Homoeopathic Doctor Fraud. होम्योपैथिक डा. कनिष्क ने बड़ा आदमी बनने के लिए जो चाल चली, उस में वह सफल तो रहा, लेकिन आखिर कब तक वह लोगों को बेवकूफ बनाता रहता. जब उस की असलियत लोगों के सामने आई तो उन्होंने जो रास्ता अख्तियार किया, शातिर डा. कनिष्क जेल पहुंच गया.
डा. कनिष्क 5 जनवरी, 2017 को शाम साढ़े 5 बजे अपने घर से यह कह कर निकले थे कि वह एक शादी में चुनार जा रहे हैं. चूंकि वह पेशे से डाक्टर थे और उन का परिचय काफी लोगों से था, इसलिए घर के किसी भी सदस्य ने उन से यह जानने की कोशिश नहीं की कि वह किस की शादी में जा रहे हैं और कब तक लौटेंगे?
लेकिन जब डा. कनिष्क देर रात तक घर नहीं लौटे तो घर वालों को चिंता हुई. कुछ जानपहचान वालों से संपर्क करने के बाद घर वाले भी इस सोच के साथ खापी कर सो गए कि हो सकता है, वह सुबह तक आ जाएं. लेकिन सुबह भी वह नहीं आए तो घर वालों की चिंता बढ़ गई. क्योंकि इस के पहले वह कहीं भी इतनी देर तक नहीं रुकते थे.
चिंता की एक बात यह भी थी कि उन का फोन भी स्विच्ड औफ था. वैसे भी वह अपनी कार से गए थे और कभी भी लौट सकते थे. डा. कनिष्क पूर्वांचल के बड़े होम्पोपैथ दवा कारोबारियों में थे. ऐसे में उन के रहस्यमय ढंग से लापता होने को ले कर जितने मुंह उतनी बातें हो रही थीं. कोई उन के अपहरण की आशंका जता रहा था तो कोई किसी अनहोनी की. 5 फरवरी की रात 6 फरवरी का दिन और रात बीत गई. डा. कनिष्क का कहीं कोई पता नहीं चला.
आखिर थकहार कर कनिष्क के पिता प्यारेलाल पटेल ने 7 फरवरी, 2017 को थाना अदलहाट जा कर भादंवि की धारा 364 के तहत अज्ञात लोगों के खिलाफ डा. कनिष्क के अपहरण की रिपोर्ट दर्ज करा दी. दूसरे दिन सभी प्रमुख अखबारों में डा. कनिष्क के अपहरण की आशंकाओं को ले कर खबरें छपीं तो पुलिस की पेशानी पर बल पड़ गए.
थानाप्रभारी अदलहाट पंकज यादव ने मुकदमा दर्ज करने के बाद डा. कनिष्क का पता लगाने के लिए अपने खास मुखबिरों को लगा दिया. इस के अलावा एसपी कलानिधि नैथानी ने चुनार के सीओ मुकेश कुमार उत्तम को डा. कनिष्क का पता लगाने के लिए टीम गठित करने को कहा.
एसपी के निर्देश पर सीओ मुकेश कुमार ने डाक्टर की तलाश के लिए चौकीप्रभारी नरायनपुर मनोज कुमार ठाकुर और सबइंसपेक्टर राजेश चौबे के नेतृत्व में एक पुलिस टीम गठित की. इस के अलावा थानाप्रभारी स्वाट व क्राइम ब्रांच विजय प्रताप को भी डा. कनिष्क की तलाश में लगा दिया गया.
पुलिस आगे की कोई दिशा तय कर पाती, उस के पहले ही मीरजापुर रेलवे स्टेशन के वाहन स्टैंड पर खड़ी एक लावारिस कार के बारे में पता चला. वह 5 फरवरी की शाम से वहां खड़ी थी. सूचना मिलने पर वहां पहुंची पुलिस ने जब कार के बारे में छानबीन की तो पता चला कि वह कार जिस का नंबर यूपी 63 जेड 2324 था, डा. कनिष्क की थी.
