Dowry Murder Case. मानेंद्र सिंह ने श्वेता से शादी सिर्फ दहेज के लिए की थी. जबकि वह प्यार अपनी भाभी की बहन स्मृति सिंह से करता था. शादी के बाद स्मृति सिंह को पाने और श्वेता से पिंड छुड़ाने के लिए उस के परिवार ने श्वेता के साथ जो किया, उसी की सजा के रूप में आज पूरा परिवार खंडवा की जेल में है, जबकि परिवार के सभी लोग सरकारी नौकरियों में अच्छे पदों पर थे.
आखिर 30 जून, 2014, सोमवार को वह दिन आ ही गया, जिस का इंतजार राघवेंद्र सिंह 5 सालों से करते आ रहे थे. यह दिन उन के लिए एक बड़ी सौगात ले कर आ रहा था. क्योंकि इस
दिन उन की उस निर्दोष बेटी को इंसाफ मिलने वाला था, जिस ने कुछ लालची लोगों की वजह से मजबूर हो कर मौत को गले लगा लिया था.
बेटी की मौत वाले दिन से ले कर उस दिन तक का एकएक दिन उन्होंने ही नहीं, परिवार के एकएक सदस्य ने कांटों पर बिताया था. हर दिन का एक सूरज नई उम्मीद के साथ उगता था तो डूबता था निराशा के साथ. बेटी की असमय और दर्दनाक मौत के दुख ने पूरे परिवार को एक पल के लिए चैन नहीं लेने दिया था. लेकिन उन की मेहनत रंग लाई था और फैसले का दिन आ गया था.
फैसले का दिन होने की वजह से खंडवा की जिला एवं सत्र न्यायालय में जहां राघवेंद्र सिंह तो मौजूद थे ही, दूसरे पक्ष यानी उन की बेटी श्वेता की ससुराल के भी वे सभी लोग मौजूद थे, जो इस मुकदमें में आरोपी थे. उन के कुछ सगेसंबंधी भी आए थे.
मामला रसूखदार लोगों से जुड़ा था, इसलिए मीडिया वाले भी अदालत में जमे थे. सभी को फैसले का इंतजार था.
दरअसल, 17 दिसंबर, 2009 को राघवेंद्र सिंह की एकलौती बेटी श्वेता सिंह, जिस की शादी उन्होंने जेल अधीक्षक मानेंद्र सिंह परिहार से की थी, का शव संदिग्ध हालत में खंडवा जेल परिसर के सरकारी आवास से मिला था. पुलिस ने जिस स्थिति में शव बरामद किया था, वह काफी संदिग्ध था. मानेंद्र सिंह ने बताया था कि श्वेता ने फांसी लगा कर आत्महत्या की थी.
मानेंद्र सिंह और श्वेता सिंह की शादी 21 जून, 2009 को भोपाल के जानेमाने होटल इम्पीरियल सेवर में हुई थी. मात्र 6 महीने में ही पढ़ीलिखी, सुंदर और संपन्न घर की बहू, जो एक अधिकारी की पत्नी भी थी, का मौत को गले लगाना वैसे भी संदेह पैदा करता था. फिर शादी के 7 सालों तक अगर कोई लड़की इस तरह आत्महत्या कर लेती है तो ससुराल वाले वैसे भी शक के घेरे में आ जाते हैं.
जबकि यहां तो आत्महत्या करने वाली श्वेता सिंह के पिता राघवेंद्र सिंह ने सीधेसीधे पति मानेंद्र सिंह ही नहीं, तहसीलदार ससुर मोहन सिंह, पटवारी जेठ जागेंद्र सिंह, ननदोई हरि सिंह डेडिया, आबकारी विभाग में उपनिरीक्षक जेठानी श्रद्धा सिंह और उस की बहन स्मृति सिंह को बेटी की आत्महत्या के लिए दोषी ठहराया था.
वन विभाग में एसडीओ राघवेंद्र सिंह ने मानेंद्र सिंह, मोहन सिंह, जागेंद्र सिंह, हरि सिंह, श्रद्धा सिंह और स्मृति सिंह के खिलाफ दहेज प्रताड़ना, हत्या का प्रयास, आत्महत्या के लिए मजबूर करने की धाराओं के अंतर्गत मुकदमा दर्ज कराया था.
खंडवा पुलिस ने भी ईमानदारी से इस मामले की जांच कर के आरोप पत्र दाखिल किया था. उसी आरोप पत्र के आधार पर पूरे 5 सालों तक मुकदमा चला था.
