High Profile Murder Case : मौजमजा बन गया सजा

High Profile Murder Case. डा. अशोक कुमार ने दोस्त की पत्नी के लिए जो बात कही थी, वह दोस्त को इतनी बुरी लगी कि उस ने दोस्ती का खयाल न कर के अन्य दोस्तों के साथ मिल कर उसे ठिकाने लगा दिया. 

गोरखपुर के अपर सत्र न्यायाधीश (विशेष) अनुसूचित जाति/जनजाति श्री सुरेंद्र कुमार यादव की अदालत में एक बहुत ही चर्चित मामले का फैसला सुनाया जाने वाला था, इसलिए उस दिन अदालत में मीडिया वालों के साथसाथ आम लोगों की कुछ ज्यादा ही भीड़ थी.  दरअसल हत्या के जिस मामले का फैसला सुनाया जाना था, उस मामले में मृतक डा. अशोक कुमार कोई मामूली आदमी नहीं थे. वह कांगे्रस के जानेमाने नेता और हरियाणा के राज्यपाल रहे स्व. महावीर प्रसाद के दामाद थे. उस भीड़ में मृतक डा. अशोक कुमार के ही नहीं, उन की हत्या के आरोपी अविनाश चौहान, शरीफ अहमद, डा. सुनील आर्या और बलदाऊ यादव के घर वाले भी मौजूद थे.

सरकारी वकील इरफान मकबूल खान ने जहां चारों अभियुक्तों को हत्या का दोषी ठहरा कर कठोर से कठोर सजा देने की मांग की थी, वहीं बचाव पक्ष के वकील का कहना था कि उन के मुवक्किलों को गलत तरीके से फंसाया गया है. पुलिस ने जो सुबूत पेश किए हैं, वे घटना एवं घटनास्थल से मेल नहीं खाते, उन के मुवक्किल निर्दोष हैं, जिस से उन्हें बरी किया जाए.

इस हत्याकांड का फैसला जानने से पहले आइए इस हत्याकांड के बारे में जान लें, जिस से फैसला जानने में थोड़ी आसानी रहेगी.

जिन डा. अशोक कुमार की हत्या के मुकदमे का फैसला सुनाया जाना था, वह उत्तर प्रदेश के जिला गोरखपुर की कोतवाली शाहपुर की पौश कालोनी आवासविकास के मकान नंबर बी-88 में रहने वाले सबइंस्पेक्टर के पद से रिटायर हुए दूधनाथ के 3 बेटों में सब से बड़े बेटे थे.

दूधनाथ सरकारी नौकरी में थे, इसलिए उन्होंने अपने सभी बच्चों की पढ़ाईलिखाई पर खास ध्यान दिया था. इसी का नतीजा था कि उन के बड़े बेटे अशोक कुमार का चयन सीपीएमटी में हो गया था. कानपुर के गणेशशंकर विद्यार्थी मैडिकल कालेज से एमबीबीएस करने के बाद नेत्र चिकित्सा में विशेष योग्यता हासिल करने के लिए वह दिल्ली स्थित आल इंडिया इंस्टीट्यूट आफ मैडिकल साइंसेज चले गए थे.

एम्स से एमएस करने के बाद डा. अशोक कुमार ने दिल्ली के आई केयर सेंटर में नौकरी कर ली. वहां से ठीकठाक अनुभव प्राप्त कर के वह गोरखपुर आ गए और गोरखपुर के शाहपुर में नेहा आई केयर सेंटर के नाम से अपना खुद का अस्पताल खोल लिया.

जल्दी ही डा. अशोक कुमार की गिनती गोरखपुर के मशहूर नेत्र विशेषज्ञों में होने लगी, जिस से शोहरत भी मिली और पैसा भी आया. फिर दोस्तों की भी संख्या बढ़ने लगी. लेकिन उन की सब से ज्यादा घनिष्ठता थी डा. सुनील आर्या से. इस की एक वजह यह थी कि डा. सुनील आर्या उन के किशोरावस्था के दोस्त थे. इस के अलावा दोनों एक ही पेशे से जुड़े थे, फिर दोनों के स्वभाव भी एक जैसे थे. डा. सुनील आर्या मैडिकल कालेज में प्रोफेसर थे.

डा. अशोक कुमार डाक्टरी की पढ़ाई कर रहे थे, तभी गोरखपुर की तहसील बांसगांव के गांव उज्जरपार के रहने वाले कांगे्रस के कद्दावर नेता महावीर प्रसाद ने अपनी छोटी बेटी निर्मला की शादी उन से कर दी थी. उन की सिर्फ 2 ही बेटियां थीं. बड़ी बेटी का ब्याह उन्होंने गोरखपुर के दाउदपुर के रहने वाले जयराम कुमार के साथ किया था. वह सिंचाई विभाग में अधिशाषी अभियंता थे.

शादी के बाद महावीर प्रसाद ने दोनों ही बेटियों को उपहार में एकएक गैस एजेंसी दी थी. विमला की गैस एजेंसी महाराजगंज में थी, जबकि निर्मला की गैस एजेंसी उन के बेटे हिमांशु के नाम से गोरखपुर के राप्तीनगर के मोहल्ला चकसा हुसैननगर में थी.

10 जुलाई, 2001 की रात साढ़े नौ बजे के करीब डा. अशोक कुमार गैस एजेंसी के काम से अकेले ही अपनी मारुति जेन कार यूपी 53 एल 2345 से इलाहाबाद के लिए निकले. उस समय उन के पास गैस एजेंसी के कागजतों के अलावा 1 लाख 10 हजार रुपए नकद थे.

11 जुलाई की सुबह 7 बजे के आसपास पति का हालचाल लेने के लिए निर्मला ने उन के मोबाइल पर फोन किया. फोन बंद होने की वजह से बात नहीं हो पाई. उन्हें लगा, लंबे सफर की वजह से वह थक गए होंगे. कोई परेशान न करे, इसलिए फोन बंद कर दिया होगा.

11 बजे तक डा. अशोक कुमार का फोन नहीं आया तो निर्मला ने एक बार फिर फोन किया. इस बार भी फोन बंद था. इस के बाद निर्मला रहरह कर पति का फोन मिलाती रही, लेकिन हर बार उन का फोन स्विच औफ बताता रहा. जब पति से किसी भी तरह संपर्क नहीं हुआ तो उन का दिल घबराने लगा.

निर्मला ने बहनोई जयराम प्रसाद को फोन किया तो पता चला कि वह भी गैस एजेंसी के ही काम से इलाहाबाद गए हुए हैं. इस के बाद निर्मला ने इलाहाबाद में रहने वाले अपने परिचितों को फोन कर के पति के बारे में पूछा. उन में से कोई भी डा. अशोक कुमार के बारे में कुछ नहीं बता सका. इसी तरह 2 दिन बीत गए. जब डा. अशोक के बारे में कुछ पता नहीं चला तो परिवार में बेचैनी हुई. निर्मला ने दिल्ली में रह रहे अपने पिता महावीर प्रसाद को फोन कर के सारी बात बताई.

दामाद के इस तरह अचानक गायब हो जाने से महावीर प्रसाद परेशान हो उठे. उन्होंने निर्मला से थाने में गुमशुदगी दर्ज कराने को कह कर गोरखपुर के पुलिस अधिकारियों से बात की. पिता के कहने पर निर्मला ने तीसरे दिन थाना शाहपुर में तहरीर दे कर पति डा. अशोक कुमार की गुमशुदगी दर्ज करा दी.

डा. अशोक कुमार कोई मामूली आदमी नहीं थे. वह दरोगा के बेटे होने के साथसाथ कांग्रेस के बड़े नेता के दामाद भी थे. महावीर प्रसाद ने वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को फोन कर ही दिया था, इसलिए गुमशुदगी दर्ज ते ही जिले के सभी थानों की पुलिस सक्रिय हो गई.

11 जुलाई, 2001 को गोरखपुर से जुड़े जिला देवरिया के थाना खुखुंदु पुलिस ने चौकीदार लालजी यादव की सूचना पर सलेमपुरदेवरिया रोड पर बनी वन विभाग की पौधशाला के पास से एक लाश बरामद की. लाश के पास एक तौलिया और एक तकिया का कवर मिला था. दोनों ही चीजें खून से सनी थीं. मृतक की उम्र 35-36 साल के करीब थी. देखने से ही लग रहा था कि यह हत्या का मामला है, इसलिए थानाप्रभारी श्यामलाल चौधरी ने अज्ञात के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज करा दिया.

मृतक की तलाशी में ऐसी कोई भी चीज नहीं मिली थी, जिस से उस की शिनाख्त हो सकती. इस से पुलिस को यही लगा कि मृतक की हत्या कहीं और कर के लाश यहां ला कर फेकी गई थी. पुलिस ने लाश के फोटो करवा कर पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. लाश की शिनाख्त न होने से थाना खुखुंदू पुलिस ने पोस्टमार्टम के बाद उसे लावारिस मान कर उसी दिन उस का अंतिम संस्कार करा दिया था.

अगले दिन यानी 12 जुलाई की देर रात आजमगढ़ के करीबी जिला मऊ के थाना दक्षिण टोला पुलिस ने जहांगीराबाद से सड़क के किनारे से एक मारुति जेन कार बरामद की. पुलिस ने कार की खिड़कियों के शीशे तुड़वा कर टार्च की रोशनी में चैक किया तो कार की पिछली सीट पर खून के कुछ निशान दिखाई दिए.

अगली सीट पर कनियार पुल के टोल टैक्स की रसीद के साथ 12 बोर की गोली का एक खोखा बरामद हुआ. कार के अंदर ही गाड़ी के कागजात मिल गए थे, जो गोरखपुर के शाहपुर की आवासविकास कालोनी, गीतावाटिका के रहने वाले डा. अशोक कुमार के नाम थे. इस के अलावा कार से एक जोड़ी चप्पलें और भोजपुरी गीतों के 6 औडियो कैसेट बरामद हुए थे. पुलिस ने कार को कब्जे में ले कर इस की सूचना जिला नियंत्रण कक्ष को दे दी थी.

