Kanpur Crime Story. यासमीन को पाने के लिए नसीम ने शादी का वादा तो कर लिया, लेकिन जब वह उस पर शादी के लिए दबाव बनाने लगी तो नसीम उस से छुटकारा पाने की राह खोजने लगा…
जून महीने की 12 तारीख की शाम को अचानक एकदम से आसमान काला हुआ और बारिश के साथ ऐसी आंधी आई कि सड़कों और छतों पर लगे बैनरपोस्टर ही नहीं, न जाने कितने पेड़, बिजली के खंभे और दीवारें तक गिर गईं. किसी तरह का हादसा न हो, इस से बचने के लिए बिजली विभाग ने आंधी आने से पहले ही बिजली काट दी थी.
जिस समय तेज आंधी के साथ बरसात हो रही थी, उसी समय यासमीन के मोबाइल फोन की घंटी बजी. फोन पर क्या बात हुई, यह तो उस की छोटी बहन शाहीन नहीं सुन सकी, लेकिन फोन कटने के बाद यासमीन ने यह जरूर बता दिया कि फोन नसीम का था. आंधीपानी बंद हुआ तो उस ने शाहीन से कहा, ‘‘मेरा सिर दर्द कर रहा है. मैं बाजार दवा लेने जा रही हूं. अगर बारिश तेज होने लगी तो फिर दवा लेने नहीं जा पाऊंगी.’’
इतना कह कर यासमीन ने नकाब ओढ़ा और घर से बाहर निकल गई. जिस समय वह घर से निकली थी, उस समय 5 सवा 5, बज रहे थे. दवा लाने में ज्यादा से ज्यादा आधा घंटा लगता. लेकिन यासमीन गई तो फिर लौट कर नहीं आई. रात 9 बजे यासमीन का बाप नूर अहमद और भाई नौशाद घर आया तो यासमीन की बहनों ने जब उस के वापस न आने की बात बताई तो बापबेटे परेशान हो उठे. उन्होंने उसे फोन किया तो फोन बंद होने की वजह से बात नहीं हो सकी.
बापबेटे उस की तलाश में लग गए. लेकिन उस का कुछ पता नहीं चल रहा था. यासमीन की मां कौसरजहां इलाहाबाद गई थी. उसे भी यासमीन के गायब होने की सूचना दे दी गई. इधर बापबेटे यासमीन की तलाश में लगे थे, उधर रात 11 बजे कानपुर की बाकरगंज बाजार का चौकीदार कल्लू उर्फ ठाकुर दुकानें बंद होने के बाद बाजार की गश्त पर निकला तो हाजी गाजी की दुकान के सामने उसे एक बोरा पड़ा दिखाई दिया.
बोरा काफी बड़ा था, इसलिए कल्लू को हैरानी हुई कि इतना बड़ा बोरा बाहर कौन छोड़ गया? उसने बोरे को लाठी से पलट कर उस पर टार्च की रोशनी डाली तो उस में उसे पैर दिखाई दिए. इस का मतलब साफ था कि उस बोरे में लाश भरी थी. क्योंकि उस में से खून भी रिस रहा था.
लाश देख कर चौकीदार कल्लू ने शोर मचाया तो तुरंत आसपास के लोग इकट्ठा हो गए. थोड़ी ही देर में यह खबर पूरे इलाके में फैल गई. फिर तो वहां हजारों लोग जमा हो गए. चौकीदार ने फोन द्वारा इस बात की जानकारी थाना बाबूपुरवा दे दी थी, जिस से थानाप्रभारी भीमसेन पोनिया भी सबइंसपेक्टर श्रीकेस भारती, अमरेंद्र बहादुर सिंह, सिपाही प्रवीण कुमार, कैलाश बाबू और मनोज कुमार के साथ आ गए थे.
पुलिस ने बोरा खुलवाया तो उस में से एक युवती की लाश निकली. युवती नकाब पहने थी, जिस से साफ हो गया कि मृतका मुसलिम थी. उस की उम्र यही कोई 28-30 साल रही होगी. चूंकि वह मुसलमानों का ही मोहल्ला था, इस से भीमसेन ने अनुमान लगाया कि युवती इसी मोहल्ले की रहने वाली होगी.