तमाम सारी गवाहियों और बहस के बाद सत्र न्यायाधीश अक्षय कुमार द्विवेदी (प्रथम) ने अपना जो फैसला सुनाया था, उस के अनुसार, जेल अधीक्षक पति मानेंद्र सिंह परिहार, पटवारी जेठ जागेंद्र सिंह, तहसीलदार ससुर मोहन सिंह को 10-10 साल की सश्रम कारावास तथा इस मुकदमे के अन्य आरोपी श्वेता की जेठानी श्रद्धा सिंह, जो आबकारी विभाग में उपनिरीक्षक थीं और ननदोई हरि सिंह डेडिया, जो रेवेन्यू विभाग में थे, को 7-7 साल की सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी.
इस सजा के साथसाथ सभी आरोपियों पर 1.20 लाख रुपए का जुर्माना भी लगाया गया था. इस मुकदमे की एक आरोपी स्मृति सिंह, जो श्रद्धा सिंह की बहन थी, को आरोप मुक्त कर दिया गया था.
इस मुकदमे के सरकारी वकील दीपक कुर्रे के अनुसार, उन्होंने अपनी ओर से 45 गवाह पेश किए थे, जबकि बचाव पक्ष की ओर से 13 गवाह पेश किए गए थे, जो बड़े अधिकारी और रसूखदार लोग थे.
श्वेता की ओर से अदालत में कुल 45 लोगों ने गवाही दी थी, उस में मुख्य गवाह 5 लोग ही थे. उन 5 लोगों में श्वेता के मातापिता, भाई और एक राघवेंद्र सिंह का सहकर्मी सुधीर सिंह था. इन में श्वेता की एक सहेली भी थी भावना पारीदार. लेकिन बाकी के 40 गवाहों ने भी मुकदमे को मजबूत बनाने में काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. उन्होंने सही गवाही दे कर अपना पूरा सहयोग दिया था.
श्वेता की सहेली भावना पारीदार गवाही के दौरान थोड़ा विचलित जरूर हुई थी, लेकिन जिरह में पूछे गए सवालों के जवाब उस ने एकदम सटीक दिए थे. 5 साल तक चले इस मुकदमे में बचाव पक्ष ने 6 बार हाईकोर्ट में गुहार लगाई थी कि वे निर्दोष हैं. लेकिन हर बार उन्हें मुंह की खानी पड़ी थी. मुकदमें का फैसला जानने के साथ आइए थोड़ा श्वेता सिंह और उन के साथ हुए अन्याय के बारे में भी जान लें.
श्वेता राघवेंद्र सिंह और सुशीला सिंह के 2 बेटों पर नाजों से पली एकलौती दुलारी बेटी थी. राघवेंद्र सिंह वन विभाग में एसडीओ थे. संपन्न बाप की बेटी श्वेता भरपूरे परिवार में आराम से जिंदगी गुजार रही थी. उस के गे्रजुएट होते ही मां सुशीला देवी को उस की शादी की चिंता सताने लगी थी.
रिश्ते की बात शुरू हुई तो रिश्तेदारों और परिचितों ने जो रिश्ते बताए, उन में उन्हें सब से अच्छा रिश्ता मानेंद्र सिंह परिहार का लगा. वह जेल अधीक्षक जैसे गजटेड पोस्ट पर थे. उन के पिता मोहन सिंह तहसीलदार थे तो बड़ा भाई जागेंद्र सिंह पटवारी था. उस की पत्नी श्रद्धा सिंह भी आबकारी विभाग में उपनिरीक्षक थी.
पढ़ालिखा और संपन्न परिवार था. घर के सभी लोग सरकारी नौकरियों में अच्छे पदों पर थे. एक लड़की के मांबाप को इस से ज्यादा और क्या चाहिए. दोनों परिवारों ने लड़कालड़की देखा, पृष्ठभूमि जानी. इस के बाद बातचीत का दौर चला. सब ठीकठाक था, इसलिए रिश्ता तय हो गया.
रिश्ता तय होने के बाद पहली रस्म सगाई की होती है, जो ठीकठाक से हो गई. शिष्टाचार और जातिबिरादरी की परंपरा के अनुरूप राघवेंद्र सिंह ने खूब लेनदेन किया. उन की एक ही तो बेटी थी, कोई कमी नहीं रखी. हर लेनदेन दिल खोल कर किया. सगाई पर ही उन्होंने समधी मोहन सिंह को ‘बोलेरो’ जीप दी. कपडे़ और गहनों की कोई गिनती ही नहीं थी.
मोहन सिंह चाहते थे कि बारातियों का स्वागत तो शानदार होना ही चाहिए, द्वारचार पर सभी को एकएक सोने की चेन दी जाए.
लेकिन राघवेंद्र सिंह के लिए यह संभव नहीं था, इसलिए उन्होंने कहा, ‘‘सभी बारातियों को चेन देना मेरे वश में नहीं है, आप कह रहे हैं तो 1-2 खास लोगों को जरूर दे दूंगा.’’
