तो आशुतोष ने साथ चलने को कहा था, शाम होतेहोते ऐसा क्या हो गया कि उस ने खुद जाने के बजाय गोलू को भेज दिया.

विजय शर्मा को रात में ही वापस आना था, इसलिए वहां पहुंच कर वह जल्दीजल्दी सब से मिले और खाना वगैरह खा कर जल्दी ही लौट पड़े. 12, साढ़े बारह बजे के बीच वह बल्केश्वर चौराहे पर पहुंचे तो गोलू उन की गाड़ी से उतर कर अपने घर चला गया. 10 मिनट बाद वह अपने घर पहुंचे तो चौकीदार ने गेट खोला.

विजय शर्मा गाड़ी अंदर कर रहे थे, तभी निवेदिता की नजर ऊपर जाने वाले दरवाजे पर पड़ी. दरवाजा खुला हुआ था. यह हैरानी वाली बात थी, क्योंकि विजय शर्मा खुद बाहर से ताला लगा कर गए थे. जल्दीजल्दी सीढि़यां चढ़ कर निवेदिता ने मां को आवाज दी. लेकिन अंदर से कोई आवाज नहीं आई. टीवी तेज आवाज में चल रहा था. निवेदिता लपक कर अंदर पहुंची.

उस की नजर बैड पर पड़ी तो वह एकदम से चीख पड़ी. बैड पर खून ही खून था. उस की चीख सुन कर विजय शर्मा तुरंत समझ गए कि उन के घर में कोई अनहोनी हो गई है. वह भी भाग कर ऊपर आ गए. उन्होंने जमीन पर नजर डाली तो खून की धार कमरे से सटे बाथरूम तक जाती दिखाई दी. वह बाथरूम में पहुंचे तो वहां उन्हें नीलम पड़ी दिखाई दी. उस के चारों ओर खून ही खून फैला था. उन्होंने पास जा कर देखा तो नीलम मर चुकी थी.

सभी जोरजोर से रोनेबिलखने लगे. शोर सुन कर पड़ोसी भी आ गए. किसी तरह विजय शर्मा ने खुद को संभाला और पुलिस को फोन कर के घटना की सूचना दी. निवेदिता ने फोन कर के रिश्तेदारों को घटना के बारे में बताया तो एकएक कर के वे भी पहुंचने लगे. तभी किसी की नजर विजय शर्मा के पालतू कुत्ते पर पड़ी. कुत्ता भी आंगन में लहूलुहान मरा पड़ा था.

एक तो हत्या का मामला था, दूसरे हत्या जिस परिवार में हुई थी, वह मीडिया से जुड़ा था. इसलिए थाना न्यू आगरा के इंसपेक्टर अरुण कुमार ने पहले तो इस घटना की जानकारी जिले के पुलिस अधिकारियों को दी. उस के बाद खुद एएसआई आशीष कुमार, आर.के. दुबे, जितेंद्र कुमार और कुछ सिपाहियों के साथ घटनास्थल के लिए रवाना हो गए. घटनास्थल पर पहुंच कर वह बारीकी से मुआयना कर रहे थे कि पुलिस अधीक्षक सत्यार्थ अनिरुद्ध पंकज, क्षेत्राधिकारी समीर सौरभ भी डाग स्क्वायड एवं फौरेंसिक टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए.

पुलिस के पहुंचने तक आनंद शर्मा के कमरे का दरवाजा बाहर से बंद था. इस का मतलब था कि उन्हें घटना के बारे में कुछ भी पता नहीं था. कमरे में रखी अलमारियों का सामान बिखरा पड़ा था. मृतका नीलम शर्मा के शरीर के भी सभी गहने गायब थे. उन की हत्या चाकू से की गई थी. उन के शरीर पर चाकू के दरजन भर से ज्यादा घाव थे. थोड़ी देर में वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक शलभ माथुर भी घटनास्थल पर आ गए थे.

