Chandigarh Crime: हमशक्ल की अक्ल का कारनामा

Chandigarh Crime: एक हत्याकांड में फरार गुरविंदर सिंह गैरी की प्रौपर्टी पर जिस गुरप्रीत सिंह की नजर थी, इत्तफाक से वह गैरी का हमशक्ल था. इसी का फायदा उठाते हुए उस ने नकली दस्तावेज तैयार करा कर गैरी की प्रौपर्टी को बेचने के नाम पर तमाम लोगों से लाखों रुपए ठग लिए थे.

मोहाली के फेज-7 के रहने वाले गुरविंदर सिंह उर्फ गैरी को चंडीगढ़ के सेक्टर-9 स्थित जापान लाइफ कंपनी ने जादू का एक शो करने को कहा था.  उसे यह शो दिल्ली में करना था. शो की तैयारी के लिए उसे कुछ सामान की जरूरत थी. इस के लिए उस ने अपने एक परिचित जादूगर प्रदीप से बात की. 28 वर्षीय प्रदीप ने 4-5 साल पहले ही जादूगरी के क्षेत्र में कदम रखा था. उन दिनों वह चंडीगढ़ के प्रतिष्ठित फाइवस्टार होटल शिवालिक व्यू में शो करता था. प्रदीप और गैरी की जानपहचान करीब 2 साल पहले तब हुई थी, जब प्रदीप सेक्टर-35 के होटल खायबर में जादू के शो किया करता था. गैरी वहां बीयर पीने जाता था. किसी दिन दोनों की जानपहचान हुई तो हमपेशा होने की वजह से उन में दोस्ती हो गई थी.

गैरी सुबह साढ़े 9 बजे प्रदीप के पास पहुंच गया था. जापान लाइफ कंपनी के निमंत्रण की बात बताने के बाद उस ने कहा, ‘‘आज सेक्टर-39 में ‘गो बनानाज किड्स क्लब’ में मेरा कार्यक्रम है. इस के लिए भी मुझे जादू का कुछ सामान चाहिए, चाहो तो तुम भी अपना कोई आइटम वहां पेश कर सकते हो. 11 बजे शो शुरू होगा, मन हो तो चलो.’’

प्रदीप तैयार हो गया. दोनों 11 बजे से पहले ही सेक्टर-39 पहुंच गए. संयोग से गैरी का एक परिचित कुलविंदर सिंह वहां मिल गया. वह गैरी का शो देखने आया था. वह पैट्रोलपंप पर काम करता था और पैट्रोलपंप पर पहनी जाने वाली ड्रैस में ही चला आया था. शो खत्म होने के बाद कुलविंदर ने कहा कि उस के पास जादू के खेलों की 1 कैसेट है. गैरी ने उस से कैसेट को मांगा तो कुलविंदर दोनों को अपने घर ले गया. उस ने पहले अपने कपड़े बदले, उस के बाद दोनों के साथ खाना खाया.

खाना खाते समय गैरी ने प्रदीप से जादू के सामान की बात की तो उस ने कहा, ‘‘मैं तुम्हें दिल्ली के चांदनी चौक की 1 दुकान का पता देता हूं, वहां तुम्हें एकदम बढि़या सामान मिल जाएगा.’’

प्रदीप की बात खत्म होते ही कुलविंदर ने कहा, ‘‘इतने चक्कर में पड़ने के बजाय तुम जादूगर अशोक से क्यों नहीं मिल लेते. जितना अच्छा सामान उस के पास मिल जाएगा,  उतना अच्छा शायद कहीं और न मिल पाए.’’

‘‘ठीक है, हमें तो सामान चाहिए, अशोक से ही ले लेता हूं.’’ गैरी ने कहा.

इस के बाद तीनों इधरउधर की बातें करते हुए गैरी के घर पहुंचे. पहले तो तीनों ने जादू की वीडियो कैसेट देखी, जिस में 1 विदेशी जादूगर के जादू के खेलों का बहुत अच्छा प्रदर्शन था. कैसेट देखने के बाद गैरी ने कुलविंदर से जादूगर अशोक को फोन करने को कहा. कुलविंदर ने पंचकूला स्थित अशोक की दुकान पर फोन किया तो वह दुकान पर ही मिल गया. कुलविंदर ने गैरी के शो के बारे में बता कर जादू के कुछ सामान के लिए कहा तो वह बोला, ‘‘रात 9 बजे सेक्टर 30 के अहाते में आ जाना, 2-2 पैग भी लगाएंगे और वहीं इस बारे में बात भी कर लेंगे.’’

चंडीगढ़ के सेक्टर-46सी में रहने वाले मोहनलाल अरोड़ा के परिवार में पत्नी आशा रानी के अलावा 4 बेटे और 2 बेटियां थीं. 6 संतानों में सब से बड़ा बेटा अशोक था. उसे बचपन से ही जादूगर बनने का शौक था. शायद इसी वजह से उस ने जादू के तमाम खेल सीख लिए थे. इस में अविश्वसनीय बात यह थी कि उस ने जादू किसी से सीखा नहीं था. उस का दिमाग इतना तेज था कि वह एक बार जो देख लेता था, जरा सी देर में उसे हूबहू दोहरा देता था. दसवीं तक पढ़ाई करने के बाद वह पिता के साथ सेक्टर-18 स्थित उन की स्वर्णकारी की दुकान पर बैठने लगा था. सन 1985 में उस की नमिता से शादी हो गई तो जल्दी ही वह एक बेटे वरुण का बाप बन गया. 1996 में उस ने पंचकूला के सेक्टर-15 में महारानी ज्वैलर्स नाम से अपनी अलग दुकान खोल ली.

आशोक की दुकान बढि़या चल रही थी, लेकिन उस का जादू का शौक गया नहीं था. अब तक जादू के खेल में उस ने न केवल महारत हासिल कर ली थी, बल्कि उसे काफी लोकप्रियता भी मिल गई थी. चंडीगढ़ के बड़ेबड़े स्कूलों में उस ने जादू के तमाम शो किए थे. सेक्टर-17 के परेड ग्राऊंड में भी उस ने हजारों लोगों की उपस्थिति में जादू के कई कार्यक्रम किए थे. विदेशों में भी उस ने कुछ शो किए थे, जिस से उसे काफी प्रसिद्धि मिल गई थी. जादू के खेलों में इस्तेमाल किए जाने वाले बेशकीमती सामानों की उस के पास भरमार थी.

इस के बावजूद स्वर्णकारी की अपनी दुकान की वजह से अशोक को जादू के खेल के आयोजनों के लिए समय निकालना मुश्किल हो गया. फिर भी उस के जादूगर दोस्त कभीकभी उस से मिलने आते रहते थे. वे अशोक से जादूगरी का करतब तो सीखते ही थे, जरूरत पड़ने पर सामान भी किराए पर ले जाते थे. अशोक खुले दिल का इंसान था, इसलिए उस ने कभी अपने किसी जादूगर दोस्त को निराश नहीं किया. ऐसे में ही 21 मई, 2000 को कुलविंदर का फोन आया तो अशोक ने रात 9 बजे सेक्टर-30 के अहाते में मिलने के लिए कह दिया था.

उसी रात खाना खाने के बाद अशोक अपने छोटे भाई मुकेश अरोड़ा के साथ घर के पीछे के कंपाउंड में बैठा बातें कर रहा था. तभी एक मारुति कार वहां आ कर रुकी. उस समय साढ़े 11 बज रहे थे. उस वक्त उस के पिता और उस के पड़ोसी निर्मल सिंह भी वहीं बैठे थे. कार से 4 युवक निकल कर अशोक के पास आए और चारों ने एक साथ कहा, ‘‘अशोक, तुम हमारे साथ चलो.’’

चारों ने अशोक से जिस तरह साथ चलने को कहा था, वहां बैठे सभी लोगों को बड़ा अजीब लगा था. लिहाजा मुकेश ने भाई से उन के बारे पूछा. अशोक ने कहा कि ये उस के दोस्त हैं और इन के नाम गुरविंदर सिंह गैरी, लखबीर सिंह, रणबीर सिंह और कुलविंदर सिंह हैं. साथ ही यह भी बताया कि मोहाली के रहने वाले ये लड़के उस से जादू सीखा करते हैं. इस के बाद चारों अशोक को एक किनारे ले जा कर बातें करने लगे. कुछ देर बाद अशोक ने मुकेश के पास आ कर कहा, ‘‘अभी मैं जादू का एक आइटम सिखाने इन के साथ जा रहा हूं. तुम लोग आराम से सो जाना. मुझे आने में शायद थोड़ी देर हो जाए.’’

‘‘लेकिन तुम जा कहां रहे हो?’’ मुकेश ने पूछा.

‘‘मैं मोहाली के फेज-7ए जा रहा हूं. घबराने की कोई बात नहीं है, ये सभी मेरे खास दोस्त हैं.’’

इतना कह कर अशोक उन लोगों के साथ उन की कार में बैठ कर चला गया.

कुछ देर बाद मुकेश भी पिता के साथ कंपाउंड से उठा और अंदर चला गया. निर्मल सिंह भी अपने घर चले गए. अब तक अशोक के घर के सभी लोग सो चुके थे. अपनेअपने बिस्तर पर पहुंच कर थोड़ी देर में मुकेश और उस के पिता भी सो गए. सुबह मुकेश की आंख खुली तो पता चला कि आशोक अभी तक लौट कर नहीं आया. जाते समय अशोक ने जिस तरह बात की थी, उस से उन लोगों को चिंता हो रही थी. फिर भी उन लोगों ने सोचा कि कुछ देर और इंतजार कर लेते हैं, उस के बाद देखते हैं. लेकिन जब 10 बजे तक भी अशोक नहीं लौटा तो मुकेश से रहा नहीं गया और वह अपने एक पड़ोसी को साथ ले कर अशोक की तलाश में मोहाली के फेज-7 की ओर चल पड़ा.

मुकेश पड़ोसी के साथ सेक्टर 45-46 के चौक पर पहुंचा तो उसे कुलविंदर सिंह मिल गया. उस के चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं. ऐसा लग रहा था, वह डर के मारे कांप रहा है. मुकेश ने उसे रोक कर उस की इस हालत के बारे में पूछा तो उस ने डरते हुए कहा, ‘‘रात 12 बजे गैरी की कोठी पर अशोक का गैरी, लखबीर और रणबीर से झगड़ा हो गया. उस समय सभी शराब पी रहे थे. शराब पीते हुए तीनों अशोक से जादू के आइटम सीखने की जिद करने लगे. अशोक ने कहा कि इतने कम समय में और इस हालात में वे आइटम नहीं सिखाए जा सकते.

जब वे नहीं माने तो एक आइटम दिखाते हुए अशोक ने गैरी की सोने की अंगूठी गायब कर दी. तीनों ने गैरी की उस अंगूठी के बारे में पूछा तो अशोक ने कहा कि अब वह नहीं मिल सकती. शराब के नशे में होने की वजह से वे अशोक की पिटाई करने लगे. उन लोगों ने अशोक को इतना मारा कि …’’

कुलविंदर कुछ और कहता, परेशानी की उस हालात में मुकेश ने उस की बात बीच में ही काट कर पूछा, ‘‘फिलहाल अशोक कहां है, उसे बहुत ज्यादा चोटें आई हैं क्या? हमें जल्दी से उस के पास ले चलो.’’

कुलविंदर ने रोते हुए कहा,‘‘अब मैं आप को किस अशोक के पास ले चलूं? डंडों से पिटाई के बाद वे रसोई से चाकू ले आए और उसी चाकू से उसे मार डाला. अशोक को मार कर उन्होंने कस्सी और कुल्हाड़ी से उस की दोनों बांहें, टांगें और गर्दन काट कर धड़ सहित कार में डाल लिया. मैं उन लोगों के साथ जाना तो नहीं चाहता था, पर उन्होंने मुझे भी जबरदस्ती कार में बैठाया और गांव मौली के बगल से बहने वाले गंदे नाले पर ले गए. वहां उन्होंने अशोक के शरीर के टुकड़ो को अलगअलग जगहों पर फेंक दिया. जबकि सिर कार में ही पड़ा रहने दिया. इतना सब करते करते सुबह के 4 बज गए. फेज-11 के पास उन्होंने कार रोक कर मुझे उतार दिया और खुद अशोक के सिर को ठिकाने लगाने के लिए कहीं चले गए.’’

‘‘हे भगवान.’’ दोनों हाथों से अपना सिर थाम कर मुकेश ने कहा और जमीन पर बैठ कर रोने लगा. इस के बाद कुलविंदर ने उसे चुप कराते हुए कहा, ‘‘गैरी, लखबीर और रणबीर ने अशोक की हत्या करने के बाद उस की अंगूठियां, ब्रेसलेट और सोने की चेन उतार ली थी. लड़ाईझगड़े में अशोक का रिवाल्वर गिर गया था, जिसे गैरी ने ले लिया था.’’

मुकेश ने किसी तरह खुद को संभाल कर पूछा, ‘‘तुम ने इस घटना के बारे में पुलिस को इन्फौर्म किया?’’

‘‘अभी नहीं, दरअसल मैं इतना डर गया था कि पुलिस के पास जाने की मेरी हिम्मत ही नहीं हुई. इस के अलावा मुझे यह भी डर लग रहा था कि कहीं वे मुझे भी न मार दें. क्योंकि वे मुझे धमकी दे रहे थे कि अगर इस हत्या के बारे में मैं ने किसी को कुछ बताया तो वे मेरा भी वही हाल करेगें, जो अशोक का किया है. यही वजह थी कि जहां उन लोगों ने मुझे कार से उतारा था, कई घंटे तक मैं वहीं छिपा बैठा रहा. अभी कुछ देर पहले ही वहां से निकल कर मैं सीधे आप लोगों के पास ही जा रहा था कि आप मिल गए.’’

‘‘चलो, पहले थाने चलते हैं.’’ मुकेश ने कहा.

इस के बाद मुकेश कुलविंदर को भी अपने साथ ले कर मोहाली की ओर चल पड़ा. वे अंबवाले चौक के पास पहुंचे थे कि मोहाली के थाना सेंट्रल के थानाप्रभारी इंसपेक्टर प्रीतम सिंह सहयोगियों के साथ मिल गए. मुकेश ने उन्हें सारी बात बताई तो उन्होंने मामला फ्लैश करवा कर मुकेश की शिकायत दर्ज करने के लिए उस की तहरीर थाने भिजवा दी और खुद टीम को साथ घटनास्थल की ओर चल पड़े. गैरी के मकान पर ताला लटक रहा था. खिड़की का कांच तोड़ कर एक पुलिस वाले को अंदर भेजा गया, जिस ने अंदर से दरवाजा खोला. इस के बाद मकान की तलाशी ली गई तो खून सनी चादर, कस्सी, शराब की बोतल और जगहजगह खून के धब्बे देख कर पुलिस को विश्वास हो गया कि कुलविंदर ने जादूगर अशोक के भाई मुकेश को जो बताया है, वह एकदम सही हैं. इसी के साथ पुलिस को यह भी शक हुआ कि अशोक के कत्ल में कुलविंदर भी शामिल था.

अब यह खुद को बचाने के लिए नाटक कर रहा है. फिलहाल इंस्पेक्टर प्रीतम सिंह कुलविंदर और मुकेश को साथ ले कर अशोक की लाश के टुकड़े बरामद करने चल पड़े. मोहाली के नजदीक मौली गांव के गंदे नाले से अशोक का धड़ बरामद हो गया. थाना सेंट्रल में जादूगर अशोक की हत्या का मुकदमा गैरी, लखबीर, रणबीर और कुलविंदर के खिलाफ दर्ज कर लिया गया. पुलिस ने कुलविंदर को हिरासत में ले कर अदालत में पेश किया, जहां से पूछताछ के लिए उसे 3 दिनों के कस्टडी रिमांड पर ले लिया गया. थाने में की गई पूछताछ में कुलविंदर बताया कि वह मोहाली के फेज-11 के मकान नंबर-1353 में रहता था. उस के पिता का नाम जोगेंद्र सिंह था.