राघवेंद्र सिंह ने कुल 15 लाख रुपए नकद दिए थे. अकेली बेटी थी, इसलिए उन्होंने खूब धूमधाम से उस की शादी की थी. उन का हर इंतजाम बहुत ही शानदार था. उन्होंने ऐसा इंतजाम किया था कि किसी को शिकायत का मौका नहीं मिला. उन्होंने घर वालों की ही नहीं, बारातियों के आवभगत में भी कोई कसर नहीं छोड़ी थी. इसीलिए हर किसी ने इंतजाम और स्वागत की खूब तारीफ की थी.
हंसीखुशी के बीच शादी संपन्न हुई. मांबाप का आशीर्वाद और भाइयों का प्यार लिए श्वेता भीगी आंखों से ससुराल आ गई. मोहन सिंह ने बेटे की शादी रीवां के अपने पुश्तैनी मकान से की थी, इसलिए श्वेता विदा हो कर पति के साथ वहीं आई. दिल में हजारो अरमान और आंखों में पिया मिलन के सपने लिए उस ने ससुराल में कदम रखा.
ससुराल में जेठजेठानी और ससुर थे. अगले दिन श्वेता सभी के साथ एक रिश्तेदार के यहां मिलने गई तो वहां नई बहू के रूपगुणों और संस्कारों की काफी प्रशंसा हुई. वापस आ कर श्वेता गहने उतारने लगी तो उस का हार बालों में फंस गया. वह उसे जेठानी श्रद्धा सिंह से निकलवाने गई तो हार निकाल कर उसे हाथ पर तौलते हुए जेठानी ने व्यंग्य से कहा, ‘‘तुम्हारे मम्मीपापा को तुम्हारी नजाकत का बड़ा ख्याल रखते हैं. तभी तो इतने हलके गहने दिए हैं कि तुम इन के वजन से थक न जाओ. जबकि हमारे यहां वजनदार गहने देने का रिवाज है.’’
श्वेता ने आहिस्ता से कहा, ‘‘भाभी, इस में मम्मीपापा का क्या दोष, सारे गहने मैं ने अपनी पसंद से फैशन के हिसाब से खरीदे हैं.’’
‘‘अच्छा, तो तुम लोग फैशन देखती हो, वजन और कीमत नहीं.’’ श्रद्धा सिंह ने मुंह बिचकाते हुए कहा.
श्वेता का मन खट्टा हो गया. जबकि उस के सारे गहने काफी सुंदर और फेशनेबल तो थे ही, वजनदार भी थे. इस के बाद भी जेठानी इस तरह कह रही थी. अगले 2-3 दिन शांतिपूर्वक बीते. श्वेता दिन में कई बार मम्मीपापा को फोन कर के बात करती थी. उसे ऐसा करते देख एक दिन जेठ जागेंद्र सिंह ने कहा, ‘‘बहू, अब मायके का मोह छोड़ो और ससुराल में मन लगाओ. कब तक मायके के मोह में पड़ी रहोगी?’’
श्वेता को जेठ की इस बात से काफी कष्ट हुआ. वह जिस परिवार से आई थी, वहां सभी एकदूसरे को खूब प्यार करने के साथ भावनाओं का भी सम्मान करने वाले थे, जबकि यहां तो माहौल ही कुछ अलग था. दूसरों की छोड़ो, पति मानेंद्र भी कटाकटा रहता था. उसे लगा वह अभी नईनई है, इसलिए उसे ऐसा लग रहा है. धीरेधीरे सब घुलमिल जाएंगे.
2 दिन और गुजरे. उस दिन शाम 5 बजे श्वेता सो कर उठी तो घर में नौकरानी के अलावा और कोई नहीं था. उस ने नौकरानी से पूछा, ‘‘घर के सब लोग कहां गए?’’
‘‘सभी लोग किसी रिश्तेदार के यहां मिलने गए हैं.’’ नौकरानी ने बताया.
यह बात श्वेता को बहुत बुरी लगी. अगर वह सो रही थी तो उसे भी जगा कर अपने साथ ले जाया जा सकता था. यहां साथ ले जाने की कौन कहे, बताने की भी जरूरत नहीं समझी गई थी.
रात को सभी लोग बाहर से ही खा कर आए तो श्वेता ने पति मानेंद्र से कहा, ‘‘आप लोग मुझे अकेली छोड़ कर चले गए. इतनी देर तक मैं बोर होती रही.’’
‘‘तुम गहरी नींद सो रही थीं, इसलिए नहीं जगाया. वैसे भी अब तुम्हें अकेली रहने की आदत डाल लेनी चाहिए, क्योंकि मेरा कोई भरोसा नहीं है कि मैं कब घर लौट कर आऊं?’’ मानेंद्र ने बड़ी ही बेरुखी से कहा.
