Bihar Train Murder Case. देव कुमार गुंजन, अजीत कुमार और अस्मिता बिहार के बिजली विभाग में अधिकारी थे. इस वजह से तीनों की आपस में अच्छी दोस्ती थी. देव कुमार और अजीत दोनों ही अस्मिता को चाहने लगे थे, लेकिन अस्मिता का झुकाव अजीत कुमार की तरफ था. इसी दौरान परिवार वालों की सहमति से देव कुमार गुंजन और अस्मिता की शादी हो गई. लेकिन अस्मिता के दिल में तो अजीत कुमार बसा हुआ था. फिर इन दोनों ने मिल कर देव कुमार को ठिकाने लगाने की ऐसी शातिर चाल चली कि…
अजीत के दोबारा जिंदगी में आते ही अस्मिता के भीतर प्यार का जो पौधा वृक्ष बनने के बाद भी सूख गया था, वह सूखा वृक्ष तो हरा हो गया, लेकिन उस हरेभरे दरख्त की छांव तले अब एक खौफनाक साजिश की बेल पनपने लगी थी. देव कुमार गुंजन की खामोश और सुरक्षित दुनिया अब अस्मिता कुमारी को एक कैदखाने जैसी लगने लगी थी.
ऐसा ही कुछ अजीत कुमार भी महसूस कर रहा था. अस्मिता कुमारी की शादी देव कुमार गुंजन से हो गई, लेकिन अजीत कुमार ने शादी नहीं की थी. पहले प्यार के इस मिलन के बाद अस्मिता और अजीत कुमार को अस्मिता का पति देव कुमार गुंजन अपनी राह का सब से बड़ा कांटा लगने लगा था.
इसलिए दोनों के दिमाग में बस एक ही खयाल चौबीसों घंटे घूमता रहता कि देव कुमार गुंजन को रास्ते से हटाना है. एक ऐसा कत्ल करवाना है, जो कत्ल न लगे, सिर्फ एक हादसा लगे.
अस्मिता कुमारी कोई पेशेवर अपराधी नहीं थी. वह पढ़ीलिखी थी, उस ने बिजली विभाग की नौकरी पाने के लिए सालों तक कड़ी मेहनत से पढ़ाई की थी. ऐसी ही पढ़ाई अजीत कुमार ने भी की थी. वह भी इसी पोस्ट पर बड़ी मेहनत और लगन की पढ़ाई करने के बाद पहुंचा था.
दोनों ने तय किया कि वह इस जुर्म को भी किसी प्रतियोगी परीक्षा की तरह अंजाम देंगे. वे दोनों बाकायदा एक ‘स्टूडेंट’ बन गए, जिस का एकमात्र सिलेबस था ‘अपराध करो और साफ बच निकलो.’
उन्होंने ‘डबल इनडेमनिटी’, ‘दृश्यम’, ‘द इनविजिबल गेस्ट’ और ‘परफेक्ट स्ट्रेंजर’ जैसी फिल्मों को देखा. वे केवल कहानी नहीं देख रहे थे, बल्कि यह नोट कर रहे थे कि कातिल कहां गलती करते हैं और पुलिस की नजर किस सुराग पर सब से पहले जाती है.
‘क्राइम पेट्रोल’, ‘सावधान इंडिया’ से ले कर ‘माइंडहंटर’ और ‘डेक्सटर’ जैसी सीरीज उस के लैपटाप की स्क्रीन पर रातरात भर चलती रहीं. अगाथा क्रिस्टी से ले कर मौडर्न सस्पेंस थ्रिलर्स के पन्नों को उस ने छान मारा. कहां जहर का इस्तेमाल हुआ, कहां एक्सीडेंट को कुदरती मौत दिखाया गया.
उन्होंने हर एक थ्योरी के बाकायदा नोट्स बनाए. उन का मकसद साफ था. देव को ऐसी मौत देनी है, जो कानून की नजर में महज एक ‘ट्रेजडी’ या ‘एक्सीडेंट’ बन कर रह जाए और वे दोनों कभी पकड़े न जा सकें.
इसी उधेड़बुन के दौरान अजीत कुमार की मुलाकात राजू कुमार उर्फ धीरज से हुई. धीरज आपराधिक दुनिया में कदम रखने वाला शातिर व्यक्ति था और अभी कुछ दिन पहले ही वह जेल से छूट कर आया था.