कार के बरामद होने के बाद पुलिस को और भी काफी कुछ पता चला. नई जानकारियों ने इस मामले को संदिग्ध बना दिया. हकीकत जानने के लिए पंकज यादव और मनोज कुमार ठाकुर ने अपनेअपने सूत्रों से डा. कनिष्क के बारे में पता लगाना शुरू किया.
जैसेजैसे जानकारियां आती गईं, वैसेवैसे दाल में काला ही नहीं, बल्कि पूरी की पूरी दाल की काली नजर आने लगी. बहरहाल, पुलिस टीम ने त्वरित काररवाई करते हुए 9 फरवरी को सुबह 10 बजे डा. कनिष्क पटेल को जनपद बांदा के राजगृह टूरिस्ट होटल से बरामद कर लिया.
होटल में वह बड़े ठाठ से रह रहा था. विवेचना के दौरान पता चला कि डा. कनिष्क कुमार ने नारायनपुर और आसपास के इलाके से 25-30 लोगों से होम्योपैथिक दवा के थोक व्यवसाय में भारीभरकम मुनाफे का सब्जबाग दिखा कर करोड़ों रुपए ले लिए थे. जब उन्होंने उस पर पैसे वापस करने का दबाव बनाया तो पता चला कि वह पैसा वापस करने की स्थिति में नहीं था.
आखिर लोगों के रोजरोज के तकाजे से छुटकारा पाने के लिए डा. कनिष्क ने अपने नजदीकी लोगों के साथ मिल कर एक अनोखी साजिश रच डाली. लेकिन उस की यह साजिश काम नहीं आई और वह पुलिस के हत्थे चढ़ गया. सच्चाई खुल जाने और पुलिस के चंगुल में फंस जाने से डा. कनिष्क ने जो कहानी बताई, वह कुछ इस तरह थी.
उत्तर प्रदेश के जिला मीरजापुर का चुनार इलाका काफी समृद्धशाली और अनेक तरह की प्राकृतिक संपदाओं वाला हराभरा क्षेत्र है. मसलन वन, पहाड़, चुनार का किला, सिद्धनाथ की दरी आदि प्रसिद्ध है. पत्थर की खदानों से ले कर ईंट कारोबार के मामले में भी इस क्षेत्र का कोई जवाब नहीं है.
इसी इलाके के अदलहाट थानांतर्गत आता है गांव नियामतपुर कलां. यहीं के निवासी हैं प्यारेलाल पटेल. उन्हें खेतीकिसानी से इतनी आय हो जाया करती थी कि उन के परिवार की जीविका ठीक से चल रही थी. उन की पत्नी सुशीला प्राथमिक विद्यालय में सहायक अध्यापिका थीं. उन्होंने अपने तीनों बेटों कनिष्क, कार्तिकेय और कोमल की शिक्षा में कोई कोरकसर नहीं छोड़ी.
बड़े बेटे कनिष्क ने डाक्टर बनने की चाहत पाल ली थी. उस की हसरत बड़ा आदमी बनने की थी. वह एमबीबीएस डाक्टर तो नहीं बन सका, अलबत्ता उस ने लखनऊ से होम्योपैथिक चिकित्सा की डिग्री जरूर ले ली.
डा. कनिष्क ने अपने घर के ही एक हिस्से में होम्योपैथिक क्लीनिक खोल कर प्रैक्टिस शुरू की. 6 महीने बाद ही कनिष्क को लगा कि गांव की जगह अगर उस की डिस्पेंसरी मेन मार्केट में होती तो उस के पास मरीज ज्यादा आते. उस ने अपने पैतृक आवास से दूर मेन मार्केट में दुकान की खोज शुरू कर दी, जहां वह मरीजों को देखने के साथ होम्योपैथिक दवाओं की फुटकर व थोक की दुकानदारी भी कर सके.
संयोग से नारायनपुर बाजार स्थित शेरपुर चौराहे के पास उसे एक खासी बड़ी दुकान मिल गई. दुकान मेन मार्केट में थी. डा. कनिष्क ने उसी में आधुनिक साजसज्जा के साथ अपनी मां के नाम से ‘सुशीला होम्यो सैंटर’ क्लीनिक खोल ली. क्लीनिक खोलने के कुछ ही दिनों बाद कनिष्क ने पड़ोसी जनपद चंदौली निवासी अनघबेन से शादी कर ली.
