Crime News : लाल कंघी से खुला कातिल का राज

Crime News : देवयानी की हत्या के संबंध में पुलिस ने उस की मां से ही नहीं बल्कि उस के प्रेमी से भी पूछताछ की थी, लेकिन कोई सफलता नहीं मिली. आखिर घटनास्थल पर पुलिस को जो लाल कंघी मिली थी, वही उसे हत्यारे तक इस तरह ले गई कि…

सर्दी की रात थी. साढ़े 9 बजे kahan के थाने में औसानगंज रोड पर एक लड़की की गोली मार कर हत्या किए जाने की सूचना मिली. पुलिस दल ने मौके पर पहुंच कर सुनसान हो चुके इलाके का मुआयना किया. फिर लाश की शिनाख्त में जुट गए. गोरीचिट्टी, इकहरे बदन की खूबसूरत नाकनक्श वाली करीब 25 वर्षीय युवती को किसी ने पीछे से गोली मारी थी. जांच के दौरान मौके से एक लाल रंग की कंघी मिली. युवती के पास एक बैग भी था. युवती के बैग से एक मोबाइल फोन मिला. उसी से उस के घर का पता चला. उस के घर सूचना दे दी गई. वह देवयानी थी. इसी मोहल्ले की रहने वाली.

उस की मौत घटनास्थल पर ही हो चुकी थी, फिर भी उसे डाक्टर की पुष्टि के लिए अस्पताल भेज दिया गया. वहीं से लाश को पोस्टमार्टम के लिए भी भेजा गया, ताकि कुछ और जानकारियां मिल सकें. सूचना पा कर मृतका की मां भागीभागी अस्पताल आईं. उन्होंने बताया कि उस के पति की हाल में ही हार्ट की बाइपास सर्जरी हुई थी. परिवार के लोग पहले से ही परेशान चल रहे थे. उस पर ये हादसा. 2 छोटे भाईबहनों और पूरे परिवार के देखभाल की जिम्मेदारी अकेली देवयानी पर ही थी. उस की मां ने बताया कि औफिस के काम की वजह से वह घर अकसर लेट आती थी.

पुलिस ने देवयानी की मां से उस के औफिस का पता ले कर देवयानी के बारे में कुछ और सवाल पूछे. किसी पर शक, उस के प्रेम प्रसंग, किसी से दोस्ती या दुश्मनी, चालचलन, फेसबुक फ्रैंड आदि के बारे में सवाल किए गए. कई सवालों पर देवयानी की मां नाराज हो गई. उस ने सख्ती से बताया कि उन की बेटी के चालचलन पर किसी भी तरह का शक नहीं किया जा सकता. पुलिस ने देवयानी की मां की भावनाओं की कद्र करते हुए जांच आगे बढ़ाई. आसपास के सीसीटीवी कैमरे खंगाले गए, हालांकि वे खराब थे. कोई सुराग हाथ नहीं लगा. अज्ञात के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर जांच के लिए अगले ही रोज पुलिस देवयानी के औफिस पहुंच गई.

औफिस में जिस ने भी देवयानी की आकस्मिक मौत की खबर सुनी, सन्न रह गया. वहीं सुपरवाइजर से मालूम हुआ कि मौत के दिन देवयानी समय पर औफिस से निकली थी. इस की पुष्टि अटेंडेंस की बायोमैट्रिक जांच से भी हो गई. इस आधार पर उस की मां का यह कहना गलत हो गया कि वह उस रोज काम निपटा कर देर से लौटती थी. इसी बीच पुलिस को कमल नामक युवक के बारे में जानकारी मिली. उस वक्त कमल दिल्ली में था. बुलाने पर उस के 2 दिन बाद थाने आते ही पुलिस ने उस से सीधा सवाल दागा, ‘‘तुम देवयानी को कब से जानते हो?’’

‘‘जी, पिछले एक साल से,’’ कमल डरते हुए बोला.

‘‘तुम्हारा उस के साथ क्या रिश्ता था?’’ पुलिस ने अगला सवाल किया.

‘‘सर, हम दोस्त थे,’’ कमल बोला.

‘‘सिर्फ दोस्त या कुछ और भी..?’’

यह सुन कर कमल थोड़ा सहमा. फिर झिझकते हुए पूछा, ‘‘जी, मैं कुछ समझा नहीं.’’

‘‘साफसाफ बताओ, वरना ठीक नहीं होगा.’’ पुलिसिया घुड़की से कमल कुछ और सहम गया.

‘‘मुझे पता है मर्डर के दिन तुम्हारी उस से एक बार बात हुई थी. झूठ नहीं बोलना, क्या तुम्हारे उस के साथ जिस्मानी संबंध थे?’’ पुलिस ने पूछा.

‘‘यह क्या कह रहे हैं सर! बिना शादी के यह कैसे? हां, उस ने मुझ से एक बार बात जरूर की थी.’’

‘‘क्या बात हुई थी?’’

‘‘वह नौकरी से खुश नहीं थी. कहती थी वहां का माहौल ठीक नहीं है. कर्मचारी ठीक नहीं हैं.’’ कमल ने बताया.

पुलिस ने उस से और अधिक कुछ नहीं पूछा. एक हिदायत के साथ जाने दिया कि देवयानी के बारे में जो भी जानकारी मिले, तुरंत हमें बताए.

जांच अधिकारी ने एक बार फिर देवयानी की मां से पूछताछ शुरू की. उस से सवाल किया, ‘‘आप ने बताया था कि देवयानी के कोई बौयफ्रैंड नहीं है, तब कमल कहां से आ टपका? कुछ और बात जानती हैं तो बताइए, वरना हत्यारा नहीं पकड़ा जाएगा.’’

देवयानी की मां अब यह झेंपती हुई बोली, ‘‘मुझे सिर्फ इतना ही पता था कि उस रोज वह देर से घर आएगी.’’

‘‘देवयानी की और भी किसी से दोस्ती थी?कोई और बौयफ्रैंड भी था?’’

यह सुन कर देवयानी की मां बिफर पड़ी, ‘‘आप ने समझ क्या रखा है मेरी बेटी को? बदचलन बनाने पर तुले हुए हैं?’’

इस तरह की कुछ और पूछताछ महज बहस बन कर रह गई. कोई नतीजा नहीं निकला.

पुलिस यह मान कर चल रही थी कि देवयानी घर की एकमात्र कमाऊ सदस्या होने का फायदा भी जरूर उठाती होगी. उस ने परिवार के लोगों की नजरें बचा कर जरूर किसी के साथ गहरे संबंध बना रखे होंगे. खैर, कुछ दिनों में ही पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी आ गई. उस से कुछ सवालों के जवाब मिल गए. इस के बाद पुलिस को जांच में फ्रैंडशिप और लव अफेयर से ले कर सैक्स रिलेशन तक का खुलासा हो गया. रिपोर्ट के अनुसार, उसे गोली तमंचे से मारी गई थी और वह गर्भवती भी थी. चौंकाने वाली इस जानकारी के आधार पर पुलिस अब सीधे हत्यारे तक पहुंचने की कोशिश में जुट गई.

सादे कपड़ों में कुछ पुलिसकर्मियों को देवयानी के घर के आसपास लगा दिया गया.  जांच की सुई एक बार फिर कमल की ओर घूम गई. हालांकि उस से पहले पुलिस उस के खिलाफ कुछ सबूत जुटाना चाहती थी. एक हफ्ते तक पुलिस इधरउधर हाथ मारती रही, परंतु कोई सुराग हाथ नहीं लगा. सिर्फ इतना पता चल पाया कि देवयानी का औफिस के किसी पूर्व कर्मचारी विशाल के साथ अफेयर था. वह विवाहित था. उम्र भी उस से 10 साल अधिक 35 के करीब थी. यह जानकारी पुलिस के लिए अहम थी.

इस दिशा में जांच से पता चला कि विशाल इन दिनों बाराबंकी स्थित एक कंपनी में नौकरी कर रहा है. बाराबंकी लखनऊ के करीब होने के कारण विशाल का देवयानी से मिलनाजुलना आसानी से संभव था.

विशाल को थाने बुला कर पूछताछ की गई. उस ने देवयानी के साथ काम करने की बात स्वीकार ली. किंतु उस की हत्या की सूचना से एकदम से चौंक गया. सख्ती से पूछताछ के बावजूद वह बहुत ज्यादा जानकारी नहीं दे पाया. उस ने बताया कि उसे नौकरी छोड़े 6 महीने बीत गए हैं. इस बीच देवयानी के साथ क्या हुआ, उसे कुछ भी नहीं मालूम. बातचीत के सिलसिले में पुलिस ने विशाल का मोबाइल फोन ले लिया. उस की गैलरी देखी. उस में विशाल और देवयानी के अंतरंग संबंध की एक तसवीर दिख गई. मौल में ली गई एक सेल्फी में देवयानी के साथ एक और महिला भी थी. विशाल से पूछने पर उस ने उसे अपनी पत्नी बताया.

विशाल को कुरेदने के लिए ये तसवीरें काफी थीं. पुलिस ने विशाल पर सख्ती दिखाते हुए कहा, ‘‘देवयानी गर्भ से थी. तुम ने ही उस की जिंदगी बरबाद की और उस की हत्या भी कर डाली…’’

यह सुनते ही विशाल के चेहरे का रंग फीका पड़ गया. किंतु बारबार कहता रहा कि ऐसी घिनौनी हरकत वह नहीं कर सकता. उस का देवयानी के साथ पारिवारिक संबंध थे. पत्नी भी देवयानी की अच्छी सहेली थी. इस पर जांच अधिकारी ने विशाल को देवयानी के बारे में वे सारी बातें बताने को कहा, जो अभी तक छिपाए हुए था. सर्विलांस से पुलिस को विशाल और देवयानी की मां के बीच फोन पर हुई बातचीत की जानकारी मिल चुकी थी. अब विशाल के साथसाथ देवयानी की मां से भी एक ही लाइन में पूछताछ होने लगी. देवयानी की मां और विशाल दोनों ने इस की पुष्टि कर दी.

देवयानी की मां ने जो बताया, वह भी कुछ कम राज की बात नहीं थी. उन्होंने कहा कि विशाल के साथ उस के पारिवारिक संबंध थे. वह कई बार अपनी पत्नी के साथ उस के घर आ चुका था. यहां तक कि विशाल की बहन की शादी में वह सपरिवार शामिल भी हो चुकी थी. पूछताछ में ही देवयानी की मां ने कह डाला कि उस की मौत के 2 दिन बाद भी विशाल से बात हुई थी. यह सुन कर जांच अधिकारी चौंक पड़े, क्योंकि विशाल खुद को देवयानी की मौत से अनजान बता चुका था. पूछताछ में देवयानी की मां ने विशाल से बातचीत के मुद्दे के बारे में बताया कि उन्होंने उस से कुछ रुपए की मदद मांगी थी. उस के घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी.

