Family Crime Story. पति की मौत के बाद राधा ने एकलौते बेटे को पालपोस कर उम्मीद लगा रखी थी कि बुढ़ापे का सहारा बनेगा. उसी तरह पत्नी की मौत के बाद रुकुलपाल ने बेटे की वजह से दूसरी शादी नहीं की कि सौतेली मां बच्चों को ठीक से प्यार नहीं करेगी. मनीष ने प्रेमिका के लिए मां की हत्या की तो शीलेश ने पत्नी के कहने पर बाप को मार डाला.
मेनगेट का ताला खुला देख कर राधा समझ गई कि मनीष आ गया है क्योंकि घर की चाबियां मनीष के पास भी होती थीं. उतने बड़े घर में मांबेटा ही रहते थे, इसलिए दोनों अलगअलग चाबियां रखते थे कि किस को कब जरूरत पड़ जाए. राधा ने अंदर आ कर बाजार से लाया सामान किचन में रखा और हाथमुंह धोने के लिए बाथरूम की ओर बढ़ी. वह मनीष के कमरे के सामने से गुजरी तो अंदर से मनीष के साथ लड़की के हंसने की आवाज उसे सुनाई दी. उस के कदम वहीं रुक गए और माथे पर बल पड़ गए. वह होंठों ही होंठों में बड़बड़ाई, ‘‘मनीष आज फिर नेहा को ले आया है. इस का मतलब यह हुआ कि वह मानने वाला नहीं है.’’
बेटे की इस मनमानी से नाराज राधा उस के कमरे में घुस गई. अंदर उस ने जो देखा, उस से एक बार उसे पलट कर बाहर आना पड़ा. अंदर पड़े बैड पर नेहा अपनी दोनों बांहें मनीष के गले में डाले गोद में बैठी थी.
राधा को देख कर दोनों भले ही अलग हो गए थे, लेकिन उन के चेहरों पर शरम की परछाई तक नहीं थी. वे कमरे से बाहर आए तो राधा ने कहा, ‘‘तू आज फिर इस लड़की को घर ले आया. मैं ने कहा था न कि मुझे यह लड़की बिलकुल पसंद नहीं है, इसलिए इसे घर मत ले आना.’’
‘‘मम्मी, नेहा आप को भले नहीं पसंद, पर मुझे तो पसंद है. आप तो जानती हैं कि मैं इसे बहुत प्यार करता हूं, इसलिए शादी भी इसी से करूंगा.’’ मनीष ने राधा के नजदीक जा कर कहा.
‘‘अगर तुम्हें अपने मन की करना है तो करो. लेकिन जिस दिन तुम ने इस लड़की से शादी की, उसी दिन तुम से मेरा संबंध खत्म.’’ राधा ने गुस्से में कहा.
मांबेटे के इस झगड़े से नेहा खुद को काफी असहज महसूस कर रही थी. इसलिए वह मनीष के पास जा कर बोली, ‘‘मनीष, अभी मैं जा रही हूं. कल कहीं बाहर मिलना, वहीं बाकी बातें करेंगे.’’
नेहा की इस बात से राधा को तो गुस्सा आया ही, मां ने प्रेमिका का अपमान किया था, इसलिए मनीष को भी गुस्सा आ गया था. उस ने चीखते हुए कहा, ‘‘मम्मी, नेहा से शादी करने में तुम्हें परेशानी क्या है, क्या तुम मेरी खुशी के लिए इतना भी नहीं कर सकती?’’
‘‘मैं ने तो तुम्हारी खुशी के लिए न जाने क्याक्या किया है, क्या तुम मेरी खुशी के लिए उस लड़की को नहीं छोड़ सकते?’’ राधा ने व्यंग्य से कहा.
‘‘नेहा को छोड़ना मेरे लिए आसान नहीं है. अगर आसान होता तो मैं कब का छोड़ देता.’’
‘‘इस का मतलब तुम मुझे छोड़ सकते हो, उसे नहीं. सोच लो, तुम्हें दोनों में से एक का ही साथ मिलेगा. चाहे मां के साथ रह लो या उस लड़की के साथ. अगर तुम ने उस लड़की से शादी की तो मेरा तुम से कोई संबंध नहीं रहेगा. मैं तुम्हें अपने इस घर में भी नहीं रहने दूंगी. यही नहीं, मेरे पास जो कुछ भी है, उस में से भी तुम्हें एक कौड़ी नहीं दूंगी.’’ इस तरह राधा ने अपना निर्णय सुना दिया.
मां की इन बातों से मनीष परेशान हो उठा. क्योंकि पिता की मौत के बाद सारी संपत्ति की मालकिन उस की मां ही थी. उस के लिए इस से भी बड़ी चिंता की बात यह थी कि वह पूरी तरह मां पर ही निर्भर था. अगर मां हाथ खींच लेती तो वह पाईपाई के लिए मोहताज हो जाता. जबकि बिना शराब के उसे नींद नहीं आती थी. सिगरेट तो वह पलपल में पीता था.
मनीष ही नहीं, राधा भी कम परेशान नहीं थी. वह उस का एकलौता बेटा था. 5 बेटियों के बाद वह न जाने कितनी मन्नतें मांगने के बाद पैदा हुआ था. बेटा पैदा होने पर राधा और उन के पति लालाराम की खुशी का ठिकाना नहीं रहा था.
लेकिन बेटे से उन्होंने जो उम्मीदें पाल रखी थीं, अधिक लाडप्यार ने उन उम्मीदों पर पानी फेर दिया था. बेटे की ही चिंता में राधा को नींद आ रही थी. देर रात तक करवट बदलते हुए किसी तरह वह सोई तो फिर सुबह उठ नहीं पाई.
सुबह मनीष उठा तो मां नहीं उठी थी. जबकि हमेशा वह उस से पहले उठ जाती थी. उस ने मां के कमरे में जा कर देखा, वहां की स्थिति देख कर वह सन्न रह गया. राधा की खून में डूबी लाश पड़ी थी. मां को उस हालत देख कर वह घबरा गया.
उस ने तुरंत थाना जगदीशपुरा पुलिस को मां की हत्या की सूचना दी. इस के बाद उस ने पड़ोस में रहने वाले डा. प्रदीप श्रीवास्तव को मां की हत्या के बारे में बताया. इस के बाद तो यह खबर पूरी कालोनी में फैल गई.