अगले दिन जब डा. अशोक कुमार के लापता होने की खबर अखबारों में छपी तो मऊ पुलिस को लगा कि बरामद कार डा. अशोक कुमार की है, क्योंकि कार का जो नंबर था, उसी नंबर की जेन कार ले कर वह निकले थे. मऊ पुलिस ने कार बरामद होने की सूचना गोरखपुर पुलिस को दी तो गोरखपुर पुलिस डा. अशोक कुमार के घर वालों को साथ ले कर मऊ के थाना दक्षिण टोला जा पहुंची.

घर वालों ने कार की शिनाख्त कर दी. कार डा. अशोक कुमार की ही थी. कार की स्थिति देख कर सभी को यही लगा कि डा. अशोक कुमार के साथ कोई अनहोनी घट चुकी है. अखबारों में छपी खबर पढ़ कर देवरिया पुलिस ने गोरखपुर पुलिस को अपने यहां से एक लाश बरामद होने की सूचना दी.

उसी सूचना के आधार पर महावीर प्रसाद के बड़े दामाद जयराम प्रसाद गोरखपुर पुलिस के साथ देवरिया के थाना खुखुंदू जा पहुंचे. लाश के फोटो और कपड़े आदि देख कर उन्होंने बता दिया कि फोटो और सामान डा. अशोक कुमार के हैं. संदेह तो पहले ही था, अब साफ हो गया कि डा. अशोक कुमार की हत्या हो चुकी है. इस के बाद परिवार में कोहराम मच गया.

मामला हाईप्रोफाइल था, इसलिए इस मामले के खुलासे के लिए वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक विजय कुमार ने इस मामले की जांच में चौराचौरी के क्षेत्राधिकारी, एसओजी प्रभारी और क्षेत्राधिकारी एस.के. भगत के नेतृत्व में 3 टीमें बना कर लगा दीं. चूंकि मामला एससी/एसटी का था, इसलिए इस मामले की जांच क्षेत्राधिकारी एस.के. भगत को सौंपी गई थी.

क्षेत्राधिकारी एस.के. भगत ने जब अपने हिसाब से इस मामले की जांच की तो पता चला कि डा. अशोक कुमार काफी आशिकमिजाज आदमी थे. वह अपने कुछ खास मित्रों के साथ पनियारा स्थित वन विभाग के बांकी डाक बंगले में अकसर मौजमस्ती के लिए जाया करते थे. उन्होंने जब उन के खास दोस्तों के बारे में पता किया तो वे थे बीआरडी मैडिकल कालेज के प्रोफेसर डा. सुनील आर्या, कपड़ा व्यवसायी शरीफ अहमद, साइबर कैफे चलाने वाला अविनाश चौहान और बलदाऊ यादव. इन में एक महिला भी थी, जिस का नाम था अराधना मिश्रा, जो नर्स थी.

इस जानकारी के बाद एस.के. भगत ने डा. सुनील आर्या, शरीफ अहमद, अविनाश चौहान और बलदाऊ यादव की ही नहीं, डा. अशोक कुमार की भी घटना के दिन एवं उस से 3 दिन पहले की मोबाइल फोन एवं लैंडलाइन फोनों की काल डिटेल्स निकलवा ली. इस से पता चला कि डा. अशोक कुमार के मोबाइल फोन पर अंतिम फोन डा. सुनील आर्या का आया था. उसी के बाद डा. अशोक कुमार गायब हुए थे.

इस से मामले की जांच कर रहे क्षेत्राधिकारी एस.के. भगत को डा. सुनील आर्या पर ही नहीं, उन के अन्य साथियों पर शक हुआ.

इस के बाद शक के आधार पर ही उन्होंने डा. सुनील आर्या, अविनाश चौहान, बलदाऊ यादव और शरीफ अहमद को पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया. कई चक्रों में की गई पूछताछ में जब घटना का खुलासा हुआ तो जो बातें सामने आईं, वह हैरान करने वाली थीं. पता चला कि डा. अशोक कुमार की हत्या उन के इन्हीं दोस्तों ने की थी.

डा. अशोक कुमार, डा. सुनील आर्या, शरीफ अहमद, अविनाश चौहान और बलदाऊ यादव शराब और शबाब के यार थे. ये सभी एक साथ शराब पीते और एक साथ अय्याशी करते. डा. अशोक कुमार अपने यार डा. सुनील आर्या के घर बैठ कर शराब पीते तो उन की पत्नी रंजना को जरा भी ऐतराज न होता. इसी तरह डा. सुनील डा. अशोक के यहां बैठ कर शराब पीते तो निर्मला भी ऐतराज नहीं करती थी. इस तरह दोनों लगभग रोज ही पार्टी करते थे.

6 जुलाई, 2001 को अविनाश चौहान के भांजे के जन्मदिन की पार्टी थी. उस पार्टी में डा. अशोक कुमार और डा. सुनील आर्या भी आमंत्रित थे. डा. अशोक कुमार तो निर्मला के साथ पार्टी में पहुंच गए, लेकिन डा. सुनील आर्या उस दिन लखनऊ में थे, इसलिए पार्टी में नहीं आ पाए. केवल उन की पत्नी रंजना आर्या ही आई थीं.

पार्टी में पीने की भी व्यवस्था थी. डा. अशोक कुमार पीने के शौकीन थे ही. वह शराब पी रहे थे, तभी किसी ने उन से पूछा, ‘‘डा. साहब, आज अकेलेअकेले ही पार्टी का मजा ले रहे हैं. आप के मित्र नहीं आए हैं क्या?’’

‘‘यार नहीं आया तो क्या हुआ, उस की मैडम तो आई हैं. उस की कमी मैं पूरी कर दूंगा. हम दोनों के बीच सब चलता है.’’ डा. अशोक कुमार ने नशे में कहा.

डा. अशोक कुमार के पास ही अविनाश खड़ा था, इसलिए उस ने ये बातें सुन ली थीं. डा. अशोक कुमार की बात से उसे हैरानी हुई कि यह नया खेल कब से शुरू हो गया? जबकि उन की दोस्ती काफी पुरानी थी. उस ने तो ऐसा कभी नहीं सुना था.

डा. अशोक कुमार की यह बात अविनाश को बहुत बुरी लगी. बुरी लगने की एक वजह यह थी कि वह डा. सुनील आर्या का सगा साढू था. देर रात पार्टी खत्म हुई तो अविनाश को अशोक कुमार की बात उस के दिमाग में घूमने लगी.

क्योंकि अशोक ने एक तरह से उस की साली को गाली दी थी. गाली भी ऐसी, जो सहन करने लायक नहीं थी. उस से नहीं रहा गया तो उस ने डा. सुनील को फोन कर के डा. अशोक द्वारा रंजना के बारे में कही गई बात बता दी.

अविनाश की बातें सुन कर डा. सुनील आर्या के तनबदन में आग लग गई. उस ने कहा, ‘‘मैं अभी गोरखपुर के लिए निकल रहा हूं. उस कमीने ने जो उलटासीधा कहा है, उस की सजा तो उसे मिलनी ही चाहिए.’’

सवेरा होते ही डा. सुनील आर्या गोरखपुर के लिए रवाना हो गए. उस समय उन के साथ उन की महिला मित्र आराधना मिश्रा के अलावा बलदाऊ यादव भी था. वहीं से उन्होंने शरीफ अहमद को फोन कर के गोरखपुर में मिलने के लिए कहा.

गोरखपुर पहुंच कर डा. सुनील आर्या ने अपने सभी साथियों यानी अविनाश चौहान, शरीफ अहमद, बलदाऊ यादव और आराधना मिश्रा को विश्वास में ले कर डा. अशोक कुमार की हत्या की योजना बना डाली.

10 जुलाई की रात डा. सुनील आर्या पत्नी रंजना के साथ एक पार्टी में गए. पार्टी में खाना खा कर उन्होंने पत्नी को घर पहुंचाया और खुद कार से निकल पड़े. इस के बाद वह मैडिकल कालेज के उत्तरी गेट पर पहुंचे, जहां नर्स आराधना मिश्रा उन का इंतजार कर रही थी. आराधना को कार में बैठा कर उन्होंने डा. अशोक कुमार को फोन किया, ‘‘भई, आज रात का क्या प्रोग्राम है?’’

‘‘आज तो कोई प्रोग्राम नहीं है.’’

डा. अशोक कुमार ने कहा तो डा. सुनील आर्या ने कहा, ‘‘सोच रहा हूं, आज बढि़या सा प्रोग्राम रखा जाए, जिस में सब कुछ हो. तुम कहो तो आराधना मिश्रा को बुला लूं?’’

डा. अशोक कुमार भला क्यों मना करते. उन्होंने हामी भर दी. इस तरह डा. सुनील आर्या जो चाहते थे, वह हो गया.   डा. अशोक कुमार से बात करने के बाद डा. सुनील आर्या ने शरीफ और अविनाश को फोन कर के बुला लिया. शरीफ अपनी इंडिका कार से उस के यहां पहुंच गया.

बलदाऊ यादव डा. सुनील के ही यहां था. थोड़ी देर में डा. अशोक कुमार भी मैडिकल कालेज परिसर स्थित डा. सुनील आर्या के आवास पर पहुंच गए. इस के बाद डा. अशोक कुमार अपनी गाड़ी से तो डा. सुनील आर्या ने अपनी गाड़ी में बलदाऊ को बैठा लिया. अविनाश चौहान शरीफ के साथ उस की गाड़ी में बैठ गया था.

सभी पनियरा डाक बंगले की ओर चल पड़े. सभी रात डेढ़ बजे के करीब वे लोग गेस्टहाऊस पहुंचे.

अराधना मिश्रा बाहर ही खड़ी रह गईं, जबकि डा. अशोक कुमार, डा. सुनील आर्या, शरीफ, अविनाश और बलदाऊ डाकबंगले के अंदर चले गए. अंदर पहुंच कर डा. अशोक कुमार ने अराधना के बारे में पूछा तो डा. आर्या ने कहा, ‘‘आराधना फ्रेश होने गई है. अभी आ जाएगी.’’