दसवीं पास करने के बाद वह इन दिनों सेक्टर-10 के एक पैट्रोलपंप पर नौकरी कर रहा  था. उसे जादू सीखने का शौक था, जिस की वजह से मरने तथा मारने वालों से उस की दोस्ती हो गई थी. इस पूछताछ में कुलविंदर सिंह ने वही सब बताया, जो वह मुकेश को पहले बता चुका था. लेकिन पुलिस वालों को उस की इन बातों पर यकीन नहीं हो रहा था. इसलिए पुलिस ने उस की रिमांड अवधि बढ़वा ली. पुलिस ने उस पर काफी दबाव डाला, पर वह लगातार यही कहता रहा कि जादूगर अशोक की हत्या में वह शामिल नहीं था.

इसी पूछताछ में जादूगर प्रदीप का नाम सामने आया. पुलिस ने प्रदीप से भी पूछताछ की. उस ने पुलिस को दिए अपने बयान में प्रदीप ने बताया था कि गुजरात का प्रसिद्ध जादूगर स्वामी राव पिछले दिनों चंडीगढ़ आया था. वह और अशोक उस से मिलने सेक्टर-17 गए थे. इस के बाद उन्होंने गैरी को भी उस से मिलवाया था. स्वामी राव के जादू के करतबों से गैरी इतना प्रभावित हुआ कि वह उस से कुछ नए आइटम्स सिखाने की जिद करने लगा. आखिर तय हुआ कि 22 मई को वे सभी एक साथ स्वामी राव के पास जा कर जादू के नए आइटम्स सीखेंगे.

21 मई को कुलविंदर ने अशोक को पंचकूला स्थित उस की दुकान पर फोन किया तो अशोक ने अहाते में मिलने को कहा था. इस के बाद गैरी और कुलविंदर ने उसे उस के घर छोड़ दिया. इस के बाद वे कहां गए, उसे मालूम नहीं. प्रदीप के बताए अनुसार, उस शाम सुखना लेक पर उस का शो था. वह उस की तैयारी में जुट गया. शाम 6 बजे से 8 बजे तक वह अपने शो में व्यस्त रहा. वहां से वह सीधे शिवालिक व्यू होटल चला गया, जहां वह रात के साढ़े 10 बजे तक व्यस्त रहा. इस के बाद वह घर जा कर सो गया.

अगले दिन वह तय समय पर जादूगर स्वामी राव के पास पहुंच गया, लेकिन अशोक गैरी, लखबीर, रणबीर और कुलविंदर नहीं आए. घंटों इंतजार के बाद भी जब वे नहीं आए तो वह लौट कर अपने कामों में लग गया. रात 11 बजे घर आ कर वह इत्मीनान से सो गया. अगले दिन अखबारों से उसे पता चला कि अशोक के साथियों ने ही उस का कत्ल कर दिया है. डर की वजह से वह अशोक के यहां भी नहीं जा सका. मोहाली उन दिनों जिला न हो कर रोपड़ का एक सब डिवीजन था. जिला रोपड़ के एसएसपी गुरप्रीत सिंह भुल्लर थे. उन्होंने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए एक विशेष टास्क फोर्स गठित कर दिया था, जिस से मामले की गहराई में पहुंच कर अभियुक्तों को जल्दी से जल्दी गिरफ्तार किया जा सके.

टास्क फोर्स मामले को हल करने के लिएजीजान से जुट गई. 23 मई को इस टीम ने गांव पापड़ी के पास एक वीरानी जगह से अशोक की टांगें बरामद कर लीं. इस के अगले दिन फेज-9 के इंडस्ट्रियल एरिया के पास बहने वाले नाले से अशोक के हाथ भी बरामद हो गए. लेकिन न शरीर के बाकी हिस्से मिले और न ही हत्यारों का पता चल सका. 2 जून को अशोक के शरीर के बरामद अंग पुलिस ने अंतिम संस्कार के लिए उस के घर वालों को सौंप दिए. 3 जून को घर वालों ने उस का दाहसंस्कार कर दिया. इसी के साथ शरीर के वे अंग अशोक के ही हैं, इस का पता लगाने के लिए पुलिस ने नमूना ले कर डीएनए टेस्ट के लिए हैदराबाद की फोरैंसिक लैबोरेटरी भिजवा दिया था.

बाद में रिपोर्ट आने पर साबित हो गया कि शरीर के वे टुकड़े जादूगर अशोक के शरीर के ही थे. पुलिस जांच में जो निष्कर्ष निकल कर सामने आया, उस के हिसाब से अशोक की हत्या की कहानी कुछ प्रकार थी. गैरी, रणबीर, लखबीर और कुलविंदर 21 मई, 2000 की रात 9 बजे जादूगर अशोक से मिलने चंडीगढ़ के सेक्टर-30 के अहाते में पहुंचे, जहां इन लोगों ने शराब पी. इस के बाद जादू का कोई आइटम दिखाने की बात चली तो अशोक ने गैरी की सोने की अंगूठी गायब कर दी. उस समय बात आईगई हो गई. लेकिन घर पहुंच कर खाना खाते समय गैरी का ध्यान अपने हाथ की अंगुली पर गया तो उसे अपनी अंगूठी की याद आई. इस के बाद वह अपने तीनों दोस्तों को साथ ले कर अशोक को उस के घर से बुला लाया.

वह उसे अपने घर न ले जा कर मोहाली के फेज-7 स्थित अपने पिता के घर ले गया, जहां गैरी ने अशोक को शराब पिला कर अपनी अंगूठी के बारे में पूछा. तब अशोक ने हंसते हुए कहा कि अंगूठी तो अब कल ही मिल सकती है. उस के इस जवाब पर गैरी को गुस्सा आ गया तो वह उसे  गालियां देने लगा. यही नहीं, वह उसे मारने के लिए भी दौड़ा. तब अशोक ने अपने बचाव के लिए लाइसेंसी रिवाल्वर निकाल ली. फिर क्या था, गैरी और उस के साथी उस पर पिल पड़े. इस के बाद उन्होंने अशोक की हत्या कर दी और उस के शव के टुकड़े यहांवहां फेंक कर गैरी, लखबीर और रणबीर फरार हो गए.

पुलिस को अपने सूत्रों से पता चला कि अशोक के हत्यारे दिल्ली में कहीं छिपे हैं. मोहाली पुलिस की एक विशेष टीम दिल्ली गई. पुलिस टीम को पता चला था कि गैरी का दिल्ली में मकान है, जहां हत्या के बाद कई दिनों तक 3 लोग ठहरे थे. उन के पास काले रंग की मारुति 1000 कार भी थी, लेकिन वे उस कार का उपयोग बिलकुल नहीं कर रहे थे. 4 जून को ओल्ड राजेंद्रनगर स्थित उस मकान पर मोहाली पुलिस ने छापा मारा. लेकिन वहां कोई नहीं मिला. कार जरूर वहां खड़ी थी. कार के निरीक्षण में पुलिस ने पाया कि उस पर काफी धूल जमी थी. कार के अंदर जगहजगह खून के धब्बे भी थे.

पुलिस को संदेह था कि तीनों हत्यारे विदेश भाग गए हैं, लेकिन इस सफलता के बाद पुलिस को लगा कि हत्यारे भारत में ही कहीं छिपे हैं. अब तक की भागदौड़ से पुलिस ने वांछित हत्यारों के बारे में कुछ व्यक्तिगत जानकारियां जुटा ली थीं. लखबीर और रणबीर सगे भाई थे. लखबीर बीए पास था और फेज-7 की मोटर मार्केट में औफिस खोल कर विदेशी गाडि़यों की खरीदफरोख्त का काम करता था. बीए करने के बाद रणबीर भी भाई के काम में हाथ बंटाने के साथ जादूगरी आदि करने लगा था. उन दिनों वह एक जापानी कंपनी से जुड़ा था. इस के बावजूद दोनों भाई जादू के और आइटम सीखने के चक्कर में लगे रहते थे.

लेकिन गुरविंदर सिंह उर्फ गैरी का आचरण एकदम अलग था. जिस कोठी में जादूगर अशोक का कत्ल हुआ था, वह उस के पिता हरभजन सिंह की थी. कोठी के आसपास रहने वालों के अनुसार, वह अलग किस्म के आदमी थे. 70 बरस की उम्र में भी वह अखबारों में अपनी शादी के विज्ञापन दिया करते थे, जबकि उन की पत्नी करतार कौर विदेश में रह रही थीं. गैरी की पत्नी भी इंग्लैंड में रहती थी. मोहाली के फेज-3बी में गैरी की अपनी कोठी थी, लेकिन अशोक की हत्या उस ने अपने पिता की कोठी में की थी पुलिस को मिली जानकारी के अनुसार, गैरी खूंखार प्रवृत्ति का आदमी था. अपने घर में उस ने सांप, बंदर, मछलियां, कुत्ते, कबूतर और तीतर आदि तो पाल ही रखे थे, एयरगन से इन का शिकार करने में उसे विशेष आनंद आता था. जानवरों को आपस में लड़वाना भी उस का खास शौक था.

गैरी को दूसरों को यातनाएं देने में भी बड़ा मजा आता था. उस की स्थिति मानसिक तौर पर बीमार बिगड़े नवाबों जैसी थी. पहले वह भी इंग्लैंड में रहता था. गैरी के पूर्व नौकर रमेश के अनुसार, वह गैरी की क्रूरता का शिकार हो चुका था. रमेश के बताए अनुसार, गैरी की फितरत समझ पाना बहुत मुश्किल था. सीधेसरल अंदाज में बैठा यह आदमी कब क्या कर बैठे, इस की कल्पना नहीं की जा सकती थी. रमेश के बताए अनुसार, वह 1995 तक मोहाली के फेज-7 स्थित रैडीमेड कपड़ों की एक दुकान पर अच्छीभली नौकरी कर रहा था. बदकिस्मती से एक दिन उस की मुलाकात गैरी से हुई तो उस ने उस से कपड़े का कारोबार करने की बात कह कर उसे मोटी तनख्वाह देने का लालच दिया.

रमेश लालच में आ गया और अपनी अच्छीभली नौकरी छोड़ कर गैरी के पास आ पहुंचा. कुछ दिन तो ठीकठाक गुजरे. उस के बाद एक दिन अपना कैमरा चोरी होने का आरोप लगा कर वह उस की पिटाई करने लगा. यही नहीं, चंडीगढ़ पुलिस के अपने एक परिचित सबइंसपेक्टर को बुला कर उस ने उसे बुरी तरह टार्चर करवाया. टांगों के नीचे डंडे रख कर उस के कंधों पर बैठ कर उसे ऐसी पीड़ा दी गई कि उस के बारे में बताते हुए उस की आंखों में आंसू छलक आए. रमेश ने आगे बताया कि जब उस की इतनी पिटाई के बाद भी कुछ हासिल नही हुआ तो गैरी ने उसी तरह अपने नेपाली नौकर बहादुर को प्रताडि़त किया. यातना की वजह से मौत को सिर पर मंडराते देख बहादुर ने कैमरा चोरी का आरोप स्वीकार कर लिया.

इस के बाद गैरी ने उस से कैमरे के बारे में पूछा तो उस ने झूठमूठ सेक्टर-45 का एक पता बता दिया. गैरी और सबइंसपेक्टर उस पते पर पहुंचे तो वहां एक बैंक अधिकारी रहता था. उस ने हंगामा मचाया तो दोनों वहां से भाग खड़े हुए. उस अधिकारी की शिकायत पर मामला दर्ज हुआ, जिस की जांच के बाद सबइंस्पेक्टर निलंबित हो गया. पुलिस ने रमेश से भी मुकदमा दर्ज कराने को कहा, लेकिन उस ने यह कह कर मना कर दिया कि उस की  जान बच गई यही क्या कम है. वह शिकायत कर के बड़े लोगों से दुश्मनी नहीं निभा सकता.

इंसपेक्टर प्रीतम सिंह के नेतृत्व में एक पुलिस टीम ने फेज-3बी स्थित गैरी की कोठी का ताला तोड़वा कर तलाशी ली तो वहां हैरान कर देने वाले अविश्वसनीय तथ्य सामने आए. मोहाली के ज्यूडिशियल मैजिस्ट्रेट संजय अग्निहोत्री की अनुमति पर मारे गए इस छापे में पुलिस ने गैरी की कोठी से न केवल आधा किलो चरस, महंगी विदेशी शराब की बोतलें और हथियार बरामद किए, बल्कि छिपा कर रखी एक हथकड़ी भी बरामद की. एक एनआरआई के घर से इस तरह हथकड़ी का मिलना पुलिस के लिए पहेली जैसा बन गया था. इस का खुलासा गैरी की गिरफ्तारी के बाद पूछताछ में ही हो सकता था.

खैर, गैरी की कोठी में हुई तलाशी में इस सब के अलावा पौन किलोग्राम सोना और सोने का एक बिस्कुट भी पुलिस के हाथ लगा. घर के एक हिस्से में बना एक आलीशान स्विमिंग पूल गैरी की शानोशौकत की जीतीजागती मिसाल था. वहां एक ऐसा शाही बिस्तर बिछा था, जिस की कीमत लाखों में आंकी गई. यह बिस्तर एक्युप्रेशर पद्धति पर आधारित था. ड्राइंगरूम में बाघ की असली खाल के अलावा हिरण और बारहसिंगे के सिर और पैर तरतीब से सजाए हुए थे. यहीं एक बार भी बना था, जिस में विदेशी शराब की बोतलें भरी पड़ी थीं. इलैक्ट्रौनिक्स सामान तो इस कद्र भरा पड़ा था कि पुलिस के लिए उस की सूची बना पाना कठिन हो रहा था.

तलाशी में मिले सामान को कब्जे में ले कर पुलिस ने गैरी के खिलाफ एनडीपीएस एक्ट की धारा 20/61/88, आबकारी अधिनियम की धारा 6/1/14 एवं आर्म्स एक्ट की धाराओं 25/54/59 के अंतर्गत मामले दर्ज कर लिए. अलबत्ता एनिमल्स एक्ट एवं वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन के तहत सबूतों के अभाव में कोई मामला दर्ज नहीं किया गया. मोहाली का यह एक ऐसा सनसनीखेज मामला था, जो उन दिनों लगातार अखबारों की सुर्खियां बना रहा. इस में सब से निराशाजनक पहलू यह रहा कि तमाम कोशिशों के बावजूद मोहाली पुलिस गैरी, लखबीर और रणबीर को गिरफ्तार नही कर सकी. कुलविंदर को चश्मदीद गवाह बना लिया गया था. आखिर 12 सितंबर, 2000 को गैरी, लखबीर और रणबीर को फरार अपराधी घोषित कर दिया गया.

देखतेदेखते इस मामले को घटित हुए 15 साल लंबा अरसा गुजर गया. अपराधी जाने किस गुफा में घुस कर बैठ गए थे. इतना समय बीत जाने के बाद भी उन के बारे मे कहीं कुछ पता नहीं चला था. गुरप्रीत सिंह भुल्लर अन्य कई जगहों से तबादला होते हुए एक बार फिर यहां के एसएसपी बने. एसएसपी मोहाली के रूप में उन्होंने यहां के कई अनसुलझे मामलों को खंगाला. जादूगर अशोक हत्याकांड की फाइल सामने आते ही उन्हें इस मामले की एकएक बात याद आ गई. पुलिस के लिए यह शरम की बात थी कि 15 साल पहले इस जघन्य अपराध की जांच जहां थी, आज भी वहीं थी. एसएसपी भुल्लर ने एक बार फिर इस मामले की जांच की जिम्मेदारी जिले के सीआईए इंस्पेक्टर गुरचरण सिंह को सौंप दी.

