Hindi Crime Story: पति की मौत का फरमान

Hindi Crime Story: कामिनी गांव के ही रहने वाले मार्तंड यादव से शादी करना चाहती थी. लेकिन घर वालों ने उस की शादी पवन से कर दी. इस का परिणाम यह निकला कि निर्दोष पवन मारा गया.

गांव में भागवत कथा होने की वजह से काफी चहलपहल थी. कथा में जाने के लिए हर कोई उत्साहित था, क्योंकि वहां बहुत ही सुंदर कथा होती थी. उस के बाद हवन होता था. कामिनी भी वहां रोजाना अपनी सहेली मीना के साथ कथा सुनने जाती थी. उस दिन वह मीना के साथ कथा सुनने पहुंची तो वहां का नजारा ही कुछ और था. गांव के कई लोग पंडितों द्वारा किए जाने वाले मंत्रोच्चारण के साथ हवन कर रहे थे. उस से जो धुआं उठ रहा था, वातावरण सुगंधित हो रहा था. कामिनी और मीना ने हाथ जोड़ कर सिर झुकाया और वहां बिछी दरी पर बैठ गईं. अचानक कामिनी की नजर दूसरी ओर बैठे एक युवक पर पड़ी, जो एकटक उसी को ताक रहा था. वह कोई और नहीं, उसी के गांव का मार्तंड यादव उर्फ पिंकू था.

कामिनी उम्र के उस दौर में पहुंच गई थी, जब लड़कों का इस तरह ताकना लड़कियों को अच्छा लगता है. यही वजह थी कि कामिनी ने भी उस की ओर उसी तरह ताका. नजरें मिलीं तो मार्तंड मुसकराया, लेकिन कामिनी ने नजरें झुका लीं. लेकिन यह भी सच है कि इस स्थिति में लड़की पहली बार भले ही नजरें झुका ले, लेकिन पलट कर जरूर देखती है. और कहते हैं कि अगर पलट कर देख लिया तो समझो मामला फिट है यानी वह भी चाहती है. कामिनी से रहा नहीं गया, उस ने नजरें उठाईं तो मार्तंड को अपनी ओर ताकते पाया. उसे उस तरह ताकते देख कामिनी को हंसी आ गई.

बस, फिर क्या था, कामिनी की इस हंसी पर मार्तंड मर मिटा. एक तो कामिनी ने पलट कर देखा था, दूसरे हंसी थी, इसलिए मार्तंड को लगा, अब मामला फिट है. अब वह सबकुछ भूल कर सिर्फ कामिनी को ही देख रहा था. कामिनी का भी कुछ ऐसा ही हाल था. उसे इस तरह बारबार उधर देखते देख कर मीना ने पूछा, ‘‘क्या बात है, जो तू बारबार उधर लड़कों की ओर देख रही है?’’

कामिनी इस तरह सिटपिटा गई, जैसे उस की चोरी पकड़ी गई हो. उसे जवाब तो देना ही था, इसलिए उस ने मीना को प्यार से झिड़कते हुए कहा, ‘‘यार, तुम भी न जाने क्याक्या सोचती रहती हो? इस तरह की जगहों पर कोई क्या देखेगा? तुम्हारे दिमाग में हमेशा खुराफात ही चलता रहता है.’’

अब तक हवन खत्म हो गया था. प्रसाद ले कर कामिनी मंडप से बाहर आई तो मार्तंड भी उस के पीछेपीछे बाहर आ गया. वह उस से थोड़ी दूरी बना कर चल रहा था. उसे अपने पीछे आते देख कामिनी का दिल तेजी से धड़कने लगा कि मीना के सामने ही वह उसे कुछ कह न दे. अब वह उसे अपना सा लग रहा था. कुछ ऐसा ही मार्तंड को भी महसूस हो रहा था. वह उस से अपने दिल की बेचैनी कहना तो चाहता था, लेकिन मीना की उपस्थिति उसे ऐसा करने से रोक रही थी. कुछ भी रहा हो, मार्तंड की नजरें उसी पर टिकी थीं. कामिनी भी बारबार पलट कर उसे देख रही थी. आखिर मीना ने उस की चोरी पकड़ ही ली. उस ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘अच्छा तो यह बात है, अब समझ में आया, यह महाशय हमारे पीछेपीछे क्यों चले आ रहे हैं?’’

‘‘क्या बकवास कर रही है? कोई पीछेपीछे आ रहा है तो इस का मतलब यह तो नहीं हुआ कि मैं उस पर मर मिटी हूं. चलो, घर चलो, नहीं तो तुम इसी तरह बकवास करती रहोगी.’’ कामिनी ने कहा.

‘‘मैं कहां कह रही हूं कि तुम यहीं रुको. चलो न घर.’’ मीना ने कामिनी का हाथ पकड़ कर कहा और तेजी से घर की ओर चल पड़ी.

मार्तंड कामिनी को तब तक देखता रहा, जब तक वह उस की आंखों से ओझल नहीं हो गई. घर पहुंच कर कामिनी मार्तंड के खयालों में डूब गई. पता नहीं क्यों वह उस के दिल में बस गया था, जबकि वह बहुत खूबसूरत भी नहीं था. गांव में उस से भी खूबसूरत लड़के थे, जो उस पर मरते थे. लेकिन उस ने कभी किसी को भाव नहीं दिया था. दूसरी ओर मार्तंड भी कामिनी के खयालों में डूबा था. उस ने सपने में भी नहीं सोचा था कि कामिनी जैसी खूबसूरत लड़की का दिल उस के लिए धड़क सकता है. इसलिए अगले दिन के इंतजार में उसे नींद नहीं आई. वह जानता था कि कामिनी रोज कथा सुनने आती है. इसलिए उस ने तय कर लिया था कि अगर अगले दिन कामिनी मिल गई तो कैसे भी वह उस से अपने दिल की बात जरूर कह देगा.

संयोग से अगले दिन कामिनी अकेली ही वहां आई. शायद उसे विश्वास था कि उस के सपनों का राजकुमार मार्तंड अवश्य वहां आएगा और उस से बात करने की कोशिश भी करेगा. उसे बात करने में कोई संकोच न हो, यही सोच कर वह मीना को साथ नहीं लाई थी. जब वह वहां पहुंची तो उसे यह देख कर हैरानी हुई कि मार्तंड वहीं बैठा था, जहां कामिनी एक दिन पहले बैठी थी. शायद वह उसी का इंतजार कर रहा था. मार्तंड की नजरें उस से मिलीं तो दोनों के होठों पर मुसकान तैर उठी. कामिनी आ कर उस से थोड़ी दूरी पर महिलाओं के झुंड में बैठ गई. दोनों बैठे तो भागवत कथा सुनने थे, लेकिन दोनों के मन में तो कुछ और ही चल रहा था.

आखिर  नहीं रहा गया तो मार्तंड ने कुछ इशरा किया. उस के बाद कामिनी उठ कर चल पड़ी. लोगों की नजरें बचा कर मार्तंड भी उस के पीछेपीछे चल पड़ा. सुरक्षित स्थान पर आ कर जरा भी संकोच किए मार्तंड ने कामिनी का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘कामिनी, अब मुझे यह कहने की जरूरत नहीं है कि मैं तुम से प्यार करता हूं. तुम्हारे हावभाव से ही मुझे पता चल गया है कि तुम भी मुझे प्यार करती हो, इसलिए चलो एकांत में कहीं बैठ कर बातें करते हैं.’’

गांवों में एकांत कहां होता है, बागों या खेतों के बीच. दोनों गेहूं के खेतों के बीच बैठ कर बातें करने लगे. मार्तंड ने उस एकांत में कामिनी के कंधे पर हाथ रख कर कहा, ‘‘कामिनी, यह जिंदगी हमारी है, इसलिए इस के बारे में सिर्फ हमें ही निर्णय लेने का हक है. तुम मुझ से मिलने के लिए रोज यहीं आना. यहां लोगों की नजर हम पर नहीं पड़ेगी. बोलो, आओगी न?’’

‘‘मैं जरूर आऊंगी मार्तंड. तुम मेरा इंतजार करना.’’ कामिनी ने कहा और अपने घर चली गई.

मनचाहा प्रेमी मिल जाने से कामिनी खुश थी. वह मार्तंड की यादों में खोई रहने लगी. अब उसे हमेशा उस समय का बेसब्री से इंतजार रहता, जब उसे मार्तंड से मिलने जाना होता. मार्तंड उस से जब भी रोमांटिक बातें करता, वह शरमा जाती. वह उस की सुंदरता की तारीफें करते हुए कहता, ‘‘तुम्हारी इसी सुंदरता ने मेरा दिल चुरा लिया है. अब मेरे इस दिल को तुम संभाल कर रखना, इसे कभी तोड़ना मत.’’

कामिनी कहती, ‘‘तुम भी कैसी बातें करते हो, मैं भला तुमरे दिल को क्यों तोड़ूंगी, अब तो वह हमारा हो चुका है.’’

‘‘मैं कितना भाग्यशाली हूं, जो तुम जैसी प्यार करने वाली मिल गई. शायद तुम मेरे भाग्य में लिखी थी.’’

ऐसी ही बातें कर के मार्तंड ने कामिनी को लुभा कर उस से शारीरिक संबंध भी बना लिए. दोनों मन से तो एक थे ही, तन से भी एक हो गए. उत्तर प्रदेश के जिला रायबरेली के थाना शिवगढ़ के निमडवल गांव में रहते थे रामेश्वर प्रसाद. वह खेती कर के अपना गुजरबसर करते थे. उन के परिवार में पत्नी रमा और 2 बेटियां तथा 2 बेटे थे. कामिनी उन के बच्चों में सब से छोटी थी. उन के बाकी बच्चों का विवाह हो चुका था. कामिनी ने जवानी की दहलीज पर कदम रखा ही था कि उसे मार्तंड से प्यार हो गया.

कामिनी ने गांव के ही सरकारी स्कूल से आठवीं तक पढ़ाई की थी. वह खूबसूरत थी, इसलिए जवान होते ही गांव के मनचले लड़के उसे अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश करने लगे थे. उन्हीं में मार्तंड भी था. आखिर में उसी ने बाजी मार ली थी. वह प्रभाकर यादव का बेटा था. वह नल वगैरह ठीक करने का काम करता था. गांवों में इस तरह की बातें ज्यादा दिनों तक छिपी नहीं रह पातीं, इसलिए मार्तंड और कामिनी के संबंध भी उजागर हो गए. जब बेटी की करतूत का पता रामेश्वर प्रसाद को चला तो उन्होंने कामिनी की खूब पिटाई की और सख्त हिदायत दी कि अब वह मार्तंड से बिलकुल नहीं मिलेगी. उस के घर से बाहर निकलने पर भी पाबंदी लगा दी गई.

इस हालत में रामेश्वर जल्द से जल्द कामिनी की शादी के बारे में सोचने लगा. क्योंकि उस की वजह से उन की गांव में बदनामी हो रही थी. रामेश्वर का एक रिश्तेदार हरभजन लखनऊ के थाना नगराम के गांव सेंधूमऊ में रहता था. सेंधूमऊ के बगल में ही एक गांव है बघौली. उसी गांव में ललई प्रसाद अपने परिवार के साथ रहता था. वह भी खेती करता था. उस के परिवार में पत्नी रामकली के अलावा 2 बेटियां और एकलौता बेटा पवन था. उस ने दोनों बेटियों की शादी कर दी थी. बेटे की अभी शादी नहीं हुई थी. वह गोसाईगंज के दयाल इंस्टीट्यूट से बीबीए कर रहा था.

हरभजन पवन से परिचित था. वह जानता था कि पवन बहुत ही नेक और पढ़ालिखा लड़का है. इसलिए उस ने उस से कामिनी से रिश्ते की बात चलाई तो वह बात आगे बढ़ाने को राजी हो गया. उस ने अपने पिता से बात की तो उन की सहमति मिलने के बाद सभी कामिनी को देखने गए. कामिनी के घर वालों को भी पवन और उस का घरपरिवार पसंद था, इसलिए बातचीत के बाद शादी तय हो गई. कामिनी ने पवन के सामने ही विवाह से मना कर दिया था, लेकिन रामेश्वर प्रसाद ने किसी तरह बात संभाल ली थी. 20 मई, 2015 को कामिनी और पवन का विवाह धूमधाम से हो गया. कामिनी को न चाहते हुए भी पवन से विवाह करना पड़ा. जबकि वह मार्तंड से शादी करना चाहती थी.

शादी के बाद भी वह उसे एक पल के लिए नहीं भूल पा रही थी. क्योंकि उस ने उसी के साथ जिंदगी गुजारने का सपना जो देखा था. लेकिन घर वालों ने उस के सपनों को तोड़ दिया था. पग फेरा में कामिनी मायके आई तो मार्तंड से मिली. तब वह उस से गले मिल कर बिलखबिलख कर रोई. मार्तंड की भी आंखें नम हो गईं. कामिनी की हालत देख कर वह बेचैन हो उठा. उस ने कामिनी को ढांढ़स बंधा कर कहा, ‘‘कामिनी हम कभी अलग नहीं होंगे, कोई भी हमें जुदा नहीं कर सकता. हम हमेशा इसी तरह मिलते रहेंगे.’’

इस के बाद मार्तंड ने एक सस्ता सा मोबाइल फोन खरीद कर कामिनी को दे दिया, जिस से उन में बराबर बातें हो सकें. कामिनी जब तक मायके में रही, मार्तंड से बराबर मिलती रही. ससुराल आने पर मिलना तो बंद हो गया, लेकिन मोबाइल से सब की चोरी वह उस से बातें कर लेती थी. 12 अगस्त, 2015 की शाम साढ़े 6 बजे पवन घर लौटा और कपड़े बदल कर आराम करने लगा. रात 8 बजे कामिनी ने उसे सौ रुपए का नोट देते हुए कहा कि उसे कोल्ड ड्रिंक पीनी है, जा कर ला दे. पवन उन्हीं कपड़ों में दहेज में मिली हीरो पैशन प्रो बाइक से कोल्ड ड्रिंक लेने चला गया.

कोल्ड ड्रिंक की दुकान उस के घर से लगभग 3 सौ मीटर की दूरी पर थी. थोड़ी देर बाद पवन का फोन आया कि गांव के बाहर उस की बाइक खड़ी है, किसी से मंगवा लें. वह किसी जरूरी काम से जा रहा है. इस के बाद पवन के पिता वहां गए और गांव के एक लड़के से कह कर बाइक ले आए. सुबह गांव के कुछ बच्चे गांव के बाहर तालाब पर शौच के लिए गए तो उन्होंने वहां झाडि़यों में पवन की लाश पड़ी देखी. बच्चों ने यह बात तुरंत पवन के घर वालों को बताई तो घर वाले रोतेबिलखते वहां पहुंचे. पवन के पिता ललई प्रसाद ने इस घटना की सूचना थाना नगराम पुलिस को दे दी.

सूचना मिलने के थोड़ी देर बाद थाना नगराम के थानाप्रभारी सुधीर कुमार सिंह पुलिस बल के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. मृतक पवन ने नीले रंग पर सफेद धारी वाली कैपरी और सफेद शर्ट पहन रखी थी. उस के गले और मुंह पर किसी तेज धारदार हथियरा के घाव थे. सुधीर कुमार सिंह घटनास्थल और लाश का निरीक्षण कर रहे थे कि सीओ राकेश नायक भी आ गए. पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए लखनऊ मैडिकल कालेज भिजवा कर पूछताछ शुरू की. इस के बाद थाने आ कर सुधीर कुमार सिंह ने मृतक के पिता ललई प्रसाद की ओर से अज्ञात के खिलाफ पवन की हत्या का मुकदमा दर्ज करा दिया. थानाप्रभारी मामले की जांच के लिए बघौली गांव जाने की तैयारी कर रहे थे कि किसी ने फोन कर के उन्हें बताया कि मृतक पवन की पत्नी कामिनी अपना सामान बांध कर कहीं जाने की तैयारी कर रही है.

यह सुन कर सुधीर कुमार सिंह को हैरानी हुई. जिस औरत के पति की हत्या हुई हो, अभी उस की लाश भी न दफनाई गई हो, इस दुख की घड़ी में ससुराल वालों का साथ देने के बजाय वह घर से जाने की तैयारी कर रही है. उन्हें लगा, कहीं ऐसा तो नहीं कि इस घटना के पीछे उसी का हाथ हो. सीओ राकेश नायक भी थाने में मौजूद थे. कामिनी के बारे में सीओ साहब को बताया तो उन्होंने भी कामिनी पर शक जाहिर किया. फिर क्या था, थानाप्रभारी ललई प्रसाद के घर जा पहुंचे. उन्हें जो सूचना मिली थी, वह सही थी. कामिनी अपना बैग तैयार कर के बैठी थी. शक के आधार पर सुधीर कुमार सिंह ने बैग की तलाशी ली तो उस में से कपड़ों और व्यक्तिगत सामान के अलावा 1 हजार रुपए, एक सिम और एक युवक की फोटो बरामद हुई. उन्होंने बैग में नीचे लगे पैड के अंदर हाथ डाला तो उस में से एक मोबाइल फोन बरामद हुआ.

घर वालों से उस मोबाइल के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि इस के बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं है. इस के पास जो मोबाइल था, उसे तो पवन ने पहले ही ले लिया था.

सुधीर कुमार सिंह ने जब कामिनी से उस के पास मिले फोटो के बारे में पूछा तो वह काफी देर तक उस फोटो को देखती रही, उस के बाद बोली, ‘‘यह युवक उस के गांव का रहने वाला है.’’

पुलिस कामिनी को हिरासत में ले कर थाने आ गई. थाने में महिला कांस्टेबल के जरिए उस से सख्ती से पूछताछ की गई तो उस ने कई नाम बताए. उन सभी को पुलिस ने थाने ला कर पूछताछ की तो पता चला कि वे निर्दोष थे. कामिनी ने जो नाम बताए थे, वे उस के पुराने आशिक थे, जिन्हें वह फंसाना चाहती थी. सुधीर कुमार सिंह ने कामिनी का मोबाइल खंगाला तो उस में सिर्फ एक ही नंबर मिला, जिस से उस में लगभग रोज ही फोन आए थे. घटना वाले दिन भी उस नंबर से अंतिम बार रात 11 बजे फोन आया था. जब उस नंबर के बारे में कामिनी से सख्ती से पूछा गया तो उस ने बताया कि उस नंबर से फोन करने वाला और फोटो वाला युवक एक ही है. उस का नाम मार्तंड यादव उर्फ पिंकू है, जो उस के मायके निमडवल में रहता है.

सुधीर कुमार सिंह ने उसी मोबाइल से उस नंबर पर स्पीकर औन कर  के कामिनी से बात करने को कहा. कामिनी ने उस नंबर पर फोन किया तो दूसरी ओर से फोन रिसीव करने वाले ने कहा, ‘‘सब ठीक कर दिया मैं ने, किसी को शक भी नहीं हुआ.’’

‘‘क्या कह…’’ कामिनी इतना ही कह पाई थी कि सुधीर कुमार सिंह ने उसे कुछ भी बताने से मना कर दिया.

‘‘मैं ने अपने दोस्तों के साथ सब कुछ बहुत सही ढंग से कर दिया है. अब हम एक साथ रह सकेंगे.’’ दूसरी ओर से कहा गया.

‘‘लेकिन यह सब कर के तुम ने मुझे फंसा दिया. पुलिस मुझ पर शक कर रही है. तुम आ कर मुझे बचाओ. तुम कहां हो?’’ कामिनी इतना ही कह पाई थी कि मार्तंड को शायद शक हो गया. उस ने तुरंत फोन काट दिया. दोबारा फोन किया गया तो फोन बंद हो चुका था. इस के बाद मार्तंड के घर छापा मारा गया, लेकिन वह घर पर नहीं मिला. तब उस के पिता को हिरासत में ले कर थाने लाया गया. लेकिन वह भी मार्तंड के बारे में कुछ नहीं बता सका. उसी दिन यानी 14 अगस्त को एक मुखबिर की सूचना पर दोपहर साढे़ 12 बजे सुधीर कुमार सिंह ने मार्तंड यादव और उस के दोस्त विक्रम यादव को समेसी के पास एक नहर के किनारे से गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ के बाद 15 अगस्त को पुलिस ने मार्तंड के एक अन्य दोस्त सूरजलाल को छतौनी से गिरफ्तार कर लिया. मार्तंड से की गई पूछताछ में पवन की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी.

मार्तंड द्वारा दिए गए मोबाइल से कामिनी चोरीछिपे उस से बात कर लिया करती थी, लेकिन किसी दिन पवन ने कामिनी को मोबाइल पर बात करते देख लिया. फिर तो उसे समझते देर नहीं लगी कि कामिनी का किसी के साथ चक्कर चल रहा है. उसी ने यह मोबाइल कामिनी को दिया है. पवन ने कामिनी को मारापीटा ही नहीं, उस का मोबाइल भी छीन लिया. कामिनी वैसे ही मार्तंड से दूर हो कर तड़प रही थी. ऐसे में बात करने का जरिया मोबाइल भी छिन गया तो वह गुस्से से भर उठी. आग में घी का काम किया पवन की पिटाई ने. कामिनी ने किसी तरह मार्तंड तक मोबाइल छिन जाने की बात पहुंचा दी.

इसी के साथ यह भी कहा कि अगर वह किसी तरह पवन को ठिकाने लगा दे तो वह हमेशाहमेशा के लिए उस की हो जाएगी. उस के बाद उन्हें मिलने से कोई नहीं रोक पाएगा. मार्तंड तो हर हाल में कामिनी को अपनी बनाना चाहता था. उस ने कामिनी से कहा, ‘‘तुम चिंता मत करो, मैं जल्द ही उसे ठिकाने लगा दूंगा.’’

मार्तंड ने अपने 2 दोस्तों, विक्रम और सूरजलाल को दोस्ती का वास्ता दे कर पवन की हत्या में साथ देने को कहा तो वे तैयार हो गए. इस के बाद योजना भी बन गई. अपनी उसी योजना के अनुसार, मार्तंड अपने दोस्तों के साथ 2 मोटरसाइकिलों से कामिनी की ससुराल उस समय पहुंचा, जब पवन घर पर नहीं था. यह बात कामिनी ने मार्तंड को पहले ही बता दी थी. जब तीनों वहां पहुंचे तो कामिनी ने अपनी सास रामकली को बताया कि तीनों उस की सगी मौसी के बेटे हैं. रामकली के हटते ही मार्तंड ने एक मोबाइल फोन कामिनी को दे दिया और पूरी योजना बता दी. इस के बाद वह दोस्तों के साथ चला आया.

13 अगस्त की शाम मार्तंड ने कामिनी को फोन किया कि वह रात 8 बजे तक दोस्तों के साथ उस के गांव के बाहर पहुंच जाएगा. शाम साढ़े 6 बजे तक पवन घर आ जाता था. रात 8 बजे जब मार्तंड गांव के बाहर आ गया तो उस ने कामिनी को फोन कर के पवन को भेजने को कहा. इस के बाद कामिनी ने पवन को कोल्डड्रिंक लाने के बहाने बाहर भेज दिया. पवन मोटरसाइकिल से कोल्डड्रिंक ले कर लौट रहा था तो रास्ते मे दोस्तों के साथ मार्तंड ने उसे हाथ दे कर रोक कर कहा, ‘‘भाई मेरी मोटरसाइकिल खराब हो गई है. जरा देख लीजिए.’’