इसे संयोग ही कहेंगे कि डा. कनिष्क की पत्नी भी होम्योपैथिक डाक्टर थीं और चंदौली के जिला अस्पताल में कार्यरत थीं. बाद में डा. कनिष्क का छोटा भाई कार्तिकेय भी बडे़ भाई की दवा की दुकान पर समय देने लगा. डा. कनिष्क जहां मरीजों को देखा करते थे, वहीं कार्तिकेय होम्योपैथिक दवा की फुटकर दुकानदारी संभालता था.
कनिष्क का सब से छोटा भाई लखनऊ में रह रहा था. डा. कनिष्क चाहते थे कि उन का बिजनैस मीरजापुर जनपद के अलावा आसपास के जनपदों में भी फैले. इस के लिए जरूरी था कि वह होम्योपैथिक दवा बनाने वाली किसी बड़ी कंपनी की होलसेल एजेंसी ले लें या फिर डीलर के रूप में काम करें. पर इस के लिए काफी मोटी रकम की जरूरत थी, जो उन के पास नहीं थी. कारोबार बढ़ाने के लिए डा. कनिष्क ने शुरूशुरू में अपने कुछ खास लोगों से बात कर के उन्हें शीशे में उतारने का काम किया. कनिष्क ने उन्हें समझाया कि दवाओं के क्षेत्र में चाहे वह एलोपैथिक दवा हो या होम्योपैथिक या आयुर्वेद की दवाएं, सभी पर जो एमआरपी लिखी होती है, दवा दुकानदारों को वह न्यूनतम 30 से 45 प्रतिशत कम रेट पर मिलती हैं.
उन दवाओं को वह फुटकर दुकानदारों को एमआरपी रेट से बेचते हैं. कुछ ऐसे लोग डा. कनिष्क के झांसे में आ गए, जिन्हें उन्होंने यह आश्वासन दिया कि वह दवाओं की थोक खरीद में जितनी पूंजी का निवेश करेंगे, दवाओं की ब्रिकी के बाद उस पूंजी पर उन्हें उन की ओर से 15 से 20 प्रतिशत मासिक ब्याज के रूप में मिलेगा. वे जब चाहे क्लीनिक में आ कर अपनी पूंजी से खरीदी गई दवाओं का स्टाक देख सकते हैं.
डा. कनिष्क के इस बहकावे में तमाम लोग आ गए. उन्होंने ज्यादा से ज्यादा कमाने के लालच में घर और बैंक में रखा पैसा निकाल कर कनिष्क के हवाले कर दिया. डा. कनिष्क ने भी होम्योपैथिक दवा बनाने वाली देश की जानीमानी कंपनी एसबीएल की एजेंसी ले ली और पूर्वांचल में बड़े पैमाने पर दवाओं की आपूर्ति करने का काम शुरू कर दिया. डा. कनिष्क ने व्यवसाय के नाम पर अपने धंधे में जिन लोगों से मोटी रकम लगवाई थी, महीना बीतने पर वह उन्हें ब्याज के रूप में किसी को 2 हजार तो किसी को 3 हजार रुपए यह कह कर दे देता था कि जितने की दवाएं बिकी हैं, उसी हिसाब से आप को रुपया दे रहा हूं.
शुरुआत में तो दवा व्यवसाय में पूंजी निवेश करने वाले लोग डा. कनिष्क की चालाकी समझ नहीं पाए, लेकिन जब 5-7 महीने बीतने के बाद उन की मिलने वाली रकम बढ़ने के बजाय कम होने लगी तो उन्हें शक हुआ. इसी दौरान डा. कनिष्क को मोटी रकम देने वाले 2-4 लोग उन से अपना पैसा मांगने लगे. इस पर डा. कनिष्क ने उन से कहा कि उस के पास नकद रुपए नहीं हैं, सारी रकम दवाओं में फंसी हैं. जैसेजैसे दवा बिकेंगी, पैसे मिल जाएंगे.