नीलम के शरीर से सोने का मंगलसूत्र, 4 चूडि़यां, कानों के कुंडल और 3 अंगूठियां गायब थीं. उन का पर्स और मोबाइल फोन भी बदमाश ले गए थे. अलमारी में रखा सामान और रुपए भी गायब थे. लेकिन जब अलमारी का सामान चेक किया जाने लगा तो अलमारी में रखे 14 लाख रुपए बिखरे सामान में मिल गए. इस से पुलिस को लगा कि बदमाश इन्हीं रुपयों के लिए आए थे, लेकिन रुपए कपड़ों के बीच रखे थे, इसलिए अलमारी की तलाशी में वे नीचे गिर गए थे, जिस से बदमाशों के हाथ नहीं लग सके.

पहले तो सभी को लगा था कि बदमाश ताला तोड़ कर अंदर आए होंगे. लेकिन जब कमरे में ताला और चाबी सुरक्षित मिला तो पता चला कि बदमाश ताला खोल कर अंदर आए थे. ताले की चाबी नीलम के पास थी यानी ताला खोलने के लिए चाबी नीलम ने ही दी थी. रात में नीलम चाबी उसी को दे सकती थीं, जिसे वह अच्छी तरह जानती थीं. पुलिस ने घटनास्थल की काररवाई निपटा कर लाश पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दी. इस के बाद हत्यारों तक पहुंचने का रास्ता तलाश किया जाने लगा.

पुलिस को पूरा विश्वास था कि यह काम किसी ऐसे परिचित और नजदीकी का है, जिसे पहचान कर ही नीलम ने चाबी दी थी. अब पुलिस को यह पता लगाना था कि ऐसे कौनकौन से लोग थे, जिन्हें नीलम अकेली होने पर भी चाबी दे सकती थी. उन में एक गाय का दूध निकालने वाला मनोज भी था.

थानाप्रभारी अरुण कुमार दूध निकालने वाले मनोज को हिरासत में ले कर थाने ले आए. लेकिन पूछताछ में उस से कुछ भी हासिल नहीं हुआ. पोस्टमार्टम के बाद नीलम का शव घर वालों को सौंप दिया गया तो उन्होंने उस का दाहसंस्कार कर दिया. पुलिस के किसी नतीजे पर न पहुंचते देख वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक शलभ माथुर ने 24 घंटे के अंदर हत्यारों को गिरफ्तार करने का आदेश दिया. लेकिन उन के आदेश के बावजूद यह संभव नहीं हो सका. क्योंकि हत्यारों का पता शर्मा परिवार से ही चल सकता था, जबकि उस परिवार में अभी कोई बयान देने लायक नहीं था.

घर में पालतू कुत्ता भी था, उस ने उसी आदमी को अंदर आने दिया होगा, जो घर आताजाता रहा होगा. इस का मतलब वारदात को अंजाम देने वाला कोई खास ही था. घर का माहौल थोड़ा ठीक हुआ तो पुलिस ने इस बारे में विजय शर्मा से बात की. उन्होंने ऐसे 5 नाम बताए, जिन्हें नीलम शर्मा रात को चाबी दे सकती थीं. उन में एक नाम उन के भांजे आशुतोष का भी था. उन पांचों में वही एक उन का रिश्तेदार था.

मजे की बात यह थी कि जो मामी उसे बेटे की तरह मानती थी, उस की हत्या के बारे में सुनने के बाद भी वह नहीं आया था. जबकि उस के छोटे भाई गोलू ने उसे फोन कर के बुलाया भी था. रात में किसी ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया था. लेकिन जब वह भाई के बारबार बुलाने पर सुबह आया तो काफी डरा हुआ लग रहा था. उस के हाथ में पट्टी बंधी थी. उस ने जो जैकेट पहन रखी थी, उस की चेन भी गले तक बंद किए हुए था. निवेदिता ने जब उस से हाथ में बंधी पट्टी के बारे में पूछा तो वह एकदम से घबरा गया. फिर थोड़ा आश्वस्त सा बोला, ‘‘कांच लग गया है, इसलिए पट्टी बंधवा ली है.’’

