Bihar Tender Scam. कबाड़ के ठेकेदार रिशु रंजन सिन्हा उर्फ रिशुश्री ने अपनी वाकपटुता के जरिए बिहार के अनेक विभागों में गहरी पैठ बना ली थी. वहां के अधिकारियों से उस के संबंध इतने गहरे हो गए थे कि उस के खास ठेकेदारों को ही करोड़ों रुपए के काम के टेंडर दिए जाने लगे. एक महिला वकील की शिकायत पर जब जांच शुरू हुई तो करोड़ों रुपए का टेंडर घोटाला सामने आया और इस घोटाले में कई आईएएस अधिकारियों के नाम भी सामने आए. एक कबाड़ी से अरबपति बने रिशुश्री के इशारे पर कैसे चल रहा था यह खेल?

9 साल पहले साल 2017 में बिहार में उस वक्त जदयू, राजद और कांग्रेस महागठबंधन की सरकार थी. इसलिए राजद विधायक गुलाब यादव और आईएएस संजीव हंस में स्वाभाविक रूप से गहरी पहचान थी. एडवोकेट सुश्री नलिनी कुमारी और शिवनंदन भारती वर्ष 2009 से फरवरी 2016 के बीच पटना हाईकोर्ट के सीनियर एडवोकेट गजेंद्र प्रसाद यादव के जूनियर के रूप में प्रैक्टिस करते थे.

नलिनी महत्त्वाकांक्षी थी, वह कुछ अलग पहचान के लिए प्रयत्नशील रहती. इसी क्रम में साथी एडवोकेट शिवंदन भारती ने नलिनी की भेंट विधायक गुलाब यादव से कराई. नलिनी मनमोहक, स्मार्ट, तेजतर्रार व बातूनी थी. गुलाब यादव नलिनी के रूपलावण्य पर फिदा हो गया. इसलिए फंसाने की चाल चली.

विधायक गुलाब यादव ने कहा, ”वकील साहिबा, मेरे पास आ गई हैं तो समझो सफलता की पहली सीढ़ी पर कदम रख दिया. मेरी सरकार है, मैं तुम को महिला आयोग की सदस्य बनाने का वचन देता हूं. अपना बायोडाटा ले कर कल आ जाओ.’’

इस आश्वासन के बाद नलिनी काफी खुश थी.

दूसरे दिन वह विधायकजी के फ्लैट संख्या 401, बिंदेश्वरी अपार्टमेंट, रूकनपुरा, पटना आई. वहां गुलाब यादव कुछ और ही योजना बना कर बैठा उस का इंतजार कर रहा था. नलिनी के आने के बाद उस ने उस के साथ जबरन शारीरिक संबंध बनाया.

जब नलिनी रोनेबिलखने और शोर मचाने लगी और उस ने पुलिस थाने में केस करने की धमकी दी, तब गुलाब यादव ने अपने नौकर से सिंदूर मंगाया और उस की मांग में लगा कर कहा, ”मैं ने शादी कर ली तुम से. मैं अपनी पहली पत्नी से तलाक लेने के बाद तुम से कोर्टमैरिज करूंगा.’’

मांग में सिंदूर लगने के बाद वह चुप हो गई.

कुछ दिन बाद गुलाब यादव ने तलाक के कागजात दिखाने के लिए नलिनी को पुणे बुलाया था. 8 जुलाई, 2017 को जब वह होटल बेस्टिल पहुंची, तब गुलाब यादव ने उसे संजीव हंस से मिलवाया और दोनों ने उस के खाने में नशीला पदार्थ मिला कर उस के साथ यौन संबंध बनाया.

जब नलिनी को होश आया तो गुलाब यादव ने उसे बलात्कार का वीडियो दिखाया और उसे उस के मोबाइल पर भेज कर वीडियो को वायरल करने की धमकी दी. नलिनी भी उसे सबक सिखाना चाहती थी. वह बिना किसी विवाद के 239/96, माया रोड, राजापुर, प्रयागराज में रहने लगी.

जब उस के मासिक धर्म नहीं आए तो उस ने गुलाब यादव को इस बारे में बताया, लेकिन गुलाब यादव ने उसे गर्भपात की दवा लेने के लिए कहा.

रेप फिर कराया अबार्शन

नलिनी ने दवा का सेवन किया, लेकिन उस का स्वास्थ्य बिगडऩे के कारण उसे अस्पताल में भरती होना पड़ा. 25 अगस्त, 2017 को सामान्य ओपीडी में फिर 30 अगस्त, 2017 को स्वरूपरानी नेहरू चिकित्सालय, प्रयागराज में नलिनी का इलाज चला.

इस के बाद गुलाब यादव ने नलिनी को दिल्ली के मुखर्जी नगर स्थित एक छात्रावास में रहने की व्यवस्था की. गुलाब यादव अब बेहिचक विभिन्न होटलों में बुला कर उस के साथ मौजमस्ती करता था. आईएएस संजीव हंस भी गुलाब यादव के साथ होता था.

इस दौरान वह फिर से गर्भवती हो गई, लेकिन इस बार उस ने गर्भपात नहीं कराया और 25 दिसंबर, 2018 को उस ने शाली बाग (दिल्ली) के कुमार मैडिकल ऐंड मैटरनिटी सेंटर में एक बेटे को जन्म दिया. मैटरनिटी सेंटर द्वारा दिए गए डिस्चार्ज पेपर पर नलिनी देवी के पति के रूप में गुलाब यादव का नाम दर्ज था.

बेटे के जन्म होने की सूचना नलिनी देवी ने जब गुलाब यादव को दी तो वह चौंकते हुए बोला, ”मेरा तो नसबंदी का औपरेशन किया हुआ है, मुझ से बच्चा कैसे पैदा होगा.’’

इस के बाद यादव को यह शक होने लगा कि यह बच्चा उस का नहीं बल्कि आईएएस संजीव हंस का होगा. यह बात जानने के बाद अब वह बेटे को पिता का नाम देने के लिए संजीव के पास पहुंच गई. नलिनी ने संजीव हंस का डीएनए टेस्ट कराने की धमकी के साथ प्रयागराज कोर्ट में अपने और बेटे के भरणपोषण का भी मामला दाखिल कर दिया.