पवन ने अपनी मोटरसाइकिल खड़ी कर के जेब में पड़ी टौर्च निकाली. उस ने टौर्च जलाई तो मार्तंड के चेहरे पर पड़ी. उस का चेहरा देख कर पवन ने कहा, ‘‘मैं तुम्हें पहचानता हूं, तुम तो मेरी ससुराल के हो, यहां कैसे, कामिनी से मिलने आए थे क्या?’’

‘‘नहीं, यहीं पास में मेरी एक रिश्तेदारी है, वहीं आया था. लेकिन यहां पहुंचते ही मेरी मोटरसाइकिल खराब हो गई.’’

इस के बाद उन में बातें होने लगीं. उसी बीच मार्तंड ने शौच जाने की बात कही तो पवन उसे तालाब की तरफ टौर्च की रोशनी में ले जाने लगा. इस के पहले उस ने फोन कर के अपनी मोटरसाइकिल मंगवा लेने के लिए घर वालों को कह दिया था. मार्तंड पवन से बातें करते हुए तालाब की ओर जा रहा था, तभी पीछेपीछे चल रहे विक्रम ने कपड़ों में छिपा हंसिया निकाल कर पवन की गरदन पर पूरी ताकत से प्रहार कर दिया. अचानक हुए इस हमले से पवन लड़खड़ा कर गिर पड़ा. वह संभल पाता, उस के पहले ही मार्तंड ने विक्रम से हंसिया ले कर पवन पर ताबड़तोड़ कई वार कर दिए.

पवन तड़पने लगा. और फिर बिना चीखेचिल्लाए मौत के मुंह में समा गया. इस के बाद तीनों उसे घसीट कर झाडि़यों में ले गए. वहां उस की जेब से दोनों मोबाइल निकाल कर तालाब में फेंक दिए. हत्या में प्रयुक्त हंसिया भी वहीं झाडि़यों में फेंक दिया. इस के बाद वे मोटरसाइकिल से चले गए. उन्होंने सोचा था कि वे पकड़े नहीं जाएंगे, लेकिन पुलिस ने उन्हें पकड़ ही लिया. सुधीर कुमार सिंह ने उन की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त हंसिया, तीनों मोबाइल, दोनों मोटरसाइकिलें बरामद कर ली थीं. इस के बाद पुलिस ने मुकदमे में धारा 120बी तथा 34 के अलावा एससी/एसटी की धारा 3(2)5 भी बढ़ा दी थी.

पुलिस ने पूछताछ के बाद सभी अभियुक्तों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. Hindi Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Hindi crime story: नीली फिल्मों का बूढ़ा नायक

Hindi crime story: अय्याश कुंदन कुमार को कमउम्र की लड़कियों के साथ शारीरिक संबंध बनाने का शौक तो लग ही गया था, दुर्भाग्य से उसे उन के साथ अपने संबंधों की फिल्म बना कर देखने का भी चस्का लग गया था. उस के इसी शौक ने उसे उस की असली जगह तक पहुंचा दिया. पहाड़ों की रानी कहलाने वाले पर्यटनस्थल शिमला के रहने वाले थे सेठ दसौंधामल. मूलरूप से जिला कांगड़ा के गांव काशनी के रहने वाले दसौंधामल ने बरसों पहले शिमला में हार्डवेयर का व्यापार शुरू किया था. उन का यह धंधा इतना बढि़या चला कि उन्होंने शिमला में अपार ख्याति और संपत्ति अर्जित की.

दसौंधामल के परिवार में पत्नी कंचनबाला के अलावा एक बेटा और 6 बेटियां थीं. बेटियों को पढ़ालिखा कर उच्च घरानों में उन की शादियां कर दी गईं, जिन में से 3 तो आज विदेशों में रह रही हैं. 6 बेटियों के बाद एकलौता बेटा था कुंदन कुमार. पढ़लिख कर वह इंडियन एयरफोर्स में पायलट औफिसर बन गया था. साल भर बाद ही मैडिकल ग्राउंड पर नौकरी छोड़ दी और अपने पुश्तैनी धंधे में पिता का हाथ बंटाने के साथसाथ शिमला स्थित पंजाब विश्वविद्यालय से बीए करने लगा. दौरान दिल्ली निवासी मधुपलाल की उच्चशिक्षित बेटी मालारानी से कुंदन कुमार की शादी हो गई, जिस से उसे 3 बेटियां और एक बेटा हुआ.

कहते हैं, जब तक दसौंधामल जिंदा थे, तब तक तो उस पर अंकुश रहा. पिता के मरते ही उस के पंख निकल आए. पैसों का लेनदेन और पूरा कारोबार अब उस के हाथों में था. उस के पास इतना पैसा था कि दोनों हाथों से लुटाता तो भी खत्म होने वाला नहीं था. जमेजमाए कारोबार के अलावा दसौंधामल इतनी प्रौपर्टी छोड़ गए थे कि उस का किराया ही हर महीने लाखों में आता था. इस सब के अलावा कुंदन कुमार की पत्नी मालारानी ऊंचे ओहदे पर सरकारी नौकरी में थीं. उन्हें भी वेतन में मोटी रकम मिलती थी. इसलिए पैसों के लिए उन्हें कभी पति की ओर देखने की जरूरत नहीं थी. 4 बच्चे होने के बाद वह उन का भविष्य संवारने में व्यस्त हो गई थीं.

पिता का अंकुश हटते ही कुंदन क्लबों की रंगीनियों में खोया रहने लगा था. इस के बाद उस की अय्याशी के तार देहधंधा करने वाली औरतों से जुड़ गए. इसी के साथा उस ने कमउम्र की लड़कियों से शारीरिक संबंध बनाने का शौक पाल लिया. बढ़ती उम्र में यौन क्षमता बढ़ाने के लिए वह दवाओं का सहारा ले रहा था. कामवासना से कभी उस का जी नहीं भरता था, इसलिए बिजनैस को नौकरों के सहारे छोड़ कर वह सिर्फ लड़कियां पटाने के तरीके सोचा करता था. धंधेबाज औरतों से मौजमस्ती से जी भर गया तो नौकरी का लालच दे कर कुंदन ने न जाने कितनी लड़कियों को बरबाद किया.

ऐसे में उसे न जाने क्या सूझी कि 4 लड़कियों के साथ के शारीरिक संबंध की उस ने फिल्में बना लीं. इन में एक लड़की अनु थी, जिस के साथ बनाई गई ब्लूफिल्म ने उसे सलाखों के पीछे पहुंचा दिया. उस समय यह मामला अखबारों में खूब उछला था. शहर का हर अखबार इस मामले से जुड़ी खबरों से भरे होते थे. उन दिनों शिमला के एडीशनल एसपी थे कुंवर वीरेंद्र सिंह. कुंदन के इस मामले की विवेचना का जिम्मा उन्हें ही सौंपा गया था. यह मामला पुलिस से पहले मीडिया के पास पहुंच गया था. स्थानीय अखबारों में एक समाचार जोरोंशोरों से छप रहा था कि शिमला के बाजारों में एक अश्लील सीडी धड़ल्ले से बिक रही है, जिस में शहर के एक प्रतिष्ठित घराने के बूढ़े को एक नवयौवना से यौनाचार करते दिखाया गया है.

समाचारों में नीचे यह भी लिखा होता था कि वह बूढ़ा काफी प्रभावशाली है, इसलिए पुलिस इस मामले में कुछ नहीं कर रही है. पुलिस के लिए परेशानी की बात यह थी कि इस मामले में किसी ने कोई शिकायत नहीं दर्ज कराई थी. बिना शिकायत के पुलिस किसी के खिलाफ क्या और कैसे काररवाई कर सकती थी. फिर भी सीआईडी के तत्कालीन आईजी आई.डी. भंडारी ने उन खबरों को गंभीरता से लेते हुए मामले की गहराई में जाने की जिम्मेदारी सीआईडी स्पैशल ब्रांच के इंसपेक्टर कुशल कुमार को सौंप दी. कुशल कुमार ने अखबार वालों से संपर्क कर खूब दौड़भाग की. मामले की गहराई में जाने के लिए उन्होंने दिनरात एक कर दिया. जांच के लिए वह सीडी जरूरी थी. बाजार में सीडी होने की चर्चा तो खूब थी, लेकिन वह सीडी कुशल कुमार के हाथ नहीं लगी. 3 दिन इसी तरह निकल गए.

चौथे दिन संयोग से किसी अनजान आदमी ने उन्हें फोन कर के बताया, ‘‘सर, आप जिस सीडी के लिए दिनरात परेशान हो रहे हैं, उस की एक कौपी रिज के पास टका बैंच पर रखी है. आप उसे देख कर छानबीन करें तो सारी असलियत सामने आ जाएगी. आप से आग्रह है कि मेरे बारे में पता लगाने की कोशिश मत कीजिएगा.’’

अंधा क्या चाहे, 2 आंखें. कुशल कुमार तुरंत रिज मैदान पहुंच गए. टका बैंच पर उन्हें दीवार के पास कागज का पुराना सा लिफाफा दिखाई दिया. उठा कर देखा तो उस में सीडी थी. अपने औफिस आ कर कंप्यूटर पर उन्होंने उस सीडी को चलाया. सीडी में 15 मिनट की अश्लील फिल्म थी, जिस में एक बूढ़ा एक लड़की के साथ शारीरिक संबंध बना रहा था. सीडी देखने के बाद कुशल कुमार उसे ले कर आईजी श्री भंडारी के पास गए. सीडी देख कर उन्होंने शिमला के पुलिस अधीक्षक जोगराज ठाकुर को एफआईआर दर्ज कर के तत्काल काररवाई करने के आदेश दे दिए.

जोगराज ठाकुर ने कुशल कुमार की ओर से एफआईआर दर्ज करने की संस्तुति कर के मामले की फाइल थाना सदर भेज दी. इसी के साथ एडीशनल एसपी कुंवर वीरेंद्र सिंह को इस मामले की विवेचना की जिम्मेदारी सौंप दी गई थी. थाना सदर के थानाप्रभारी इंसपेक्टर बृजेश सूद ने भादंसं की धारा 292 के तहत मुकदमा दर्ज कर के इस मामले की जांच अतिरिक्त थानाप्रभारी गोबिंदराम को सौंप दी थी. गोबिंदराम ने सब से पहले शहर के कुछ गणमान्य लोगों को बुला कर उन के सामने उस सीडी को चला कर दिखाया. इस का उद्देश्य ब्लूफिल्म के नायक की पहचान करना था. आखिर उस आदमी की पहचान हो गई. वह कोई और नहीं, कुंदन कुमार था.

उन लोगों ने बताया कि इस की गिनती शहर के प्रमुख कारोबारियों में होती है. इस की पत्नी सरकारी अधिकारी है और इस के बच्चे इंग्लैंड, अमेरिका में पढ़ रहे हैं. सीडी की अश्लील फिल्म के नायक की पहचान हो जाने के बाद पुलिस टीम ने कुंदन कुमार के भव्य निवास पर छापा मारा. उस समय घर पर नौकर मोतीलाल के अलावा और कोई नहीं था. पुलिस ने उसे थाने ला कर गहन पूछताछ की. इस पूछताछ में मोतीलाल ने बताया कि उस का मालिक शराब और शबाब का शौकीन है. पैसे की उसे कोई कमी नहीं है. शिमला में प्रौपर्टी से ही उसे लाखों रुपए महीने किराया आता है. उस की उम्र काफी हो गई है, लेकिन बिना मेहनत के आने वाले पैसों की वजह से इस उम्र में भी उस की आदतें खराब हैं.

मोतीलाल को जब सीडी की फिल्म दिखाई गई तो उस ने उस फिल्म के बूढ़े नायक की पहचान अपने मालिक कुंदन कुमार के रूप में कर दी. लड़की के बारे में उस ने कहा, ‘‘अरे यह तो अनु है. यह साहब के औफिस में नौकरी करती थी.’’

‘‘इस समय यह कहां है?’’ मोतीलाल से पूछा गया.

‘‘अब कहां है, यह मुझे पता नहीं. क्योंकि इस ने साहब के यहां से नौकरी छोड़ दी है.’’ मोतीलाल ने कहा.

इस के बाद मोतीलाल को यह संदेश दे कर छोड़ दिया गया कि वह अपने साहब से कह देगा कि वह खुद थाने आ कर पुलिस जांच में शामिल हो जाए तो ज्यादा ठीक रहेगा, वरना उन्हें भारी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है. इस का असर यह हुआ कि पुलिस का संदेश मिलते ही कुंदन कुमार अपने वकील के साथ थाना सदर आ पहुंचा. पुलिस ने उसे उस की ब्लूफिल्म दिखाते हुए उस के बारे में स्पष्टीकरण मांगा तो उस ने कहा, ‘‘अनु मेरे औफिस में नौकरी करती थी. अपनी खूबसूरती के जाल में फंसा कर वह मुझ से पैसे ऐंठती थी. उस के फरेब में आ कर मैं उस के हुस्न के जाल में फंस गया था. जब भी मौका मिलता था, हम संबंध बना लेते थे.

कभीकभी औफिस में भी यह सब हो जाता था. एक दिन मेरे मन में न जाने क्या आया कि मैं ने वैब कैमरे से यह फिल्म बना ली.’’

‘‘फिल्म की सीडी मार्केट में कैसे आई?’’ पुलिस ने पूछा तो जवाब में कुंदन ने कहा, ‘‘कुछ दिनों पहले मेरा कंप्यूटर खराब हो गया था. मिडिल बाजार में मुकेश की कंप्यूटर रिपेयर की दुकान है. अपना कंप्यूटर ठीक करवाने के लिए मैं ने उसे अपने घर बुलवाया. लेकिन घर में कंप्यूटर ठीक नहीं हुआ तो वह सीपीयू अपने साथ ले गया.’’

इतना कह कर कुंदन ने पानी मांगा. 2 गिलास पानी पीने के बाद उस ने आगे कहा, ‘‘अगले दिन मैं मुकेश की दुकान पर गया तो उस ने कहा कि हार्डडिस्क क्रैश हो गई है, इसलिए बदलनी पड़ेगी. मेरे कहने पर उस ने हार्डडिस्क बदल दी. पुरानी हार्डडिस्क उस के पास ही रह गई. मुझे लगता है कि पुरानी हार्डडिस्क को नई में लोड करते समय उस ने मेरी इस फिल्म को देख लिया. उस के बाद पैसा कमाने के लिए उस की सीडी बना कर बाजार में पहुंचा दिया.’’

बृजेश सूद ने कुंदन को अपनी बातों में उलझा लिया और गोबिंदराम 2 सिपाहियों को साथ ले कर कुंदन कुमार की पुरानी हार्डडिस्क बरामद करने मुकेश की दुकान पर जा पहुंचे. कुछ देर बाद आ कर उन्होंने बताया कि दुकान बंद है. लेकिन उन्होंने दुकान सील कर के अपने दोनों सिपाही वहां बैठा दिए हैं. इस के बाद एडीशनल एसपी कुंवर वीरेंद्र सिंह के आदेश पर पुलिस ने कुंदन कुमार के औफिस और घर को सील कर दिया. अगले दिन 2 पार्षदों की उपस्थिति में मुकेश की दुकान खुलवाई गई. कुंदन कुमार भी पुलिस के साथ वहां मौजूद था. उस से दुकान में मिली हार्डडिस्कों से अपनी हार्डडिस्क पहचानने को कहा गया. उस ने इधरउधर देख कर कहा, ‘‘मेरी हार्डडिस्क दुकान में नहीं है.’’

मुकेश भी वहां मौजूद था. जब उस से कहा गया तो उस ने दुकान से 3 हार्डडिस्कें निकाल कर पुलिस के हवाले करते हुए कहा कि ये तीनों हार्डडिस्कें कुंदन कुमार की हैं. साथ ही उस ने यह भी कहा कि उसे नहीं पता कि इन सब में क्या था. उस ने इन के अंदर ताकझांक करने की कोई कोशिश नहीं की थी. पुलिस ने तीनों हार्डडिस्कें कब्जे में ले कर मुकेश की दुकान की गहन तलाशी ली. दुकान में कोई भी आपत्तिजनक चीज नहीं मिली. इस के बाद पुलिस ने कुंदन कुमार के औफिस की तलाशी ली, जहां पुलिस को पुरानी हार्डडिस्कें तो मिली हीं, 87 सीडीज और 25 फ्लौपीज भी मिलीं. जब उन सब को देखा गया तो उन सभी में अश्लील फिल्में थीं. यही नहीं, 4 ब्लूफिल्मों का हीरो खुद कुंदन कुमार था.

अनु के अलावा 3 अन्य लड़कियों के साथ भी उस ने अश्लील फिल्में बना रखी थीं. जिन फिल्मों में कुंदन कुमार खुद हीरो था, उन्हें देख कर साफ लग रहा था कि उन्हें औफिस में ही बनाया गया था. इसलिए फिल्म में दिखाई देने वाला सामान यानी चादर, कुशन, गिलाफ, तकिए और गिलासों के अलावा लकड़ी का वह छोटा सा दीवान भी कब्जे में ले लिया गया, जिस पर शारीरिक संबंध बनाया गया था. इसी के साथ कुंदन कुमार की निशानदेही पर उस के घर से वे कपड़े भी बरामद कर लिए गए थे, जिन्हें उस ने शारीरिक संबंध बनाने से पहले पहन रखे थे. बाद में तो उस ने कपड़े उतार दिए थे. कुंदन चूंकि गंजा था, जवान लड़की को शायद यह बात खल जाती, इसलिए पूरे कपड़े उतारने के बाद भी उस ने सिर पर आकर्षक कैप पहन रखी थी. वह कैप भी पुलिस ने जब्त कर ली थी.

सारी चीजों को कब्जे में लेने के बाद पुलिस ने कुंदन कुमार को थाने ला कर पूछताछ शुरू की. इस पूछताछ में उस ने यह तो खुलासा कर दिया कि वह शराब और शबाब का शौकीन था, खासकर कमउम्र की लड़कियों के साथ उसे बहुत मजा आता था. इसी के साथ उस की एक कमजोरी भी सामने आई कि अकसर वह कमउम्र लड़कियों के साथ शारीरिक संबंध बनाते समय वैब कैमरे से उन की फिल्में बना लिया करता था. इस के लिए उस ने अपने औफिस के निजी कमरे में एक वैबकैम लगवा रखा था. बाद में वह अपनी उन फिल्मों को देख कर रोमांचित होता था.

कुंदन कुमार ने अपनी सारी कमजोरियों को बता कर अपना अपराध स्वीकार कर लिया था, लेकिन किसी भी लड़की के बारे में उस ने कुछ नहीं बताया था. शायद बताना नहीं चाहता था. उस ने पुलिस से कहा, ‘‘ये पेशेवर लड़कियां थीं, जो पैसे के लिए मेरे पास आती थीं. खायापिया, मुझे खुश करने का पैसा लिया और चलती बनीं.’’

‘‘लेकिन अनु तो तुम्हारे यहां नौकरी करती थी?’’ पुलिस ने पूछा.

‘‘जी, मैं ने उसे नौकरी पर रखा था, लेकिन वह भी अन्य लड़कियों की तरह पैसे ऐंठने के लिए खुशीखुशी मेरे साथ संबंध बनाने को राजी हो गई थी.’’ कुंदन कुमार ने कहा.

‘‘वह सब छोड़ो, फिलहाल यह बताओ कि अनु जब नौकरी करने आई थी तो उस का बायोडाटा तो तुम ने लिया ही होगा?’’ पुलिस ने थोड़ा सख्त लहजे में पूछा.

कुंदन कुमार ने घबरा कर कहा, ‘‘जी हां, लिया था.’’

इस के बाद पुलिस कुंदन कुमार को उस के औफिस ले गई और अनु का बायोडाटा बरामद कर लिया. उस पर उस का फोटो लगा था. फोटो में वह वाकई निहायत खूबसूरत लग रही थी. वह कस्बा रहेड़ू की रहने वाली थी. बायोडाटा से उस का पता ही नहीं, फोन नंबर भी मिल गया था. पुलिस ने उस नंबर पर फोन किया तो फोन अनु के पिता ने रिसीव किया. उन्होंने बताया कि अनु पिछले कई दिनों से कहीं गई हुई है. कहां गई है, इस बारे में वह कुछ नहीं बता पाए. पुलिस ने अनु की तलाश में अपना पूरा जाल बिछा दिया. इसी के साथ उस के घर वालों के अलावा कुंदन कुमार पर पुलिसिया शिकंजा कसा गया तो 2 दिनों में सोलन जिले के कनलख कस्बा के एक घर में अनु मिल गई. पिछले कुछ दिनों से वह वहां छिप कर रह रही थी.

शिमला ला कर पुलिस ने अनु से पूछताछ की तो अनु ने बताया कि एक भाई और 3 बहनों में वह सब से बड़ी थी. 12वीं पास करने के बाद वह पुलिस में भरती हो गई. लेकिन वहां दिल नहीं लगा तो जल्दी ही उस ने वह नौकरी छोड़ दी. इस के बाद वह किसी औफिस में नौकरी तलाश करने लगी. इस के लिए उस ने कंप्यूटर कोर्स भी कर लिया था. एक दिन उसे उस की एक सहेली ने कुंदन कुमार के बारे में बता कर कहा कि उसे औफिस में काम करने के लिए एक लड़की की जरूरत है. कुंदन कुमार के औफिस जा कर अनु उस से मिली तो उस ने उस का बायोडाटा और फोटो लेने के अलावा उस का इंटरव्यू भी लिया. इस के बाद उस से कहा कि वह एक हफ्ते बाद आ कर मिले. हफ्ते भर बाद अनु गई तो उसे अगले हफ्ते आने को कहा.

महीना भर इसी तरह टरकाने के बाद एक दिन कुंदन कुमार ने कहा, ‘‘ऐसा है बेटा, तुम्हारी परफौरमेंस तो अच्छी नहीं है, फिर भी मैं तुम्हें नौकरी पर रखने के बारे में सोच रहा हूं.’’

‘‘थैंक्यू सर,’’ अनु ने चहकते हुए कहा, ‘‘आप ने मुझे यह नौकरी दे दी न सर तो देखिएगा, आप को मेरी तरफ से शिकायत का कोई मौका नहीं मिलेगा. मुझे नौकरी की जरूरत तो है ही, इस के अलावा मैं अपनी मेहनत से जिंदगी में कुछ बनना चाहती हूं.’’

कुंदन कुमार उठे और अनु की पीठ थपथपा कर बोले, ‘‘मैं तुम्हारी भावना से बहुत खुश हूं बेटी. लेकिन पहले मेरी एक बात ध्यान से सुन लो. अभी मैं तुम्हें रैग्युलर नौकरी पर न रख कर ट्रेनी के रूप में रखूंगा. 3 महीने तुम्हें औफिस के कामों की, कंप्यूटर की, सेल्स टैक्स व इनकम टैक्स संबंधी रिटर्न भरने और चुस्तदुरुस्त बनी रहने की ट्रेनिंग दी जाएगी. इस बीच तुम्हें 12 सौ रुपए महीने मिलेंगे. इस बीच तुम ने बढि़या काम किया तो तुम्हारी नौकरी रैग्युलर कर के तुम्हें 5 हजार रुपए महीने तनख्वाह दी जाएगी. हर साल 5 सौ रुपए का इन्क्रीमेंट के अलावा हर साल दीवाली पर 1 महीने की तनख्वाह बोनस में मिला करेगी.’’