गुरचरण सिंह ने एसआई हरभजन सिंह के नेतृत्व में एक विशेष टीम का गठन कर जादूगर अशोक हत्याकांड की फाइल फिर से खोल दी. अन्य प्रयासों के साथ हरभजन सिंह ने अपने मुखबिरों को भी सक्रिय कर दिया. इसी 23 अप्रैल, 2015 की शाम करीब साढ़े 4 बजे एसआई हरभरज सिंह, एएसआई पवन कुमार, हवलदार सतीश कुमार, दर्शन सिंह और रसजीत के साथ रूटीन गश्त में गांव दाऊं के मोड़ पर मौजूद थे कि उन के एक विश्वस्त मुखबिर ने आ कर उन्हें एक ऐसी सूचना दी, जो हैरान करने वाली थी.

सूचना के अनुसार, जादूगर अशोक हत्याकांड का वांछित अभियुक्त गुरविंदर सिंह उर्फ गैरी अपनी जायदाद बेचने के लिए अपने कुछ साथियों के साथ मोहाली आया हुआ था. 15 साल के अंतराल में उस की सूरत थोड़ी बदल गई थी. खुली दाढ़ी, सामान्य कपड़ों में उस ने अपना हुलिया काफी बदल रखा था. मुखबिर ने उन्हें बताया था कि उस ने उस आदमी के बारे में काफी गहराई से पता किया है.  चौंकाने वाली बात यह है कि वह आदमी असली गैरी नहीं है. वह सारे दस्तावेज तैयार करा कर खुद को गुरविंदर सिंह गैरी साबित कर के उस की जमीन जायदाद बेचने की कोशिश कर रहा है. इस के लिए उस ने कई लोगों से लाखों रुपए एडवांस भी ले लिए हैं.

मुखबिर का कहना था कि ठगी का यह काम करने वाले उस आदमी का अपना एक गिरोह है. एसआई हरभजन सिंह ने तुरंत यह जानकारी इंसपेक्टर गुरचरण सिंह को दी. उन्होंने एसएसपी हरप्रीत सिंह भुल्लर से संपर्क किया तो उन्हें दिशानिर्देश के साथ काररवाई करने का आदेश मिल गया. अधिकारियों का निर्देश और आदेश मिलते ही हरभजन सिंह ने मुखबिर से मिली जानकारियों के आधार पर एक तहरीर तैयार कर थाना बलौंगी भिजवा दी, जहां अपराध भादंवि की धाराओं 410, 420, 465, 467 478, 471 एवं 120 बी के तहत कुल 9 लोगों गुरविंदर सिंह, बूटा सिंह, जगतार सिंह, उत्तम सिंह, हरभजन सिंह, लाला पटवारी, सुक्खी पत्नी अमरजीत सिंह, बंटी और हरबंस डीलर के खिलाफ मुकदमा दर्ज हो गया.

हरभजन सिंह ने अपने साथियों के साथ मुखबिर द्वारा बताई जगह पर छापा मार कर 4 लोगों को गिरफ्तार कर लिया. बाकी लोग उन के वहां पहुंचने से पहले ही चले गए थे. जो 4 लोग पकड़े गए, उन के नाम थे गुरविंदर सिंह, जगतार सिंह, उत्तम सिंह और हरभजन सिंह, इन्हें अदालत में पेश कर के पूछताछ के लिए 4 दिनों के कस्टडी रिमांड पर ले लिया गया. हरभजन सिंह और इंसपेक्टर गुरचरण सिंह के अलावा एसएसपी भुल्लर ने भी इन से मनोवैज्ञानिक तरीके से पूछताछ की. इस पूछताछ में जो कहानी सामने आई, वह थोड़ा हैरान करने वाली थी.

गुरप्रीत सिंह मूलरूप से डूगरी, लुधियाना का रहने वाला था. गुजारे लायक पढ़ाई करने के बाद वह छिटपुट काम करते हुए दुबई चला गया. वहां से कुछ समय पहले वह लौटा तो उस की मुलाकात पंचकूला निवासी अमरजीत सिंह से हुई, जिस ने खुद को पंजाब पुलिस का कर्मचारी बताया. उस ने यह भी बताया कि उस की नियुक्ति खेल कोटे से हुई थी. गुरप्रीत सिंह को उस ने एक फायदे की बात यह बताई कि आपराधिक मामलो में फंस कर कई बार लोग पुलिस की मार से बचने के लिए अपनी जमीनजायदाद छोड़ कर भूमिगत हो जाते हैं. ऐसे में नकली दस्तावेज तैयार करा कर इस तरह की संपत्ति को बेच कर मोटा पैसा कमाया जा सकता है.

बात जंच गई तो गुरप्रीत और अमरजीत ने अपना एक गिरोह बना लिया. उन का यह धंधा चल निकला. मगर अचानक अमरजीत की मौत हो गई तो उस की पत्नी सुक्खी को इस गिरोह में शामिल कर लिया गया, जिसे जादूगर अशोक हत्याकांड वाले मामले की काफी जानकारी थी. उस का कहना था कि इस मामले का मुख्य आरोपी गैरी बहुत अमीर आदमी था. चंड़ीगढ़ और मोहाली में उस की काफी प्रौपर्टी थी, जिसे छोड़ कर वह विदेश भाग गया था और अब वह कभी वापस आने वाला नहीं था. जैसेतैसे इन लोगों ने गैरी की फोटो जुटा ली तो यह बात सामने आई कि उस की शक्ल गिरोह के सदस्य गुरप्रीत से एकदम मेल खा रही है. दोनों को हमशक्ल कहा जा सकता था.

इस के बाद योजना बना कर गुरप्रीत की फोटो के साथ गुरविंदर सिंह गैरी के नाम से वोटर कार्ड के अलावा अन्य जाली दस्तावेज तैयार करा लिए गए. इस तरह गुरप्रीत को गैरी बना कर उस की प्रौपर्टी बेचने की कोशिश में एडवांस के रूप में इन्होंने 60 लाख रुपए इकट्ठा कर लिए. दरअसल ये लोग प्रौपर्टी की कीमत मार्केट रेट से इतनी कम बताते थे कि लोग इन के झांसे में आसानी से आ जाते थे. गिरफ्त में आए 4 लोगों से हुई पूछताछ के बाद इन की निशानदेही पर पुलिस ने वह पैसा बरामद कर लिया था. अभियुक्त उत्तम सिंह निवासी गांव आलमपुर जिला पटियाला, हरभजन सिंह निवासी गांव तलबड़ी, जिला मोहाली और जगतार सिंह निवासी हरपालपुर, जिला पटियाला साधारण परिवारों से थे. सभी शादीशुदा और बालबच्चेदार हैं.

पढ़ाई भी इन्होंने गुजारे लायक कर रखी है. छिटपुट काम करते हुए अपने गुजारे लायक कमाई भी कर रहे थे. बिना मेहनत के रातोरात अमीर बनने के लालच ने इन की मति मारी गई थी. पुलिस ने पकड़े गए चारों अभियुक्तों से पूछताछ कर के इन्हें पुन: अदालत में पेश किया, जहां से सभी को न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. पुलिस को अब अन्य अभियुक्तों बूटा सिंह, लाला पटवारी, बंटी, हरबंस डीलर और सुक्खी की तलाश है. ठगी करने वाले भले ही पकड़े गए, मगर अफसोस की बात यह है कि जादूगर अशोक हत्याकांड का एक भी अभियुक्त अभी तक पकड़ा नहीं जा सका. Chandigarh Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित.

 

Hindi Crime Stories: आशिकी में पति दफन

Hindi Crime Stories: जिस सुख और आनंद के लिए सुदेवी ने प्रेमी के साथ साजिश रच कर पति को ठिकाने लगवा दिया, क्या वह सुख उसे मिल सका…

एसपी (रूरल) सुरेंद्रनाथ तिवारी थाना महराजगंज निरीक्षण के लिए आए थे, तभी एक लड़का और एक औरत थाने पहुंची. दोनों काफी घबराए हुए थे. उन्हें देख कर ही लग रहा था कि वे किसी बड़ी मुसीबत में हैं. सुरेंद्रनाथ की नजर उन पर पड़ी तो उन्होंने दोनों को अपने पास बुला कर पूछा, ‘‘कहो, क्या बात है? जो भी परेशानी हो, सचसच बताओ?’’

लड़का हाथ जोड़ कर बोला, ‘‘हुजूर, मेरा नाम दिनेश है.’’ इस के बाद औरत की ओर इशारा कर के बोला, ‘‘यह मेरी भाभी सुदेवी है. हम लोग थाना बिठूर के गांव हिंगूपुर से आए हैं. 21 अप्रैल को मेरा बड़ा भाई हरिश्चंद्र थाना महराजगंज के गांव जाना के रहने वाले अपने साढू मंगू के यहां गया था, तब से उस का कुछ पता नहीं है. हम ने उसे हर जगह खोज लिया है. मंगू ने ही भैया को गांव में लगने वाला मेला देखने को बुलाया था.’’

सुरेंद्रनाथ तिवारी को लगा कि सुदेवी भी कुछ कहना चाहती है, इसलिए उन्होंने उस की ओर देखते हुए कहा, ‘‘तुम भी कुछ कहना चाहती हो क्या? लेकिन एक बात का ध्यान रखना, जो भी कहना, सचसच कहना.’’

‘‘जी हुजूर,’’ सुदेवी बोली, ‘‘21 अप्रैल को जब मैं कन्नौज में अपनी बुआ की बेटी के यहां थी तो उन्होंने फोन कर के बताया था कि वह जाना में साढू के यहां मेला देखने आए हैं. आज घर लौटने को कहा था. लेकिन जब वह घर नहीं लौटे और फोन पर भी बात नहीं हुई तो मैं 23 अप्रैल को जाना गई और जीजा और उन के घर वालों से उन के बारे में पता किया. उन लोगों ने बताया कि उन्हें उस दिन शाम को सर्वेश के साथ देखा गया था.’’

‘‘यह सर्वेश कौन है?’’ एसपी साहब ने पूछा.

‘‘हुजूर, सर्वेश मेरे बहनोई का भतीजा है. मेरे ऊपर उस की नीयत खराब थी, जिस की वजह से एक बार मेरे पति ने उसे डांटा भी था. मुझे लगता है कि सर्वेश ने ही उन का अपहरण कर लिया है या फिर मार डाला है.’’

मामला गंभीर था, इसलिए सुरेंद्रनाथ तिवारी ने थानाप्रभारी जीवाराम को आदेश दिया कि तुरंत जाना जा कर सर्वेश को पकड़ कर सख्ती से पूछताछ करें, जिस से हरिश्चंद्र के बारे में पता लग सके. जीवाराम ने एसआई आर.के. सिंह, सरिता मिश्रा, सिपाही बृजेशचंद्र शर्मा, आशित कुमार तथा राजेंद्र कुमार सिंह को साथ लिया और जाना जा कर सर्वेश के घर छापा मारा. सर्वेश उस समय घर पर ही था, इसलिए जीवाराम उसे पकड़ कर थाने ले आए. थाने में जब उस से हरिश्चंद्र के बारे में पूछा गया तो वह साफ मुकर गया. लेकिन वह परेशान जरूर हो उठा. उस के चेहरे पर आई घबराहट से थानाप्रभारी ने भांप लिया कि यह झूठ बोल रहा है.

उन्होंने उस पर दबाव बनाने के लिए कहा, ‘‘तुम्हारे झूठ बोलने से कोई फायदा नहीं है, सुदेवी ने हमें सब बता दिया है. इसलिए तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम भी सब कुछ सचसच बता दो.’’

इस पर सर्वेश ने कहा, ‘‘साहब, हरिश्चंद्र को तो मैं ने मार दिया है. लेकिन ताज्जुब की बात यह है कि जिस सुदेवी ने वादा किया था कि हत्या के इस राज को वह किसी को नहीं बताएगी. उसी ने आप से सब बता दिया. साहब,  हरिश्चंद्र की हत्या मैं ने सुदेवी के कहने पर ही की थी. हम दोनों के बीच नाजायज संबंध थे. हत्या की साजिश हम दोनों ने मिल कर रची थी. हत्या करने के बाद मैं ने सुदेवी को बताया भी था कि हरिश्चंद्र को ठिकाने लगा दिया है.’’

सुदेवी उस समय थाने में ही थी. जीवाराम ने उसे बुला कर जब बताया कि सर्वेश ने हरिश्चंद्र का कत्ल कर दिया है तो वह दहाडे़ मार कर रोने लगी. तब जीवाराम ने उसे डांटते हुए कहा, ‘‘त्रियाचरित्र करने की जरूरत नहीं है. सर्वेश ने हमें यह भी बता दिया है कि तू ने ही साजिश रच कर हरिश्चंद्र की हत्या कराई है.’’

इस के बाद सुदेवी ने भी अपना अपराध स्वीकार कर लिया तो सर्वेश की निशानदेही पर पुलिस ने जाना गांव के बगल से बहने वाले नाले के पास से हरिश्चंद्र का शव बरामद कर लिया. लाश सड़ चुकी थी. वहीं झाडि़यों से वह खून सनी ईंट भी बरामद कर ली गई, जिस से हत्या की गई थी. घटनास्थल की सारी औपचारिक काररवाई निपटा कर थाना महराजगंज पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. सर्वेश और सुदेवी ने हरिश्चंद्र की हत्या का अपराध स्वीकार कर लिया था, इसलिए थाना महराजगंज पुलिस ने मृतक के छोटे भाई दिनेश की ओर से सर्वेश और सुदेवी के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया. पुलिस पूछताछ में हरिश्चंद्र की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह एक औरत द्वारा आशिकी में अपना ही सिंदूर उजाड़ने की वाली थी.

कानपुर शहर से 40 किलोमीटर दूर जीटी रोड पर बसा है कस्बा शिवराजपुर. इसी कस्बे में रामबाबू अपने परिवार के साथ रहता था. इसी रामबाबू की बेटी है सुदेवी. सुदेवी शादी लायक हुई थी तो उस ने उस की शादी कानपुर के थाना बिठूर के गांव हिंगूपुर के रहने वाले छोटेलाल के बड़े बेटे हरिश्चंद्र से कर दी थी. छोटेलाल का खातापीता परिवार था. यह 10-12 साल पहले की बात है. सुदेवी ने जो चाहा था, उसे ससुराल में वह सब कुछ मिल गया था, इसलिए वह खुश थी. सब से बड़ी बात यह थी कि हरिश्चंद्र उसे हद से ज्यादा प्यार करता था. यही हर लड़की का सपना होता है. सुदेवी सचमुच भाग्यशाली थी. पति ही नहीं, ससुराल का हर आदमी उसे बहुत प्यार करता था.

हंसीखुशी से 5 साल बीत गए. इस बीच सुदेवी 2 बेटों, गोल्डी और निखिल की मां बन गई. 2 बच्चों की जिम्मेदारियां बढ़ीं तो हरिश्चंद्र को आय बढ़ाने के लिए ज्यादा मेहनत की जरूरत पड़ने लगी. वह अधिक कमाई के चक्कर में ज्यादा से ज्यादा घर से बाहर रहने लगा. बस, पति का साथ न मिलने की वजह से सुदेवी के कदम बहक गए. हुआ यह कि बरसात में हरिश्चंद्र का घर गिर गया. घर बनवाने के लिए उस ने जाना के रहने वाले अपने साढू गंगू से कोई राजमिस्त्री बताने को कहा तो उस ने कहा, ‘‘साढूभाई राजमिस्त्री तो घर में ही है. हमारा भतीजा सर्वेश बहुत अच्छा राजमिस्त्री है. आजकल वह बड़ेबड़े ठेके ले रहा है. वैसे तो वह खाली नहीं है, लेकिन घर का काम है, इसलिए उसे समय तो निकालना ही पड़ेगा. तुम जब कहो, मैं उसे भेज दूं.’’