राजू कुमार को भी काम की जरूरत थी. इस बात को अजीत कुमार किसी तरह जान चुका था. क्योंकि दोनों एक ही शहर के रहने वाले थे. अजीत कुमार ने एक सरकारी कर्मचारी को मौत के घाट उतारने के लिए राजू कुमार से बात की. अजीत कुमार और अस्मिता कुमारी ने 4 लाख रुपए में हत्या की सुपारी राजू को दे दी.
तीनों ने मिल कर लंबे डिसकस के बाद हत्या की योजना तैयार कर दी. फलस्वरूप, राजू ने 11 जून, 2026 को जनसाधारण एक्सप्रैस में देव कुमार की गोली मार कर हत्या कर दी. इसे लूटपाट के दौरान हुई हत्या साबित करने की कोशिश की गई.
साल 2017 बिहार के सीतामढ़ी जिले में बिजली विभाग में नए तकनीशियन इंजीनियरों की नियुक्ति हुई. उसी बैच में 3 युवा अधिकारी आए. अस्मिता कुमारी, देव कुमार गुंजन और अजीत कुमार. तीनों के लिए यह नौकरी केवल रोजगार नहीं, बल्कि अपने सपनों को पूरा करने की पहली सीढ़ी थी.
धीरेधीरे परिचय दोस्ती में बदला. तीनों एकदूसरे की मदद करते, साथ चाय पीते, समस्याओं पर चर्चा करते और भविष्य के सपने साझा करते.
इसी दौरान अस्मिता और अजीत के बीच एक अलग ही अपनापन जन्म लेने लगा. पहले यह केवल मित्रता थी, लेकिन समय के साथ दोनों को एकदूसरे की प्रतीक्षा रहने लगी. सुबह औफिस पहुंचने पर सब से पहले एकदूसरे को ढूंढऩा, काम के बाद कुछ देर बातें करना और छोटीछोटी खुशियां साझा करना उन की दिनचर्या बन गई.
धीरेधीरे दोनों को एहसास हुआ कि यह केवल दोस्ती नहीं रही, बल्कि प्रेम का रूप ले चुकी है. प्यार का यह पौधा धीरेधीरे एक बड़े वृक्ष का रूप धारण कर चुका था. दोनों 2 जिस्म मगर एक जान हो चुके थे. एकदूसरे के साथ जीनेमरने की दोनों ने कसमें भी खाई थीं.
अस्मिता देव को एक अच्छे सहकर्मी के रूप में देखती थी, जबकि देव के मन में उस के प्रति कोई विशेष भावना उस समय नहीं थी.
समय अपनी रफ्तार से आगे बढ़ता रहा. तभी एक दिन अस्मिता के जीवन ने अचानक करवट ली. उस के परिवार ने उसे बताया कि उस के लिए एक योग्य युवक का रिश्ता आया है. वह युवक कोई और नहीं, बल्कि उसी विभाग में कार्यरत देव कुमार गुंजन था.
देव कुमार मूलरूप से झारखंड के गोड्ïडा का रहने वाला था. यह सुन कर अस्मिता सन्न रह गई. उस की आंखों के सामने देव का वह शांत, गंभीर और सादगी से भरा चेहरा घूम गया. देव हर लिहाज से एक सुलझा हुआ इंसान था, परिवार की नजरों में वह एक ‘परफेक्ट’ जीवनसाथी लगा.
लेकिन अस्मिता का दिल तो अजीत के उस लंबे कद, कसरती काया और उस की बेबाक मुसकान में अटका हुआ था. उस ने अपने पेरेंट्स को समझाने की कोशिश की कि वह अभी विवाह नहीं करना चाहती. उस ने अपनी झिझक और मन की उलझन भी व्यक्त की, लेकिन परिवार ने इसे जीवन की सामान्य घबराहट समझा और दोनों परिवारों की सहमति से रिश्ता तय हो गया. अजीत तक जब यह खबर
पहुंची तो वह भी भीतर से टूट गया. शाम को औफिस से निकलते समय उस ने देखा कि अस्मिता अकेली परिसर के एक शांत कोने में खड़ी थी. वह धीरेधीरे उस के पास पहुंचा, ”अस्मिता क्या 2 मिनट बात कर सकती हो?’’
अस्मिता ने उस की ओर देखा. उस के चेहरे पर सामान्य मुसकान थी, लेकिन अजीत की आंखों में बेचैनी साफ दिखाई दे रही थी. ”हां, बोलो अजीत, क्या बात है?’’