थानाप्रभारी भीमसेन पोनिया ने लाश मिलने की सूचना उच्चाधिकारियों को भी दे दी थी. सूचना मिलते ही क्षेत्राधिकारी अविनाश सिंह डागस्क्वायड के साथ घटनास्थल पर आ गए थे. मृतका के सिर पर किसी भारी चीज से वार किया गया था, जिस से उस का सिर फट गया था. वहां से अभी भी खून बह रहा था, इस का मतलब हत्या जल्दी ही की गई थी.
मृतका के मुंह में कपड़ा ठुंसा हुआ था. उस के ऊपर पट्टी भी बंधी थी. इस के अलावा उस के हाथपैर भी बंधे थे. हत्या कहीं और कर के लाश वहां ला कर फेंकी गई थी. इस से पुलिस को लगा कि लड़की के साथ जबरदस्ती कर के हत्या की गई है. कुत्ते को लाश सुंघा कर छोड़ा गया तो वह सूंघतेसूंघते बाकरगंज चौराहे तक गया. कुत्ता जहां रुका, वहां सड़क के किनारे 2 जोड़ी चप्पलें और एक टीवी के बिल की रसीद पड़ी मिली.
कुत्ता उन्हीं चीजों के पास रुक गया था. पुलिस ने वहां मिलीं चीजों को जब्त कर लिया. घटनास्थल पर आए लोगों से लाश की शिनाख्त कराने की कोशिश की गई, लेकिन कोई भी उस की शिनाख्त नहीं कर सका. इस के बाद पुलिस ने लाश के फोटो करा कर उसे पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया.
घटनास्थल से वापस आ कर थानाप्रभारी भीमसेन पोनिया ने चौकीदार की ओर से अज्ञात के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज करा दिया. लाश जिस स्थिति में मिली थी, उस से पुलिस को पूरा विश्वास था कि मृतका के साथ सामूहिक दुष्कर्म हुआ है, इसलिए मुकदमे में सामूहिक दुष्कर्म की धारा भी लगा दी गई थी.
लाश की शिनाख्त न होने और न ही किसी युवती की गुमशुदगी दर्ज होने से पुलिस ने उस लाश की फोटो के पंफलेट छपवा कर बाकरगंज और आसपास के मोहल्ले में चस्पा करा दिए. इस के बाद कुछ लोगों ने थाने आ कर थानाप्रभारी भीमसेन पोनिया को बताया कि जिस लड़की ही फोटो पंफलेट में छपी है, वह नूर अहमद की बेटी यासमीन की फोटो लगती है.
यासमीन घर से गायब भी थी. इसलिए थानाप्रभारी ने तुरंत 2 सिपाहियों को लाश की फोटो ले कर नूर अहमद के घर शिनाख्त कराने के लिए भेजा. लेकिन सिपाहियों ने जब लाश की फोटो नूर अहमद के बेटे नौशाद को दिखाई तो उस ने फोटो को गौर से देख कर कहा कि यह फोटो उस की बहन की नहीं है.
सिपाहियों ने वापस आ कर जब यह बात थानाप्रभारी को बताई तो वह हैरान रह गए. क्योंकि बताने वालों ने पूरे दावे के साथ कहा था कि पंफलेट में छपी फोटो नूर अहमद की बेटी यासमीन की ही है और वह घर से गायब भी है.
जब तक लाश की शिनाख्त नहीं हो जाती, तब तक पुलिस जांच को आगे नहीं बढ़ा सकती थी, इसलिए थानाप्रभारी खुद पुलिस बल के साथ नूर अहमद के घर जा पहुंचे. बापबेटे को गाड़ी में बैठा कर वह पोस्टमार्टम हाउस ले गए, जहां उन्होंने बोरे में मिली लड़की की लाश नूर अहमद को दिखाई तो वह फफकफफक कर रोने लगा. उस ने स्वीकार कर लिया कि लाश उस की बेटी यासमीन की है.
लाश की शिनाख्त करा कर थानाप्रभारी भीमसेन पोनिया दोनो को थाने ले आए. थाने में जब नूर अहमद और नौशाद से पूछताछ की गई तो उन्होंने बताया कि 12 जून को वे सुबह अपनेअपने काम पर चले गए थे. उन की पत्नी कौसर जहां इलाहाबाद में रहने वाली अपनी बहन महशर जहां के यहां गई थीं. घर में यासमीन, शाहीन, आफरीन, तंजीम, फात्मा और बेटा फैजान के अलावा बूढ़ी मां कदीसन निशां थीं.