इस घटना से लगभग 2 साल पहले इलाज के दौरान चुनार परसोधा, सहसपुरा निवासी गोपनाथ सिंह के बेटे दिनेश सिंह की मुलाकात डा. कनिष्क से हुई थी. तब डाक्टर ने दवाओं के धंधे में होने वाली बेहिसाब कमाई का सब्जबाग दिखा कर उन्हें भी अपने जाल में फांस लिया था. दिनेश सिंह की माने तो डा. कनिष्क ने उन्हें बताया था कि वह जितनी भी रकम दवा के धंधे में निवेश करेंगे, उन्हें निवेश की हुई रकम पर कम से कम 15 प्रतिशत की दर से हर माह फायदा होगा.
विशेष परिस्थितियों में कुछ खास दवाओं पर यह फायदा 20 प्रतिशत भी हो सकता है. दिनेश सिंह कनिष्क के झांसे में आ गए और कुछ महीनों में ही उन्होंने हर महीने मोटी कमाई के लालच में करीब 40 लाख रुपए डा. कनिष्क के दवा व्यवसाय में लगा दिए.
दिनेश सिंह द्वारा दी गई ज्यादातर रकम बैंकों के माध्यम से डा. कनिष्क के बैंक औफ बड़ौदा की नारायनपुर शाखा के खाता संख्या 28230500000824 में जमा की गई थी. डा. कनिष्क 3-4 महीने तक दिनेश सिंह को 15 से 20 प्रतिशत की दर से फायदा देने की जगह 15 से 20 हजार रुपए ही पकड़ाते रहे. डा. कनिष्क दिनेश को आश्वासन देते रहे कि दवा की थोक सप्लाई में पैसे फंसे हुए हैं. जैसे ही पैसे आएंगे, उन्हें ब्याज सही दर से मिल जाएगा. लेकिन समय बढ़ता रहा और वह दिन कभी नहीं आया. दिनेश को अब तक इस बात की भनक लग चुकी थी कि डा. कनिष्क ने उन से ही नहीं, उन की तरह दर्जनों लोगों से लाखों की रकम ले रखी है और मांगने पर वापस नहीं कर रहे हैं.
दिनेश सिंह ने भी अपनी दी हुई 40 लाख रुपए की रकम वापस करने के लिए जब कनिष्क पर दबाव बनाया तो उस ने दिनेश सिंह को 3 फरवरी को 30 लाख रुपए देने का वादा किया. लेकिन जब पैसा खाते में नहीं आया तो दिनेश ने उसे फोन कर पूछा, ‘‘भाई आप ने कहा था कि पैसा खाते में डाल रहा हूं, लेकिन पैसा तो खाते में आया ही नहीं है.’’
‘‘अरे नहीं भाई, मैं ने तो पैसे जमा करा दिए हैं, मेरे खाते से पैसा भी जा चुका है. ऐसा कैसे हो सकता है?’’ घबराहट भरे अंदाज में कनिष्क ने कहा, ‘‘मैं ने आप के पीएनबी वाले खाते में 10 लाख तथा आईसीआईसीआई वाले खाते में 5 लाख रुपए आरटीजीएस द्वारा भेजे हैं. जिस का मेरे मोबाइल पर मैसेज भी आया हुआ है. अगर विश्वास न हो रहा हो तो मैं वह स्लिप आप के मोबाइल पर अभी मैसेज किए देता हूं.’’
इतना कह कर डा. कनिष्क ने दिनेश के मोबाइल पर खाते से पैसा ट्रांसफर होने पर जो मैसेज उस के मोबाइल पर आया था, भेज दिया.
डा. कनिष्क द्वारा भेजी गई आरटीजीएस स्लिप और मोबाइल मैसेज देख कर दिनेश को शक हुआ. उस ने बैंक जा कर जब अपने खाते में पैसों के बाबत पता किया तो पता चला कि शाम 5 बजे तक उस के खाते में कोई पैसा नहीं आया था. इस पर दिनेश सिंह ने कनिष्क से तल्ख शिकायती लहजे में कहा, ‘‘यार, तुम कह रहे हो कि पैसा डाल दिया है. जबकि एकाउंट में कोई पैसा नहीं आया है. मैं किस की मानूं, तुम्हारी या बैंक की?’’