कुछ क्षण तक अजीत चुप रहा. जैसे शब्द उस का साथ छोड़ चुके हों. फिर उस ने धीमी आवाज में कहा, ”जो लोग कह रहे हैं, क्या वह सच है? तुम्हारा रिश्ता देव के साथ तय हो गया है?’’
”हां, यह सच है.’’
”अस्मिता, तुम ने यह क्या कर दिया? क्या एक बार भी मेरा खयाल नहीं आया? तुम ने सोचा है कि मेरा क्या होगा?’’
अस्मिता ने अपनी नजरें झुका लीं. उस के पास कोई जवाब नहीं था.
”अस्मिता, हम ने एक साथ सपने देखे थे. मेरी आंखों में आंखें डाल कर कहो कि क्या तुम देव को चाहती हो? क्या तुम उस शांत, गंभीर देव के साथ रह कर मुझे भुला पाओगी? अस्मिता, तुम्हारा पहला प्यार मैं हूं. तुम ने बिना मुझ से एक बार बात किए, बिना लड़े, इतनी आसानी से किसी और का हाथ थामने का फैसला कैसे ले लिया?’’
अस्मिता की आंखों से आंसू की एक बूंद टपक कर जमीन पर गिर पड़ी. उस ने अपनी अंगुलियों को आपस में भींचते हुए कहा, ”अजीत, कुछ फैसले हमारे हाथ में नहीं होते. अचानक परिस्थितियां बदल गईं.’’
”परिस्थितियां नहीं बदलीं अस्मिता, तुम ने हार मान ली.’’ अजीत की आवाज में बेबसी का दर्द साफ झलक रहा था, ”तुम जा रही हो देव के पास. जाओ, लेकिन याद रखना, तुम मुझे कभी भुला नहीं पाओगी और जब कभी तुम्हें जिंदगी में लगे कि देव से विवाह करना गलत निर्णय था तो फिर मुझे याद कर लेना. मैं तुम्हारा जिंदगी भर इंतजार करूंगा. मेरे दिल का दरवाजा हमेशा तुम्हारे लिए खुला रहेगा.’’
यह कह कर अजीत पीछे मुड़ा और अपनी राह पर चलता चला गया. उस ने पीछे मुड़ कर भी नहीं देखा कि अस्मिता किस हाल में है.
साल 2018 में पूरे रीतिरिवाजों और परिवारों की मौजूदगी में अस्मिता और देव कुमार का विवाह संपन्न हो गया. एक ओर शहनाइयां बज रही थीं, दूसरी ओर कुछ अधूरे सपने हमेशा के लिए खामोश हो रहे थे.
विवाह के बाद अस्मिता ने अपने नए जीवन की शुरुआत की. अजीत ने भी खुद को अपने काम में व्यस्त कर लिया. तीनों की जिंदगी अलगअलग दिशाओं में आगे बढ़ गई.
अस्मिता इस नौकरी से संतुष्ट नहीं थी. उस ने अगले कंपटीशन की पढ़ाई शुरू कर दी. आंगन में एक बेटी की किलकारी भी गूंजी. बेटी के जन्म ने घर के आंगन में खुशियों की किलकारी जरूर भर दी थी, लेकिन अस्मिता के भीतर की बेचैनी शांत नहीं हुई थी.
ग्रेड-वन टेक्नीशियन की नौकरी उस के सपनों का अंत नहीं थी. उस ने इस सीमित दायरे से बाहर निकलने के लिए आगे के बड़े कंपटीशन एग्जाम की तैयारी शुरू कर दी. दिन में ड्यूटी, शाम को मासूम बेटी की ममतामयी देखभाल और देर रात तक किताबों के बीच जगती. अस्मिता की जिंदगी इन्हीं 3 धुरियों पर घूमने लगी.
उस ने बेटी के पालनपोषण में कोई कमी नहीं छोड़ी. जब भी वह किताबों से आंखें हटाती, अपनी नन्ही सी बच्ची को सीने से लगा कर मातृत्व के सुकून में डूब जाती. लेकिन इस पूरे समीकरण में देव, जो उस का पति था, धीरेधीरे हाशिए पर धकेला जाने लगा.