शाम 5 बजे के आसपास यासमीन सिर दर्द की दवा लेने की बात कह कर घर से निकली थी तो लौट कर नहीं आई थी.
देर रात नूर अहमद और नौशाद घर लौटे तो उन्हें यासमीन के वापस न आने का पता चला. नौशाद ने फोन किया तो उस के फोन का स्विच आफ था. इस के बाद पूरा घर यासमीन की तलाश करने लगा. लेकिन उस का कुछ पता नहीं चला.
इस के बाद नूर अहमद ने बताया कि घर से निकलने से पहले यासमीन के मोबाइल पर नसीम का फोन आया था. वह रेल बाजार का रहने वाला है. उन के घर के सामने ही उस के मामा रहते हैं. उन के यहां वह आताजाता था. लगभग एक साल से वह यासमीन को फोन कर के परेशान कर रहा था. उसी ने उस की बेटी की हत्या कर लाश वहां फेंकी होगी.
लेकिन पुलिस को नूर अहमद की इस कहानी पर विश्वास नहीं हुआ. क्योंकि जवान बेटी के गायब होने के बाद उस ने पुलिस को इस बात की सूचना नहीं दी. यही नहीं, लड़की के गायब होने के कुछ घंटे बाद ही लड़की की लाश मिलने की खबर पूरे इलाके में फैलने पर भी उस के घर का कोई भी आदमी वहां नहीं गया.
अगर गया भी रहा होगा तो उस ने यासमीन की लाश नहीं पहचानी. क्षेत्र में पोस्टर लगाए जाने पर भी वे लोग चुप बैठे रहे. यही नहीं, पुलिस ने उस के घर जा कर फोटो दिखाया, तब भी नौशाद ने उसे पहचानने से मना कर दिया. जबकि घर में मौजूद यासमीन की फोटो से लाश की फोटो काफी हद तक मेल खा रही थी.
इस से पुलिस को लगा कि कहीं इन्हीं लोगों ने तो इज्जत की खातिर यासमीन की हत्या नहीं कर दी. पुलिस को मामला औनर किलिंग का लगा तो पुलिस ने बापबेटे को हिरासत में ले लिया. मगर जब शाम को यासमीन का जनाजा जाने लगा तो पुलिस ने नूर अहमद को छोड़ दिया. जबकि नौशाद को थाने में ही बैठाए रखा गया. पुलिस के पास बापबेटे के खिलाफ कोई पुख्ता सुबूत नहीं थे, इसलिए उन्हें गिरफ्तार नहीं किया जा सका था.
रात में एसएसपी के.एस. इमैनुअल जब इस मामले की तह में गए तो उन्हें लगा कि यह औनर किलिंग का मामला नहीं है. उन्होंने नूर अहमद की उस बात को मान लिया कि इज्जत के डर से उस ने थाने जा कर न तो यासमीन की गुमशुदगी दर्ज कराई थी और न लाश की शिनाख्त की थी. इस के बाद उन्होंने थानाप्रभारी भीमसेन पोनिया को निर्देश दिया कि मृतका यासमीन और नसीम के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स निकलवा कर उस का अध्ययन करने के साथसाथ उन की लोकेशन का भी पता किया.
काल डिटेल्स से पता चला कि यासमीन के मोबाइल पर अंतिम फोन नसीम का ही आया था. शाम साढ़े 6 बजे उस का स्विच आफ हो गया था. नसीम के काल डिटेल्स से पता चला कि 7 बजे उस का भी फोन औफ हो गया था. पुलिस को नसीम पर संदेह हुआ तो उस के घर छापा मारा. वह घर से गायब था. पुलिस ने उस के फोन को सर्विलांस पर लगाया तो उस की लोकेशन इलाहाबाद के सिराथू की मिली.
पुलिस को मुखबिरों से पता चला था कि इस वारदात में नसीम के दोस्त शादाब उर्फ छोटे राजा का भी हाथ हो सकता है. पुलिस ने उस के बारे में पता किया तो वह भी फरार था. इस से पुलिस को लगा कि यासमीन की हत्या में शादाब उर्फ छोटे राजा और नसीम का ही हाथ है. तब पुलिस ने नसीम पर दबाव बनाने के लिए उस के पिता को हिरासत में लिया.