मनीष की एक बहन स्नेहलता उसी कालोनी में रहती थी. मनीष ने उसे भी मां के कत्ल की सूचना दे दी थी. आते ही वह मनीष से लिपट कर रोने लगी. वह उसे झिंझोड़ कर पूछने लगी, ‘‘भैया, किस ने किया मम्मी का कत्ल, उस ने किसी का क्या बिगाड़ा था?’’
‘‘दीदी, मैं तो खाना खा कर सो गया था. सुबह उठा तो मम्मी को इस हालत में पाया?’’ रोते हुए मनीष ने कहा.
लोग बहनभाई को सांत्वना दे रहे थे. राधा के अन्य रिश्तेदारों को भी उस के कत्ल की सूचना दे दी गई थी. नजदीक रहने वाले रिश्तेदार आ भी गए थे.
थाना जगदीशपुरा के थानाप्रभारी आदित्य कुमार भी पुलिसबल के साथ आ गए थे. उन की सूचना पर एएसपी शैलेश कुमार पांडेय भी आ गए थे. राधा की लाश जमीन पर पड़ी थी. उस के सिर, गर्दन और चेहरे पर किसी धारदार हथियार से वार किए गए थे. गले पर अंगुलियों के भी निशान थे.
राधा की उम्र 65 साल के आसपास थी. शरीर पर सारे गहने मौजूद थे. कमरे का भी सारा सामान व्यवस्थित था. यह देख कर सभी एक ही बात कह रहे थे कि आखिर इस बुढि़या ने किसी का क्या बिगाड़ा था, जो इस की हत्या कर दी गई.
जबकि उस का जवान बेटा घर में ही दूसरे कमरे में सो रहा था. पूछने पर मनीष ने पुलिस को बताया था कि मम्मी शायद चीख भी नहीं पाई थी, क्योंकि अगर वह चीखी होतीं तो उस की आंख जरूर खुल जाती.
हत्या लूट के इरादे से नहीं हुई थी, यह अब तक की जांच में साफ हो चुका था. मेनगेट पर ताला राधा ही बंद करती थी. पूछताछ में मनीष ने कहा था कि हो सकता है रात में वह ताला लगाना भूल गई हों.
घटनास्थल के निरीक्षण के दौरान इंसपेक्टर आदित्य कुमार ने देखा था कि वाशबेसिन में खून लगा है. इस का मतलब हत्यारे ने हत्या करने के बाद अपने हाथ वाशबेसिन में धोए थे. इस के अलावा पुलिस को वहां से ऐसा कोई सुबूत नहीं मिला था, जिस से हत्यारे तक पहुंचा जा सकता.
मां की हत्या पर मनीष जिस तरह रो रहा था, वह लोगों को एक तरह का नाटक लग रहा था. ऐसा लग रहा था, जैसे वह यह साबित करना चाहता है कि मां की हत्या का उसे बहुत दुख है.
पुलिस को भी कुछ ऐसा ही अहसास हुआ था. क्योंकि परिस्थितियां मनीष को ही शक के दायरे में ला रही थीं. पूछताछ में पुलिस को कुछ ऐसी बातें पता चलीं थीं, जिस से वही शक के दायरे में आ रहा था.
बहरहाल, पुलिस ने काररवाई को आगे बढ़ाते हुए लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. इस के बाद थाने लौट कर थानाप्रभारी आदित्य कुमार ने अज्ञात के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज करा दिया.
आदित्य कुमार को पूरी संभावना थी कि हत्या के इस मामले में कहीं न कहीं से मृतका का बेटा जरूर जुड़ा है, फिर भी उन्होंने उसे हिरासत में नहीं लिया था. वह सुबूत जुटा कर ही उसे गिरफ्तार करना चाहते थे. आगे क्या हुआ, यह जानने से पहले आइए थोड़ा मनीष के बारे में जान लें.
आगरा के थाना जगदीशपुरा की विजय विहार कालोनी की कोठी नंबर 27 में रहने वाले लालाराम का बेटा था मनीष. लालाराम ने यह कोठी आगरा में तहसीलदार रहते हुए बनवाई थी. उन के परिवार में पत्नी राधा, 5 बेटियां स्नेहलता, अनीता, प्रेमलता, हेमलता और सुनीता थी.
बेटे के चक्कर में ही उन्हें ये 5 बेटियां हो गई थीं. इसीलिए लालाराम इतने पर भी नहीं रुके थे. आखिरकार छठवीं संतान के रूप में उन के यहां बेटा मनीष पैदा हुआ था. मनीष के पैदा होतेहोते लालाराम और राधा काफी उम्रदराज हो गए थे.
उम्र के तीसरे पन में बेटा पा कर पतिपत्नी फूले नहीं समाए थे. एक तो मनीष बुढ़ापे में पैदा हुआ था, दूसरे 5 बेटियों के बाद, इसलिए वह मांबाप का बहुत लाडला था. इसी लाडप्यार में वह बिगड़ता चला गया.
जैसेजैसे बेटियां सयानी होती गईं, लालाराम उन की शादियां करते गए. अच्छी नौकरी में थे, इसलिए उन्होंने सारी बटियों की शादी ठीकठाक घरों में की थीं. उन के 3 दामाद रेलवे में थे, एक बैंक में तो एक प्राइवेट नौकरी में था.
बेटे को भी वह पढ़ालिखा कर किसी काबिल बनाना चाहते थे, लेकिन बेटे का मन पढ़ने में कम, आवारागर्दी में ज्यादा लगता था. खर्च के लिए पैसे मिल ही रहे थे, इसलिए उस के दोस्त भी तमाम हो गए थे.
मनीष पढ़ ही रहा था, तभी लालाराम नौकरी से रिटायर हो गए थे. दुर्भाग्य से रिटायर होने के कुछ ही दिनों बाद वह एक ऐसी दुर्घटना का शिकार हुए, जिस की वजह से कोमा में चले गए. यह सन 2005 की बात है.
राधा ने पति का बहुत इलाज कराया, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. पिता के कोमा में चले जाने के बाद मनीष और ज्यादा आजाद हो गया. राधा के लिए परेशानी यह थी कि वह बेटे को संभाले या पति की देखभाल करे.