पहले भी विशाल उस के पति की बाईपास सर्जरी के लिए 3 लाख रुपए दे चुका था. फिर भी उसी दिन विशाल ने एक बार फिर 50 हजार रुपए ट्रांसफर कर दिए थे. जांच अधिकारी सोच में पड़ गए कि देवयानी की मौत के बारे में जानने के बावजूद उस ने पैसे क्यों दिए? आखिर उस की मदद के पीछे क्या राज हो सकता है? इन्हीं सवालों के जवाब जानने के लिए विशाल को थाने बुला कर फिर से पूछताछ की गई. जांच अधिकारी ने डांटते हुए उस से पूछा, ‘‘तुम ने देवयानी की मौत के बाद उस की मां से फोन पर बातचीत और उसी दिन पैसे ट्रांसफर की बात क्यों छिपाई, जबकि मैं ने सारी बातें तुम से बताने को कहा था. पैसा देने के पीछे तुम्हारा क्या मकसद था?’’

‘‘हांहां, कुछ बातें मैं ने नहीं बताईं. बताना जरूरी नहीं समझा… देवयानी की मौत के बाद भी मैं ने उस की मां को पैसे की मदद की, क्योंकि वह मुसीबत में थी.’’ विशाल ने बौखलाहट के साथ जवाब दिया.

पुलिस समझ चुकी थी कि उस के पास कोई ठोस जवाब नहीं है. उन्होंने डपटते हुए पूछा, ‘‘सचसच बताओ, पूरा माजरा क्या है?’’

जवाब में उस ने चुप्पी साध ली. इसी बीच जांच अधिकारी ने अपनी जेब से एक लाल कंघी निकाली. उसे देखते ही विशाल तपाक से बोल उठा, ‘‘अरे, यह तो मेरी कंघी है, आप को कहां मिली?’’

‘‘देवयानी की लाश के पास से.’’

यह सुनना था कि विशाल के चेहरे का रंग फीका पड़ गया. उस के बाद विशाल खुद को काबू में नहीं रख पाया. उस ने जो कुछ बताया उस से न केवल हत्या का राज खुल गया, बल्कि उस के पीछे के कारणों में अनैतिक प्रेम, अवैध संबंध और ब्लैकमेल भी उजागर हो गया. विशाल ने देवयानी के साथ संबंधों का खुलासा कुछ इस प्रकार किया—

देवयानी पहली बार औफिस में काम करने आई थी. उसे देखते ही मैं उस के रूपरंग और मदमस्त यौवन का दीवाना बन गया था. वह बहुत जल्द मेरे जाल में फंस गई थी, क्योंकि उसे काम सिखाना मेरे ही जिम्मे था. बहुत जल्द ही वह मेरे काफी करीब आ गई थी. हम ने सीमा रेखा लांघ ली थी. उस पर परदा डालने के लिए मैं ने अपनी बीवी से उस की दोस्ती करवा दी. इस तरह सब की नजरों में देवयानी के साथ मेरा पारिवारिक संबंध था. बीवी को भी मेरे और देवयानी के साथ गहरे संबंधों की भनक नहीं थी. कुछ दिनों बाद मैं बाराबंकी चला आया, लेकिन देवयानी से मिलनाजुलना जारी रहा. संयोग से वहां भी मेरे एक महिला से संबंध बन गए. इस की जानकारी देवयानी को हो गई. इस पर उस ने जबरदस्त आपत्ति की. एक बार तो बाराबंकी आ कर उस ने मुझ से खूब झगड़ा किया. तभी मालूम हुआ कि वह गर्भ से है.

उस ने मुझ से शादी की जिद भी की. जब मैं ने इनकार किया, तब उस ने हमारी अंतरंग तसवीरें और बातचीत के औडियो जगजाहिर करने की धमकी दी. मैं इसी डर से उस का मुंह बंद रखने के लिए उस की आर्थिक मदद करता रहा. पहले उस के पिता के इलाज के लिए पैसे दिए. इस बीच उस पर गर्भ गिराने के लिए दबाव भी डाला, लेकिन वह नहीं मानी. उस ने मेरी बीवी को सारी बात बता दी. तमाम तसवीरें दिखा दीं. नाराज बीवी ने मुझ से डाइवोर्स की मांग कर दी. बीवी की डाइवोर्स की बात पर मैं ने एक बार फिर देवयानी को गर्भ गिराने और संबंध हमेशा के लिए खत्म करने की मिन्नत की, लेकिन वह शादी की रट लगाए रही. अंतत: मैं ने उसे हमेशा के लिए खत्म करने का निर्णय ले लिया.

घटना के बारे में विशाल ने बताया कि मैं ने उसे एक रेस्टोरेंट में उसे बुलाया था. उस ने समझा कि शायद मैं उस की बात मानने के लिए तैयार हो गया हूं. इसलिए वह रेस्टोरेंट में पहुंच गई. मैं ने उसे एक बार फिर समझाने की कोशिश की कि वह गर्भ गिरा दे. इस पर वह कहने लगी कि वह मुझे भूल नहीं सकती. अगर मैं ने बात नहीं मानी तो वह मुझे कोर्ट तक घसीटेगी. कोर्ट की बात पर ही मुझे काफी गुस्सा आ गया. मैं उठ खड़ा हुआ. उस ने भी कुरसी छोड़ दी और मोबाइल बैग में रखते हुए रेस्टोरेंट से तेजी से बाहर निकल गई.

मैं ने उस का पीछा किया. सुनसान जगह पर जब वह पहुंची तो तमंचे से उसे पीछे से गोली मार दी. मैं पूरी तैयारी के साथ आया था. उस के बाद तमंचा छिपाने की हड़बड़ी में मेरी जेब से मेरी कंघी गिर गई. इस तरह से विशाल ने अपना जुर्म कुबूल कर लिया था. Crime News

तुमने क्यों कहा मैं सुंदर हूं – भाग 5

‘‘कुछ समय बाद मैं और तुम सेवानिवृत्त हो गए. मैं अब वकील साहिबा को देखने के लिए नियमितरूप से मानसिक अस्पताल जाने लगा और उन के साथ काफी समय गुजारने लगा. एक दिन अस्पताल की डाक्टर ने मुझ से कहा, ‘देखिए, अब वह बिलकुल स्वस्थ हो गई है. वह वकालत फिर से कर पाएगी, यह तो नहीं कहा जा सकता मगर एक औरत की सामान्य जिंदगी जी पाएगी, बशर्ते उसे एक मित्रवत व्यक्ति का सहारा मिल सके जो उसे यह यकीन दिला सके कि वह उसे तन और मन से संरक्षण दे सकता है.

‘‘पत्नी की मृत्यु के बाद मैं ने अपनी संतानों द्वारा मुझे लगभग पूरी तरह इग्नोर कर दिए जाने के चलते गहराए अकेलेपन से छुटकारा पाने के लिए उन का दिल से मित्र बनने का संकल्प लिया. इस बारे में बच्चों से बात की, तो पुत्र ने तो केवल इतना कहा, ‘आप तो हमें भारतीय सभ्यता, संस्कृति और सामाजिक नैतिकता की बातें सिखाया करते थे,

अब हम क्या कहें.’ मगर बड़ी पुत्री ने कहा, ‘आया का देर से आने की सूचना देने के बावजूद आप का औफिस चले जाना और इस बीच उसी दिन मम्मी की दवाइयों का असर समय से पहले ही खत्म होने के कारण उन का बीच में जाग जाना व अपनी दवाइयां घातक होने की हद तक अपनेआप खा लेना पता नहीं कोई कोइंसीडैंट था या साजिश.

ऐसी क्या मजबूरी थी कि आप पूरे दिन की नहीं, तो आधे दिन की छुट्टी नहीं ले सके उस दिन. लगता है मम्मी ने डिप्रैशन में नींद की गोलियों के साथ ब्लडप्रैशर कम करने की गोलियां इतनी ज्यादा तादाद में खुद नहीं ली थीं. किसी ने उन्हें जान कर और इस तरह दी थीं कि लगे कि ऐसा उन्होंने डिप्रैशन की हालत में खुद यह सब कर लिया.’

‘‘यह सुन कर तो मैं स्तब्ध ही रह गया. छोटी पुत्री ने, ‘अब मैं क्या कहूं, आप हर तरह आजाद हैं. खुद फैसला कर लें,’ जैसी प्रतिक्रिया दी. तो एक बार तो लगा कि पत्नी की बची पड़ी दवाइयों की गोलियां मैं भी एकसाथ निगल कर सो जाऊं, मगर यह सोच कर कि इस से किसी को क्या फर्क पड़ेगा, इरादा बदल लिया और पिछले कुछ दिनों से सब से अलग इस गैस्टहाउस में रहने लगा हूं. परिचितों को इसी उपनगर में चल रहे किसी धार्मिक आयोजन में व्यस्त होने की बात कह रखी है.’’ यह सब कह कर मेरे मित्र शायद थक कर खामोश हो गए.

काफी देर मौन पसरा रहा हमारे बीच, फिर मित्र ने ही मौन भंग किया, और बड़े निर्बल स्वर में बोले, ‘‘मैं ने तुम्हें इसलिए बुलाया है कि तुम बताओ, मैं क्या करूं?’’

मित्र के सवाल करने पर मुझे अपना फैसला सुनाने का मौका मिल गया. सो, मैं बोला, ‘‘अभिनव तुम्हें क्या करना है, तुम दोनों अकेले हो. वकील साहिबा के अंदर की औरत को तुम ने ही जगाया था और उन के अंदर की जागी हुई औरत ने तुम्हारे हताशनिराश जीवन में नई उमंग पैदा की और तुम्हारे परिवार को तनमन से अपने प्यार व सेवा का नैतिक संबल दे कर टूटने से बचाया.

ऐसे में उसे जीवन की निराशा से टूटने से उबार कर नया जीवन देने की तुम्हारी नैतिक जिम्मेदारी बनती है. उस के द्वारा तुम्हारे परिवार पर किए गए एहसानों को चुकाने का समय आ गया है. तुम वकील साहिबा से रजिस्ट्रार औफिस में बाकायदा विवाह करो, जिस से वे तुम्हारी विधिसम्मत पत्नी का दर्जा पा सकें और भविष्य में कभी भी तुम्हारी संतानें उन्हें सता न सकें. तुम्हारे संतानों की अब अपनी दुनिया है, उन्हें उन की दुनिया में रहने दो.’’

मेरी बात सुन कर मित्र थोड़ी देर कुछ फैसला लेने जैसी मुद्रा में गंभीर रहे, फिर बोले, ‘‘चलो, उन के पास अस्पताल चलते हैं.’’

मित्र के साथ अस्पताल पहुंच कर डाक्टर से मिले, तो उन्होंने सलाह दी कि आप उन के साथ एक नई जिंदगी शुरू करेंगे, इसलिए उन्हें जो भी दें, वह एकदम नया दें और अपनी दिवंगत पत्नी के कपड़े या ज्वैलरी या दूसरा कोई चीज उन्हें न दें. साथ ही, कुछ दिन उस पुराने मकान से भी कहीं दूर रहें, तो ठीक होगा.

