विचित्र संयोग : चक्रव्यूह का भयंकर परिणाम – भाग 2

इमारत के चारों और घूमते हुए पीछे एक जगह रुक कर प्रकाश राय ने खन्ना से पूछा, “ये कमरे किस के है?”

“सफाई कर्मचारियों और वाचमैन के .”

“कितने वाचमैन हैं?”

“2 हैं. इन की ड्यूटी 2 शिफ्टों में है. सुबह 8 बजे से रात 8 बजे और रात 8 बजे से सवेरे 8 बजे तक.”

“इन के खाने की छुट्टी?”

“वो तो सर, ये अपनी सुविधा के अनुसार खाने जाते हैं. वैसे भी यह समस्या पहली शिफ्ट में आती है. ज्यादातर ये अपना खाना साथ लाते हैं. इसी कमरे में वे खाना खाते हैं. तब तक हम यहां के स्वीपर को गेट पर बैठा देते हैं.”

“दोनों के नाम क्या हैं और इन के घर कहां है?”

“कल नाइट शिफ्ट पर नारायण था. वह सेक्टर-10 में रहता है. मौर्निंग शिफ्ट में जो अभी पौने 8 बजे आया है, उस का नाम भास्कर है, वह खोड़ा में रहता है.”

“अच्छा, यहां स्वीपर कितने हैं?”

“एक ही है साहब, रणधीर और उस की पत्नी देविका. ये दोनों अपने दोनों बच्चों के साथ यहीं रहते हैं. बाहर का काम रणधीर और टायलेट वगैरह साफ करने का काम देविका करती है.”

खन्ना से बात करतेकरते प्रकाश राय इमारत के गेट पर आ गए. तभी एसएसपी, एसपी और सीओ भी आ गए. इन्हीं अधिकारियों के साथ डौग स्क्वायड की टीम भी आई थी. ऊपर जांच चल रही थी. प्रकाश राय एक सिपाही के साथ नीचे रुक गए, बाकी सभी अधिकारी ऊपर चले गए.

प्रकाश राय देविका के बारे में सोच रहे थे. वह सभी के घर में आजा सकती थी. वाचमैन जरूरी काम के बिना किसी फ्लैट में जा नहीं सकते थे. नारायण जो रात की ड्यूटी पर था, उसी के रहते हत्या हुई थी. लेकिन उस से पूछताछ करने पर प्रकाश राय के हाथ कोई सूत्र नहीं लगा. उस ने धनंजय को मीट ले आने जाते और लौटते देखा था बस.

“अच्छा नारायण, धनंजय साहब के जाने के बाद तुम यहीं थे क्या? यहां से कहीं नहीं गए?”

“साहब, मैं यहां से वहां राउंड मार रहा था और नीचे की लाइन बंद कर रहा था. रणधीर ने पंप चालू किया या नहीं, यह

देखने भी गया था.”

“यानी इस दौरान कोई ऊपर जा सकता था?”

“साहब, आप जो कह रहे हैं, वह संभव है.”

“अच्छा नारायण, सुबह तुम ने किसी अनजान आदमी को बाहर जाते तो नहीं देखा?”

“साहब, मेरे रहते कोई अंदर गया ही नहीं तो बाहर कैसे…?”

“सुनो नारायण, रात को ही कोई अंदर आ गया होगा या किसी के यहां मेहमान के रूप में आया होगा तो…?”

नारायण चुप हो गया. उसे अपनी बुद्धि पर तरस आने लगा. कुछ सोच कर बोला, “साहब, दूध वाला और पेपर वाला, ये दोनों आए थे. गनपत दूध वाला जब आया था, धनंजय साहब घर में ही थे. उन्होंने ही दूध लिया होगा. उस के जाने के बाद ही वह मीट लेने चले गए थे. वह ‘ए’ विंग के 7 फ्लैटों में दूध सप्लाई करता है, बाकी के सभी लोग 9 बजे डेयरी की गाड़ी से दूध लेते हैं.”

“पेपरवाला नरेश धनंजय साहब के जाने के बाद आया था. 2-3 मिनट में ही वह लौट गया था. सिर्फ एक व्यक्ति मुझे याद है रणधीर. धनंजय साहब के जाने के बाद रणधीर सफाईवाला झाडू और प्लास्टिक की बाल्टी ले कर सीढिय़ां साफ करने गया था. धनंजय साहब के लौटने से पहले नीचे आ कर वह ‘बी’ इमारत मे चला गया था.”

“ठीक है नारायण.” कह कर प्रकाश राय ने इशारे से सिपाही को पास बुला कर कहा, “तुम किसी बहाने से बाहर जाओ और थोड़ी देर बाद लौट कर नारायण से गप्पें मारते हुए रणधीर के बारे में कुछ पता लगाने की कोशिश करो.”

प्रकाश राय के ऊपर पहुंचते ही दयाशंकर ने धनंजय से उन का परिचय कराया. धनंजय के कंधे पर हाथ रखते हुए और सहानुभूति जताते हुए प्रकाश राय ने कहा, “धनंजय, तुम्हारे साथ जो हुआ, उस का मुझे बेहद अफसोस है. मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूं कि अगर तुम्हारा सहयोग मिलेगा तो मैं खूनी को कानून के शिकंजे में जकड़ कर ही रहूंगा. आओ, अंदर चलते हैं.”

अंदर फिंगरप्रिंट्स वाले प्रिंट्स की तलाश में लगे थे और फोटोग्राफर फोटो खींच रहा था. प्रकाश राय ने खून से लथपथ रोहिणी की लाश देखी. फिर वह कमरे का निरीक्षण करने लगे. वह सिर्फ एक ही बात सोच रहे थे कि हत्यारा मुख्य द्वार से आया था या दरवाजे से लग कर जो पैसेज है उस में से किचन पार कर के आया था? पैसेज की जांच के लिए वह किचन के दरवाजे पर आए तो किचन टेबल पर ढेर सारा मीट और मछलियां देख कर चौंके. खाने वाले सिर्फ 2 और सामान इतना.

प्रकाश राय बैडरूम में लौट आए. सबइंसपेक्टर दयाशंकर और एएसआई राजेंद्र सिंह अलमारी को सील कर रहे थे. आश्चर्य की बात यह थी कि अलमारी का लौकर खुला था. उस में चाबियां लटक रही थीं. अलमारी का सारा सामान ज्यों का त्यों था, जो इस बात का प्रमाण था कि हत्यारे ने सिर्फ लौकर का माल साफ किया था.

बैडरूम में दूसरी अलमारी भी थी. उसे हाथ नहीं लगाया गया था. दयाशंकर ने प्रकाश राय की ओर प्रश्नभरी नजरों से देखा और फिर धनंजय से कहा, “मिस्टर विश्वास, आप जरा यह अलमारी खोलने की मेहरबानी करेंगे?”

धनंजय ने एक बार प्रकाश राय को और फिर दयाशंकर की ओर देखते हुए पूछा, “मैं इन चाबियों को हाथ लगा सकता हूं?”

प्रकाश राय ने फिंगरप्रिंट्स एक्सपर्ट को प्रश्नभरी नजरों से देखा. एक्सपर्ट ने गर्दन हिलाते हुए अनुमति दे दी. धनंजय ने पहली अलमारी से चाबी निकाल कर दूसरी अलमारी खोली. प्रकाश राय ने गौर से देखा, अलमारी का सारा सामान ज्यों का त्यों था. कहीं कोई उलटपुलट नहीं की गई थी.