पति की देखभाल के चक्कर में मनीष उस के हाथ से पूरी तरह निकल गया. आखिर कोमा में रहते हुए सन 2010 में लालाराम की मौत हो गई. पति की मौत के बाद राधा को लगा कि बेटा तो है ही, उसी के सहारे बाकी का जीवन काट लेगी.
लेकिन मनीष मां का सहारा नहीं बन सका. क्येंकि पति की मौत के बाद जब राधा का ध्यान बेटे पर गया तो उसे उस की असलियत का पता चला. उसे पता चला कि बेटा सिगरेट का ही नहीं, शराब का भी आदी हो चुका है. यही नहीं, नेहा नाम की लड़की से उस का प्रेमसंबंध हो गया है, जिस से वह शादी करना चाहता है.
जबकि राधा इस शादी के लिए कतई तैयार नहीं थी. इस की वजह यह थी कि वह लड़की उस की जाति की नहीं थी. बेटे की हरकतों से से राधा बहुत परेशान रहती थी. ऐसे में बेटियां ही उसे थोड़ा सुकून पहुंचा रही थीं. जबकि मनीष को बहनों का आनाजाना भी अच्छा नहीं लगता था. क्योंकि बहनें उसे रोकतीटोकती तो थीं ही, मां को भी उसे पैसे देने से रोकती थीं.
पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार राधा पर धारदार हथियार से तो हमला किया ही गया था, उस का गला भी दबाया गया था. स्थितियों से पुलिस ने अंदाजा लगाया कि कातिल कोई नजदीकी ही था. शायद वह गला दबा कर पूरी तरह निश्चित हो जाना चाहता था कि उस में जान नहीं रह गई है.
मनीष ने पुलिस को बताया था कि वह रात में शराब पी कर सोया था, इसलिए न तो उसे चीख सुनाई दी थी, न खटरपटर की आवाज. उस ने सफाई तो बहुत दी थी, लेकिन पुलिस को उसी पर संदेह था. इसलिए पुलिस ने अपने मुखबिरों से उस के बारे में पता लगाने को कह दिया था.
मुखबिरों ने थानाप्रभारी आदित्य कुमार को बताया था कि मांबेटों में अकसर झगड़ा होता रहता था. इस की वजह मनीष की आवारागर्दी थी. लालाराम अपनी सारी संपत्ति राधा के नाम कर गए थे. शायद उन्हें बेटे पर पहले से ही संदेह था.
पुलिस ने अब तक जो सुबूत जुटाए थे, वे मनीष को ही दोषी ठहरा रहे थे. थानाप्रभारी आदित्य कुमार पुलिस बल के साथ उस के घर जा पहुंचे. पुलिस को देख कर मनीष का चेहरा उतर गया. जब सिपाहियों ने उस का हाथ पकड़ कर साथ चलने को कहा तो वह बोला, ‘‘मुझे कहां चलना है?’’
‘‘थाने और कहां, साहब तुम से कुछ पूछताछ करना चाहते हैं.’’ सिपाहियों ने कहा.
‘‘लेकिन मैं ने तो सब कुछ पहले ही बता दिया है,’’ मनीष ने कहा, ‘‘अब क्या पूछना है?’’
‘‘अभी तो तुम से और भी बहुत कुछ पूछना है.’’ कह कर सिपाहियों ने उसे गाड़ी में बैठा दिया.
मनीष को थाने ला कर पूछताछ शुरू हुई. पहले तो वह वही बातें बताता रहा, जो शुरू में बता चुका था. जबकि आदित्य कुमार उस से वह पूछना चाहते थे, जो उस ने सचमुच में किया था. लेकिन यह इतना असान नही ंथा. उन्होंने जब उसे जुटाए सुबूतों के आधार पर घेरना शुरू किया तो वह फंसने लगा.
जब वह आदित्य कुमार के सवालों में पूरी तरह से फंस गया तो फूटफूट कर रोने लगा. फिर उस ने अपनी मां की हत्या का अपना अपराध स्वीकार कर लिया. इस के बाद उस ने पुलिस को मां की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी.
मनीष बिगड़ तो चुका ही था, उस के दोस्त भी वैसे ही थे. राधा का सोचना था कि वह उस की शादी कर दे तो शायद उस में सुधार आ जाए. उस के पास किसी चीज की कमी तो थी नहीं, इसलिए उसे अच्छा रिश्ता मिल सकता था.
लेकिन तभी राधा को पता चला कि मनीष का शाहगंज की रहने वाली किसी लड़की से चक्कर चल रहा है. वह लड़की दूसरी जाति की थी, इसलिए राधा किसी भी स्थिति में उस से मनीष की शादी नहीं करना चाहती थी.
इस की एक वजह यह भी थी कि उस लड़की यानी नेहा के घर वालों को मनीष और उस के संबंधों का पता नहीं था. ऐसे में अगर शादी हो जाती तो हंगामा भी हो सकता था. इसलिए राधा इस झंझट में नहीं पड़ना चाहती थी. जबकि मनीष अपनी जिद पर अड़ा था. यही वजह थी कि एक दिन वह नेहा को ले कर घर आ गया.
तब राधा ने दोनों को डांटा ही नहीं था, बल्कि नेहा को चेतावनी भी दी थी कि अगर वह नहीं मानी तो वह उस की शिकायत उस के पिता से कर देगी. इस के बाद उस ने यह बात अपनी बड़ी बेटी और दामाद को बताई तो उन्होंने कहा कि वे मनीष को समझा देंगे.
26 फरवरी को राधा की अनुपस्थिति में मनीष फिर नेहा को घर ले आया. संयोग से राधा घर आ गई और नेहा को मनीष की बांहों में देख लिया तो वह भड़क उठी. उस ने दोनों को डांटाफटकारा ही नहीं, नेहा को अपमानित कर के भगा दिया और मनीष को अपनी संपत्ति से बेदखल करने की धमकी दे दी.
मनीष न तो नेहा को छोड़ना चाहता था और न ही मां की संपत्ति को. उसे यह भी पता था कि मां वसीयत बनवाने के लिए वकील से सलाह ले रही है. इसलिए उसे लगा कि अगर मां ने सचमुच उसे संपत्ति से बेदखल कर दिया तो वह कहीं का नहीं रहेगा. वह यह भी जानता था कि मां जो ठान लेती हैं, कर के मानती हैं.