डा. अशोक कुमार वहीं पड़ी कुर्सी पर बैठ गए. इस के बाद उसी के सामने कुर्सी रख कर डा. आर्या भी बैठ गए. उस ने डा. अशोक कुमार को बातों में उलझा लिया तो शरीफ ने देशी तमंचा निकाल कर उस की कनपटी से सटाया और ट्रिगर दबा दिया. गोली लगते ही डा. अशोक कुमार लुढ़क कर छटपटाने लगा.

थोड़ी देर में वह खत्म हो गया तो डा. आर्या ने बलदाऊ से अपनी कार से तौलिया मंगा कर उस के सिर में लपेट दिया. इस के बाद लाश उठा कर शरीफ अहमद की इंडिका में रख दी गई. गेस्टहाउस से तकिए का कवर निकाल कर बलदाऊ ने फर्श पर फैला खून साफ किया और उस तकिए के कवर को भी रख लिया.

एक बार फिर तीनों कारें चल पड़ीं. उस समय रात के ढाई बज रहे थे. डा. अशोक कुमार की कार अविनाश चला रहा था तो लाश वाली गाड़ी में शरीफ के साथ बलदाऊ बैठा था.

आराधना मिश्रा डा. सुनील आर्या की कार में थी. गोरखपुर के भटहट पहुंच कर लाश को शरीफ की गाड़ी से निकाल कर मृतक डा. अशोक कुमार की कार में डाला जाने लगा तो अराधना को पता चला कि डा. अशोक कुमार की हत्या कर दी गई है. वह डर गई, लेकिन बोली कुछ नहीं.

वहीं डा. सुनील आर्या ने अपनी कार अविनाश को दे कर अराधना को उस के साथ गोरखपुर भेज दिया. जबकि खुद शरीफ और बलदाऊ के साथ लाश को ठिकाने लगाने के लिए देवरिया की ओर चल पड़ा. इस के बाद देवरिया-सलेमपुर रोड पर स्थित वन विभाग की पौधशाला के पास डा. अशोक की लाश को फेंक दिया.

उसी के साथ उन्होंने तौलिया और तकिया का कवर भी फेंक दिया था. लाश तो ठिकाने लग गई थी, अब कार को ठिकाने लगाना था. कार ले जा कर उन्होंने जिला मऊ के थाना दक्षिण टोला के जहांगीराबाद में सड़क किनारे खड़ी कर दी. उस के बाद सभी गोरखपुर वापस आ गए.

तीनों से पूछताछ के बाद पुलिस ने बलदाऊ यादव को भी गिरफ्तार कर लिया था. इस के बाद शरीफ की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त 315 बोर का एक देशी पिस्तौल, 2 कारतूस, हत्या के समय पहने कपड़े बरामद कर लिए थे. कार में लगे खून के धब्बे के नमूने परीक्षण के लिए लखनऊ भेज दिए गए थे.

आराधना मिश्रा की डा. अशोक कुमार की हत्या में कोई भूमिका नहीं थी, इसलिए पुलिस ने उसे पूछताछ के बाद छोड़ दिया था. लेकिन गवाहों की सूची में उस का भी नाम था. पुलिस ने इस मामले में 34 लोगों को गवाह बनाया था.

अभियुक्तों के बयान और सभी गवाहों के गवाही होने में काफी अरसा लग गया. लगभग 13 सालों तक चले डा. अशोक कुमार की हत्या के मुकदमे का फैसला सुनाया गया 11 अप्रैल, 2014 को. न्यायमूर्ति श्री सुरेंद्र कुमार यादव ने डा. अशोक कुमार की हत्या का दोषी मानते हुए 52 पृष्ठों का अपना फैसला सुनाया था.

फैसले में अभियुक्त अविनाश चौहान, शरीफ अहमद, डा. सुनील आर्या तथा बलदाऊ यादव को आजीवन कारावास के साथ 10-10 हजार रुपए के जुर्माने की सजा सुनाई थी.

जुर्माना अदा न करने पर एक साल की अतिरिक्त सजा भोगनी होगी. सजा सुनाते ही सभी अभियुक्तों को पुलिस ने अपनी कस्टडी में ले कर जेल भेज दिया. अब चारों अभियुक्त हाईकोर्ट जाने की तैयारी कर रहे हैं. High Profile Murder Case

— इसके बाद अदालती कार्रवाई में क्या हुआ यह ज्ञात नहीं है.

— 2014 में प्रकाशित

Delhi News : आपसी रंजिश के चलते 55 लाख की सुपारी देकर कराई गई किन्नर की हत्या

Delhi News : दिल्ली में किन्नरों के कई ग्रुप हैं, जो मोटी कमाई करते हैं. अंडरवर्ल्ड की तरह किन्नरों में भी आपसी रंजिश रहती है. कई हत्याएं भी हुई हैं. एकता जोशी की हत्या भी किसी ग्रुप ने ही कराई, लेकिन किस ग्रुप ने, यह पता लगाना आसान नहीं होगा. फिर भी…

पूर्वी दिल्ली के जीटीबी एनक्लेव में बने डीडीए के जनता फ्लैट्स का वह कंपाउंड सब से आलीशान था. 6 फ्लैट के इस पूरे कंपाउड को 3 किन्नरों ने खरीद कर इसे आलीशान बंगले के रूप में तब्दील कर दिया था. इस बंगलेनुमा कंपाउंड में 3 किन्नरों के परिवार रहते हैं. किन्नरों के इस ग्रुप ने कुछ महीनों पहले ही इस कपांउड में आ कर रहना शुरू किया था. इन्हीं में एक परिवार था एकता जोशी (40) का. एकता मूलरूप से उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल की रहने वाली थी. एकता के पिता दिल्ली के पूसा इंस्टीट्यूट में जौब करते हैं, जबकि मां और भाई गांव में रहते हैं.

एकता ने भाई के बच्चों 3 बेटों व एक बेटी को अपने पास रखा हुआ था. जबकि भाईभाभी और मां गांव में रहते थे. एकता चाहती थी कि उस के भाई के बच्चे अच्छे स्कूलों में पढ़लिख कर काबिल बने. चारों बच्चों की पढ़ाई के खर्चे एकता खुद उठाती थी. एकता बचपन से किन्नर थी, इसलिए युवावस्था में पहले वह उत्तराखंड में रही, इस के बाद दिल्ली के किन्नर समाज में आ कर रहने लगी. किन्नरों की गुरू अनीता का एकता से खास लगाव था. इसलिए जिस कंपाउंड में एकता रहती थी, अनीता का निवास भी उसी कंपाउंड में था. धर्मालु स्वभाव और घूमनेफिरने की शौकीन एकता की सुंदरता के कारण लोगों को इस बात का पता ही नहीं चलता था कि वह किन्नर है. एकता का एक ही सपना था कि उस के भतीजेभतीजी पढ़लिख कर काबिल बने और उन्हें जीवन की हर खुशी मिले.

एकता का अपने परिवार से बहुत ज्यादा लगाव था. इसीलिए वह हमेशा परिवार के संपर्क में रहती थी. कभी वह बच्चों को ले कर गांव चली जाती तो कभी मां, भाई और भाभी उस से मिलने के लिए चले आते थे. 5 सितंबर, 2020 की रात के लगभग 9 बजे का वक्त था. उस दिन बड़े भतीजे अमित ने बुआ एकता से नई जींस और कुछ दूसरे कपड़े खरीदने की फरमाइश की थी. कोरोना महामारी के चलते लगे लौकडाउन के बाद से एकता ने बच्चों के लिए और अपने लिए भी कोई नई ड्रैस नहीं खरीदी थी. इसलिए वह भतीजे अमित को ले कर लक्ष्मीनगर में शौपिंग करने के लिए निकल गई. अपने व सभी बच्चों के लिए उस ने कुछ ना कुछ खरीदा.

कई घंटे तक शौपिंग करने के बाद 9 बजे वह वापस घर लौट आई. अमित कपड़ों से भरे बैग ले कर घर के भीतर चला गया. एकता कार को घर के सामने पार्क करने के बाद जैसे ही बाहर निकली, अचानक तेजी से एक सफेद रंग की स्कूटी उस के पास आ कर रुकी. अज्ञात स्कूटी सवारों का हमला स्कूटी पर 2 लोग सवार थे, दोनों ने चेहरों पर मास्क और सिर पर हेलमेट पहने थे. एकता जब तक स्कूटी सवार आगंतुकों से कुछ पूछती, तब तक उन दोनों ने पैंट के अंदर खोंस रखे पिस्तौल निकाले और एक के बाद एक 4 गोलियों की आवाजों से इलाका गूंज उठा. आगंतुक स्कूटी सवारों के पिस्तौल से बेहद करीब से चलाई गई चारों गोलियां एकता के शरीर के नाजुक हिस्सों में लगी थी.

गोलियां लगते ही एकता के हलक से बचाओ…ओ….ओ की चीख निकली और खून में नहाया उस का शरीर लहरा कर जमीन पर गिर गया. गोलियों की आवाज और एकता की चीख सुन कर उस कंपाउंड में रहने वाले किन्नरों के परिवार और राहगीर वहां एकत्र हो गए. इस बीच एकता पर गोलियां दागने वाले स्कूटी सवार जिस तेजी से आए थे, उसी तेजी के साथ वहां से नौ दो ग्यारह हो गए. एकता के भाई के चारों बच्चे भी शोर व गोलियों की आवाज सुन कर वहां पहुंच गए. एकता को खून में लथपथ देख वे फूटफूट कर रोने लगे. तब तक किसी ने अस्पताल ले चलने की बात कही तो कंपाउंड में रहने वाले कुछ किन्नर एकता को जल्दी से गाड़ी में डाल कर समीप के जीटीबी अस्पताल ले गए.

लेकिन वहां पहुंचते ही डाक्टरों ने बता दिया कि उस की मौत हो चुकी है. किन्नरों के कंपाउंड में रहने वाले किसी व्यक्ति ने तब तक पुलिस नियंत्रण कक्ष को फोन कर के वारदात की सूचना दे दी थी. सूचना मिलने के 10 मिनट बाद ही पीसीआर की गाड़ी मौके पर पहुंच गई. वारदात की पुष्टि करने के बाद पीसीआर ने घटनास्थल से संबंधित इलाके के जीटीबी एनक्लेव थाने को फोन कर के घटना की जानकारी दे दी और तत्काल वहां पहुंचने के लिए कहा. सूचना मिलते ही जीटीबी थाने के एसएचओ अरुण कुमार अपने इंसपेक्टर इनवैस्टीगेशन धर्मेंद्र कुमार को ले कर वारदात वाले स्थान पर पहुंच गए.