अस्मिता और उस की नन्ही बेटी ही उस की पूरी दुनिया थे. जब अस्मिता देर रात तक पढ़ाई करती तो देव बिना कुछ कहे चुपचाप किचन में जा कर उस के लिए चाय बना लाता. वह चाहता था कि अस्मिता आगे बढ़े.
जब देव थकाहारा ड्यूटी से घर लौटता तो अस्मिता या तो किताबों में डूबी होती या बेटी को बहला रही होती. देव जब भी अस्मिता के करीब आने की कोशिश करता या उस के कंधे पर हाथ रखता, अस्मिता का ध्यान या तो अपने अगले टेस्ट के सिलेबस पर होता या वह थकावट का बहाना बना कर मुंह फेर लेती.
देव यह सब देखता था. वह जानता था कि उस की पत्नी के सपने बड़े हैं. कई बार वह बेटी को अपनी गोद में ले कर कहता, ”तुम पढ़ो, मैं इसे संभाल लेता हूं.’’
घर के छोटेबड़े कामों में भी वह यथासंभव हाथ बंटाने की कोशिश करता, ताकि अस्मिता को पढऩे का समय मिल सके.
फिर भी धीरेधीरे दोनों के बीच पहले जैसी सहज बातचीत कम होने लगी.
जाग उठीं भावनाएं
किसी को नहीं पता था कि समय का पहिया आगे चल कर इन तीनों के जीवन को फिर एक ऐसे मोड़ पर ला कर खड़ा करेगा, जहां अतीत की दब चुकी भावनाएं एक बार फिर दस्तक देंगी.
बाद में अजीत कुमार का तबादला नालंदा के करायपरसुराय हो गया, जबकि देव कुमार गुंजन की पोस्टिंग जमुई के मलयपुर में हुई. 2023 में अस्मिता का बिहार सरकार में मोटर वाहन निरीक्षक (एमवीआई) के पद पर सेलेक्शन हुआ. उस की पहली पोस्टिंग सुपौल जिले में हुई.
कंधे पर जिम्मेदारी के स्टार और आंखों में नए भविष्य की चमक लिए अस्मिता ने सुपौल की धरती पर कदम रखा. इस तरह तीनों अपनेअपने प्रशासनिक दायित्वों में उलझ गए, मानो जीवन की गाडिय़ां अलगअलग पटरियों पर दौड़ रही हों.
एक दिन, सुपौल की व्यस्त सड़क पर गाडिय़ों की चैकिंग और निरीक्षण के दौरान अचानक अस्मिता की नजर एक परिचित चेहरे पर ठिठक गई. सामने अजीत कुमार खड़ा था. बरसों पुराना अतीत, जो बीतती रातों के साथ धुंधला हो चुका था, अचानक सामने जीवंत हो उठा.
वह रिश्ता जो किसी जमाने में पतझड़ का शिकार हो कर एक सूखे पेड़ की तरह बेजान हो गया था, इस अचानक हुई मुलाकात से खिल उठा. मानो सूखी शाखाओं पर अचानक चमक आ गई हो. मुलाकातों का सिलसिला शुरू हुआ. सुपौल की शांत शामों में पुरानी यादों और बातों के नए पन्ने खुलने लगे.
बात यहां तक पहुंच गई कि जब भी देव कुमार गुंजन जमुई के मलयपुर से अपनी पत्नी अस्मिता के पास सुपौल आता, अस्मिता पहले ही अजीत को खबर कर देती. और जब वह अपनी ड्यूटी के लिए रवाना होता, अजीत की रातें और छुट्टियों के दिन अस्मिता के साथ ही बीतते.
अस्मिता की बेटी को भी एक पितातुल्य अपनी मां का प्रेमी मिल गया, जो उसे पिता की तरह या कहिए उस से भी ज्यादा प्यार करता था. वह न सिर्फ प्रेमी का फर्ज निभाता, बल्कि घरेलू जिम्मेदारियों में भी एक पति की तरह अस्मिता के साथ खड़ा दिखता.
अजीत फिर आया करीब
एक दिन की बात है जमुई के मलयपुर में अपनी सख्त ड्यूटी से कुछ दिनों की राहत पा कर देव कुमार गुंजन अपने परिवार के साथ छुट्टियां बिताने आया था. सरकारी नौकरी के तनाव और भागदौड़ के बीच, यह वक्त अपनी नन्ही बेटी के साथ हंसनेखेलने का था. दोपहर की गुनगुनी धूप में बेटी का हाथ थामे जब वह बाजार की ओर निकला तो उस के चेहरे पर एक सुकून भरी मुसकान थी.