श्वेता ने पति से बहस करना उचित नहीं समझा. लेकिन पति ने जिस तरह बेरुखी से बात की थी, उस से उस के चेहरे पर गुस्सा साफ झलक आया था. इस बात को जेठानी श्रद्धा सिंह ने ताड़ लिया. उस ने कहा, ‘‘मिजाज तो बहुत गरम है. जरा सी बात पर भी गुस्सा आ जाता है. तुम इतने बडे़ घर की नहीं हो कि इस तरह तेवर दिखाओ. हम लोगों को उम्मीद थी कि तुम्हारे पिता कम से कम 25-30 लाख रुपए तो देंगे ही. सोना भी उसी तरह देंगे. बनते तो बहुत बड़े आदमी हैं, लेकिन लेनदेन में बहुत कंजूस हैं.’’
श्रद्धा सिंह अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाई थी कि उस की बात बीच में ही काट कर उस के पति जागेंद्र सिंह ने कहा, ‘‘मुझे तो पूरी उम्मीद थी कि द्वारचार पर मुझे सोने की चेन मिलेंगी, लेकिन वह मेरे लिए इतना भी नहीं कर सके.’’
इस के बाद श्रद्धा सिंह ने अपनी बात पूरी की, ‘‘राघवेंद्र सिंह ने जो दियालिया, उस से ज्यादा तो एक मिडिल क्लास मांबाप दे देता. उन के यहां शादी करने से हमें फायदा ही क्या हुआ?’’
जेठजेठानी की बातों से श्वेता हैरान रह गई. उस की आंखों में आंसू आ गए. लेकिन इन आंसुओं का वहां किसी पर कोई असर नहीं हुआ. दोनों उसी तरह ताने मारते रहे. इस से श्वेता समझ गई कि अब यहां उस के साथ कुछ अच्छा नहीं होगा.
जैसेतैसे 10-12 दिन रीवां में गुजार कर श्वेता मानेंद्र सिंह के साथ भोपाल आ गई. मानेंद्र उन दिनों भोपाल की सेंट्रल जेल में ट्रेनिंग पर थे. भोपाल आ कर श्वेता ने चैन की सांस ली कि अब यहां उसे दहेज के लिए ताने नहीं सुनने पड़ेंगे. लेकिन यहां एक दूसरी मुसीबत खड़ी हो गई.
मानेंद्र सिंह दिन भर तो घर से गायब रहते ही, रात को भी देर से आते. श्वेता अकेली पागलों की तरह घर में पड़ी रहती. 2 लोगों का काम ही कितना होता था, ऊपर से नौकरचाकर भी थे. अगर कभी देर रात उठ कर श्वेता को दरवाजा खोलने में देर हो जाती तो मानेंद्र का पारा चढ़ जाता.
वैसे भी कोई बात छिपी नहीं रहती. अगर बात अनैतिक संबंधों की हो तो वह हावभाव और बातव्यवहार से ही उजागर हो जाती है. रिश्तेदारों, मित्रों और जानने वालों से श्वेता को भी पता चल गया था कि मानेंद्र सिंह का जेठानी की बहन स्मृति सिंह से गलत संबंध है. पता चला कि दोनों का प्रेमसंबंध शादी से पहले से ही चल रहा था, जो शादी के बाद भी उसी तरह चल रहा है. उसी से मिलने और उस के साथ घूमनेफिरने में मानेंद्र सिंह को घर आने में देर होती थी.
श्वेता ने अपने साथ होने वाले इस अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाई तो घर में क्लेश होने लगा. रोजरोज के क्लेश से ऊब कर मानेंद्र ने एक दिन श्वेता को बुरी तरह डांट दिया, ‘‘तुम्हें मेरे पर्सनल मामले में दखल देने की बिलकुल जरूरत नहीं है. मैं बाहर क्या करता हूं, अगर तुम इस में पड़ोगी तो परेशान होती रहोगी. इस से अच्छा है कि तुम आराम से घर में रहो, खाओपियो और ऐश करो.’’
श्वेता समझ गई कि उस के कहनेसुनने का कोई फायदा नहीं है. वह अंदर ही अंदर कुढ़ने लगी. क्योंकि मांबाप को ये सब बातें बता कर वह उन्हें कष्ट नहीं पहुंचाना चाहती थी. अभीअभी तो उन्होंने उसे कितने अरमानों से बिदा किया था. ये सब जान कर वे परेशानी में पड़ जाएंगे. हां, कभी घुटन सी होने लगती तो सहेली भावना को फोन कर के जरूर इस बारे में बात कर मन हलका कर लेती. लेकिन उसे भी हिदायत देती कि वह मम्मीपापा से कुछ न बताए.