पता चला कि एकता किन्नर को कुछ लोग जीटीबी अस्पताल ले गए हैं और उस की मौत हो चुकी है. एसएचओ अरुण कुमार ने इंसपेक्टर धर्मेंद्र कुमार को पंचनामे की काररवाई के लिए जीटीबी अस्पताल भेज दिया और खुद घटनास्थल पर जांच व पूछताछ का काम शुरू कर दिया. सब से पहले उन्होंने अमित से पूछताछ की, जिस ने लक्ष्मीनगर बाजार से शौपिंग कर के लौटने और घर के भीतर जाने के बाद बाहर अपनी बुआ को गोली मार जाने की सारी बात बता दी. तब तक वारदात की सूचना पा कर एसीपी (सीमापुरी) मुकेश त्यागी और शाहदरा जिले के डीसीपी अमित शर्मा भी क्राइम व फोरैंसिक टीम के साथ मौके पर आ गए.

पूछताछ में पता चला कि वारदात के बाद कातिल मुश्किल से 5 मिनट में वारदात को अंजाम दे कर वहां से फरार हो गए थे. इंसपेक्टर धर्मेंद्र कुमार भी एकता के शव की जांचपड़ताल और उस के शव के पंचनामे की काररवाई कर के वापस घटनास्थल पर पहुंच गए. एकता के सीने व पेट में 4 गोली लगी थीं. गोली मारने के बाद मौके से स्कूटी पर फरार हुए कातिलों का चेहरा किसी ने नहीं देखा था. जिस कंपाउंड में एकता व अन्य किन्नरों के परिवार रहते थे, उस के गेट पर सीसीटीवी कैमरे लगे थे. पुलिस ने सीसीटीवी कैमरों की फुटेज को जांच के लिए अपने कब्जे में ले लिया. एसीपी मुकेश त्यागी के निर्देश पर उसी रात एसएचओ अरुण कुमार ने धारा 302 के तहत हत्या का मुकदमा दर्ज कर जांच का काम इंसपेक्टर इनवैस्टीगेशन धर्मेंद्र के सुपुर्द कर दिया. साथ ही उन की मदद के लिए एक विशेष टीम का गठन कर दिया.

जांच का काम शुरू करते ही पुलिस ने सब से पहले सीसीटीवी फुटेज की जांच की, लेकिन उस से कोई विशेष मदद नहीं मिली. क्योंकि बदमाशों के चेहरे पूरी तरह हेलमेट व मास्क से ढके थे. पुलिस को वारदात में इस्तेमाल की गई स्कूटी के नंबर से मदद मिलने की उम्मीद थी. क्योंकि सीसीटीवी में उस का नंबर स्पष्ट नजर आ रहा था. लेकिन जब नंबर की पड़ताल की गई तो पता चला कि इस नंबर पर स्कूटी रजिस्टर्ड ही नहीं है, जिस से साफ हो गया कि कातिलों ने स्कूटी पर फरजी नंबर प्लेट का इस्तेमाल किया था. पुलिस को शक था कि संभव है पिछले दिनों एकता का किसी से कोई झगड़ा हुआ हो या फिर किसी ने धमकी दी हो. क्योंकि आमतौर पर किन्नर समाज में सब से ज्यादा झगड़े इलाके को ले कर होते हैं.

कई ग्रुप हैं किन्नरों के दिल्ली में किन्नरों के अलगअलग ग्रुप हैं और अकसर इलाके में काम करने को ले कर कोई ग्रुप किसी दूसरे इलाके में घुस आता है तो उस इलाके में काम करने वाले किन्नर झगड़ा कर लेते हैं. जब इस बिंदु पर जांच हुई और कंपाउंड में रहने वाले किन्नरों से पूछताछ की गई तो पता चला एकता स्वभाव से बेहद मिलनसार थी. उस का किसी से कोई विवाद नहीं था. पूछताछ करने पर पता चला कि इसी कंपाउंड में रहने वाली अनीता जोशी इस इलाके की गुरु हैं, जिन्होंने एकता को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था. इसलिए पैसे के लेनदेन का सारा हिसाब एकता ही रखती थी. किन्नर समाज में एकता का रुतबा बन चुका था. वह पूरी दिल्ली की गुरु बनने की रेस में शामिल हो गई थी.

एकता के करीबियों से पूछताछ में यह भी पता चला कि जिस रात एकता की हत्या हुई, उसी सुबह नंदनगरी 212 बस स्टैंड पर जनता फ्लैट्स के किन्नर ग्रुप का दूसरे किन्नरों के ग्रुप से विवाद हुआ था. दूसरा ग्रुप कमजोर पड़ गया था, जिस ने रात को देख लेने की धमकी दी थी. इसलिए पुलिस को आशंका हुई कि कहीं इस हत्याकांड को आपसी रंजिश के तहत अंजाम न दिया गया हो. पुलिस ने किन्नरों से पूछताछ के बाद किन्नरों के दूसरे गुट के बारे में जानकारी हासिल की और कुछ किन्नरों को हिरासत में ले कर पूछताछ की. लेकिन पूछताछ के बाद भी पुलिस किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकी. फिर भी न जाने क्यों एसएचओ अरुण कुमार को अंदेशा था कि किन्नर समाज के लोग ही इस हत्या में शामिल हैं, गुरु की कुरसी हासिल करने के चलते भी यह हत्या हो सकती है.

जिन संदिग्ध लोगों को पुलिस ने हिरासत में लिया था, उन से हत्याकांड के बारे में तो पता नहीं चला लेकिन यह जरूर पता चल गया कि एकता को उत्तराधिकारी घोषित किए जाने के बाद दिल्ली में कई किन्नर गुरु एकता से नाराज थे. दूसरी तरफ पुलिस की टीम ने इलाके के सौ से ज्यादा लोगों से पूछताछ कर ली थी और 2 सौ से ज्यादा कैमरों की फुटेज खंगाल चुकी थी. लेकिन इस के बावजूद कोई ठोस जानकारी हासिल नहीं हो पाई थी. कुछ किन्नरों से पूछताछ के बाद पुलिस को ऐसे संकेत मिले कि एकता जोशी की हत्या में भाड़े के हत्यारों का इस्तेमाल हो सकता है. ऐसा इसलिए भी लग रहा था क्योंकि गोली चलाने वाले बेहद प्रोफेशनल थे.

दूसरी तरफ देश के कई हिस्सों में किन्नर समाज के लोगों ने एकता जोशी की हत्या पर आक्रोश जताते हुए हत्याकांड का जल्द खुलासा करने की मांग शुरू कर दी थी. एकता के रुतबे का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता था कि उस की हत्या के बाद शिवसेना के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष जयभगवान भी शोक प्रकट करने के लिए उस के घर पर पहुंचे. किन्नर महामंडलेश्वर लक्ष्मी किन्नर एकता को अपनी खास दोस्त मानती थी, इसलिए वह भी शोक प्रकट करने के लिए उन के घर पहुंची. एसएचओ अरुण कुमार ने जांचपड़ताल में साइबर सेल टीम की भी मदद ली थी. साइबर टीम के सहयोग से पुलिस ने घटनास्थल के आसपास उस रात एक्टिव मोबाइल फोन नंबरों का डंप निकाल कर छानबीन शुरू कर दी थी.

एकता जोशी के मोबाइल की काल डिटेल्स निकाल कर पुलिस ने उस की भी छानबीन की. इस बिंदु पर की गई छानबीन के बाद पुलिस को पता चला कि एकता जोशी की पश्चिमी यूपी के मेरठ व गाजियाबाद में कुछ लोगों से बातचीत होती थी. जिन नंबर से उन्हें काल आती या की जाती, वे सभी मेरठ के अपराधियों के नंबर थे. इसीलिए एसीपी मुकेश त्यागी ने मेरठ में एसटीएफ टीम से संपर्क कर हत्याकांड में मदद करने के लिए कहा था. उत्तर प्रदेश पुलिस की स्पैशल टास्क फोर्स के डीएसपी बृजेश सिंह ने अपने तेजतर्रार इंसपेक्टर रविंद्र कुमार के नेतृत्व में एक टीम गठित कर दी, जिस में सबइंसपेक्टर संजय कुमार, हेडकांस्टेबल संजय सिंह, रवि वत्स, रकम सिंह, कांस्टेबल दीपक कुमार व अंकित श्यौरान को शामिल किया गया.

छानबीन पहुंची मेरठ तक पुलिस की इस टीम के पास मेरठ के अधिकांश अपराधियों की कुंडली थी. दिल्ली पुलिस से सूचना मिलने के बाद पुलिस ने अपने मुखबिर नेटवर्क का इस्तेमाल करना शुरू किया. एसटीएफ की टीम ने ऐसे अपराधियों को चिह्नित करना शुरू किया, जो सुपारी ले कर हत्या करने के लिए जाने जाते थे. पुलिस ने चिह्नित किए गए सभी बदमाशों के मोबाइल नंबर हासिल कर उन की काल डिटेल्स निकाल कर उसे खंगालना शुरू कर दिया. इसी पड़ताल के दौरान एसटीएफ की टीम को आमिर गाजी नाम के एक बदमाश के मोबाइल की लोकेशन 5 सितंबर को दिल्ली में मिली.

संयोग से आमिर के मोबाइल की लोकेशन रात को साढ़े 8 से 9 बजे के करीब जीटीबी एनक्लेव के जनता फ्लैट के आसपास थी और यहीं एकता जोशी की हत्या हुई थी. एसटीएफ की टीम समझ गई कि दिल्ली पुलिस का शक सही है कि एकता जोशी की हत्या करने वाले बदमाशों का संबंध मेरठ से है. इतनी जानकारी मिलने के बाद एसटीएफ की टीम ने आमिर गाजी को ट्रैक करना शुरू कर दिया. और 9 नवंबर को सटीक सूचना मिलने के बाद एसटीएफ टीम ने शाम को करीब 7 बजे उसे इस्माइल वाली गली से गिरफ्तार कर लिया. आमिर के साथ एक अन्य युवक भी था. तलाशी लेने के बाद दोनों के कब्जे से एक आटोमैटिक पिस्टल और एक तमंचा बरामद हुआ. आमिर के साथ पकड़े गए युवक का नाम सुहैल खान था.