”पापा! मुझे वो वाली ड्राइंग बुक और कलर्स चाहिए,’’ मासूमियत से अपनी छोटीछोटी अंगुलियों से इशारा करते हुए बेटी चहक उठी.
”बिलकुल मेरी राजकुमारी, जो तुम कहो,’’ देव कुमार ने मुसकराते हुए बेटी को दुलारा और सड़क किनारे बनी एक स्टेशनरी की दुकान की तरफ कदम बढ़ा दिए.
वह दुकान के काउंटर पर पहुंचे ही थे और देव कुमार ने दुकानदार से सामान मांगना शुरू ही किया था कि अचानक उन की बेटी ने बड़े भोलेपन से देव कुमार की अंगुली खींची.
बेटी ने मासूमियत से सामने वाली दुकान की तरफ इशारा करते हुए कहा, ”पापा, अंकल तो सारा सामान सामने वाली दुकान से लेते हैं.’’
देव कुमार थोड़ा चौंका. उस ने हलके से मुसकराते हुए पूछा, ”कौन अंकल, बेटा?’’
बेटी ने बिना किसी झिझक के अपनी साफ आवाज में जवाब दिया, ”अरे वही, अजीत अंकल!’’
बस. इतना सुनना था कि मानो ठहरती हुई दोपहर में अचानक बिजली कड़क कर सीधे देव कुमार के सिर पर आ गिरी हो. दुकान का शोर, गाडिय़ों की पोंपों और बाजार की चहलपहल, सब कुछ पलभर में बिलकुल खामोश हो गया. देव कुमार के शरीर से जैसे पलभर में पूरी जान ही निकल गई हो.
सामने वही अजीत कुमार था, जिस का जिक्र अकसर काम के सिलसिले या सरकारी तबादलों की बातों में आता था. वही अजीत जो कभी अस्मिता का पहला प्यार था. जिस को भुलाने और वास्ता खत्म करने की कसम अस्मिता खा चुकी थी. वह उस की गैरमौजूदगी में घर में अब यह गुल खिला रहा था.
देव कुमार ने कांपते हाथों से बेटी का हाथ और कस कर थाम लिया. उस की आंखों के सामने सुपौल के घर का वो हर लम्हा तैरने लगा. अस्मिता का अचानक फोन पर बात करना बंद कर देना, उस के पहुंचने पर घर का बिलकुल सामान्य दिखना, जिस रिश्ते को वह अपनी दुनिया समझ कर सींच रहा था, वह तो किसी और के ही साए में पनप रहा था.
11 जून, 2026 की रात लगभग साढ़े 8 बजे के आसपास का वक्त था. अमृतसर से चल कर नरपतगंज जाने वाली जनसाधारण एक्सप्रैस बिहार के मानसी रेलवे स्टेशन से गुजर रही थी. खगडिय़ा जिले के अंतर्गत आने वाले बदला घाट स्टेशन के पहले ही इस गाड़ी को चेन पुलिंग कर रोका गया.
आरपीएफ वाले एकदम से अलर्ट हो गए. कुछ ही समय में पता चल गया कि आखिरकार किस बोगी में चेन पुलिंग की गई है.
आरपीएफ के जवान दौड़ते हुए पहुंचे तो बोगी में अंधेरा था. लाइटें बंद थीं. जैसे ही लाइट जलाई तो देखा कि एक व्यक्ति कराह रहा है. वो खून से लथपथ था. पूछने पर लोगों ने बताया कि किसी ने इस के ऊपर गोली चला दी है. हमलावरों ने ही चेन पुलिंग की और भाग गए. इसी बीच एक पुलिस वाले ने नजदीकी पुलिस स्टेशन को वायरलेस से यह सूचना दे दी. फिर नजदीकी पुलिस स्टेशन की टीम भी मौके पर आ गई. इस के बाद एंबुलैंस को बुलवाया गया.
गंभीर रूप से घायल यात्री को खगडिय़ा के सदर हौस्पिटल पहुंचाया गया. प्राथमिक उपचार के बाद घायल व्यक्ति को बेगूसराय हौस्पिटल रेफर कर दिया गया. बेगूसराय हौस्पिटल में थोड़ाबहुत इलाज कर के उसे हायर मैडिकल सेंटर रेफर कर दिया गया.