पहली अलमारी के लौकर से चोरी गए सामान के बारे में धनंजय से पूछा, “धनंजय, तुम्हारे अंदाज से कितना सामान चोरी गया होगा?”

“रोहिणी के जेवरात ही लगभग 30-40 लाख रुपए के थे. 40-42 हजार नकदी भी थी.”

“इतनी नकदी तुम घर में रखते हो?”

“नहीं साहब, कल शनिवार था, रोहिणी ने 40 हजार रुपए बैंक से निकाले थे. बैंक में हम दोनों का जौइंट एकाउंट है. कल सवेरे यह रकम मैं एक टूरिस्ट कंपनी में जमा कराने वाला था.”

“कारण?”

“अगले महीने मैं और रोहिणी घूमने के लिए जाने वाले थे.” कहते हुए उस ने प्रकाश राय को चेकबुक थमा दी. उन्होंने चेकबुक देखा. धनंजय सही कह रहा था. राजेंद्र सिंह को चेकबुक देते हुए उन्होंने कहा, “राजेंद्र सिंह, इस चेकबुक को भी कब्जे में ले लो और ‘एवन ट्रैवेल्स’ के एजेंट का स्टेटमेंट भी ले लो. रकम बरामद होने पर प्रमाण के रूप में यह सब काम आएगा.”

इस के बाद गैलरी में आ कर प्रकाश राय ने इशारे से एक सिपाही को बुला कर दबी आवाज में कहा, “तुम नीचे जा कर रणधीर से बातें करो और किसी बहाने से उस के घर में जा कर देखो, कहीं कुछ सामान दिखाई देता है क्या? रणधीर संदिग्ध है. बात करतेकरते उस से कहो कि साहब को नारायण पर शक है. वह जरूर कुछ न कुछ बताएगा.”

सिपाही के रवाना होते ही प्रकाश राय किचन में आए. एसआई दयाशंकर और एएसआई राजेंद्र सिंह किचन का निरीक्षण कर रहे थे. प्रकाश राय ने धनंजय से कहा, “धनंजय साहब, बुरा मत मानिएगा. मैं एक बात जानना चाहता हूं. तुम और रोहिणी, सिर्फ 2 लोग हो, इस के बावजूद इतना सारा गोश्त और मछली?”

“साहब, आज मेरे घर पार्टी थी. मेरे औफिस के 2 अधिकारी आशीष तनेजा और देवेश तिवारी अपनीअपनी बीवियों के साथ खाना खाने आने वाले थे. बारीबारी से हम तीनों एकदूसरे के घर अपनी पत्नियों सहित जमा होते हैं और खातेपीते हैं. इस रविवार को मेरे यहां इकट्ठा होना था.”

“तुम हमेशा फाइन चिकन एंड मीट शौप से ही मीट लाते हो?”

“जी सर.”

इतने में सचमुच आशीष तनेजा और देवेश तिवारी अपनीअपनी पत्नियों के साथ धनंजय के घर आ पहुंचे. रोहिणी की हत्या के बारे में सुन कर वे कांप उठे. सक्सेना उन्हें अपने फ्लैट में ले गए. सवेरे 9 बजे धनंजय के मातापिता भी अलकनंदा आ पहुंचे थे. सक्सेना ने फोन कर के उन से कहा था कि रोहिणी सीरियस है. सक्सेना ने दिल्ली में रह रहे रोहिणी के मातापिता को भी खबर कर दी थी.

विचित्र संयोग : चक्रव्यूह का भयंकर परिणाम – भाग 1

रविवार के सुबह सात बजे के लगभग धनवानों का इलाका सेक्टर-15ए अभी सोया पड़ा था. चारों ओर शांति फैली थी. वीआईपी इलाका होने के कारण यहां सवेरा यों भी जरा देर से उतरता है, क्योंकि यहां रात का आलम ही कुछ और होता है. चहलपहल थी तो सिर्फ सेक्टर-2 के पीछे के इलाके में. सवेरे 4 बजे से ही यहां मछलियों का बाजार लग जाता है. ट्रौली रिक्शे और टैंपो रुक रहे थे और उन के साथ ही मछलियों के ढेर लग रहे थे. मछलियां लाने के लिए यहां टैंपो और ट्रौली रिक्शों की लाइन लगी थी.

इसी बाजार के पास फाइन चिकन एंड मीट शौप है, जहां सवेरे 4 बजे से ही बकरों को काटने और उन्हें टांगने का काम शुरू हो जाता है. इस इलाके के लोग इसी दुकान से गोश्त खरीदना पसंद करते थे. सामने स्थित डीटीसी बस डिपो से बसें बाहर निकलने लगी थीं. डिपो के एक ओर नया बास गांव है, जिस में स्थानीय लोगों के मकान हैं. डिपो के सामने पुलिस चौकी है, जिस के बाहर 2-3 सिपाही बेंच पर बैठ कर गप्पें मार रहे थे और चौकी के अंदर बैठे सबइंसपेक्टर आशीष शर्मा झपकियां ले रहे थे.

गांव के पीछे के मयूरकुंज की अलकनंदा इमारत की पांचवी मंजिल के एक फ्लैट में एक सुखी जोड़ा रहता था. यह फ्लैट सेक्टर-62 की एक सौफ्टवेयर कंपनी में काम करने वाले धनंजय विश्वास का था. फ्लैट में धनंजय अपनी पत्नी रोहिणी के साथ रहते थे.

रोहिणी दिल्ली में पंजाब नेशनल बैंक में प्रोबेशनरी औफिसर थी. वह आगरा की रहने वाली थी. 2 वर्ष पूर्व धनंजय से उस का विवाह हुआ था. इस से पहले धनंजय दिल्ली में अपने मातापिता के साथ रहता था. विवाह के बाद उस के सासससुर ने यह फ्लैट खरीदवा दिया था. रोहिणी वाकई रोहिणी नक्षत्र के समान सुंदर थी. धनंजय और उस की जोड़ी खूब फबती थी.

धनंजय के औफिस का समय सवेरे 9 बजे से शाम 6 बजे तक था. वह औफिस अपनी कार से जाता था. लेकिन लौटने का उस का कोई समय निश्चित नहीं था. रोहिणी शाम साढ़े छह बजे तक घर लौट आती थी. इन हालात में पतिपत्नी शाम का खाना साथ ही खाया करते थे. हां, छुट्ïटी के दिनों दोनों मिल कर हसंतेखेलते खाना बनाते थे. धनंजय हर रविवार को सेक्टर-2 में लगने वाली मछली बाजार से मछलियां और फाइन चिकन एंड मीट शौप की दुकान से मीट लाता था.

पहली जून की सुबह 6 बजे फ्लैट की घंटी बजने पर दूध देने वाले गनपत से दूध ले कर धनंजय फटाफट तैयार हो कर मीट लेने के लिए निकल गया. रोहिणी को वह सोती छोड़ गया था. वह कार ले कर निकलने लगा तो चौकीदार ने हंसते हुए पूछा, “साहब, आज रविवार है न, मीट लेने जा रहे हो?”

धनंजय ने हंस कर कार आगे बढ़ा दी थी. फाइन चिकन एंड मीट शौप पर आ कर उस ने 2 किलोग्राम मीट और एक किलोग्राम कीमा लिया. इस के बाद उस ने रास्ते में मछली और नाश्ते के लिए अंडे, ब्रेड, मक्खन और 4 पैकेट सिगरेट लिए. लगभग साढ़े 7 बजे वह फ्लैट पर लौट आया. वाचमैन नीचे ही था, साफसफाई करने वाले अपने काम में लगे थे. ऊपर पहुंच कर उस ने ‘लैच की’ से दरवाजा खोला. दरवाजे के अंदर अखबार पड़ा था, जिसे नरेश पेपर वाला दरवाजे के नीचे से अंदर सरका गया था. अखबार उठाते हुए उस ने रोहिणी को आवाज लगाई, “उठो भई, मैं तो बाजार से लौट भी आया.”