इतना ही नहीं, एडवोकेट नलिनी कुमारी ने थाना शास्त्रीनगर में रिपोर्ट दर्ज कराने के लिए तहरीर दी, परंतु आईएएस संजीव हंस और विधायक गुलाब यादव का नाम सुनते ही पुलिस के हाथपांव फूल गए. इन रसूखदार लोगों के खिलाफ मामला दर्ज नहीं हुआ.

तब नलिनी ने दानापुर के अतिरिक्त न्यायिक दंडाधिकारी के समक्ष परिवाद संख्या 1122/2021 दर्ज कराई. काफी बिलंब के बाद 6 जनवरी, 2023 को रुपसपुर थाना (दानापुर) कांड संख्या 18/2023 भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 323, 341, 376, 376डी, 420, 313, 120-बी, 504, 506/34 और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 67 के तहत अपराधों के लिए पंजीकृत किया गया.

इस में संजीव हंस सचिव, ऊर्जा विभाग, बिहार सरकार, विधायक गुलाब यादव और ललित यादव को आरोपी बनाया गया. इस में बलात्कार, अनैतिक कार्य और सरकारी राजस्व की हेराफेरी प्रमुख आरोप थे.

ईडी ने शुरू की जांच

महिला वकील ने अपनी शिकायत में दोनों पर भ्रष्टाचार और अवैध रूप से अकूत संपत्ति जुटाने का आरोप भी लगाया था. ईडी ने नलिनी कुमारी के रेप के मुकदमे में लगे इन धाराओं 420 एवं 120बी की बुनियाद पर दोनों को टारगेट पर लिया और पीएमएलए (प्रिवेंशन आप मनी लौंड्रिंग ऐक्ट) के तहत रिपोर्ट दर्ज कर शुरुआती जांच के बाद सबूत जुटाने के लिए रेड मारी.

बिहार सरकार के ऊर्जा विभाग के प्रधान सचिव आईएएस संजीव हंस और झंझारपुर के पूर्व विधायक गुलाब यादव के ठिकानों पर प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) का छापा पड़ा. पटना, झंझारपुर, दिल्ली और पुणे में दोनों के ठिकानों पर एक साथ ईडी की रेड में गुलाब यादव और संजीव हंस के बिजनैस पार्टनर होने का पता चला है.

सूत्रों के अनुसार गुलाब यादव के ठेकेदारी और व्यापार में हंस की पत्नी के जरिए पार्टनरशिप है. गुलाब यादव, उस की विधान परिषद पत्नी अंबिका यादव, आईएएस अफसर संजीव हंस और उन की पत्नी के बीच लेनदेन की बात भी सामने आ गई. ईडी को पुणे में संजीव हंस की पत्नी और गुलाब यादव की पार्टनरशिप में एक सीएनजी पंप की भी जानकारी मिली.

जैसेजैसे ईडी की जांच का दायरा बढ़ता गया, बिहार में चल रहे टेंडर घोटाला परतदरपरत खुलता गया. आम जनता ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि सरकार चलाने के लिए मुख्यमंत्री की नाक के बाल आईएएस, अभियंता और एजेंसियों ने किस तरह सरकारी धन की लूट की.

जांच क्रम में सब से बड़ा किरदार बन कर उभरा रिशुश्री नाम का कबाड़ी.

16 जुलाई, 2024 को पहली बार पीएमएलए की धारा 17 के तहत ईडी द्वारा रिशुश्री की कंपनी मेसर्स रिलायबल इंफ्रा सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड के दफ्तर में छापेमारी कर कागजातों और परिसंपत्तियों की जब्ती की गई. साथ ही रिशुश्री के बयान दर्ज किए गए.

इन बयानों से रिशुश्री की संलिप्तता से आर्थिक अपराध गठित हो गया. उस के द्वारा सरकारी टेंडर में हेराफेरी, कमीशन की उगाही और नगर विकास, भवन निर्माण विभाग, निगम निगम, जल संसाधन विभाग, स्वास्थ्य विभाग के आला अधिकारियों के बीच मनी लौंड्रिंग द्वारा और विभिन्न इलेक्ट्रौनिक माध्यमों से हिस्सेदारी पहुंचाई गई.

इतने बड़े पैमाने पर हो रहे टेंडर मैनेज, वसूली जा रही 5 से 8 फीसदी की लाइजनिंग कमीशन राशि से लगभग 265 करोड़ रुपए का सोना, हीरा, जमीन, मकान की डीड, लग्जरी गाडिय़ां, देशविदेश में खड़ी की गई संपतियों का परदाफाश होने लगा.

इस परिस्थिति को देखते हुए 20 अगस्त, 2024 को ईडी ने पीएमएलए की धारा 66(2) के तहत बिहार के स्पैशल विजिलेंस यूनिट को पत्र लिख कर हो रही सरकारी हेराफेरी की सूचना दी.

14 फरवरी, 2025 को अपनी जांच के आधार पर ईडी ने दूसरा पत्र एडिशनल डायरेक्टर जनरल औफ पुलिस, आर्थिक अपराध इकाई, बिहार सरकार को भेजा, जिस में कहा गया कि आईएएस संजीव हंस द्वारा 90 लाख रुपए नलिनी कुमारी को भेजे गए. यह पुष्ट होता है कि मेसर्स रिलायबल इंफ्रा सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड द्वारा 20 लाख रुपए सुनील कुमार सिन्हा के माध्यम से नलिनी कुमारी को स्थानांतरित किए गए थे. यह लेनदेन 2018 में हुआ था.

2018 में संजीव हंस जल संसाधन विभाग, बिहार के सचिव थे और कौन्ट्रैक्टर रिशुश्री ने जल संसाधन विभाग, बिहार में मेसर्स रिलायबल इंफ्रा सर्विसेज कंपनी नाम से सब कौंट्रैक्ट प्राप्त किया था. रिलायबल इंफ्रा सर्विसेज द्वारा सुनील कुमार सिन्हा को दी गई रकम संजीव हंस को ही दी गई घूस थी. सुनील कुमार सिन्हा आईएएस संजीव हंस के घरेलू और घनिष्ठ मित्र थे और संजीव हंस के विश्वासपात्र भी.