‘‘यह तो बहुत अच्छा है सर.’’

‘‘नहीं, अभी मेरी बात पूरी नहीं हुई. पहले पूरी बात सुन लो.’’

‘‘देखो, तुम्हारा जो ट्रेनिंग पीरियड है, अगर यह संतोषजनक नहीं रहा तो तुम्हें नौकरी से हटा दिया जाएगा या फिर 3 महीने के लिए तुम्हारा ट्रेनिंग पीरियड और बढ़ा दिया जाएगा. अब फैसला तुम्हें करना है.’’

अनु कुछ देर सोचती रही, फिर बोली, ‘‘ठीक है सर, मुझे मंजूर है.’’

इस के बाद अनु मालरोड स्थित कुंदन कुमार के औफिस में नियमित ड्यूटी पर जाने लगी. औफिस में जहां कुंदन कुमार बैठता था, वहीं बगल में कंप्यूटर टेबल रखी थी. उसी पर अनु को बैठना था. वहीं बगल में दीवार से सटा कर छोटा सा दीवान रखा था, जिस पर लेट कर कुंदन कुमार आराम किया करता था. औफिस में कोई खास काम तो था नहीं, लिहाजा कुंदन कुमार बैठा अनु से गप्पें हांकता रहता था. कभीकभी उसे औफिस के कामों के बारे में समझाने बैठ जाता. वह जब भी बैंक में पैसा जमा करने अथवा निकलवाने के लिए जाता, अनु को भी साथ ले जाता. रुपए भी वह उसी से गिनवाता.

औफिस में छोटा सा किचन था. उस में रखे फ्रिज में कई तरह के जूस मौजूद रहते थे. चाय बनाने की भी व्यवस्था थी. कुंदन का जब भी मन होता, अनु से चाय बनवा कर अथवा फ्रिज से जूस मंगवा कर पीता. उस ने अनु से भी कह रखा था कि जब भी उस का मन हो, वह चाय या जूस पी लिया करे. इसी तरह 2 महीने बीत गए. एक दिन कुंदन कुमार बाहर से आया. उस समय अनु कंप्यूटर पर गेम खेल रही थी. कुंदन ने आते ही उस के गाल को गर्मजोशी से चूम कर कहा, ‘‘आज मैं बहुत खुश हूं अनु.’’

अनु ने उस की बात पर ध्यान न देते हुए कुंदन पर सख्त ऐतराज जताते हुए कहा, ‘‘मुझे आप से यह उम्मीद नहीं थी सर. आप ने मुझे किस कर के बहुत गलत किया. आप को ऐसा हरगिज नहीं करना चाहिए था.’’

कुंदन कुमार ने भी नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा, ‘‘मैं ने तुम्हारा गाल चूम लिया तो कौन सा गजब कर दिया. मुझे एक खुशखबरी मिली थी. इसी वजह से खुश हो कर मैं ने तुम्हें अपनी बेटी की तरह किस कर लिया. इस का तुम्हें बुरा लगा तो आगे से मैं ध्यान रखूंगा.’’

अनु के बताए अनुसार, यह बात आईगई हो गई. उसे भी लगा कि शायद कुंदन अपनी जगह ठीक था. वैसे भी उम्र में वह उस के पिता से भी कहीं ज्यादा का था. इसलिए अनु ने उस की ओर से अपना मन साफ कर लिया. मगर इस के लगभग 10 दिनों बाद कुंदन ने अचानक अनु को अपनी बांहों में कस कर भींच लिया. इस बार अनु ने पहले से भी कहीं ज्यादा सख्त लहजे में ऐतराज जताया. यहां तक कि नौकरी छोड़ देने की धमकी भी दी. कुंदन ने इस बार भी उसे यह कह कर मना लिया कि उस की शक्ल हूबहू उस की बेटी जैसी है. जिस तरह ज्यादा खुश होने पर वह अपनी बेटी को बांहों में ले कर प्यार करता था, उसी तरह उस से भी कर बैठा.

इसी के साथ कुंदन कुमार ने कान पकड़ कर अनु से माफी भी मांगी. हालांकि जिस तरह कुंदन कुमार ने अनु को अपनी बांहों में भर कर भींचा था, हर तरह से ऐतराज वाली बात थी. इस के बाद भी कुंदन की बात पर भरोसा कर के अनु ने इस बार भी उस की गलती माफ कर दी थी. कुछ दिनों बाद तो हद ही हो गई. कुंदन कुमार अनु को ले कर बैंक गया था. वहां से कोई फाइल लेने का बहाना कर के उसे अपने घर ले गया. उस समय घर में कोई नहीं था. ताला खोलने के बाद कुंदन कुमार ने उसे ले जा कर एक ऐसे कमरे में बैठा दिया, जहां कंप्यूटर लगा था. उस पर सीडी लगा कर वह बोला, ‘‘मैं अभी आया, तब तक तुम यह फिल्म देखो.’’

इस के बाद वह कमरे से चला गया. अनु ने कंप्यूटर स्क्रीन पर नजरें जमा दीं. कुछ देर में फिल्म चलने लगी. कंप्यूटर स्क्रीन पर जो दृश्य उभरे, उन्होंने अनु के होश उड़ा दिए. वह एक ब्लूफिल्म थी. फिल्म के अश्लील दृश्यों को देख कर अनु घबरा गई, उस का हलक सूख गया. उसे कुछ नहीं सूझा तो वह दरवाजा खोल कर भागी. इस के बाद अनु ने कुंदन कुमार के यहां नौकरी पर जाना बंद कर दिया. वह अपनी तनख्वाह भी लेने नहीं गई. कुंदन कुमार ने भी उस से संपर्क करने की कोशिश नहीं की. इसी तरह करीब 2, ढाई महीने बीत गए. इस बीच अनु कहीं और नौकरी तलाश करती रही, लेकिन उसे सफलता नहीं मिली.

संयोग से एक दिन लोअर बाजार में कुंदन कुमार से अनु की मुलाकात हो गई. कुंदन कुमार उस की बांह पकड़ कर एक किनारे ले गया और वात्सल्य भरे लहजे में उस के सिर पर हाथ फेरते हुए बोला, ‘‘मुझे गलत न समझ बेटी, उस दिन मैं ने तुम्हारे लिए अपनी ओर से वह हिंदी फिल्म लगाई थी, जो उस सुबह ही मैं ने देखी थी. मुझे इस बात की जरा भी जानकारी नहीं थी कि उस सीडी में ब्लूफिल्म है. मेरा यकीन करो बेटी, इस में मेरा जरा भी कुसूर नहीं है.’’

‘‘कुसूर नहीं है तो इस तरह की गंदी फिल्म घर पर ला कर रखी ही क्यों?’’ अनु ने तल्खी से कहा, ‘‘ऐसी फिल्में देखने के बाद, वह भी इस उम्र में, आप क्या समझते हैं कि आप अच्छे कैरेक्टर के मालिक होंगे, कतई नहीं.’’

‘‘अब तुम्हें कैसे समझाऊं बेटी. दरअसल हम जैसे हाईसोसायटी वालों के घरों में यह सब आम बात है. हमारे यहां बच्चे, औरतें सब इस तरह की फिल्में देख कर मनोरंजन करते हैं. तुम मिडिल क्लास की हो, इसलिए तुम्हें यह सब अजीब लग रहा है. उस दिन गलती से ब्लूफिल्म लग गई थी तो कंप्यूटर बंद कर देती या आवाज दे कर मुझे बुला लेती. तुम तो सिर पर पांव रख कर ऐसे भागी, जैसे कोई बम फट गया हो.’’

अनु कुंदन कुमार को बीचबीच में टोकने का प्रयास करती रही, लेकिन कुंदन उसे नजरअंदाज कर के अपनी बात कहता रहा. अंत में उस ने कहा, ‘‘अब मैं तुम्हें कभी बेटी भी नहीं कहूंगा. जब तुम्हें मेरे दिमाग में, मेरे काम में और मेरी हर हरकत में गंदगी ही दिखाई दे रही है तो फिर इस रिश्ते को बदनाम क्यों किया जाए. बस मेरी एक बात ध्यान से सुन लो अनु कि मैं आज भी तुम्हें अपनी बेटी की तरह ही मानता हूं.

‘‘मैं ने जानबूझ कर कोई गलती नहीं की. बेकसूर होते हुए भी मैं तुम्हारी नफरत का शिकार हो गया. अब इस की सजा मैं अपने आप को यह देना चाहता हूं कि तुम्हारे ट्रेनिंग पीरियड का वेतन 2 हजार रुपए महीने कर दूंगा. 3 महीने के बाद नौकरी रैग्युलर कर के तनख्वाह 8 हजार रुपए महीने और हर साल बोनस भी इतना ही दूंगा. ठीक लगे तो कल से औफिस आना शुरू कर दो. तुम्हारी सीट आज भी खाली है.’’

अपनी बात पूरी कर के कुंदन कुमार क्षण भर के लिए भी वहां नहीं रुका. तेज कदमों से चलता हुआ वह पलभर में अनु की नजरों से ओझल हो गया. अनु उस के झांसे में आ कर अगले दिन से उस के औफिस में काम करने लगी. कुछ दिन तो ठीकठाक बीते. एक दिन दोपहर को कुंदन कुमार ने फ्रिज से फ्रूटजूस के 2 टेट्रापैक निकाल कर एक उसे पीने को दिया और एक खुद पीने लगा. जूस पीते ही अनु पर नशा सा छाने लगा. जल्दी ही वह अर्धबेहोशी की हालत में पहुंच गई. कुंदन कुमार ने उसे उठा कर दीवान पर लिटा दिया. इस के बाद कपड़े उतार कर शारीरिक संबंध बनाने लगा.

अनु के साथ कुछ हो रहा है, इस बात की जानकारी तो उसे थी, लेकिन वह विरोध करने की स्थिति में नहीं थी. शाम 6 बजे वह होश में लौटी तो उसे उस सब का कुछकुछ याद आने लगा. उस ने इस बारे में कुंदन कुमार से पूछा तो उस ने उसे उस की ब्लूफिल्म दिखा दी. साथ ही धमकी दी कि इस सब के बारे में किसी को कुछ बताया तो वह उस की ब्लूफिल्म की सीडी बाजार में उतार देगा.  इस से अनु बुरी तरह डर गई. इस के बाद जब भी कुंदन कुमार का मन होता, उस से अपने मन की कर लेता. इस के एवज में वह उस की हर छोटीबड़ी जरूरत का ध्यान रखने लगा. वह सीडी बाजार में कैसे पहुंची, इस बारे में कुंदन कुमार और अनु ने कुछ भी मालूम होने से मना कर दिया. जैसे ही यह सब अखबारों में छपना शुरू हुआ, उस ने काफी पैसे दे कर अनु को छिपा दिया था.

अनु से पूछताछ के बाद कुंदन के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर के उस हवालात में बंद कर दिया गया. इस के बाद वह पुलिस को धमकियां देने लगा कि वह सभी पुलिस वालों को देख लेगा. लेकिन पुलिस के पास पुख्ता सबूत थे. इस पर भी वह खुद को बेकसूर बता रहा था, साथ ही कह रहा था कि उसे किसी साजिश के तहत फंसाया जा रहा है. उस ने थाने की मैस का खाना खाने से इनकार कर दिया था. कह रहा था कि उस का खाना किसी बढि़या होटल से मंगवाया जाए. एडीशनल एसपी कुंवर वीरेंद्र सिंह ने कहा कि जब तक वह यहां है, उसे यहीं का खाना मिलेगा. जैसेतैसे उस ने थोड़ा सा खाना खा लिया तो आधी रात में दिल का दौरा पड़ने का शोर मचाने लगा. उसे तुरंत अस्पताल ले जाया गया, जहां चैकअप के बाद डाक्टरों ने उसे पूरी तरह स्वस्थ बताया.

अगले दिन पुलिस ने उसे न्यायिक दंडाधिकारी के सम्मुख पेश कर के 5 दिनों के कस्टडी रिमांड पर ले कर विस्तारपूर्वक पूछताछ की. रिमांड अवधि में भी वह कभी सीने में दर्द का तो कभी किसी और तरह की परेशानी का ढोंग कर के पुलिस वालों को अस्पतालों के चक्कर लगवाता रहा. आखिर उस की सारी नौटंकियां फ्लौप साबित हुईं. जैसेतैसे पुलिस रिमांड की अवधि समाप्त हुई और पुलिस ने उसे फिर से अदालत में पेश कर के न्यायिक हिरासत में जेल भिजवा दिया, जहां से उसे सजा सुनाए जाने तक जमानत नहीं मिली.

चार्जशीट दाखिल होने के बाद इस केस की सुनवाई 2 सालों तक चली. इस मामले में उसे 10 सालों की कैद की सजा हुई. सजा सुनाए जाने के समय विद्वान जज महोदय ने टिप्पणी करते हुए उसे लताड़ा था कि जिस लड़की से दुष्कर्म के आरोप में उसे यह सजा दी जा रही है, वह उस की बेटी से भी कम उम्र की थी. ऐसे में उस के इस घिनौने अपराध के प्रति देश की कोई भी अदालत नरम रवैया अपनाने के बारे में शायद ही सोच सके. खैर, पुलिस ने तो कुंदन को उस के अपराध की सजा दिला दी, लेकिन वह अश्लील सीडी बाजार में कैसे पहुंची, इस रहस्य की तह तक अंत तक नहीं पहुंच सकी और न ही उन 3 अन्य लड़कियों का पता लगा सकी, जिन के साथ कुंदन कुमार की अश्लील फिल्मों की कई सीडी बरामद हुई थीं.

इस मामले से मिडिल क्लास की उन बेरोजगार लड़कियों को सावधान हो जाना चाहिए, जिन्हें नौकरी देने के नाम पर नोचने के लिए इस तरह के कामुक भेडि़ए घात लगाए बैठे रहते हैं. Hindi crime story

—कथा में पात्रों के नाम बदले हुए हैं.

 

Suspense Story: शराब के नशे में शबाब की चाहत

Suspense Story: जय सिंह की नीयत के बारे में जान कर अमरजीत और मीना का खून खौल उठा. इस के बाद जहां जय सिंह अपनी जिद पूरी करने पर अड़ गया वहीं दोनों बहनें भी पीछे नहीं हटीं और…  पि  छले 2 दिनों से हो रही बारिश के थमने के बाद अमेंद्र सिंह 2 मजदूरों को अपने ट्रैक्टर पर बैठा कर खेतों की ओर चल पड़े थे. उन के पास 20 बीघा जमीन थी, जिस में उन्हें गवार की बोआई करनी थी. जैसे ही वह खेतों पर पहुंचे, उन्हें किसी जीव के सड़ने की दुर्गंध महसूस हुई.

अमेंद्र ने इधरउधर नजरें घुमा कर यह जानने की कोशिश की कि यह बदबू आखिर आ कहां से रही है. तभी उन्हें खेतों के नीचे वाले हिस्से में 5-7 कुत्तों का झुंड दिखाई दिया. कुत्ते जमीन के अंदर से कुछ खींच रहे थे. उन्हें लगा कि कोई जानवर मरा पड़ा है, जिसे कुत्ते खा रहे हैं.

उन्होंने गांव के कोटवाल भजनलाल को बुलाने के लिए अपने एक मजदूर को भेज दिया. गांवों में आज भी मृत जानवरों को दफनाने का काम कोटवाल करते हैं. भजनलाल आया तो उस ने हड़बड़ा कर कहा, ‘‘भैयाजी, यह जानवर की नहीं, किसी आदमी की लाश है.’’

आदमी की लाश होने की बात सुन कर खेतों में बुआई कर रहे अमेंद्र चौंके. वह भाग कर लाश के पास पहुंचे. वहां गड्ढा खोद कर दफनाई गई आदमी की लाश को कुत्तों ने पंजों से खोदखोद कर बाहर निकाल लिया था. लाश बाहर आ गई थी, इसलिए बदबू फैल रही थी. मजदूरों को लाश के पास छोड़ कर अमेंद्र सिंह कोटवाल भजनलाल को साथ ले कर तुरंत हनुमानगढ़ जंक्शन के थाना सदर पहुंचे. थानाप्रभारी राजेश कुमार सिहाग से मिल कर उन्होंने खेत के पास लाश पड़ी होने की बात बताई तो थानाप्रभारी ने इस बात की जानकारी पुलिस अधिकारियों को दे कर खुद सहयोगियों के साथ घटनास्थल के लिए रवाना हो गए.

राजेश कुमार सिहाग ने घटनास्थल पर पहुंच कर देखा कि खेतों के नीचे वाले हिस्से में एक लाश पड़ी है. उस के शरीर की चमड़ी गायब थी. दोनों पैरों की हड्डियां दिखाई दे रही थीं. देखने से ही लग रहा था कि लाश 8-10 दिन पुरानी थी. थानाप्रभारी लाश और घटनास्थल का निरीक्षण कर रहे थे कि सीओ अतर सिंह भी घटनास्थल पर आ पहुंचे. अब तक वहां काफी भीड़ लग गई थी. पूछने पर भीड़ ने बताया कि मृतक यहां का नहीं लगता. इस से पुलिस को लगा कि हत्या कहीं और कर के सबूत मिटाने के लिए लाश को यहां ला कर गाड़ दिया गया है.

अतर सिंह के निर्देश पर डौग स्क्वायड को लाया गया, लेकिन इस से भी पुलिस को कोई लाभ नहीं मिला. इस के बाद घटनास्थल की काररवाई निपटा कर पुलिस ने थाने आ कर अमेंद्र की तहरीर पर अज्ञात की हत्या का मुकदमा अज्ञात लोगों के खिलाफ दर्ज कर लिया. सीओ ने इस मामले की जांच सबइंसपेक्टर राजेश कुमार सिहाग को सौंप दी. मृतक की पहचान के बिना हत्यारे तक पहुंचना बहुत मुश्किल था. लेकिन राजेश कुमार सिहाग का मानना था कि मृतक भले ही यहां का रहने वाला नहीं है, लेकिन हत्यारे यहीं कहीं आसपास के होंगे. मृतक या हत्यारे तक पहुंचना चुनौती था, लेकिन राजेश कुमार ने इस चुनौती को स्वीकार कर आगे की जांच शुरू कर दी.

घटनास्थल पर लाश के अलावा ऐसा कोई सबूत नहीं मिला था, जिस से कुछ मदद मिल सकती. अधिकतर हत्या जैसे मामलों में जरजोरू या जमीन का विवाद सामने आता है. इसी के साथ अधिकतर यह भी देखा गया है कि अपराधी कितना ही शातिर क्यों न रहा हो, वारदात की जगह पर अनजाने में ही सही, कोई न कोई सबूत अवश्य छोड़ जाता है. राजेश कुमार सिहाग इन्हीं दोनों तथ्यों के आधार पर मामले का खुलासा करने में लग गए. राजेश कुमार सिहाग ने जिले के ही नहीं, नजदीक के अन्य प्रदेशों के पुलिस थानों से भी पता किया कि कहीं कोई गुमशुदगी तो नहीं दर्ज है. लेकिन उन्हें कहीं से भी किसी की गुमशुदगी की कोई सूचना नहीं मिली. मृतक की पहचान न होने की वजह से मामले की जांच आगे नहीं बढ़ पा रही थी.

थानाप्रभारी को उम्मीद थी कि घटनास्थल से कोई न कोई ऐसा सूत्र अवश्य मिल जाएगा, जिस से वह हत्यारे को ढूंढ निकालेंगे. इसी उम्मीद पर वह अपने रीडर बृजमोहन मीणा और किसान अमेंद्र सिंह को साथ ले कर एक बार फिर घटनास्थल पर पहुंचे. अमेंद्र के ही नहीं, आसपास के लगभग सभी खेत अभी खाली पडे़ थे. खेतों के चारों ओर एक निर्माणाधीन मकान के अलावा दूरदूर तक कोई मकान या झोपड़ी नहीं थी. राजेश कुमार सिहाग ने सूत्र की तलाश में पूरी ताकत झोंक दी. घटनास्थल के 20-25 मीटर के दायरे को उन्होंने जांच केंद्र बनाया. बरसात हो जाने की वजह से कोई सूत्र मिलने की उम्मीद कम ही थी, इस के बावजूद उन की कोशिश रंग लाई.

उन्होंने गौर से देखा तो लाश जिस गड्ढे में दफनाई गई थी, वहां खेत में गड्ढे से 7-8 फुट की दूरी पर पश्चिम की ओर लग रहा था कि लाश इधर से घसीट कर लाई गई थी. पानी बरस जाने से घसीटे जाने का वह निशान धूमिल तो पड़ गया था, लेकिन अगलबगल की मिट्टी का जो उभार था, वह किसी भारी चीज के घसीटने की चुगली कर रहा था. घसीटे जाने का वह निशान वहां से थोड़ी दूरी पर स्थित उस निर्माणाधीन मकान की ओर जा रहा था. राकेश कुमार को सूत्र मिल गया था. वह मन ही मन प्रफुल्लित हो उठे, क्योंकि जांच को दिशा मिल गई थी. उन्होंने अमेंद्र सिंह से पूछा, ‘‘यह सामने वाला घर किस का है, कौन रहता है यहां?’’

‘‘साहब, यह मकान शृंगारा सिंह बाजीगर का है. 7-8 साल पहले बीकानेर क्षेत्र से आ कर यहां 12 बीघा जमीन खरीद कर बस गया था. 2 साल पहले वह मर चुका है. अब उस की पत्नी और छोटा बेटा यहां रह रहे हैं. लेकिन इस समय उस की 2 बेटियां, जिन की शादी हो चुकी हैं और एक दोहती यहीं हैं.’’

राजेश कुमार सिहाग थाने लौट आए और सारी जानकारी सीओ अतर सिंह को दी. इस जानकारी से संतुष्ट हो कर उन्होंने थानाप्रभारी को अपने विवेक के अनुसार काररवाई करने का आदेश दिया. राजेश कुमार सिंह को शृंगारा सिंह के घर में रहने वालों पर संदेह था, इसलिए उन्होंने काररवाई करने का मन बना लिया. 2 महिला सिपाही साथ ले कर राजेश कुमार शृंगारा सिंह के घर पहुंचे. घर में 4 महिलाएं और एक बच्चा था. उन्होंने घर की मालकिन से पूछा, ‘‘मांजी, पुलिस ने अमेंद्र सिंह के खेत में एक लाश बरामद की थी. आप ने बीते 10-12 दिनों में उन के खेत की ओर किसी आदमी को आतेजाते देखा तो नहीं?’’

‘‘नहीं साहब, मैं ने तो इधर किसी को आतेजाते नहीं देखा.’’ शृंगारा की विधवा ने बताया.