धनंजय के फ्लैट में सुखसुविधा के सभी आधुनिक सामान मौजूद थे. उस ने डाइनिंग टेबल पर सारा सामान रख कर 2 बड़ी प्लेटें उठाईं. एक में उस ने गोश्त और दूसरे में मछली निकाली. फ्लैट के हौल में शानदार दरी बिछी थी और कीमती सोफे सजे थे. एक कोने में टीवी और डीवीडी प्लेयर रखा था. दूसरे कोने में शो केस के नीचे टेलीफोन रखा था, वहीं मेज पर लैपटौप था. पीछे की ओर गैलरी थी, जहां से दिल्ली की ओर जाने वाली सडक़ के साथसाथ दूर तक फैली हरियाली और नोएडा गेट दिखाई देता था.

इस हौल के बाईं ओर बैडरूम का दरवाजा था. बैडरूम में डबल बैड, गोदरेज की 2 अलमारियां और एक ड्रेसिंग टेबल था. बैडरूम से लग कर ही एक छोटा गलियारा था. गलियारे में ही टौयलेट और बाथरूम था. सारा सामान डाइनिंग टेबल पर रखने के बाद बैडरूम में घुसते ही धनंजय की चीख निकल गई, “रोहिणी?”

उस की सुंदर पत्नी, उसे जीजान से चाहने वाली जीवनसंगिनी, जो अभी रात में उस के सीने पर सिर रख कर सोई थी, जिसे वह सुबह की मीठी नींद में छोड़ कर गया था, रक्त से सराबोर बैड पर मरी पड़ी थी. रोहिणी के गले, सीने और पेट से उस वक्त भी खून रिस रहा था, जिस से सफेद बैडशीट लाल हो गई थी.

कुछ क्षणों बाद धनंजय रोहिणी का नाम ले कर चीखता हुआ बाहर की ओर भागा. उस के अड़ोसपड़ोस में 3 फ्लैट थे. दाईं ओर के 2 फ्लैटों में सक्सेना और मिश्रा तथा बाईं ओर के फ्लैट में रावत रहते थे. पागलों की सी अवस्था में धनंजय ने सक्सेना के फ्लैट की घंटी पर हाथ रखा तो हटाया ही नहीं. वह पड़ोसियों के नाम लेले कर चिल्ला रहा था.

कुछ क्षणों बाद तीनों पड़ोसी बाहर निकले. वे धनंजय की हालत देख कर दंग रह गए. धनंजय कांप रहा था. वह कुछ कहना चाहता था, पर उस के मुंह से शब्द नहीं निकल रहे थे. उस के कंधे पर हाथ रख कर सक्सेना ने पूछा, “क्या हुआ विश्वास?”

सक्सेना रिटायर्ड कर्नल थे. उन्होंने ही नहीं, मिश्रा और रावत ने भी किसी अनहोनी का अंदाजा लगा लिया था. धनंजय ने हकलाते हुए कहा, “रो…हि…णी.”

सक्सेना, उन का बेटा एवं बहू, मिश्रा और रावत उस के फ्लैट के अंदर पहुंचे. बैडरूम का हृदयविदारक दृश्य देख कर सक्सेना की बहू डर के मारे चीख पड़ी और उलटे पांव भागी. अपने आप को संभालते हुए सक्सेना ने कोतवाली पुलिस को फोन लगा कर घटना की सूचना दी. कोतवाली में उस समय ड्ïयूटी पर सबइंसपेक्टर दयाशंकर थे.

दयाशंकर ने मामला दर्ज कर के मामले की सूचना अधिकारियों को दी और खुद 2 सिपाही ले कर अलकनंदा के लिए निकल पड़े. उन के पहुंचते ही वहां के चौकीदार ने उन्हें सलाम किया. लोगों के बीच से जगह बनाते हुए दयाशंकर सीधे पांचवीं मंजिल पर पहुंचे. लोग सक्सेना के घर में जमा थे. धनंजय सोफे पर अपना सिर थामे बैठा था.

दयाशंकर के पहुंचते ही धनंजय उठ कर खड़ा हो गया. आगे बढ़ कर सक्सेना ने अपना परिचय दिया और धनंजय के फ्लैट की ओर इशारा किया. थोड़ी ही देर में फोरैंसिक टीम के सदस्य भी आ पहुंचे. इंसपेक्टर प्रकाश राय भी आ पहुंचे थे.

उन के वहां पहुंचते ही एक व्यक्ति सामने आया, “गुडमौर्निंग सर? आप ने मुझे पहचाना? मैं रिटायर्ड इंसपेक्टर खन्ना. इन फ्लैटों की सुरक्षा व्यवस्था मेरे जिम्मे है. सोसाइटी के सेक्रैटरी ने फोन पर मुझे सूचना दी. दयाशंकर साहब से मुझे पता चला कि आप आ रहे हैं.”

प्रकाश राय को खन्ना का चेहरा जानापहचाना लगा. मगर उन्हें याद नहीं आया कि वह उस से कहां मिले थे. सीधे ऊपर न जा कर उन्होंने इमारत को गौर से देखना शुरू किया. इमारत में ‘ए’ और ‘बी’ 2 विंग थे. दोनों विंग के लिए अलगअलग सीढिय़ां थीं. धनंजय ‘ए’ विंग में रहता था. इमारत के गेट पर ही वाचमैन के लिए एक छोटी सी केबिन थी, जिस में से आनेजाने वाला हर व्यक्ति उसे दिखाई देता था.

बदनामी का डर : प्रेमी बना ब्लैकमेलर

आवारगी में गंवाई जान

मोहब्बत का खतरनाक अंजाम

संगीता के प्यार की झंकार – भाग 3

अवशिष्ट को जब संगीता के गांव से लौट आने की जानकारी मिली, तब वह भागाभागा उस से मिलने आ गया. उस वक्त घर पर श्रीराम भी था. संगीता ने पति के सामने ही उसे रूखेपन के साथ कहा कि वह श्रीराम के रहने पर ही यहां आए. इस पर श्रीराम और अवशिष्ट चुप रहे. जैसे ही श्रीराम कुछ मिनट के लिए कमरे से बाहर गया अवशिष्ट ने जेब से एक मोबाइल निकाल कर संगीता को पकड़ा दिया. बोला, ‘‘इसे छिपा कर रखना. जब बात करनी हो तो इसी से फोन करना.’’

उस रोज चायनाश्ते के बाद अवशिष्ट चला गया. कुछ दिन बीत गए. इस बीच जब श्रीराम ड्यूटी पर होता था तब वह अवशिष्ट के दिए फोन से बातें करती. अस्पताल में श्रीराम की ड्यूटी शिफ्ट में होती थी. उस रोज उस की ड्यूटी रात को होने वाली थी. अवशिष्ट को इस की सूचना संगीता ने फोन कर दे दी और उसे अपने घर पर बुला लिया.

शाम ढलते ही अवशिष्ट आ गया. उस से काफी देर तक बातें कीं. आगे की योजना बनाई. रात के 8 बजने वाले थे. संगीता ने अवशिष्ट को रात में वहीं रुकने के लिए कहा.