स्मृति सिंह और पति के संबंधों के बारे में जान कर श्वेता को जेठानी की चिढ़ और पति के रूखे व्यवहार की वजह का पता चल गया था. वह अपनी बहन की शादी देवर से कराना चाहती रही होगी. लेकिन दहेज की वजह से हो नहीं पाई होगी. अब उस की जगह श्वेता से शादी हो गई तो उसे देख कर उसे गुस्सा आता होगा. इसी वजह से वह उसे दहेज के ताने दे कर प्रताडि़त कर के अंदर की जलन निकालती है.
जब हद पार होने लगी तो श्वेता ने विरोध शुरू किया. मानेंद्र उसे घर के अंदर कर के बाहर से ताला लगा कर जाने लगा. भोपाल में मानेंद्र को स्मृति से मिलने में परेशानी महसूस हुई तो वह उसे साथ ले कर 15 दिनों के औफिशियल काम के बहाने दिल्ली चला गया. श्वेता जानती थी कि वह स्मृति के साथ गुलछर्रे उड़ाने गया है. लेकिन आंसू बहाने के अलावा वह कुछ कर नहीं सकी.
इसी तरह वक्त का चक्र चलता रहा. उसी बीच श्वेता के ससुर, जेठजेठानी कुछ दिनों के लिए भोपाल आ गए. रक्षाबंधन का त्यौहार था. श्वेता के ननदोई हरि सिंह डेडिया ने बिचौलिया बन कर राघवेंद्र सिंह के पास संदेश भिजवाया कि रक्षाबंधन का त्यौहार आ रहा है, इसलिए त्यौहार पर कुछ उपहार भिजवा दें.
इस संदेश पर श्वेता की मां सुशीला देवी ने करीब 20-25 हजार का सामान श्वेता के घर भिजवा दिया. मानेंद्र सिंह की ट्रेनिंग पूरी हो गई तो वह श्वेता को ले कर खंडवा चला गया. क्योंकि उस की पोस्टिंग वहीं हुई थी. जेल परिसर में ही उसे आवास मिला था. यहां आ कर श्वेता को थोड़ी उम्मीद बंधी कि शायद अब हालात कुछ सुधर जाएंगें. क्योंकि स्मृति यहां आने का दुस्साहस नहीं कर सकेगी. इसी के साथ उसे एक खुशखबरी यह मिली कि वह मां बनने वाली है. इस खबर ने उस की जिंदगी में एक नई उमंग भर दी.
उस ने यह बात पति मानेंद्र को बताई तो उस ने जरा भी खुशी का इजहार नहीं किया. इस के अगले दिन ही वह भोपाल चला गया. वापस आने पर जब श्वेता को उस के भोपाल जाने का पता चला तो उस ने कहा, ‘‘आप भोपाल गए थे तो मुझे भी साथ ले चलते. मैं भी मम्मीपापा से मिल लेती.’’
‘‘मैं वहां अपने ही कामों में व्यस्त था, तुम्हें साथसाथ लिए कहां घूमता फिरता.’’
लेकिन जब अगली बार मानेंद्र भोपाल जाने लगा तो श्वेता जिद कर के उस के साथ भोपाल आ गई. भोपाल में मानेंद्र खुद तो होटल में रुका, जबकि श्वेता को ड्राइवर के साथ मायके भिजवा दिया. श्वेता भले ही जिद कर के भोपाल आ गई थी, लेकिन मानेंद्र को स्मृति से मिलने से नहीं रोक पाई.
श्वेता के मन में जो छटपटाहट थी, उसी से मम्मीपापा और भाई समझ गए कि कुछ तो गड़बड़ है. उन्होंने श्वेता को खोदखोद कर पूछा भी, लेकिन मांबाप की इज्जत और मर्यादा के लिए दिल पर पत्थर रख कर वह मुसकराती रही. क्योंकि सच्चाई वह बता कर मांबाप को दुख नहीं पहुंचाना चाहती थी.
भोपाल से लौट कर श्वेता ने मानेंद्र सिंह से 2 टूक बात की तो जवाब में मानेंद्र ने कहा, ‘‘मैं स्मृति को प्यार करता हूं, इसलिए उस से नाता नहीं तोड़ सकता. तुम मेरे इस प्रेमसंबंध के पचड़े में न पड़ कर इस घर में आराम से रहो, क्योंकि तुम इस घर की मालकिन हो.’’
श्वेता ने रोते हुए कहा, ‘‘अरे कुछ तो शरम करो, अब तुम पिता बनने वाले हो. यह सब तुम्हें शोभा नहीं देता.’’
‘‘मुझे बच्चे की कोई जरूरत नहीं है. मैं चाहता हूं कि तुम इसे गिरवा दो. क्योंकि मुझे न तुम में कोई रुचि है न तुम्हारे बच्चे में.’’ मानेंद्र ने कहा.