डाक्टर से सलाह कर के और उन्हें कुछ दिन अभी अस्पताल में ही रखने की अपील कर के हम घर लौटे तो पड़ोसी ने घर की चाबी दे कर बताया कि उन की छोटी बेटी सरकारी गाड़ी में थोड़ी देर पहले आई थी. आप द्वारा हमारे पास रखाई गई घर की चाबी हम से ले कर बोली कि उन्होंने मां की मृत्यु के बाद आप को अकेले नहीं रहने देने का फैसला लिया है, और काफी बड़े सरकारी क्वार्टर में वह अकेली ही रहती है, इसलिए अभी आप का कुछ जरूरी सामान ले कर जा रही है. आप ने तो कभी जिक्र किया नहीं, मगर बिटिया चलते समय बातोंबातों में इस मकान के लिए कोई ग्राहक तलाशने की अपील कर गई है.

ताला खोल कर हम अंदर घुसे तो पाया कि प्रशासनिक अधिकारी पुत्री उन के जरूरी सामान के नाम पर सिर्फ उन की पत्नी का सामान सारे वस्त्र, आभूषण यहां तक कि उन की सारी फोटोज भी उतार कर ले गई थी. एक पत्र टेबल पर छोड़ गई थी. जिस में लिखा था, ‘हम अपनी दिवंगता मां की कोई भी चीज अपने बाप की दूसरी बीवी के हाथ से छुए जाना भी पसंद नहीं करेंगे. इसलिए सिर्फ अपनी मां के सारे सामान ले जा रही हूं. आप का कोईर् सामान रुपयापैसा मैं ने छुआ तक नहीं है.

मगर आप को यह भी बताना चाहती हूं कि अब हम आप को इस घर में नहीं रहने देंगे. भले ही यह घर आप के नाम से है और बनवाया भी आप ने ही है, मगर इस में हमारी मां की यादें बसी हैं. हम यह बरदाश्त नहीं करेंगे कि हमारे बाप की दूसरी बीवी इस घर में हमारी मां का स्थान ले. आप समझ जाएं तो ठीक है. वरना जरूरत पड़ी तो हम कानून का भी सहारा लेंगे.’

पत्र पढ़ कर मित्र कुछ देर खिन्न से दिखे. तो मैं ने उन्हें थोड़ा तसल्ली देने के लिए फ्रिज से पानी की बोतल निकाल कर उन्हें थोड़ा पानी पीने को कहा तो वे बोले, ‘‘आश्चर्य है, तुम मुझे इतना कमजोर समझ रहे हो कि मैं इस को पढ़ कर परेशान हो जाऊंगा. नहीं, पहले मैं थोड़ा पसोपेश में था, मगर अब तो मैं ने फैसला कर लिया है कि मैं इस मकान को जल्दी ही बेच दूंगा.

पुत्री की धमकी से डर कर नहीं, बल्कि अपने फैसले को पूरा करने के लिए. इस की बिक्री से प्राप्त रकम के 4 हिस्से कर के 3 हिस्से पुत्र और पुत्रियों को दे दूंगा, और अपने हिस्से की रकम से एक छोटा सा मकान व सामान्य जीवन के लिए सामान खरीदूंगा. उस घर से मैं उन के साथ नए जीवन की शुरुआत करूंगा. मगर तब तक तुम्हें यहीं रुकना होगा. तुम रुक सकोगे न.’’ कह कर उन्होंने मेरा साथ पाने के लिए मेरी ओर उम्मीदभरी नजर से देखा.

मेरी सांकेतिक स्वीकृति पा कर वे बड़े उत्साह से, ‘‘किसी ने सही कहा है, अ फ्रैंड इन नीड इज अ फ्रैंड इनडीड,’’ कहते हुए कमरे के बाहर निकले, दरवाजे पर ताला लगा कर चाबी पड़ोसी को दी और सड़क पर आ गए. नई जिंदगी की नई राह पर चलने के उत्साह में उन के कदम बहुत तेजी से बढ़ रहे थे.

तुमने क्यों कहा मैं सुंदर हूं – भाग 4

‘‘इस तरह एक साल गुजर गया. उस दिन भी हाईकोर्ट में विभाग के विरुद्ध एक मुकदमे में मैं भी मौजूद था. विभाग के विरुद्ध वादी के वकील के कुछ हास्यास्पद से तर्क सुन कर जज साहब व्यंग्य से मुसकराए थे और उसी तरह मुसकराते हुए प्रतिवादी के वकील हमारी वकील साहिबा की ओर देख कर बोले, ‘हां वकील साहिबा, अब आप क्या कहेंगी.’

‘‘जज साहब के मुसकराने से अचानक पता नहीं वकील साहिबा पर क्या प्रतिक्रिया हुई. वे फाइल को जज साहब की तरफ फेंक कर बोलीं, ‘हां, अब तुम भी कहो, मैं, जवान हूं, सुंदर हूं, चढ़ाओ मुझे चने की झाड़ पर,’ कहते हुए वे बड़े आक्रोश में जज साहब के डायस की तरफ बढ़ीं तो इस बेतुकी और अप्रासंगिक बात पर जज साहब एकदम भड़क गए और इस गुस्ताखी के लिए वकील साहिबा को बरखास्त कर उन्हें सजा भी दे सकते थे पर गुस्से को शांत करते हुए जज साहब संयत स्वर में बोले, ‘वकील साहिबा, आप की तबीयत ठीक नहीं लगती, आप घर जा कर आराम करिए. मैं मुकदमा 2 सप्ताह बाद की तारीख के लिए मुल्तवी करता हूं.’

‘‘उस दिन जज साहब की अदालत में मुकदमा मुल्तवी हो गया. मगर इसके बाद लगातार कुछ ऐसी ही घटनाएं और हुईं. एक दिन वह आया जब एक दूसरे जज महोदय की नाराजगी से उन्हें मानसिक चिकित्सालय भिजवा दिया गया. अजीब संयोग था कि ये सभी घटनाएं मेरी मौजूदगी में ही हुईं.

‘‘वकील साहिबा की इस हालत की वजह खुद को मानने के चलते अपनी नैतिक जिम्मेदारी मानते हुए औफिस से ही समय निकाल कर उनका कुशलक्षेम लेने अस्पताल हो आता था. एक दिन वहां की डाक्टर ने मुझ से उन के रिश्ते के बारे पूछ लिया तो मैं ने डाक्टर को पूरी बात विस्तार से बतला दी. डाक्टर ने मेरी परिस्थिति जान कर मुलाकात का समय नहीं होने पर भी मुझे उन की कुशलक्षेम जानने की सुविधा दी. फिर डाक्टर ने सीधे उन के सामने पड़ने से परहेज रखने की मुझे सलाह देते हुए बताया कि वे मुझे देख कर चिंतित सी हो कर बोलती हैं, ‘तुम ने क्यों कहा, मैं सुंदर हूं.’ और मेरे चले आने पर लंबे समय तक उदास रहती हैं.

‘‘बेटा उच्चशिक्षा के बाद और बड़ी बेटी व दामाद किसी विदेशी बैंकिंग संस्थान में अच्छे वेतन व भविष्य की खातिर विदेश चले गए थे. छोटी बेटी केंद्र की प्रशासनिक सेवा में चयनित हो गई थी. मगर वह औफिसर्स होस्टल में रह रही थी. अब परिवार में मेरे और पत्नी के अलावा कोई नहीं था. उधर पत्नी के मन में मेरे और वकील साहिबा के काल्पनिक अवैध संबंधों को ले कर गहराते शक के कारण उन का ब्लडप्रैशर एकदम बढ़ जाता था, और फिर दवाइयों के असर से कईकई दिनों तक मैमोरीलेप्स जैसी हालत हो जाती थी.

‘‘इसी हालात में उन्हें दूसरा झटका तब लगा जब बेटे ने अपनी एक विदेशी सहकर्मी युवती से शादी करने का समाचार हमें दिया.

‘‘उस दिन मेरे मुंह से अचानक निकल गया, ‘अब मन्नू को तो वकील साहिबा ने नहीं भड़काया.’ मेरी बात सुन कर पत्नी ने कोई विवाद खड़ा नहीं किया तो मुझे थोड़ा संतोष हुआ. मगर उस के बाद पत्नी को हाई ब्लडप्रैशर और बाद में मैमोरीलेप्स के दौरों में निरंतरता बढ़ने लगी तो मुझे चिंता होने लगी.

‘‘कुछ दिनों बाद उन्हें फिर से डिप्रैशन ने घेर लिया. अब पूरी तरह अकेला होने कारण पत्नी की देखभाल के साथ दैनिक जीवन की जरूरतों को पूरा करना बेहद कठिन महसूस होता था. रिटायरमैंट नजदीक था, और प्रमोशन का अवसर भी, इसलिए लंबी छुट्टियां ले कर घर पर बैठ भी नहीं सकता था. क्योंकि प्रमोशन के मौके पर अपने खास ही पीठ में छुरा भोंकने का मौका तलाशते हैं और डाक्टर द्वारा बताई गई दवाइयों के असर से वे ज्यादातर सोई ही रहती थीं. फिर भी अपनी गैरहाजिरी में उन की देखभाल के लिए एक आया रख ली थी.

‘‘उस दिन आया ने कुछ देर से आने की सूचना फोन पर दी, तो मैं उन्हें दवाइयां, जिन के असर से वे कमसेकम 4 घंटे पूरी तरह सोईर् रहती थीं, दे कर औफिस चला गया था. पता नहीं कैसे उन की नींद बीच में ही टूट गई और मेरी गैरहाजिरी में नींद की गोलियों के साथ हाई ब्लडप्रैशर की दशा में ली जाने वाली गोलियां इतनी अधिक निगल लीं कि आया के फोन पर सूचना पा कर जब मैं घर पहुंचा तो उन की हालत देख कर फौरन उन्हें ले कर अस्पताल को दौड़ा. मगर डाक्टरों की कोशिश के बाद भी उन की जीवन रक्षा नहीं हो सकी.

‘‘पत्नी की मृत्यु पर बेटे ने तो उस की पत्नी के आसन्न प्रसव होने के चलते थोड़ी देर इंटरनैट चैटिंग से शोक प्रकट करते हुए मुझ से संवेदना जाहिर की थी, मगर दोनों बेटियां आईं थी. छोटी बेटी तो एक चुभती हुई खमोशी ओढ़े रही, मगर बड़ी बेटी का बदला हुआ रुख देख कर मैं हैरान रह गया.

वकील साहिबा को मौसी कह कर उन के स्नेह से खुश रहने वाली और बैंकसेवा के चयन से ले कर उस के जीवनसाथी के साथ उस का प्रणयबंधन संपन्न कराने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निबाहने के कारण उन की आजीवन ऋ णी रहने की बात करने वाली मेरी बेटी ने जब कहा, ‘आखिर आप के और उन के अफेयर्स के फ्रस्टेशन ने मम्मी की जान ले ही ली.’ और मां को अपनी मौसी की सेवा की याद दिलाने वाली छोटी बेटी ने भी जब अपनी बहन के ताने पर भी चुप्पी ही ओढ़े रही तो मैं इस में उस का भी मौन समर्थन मान कर बेहद दुखी हुआ था.