अब उसे बिहार की राजधानी पटना के मेदांता हौस्पिटल में भरती कराया गया गया. 11 जून, 2026 के रात लगभग साढ़े 8 बजे उस व्यक्ति को गोली मारी गई थी और 12 जून, 2026 को इलाज के दौरान उस व्यक्ति की मौत हो गई.
चलती ट्रेन में की हत्या
मृतक के जेब से मिले पर्स में पुलिस को उस की आईडी मिल गई थी. उस की पहचान इंजीनियर देव कुमार गुंजन के रूप में हुई थी. उस की पत्नी मोटर व्हीकल इंसपेक्टर अस्मिता को पुलिस ने घटना की सूचना दी. पति की हत्या की सूचना मिलते ही अस्मिता का रोरो कर बुरा हाल हो गया.
पोस्टमार्टम के बाद परिजनों द्वारा मृतक का अंतिम संस्कार कर दिया गया. उस के बाद पुलिस ने मामले की जांचपड़ताल शुरू की. जांच में पता चला कि देव कुमार गुंजन की अस्मिता से एक बच्ची है, जिस की उम्र लगभग 5 साल है.
पति की हत्या के बारे में पत्नी से पूछा तो उस ने किसी पर कोई शक नहीं जताया. उस ने यही कहा कि शायद लूटपाट जैसी कोई घटना हुई होगी. अस्मिता की तहरीर पर पुलिस ने उस के पति की लूटपाट के दौरान हत्या किए जाने की रिपोर्ट दर्ज कर ली.
इस केस की जांच समस्तीपुर रेल मंडल की पुलिस को दी गई. क्योंकि मामला रेल विभाग से जुड़ा हुआ था, बड़ा सीरियस मैटर हो गया था, इसलिए एसआईटी का गठन कर दिया गया. पूरे मामले की कमान एसपी (रेलवे) हरिशंकर कुमार ने संभाल ली.
पुलिस ने उस बोगी में बैठे हुए बाकी यात्रियों से बातचीत की. उन में से किसी के साथ में कोई लूट की घटना नहीं हुई थी. मृतक के पास पर्स भी था. इस का मोबाइल भी था और पर्स में जितने पैसे थे, वे सुरक्षित मिले. पुलिस के सामने अब यह सवाल आया कि जब सब कुछ था तो आखिरकार इस की हत्या क्यों की गई?
पुलिस ने अस्मिता और उस के पति के मोबाइल की कौल डिटेल्स निकलवाई. समस्तीपुर रेल पुलिस और बिहार एसटीएफ की टीम स्पैशल इनवैस्टिगेशन रूम में बैठी थी. तकनीकी सर्विलांस टीम ने देव की पत्नी अस्मिता के मोबाइल डेटा और कौल हिस्ट्री को खंगालना शुरू किया तो फोरैंसिक एक्सपर्ट की नजर एक बेहद अजीब और रहस्यमयी पैटर्न पर जा कर टिक गई.
जांच अधिकारी ने स्क्रीन पर जूम करते हुए पूरी टीम का ध्यान एक विशिष्ट नंबर की ओर खींचा, ”सर, यह नंबर देखिए.’’
पिछले एक साल के अंदर इस नंबर से अस्मिता के फोन पर 186 बार बातचीत हुई है. लेकिन अजीब बात यह है कि यह बातचीत सामान्य मोबाइल कौल से ज्यादा वाट्सऐप कौल पर हुई है.’’
”11 जून को, यानी जिस दिन देव कुमार की जनसाधारण एक्सप्रैस में हत्या हुई, उस दिन भी इस नंबर से सुबह ठीक 3 बजे एक वाट्सऐप कौल आई थी. फिर दोपहर में 2 बार और शाम के वक्त भी बात हुई.’’
पुलिस अधिकारियों के माथे पर बल पड़ गए. ट्रेन जब मानसी रेलखंड के सुदूर इलाकों से गुजरती है तो मोबाइल नेटवर्क की भारी समस्या होती है. इंटरनेट (डेटा) के सिग्नल बारबार कटते हैं. आमतौर पर सफर करने वाला इंसान इमरजेंसी में नौरमल कौल करता है ताकि कौल कट न जाए. फिर आखिर यह कौन है जो लगातार वाट्सऐप कौल पर ही जोर दे रहा था?