‘‘ठीक है भाई, आप ने हमारी एक बहुत बड़ी समस्या हल कर दी. बरसात खत्म होते ही मकान बनवाना शुरू कर दूंगा.’’

28 वर्षीय सर्वेश हृष्टपुष्ट युवक था. वह काम भले राजमिस्त्री का करता था, लेकिन रहता ठाठ से था. सर्वेश रिश्तेदार था. इसलिए हरिश्चंद्र के यहां काम करने आया तो घर में ही रहताखाता और सोता था. सुदेवी उस की मौसी लगती थी, इसलिए वह उस से खूब बातें करता था. मौकेबेमौके हंसीठिठोली भी कर लेता था. सुदेवी भी उस की लच्छेदार बातों में खूब रस लेती थी. बातों ही बातों में दोनों एकदूसरे की ओर आकर्षित होने लगे. धीरेधीरे सर्वेश और सुदेवी के बीच की दूरियां सिमटती चली गईं. दोनों रिश्ते को भूल कर खुल कर हंसीमजाक और छेड़छाड़ करने लगे. कुंवारा सर्वेश जहां मौसी से स्त्री सुख पाने को लालायित रहने लगा था, वहीं पति की उपेक्षा का शिकार सुदेवी सर्वेश की जवानी पर मर मिटी थी.

आग दोनों तरफ लगी थी. बस उन्हें मौके की तलाश थी. एक दिन सुबह से बरसात हो रही थी, जिस की वजह से काम बंद था. हरिश्चंद्र किसी काम से ठिबूर चला गया था और बच्चे भी स्कूल चले गए थे. दोपहर को सर्वेश आंगन में आया तो सुदेवी पेटीकोट और ब्लाउज पहने नहा रही थी. भीगे कपड़े उस के बदन से चिपके हुए थे. उन कपड़ों में सुदेवी का अंगअंग साफ झलक रहा था. सुदेवी इस बात से अनजान थी कि उसे कोई देख रहा है. अचानक सर्वेश उस के सामने आ कर खड़ा हो गया तो उसे फटकारने या शरमाने के बजाय सुदेवी उसे अजीब नजरों से ताकने लगी.

सर्वेश के लिए यह एक तरह का इशारा था. इशारा समझते ही सर्वेश ने बाहर का दरवाजा बंद किया और सुदेवी को उठा कर कमरे में ले आया. इस के बाद मर्यादा की सारी सीमाएं टूट गईं और रिश्ते तारतार हो गए. सर्वेश के साथ यौवन का आनंद मिलने के बाद सुदेवी ने पति हरिश्चंद्र की ओर से मुंह मोड़ लिया. वह हरिश्चंद्र की उपेक्षा करने लगी. बातबात में उस से लड़नेझगड़ने लगी. इस की वजह यह थी कि उसे सर्वेश से जो शारीरिक सुख मिल रहा था, वैसा सुख हरिश्चंद्र काफी दिनों से नहीं दे सका था. सर्वेश हट्टाकट्टा जवान था, जबकि हरिश्चंद की जवानी ढल चुकी थी.

धीरेधीरे सर्वेश सुदेवी की जिंदगी में पूरी तरह से आ गया. घर के लोग इस सब से बेखबर थे. कोई सोच भी नहीं सकता था कि ऐसा भी हो सकता है. लेकिन जो सोचा नहीं जा सकता था, वैसा हो रहा था. जब भी दोनों को मौका मिलता वे एक हो जाते. यह भी सच है कि एक न एक दिन पाप का घड़ा ऐसा ही अवश्य भरता है. सुदेवी और सर्वेश के साथ भी हुआ. एक दिन रात में हरिश्चंद्र की नींद खुली तो सुदेवी बिस्तर से गायब थी. उतनी रात को पत्नी कहां गई, हरिश्चंद्र सोच में पड़ गया, क्योंकि दरवाजा भी अंदर से बंद था. वह सर्वेश के कमरे में गया तो वह भी नहीं था. इस के बाद हरिश्चंद्र को शक हुआ. कुछ सोच कर वह छत पर गया तो वहां का नजारा देख कर उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई. सुदेवी और सर्वेश आपत्तिजनक स्थिति में थे.

हरिश्चंद्र को देखते ही सर्वेश तो भाग खड़ा हुआ, लेकिन सुदेवी कहां भाग कर जाती. हरिश्चंद्र ने उस की जम कर पिटाई की. शोर सुन कर घर वाले आ गए. जब उन्हें सच्चाई का पता चला तो सब ने सिर पीट लिया. इस के बाद हरिश्चंद सुदेवी पर नजर रखने लगा और सर्वेश के घर आने पर सख्त पाबंदी लगा दी. अब दोनों का मिलना असंभव हो गया, लेकिन फोन पर उन की बातें हो जाती थीं. जब कभी हरिश्चंद्र गांव से बाहर जाता, सुदेवी फोन कर के सर्वेश को बुला लेती. लेकिन हरिश्चंद्र को बच्चों से सर्वेश के आने की खबर मिल ही जाती. तब वह सुदेवी की जम कर पिटाई करता. उस समय सुदेवी रोते हुए यही कहती, ‘‘तुम्हारी जितनी इच्छा हो मार लो, लेकिन याद रखना, एक दिन इस का खामियाजा तुम्हें भुगतना ही पड़ेगा.’’

पत्नी की इस धमकी पर हरिश्चंद्र को और भी गुस्सा आ जाता. उस हालत में वह उस की और पिटाई करता. लेकिन सुदेवी के सिर से सर्वेश के प्यार का भूत नहीं उतरा तो नहीं उतरा. वह सर्वेश की इस कदर दीवानी हो गई थी कि उस के लिए पति को मिटाने का फैसला कर लिया. इस के बाद उस ने सर्वेश के साथ मिल कर एक ऐसी योजना बनाई, जिस की किसी ने कल्पना तक नहीं की थी. उसी योजना के तहत सुदेवी खुद तो बुआ की बेटी की शादी में शामिल होने कन्नौज चली गई. जाने से पहले उस ने बड़ी बहन श्यामदुलारी को फोन कर के कह दिया था कि वह मेला देखने के बहाने उस के पति हरिश्चंद्र को अपने गांव जाना बुला ले. क्योंकि उन का मूड आजकल ठीक नहीं है.

छोटी बहन के कहने पर श्यामदुलारी ने मोबाइल पर हरिश्चंद्र से बात की तो वह मेला देखने के लिए जाने को राजी हो गया. 21 अप्रैल, 2015 को हरिश्चंद्र साढू गंगू के घर पहुंच गया. साढू के घर हरिश्चंद्र का सामना सर्वेश से हुआ तो उस ने लपक कर उस के पैर छू लिए और कुशलक्षेम पूछी. हर साल की तरह उस दिन जाना में मेला लगा था और रात में नौटंकी का कार्यक्रम था. सर्वेश और सुदेवी में मोबाइल पर लगातार बातें हो रही थीं. उस ने सुदेवी को बता दिया था कि बकरा (हरिश्चंद्र) हलाल होने के लिए आ गया है.

योजना के अनुसार, सर्वेश हरिश्चंद्र को मेला दिखाने ले गया. शाम तक दोनों मेला देखते रहे. उस के बाद वह उसे शराब के ठेके पर ले गया. सर्वेश ने खुद तो कम शराब पी, जबकि हरिश्चंद्र को ज्यादा पिलाई. इस के बाद टहलने के बहाने वह हरिश्चंद्र को गांव के बाहर बहने वाले नाले के पास ले गया और वहां धक्का दे कर जमीन पर गिरा दिया. हरिश्चंद्र जैसे ही जमीन पर गिरा, उस की गरदन पर पैर रख कर तब तक दबाए रहा, जब तक उस की मौत नहीं हो गई. मरने के बाद सर्वेश ने हरिश्चंद्र के चेहरे को ईंट से कुचल कर विकृत कर दिया और लाश को वहीं गड्ढे में दफना दिया. रात 11 बजे सर्वेश ने फोन कर के सुदेवी को बता दिया कि उस ने कांटे को निकाल दिया है.

इसी के साथ उस ने सुदेवी से अनुरोध किया कि वह गांव आ जाए, क्योंकि वह उस से मिलने के लिए तड़प रहा है. 23 अप्रैल को सुदेवी पति की खोज के बहाने जाना पहुंची. बहनबहनोई को उस ने पति के लापता होने की जानकारी दे कर पति को खोजने के बहाने सर्वेश के साथ मौजमस्ती करती रही. कुछ दिनों बाद वह घडि़याली आंसू बहाते हुए हिंगूपुर आ गई और जब ससुराल में हरिश्चंद्र के लापता होने की बात बताई तो सभी सन्न रह गए. हरिश्चंद्र के छोटे भाई दिनेश को शक हुआ कि भाई के लापता होने में भाभी सुदेवी का हाथ हो सकता है, इसलिए उस ने पहले तो भाभी को खूब खरीखोटी सुनाई, उस के बाद रिपोर्ट दर्ज करवाने को कहा. देवर के दबाव में सुदेवी डर गई और रिपोर्ट दर्ज कराने को राजी हो गई.

27 अप्रैल, 2015 को सुदेवी दिनेश के साथ थाना महराजगंज पहुंची और सर्वेश पर पति के अपहरण या मार डालने का आरोप लगा कर रिपोर्ट दर्ज करने का अनुरोध किया. इस के बाद सर्वेश पकड़ा गया तो सारा राज सामने आ गया. पूछताछ के बाद 28 अप्रैल, 2015 को पुलिस ने सर्वेश और सुदेवी को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक उन की जमानतें स्वीकृत नहीं हुई थीं. Hindi Crime Stories

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

True Crime Story: ढोंगी गुरू का अपराधिक अतीत

True Crime Story: कविता रानी को पूरा विश्वास था कि स्वामी सच्चिदानंद उस का परलोक सुधार देगा. परलोक सुधारने की कौन कहे, उस ने उस का सारा धन तो हड़प ही लिया, जान भी ले ली. पंजाब के जनपद नवांशहर में थाना काठगढ़ के तहत एक गांव है मत्तो. यहां के किराना दुकानदार सोमनाथ के 7 भाईबहनों में सब से छोटी थी कविता रानी, जिस की शादी मोहल्ला शिवनगर निवासी सुरेंद्र कुमार से हुई थी. कालांतर में इस दंपति के 2 बेटे हुए, जिन्हें ले कर सुरेंद्र स्पेन चला गया था. पति और बेटों के जाने के बाद कवितारानी नवांशहर के अपने मकान में अकेली रह गई थी.

सोमनाथ बहन का हालचाल लेने के लिए अकसर उस के घर जाया करते थे. पहली दिसंबर, 2009 को शाम 6 बजे उन्हें स्पेन से कविता के बड़े बेटे अजय का फोन आया, ‘‘मामाजी, पिछले 2-3 दिनों से मम्मी को फोन कर रहा हूं, उन से बात नहीं हो पा रही है. आप जा कर जरा मां को देख आएं.’’

अजय की बात ने सोमनाथ को भी चिंता में डाल दिया. वह तुरंत नवांशहर के लिए रवाना हो गए. वहां पहुंच कर उन्होंने देखा, घर के बाहरी गेट पर ताला लटक रहा है. 2 लड़कों ने उन के पास आ कर बताया कि वे कालेज स्टूडैंट हैं और सामने वाले घर में किराए पर रहते हैं. उन में से एक ने उन्हें चाबी सौंपते हुए कहा, ‘‘2-3 दिनों पहले यह चाबी हमें यहां पड़ी मिली थी. शायद आंटीजी के कहीं जाते वक्त उन के हाथ से छूट कर गिर गई है. हम आप को पहचानते हैं, आप आंटीजी के भाई हैं न?’’

दोनों लड़कों ने अपने नाम अजीत चौहान और ऋषि चौहान बताते हुए कविता के घर की ओर इशारा कर के एक साथ कहा, ‘‘यह चाबी हमें इसी गेट के ताले की लग रही है. हम ने इसे उठा कर अपने पास रख लिया था कि आंटीजी के आने पर उन्हें दे देंगे.’’

सोमनाथ ने लड़कों को साथ ले कर गेट का ताला खोला. वे भीतर गए तो सामने के कमरे में भी ताला लगा था, साथ ही अंदर से तेज बदबू आ रही थी. सोमनाथ समझदार आदमी थे. उन्हें समझते देर नहीं लगी कि बदबू लाश की है. उन के मन में आया, ‘कहीं ऐसा तो नहीं कि भीतर उन की बहन मरी पड़ी हो और यह बदबू उसी की लाश से आ रही हो?’

यह बात मन में आते ही सोमनाथ दोनों लड़कों को साथ ले कर थाने जा पहुंचे. थानाप्रभारी राजकुमार ने उन से तहरीर ले कर मामला दर्ज करवाया और पुलिसपार्टी के साथ घटनास्थल के लिए रवाना हो गए. पुलिस ने ताला तोड़ा और मुंह पर कपड़ा लपेट कर भीतर गई. घर का सारा सामान बिखरा पड़ा था और उस के बीच चादर में लिपटी कविता की लाश पड़ी थी. लग रहा था कि मामला लूटपाट के लिए कत्ल का है. कविता के गले में उसी का दुपट्टा कस कर मारा गया था. अपनी काररवाई पूरी कर के पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए सिविल अस्पताल भिजवा दिया. रात काफी हो जाने की वजह से काररवाई रोक कर पुलिस ने घर को सील कर दिया.

अगली सुबह पुलिस ने घर को फिर से खोल कर वहां की तलाशी ली तो एक ड्राइविंग लाइसेंस हाथ लगा, जो स्वामी सच्चिदानंद के नाम से था. पासपड़ोस के लोगों ने लाइसेंस देख कर बताया कि यह बहुत मशहूर आदमी है, टीवी के साधना चैनल पर इस के नियमित प्रवचन आते हैं. पता चला कि यह बक्करखाना क्षेत्र में किराए का घर ले कर रहता था. वहीं अपना डेरा बना कर वह प्रवचन दिया करता था, जिसे सुनने के लिए काफी लोग आया करते थे, जिन में कविता रानी भी थी. स्वामी को संदेह के दायरे में रख कर पुलिस ने उस के यहां छापा मारा. पता चला कि स्वामीजी उस रात एक स्थानीय जागरण में व्यस्त थे, जहां से फारिग होने के बाद सुबह ही अपने कुछ शिष्यों के साथ कुरुक्षेत्र चले गए थे.

जागरण आयोजकों ने पुलिस को बताया कि उस रात स्वामीजी थोड़ीथोड़ी देर के लिए 2 बार जागरण में आए थे. मतलब यह रात भर वह जागरण में नहीं रहे थे. पुलिस ने अपना सारा ध्यान स्वामी सच्चिदानंद पर जमा दिया, साथ ही उन के बारे में पता करने के लिए मुखबिरों का भी सहारा लिया गया. मुखबिरी के आधार पर 7 दिसंबर, 2009 को स्वामी को उस वक्त बंगा रेलवे फाटक के पास से गिरफ्तार कर लिया गया, जब वह अपनी इंडिका कार से अपनी एक शिष्या के साथ कहीं जा रहा था.