तुमने क्यों कहा मैं सुंदर हूं – भाग 3

‘‘दिन बीतते रहे. बातचीत में, हंसीमजाक से नजदीकी बढ़ते हुए उस दिन एक बात पर वे हंसी के साथ मेरी और झुक गईं तो मैं ने उन्हें बांहों में बांध लिया. उन्होंने एकदम तो कोई विरोध नहीं किया मगर जैसे ही उन्हें आलिंगन में कसे हुए मेरे होंठ उन्हें चूमने के लिए बढ़े, अपनी हथेली को बीच में ला कर उन्हें रोकते हुए वे बोलीं, ‘देखिए, लंबे समय से अपने घरपरिवार और अपनों से अलग रहते अकेलेपन को झेलती तल्ख जिंदगी में आप से पहली ही मुलाकात में आप के अंदर एक अभिभावक का स्वरूप देख कर आप मुझे अच्छे लगने लगे थे.

‘‘आप से बात करते हुए मुझे एक अभिभावक मित्र का एहसास होता है. आप के परिवार में आप की बेटियों से मिल कर उन के साथ बातें कर के समय बिताते मुझे एक पारिवारिक सुख की अनुभूति होती है. मेरे अंदर का मातृत्वभाव तृप्त हो जाता है. इसलिए आप से, आप के परिवार से मिले बिना रह नहीं पाती.

‘‘हमारा परिचय मजबूत होते हुए यह स्थिति भी आ जाएगी, मैं ने सोचा नहीं था. फिर भी आप अगर आज यह सब करना चाहेंगे तो शायद आप की खुशी की खातिर आप को रोकूंगी नहीं, मगर इस के बाद मैं एकदम, पूरी तरह से टूट जाऊंगी. मेरे मन में आप की बनाई हुई एक अभिभावक मित्र की छवि टूट जाएगी.

आप की बेटियों से मिल कर बातें कर के मेरे मन में उमंगती मातृत्व की सुखद अनुभूति की तृप्ति की आशा टूट जाएगी. मैं पूरी तरह टूट कर बिखर जाऊंगी. क्या आप मुझे इस तरह टूट कर बिखर जाने देंगे या एक परिपक्व मित्र का अभिभावक बन सहारा दे कर एक आनंद और उल्लास से पूर्ण जीवन प्रदान करेंगे, बोलिए?’

‘‘यह कहते भावावेश में उन की आवाज कांपने लगी और आंखों से आंसू बहने लगे. मेरी चेतना ने मुझे एकदम झकझोर दिया. जिस्म की चाहत का जनून एक पल में ठंडा हो गया. अपनी बांहों से उन्हें मुक्त करते हुए मैं बोला, ‘मुझे माफ कर देना. पलभर को मैं बहक गया था. मगर अब अपने मन का द्वार बंद मत करना.’

‘यह द्वार दशकों बाद किसी के सामने अपनेआप खुला है, इसे खुला रखने का दायित्व अब हम दोनों का है. आप और मैं मिल कर निभाएंगे इस दायित्व को,’ कह कर उन्होंने मेरा हाथ कस कर थाम लिया, फिर चूम कर माथे से लगा लिया.

‘‘उस दिन के बाद उन का मेरे घरपरिवार में आना ज्यादा नियमित हो गया. एक घरेलू महिला की तरह उन की नियमित देखभाल से बच्चे भी काफी खुश रहने लगे थे. एक दिन घर पहुंचने पर मैं बेहद पसोपेश में पड़ गया. मेरी बड़ी बेटी पत्नी के कमरे के बाहर बैठी हुई थी. और कमरे का दरवाजा अंदर से बंद था.

मेरे पूछने पर बेटी ने बताया कि आज भी सेविका नहीं आई है और उसे पत्नी के गंदे डायपर बदलने में काफी दिक्कत हो रही थी. तभी अचानक मौसी आ गईं. उन्होंने मुझे परेशान देख कर मुझे कमरे के बाहर कर दिया और खुद मम्मी का डायपर बदल कर अब शायद बौडी स्पंज कर रही हैं. तभी, ‘मन्नो, दीदी के कपड़े देदे,’ की आवाज आई.

‘‘बेटी ने उन्हें कपड़े पकड़ा दिए. थोड़ी देर में वकील साहिबा बाहर निकलीं तो उन के हाथ में पत्नी के गंदे डायपर की थैली देख कर मैं शर्मिंदा हो गया और ‘अरे वकील साहिबा, आप यह क्या कर रही हैं,’ मुश्किल से कह पाया, मगर वे तो बड़े सामान्य से स्वर में, ‘पहले इन को डस्टबिन में डाल दूं, तब बातें करेंगे,’ कहती हुई डस्टबिन की तरफ बढ़ गईं.

‘‘डस्टबिन में गंदे डायपर डाल कर वाशबेसिन पर हाथ धो कर वे लौटीं और बोलीं, ‘मैं ने बच्चों को मुझे मौसी कहने के लिए यों ही नहीं कह दिया. बच्चों की मौसी ने अपनी बीमार बहन के कपड़े बदल दिए तो कुछ अनोखा थोड़े ही कर दिया,’ कहते हुए वे फिर बेटी से बोलीं, ‘अरे मन्नो, पापा को औफिस से आए इतनी देर हो गई और तू ने चाय भी नहीं बनाई. अब जल्दी से चाय तो बना ले, सब की.’

‘‘चाय पी कर वकील साहिबा चलने लगीं तो बेटी की पीठ पर हाथ रख कर बड़े स्नेह से बोलीं, ‘देखो मन्नो, आइंदा कभी भी ऐसे हालात हों तो मौसी को मदद के लिए बुलाने में देर मत करना.’

‘‘ऐसे ही दिन, महीने बीतते हुए 5 साल बीत गए. पत्नी इलाज के साथसाथ वकील साहिबा की सेवा से धीरेधीरे काफी स्वस्थ हो गईं. मगर उन के स्वास्थ्य में सुधार होते ही उन्होंने सब से पहले कभी उन की कालेजमेट रही और अब बच्चों की मौसी वकील साहिबा के बारे में ही एक सख्त एन्क्वायरी औफिसर की तरह उन से मेरा परिचय कैसे बढ़ा, वह घर कैसे और क्यों आने लगी, बेटियों से वह इतना क्यों घुलमिल गई, मैं उन के घर क्यों जाता हूं आदि सवाल उठाने शुरू कर दिए तो मैं काफी खिन्न हो गया.

मगर मैं ने अपनी खिन्नता छिपाए रखी, इस से पत्नी के शक्की स्वभाव को इतना प्रोत्साहन मिल गया कि एक दिन घर में मुझे सुनाने के लिए ही बेटी को संबोधित कर के जोर से बोली थी, ‘वकील साहिबा तेरे बाप की बीवी बनने के लिए ही तेरी मौसी बन कर घर में घुस आई. खूब फायदा उठाया है दोनों ने मेरी बीमारी का. मगर मैं अब ठीक हो गई हूं और दोनों को ठीक कर दूंगी.’

‘‘पत्नी का प्रलाप सुन कर बेटी कुढ़ कर बोली, ‘मम्मी, मौसी ने आप के गंदे डायपर तक कई बार बदले हैं, कुछ तो खयाल करो.’ यह कह कर अपनी मां की बेकार की बातें सुनने से बचने के लिए वह अपने कमरे में चली गई. वह अपनी मौसी की मदद से किसी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रही थी.

‘‘इस के कुछ समय बाद बड़ी बेटी, जो ग्रेजुएशन पूरा होते ही वकील साहिबा के तन, मन से सहयोग के कारण बैंक सेवा में चयनित हो गई थी, ने अपने सहपाठी से विवाह करने की बात घर में कही तो पत्नी ने शालीनता की सीमाएं तोड़ते हुए अपनी सहपाठिनी वकील साहिबा को फोन कर के घर पर बुलाया और बेटी के दुस्साहस के लिए उन की अस्वस्थता के दौरान मेरे साथ उन के अनैतिक संबंधों को कारण बताए हुए उन्हें काफी बुराभला कह दिया.

‘‘इस के बावजूद भी बेटी के जिद पर अड़े रहने पर जब उन्होंने बेटी का विवाह में सहयोग करते हुए उस की शादी रजिस्ट्रार औफिस में करवा दी तब तो पत्नी ने उन के घर जा कर उन्हें बेहद जलील किया. इस घटना के बाद मैं ने ही उन्हें घर आने से रोक दिया. अब जब भी कोर्ट में उन से मिलता, उन का बुझाबुझा चेहरा और सीमित बातचीत के बाद एकदम खामोश हो कर ‘तो ठीक है,’ कह कर उन्हें छोड़ कर चले जाने का संकेत पा कर मैं बेहद खिन्न और लज्जित हो जाता था.

तुमने क्यों कहा मैं सुंदर हूं – भाग 2

इस घटना के कुछ दिनों बाद शाम को मैं औफिस से घर लौटा तो वकील साहिबा मेरे घर पर मौजूद थीं और बेटियों से खूब घुममिल कर बातचीत कर रही थीं. मेरे पहुंचने पर बेटी ने चाय बनाई तो पहले तो उन्होंने थोड़ी देर पहले ही चाय पी है का हवाला दिया, मगर मेरे साथ चाय पीने की अपील को सम्मान देते हुए चाय पीतेपीते उन्होंने बेटियों से बड़ी मोहब्बत से बात करते हुए कहा, ‘देखो बेटी, मैं और तुम्हारी मम्मी एक ही शहर से हैं और एक ही कालेज में सहपाठी रही हैं, इसलिए तुम मुझे आंटी नहीं, मौसी कह कर बुलाओगी तो मुझे अच्छा लगेगा.

‘‘अब जब भी मुझे टाइम मिलेगा, मैं तुम लोगों से मिलने आया करूंगी. तुम लोगों को कोई परेशानी तो नहीं होगी?’ कह कर उन्होंने प्यार से बेटियों की ओर देखा, तो दोनों एकसाथ बोल पड़ीं, ‘अरे मौसी, आप के आने से हमें परेशानी क्यों होगी, हमें तो अच्छा लगेगा, आप आया करिए.

आप ने तो देख ही लिया, मम्मी तो अभी बातचीत करना तो दूर, ठीक से बोलने की हालत में भी नहीं हैं. वैसे भी वे दवाइयों के असर में आधी बेहोश सी सोई ही रहती हैं. हम तो घर में रहते हुए किसी अपने से बात करने को तरसते ही रहते हैं और हो सकता है कि आप के आतेजाते रहने से फिल्मों की तरह आप को देख कर मम्मी को अपना कालेज जीवन ही याद आ जाए और वे डिप्रैशन से उबर सकें.’

‘‘मनोचिकित्सक भी ऐसी किसी संभावना से इनकार तो नहीं करते हैं. अपनी बेटियों के साथ उन का संवाद सुन कर मुझे उन के एकदम घर आ जाने से उपजी आशंकापूर्ण उत्सुकता एक सुखद उम्मीद में परिणित हो गई और मुझे काफी अच्छा लगा.

‘‘इस के बाद 3-4 दिनों तक मेरा उन से मिलना नहीं हो पाया. उस दिन शाम को औफिस से घर के लिए निकल ही रहा था कि उन का फोन आया. फोन पर उन्होंने मुझे शाम को अपने औफिस में आने को कहा तो थोड़ा अजीब तो लगा मगर उन के बुलावे की अनदेखी भी नहीं कर सका.