संगीता ने प्रेमी के साथ गटके पैग

अवशिष्ट तुरंत बाजार गया और बच्चों के लिए खानेपीने का कुछ सामान ले आया. साथ में शराब की एक बोतल भी खरीद लाया. पहले भी वह श्रीराम के साथ बैठ कर कई बार शराब की महफिल जमा चुका था.

इस में संगीता भी साथ दिया करती थी. उस रोज भी वह शराब की बोतल देख कर खुश हो गई. काफी दिनों बाद अवशिष्ट के साथ पैग लगाने का मौका जो मिल गया था. वह भी अकेले में. अवशिष्ट ने फटाफट शराब के 2 पैग गटक लिए और कमरे में पड़े बैड पर पसर गया. थोड़ी देर में संगीता प्लेट में कुछ नमकीन ले आई. गिलास खाली देख कर बोली, ‘‘अकेलेअकेले गटक लिए.’’

अवशिष्ट लेटालेटा बोला, ‘‘एक और बना दो.’’

संगीता गिलास में 2 पैग शराब डालने के बाद अपने साथ गिलास में एक पैग बना लिया. गिलास को छोटे टेबल पर रख कर अवशिष्ट को उठने के लिए कहा. अवशिष्ट ने उठने के बजाए अपना हाथ बढ़ा दिया, ‘‘ये लो, खींच कर उठाना जरा.’’

संगीता मुसकराती हुई उस का हाथ खींचने लगी, लेकिन वह अपनी ताकत लगाती कि इस से पहले अवशिष्ट ने उसे ही खींच कर अपने ऊपर गिरा लिया, ‘‘अरे..अरे, यह क्या करते हो…’’ कहती हुई संगीता अवशिष्ट के शरीर पर गिर पड़ी. संगीता उठने का प्रयास करने लगी. हालांकि अवशिष्ट की मदद से ही वह उठ पाई और अपने अस्तव्यस्त कपड़े को संभालने लगी.

इस क्रम में अवशिष्ट की निगाह उस की मांसल शरीर पर गई. एक नजर उस ने उभार पर भी डाली और दूसरी नजर उस की शरमाई हुई आंखों पर. संगीता ने चुपचाप शराब का गिलास उसे पकड़ा दिया.

‘‘अपना गिलास तो उठाओ. चीयर्स करते हैं,’’ अवशिष्ट बोला. झेंपती हुई संगीता ने अपना गिलास उठा लिया और चीयर्स करने के बाद उन्होंने अपनेअपने गिलास को एक साथ होंठों से लगा लिया.

उस के बाद संगीता ने 3 और पैग बनाए. उन्होंने नमकीन खाई. चीयर्स किया फिर पैग दर पैग गटकते रहे. अवशिष्ट पर शराब का नशा छाने लगा था, जबकि संगीता पर शराब के साथसाथ यौवन का नशा भी छा चुका था. दोनों कब दो जिस्म एक जान हो गए, पता ही नहीं चला.

आधी रात को जब संगीता को होश आया तब उस ने खुद को अवशिष्ट की बलिष्ठ बाहों में पाया. लंबे अरसे के बाद उस ने अपनी कामुकता को इतना शांत महसूस किया था. अवशिष्ट की भी आंखें खुल चुकी थीं. उसे भी संगीता के समर्पण को ले कर आश्चर्य हुआ.

दोनों एकदूसरे से अलग हुए. अपनेअपने कपड़े पहने और बैठ कर इधरउधर की बातें करने लगे. संगीता ने पति को ले कर आशंका जताई. चिंतित हो कर बोली, ‘‘हमारे संबंध के बारे में श्रीराम को नहीं मालूम पड़ना चाहिए, वरना वह हमें कहीं का नहीं छोड़ेगा.’’

‘‘उसे कैसे मालूम होगा?’’ अवशिष्ट बोला.

हालांकि सवाल तो दोनों के मन में था कि वे श्रीराम की नजरों से बचते हुए इस नए रिश्ते को कायम कैसे रखें. इस का हल संगीता ने ही निकाला कि वे चोरीछिपे मिलेंगे. उसे छिपा कर फोन पर बातें होंगी.

वे बातों में इतने खो गए कि उन्हें पता ही नहीं चला सुबह के 4 बजने वाले हैं. वे अपने संबंधों के आड़े आने वाली समस्या का समाधान निकालने लगे थे, तभी दरवाजा खटखटाने की आवाज आई.

संगीता ने ‘कौन है’ पूछा तो बाहर से श्रीराम की आवाज आई. उस ने भाग कर शराब की बोतल, नमकीन के प्लेट, गिलास आदि हटा कर बिस्तर ठीक किया और दरवाजा खोला. अवशिष्ट श्रीराम को आया देख कर सकपका गया. श्रीराम भी उसे घर में देख कर पूछ बैठा, ‘‘तुम यहां? रात को यहीं थे?’’

‘‘अरे, नहीं. मैं तो अभीअभी आया हूं. तुम्हारे बारे में पूछ ही रहा था. असल में मेरी गाड़ी चौराहे के पास ही खराब हो गई थी. मैं ने सोचा कि तुम से किसी मैकेनिक की मदद मिल जाएगी. यहां तुम्हारी जानपहचान का कोई मैकेनिक होगा ही, इसलिए आ गया.’’ अवशिष्ट ने रुकरुक कर अपनी बात पूरी की.

संगीता आश्चर्य से उस का चेहरा देखने लगी. श्रीराम बोला, ‘‘अभी तो नहीं, सुबह 9 बजे के करीब ही मैकेनिक मिल पाएगा. तब तक तुम यहीं रुक जाओ.’’

‘‘नहींनहीं, मैं टैंपो से घर चला जाता हूं, सुबह तो होने वाली ही है.’’ कहता हुआ अवशिष्ट चला गया. उस के जाने के बाद श्रीराम ने गुस्से में संगीता से पूछा, ‘‘सचसच बताओ, वह यहां कब आया था? संगीता ने हाथ जोड़ लिए. माफी मांगते हुए बोली, ‘‘उस ने जो बताया सही था. मेरा उस के साथ कोई नाजायज संबंध नहीं है, जैसा तुम समझ रहे हो.’’

उस वक्त तो श्रीराम और ज्यादा कुछ नहीं बोला. सिर्फ हिदायत दी कि आगे से वह उसे अवशिष्ट के साथ देखना नहीं चाहता है.

पति से दूरियां, प्रेमी से नजदीकियां

उस के बाद अवशिष्ट कुल 2 महीने तक श्रीराम की नजरों से छिपा रहा, लेकिन संगीता से उस का मिलना बंद नहीं हुआ. वह श्रीराम के नहीं रहने पर अवशिष्ट को बुला लेती थी. इस तरह से उन के बीच नाजायज रिश्ते की रेल चलती रही. पति की नजरों में अच्छी बनी रहने के लिए वह उस की हर बात मान लेती थी.

इस की जानकारी श्रीराम को भी हो गई थी, लेकिन अपनी बदनामी के डर से चुप लगाए हुए था. धीरधीरे उस ने संगीता को सही रास्ते पर लाने की काफी कोशिशें कीं, मगर संगीता पर तो इश्क का भूत और जिस्म का नशा सवार था.

जब कभी पति शारीरिक संबंध के लिए कहता तो सिरदर्द का बहाना बना लेती थी. जबकि वह प्रेमी संग गुलछर्रे उड़ाया करती थी. शर्मसार श्रीराम उन के बीच के रिश्ते को रोक पाने में असफल था. वह विवश भी था. धीरेधीरे अवशिष्ट पहले की तरह बेधड़क संगीता के पास आनेजाने लगा.