अब 2 जांच एजेंसियों द्वारा गहन छापेमारी, जब्ती में नकद राशि, जेवरातों, मकानों , वाहनों और डीड्स की जो जानकारी मिली, वह एक कबाड़ी और उच्चपदस्थ अधिकारियों के बीच बने नेक्सस का काला अध्याय है.

कबाड़ी से अरबपति

कबाड़ी रिशुश्री के पटना के मीठापुर स्थित कामता रामसखी इनक्लेव में विशेष निगरानी यूनिट (स्ङ्क) टीम ने जब 27-28 मई 2026 को रेड डाली, तब लगभग 2 करोड़ रुपए के आभूषण जिस में सोने, चांदी, हीरे के चेन, मंगलसूत्र, कंगन, गले का हार सेट, अंगूठी, कान की बाली, चांदी के सिक्के, पायल, चांदी की कटोरी सहित अन्य जेवरात थे. ढाई लाख रुपए नकद बरामद हुए.

जबकि ईडी ने 13 जून, 2025 को सामान्य प्रशासन विभाग के अंदर सेक्रेटरी विनोद कुमार सिंह के गोला रोड स्थित आवास पर दिन भर छापेमारी की. विनोद कुमार सिंह अधिकारियों के ट्रांसफर पोस्टिंग करवाने वाले सिंडिकेट का पदाधिकारी था. अधिकारियो या कर्मचारियों की जिले में रिशुश्री के मनमाफिक पोस्टिंग कराता था.

बिचौलिया रिशुश्री को अच्छी पोस्टिंग चाहने वाले अधिकारी कर्मचारी ऐसा जादूगर मानते थे, जो बड़ेबड़े अधिकारियों की पोस्टिंग चुटकी में करा देता था. 26 नवंबर, 2025 में रिशुश्री के 9 ठिकानों पटना, मुजफ्फरपुर, पानीपत, अहमदाबाद, सूरत, गुरुग्राम, नई दिल्ली पर छापेमारी कर तलाशी ली, जिस में रिशुश्री से जुड़े सहयोगियों, ट्रेवल एजेंट एवं रिश्तेदारों के ठिकाने शामिल हैं.

इन तलाशियों में नकद राशि और डिजिटल साक्ष्य जब्त किए गए. ईडी ने रिशुश्री के परिवार के सदस्यों और संस्थाओं से करीब 68.09 करोड़ की संपत्ति कुर्क की.

मीठापुर स्थित रिशुश्री के आवास से टीम ने 51 लाख रुपए नकद, 2 करोड़ के गहने और 61 जमीन खरीदबिक्री के डीड जब्त किए गए.

ईडी और एसवीयू कुल 4 करोड़ के जेवर, 53.5 लाख रुपए नकद और 61 सेल डीड एवं 47 जमीनों के मूल कागजात जब्त कर चुकी थी.

इस तरह फैलाया जाल

सब से पहले उस टेंडर का जिक्र करना जरूरी है, जिस से जुड़े हेराफेरी, कमीशनखोरी के तार सीधे आईएएस संजीव हंस से जुड़े थे और उस की राशि स्थानांतरित हो कर यौन पीडि़त महिला अधिवक्ता नलिनी कुमारी के पास आई और उस के द्वारा दायर एफआईआर संख्या 18/2023 के अभियुक्त संजीव हंस, पूर्व विधायक गुलाब यादव, ललित यादव  ईडी और एसवीयू के  पीएमएलए के अभियुक्त बन गए.

चूंकि रिशुश्री की मातृस्वा इंफ्रा सर्विसेज से संजीव हंस ने 20 लाख रुपए नलिनी कुमारी को देने के लिए ली थी, फलस्वरूप उस की भरपाई के लिए जल संसाधन विभाग के अंतर्गत 2018 में कोसी प्रमंडल (सहरसा) के सुपौल जिले के बीरपुर में फिजिकल मौडलिंग सेंटर बनाने के लिए टेंडर जारी हुआ था.

उस वक्त संजीव हंस जल संसाधन विभाग में सचिव था. करीब 125 करोड़ रुपए खर्च कर सेंटर तैयार होना था. यह कोसी और बिहार की दूसरी नदियों के प्रवाह के अध्ययन का केंद्र बनने वाला था.

रिपोट्र्स के अनुसार टेंडर में रिशु ने ऐसी शर्तें रखवाईं, जिस से उस के क्लाइंट अहमदाबाद की ‘शेवरोक्स कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड’ को ठेका मिल गया. रिशु ने ‘मातृस्वा कंस्ट्रक्शन’ नाम की कंपनी को इस प्रोजेक्ट का सबकौन्ट्रैक्ट दिलाया. मातृस्वा कंस्ट्रक्शन कंपनी रिशु के स्टाफ संतोष कुमार के नाम पर थी.

संतोष रिशु की कंपनी रिलायबल इंफ्रा सर्विस प्राइवेट लिमिटेड में काम करता था. मातृस्वा कंस्ट्रक्शन को मिले सबकौन्ट्रैक्ट के जरिए रिशु को फिजिकल मौडलिंग सेंटर बनाने का ठेका दिलाने के बदले 8 से 10 प्रतिशत कमीशन शेवरोक्स कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड द्वारा दिया गया. बाद में पता चला कि मातृस्वा कंपनी की तरफ से सचिव संजीव हंस को 67 लाख रुपए दिए गए. 2016 से 2018 के बीच उस ने एक के बाद एक कई कंपनियां खड़ी कीं.