पुलिस की यह युक्ति काफी काम आई. नसीम और शादाब कानपुर वापस आ गए. इस के बाद सर्विलांस के माध्यम से पुलिस ने 19 जून, 2014 को दोनों को बाकरगंज चौराहे से गिरफ्तार कर लिया. थाने ला कर दोनों से पूछताछ की गई तो उन्होंने बिना किसी हीलाहवाली के यासमीन की हत्या का अपना अपराध स्वीकार कर लिया. इस के बाद नसीम ने यासमीन की हत्या की जो कहानी सुनाई, वइ इस प्रकार थी.
उत्तर प्रदेश के महानगर कानपुर के थाना बाबूपुरवा का एक मुसलिम बाहुल्य मोहल्ला है बाकरगंज. इसी मोहल्ले के मुंशीपुरवा महेलिया के मैदान के मकान नंबर 125/555 में किराए के दो कमरों में परिवार के साथ रहते थे नूर अहमद अंसारी. वह चप्पलें बनाने का काम करते थे. उन के परिवार में पत्नी कौसर जहां के अलावा 2 बेटे नौशाद, फैजान तथा 5 बेटियां यासमीन, शाहीन, आफरीन, तंजीम और फातिमा थीं.
नूर अहमद का परिवार बड़ा था, जबकि कमाई काफी कम थी. बच्चों में यासमीन सब से बड़ी थी. उसे तो उस ने किसी तरह हाईस्कूल तक पढ़ा दिया था, बाकी बच्चे ज्यादा नहीं पढ़ पाए. आठवीं पास कर के नौशाद कारपेंटर का काम सीख कर कमाई में पिता की मदद करने लगा था.
फिर भी नूर अहमद की इतनी कमाई नहीं थी कि वह बेटियों के लिए दहेज जुटा पाता. यही वजह थी कि शादी के लायक हो जाने के बावजूद वह यासमीन की शादी नहीं कर पा रहा था. ऐसा नहीं था कि उस के लिए रिश्ते नहीं आ रहे थे. रिश्ते तो खूब आए, पर दहेज की वजह से तय नहीं हुए. इस के अलावा यासमीन नाटे कद की भी थी. उस के चेहरे पर मुहासों के दाग भी काफी थे.
शादी तय नहीं हुई तो यासमीन ब्यूटीपार्लर का काम सीखने लगी. वह पूरी तरह जवान हो चुकी थी. ऐसे में उस के बहकने का खतरा ज्यादा था. फिर भी इस बात पर न नूर अहमद ने ध्यान दिया, न कौसर जहां ने. इसी बीच यासमीन की आंखें नसीम से लड़ गईं. इस की एक वजह यह थी कि तमाम जगहों से ठुकराई यासमीन को नसीम ने चाहत भरी नजरों से ताका था. वह रेल बाजार के फेथपुलगंज के रहने वाले सलीम का बेटा था. वह चप्पलों का कारीगर था और काफी दिन केरल में भी रह कर आया था.
नसीम से आंखें चार होने की एक वजह यह भी थी कि यासमीन के घर के सामने ही नसीम के मामू रहते थे. दोनों के घरों की छतें भी लगभग मिली हुई थीं. नसीम अक्सर अपने मामू के घर आता रहता था. इसी आनेजाने में नसीम की नजर यासमीन पर पड़ी तो वह उसे चाहत भरी नजरों से ताकने लगा. प्यार की भूखी यासमीन को नसीम का इस तरह ताकना अच्छा लगा. परिणामस्वरूप वह उसे अपना दिल दे बैठी.
यासमीन की उम्र अब प्यार में वायदे करने की नहीं, शारीरिक जरूरत पूरी करने वाली थी. इसलिए शादी का वादा करके नसीम ने शरीर की मांग की तो उस ने उसे अपना शरीर सौंप दिया. इस के लिए नसीम ने जगह भी बढि़या ढूंढ ली थी. नसीम का एक दोस्त था शदाब उर्फ छोटे राजा. वह अलग कमरा ले कर अकेला ही रहता था.