यह बात यहीं खत्म नहीं हुई. मानेंद्र श्वेता को खंडवा की मशहूर महिला डा. ओबेजा के पास ले गया. उस ने डा. ओबेजा से श्वेता का गर्भ गिराने की बात की तो उन्होंने समझाया, ‘‘इस का यह पहला बच्चा है. इसे बड़ों का आशीर्वाद समझो. इसे गिराने से श्वेता के शरीर पर ही नहीं, दिमाग पर भी बुरा असर पडे़गा. इसलिए गर्भपात कराना ठीक नहीं है.’’
डा. ओबेजा के समझाने और अबार्शन के लिए मना करने से मानेंद्र वापस आ गया. श्वेता का गर्भपात भले नहीं हुआ, लेकिन पति के इस व्यवहार से वह अवसाद में रहने लगी थी.
अक्तूबर, 2009 में मानेंद्र के घर वाले खंडवा आए तो एक बार फिर दहेज की बात उठने लगी. इस के बाद पहले से परेशान श्वेता की परेशानी और बढ़ गई. मांबाप से बात होती ही रहती थी, लेकिन इधर श्वेता से होने वाली बातों से उन्हें लग गया कि उसे ससुराल में दहेज को ले कर परेशान किया जा रहा है.
ससुराल वालों की बातचीत से श्वेता समझ चुकी थी कि मानेंद्र सिंह से उस की शादी सिर्फ इसलिए की गई थी कि वह बहुत सारा पैसा और सोना ले कर आएगी. श्रद्धा की बहन स्मृति उतना दहेज नहीं ला सकती थी, इसलिए उस से मानेंद्र की शादी नहीं की गई थी.
श्वेता की ससुराल में दहेज को ले कर कहासुनी चल ही रही थी कि उसी बीच एक दिन राघवेंद्र सिंह बेटे पीयूष के साथ उस से मिलने खंडवा आ पहुंचे. उन्हें भी दहेज को ले कर काफी बातें सुनाई गईं. उसी के साथ एक नई मांग रख दी गई कि पहले उन्होंने जो बोलेरो जीप दी थी, उसे तो मोहन सिंह इस्तेमाल कर रहे थे. इसलिए दामाद मानेंद्र सिंह के लिए वह एक नई बोलेरो जीप और खरीद कर दें.
राघवेंद्र सिंह ने कहा कि उन्होंने पहली ही गाड़ी बैंक से लोन ले कर खरीदी थी. अभी वह उस की ही किस्ते नहीं भर पाए हैं. ऐसे में दूसरी गाड़ी देना अभी उन के वश में नहीं है. कुछ समय बाद देखेंगे.
इस तरह समझाबुझा कर बापबेटे भोपाल लौट आए. श्वेता को भी दिलासा दिया कि जल्दी ही सब ठीक हो जाएगा. मां बनते ही उस का रुतबा बढ़ जाएगा.
लेकिन श्वेता के लिए कुछ भी नहीं बदला. जितने दिन पूरा परिवार वहां रहा, रोजाना कोई न कोई नया बखेड़ा खड़ा करता रहा. दिन भर ताने दिए जाते. उसे ही नहीं, मांबाप और भाइयों को भी अपशब्द बोले जाते.
राघवेंद्र सिंह जब बेटे के साथ श्वेता से मिलने आए थे तो उस की ससुराल वालों ने स्पष्ट कह दिया था कि अगर वह मानेंद्र के लिए नई गाड़ी नहीं देते तो बेटी को तलाक दिला कर अपने साथ ले जाएं. रही बात प्रेग्नेंसी की तो अभी ज्यादा समय नहीं हुआ है, चाहे तो अबार्शन करवा दें.
राघवेंद्र सिंह ने सोचा था कि उन के समझानेबुझाने और गाड़ी देने के बाद हालात सुधर जाएंगे. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. अब एक नया खेल शुरू हो गया. श्वेता को प्रताडि़त करने के लिए उसे दुख पहुंचाने वाले एसएमएस भेजे जाने लगे. इसी के साथ उसे परेशान करने के दूसरे नएनए तरीके उपयोग में लाए जाने लगे. बातें तो ऐसी कही जातीं कि श्वेता से सुनी नहीं जातीं.
सहनशक्ति की भी एक सीमा होती है. धीरेधीरे वह सीमा खत्म हो रही थी. परेशान श्वेता डिप्रेशन में रहने लगी. उसी सब का नतीजा था कि 17 दिसंबर, 2009 की शाम 6 बजे श्वेता ने फांसी लगा कर जान दे दी. इस तरह एक जवान, सुंदर और पढ़ीलिखी लड़की दहेज की बलि चढ़ गई.