विधिवत गिरफ्तारी के बाद सच्चिदानंद को अदालत पर पेश कर के 2 दिनों के कस्टडी रिमांड पर लिया गया. उस से व्यापक पूछताछ की गई. इस पूछताछ से स्वामी सच्चिदानंद की जो कहानी सामने आई, वह कुछ इस तरह थी: जिला गुरदासपुर का बड़ा कस्बा है कादियां. यहां के मोहल्ला धर्मपुरा के रहने वाले तिलकराज भारद्वाज छिटपुट काम कर के अपने परिवार का भरणपोषण करते थे. उन की 7 औलादें थीं, जिन में दूसरे नंबर का था सत्येंद्र कुमार. बचपन ही से उसे एक्टिंग का शौक था.

जैसेजैसे वह बड़ा होता गया, उस के मन में एक्टर बनने की इच्छा प्रबल होती गई. सत्येंद्र की यह इच्छा तो पूरी नहीं हुई, लेकिन दसवीं पास करने के बाद उसे पंजाब सरकार के रेवेन्यू विभाग में पटवारी की नौकरी जरूर मिल गई. यह अलग बात है कि अपनी इस नौकरी से वह संतुष्ट नहीं था. उसे जहां कहीं किसी फिल्म की शूटिंग होने की बात पता चलती, वह छुट्टी ले कर वहां पहुंच जाता. अपनी इसी सनक के चलते एक बार वह छुट्टी ले कर मुंबई गया तो काफी दिनों बाद लौटा. परिणामस्वरूप उसे नौकरी से बरखास्त कर दिया गया. इस के बाद वह किसी अन्य काम की तलाश में दिल्ली चला गया. यहांवहां भटकते हुए एक दिन वह पानी पीने के लिए एक ऐसे डेरे में चला गया, जहां एक संत का प्रवचन चल रहा था.

वहां बहुत भीड़ थी. पानी की तो छोडि़ए, वहां तरहतरह के पकवान मुफ्त में बांटे जा रहे थे. पेट भर खाने के बाद सत्येंद्र वहीं पसर गया. जितना बढि़या खाना उसे वहां खाने को मिला था, उस से भी कहीं ज्यादा मजा आया उसे प्रवचन सुनने में उस ने देखा कि श्रद्धालु न केवल संतजी के पैरों में माथा टेक रहे थे, बल्कि अच्छीभली रकम भी चढ़ा रहे थे. बस, यहीं से सत्येंद्र का दिमाग दूसरी दिशा में सोचने लगा. उसे लगा कि इस अंधविश्वासी देश में नाम और दाम कमाने का इस से बेहतर जरिया कोई दूसरा नहीं हो सकता.

पूछताछ में सत्येंद्र ने पुलिस को बताया, ‘‘वाकजाल फैलाने में मैं कुशल था ही, मेरी वाणी में भी ओज था. ऊपर वाले ने चेहरामोहरा भी आकर्षक दिया था. अपनी बात कहने का तरीका भी मुझे काफी हद तक आ गया था. बस थोड़ी जरूरत थी धर्म शास्त्रों की जानकारी की. बिना देरी किए मैं धर्मकर्म का ज्ञान जुटाने लगा. बाबाओं के प्रवचन पूरे ध्यान से सुनने लगा. टीवी चैनलों पर खरीदे गए वक्त में बाबा प्रवचन देने आते तो मैं ध्यान से उन का तौरतरीका देखता और पूरे मनोयोग से उन के प्रवचनों को सुनता.

‘‘आखिर मैं ने तय कर लिया कि मैं इसी धंधे को अपना कर नाम और दाम कमाऊंगा. इस के लिए मैं ने सब से पहले अपने लिए गेरुआ वस्त्र सिलवाए. फिर धार्मिक ग्रंथ खरीद कर उन का अध्ययन शुरू कर दिया. थोड़ीबहुत तैयारी कर के सन् 2004 में मैं छोटेमोटे धार्मिक समारोहों में प्रवचन देने लगा. आत्मविश्वास से भरे मेरे प्रवचन लोगों को पसंद आने लगे. अब मैं ने अपने आप को स्वामी सच्चिदानंद कहलवाना शुरू कर दिया था.’’

सत्येंद्र के बताए अनुसार, पता नहीं यह उस की आवाज का जादू था या उस के आकर्षक व्यक्तित्व का कमाल कि उस के प्रवचनों की धाक जमने लगी. धीरेधीरे उस का सर्कल बढ़ने लगा. जल्दी यह स्थिति आ गई कि उस के कार्यक्रमों में धर्मभीरु लोगों की अच्छीखासी भीड़ जुटने लगी. चढ़ावे के रूप में काफी पैसा भी आने लगा. लोगों की अंधश्रद्धा को देखते हुए उस ने अपना नाम स्वामी सतिंदरानंद की जगह स्वामी सच्चिदानंद रख लिया. क्योंकि इस नाम में कुछ ज्यादा आकर्षण था. उस के दिन तेजी से बदलने लगे. उन्हीं दिनों उस का संपर्क दिल्ली के गणेशनगर निवासी चमनलाल मोंगा से हुआ. उस का अपना कारोबार था. जल्दी ही वह उस का शिष्य बन कर दिनरात उस की सेवा करने लगा. मोंगा को किसी बात की कोई चिंता नहीं थी. लेकिन वह इस लोक में रहतेरहते अपना परलोक सुधारना चाहता था.

मोंगा ने इस बारे में जब स्वामी सच्चिदानंद से बात की तो उस ने उसे यह कह कर डरा दिया कि वह परलोक की चिंता छोड़े, अभी तो उस का यह लोक भी नहीं संवरा. इस पर उस ने सच्चिदानंद के पैर पकड़ लिए. तब उस ने उसे झांसे में लेने का प्रयास करते हुए कहा कि उस के एकलौते बेटे की उम्र केवल 3 महीने रह गई है. यही नहीं, उस की एकलौती बेटी भी उस की इस तरह दुश्मन बन जाएगी कि वह कहीं का नहीं रहेगा. इस पर मोंगा बच्चों की तरह फूटफूट कर रोते हुए सच्चिदानंद के पैरों पर नोटों की गड्डियां रख कर बर्बाद होने से बचाने की प्रार्थना करने लगा.

स्वामी सच्चिदानंद ने मोंगा को जो बातें बताईं थीं, उन्हें सच साबित करने के लिए उस ने जाल बिछाना शुरू कर दिया. उस ने मोंगा की जवान बेटी को बुला कर उसे अपने जाल में फंसा लिया. जब लड़की वश में हो गई तो उस ने उसे कुछ इस तरह से उकसाया कि उस ने अपने पिता समेत 11 लोगों पर गैंगरेप का केस दर्ज करवा दिया और खुद उस के साथ उस के डेरे में रहने लगी. साधना चैनल पर सच्चिदानंद का जो कार्यक्रम आता था, उस का सारा खर्च चमनलाल मोंगा उठाता था, लेकिन उस ने उस का चमन उजाड़ कर उस की बेटी को अपनी शिष्या बना लिया था.

फिर 2008 के अंत में वह उसे साथ ले कर नवांशहर चला गया. यहां आ कर उस ने प्रचार किया कि उस का एक भाई जज है. अपना प्रभाव जमाने के लिए उस ने यह भी प्रचारित किया कि पहले वह भी जज था, लेकिन मोहमाया त्याग कर उस ने साधु का चोला पहन लिया है. नवांशहर में वह खूब मशहूर हो गया. बक्करखाना रोड पर किराए का मकान ले कर सच्चिदानंद ने अपना डेरा बना लिया और रोज प्रवचन करने लगा. उस के यहां श्रद्धालुओं की भीड़ जुटने लगी. इन्हीं में कविता रानी भी थी, जो उस से कुछ ज्यादा ही प्रभावित हो गई थी. उस का पति और बेटे विदेश में थे. करने को उस के पास कुछ था नहीं. वह भी परलोक सुधारने की गरज से उस के यहां जाने लगी थी और उस की शिष्या बन गई थी. बहाने बना कर उस ने उस से करीब 6 लाख रुपए ऐंठ लिए थे.

एक दिन कविता को विश्वास में ले कर सच्चिदानंद ने उस से कहा कि उस से खार खाने वाले लोंगों ने उस पर झूठे मुकदमे कर दिए हैं, जिन्हें खत्म करवाने के लिए उसे 20 लाख रुपए चाहिए. इस से कविता को उस पर शक हो गया. परिणाम यह हुआ कि उस ने उस से अपना पिछला पैसा मांग लिया. तब सच्चिदानंद को लगा कि उस का पांसा उल्टा पड़ गया है. कुछ दिन तो वह उसे टालता रहा, लेकिन जब वह उस के पीछे ही पड़ गई तो उसे लगा कि कविता अपना पैसा वापस ले कर ही रहेगी. इस मुसीबत से छुटकारा पाने के लिए सच्चिदानंद ने एक योजना बनाई. 28 नवंबर, 2009 को उस ने फोन कर के कविता से कहा कि पैसों का इंतजाम हो गया है, आज वह उसे उस के पूरे 6 लाख रुपए दे देगा.

साथ ही यह भी कहा कि जागरण की वजह से वह थोड़ा व्यस्त है, इसलिए रात में 10, साढ़े 10 बजे पैसा देने आएगा, क्योंकि सुबह उसे कुरुक्षेत्र जाना है. इस तरह जागरण के बीच से उठ कर वह कविता के यहां जा पहुंचा. कविता बेसब्री से उस का इंतजार कर रही थी. जैसे ही वह भीतर पहुंचा, उस ने सीधेसीधे अपने 6 लाख रुपए मांगे. उस ने रोनी सी सूरत बनाते हुए कहा, ‘‘क्या बताऊं, मैं ने तो पूरे 6 लाख रुपए का इंतजाम कर लिया था. लेकिन जगराता में झगड़ा हो जाने से किसी ने मेरी जेब से पैसे निकाल लिए.’’

‘‘देखो, तुम्हारा यह झूठफरेब मेरे आगे चलने वाला नहीं है. तुम सीधेसीधे मेरे 6 लाख रुपए निकालो वरना मैं तुम्हारी शिकायत पुलिस से करूंगी.’’

कविता के मुंह से इतना निकला था कि स्वामी सच्चिदानंद उर्फ सत्येंद्र ने पूरे जोर से उस की नाक पर घूंसा मारा. वह बेहोश सी हो कर नीचे गिरने को हुई, तभी उस ने उस के गले में पड़ा दुपट्टा उस की गरदन पर कस दिया. जरा सी देर में वह मौत की नींद सो गई. सच्चिदानंद ने उस की लाश चादर में लपेट कर एक तरफ रख दी. उस के बाद कमरे का सामान इस तरह बिखेर दिया, जैसे वहां किसी ने लूटपाट की हो. यह उस का दुर्भाग्य ही था कि यह सब करते समय उस का ड्राइविंग लाइसेंस वहां गिर गया. उस ने कविता के दोनों सैलफोन भी उठा लिए थे, जिन्हें बाद में उस ने तोड़ दिए थे.

कविता को ठिकाने लगाने के बाद कथित स्वामी सच्चिदानंद इत्मीनान से जा कर जागरण में बैठ गया, ताकि उस पर किसी को शक न हो. सुबह 6 बजे अपने चेलों को ले कर वह कुरुक्षेत्र चला गया. बाद में दिल्ली वाली अपनी शिष्या को भी उस ने वहीं बुला लिया. इस के बाद वह जालंधर और अमृतसर में घूमता रहा. आखिर बंगा फाटक से गुजरते हुए वह पकड़ा गया. कथित स्वामी सच्चिदानंद के साथ पकड़ी गई उस की शिष्या से भी पुलिस ने पूछताछ की. लेकिन वह कविता की हत्या के षडयंत्र में शामिल नहीं थी. वह तो खुद ढोंगी स्वामी के जाल में फंसी हुई थी, जिस ने उस के दबाव में अपने पिता तथा अन्य लोगों पर बलात्कार का मुकदमा दर्ज करा दिया था.

इस मामले में उस की कोई भूमिका न पाए जाने पर पुलिस ने उसे उस के अभिभावकों के हवाले कर दिया. 10 दिसंबर, 2009 को अभियुक्त सत्येंद्र उर्फ स्वामी सच्चिदानंद को फिर से अदालत में पेश कर के न्यायिक अभिरक्षा में भिजवा दिया गया. इस के ठीक एक महीने बाद कथित स्वामी सच्चिदानंद को जब पेशी पर अदालत ले जाया जा रहा था तो रास्ते में पुलिस वालों को गच्चा दे कर वह फरार हो गया. पंजाब पुलिस ने पूरा जोर लगा दिया, लेकिन वह आदमी दोबारा उन के हत्थे नहीं चढ़ा. देखतेदेखते साढ़े 5 साल का लंबा अरसा गुजर गया.

मगर जैसी कि कहावत है, 100 दिन चोर के 1 दिन साधु का. दिल्ली पुलिस की स्पेशल सैल ने 6 जुलाई, 2015 को कथित स्वामी सच्चिदानंद को बेगमपुर इलाके के एक मकान से गिरफ्तार कर लिया. स्पैशल सैल के डीसीपी राजीव रंजन, एसीपी संदीप ब्याला और इंसपेक्टर संजय नागपाल ने उस से सख्ती से पूछताछ की तो अपनी उक्त कहानी बताने के बाद उस के आगे की दास्तान इस तरह से सुनाई: दरअसल ढोंगी सत्येंद्र उर्फ सच्चिदानंद नवांशहर में बहुत बुरी तरह फंस गया था. उस के खिलाफ कत्ल का मुकदमा दर्ज हो गया था. पुलिस ने उसे पकड़ कर जेल भी भिजवा दिया था. चूंकि उस के सारे सपने चकनाचूर हो गए थे, इसलिए वह भाग निकला. वहां से भागने के बाद सच्चिदानंद उत्तराखंड पहुंच कर साधुओं की एक टोली में शामिल हो कर उन की सेवा करने लगा. अपना रंगरूप भी उस ने साधुओं जैसा ही बना लिया था.

कुछ दिनों बाद वह उत्तरकाशी चला गया, जहां किस्मत से विश्वनाथ मंदिर में उसे पुजारी की नौकरी मिल गई. दिल्ली में उस की शिष्या यानी प्रेमिका थी कल्पना. एक दिन साधु वेश में ही वह दिल्ली जा कर उस से मिला. कल्पना उस की प्रेम दीवानी थी. नवांशहर में भी वह उस के साथ पकड़ी गई थी, मगर पुलिस ने उसे शुरू ही में निर्दोष मान कर उस के कुछ रिश्तेदारों के हवाले कर दिया था. सच्चिदानंद को कत्ल केस में गिरफ्तार कर के हवालात में डाल दिया गया. वहां से उस के फरार हो जाने के बारे में कल्पना को कुछ पता नहीं था. पता चलने पर भी न उस ने इस बात का बुरा माना और न जरा भी घबराई, बल्कि उस के साथ उत्तरकाशी में रहने को तैयार हो गई.

जबकि सच्चिदानंद के लिए फिलहाल यह संभव नहीं था. विश्वनाथ मंदिर से उसे इतना पैसा नहीं मिलता था कि वह अपने साथसाथ कल्पना का भी खर्च उठा पाता. दूसरी ओर वह कल्पना को छोड़ना भी नहीं चाहता था. इसलिए अतिरिक्त धन कमाने के लिए उस ने अलग से कोई धंधा करने की सोची. नए धंधे के रूप में उस ने पंजाब में स्मैक सप्लाई करना शुरू कर दिया. इस से उसे मोटी कमाई होने लगी तो वह विश्वनाथ मंदिर को छोड़ कर दिल्ली में ही रहने लगा. अब वह एक तरफ मादक पदार्थों की तस्करी कर रहा था तो दूसरी तरफ दिल्ली के कई इलाकों में प्रवचन कर के अपने आडंबर को भी जारी रखे हुए था. बीचबीच में वह धर्मांध लोगों को चूना लगाने से भी बाज नहीं आ रहा था. इन ठगियों से उस ने कई लोगों की संपत्तियां भी हथिया ली थीं.