‘‘उन के औफिस में वे आज भी बेहद सलीके से सजी हुई और किसी का इंतजार करती हुई जैसी ही मिलीं. तो मैं ने पूछ ही लिया कि वे कहीं जा रही हैं या कोई खास मेहमान आने वाला है?

‘‘मेरा सवाल सुन कर वे बोलीं, ‘आप बारबार यही अंदाजा क्यों लगाते हैं.’ यह कह कर थोड़ी देर मुझे एकटक देखती रहीं, फिर एकदम बुझे स्वर में बोलीं, ‘मेरे पास अब कोई नहीं आने वाला है. वैसे आएगा भी कौन? जो आया था, जिस ने इस मन के द्वार पर दस्तक दी थी, मैं ने तो उस की दस्तक को अनसुना ही नहीं किया था, पता नहीं किस जनून में उस के लिए मन का दरवाजा ही बंद कर दिया था. उस के बाद किसी ने मन के द्वार पर दस्तक दी ही नहीं.

‘‘आज याद करती हूं तो लगता है कि वह पल तो जीवन में वसंत जैसा मादक और उसी की खुशबू से महकता जैसा था. मगर मैं न तो उस वसंत को महसूस कर पाई थी, न उस महकते पल की खुशबू का आनंद ही महसूस कर सकी थी,’ यह कह कर वे खामोश हो गईं.

‘‘थोड़ी देर यों ही मौन पसरा रहा हमारे बीच. फिर मैं ने ही मौन भंग किया, ‘मगर आप के परिवारजन, मेरा मतलब भाई वगैरह, तो आतेजाते होंगे.’ मेरी बात सुन कर थोड़ी देर वे खामोश रहीं, फिर बोलीं, ‘मातापिता तो रहे नहीं. भाइयों के अपनेअपने घरपरिवार हैं. उन में उन की खुद की व्यस्तताएं हैं. उन के पास समय कहां है?’ कहते हुए वे काफी निराश और भावुक होने लगीं तो मैं ने उन की टेबल पर रखे पानी के गिलास को उन की ओर बढ़ाया और बोला, ‘आप थोड़ा पानी पी लीजिए.’

‘‘मेरी बात सुन कर भी वे खामोश सी ही बैठी रहीं तो मैं गिलास ले कर उन की ओर बढ़ा और उन की कुरसी की बगल में खड़ा हो कर उन्हें पानी पिलाने के लिए गिलास उन की ओर बढ़ाया. तो उन्होंने मुझे बेहद असहाय नजर से देखा तो सहानुभूति के साथ मैं ने अपना एक हाथ उन के कंधे पर रख कर गिलास उन के मुंह से लगाना चाहा. उन्होंने मेरे गिलास वाले हाथ को कस कर पकड़ लिया. तब मुझे अपनी गलती का एहसास हुआ, और मैं ने सौरी बोलते हुए अपना हाथ खींचने की कोशिश की.

‘‘मगर उन्होंने तो मेरे गिलास वाले हाथ पर ही अपना सिर टिका दिया और सुबकने लगीं. मैं ने गिलास को टेबल पर रख दिया, उन के कंधे को थपथपाया. पत्नी की लंबी बीमारी के चलते काफी दिनों के बाद किसी महिला के जिस्म को छूने व सहलाने का मौका मिला था, मगर उन से परिचय होने के कम ही वक्त और अपने सरकारी पद का ध्यान रखते हुए मैं शालीनता की सीमा में ही बंधा रहा.

‘‘थोड़ी देर में उन्हें सुकून महसूस हुआ तो मैं ने कहा, ‘आई एम सौरी वकील साहिबा, मगर आप को छूने की मजबूरी हो गई थी.’ सुन कर वे बोलीं, ‘आप क्यों अफसोस जता रहे हैं, गलती मेरी थी जो मैं एकदम इस कदर भावुक हो गई.’ कह कर थोड़ी देर को चुप हो गईं, फिर बोलीं, ‘आप से एक बात कहना चाहती हूं. आप ‘मैं जवान हूं, मैं सुंदर हूं’ कह कर मेरी झूठी तारीफ कर के मुझे यों ही बांस पर मत चढ़ाया करिए.’ यह कहते हुए वे एकदम सामान्य लगने लगीं, तो मैं ने चैन की सांस ली.

‘‘उस दिन के बाद मेरा आकर्षण उन की तरफ खुद ही बढ़ने लगा. कोर्ट से लौटते समय वे अकसर मेरी बेटियों से मिलने घर आ जाती थीं. फिर घर पर साथ चाय पीते हुए किसी केस के बारे में बात करते हुए बाकी बातें फाइल देख कर सोचने के बहाने मैं लगभग रोज शाम को ही उन के घर जाने लगा.

पत्नी की मानसिक अस्वस्थता के चलते उन से शारीरिक रूप से लंबे समय से दूर रहने से उपजी खीझ से तल्ख जिंदगी में एक समवयस्क महिला के साथ कुछ पल गुजारने का अवसर मुझे खुशी का एहसास देने लगा.

तुमने क्यों कहा मैं सुंदर हूं – भाग 1

सरकारी नौकरियों में लंबे समय तक एकसाथ काम करते और सरकारी घरों में साथ रहते कुछ सहकर्मियों से पारिवारिक रिश्तों से भी ज्यादा गहरे रिश्ते बन जाते हैं, मगर रिटायरमैंट के बाद अपने शहरोंगांवों में वापसी व दूसरे कारणों के चलते मिलनाजुलना कम हो जाता है. फिर भी मिलने की इच्छा तो बनी ही रहती है. उस दिन जैसे ही मेरे एक ऐसे ही सहकर्मी मित्र का उन के पास जल्द पहुंचने का फोन आया तो मैं अपने को रोक नहीं सका.

मित्र स्टेशन पर ही मिल गए. मगर जब उन्होंने औटो वाले को अपना पता बताने की जगह एक गेस्टहाउस का पता बताया तो मैं ने आश्चर्य से उन की ओर देखा. वे मुझे इस विषय पर बात न करने का इशारा कर के दूसरी बातें करने लगे.

गेस्टहाउस पहुंच कर खाने वगैरह से फारिग होने के बाद वे बोले, ‘‘मेरे घर की जगह यहां गेस्टहाउस में रहने की कहानी जानने की तुम्हें उत्सुकता होगी. इस कहानी को सुनाने के लिए और इस का हल करने में तुम्हारी मदद व सुझाव के लिए ही तुम्हें बुलाया है, इसलिए तुम्हें तो यह बतानी ही है.’’ कुछ रुक कर उन्होंने फिर बोलना शुरू किया, ‘‘मित्र, महिलाओं की तरह उन की बीमारियां भी रहस्यपूर्ण होती हैं. हर महिला के जीवन में उम्र के पड़ाव में मीनोपौज यानी प्राकृतिक अंदरूनी शारीरिक बदलाव होता है, जो डाक्टरों के अनुसार भी कोई बीमारी तो नहीं होती, मगर इस का मनोवैज्ञानिक प्रभाव हर महिला पर अलगअलग तरह से होता है. कुछ महिलाएं इस में मनोरोगों से ग्रस्त हो जाती हैं.

‘‘इसी कारण मेरी पत्नी भी मानसिक अवसाद की शिकार हो गई, तो मेरा जीवन कई कठिनाइयों से भर गया. घरपरिवार की देखभाल में तो उन की दिलचस्पी पहले ही कम थी, अब इस स्थिति में तो उन की देखभाल में मुझे और मेरी दोनों नवयुवा बेटियों को लगे रहना पड़ने लगा जिस का असर बेटियों की पढ़ाई और मेरे सर्विस कैरियर पर पड़ रहा था.

‘‘पत्नी की देखभाल के लिए विभाग में अपने अहम पद की जिम्मेदारी के तनाव से फ्री होने के लिए जब मैं ने विभागाध्यक्ष से मेरी पोस्ंिटग किसी बेहद सामान्य कार्यवाही वाली शाखा में करने की गुजारिश की, तो उन्होंने नियुक्ति ऐसे पद पर कर दी जो सरकारी सुविधाओं को भोगते हुए नाममात्र का काम करने के लिए सृजित की गई लगती थी.’’

‘‘काम के नाम पर यहां 4-6 माह में किसी खास मुकदमे के बारे में सरकार द्वारा कार्यवाही की प्रगति की जानकारी चाहने पर केस के संबंधित पैनल वकीलों से सूचना हासिल कर भिजवा देना होता था.

‘‘मगर मुसीबत कभी अकेले नहीं आती. मेरे इस पद पर जौइन करने के 3 हफ्ते बाद ही उच्चतम न्यायालय ने राज्य सरकार से विभिन्न न्यायालयों में सेवा से जुड़े 10 वर्ष से ज्यादा की अवधि से लंबित मामलों में कार्यवाही की जानकारी मांग ली. मैं ने सही स्थिति जानने के लिए वकीलों से मिलना शुरू किया. विभाग में ऐसे मामले बड़ी तादाद में थे, इसलिए वकील भी कई थे.

‘‘इसी सिलसिले में 3-4 दिनों में कई वकीलों से मिलने के बाद में एक महिला पैनल वकील के दफ्तर में पहुंचा. उन पर नजर डालते ही लगा कि उन्होंने अपने को एक वरिष्ठ और व्यस्त वकील दिखाने के लिए नीली किनारी की मामूली सफेद साड़ी पहन रखी है और बिना किसी साजसज्जा के गंभीरता का मुखौटा लगा रखा है. और 2-3 फाइलों के साथ कानून की कुछ मोटी किताबें सामने रख कर बैठी हुई हैं. मेरे आने का मकसद जानते ही उन्होंने एक वरिष्ठ वकील की तरह बड़े रोब से कहा, ‘देखिए, आप के विभाग के कितने केस किसकिस न्यायाधीश की बैंच में पैडिंग हैं और इस लंबे अरसे में उन में क्या कार्यवाही हुई है, इस की जानकारी आप के विभाग को होनी चाहिए. मैं वकील हूं, आप के विभाग की बाबू नहीं, जो सूचना तैयार कर के दूं.’

‘‘इस प्रसंग में वकील साहिबा के साथ अपने पूर्व अधिकारियों के व्यवहार को जानते व समझते हुए भी मैं ने उन से पूरे सम्मान के साथ कहा, ‘वकील साहिबा, माफ करें, इन मुकदमों में सरकार आप को एक तय मानदेय दे कर आप की सेवाएं प्राप्त करती है, तो आप से उन में हुई कार्यवाही कर सूचना प्राप्त करने का हक भी रखती है. वैसे, हैडऔफिस का पत्र आप को मिल गया होगा. मामला माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा मांगी गई सूचना का है. यह जिम्मेदारीभरा काम समय पर और व्यवस्था से हो जाए, इसलिए मैं आप लोगों से संपर्क कर रहा हूं, आगे आप की मरजी.’