फिर से अवशिष्ट को ले कर घर में श्रीराम और संगीता के बीच कलह होने लगी. एक दिन श्रीराम दोपहर के समय घर पहुंचा, तो संगीता को आधेअधूरे कपड़े में पाया. उस वक्त अवशिष्ट भी मौजूद था. उस ने उसे  काफी भलाबुरा कहा. उस के जाने के बाद संगीता को भी समझाया.

घर में रोजरोज के कलह से बचने के लिए संगीता जरूरी काम का बहाना बना कर मायके चली गई. मायके वालों को जब संगीता के अवैध रिश्ते के बारे में जानकारी मिली, तब उन्होंने भी उसे समझाने की कोशिश की. फिर वह मायके से वापस आ गई. लखनऊ आते ही उस का पुराना खेल फिर शुरू हो गया.

अगली बार जब संगीता और अवशिष्ट मिले, तब उन्होंने अपने भविष्य की योजना बनाई कि कैसे श्रीराम से छुटकारा पाया जाए. संगीता ने कहा कि श्रीराम के रहते एक साथ बगैर रोकटोक के सुखशांति से जीवन गुजारना मुश्किल है. अवशिष्ट ने जब पूछा कि क्या किया जाना चाहिए, तब संगीता ने 2 प्रस्ताव रखे कि कहीं भाग चलें या फिर श्रीराम को रास्ते से हटाने का वही कोई तरीका बताए. दोनों की किसी भी बात पर रजामंदी नहीं बनी.

अवशिष्ट ने संगीता को सपने दिखाते हुए कहा कि वह उस के कहने पर श्रीराम को हमेशा के लिए रास्ते से हटा देगा. इस से उस के जीवन भर के लिए कांटा तो दूर हो जाएगा. साथ ही उस के मरने के बाद मकान, प्लौट, धन उस के नाम हो जाएगा. यहां तक कि अनुकंपा पर उसे नौकरी भी मिल जाएगी. इस तरह से वह श्रीराम की सारी संपत्ति की वारिस बन जाएगी.

यह प्रस्ताव संगीता को अच्छा लगा. जबकि सच तो यह भी था कि इस से अवशिष्ट को भी फायदा होने वाला था. वह चाहता था कि श्रीराम की मौत के बाद उस से शादी कर लेगा और फिर उस की संपत्ति का हकदार भी बन जाएगा.

भाड़े के हत्यारों को किया शामिल

संगीता के हामी भरने के बाद योजना बनाई गई. इस में संतोष और सुशील को पैसे का लालच दे कर योजना में शामिल किया गया. दोनों राजकीय पौलीटेक्निक के जहांगीराबाद कैंपस के तालाब से मछली का कारोबार करते थे.

श्रीराम अपनी कार बेचना चाहता था. यह बात उस ने अवशिष्ट को भी बता दी थी. तय कार्यक्रम के अनुसार 18 दिसंबर, 2021 की शाम राम मनोहर लोहिया मैडिकल संस्थान से अवशिष्ट ने श्रीराम से कहा कि कार खरीदने के लिए 2 युवक मैडिकल संस्थान में आए हैं. वे कार की टेस्ट ड्राइव करना चाहते हैं. उन के साथ उन के परिवार की एक महिला भी है.

वे युवक कोई और नहीं बल्कि अवशिष्ट द्वारा भेजे गए भाड़े के बदमाश सुशील और संतोष थे जो कुंती नाम की महिला को इसलिए अपने साथ लाए थे ताकि श्रीराम को उन पर शक न हो. टेस्ट ड्राइव के बहाने दोनों युवक श्रीराम को कार में बिठा कर फैजाबाद रोड पर ले गए इस के बाद वे किसान पथ से कार को इंदिरा नगर की ओर ले गए. वहां एक सुनसान जगह पर कार रोक दी.

अवशिष्ट अपनी कार से उन के पीछेपीछे चल रहा था. उस के साथ प्रेमिका संगीता थी. सुनसान जगह पर श्रीराम को कार से उतारने के बाद सुशील ने तमंचे से श्रीराम पर फायर झोंक दिया. लेकिन फायर मिस हो जाने के कारण अवशिष्ट के दिए हुए पिस्टल से श्रीराम को गोली दाग दी. उस की घटनास्थल पर ही मौत हो गई.

उन्होंने शव को इंदिरा नहर में फेंक दिया. तीनों उस की कार को लखनऊ हाईवे से लिंक रोड पर करौली के पास छोड़ कर चले गए, जिसे बाद में पुलिस ने बरामद किया. अवशिष्ट ने भी अपनी कार दूसरी जगह ले जा कर खड़ी कर दी. वह कार भी 24 दिसंबर, 2021 को पुलिस ने बरामद कर ली थी. उसी कार कार से मिले कुछ दस्तावेजों के आधार पर संगीता और अवशिष्ट कुमार की गिरफ्तारी हो पाई. उन्होंने श्रीराम हत्याकांड में संतोष, सुशील और कुंती का नाम लिया, जिन की भी अगले दिन गिरफ्तारी हो गई.

इस पूरे मामले को निपटाने में एसआई उदयराज निषाद, अतिरिक्त क्राइम ब्रांच इंसपेक्टर विनोद यादव और पवन सिंह समेत महिला एसआई दीपिका सिंह व सिपाही पूजा देवी की सराहनीय भूमिका रही.

पुलिस सभी आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेज चुकी थी. कथा संकलन तक श्रीराम की लाश बरामद नहीं हो पाई थी.

संगीता के प्यार की झंकार – भाग 2

अवशिष्ट जब श्रीराम के घर गया, तब उन्होंने उस की खूब खातिरदारी की, जिस से उन के बीच का आत्मीय संबंध और गहरा हो गया. फिर तो अवशिष्ट का श्रीराम के घर अकसर आनाजाना भी होने लगा. वह श्रीराम और संगीता के कागजी काम में मदद कर दिया करता था. जैसे बैंक, मोबाइल, बिजली बिल, गैस आदि के काम में पतिपत्नी दोनों अवशिष्ट की मदद लिया करते थे. इसलिए जरूरत पड़ने पर श्रीराम या संगीता उसे गाहेबगाहे फोन कर बुला लिया करते थे.

ऐसे में कई बार अवशिष्ट को संगीता के साथ अकेले में समय गुजारने का भी मौका मिल जाता था. जल्द ही दोनों आपस में काफी घुलमिल गए थे. संगीता को अवशिष्ट की अदाएं, बातचीत करने का अंदाज, पहनावा, बोलचाल व बर्ताव काफी अच्छा लगता था. अवशिष्ट को भी संगीता एक सभ्य महिला की तरह लगती थी, जबकि वह बहुत कम पढ़ीलिखी थी.

संगीता जब कभी अवशिष्ट की तुलना पति श्रीराम से करती तब अवशिष्ट के मुकाबले पति बेवकूफ नजर आता था. संयोग से वह श्रीराम से अच्छे ऊंचे पद पर सरकारी नौकरी में था. फिर क्या था, दोनों को जब कभी मौका मिलता वे साथसाथ खरीदारी करने या यूं ही सैरसपाटे के लिए निकल जाते थे. वे आपस में काफी खुल गए थे. उन के बीच हंसीमजाक भी होने लगा था. संगीता को वह कई बार गिफ्ट भी दे चुका था.