कथित स्वामी सच्चिदानंद अपने सभी काम पूरी होशियारी से कर रहा था. फिर भी मादक पदार्थों की तस्करी करते 14 अक्तूबर, 2014 को वह पंजाब में पठानकोट पुलिस के हत्थे चढ़ गया. चूंकि वह साधु लिबास में था और मादक पदार्थों की मात्रा भी कुल 250 ग्राम थी, इसलिए उस ने पुलिस को यही बताया कि यह नशा वह अपने निजी इस्तेमाल के लिए रखे हुए था. जो भी हो, पुलिस ने उस की बातों में आ कर उस से सख्त पूछताछ नहीं की, वरना उस के द्वारा किए गए कत्ल जैसे संगीन अपराध का तभी खुलासा हो जाता और वह जालंधर की उसी जेल में सलाखों के पीछे होता, जहां से अदालत ले जाते वक्त फरार हुआ था.

खैर, पठानकोट पुलिस ने सच्चिदानंद से नरमी का व्यवहार करते हुए उस का कस्टडी रिमांड न ले कर उसे अदालत पर पेश कर के जेल भेज दिया. इस का फायदा उठा कर एक दिन उस ने वहां से भी फरार होने की सोची. एक दिन जेल के अपने सैल में लेटे हुए उस ने यह कह कर जोरों से चिल्लाना शुरू कर दिया कि उस के पेट में जोरों का दर्द हो रहा है. जेल अधिकारियों ने तत्काल उसे अस्पताल में भरती करवाने की व्यवस्था कर दी. अस्पताल में उस की निगरानी के लिए 2 सिपाही भी तैनात किए गए. आखिर वह उन्हें चकमा दे कर पहली ही रात अस्पताल से फरार हो गया.

वहां से वापस दिल्ली पहुंच कर वह कल्पना के साथ लिव इन रिलेशन में रहने लगा, साथ ही स्वामी सच्चिदानंद के रूप में प्रवचनों के कार्यक्रम भी करता रहा. लेकिन पता नहीं कैसे पुलिस ने उस के आपराधिक अतीत का पता लगा कर उसे गिरफ्तार कर लिया. दिल्ली पुलिस ने अपनी पूछताछ पूरी कर सत्येंद्र उर्फ स्वामी सच्चिदानंद को न्यायिक हिरासत में भेजने की व्यवस्था करने के अलावा पंजाब पुलिस को उस की गिरफ्तारी की सूचना दे दी. पठानकोट पुलिस की एक टीम दिल्ली जा कर उसे ट्रांजिट रिमांड पर ले आई. इस बार उन्होंने स्वामी सच्चिदानंद उर्फ सत्येंद्र से गहन एवं व्यापक पूछताछ की. इस पूछताछ में भी उस ने वही सब बताया था, जो वह पहले ही दिल्ली पुलिस को बता चुका था.

पूछताछ के बाद उसे न्यायिक हिरासत में गुरदासपुर की सैंट्रल जेल भेज दिया गया, जहां से नवांशहर पुलिस उसे ट्रांजिट रिमांड पर ले गई. True Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित.

Hindi Crime Story: बदल जाए जब प्यार

Hindi Crime Story: बिरमा को अनुज यादव से प्यार हुआ तो वह पुराने प्रेमी राजकुमार से पीछा छुड़ाने के बारे में सोचने लगी. प्रेमी से पीछा छुड़ाने के लिए बिरमा ने जो रास्ता अपनाया, क्या वह उचित था?

फिरोजाबाद से मैनपुरी की ओर जाने वाली सड़क पर स्थित थानाकस्बा घिरोर के नजदीकी गांव नंगला केहरी के शिव मंदिर के पास जब गांव वालों ने 2-2 लाशें पड़ी देखीं तो परेशान हो उठे. उन्होंने तुरंत इस की सूचना थाना घिरोर पुलिस को दी. गांव नंगला केहरी थाना घिरोर के अंतर्गत ही आता था. वह थाने के नजदीक ही था, इसलिए थानाप्रभारी देवेश कुमार जल्दी ही घटनास्थल पर पहुंच गए. मृतकों की उम्र 35-40 साल रही होगी. शक्लसूरत और पहनावे से दोनों ही ठीकठाक घरों के लग रहे थे. लाशों के आसपास खून नहीं था, इस से पुलिस समझ गई कि इन्हें कहीं दूसरी जगह मार कर लाशें यहां फेंकी गई हैं.

गांव वाले भी उन्हें नहीं पहचान पाए थे. इस का मतलब वे इस इलाके के रहने वाले नहीं थे. पुलिस को लाशों की तलाशी में भी कुछ नहीं मिला था, जिस से उन की पहचान हो पाती. पुलिस को लगा कि इन की शिनाख्त में परेशानी होगी. लेकिन जब उन्हें एक लाश की कमीज पर सिलने वाले दरजी का स्टिकर दिखाई दिया तो मन को थोड़ा संतोष हुआ कि शायद इस से कुछ मदद मिल जाए. पुलिस ने कोशिश की तो उस स्टिकर से मदद ही नहीं मिली, बल्कि मृतकों के घर तक पहुंच गई. कमीज पर जो स्टिकर लगा था, वह आगरा के फतेहाबाद के एक दरजी का था. थाना घिरोर पुलिस दरजी के यहां पहुंची तो उस ने तुरंत मृतक की शिनाख्त कर दी. उस ने बताया कि यह कमीज गांव छहबिस्वा के रहने वाले राजकुमार की है.

थाना घिरोर पुलिस ने राजकुमार के घर पहुंच कर उस के बारे में पूछा तो घर वालों ने कहा कि वे खुद ही राजकुमार और लक्ष्मीकांत को ढूंढ रहे हैं. दोनों एक दिन पहले फिरोजाबाद में रहने वाली अपनी बहन के यहां जाने की बात कह कर घर से निकले थे, लेकिन वे बहन के यहां पहुंचे ही नहीं. चिंता की बात यह है कि उन का फोन भी बंद है. जब पुलिस ने घर वालों को बताया कि राजकुमार और लक्ष्मीकांत की हत्या हो गई है तो घर वाले हैरान होने के साथसाथ रोनेबिलखने लगे. घर वालों की समझ में नहीं आ रहा था कि उन की हत्या क्यों की गई?

क्योंकि उन की ऐसी किसी से दुश्मनी भी नहीं थी. लेकिन जब पुलिस ने पूछा कि दोनों का किसी महिला से कोई चक्कर वगैरह तो नहीं था तो घर वालों ने बताया कि राजकुमार का फिरोजाबाद में रह रही बिरमा से संबंध था. उस का यह संबंध तब से था, जब वह इसी गांव में रहती थी. 2 भाइयों की हत्या को ले कर पुलिस गंभीर थी. बिरमा की ससुराल आगरा के थाना फतेहाबाद के गांव खिसवा में थी. राजकुमार का तभी से उस के यहां आनाजाना था. लेकिन इधर उस का पति प्रहलाद सिंह उसे और बच्चों को ले कर फिरोजाबाद में रहने लगा था. पुलिस ने सबूत जुटाने के लिए राजकुमार के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई.

काल डिटेल्स के अनुसार राजकुमार की घटना वाले दिन एक नंबर पर कई बार बात हुई थी. उस नंबर के बारे में पुलिस ने पता किया तो वह नंबर फिरोजाबाद में झील की पुलिया की रहने वाली ऊषा का निकला.  पुलिस ऊषा के घर पहुंची तो वह घर से गायब थी. उस के घर से गायब होने पर पुलिस को उस पर शक हुआ. पुलिस ने उस के बारे में पता किया तो जानकारी मिली कि ऊषा देहधंधा करने के अलावा लड़कियां भी सप्लाई करती थी. ऊषा के मिलने पर ही स्थिति साफ हो सकती थी. पुलिस ऊषा के पीछे लग गई. वह जहांजहां मिल सकती थी, पुलिस ने छापा मारा. उस के पति बलबीर पर भी शिकंजा कसा गया, लेकिन उस का कहीं कुछ पता नहीं चला. इस के बाद मुखबिरों की मदद ली गई. तब जा कर मैनपुरी बसअड्डे से उसे गिरफ्तार किया गया.

उस के साथ एक औरत और थी. दोनों दिल्ली जाने की फिराक में थीं. पूछताछ में पता चला कि ऊषा के साथ जो औरत थी, वह बिरमा थी. पुलिस उस से भी पूछताछ करना चाहती थी. थाने ला कर उन से पूछताछ की गई तो उन के बताए अनुसार, राजकुमार और उस के चचेरे भाई लक्ष्मीकांत की हत्या की जो कहानी सामने आई, सुन कर पुलिस भी सन्न रह गई. हत्या की यह कहानी कुछ इस प्रकार थी: आगरा के थाना फतेहाबाद के गांव छहबिस्वा के रहने वाले राजेंद्र सिंह का बेटा था राजकुमार. उस के 2 भाई और थे, भोले और पूरन. राजेंद्र सिंह गांव का खातापीता किसान था.

राजकुमार की शादी मुरैना के जनकपुर की रहने वाली गुड्डी के साथ हुई थी, जिस से उसे एक बेटी और 2 बेटे थे. राजकुमार के पड़ोस के गांव में रहता था प्रहलाद सिंह, जो ब्याज पर पैसे देने का काम करता था. राजकुमार अकसर प्रहलाद सिंह के घर जाया करता था. वह उस की पत्नी बिरमा को भाभी कहता था. न जाने क्यों बिरमा उस की खूब आवभगत करती थी. राजकुमार को भी वह अच्छी लगती थी. एक तो बिरमा का अच्छा लगना, दूसरे उस के द्वारा आवभगत करना, राजकुमार उस की ओर आकर्षित हो गया. फिर वह उसे अपनी बनाने के चक्कर में रहने लगा. दूसरी ओर बिरमा ब्याही भले प्रहलाद सिंह के साथ थी, लेकिन कभी उस ने उसे पसंद नहीं किया, इस की वजह यह थी कि प्रहलाद सिंह कमजोर दिमाग का था.

बिरमा उस के साथ बिलकुल खुश नहीं थी. इसीलिए राजकुमार के आने पर वह उस की खूब आवभगत करती थी. क्योंकि वह उसे पसंद करती थी. दोनों ओर से आकर्षण की डोर बढ़ी तो उसे जुड़ने में ज्यादा देर नहीं लगी. दोनों की मुलाकातों का सिलसिला चल निकला. लेकिन यह सब चोरीछिपे हो रहा था. बिरमा भी 1 बेटी और 2 बेटों की मां थी. वह रहती भले प्रहलाद सिंह के साथ थी, लेकिन वह पति राजकुमार को ही मानती थी. कोई बात आखिर कितने दिनों तक छिपी रह सकती है. धीरेधीरे गांव वालों को बिरमा और राजकुमार के संबंधों का पता चल गया.

कुछ लोगों ने प्रहलाद सिंह को आगाह भी किया, लेकिन उस में इतनी हिम्मत नहीं थी कि वह बिरमा को रोक सकता. दूसरी ओर राजकुमार भी दबंग किस्म का युवक था. इसलिए सब कुछ जानते हुए भी उसे कोई रोक नहीं सका. इस तरह राजकुमार और बिरमा बिना किसी रुकावट के एकदूसरे से मिलते रहे. लेकिन जब पति के इन संबंधों की जानकारी गुड्डी को हुई तो वह तनाव में रहने लगी. बिरमा की वजह से पतिपत्नी के बीच दूरियां पैदा होने लगीं. उस ने कई बार सास से शिकायत भी की, लेकिन मां भी बेटे को नहीं रोक पाई. लिहाजा इसी गम और चिंता में एक दिन गुड्डी चल बसी.

गुड्डी जब मरी थी, बच्चे छोटेछोटे थे. लेकिन राजकुमार ने दूसरी शादी नहीं की, क्योंकि उस का काम तो बिरमा से चल ही रहा था. अब वह पूरी तरह से आजाद था. प्रहलाद सिंह की गांव में ज्यादा बदनामी होने लगी तो उस ने अपना गांव छोड़ दिया और फिरोजाबाद के थाना लाइन पार के रामनगर गांव में अपना मकान बनवा कर परिवार के साथ रहने लगा. जिस बदनामी की वजह से प्रहलाद सिंह ने गांव छोड़ा था, उस ने यहां आने के बाद भी पीछा नहीं छोड़ा. बिरमा और राजकुमार के संबंध उसी तरह बने रहे. वह यहां भी लगातार आता रहा. फिरोजाबाद में बिरमा की दोस्ती ऊषा से हो गई तो वह उस के घर भी आनेजाने लगी.

यहीं ऊषा की मुलाकात राजकुमार से हुई. राजकुमार को पता चला कि ऊषा देहधंधा तो करती ही है, लड़कियां भी सप्लाई करती है तो उसे खुशी हुई. इस के बाद वह ऊषा के घर जा कर अपने लिए लड़कियां मंगवाने लगा. इस तरह शारीरिक सुख की चाह में वह ऊषा के घर भी जाने लगा. बिरमा को इस की जानकारी थी, लेकिन उसे इस से कोई मतलब नहीं था, क्योंकि राजकुमार अब भी उस पर दिल खोल कर पैसे खर्च करता था. लेकिन जब बिरमा की मुलाकात चिलवा गेट के रहने वाले अनुज यादव से हुई तो राजकुमार उसे खटकने लगा. अनुज भी सूदखोरी का काम करता था. वह भी बिरमा पर दिल खोल कर रुपए खर्च करने लगा था. था तो वह भी शादीशुदा और बालबच्चेदार, लेकिन जैसा कहा जाता है कि आदमी को घर की मुर्गी दाल बराबर लगती है, वैसा ही कुछ अनुज के साथ भी था.

इस नए प्रेमी के जिंदगी में आने के बाद बिरमा राजकुमार से दूरियां बनाने लगी. उस ने राजकुमार का फोन रिसीव करना भी बंद कर दिया. बिरमा के इस व्यवहार से राजकुमार को परेशानी होने लगी, क्योंकि उसी से मिल कर उस के दिल को तसल्ली मिलती थी. जब उसे बिरमा से कुछ ज्यादा ही उपेक्षा मिलने लगी तो एक दिन उस ने कहा, ‘‘बिरमा, इधर तुम बदल नहीं गई हो, लगता है मैं तुम्हें भारू लगने लगा हूं?’’

‘‘नहीं तो, यह तुम्हारा वहम है. मैं तुम्हें अभी भी उसी तरह चाहती हूं. लेकिन अब परेशानी की बात यह है कि बच्चे बड़े हो गए हैं. उन के सामने यह सब अच्छा नहीं लगता.’’

बिरमा राजकुमार से ये बातें कह ही रही थी कि तभी उस की बेटी आ गई. उसे देख कर राजकुमार मुसकराते हुए बोला, ‘‘तुम सही कह रही हो, बच्चे बड़े हो गए हैं. मैं ने तो इस बात पर ध्यान ही नहीं दिया.’’

राजकुमार ने बिरमा की बेटी को जिस तरह  देखा था, उस की नजरों में खोट था, जिसे बिरमा ने ताड़ लिया था. उस ने तुरंत बेटी को अंदर जाने का इशारा करते हुए राजकुमार से धीरे से कहा, ‘‘अब हम घर के बाहर मिले तो ज्यादा ठीक रहेगा.’’