‘‘मेरी बात सुन कर वकील साहिबा थोड़ी देर चुप रहीं, मानो कोई कानूनी नुस्खा सोच रही हों. फिर बड़े सधे लहजे में बोलीं, ‘देखिए, ज्यादातर केसेज को मेरे सीनियर सर ही देखते थे. उन का हाल  में बार कोटे से न्यायिक सेवा में चयन हो जाने से वे यहां है नहीं, इसलिए मैं फिलहाल आप की कोई मदद नहीं कर सकती.’

‘ठीक है मैडम, मैं चलता हूं और आप का यही जवाब राज्य सरकार को भिजवा दिया जाएगा.’ कह कर मैं चलने के लिए उठ खड़ा हुआ तो वकील साहिबा को कुछ डर सा लगा. सो, वे समझौते जैसे स्वर में बोलीं, ‘आप बैठिए तो, चलिए मैं आप से ही पूछती हूं कि यह काम 3 दिनों में कैसे किया जा सकता है?’

‘‘अब मेरी बारी थी, इसलिए मैं ने उन्हीं के लहजे में जवाब दिया, ‘देखिए, यह न तो मेरा औफिस है, न यहां मेरा स्टाफ काम करता है. ऐसे में मैं क्या कह सकता हूं.’ यह कह कर मैं वैसे ही खड़ा रहा तो अब तक वकील साहिबा शायद कुछ समझौता कर के हल निकालने जैसे मूड में आ गई थीं. वे बोलीं, ‘देखिए, सूचना सुप्रीम कोर्ट को भेजी जानी है, इसलिए सूचना ठोस व सही तो होनी ही चाहिए, और अपनी स्थिति मैं बता चुकी हूं, इसलिए आप कड़वाहट भूल कर कोई रास्ता बताइए.’

‘‘वकील साहिबा के यह कहने पर भी मैं पहले की तरह खड़ा ही रहा. तो वकील साहिबा कुछ ज्यादा सौफ्ट होते हुए बोलीं, ‘देखिए, कभीकभी बातचीत में अचानक कुछ कड़वाहट आ जाती है. आप उम्र में मेरे से बड़े हैं. मेरे फादर जैसे हैं, इसलिए आप ही कुछ रास्ता बताइए ना.’

‘‘देखिए, यह कोई इतना बड़ा काम नहीं है. आप अपने मुंशी से कहिए. वह हमारे विभाग के मामलों की सूची बना कर रिपोर्ट बना देगा.’

‘‘देखिए, आप मेरे फादर जैसे हैं, आप को अनुभव होगा कि मुंशी इस बेगार जैसे काम में कितनी दिलचस्पी लेगा, वैसे भी आजकल उस के भाव बढ़े हुए हैं. सीनियर सर के जाने के बाद कईर् वकील लोग उस को बुलावा भेज चुके हैं,’ कह कर उन्होंने मेरी ओर थोड़ी बेबसी से देखा. मुझे उन का दूसरी बार फादर जैसा कहना अखर चुका था. सो, मैं ने उन्हें टोकते हुए कहा, ‘मैडम वकील साहिबा, बेशक आप अभी युवा ही है और सुंदर भी हैं ही, मगर मेरी व आप की उम्र में 4-5 साल से ज्यादा फर्क नहीं होगा. आप व्यावसायिक व्यस्तता के कारण अपने ऊपर ठीक से ध्यान नहीं दे पाती हैं, नहीं तो आप…

‘‘महिला का सब से कमजोर पक्ष उस को सुंदर कहा जाना होता है. इसलिए वे मेरी बात काट कर बोलीं, ‘आप कैसे कह रहे हैं कि मेरी व आप की उम्र में सिर्फ 4-5 साल का फर्क है और आप मुझे सुंदर कह कर यों ही क्यों चिढ़ा रहे हैं.’ उन्होंने एक मुसकान के साथ कहा तो मैं ने सहजता से जवाब दिया, ‘वकील साहिबा, मैं आप की तारीफ में ही सही, मगर झूठ क्यों बोलूंगा? और रही बात आप की उम्र की, तो धौलपुर कालेज में आप मेरी पत्नी से एक साल ही जूनियर थीं बीएससी में. उन्होंने आप को बाजार वगैरह में कई बार आमनासामना होने पर पहचान कर मुझे बतलाया था. मगर आप की तरफ से कोई उत्सुकता नहीं होने पर उन्होंने भी परिचय को पुनर्जीवित करने की कोशिश नहीं की.’

‘‘अब तक वकील साहिबा अपने युवा और सुंदर होने का एहसास कराए जाने से काफी खुश हो चुकी थीं. इसलिए बोलीं, ‘अच्छा ठीक है, मगर अब आप बैठ तो जाइए, मैं चाय बना कर लाती हूं, फिर आप ही कुछ बताएं,’ कह कर वे कुरसी के पीछे का दरवाजा खोल कर अंदर चली गईं.

‘‘थोड़ी देर में वे एक ट्रे में 2 कप चाय और नाश्ता ले कर लौटीं और बोलीं, ‘आप अकेले बोर हो रहे होंगे. मगर क्या करूं, मैं तो अकेली रहती हूं, अकेली जान के लिए कौन नौकरचाकर रखे.’ उन की बात सुन कर एकदफा तो लगा कि कह दूं कि सरकारी विभागों के सेवा संबंधी मुदकमों के सहारे वकालत में इतनी आमदनी भी नहीं होती? मगर जनवरी की रात को 9 बजे के समय और गरम चाय ने रोक दिया.

‘‘चाय पीने के बाद तय हुआ कि मैं अपने कार्यालय में संबंधित शाखा के बाबूजी को उन के मुंशी की मदद करने को कह दूंगा और दोनों मिल कर सूची बना लेंगे. फिर उन की फाइलों में अंतिम तारीख को हुई कार्यवाही की फोटोकौपी करवा कर वे सूचना भिजवा देंगी.

‘‘सूचना भिजवा दी गई और कुछ दिन गुजर गए मगर कोई काम नहीं होने की वजह से मैं उन से मिला नहीं. तब उस दिन दोपहर में औफिस में उन का फोन आया. फोन पर उन्होंने मुझे शाम को उन के औफिस में आ कर मिलने की अपील की.

‘‘शाम को मैं उन के औफिस में पहुंचा तो एकाएक तो मैं उन्हें पहचान ही नहीं पाया. आज तो वे 3-4 दिनों पहले की प्रौढ़ावस्था की दहलीज पर खड़ी वरिष्ठ गंभीर वकील लग ही नहीं रही थीं. उन्होंने शायद शाम को ही शैंपू किया होगा जिस से उन के बाल चमक रहे थे, हलका मेकअप किया हुआ था और एक बेहद सुंदर रंगीन साड़ी बड़ी नफासत से पहन रखी थी जिस का आंचल वे बारबार संवार लेती थीं.

‘‘मुझे देखते ही उन के मुंह पर मुसकान फैल गई तो पता नहीं कैसे मेरे मुंह से निकल गया, ‘क्या बात है मैडम, आज तो आप,’ मगर कहतेकहते मैं रुक गया तो वे बोलीं, ‘आप रुक क्यों गए, बोलिए, पूरी बात तो बोलिए.’ अब मैं ने पूरी बात बोलना जरूरी समझते हुए बोल दिया, ‘ऐसा लगता है कि आप या तो किसी समारोह में जाने के लिए तैयार हुई हैं, या कोई विशेष व्यक्ति आने वाला है.’ मेरी बात सुन कर उन के चेहरे पर एक मुसकान उभरी, फिर थोड़ा अटकती हुई सी बोलीं, ‘आप के दोनों अंदाजे गलत हैं, इसलिए आप अपनी बात पूरी करिए.’ तो मैं ने कहा, ‘आज आप और दिनों से अलग ही दिख रही हैं.’

‘‘और दिनों से अलग से क्या मतलब है आप का,’ उन्होंने कुछ शरारत जैसे अंदाज में कहा तो मैं ने भी कह दिया, ‘आज आप पहले दिन से ज्यादा सुंदर लग रही हैं.’

‘‘मेरी बात सुन कर वे नवयुवती की तरह मुसकान के साथ बोलीं, ‘आप यों ही झूठी तारीफ कर के मुझे चने के झाड़ पर चढ़ा रहे हैं.’ तो मैं ने हिम्मत कर के बोल दिया, ‘मैं झूठ क्यों बोलूंगा? वैसे, यह काम तो वकीलों का होता है. पर हकीकत में आज आप एक गंभीर वकील नहीं, किसी कालेज की सुंदर युवा लैक्चरर लग रही हैं?’ यह सुन कर वे बेहद शरमा कर बोली थीं, ‘अच्छा, बहुत हो गई मेरी खूबसूरती की तारीफ, आप थोड़ी देर अकेले बैठिए, मैं चाय बना कर लाती हूं. चाय पी कर कुछ केसेज के बारे में बात करेंगे.’

आखिर खुल ही गया ललिता का राज

30 जनवरी, 2017 की बात है. भगवानदास कुशवाह आंगन में बैठे चाय पी रहे थे. तभी उन की नजर भतीजे रामरतन के कमरे की तरफ गई. मांबाप की मौत के बाद रामरतन उन के साथ ही रह रहा था. करीब 10 महीने पहले भगवानदास ने ही रामरतन की शादी ललिता से कराई थी. उस समय उस की बीवी मायके गई हुई थी. रोजाना रामरतन सूरज निकलने से पहले ही सो कर उठ जाता था लेकिन उस दिन सुबह के करीब साढ़े 8 बज गए. तब भी रामरतन के कमरे का दरवाजा नहीं खुला था.

भगवानदास ने आंगन से ही रामरतन को कई आवाजें लगाईं पर उस के कमरे से कोई आवाज नहीं आई. तब वह चाय का प्याला एक तरफ रख कर दरवाजा खोल कर उस के कमरे में पहुंचे. रामरतन अपनी चारपाई पर था. उन्होंने उसे फिर कई आवाज दीं पर वह नहीं उठा.

तब उन्होंने आवाज देते हुए उसे झकझोरा. झकझोरते समय उन्हें कुछ शक हुआ तो उस की नब्ज टटोली. नब्ज गायब मिली और उस का शरीर भी एकदम ठंडा था. लग रहा था जैसे उस की मौत हो चुकी है.

भगवानदास घबराते हुए बाहर गए और पड़ोसियों को बुला लाए. सभी ने कमरे में पहुंच कर रामरतन की धड़कनों आदि को देखा तो पाया कि उस की मौत हो चुकी है. वह रात को खाना खा कर ठीकठाक सोया था तो यह अचानक हो क्या गया. भगवानदास समझ नहीं पाए.

रामरतन के गले पर कुछ निशानों को देख कर भगवानदास को शक हो गया कि उस की मौत स्वाभाविक नहीं हुई है बल्कि किसी ने उस की हत्या की है. इसलिए वह कुछ लोगों के साथ तिघरा थाने पहुंच गए. थानाप्रभारी आर.पी. मिश्रा को उन्होंने रामरतन की मौत की बात बता दी.