उन्होंने शृंगारा की पत्नी से ही नहीं, बेटियों से भी पूछताछ की. सब ने लगभग एक जैसा जवाब दिया. वह पूछताछ कर रहे थे कि  तभी शृंगारा सिंह की दोहती (बेटी की बेटी) गुलबदन (बदला हुआ नाम) उन के लिए चाय ले कर आई. उन की नजर उस पर गई तो वह उन्हें सहमी हुई सी लगी. उन्होंने बाकी लोगों को बाहर भेज कर उसे रोक लिया. जवानी की दहलीज पर कदज रख रही गुलबदन शृंगारा की बड़ी बेटी की बेटी थी, जो मिडिल स्कूल में पढ़ रही थी और छुट्टियां होने की वजह से नानी के पास आई हुई थी. गेहुंआ रंग की आभा के साथ गुल की सुघड़ शारीरिक बनावट गजब का आकर्षण पैदा कर रही थी. धवल दंत पंक्ति और नितंबों तक लहराते काले बालों की चुटिया 14-15 साल की कमसिन गुल को और ज्यादा आकर्षक बनाती थी.

राजेश कुमार सिहाग के सामने आते ही गुल की रुलाई फूट पड़ी. सुबकते हुए उस ने कहा, ‘‘साहब, मैं ने कुछ नहीं किया. मेरी दोनों मासियां ही कुछ बता सकती हैं.’’

गुल का यह जवाब और चेहरे पर उभरा अपराधबोध का भाव सब कुछ कह गया. राजेश कुमार ने दोनों महिला कांस्टेबलों को इशारा कर के गुल की दोनों मासियां यानी अमरजीत कौर और मीना कौर को पूछताछ के लिए एक बार फिर बुला लिया. सीओ अतर सिंह की मौजूदगी में राजेश कुमार सिहाग ने दोनों बहनों से कहा, ‘‘गुल तो बच्ची थी, लेकिन तुम दोनों समझदार हो. उस ने मुझे सब कुछ साफसाफ बता दिया है. अब अगर तुम झूठ बोलती हो तो वह तुमहारे लिए ही नुकसानदायक साबित होगा. अगर तुम सबकुछ सचसच बता देती हो तो पुलिस तुम्हारी मदद कर सकती है.’’

अंधेरे में फेंका गया उन का यह तीर सही निशाने पर लगा. दोनों बहनों ने बिना किसी हीलहवाली के 5 दिनों पहले कुल्हाड़ी और कस्सी से की गई जय सिंह की निर्मम हत्या का अपना अपराध स्वीकार कर लिया. उन का कहना था कि जय सिंह अव्वल दर्जे का शराबी और अय्याश था. उसे अपनी ओछी हरकतों की वजह से जान से हाथ धोना पड़ा. पुलिस द्वारा की गई पूछताछ में जय सिंह की हत्या की जो कथा उभर कर सामने आई, वह इस प्रकार थी. राजस्थान के जिला बीकानेर की तहसील जामनगर का एक गांव है भरूपावा. इसी गांव में रहता था शृंगारा सिंह बाजीगर. परिवार में पत्नी, 4 बेटियां और एक बेटा था. बेटा सब से छोटा था. बड़ी 2 बेटियों की शादी हो चुकी थी.

मामूली खेतीबाड़ी होने की वजह से शृंगारा सब्जी की दुकान भी लगाता था. उस के कहीं चले जाने पर दुकान का जिम्मा दोनों छोटी बेटियां अमरजीत कौर और मीना कौर संभालती थीं. उस बीच जय सिंह उन का पक्का और नियमित ग्राहक बन गया था. वह ठीकठाक कपड़ों में किसी हीरो से कम नहीं लगता था. जय सिंह मूलरूप से जिला झुंझुनू के बजावा गांव का रहने वाला था और उन दिनों खनन विभाग की रायल्टी वसूलने वाली टीम में नौकरी कर रहा था. उस का पिता बालू सिंह बीकानेर के एक होटल में वाचमैनी करता था. जय सिंह को जो वेतन मिलता था, वह तो मिलता ही था, ऊपरी कमाई भी कर लेता था. उस का ज्यादातर समय दोनों बहनों की सब्जी की दुकान पर ही बीतता था.

उसी बीच उस ने छोटी बहन मीना का मोबाइल नंबर हासिल कर लिया तो उसी से नहीं, अमरजीत से भी फोन से बातें करने लगा. वह दोनों बहनों को उपहार भी देता था. धीरेधीरे उस ने दोनों बहनों से दोस्ती गांठ ली थी. सन 2010 के आसपास शृंगारा सिंह भरूपावा के अपने खेत और मकान बेच कर डबली राठान गांव में 12 बीघा जमीन खरीद ली और वहीं पक्का मकान बना कर रहने लगा. यहीं से उस ने बाकी बची दोनों बेटियों, अमरजीत कौर और मीना कौर की शादियां कर दीं. इस के बाद सन 2014 की शुरुआत में उस की मौत हो गई.

शृंगारा के परिवार में बूढ़ी पत्नी और 8-10 साल का बेटा बचा था. चारों बेटियों ने स्वयं को बेटा समझते हुए मां को संभालने का जिम्मा सा ले लिया. हर बेटी 1-2 महीने के लिए मां के पास आ जाती. जय सिंह के पास मीना का मोबाइल नंबर था ही, इसलिए उस से उस की बातें होती रहती थी. ज्यादातर मीना और अमरजीत एक साथ मायके आती थीं. दोनों बहनों के मायके आने का पता चलते ही जय सिंह उन से मिलने आ जाता. अव्वल दर्जे का शराबी जय सिंह 1-2 दिन रुक कर अपने काम पर लौट जाता. 20 मई को जय सिंह शृंगारा सिंह के घर आ कर 2 दिनों बाद लौट गया था. उसे जब भी आना होता, वह मोबाइल पर बता देता था.

इस बार कुछ दिनों पहले जय सिंह के जाने के बाद गुलबदन गुमसुम सी आंगन में बैठी थी. उस के दाएं गाल पर बड़ा सा चकता उभरा था. उसे इस तरह उदास देख कर अमरजीत ने पूछा, ‘‘क्या बात है गुल, उदास क्यों है? तेरे गाल को क्या हुआ?’’

जवाब देने के बजाए गुल रोने लगी. अमरजीत ने गुल को सीने से लगा कर ढांढ़स बंधाया. आंसू पोंछ कर पूछा, ‘‘सचसच बता क्या बात है?’’

गुल ने सिसकते हुए कहा, ‘‘मौसी कल रात जय मामा रात में मेरी चारपाई पर आ कर बैठ गए. उन्होंने दांतों से यहां काट लिया,’’ चकत्ते पर अंगुली रख कर गुल ने कहा, ‘‘उस के बाद उस ने मेरी सलवार खोलने की कोशिश की. तभी मीना मौसी जाग गईं. अंधेरा होने की वजह से वह मामा को देख नहीं पाईं और वह चुपके से अपनी चारपाई पर चला गया. सुबह उन्होंने कहा कि अगर मैं ने यह बात किसी को बताई तो वह मेरा गला दबा कर मुझे मार देंगे.’’

जय सिंह की इस घिनौनी हरकत के बारे में सुन कर अमरजीत का खून खौल उठा. मीना भी आंगन में आ गई थी. वह तो गुस्से में कांपने लगी थी. अमरजीत ने तुरंत जय सिंह को फोन किया. उस के फोन रिसीव करते ही वह उसे धमकाते हुए बोली, ‘‘तेरी इतनी हिम्मत कि तू ने गुल को हाथ लगा दिया. आइंदा गुल को हाथ लगाना तो दूर, उस की तरफ गंदी नजरों से देखा भी तो तेरी आंखें फोड़ दूंगी. तेरी बोटीबोटी कर के चीलकौवों को खिला दूंगी. मेरी ढाणी की तरफ रुख भी किया तो मेरी जैसी कोई बुरी नहीं होगी.’’

जो मुंह में आया जय सिंह को कह कर अमरजीत ने फोन काट दिया. उस के मुंह बोले भाई जय सिंह ने सफाई देनी चाही, पर मीना और अमरजीत ने फोन रिसीव नहीं किया.  पिछले 4-5 दिनों से जय सिंह फोन कर रहा था, पर उस का फोन रिसीव नहीं किया गया. 2 जून, 2015 को अमरजीत मां के साथ खेतों की ओर गई थी. घर पर मीना और गुल थीं. तभी मोबाइल की घंटी बजी. मीना ने देखा कि जय सिंह का फोन है. उस ने फोन रिसीव कर लिया तो दूसरी ओर से जय सिंह ने कहा, ‘‘देख मीना, तुम दोनों बहनें बेकार ही मुझ पर नाराज हो. मैं ने कोई गलती नहीं की थी. आरोप लगाने और सच्चाई को आंखों से देखने में रातदिन का फर्क होता है. सच्चाई यह है कि उस रात मैं नहीं, गुल मेरी चारपाई पर आ कर लेट गई थी.

वह तो मैं था जो गुल को दुत्कार कर भगा दिया. मेरी जगह कोई और होता तो निश्चय ही अनर्थ हो जाता. और अब आगे सुन, आज रात मैं तेरे घर आ रहा हूं. गुल ने मेरे ऊपर जो झूठा आरोप लगाया था, आज रात मैं उस झूठे आरोप को सच कर दूंगा. तुम दोनों बहनों से जो बन पड़े कर लेना.’’

इस तरह की धमकी दे कर जय सिंह ने फोन काट दिया. लगभग 2 घंटे बाद अमरजीत मां के साथ घर लौटी तो मीना और गुल को डरी देख कर चौंकी. अमरजीत कुछ पूछती, उस के पहले ही मीना ने कहा, ‘‘दीदी, अभी जय सिंह का फोन आया था. वह आज रात आ रहा है. उस का कहना है कि गुल ने उस पर झूठा आरोप लगाया है.’’

‘‘मीना गुल ने झूठा आरोप नहीं लगाया, बल्कि सच्चाई वही है. गुल झूठा आरोप क्यों लगाएगी.’’ अमरजीत ने कहा.

‘‘दीदी, जय सिंह ने धमकी दी है कि वह आज रात गुल के साथ हमारी मौजूदगी में ही मनमानी करेगा.’’ मीना ने कहा.

‘‘अरे, तुम दोनों इस बात को ले कर इतना डरी हुई क्यों हो? मेरे जीतेजी वह मनमानी तो दूर, गुल को छू भी नहीं पाएगा.’’ अमरजीत ने दृढ़ता से कहा.

अमरजीत जय सिंह के जिद्दी स्वभाव को जानती थी. उसे यह भी पता था कि ट्रक चालकों से जानपहचान होने की वजह से वह फोकट में कहीं भी आजा सकता है. अमरजीत भी जय सिंह की इस धमकी से डर गई, इसलिए खलिहान में पड़ी कुल्हाड़ी और कस्सी को ला कर उस ने आंगन में छिपा कर रख दिया. दोनों बहनें अभी जाग रही थीं. रात 12-1 बजे के बीच जय सिंह उन के घर पहुंचा. शराब के नशे में वह लड़खड़ा रहा था. वह सीधे गुल की चारपाई के पास पहुंचा और उसे बांहों में भर कर उठाने की कोशिश करने लगा. लेकिन नशे में होने की वजह से वह खुद ही गिर गया. इस के बाद नींद में गाफिल गुल के बाल पकड़ कर घसीटा तो वह जाग गई. उस के इस रूप को देख कर मासूम गुल ‘बचाओबचाओ’ कह कर रोने लगी.

गुल की करुणामयी पुकार ने अमरजीत और मीना को चंडी बना दिया. अगले ही पल एक ने कुल्हाड़ी तो दूसरी ने कस्सी उठा ली और जय सिंह पर हमला बोल दिया. एक ही वार में वह लुढ़क गया. कुछ देर छटपटा कर उस ने दम तोड़ दिया. लाश ठिकाने लगाने के लिए दोनों बहनें उसे उठा कर खेतों की ओर ले गईं. अमेंद्र के खेत के पास पहुंचतेपहुंचते वे थक गईं. मीना कस्सी लेने घर लौट गईं तो अमरजीत अकेली ही लाश को कई फुट तक घसीट कर ले आई. इसी घसीटने के निशान के आधार पर राजेश कुमार सिहाग उन के घर तक पहुंच गए थे.  कस्सी से दोनों बहनों ने गड्ढा खोदना शुरू किया. मानसिकशारीरिक थकावट की वजह से वे एकडेढ़ फुट से ज्यादा गहरा गड्ढा नहीं खोद पाईं. उसी गड्ढे में लाश दफना कर दोनों बहनें घर आ कर सो गईं.

पुलिस ने दोनों बहनों को गिरफ्तार कर अदालत में पेश किया, जहां से पूछताछ एवं साक्ष्य जुटाने के लिए पुलिस ने 3 दिनों के पुलिस रिमांड पर ले लिया. रिमांड अवधि के दौरान जांच अधिकारी ने वारदात में प्रयुक्त कस्सी और कुल्हाड़ी बरामद कर ली. रिमांड अवधि समाप्त होने के बाद दोनों बहनों को पुन: अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. Suspense Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Delhi News: घर छिनने की नौबत पर मां और 2 बेटों ने दी जान

Delhi News: राजधानी दिल्ली से एक ऐसी दर्दनाक घटना सामने आई है, जिस ने लोगों को झकझोर कर रख दिया है. यहां मां और 2 बेटों ने फंदा लगाकर जान दे दी. क्या वजह थी कि परिवार इतना परेशान था कि अपनी जान देनी पड़ी. क्या है इस परिवार की दर्दनाक घटना, जो आप को भी सोचने पर मजबूर कर देगी. चलिए जानते हैं, इस पूरी स्टोरी को विस्तार से.

यह हैरान कर देने वाली घटना दिल्ली के कालकाजी क्षेत्र से सामने आई है. यहां मानसिक तनाव और पैसों की तंगी से परेशान अनुराधा कपूर नाम की महिला और उस के 2 बेटों आशीष कपूर और चैतन्य कपूर ने 19 दिसंबर, 2025 को फांसी लगाकर जान दे दी.

पुलिस के अनुसार, तीनों के शव उन के घर में पंखे से लटके मिले. सूचना मिलने पर कालकाजी थाना पुलिस मौके पर पहुंची और शवों को कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम के लिए सुरक्षित रख लिया. शुरुआती जांच में पुलिस को कमरे से एक सुसाइड नोट मिला जिस में लिखा था कि तीनों पैसों की तंगी और घर टूटने की वजह से मानसिक तनाव में थे. वे कालकाजी इलाके के जी ब्लौक के मकान नंबर B-70 में रहते थे. पुलिस ने बताया कि दोपहर करीब पौने 3 बजे एक पुलिसकर्मी कोर्ट का नोटिस ले कर उन के घर पहुंचा था.

कई बार गेट और डोरबेल बजाई, लेकिन अंदर से कोई जवाब नहीं मिल पाया था. शक होने पर उस ने मामले की सूचना कालकाजी पुलिस स्टेशन को दे दी थी. इस के बाद पुलिस पहुंची, तो घर का गेट अंदर से बंद था. इस के बाद चाबी वाले को बुलाकर डुप्लीकेट चाबी से दरवाजा खोला. पुलिस घर के अंदर गई तो मां और उस के दोनों बेटे फंदे से लटके हुए थे. इस के बाद तीनों को नीचे उतारकर अस्पताल भेजा, जहां डॉक्टरों ने जांच के बाद उन्हें मृत घोषित कर दिया.

एक पुलिस अधिकारी ने बताया कि घर से एक सुसाइड नोट मिला है, जिस में परिवार की परेशानी का जिक्र है. पुलिस का कहना है कि शुरुआती जांच में सामने आया है कि परिवार लंबे समय से पैसों की तंगी से जूझ रहा था. जिस घर में वे रहते थे, उसे ले कर पड़ोसी से विवाद चल रहा था. दूसरी पार्टी ने कोर्ट में केस जीत लिया था, जिस के बाद घर खाली करने का आदेश दिया गया.

सूत्रों के मुताबिक, 19 दिसंबर, 2025 को पुलिसकर्मी घर खाली करने का कोर्ट नोटिस देने पहुंचा था. फिलहाल पुलिस पूरे मामले की विस्तार से जांच कर रही है. Delhi News

Jaunpur Crime: मुसलिम गर्लफ्रेंड के लिए मांबाप को 6 टुकड़ों में काट डाला

Jaunpur Crime: एक ऐसी शर्मनाक घटना सामने आई है जिस ने रिश्तों को तारतार कर रख दिया है. एक प्रेमी ने मुसलिम प्रेमिका के लिए अपने मांबाप को 6 टुकड़ों में काट डाला. आखिर ऐसा क्या था उस प्रेमिका में जिस से एक इंजीनियर बेटा ने मांबाप को इतनी बेरहमी से मार डाला?  क्या है इस मर्डर का पूरा सच जानने के लिए पढ़ते हैं आगे जो आप को करेगा होने वाली घटना से सचेत और सावधान?

यह दर्दनाक घटना उत्तर प्रदेश के जौनपुर से सामने आई है. यहां एक इंजीनियर बेटे अम्बेश कुमार ने अपने मांबाप की हत्या कर दी. अम्बेश ने मांबाप का सिर लोहे के खलबट्टे से कूच दिया था. फिर आरी से उन के 6 टुकडे कर डाले. इस के बाद उन टुकड़ों को बोरियों में भर कर गोमती नदी में बारीबारी से फेंक आया.

पुलिस के अनुसार, अम्बेश बीटेक की डिग्री लेने के बाद कोलकाता में एक कंपनी में बतौर क्वालिटी इंजीनियर कार्यरत था. वहां उसे 25 हजार की सैलरी मिलती थी. इसी जौब के दौरान उस की मुलाकात एक मुसलिम युवती से हुई. दोनों की नजदीकियां बढ़ी और 2019 में दोनों ने लव मैरिज शादी कर ली. दोनों के 2 बेटे हैं, जिन की उम्र 5 साल और 11 महीने है.

अम्बेश की लव मैरिज से परिवार खुश नहीं था. इसी को ले कर उस के पापा श्याम बहादुर और मम्मी बबीता के बीच बहस हो जाया करती थी. इसी बात को ले कर दोनों के बीच 8 दिसंबर, 2025 को झगड़ा हुआ  तो गुस्से में उस ने अपने मम्मीपापा की खलबट्टे से कूच कर हत्या कर दी.

हत्या करने के बाद अम्बेश ने अपनी बहन को फोन कर बताया कि मम्मी और पापा  कहीं चले गए हैं. वह इसी तरह नाटक करता रहा. 12 दिसंबर, 2025 को अचानक वह भी लापता हो गया. इस के बाद अम्बेश की बड़ी बहन वंदना ने उसे फोन मिलाया तो उस का कुछ पता नहीं चल सका. तब वंदना ने फिर अम्बेश की गुमशुदगी की सूचना दर्ज करा दी.

पुलिस को उस ने बताया कि  उस के मम्मीपापा पहले गायब हो गए, अब भाई भी लापता है. इस के बाद पुलिस ने इस मामले की गंभीरता से जांच की तो पुलिस को अम्बेश मिल गया. उस से पूछताछ की गई तो उस ने अपना जुर्म कुबूल कर लिया.

एएसपी आयुष श्रीवास्तव ने बताया कि अम्बेश ने बताया कि मम्मीपापा मेरी शादी तुड़वाना चाहते थे. वे चाहते थे कि वह दूसरी शादी कर ले. अम्बेश मुसलिम पत्नी को तलाक देने के लिए तैयार भी था, लेकिन उसे गुजारा भत्ता देना पड़ता. मम्मीपापा गुजारा भत्ता देने के लिए तैयार नहीं थे. तो उस ने पत्नी को तलाक देने से इनकार कर दिया.

इस के बाद मम्मी ने अम्बेश से घर से निकल जाने को कहा. तब अम्बेश ने कहा कि यह तो मेरी नानी का घर है. मुझे नेवासा में दिया था. इसी बात को ले कर मम्मी ने अम्बेश को धक्का मार दिया और कहा कि इसी समय घर से निकल जा. इसी बात को ले कर अम्बेश गुस्सा आ गया. पास में रखा टेबल के लोहे का खलबट्टा था. उस का मूसल उठाया और मम्मी के सिर पर मार दिया. इस के बाद पापा भी वहां आ गए.  वह पुलिस को फोन करने की धमकी देने लगे. वह पुलिस को फोन कर ही रहे थे तभी अम्बेश ने उन को भी मूसल मार दिया.

पापा और मम्मी चिल्लाए. दोनों फर्श पर जा गिरे. इस के बाद उन की सांसें थम चुकी थीं. दोनों की हत्या करने के बाद अम्बेश की समझ में नहीं  आ रहा था कि वह क्या करे.

यह अपराध छिपाने के लिए उस के दिमाग में एक आईडिया आया. वह बेसमेंट से सरिया काटने वाली इलेक्ट्रिक आरी ले आया और दोनों की लाशों के 3-3 टुकड़े कर दिए. फिर 6 को प्लास्टिक की बोरी में भर कर गोमती नदी में फेंक आया.

पुलिस ने आरोपी अम्बेश को अरेस्ट कर लिया है. पुलिस उस के खिलाफ सबूत इकट्ठे कर काररवाई कर रही है. Jaunpur Crime

Love Crime: इश्क की आग में कुछ इस तरह बरबाद हुआ एक परिवार

Love Crime: 2 लोगों के साथ जगराओं के थाना सिटी पहुंची लक्ष्मी ने थानाप्रभारी इंसपेक्टर इंद्रजीत सिंह को बताया था कि उस के पति प्रवासराम 2 दिन पहले काम पर गए तो अब तक लौट कर नहीं आए हैं. थानाप्रभारी ने पूरी बात बताने को कहा तो लक्ष्मी ने बताया कि उस के पति प्रवासराम मूलरूप से बिहार के जिला बांका के थाना रजौली के गांव उपराम के रहने वाले थे.

कई सालों पहले वह काम की तलाश में जगराओं आ गया था और पीओपी का काम सीख कर बडे़बडे़ मकानों में पीओपी करने के ठेके लेने लगा था. उस का काम ठीकठाक चलने लगा तो वह गांव से पत्नी और बच्चों को भी ले आया. जगराओं में वह डा. हरिराम अस्पताल के पास रहता था. सन 2001 में प्रवासराम की लक्ष्मी से शादी हुई थी. उस के कुल 6 बच्चे थे, जिन में 4 बेटियां और 2 बेटे थे. वह सुबह काम पर जाता था तो शाम 7 बजे तक वापस आता था. लक्ष्मी की बात सुन कर इंद्रजीत सिंह ने पूछा, ‘‘जिस जगह तुम्हारा पति काम करता था, वहां जा कर तुम ने पता किया था?’’

‘‘जी साहब, यह लड़का उन्हीं के साथ काम करता था.’’ साथ आए 20-22 साल के एक लड़के की ओर इशारा कर के लक्ष्मी ने कहा.

थानाप्रभारी ने उस लड़के की ओर देखा तो उस ने कहा, ‘‘साहब, मेरा नाम सोनू है, मैं उन्हीं के साथ काम करता था. वह 2 दिनों से काम पर नहीं आए हैं, जिस से हम सभी बहुत परेशान हैं. हम सभी खाली बैठे हैं.’’

इंद्रजीत सिंह ने एएसआई बलजिंदर सिंह को पूरी बात समझा कर प्रवासराम की गुमशुदगी दर्ज करा कर उस की पत्नी से उस का एक फोटो लेने को कहा. थानाप्रभारी के आदेश पर बलजिंदर सिंह ने प्रवासराम की गुमशुदगी दर्ज कर लक्ष्मी से उस का एक फोटो ले लिया. इस के बाद उन्होंने उस की फोटो के साथ सभी थानों को उस की गुमशुदगी की सूचना दे दी. यह 4 अप्रैल, 2017 की बात है. इस का मतलब प्रवासराम 2 अप्रैल से गायब था.