निवेदिता ने देखा था कि मरने से पहले मम्मी ने हत्यारे से संघर्ष किया था. उसी वजह से घर का सामान भी टूटा था. उसे लगा कि कहीं रात में यही तो नहीं आया था. उसे आशुतोष पर शक हो गया. इस की एक वजह यह भी थी कि वह हाथ में लगी चोट के बारे में पूछने वालों को अलगअलग बता रहा था.

पुलिस ने उन पांचों लोगों, जिन्हें नीलम चाबी दे सकती थीं, के फोनों की उस रात की लोकेशन के बारे में पता कराया. 4 लोगों की लोकेशन तो बल्केश्वर के बजाय अन्य जगहों की मिली, लेकिन आशुतोष के मोबाइल फोन की लोकेशन बल्केश्वर की पाई गई थी. जबकि पूछने पर उस ने बताया था कि उस रात वह अपने घर पर था. लेकिन फोन के लोकेशन के अनुसार यह झूठ थी.

आशुतोष के इस झूठ पर पुलिस को पूरा विश्वास हो गया कि यह सब विजय शर्मा के इसी भांजे का कियाधरा है. लेकिन पुलिस सारे सुबूत जुटा कर ही उस पर हाथ डालना चाहती थी. पुलिस ने विजय शर्मा को भी बता दिया था कि नीलम की हत्या उन के भांजे आशुतोष ने ही की है. तब उन्होंने भी कहा था कि हत्यारा कोई भी हो, पुलिस उसे गिरफ्तार कर सकती है.

आशुतोष जब भी मामा के यहां आता था, कमीज और जैकेट से बांहें पूरी तरह ढके रहता था. बटन भी वह कालर तक बंद किए रखता था. यह बात सभी को खटकती थी. आखिर जब रहा नहीं गया तो एक दिन विजय शर्मा की बड़ी बेटी नीति ने उस की बांहें समेट कर और बटन खोल कर दिखाने को कहा. जब उस ने बांहें समेट कर बटन खोल कर दिखाया तो वह हैरान रह गई, क्योंकि बांहों और गले पर तमाम जगह खरोंचें थीं. नीति ने जब उन खरोंचों के बारे में पूछा तो उस ने कहा कि उस का एक लड़के से झगड़ा हो गया था, उसी में ये खरोचें आई थीं.

निवेदिता देखती थी कि आशुतोष जब भी उस के घर आता था, उस का तोता अपने पिंजरे में दुबक जाता था. हमेशा बोलते रहने वाला तोता हीरा नीलम की मौत के बाद गुमसुम सा रहने लगा था. एक दिन निवेदिता को न जाने क्या सूझा कि वह तोते से बातें करने लगी. बातें करतेकरते उस ने पूछा, मम्मी को किस ने मारा, तुम ने देखा है? तोते ने हां में सिर हिलाया तो निवेदिता उस के सामने उन लोगों के नाम लेने लगी, जो नीलम से चाबी ले कर अंदर आ सकते थे. निवेदिता ने जैसे ही आशुतोष का नाम लिया, तोता चिल्लाने लगा, ‘‘आशु ने मारा… आशु ने मारा…’’

निवेदिता को भी आशु यानी आशुतोष पर संदेह था. लेकिन उस ने किसी से कुछ कहा नहीं था. थोड़ी देर बाद आशुतोष आया तो उसे देख कर तोता चीखने लगा. सारा मामला निवेदिता की समझ में आ गया. उस ने यह बात विजय शर्मा से बताई तो उन्होंने यह बात पुलिस को बता दी. इस तरह आशुतोष पुलिस के घेरे में पूरी तरह आ गया तो 24 फरवरी, 2014 को दयालबाग से उसे हिरासत में ले लिया गया.

आशुतोष का सोचना था कि पुलिस उस पर हाथ नहीं डालेगी, लेकिन जब पुलिस उसे हिरासत में ले कर थाने आई तो उस के चेहरे का रंग फीका पड़ गया. उस ने कहा, ‘‘मैं ने ऐसा क्या किया है, जो आप लोग मुझे थाने ले आए हैं?’’