अगर राधा सरा संपत्ति बेटियों के नाम कर देती तो मनीष का भविष्य अंधेरे में फंस जाता. अपने भविष्य को बचाने के लिए उस ने गहराई से विचार किया तो उसे लगा कि अगर मां न रहे तो उस की संपत्ति भी उसे मिल जाएगी और वह नेहा से शादी भी कर सकेगा.
इस के बाद उस ने तय कर लिया कि वह मां की हत्या कर के अपना रास्ता साफ कर लेगा. रात का खाना खा कर मनीष लेट गया. उसे मां की हत्या करनी थी, इसलिए उसे नींद नहीं आ रही थी. दूसरी ओर बेटे की चिंता की वजह से राधा को भी नींद नहीं आ रही थी.
करवट बदलतेबदलते राधा को नींद आ गई तो मनीष को मौका मिल गया. राधा के सोते ही मनीष ने पहले से छिपा कर रखा हंसिया उठाया और राधा के कमरे में जा पहुंचा. सो रही राधा के चेहरे पर उस ने वार किया तो राधा चीखी. मनीष ने झट उस का मुंह दबा दिया तो वह बेहोश हो गई. इस के बाद उस ने 2-3 वार और किए.
मनीष ने देखा कि मां अभी मरी नहीं है तो उस ने गला दबा दिया. राधा का खेल खत्म हो गया. उस ने रास्ते का कांटा तो निकाल फेंका, लेकिन अब उसे पुलिस का डर सताने लगा. वह पुलिस से बचने का उपाय सोचने लगा.
काफी सोचविचार कर मनीष ने खून लगे कपड़े उतार कर छिपा दिए. इस के बाद मोटरसाइकिल निकाली और देर तक आगरा की सड़कों पर बेमतलब घूमता रहा. सड़क पर घूमते हुए ही उस ने खुद को बचाने के लिए एक की कहानी गढ़ डाली.
सुबह सब से पहले उस ने मां की हत्या की सूचना पुलिस कंट्रोल रूम को दी. इस के बाद अपना पक्ष मजबूत करने के लिए उस ने पड़ोसी डा. प्रदीप श्रीवास्तव को घटना के बारे में बताया. इस के बाद कालोनी में ही रहने वाली बहन स्नेहलता को सूचना दी.
पुलिस ने मनीष की निशानदेही पर उस के घर से वह हंसिया बरामद कर लिया, जिस से उस ने मां की हत्या की थी. उस के वे कपड़े भी मिल गए थे, जिन्हें वह हत्या के समय पहने था. पूछताछ के बाद पुलिस ने उसे आगरा की अदालत में उसे पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.
कथा लिखे जाने तक मनीष जेल में था. अब दुविधा उस की बहनों के सामने है कि वे एकलौते भाई को बचाएं या मां के हत्यारे को सजा दिलाएं.
मनीष ने एक गैर लड़की के लिए उस की मां की हत्या कर डाली, जिस ने उस के लिए न जाने कितनी ड्योढि़यों पर सिर पटका था. वैसा ही कुछ रुकुमपाल के एकलौते बेटे शीलेश ने भी किया. पत्नी के कहे में आ कर उस ने भी उस पिता की हत्या कर दी, जिस ने उसे पिता का ही नहीं, मां का भी प्यार दिया था. क्योंकि जब वह 4 साल का था तभी रुकुमपाल की पत्नी श्यामश्री की मौत हो गई थी.
श्यामश्री की मौत हुई थी तो बेटी आशा 6 साल की थी तो बेटा शीलेश 4 साल का था. छोटेछोटे बच्चों को संभालना मुश्किल था, इसलिए घर वाले ही नहीं, रिश्तेदार भी उस की दूसरी शादी कराना चाहते थे. लेकिन रुकुमपाल ने शादी से तो मना किया ही, खुद को संभाला और बच्चों को भी संभाल लिया.
उत्तर प्रदेश के जिला एटा की कोतवाली देहात के गांव नगला समल में रहता था रुकुमपाल. शहर के नजदीक और सड़क के किनारे बसा होने की वजह से गांव के लोग खुश और संपन्न थे. रुकुमपाल के पास खेती की जमीन ठीकठाक थी और वह मेहनती भी था, इसलिए गांव के हिसाब से उस के परिवार की गिनती खुशहाल परिवारों में होती थी.
पत्नी की मौत के बाद बच्चों को मां रामरखी के भरोसे छोड़ कर रुकुमपाल परिवार और जिंदगी को पटरी पर लाने की कोशिश करने लगा था. शादी से उस ने मना ही कर दिया था, इसलिए दोनों बच्चों को बाप के साथसाथ वह मां का भी प्यार दे रहा था. इस में उसे परेशानी तो हो रही थी लेकिन बच्चों के लिए वह इस परेशानी को झेल रहा था. क्योंकि वह बच्चों के लिए सौतेली मां नहीं लाना चाहता था.
समय जितना जालिम होता है, उतना ही दयालु भी होता है. समय के साथ बड़ेबड़े जख्म भर जाते हैं. रुकुमपाल की जिंदगी भी सामान्य हो चली थी. बच्चे भी मां को भूल कर अपनीअपनी जिंदगी संवारने में लग गए थे.
आशा पढ़लिख कर शादी लायक हो गई तो रुकुमपाल ने एटा के ही गांव नगला बेल के रहने वाले विनोद कुमार के साथ उस का विवाह कर दिया था. विनोद वन विभाग में नौकरी करता था. नौकरी की वजह से वह एटा में रहता था, इसलिए आशा भी उस के साथ एटा में ही रहने लगी थी.
रुकुमपाल बेटे को पढ़ाना चाहता था, लेकिन शीलेश इंटर से ज्यादा नहीं पढ़ सका. पढ़ाई छोड़ कर वह दिल्ली चला गया और किसी फैक्ट्री में नौकरी करने लगा. हालांकि रुकुमपाल चाहता था कि शीलेश गांव में ही रहे, क्योंकि उस के पास जमीन ठीकठाक थी.
लेकिन शीलेश को जो आजादी दिल्ली में मिल रही थी, शायद वह गांव में नहीं मिल सकती थी, इसलिए उस ने रुकुमपाल से साफ कह दिया था कि वह जहां भी है, वहीं ठीक है.