6 अप्रैल, 2017 को पुलिस को जगराओं के बाहरी इलाके में सेम नानकसर रोड पर स्थित एक गंदे नाले में एक लाश मिली. उसे बिस्तर में लपेट कर फेंका गया था. मौके पर पहचान न होने की वजह से पुलिस ने लाश को मोर्चरी में रखवा कर उस के पोस्टर जारी कर दिए थे. पोस्टर देख कर अगवाड़ लोपो के रहने वाले मृतक के साढू समीर ने उस की शिनाख्त डा. हरिराम अस्पताल के पास रहने वाले प्रवासराम की लाश के रूप में कर दी थी.

इंद्रजीत सिंह ने तुरंत सिपाही भेज कर लक्ष्मी को बुलवा लिया था. लाश देखते ही लक्ष्मी रोने लगी. अब शक की कोई गुंजाइश नहीं रह गई थी. वह लाश उस के गुमशुदा पति प्रवासराम की ही थी. लाश की शिनाख्त होने के बाद इंद्रजीत सिंह ने प्रवासराम की गुमशुदगी की जगह अज्ञात लोगों के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कर लाश लक्ष्मी और उस के रिश्तेदारों को सौंप दी. उसी दिन शाम को उन्होंने उस का अंतिम संस्कार कर दिया.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, प्रवासराम की हत्या 4 दिनों पहले गला घोंट कर की गई थी. उस की गरदन पर रस्सी के निशान थे. थानाप्रभारी ने इस मामले की जांच बलजिंदर सिंह को ही सौंप दी थी. उन्होंने मृतक की पत्नी लक्ष्मी और उस के भाइयों को बुला कर विस्तार से पूछताछ की. मृतक के भाई अनूप का कहना था कि उस के भाई की न किसी से कोई दुश्मनी थी और न किसी तरह का कोई लेनादेना था. इस के बाद बलजिंदर सिंह ने लक्ष्मी से पूछा, ‘‘तुम सोच कर बताओ कि काम पर जाने से पहले तुम्हारी पति से कोई खास बात तो नहीं हुई थी?’’

‘‘कोई बात नहीं हुई थी साहब, रोज की तरह उस दिन भी वह अपना खाने का टिफिन ले कर सुबह साढ़े 7 बजे घर से गए तो लौट कर नहीं आए.’’

बलजिंदर सिंह ने वहां जा कर भी पूछताछ की, जहां प्रवासराम काम करा रहा था. उस के साथ काम करने वाले मजदूर ही नहीं, मकान के मालिक ने भी बताया कि प्रवासराम निहायत ही शरीफ और ईमानदार आदमी था. लड़ाईझगड़ा तो दूर, वह किसी से ऊंची आवाज में बात भी नहीं करता था. समय पर काम कर के मालिक से समय पर मजदूरी ले कर अपने मजदूरों को उन की मजदूरी दे कर उन्हें खुश रखता था. बलजिंदर सिंह को अब तक की पूछताछ में कोई ऐसा सुराग नहीं मिला था, जिस से वह हत्यारों तक पहुंच पाते. यह तय था कि हत्यारे 2 या 2 से अधिक थे. लेकिन उन की समझ में नहीं आ रहा था कि ऐसे शरीफ आदमी की भला किसी की क्या दुश्मनी हो सकती थी, जो उसे मार दिया.

थानाप्रभारी इंद्रजीत सिंह से सलाह कर के बलजिंदर सिंह मुखबिरों की मदद से यह पता करने लगे कि मृतक की पत्नी का किसी से अवैध संबंध तो नहीं था. इस की एक वजह यह थी कि लक्ष्मी ने कई बार बयान बदले थे. यही नहीं, पूछताछ के दौरान वह डरीडरी सी रहती थी. कभी वह कहती थी कि 2 अप्रैल को काम से लौटने के बाद वह कुछ लेने के लिए बाजार गए थे तो लौट कर नहीं आए तो कभी कहती थी कि सुबह काम पर गए थे तो लौट कर नहीं आए थे.

उस की इन्हीं बातों पर उन्हें उस पर शक हो गया था. मुखबिरों से उन्हें पता चला था कि लक्ष्मी के घर सिर्फ 20-22 सल के सोनू का ही आनाजाना था. उसी सोनू के साथ लक्ष्मी प्रवासराम की गुमशुदगी दर्ज कराने थाने आई थी. उस की उम्र लक्ष्मी से इतनी कम थी कि उस पर संदेह नहीं किया जा सकता था. लेकिन मुखबिर ने जो खबर दी थी, उस से सोनू ही संदेह के घेरे में आ गया था. पुलिस जब उसे गिरफ्तार करने पहुंची तो वह घर पर नहीं मिला.

बलजिंदर सिंह महिला सिपाही की मदद से लक्ष्मी को थाने ले आए और जब उस से कहा कि उसी ने सोनू के साथ मिल कर अपने पति की हत्या की है तो वह अपने बच्चों की कसम खाने लगी. उस का कहना था कि पुलिस को शायद गलतफहमी हो गई है. वह भला अपने पति की हत्या क्यों करेगी. लेकिन पुलिस को मुखबिर पर पूरा भरोसा था. इसलिए जब उस के साथ थोड़ी सख्ती की गई तो उस ने अपने पति प्रवासराम की हत्या का अपराध स्वीकार करते हुए बता दिया कि उसी ने अपने प्रेमी सोनू के साथ साजिश रच कर पति प्रवासराम की हत्या कराई थी.

इस हत्या में उस का प्रेमी सोनू और उस के 2 दोस्त मिल्टन और छोटू सोनू शामिल थे. सोनू के दोस्त का नाम भी सोनू था, इसलिए यहां उस का नाम छोटू सोनू लिख दिया गया है. लक्ष्मी ने ही प्रवासराम की हत्या करा कर उस की लाश गंदे नाले में फेंकवा दी थी. इस के बाद लक्ष्मी की निशानदेही पर उस के प्रेमी सोनू और उस के साथी अवधेश (बदला हुआ नाम) को हिरासत में ले लिया गया था. जबकि उस का साथी सोनू फरार होने में कामयाब हो गया था. शायद उसे लक्ष्मी, अवधेश और सोनू के गिरफ्तार होने की सूचना मिल गई थी.

बलजिंदर सिंह ने उसी दिन यानी 9 अप्रैल, 2017 को तीनों अभियुक्तों लक्ष्मी, अवधेश और सोनू को जिला मजिस्टै्रट की अदालत में पेश कर के लक्ष्मी और सोनू को 2 दिनों के पुलिस रिमांड पर ले लिया, जबकि नाबालिग होने की वजह से अवधेश को बाल सुधारगृह भेज दिया गया. रिमांड अवधि के दौरान प्रवासराम की हत्या की जो कहानी प्रकाश में आई, वह  इस प्रकार थी- 6 बच्चों की मां बन जाने के बाद भी लक्ष्मी की देह की आग शांत होने के बजाय और भड़क उठी थी. इस की वजह यह थी कि प्रवासराम सीधासादा और शरीफ आदमी था. उस ने लक्ष्मी से कहा था कि अब उसे खुद पर संयम रखना चाहिए, क्योंकि उस के 6 बच्चे हो चुके हैं. अब उसे अपने इन बच्चों की फिक्र करनी चाहिए.

प्रवासराम दिनभर काम कर के थकामांदा घर लौटता और खाना खा कर अगले दिन काम पर जाने के लिए जल्दी सो जाता. लक्ष्मी को यह जरा भी नहीं सुहाता था. जब पति ने उस की ओर से पूरी तरह मुंह मोड़ लिया तो उस की नजरें खुद से लगभग 22 साल छोटे सोनू पर जा टिकीं. काम से फारिग होने के बाद अकेला रहने वाला सोनू अक्सर प्रवासराम के साथ उस के घर आ जाता था. वह घंटों बैठा प्रवासराम और लक्ष्मी से बातें किया करता था. लक्ष्मी की नजरें उस पर टिकीं तो वह उस से हंसीमजाक के साथसाथ शारीरिक छेड़छाड़ भी करने लगी. युवा हो रहे सोनू को यह सब बहुत अच्छा लगता था.

एक दिन दोपहर को जब सोनू काम से छुट्टी ले कर लक्ष्मी के घर पहुंचा तो लक्ष्मी ने उसे पकड़ कर बैड पर पटक दिया और मनमानी कर डाली. सोनू के लिए यह एकदम नया सुख था. उसे ऐसा लगा, जैसे वह जन्नत की सैर कर रहा है. उस दिन के बाद यह रोज का नियम बन गया. सोनू काम के बीच कोई न कोई बहाना कर के लक्ष्मी के पास पहुंच जाता और मौजमस्ती कर के लौट जाता. यह सब लगभग एक साल तक चलता रहा. किसी तरह इस बात की जानकारी प्रवासराम को हुई तो उस ने लक्ष्मी को खरीखोटी ही नहीं सुनाई, बल्कि प्यार से समझाया भी, पर उस के कानों पर जूं नहीं रेंगी.

जब प्रवासराम ने लक्ष्मी पर रोक लगाने की कोशिश की तो सोनू के प्यार में पागल लक्ष्मी ने सोनू के साथ मिल कर प्रवासराम की हत्या की योजना बना डाली. एक दिन उस ने सोनू से कहा, ‘‘जब तक प्रवासराम जिंदा रहेगा तो हम दोनों इस तरह मिल नहीं पाएंगे. वैसे भी अब उस के वश का कुछ नहीं रहा. वह बूढा हो गया है, अब उस का मर जाना ही ठीक है.’’

लक्ष्मी के साथ मिल कर प्रवासराम की हत्या की योजना बना कर सोनू ने साथ काम करने वाले अवधेश और छोटू सोनू को कुछ रुपयों का लालच दे कर अपने साथ मिला लिया. घटना वाले दिन यानी 2 अप्रैल, 2017 को सोनू पार्टी देने के बहाने शराब की बोतल और चिकन ले कर लक्ष्मी के घर पहुंचा. अवधेश और छोटू सोनू भी उस के साथ थे. उस ने प्रवासराम से कहा, ‘‘भइया चिकन और शराब लाया हूं, आज पार्टी करने का मन है.’’

योजनानुसार चारों शराब पीने बैठ गए. खुद कम पी कर सोनू और उस के साथियों ने प्रवासराम को अधिक शराब पिला दी. रात के 11 बजे तक प्रवासराम जरूरत से ज्यादा शराब पी कर लगभग बेहोश हो गया तो लक्ष्मी ने सोनू को इशारा किया. सोनू ने छोटू सोनू और अवधेश की तरफ देखा तो छोटू सोनू ने बेसुध पड़े प्रवासराम के दोनों पैर कस कर पकड़ लिए. अवधेश उस की छाती पर सवार हो गया तो लक्ष्मी और सोनू ने प्रवासराम के गले में रस्सी डाल कर कस दिया. प्रवासराम तड़प कर शांत हो गया तो चारों ने मिल कर लाश को बैड से उतार कर नीचे खिसका दिया.

अवधेश और छोटू सोनू तो अपनेअपने घर चले गए, जबकि सोनू लक्ष्मी के कमरे पर ही रुक गया. दोनों पूरी रात उसी बैड पर मौजमस्ती करते रहे, जिस बैड के नीचे प्रवासराम की लाश पड़ी थी. अगले दिन यानी 3 अप्रैल की रात को अवधेश और छोटू सोनू की मदद से सोनू प्रवासराम की लाश को बिस्तर में लपेट कर रेहड़े से ले जा कर सेम नानकसर रोड पर बहने वाले गंदे नाले में फेंक आया. रिमांड अवधि के दौरान लक्ष्मी की निशानदेही पर पुलिस ने उस के घर से वह रस्सी बरामद कर ली थी, जिस से प्रवासराम का गला घोंटा गया था. हत्या करते समय लक्ष्मी ने अपने सभी बच्चों को दूसरे कमरे में सुला कर बाहर से कुंडी लगा दी थी, जिस से बच्चों को कुछ पता नहीं चल सका था.

रिमांड अवधि समाप्त होने पर 11 अप्रैल, 2017 को लक्ष्मी और उस के प्रेमी सोनू को पुन: अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. अवधेश को पहले ही बाल सुधार गृह भेज दिया गया था. इस हत्याकांड का एक आरोपी छोटू सोनू अभी फरर है. पुलिस उस की तलाश कर रही है. प्रवासराम की हत्या और लक्ष्मी के जेल जाने के बाद उन के सभी बच्चों को प्रवासराम का छोटा भाई अपने घर ले गया है. लक्ष्मी ने अपनी वासना में अपना परिवार तो बरबाद किया ही, 3 लड़कों की जिंदगी पर सवालिया निशान लगा दिए. Love Crime

कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. अवधेश बदला हुआ नाम है.

Gorakhpur Crime: रिश्तों की मर्यादा टूटी, चाची की यारी में चाचा का खौफनाक कत्ल

Gorakhpur Crime: 17 अक्तूबर, 2016 की सुबह जिला गोरखपुर के चिलुआताल के महेसरा पुल के नजदीक जंगल में एक पेड़ के सहारे एक साइकिल खड़ी देखी गई, जिस के कैरियर पर एक बोरा बंधा था. बोरा खून से लथपथ था, इसलिए देखने वालों को अंदाजा लगाते देर नहीं लगी कि बोरे में लाश हो सकती है. लाश  होने की संभावना पर ही इस बात की सूचना थाना चिलुआताल पुलिस को दे दी गई थी. सूचना मिलते ही थानाप्रभारी इंसपेक्टर रामबेलास यादव पुलिस बल के साथ घटनास्थल पर आ पहुंचे थे. बोरे से उस समय भी खून टपक रहा था.

इस का मतलब था कि बोरा कुछ देर पहले ही साइकिल से वहां लाया गया था. उन्होंने बोरा खुलवाया तो उस में से एक आदमी की लाश निकली. मृतक की उम्र 35-36 साल रही होगी. उस के सिर पर किसी वजनदार चीज से वार किया गया था. वह रंगीन सैंडो बनियान और लुंगी पहने था. शायद रात को सोते समय उस की हत्या की गई थी. पुलिस को लाश की शिनाख्त कराने में जरा भी दिक्कत नहीं हुई. वहां जमा भीड़ ने मृतक की शिनाख्त प्रौपर्टी डीलर सुरेश सिंह के रूप में कर दी थी. वह चिलुआताल गांव का ही रहने वाला था.

शिनाख्त होने के बाद रामबेलास यादव ने मृतक के घर वालों को सूचना देने के लिए 2 सिपाहियों को भेजा. दोनों सिपाही मृतक के घर पहुंचे तो घर पर कोई नहीं मिला. पड़ोसियों से पता चला कि सुरेश सिंह के बिस्तर पर भारी मात्रा में खून मिलने और उस के बिस्तर से गायब होने से घर के सभी लोग उसी की खोज में निकले हुए थे. घर पर पुलिस के आने की सूचना मिलने पर मृतक सुरेश सिंह के बड़े भाई दिनेश सिंह घर आए तो जंगल में एक लाश मिलने की बात बता कर दोनों सिपाही उन्हें अपने साथ ले आए. लाश देखते ही दिनेश सिंह फफक कर रो पड़े. इस से साफ हो गया कि मृतक उन का भाई सुरेश सिंह ही था.

इस के बाद पुलिस ने घटनास्थल की सारी काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए बाबा राघवदास मैडिकल कालेज भिजवा दिया और उस साइकिल को जब्त कर लिया, जिस पर लाश बोरे में भर कर वहां लाई गई थी. थाने लौट कर रामबेलास यादव ने मृतक के बडे़ भाई दिनेश सिंह की तहरीर पर सुरेश सिंह की हत्या का मुकदमा अज्ञात के खिलाफ दर्ज कर लिया. मृतक सुरेश सिंह प्रौपटी डीलिंग का काम करता था. विवादित जमीनों को खरीदनाबेचना उस का मुख्य धंधा था. पुलिस ने इसी बात को ध्यान में रख कर जांच आगे बढ़ाई, लेकिन उस का ऐसा कोई दुश्मन नजर नहीं आया, जिस से लगे कि हत्या उस ने कराई है.

यह हत्याकांड अखबारों की सुर्खियां बना तो एसएसपी रामलाल वर्मा ने एसपी (सिटी) हेमराज मीणा को आदेश दिया कि वह जल्द से जल्द इस मामले का खुलासा कराएं. उन्होंने सीओ देवेंद्रनाथ शुक्ला और थानाप्रभारी रामबेलास यादव को सुरेश सिंह तथा उस के घरपरिवार के आसपास जांच का घेरा बढ़ाने को कहा. क्योंकि उन्हें लग रहा था कि यह हत्या दुश्मनी की वजह से नहीं, बल्कि अवैधसंबंधों की वजह से हुई है. क्योंकि मृतक को जिस तरह बेरहमी से मारा गया था, इस तरह लोग अवैध संबंधों में ही नफरत में मारे जाते हैं. इसी बात को ध्यान में रख कर जांच आगे बढ़ाई गई तो जल्दी ही नतीजा निकलता नजर आया.

किसी मुखबिर ने बताया कि पिछले कई सालों से सुरेश सिंह की अपनी पत्नी से पटती नहीं थी. दोनों में अकसर लड़ाईझगड़ा होता रहता था और इस की वजह सुरेश सिंह का सगा भतीजा राहुल चौधरी था. क्योंकि उस के अपनी चाची राधिका से अवैध संबंध थे. घटना से सप्ताह भर पहले भी इसी बात को ले कर सुरेश और राधिका के बीच काफी झगड़ा हुआ था. तब सुरेश ने पत्नी की पिटाई कर दी थी, जिस से नाराज हो कर वह बच्चे को ले कर मायके चली गई थी. रामबेलास यादव को हत्या की वजह का पता चल गया था. राहुल से पूछताछ करने के लिए वह उस के घर पहुंचा तो उस के पिता दिनेश सिंह ने बताया कि वह तो लखनऊ में है.

लखनऊ में राहुल गोमतीनगर में किराए का कमरा ले कर रहता है और सरकारी नौकरी के लिए तैयारी कर रहा है. पिता का कहना था कि हत्या वाले दिन के एक दिन पहले वह लखनऊ चला गया था. जबकि मुखबिर ने उन्हें बताया था कि घटना वाले दिन सुबह वह चिलुआताल में दिखाई दिया था. पिता का कहना था कि घटना से एक दिन पहले यानी 16 अक्तूबर, 2016 को राहुल लखनऊ चला गया था, जबकि मुखबिर का कहना था कि घटना वाले दिन वह चिलुआताल में दिखाई दिया था. मुखबिर की बात पर विश्वास कर के रामबेलास यादव ने राहुल को लखनऊ से लाने के लिए 2 सिपाहियों को भेज दिया.

लखनऊ पुलिस की मदद से गोरखपुर पुलिस 22 अक्तूबर, 2016 को लखनऊ के गोमतीनगर से राहुल चौधरी को गिरफ्तार कर गोरखपुर ले आई. थाने ला कर उस से सुरेश सिंह की हत्या के बारे में पूछताछ की गई तो उस ने बिना किसी हीलाहवाली के चाची से अवैध संबंधों की वजह से चाचा सुरेश सिंह की हत्या का अपना अपराध स्वीकार कर लिया. राहुल ने चाची के प्रेम में पड़ कर चाचा की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी—

उत्तर प्रदेश के जिला गोरखपुर के थाना चिलुआताल में सुरेश सिंह पत्नी राधिका सिंह और 6 साल के बेटे के साथ रहता था. उस का बड़ा भाई था दिनेश सिंह. राहुल उसी का बेटा था. दोनों भाइयों के परिवार भले ही अलगअलग रहते थे, लेकिन रहते एक ही मकान में थे. सुखदुख में भी एकदूसरे की मदद भी करते थे. गांव वाले भाइयों के इस प्रेम को देख मन ही मन जलते थे. सुरेश सिंह चेन्नई में किसी प्राइवेट कंपनी में नौकरी करता था. लेकिन पत्नी राधिका बेटे के साथ गांव में रहती थी. वह साल में एक या 2 बार ही घर आता था. उस के न रहने पर जरूरत पड़ने पर घर के छोटेमोटे काम उस के बड़े भाई का बेटा राहुल कर दिया करता था.

राहुल और राधिका थे तो चाचीभतीजा, लेकिन हमउम्र होने की वजह से दोनों दोस्तों की तरह रहते थे, बातचीत भी वे दोस्तों की ही तरह करते थे. इस का नतीजा यह निकला कि धीरेधीरे उन के बीच मधुर संबंध बन गए. उन के मन में एकदूसरे के लिए चाहत के फूल खिले तो एकदूसरे के स्पर्श मात्र से उन का रोमरोम खिल उठने लगा. राहुल चाची राधिका से जुनून के हद तक प्यार करने लगा तो राधिका ने भी उस के प्यार पर अपने समर्पण की मोहर लगा दी. एक बार मर्यादा टूटी तो उन्हें जब भी मौका मिलता, जिस्म की भूख मिटाने लगे. दोनों ने अपने इस अनैतिक रिश्ते पर परदा डालने की कोशिश तो बहुत की, लेकिन पाप के इस रिश्ते को वे छिपा नहीं सके.

लोग राधिका और राहुल को ले कर तरहतरह की चर्चाएं भी करने लगे, पर उन्होंने इस बात पर ध्यान नहीं दिया. जब सुरेश सिंह के किसी शुभचिंतक ने उसे फोन कर के चाचीभतीजे के बीच पक रही खिचड़ी की जानकारी दी तो वह नौकरी छोड़ कर गांव आ गया. यह सन 2014 की बात है. सुरेश ने खूब पैसे कमाए थे. उन्हीं पैसों से उस ने गांव में रह कर प्रौपर्टी का काम शुरू कर दिया, जो थोड़ी मेहनत के बाद अच्छा चल निकला. कामधंधे की वजह से अकसर उसे दिन भर घर से बाहर रहना पड़ता था, इसलिए राहुल और राधिका को मिलने में कोई परेशानी नहीं होती थी. लेकिन एक दिन अचानक वह दोपहर में घर आ गया तो उस ने दोनों को आपत्तिजनक स्थिति में पकड़ लिया.

फिर क्या था, सुरेश ने न पत्नी को छोड़ा और न भतीजे को. उस ने इस बात को ले कर भाई से बात की तो बेटे की हरकत से वह काफी शर्मिंदा हुए. समाज और रिश्तों की दुहाई दे कर उन्होंने बेटे को घर से निकाल दिया तो वह लखनऊ आ गया और गोमतीनगर में किराए पर कमरा ले कर रहने लगा. यहां वह सरकारी नौकरी की परीक्षाओं की तैयारी कर रहा था. सुरेश की वजह से गांव में राहुल और उस की चाची की काफी बदनामी हुई थी. यही नहीं, उसे घर से भी निकाल दिया गया था. राधिका की खूब थूथू हुई थी. गांव से ले कर नातेरिश्तेदारों तक ने उस की खूब फजीहत की थी.