बिरमा की बेवफाई राजकुमार की समझ में नहीं आ रही थी. उस की उपेक्षा से वह चिंतित था. उसे लगा, इस के पीछे जरूर कोई बात है. उस ने कोशिश की तो सच्चाई सामने आ गई. बिरमा और अनुज यादव के संबंधों की उसे जानकारी हो गई. बिरमा ने उसे शारीरिक सुख दिया था तो उस ने भी उस के बदले उस के लिए कम नहीं किया था. अब उसे चिंता थी कि अगर बिरमा हाथ से निकल गई तो उसे शारीरिक सुख कैसे मिलेगा? वह किसी भी कीमत पर उसे छोड़ना नहीं चाहता था. इसलिए उस ने बिरमा से पूछा, ‘‘अनुज यादव तुम्हारा कौन लगता है?’’

‘‘अनुज यादव से मेरा क्या संबंध? बस मोहल्ले में रहता है?’’ बिरमा ने कहा.

‘‘बिरमा, मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता. इसलिए कान खोल कर सुन लो, अगर हमारे बीच कोई आया तो मैं न तुम्हें जिंदा छोड़ूंगा और न उसे.’’ राजकुमार ने धमकी दी.

राजकुमार की इस धमकी से बिरमा परेशान जरूर हो गई, लेकिन अब वह अनुज को कतई नहीं छोड़ सकती थी. वह उसी की बदौलत राजकुमार से पीछा छुड़ाना चाहती थी. जबकि यह इतना आसान नहीं था. इसी वजह से दोनों के बीच तनाव बढ़ने लगा. जब राजकुमार को लगा कि बिरमा उस के बजाय अनुज को ज्यादा महत्त्व दे रही है तो उस ने अपनी लायसेंसी पिस्तौल से बिरमा के घर फायरिंग करते हुए धमकी दी कि अगर उस ने अनुज से संबंध खत्म नहीं किए तो अच्छा नहीं होगा. राजकुमार के तेवर देख कर बिरमा डर गई. बिरमा को लगने लगा कि राजकुमार कभी भी उस की बेटी पर हाथ डाल सकता है. यह बात उस ने अनुज से बता कर कहा, ‘‘अगर तुम मुझ से संबंध बनाए रखना चाहते हो तो राजकुमार नाम के इस कांटे को तुम्हें निकालना होगा.’’

अनुज को पता चल गया था कि राजकुमार दबंग किस्म का आदमी है. बिरमा के लिए वह उस की भी जान ले सकता है. इसलिए उस ने सोचा कि राजकुमार उस के साथ कुछ गड़बड़ करे, उस के पहले ही वह उसे ठिकाने लगा दे. इस के बाद उस ने ऊषा और बिरमा के साथ बैठ कर राजकुमार को ठिकाने लगाने की योजना बना डाली. योजना बनने के बाद ऊषा ने राजकुमार को फोन किया, ‘‘एक अच्छी लड़की आ गई है. अगर चाहो तो आ जाओ. लेकिन पैसा थोड़ा ज्यादा लगेगा.’’

राजकुमार ने कहा, ‘‘पैसे की कोई चिंता नहीं है. बस लड़की अच्छी होनी चाहिए.’’

‘‘लड़की अच्छी है, तभी तो फोन किया है.’’

‘‘फिर रात में मैं पहुंच रहा हूं.’’ कह कर राजकुमार ने फोन काट दिया.

शाम को राजकुमार ने घर वालों से कहा कि वह बहन के यहां जा रहा है. वह घर से निकला तो चचेरा भाई लक्ष्मीकांत दिखाई दे गया. लड़की के बारे में बता कर उस ने उसे भी साथ ले लिया. लक्ष्मीकांत भी विधुर था. शारीरिक सुख की लालसा से वह भी राजकुमार के साथ चल पड़ा. दोनों ऊषा के घर पहुंचे तो वहां बिरमा भी मौजूद थी. बिरमा और लड़की को देख कर राजकुमार ने कहा कि वह बिरमा के साथ मौजमस्ती करेगा और लक्ष्मीकांत लड़की के साथ. ऊषा ने लड़की के साथ लक्ष्मीकांत को संतनगर भेज दिया तो राजकुमार को बिरमा के साथ तिलकनगर के अन्य मकान में. राजकुमार अपनी पिस्तौल लिए था.

लेकिन जब वह बिरमा के साथ उस घर में पहुंचा तो वहां पहले से घात लगाए बैठे अनुज यादव, लाला पंडित और विजय सिंह उस पर टूट पड़े. अनुज यादव ने राजकुमार की हत्या के लिए उन दोनों को 2 लाख रुपए दिए थे. राजकुमार को पिस्तौल निकालने का मौका ही नहीं मिला. उन लोगों ने ईंटपत्थर से राजकुमार की हत्या कर दी. लक्ष्मीकांत लड़की के साथ संतनगर स्थित जिस मकान में आया था, थोड़ी देर बाद टाटा मैजिक से राजकुमार की लाश ले कर तीनों वहां पहुंचे. उन्हें देख कर वह हक्काबक्का रह गया. वह कुछ समझ पाता, गोली मार कर उस की भी हत्या कर दी गई.

इस के बाद उस की लाश को भी उसी टाटा मैजिक में डाल कर वे मैनपुरी को जाने वाली सड़क पर चल पड़े. रोड पर ही स्थित थानाकस्बा घिरोर के पास गांव नंगला केहरी के शिवमंदिर के पास दोनों लाशें फेंक कर अपनेअपने घर चले गए. थाना घिरोर पुलिस ने ऊषा और बिरमा को गिरफ्तार कर हत्या का खुलासा तो कर दिया, लेकिन अभी मुख्य अभियुक्त उन के हाथ नहीं लगे थे. देवेश कुमार मुख्य अभियुक्तों तक पहुंचते, उस के पहले ही उन का तबादला हो गया. उस के बाद आए नए थानाप्रभारी दिवाकर सिंह यादव. उन्होंने काफी कोशिश कर के अनुज यादव को गिरफ्तार कर लिया.

पूछताछ में अनुज यादव ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया, लेकिन वह राजकुमार की मोटरसाइकिल, पिस्तौल और मोबाइल नहीं बरामद कर सके. उस का कहना था कि इन चीजों के बारे में लाला पंडित और गुन्नू यादव उर्फ विजय सिंह ही कुछ बता सकते हैं. अनुज यादव की गिरफ्तारी के बाद लाला पंडित और विजय सिंह को लगा कि वे कभी भी पकड़े जा सकते हैं. पकड़े जाने के डर से दोनों ने अदालत में आत्मसमर्पण कर दिया. पुलिस पूछताछ तथा सामान की बरामदगी के लिए उन्हें रिमांड पर लेने की कोशिश कर रही थी. लेकिन कथा लिखे जाने तक उन्हें रिमांड पर नहीं लिया जा सका था. Hindi Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Rajasthan Crime Story: आखिर माता बनी कुमाता – बेटे का अत्याचार

Rajasthan Crime Story: राजस्थान के भरतपुर जिले और उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले की सीमाएं एकदूसरे से सटी हुई हैं. इसी सीमा पर भरतपुर जिले की ग्राम पंचायत जाटौली रथभान का गांव कोलीपुरा बसा हुआ है. इसी साल 21 मार्च की बात है. पौ फट गई थी, लेकिन सूरज निकलने में अभी देर थी. कुछ लोग खेतों की तरफ जा रहे थे, तभी उन्होंने कोलीपुरा गांव के पास एक खेत में एक युवक का शव पड़ा देखा. कुछ लोगों ने शव के पास जा कर देखा. वहां शराब की बोतल, गिलास, नमकीन और पानी के पाउच पड़े थे.

खेत में लाश मिलने की बात जल्दी ही आसपास के गांवों में फैल गई. इस के बाद कोलीपुरा समेत दूसरे गांवों के लोग भी मौके पर जमा हो गए. किसी गांव वाले ने पुलिस को इस की सूचना दे दी. सूचना मिलने पर भरतपुर जिले की चिकसाना थाना पुलिस मौके पर पहुंच गई. पुलिस ने लाश का मुआयना किया. करीब 25 साल के उस युवक की कनपटी पर गोली लगी हुई थी. लग रहा था कि उसे नजदीक से गोली मारी गई थी. पुलिस ने वहां इकट्ठा लोगों से मृतक युवक के बारे में पूछताछ की. लोगों ने शव देख कर उस की शिनाख्त कर ली. उस का नाम जितेंद्र उर्फ टल्लड़ था. वह मथुरा जिले के ओल गांव के रहने वाले नत्थी सिंह का बेटा था.

कोलीपुरा गांव में जिस जगह जितेंद्र की लाश मिली थी, वह जगह उस के गांव से करीब दोढाई किलोमीटर ही दूर थी. उस जगह से कुछ ही दूरी पर शराब का ठेका भी था. पुलिस ने मौके पर मौजद कोलीपुरा गांव के लोगों से पूछताछ की. इस में पता चला कि एक दिन पहले यानी 20 मार्च की शाम को 7-8 बजे के आसपास गांव वालों ने 3-4 युवकों को उस जगह देखा था.

गांव वालों से पूछताछ में जो बातें पता चलीं, उस से पुलिस ने अंदाजा लगाया कि जितेंद्र अपने दोस्तों के साथ रात में खाली खेत में शराब पी रहा होगा. इस दौरान किसी बात पर उन दोस्तों में झगड़ा हो गया होगा. झगड़े में ही किसी ने उसे गोली मार दी होगी. गोली पास से मारी गई, जो उस की आंख के नीचे कनपटी पर धंस गई.

लाश की शिनाख्त हो गई थी. मृतक जितेंद्र का गांव भी वहां से ज्यादा दूर नहीं था. इसलिए थानाप्रभारी ने एक सिपाही ओल गांव भेज कर उस के घर वालों को मौके पर बुला लिया. घर वालों ने लाश की शिनाख्त जितेंद्र के रूप में कर दी. उन्होंने पुलिस को बताया कि जितेंद्र कल शाम को आसपास घूमने जाने की बात कह कर घर से निकला था. इस के बाद वह रात को घर नहीं लौटा. रात को उस की तलाश भी की, लेकिन पता नहीं चला.

पुलिस ने जितेंद्र के घर वालों से जरूरी पूछताछ की. इस के बाद लाश पोस्टमार्टम के लिए सरकारी अस्पताल भिजवा दी. पोस्टमार्टम कराने के बाद उसी दिन पुलिस ने लाश जितेंद्र के घर वालों को दे दी. एकलौते जवान बेटे जितेंद्र की लाश देख कर उस की मां गीता दहाड़े मार कर रोने लगी. जितेंद्र की मौत से दुखी दोनों बहनों और बहनोइयों की आंखों से भी आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे. जवान मौत का गम तो पूरे गांव को था. फिर वे तो घर के लोग थे. उन का रोना, विलाप करना स्वाभाविक था.

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मृतक के चाचा राधाचरण ने जितेंद्र की हत्या का मामला भरतपुर जिले के चिकसाना पुलिस थाने में दर्ज करा दिया. थानाप्रभारी रामनाथ सिंह गुर्जर ने इस मामले की जांच खुद अपने हाथ में ले ली. मृतक जितेंद्र के पिता नत्थी सिंह की मौत हो चुकी थी. जितेंद्र शादीशुदा था. करीब 9 महीने पहले उस की शादी ज्योति से हुई थी. ज्योति के साथ वह खुश था. पतिपत्नी में किसी तरह की कोई अनबन नहीं थी. दोनों का दांपत्य जीवन सुखी था.

परिवार में केवल 2 ही प्राणी थे. जितेंद्र की मां गीता और उस की पत्नी ज्योति. पुलिस ने इन दोनों से पूछताछ की, लेकिन न तो कातिलों के बारे में कुछ पता चला और न ही कत्ल के कारण का राज सामने आया. पुलिस ने ओल गांव के लोगों से भी पूछताछ की, लेकिन कोई खास बात पता नहीं चली. यह बात जरूर पता चली कि जितेंद्र के घर उस की 2 शादीशुदा बहनों और बहनोइयों का आनाजाना रहता था. पुलिस ने दोनों बहनोइयों विपिन और सुनील से भी पूछताछ की, लेकिन जितेंद्र की हत्या के बारे में ऐसा कोई सुराग नहीं मिला, जिस से कातिलों तक पहुंचा जा सके.

जांचपड़ताल में मृतक जितेंद्र की किसी से दुश्मनी या खराब चालचलन की बात भी सामने नहीं आई. यह पता चला कि जितेंद्र शराब पीने का आदी था. शराब पी कर वह घर में क्लेश और अपनी मां से मारपीट करता था. जितेंद्र के घर वालों और गांव वालों से पूछताछ में कोई बात पता नहीं चलने पर पुलिस ने ओल गांव से कोलीपुरा तक 2 किलोमीटर के दायरे में लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखने का फैसला किया.

सीसीटीवी फुटेज में एक पलसर बाइक पुलिस के संदेह के दायरे में आई. पुलिस ने नंबरों के आधार पर इस बाइक के मालिक का पता लगाया. इस के बाद पुलिस ने महेंद्र ठाकुर को पकड़ा. वह मथुरा जिले के फरह थानांतर्गत परखम गांव का रहने वाला है. सख्ती से पूछताछ में महेंद्र ठाकुर ने जितेंद्र की हत्या का राज उगल दिया. उस ने जो बताया, उस से पुलिस को भी एक बार तो भरोसा नहीं हुआ कि कोई मां भी अपने बेटे को मरवा सकती है.

पुलिस ने महेंद्र ठाकुर को गिरफ्तार कर लिया. उस से पूछताछ के आधार पर मृतक के बहनोई विपिन को भी गिरफ्तार कर लिया. विपिन मथुरा जिले के फरह थाना इलाके के गांव सनोरा का रहने वाला है. विपिन से पूछताछ के बाद पुलिस ने पहली अप्रैल को जितेंद्र की मां गीता देवी को भी गिरफ्तार कर लिया. इन से पूछताछ में जो कहानी उभर कर सामने आई, वह एक मां की अपनी कोख से पैदा किए एकलौते बेटे के प्रति नफरत की इंतहा की कहानी है. मथुरा जिले के ओल गांव के रहने वाले नत्थी सिंह के परिवार में उस की पत्नी गीता देवी के अलावा 2 बेटियां और एक बेटा था. नत्थी के पास खेतीबाड़ी थी. इस से अच्छी गुजरबसर हो जाती थी. घरपरिवार में मौज थी. किसी तरह की कोई कमी नहीं थी.

नत्थी सिंह की कुछ साल पहले मृत्यु हो गई. गीता देवी पर परिवार की जिम्मेदारी आ गई. दोनों बेटियां जवान हो रही थीं. इसलिए उसे उन के हाथ पीले करने की ज्यादा फिक्र थी. रिश्तेदारों से पूछ परखने के बाद उस ने अपनी दोनों बेटियों की शादी पास के ही गांव सनोरा में एक ही परिवार में तय कर दी. सनोरा गांव भी मथुरा जिले के फरह थाना इलाके में आता है. गीता ने सनोरा गांव के रहने वाले विपिन से बड़ी बेटी की शादी कर दी और विपिन के

छोटे भाई सुनील से छोटी बेटी की शादी कर दी. बेटियों की शादी के बाद गीता देवी के सिर से एक बोझ सा उतर गया. उस की आधी चिंता खत्म हो गई. दोनों बेटियां पास के ही गांव में ब्याही थीं, इसलिए उन का जब मन होता, मां गीता के पास आ जाती थीं. गीता का दोनों बेटियों से ज्यादा मोह था. इसलिए बेटी या जमाई आते तो वह खुले हाथ से उन पर पैसे खर्च करती थी. उन्हें दान या शगुन देने में कोई कंजूसी नहीं करती थी.