रिशुश्री की सीधे एवं उस के सहकर्मी के नाम से संचालित कंपनियां, जो टेंडर लेता था

  1. रिलायबल इंफा सर्विसेज: रिशुश्री और उस की पत्नी ऋतंभरा कुमारी निदेशक हैं. यह कंपनी सरकारी ठेके लेती है और पैसों को स्थानांतरित करने के लिए इस का उपयोग किया जाता है.
  2. रिलायबल एंटरप्राइजेज: रिशुश्री की अपनी फर्म है. 2012 में इस फर्म के माध्यम से बिहार-झारखंड सरकार में प्लास्टिक पानी की टंकियों के लिए टेंडर हासिल किया गया था.
  3. श्री नेस्टबिल्ड इंफ्रा: यह भी रिशुश्री द्वारा नियंत्रित कंपनी बताई गई है. उस का भाई चिन्मय प्रिया इस का निदेशक है.
  4. अर्बन एनवायर्नमेंटल सोल्यूशन: यह कंपनी भी रिशुश्री द्वारा नियंत्रित बताई गई है.
  5. मातृस्वा कंस्ट्रक्शंस: संतोष कुमार नियंत्रित करता है. संतोष रिशुश्री का कर्मचारी है. कंपनी के गठन के समय रिशुश्री ने 4 करोड़ का निवेश किया था.
  6. मातृस्वा इंफ्रा: निदेशक पवन कुमार हैं. यह कंपनी भी रिशुश्री के समूह की कंपनियों से जुड़ी है.
  7. रितश्री एंटरप्राइजेज: इसे भी रिशुश्री की ही कंपनी बताई गई है और सरकारी सिस्टम के भीतर अपनी एक समानांतर सरकार चलाने लगा.

रिशुश्री बना किंगपिन

वर्ष 2018 में सुपौल जिले के बीरपुर में ‘फिजिकल मौडलिंग सेंटर’ बनाने के लिए टेंडर जारी हुआ था. उस वक्त संजीव हंस जल संसाधन विभाग में सचिव था. करीब 125 करोड़ रुपए खर्च कर सेंटर तैयार होना था. यह कोसी और बिहार की दूसरी नदियों के प्रवाह के अध्ययन का केंद्र बनने वाला था.

विभाग की मिलीभगत से  टेंडर में रिशुश्री ने ऐसी शर्तें रखवाईं, जिस से उस के क्लाइंट अहमदाबाद की ‘शेवरोक्स कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड’ को ठेका मिल गया.

मातृस्वा ने स्वयं कौन्ट्रैक्ट नहीं लिया, कारण कि उसे इस कार्य का अनुभव नहीं था. परंतु रिशुश्री ने अपनी ‘मातृस्वा कंस्ट्रक्शन नाम की कंपनी’ को इस प्रोजेक्ट का सबकौन्ट्रैक्ट दिलाया. मातृस्वा कंस्ट्रक्शन कंपनी रिशुश्री के स्टाफ संतोष कुमार के नाम पर थी.

यह संतोष कुमार ने ईडी को दिए बयान में दर्ज कराया. रिशुश्री की कंपनियां सरकारी सिस्टम के भीतर अपनी एक समानांतर सरकार चलाने लगीं. उस की सफलता का राज था टेंडर प्रक्रिया को हैक करना और अफसरों को सुखसुविधाओं के जाल में फंसाना.

बिहार के 5 बड़े विभागों के तत्कालीन अधिकारी ईडी की रडार पर हैं, जो रिशुश्री के इसी करप्ट इकोसिस्टम का हिस्सा थे. ईडी ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि रिशुश्री ने बिहार के सरकारी ठेकों में करप्ट इको सिस्टम डेवलप कर दिया था.

रिशुश्री और उस के सहयोगियों से मिले इनपुट के आधार पर ईडी ने बुडको, बीसीडी, बीएमएसआईसीएल, यूडीएचडी और फाइनैंस डिपार्टमेंट के अधिकारियों के यहां छापेमारी की.

27 मार्च, 2025 को ईडी विभिन्न विभागों के तत्कालीन अधिकारियों में से मुमुक्षु चौधरी (जौइंट सेक्रेटरी, फाइनैंस डिपार्टमेंट), तारिणी दास (चीफ इंजीनियर, बीसीडी), उमेश कुमार सिंह (एग्जीक्यूटिव इंजीनियर, यूडीएचडी), साकेत कुमार (एग्जीक्यूटिव इंजीनियर, बीसीडी), सागर जायसवाल (डिप्टी जनरल मैनेजर, प्रोजेक्ट, बीएमएसआईसीएल) के यहां छापेमारी की. यही वे अधिकारी थे, जिन की मदद से रिशुश्री को इन विभागों का ठेका मिला.

सीनियर आईएएस अधिकारी संजीव हंस और अन्य जूनियर आईएएस अधिकारियों के खिलाफ चल रहे भ्रष्टाचार और मनी लौंड्रिंग केस में जो नाम सामने आए हैं, चौंकाने वाले हैं.

आईएएस संजीव हुआ अरेस्ट

संजीव हंस 2024 में बिहार स्टेट पावर होल्डिंग कंपनी लिमिटेड का सीएमडी था. तब 16 जुलाई, 2024 को पटना में मनी लौंड्रिंग की जांच के तहत ईडी द्वारा विद्युत भवन पर  छापेमारी की गई और तलाशी अभियान चलाया गया था.

ईडी की काररवाई के कुछ दिनों बाद ही उन का ऊर्जा विभाग से तबादला कर दिया गया. आगे की काररवाई करते हुए प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने 18 अक्तूबर, 2024 को आईएएस अधिकारी संजीव हंस और राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के पूर्व विधायक गुलाब यादव को मनी लौंड्रिंग मामले में गिरफ्तार किया. हंस को पटना से और यादव को दिल्ली से गिरफ्तार किया गया.

एक साल बाद आईएएस संजीव हंस को 16 अक्तूबर 2025 को पटना उच्च न्यायालय में आपराधिक विविध संख्या 22880/2025 उत्पन्न थाना कांड संख्या-4, वर्ष-2024, थाना ईसीआईआर (सरकारी) में निम्न शर्तों के साथ जेल से जमानत दी गई—

(ए) याचिकाकर्ता को प्रत्येक और हर तारीख पर विद्वान निचली अदालत के समक्ष शारीरिक रूप से उपस्थित रहने का निर्देश दिया जाता है, ऐसा न करने पर बिना किसी उचित कारण के लगातार 2 तारीखों पर अनुपस्थित रहने पर याचिकाकर्ता के जमानत बांड रद्ïद किए जाने योग्य होंगे.

(बी) याचिकाकर्ता जमानत अवधि के दौरान देश नहीं छोड़ेगा और रिहाई के बाद अपना पासपोर्ट विचारण न्यायालय के समक्ष समर्पित करेगा.