इस का मतलब है कि यह शख्स अपनी पहचान छिपाने के लिए कर रहा था.
पुलिस ने अस्मिता के पति देव कुमार गुंजन के मोबाइल फोन में सर्च किया कि यह रहस्यमयी नंबर किस नाम से सेव है. जैसे ही स्क्रीन पर कौंटेक्ट डिटेल फ्लैश हुई, कमरे में सन्नाटा छा गया. उस नंबर के आगे लिखा था ‘कमीना’.
अधिकारियों के चेहरे पर हैरानी और उलझन के भाव तैर गए. जांच टीम ने बिना वक्त गंवाए उस नंबर का यूजर ढूंढने के लिए ट्रैक किया.
ऐसे खुली मर्डर मिस्ट्री
जब सिम कार्ड का रजिस्ट्रैशन और आधार डिटेल्स निकाली गईं तो नाम सामने आया अजीत कुमार. वही अजीत कुमार जो 2017 में बिजली विभाग में अस्मिता और देव का सहकर्मी था! पुलिस की थ्योरी अब शीशे की तरह साफ हो चुकी थी.
देव कुमार गुंजन ने जानबूझ कर अजीत के नंबर को ‘कमीना’ नाम से सेव कर रखा था, इस से स्पष्ट होता है कि देव कुमार गुंजन को अजीत कुमार और अस्मिता के बीच अवैध संबंध की जानकारी हो चुकी थी.
कौल डिटेल्स रिकौर्ड से पता चला है कि अजीत कुमार और अस्मिता की लोकेशन बहुत बार साथसाथ होती थी यानी कि एक ही जगह होती थी. ये घंटोंघंटों एक साथ रहते हैं. जब अस्मिता से पता करने की कोशिश की तो उस ने नौरमल सा जवाब दिया.
अजीत कुमार ने भी सहजता के साथ पुलिस को बताया कि इस हत्या के मामले की उसे कोई जानकारी नहीं है. ये दोनों जो भी बातें बता रहे थे, पुलिस उसी बात पर यकीन करने के लिए मजबूर हो रही थी. दोनों बिहार सरकार में अधिकारी पद पर कार्यरत थे. बिना ठोस सबूत के उन पर हाथ डाला नहीं जा सकता था.
पुलिस ने जांच का रुख बदला और तफ्तीश शुरू की. आखिरकार चेन पुलिंग किस ने की थी? उस इलाके में बदलाघाट क्षेत्र के बीटीएस टावरों से जो नंबरों का आनाजाना था, उन सभी नंबरों को लाइन पर लिया गया.
लाखों की तादाद में नंबर थे, क्योंकि इस ट्रैक से बहुत सारी ट्रेनें गुजरती हैं और साथ ही जो आसपास के इलाके के लोग 10-12 किलोमीटर की रेंज में बहुत बड़ी संख्या में मोबाइल का प्रयोग करते हैं, पुलिस ने हजारों नंबरों में से 101 नंबर संदिग्ध पाए.
इन 101 में से 11 जून की वारदात वाले दिन मानसी-बदलाघाट रेलखंड के आसपास एक और संदिग्ध मोबाइल लोकेशन मिली. जब उस नंबर की कुंडली खंगाली गई, तो नाम सामने आया राजू कुमार उर्फ धीरज.
पुलिस को पता चला कि राजू कोई आम इंसान नहीं, बल्कि जहानाबाद इलाके का एक कुख्यात अपराधी है, जिस पर पहले से कुछ आपराधिक मामले दर्ज थे. जांच अधिकारी की टेबल पर जब दोनों की फाइलों की जांच हुई तो पुलिस का दिमाग ठनक गया.
पुलिस ने राजू कुमार उर्फ धीरज को हिरासत में ले लिया.
शुरुआत में राजू ने पुलिस को गुमराह करने की कोशिश की, लेकिन जब पुलिस ने उस के सामने 11 जून की उस की मोबाइल लोकेशन, टावर डंप डेटा और अजीत से हुई उस की गुफ्तगू के सबूत रखे तो उस का सारा दबदबा हवा हो गया. तकनीकी सवालों के आगे राजू टूट गया और उस ने खाकी के सामने पूरा सच उगल दिया.