पुलिस के पहुंचने तक लाश उतारी जा चुकी थी. उसे अस्पताल ले जाने की भी कोशिश की गई, लेकिन पता चला कि वह मर चुकी है, इसलिए उसे अस्पताल नहीं ले जाया गया. सारी स्थितियां संदेह पैदा कर रही थीं. पुलिस ने शव को कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया था.
सूचना पा कर राघवेंद्र सिंह भी बेटों के साथ खंडवा पहुंच गए थे. उन्हीं की शिकायत पर जेल अधीक्षक मानेंद्र सिंह, तहसीलदार पिता मोहन सिंह, पटवारी भाई जागेंद्र सिंह, आबकारी विभाग में उपनिरीक्षक भाभी श्रद्धा सिंह और रिश्ते में भाई एवं ननदोई हरि सिंह डेडिया के खिलाफ दहेज प्रताड़ना एवं दहेज प्रतिबंधात्मक अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था.
इस मामले में श्रद्धा सिंह की बहन स्मृति सिंह को भी शामिल किया गया था. जिस के अनैतिक प्रेमसंबंध की वजह से श्वेता जिंदगी से आजिज आ गई थी.
केस अदालत में पहुंचा. अभियोजन की ओर से 45 गवाह तो बचाव पक्ष की ओर से 13 गवाह पेश हुए.
शुरू में इस मामले की सुनवाई जज श्रीमती अशिता श्रीवास्तव ने की. उन का तबादला हो गया तो इस मामले की सुनवाई जज अक्षय कुमार द्विवेदी ने की. उन्होंने ही इस मुकदमे का फैसला सुनाया.
बचाव पक्ष की ओर से मुख्य गवाह थे डीआईजी (जेल) उमेश गांधी, आईएएस अधिकारी, कुछ मित्र, गार्ड और नौकर. जबकि अभियोजन पक्ष की ओर से 45 गवाह थे, लेकिन उन में मुख्य गवाह थे राघवेंद्र सिंह, उन की पत्नी सुशीला देवी, बेटा पीयूष, राघवेंद्र सिंह के एक सहयोगी सुधीर सिंह तथा श्वेता की सहेली भावना पाटीदार. पोस्टमार्टम करने वाले डाक्टर के अलावा लेडी डा. ओबेजा भी शामिल थीं, जिन्होंने श्वेता का अबार्शन करने से मना किया था.
डा. ओबेजा की गवाही इस मुकदमें में इसलिए महत्वपूर्ण थी, क्योंकि इस से पता चलता था कि पति मानेंद्र सिंह नहीं चाहता था कि श्वेता मां बने. क्योंकि बच्चा न होने पर उसे श्वेता को छोड़ने में आसानी रहती. गवाही के दौरान श्वेता की सहेली भावना पाटीदार घबरा रही थी या दबाव में थी, इसलिए थोड़ा विचलित नजर आ रही थी. लेकिन अपनी गवाही में उस ने स्वीकार किया कि श्वेता अकसर पति, ससुर, जेठजेठानी और हरि सिंह के बुरे रवैये की शिकायत करती रहती थी. उन की ससुराल वाले उसे दहेज के लिए परेशान करते थे. उस के पिता को भिखारी कह कर अपमानित करते थे.
सुशीला देवी ने बताया था कि ससुराल में श्वेता को दहेज के लिए ताने दिए जाते थे. मानेंद्र उसे घर में बंद कर के बाहर से ताला लगा कर चला जाता था. रात भर वह घर में अकेली पड़ी रहती थी. जिन दिनों खंडवा में पूरा परिवार रह रहा था, रात में श्वेता को घर से बाहर कर के सब लोग अंदर से सिटकनी बंद कर लेते थे. तब श्वेता को बाहर बरमादे में सोना पड़ता था. ससुराल वालों का कहना था कि उसे कम से कम 50 तोले सोना तो ले ही आना चाहिए था.
पिता राघवेंद्र सिंह और भाई पीयूष ने गवाही के दौरान बताया था कि उन से एक और बोलेरो जीप की मांग की गई तो उन्होंने देने में असमर्थता व्यक्त की थी. तब उन से कहा गया था कि वह बेटी को तलाक दिला कर घर में बैठा लें. उन्हें बच्चे की भी जरूरत नहीं है. इसलिए बेटी का अबार्शन करवा दें. पीयूष ने यह भी बताया था कि श्वेता की जेठानी बातबात पर ताना देती थी.
जिन दिनों मानेंद्र भोपाल में थे, 15 दिनों के लिए दिल्ली गए थे. उन्होंने वहां एक मकान किराए पर लिया था. पता चला कि उस मकान में वह अपनी पत्नी के साथ ठहरे थे. मकान मालिक बलवीर सिंह को श्वेता की फोटो दिखाई तो उस ने बताया कि यह उस की पत्नी नहीं है.