(सी) यदि याचिकाकर्ता अपना पता बदलता है तो वह ईडी के साथसाथ संबंधित न्यायालय को भी सूचित करेगा.

ईडी की जांच इतने भर से नहीं रुकी है. उन की जांच और अवैध ढंग से रिशुश्री से फायदा लेने वालों पर ही शिकंजा नहीं कसा है, बल्कि कुछ आईएएस अधिकारी तो दागी पदाधिकारी को बचाते हुए, रुपए की थैली ले कर बेशर्मी से स्थानांतरण पदस्थापन का भी अंदरखाने खेल खेल रहे थे. ईडी के राडार पर आने वाले ऐसे औफिसर की भी पोस्टमार्टम हो गई है.

उन आईएएस का नाम जिन के रिशुश्री की समानांतर सरकार में संलिप्त रहने के सबूत मिले हैं.

ईडी की रिपोर्ट के मुताबिक, रिशुश्री ने आईएएस योगेश कुमार सागर और उन के परिवार की आस्ट्रिया यात्रा पर 21.92 लाख रुपए खर्च किए. वहीं, आईएएस धर्मेंद्र कुमार की यूरोप यात्रा का खर्च भी उसी ने उठाया.

आईएएस अभिलाषा कुमारी शर्मा के परिवार की बुकिंग और पूजा अनुष्ठानों के लिए करीब 29 लाख रुपए दिए गए. आनंद किशोर स्थानांतरण में मदद विभिन्न आरोपों के बाद नगर आयुक्त, सहरसा के पद से स्थानांतरित होने के बाद वित्त विभाग में ही संयुक्त सचिव पद पर मुमुक्षु चौधरी पहुंच गए कारण यहां आनंद किशोर पहले से थे.

आनन्द किशोर ही नगर विकास विभाग में रहते हुए मुमुक्षु चौधरी को सीतामढ़ी और सहरसा में नगर आयुक्त बनवाया. आयुक्त बनवाने के लिए 25 लाख रुपए दिए थे. उस ने शहरी विकास और आवास विभाग के तत्कालीन प्रधान सचिव आनंद किशोर के माध्यम से तबादलों और पोस्टिंग को प्रभावित किया.

मुमुक्षु चौधरी ने बताया कि रिशुश्री अकसर कहते थे कि उन्हें आनंद किशोर से मदद मिली है, जिन्हें रिशुश्री ‘भैया’ कहता था.

आईएएस सुनील यादव से भी रिशुश्री के चैट के साक्ष्य जांच एजेंसी को मिले हैं. उस की वित्त विभाग, नगर विकास विभाग, भवन विभाग और जल संसाधन विभाग बिहार के अंदर बड़ी पैठ थी.

मिलते गए सबूत

घोटाले के किंगपिन रिशुश्री से लाभ पाने और रिश्वत लेने के आरोप में राज्य सरकार ने बड़ी काररवाई करते हुए भारतीय प्रशासनिक सेवा (आइएएस) के 2 अधिकारियों को निलंबित कर दिया. इन में 2017 बैच के आईएएस अधिकारी योगेश कुमार सागर और 2014 बैच की अभिलाषा कुमारी शर्मा शामिल हैं.

योगेश वर्तमान में समाज कल्याण विभाग के अंतर्गत नि:शक्तता निदेशक के पद पर थे, जबकि अभिलाषा ग्रामीण विकास विभाग के अंतर्गत जीविका की अपर मुख्य कार्यपालक पदाधिकारी के पद पर थीं. सामान्य प्रशासन विभाग ने दोनों के निलंबन का आदेश जारी कर दिया.

निलंबन अवधि में दोनों अधिकारियों का मुख्यालय सामान्य प्रशासन विभाग होगा.इस अवधि में इन्हें सिर्फ जीवन निर्वाह भत्ता दिया जाएगा.

सूत्रों के अनुसार, रिशुश्री मामले में अभी निर्माण संबंधी विभागों से जुड़े कई और अधिकारी जांच की रडार पर हैं, जिन पर आने वाले समय में काररवाई हो सकती है.

कौन हैं आईएएस योगेश

आईएएस योगेश कुमार सागर मूलरूप से उत्तर प्रदेश के बरेली के रहने वाले हैं. उन के पास एमबीबीएस की डिग्री है. योगेश ने बतौर एसडीओ अपना करिअर शुरू किया था. वह भागलपुर के नगर आयुक्त भी रहे. जिस समय का आरोप योगेश पर लगा है, उस समय वह बिहार शहरी अवसंरचना विकास निगम लिमिटेड (बुडको) में प्रबंध निदेशक के पद पर तैनात थे.

कराई यूरोप की यात्रा

ईडी की जांच में बताया गया है कि ठेकेदार रिशुश्री ने आईएएस अधिकारी योगेश कुमार सागर और उन के 8 रिश्तेदारों को यूरोप की यात्रा कराई थी. वर्ष 2024 में 22 से 30 जून तक हुई इस यात्रा में योगेश और उन का परिवार आस्ट्रिया के विएना, साल्जवर्ग और वाल्फगैंग शहर घूमे थे.

इस दौरान सभी महंगे आलीशान होटल में ठहरे. इन सब पर करीब 21.92 लाख रुपए खर्च हुए, जिस का भुगतान रिशुश्री के स्तर से किया गया था. इन का निलंबन 30 मई, 2026 को हुआ.

कौन है आईएएस अभिलाषा शर्मा

अभिलाषा शर्मा मूलरूप से नवादा की रहने वाली हैं. इन के पास बीटेक और लोक प्रशासन में एमए की डिग्री है. यह 2014 बैच की आईएएस अधिकारी हैं. करिअर की शुरुआत केंद्रीय गृह मंत्रालय से हुई. सीतामढ़ी के डीएम एवं वित्त विभाग में संयुक्त सचिव जैसे महत्त्वपूर्ण पद पर पदस्थापित थीं.

30 मई, 2026 को निलंबन के समय यह ग्रामीण विकास विभाग अंतर्गत जीविका की अपर मुख्य कार्यपालक पदाधिकारी के पद पर थीं.