”साहब, मैं ने खुद से यह कत्ल नहीं किया.’’ राजू ने कांपती आवाज में कुबूला, ”मुझे इस काम के लिए सुपारी दी गई थी. जहानाबाद के ही अजीत कुमार ने मुझे इस काम के लिए तैयार किया था. उस ने मुझे मोटी रकम देने का वादा किया था और देव कुमार के सफर की एकएक डिटेल दी थी.’’
राजू ने आगे बताया कि वारदात की पूरी पटकथा कैसे लिखी गई थी. उसे बताया गया था कि देव कुमार किस ट्रेन के किस डिब्बे में रहेगा, उस ने क्या पहन रखा होगा और किस सुनसान स्टेशन के पास वारदात को अंजाम दे कर गायब होना है. सब से बड़ा खुलासा तब हुआ, जब राजू ने इस पूरी साजिश की मुख्य सूत्रधार का नाम लिया अस्मिता.
राजू के इस सनसनीखेज कुबूलनामे के बाद पुलिस के पास अब कोई शक की गुंजाइश नहीं बची थी. कानून के हाथ अब उस ऊंचे पद पर बैठी अफसर तक पहुंचने वाले थे, जिस ने खुद को बेदाग साबित करने के लिए हर एक कदम सोचसमझ कर उठाया था. कटिहार रेल पुलिस और एसटीएफ की टीम ने बिना कोई मौका दिए एक साथ छापेमारी की.
सारी रिसर्च हुई फेल
अस्मिता जो अपने पद, रुतबे और मासूमियत के पीछे इस खौफनाक साजिश को छिपाए बैठी थी, उसे हिरासत में लिया गया. अजीत कुमार (कमीना) जो जहानाबाद से बैठ कर अपनी पुरानी मोहब्बत को हासिल करने के लिए कत्ल की बिसात बिछा रहा था, उसे दबोच लिया गया.
राजू कुमार उर्फ धीरज जो पैसों के लालच में इस खूनी खेल का प्यादा बना था, वह पहले से ही पुलिस की गिरफ्त में था. पुलिस ने तीनों से सख्ती से पूछताछ करनी शुरू कर दी. तीनों ने अपना जुर्म कुबूल कर लिया. पुलिस ने घटनाक्रम का खुलासा किया तो लोगों को यकीन नहीं हो रहा था.
जांच एजेंसियों का दावा है कि हत्या के लिए कथित तौर पर 4 लाख रुपए की सुपारी तय की गई थी, जिस में से कुछ रकम पहले ही दे दी गई थी.
एसपी (रेलवे) हरिशंकर कुमार ने 15 जुलाई, 2026 को प्रैस कौन्फ्रैंस में बताया कि यह कोई अचानक हुई वारदात नहीं, बल्कि एक बेहद सोचीसमझी और खौफनाक साजिश थी.
अस्मिता कुमारी सुपौल में एमवीआई थी, जबकि उस का प्रेमी अजीत कुमार नालंदा में बिजली विभाग में ग्रेड-वन टेक्नीशियन के पद पर कार्यरत था. दोनों के अवैध संबंधों के बीच अस्मिता का पति देव कुमार गुंजन सब से बड़ी बाधा बन रहा था. रास्ते के इस कांटे को हटाने के लिए महिला अफसर और उस के प्रेमी ने मिल कर 4 लाख रुपए की भारीभरकम सुपारी दी.
इस तरह 34 दिन की कड़ी मेहनत के बाद पुलिस ने चलती ट्रेन में किए गए मर्डर के कातिलों को पकड़ कर जेल भेज दिया.
अस्मिता ने अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी थी. उस ने अजीत के साथ मिल कर ट्रेन के सफर की जो पटकथा लिखी थी, उसे लगा था कि वह दुनिया की सब से परफेक्ट थ्रिलर फिल्म की डायरेक्टर बन चुकी है, लेकिन वह एक बुनियादी और शाश्वत कड़वी सच्चाई को भूल गई थी कि अपराधी एक न एक दिन कानून के शिकंजे में फंसता जरूर है.
जिस रात चलती ट्रेन में अजीत ने देव पर गोली चलवाई, अस्मिता को लगा कि उस की थ्योरी पास हो गई, लेकिन जैसे ही पुलिस ने जांच का पन्ना पलटा, अस्मिता की सारी ‘पढ़ाई’ धरी की धरी रह गई. कथा लिखे जाने तक तीनों आरोपी जेल की सलाखों के पीछे थे. Bihar Train Murder Case