धीरेधीरे बात थमती गई. मांबाप से मांफी मांग कर राहुल फिर घर लौट आया. मांबाप ने उसे माफ जरूर कर दिया था, लेकिन उस पर कड़ी नजर रखी जा रही थी. राधिका से उसे मिलने की सख्त मनाही थी. जबकि वह चाची से मिलने के लिए तड़प रहा था. लेकिन सख्त पहरेदारी की वजह से दोनों का मिलन संभव नहीं हो पा रहा था. चाचा सुरेश की वजह से राहुल प्रेमिका चाची से मिल नहीं पा रहा था. उसे लग रहा था कि जब तक चाचा रहेगा, वह चाची से कभी मिल नहीं पाएगा. चाचा प्यार की राह का कांटा लगा तो वह उसे हटाने के बारे में सोचने लगा. आखिर उस ने उसे हटाने का निश्चय कर लिया.

अब वह ऐसी राह खोजने लगा, जिस पर चल कर उस का काम भी हो जाए और वह फंसे भी न. काफी सोचविचार कर उस ने तय किया कि वह अपना मोबाइल फोन औन कर के बाइब्रेशन पर लखनऊ वाले कमरे पर ही छोड़ देगा और रात में गोरखपुर पहुंच कर चाचा की हत्या कर के लखनऊ अपने कमरे पर आ जाएगा. पुलिस उस पर शक करेगी तो मोबाइल लोकेशन के सहारे वह बच जाएगा. तब वह शायद यह भूल गया था कि कातिल कितना भी चालाक क्यों न हो, कानून के लंबे हाथों से उस का बचना आसान नहीं है.

राहुल जब से घर आ कर रहने लगा था, सुरेश और उस की पत्नी राधिका के बीच उसे ले कर अकसर झगड़ा होता रहता था. जबकि इस बीच राहुल एक बार भी चाची से नहीं मिला था. रोजरोज के झगड़े से परेशान हो कर राधिका नाराज हो कर बेटे को ले कर मायके चली गई थी. राधिका के चली जाने से राहुल काफी दुखी था. उस का मन घर में नहीं लगा तो 16 अक्तूबर को मांबाप से कह कर वह लखनऊ चला गया. चाची से न मिल पाने की वजह से राहुल तड़प रहा था. तड़प की वेदना से आहत हो कर उस ने योजना को अमलीजामा पहना दिया. योजना के अनुसार 17 अक्तूबर की शाम 4 बजे इंटरसिटी ट्रेन से वह गोरखपुर के लिए चल पड़ा. रात 11 बजे के करीब वह गोरखुपर पहुंचा. स्टेशन से टैंपो ले कर वह चिलुआताल के बरगदवां चौराहे पर पहुंचा और वहां से पैदल ही घर पहुंच गया.

उसे घर तो जाना नहीं था, इसलिए सब से पहले उस ने पिता के कमरे के दरवाजे की सिटकनी बाहर से बंद कर दी, ताकि शोर होने पर वह बाहर न निकल सकें. इस के बाद पीछे की दीवार के सहारे वह सुरेश सिंह के कमरे में पहुंचा, जहां वह गहरी नींद सो रहा था. उसे देखते ही नफरत से राहुल का खून खौल उठा. उसे पता था कि चाचा के घर में लोहे की रौड कहां रखी है. उस ने लोहे की रौड उठाई और पूरी ताकत से सुरेश के सिर पर 3 वार कर के उसे मौत के घाट उतर दिया.

राहुल को विश्वास हो गया कि सुरेश की मौत हो चुकी है तो उस ने घर में रखा बोरा उठाया और उसी में उस की लाश भर कर रात के 4 बजे के करीब बाहर झांक कर देखा कि कोई देख तो नहीं रहा. जब उसे लगा कि कोई नहीं देख रहा है तो उस ने सुरेश की ही साइकिल घर उस की लाश वाले बोरे को कैरियर पर रख कर जंगल की ओर चल पड़ा. लेकिन जब वह झील की ओर जा रहा था, तभी एक ट्रैक्टर आता दिखाई दिया. उसे देख कर वह घबरा गया और साइकिल को एक पेड़ से टिका कर भागा. ट्रैक्टर पर बैठे एक मजदूर ने उसे भागते देख लिया तो उस ने उस का नाम ले कर पुकारा भी, लेकिन रुकने के बजाए राहुल बरगदवां चौराहे की ओर भाग गया.

वहां से उस ने टैंपो पकड़ी और गोरखपुर रेलवे स्टेशन पहुंचा, जहां से ट्रेन पकड़ कर लखनऊ स्थित अपने कमरे पर चला गया. उस ने चालाकी तो बहुत दिखाई, लेकिन वह काम न आई और पकड़ा गया. राहुल चौधरी की निशानदेही पर पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त लोहे की रौड बरामद कर ली थी. पूछताछ के बाद राहुल को अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. राधिका के पति की हत्या की खबर पा कर ससुराल आ गई थी. राहुल ने जो किया था, उस से उसे काफी दुख पहुंचा. क्योंकि उस ने राहुल से कभी नहीं कहा था कि वह उस के पति की हत्या कर उसे विधवा बना दे.

राहुल के मांबाप भी काफी दुखी हैं. उन्होंने राहुल से अपना नाता तोड़ कर उसे उस के हाल पर छोड़ दिया है. Gorakhpur Crime

कथा में राधिका सिंह बदला नाम है. कथा पुलिस सूत्रों एवं राहुल के बयानों पर आधारित

MP Crime: वासना की भूख ने जूली को कातिल बना दिया

MP Crime: वह सैक्स की आग में कई सालों से झुलस रही थी. उस का पति पिछले 2 सालों से दोहरे हत्याकांड के आरोप में जेल में बंद था. पति की गैरहाजिरी में उसे जिस्मानी सुख नहीं मिल पा रहा था. आखिर में उस ने एक रास्ता निकाल ही लिया. वह दोहरी जिंदगी जीने लगी. दिन के उजाले में वह घर वालों के सामने घूंघट ओढ़े आदर्श बहू की तरह रहती और जैसे ही रात का अंधेरा घिरता, वह आदर्श बहू का चोला उतार कर ऐयाशी में रम जाती. यह सिलसिला पिछले एक साल से चल रहा था. बहू की इस दोहरी जिंदगी का राज एक दिन घर वालों के सामने उजागर हो गया. एक रात दादी सास सुशीला राजावत ने बहू को किसी पराए मर्द के साथ सैक्स संबंध बनाते देख लिया. इस के बाद से दादी सास उस पर कड़ी नजर रखने लगीं.

इस से खफा उस औरत ने रची एक खौफनाक साजिश, जो दिल दहला देने वाली थी. यह मामला मध्य प्रदेश के ग्वालियर जिले के हजारी इलाके के बिरला मंदिर का है. जूली अपनी दादी सास सुशीला राजावत और अपने 6 साल के बेटे के साथ रहती थी. पुलिस अधीक्षक हरिनारायणचारी मिश्र के मुताबिक, पिछले 3 साल से जूली का पति शिवा राजावत दोहरे हत्याकांड के आरोप में अपने पिता और छोटे भाई के साथ जेल में बंद है. पति के जेल चले जाने के बाद से जूली अकेली हो गई. पति के बिना उस का मन नहीं लगता था. वह अकसर अपनी दादी सास के सामने रोती रहती थी.

शिवा राजावत के कुछ करीबी दोस्त थे, जो जेल से उस की खबर ले कर उस के घर पर आते रहते थे. इसी दौरान जूली उन में से एक दोस्त की ओर आकर्षित हो गई. जल्दी ही दोनों नजदीक आ गए और चोरीछिपे मिलने लगे. जूली काफी समय से सैक्स की भूखी थी. अपनी भूख मिटाने के लिए वह प्रेमी को रात के समय अपने कमरे पर बुलाने लगी. वह शख्स रात में उस के पास आता और सुबह होने से पहले ही वहां से निकल जाता. रात के अंधेरे में चलने वाले ऐयाशी के इस खेल के बारे में किसी को पता नहीं था.

एक रात दादी सास सुशीला राजावत ने जूली को पराए मर्द के साथ मस्ती करते देख लिया. उस रात जूली कुछ ज्यादा ही उतावली थी. इस चक्कर में कमरे का दरवाजा बंद करना भूल गई. रात के समय दादी सास सुशीला राजावत की नींद खुल गई. उन्हें बहू के कमरे से सिसकारियों की आवाज सुनाई दी. उन के कान खड़े हो गए. वे दबे कदमों से कमरे के पास पहुंचीं. अंदर का नजारा देख कर उन के होश उड़ गए. जूली अपने यार के साथ सैक्स में इतनी खोई हुई थी कि उसे कमरे में किसी के आने का एहसास तक न हुआ. दादी सास ने उसी वक्त दोनों को काफी खरीखोटी सुनाई.

वह शख्स बिना कुछ बोले सिर नीचे कर के वहां से भाग गया, लेकिन उस दिन से जूली घर में कैद हो कर रह गई. दादी सास उस पर कड़ी निगाह रखने लगीं. उसे बाहर के किसी शख्स से बात करने, घर के बाहर कहीं जाने, यहां तक कि मोबाइल फोन से बात करने पर भी रोक लगा दी. जूली अपने प्रेमी से मिलने के लिए तड़पने लगी. उस ने सास की नजरों से बच कर घर से बाहर निकलने की कोशिश की, पर कामयाबी नहीं मिली. नतीजा यह हुआ कि वह गुस्से से बौखला गई. उस ने सास को ही खत्म करने का खतरनाक प्लान बना लिया.

5 अगस्त की सुबह 8 बजे अपने बेटे को स्कूल भेजने के बाद जूली ने इस खौफनाक वारदात को अंजाम दिया. जूली ने चाय में ढेर सारी नींद की गोलियां मिला कर अपनी दादी सास सुशीला को पिला दी. चाय पीने के कुछ समय बाद ही सुशीला राजावत को नींद आने लगी. वे अपने कमरे में जा कर सो गईं. मौका पा कर जूली ने तौलिया से गला दबा कर उन की हत्या कर दी. सास की हत्या के बाद उस ने कमरे का सारा सामान इस तरह से बिखेर दिया, ताकि मामला लूटपाट का लगे. तकरीबन 12 बजे जूली ‘मैं लुट गई… बरबाद हो गई’ चिल्लाने लगी. आवाज सुन कर आसपास के लोग जमा हो गए. पुलिस भी वहां पहुंच गई.

जूली ने पुलिस को बताया, ‘‘3 लोग उस के पति शिवा के दोस्त बता कर घर में घुसे. तीनों अंदर कमरे में कुरसी पर बैठ कर सास से बातें करने लगे. मैं उन के लिए अंदर रसोई में चाय बनाने चली गई.

‘‘थोड़ी देर में 2 लोग रसोई में आ गए. उन्होंने मुझे पीछे से पकड़ लिया. एक ने मेरे सिर पर पिस्टल अड़ा दिया. दूसरे ने मेरा पेटीकोट उठा कर रेप करने की कोशिश की.

‘‘वह कुछ करने में कामयाब होता, उस बीच किसी ने दरवाजे पर आवाज दी. आवाज सुन कर तीनों भाग निकले. जाने से पहले वे अलमारी में रखा सोना लूट कर ले गए और उन्होंने सास की हत्या भी कर दी.’’

जूली ने पुलिस को जो कहानी सुनाई थी, पुलिस द्वारा अंदर तहकीकात करने पर झूठी निकली, जिस की वजह से जूली शक के घेरे में आ गई.

जूली ने तीनों लुटेरों को सामने कमरे में रखी कुरसियों पर बैठ कर सास से बातें करने की बात कही थी, जबकि कमरे में कुरसियां एक के ऊपर एक रखी थीं. दूसरी बात, जूली ने हत्यारे द्वारा उस का दुपट्टा ले जाने की बात कही थी, पर वह दुपट्टा अंदर कमरे में लाश के पास मिला. तीसरी बात, जो सोना लुटेरों द्वारा लूट कर ले जाने की बात की थी, जांच में पता चला कि वह सोना बैंक में गिरवी रखा हुआ है. उस पर लोन लिया गया था. इस के अलावा जूली अपना बयान बारबार बदल रही थी. पुलिस द्वारा कड़ाई से पूछताछ करने पर जूली ने दादी सास की हत्या करने की बात कबूल ली और सारी असलियत बयान कर दी.

जूली ने पुलिस को बताया कि वह पिछले 5 महीने से अपनी दादी सास की हत्या की साजिश रचने में लगी थी. उस ने टैलीविजन सीरियल देख कर हत्या करने व उस से बचने की प्लानिंग बनाई थी. उस ने सीरियल के द्वारा छोटेबड़े अपराध के बारे में जानकारी हासिल की थी. पहले उस ने बदमाशों द्वारा रेप किए जाने की कहानी पुलिस के सामने सुनाने की सोची थी, लेकिन रेप के मामले में मैडिकल एंगल को देखते हुए उस ने पिस्टल अड़ा कर रेप करने की कोशिश, लूट और हत्या की कहानी सुनाई.

जूली को यकीन था कि उस के द्वारा बताई गई सारी बातें पुलिस मान लेगी और वह साफतौर पर बच जाएगी, पर ऐसा हुआ नहीं. पुलिस ने तहकीकात कर उस की सारी पोल खोल कर रख दी. जूली ने बताया कि उसे अपनी दादी सास की हत्या करने का कोई मलाल नहीं है, क्योंकि वे उसे प्रेमी से मिलने नहीं दे रही थीं. सैक्स के माहिर डाक्टरों का कहना है कि इनसान के लिए सैक्स की भूख जिस्मानी जरूरत है. इस पर रोक लगाने पर औरत हो या मर्द, हत्या करने जैसा खौफनाक कदम उठा सकते हैं. MP Crime

UP Crime News: कातिल सहेलियां

UP Crime News: प्रियंका और अंजू दोनों ही बाचाल किस्म की लड़कियां थीं. उन्होंने जो किया था, उस के लिए उन्हें उम्रकैद की सजा मिली. अगर घर वालों की बात मान कर वक्त रहते दोनों सुधर गई होतीं तो उन का यह अंजाम  न होता. 2 सहेलियां  की कू्ररता का दिल दहला देने वाला कारनामा…

उत्तर प्रदेश के जनपद मेरठ के कचहरी परिसर स्थित जिला न्यायाधीश रामकिशन गौतम की अदालत के बाहर सुबह से ही भारी भीड़ लगनी शुरू हो गई थी. भीड़ में अधिवक्ताओं और आम लोगों के अलावा प्रिंट व इलैक्ट्रौनिक मीडियाकर्मी भी शामिल थे. भीड़ को काबू करने के लिए बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात किया गया था. दरअसल, न्यायाधीश गौतम की अदालत में उस दिन दोस्ती और दौलत की खातिर रिश्तों के कत्ल के लिए एक बहुचर्चित हत्याकांड की गुनाहगार 2 सहेलियों को सजा सुनाई जानी थी. ये 2 सहेलियां थीं कुमारी प्रियंका और उस की सहेली कुमारी अंजू. इंजीनियर पिता की बेटी प्रियंका ने फैशन डिजाइनिंग का कोर्स किया था.

वह मेरठ की मिस ब्यूटी क्वीन भी रह चुकी थी, जबकि अंजू एनसीसी ग्रुप की कमांडो रही थी और उस ने  भी इंटीरियर डिजाइनिंग का कोर्स कर रखा था. साधन संपन्न, रसूखदार और शिक्षित परिवार की खूबसूरत प्रियंका ऐसी बेरहम लड़की थी, जिस ने उच्च शिक्षित होते हुए भी सहेली से ताजिंदगी अपने रिश्तों को बनाए रखने की चाहत में अपने मातापिता के प्यार को भुला दिया था. प्रियंका न केवल साजिश की सरताज बनी, बल्कि उस ने अपने मातापिता को ही मौत की नींद सुला दिया था. इस बहुचर्चित हत्याकांड ने कानून-व्यवस्था की स्थिति व समाज को हिला कर रख दिया था.

हत्या के बाद किसी सफल अदाकारा की तरह नाटक कर के उस ने लोगों की सहानुभूति भी बटोरी. पुलिस जांचपड़ताल के दौरान साजिश की चादर में छेद नजर आने लगे तो दोनों सहेलियां बेनकाब हो गईं. अदालत में 6 साल 3 महीने में 16 गवाहों की गवाही और सबूतों के बाद आखिर 28 मई, 2015 को इस केस के फैसले का दिन आ ही गया. इस केस की बुनियाद 285 पेजों की इबारत पर टिकी थी. गहमागहमी के बीच प्रियंका और अंजू अपने अधिवक्ता के साथ अदालत में दाखिल हुईं. मीडिया से बचने के लिए दोनों ने अपने चेहरों पर रूमाल बांध रखे थे. सरकारी अधिवक्ता अनिल तोमर पहले की कई तारीखों पर जोरदार बहस कर के दोनों को सख्त सजा दिए जाने की मांग कर चुके थे.

प्रियंका व अंजू को कटघरे में खड़ा कर दिया गया था. मुकदमें की सुनवाई पहले ही पूरी हो चुकी थी. लिहाजा अदालत ने फैसले के लिए 28 तारीख मुकर्रर की थी. न्यायाधीश रामकिशन गौतम अपनी सीट पर आ कर बैठे तो अदालत में खामोशी छा गई. काररवाही शुरू हुई तो बचाव पक्ष के अधिवक्ता ने एक बार फिर अदालत से आखिरी बार गुहार लगाई, ‘‘जज साहब, इन लड़कियों के सामने पूरी जिंदगी पड़ी हैं, आप इन्हें कम से कम सजा दें. इन्हें मौका मिलेगा तो ये अपनी गलती को सुधार लेंगी.’’

इस पर अभियोजन पक्ष के अधिवक्ता अनिल तोमर ने दो टूक कहा, ‘‘सर, कानून सभी के लिए बराबर है, इन लड़कियों ने जघन्य अपराध किया है. लिहाजा इन्हें सख्त से सख्त सजा दी जाए.’’

दोनों पक्षों की बातें सुनने के बाद न्यायाधीश ने प्रियंका और अंजू की ओर देख कर पूछा, ‘‘तुम्हें कुछ कहना है?’’ उन्होंने मासूमियत से जवाब दिया, ‘‘हमें फंसाया जा रहा है जज साहब, हम ने ऐसा कुछ नहीं किया.’’

इस के बाद अदालत में खामोशी छा गई. न्यायाधीश रामकिशन गौतम ने एक नजर दोनों लड़कियों की ओर देखा और फिर लिखित फैसले को पढ़ने लगे, ‘‘प्रियंका और अंजू, दोनों का गुनाह निहायत ही संगीन रहा है. परिस्थितिजन्य साक्ष्यों और गवाहों की गवाही के अलावा दोनों के खिलाफ तमाम सबूत हैं. इन सबूतों और गवाहियों की रोशनी में यह अदालत दोनों मुजरिमों को उम्रकैद की सजा सुनाती है.’’

अदालत के सजा सुनाते ही पुलिसकर्मियों ने दोनों लड़कियों को घेर लिया. तब तक दोनों के चेहरे गमजदा हो चुके थे. दोनों को अदालत से बाहर लाया गया तो मीडियाकर्मियों के सामने दोनों ने खामोशी की चादर ओढ़ ली. पुलिस उन्हें जिला कारागार ले गई. उन्हें मिली उम्रकैद की सजा पर किसी को अफसोस नहीं था. दरअसल, 11 नवंबर, 2008 की सुबह मैडिकल थानाक्षेत्र की पौश कालोनी प्रेम प्रयाग में रहने वाली मंजू सुबह टहलने के लिए निकली तो कोठी नंबर-48 पर ताला लटका देख कर चौंक गईं. कोठी में उन की सगी बहन संतोष अपने पति सेवानिवृत्त इंजीनियर प्रेमवीर सिंह के साथ रहती थीं. मंजू भी पड़ोस में ही रहती थीं. मन में ढेरों सवाल लिए वह अपने घर पहुंचीं और यह बात पति पदम सिंह को बताई.

उन्होंने प्रेमवीर का मोबाइल फोन नंबर मिलाया तो वह स्विच्ड औफ मिला. चिंता की बात यह थी कि प्रेमवीर और संतोष पिछली शाम तक कोठी में ही थे. प्रेमवीर मूलरूप से अलीगढ़ जनपद की तहसील इग्लास के गांव रजाबल के रहने वाले  थे. करीब 10 साल पहले उन्होंने मेरठ में अपनी कोठी बनाई थी. प्रेमवीर पावर कारपोरेशन में जूनियर इंजीनियर रह चुके थे. सेवानिवृत्त होने के बाद वह घर में ही रहते थे. उन के परिवार में पत्नी संतोष सिंह के अलावा बड़ी बेटी सोनिया, उस से छोटा बेटा गौरव और सब से छोटी और खूबसूरत बेटी थी प्रियंका उर्फ गुडि़या.

प्रेमवीर सुलझे हुए मिलनसार और व्यवहारकुशल व्यक्ति थे. बड़ी बेटी का वह एक सैन्य अधिकारी के साथ विवाह कर चुके थे. उस का पति भूटान बौर्डर पर तैनात था. बला की खूबसूरत प्रियंका सन 2005 में मिस मेरठ रह चुकी थी. शोख व चंचल प्रियंका ने ग्रेजुएट किया था और अब दिल्ली के वीमन पालीटैक्निकल कालेज, लाजपतनगर से इंटीरियर डिजाइनिंग का कोर्स कर रही थी. वह वहीं हौस्टल में रहती थी. जबकि प्रेमवीर का बेटा गौरव हैदराबाद की एक निजी कंपनी में इंजीनियर था. अनहोनी की आशंका ने सताया तो पदम सिंह कुछ लोगों के साथ प्रेमवीर की कोठी पर जा पहुंचे. उस वक्त अंदर से एफएम पर गाने चलने की आवाज आ रही थी. यह बात सब को थोड़ी अजीब लगी.

घर में विदेशी नस्ल का एक कुत्ता था, वह भी दिखाई नहीं दे रहा था. संतोष या उन के पति को कहीं जाना होता था तो आदतन मंजू के घर बता कर और चाबी दे कर जाते थे. संदेह हुआ तो उन लोगों ने इस की सूचना मैडिकल थाना पुलिस को दे दी. सूचना मिलते ही मैडिकल थानाप्रभारी आर.वी. कौल अपनी टीम के साथ मौके पर आ गए. पुलिस ताला तोड़ कर कोठी के अंदर गई. अंदर कमरों में भी ताले लगे हुए थे. खिड़की का परदा हटा कर अंदर झांका गया तो सभी सन्न रह गए. बैडरूम में प्रेमवीर और संतोष की लाशें पड़ी थीं. पुलिस ने किचन का ताला तोड़ कर घर में प्रवेश किया. प्रेमवीर की लाश नीचे पड़ी थी और संतोष की लाश डबलबैड पर थी.

प्रेमवीर सिंह के सिर पर किसी भारी चीज  से प्रहार किया गया था, जबकि संतोष के चेहरे व गले पर अंगुलियों के निशान थे. दोनों के मुंह में कपड़ा ठूंसा हुआ था. डबलबैड पर खून के निशान थे. घटनास्थल को देख कर लगता था कि प्रेमवीर ने मृत्युपूर्व हत्यारों से संघर्ष किया था. उन के हाथ व अन्य स्थानों पर चोट के निशान थे. ताज्जुब की बात यह थी कि विदेशी नस्ल का बुलडौग भी कोठी में चेन से बंधा हुआ था. घर का सारा सामान अस्तव्यस्त था.