श्रीराम इन सब से अनजान बना रहा. सच तो यह था कि संगीता को अवशिष्ट काफी पसंद आने लगा था. जब कभी वह घर नहीं आता था, तब संगीता उसे किसी काम के लिए श्रीराम से फोन करवा कर बुला लेती थी. इधर दोनों की मुलाकातों का सिलसिला बढ़ने लगा, उधर श्रीराम की संगीता के साथ तूतूमैंमैं होने लगी. फिर भी संगीता की लव स्टोरी परवान चढ़ रही थी.

कहने को संगीता 3 बच्चों की मां बन चुकी थी. उम्र भी 40 के करीब पहुंच चुकी थी, लेकिन वह यौवन के चरम पर थी. उस की जरूरतों को पूरी करने में श्रीराम असमर्थ था. वह घरेलू जरूरतों की पूर्ति में लगा रहता था. वह न तो संगीता की भावनाओं का खयाल रख पाता था और न ही उसे यौनसुख ही दे पाता था.

प्रेमी की मर्दानगी की कायल हो गई थी संगीता

संगीता की स्थिति एक जल बिन प्यासी मछली जैसी हो गई थी. ऐसे में वह अवशिष्ट का साथ पा कर कुछ पल के लिए सुखद एहसास का अनुभव करती थी. वह उस से एक दिन भी मिले बगैर नहीं रह पाती थी. श्रीराम को इस बात का एहसास होने लगा था कि संगीता का लगाव अवशिष्ट के प्रति कुछ अधिक ही हो गया है. वह उसे एक भरपूर मर्द के नजरिए से देखने लगी है.

सच तो यह भी था कि संगीता श्रीराम की उपेक्षा कर उसे कमजोर मर्द का ताना भी कसने लगी थी, जबकि उसे संगीता की यह हरकत बुरी लगने लगी थी. वह नहीं चाहता था कि संगीता उस के दोस्त के साथ मेलजोल रखे. पानी उस के सिर के ऊपर से बहने लगा था.

श्रीराम को संगीता का अवशिष्ट के साथ मिलनाजुलना अखरने लगा था. यह देख कर श्रीराम संगीता पर अंकुश लगाने लगा. बातबात पर टोकने लगा. जब उस से बात नहीं बनी, तब उस ने इस बारे में अवशिष्ट से भी बात की. उस से कहा, ‘‘यार, तुम्हारी मेरी दोस्ती है. मैं चाहता हूं कि वह हमेशा बनी रहे, लेकिन तुम्हारी खातिर मेरा पत्नी के साथ झगड़ा होता रहता है. इसलिए तुम उस से नहीं मिलो तो अच्छा होगा… उस से फोन पर बातें भी मत किया करो… ’’

इस पर अवशिष्ट ने उसे खरा सा जवाब दिया, ‘‘इस में मेरी क्या गलती है. तुम अपनी पत्नी संगीता पर क्यों नहीं अंकुश लगाते हो. उसे क्यों नहीं समझाते हो. वही मुझे फोन कर बुलाती रहती है.’’

श्रीराम को अवशिष्ट की बात बुरी लगी. वह समझ गया कि उसे संगीता पर ही किसी तरह से अंकुश लगाना होगा. उसे अवशिष्ट से दूर करना होगा.

वैवाहिक जीवन और नाजायज रिश्ता

इस के लिए उस ने एक तरीका निकाला और संगीता को उस के मायके कंचनपुर भेज दिया, लेकिन संगीता भी कहां मानने वाली थी. वह तो अवशिष्ट को दिल से चाहती थी. उस के खयालों में खोई रहती थी. दिल में उस के प्रति प्यार का तूफान उठ चुका था. शरीर में यौनांनद की काल्पनिक अनुभूति के गुबार उठते रहते थे. उसे मिले बगैर रह ही नहीं सकती थी.

दूसरी तरफ अवशिष्ट की भी कुछ ऐसी ही स्थिति बनी हुई थी. संगीता के रूपयौवन से वह भी काफी प्रभावित था. जब कभी सजीसंवरी संगीता के मांसल शरीर के साथ कमसिन अल्हड़ जैसी हरकतें देखता था, तब उसे के कुंवारेपन में एक टीस की अनुभूति होती थी. यही कारण था कि वह उस के एक बुलावे पर दौड़ादौड़ा मिलने चला आता था.

श्रीराम यादव का विवाह संगीता के साथ 1996 में सामाजिक रीतिरिवाज के अनुसार हुआ था. तब से वह उस के साथ लखनऊ में ही रह रही थी. विवाह होने के कई सालों बाद गांव गई थी. वहां उस का मन नहीं लगा. 2 सप्ताह में ही वह अपने पति के पास आ गई. आते ही उस ने पति से माफी मांगते हुए कहा कि वह उस का हर कहा मानेगी.

संगीता के प्यार की झंकार – भाग 1

पति के देहसुख से वंचित संगीता जिस युवक के प्यार में पागल थी, उस की नजर कहीं और भी टिकी थी. लखनऊ के बहुचर्चित राम मनोहर लोहिया संस्थान में 28 दिसंबर, 2021 को कुछ ज्यादा ही गहमागहमी थी. ओपीडी से ले कर दूसरे विभागों में मरीजों की काफी भीड़भाड़ थी. हर विंडो और डाक्टर के चैंबर के बाहर अफरातफरी का आलम था.

ऐसा ही माहौल भरती वार्ड और जांच करवाने वाले विभागों के भीतर भी था. वहां के मरीज और उन के साथ आए अटेंडेंट ने पाया कि अस्पताल के कर्मचारी ड्यूटी करने के बजाय विरोध जता रहे थे. नतीजा अस्पताल का अधिकतर कामकाज पूरी तरह से ठप हो चुका था.

दरअसल, संस्थान में काम करने वाले चतुर्थ श्रेणी के एक कर्मचारी श्रीराम यादव का 18 दिसंबर, 2021 को अपहरण हो गया था. उसे मार कर नहर में फेंक देने की चर्चा थी, जबकि हत्या के जुर्म में उस की पत्नी संगीता यादव समेत 5 लोगों को हिरासत में लिया जा चुका था. लेकिन पुलिस लाश बरामद नहीं कर सकी थी.

इस हत्याकांड को ले कर ही संस्थान का स्टाफ गुस्से में था. नर्सिंग संघ के आह्वान पर सभी सुबह 9 बजे से ही हड़ताल पर थे. अस्पताल की स्थिति को देख कर मैनेजमेंट के हाथपांव फूल गए थे. इस की शिकायत जब मैडिकल कालेज के सीएमएस यानी चीफ मैडिकल सुपरिंटेंडेंट तक पहुंची, तब उन्होंने जिला प्रशासन और पुलिस के उच्च अधिकारियों से संपर्क किया.

सीएमएस की सूचना पा पुलिस कमिश्नर डी.के. ठाकुर ने तुरंत डीसीपी अमित कुमार आनंद और एडिशनल सीपी एस.एम. कासिम आब्दी को लोहिया संस्थान में आई आकस्मिक समस्या का तुरंत समाधान निकालने के लिए कहा. डीसीपी अमित कुमार टीम के साथ अस्पताल पहुंचे. उन्होंने आंदोलनकारियों की बातें सुनीं. उन की मांग को जल्द से जल्द पूरी करने का आश्वासन दिया. उन्होंने कहा कि वह पीडि़त परिवार को न्याय दिलाने और श्रीराम की लाश बरामद करने की कोशिश करेंगे.