पत्नी की मौत के बाद रुकुमपाल ने अपना पूरा जीवन यह सोच कर बच्चों के लिए होम कर दिया था कि यही बच्चे बुढ़ापे का सहारा बनेंगे. बेटी तो ससुराल चली गई थी. बचा शीलेश, वह उस की कल्पना से अलग ही स्वभाव का लग रहा था. उस का सोचना था कि पिता ने अपना फर्ज पूरा किया है, उस के लिए कोई कुर्बानी नहीं दी है.
अपनी इसी सोच की वजह से कभीकभी शीलेष रुकुमपाल को ऐसी बात कह देता था कि उस के मन को गहरी ठेस पहुंचती थी. लेकिन उस के लिए शीलेश अभी भी बच्चा ही था. इसलिए वह उस की इन बातों को दिल से नहीं लेता था.
रुकुमपाल को अपने फर्ज पूरे करने थे, इसलिए वह शीलेश की शादी के लिए जीजान से जुट गया. आखिर उस की तलाश रंग लाई और एटा के ही गांव निछौली कलां के रहने वाले सोबरन की बेटी ममता उसे पसंद आ गई. फिर उस ने धूमधाम से उस की शादी कर दी.
सोबरन की 4 बेटियों में ममता सब से छोटी थी. उस का एक ही भाई था किशोरी. अंतिम बेटी होने की वजह से सोबरन ने ममता की शादी खूब धूमधाम से की थी.
ममता के आने से सब से ज्यादा खुशी दादी रामरखी को हुई थी. क्योंकि घर में दुलहन के आ जाने से उसे एक सहारा मिल गया था. कुछ दिन गांव में रह कर ममता शीलेश के साथ दिल्ली चली गई थी.
ममता गर्भवती हुई तो शीलेश उसे गांव छोड़ गया. कुछ दिनों बाद ममता ने एक बेटी को जन्म दिया. बेटी पैदा होने के बाद भी ममता दिल्ली नहीं गई. अब महीने, 2 महीने में शीलेश ही पत्नी और बिटिया से मिलने गांव आ जाता था.
बेटी 2 साल की हुई तो ममता एक बार फिर गर्भवती हुई. इस बार उस ने बेटे को जन्म दिया. ममता दिल्ली जाना तो नहीं चाहती थी, लेकिन रुकुमपाल और रामरखी ने उसे जबरदस्ती दिल्ली भेज दिया.
दिल्ली आने के बाद कुछ दिनों में ममता को लगा कि पति की कमाई से घर ठीक से नहीं चल सकता तो वह गांव लौट आई और रुकुमपाल से साफ कह दिया कि अब वह दिल्ली नहीं जाएगी.
ममता मजबूरी में गांव में रह रही थी, क्योंकि एक तो पति की कमाई में गुजर नहीं होता था, दूसरे उस के छोटे से कमरे में बच्चों के साथ उसे घुटन सी होती थी. गांव में दिन तो कामधाम में कट जाता था, लेकिन पति के बिना रात काटना मुश्किल हो जाता था. जिस्म की भूख और अकेलापन काटने को दौड़ता था.
ममता ने शीलेश से कई बार कहा कि वह आ कर गांव में रहे, लेकिन शीलेश को शहर का जो चस्का लग चुका था, वह उसे गांव वापस नहीं आने दे रहा था.
पति की इस उपेक्षा से नाराज हो कर ममता मायके चली गई थी. लेकिन अब मायके में तो जिंदगी कट नहीं सकती थी, इसलिए मजबूर हो कर उसे ससुराल आना पड़ा. फिर मांबाप ने भी कह दिया था कि वह जैसी भी ससुराल में है, उसे उसी में खुश रहना चाहिए.
ममता को ससुराल में कोई भी परेशानी नहीं थी. परेशानी थी तो सिर्फ यह कि पति का साथ नहीं मिल पा रहा था. इस परेशानी का भी वह हल ढूंढ़ने लगी. तभी एक दिन वह मायके जा रही थी तो एटा में उस की मुलाकात हरीश से हो गई.
हरीश और ममता एकदूसरे को शादी के पहले से ही जानते थे. हरीश उस के गांव के पास का ही रहने वाला था. दोनों एकदूसरे को तब से पसंद करते थे, जब साथसाथ पढ़ रहे थे. बसअड्डे पर हरीश मिला तो ममता ने पूछा, ‘‘हरीश गांव चल रहे हो क्या?’’
‘‘अब शाम हो गई है तो गांव ही जाऊंगा न. लगता है, तुम भी मायके जा रही हो?’’ हरीश ने पूछा.
‘‘हां, मायके ही जा रही हूं. अब तुम मिल गए हो तो कोई परेशानी नहीं होगी. बाकी बच्चों को ले कर आनेजाने में बड़ी परेशानी होती है.’’
‘‘किसी को साथ ले लिया करो.’’ हरीश ने कहा तो ममता तुनक कर बोली, ‘‘किसे साथ ले लूं. वह तो दिल्ली में रहते हैं. घर में बूढ़े ससुर हैं, उन्हें खेती के कामों से ही फुरसत नहीं है.’’
‘‘तुम्हारे पति दिल्ली में रहते हैं और तुम गांव में रहती हो?’’ ‘‘क्या करूं, उन के साथ वहां छोटी सी कोठरी में मेरा दम घुटता है, इसलिए मैं यहां गांव में रहती हूं.’’
‘‘तो उन से कहो, वह भी यहां गांव में आ कर रहें. पति के बिना तुम अकेली कैसे रह लेती हो?’’ हरीश ने कहा तो ममता निराश हो कर बोली, ‘‘उन्हें गांव में अच्छा ही नहीं लगता.’’
‘‘लगता है, वहां उन्हें कोई और मिल गई है. तुम यहां उन के नाम की माला जप रही हो और वह वहां मौज कर रहे हैं.’’
‘‘भई वह मर्द हैं, कुछ भी कर सकते हैं.’’ ‘‘तो औरतों को किस ने मना किया है. वह वहां मौज कर रहे हैं, तुम यहां मौज करो. तुम्हारे लिए मर्दों की कमी है क्या.’’