आशुतोष ने पुलिस को बरगलाने की बहुत कोशिश की, लेकिन पुलिस के पास इतने सुबूत थे कि वह उस के झांसे में नहीं आ सकी. पुलिस ने सुबूतों के आधार पर उस के साथ सख्ती की तो आशुतोष समझ गया कि अब वह पुलिस के शिकंजे में फंस चुका है. उस का बचना मुश्किल है. उस ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया. इस के बाद नीलम की हत्या की उस ने जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी—

नौकरी छोड़ने के बाद आशुतोष पाईपाई के लिए मोहताज रहने लगा था. मामा से उसे जो पैसे मिलते थे, उस से उस का खर्च पूरा नहीं होता था. उसे लगता था कि अगर मामा के घर हाथ मारा जाए तो 4-6 लाख रुपए अवश्य मिल जाएंगे. यही सोच कर उस ने अपने मकानमालिक रौबर्ट मैसी के बेटे रौनी मैसी से बात की. बारहवीं पास रौनी मैसी भी बेरोजगार था. इसलिए मोटी रकम के लालच में आ कर वह भी आशुतोष का साथ देने को तैयार हो गया. इस के बाद आशुतोष मौके की तलाश में रहने लगा.

20 फरवरी को फिरोजाबाद में विजय शर्मा की बेटी नुपूर के देवर की शादी थी. इस शादी में मामा के साथ जाने के लिए आशुतोष भी तैयार था. लेकिन जब उसे पता चला कि शादी में मामी नीलम को छोड़ कर सभी जा रहे हैं तो उसे अपनी योजना को अंजाम देने का यह उचित मौका लगा. इसलिए उस ने निमंत्रण में खुद की जगह छोटे भाई गोलू को भेज दिया.

सब के जाने के बाद आशुतोष और रौनी ने शराब पी. उस के बाद स्कूटी से वह मामा के घर जा पहुंचा. रात 11 बजे तक स्कूल का गेट खुला रहता था, क्योंकि इस बीच लोगों का आनाजाना लगा रहता था, इसलिए गेट पर तैनात चौकीदार भी ध्यान नहीं देता था कि कौन आया और कौन गया. वह रात 11 बजे गेट पर ताला लगाता था. उस के बाद ही वह आने वाले को पूछ कर अंदर आने देता था.

शराब पीने के बाद रात 9 बजे के आसपास आशुतोष रौनी के साथ अपने मामा के घर जा पहुंचा. वह गेट बंद होने से पहले अपने काम को अंजाम देना चाहता था. उस ने घंटी बजाई तो नीलम ने बाहर आ कर देखा. आशुतोष ने चाबी मांगी तो नीलम ने उस के साथ आए रौनी मैसी के बारे में पूछा. आशुतोष ने बताया कि वह उस का दोस्त है तो नीलम ने चाबी फेंक दी.

दरवाजा खोल कर सीढि़यां चढ़ते हुए आशुतोष ऊपर पहुंचा. उस ने रौनी को नाना के पास भेजते हुए कहा, ‘‘तू मेरे नानाजी के पास रहना. बाकी का काम मैं अकेला करूंगा. लेकिन तू एक बात का ध्यान रखना. अगर शोरशराबा होने पर नाना जाग जाते हैं तो उन्हें जिंदा मत छोड़ना.’’

इतना कह कर आशुतोष ने रौनी को नाना के कमरे में भेज दिया तो खुद मामी के कमरे की ओर बढ़ गया. नीलम बैड पर बैठी टीवी देख रही थीं. वह उन के पास जा कर खड़ा हो गया. नीलम का ध्यान टीवी पर था, इसलिए वह क्या कर रहा है, नीलम ने देखा ही नहीं.