श्रीराम यादव (42) अपनी पत्नी संगीता यादव, 3 बच्चों और परिवार के अन्य सदस्यों के साथ लोहिया संस्थान के परिसर स्थित सरकारी आवास में रहते थे. उन के पास 18 दिसंबर की देर शाम कार खरीदने के लिए 2 युवक आए थे. श्रीराम ने अपनी कार बेचने के बारे में खास दोस्त अवशिष्ट कुमार को कह रखा था. उन के कहे मुताबिक ही दोनों युवक कार का ट्रायल लेने आए थे.

श्रीराम उन के साथ टेस्ट ड्राइव कराने के लिए चले गए. किंतु देर रात तक घर नहीं लौटने पर परिवार के सदस्य चिंतित हो गए. पत्नी संगीता ने इस की सूचना अपने देवर को दी. उन्होंने रिश्तेदारों व दोस्तों से संपर्क किया, लेकिन श्रीराम के बारे में कोई जानकारी नहीं मिल पाई.

अगले दिन 19 दिसंबर को भाई मनीष यादव ने विभूतिखंड थाने में उन की खास जानपहचान वाले प्रो. अवशिष्ट कुमार व अन्य अज्ञात युवकों के खिलाफ अपहरण की रिपोर्ट लिखवा दी थी.

पुलिस ने छानबीन के बाद 3 दिन के भीतर ही 22 दिसंबर को बाराबंकी में अयोध्या हाईवे से लिंक रोड पर कुरौली के पास यूपी32 बीएम 5048 नंबर की कार बरामद कर ली, लेकिन तब तक श्रीराम का कोई अतापता नहीं चल पाया.

पति की हत्या में संगीता हुई गिरफ्तार

कार मिलने के बाद घटनास्थल से ले कर लोहिया परिसर के सीसीटीवी कैमरे खंगाले गए. सभी फुटेज में श्रीराम की गाड़ी के पीछे एक कार जाती दिखी. उस के नंबर यूपी78 पीक्यू 2268 से पता चला कि वह कार अवशिष्ट की है, जिस पर श्रीराम के भाई ने एफआईआर में शक जताया था. साथ ही कार 18 दिसंबर, 2021 से ही अवशिष्ट के निवास स्थान परिसर में भी नहीं थी.

इसे आधार बना कर की गई गहन छानबीन के बाद पुलिस टीम ने श्रीराम की पत्नी संगीता समेत अवशिष्ट, संतोष, सुशील व कुंती को गिरफ्तार कर लिया. उन से पूछताछ में श्रीराम की गोली मार कर हत्या किए जाने की बात सामने आई.

उन्होंने स्वीकार कर लिया कि श्रीराम को गोली मार कर उस का शव इंदिरा नहर में फेंक दिया गया है. इस जानकारी के बाद श्रीराम की दोनों बेटियां व एक बेटा पिता की हत्या व मां की गिरफ्तारी से सदमे में आ गए. इस हत्याकांड में सब से बड़े सवाल का जवाब मिलना बाकी था कि आखिर श्रीराम की हत्या क्यों की गई? इसी के साथ कई दूसरे सवालों के जवाब भी तलाशे जाने थे.

इस बारे में डीसीपी (पूर्वी) अमित कुमार आनंद ने अपनी प्राथमिक जांच के आधार पर मीडिया को बताया कि श्रीराम की पत्नी संगीता यादव अवशिष्ट कुमार की प्रेमिका है, जो बाराबंकी के जहांगीराबाद स्थित राजकीय पौलीटेक्निक परिसर में रहता है.

अवशिष्ट मूलरूप से लखीमपुर खीरी का निवासी है. हिरासत में लिए गए दूसरे आरोपियों में कुंती गांधीनगर, बाराबंकी की रहने वाली है. संतोष कुमार बाराबंकी में डखौली गांव और सुशील कुमार अशोक नगर का निवासी है.

विभूतिखंड थाने के इंसपेक्टर चंद्रशेखर सिंह ने उन की गिरफ्तारी के साथसाथ .32 बोर की पिस्टल, तमंचा, 7 कारतूस व एक खोखा और अवशिष्ट से संगीता की 4 फोटो, आधार कार्ड, पैन कार्ड व पोस्ट पेमेंट कार्ड बरामद किया. पुलिस के मुताबिक संगीता का अवशिष्ट के साथ लंबे समय से प्रेमप्रसंग चल रहा था. दोनों चोरीछिपे मिलते रहते थे. अवशिष्ट से बात करने के लिए संगीता ने एक मोबाइल फोन छिपा कर रखा हुआ था.

दिसंबर 2021 की शुरुआत में श्रीराम ने वह फोन देख लिया था. उसे पता चल गया था कि संगीता चोरीछिपे अवशिष्ट से बातें करती है. इसे ले कर पतिपत्नी के बीच काफी झगड़ा हुआ. उस के बाद से श्रीराम पत्नी संगीता पर नजर रखने लगा.

और शुरू हुई लव स्टोरी

संगीता ने जब अवशिष्ट को इस की जानकारी दी, तब दोनों ने श्रीराम को रास्ते से हटाने की साजिश रच डाली. उन्होंने योजना बना कर श्रीराम को मौत के घाट उतार दिया था. इसे अंजाम देने के लिए अवशिष्ट ने जहांगीराबाद में पौलीटेक्निक के पास स्थित तालाब में मछली पालन करने वाले जानकार संतोष व सुशील को राजी कर लिया था.

लोहिया संस्थान में 28 दिसंबर को हंगामे के बाद श्रीराम हत्याकांड को ले कर पुलिस नए सिरे से सक्रिय हो गई. थानाप्रभारी ने संगीता यादव को लखनऊ के बड़े पुलिस अधिकारियों अमित कुमार आनंद, कासिम आब्दी और एसीपी अनूप कुमार सिंह के सामने पेश किया.

संगीता से जब सख्ती से पूछताछ की गई, तब हत्याकांड और उस के पीछे के कारणों का सारा मामला सामने आ गया, जिस में अवशिष्ट कुमार की भूमिका भी काफी संदिग्ध थी. उस के बाद अवशिष्ट कुमार से भी गहन पूछताछ की गई. फिर जो कहानी आई, वह इस प्रकार है—

प्रो. अवशिष्ट कुमार बाराबंकी में फैजाबाद रोड पर राजकीय पौलीटेक्निक कालेज जहांगीराबाद में पिछले 8 सालों से नौकरी कर रहा था. उस के पिता रामनरेश लखीमपुर में रहते हैं. उस का श्रीराम से 2020 में अचानक संपर्क तब हो गया था, जब वह अपने इलाज के सिलसिले में राम मनोहर लोहिया संस्थान में भरती था. वह कोविड-19 का क्वारंटाइन मरीज था. इसी बीच उस की जानपहचान बड़े अधिकारी से ले कर निचले तबके के कर्मचारियों तक से हो गई थी.

वह अकेला था और अपनी देखरेख उसे ही खुद करनी पड़ती थी. यह देख कर वहां काम करने वाला श्रीराम उस की मदद करने लगा था. सहानुभूति दिखाते हुए उस ने अपनी पत्नी संगीता को भी बीचबीच में देखरेख करने के लिए कह दिया. जल्द ही अवशिष्ट की श्रीराम और संगीता से अच्छी जानपहचान हो गई. उस की सेहत में भी काफी सुधार हो गया और अस्पताल से छुट्टी मिल गई. इस के लिए उस ने श्रीराम और उस की पत्नी को तहेदिल से धन्यवाद कहा. जवाब में पतिपत्नी ने उसे एक रोज घर पर आमंत्रित किया.