शादाब अपराधी प्रवृत्ति का था, लेकिन वह छोटेमोटे ही अपराध करता था. बाद में वह पुलिस की मुखबिरी करने लगा था. फिर भी उस के खिलाफ तमाम मुकदमे चल रहे थे. वह भले ही अपराधी प्रवृत्ति का था, लेकिन दोस्त के प्रति पूरी तरह से ईमानदार था.
नसीम शादाब उर्फ छोटे राजा के कमरे पर ही यासमीन से मिलता था. वहां हर तरह की सुविधा होने के साथसाथ किसी तरह का डर भी नहीं था. नसीम ने यासमीन से शादी का वादा जरूर किया था, लेकिन जब यासमीन शादी के लिए जोर देने लगी तो वह बहाने करने लगा.
नसीम भौंरे की तरह यासमीन का रस निचोड़ कर अब उसे गले नहीं लगाना चाहता था. इसीलिए वह उस से शादी के लिए बहाने कर रहा था. यासमीन से शादी न करने की एक वजह यह भी थी कि उस के चेहरे पर मुंहासों के दाग बहुत थे.
यासमीन को लगा कि नसीम उसे टरका रहा है तो वह उस पर शादी के लिए दबाव डालने लगी. इस की सब से बड़ी वजह यह थी कि उस की मां कौसर जहां उस के लिए अपनी बहन महशर जहां के यहां इलाहाबाद उस के लिए लड़का देख रही थी.
यासमीन नसीम को दिल से चाहती थी, इसलिए कहीं और शादी नहीं करना चाहती थी. वह नसीम पर दबाव बना नही थी कि चाहे भाग कर ही शादी करो, मगर जल्दी करो. क्योंकि उस के घर वाले अब जल्दी से जल्दी उस की शादी कर देना चाहते हैं.
उस दिन भी उस की अम्मी इलाहाबाद उस के लिए लड़का देखने गई थीं. इसलिए जब नसीम ने फोन कर के यासमीन को मिलने के लिए बुलाया तो वह यही बात बताने के लिए शादाब उर्फ छोटे राजा के कमरे पर जा पहुंची थी.
नसीम ने शादाब उर्फ छोटे राजा के साथ मिल कर पहले ही योजना बना रखी थी कि आने पर पहले वह यासमीन को समझाएगा. अगर वह मान गई तो ठीक, अन्यथा उस की हत्या कर दी जाएगी. नसीम के बुलाने पर यासमीन पहुंची तो पहले उस ने उसे समझाया. लेकिन जब यासमीन नहीं मानी तो शादाब ने उसे धक्का दे दिया.
यासमीन उस समय जीने पर खड़ी थी, इसलिए गिर पड़ी. नीचे आ कर वह बेहोश हो गई तो नसीम ने उस के मुंह में कपड़ा ठूंस कर ऊपर से पट्टी बांध दी. इस के बाद हाथपैर बांध कर उस का गला दबा दिया. सीढि़यों पर गिरने से उस का सिर फट गया था.
बिजली न होने से रात में अंधेरा था ही. जब सन्नाटा पसर गया तो लाश को बोरे में भर कर दोनों उसे मोटरसाइकिल से ले जा कर बाजार में फेंक आए. नसीम और शादाब से हुई पूछताछ में पता चला कि यासमीन के साथ उस दिन उन्होंने कोई गलत काम नहीं किया था.
पुलिस ने यासमीन का वोटर आईडी कार्ड, घड़ी और मोबाइल फोन शादाब उर्फ छोटे राजा के कमरे से बरामद कर लिया था. इस के बाद वह मोटरसाइकिल भी बरामद कर ली, जिस से उन्होंने यासमीन की लाश को ले जा कर बाजार में फेंका था. पूछताछ और बरामदगी के बाद उसी दिन पुलिस ने दोनों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.
इस घटना का खुलासा करने वाली पुलिस टीम को एसएसपी ने 5 हजार रुपए का इनाम देने की घोषणा की है. कथा लिखे जाने तक नसीम और शादाब जेल में थे. Kanpur Crime Story
— इसके बाद अदालती कार्रवाई में क्या हुआ यह ज्ञात नहीं है.
— 2014 में प्रकाशित