थानाप्रभारी आर.पी. मिश्रा ने भगवानदास की बात को काफी गंभीरता से लिया और तत्काल फोर्स ले कर उन के साथ गांव तालपुरा के लिए रवाना हो गए. थाने से तालपुरा महज 4 किलोमीटर दूर था, इसलिए थानाप्रभारी 10-15 मिनट में ही घटनास्थल पर पहुंच गए.

तब तक भगवानदास के घर के बाहर गांव के काफी लोग जमा हो चुके थे. थानाप्रभारी ने लाश का बड़ी बारीकी से निरीक्षण किया तो मृतक की गरदन पर उन्हें कुछ निशान दिखाई दिए. गौर से देखने पर लग रहा था जैसे किसी ने उस का गला घोंटा हो.

मरने वाले की उम्र यही कोई 33 साल थी. तलाशी के दौरान मृतक की पैंट की जेब से कुछ रुपए और एक डायरी मिली. डायरी में नातेरिश्तेदारों के मोबाइल नंबर लिखे हुए थे. कमरे का सारा सामान अपनीअपनी जगह रखा था. कमरे का मुआयना करने के बाद नहीं लग रहा था कि वहां कोई लूट की वारदात हुई है. लग रहा था कि हत्या लूट के लिए नहीं बल्कि सुनियोजित तरीके से की गई है.

थानाप्रभारी के पूछने पर भगवानदास ने बताया कि रामरतन की पत्नी ललिता इन दिनों अपने मायके कुलैथ गई हुई है. उस के मायके वालों को इस घटना की सूचना भिजवा दी है. वे लोग आपस में बातें कर ही रहे थे कि इतने में ललिता दहाड़ मारती हुई उस कमरे में आ गई, जहां उस के पति की लाश पड़ी थी.

कुछ देर बाद थानाप्रभारी ने ललिता से पूछा, ‘‘क्या तुम बता सकती हो कि तुम्हारे पति की हत्या किस ने की होगी?’’

‘‘साहब, मैं तो अपने मायके में थी. मोए का मालूम किस ने मेरा सुहाग उजाड़ दयो.’’ इतना कह कर वह फिर सुबकने लगी.

थानाप्रभारी की सूचना पर फोटोग्राफर और फिंगरप्रिंट ब्यूरो का स्टाफ भी वहां पहुंच गया. उन का काम निपट जाने के बाद पुलिस ने जरूरी काररवाई की और लाश पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दी. इस के बाद थाने पहुंच कर भगवानदास की तहरीर पर अज्ञात हत्यारे के खिलाफ भादंवि की धारा 302 के तहत मामला दर्ज कर लिया.

थानाप्रभारी ने भगवानदास से बात की तो उन्होंने बताया कि ललिता के लाखन के साथ नजदीकी संबंध थे. रामरतन ललिता से कहता था कि वह लाखन से न मिला करे, पर वह नहीं मानी. उन्होंने ललिता पर ही रामरतन की हत्या का आरोप लगाया.

थानाप्रभारी जब उस दिन घटनास्थल पर गए थे तो उन्हें ललिता के हावभाव देख कर शक भी हो रहा था. उन्होंने भगवानदास से ललिता का फोन नंबर लेने के बाद उस की काल डिटेल्स निकलवाई.

काल डिटेल्स का अध्ययन करने पर पता चला कि ललिता एक फोन नंबर पर सब से ज्यादा बातें किया करती थी. उस फोन नंबर की जांच हुई तो वह ललिता के चचेरे देवर लाखन का निकला. लाखन के बारे में जांच की तो पता चला कि उस के ललिता के साथ नाजायज संबंध थे. यह जानकारी मिलते ही थानाप्रभारी समझ गए कि रामरतन अपनी पत्नी ललिता और लाखन के अवैध संबंधों की भेंट चढ़ा है.

पुलिस ने एक बार फिर ललिता से पूछताछ की. उस ने बिना डरे बड़ी सफाई से सभी सवालों के जवाब दिए. पति से खटपट की बात तो उस ने स्वीकार की लेकिन उस की हत्या करने की बात को नकार दिया.

पुलिस के पास काल डिटेल्स के अलावा ललिता के खिलाफ ऐसा कोई ठोस अहम सबूत नहीं था जिस के आधार पर उसे गिरफ्तार किया जा सके.

अब पुलिस लाखन से पूछताछ करना चाहती थी. लेकिन वह घर से फरार हो चुका था. कई संभावित जगहों पर उसे तलाशा पर वह नहीं मिला. उस की फरारी ने थानाप्रभारी का शक और मजबूत कर दिया. लाखन से पूछताछ से पहले पुलिस ने ललिता को थाने बुलाना उचित नहीं समझा.

थानाप्रभारी ने गांव के मुखबिर को ललिता की निगरानी के लिए लगा दिया. करीब पौने 3 महीने बाद लाखन पुलिस के हत्थे चढ़ गया. पुलिस ने जब उस से सख्ती से पूछताछ की तो उस ने रामरतन की हत्या करने की बात स्वीकार ली. उस ने उस की हत्या की जो कहानी बताई, वह अवैध संबंधों की बुनियाद पर रची निकली.

रामरतन और ललिता की शादी करीब 10 महीने पहले एक सामूहिक विवाह सम्मेलन में हुई थी. दोनों की उम्र में 13 साल का अंतर था. यानी 20 साल की ललिता की अपनी उम्र से 13 साल बड़े रामरतन से शादी तो हो गई थी, पर वह उस के साथ खुश नहीं थी.

इस का नतीजा यह हुआ कि शादी के एक पखवाड़े बाद ही पतिपत्नी में खटपट शुरू हो गई. वैसे भी रामरतन सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी कर के शाम को थकामांदा घर लौटता. वह पत्नी की जरूरतों का खयाल किए बिना ही सो जाता था.

ललिता ने इधरउधर नजरें दौड़ाईं तो उसे चचेरा देवर लाखन जंच गया. वह अविवाहित था. ललिता ने उसे अपने जाल में फांस लिया. जब घर में कोई नहीं होता तो वह उसे बुला लेती थी. इस तरह उन दोनों के बीच अवैध संबंध कायम हो गए.

धीरेधीरे उन का प्यार परवान चढ़ने लगा. रामरतन निर्धारित समय पर रोजाना अपनी नौकरी पर निकल जाता था, उसी मौके का फायदा उठा कर ललिता लाखन को फोन कर घर पर बुला लेती थी. फिर दोनों अपनी हसरतें पूरी करते.

इस तरह के संबंधों को कोई लाख छिपाने की कोशिश करे, पर वह ज्यादा दिनों तक छिपे नहीं रहते. एक न एक दिन उजागर हो ही जाते हैं. लाखन का जब रामरतन की गैरमौजूदगी में उस के घर ज्यादा आनाजाना होने लगा तो लोगों का शक भी बढ़ गया.

आखिरकार एक दिन रामरतन के एक पड़ोसी ने उस से कह ही दिया, ‘‘भैया, नौकरी तो तुम पूरी मुस्तैदी के साथ करते हो, मगर घरवाली का भी खयाल रखा करो.’’

‘‘मैं समझा नहीं, तुम क्या कहना चाह रहे हो?’’ रामरतन ने कहा.

‘‘आजकल लाखन तुम्हारे घर के खूब चक्कर लगा रहा है.’’ पड़ोसी बोला.

उस पड़ोसी की बात सुन कर रामरतन हक्काबक्का रह गया. उस ने ललिता से पूछा, ‘‘मेरी गैरमौजूदगी में लाखन आता है क्या?’’

‘‘आप से किस ने कहा कि आप की गैरमौजूदगी में लाखन आता है?’’ ललिता ने उलटे उस से सवाल किया.

‘‘किस ने कहा है, इस से मतलब मत रख, पर इतना समझ ले कि अब लाखन घर आए तो उसे कमरे में कतई नहीं आने देना. उसे ले कर समूचे तालपुरा में तरहतरह की चर्चाएं हो रही हैं. मैं कतई नहीं चाहता कि उस की वजह से हमारी गांव में बदनामी हो.’’ रामरतन बोला.

ललिता ने कोई जवाब नहीं दिया. रामरतन इस बात को ले कर काफी परेशान था. वह भी कुछ दिनों से महसूस कर रहा था कि ललिता का व्यवहार उस के प्रति उपेक्षापूर्ण रहने लगा है. उस से उसे लगा कि कहीं ललिता सही में मर्यादा की दीवार तो नहीं लांघ गई

उधर ललिता ने लाखन को फोन कर के बता दिया था कि पति को हम दोनों पर शक हो गया है इसलिए कुछ दिनों वह घर न आए. ललिता के कहने के बाद लाखन ने ऐहतियात बरती. उस दौरान वे केवल फोन पर ही बात कर लेते. पर खाली बातों से काम चलने वाला नहीं था. वे फिर से मिलने का उपाय खोजने लगे.

रामरतन अपनी नौकरी पर निकल जाता और भगवानदास अपने खेतों पर, इसी का फायदा उठा कर ललिता लाखन को फोन कर के कमरे पर बुला लेती.

इत्तफाक से एक दिन दोपहर में रामरतन की तबीयत अचानक खराब हो गई तो वह काम से घर लौट आया. संयोग से लाखन उस वक्त ललिता से मिलने उस के घर आया हुआ था. रामरतन को क्या पता था कि उस के पीछे घर में क्या हो रहा है. रामरतन आया और सीधा अपने कमरे में दाखिल हो गया. पर सामने का दृश्य देख कर वह भौचक्का रह गया. उस की पत्नी अपने चचेरे देवर लाखन की बांहों में समाई हुई थी.

यह देख कर गुस्से से रामरतन का खून खौल उठा. रामरतन को अचानक आया देख लाखन वहां से भाग गया. तब उस ने ललिता की जम कर पिटाई की.

गुस्सा शांत हो जाने के बाद रामरतन की समझ में नहीं आ रहा था कि वह चरित्रहीन पत्नी का क्या करे. यदि वह उसे मायके भेज देगा तो समस्या यह थी कि रोटी कौन बनाएगा और नौकरी छोड़ कर पत्नी की रखवाली कर नहीं सकता था.

उधर ललिता का लाखन से इतना लगाव हो गया था कि वह उसे छोड़ना नहीं चाहती थी. इस के साथसाथ वह पति से भी नाता नहीं तोड़ना चाहती थी. क्योंकि जो सुखसुविधा रामरतन उसे दे रहा था, वह लाखन फिलहाल नहीं दे सकता था. क्योंकि वह तो बेरोजगार था. यही सब सोच कर ललिता ने पति से माफी मांगते हुए वादा किया कि आइंदा वह लाखन से नहीं मिलेगी. रामरतन को लगा कि ललिता को शायद अपनी गलती का अहसास हो गया है तो उस ने पत्नी को माफ कर दिया.

दूसरी ओर लाखन अब ललिता से मेलजोल बनाए रखने का साहस नहीं जुटा पा रहा था. क्योंकि उस दिन रामरतन ने उसे रंगेहाथों जो पकड़ लिया था. वह ललिता से कन्नी काटने लगा. मगर ललिता उस का पीछा कहां छोड़ने वाली थी. उस ने एक दिन लाखन से कह भी दिया कि वह उस के बिना नहीं रह सकेगी. अपनी चिकनीचुपड़ी बातों से उस ने लाखन को मना लिया. लिहाजा पहले की तरह उन की रासलीला चलने लगी.