इस के बाद स्मृति सिंह की फोटो दिखाई गई तो उस ने कहा कि उस के मकान में मानेंद्र की पत्नी के रूप में यही औरत रह रही थी. बलवीर सिंह की गवाही से मानेंद्र और स्मृति के अवैध संबंधों की सच्चाई सामने आ गई थी.
इसी तरह भोपाल के न्यू मार्केट स्थित होटल कालिंदी के अटेंडेंट गोवर्धन सिंह ने स्मृति सिंह का फोटो देख कर अपनी गवाही में बताया था कि जब मानेंद्र सिंह उस के होटल में ठहरा था तो यही औरत उस की पत्नी के रूप में उस के साथ ठहरी थी. तब मानेंद्र सिंह ने होटल के रजिस्टर में उस का नाम नेहा सिंह लिखा था. राघवेंद्र सिंह के सहयोगी सुधीर सिंह की गवाही भी मांबाप को आने वाले फोन पर आधारित थी.
सरकारी वकील दीपक कुर्रे तो इस केस को देख ही रहे थे, उन की मदद के लिए राघेवंद्र सिंह ने 2 वकील और कर रखे थे. बचाव पक्ष की ओर से भी 2 वकील थे. उन की मदद के लिए इंदौर के सीनियर वकील जय सिंह मांडलोई को बुलाया गया था. बचाव पक्ष के वकीलों ने अपने मुवक्किलों को बचाने की कोशिश तो बहुत की, पर अकाट्य साक्ष्यों के आगे उन की एक न चली और आरोपियों को उन के किए की सजा मिल ही गई.
सजा पाए आरोपियों में मानेंद्र सिंह इस समय दमोह की जेल में जेल अधीक्षक थे तो उन के पिता मोहन सिंह हरदा में तहसीलदार थे. बड़े भाई जागेंद्र सिंह रीवां में पटवारी थे और उन की पत्नी श्रद्धा सिंह भिंड में आबकारी विभाग में उपनिरीक्षक थीं. हरि सिंह डेडिया इंदौर में रेवेन्यू व प्रौपर्टी के कार्य से जुड़े थे.
फैसला सुन कर पांचों आरोपी स्तब्ध रह गए थे. उन्हें यकीन ही नहीं हो रहा था कि उन्हें सजा हो चुकी है. क्योंकि पैसों और रसूख के घमंड में चूर वे सभी लोग भ्रम में थे कि कानून के हाथ उन तक पहुंच नहीं पाएंगे. लेकिन इंसाफ की विजय हो ही गई.
श्रद्धा सिंह को जब 7 साल की सश्रम कारावास की सजा सुनाई गई तो वह जोरजोर से रोने लगी.
महिला सिपाही उसे कस्टडी में लेने लगीं तो वह उन पर गरज पड़ी. अपनी बहन की खातिर उस ने श्वेता को आत्महत्या के लिए मजबूर किया था.
श्वेता के ससुर मोहन सिंह को 10 साल की सश्रम कारावास की सजा सुनाई गई थी. लेकिन सजा होने के बावजदू उन में अकड़ कायम थी. कस्टडी में होने के बावजूद वह पुलिसकर्मियों को खुद से दूर चलने के लिए धमका रहे थे.
मीडिया वालों को भी थप्पड़ मारने के लिए कह रहे थे. फैसले के बाद पांचों मुलजिमों को खंडवा जेल भेज दिया गया था. विडंबना तो देखिए, कभी जिस जेल का मानेंद्र सिंह अधीक्षक था, आज उसी में कैदी के रूप में सजा काट रहा है.
फैसला सुन कर श्वेता के परिवार वालों की आंखें खुशी से भर आई थीं. राघवेंद्र सिंह ने कहा, ‘‘बेटी की मौत का दुख तो सारी उम्र रहेगा, क्योंकि इस शादी में हम ने अपनी बहुत प्यारी बेटी को खोया है. लेकिन इस बात से सुकून मिला है कि उसे मौत तक पहुंचाने वालों को उन के किए की सजा मिल गई है. इस से न्याय और न्यायपालिका में आस्था बढ़ी है. इस से लोगों को सबक मिलेगा कि वे किसी की बेटी को बेवजह परेशान नहीं करेंगे. जज साहब के इस फैसले से बहुत सी बेटियों के दुखी मातापिता को सुख और तसल्ली मिलेगी.’’ Dowry Murder Case
— कथा अदालत द्वारा आए फैसले और श्वेता के पिता राघवेंद्र सिंह से बातचीत पर आधारित.
— मनोहर कहानियां, 2014 में प्रकाशित