वैसे तो हरीश ने यह बात मजाक में कही थी, लेकिन ममता ने इसे गंभीरता से ले लिया. उस ने कहा, ‘‘मैं 2 बच्चों की मां हूं, मुझे कौन पूछेगा?’’
‘‘तुम हाथ बढ़ाओ,सब से पहले मैं ही पकड़ूंगा.’’ हरीश ने हंसते हुए कहा, ‘‘ममता, मैं तुम्हें तब से प्यार करता हूं, जब हम साथ में पढ़ते थे. लेकिन मैं अपने मन की बात कह पाता, उस के पहले ही तुम किसी और की हो गई.’’
जब ममता ने भी उस से मन की बात कह दी तो दोनों चोरीछिपे मिलने ही नहीं लगे बल्कि संबंध भी बना लिए. ममता मौका निकाल हरीश से मिलने लगी. हरीश से संबंध बनने के बाद ममता को शीलेश की कोई परवाह नहीं रह गई.
शीलेश महीने, 2 महीने में आता और 1-2 दिन रह कर चला जाता. उस के बाद ममता को जब भी हरीश से मिलना होता, किसी न किसी बहाने एटा चली जाती और उस से मिल लेती. मोबाइल फोन इस काम में उन की पूरी मदद कर रहा था.
ममता का बारबार एटा जाना रामरखी को अच्छा नहीं लगता था. उस ने रोका भी, लेकिन ममता के बहाने ऐसे होते थे कि वह रोक नहीं पाती थी. फिर उस पर उस का इतना जोर भी नहीं चलता था, इसलिए ममता आराम से हरीश से मिल रही थी.
लेकिन किसी दिन गांव के किसी आदमी ने ममता को हरीश के साथ देख लिया तो उस ने रुकुमपाल से बता दिया कि उस की बहू शहर में किसी लड़के के साथ घूम रही थी. बात चिंता वाली थी. लेकिन रुकुमपाल ने अपनी आंखों से नहीं देखा था, इसलिए वह बहू से कुछ कह नहीं सकता था.
रुकुमपाल को पता था कि उन का बेटा उन से ज्यादा पत्नी पर विश्वास करता था, इसलिए उस से कुछ कहने से कोई फायदा नहीं हो सकता था.
उसी बीच रामरखी कुछ दिनों के लिए आशा के यहां चली गई तो ममता को हरीश से घर में ही मिलने का मौका मिल गया. रुकुमपाल दिनभर खेतों पर रहता था, इसलिए ममता हरीश को घर में बुलाने लगी. संयोग से एक दिन रुकुमपाल की तबीयत खराब हो गई तो वह दोपहर को ही घर आ गया. घर में अनजान युवक को देख कर उस ने ममता से पूछा, ‘‘यह कौन है?’’
‘‘मेरे मामा का बेटा है.’’ ममता ने कहा. ‘‘आज के पहले तो इसे कभी नहीं देखा.’’ ‘‘पापा, यह पहली बार मेरे यहां आया है.’’
ममता और रुकुमपाल बातचीत कर रहे थे, तभी हरीश चुपके से खिसक गया था. इस से रुकुमपाल को पूरा संदेह हो गया. उसे लगा कि यह वही लड़का है, जिसे ममता के साथ एटा में देखा गया था.
अब रुकुमपाल ममता पर नजर रखने लगा. बाहर आनेजाने के लिए भी वह मना करने लगा. परेशान हो कर आखिर एक दिन ममता ने कह दिया, ‘‘मैं इस घर की बहू हूं, नौकरानी नहीं कि 24 घंटे घर में कोल्हू के बैल की तरह जुटी रहूं. मेरी भी कुछ इच्छाएं हैं. जब देखो तब आप रोकतेटोकते रहते हैं. यह मुझे अच्छा नहीं लगता.’’
रुकुमपाल समझ गया कि बहू उस के हाथ से निकल चुकी है. अब इसे संभालना उस के वश का नहीं है. इसलिए उस ने शीलेश को फोन किया कि वह आ कर अपनी बीवीबच्चों को ले जाए. क्योंकि अब उन्हें संभालना उस के वश में नहीं है.
‘‘ऐसा क्या हो गया पापा?’’ शीलेश ने पूछा.
रुकुमपाल ने सच्चाई छिपा ली, क्योंकि वह जानता था कि सच्चाई बताने पर बेटे का घर टूट सकता है. उस ने कहा, ‘‘मुझे लगता है, तुम्हारे बिना ममता उदास रहती है. बच्चे भी तुम्हें बहुत याद करते हैं.’’
‘‘ठीक है पापा, मैं कुछ दिनों की छुट्टी ले कर घर आ रहा हूं.’’
ममता को जब पता चला कि रुकुमपाल उसे दिल्ली भेजना चाहता है तो वह बेचैन हो उठी. उस ने तुरंत शीलेश को फोन किया, ‘‘तुम अपने काम में मन लगाओ. अगर मैं दिल्ली आ गई तो यहां दादी औरर पापा को कौन देखेगा. तुम मेरी और बच्चों की चिंता बिलकुल मत करो. मेरी तो अब तुम्हारे बिना रहने की आदत सी पड़ गई है.’’
रामरखी के न रहने से ममता आजाद थी. उस ने एक दिन फोन कर के फिर हरीश को बुला लिया. रुकुमपाल ममता पर बराबर नजर रख रहा था. इसलिए हरीश के आने की खबर उसे लग गई. संयोग से उस दिन ममता ने दरवाजा बंद नहीं किया था, इसलिए रुकुमपाल ने दोनों को रंगेहाथों पकड़ लिया.
रुकुमपाल को देख कर हरीश तो भाग खड़ा हुआ, जबकि ममता डर के मारे कांपने लगी. रुकुमपाल ने पहले तो उसे खूब फटकारा. इस के बाद कहा, ‘‘अब तुम्हें गांव में रहने की जरूरत नहीं है. मैं सब कुछ बता कर शीलेश को बुलाता हूं और तुम्हें उस के साथ दिल्ली भेज देता हूं.’’
ममता बुरी तरह डर गई. क्योंकि अगर उस के और हरीश के संबंधों की जानकारी शीलेश को हो गई तो उस की नजरों में गिर जाएगी. दूसरी ओर वह दिल्ली बिलकुल नहीं जाना चाहती थी. इसलिए सोचने लगी कि वह ऐसा क्या करे कि शीलेश को बाप की बात पर विश्वास न हो.