इस तरह रामरतन के पीठ पीछे वह अपनी हसरतें पूरी करते रहे. गांव वालों से रामरतन को पुन: पता चल गया कि लाखन अब भी उस के घर आता है.

लाखन और ललिता इश्क की राह में इतने दूर आ चुके थे कि अब वे किसी भी कीमत में वापस नहीं लौटना चाहते थे. इश्क का जुनून दोनों के सिर चढ़ कर बोल रहा था. आखिर एक दिन रामरतन ने उन दोनों को फिर रंगेहाथ पकड़ लिया. इस बार रामरतन ने ललिता की पिटाई करने के बजाय खरीखोटी सुनाई. बाद में उस ने पत्नी को समझाने की भरसक कोशिश की. लाखन उस दिन भी भाग गया था. रामरतन को लगा कि ललिता सुधरने वाली नहीं है इसलिए उस ने उसी दिन अपने मामा हरिज्ञान सिंह को बुला कर ललिता को उस के मायके कुलैथ भिजवा दिया.

रामरतन ने ललिता को भले ही उस के मायके भिजवा दिया पर उस ने खुद को नहीं बदला. कुछ दिनों बाद वह लाखन को फोन कर के एकांत में मिलने के लिए अपने मायके कुलैथ बुला लेती.

ललिता भले ही अपने मायके वालों की नजरों से बच कर लाखन के साथ रंगरलियां मना रही थी, लेकिन कुलैथ के लोगों की नजरों को वह कैसे चकमा दे सकती थी. यानी मायके में भी ललिता और लाखन के अवैध संबंधों को ले कर चर्चाएं होने लगीं. इस से ललिता के मांबाप और भाईभाभी की बदनामी होने लगी.

इस के बावजूद भी ललिता अपने प्रेमी लाखन को नहीं भूल पाई. एक दिन वह लाखन से बोली, ‘‘लाखन, मैं तेरे बिना अब जी नहीं सकती. अब मुझे हमेशाहमेशा के लिए तेरा साथ चाहिए. रामरतन के रहते यह संभव नहीं है क्योंकि वह हम दोनों के मिलन में रोड़ा बना हुआ है. इस रोड़े को अब हर हाल में हटाना होगा.’’

अपनी लच्छेदार बातों से ललिता ने लाखन से पति को रास्ते से हटाने के लिए रजामंद कर लिया. लाखन यह काम करने के लिए तैयार हो गया.

29 जनवरी, 2017 को ललिता के मातापिता और भाई रिश्तेदारी में शादी के कार्यक्रम में शरीक होने के लिए गए थे. घर पर सिर्फ ललिता और उस की भाभी ही थी. मौका देख कर आधी रात को ललिता ने लाखन को फोन कर के कुलैथ बुला लिया.  इस के बाद ललिता लाखन की मोटरसाइकिल पर बैठ कर तालपुरा के लिए निकल गई. रास्ते में स्थित पुलिया पर कुछ देर बैठ कर दोनों ने यह तय कर लिया कि आज रामरतन को हर हाल में रास्ते से हटाना है.

कुलैथ से तालपुरा पहुंच कर दोनों घर के पिछवाड़े की दीवार फांद कर दबे पांव रामरतन के कमरे में पहुंच गए. रामरतन उस समय गहरी नींद में सो रहा था. उस के चाचा भगवानदास दूसरे कमरे में थे. ललिता और लाखन ने रामरतन को दबोच लिया.

ललिता ने उस के हाथ पकड़े और लाखन छाती पर सवार हो गया. फिर दोनों हाथों से उस का गला दबाने लगा. रामरतन ने जान बचाने के लिए हाथपैर पटके तो ललिता ने उस के पैर कस कर पकड़ लिए.

कुछ ही देर में रामरतन की सांसें थम गईं. वह बेदम हो गया तो उसे उसी हालत में छोड़ कर दोनों दीवार फांद कर निकल गए. लाखन रात के अंतिम पहर में ही ललिता को उस के मायके कुलैथ छोड़ आया. जहां ललिता रात में ही नहाई. इतनी रात में नहाने पर उस की भाभी ने टोका तो ललिता ने बहाना बना दिया.

लाखन से पूछताछ के बाद पुलिस ने उस की प्रेमिका ललिता को भी गिरफ्तार कर लिया. थाने में उस से पूछताछ की गई तो उस ने भी अपना अपराध स्वीकार कर लिया.

ललिता को क्या पता था कि पति की ढाई बीघा जमीन पर लाखन के साथ मौज करने के बजाय वह जेल चली जाएगी. पुलिस ने गिरफ्तार लाखन और ललिता को 22 मार्च को अदालत में पेश कर जेल भेज दिया. कथा लिखे जाने तक दोनों की जमानत नहीं हुई थी.

लेखक : मुकेश तिवारी/रणजीत सुर्वे

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

जान लेने वाली पत्नियां

प्राणों की प्यारी अब प्राणों की प्यासी हो चली हैं. शादी के बाद बहुत सी लड़कियां घरेलू हिंसा डीवी ऐक्ट 2005 के ब्रह्मास्त्र से लैस हो कर अपनी ससुराल पहुंचने लगी हैं. 498 की धारा का गुणगान आज तकरीबन हर लड़की वाला करता है और लड़के वाले चुप रहते हैं, उदास भी.

जहां वर पक्ष सीधासरल होता है, लड़के वाले शरीफ होते हैं, वहां लड़के के सीधेपन को तेज लड़की कई तरह से अस्त्र बना कर हालात को अपने हक में मोड़ लेती है.

कुछ लड़कियां जिन के मायके में अफेयर होते हैं, वे ससुराल में एक पल भी नहीं रहना चाहती हैं और बिना वजह ससुराल वालों को घरेलू हिंसा व दहेज को ले कर सताने का इलजाम लगा कर अपने मायके की राह पकड़ लेती हैं.

कुछ लड़कियों को मां के बिना रहना नहीं भाता. मां के संग सोने वाली लड़कियां हर चौथे दिन मायके चली जाती हैं. वे हनीमून मना कर मायके लौटे जाती हैं. उन का शादी के प्रति इतना ही शौक होता है जो 1-2 बार ससुराल आ कर पूरा हो जाता है.

बहुत सी लड़कियां अपने मायके के पड़ोस से इतनी रमी होती हैं कि ससुराल का माहौल उन्हें अकेलापन ही देता है. वे किसी भी हालात में मायके की ओर दौड़ लगाती हैं. उन्हें ससुराल या पति से कभी कोई मोह नहीं होता.

कुसुम शादी ही नहीं करना चाहती थी. वजह, उसे अपने भाई के बेटे रिंकू से लगाव था. शादी में देरी हो चुकी थी और कुसुम पूरी तरह से भतीजे की मां बन गई थी.

भाई ने कुसुम के इसी सम्मोहन का फायदा उठा कर उसे उस के पति के खिलाफ कर के हमेशा के लिए उस की गृहस्थी तोड़ दी.

महज 7 महीने के छोटे से वैवाहिक जीवन में कुसुम ने 14-15 बार मायके की ओर दौड़ लगाई थी. जब वह ससुराल में होती थी तो उस की मां रातदिन अपने नाती रिंकू के रोने की बात फोन पर बता कर उस को ससुराल में नहीं रहने देती थी. कुसुम को उस की मां हमेशा अपनी तबीयत का दुखड़ा बता कर बुलाती थी. कुसुम की गोद में रिंकू को डाल कर वह उस का भावनात्मक शोषण करती थी.

इस तरह से मां ने एक पल भी कुसुम को ससुराल में चैन से अपने पति विनीत के साथ नहीं रहने दिया. इस से विनीत डिप्रैशन में चले गया तो मां ने नई चाल चली. वह कुसुम को सिखाने लगी कि तेरा आदमी नामर्द है, उसे छोड़ दे.

इसी बीच विनीत की मां ने कुसुम की मां को उस का घर मरम्मत कराने के लिए कुछ पैसा दे दिया. रिश्तों के बीच पैसा आते ही नए रिश्ते में खटास आ गई.

कुसुम का भाई विमल जुआ खेलता था. वह हर महीने विनीत के सीधेपन का फायदा उठा कर उस की मां से पैसे की मांग करता था. वैसे तो लड़के वाले मांग करते हैं, पर यहां विनीत की मां से कुसुम का भाई पैसे की डिमांड करने लगा था.

आखिर में हार कर विनीत की मां ने पैसे की डिमांड बाबत विमल के खिलाफ शिकायत कर दी तो विमल ने कुसुम को मायके बुला लिया और विनीत व उस के मांबाप पर फर्जी डीवी ऐक्ट लगा कर उन का जीना दूभर कर दिया.

खुद ही पैसा दे कर अपने ऊपर लगाए गए इस झूठे इलजाम का तोड़ विनीत की मां इसलिए नहीं ढूंढ़ पा रही थीं कि बिना लिखापढ़ी किए उन्होंने बहू के मायके वालों को रुपए दे दिए थे. अब वे घरेलू हिंसा के फर्जी मामले में फंसी हैं. कोर्ट हमेशा लड़की की बात सुनती है. लड़के वालों को कुसूरवार समझा जाता है. इन्हीं बातों व कानून का फायदा उठा कर कुसुम का जुआरी भाई अब ठहाके लगा रहा है.

इस तरह की बातों से आज कितने ही परिवार बस नहीं पा रहे हैं. लड़की के लालची भाइयों की नजर अब बहन की ससुराल की जायदाद पर टिकी होती है. जो सीधेसादे ससुराल वाले होते हैं उन को लड़की के भाई ब्लैकमेल कर लेते हैं.

इसी तरह ग्वालियर का एक परिवार भी तब सांसत में आ गया था जब बहू ने अपने पति से कहा कि वह सासससुर से अलग रहेगी. बेचारा मनीष मांबाप पर ही निर्भर था और उन का लाड़ला भी था.

नई बीवी ने मनीष पर जब ज्यादा दबाव बनाया तो वह कुछ भी नहीं कर सका. बीवी मायके जा कर रहने लगी और पति व सासससुर पर दहेज के नाम पर सताने का मामला दायर कर दिया.

बेचारे मांबाप की जान सांसत में देख कर मनीष ने एक सुसाइड नोट लिखा और अपनी जान दे दी. वह खुदकुशी कर के अपनी छोटी सी वैवाहिक जिंदगी का अंत कर गया. उसे लगा कि उस की पत्नी को उस में या उस के मातापिता में कोई दिलचस्पी नहीं है. वे लोग कब तक उस की पत्नी को मनाएंगे.

एक तरफ तो मातापिता का प्यार, दूसरी तरफ नई बीवी का हठ, तीसरी तरफ 498 की हिटलरशाही धारा, जिस से निकलने की राह सीधेसादे मनीष को नहीं सूझी और उस ने अपनी जिंदगी खत्म कर के ऐसी शादी व कानूनी आतंक को विराम दे दिया जिस में फंसने के बाद बाहर निकलने की राह उस मासूम लड़के के पास नहीं थी.