पुलिस ने घटनास्थल की बारीकी से जांचपड़ताल की तो बैडरूम में लगे लैंडलाइन फोन का वायर निकला हुआ मिला. रिसीवर पर भी खून के धब्बे लगे थे. कालर आईडी फोन डिस्प्ले स्क्रीन पर 100 नंबर की डायलिंग दिख रही थी. इस का मतलब प्रेमवीर ने पुलिस कंट्रोल रूम को सूचना देने का प्रयास किया था. मृतकों के रिश्तेदारों ने घर का मुआयना कर के बताया कि हत्यारे घर में रखे करीब 50 हजार रुपए नकद, लाखों के आभूषण, लगभग 5 लाख के फिक्स डिपाजिट, मोबाइल फोन व कोठी की वसीयत के कागजात ले गए थे. संतोष के कान और गले की ज्वैलरी भी लापता थी.

पुलिस ने लाशों को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया और मृतक के साढू पदम सिंह की तहरीर के आधार पर अज्ञात बदमाशों के खिलाफ हत्या व लूट का मुकदमा दर्ज कर लिया. एसएसपी रघुवीरलाल ने थाना मैडिकल पुलिस की टीम के अलावा एसओजी टीम को भी इस मामले के खुलासे में लगा दिया. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में पता लगा कि प्रेमवीर और संतोष की मौत दम घुटने से हुई थी. प्रेमवीर के शरीर पर चोटों के 11, जबकि संतोष के शरीर पर 3 निशान पाए गए.

अगले दिन पुलिस ने परिवार के सभी सदस्यों से एकएक कर के पूछताछ का मन बनाया तो यह देख कर आश्चर्य हुआ कि मृत दंपति के सभी नातेरिश्तेदार तो आ गए थे, लेकिन उन की छोटी बेटी प्रियंका नहीं आई थी. पुलिस ने इस की जड़ में जाने का प्रयास किया तो चौंकाने वाली जानकारी हाथ लगी. पुलिस को पता चला कि प्रियंका का अपने परिवार से मनमुटाव चल रहा था. यह भी जानकारी मिली कि उस की एक सहेली अंजू उस की हमराज है. पुलिस जब इस मनमुटाव की जड़ में पहुंची तो पता चला कि अंजू के कहने पर प्रियंका ने अंजू के भाई से प्रेम विवाह कर लिया था.

इस मामले में प्रियंका के घर वालों ने अपहरण का मुकदमा भी दर्ज कराया था, लेकिन प्रियंका ने चूंकि अपनी तथाकथित ससुराल के पक्ष में बयान दिए थे, इसलिए मामला कमजोर पड़ गया था. यह अप्रैल, 2008 की बात थी. इस के बाद प्रियंका का परिवार उस से नफरत करने लगा था. पुलिस ने प्रियंका के मोबाइल पर संपर्क करने का प्रयास किया, लेकिन वह औफ जाता रहा. इस से पुलिस को लगने लगा कि इस हत्याकांड के तार प्रियंका से जुड़े हो सकते हैं. फलस्वरूप शक की सुई उसी पर जा कर ठहर गई. देखतेदेखते 4 दिन बीत गए. मांबाप की हत्या के बाद प्रियंका ने अपने किसी रिश्तेदार तक से संपर्क नहीं किया था. यह पता चलने पर पुलिस को पूरा विश्वास होने लगा कि प्रियंका हत्यारों के साथ थी.

हत्यारों के साथ प्रियंका के होने की बात उस घरेलू कुत्ते की वजह से भी लग रही थी, जिस पर कोई घर वाला ही काबू कर सकता था. दरअसल रात के वक्त कुत्ता खुला रहता था. घटना के दिन भी वह खुला था और उस के होते हुए किसी बाहरी व्यक्ति का घर में घुस पाना आसान नहीं था. खतरनाक बुलडौग भला किसी ऐसे शख्स को कैसे बख्श सकता था, जो उस के मालिक की हत्या कर रहा हो? एसएसपी रघुवीरलाल ने एसओजी के सबइंसपेक्टर राकेश के नेतृत्व में एक पुलिसटीम को दिल्ली भेजा, लेकिन वह दिल्ली में नहीं मिली.

इस पर पुलिस ने प्रियंका के फोन नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई. उस की काल डिटेल्स और लोकेशन देख कर पुलिस अधिकारी चौंके. पता चला कि वह अपनी मां के संपर्क में थी. प्रियंका द्वारा खुद किए गए प्रेम विवाह के बाद घर वालों ने एक तरह से उस का बायकाट कर दिया था. लेकिन काल डिटेल्स के आधार पर पता चला कि वह बराबर अपनी मां के संपर्क में रहती थी. घटना वाली रात भी हत्या के समय उस की संतोष से बात हुई थी. प्रियंका की लोकेशन भी उस रात उसी क्षेत्र में पाई गई थी, जबकि घटना की रात और उस से पहले प्रियंका की लोकेशन मेरठ के ही टीपीनगर क्षेत्र के दशमेशनगर में मिली थी. घटना के बाद उस का मोबाइल लगातार औफ था. इस से यह स्पष्ट हो गया कि हो न हो प्रियंका मेरठ में ही शरण लिए हुए हो.

पुलिस ने उस की तलाश शुरू की. आखिर पुलिस को 17 नवंबर को कामयाबी मिल गई. प्रियंका अपनी सहेली अंजू के साथ एक छोटे से कमरे में किराए पर रह रही थी. कमरे की तलाशी के दौरान पुलिस को उन के पास से लूट के 50 हजार रुपए, लाखों की एफडी, लौकर की चाबियां और लाखों के आभूषण भी मिल गए. इस से यह प्रमाणित हो गया कि हत्याओं में उन्हीं दोनों सहेलियों का हाथ था. पुलिस दोनों को गिरफ्तार कर के थाने ले आई. अधिकारियों ने दोनों से पूछताछ की तो ऐसी चौंकाने वाली कहानी पता चली, जिसे सुन कर पुलिस अधिकारी भी दंग रह गए.

प्रेमवीर सिंह के परिवार को देख कर हर कोई कहता था कि यह एक सुखी परिवार है. हर पिता की तरह प्र्रेमवीर सिंह का भी सपना था कि उन के बच्चे बुलंदियों को छुएं. हंसमुख स्वभाव की प्रियंका शुरू से ही महत्वकांक्षी लड़की थी. वह बीए कर रही थी. कुछ साल पहले प्रेमवीर सिंह सेवानिवृत्त हो गए थे. इस बीच गौरव की नौकरी हैदराबाद में लग गई तो वह वहां चला गया. वह बीचबीच में घर आता रहता था. प्रियंका फैशन की दुनिया में नाम कमाना चाहती थी. वह छोटीमोटी प्रतियोगिताओं में भाग लेती रहती थी. इस के लिए प्रेमवीर या उन की पत्नी ने उसे कभी नहीं रोका.

सन 2002 में प्रियंका ने फैशन डिजाइनिंग से डिप्लोमा किया. सन 2005 में प्रियंका को एक प्रतियोगिता में मिस मेरठ चुना गया. इस समारोह में बतौर मुख्य अतिथि मेरठ की तत्कालीन एसएसपी अंजू गुप्ता ने उसे मिस मेरठ का ताज पहनाया. प्रियंका का जीवन खुशियों से भरा हुआ था. मिस मेरठ बनने के बाद उस का जिंदगी जीने का अंदाज ही बदल गया. उस के कई दोस्त भी बन गए थे. बदलते वक्त के साथ इंसान की सोच और अचारविचार भी बदलते हैं. प्रियंका के साथ भी ऐसा ही हुआ. वह अपनी सहेलियों और दोस्तों के साथ समय बिताने लगी. इस से प्रियंका की उड़ान बेकाबू होती गई. वह स्टाइलिश जिंदगी जीने लगी और उस का ज्यादातर समय दोस्तों के साथ घूमने में बीतने लगा.

प्रियंका का यह रंगढंग पिता प्रेमवीर और भाई गौरव को पसंद नहीं आया. इस के लिए गौरव ने उसे डांटाफटकारा भी. इसी बीच घर वालों ने यह सोच कर उस का दाखिला दिल्ली के पौलिटैक्निक कालेज में इंटीरियर डिजाइनिंग कोर्स के लिए करा दिया कि दोस्तों से उस का पीछा छूट जाएगा. 24 वर्षीया प्रियंका हौस्टल में रह कर पढ़ाई करने लगी. यहीं उस की मुलाकात उस की हमउम्र अंजू से हुई. अंजू उर्फ ज्योति मूलरूप से जिला अमरोहा के गांव शहबाजपुर निवासी संतराम की बेटी थी. जब अंजू छोटी थी, तभी संतराम की मौत हो गई थी. उस के चाचा धर्मपाल ने उस की मां से विवाह कर लिया था. बाद में धर्मपाल का एक बेटा हुआ अजेंद्र.

अंजू बचपन से ही तेजतर्रार थी. पढ़ाई के दौरान ही उस ने एनसीसी में कमांडों की ट्रेनिंग ली थी. बेस्ट कमांडों होने की वजह से उस का सिलेक्शन गणतंत्र दिवस पर दिल्ली में होने वाली परेड में भी हुआ था. बाद में उस के घर वालों ने फैशन डिजाइनिंग का कोर्स करने के लिए उस का दाखिला दिल्ली के पौलिटैक्निक कालेज में करा दिया था. यहीं  वह प्रियंका से मिली थी. वक्त के साथ प्रियंका और अंजू में ऐसा भावनात्मक लगाव पैदा हुआ कि दोनां एकदूसरे की पूरक बन गईं. इसी के चलते दोनों एक ही कमरे में रहने लगीं. अपनी दोस्ती की बात दोनों ने अपनेअपने घर वालों को भी बता दी थी.

अंजू का भाई अजेंद्र उस के पास दिल्ली आता रहता था. इसी दौरान उस की मुलाकात प्रियंका से हुई. प्रियंका बोल्ड किस्म की लड़की थी. अजेंद्र गांव का सीधासादा देहाती युवक था और प्रियंका हाईप्रोफाइल जमाने के साथ कदम मिला कर चलने वाली लड़की. एक बार अंजू अपने गांव गई तो साथ में प्रियंका को भी ले गई. प्रियंका को अंजू कुछ मिनटों के लिए भी खुद से दूर नहीं होने देती थी. दोनों साथ खातीपीती थीं और साथ सोती थीं. कुछ दिन गांव में रुक कर दोनों दिल्ली चली आईं. प्रियंका अंजू के लगाव में ऐसी डूबी कि उस ने घर वालों से भी दूरी बना ली.

पहले प्रियंका शनिवार को मेरठ आ जाती थी और रविवार को रुक कर चली जाती थी, लेकिन बाद में उस ने बहाने बनाने शुरू कर दिए. शुरू में तो किसी की कुछ समझ नहीं आया. लेकिन एक बार गौरव घर पर आया तो उस ने प्रियंका को जबरन घर बुला कर उसे समझाया. लेकिन इस से प्रियंका में कोई बदलाव नहीं आया. इस की जगह उस की आदतें लगातार बिगड़ती चली गईं. प्रियंका जब भी मेरठ आती थी, वह अपने दोस्तों के साथ घूमने चली जाती थी. उस के इन दोस्तों में उस की सहेलियों के कई भाई भी शामिल थे और अन्य कई लोग भी. जब वह रातों को भी घर से गायब रहने लगी तो घर में तनाव के हालात बन गए.

हालात तब और भी अधिक बिगड़ गए, जब प्रियंका दिल्ली से भी गायब रहने लगी. घर पर उस की अटेंडेंस कम होने का 2 बार नोटिस आया तो घर वालों को पता चला. इस के बाद प्रेमवीर और संतोष उसे खरीखोटी सुनाने लगे. गौरव को भी यह सब अच्छा नहीं लगा तो उस ने प्रियंका को ताने देदे कर उस के साथ मारपीट शुरू कर दी. वह उस से नफरत करने लगा. प्रियंका को अपनी जिंदगी में घर वालों का दखल गवारा नहीं लगता था. इसी बीच एक बार गौरव को जब पता चला कि प्रियंका अंजू के साथ उस के गांव जाती है तो उस ने उसे जम कर लताड़ा. प्रियंका के साथ अंजू मेरठ भी आई.

अंजू चूंकि तेजतर्रार लड़की थी, इसलिए उसे किसी ने पसंद नहीं किया. घर वालों ने प्रियंका को उस का साथ छोड़ने की सलाह दी, लेकिन उस ने साफ कह दिया कि वह सब कुछ छोड़ सकती है, लेकिन अंजू को नहीं. मार्च, 2008 में गौरव मेरठ में ही था. तभी प्रियंका अंजू को ले कर मेरठ आई. घर में दोनों साथ ही रहीं. अंजू के सामने ही गौरव ने प्रियंका पर हाथ छोड़ दिया. अंजू साथ थी, इसलिए प्रियंका भाई से भिड़ गई. यह बात किसी को अच्छी नहीं लगी. घर में मनमुटाव होने के बाद प्रियंका अंजू के साथ चली गई और परिजनों से संपर्क बंद कर दिया.

प्रियंका के घर वाले उसे बिगाड़ने में अंजू का हाथ मानते थे, क्योंकि वह वही करती थी, जो अंजू कहती थी. एक बार प्रेमवीर की तबीयत खराब हुई तो गौरव ने प्रियंका से मेरठ पहुंचने को कहा. पहले तो उस ने बहाना बनाया, लेकिन जब गौरव ने उस पर दबाव बनाया तो वह अंजू को साथ ले कर मेरठ आ गई. गौरव भी मेरठ आ गया था. कुछ मुद्दों पर बात हुई तो प्रियंका की मुंहजोरी देख कर गौरव ने प्रियंका के साथ मारपीट की. गौरव ने उस से अंजू का साथ छोड़ने को भी कहा, लेकिन प्रियंका ने ऐसा करने से साफ इनकार कर दिया.

नतीजतन यह हुआ कि गौरव ने गुस्से में दोनों को बाहर का रास्ता दिखा दिया. दरअसल प्रियंका और अंजू का रिश्ता कुछ ऐसा खास बन गया था कि वह एकदूसरे के बिना जीने की सोच भी नहीं सकती थीं. अलबत्ता दोनों को लगने लगा था कि घर वाले अब उन्हें साथ नहीं रहने देंगे. प्रियंका को अपने साथ बनाए रखने के लिए शातिर दिमाग अंजू ने एक योजना बनाई. वह अपने इस रिश्ते को शादी की बैशाखी पर चलाए रखना चाहती थी. अप्रैल, 2008 के प्रथम सप्ताह में वह प्रियंका को ले कर अपने गांव पहुंची. उस ने अपने भाई अजेंद्र से कहा कि प्रियंका उस से प्यार करती है और शादी करना चाहती है. यह सुन कर अजेंद्र की खुशी का ठिकाना नहीं रहा.

प्रियंका ने भी अपनी अदाओं से उसे ऐसा रिझाया कि वह पलक झपकते ही तैयार हो गया. उम्र के हिसाब से अजेंद्र प्रियंका से 3 साल छोटा था. आखिर 7 अप्रैल, 2008 को अंजू ने अमरोहा की आर्य समाज धर्मशाला में दोनों का विवाह करा दिया. यह विवाह पुरोहित  तेजपाल सिंह ने संपन्न कराया. प्रियंका और अंजू को यहां शपथपत्र दाखिल करने पड़े. शपथपत्र में प्रियंका ने अपना मेरठ का फरजी पता लिखवाया. प्रियंका और अजेंद्॑र ने एकदूसरे के साथ फेरे लिए और जयमाला पहनाईं. मंदिर की तरफ से उन्हें विवाह का प्रमाण पत्र भी दे दिया गया. अजेंद्र यह नहीं जानता था कि वह सिर्फ एक मोहरा है.

असली खिलाड़ी तो उस की बहन और उस की सहेली हैं. प्रियंका अजेंद्र की पत्नी तो बन गई, लेकिन पत्नी का धर्म न उसे निभाना था न ही उस ने निभाया. अजेंद्र जब भी उस का साथ पाने की कोशिश करता, वह बीमारी या दर्द का बहाना कर देती. रात में उस के साथ अंजू सोती थी. प्रियंका के घर वाले उसे ले कर पहले ही परेशान थे. जब उन्हें पता चला कि वह अंजू के साथ अमरोहा में रह रही है तो वे लोग वहां पहुंचे और खूब हंगामा किया. उन्होंने प्रियंका को अगवा करने का मुकदमा भी दर्ज करा दिया. लेकिन यहां भी प्रियंका ने जब अंजू का ही साथ दिया तो उन्होंने प्रियंका से रिश्ता तोड़ लिया.

कुछ माह के लिए प्रियंका और अंजू दिल्ली चली गईं और फिर से गांव लौट आईं. वहां दोनों पतिपत्नी की तरह रहती थीं. अजेंद्र ने प्रियंका पर हक जताया और घर में उन के रिश्तों का विरोध हुआ तो प्रियंका और अंजू फिर दिल्ली चली गईं. इस के बाद दोनों को घर से खर्चा मिलना बंद हो गया. आगे कोई उम्मीद नहीं थी. ऐसे में नौकरी करना जरूरी था. दोनों ने चूंकि ताउम्र साथ रहने की कसमें खाई थीं, इसलिए उन्होंने सहारनपुर का रुख किया. सहारनपुर में प्रियंका की एक सहेली का भाई रहता था. वह मारबल कारोबारी का बेटा था. वहां के एक युवक से अंजू की भी दोस्ती थी. दोनों ने कारोबारी के बेटे से आर्थिक हालात का रोना रो कर नौकरी दिलाने की बात कही.

उन्होंने प्रयास भी किए, लेकिन प्रियंका के पास शैक्षणिक प्रमाण पत्र नहीं थे, इसलिए उसे नौकरी नहीं मिल सकी. अलबत्ता दोनों युवकों ने उन्हें अपने एटीएम कार्ड जरूर दे दिए, ताकि वे अपना खर्चा चला सकें. इस के बाद दोनों सहेलियां मेरठ चली आईं और टीपीनगर थानाक्षेत्र की कालोनी दशमेश नगर में 6 सौ रुपए महीने पर किराए का एक कमरा ले कर रहने लगीं. दोनों की जिंदगी के जो थोड़े बहुत गम थे उन्हें वह सिगरेट के धुएं और शराब में उड़ा देती थीं. उधर विद्रोही बेटी से आजिज आ कर प्रेमवीर सिंह ने स्थिति को भांपते हुए अपनी वसीयत तैयार करा ली थी, जिस में उन्होंने प्रियंका को कोई जगह नहीं दी थी. वसीयत में केवल सोनिया व गौरव को शामिल किया गया था.

हालांकि घर के हालात तनावपूर्ण चल रहे थे, इस सब के बावजूद प्रियंका अपनी मां के काफी करीब थी. मां ही थी, जिस की ममता बारबार जोर मार रही थी. मां संतोष गुपचुप ढंग से फोन कर के प्रियंका को समझाती रहती थीं. प्रियंका और अंजू किराए पर रह रही थीं. प्रियंका नौकरी करना चाहती थी, लेकिन उस के प्रमाण पत्र पिता के घर पर थे. उसे पिता की वसीयत का पता चला तो उस के मन में अपने परिवार के प्रति नफरत का सैलाब उमड़ पड़ा. उस की जिंदगी दोराहे पर आ कर खड़ी हो गई थी. आखिरकार 10 नवंबर को उस ने घर जा कर अपने प्रमाण पत्र लाने का फैसला कर लिया. उस दिन रात तकरीबन 9 बजे रिक्शा ले कर प्रियंका और अंजू प्रेमवीर सिंह के घर जा पहुंची. दरवाजा संतोष ने ही खोला. प्रियंका को देख कर वह गुस्से में बोलीं, ‘‘अब तेरे लिए इस घर में कोई जगह नहीं है.’’

‘‘मैं अंदर बैठ कर बातें करूंगी.’’ वह निर्णायक अंदाज में नरम हो कर बोली. इसी बीच ड्राइंगरूम में बैठे प्रेमवीर भी बाहर आ गए. उन की नजर प्रियंका पर पड़ी तो उन्होंने भी उसे खरीखोटी सुनानी शुरू कर दी और बड़बड़ाते हुए बाहर टहलने के लिए निकल गए. संतोष से बात करते हुए अंजू बैडरूम में पहुंच गई.

‘‘मुझे अपनी डिग्रियां चाहिए.’’ प्रियंका ने कहा तो संतोष गुस्से में बोलीं, ‘‘बेशरम, तूने जो डिग्री ली है, वह क्या कम है? तुझे मैं बहुत समझा चुकी, अब तू मेरे लिए भी मर चुकी है.’’

‘‘मेरी जिंदगी पर सिर्फ मेरा हक है. मैं चाहे जो करूं मेरी मरजी.’’

‘‘यह सब तेरी वजह से हुआ है.’’ संतोष ने अंजू की तरफ घूम कर उसे धक्का देना चाहा. इस पर प्रियंका व अंजू दोनों को ताव आ गया. प्रियंका ने पलक झपकते ही मां के गाल पर एक थप्पड़ रसीद कर दिया. इस पर संतोष बिफर गईं और शोर मचाने का प्रयास करने लगीं. दोनों लड़कियों के रूप में उन्हें अपनी मौत नजर आने लगी थी.

प्रियंका और अंजू समझ गईं कि अब खेल बिगड़ चुका है. संतोष उन्हें बख्शने वाली नहीं है और न ही प्रमाण पत्र मिल पाएंगे. वसीयत में अपना नाम न होने और परिवार की उपेक्षा से वह पहले ही प्रतिशोध की आग में जल रही थी. फलस्वरूप दोनों ने पलक झपकते ही लूट की योजना बना ली. दोनों ने आंखोंआंखों में इशारे कर के संतोष का खेल खत्म करने की ठान ली. अंजू एनसीसी कमांडो रह चुकी थी. उस ने एक ही झटके में संतोष को बैड पर गिरा दिया. संतोष कुछ समझ पातीं, उस से पहले ही अंजू ने उन का गला दबा दिया. संतोष छटपटाईं तो प्रियंका ने उन के पैरों को कस कर पकड़ लिया.

कुछ ही देर में उन की नाक व मुंह से खून आने लगा और वह ठंडी पड़ गईं. उन्हें सांस न आ जाए, इसलिए अंजू ने उन के मुंह में कपड़ा ठूंस दिया. अचानक पैदा हुई इस स्थिति से प्रियंका व अंजू बौखला गईं. प्रियंका को डर था कि उस के पिता कभी भी आ सकते हैं. सोचविचार कर उस ने दरवाजा अंदर से बंद कर लिया. कुछ देर बाद प्रेमवीर ने दरवाजे पर दस्तक दी तो अंजू ने प्रियंका को दरवाजा खोलने का इशारा किया और खुद हमले के लिए तैयार हो गई. दरवाजा खुलते ही प्रेमवीर जैसे ही अंदर घुसे अंजू ने पीछे से ऐसी लात मारी कि वह लड़खड़ा कर नीचे गिर गए. इस के बावजूद बैड पर पत्नी की लाश पड़ी देख उन का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया.