मांगा सुहाग मिली मौत

बदनामी का डर : प्रेमी बना ब्लैकमेलर – भाग 3

साहिल ने तुरंत इस घटना की सूचना अपने ससुर बृजभूषण और साले गौरव को दी. लगभग 2 घंटे बाद श्वेता के घर वाले रिश्तेदारों और परिचितों के साथ जगराओं आ पहुंचे. उन लोगों ने साहिल या उस के घर वालों की कोई बात सुने बिना ही हंगामा करना शुरू कर दिया.

थाना सिटी को भी घटना की सूचना दे दी गई थी. थाना सिटी के थानाप्रभारी दलजीत सिंह सिद्धू, एसआई मलकीत सिंह एएसआई बलदेव सिंह, हेडकांस्टेबल कुलदीप सिंह, गुरदियाल सिंह, बलजिंदर कुमार, कांस्टेबल जसविंदर सिंह के साथ अस्पताल पहुंच गए थे.

लाश कब्जे में ले कर उन्होंने आगे की काररवाई शुरू कर दी. दलजीत सिद्धू ने श्वेता की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवानी चाही तो उस के मायके वालों ने हंगामा खड़ा कर दिया.  उन का कहना था कि श्वेता कोठी की छत से खुद नहीं कूदी, बल्कि साहिल और उस के मांबाप ने दहेज के लिए उसे छत से धकेल कर मारा है. जब तक उन लोगों को गिरफ्तार नहीं किया जाएगा, तब तक वे लाश नहीं ले जाने देंगे.

श्वेता के घर वालों की मदद के लिए कुछ स्थानीय नेता और समाजसेवी भी आ गए थे. वे पुलिस वालों को धमकी दे रहे थे कि अगर दोषियों के खिलाफ काररवाई नहीं की जाती तो वे धरनाप्रदर्शन के साथ बाजार बंद करवा देंगे. हंगामा चल ही रहा था कि डीएसपी सिटी सुरेंद्र कुमार भी घटनास्थल पर आ गए.

थानाप्रभारी दलजीत सिद्धू ने मौके की नजाकत देखते हुए इस घटना को अपराध संख्या 62/2014 पर भादंवि की धारा 304बी/34 के अंतर्गत साहिल, उस के पिता अशोक कुमार सिंगला और मां कुसुम सिंगला के खिलाफ दर्ज करा दिया. यह 11 मार्च, 2014 की बात है. थानाप्रभारी दलजीत सिंह सिद्धू ने उसी दिन श्वेता की लाश का पोस्टमार्टम करा कर लाश मोर्चरी में रखवा दी. अगले दिन यानी 12 मार्च को श्वेता की लाश का एक्सरे करवाया गया.

13 मार्च को श्वेता की हत्या के आरोप में साहिल को गिरफ्तार कर लिया गया. साहिल की गिरफ्तारी के बाद श्वेता के मायके वाले कुछ शांत हुए. 14 मार्च को उसे डयूटी मजिस्ट्रेट के सामने पेश कर के 18 मार्च तक के लिए रिमांड पर लिया गया.

थानाप्रभारी दलजीत सिंह सिद्धू ने साहिल को अदालत में पेश करने से पहले 13 मार्च को ही उस की निशानदेही पर श्वेता का मोबाइल फोन और लैपटौप उस के घर से बरामद कर लिया था.  पुलिस ने श्वेता का फोन चैक किया तो पता चला कि घटना वाले दिन यानी 10 मार्च को श्वेता के नएपुराने, दोनों नंबरों पर 2 नंबरों  से 163 बार फोन आए थे तो उन्हीं नंबरों से 193 मैसेज किए गए थे.

पुलिस ने उन दोनों नंबरों के बारे में पता किया तो वे नंबर लुधियाना के हितेश जिंदल के निकले. इस के बाद जब थानाप्रभारी दलजीत सिंह सिद्धू ने श्वेता के लैपटौप को खंगाला तो उस में उन्हें श्वेता और हितेष की अनगिनत अर्धनग्न अश्लील तसवीरें भरी पड़ी मिलीं. श्वेता के मोबाइल फोन और लैपटौप को चैक करने के बाद सारा मामला साफ हो गया.

एक एसएमएस में श्वेता ने हितेश को लिखा था, ‘तुम मुझे परेशान मत करो. मैं इस दुनिया से बहुत दूर जा रही हूं, मेरे जाने के बाद तुम्हारे मन में जो आए कर लेना, जितनी मरजी हो मेरी बदनामी करा देना.’

इस एसएमएस के जवाब में हितेश ने लिखा था, ‘हिम्मत है तो मर के दिखा.’

दरअसल, घटना वाले दिन यानी 10 मार्च को 163 बार फोन कर के और 193 बार एसएमएस कर के हितेश ने श्वेता को पूरी तरह से बदनाम करने की जो धमकियां दी थीं, उस से वह बुरी तरह डर गई थी. हितेश उसे तुरंत साहिल से रिश्ता खत्म करने के लिए कह रहा था. वह यह भी कह रहा था कि अगर वह बात नहीं कर सकती तो वह स्वयं फोन कर के साहिल से बात कर लेता है.

जबकि श्वेता ऐसा करने से उसे मना कर रही थी. श्वेता के बारबार मना करने के बावजूद भी हितेश ने रात 1 बजे के करीब साहिल को फोन कर के अपने संबंधों की बात बता दी थी. यही नहीं, उस ने साहिल से गालीगलौज भी की थी. इस पर साहिल ने उस की बातों का बुरा नहीं माना और सुबह बात करने को कह कर फोन काट दिया था.

साहिल ने सोचा था कि सुबह वह कुछ बड़ेबूढ़ों को ले जा कर हितेश को समझा देगा. क्योंकि उन के बीच रिश्तेदारी भी थी. एक तरह से साहिल हितेश के बहनोई का बहनोई था. रात में साहिल ने श्वेता से भी कोई बात नहीं की थी. लेकिन श्वेता ने साहिल और हितेश के बीच होने वाली बातें सुन ली थीं. तब बदनामी के डर से उस ने आत्महत्या कर ली थी.

23 मार्च को पुलिस ने फोन और लैपटौप में मिले सुबूतों को अदालत में पेश कर के स्थानीय जज गुरबीर सिंह की अदालत में साहिल को निर्दोष बताते हुए श्वेता को आत्महत्या के लिए विवश करने के लिए हितेश जिंदल को आरोपी बनाने की अपील की.

साहिल के वकील अशोक भंडारी ने भी श्वेता के घर वालों के अलावा अन्य लोगों के दर्ज बयान, लैपटौप से मिली श्वेता और हितेश की अश्लील तसवीरें तथा फोन में मिले तमाम रिकौर्ड अदालत में पेश किए थे. अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें और सुबूत देखने के बाद साहिल को इस केस से मुक्त कर हितेश को आरोपी बना कर जल्द से जल्द उसे गिरफ्तार करने के आदेश दिए. हितेश अपनी पत्नी हिना के साथ उसी दिन घर से फरार हो गया था, जिस दिन श्वेता ने आत्महत्या की थी.

5 मई, 2014 को हितेश ने लुधियाना की सैशन जज सुरेंद्रपाल कौर की अदालत में अग्रिम जमानत के लिए आवेदन किया, जिसे उन्होंने अगले दिन खारिज कर दिया था. हितेश की तलाश में पुलिस रातदिन छापे मार रही थी. लेकिन वह पुलिस के हाथ नहीं लग रहा था. श्वेता ने अपनी एक गलती से अपना घर तो बरबाद किया ही, बेटे को भी बिना मां के कर दिया.

_हरमिंदर खोजी / संजीव मल्होत्रा