रुकुमपाल ने ममता को भले ही धमकी दे दी थी, लेकिन शीलेश को यह सब बताना नहीं चाहता था. क्योंकि बेटे की गृहस्थी बरबाद नहीं करना चाहता था. ममता ने हरीश से कह दिया था कि कुछ दिनों तक वह इधर बिलकुल न आए. इस के बाद उस ने पूरी योजना बना कर जो ड्रामा रचा, उस में सचमुच उस ने रुकमपाल को चारों खाने चित्त कर दिया. उस ने शीलेश को फोन किया, ‘‘तुम जल्दी से गांव आ जाओ. मैं यहां बहुत परेशान हूं.’’
‘‘तुम्हें जो भी परेशानी हो, पापा से बता दो. मैं अभी नहीं आ सकता, क्योंकि मुझे छुट्टी नहीं मिलेगी.’’ शीलेश ने कहा.
‘‘उन से क्या बताऊं परेशानी, परेशानी की वजह ही वही हैं. तुम्हें अपनी नौकरी की पड़ी है और मैं यहां उन की हरकतों से परेशान हूं.’’
‘‘क्या… पापा की हरकतों से परेशान हो?’’ शीलेश हैरानी से बोला. ‘‘एक ही बात को कितनी बार कहूं?’’ ममता गुस्से में बोली.
ममता ने ऐसी बात कह दी थी कि मजबूरन शीलेश को छुट्टी ले कर घर आना पड़ा. बेटे को देख कर रुकुमपाल ने राहत की सांसें ली. उस ने सोचा कि बेटा आ गया है तो वह बहू को उस के साथ भेज देंगे. उस के बाद सारा झंझट खतम हो जाएगा.
रुकुमपाल कुछ दूसरा सोच रहा था, जबकि ममता कुछ और ही सोचे बैठी थी. रात में उस ने रोते हुए शीलेश से कहा, ‘‘तुम तो दिल्ली में रहते हो, यहां मुझे इज्जत बचाना मुश्किल हो गया है.’’
‘‘तुम्हें भ्रम हुआ होगा. करने की कौन कहे, पापा ऐसा कभी सोच भी नहीं सकते.’’ शीलेश ने कहा.
‘‘उन्हें पता है कि तुम मेरी बात पर विश्वास नहीं करोगे, इसीलिए तो वह मुझे गंदी नजरों से देखते हैं. इस हालत में मैं अपनी इज्जत कैसे बचाऊं?’’
शीलेश को पत्नी की बातों पर विश्वास नहीं हो रहा था. जिस बाप ने उस की खातिर अपनी जवानी होम कर दी थी, वह उस की पत्नी के साथ गलत काम करने की कैसे सोच सकता था. उस ने ममता को समझाना चाहा, लेकिन ममता अपनी जिद पर अड़ी थी. तब उस ने दिल्ली चलने को कहा तो ममता ने वहां जाने से मना करते हुए कहा, ‘‘नहीं जाना मुझे दिल्ली, वहां उस छोटी सी कोठरी में मेरा दम घुटता है.’’
उस रात ममता ने रोधो कर ऐसा त्रियाचरित्र रचा कि शीलेश को पूरा विश्वास हो गया कि ममता सही है और उस के पापा गलत. यही नहीं, उस ने वादा भी कर लिया कि सुबह वह इस बात को ले कर पापा से आरपार की बात करेगा.
सुबह रुकुमपाल शीलेश से ममता के बारे में कुछ कहता, उस से पहले ही शीलेश ने कहा, ‘‘पापा आप एकदम बेशरम ही हो गए हैं क्या?’’
‘‘क्यों? मैं ने ऐसा क्या किया, जो तुम मुझे बेशरम कह रहे हो?’’ रुकुमपाल ने हैरानी से कहा.
‘‘बहू पर नीयत खराब किए हो और कह रहे हो कि मैं ने क्या किया है.’’
रुकुमपाल की समझ में सारा माजरा आ गया. उस ने बेटे को समझाने के लिए कहा, ‘‘बेटा अपना पाप छिपाने के लिए तुम्हारी पत्नी मेरे ऊपर यह गंदा आरोप लगा रही है. सोचो, जिस आदमी ने अपनी पूरी जिंदगी तुम लोगों के पीछे होम कर दी, अब इस उम्र में वह ऐसी घटिया हरकत करेगा. मैं ने सपने में भी नहीं सोचा था कि बुढ़ापे में मुझ पर यह कलंक भी लगेगा.’’
‘‘पापा, आप कुछ और कह रहे हैं और ममता कुछ और.’’
ममता ने रोधो कर शीलेश के मन में रुकुमपाल के खिलाफ जो जहर भरा था, उस की वजह से वह बाप की न कोई बात सुनने को तैयार था न कोई तर्क. रुकुमपाल की समझ में नहीं आ रहा था कि वह शीलेश को कैसे समझाए कि गलत वह नहीं, गलत ममता है.
दूसरी ओर शीलेश भी कम परेशान नहीं था. गांव के कुछ लोगों ने भी उस से कहा था कि जवान बीवी को इस तरह घर में छोड़ना ठीक नहीं है. उन लोगों के कहने का मतलब कुछ और था, जबकि शीलेश ने इस का मतलब वही लगाया, जो ममता ने उस के दिमाग में भरा था.
रुकुमपाल उस से बहुत कुछ कहना चाहता था, जबकि वह उस की कोई भी बात सुनने को तैयार नहीं था. तनाव हद से ज्यादा हो गया तो शीलेश ने ठेके पर जा कर जम कर शराब पी. गिरतेपड़ते किसी तरह घर पहुंचा तो रुकुमपाल ने उसे संभालने की कोशिश की. तब वह बाप को धक्का दे कर गालियां देने लगा.
ममता ने सुना तो बहुत खुश हुई. वह यही तो चाहती थी. वह बापबेटे के बीच दीवार खड़ी करने में कामयाब हो गई थी. शीलेश चारपाई पर लुढ़का तो सुबह ही उठा. उठते ही उस ने कहा, ‘‘ममता, तुम अपना सारा सामान समेटो. हम दिल्ली चलेंगे.’’