पुलिस को दोनों से पूछताछ करने में ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ी. थोड़ी सी सख्ती के बाद आमिर ने कबूल कर लिया कि उसी ने अपने एक दोस्त गगन पंडित के साथ मिल कर किन्नर एकता जोशी की हत्या की थी. आमिर मेरठ के कुख्यात अपराधी और गाजियाबाद की डासना जेल में बंद सलमान गाजी का छोटा भाई है. सलमान की मेरठ के दूसरे कुख्यात अपराधी शारिक से जानलेवा दुश्मनी चल रही है. एक जमीन को ले कर कई साल पहले शुरू हुई शारिक व सलमान की दुश्मनी में अब तक दोनों के गैंग के कई लोग मारे जा चुके हैं. इन दिनों सलमान व शारिक दोनों ही जेल में बंद हैं.

आमिर गाजी ने बताया कि कोतवाली क्षेत्र में सराय बहलीम निवासी गगन पंडित ने किन्नर गुरु एकता जोशी की हत्या कराई थी. चूंकि उस के भाई सलमान के गैंग की रंजिश शारिक गैंग से चल रही है. इसलिए जेल में बंद सलमान ने आमिर से कहा था कि किसी भी तरह शारिक की हत्या करा दें तो शहर में उन की पकड़ मजबूत हो जाएगी. बस इसी काम के लिए आमिर ने कुछ दिन पहले गगन पंडित से मदद मांगी थी. आमिर की गगन पंडित से 6 महीने पहले ही हाजी याकूब गली में रहने वाले असलम पहलवान के जरिए मुलाकात हुई थी. दोनों की जानपहचान जल्द ही दोस्ती में बदल गई थी.

3 महीने पहले गगन पंडित ने आमिर से कहा था कि वह पहले दिल्ली के शाहदरा में जीटीबी एनक्लेव में एक हत्या करने में उस की मदद कर दे तो उस के बाद वह शारिक गैंग का खात्मा कराने में उस की मदद करेगा. आमिर ने कह दिया कि वह उस के काम में मदद जरूर करेगा, लेकिन उस के बाद उसे शारिक गैंग को खत्म करने में उस की मदद करनी पडे़गी. इस बात पर दोनों की ही सहमति बन गई थी. 5 सितंबर, 2020 को आमिर मेरठ में था जब सुबह के वक्त उस के पास गगन पंडित का फोन आया. उस ने बताया कि वह दिल्ली में है. गगन ने उस से कहा, दोस्त जिस काम के लिए तुम्हें मेरी मदद करनी है उसे पूरा करने का वक्त आ गया है. इसी वक्त दिल्ली चले आओ.

मदद लेने से पहले दोस्त की मदद करने का वायदा किया था, लिहाजा आमिर उसी समय दिल्ली के लिए रवाना हो गया. शाम को 3 बजे के करीब वह दिल्ली पहुंच गया और नंदनगरी में उस जगह पहुंचा, जहां गगन ने उसे पहुंचने के लिए कहा था. गगन पंडित के साथ वहां कुछ और लोग भी थे. यहीं पर गगन ने उसे बताया कि जीटीबी एनक्लेव में रहने वाले एक किन्नर एकता जोशी से उस की खुन्नस चल रही है.

‘‘किन्नर से तुम्हारी किस बात की खुन्नस गगन भाई?’’ आमिर ने उत्सुकता में पूछा.

‘‘मेरी सीधी तो खुन्नस नहीं है लेकिन उसी की बिरादरी के कुछ लोग हैं, जिन से अपनी दोस्ती है और वे मदद भी करते रहते हैं. उन्हीं के रास्ते का कांटा बन गई है एकता जोशी, बस इसीलिए टपकाना है. समझो, पीछे से डिमांड मिली है.’’ गगन जोशी ने थोड़े शब्दों में पूरी बात बता दी.

‘‘ठीक है भाई, आप चाहते हो तो टपका देते हैं साली को.’’ आमिर ने जोश के साथ कहते हुए पूछा, ‘‘सामान वगैरह है या जुगाड़ करने पडें़गे?’’

‘‘चिंता मत करो पूरा सामान है.’’ कहते हुए गगन ने उसे एक इंग्लिश पिस्टल दी और खुद भी एक पिस्टल निकाल कर अपनी पैंट में खोंस ली. गगन का खेल इस के बाद वे किसी के फोन का इंतजार करने लगे. शाम को किसी का फोन आने के बाद गगन आमिर को एक स्कूटी पर बैठा कर अपने साथ जीटीबी एनक्लेव में जनता फ्लैट के पास पहुंचा और इंतजार करने लगा. पहचान छिपाने के लिए दोनों ने सिर पर हेलमेट लगा लिए थे और चेहरे पर मास्क भी पहन रखे थे. उन्हें बैकअप देने के लिए गगन के कुछ साथी भी स्कूटी ले कर उन के आसपास थे. रात करीब 9 बजे जैसे ही एकता जोशी की कार उस के कंपाउंड के बाहर आ कर रुकी तो गगन ने थोड़ी दूर पर खड़ी अपनी स्कूटी स्टार्ट की और जब तक एकता कार से बाहर निकलती, तब तक स्कूटी ले जा कर एकता के पास रोक दी.

एकता जैसे ही कार से बाहर निकली आमिर और गगन ने उस पर 2-2 गोलियां इतने नजदीक से दागीं कि उस के बचने की गुजांइश ही नहीं थी. गोलियां मारने के बाद दोनों फौरन घटनास्थल से फरार हो गए. एकता की हत्या के बाद आमिर और गगन दोनों ही मेरठ वापस आ गए. हालांकि आमिर के साथ गिरफ्तार हुए सुहैल खान उर्फ सोनू का एकता की हत्या से कोई वास्ता नहीं था, लेकिन उस से पुलिस ने अवैध हथियार बरामद किया था. इसलिए एसटीएफ ने उस के खिलाफ भी आमिर के साथ शस्त्र अधिनियम के तहत मामला दर्ज कर लिया. मेरठ के नूरनगर का रहने वाला सुहैल ईव्ज चौराहे पर कार वाशिंग का काम करता है. सुहैल 2 साल से आमिर के संपर्क में था.

श्यामनगर निवासी इरफान ने परवेज से उस का संपर्क कराया था. परवेज मेरठ के एक बड़े गैंगस्टर हाजी इजलाल का भाई है. इजलाल ने 10 साल पहले दिल्ली पुलिस के रिटायर्ड एसीपी एस.के. गिहा के भतीजे पुनीत गिरि, उस के दोस्त सुनील ढाका और कुलदीप उज्ज्वल की हत्या कर उन के शव बागपत नहर में डाल दिए थे. इजलाल ने अपनी प्रेमिका के कहने पर मेरठ कालेज में पढ़ने वाले इन तीनों लड़कों की बेरहमी से हत्या की थी. इस हत्याकांड में परवेज भी जेल गया था, लेकिन 2 साल पहले उसे जमानत मिल गई थी. उसी इजलाल के भाई परवेज ने सुहैल को 2 हत्याओं के लिए 10-10 लाख रुपए की सुपारी दी थी, लेकिन उस ने अभी यह नहीं बताया था कि उसे किस की हत्या करनी है.

परवेज ने सुहैल से कहा था कि किस की हत्या करनी है और कब करनी है, इस के बारे में आमिर उसे बताएगा. आमिर को परवेज ने बता दिया था कि उसे सुहैल के साथ मिल कर किन लोगों की हत्या को अंजाम देना है. आमिर गाजी के एकता हत्याकांड के कबूलनामे के बाद एसटीएफ के डीएसपी बृजेश सिंह ने सीमापुरी एसीपी मुकेश त्यागी और जीटीबी एनक्लेव थाने के एसएचओ अरुण कुमार को आमिर की गिरफ्तारी और एकता हत्याकांड के खुलासे की सूचना दे दी और उन के खिलाफ शस्त्र अधिनियम का मामला दर्ज कर मेरठ की अदालत में पेश कर दिया. जहां से उन्हें मेरठ जेल भेज दिया गया.

कथा लिखे जाने तक हत्याकांड में शामिल गगन पंडित की गिरफ्तारी नहीं हुई थी. पुलिस को आशंका है कि एकता की हत्या किसी विरोधी किन्नर ग्रुप ने सुपारी दे कर कराई है. आमिर व गगन से पूछताछ के बाद ही पूरे राज से परदा उठेगा. लेकिन वह लापता है.

बेईमान प्यार : बेमौत मारा गया परिवार

बेईमान प्यार : बेमौत मारा गया परिवार – भाग 4

इस से रमित बुरी तरह डर गया. उस ने अपना पीछा छुड़ाने के लिए निशा के पिता को चैक काट कर दे दिए. उस ने चैक तो दे दिए, लेकिन चैक देने के बाद वह परेशान रहने लगा. क्योंकि उस के खाते में पैसे नहीं थे. उसे पता था कि अगर चेक बाउंस हो गए तो एक और नई मुसीबत खड़ी हो जाएगी. इसलिए उस ने इस मुसीबत से पीछा छुड़ाने के लिए एक भयानक योजना बना डाली.

रोशनलाल के परिवार में गहरी पैठ होने की वजह से रमित उन के परिवार की हर गतिविधियों को जानता था. वह यह भी जानता था कि हर रविवार की सुबह रोशनलाल और निशा हैबोवाल स्थित राधास्वामी सत्संग भवन में सत्संग सुनने जाते हैं. रविवार को साप्ताहिक अवकाश होने की वजह से लुधियाना के सारे बाजार और उद्योग बंद रहते हैं. रमित की फैक्ट्री भी उस दिन बंद थी. इन्हीं बातों के मद्देनजर रमित ने शनिवार शाम यानी 21 अगस्त को रोशनलाल को फोन कर के कहा, ‘‘पापा, मैं कल सुबह एटीएम से रुपए निकाल कर आप को दे दूंगा. आप चैक बैंक में मत डालना.’’