आशुतोष ने चुपके से चाकू निकाला और पेटीकोट ब्लाउज पहन कर बैठी नीलम के पेट में अचानक घोंप दिया. नीलम के मुंह से चीख निकलती, उस ने अपना एक हाथ उन के मुंह पर रख दिया. आशुतोष के इरादे का पता चलते ही नीलम जान बचाने के लिए चीखते हुए उठ कर भागीं और बाथरूम में घुस गईं. वह दरवाजा बंद कर पातीं, उस के पहले ही आशुतोष भी बाथरूम में घुस गया और ताबड़तोड़ वार करने लगा.

उसी बीच नीलम की चीख सुन कर विजय शर्मा का पालतू कुत्ता टफी भाग कर आ गया. उस ने आशुतोष को नीलम पर हमला करते देखा तो वह उस पर झपट पड़ा. उस ने हाथ में काटा ही नहीं, मालकिन को छुड़ाने के लिए उस के सीने और गरदन पर पंजे मारने लगा.

कुत्ते के हमले से आशुतोष घबरा गया था. उस ने उसी चाकू से कुत्ते पर भी वार करने शुरू कर दिए. कुत्ता लगातार संघर्ष करता रहा, इसलिए आशुतोष ने उसे भी मार दिया. कमरे में टंगा तोता भी आशुतोष की करतूतों को देखता रहा. डर के मारे वह पिंजरे में दुबक गया था.

कुत्ते को मार कर आशुतोष ने नीलम को देखा. वह भी मर चुकी थी. उस ने जल्दीजल्दी उन के शरीर के सारे गहने उतार लिए. वह गहने उतार रहा था, तभी उस के फोन की घंटी बजी. उस ने नंबर देखा, फोन गोलू का था. तब उस ने बताया था कि वह घर पर है.

इस के बाद आशुतोष अलमारी खोल कर उस में रखे रुपए और गहनों के लिए तलाशी लेने लगा. तलाशी के दौरान सामान फेंकने में विजय शर्मा ने मकान के जो 14 लाख रुपए रखे थे, वे नीचे गिर गए, जिस के बारे में आशुतोष को पता नहीं चल सका. उसे मात्र उस में 2 हजार रुपए मिले थे. अलमारी खंगाल कर वह रौनी के साथ नीचे आया और स्कूटी से चला गया. यह सब काम उस ने 10 बजे तक निपटा दिया था, इसलिए चौकीदार को उस के आनेजाने का पता नहीं चला.

आशुतोष ने पालीवाल पार्क के पास नीलम का मोबाइल फोन बिना स्विच औफ किए ही फेंक दिया था. चाकू उस ने धो कर रख दिया और अपने उन कपड़ों को जला दिया, जिन्हें वह नीलम की हत्या करते समय पहने था. कमरे पर आ कर उस ने विजय शर्मा को फोन कर के पूछा था कि वह कब तक आ रहे हैं? तब विजय शर्मा ने बताया था कि वह जल्दी ही पहुंच रहे हैं.

आशुतोष के अपराध स्वीकार करने के बाद पुलिस ने उस के साथी रौनी को भी गिरफ्तार कर लिया था. उस ने भी अपना अपराध स्वीकार कर लिया था. आशुतोष ने चाकू मामी के गहने और रुपए बरामद करा दिए थे. एक अंगूठी उस ने 6 हजार रुपए में बेच दी थी. पालीवाल पार्क से नीलम का फोन भी पुलिस ने बरामद कर लिया था.

नीलम के फोन ने भी आशुतोष और रौनी की लोकेशन बता दी थी. पुलिस को नीलम की मुट्ठी से कुछ बाल भी मिले थे. पूछताछ में आशुतोष ने बताया था कि स्वयं को बचाने के लिए नीलम ने उस के बाल कस कर पकड़ लिए थे. छुड़ाने के चक्कर में कुछ बाल उखड़ गए थे.

अब पुलिस उन बालों की डीएनए जांच कराएगी, जिस से साफ हो सके कि वे बाल आशुतोष के ही थे.

सारे सुबूत जुटाने के बाद पुलिस ने आशुतोष और रौनी को अदालत में पेश किया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया गया.  Family Crime Story

— इसके बाद अदालती कार्रवाई में क्या हुआ यह ज्ञात नहीं है.

— 2014 में प्रकाशित

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