ममता घबरा गई. उस का फेंका पासा उलटा पड़ रहा था. क्योंकि इस हालत में अगर वह दिल्ली चली गई तो फिर लौट नहीं सकती थी. हरीश दिल्ली जा नहीं सकता. तब वह उस से कैसे मिल सकती थी. अब वह इस सोच में डूब गई कि ऐसा क्या करे कि उसे दिल्ली भी न जाना पड़े और बुड्ढे से भी पिंड छूट जाए.
काफी सोचविचार कर उस ने तय किया कि वह दिल्ली जाने के बजाय इस कांटे को ही जड़ से निकलवा फेंकेगी. उस ने कहा, ‘‘तुम्हें पता नहीं, मैं गर्भवती हूं. इस हालत में मैं दिल्ली नहीं जा सकती. अब तुम्हें सोचना है कि इस हालात में तुम मुझे अपने बाप से कैसे बचा सकते हो? कोई दूसरा होता तो वह ऐसे आदमी को खत्म कर देता, जो उस की पत्नी पर बुरी नजर रखता हो.’’
ममता ने यह चाल बहुत सोचसमझ कर चली थी. उस का सोचना था कि शीलेश अगर अपने बाप को मार देता है तो बाप की हत्या के आरोप में वह जेल चला जाएगा. उस के बाद वह पूरी तरह से आजाद हो जाएगी. फिर वह आराम से हरीश से मिल सकेगी.
इस के बाद ममता ने त्रियाचरित्र फैला कर शीलेश के मन में बाप के प्रति ऐसा जहर भरा कि वह बाप का ऐसा दुश्मन बना कि उस की जान लेने को तैयार हो गया. उसे लगा कि ऐसे बाप को जीने का बिलकुल हक नहीं है, जो अपने बेटे की ही पत्नी पर गंदी नीयत रखता हो.
रुकुमपाल यह तो जान गया था कि पत्नी के कहने में आ कर बेटा उस के खिलाफ हो गया है. लेकिन उसे यह विश्वास नहीं था कि बेटा उस की जान भी ले सकता है. उस का सोचना था कि जब शीलेश को सच्चाई का पता चल जाएगा तो अपने आप सब ठीक हो जाएगा.
19 मार्च की शाम को शीलेश ने रुकुमपाल से खेतों से भूसा लाने को कहा. रुकुमपाल भूसा लाने के लिए खेतों की ओर चला तो शीलेश भी फावड़ा ले कर उस के पीछेपीछे वहां जा पहुंचा. उस के साथ ममता भी थी.
रुकुमपाल झुक कर भूसा निकालने लगा तो शीलेश ने पीछे से उस पर फावड़े से वार कर दिया. रुकुमपाल चीख कर गिर पड़ा. उस की चीख सुन कर आसपास के खेतों में काम कर रहे लोग उस की ओर दौड़े. वे रुकुमपाल के पास तक पहुंच पाते शीलेश ने बाप पर फावड़े से कई वार किए और भाग निकला. लेकिन गांव वालों ने उसे ही नहीं, ममता को भी उस के साथ भागते हुए देख लिया था.
गांव वालों ने घटना की सूचना कोतवाली देहात पुलिस को दी. सूचना पा कर कोतवाली प्रभारी इंसपेक्टर पदम सिंह पुलिस बल के साथ गांव नगला समल पहुंच गए. पहुंचते ही उन्होंने लाश को कब्जे में ले लिया. गांव वालों ने पूछताछ में बताया कि जब वे रुकुमपाल की चीख सुन कर उस की ओर दौड़े थे तो उन्हें मृतक का बेटा शीलेश और बहू ममता भागते ही दिखाई दिए थे.
पुलिस को लगा कि उन्हीं लोगों ने यह काम किया है, तभी भाग रहे थे अन्यथा बाप की चीख सुन कर वह बचाने दौड़ेगा, भागेगा नहीं. कोतवाली प्रभारी ने 2 सिपाहियों को घटनास्थल पर छोड़ा और खुद बाकी सिपाहियों को ले कर रुकुमपाल के घर जा पहुंचे.
शीलेश भागने की तैयारी कर रहा था. ममता भी उस के साथ थी. पुलिस ने दोनों को पकड़ लिया. पुलिस ने मृतक की बेटी आशा को घटना की सूचना दी तो वह दादी रामरखी को साथ ले कर आ गई. रुकुमपाल की लाश देख कर रामरखी बेहोश हो गई तो आशा भी फूटफूट कर रोने लगी.
रामरखी को होश में लाया गया तो वह रोते हुए कहने लगी, ‘‘ममता ने ही अपने प्रेमी से मिलने के लिए मेरे बेटे को मरवाया है, क्योंकि मेरा बेटा उसे उस से मिलने से रोकता था.’’
जब रामरखी को पता चला कि शीलेश ने ही रुकुमपाल की हत्या की है तो उस का दुख और बढ़ गया. पुलिस ने घटनास्थल की काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. इस के बाद शीलेश और ममता को ले कर थाने आ गई.
थाने में शीलेश और ममता ने अपना जुर्म स्वीकार कर लिया. इस के बाद ममता ने ससुर की हत्या करवाने के पीछे की अपने अवैध संबंधों की जो कहानी सुनाई, उसे सुन कर शीलेश ने अपना सिर पीट लिया.
लेकिन अब क्या हो सकता था. पत्नी के कहने में आ कर उस ने अपने बच्चों को तो अनाथ किया ही, उस बाप के खून से हाथ रंग लिए, जिस ने उसे बाप का ही नहीं, मां का भी प्यार दिया था. उस ने दादी के बुढ़ापे का सहारा छीनने के साथ भरापूरा परिवार बरबाद कर दिया.
पूछताछ के बाद पुलिस ने शीलेश और ममता को अदालत में पेश किया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया गया. रुकुमपाल का भी कैसा दुर्भाग्य था कि जिस बेटे से उस ने उम्मीद लगा रखी थी कि मरने पर उस का अंतिम संस्कार करेगा. उसी ने उसे मौत के घाट उतार दिया. Family Crime Story
— इसके बाद अदालती कार्रवाई में क्या हुआ यह ज्ञात नहीं है.
— 2014 में प्रकाशित