आरोप है कि अभिलाषा के घर की छत पर बागवानी और सौंदर्यीकरण के काम पर करीब 9 लाख रुपए खर्च हुए थे, जिस का पूरा भुगतान रिशुश्री के स्तर से किया गया था. आरोप है कि अभिलाषा के रिश्तेदारों को रिशुश्री ने गोवा, दिल्ली जैसे कई शहरों में घुमाया.

इस के अलावा रिशुश्री से आईफोन समेत कई महंगे उपहार भी महिला आईएएस अधिकारी को दिए जाने की बात जांच में सामने आई है.

प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और विशेष सतर्कता इकाई (एसवीयू) द्वारा अभिलाषा कुमारी शर्मा के खिलाफ दर्ज मामले का मुख्य आधार यह है कि उन्होंने जीविका (बीआरएलपीएस) खरीद नेटवर्क के भीतर अपनी प्रशासनिक शक्ति का दुरुपयोग करके रिशुश्री के व्यापारिक तंत्र के लिए सरकारी ठेके हासिल कराए.

बिहार ग्रामीण आजीविका संवर्धन समिति (बीआरएलपीएस/जीविका) के अतिरिक्त सीईओ के रूप में अभिलाषा शर्मा ने बीआरएलपीएस निविदा में हेराफेरी की.

रिश्वतखोरी को छिपाने के लिए रिशुश्री ने अपनी मुख्य कंपनी, मेसर्स रिलायबल इंफ्रा सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड के नाम से खुले तौर पर आवेदन नहीं किया. इस के बजाय, बीआरएलपीएस निविदा पात्रता मानदंडों में जानबूझ कर हेरफेर किया गया, ताकि कुछ चुनिंदा फर्मों को लाभ मिल सके.

एक बार जब उन चयनित बाहरी फर्मों को बीआरएलपीएस के बड़े अनुबंध मिल गए, तो रिशुश्री की कंपनियों को तुरंत निष्पादन का काम सौंपने के लिए नामित उपठेकेदार के रूप में नियुक्त किया गया. जांच में पाया गया कि रिशुश्री की कंपनियों ने बीआरएलपीएस प्रोजेक्ट के खातों के भीतर, बहुत ज्यादा बढ़ाचढ़ा कर कमर्शियल बिल बनाए.

यह एक मनी लौंड्रिंग के तरीके के तौर पर काम करता था, जिस से अवैध कमीशन के भुगतान और प्रशासनिक रिश्वतें, ग्रामीण कार्यक्रमों के लिए होने वाले सामान्य, नियमित वेंडर खर्चों जैसी लगती थीं.

एजेंसियों ने इस कौन्ट्रैक्ट से जुड़े इन फायदों को सीधे तौर पर शर्मा को मिले आलीशान फायदों से जोड़ा है. सबूतों वाली फाइलों से पता चलता है कि रिशुश्री ने सीधे तौर पर अपने निजी घर में लाखों रुपए का एक आलीशान टेरेस गार्डन बनवाया.

अपने परिवार के लिए महंगे आईफोन खरीदे और अपने करीबी रिश्तेदारों के लिए गोवा, दिल्ली और हैदराबाद की फ्लाइट और आलीशान होटलों में ठहरने का सारा खर्च खुद उठाया.

बिहार सरकार द्वारा आधिकारिक तौर पर निलंबित किए जाने के बाद, जांच एजेंसी ने कौन्ट्रैक्ट रजिस्टर, डिजिटल खरीद के रिकौर्ड और शर्मा के हस्ताक्षर वाले मंजूरी नोट जब्त कर लिए हैं. फोरैंसिक अकाउंटेंट शेल खातों के जरिए बीआरएलपीएस फंड के प्रवाह का पता लगा रहे हैं, ताकि यह साबित किया जा सके कि हेरफेर वाले टेंडरों और ठेकेदार को किए गए भुगतानों के बीच सीधा वित्तीय संबंध है.

यहां यह गौरतलब है कि हिमांशु शर्मा, सीईओ, जीविका, राम निरंजन सिंह, डायरेक्टर, जीविका और डा. संतोष, प्रोक्योरमेंट स्पैशलिस्ट से गुजर कर ही टेंडर की फाइल अप्रूव होती थी और भुगतान रंजीत कुमार, सीएफओ के जरिए होता था.

किस की कितनी मिलीभगत, हिस्सेदारी और जिम्मेवारी रही, यह सब जांच में निकल कर आ रहा है.

अक्तूबर 2024 में आईएएस संजीव हंस ने निलंबन के साथसाथ एक वर्ष तक जेल भी काटी.

टेंडर मास्टरमाइंड अरेस्ट

करोड़ों रुपए के टेंडर घोटाला में किंगपिन रिशुश्री को सब से पहले 28 मई, 2026 को गिरफ्तार किया गया. उस के सहयोगी संतोष कुमार भी जो अलगअलग कंपनियों में कहीं रिशुश्री के स्टाफ तो किसी में निदेशक पद संभाल रहे थे, को भी गिरफ्तार कर लिए गए.

एसवीयू द्वारा रिशुश्री की गिरफ्तारी में इसलिए विलंब हो रहा था, क्योंकि उस के द्वारा माननीय उच्च न्यायालय में वाद संख्या 2942/25 दायर कर काररवाई रोकने की अपील की गई थी, परंतु 15 मई, 2026 को आवेदन खारिज कर दिया. उस के बाद ही उसे गिरफ्तार किया गया.

गिरफ्तारी के बाद रिमांड पर ले कर एसवीयू टीम ने उस से गहन पूछताछ की. रिशुश्री और संतोष कुमार के पास से मिले वाट्सऐप चैट और बैंक खातों के सबूतों ने वर्णित संलिप्त अफसरों की पोल ही खोल दी.

आरोपी हुए फरार

गिरफ्तार मुमुक्षु चौधरी, वित्त विभाग में संयुक्त सचिव के पद पर पदस्थापन से पहले सीतामढ़ी और सहरसा में नगर आयुक्त के पद पर थे. इन की पोस्टिंग नगर विकास विभाग के सचिव आनंद किशोर के द्वारा की गई.  बड़े अधिकारियों को 25 लाख रुपए दिए गए. इस के एवज में सीतामढ़ी और सहरसा में नगर आयुक्त रहते हुए रिशुश्री की कंपनी को ठेके दिए गए.