अगले दिन सुबह जब रोशनलाल और निशा सत्संग के लिए जा रहे थे तो रास्ते में ही रमित ने उन्हें अपनी कार में बिठा लिया. हालांकि रोशनलाल ने बहुत कहा कि रुपए निकालने ही तो हैं, सत्संग के बाद निकाल लेंगे. लेकिन रमित ने यह कह कर उन्हें खामोश कर दिया कि वह पैसे दे देगा तो उस के सिर से बोझ उतर जाएगा.

रमित की गाड़ी दुगड़ी स्थित एटीएम पर रुकी. उस ने यह कह कर रोशनलाल को वहीं उतार दिया कि वह 10 मिनट वहीं रुकें, एटीएम कार्ड वह घर भूल आया है. झूठ बोल कर वह निशा को साथ ले कर सीधा फैक्ट्री पहुंचा. फैक्ट्री ले जा कर उस ने निशा को केबिन में बिठा दिया और पहले से खरीद कर रखा चाकू निकाल कर उस पर चाकू से ताबड़तोड़ वार कर उस की हत्या कर दी.

निशा की हत्या कर के उस ने अपने 2 कर्मचारियों विजय व कुमार की मदद से निशा की लाश प्लास्टिक के एक बोरे में भरी और उन्हीं की मदद से वह बोरा कार की डिग्गी में रख कर जस्सियां के एक खाली प्लाट में फेंक आया. इस के बाद वह दुगड़ी स्थित एटीएम पर पहुंचा, जहां रोशनलाल खड़ा था. वह उसे भी कार में बैठा कर फैक्ट्री ले आया. निशा की तरह उस ने उस की भी हत्या कर दी और उस की लाश भी प्लास्टिक के बोरे में भर कर दोराहा नहर में फेंक दी.

बापबेटी की हत्या करने के बाद रमित कार से सीधा रोशनलाल के घर पहुंचा. कार उस ने मकान के पीछे वाली गली में खड़ी कर दी. इस के बाद वह मकान के भीतर गया. पहले वाले कमरे में शकुंतला बैठी थी. रमित ने चाकू निकाल कर उस पर ताबड़तोड़ हमला कर दिया. वह ढेर हो गई. इस के बाद वह भीतर वाले कमरे में पहुंचा, जहां राजेश टीवी देख रहा था.

कमरे में पहुंचते ही उस ने सब से पहले टीवी की आवाज तेज की और फिर राजेश पर अचानक हमला बोल दिया. अचानक हमला हुआ था, फिर भी अपाहिज राजेश चीखाचिल्लाया. उस ने रमित का विरोध करते हुए आखिरी क्षणों तक उस के साथ संघर्ष किया. राजेश की हत्या करने के बाद रमित बाथरूम में हाथमुंह धोना चाहता था, लेकिन उसी समय मोहल्ले वालों ने बाहर का दरवाजा तोड़ना शुरू कर दिया.

हड़बड़ाहट में वह चाकू वहीं छोड़ कर मकान के पिछले दरवाजे से भाग निकला. पूरे परिवार की हत्या करने के बाद वह पुन: फैक्ट्री आया, जहां उस ने हाथमुंह धोया. चार लोगों की हत्याएं करने में चाकू की कुछ खरोंचे उस के हाथ पर भी लग गई थीं. उस ने दुगड़ी की एक डिस्पेंसरी में जा कर हाथ पर पट्टी करवाई और फिर आगे के बारे में सोचने लगा. पर वह कुछ सोचता या करता, इस से पहले ही वह पुलिस की गिरफ्त में आ गया.

पुलिस ने रमित भंडारी के साथ उस के दोनों कर्मचारियों को भी हिरासत में ले कर अगले दिन मेट्रोपौलिटन मजिस्ट्रेट परमिंदर कौर की अदालत में पेश कर के 5 दिनों के रिमांड पर ले लिया. रिमांड की अवधि में रमित की निशानदेही पर जस्सियां से निशा की तथा दोराहा नहर के किनारे से रोशनलाल की लाश बरामद कर ली. पुलिस ने रमित की 2 कारें भी जब्त कर लीं. पुलिस ने 7-7 लाख रुपए के वे 2 चैक भी बरामद किए, जो रमित ने रोशनलाल को दिए थे. तलाशी लेने पर निशा के पर्स से डेढ़ लाख कैश भी मिला था.

इस तरह यह हत्याकांड पुलिस कमिश्नर ईश्वर सिंह की देखरेख में एसीपी नरेंद्र रूबी व अन्य अधिकारियों की सूझबूझ से 24 घंटे के भीतर ही सुलझा लिया गया. एक तरह से इस में रुपए दे कर दुश्मन बनाने वाली बात हुई थी. रोशनलाल रमित को रुपए दे कर न उस की सहायता करता और न ही उस का परिवार यूं बेमौत मारा जाता. शायद सांप को दूध पिलाने का यही अंजाम होता है.

बेईमान प्यार : बेमौत मारा गया परिवार – भाग 3

रमित की यह बात हमारे गले नहीं उतर रही थी. इस में कई ऐसे पेंच थे, जो समझ से बाहर थे. मैं ने रमित से पूछा, ‘‘अच्छा, यह बताओ कि इस वक्त निशा कहां है?’’

मेरे सवाल पर वह बौखला उठा और झल्ला कर बोला, ‘‘मैं क्या जानूं, भाग गई होगी अपने किसी यार के साथ.’’

‘‘तुम्हें कैसे पता?’’ मैं ने पूछा तो रमित बोला, ‘‘जनाब ऐसी औरतें यही तो करती हैं. एक से दिल भर गया तो दूसरे के पास और दूसरे से भर गया तो तीसरे के पास.’’

‘‘वाह रमित कुमार.’’ मैं ने कहा, ‘‘मैं ने तो तुम से केवल निशा के बारे में पूछा था और तुम ने पूरी रामायण सुना दी. खैर छोड़ो, यह बताओ कि तुम्हें ब्लैकमेल तो निशा कर रही थी, फिर तुम ने उस की मां और भाई की हत्या क्यों की?’’

मेरे इस सवाल पर वह बगले झांकने लगा. मैं ने उसे चेतावनी देते हुए कहा, ‘‘देखो, हमें सब पता है. अच्छा यही है कि तुम हमें पूरी बात सचसच बता दो, वरना तुम्हें फांसी के फंदे से कोई नहीं बचा सकता.’’

मेरी बात सुन कर उस ने गर्दन झुका ली. मैं इंसपेक्टर हरपाल सिंह, निर्मल सिंह और बिट्टन कुमार को साथ ले कर उस की मौसी की फैक्ट्री पहुंचा. वहां रमित की कार बाहर ही खड़ी थी. कार का बारीकी से मुआयना किया गया तो उस में कई जगह खून के धब्बे दिखाई दिए. ठीक वैसे ही खून के धब्बे फैक्ट्री के औफिस में भी मिले. फैक्ट्री की अच्छी तरह तलाशी लेने पर हमें एक लेडीज सैंडिल भी मिली. फैक्ट्री में 2 कर्मचारी मिले, जिन के नाम विजय प्रसाद और कुमार थे. विजय प्रसाद गहरी कोठी, थाना नोतन, जिला पश्चिमी चंपारण (बिहार) का रहने वाला था तो कुमार गांव मुकार, जिला प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश का रहने वाला था.

दोनों से पूछताछ करने पर इस दोहरे हत्याकांड के साथसाथ रिटायर्ड स्टेशन मास्टर रोशनलाल और उस की बेटी निशा की गुमशुदगी का रहस्य भी खुल गया. मेरे आदेश पर इंसपेक्टर हरपाल सिंह ने विजय प्रसाद और कुमार को पुलिस हिरासत में ले लिया. रमित भंडारी को हम ने पहले ही गिरफ्तार कर लिया था. अब तक की तफ्तीश, रमित भंडारी और फैक्ट्री से दबोचे गए दोनों कर्मचारियों से की गई पूछताछ के बाद इस जघन्य हत्याकांड की जो कहानी प्रकाश में आई, वह स्वार्थ के रिश्तों और विश्वास की नींव पर झूठ का महल खड़ा करने जैसी थी.

36 वर्षीया निशा काफी खूबसूरत, मिलनसार व हंसमुख स्वभाव की युवती थी. संभवत: उस का यही स्वभाव उस की और उस के परिवार की हत्या का कारण बना था. सीधीसादी निशा की बीए पास करने के बाद शादी हो गई थी. लेकिन पति से उस की नहीं बनी, जिस से जल्दी ही उस का तलाक हो गया था. निशा ने इसे भाग्य मान कर चुपचाप स्वीकार कर लिया और मन ही मन तय कर लिया कि अब वह कभी शादी नहीं करेगी. गुजरबसर के लिए उस ने एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी कर ली.

सन 2008 में जब निशा का परिवार चंद्रनगर, सुंदरनगर में रहता था, तभी अचानक एक दिन निशा की मुलाकात रमित भंडारी से हुई. रमित महत्त्वाकांक्षी, चतुरचालाक युवक था. उस ने शादीशुदा होते हुए भी अपनी शादी की बात निशा से छिपा ली थी. हालांकि निशा ने कभी शादी न करने का फैसला किया था. लेकिन रमित ने उस की सोई कामनाओं को जगा कर उस से शादी करने का वादा कर लिया. न चाहते हुए भी निशा धीरेधीरे रमित के आकर्षण में बंधती चली गई. जल्दी ही दोनों के बीच आंतरिक संबंध बन गए. एक दिन निशा ने रमित को अपने घर ले जा कर उस का परिचय अपने मातापिता से करवा दिया.

रोशनलाल के परिवार की समस्या यह थी कि उस के परिवार में कोई भी युवा पुरुष नहीं था. बेटा राजेश था भी तो अपाहिज था. इसीलिए पूरा परिवार रमित से खुश रहता था और उसे बेटे की तरह मानता था. निशा का भी सोचना था कि उस की अन्य बहनें दूर रहती थीं, अगर शादी के बाद रमित उस के मातापिता और अपाहिज भाई का खयाल रखेगा तो इस से अच्छा और क्या हो सकता था.