दिनेश का इतना कहना था कि कुछ ही देर में डा. कनिष्क दिनेश सिंह के परसोधा स्थित खेत पर आ पहुंचा और जेब से कुछ निकाल कर दिनेश के हाथ पर रखते हुए बोला, ‘‘लीजिए, मैं ने आरटीजीएस कर दिया है, यह रही उस की स्लिप.’’ चूंकि दिनेश को कनिष्क के हावभाव देख कर शक हुआ कि कुछ गड़बड़ जरूर है, दिनेश ने कनिष्क द्वारा दी गई स्लिप गौर से देखी तो उसे पहली ही नजर में फर्जीवाड़ा दिख गया.
दरअसल, कनिष्क ने उस के 2 खातों में पैसा भेजे जाने की जो स्लिप दी थी, उस में से एक स्लिप पीएनबी की थी, जबकि दूसरी आईसीआईसीआई की थी, जिन में काफी समानता थी. पीएनबी खाता नंबर में जहां आखिरी 214 था. उस की जगह 148 लिखा हुआ था. इसी तरह आईसीआईसीआई का खाता नंबर के आईएफएससी कोड के अंत में 3 की जगह 9 बना दिया गया था.
इस के बाबत दिनेश ने कनिष्क से कहा, ‘‘क्यों बेवकूफ बना रहे हो?’’ कनिष्क तपाक से बोला, ‘‘यार दिनेश, गलती हो गई. मैं 7 फरवरी को पैसा दे दूंगा.’’
7 फरवरी को दिनेश को पैसा मिल पाता, इस से पहले ही डा. कनिष्क रहस्यमयढंग से गायब हो गया है.
डा. कनिष्क का होम्योपैथिक दवा का कारोबार मीरजापुर, वाराणसी से होते हुए पूर्वांचल के कई जनपदों तक फैला था. बताया जाता है कि दवा व्यवसाय और स्कीम के नाम पर उस ने 20 से 30 लोगों से मोटी रकम ले रखी थी. कही गई बातों को सच माना जाए तो कनिष्क ने लोगों से दवा कारोबार के नाम पर करीब 550 लाख रुपए ले रखे थे.
कारोबार बढ़ने के साथ कनिष्क के ऊपर कर्ज का बोझ भी बढ़ने लगा था. बड़ा आदमी बनने की चाहत और कर्ज से बचने के लिए उस ने कड़ी मेहनत के बजाय शार्टकट रास्ता ढूंढा और उस के दिमाग में एक शातिराना साजिश ने जन्म लेना शुरू किया. उसी को अमली जामा पहनाते हुए साजिश के तहत 5 फरवरी को वह गायब हो गया, ताकि लोग समझे कि उस का अपहरण हो गया है.
लेकिन पुलिस उस से भी तेज निकली. डाक्टर के परिवार के सदस्यों के मोबाइल नंबर को टे्रस करते हुए उस के बारे में पता लगाना शुरू किया तो उस का भेद खुल गया.
दरअसल, कनिष्क 5 फरवरी को अपनी कार से कहीं जाने के बजाय सीधे मीरजापुर रेलवे स्टेशन पहुंचा और वहां पार्किंग में अपनी कार को लौक कर के छोड़ दी. इस के बाद अपना मोबाइल स्विच औफ कर के कार में छोड़ दिया और बस पकड़ कर इलाहाबाद चला गया, जहां रात को वह जीरो रोड स्थित एक होटल में ठहरा.
सुबह वह बांदा के लिए रवाना हो गया. बांदा पहुंच कर उस ने वहीं से शाम को दूसरे नंबर से अपने घर वालों से मोबाइल पर बात कर के स्वयं के अपहरण की अफवाह फैलाने और फर्जी मुकदमा लिखाने को कहा, ताकि लोगों को शक न होने पाए. उस का इरादा था कि अगर लोग उस के अपहरण की बात सच मान लेंगे तो वह कह देगा कि वह करोड़ों की फिरौती दे कर छूटा है.