सहरसा में मातृस्वा इंफ्राटेक प्राइवेट लिमिटेड को 24 अक्तूबर, 2024 को 98 लाख 95 हजार का ठेका छठ घाट सफाई के लिए दिया गया. इस राशि में 92 लाख का भुगतान 6 अगस्त, 2025 में वर्तमान नगर आयुक्त द्वारा कर दिया गया.

पटना से अपराध इकाई टीम भुगतान की संचिका अपने साथ ले गई. उल्लेखनीय है कि अन्य अनियमितताओं और अपने गलत व्यवहार के कारण मुमुक्षु चौधरी के चहरे पर कालिख भी पोती गई थी.

पूर्व मुख्य अभियंता भवन निर्माण विभाग, तारिणी दास दूसरे सब से बड़ा भ्रष्ट गिरफ्तार इंजीनियरिंग अधिकारी है. यह बिल पास कराने के बदले सीधे 3.5 प्रतिशत कमीशन नकद ही लेता था. इस की सरकार के अंदर इतनी पहुंच थी कि सेवानिवृत्ति के बाद बिना किसी कैबिनेट डिसीजन के ही सेवा विस्तार दे दिया गया था. ईडी की छापेमारी में इस के ठिकाने से 8.5 करोड़ रुपए नकद बरामद हुए. इसे भी बरखास्त कर दिया गया.

कार्यपालक अभियंता पीएचईडी बाद में बुडको में स्थानांतरित उमेश सिंह की गिरफ्तारी ड्रेनेज पंपिंग स्टेशन प्रोजेक्ट के ठेके के रिश्वतखोरी में हुई.

स्टेशन प्रोजेक्ट डायरेक्टर उमेश कुमार सिंह बिल पास करने के लिए तय दर से अधिक राशि की मांग कर रहा था. ज्यादा घूस मांगने पर रिशुश्री के पार्टनर रंजीत राणा ने एक प्रतिशत अधिक कमीशन दे कर बिल पास कराया.

टेंडर घोटाला में संलिप्त 2 आईएएस अधिकारियों योगेश कुमार सागर और अभिलाषा शर्मा के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करने की इजाजत मांगी गई है. स्पैशल विजिलेंस यूनिट (एसवीयू) ने प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) से प्राप्त दस्तावेजों एवं अन्य उपलब्ध साक्ष्यों के साथ सरकार के निगरानी विभाग से मार्गदर्शन के लिए अनुरोध किया है.

वहीं, विभागीय सूत्रों के अनुसार पूरे मामले में कोई भी कानूनी काररवाई करने के पहले राज्य के महाधिवक्ता से राय मांगी गई है.

मालूम हो कि टेंडर घोटाले के आरोपी रिशुश्री से साठगांठ को ले कर इन 2 आईएएस अधिकारियों को पहले ही निलंबित किया जा चुका है. साथ ही, इन के अलावा कई अन्य आईएएस अधिकारी भी निशाने पर हैं.

एसवीयू ने इस मामले में जांच तेज कर दी है. एसवीयू अपने स्तर से सभी साक्ष्यों को एकत्र कर लेना चाहती है ताकि आरोपियों के खिलाफ ठोस काररवाई की जा सके.

अन्य जिन अधिकारियों पर पीएमएलए की आंच आई, उन में कई का ट्रांसफर बिहार सरकार ने कर दिया है. ये सभी अधिकारी नीतीश सरकार में काफी योग्य और तेजतर्रार की गिनती में थे.

इन अधिकारियों के खिलाफ राजद नेता और बक्सर के सांसद सुधाकर सिंह ने मोर्चा खोल दिया है. उन्होंने मंत्री को भी जांच के घेरे में लेने का सवाल रखा है.

दोस्त बन गया गवाह

संजीव हंस ने अपनी बदनामी के डर से नलिनी कुमारी के साथ समझौता किया था. बताया जाता है कि बेटे और नलिनी कुमारी के भरणपोषण और मकान आदि के लिए 5 करोड़ रुपए पर डील हुई.

आईएएस संजीव हंस के एक घनिष्ठ दोस्त सुनील कुमार सिन्हा ने इस समझौते में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. वह बिहार का बड़ा ठेकेदार भी है. संजीव हंस ने प्रयागराज के बिल्डर श्री बघेल को अपार्टमेंट के लिए 90 लाख रूपए मैनेज करने को कहा.

सुनील कुमार सिन्हा ने अपने बैंक खाते से 70 लाख और रिशु रंजन सिन्हा उर्फ रिशुश्री जैसे कबाड़ ठेकेदार से 20 लाख रुपए ट्रांसफर कराए. रिशुश्री को रुपए देने के बदले संजीव हंस ने रिशुश्री को जल संसाधन विभाग के टेंडर से इस रकम को एडजस्ट करने की बात कही. इस प्रकार आईएएस लौबी में रिशुश्री की एंट्री हो गई.

ईडी की जांच में रिशुश्री के रिलायबल इंफ्रा से सुनील कुमार सिन्हा की कंपनी के खाते में 20 लाख फिर सुनील कुमार सिन्हा के खाते से बिल्डर के खाते में कुल 90 लाख दिए गए.

सुनील कुमार सिन्हा ने कहा कि मेरे रुपए अभी तक नहीं लौटाए गए हैं. इसलिए मैं इस अपराध के खिलाफ जांच एजेंसियों के साथ गवाही दूंगा.

(संपूर्ण अपराध कथा विशेष निगरानी इकाई के तत्कालीन अतिरिक्त महानिदेशक पंकज कुमार द्वरीर द्वारा प्रैस कौन्फ्रैंस में दी गई)

रिशुश्री की काली कमाई का सच

झोपड़ी से अट्टालिका तक और पैदल से पोर्शे, बीएमडब्ल्यू और लैंड क्रूजर वाहन तक कैसे पहुंचा.