समय के साथ निशा और रमित के आपसी संबंध बन गए थे. सन् 2009 के अंत में रोशनलाल स्टेशन मास्टर से रिटायर हो गए थे. उन्हें रिटायरमेंट पर काफी रुपए मिले थे. कुछ दिनों बाद उन्होंने चंद्रनगर वाला मकान 70 लाख रुपए में बेच दिया था. नया मकान लेने के बाद भी उन के पास 35-40 लाख रुपया बच गया था.

एक दिन जब रमित रोशनलाल के घर आया तो बहुत परेशान था. पूरे परिवार ने उस की परेशानी का कारण पूछा, पर उस ने कुछ नहीं बताया. बाद में उस ने निशा को अलग ले जा कर बताया, ‘‘निशा, मुझे बिजनैस में बहुत बड़ा घाटा हो गया है. बाजार का लाखों रुपया देना है. अगर मैं ने रुपए नहीं दिए तो मैं बहुत बड़ी मुसीबत में फंस जाऊंगा.’’

‘‘तुम्हें कितने रुपए चाहिए?’’ निशा ने पूछा तो रमित बोला, ‘‘यही कोई 40-45 लाख…’’

रमित की बात सुन कर निशा हतप्रभ रह गई. पल भर बाद वह कुछ सोच कर बोली, ‘‘रमित, पापा के पास 30-35 लाख रुपए होंगे, वे तुम्हें इनकार नहीं करेंगे. जब तुम्हारा बिजनैस ठीक हो जाए तो पापा के पैसे लौटा देना.’’

‘‘वह सब तो ठीक है, पर मैं तुम्हारे पापा से रुपए नहीं मांगूगा. मुझे शर्म आती है.’’ रमित ने अभिनय करते हुए कहा तो निशा बोली, ‘‘ठीक है, तुम रुपए मत मांगना. रुपए मैं मांग लूंगी, पर तुम साथ तो चलो.’’

निशा के समझाने पर रमित उस के साथ चलने को तैयार हो गया. निशा ने जब अपने पिता रोशनलाल को रमित की परेशानी का कारण बताया तो वे हंसते हुए बोले, ‘‘तुम भी कमाल करते हो बेटा, यह घर तुम्हारा है. यहां की हर चीज पर तुम्हारा अधिकार है. रुपए मेरे पास बढ़ तो रहे नहीं हैं. तुम अपना काम निपटा लो. जब आ जाएं तो मुझे लौटा देना.’’

अगले दिन ही रोशनलाल ने रमित को 35 लाख रुपए कैश दे दिए. रुपए लेते समय उस ने वादा किया था कि वह एक महीने में रुपए लौटा देगा. लेकिन कई महीने बीत जाने के बाद भी जब उस ने न तो पैसे लौटाए और न कभी इस विषय में बात की तो रोशनलाल और निशा को चिंता होने लगी. उसी बीच कहीं से निशा को पता चल गया कि रमित शादीशुदा है. उस ने उस से झूठ बोला था.

इस बात से निशा के दिल को बहुत ठेस पहुंची. उस ने मन ही मन तय कर लिया कि पिता का पैसा वापस मिलने के बाद वह रमित से संबंध तोड़ लेगी. यह बात उस ने रमित से कह भी दी थी, लेकिन समस्या यह थी कि रमित पैसा लौटाने का नाम नहीं ले रहा था. इस पर निशा ने उसे धमकी देते हुए कहा कि अगर उस ने शराफत से उस के पिता का पैसा नहीं लौटाया तो वह अपने और उस के संबंधों की बात उस की मां और पत्नी को बता देगी.

                                                                                                                                         क्रमशः

बेईमान प्यार : बेमौत मारा गया परिवार – भाग 2

पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी आ गई थी, जिस के अनुसार मौत का कारण अधिक खून बह जाना था. फगवाड़ा से शकुंतला के मायके वाले आ गए थे. पोस्टमार्टम के बाद लाशें उन्हें सौंप दी गई थीं. मृतका के भाइयों ने दोनों लाशों का अंतिम संस्कार कर दिया था. मैं ने उन से भी पूछताछ की. उन्होंने केवल इतना ही बताया था कि रोशनलाल ने रिटायर होने के बाद चंद्रनगर वाला मकान 70 लाख में बेचा था. नया मकान उन्होंने 35-40  लाख रुपए में खरीदा था.

कुछ पैसा उन्हें रिटायर होने पर मिला था. कुल मिला कर उन के पास करीब 35 लाख रुपए थे. रुपए उन्होंने कहां रखे थे या किसी को दिए थे, इस बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं थी. फलस्वरूप बात वहीं की वहीं रह गई. मैं ने सोचा था कि शायद मृतका के मायके वालों से काम की कोई बात पता चल जाएगी, पर मायूस ही होना पड़ा. घूमफिर कर हमारी नजर फिर रमित भंडारी पर ही जा कर टिक गई थी.

रमित ने आधा घंटे बाद आने को कहा था. मैं ने घड़ी देखी. अब तक पौन घंटा हो चुका था. मैं ने सबइंसपेक्टर बिट्टन कुमार से कहा कि वह रमित को फोन कर के पूछे. बिट्टन कुमार ने बताया कि उस ने 10 मिनट में आने को कहा है, लेकिन वह दस मिनट बाद भी नहीं आया. इस प्रकार 10-10 मिनट करतेकरते उस ने 2 घंटे बरबाद कर दिए. उधर पुलिस के सिर पर उच्च अधिकारियों की तलवार लटक रही थी.

मेरी टीम की जान सांसत में थी. मुझे रमित भंडारी पर गुस्सा आ रहा था. जब बात बरदाश्त के बाहर हो गई तो मैं ने भंडारी से मोबाइल पर खुद बात की. मैं ने उसे डांटते हुए कहा कि वह तुरंत मेरे औफिस पहुंचे. उस ने मुझ से भी 10 मिनट का समय मांगा. जब वह 10 मिनट तक नहीं आया तो मैं ने फिर फोन किया. लेकिन इस बार उस के फोन का स्विच बंद मिला. इस के बाद उस के फोन का स्विच हमेशा के लिए बंद हो गया.

रमित के इस व्यवहार से मुझे उस पर संदेह हुआ. मैं समझ गया कि वह जानबूझ कर पूछताछ से बचना चाहता था. मैं ने हरपाल सिंह से उस के फोन की लोकेशन पता करने को कहा. इंसपेक्टर हरपाल ने रमित के फोन की लोकेशन चैक करवाई तो उस की लोकेशन जस्सियां रोड, लुधियाना की मिली. इस से यह बात साफ हो गई कि वह हम से झूठ बोल रहा था. इस से उस पर हमारा संदेह और बढ़ गया.

अभी मैं और हरपाल सिंह इस मुद्दे पर बातें कर ही रहे थे कि सबइंसपेक्टर बिट्टन कुमार ने आ कर बताया कि रमित भंडारी अपनी मौसी की फैक्ट्री नैना क्वायर प्रोडक्ट्स में कहने को तो मार्केटिंग एक्जीक्यूटिव था, लेकिन एक तरह से उस गद्दा फैक्ट्री का सर्वेसर्वा वही था. बिट्टन कुमार ने यह भी बताया कि रिटायर्ड स्टेशन मास्टर रोशनलाल की छोटी बेटी निशा से उस के मधुर संबंध थे. वह उस के घर खूब आताजाता था. रोशनलाल ने उसे अपना बेटा बना रखा था.

मेरे लिए यह जानकारी काफी थी. इस से मुझे पक्का यकीन हो गया था कि वह इस दोहरे हत्याकांड का रहस्य जरूर जानता होगा. इसीलिए पुलिस के सामने आने से कतरा रहा था. मुझे समय बेकार करना उचित नहीं लगा. इसलिए मैं ने इंसपेक्टर हरपाल सिंह को तुरंत पुलिस टीम के साथ घाघरा रोड पहुंचने को कहा.

एक टीम मैं ने एसीपी परमजीत सिंह पन्नू की अगुवाई में तैयार करवाई. रमित भंडारी हमें फैक्ट्री के पास ही मिल गया. उस से वहीं पूछताछ की गई. वह हमें बहकाने की कोशिश करने लगा. वह हर सवाल का जवाब घुमाफिरा कर दे रहा था. उस के चेहरे पर काफी उलझन और घबराहट के मिलेजुले भाव थे. बात करते हुए वह हकला भी रहा था. तभी अचानक मेरा ध्यान उस के हाथ की ओर चला गया. उस के हाथ पर ताजी पट्टी बंधी थी. मैं ने इस बारे में पूछा तो वह बोला, ‘‘ऐसे ही मामूली सी खरोंच आ गई थी. सावधानी के तौर पर मैं ने पट्टी बंधवा ली.’’

खरोंच कैसे और किस चीज से आई, यह वह नहीं बता सका. इस बातचीत के बाद मेरा शक विश्वास में बदलने लगा. मैं ने उसे अपने औफिस चलने को कहा.

औफिस आ कर इंसपेक्टर हरपाल सिंह और बिट्टन कुमार ने जब उस से सख्ती से पूछताछ की तो उस ने शकुंतला और राजेश की हत्या की बात स्वीकार कर ली. मैं ने कारण पूछा तो उस ने कोई कारण नहीं बताया. लेकिन जब थोड़ी सख्ती की गई तो उस ने बताया कि रिटार्यड स्टेशन मास्टर रोशनलाल की बेटी निशा उसे ब्लैकमेल कर रही थी. उस के अनुसार निशा के साथ उस के तीन सालों से अवैध संबंध थे. वह शादीशुदा था, जबकि निशा तलाकशुदा थी.