‘‘तुम ने संतोष को मार डाला, मैं तुम्हें छोडूंगा नहीं, अभी पुलिस को बुलाता हूं.’’ कहते हुए वह फोन की तरफ लपके और 100 नंबर डायल कर दिया. इसी बीच प्रियंका ने फोन का तार खींच दिया. तभी अंजू ने किचन से चाकू ला कर उन के सिर पर वार करने शुरू कर दिए. प्रेमवीर शरीर से मजबूत थे. वह दोनों से गुत्थमगुत्था हो गए. अंजू उन पर वार करती रही और उन के सीने पर सवार हो गई. इसी बीच प्रियंका ने कपड़ा ला कर उन के मुंह में ठूंस दिया. कुछ ही देर में उन्होंने भी दम तोड़ दिया. इस के बाद प्रियंका ने अपने प्रमाण पत्र तो लिए ही, साथ ही सेफ से लाखों की एफडी, जो उस के साथ ज्वाइंट थी, वसीयत, जेवरात व नगदी ले कर एक बैग में डाल लिए, ताकि यह घटना लूटपाट की लगे और उस पर किसी को शक न हो.

इसी के मद्देनजर दोनों ने घर के सामान को उथलपुथल कर के बिखेर दिया. संतोष के मोबाइल को उस ने औफ कर के अपने पास रख लिया और एफएम चला दिया. सारा काम खत्म कर के प्रियंका कोठी के आंगन में घूम रहे बुलडौग को प्यार करते हुए बैडरूम में लाई और उसे चेन से बांध दिया. रात में दोनों दूसरे कमरे में सो गईं. भोर में करीब 5 बजे कोठी में ताला लगा कर दोनों रिक्शा ले कर अपने टीपीनगर स्थित कमरे पर पहुंच गईं. प्रियंका ने संतोष के मोबाइल फोन को ईंट से तोड़ दिया, ताकि उस के जरिए पुलिस उन तक न पहुंच सके और अपना मोबाइल बंद कर दिया. दोनों की योजना बैंक का लौकर खंगालने और एफडी तुड़वाने की थी, ताकि बाकी जिंदगी आराम से कहीं बाहर जा कर बिताई जा सके.

इस बीच इस दोहरे हत्याकांड ने शहर को हिला कर रख दिया था. अखबारों में कई दिन तक यही खबर छाई रही. इस से दोनों कमरे में ही छिपे रहने पर मजबूर हो गईं और माहौल के ठंडा होने का इंतजार करने लगीं. लेकिन आखिर दोनों पुलिस के शिकंजे में आ ही गईं. मिस मेरठ का कारनामा अखबारों और न्यूज चैनलों पर सुर्खियों में आया तो लोग हैरत में रह गए. पूछताछ के बाद अगले दिन पुलिस ने दोनों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

विवेचनाधिकारी ने 80 दिनों की विवेचना के बाद कोर्ट में इस मामले का आरोप पत्र दाखिल कर दिया. अदालत में मुकदमें पर जिरह शुरू हो गई. 285 पन्नों में सबूतों का दस्तावेज कोर्ट में पेश किया गया. 6 साल में 16 गवाहों की गवाहियां हुईं. इन गवाहों में वादी व प्रियंका के मौसा पदम सिंह, उस का भाई गौरव, विवेचनाधिकारी आर.वी. कौल, डा. नरेंद्र, हेडकांस्टेबल सुरेंद्रपाल, एसआई कृष्णवीर, अमन सिंह, राकेश कुमार, कांस्टेबल किरण, कांस्टेबल पवन सिंह, तेजपाल प्रियंका की मौसी मंजू, राजीव सक्सेना, रमेशचंद, पवन सिंह और रामआसरे शामिल थे. दोनों पक्षों की जिरह सुनने और सबूतों को देखने के बाद अदालत ने प्रियंका और अंजू को 28 मई को उम्रकैद की सजा सुना दी.

कथा लिखे जाने तक दोनों जेल में थीं. दोनों के घर वालों के अलावा सभी रिश्तेदारों ने भी उन का हर तरह से साथ छोड़ दिया था. प्रियंका व अंजू ने अपने बहकते कदमों को वक्त रहते संभाला होता और घर वालों की मानी होती तो उन का भविष्य बरबाद नहीं होता. जिला जेल में उन से महिला कैदियों को पढ़ाने का काम लिया जा रहा है. UP Crime News

कथा न्यायालय के निर्णय पर आधारित

 

Real Crime Story: हुस्न बना दुश्मन

Real Crime Story: शातिर तूबा को लगा कि उस के सारे दोस्त खूबसूरत अबीरा के होते जा रहे हैं तो वह उसे रास्ते से हटाने के बारे में सोचने लगी. उस ने इस के लिए तरीका तो बहुत बढि़या अख्तियार किया, लेकिन पुलिस की नजरों से बच नहीं सकी.

जनवरी की 13 तारीख थी, मौसम में काफी ठंडक थी. पूरा पंजाब लोहड़ी की तैयारी में लगा हुआ था. अगर आप यह सोचते हैं कि लोहड़ी सिर्फ भारत में ही मनाई जाती है तो आप गलत सोच रहे हैं, पाकिस्तान के पंजाब में भी लोहड़ी का त्यौहार अत्यंत उत्साह के साथ मनाया जाता है. लाहौर के लोगों में भी लोहड़ी का उत्साह था. सुबह का समय था, लाहौर के एक संभ्रांत इलाके जौहर टाउन के शेरकोट बसअड्डे पर अच्छीखासी भीड़ थी. बसअड्डे के लाउंज में एक लावारिस सूटकेस रखा था.

बहुत देर तक जब कोई उस सूटकेस को लेने नहीं आया तो बसअड्डे पर मौजूद लोगों में से किसी ने पुलिस को फोन कर दिया. इसके बाद थोड़ी देर में ही पुलिस आ गई. पुलिस ने सूटकेस को खोला तो उस में से एक लड़की की लाश निकली. लड़की की लाश बिलकुल ठंडी थी. पुलिस को लगा कि यह मौसमी ठंडक की वजह से ठंडी नहीं हुई है, बल्कि इसे बर्फ में रख कर ठंडा किया गया था. लड़की के जिस्म पर चोट के निशान थे, जिस से पता चलता था कि उसे मारापीटा गया था. पहली नजर में ही देखने से लग रहा था कि लड़की की मौत दम घुटने की वजह से हुई थी. क्योंकि उस के गले पर नीले रंग का निशान था.

पुलिस ने लाश की पहचान करवाने की कोशिश की, लेकिन वहां मौजूद लोगों में से कोई भी लाश को नहीं पहचान सका. जब कई दिनों तक लाश की पहचान नहीं हो सकी तो पुलिस ने लाश का पोस्टमार्टम और औटोप्सी कराई. पुलिस ने बसअड्डे के पास लगे सीसीटीवी कैमरों की रिकौर्डिंग निकलवाई तो उस से पता चला कि वह सूटकेस सुबहसुबह एक लड़की औटोरिक्शा में रख कर लाई थी और उसे बसस्टैंड पर रख कर फौरन वापस चली गई थी. लेकिन पुलिस उस लड़की की पहचान नहीं कर पाई थी.

औटोप्सी से पता चला कि मृतका को खाने में आर्सेनिक और नाइट्रेट जहर भी दिया गया था. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में उस के साथ बलात्कार होने की भी पुष्टि हुई थी. वैसे उस की मौत गला घोंटने के कारण हुई थी. लाश को पहचान के लिए अस्पताल में सुरक्षित रख दिया गया था. 10-12 दिनों तक न तो लाश की पहचान हो पाई और न ही उस लड़की की. अंतत: पुलिस ने लावारिस मान कर लाश को दफन करा दिया. 13 फरवरी 2015 को लाहौर की वहादत कालोनी के पुलिस स्टेशन में एक आदमी आया. उस का नाम जुहेब भट्टी था

उस ने अपना पूरा परिचय देते हुए बताया कि वह सियालकोट के छावनी इलाके के रहने वाले मोहम्मद भट्टी का बेटा है और सियालकोट में अपने बड़े भाई जावेद भट्टी के साथ प्रौपर्टी डीलिंग का काम करता है. उस की 2 बहनें थीं, उज्मा और अबीरा. मां का कुछ साल पहले देहांत हो चुका है. उस ने आगे बताया कि उस की बहन अबीरा, जिस की उम्र 22 साल थी, कुछ साल पहले वह पढ़ने के लिए लाहौर आई थी. पहले  कुछ समय तक वह लाहौर में अपने मामू के यहां रही. चूंकि उस की हार्दिक इच्छा थी कि वह मौडल बने, इसलिए वह शोबिज (व्यावसायिक पार्टियां) की पार्टियों में शिरकत करने लगी.

ऐसी पार्टियों में शामिल होने के लिए वह नएनए दोस्त बनाती रहती थी. उस की इस आदत की वजह से मामू परेशान रहते थे और उसे डांटते भी थे. इसलिए उस ने मामू का घर छोड़ दिया था और वहादत कालोनी स्थित एक हौस्टल में रहने लगी थी. अब वह कई दिनों से हौस्टल से लापता है. उसे शक है कि हौस्टल की मालकिन सिदरा ने उस की बहन को गायब कर दिया है. पुलिस ने जुहेब भट्टी की शिकायत पर  वहादत रोड स्थित हौस्टल में छापा मार कर हौस्टल की मालकिन सिदरा अवान सहित 4 लोगों, नौमान कुरैशी, फरहान खान, सकीना और आयशा बट को हिरासत में ले लिया.

पुलिस सभी को थाने ले आई. पुलिस ने जब सिदरा से जुहेब भट्टी की बहन अबीरा के बारे में पूछताछ की तो उस ने अबीरा के बारे में अनभिज्ञता जाहिर की, लेकिन इतना जरूर बता दिया कि अबीरा आजकल तूबा से बहुत मिलती थी, जो एक मेकअप आर्टिस्ट है. वह खासकर मौडल्स का मेकअप करती है. इकबाल टाऊन के एसपी मोहम्मद इकबाल ने जब जुहेब से उस की बहन का हुलिया पूछा तो उस ने जो हुलिया बताया, उस से पुलिस को लगा कि संभवत: बसअड्डे पर मिली लाश उस की बहन की थी. लाश के फोटो देखने के बाद जुहेब ने उस की शिनाख्त अपनी बहन अबीरा के रूप में कर दी. चूंकि अब लाश की पहचान हो गई, इसलिए पुलिस जांच में तेजी आ गई.

पुलिस ने शेरकोट बसअड्डे की सीसीटीवी की फुटेज पहले ही अपने कब्जे में ले रखी थी. उस में साफ दिख रहा था कि एक लड़की औटोरिक्शा में सूटकेस ले कर आई थी और सूटकेस वहां रख कर वापस चली गई थी. पुलिस ने वह सीसीटीवी फुटेज सिदरा को दिखाई तो उस ने फुटेज में दिख रही लड़की की पहचान तूबा के रूप में कर के बताया कि अबीरा आजकल इसी के साथ कुछ ज्यादा दिखाई दी जा रही थी. साथ ही उस ने तूबा का पता भी बता दिया था. पुलिस ने तुरंत तूबा के घर छापा मारा तो वह घर पर ही मिल गई. पुलिस उसे पकड़ कर थाने ले आई. पुलिस पूछताछ में तूबा ने बताया कि अबीरा को उस ने नहीं, औटोरिक्शा वाले ने मारा है. पुलिस ने तूबा की निशानदेही पर औटोचालक असलम को भी गिरफ्तार कर लिया.

पुलिस पूछताछ में असलम ने अबीरा की हत्या से साफ इनकार कर दिया. उस ने पुलिस को बताया कि वह तो अबीरा को जानता तक नहीं. वह तो तूबा के कहने पर उस सूटकेस को बसअड्डे तक ले आया था. इस के बाद पुलिस के सामने यह सवाल खड़ा हो गया कि वह तूबा से सच कैसे उगलवाए. इस के लिए पुलिस ने तूबा का पौलिग्राफिक टेस्ट कराया. इस पौलिग्राफिक टेस्ट में जो हकीकत सामने आई, उस से सारे पुलिस अफसर हैरान रह गए. इस के बाद पूछताछ में तूबा ने बताया कि उस का असली नाम उज्मा राव है और वह मेकअप आर्टिस्ट है. 7 साल पहले उस की शादी बाबर बट के साथ हुई थी.

पति से उसे एक बेटी पैदा हुई. एक दिन उस की तबीयत खराब हुई तो बाबर ने अपने दोस्त यूसुफ खोखर के कहने पर उसे डाक्टर को इसलिए नहीं दिखाने दिया, क्योंकि वह लड़की थी. यूसुफ खोखर कैमरामैन था. दरअसल बाबर और युसुफ, दोनों ही मौडलिंग की दुनिया से जुड़े थे. डाक्टर को न दिखाने की वजह से तूबा की बेटी मर गई. तूबा ने इस का सारा इल्जाम बाबर और यूसुफ पर डाला. इस के बाद उस की बाबर से अनबन रहने लगी. आखिरकार 2 साल बाद बाबर ने उसे तलाक दे दिया. इस के बाद तूबा उर्फ उज्मा ने बाबर और यूसुफ को मारने का फैसला कर लिया.

बाबर से तलाक लेने के बाद तूबा जौहर टाऊन के एक अपार्टमेंट में अलग रहने लगी थी. यहीं रहते हुए उस की कई पुरुषों से दोस्ती हो गई, जिन में से एक का नाम जीशान था. एक दिन उस ने जीशान से कोई जहर ला कर देने को कहा तो उस ने उसे आर्सेनिक जहर ला कर दे दिया. तूबा ने बाबर से तलाक लेने के बाद भी उस के दोस्त यूसुफ खोखर से दोस्ती कायम कर रखी थी. उस ने इसी दोस्ती का फायदा उठा कर एक दिन खाने में यूसुफ को जीशान द्वारा लाया आर्सेनिक जहर दे दिया. आर्सेनिक जहर की विशेषता यह है कि यह कुछ समय बाद असर करता है. यूसुफ ने खाना तो खाया तूबा के साथ, लेकिन मरा अपने घर जा कर. इस से पुलिस को पता नहीं लग सका कि उसे जहर किस ने दिया था.

इस के बाद तूबा इस फिक्र में रहने लगी कि बाबर को किस तरह मौत के घाट उतारा जाए. इसी बीच उस की जिंदगी में एक और आदमी आया, जिस का नाम फारुख रहमान था. वह एक प्राइवेट बैंक में अधिकारी था. तूबा उस के साथ लिवइन रिलेशन में रहने लगी. फारुख रंगीनमिजाज आदमी था. वह जब भी कोई सुंदर लड़की देखता, उस की लार टपकने लगती थी. तूबा का प्रोफेशन चूंकि मौडल्स का मेकअप करना था, इसलिए वह भी शोबिज की पार्टियों में शामिल हुआ करती थी. 24 दिसंबर, 2014 को एक ऐसी ही पार्टी में उस के परिचित तरनजीत सिंह ने उस की मुलाकात एक नई उभरती मौडल से कराई. इस मौडल का नाम था अबीरा. वह बेपनाह हुस्न व कशिश की मलिका थी. ऊंचा कद, गोरा रंग, एकदम हूर लगती थी.

अबीरा एक उभरती हुई मौडल थी. उसे किसी अच्छे कौंट्रेक्ट की चाहत थी. तरनजीत ने जब उसे बताया कि तूबा की मौडलिंग इंडस्ट्री में काफी जानपहचान है तो अबीरा उस से मिली. इस पहली मुलाकात में ही वह उस से काफी प्रभावित हुई. वह जल्द ही उस से घुलमिल गई. इस के 3-4 दिनों बाद तूबा ने अबीरा को अपने घर बुलाया. उस वक्त वहां फारुख भी मौजूद था. फारुख ने अबीरा को देखा तो देखते ही उस के हुस्न का दीवाना हो गया. उस ने तूबा के सामने अपनी ख्वाहिश रखते हुए कहा कि वह हर हाल में उसे पाना चाहता है. पता नहीं क्या सोच कर तूबा ने उस की मदद करने की हामी भर दी. उस समय तूबा अपने दिमाग में शायद किसी साजिश का तानाबाना तैयार कर रही थी.

उस ने सोचा कि अबीरा की मदद से वह अपने पूर्व पति बाबर बट की हत्या करवा सकती है. वह जानती थी कि बाबर भी अय्याश किस्म का आदमी है और आसानी से अबीरा के हुस्न के जाल में फंस जाएगा. फिर जिस तरह उस ने यूसुफ खोखर को जिंदगी से छुटकारा दिलाया था, उसी तरह अबीरा भी बाबर को उस की जिंदगी से छुटकारा दिला देगी. तूबा को पता था कि अबीरा के पास अभी कोई बड़ा प्रोजैक्ट नहीं है, इसलिए वह आर्थिक तंगी से गुजर रही है. घर वालों से रिश्ते ठीक न होने की वजह से वह उन से भी मदद नहीं मांग सकती.

सोचविचार कर तूबा ने अबीरा से एक समझौता कर लिया. फिर उसी समझौते के तहत अबीरा को बाबर की हत्या में तूबा की मदद करनी थी. इस के बदले में तूबा को उसे कुछ नकद और मौडलिंग के कुछ अच्छे अनुबंध दिलाने थे. अबीरा जानती थी कि तूबा के शोबिज के सर्किल में काफी अच्छे ताल्लुकात हैं. निस्संदेह उस की मदद से वह कामयाबी की सीढि़या चढ़ सकती है. इसलिए उस ने तूबा का साथ देने की हामी भर ली. दूसरी ओर तूबा ने सोचा था कि एक बार अगर अबीरा उस के साथ जुर्म में शामिल हो गई तो फिर वह बड़े आराम से अपने दोस्त फारुख की इच्छा पूरी करवा देगी, क्योंकि इस के बाद अबीरा इस स्थिति में नहीं रह जाएगी कि उस की किसी बात से इनकार कर सके.

फारुख ने जिस दिन तूबा से यह कहा था कि वह अबीरा को पाना चाहता है, वह जलभुन उठी थी. लेकिन वह चाह कर भी फारुख का कुछ नहीं कर सकती थी. उस ने फारुख के जाने के बाद अबीरा के फोटो निकाले और गुस्से में उस के फोटो पर ही खुरचखुरच कर उस का चेहरा बिगाड़ दिया था. उस वक्त वह इतने गुस्से में थी कि अगर अबीरा वहां होती तो शायद उस का चेहरा सचमुच बिगाड़ देती. खैर, अपनी योजना को अमलीजामा पहनाने के लिए जनवरी के पहले सप्ताह में उस ने अबीरा को अपने घर बुलाया और बाबर को मारने की अपनी योजना में साथ देने को कहा. लेकिन इस बार अबीरा ने मना कर दिया. तूबा ने उसी वक्त सोच लिया कि अब वह अबीरा को इस दुनिया में जीवित नहीं रहने देगी.

तूबा ने उस वक्त तो अबीरा से कुछ नहीं कहा. अलबत्ता उस ने अपने दोस्त जीशान से जरूर कहा कि उसे डर है कि अबीरा कहीं उस से उस के दोस्तों को न छीन ले. अगर ऐसा हुआ तो उस का धंधा चौपट हो जाएगा. जीशान ने उसे फिर से आर्सेनिक जहर ला कर दे दिया. 12 जनवरी, 2015 को तूबा ने मौडलिंग का एक अच्छा और बड़ा अनुबंध दिलाने के बहाने अबीरा को खाने पर बुलाया. अबीरा वहां आई तो फारुख को यह पता नहीं था कि तूबा उसे मारने की योजना बना चुकी है. तूबा ने अबीरा के लिए स्पैशल खीर बनाई. उस ने अबीरा की खीर में जीशान का लाया जहर मिला दिया. जब अबीरा खाना खा चुकी तो फारुख उसे बहाने से अपने कमरे में ले गया और अंदर से दरवाजा बंद कर लिया. इस के बाद उस ने अबीरा को अपनी हवस का शिकार बनाने की कोशिश की.

अबीरा पर चूंकि जहर का असर होने लगा था, इसलिए वह ज्यादा विरोध नहीं कर सकी और फारुख ने आसानी से अपनी अच्छा पूरी कर ली. तब तक अबीरा बेहोश हो चुकी थी. थोड़ी देर बाद उस ने तूबा को बुलाया और अबीरा को वहां से ले जाने को कहा. तूबा जानती थी कि जो जहर अबीरा को दिया गया है, उसे पूरे तौर पर असर करने में अभी कई घंटे का समय लगेगा. उसे डर था कि अगर उसे बेहोशी की हालत में कहीं छोड़ा गया और वह बच गई तो उस का पुलिस से बच पाना नामुमकिन हो जाएगा. यही सोच कर तूबा ने पास पड़े अपने दुपट्टे से उस का गला घोंट दिया. जिस से अबीरा उसी वक्त मर गई.

अबीरा तो मर गई. अब समस्या यह थी कि अबीरा की लाश का क्या किया जाए? इस के लिए तूबा ने फारुख से कहा कि लाश को एक बड़े सूटकेस में डाल कर बंद कर दो. फारुख ने ऐसा ही किया. लाश को सूटकेस में रख कर दोनों ने उसे फ्रीजर में रख दिया. रात भर सूटकेस तूबा के अपार्टमेंट में ही फ्रीजर में रखा रहा. तूबा ने वह रात फारुख के साथ दूसरे कमरे में गुजारी. सुबह सूरज निकलने से पहले तूबा ने अपने जानने वाले एक औटोरिक्शा वाले असलम को फोन कर के बुलाया. फिर उस के औटोरिक्शा में सूटकेस रखकर शेरकोट बसअड्डे पहुंची.

चूंकि सुबह का समय था, इसलिए बसअड्डे पर ज्यादा भीड़भाड़ नहीं थी. तूबा सूटकेस उतार कर बसअड्डे के लाउंज में ले गई और वहीं रख कर वापस आ गई. लेकिन सीसीटीवी कैमरे से उस की सारी हरकतें रिकौर्ड हो गईं. जब पुलिस ने तूबा के अपार्टमेंट पर छापा मारा था तो पुलिस को उस के घर से वह जहर भी मिल गया था, जो पोस्टमार्टम में अबीरा के शरीर में पाया गया था. इस के अलावा अबीरा की फोन काल डिटेल्स में अबीरा की आखिरी लोकेशन तूबा के घर की पाई गई थी. तूबा के बयान के आधार पर पुलिस ने फारुख और जीशान को भी गिरफ्तार कर लिया.

आगे की जांच में पता चला कि तूबा का असली नाम उज्मा राव था. उस ने अपना पहचान पत्र तूबा के फरजी नाम से बनवा रखा था. पुलिस को यूसुफ की हत्या के सबूत भी तूबा के घर से मिल गए हैं. पुलिस के अनुसार बाबर बट ने तूबा के साथ बलात्कार किया था, जिस की उस ने पुलिस में रिपोर्ट भी दर्ज कराई थी. लेकिन बाद में जब बाबर ने केस के डर से तूबा से शादी कर ली थी तो तूबा ने अपनी शिकायत वापस ले ली थी. तूबा अपने दूसरे दुश्मन बाबर बट का कत्ल करती, इस से पहले ही उस की एक और अबीरा दुश्मन पैदा हो गई. अपनी इसी दुश्मन अबीरा को रास्ते से हटाने के चक्कर में वह पुलिस की गिरफ्त में आ गई.

पुलिस ने तूबा, फारुख, जीशान और असलम को लाहौर की अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. तीनों जेल की सलाखों के पीछे हैं और अपने किए की सजा भुगत रहे हैं. असलम को जमानत मिल गई है. Real Crime Story

लेखक – एम.जेड. बेग