सीओ मुकेश कुमार उत्तम ने जब डा. कनिष्क को मीडिया के सामने पेश किया तो उस ने खुद ही सब कुछ बता दिया. उस के मुताबिक उस ने कई लोगों से होम्योपैथिक दवाओं के व्यवसाय के नाम पर करोड़ों रुपए ले रखा था. लाभ होता न देख जब लोगों ने पैसे मांगने शुरू किए तो वह बहाने बनाने लगा. इन में चुनार कोतवाली क्षेत्र के परसोधा, सहसपुरा गांव निवासी दिनेश सिंह प्रमुख थे.
डा. कनिष्क के पकड़े जाने के बाद दिनेश सिंह की लिखित तहरीर पर अदलहाट थाना पुलिस ने उस के खिलाफ भादंवि की धारा 406, 419, 420, 467, 468 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया. कनिष्क द्वारा अपना अपराध स्वीकार कर लेने के बाद उसे सक्षम न्यायालय में पेश किया गया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. कहानी लिखे जाने तक उस की जमानत नहीं हो पाई थी. कनिष्क ने जिन लोगों से पैसे लिए हैं, उन में आनंद गुप्ता, जयकुमार सिंह, विजय सिंह, बब्बू, आशीष पटेल, जितेंद्र सिंह, बबलू, अमित गुप्ता, सत्यप्रकाश, इंद्रकेश सिंह, अजय सिंह, उदय सिंह, धर्मेंद्र जायसवाल, रूपेश जायसवाल, विनीत सिंह, प्रशांत पटेल, आदेश जायसवाल, इच्छा लाल, शानू गुप्ता शामिल हैं.
जालसाजी करने और स्वयं के अपहरण की झूठी कहानी गढ़ने के आरोप में जेल में बंद डा. कनिष्क कुमार पटेल के छोटे भाई कार्तिकेय कुमार सिंह को भी अदलहाट पुलिस ने शुक्रवार 17 मार्च, 2017 को उस के घर से गिरफ्तार कर लिया. बड़े भाई डा. कनिष्क कुमार की तर्ज पर उस ने भी दवा व्यापार के नाम पर लाखों रुपए की हेराफेरी की थी.
पुलिस ने यह काररवाई चुनार कोतवाली क्षेत्र के बघेड़ी गांव निवासी जगत सिंह की शिकायत पर की है. पुलिस को दी गई तहरीर में उन्होंने लिखा है कि दवा कारोबार में मुनाफा देने के नाम पर कार्तिकेय ने उन से 17 लाख रुपए लिए थे.
कनिष्क के पकड़े जाने पर जब उन्होंने अपने पैसे वापस करने की बात कहीं तो वह इनकार करने लगा. दबाव बढ़ाने पर कार्तिकेय ने चेक दिया, जिसे एकाउंट में जमा किया गया तो पता चला कि उस में पैसा ही नहीं है.
इस पर उन्होंने 15 मार्च को अदलहाट थाना में तहरीर दे कर काररवाई की गुहार की. तभी से पुलिस कार्तिकेय के पीछे लगी थी, लेकिन वह पुलिस को चकमा देता फिर रहा था. आखिर 17 मार्च को वह पुलिस के हाथ लग ही गया. कार्तिकेय को जेल भेज कर अदलहाट थानाप्रभारी ने बताया कि धोखाधड़ी और जालसाजी के इस खेल में और भी शातिर खिलाड़ी शामिल हैं, जिन के बारे में पुलिस जांच कर रही है. उन्होंने बताया कि दोनों भाइयों ने अब तक तकरीबन 30 लोगों को अपने जाल में फांसा था, जिन में अब तक काफी लोगों के नाम सामने आ चुके हैं. लेकिन अभी और भी बहुत सी परतें खुलनी बाकी हैं. Homoeopathic Doctor Fraud
— इसके बाद अदालती कार्रवाई में क्या हुआ यह ज्ञात नहीं है.
— 2017 में प्रकाशित