निशा बहुत ही खूबसूरत थी. पहली मुलाकात में ही दोनों एकदूसरे पर फिदा हो गए थे. दोनों के संबंध इतनी तेजी से परवान चढ़े कि रमित आए दिन उस के घर आनेजाने लगा. परिवार के लोगों को भी उस का आनाजाना अच्छा लगता था. शकुंतला तो उसे बेटाबेटा कहते नहीं थकती थी. निशा के साथ रमित के संबंधों की उन्हें कोई जानकारी नहीं थी. वे लोग अपने घर के छोटे से ले कर बडे़ कामों तक में रमित की सलाह लेने लगे थे.

रमित के अनुसार पिछले कुछ समय से निशा उसे ब्लैकमेल कर रही थी. वह कई बार उस की मांग पूरी भी कर चुका था. उस के घर वाले भी इस बात का फायदा उठा रहे थे. कुछ ही दिनों पहले निशा ने उस से 50 हजार रुपए की मांग की थी, लेकिन उस ने इतना पैसा देने से मना कर दिया था. शनिवार को निशा ने रमित की मां को फोन कर के कहा था कि वह उन्हें कुछ राज बताना चाहती है.

उसी दिन निशा ने फोन पर रमित को भी धमकी दी थी कि उस ने दोनों के निजी संबंधों की सीडी बनवा रखी है. अगर उस ने 50 हजार रुपए नहीं दिए तो वह उस सीडी को उस की मां और पत्नी को दे देगी. इसी बात से गुस्से में उस ने निशा से बदला लेने के लिए उस की मां और भाई की हत्या कर दी थी.

                                                                                                                                              क्रमशः

बेईमान प्यार : बेमौत मारा गया परिवार – भाग 1

22 अगस्त, 2010 की सुबह 10 बजे पुलिस कंट्रोल रूम को सूचना मिली कि हैबोवाल की दुर्गापुरी कालोनी की गली नंबर 5 के मकान नंबर- 7187/1 में 2 लोगों की हत्या हो गई है. सूचना मिलते ही थाना सलेम टाबरी के थानाप्रभारी इंसपेक्टर निर्मल सिंह, सीआईए इंचार्ज इंसपेक्टर हरपाल सिंह, इंसपेक्टर दविंद्र कुमार, एसएचओ डिवीजन नंबर 4 तथा दुर्गापुरी पुलिसचौकी इंचार्ज सबइंसपेक्टर बिट्टन कुमार मेरे पहुंचने से पहले ही घटनास्थल पर पहुंच गए थे. जिस मकान में हत्याएं हुई थीं, उस के बाहर लोगों की काफी भीड़ लगी थी.

पड़ोसियों ने बताया कि उन्होंने सुबह लगभग साढ़े 9 बजे मकान के भीतर तेज चीखों की आवाजें सुनी थीं. चूंकि उस वक्त अंदर तेज आवाज में टीवी चल रहा था, इसलिए यह समझना मुश्किल था कि आवाजें टीवी की थीं या मकान में रहने वालों की. मकान का दरवाजा अंदर से बंद था. थोड़ी देर बाद जब पड़ोसियों को लगा कि चीखें टीवी की नहीं, बल्कि उस में रहने वालों की थीं तो उन्होंने मुख्य द्वार तोड़ कर भीतर जा कर देखा.

अंदर अलगअलग कमरों में 2 लाशें पड़ी थीं. इस के बाद घटना की सूचना पुलिस को दी गई थी. मैं ने मकान के भीतर जा कर देखा. एक कमरे में अधेड़ उम्र की महिला की रक्तरंजित लाश पड़ी थी. उस के शरीर पर तेजधार हथियार के कई घाव थे, जिस में से खून रिस रहा था. दूसरे कमरे में लगभग 40 वर्षीय एक व्यक्ति की रक्तरंजित लाश पड़ी थी. उस के शरीर पर भी तेजधार हथियार के घाव थे. वह विकलांग था. उस की व्हीलचेयर वहीं पास में उलटी पड़ी थी. देखने से ही लग रहा था कि विकलांग होने के बावजूद उस ने हत्यारों का विरोध किया था. दोनों को ही बड़ी बेरहमी से मारा गया था.

मैं ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया. कमरे में रखा टीवी अभी भी चल रहा था. मेरे इशारे पर सबइंसपेक्टर बिट्टन कुमार ने टीवी बंद कर दिया. क्राइम टीम और फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट को भी बुलाया गया था, साथ ही डौग स्क्वायड को भी. जासूस कुत्ते लाश को सूंघ कर मकान के पिछवाड़े जा कर रुक गए. संभवत: हत्यारे वहां से किसी सवारी में बैठ कर गए थे.

मकान की अच्छी तरह छानबीन की गई. लूटपाट के लक्षण दिखाई नहीं दे रहे थे. हत्याएं शायद आपसी रंजिश के कारण हुई थीं. टीवी के पास खून सना एक खंजरनुमा चाकू पड़ा था. मैं ने फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट को उसे संभाल कर रखने के लिए कहा. हत्याएं शायद चाकू से की गई थीं. मैं पुलिस टीम के साथ मुआयना कर रहा था कि पड़ोसियों से पता चला कि यहां सिर्फ हत्याएं ही नहीं हुई थीं, बल्कि इस परिवार के 2 अन्य लोग लापता भी थे.

इंसपेक्टर हरपाल सिंह ने पूछताछ के आधार पर मुझे बताया कि इस परिवार के मुखिया का नाम रोशनलाल था और वह रेलवे से रिटायर्ड था. इस के पहले यह परिवार चंद्रनगर में रहता था. रोशनलाल की पत्नी का नाम शकुंतला था. दोनों की 4 संतानें थीं, जिन में सब से बड़ी 47 वर्षीया बेटी स्वीटी शादीशुदा थी और इंग्लैंड में रहती थी. दूसरे नंबर का बेटा राजेश कुमार उर्फ राजू अपाहिज था, लेकिन घर में काम कर के लगभग 10 हजार रुपए महीना कमा लेता था.

तीसरे नंबर की बेटी सीमा भी शादीशुदा थी, लेकिन 3 साल पहले पीलिया से उस की मृत्यु हो चुकी थी. सब से छोटी 36 वर्षीया निशा थी. बीए पास निशा किसी प्राइवेट कंपनी में कार्यरत थी. लगभग 2 महीने पहले इन लोगों ने अपना चंद्रनगर वाला मकान 70 लाख रुपए में बेचा था. लगभग डेढ़ महीने पहले ही यह परिवार इस मकान में रहने आया था. यह मकान उन्होंने 40 लाख रुपए में खरीदा था. कत्ल शकुंतला और राजेश कुमार उर्फ राजू का हुआ था. जबकि रोशनलाल और निशा गायब थे.

मैं ने इंसपेक्टर निर्मल सिंह को आदेश दिया कि लाशों का पंचनामा भर कर पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दें. साथ ही इंसपेक्टर हरपाल सिंह से कहा कि पड़ोसियों से पूछताछ कर के बापबेटी की तलाश में संभावित जगहों पर छापे मारें. जबकि सबइंस्पेक्टर बिट्टन कुमार को मैं ने अस्पतालों, बसस्टैंड, रेलवे स्टेशन पर बापबेटी की तलाश करवाने तथा जिले के अन्य सभी थानों में उन का हुलिया बता कर वायरलैस मैसेज भिजवाने की जिम्मेदारी सौंपी.

चूंकि यह केस पुलिस कमिश्नर की नजर में आ गया था, इसलिए इन कामों से फारिग हो कर उन्हें रिपोर्ट देने मैं उन के औफिस पहुंच गया. मैं ने अपनी परेशानी बता कर उन से कहा, ‘‘सर, समस्या यह है कि यह परिवार मोहल्ले में नया है. पड़ोसियों को इन के बारे में ज्यादा कुछ जानकारी नहीं है.’’

‘‘ठीक है, जैसा भी हो हर नजरिए से जांच करो. इस के लिए कई टीमें बना कर लगाओ. और हां, सब से जरूरी है बापबेटी का पता लगाना.’’

कमिश्नर साहब के पास से लौट कर मैं ने एक बार फिर घटनास्थल पर जा कर पड़ोसियों से पूछताछ की. काफी लंबी छानबीन के बाद काम की एक बात पता चली. मैं ने जब रोशनलाल के घर पर आनेजाने वाले लोगों की लिस्ट बनाई तो पता चला कि रमित कुमार भंडारी उर्फ रिकी नाम का एक युवक रोशनलाल के घर कुछ ज्यादा ही आताजाता था. मैं ने हरपाल सिंह से रमित के बारे पता लगाने को कहा.

हरपाल सिंह ने पता लगा कर बताया कि रमित कुमार भंडारी जस्स्यिं रोड, तरसेम कालोनी के मकान नंबर बी34/6614 में रहता था. वह रमित का मोबाइल नंबर भी ले आए थे. मेरे कहने पर सबइंसपेक्टर बिट्टन कुमार ने रमित को फोन किया, पर उस ने फोन नहीं उठाया. जब उसे कई बार फोन किया गया तो उधर से कंप्यूटराइज्ड आवाज आने लगी कि यह नंबर पहुंच के बाहर है.

काफी कोशिशों के बावजूद हमें तफ्तीश को आगे बढ़ाने का कोई रास्ता नहीं मिल रहा था. कह सकते हैं कि हम अंधेरे में तीर मार रहे थे. ऐसे में जांच आगे बढ़ाने के लिए हमें केवल रमित भंडारी ही एकमात्र सहारा नजर आ रहा था. हमारी सारी उम्मीदें उसी पर टिकी थीं. इसलिए हम उस का नंबर मिलाते रहे.

आखिर उस ने फोन उठा लिया. सबइंस्पेक्टर बिट्टन कुमार ने उसे मेरे औफिस आने को कहा. उस ने बताया था कि उस समय वह जालंधर में है और आधे घंटे में हाजिर हो जाएगा. मैं अपने औफिस में बैठा उस का इंतजार करता रहा.

इंसपेक्टर हरपाल सिंह ने कहीं से मृतका शकुंतला के मायके का पता ढूंढ़ निकाला था. उस के पिता जगतराम की फगवाड़ा में टेलरिंग की दुकान थी.  पता मिल गया तो इस घटना की सूचना मृतका के भाइयों अशोक, सुखविंदर और जसविंदर को दे दी गई थी.

                                                                                                                                             क्रमशः