बिहार का टेंडर किंग रिशुश्री का पूरा नाम रिशु रंजन सिन्हा खगडिय़ा नगर परिषद के सन्हौली का रहने वाला था. रिशु का पिता विनोद कुमार सिन्हा एक मैडिकल रिप्रेजेंटेटिव था. 25 वर्ष पहले उस की आर्थिक हालत ठीक नहीं थी. इसलिए अपने घर में ताला लगा कर विनोद कुमार सिन्हा ने परिवार सहित पटना में एक रिश्तेदार के घर शरण ले ली.

रिशुश्री उस समय 12-13 वर्ष का था. अरबों रुपए की अवैध संपत्ति अर्जित करने वाला रिशुश्री अपने ढहे खपरैल घर को कभी देखने और बनाने नहीं आया. हालिया घटनाक्रम के बाद खगडिय़ा शहर के हर जुबां पर उसी का नाम है.

पटना एनआईटी से बीटेक तक की शिक्षा पा कर साल 2013-14 में उस ने एक एजेंसी से अपना करिअर शुरू किया था. लेकिन महज एक दशक के भीतर उस ने बिहार के नगर विकास विभाग, बुडको, बीसीडी, भवन निर्माण विभाग, पीएचईडी, जीविका और वित्त विभाग जैसे महत्त्वपूर्ण महकमों में अपनी पैठ बना ली.

वर्ष 2016 से 2018 के बीच उस ने एक के बाद एक कई कंपनियां खड़ी की और सरकारी सिस्टम के भीतर अपनी एक समानांतर सरकार चलाने लगा. इसे सब से पहले साथ मिला जल संसाधन विभाग के सचिव आईएएस संजीव हंस का.

उस की सफलता का राज था टेंडर प्रक्रिया को हैक करना और अफसरों को सुखसुविधाओं के जाल में फंसाना.

आज बिहार के 5 बड़े विभागों के तत्कालीन अधिकारी रिशु के इसी करप्ट इकोसिस्टम का हिस्सा थे.

ईडी ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि रिशुश्री ने बिहार के सरकारी ठेकों में करप्ट इको सिस्टम डेवलप कर दिया था. उस ने सरकारी कर्मचारियों व अधिकारियों को फायदा पहुंचाया. इस के बदले उसे सरकारी टेंडरों से जुड़ी अहम जानकारी पहले ही मिल जाती थी.

रिशु अधिकारियों के साथ सांठगांठ कर टेंडर में फेरबदल करा लेता था. मनचाहे ठेकेदार को टेंडर दिलाता था. इस के बदले कमीशन लेता था. कमीशन का हिस्सा संबंधित अधिकारी तक भी पहुंचाता था.

हजारों करोड़ के कौन्ट्रैक्ट्स में दलाली करता था रिशु श्री. सरकारी विभागों में हजारों करोड़ रुपए के कौन्ट्रैक्ट्स के लिए बिचौलिए की भूमिका निभाता था.

रिशुश्री पहले कबाड़ ठेकेदार था. कबाड़ खरीदने का ठेका लेने के लिए उस का सरकारी औफिस में आनाजाना शुरू हुआ. उस ने जल्द सरकारी बोर्डों, संगठनों और विभागों में पैठ बना ली. जैसेजैसे रसूख बढ़ा, बड़ेबड़े ठेकों से जुड़ गया. 2021 में उसे स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट में सलाहकार नियुक्त किया गया था.

देखतेदेखते रिशु शहरी विकास, आवास, जल संसाधन और स्वास्थ्य जैसे विभागों में ठेकेदारों और अधिकारियों के लिए ऐसा व्यक्ति बन गया, जिस की मदद के बिना सौदा नहीं हो. आरोप है कि उस ने कई शेल कंपनियां बनाई. इन में कुछ आईएएस अधिकारियों का भी निवेश था.

रिशु मीठी जुबान यानी चमचागिरी करने में माहिर था. तोहफों और कीमती गिफ्ट के सहारे वह बड़े अधिकारियों के करीब पहुंचा था. उन के काम कराता. धीरेधीरे उस ने कई अधिकारियों का भरोसा जीता. उन के साथ अच्छे संबंध बनाए.

अधिकारियों और उन के परिवार के लोगों के घूमनेफिरने का इंतजाम किया. अधिकारियों की पत्नियों और बच्चों के जन्मदिन पर महंगे गिफ्ट देता था.

उन के लिए शानदार पार्टियों का इंतजाम करता था. इन सब के बदले उसे अधिकारियों से मनचाहे ठेकेदार को टेंडर दिलाने और दूसरे काम कराने में मदद मिलती थी.

ठेकेदारी और दलाली से अकूत कमाई करने वाला रिशु ऐशोआराम कह लाइफ जीता है. महंगे कपड़े और घडिय़ां पहनता है. पटना से बाहर जाने पर वह महंगे होटलों में ठहरता था. आरोप है कि रिशु ने पिछले 7-8 साल में 58 करोड़ अपने ऊपर खर्च कर दिए.

रिशु अधिकारियों की संपत्ति मैनेज करता था. उसे विदेशों में सुरक्षित ठिकानों में जमा कराने में भी मदद करता था. उस ने 12 आईएएस अफसरों की प्रौपर्टी फ्रांस, यूएई  और स्विट्जरलैंड जैसे देशों में बनवाई.

पिछले 6 साल में उस ने तुर्की, स्विट्जरलैंड, फ्रांस, दुबई, बहरीन, अबू धाबी, भूटान, थाईलैंड, जेद्दाह, शारजाह आदि जगहों की कई बार यात्राएं कीं.

रिशु ने अधिकारियों के नाम पर देश और विदेश में निवेश किया है. यह अधिकारियों को काम करने के बदले देश या विदेश जहां चाहे पैसे पहुंचाने या संपत्ति दिलाने का वादा कर लुभाता था.

ईडी की रिपोर्ट के अनुसार बिहार की नौकरशाही व्यवस्था में रिशु की बेहद मजबूत पकड़ थी. सचिवालय में उसे साहबों की तरह ट्रीट किया जाता था. स्थिति यह थी कि कुछ विभागों में बड़े ठेकों से जुड़ी बड़ी फाइलें उस की सहमति के बिना आगे नहीं बढ़ती थीं. Bihar Tender Scam

—कथा में नलिनी परिवर्तित नाम है

—मुक्तेश्वर प्रसाद सिंह

और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...