कभी कोई दुखतकलीफ होती तो गीता फोन कर दोनों में से किसी भी बेटी को अपने पास बुला लेती. 2-4 दिन रुक कर वे चली जातीं. गीता का मन अपनी बेटियों में ज्यादा लगता था. होने को तो वे जितेंद्र की ही बहनें थी, लेकिन मां का बेटियों के प्रति लाडप्यार देख कर जितेंद्र को कोफ्त होती थी. जितेंद्र शराब पीता था. उस की इस बुरी लत पर मां टोकती थी. बहनें जब घर पर होतीं, तो वे भी जितेंद्र को लताड़ लगाती थीं. मां और बहनों के टोकने पर उसे बुरा लगता था. ऐसा 1-2 बार नहीं, बीसियों बार हुआ. धीरेधीरे जितेंद्र के मन में मां और बहनों के प्रति गुस्सा बढ़ने लगा.

शराब पीने के बाद जितेंद्र कई बार अपनी मां से मारपीट करने लगा. पहले तो मां और बहनबहनोइयों ने उसे समझाया, लेकिन उस के दिमाग में यह बात बैठ गई कि मां उस से ज्यादा प्यार दोनों बहनों को करती है. इस से जितेंद्र के मन में हीनभावना बढ़ती गई. वह मां की बातों पर ऐतराज जताने लगा. मां जब अपनी बेटियों और जमाई को पैसे या कोई सामान देती तो जितेंद्र को बुरा लगता था. वह घर में मां से झगड़ा करता और उसे पीटता था.

बुढ़ापे की ओर बढ़ रही गीता बेटे की रोजरोज की पिटाई को आखिर कब तक बरदाश्त करती. घर में हालत यह हो गए कि मां और बेटा दोनों एकदूसरे से नफरत करने लगे. दोनों नफरत की आग में जलते थे. जितेंद्र तो अपनी नफरत की आग को मां की पिटाई कर शांत कर लेता था, लेकिन गीता क्या करती? वह जवान बेटे का मुकाबला भी नहीं कर सकती थी.

एक दिन गीता ने अपने बड़े जमाई विपिन को घर बुला कर सारी बातें बताईं. विपिन को पहले से ही अपने साले जितेंद्र की सारी हरकतों के बारे में पता था. विपिन को यह भी पता था कि जितेंद्र को समझानेबुझाने का कोई फायदा नहीं है. उस ने अपनी सास को कोई न कोई रास्ता निकालने का भरोसा दिया और यह सुझाव दिया कि जितेंद्र की शादी कर दी जाए. हो सकता है शादी के बाद वह सुधर जाए.

गीता को भी यह बात ठीक लगी. उस ने रिश्ता ढूंढ कर पिछले साल जितेंद्र की शादी कर दी. ज्योति से उस की शादी धूमधाम से हो गई. गीता ने सोचा था कि शादी के बाद बेटा सुधर जाएगा. शादी का लड्डू खा कर जितेंद्र ज्योति के साथ खुश था. इसी हंसीखुशी के बीच, शादी के कुछ समय बाद ही ज्योति गर्भवती हो गई. ज्योति के गर्भवती होने से जितेंद्र खुश था, लेकिन गीता के मन में इस की जरा भी खुशी नहीं थी. बेटे के अत्याचारों से नफरत की आग में सुलगती गीता नहीं चाहती थी कि घर में कोई नया वारिस आए. इसलिए उस ने बहू ज्योति को भरोसे में ले कर उस का ढाई महीने का गर्भपात करा दिया.

दरअसल, गीता के पास करीब 50 लाख रुपए की संपत्ति थी. यह संपत्ति वह अपनी दोनों बेटियों को देना चाहती थी. बेटे जितेंद्र को संपत्ति में से फूटी कौड़ी भी नहीं देना चाहती थी. जितेंद्र जब गीता को पीटता था, तो वह कई बार यह बात कह चुकी थी. जितेंद्र को भी इस का अंदेशा था कि पैतृक संपत्ति में से मां उसे कुछ नहीं देगी. इसीलिए वह मां पर अत्याचार और अपनी बहनों का विरोध करता था. शादी के बाद भी बेटा जितेंद्र नहीं सुधरा. वह अपनी मां पर अत्याचार करता रहा, तो गीता उस से तंग आ गई. उस ने अपने बड़े जमाई विपिन के साथ मिल कर जितेंद्र की रोजरोज की पिटाई से छुटकारा पाने के लिए उस का काम तमाम करने की योजना बनाई.

विपिन को इस में अपना फायदा नजर आया. एक तो जितेंद्र मां के लाडप्यार के कारण अपनी बहनों से भी नफरत करता था. इसलिए विपिन ने सोचा कि यदि जितेंद्र नाम का कांटा निकल जाएगा तो नफरत की झाड़ी हमेशा के लिए कट जाएगी. फिर सास गीता भी बेटे की रोज की पिटाई से बच जाएगी. इस के अलावा गीता की संपत्ति भी उस के हाथ में आ जाएगी. विपिन ने अपनी सास के भरोसे का फायदा उठाया. योजना के तहत, उस ने सास का खाता अपने नजदीकी बैंक में ट्रांसफर करवा लिया और खुद नौमिनी बन गया. गीता के बैंक खाते में करीब 7 लाख रुपए थे.

गीता ने विपिन की मदद से इसी साल जनवरी महीने में मथुरा जिले के कुख्यात सुपारी किलर छविराम ठाकुर के गैंग को अपने बेटे जितेंद्र की हत्या की 3 लाख रुपए की सुपारी दे दी. उसी दिन एडवांस के रूप में उसे 50 हजार रुपए भी दे दिए. छविराम ठाकुर ने अपनी गैंग के शार्पशूटर महेंद्र ठाकुर को जितेंद्र की हत्या का जिम्मा सौंप दिया.

योजनाबद्ध तरीके से महेंद्र ठाकुर ने शराब पिलाने के बहाने जितेंद्र से दोस्ती की. इस के बाद 20 मार्च की शाम महेंद्र ने जितेंद्र को बुलाया. महेंद्र के साथ एकदो लोग और भी थे. उन्होंने कोलीपुरा गांव के पास ठेके से शराब खरीदी. इन सभी ने पास ही एक खाली खेत में बैठ कर शराब पी. रात करीब 8-साढ़े 8 बजे शराब का दौर खत्म हुआ तो जितेंद्र ने अपने घर जाने की बात कही. महेंद्र ने उसे पकड़ कर वापस बैठा लिया और तमंचा निकाल कर उस की कनपटी पर गोली मार दी. जितेंद्र कुछ बोलता, उस से पहले ही उस के प्राण निकल गए.

सीसीटीवी फुटेज के आधार पर महेंद्र ठाकुर की गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने जितेंद्र की हत्या के मामले में उस के बहनोई विपिन और मां गीता को भी गिरफ्तार कर लिया. गीता को अपने ही बेटे की हत्या कराने का कतई मलाल नहीं था. उस ने कहा, ‘‘मैं ने उसे जनम दिया और मैं ने ही उसे मरवा दिया, इस का कोई अफसोस नहीं है. पति की मौत के बाद दोनों बेटियां ही मेरा खयाल रखती  थीं. बेटा तो रोज पैसे मांगता और मारपीट करता था. कभी बेटियां मेरे पास आ जातीं, तो वह उन का विरोध करता था.

‘‘वह मेरे बैंक खाते और सारी संपत्ति का अकेला ही मालिक बनना चाहता था. मैं ने उसे कई बार समझाया, लेकिन वह किसी भी कीमत पर दोनों बहनों को स्वीकार नहीं करता था. मैं उस की रोजरोज की कलह से तंग आ गई थी. इसलिए उसे रास्ते से हटाना ही उचित समझा. कोई नया वारिस न आए, इसलिए बहू ज्योति का भी गर्भपात करा दिया.’’ सभी आरोपियों से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उन्हें कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया. Rajasthan Crime Story

UP News: प्यार में खत्म हुई ‘सीमा’

UP News: नाबालिग सीमा अपने प्रेमी प्रभु के साथ भाग गई थी. पुलिस ने सीमा को बरामद कर के प्रभु को गिरफ्तार भी कर लिया. इस के बावजूद जब सीमा की हत्या हो गई तो पुलिस को संदेह उस के घर वालों पर ही हुआ. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बरेली जनपद के थाना विशारतगंज के मोहल्ला वार्ड नंबर 11 में भूरे खां अपने परिवार के साथ रहता था. भूरे के परिवार में पत्नी नसीम, 6 बेटियां और 2 बेटे थे. इन में केवल सब से बड़ी सकीना का विवाह हुआ था, बाकी सभी अविवाहित थे.

इश्तियाक दिल्ली में किसी फैक्ट्री में नौकरी करता था. मुश्ताक भी कुछ दिनों तक दिल्ली में रहा था, लेकिन इधर वह घर पर ही रह रहा था. पूरा परिवार जरी का काम करता था, जिस से होने वाली कमाई से उन के घर का खर्च आसानी से चल रहा था. भूरे की 15 साल की बेटी सीमा किशोरावस्था की सीमा पार कर के जवानी की दहलीज पर कदम रख रही थी. जवानी की चमक से उस का रूपरंग दमकने लगा था. वह ज्यादा पढ़ीलिखी नहीं थी, इस के बावजूद उसे फिल्मों का जबरदस्त शौक था. उस की सहेलियां भी उसी जैसी सोच की थीं. इसलिए उन में जब भी बातें होतीं, फिल्मों और उन में दिखाए जाने वाले प्रेमसंबंधों को ले कर होतीं.

यह उम्र का ही तकाजा था कि सीमा को उन बातों में खूब मजा आता था. उस के दिल में भी उमंगें थीं, उस के ख्यालों में भी अपने चाहने वाले की तस्वीर थी. लेकिन यह तस्वीर कुछ धुंधली सी थी. उस की आंखें ख्यालों की तस्वीर के चाहने वाले की तलाश किया करती थीं. लेकिन काफी कोशिशों के बाद भी वह धुंधली तस्वीर साफ हो रही थी और न वह कहीं नजर आ रहा था. उस के आगेपीछे चक्कर लगाने वाले लड़के कम नहीं थे, लेकिन उन में से एक भी ऐसा नहीं था, जो उस के ख्यालों की तस्वीर में फिट बैठता.

2 साल पहले सीमा पिता भूरे के साथ एक रिश्तेदारी में बरेली के ही एक गांव रेवती गई. यह गांव उस के गांव से ज्यादा दूर नहीं था. लौटते समय वह रेवती रेलवे स्टेशन पर खड़ी ट्रेन का इंतजार कर रही थी, तभी एक वेंडर युवक पानी की बोतल बेचते हुए उस के पास से गुजरा. उस लड़के में सीमा ने न जाने क्या देखा कि उस का दिल एकदम से धड़क उठा. उस की निगाहें उस पर टिक कर रह गई. उस के दिल से आवाज आई, ‘सीमा यही है तेरा चाहने वाला.’

उस युवक का चेहरा आंखों के रास्ते दिल में पहुंचा तो उस के ख्यालों में बनी धुंधली तस्वीर, बिलकुल साफ हो गई. वह युवक जब तक उस की नजरों के सामने रहा, सीमा उसे एकटक निहारती रही. उसे अपनी ओर इस तरह निहारते देख वह युवक भी बारबार उसी को देखने लगा. जब उन की निगाहें आपस में मिल जातीं तो दोनों के होंठों पर मुसकराहट तैर उठती. ट्रेन आई तो सीमा पिता के साथ ट्रेन में बैठ गई. पूरे रास्ते उस की आंखें के सामने उसी युवक का चेहरा घूमता रहा.

वह विशारतगंज रेलवे स्टेशन पर ट्रेन से उतर कर स्टेशन से बाहर आई तो उस नवयुवक को एक अंडे की दुकान पर देखा. वह ग्राहकों को अंडे बेच रहा था. इस का मतलब वह दुकान उसी की थी. इस का मतलब युवक विशारतगंज का रहने वाला था. यह जान कर सीमा को काफी खुशी हुई. उस ने सोचा कि वह जब भी चाहेगी, उस युवक के बारे में पता कर के उस से मिल सकेगी. यह बात दिमाग में आते ही उसे काफी सुकून मिला. वह पिता के साथ घर आ गई.

सीमा ने जल्दी ही उस युवक के बारे में पता कर लिया. उस का नाम था प्रभु गोस्वामी. वह वार्ड नंबर 6 में रहता था. उस के पिता महेश की मौत हो चुकी थी. परिवार में मां और 2 छोटे भाई थे. घर प्रभु की ही कमाई से चल रहा था. रेलवे स्टेशन के पास वह अंडे की दुकान लगाता था, साथ ही स्टेशन और ट्रेन में पानी की बोतलें बेच लेता था. एक दिन सुबह प्रभु छत पर बैठा मौसम का आनंद ले रहा था, तभी अचानक उस के मोबाइल की घंटी बज उठी. इतनी सुबह फोन करने वाला उस का कोई दोस्त ही होगा, यह सोच कर वह मोबाइल स्क्रीन पर नंबर देखे बगैर ही बोला, ‘‘हां बोल?’’

‘‘जी, आप कोन बोल रहे हैं?’’ दूसरी ओर से किसी लड़की की मधुर आवाज आई तो प्रभु चौंका. उसे अपनी गलती का अहसास हुआ तो उस ने तुरंत ‘सौरी’ कहते हुए कहा, ‘‘माफ करना, दरअसल मैं ने सोचा कि इतनी सुबहसुबह कोई दोस्त ही फोन कर सकता है, इसीलिए… वैसे आप को किस से बात करनी है, आप कौन बोल रही हैं?’’

‘‘मैं सीमा बोल रही हूं. मुझे भी अपनी दोस्त से बात करनी थी. लेकिन लगता है नंबर गलत डायल हो गया है.’’

‘‘कोई बात नहीं, आप को अपनी दोस्त का नंबर सेव कर के रखना चाहिए. ऐसा करेंगी तो गलती नहीं होगी.’’

‘‘आप पुलिस में हैं क्या?’’

‘‘नहीं तो, क्यों?’’

‘‘बात तो पुलिस वालों की ही तरह कर रहे हो. सवाल के साथ सलाह भी.’’ कह कर सीमा जोर से हंसी.

‘‘अरे नहीं, मैं ने तो वैसे ही कह दिया. दोस्त आप की, फोन भी आप का. आप चाहें नंबर सेव करें या न करें.’’

‘‘आप बुजुर्ग हैं?’’ सीमा ने फिर छेड़ा.

‘‘जी नहीं, अभी मैं नौजवान हूं.’’

‘‘तब तो किसी न किसी के खास होंगे?’’

‘‘आप बहुत बातें करती हैं.’’

‘‘अच्छी या बुरी?’’

‘‘अच्छी.’’

‘‘क्या अच्छा है मेरी बातों में?’’

अब हंसने की बारी प्रभु की थी. वह जोर से हंसा फिर बोला, ‘‘माफ करना, मैं आप से नहीं जीत सकता.’’

‘‘और मैं माफ न करूं तो?’’

‘‘तो आप ही बताएं, मैं क्या करूं?’’ प्रभु ने हथियार डाल दिए.

‘‘अच्छा जाओ, माफ किया.’’

दरअसल, सीमा ने किसी तरह प्रभु का मोबाइल नंबर हासिल कर लिया था. सीमा के पास खुद का मोबाइल नहीं था. इसलिए उस ने अपनी सहेली का मोबाइल ले कर बात की थी. पहली ही बातचीत में दोनों काफी घुलमिल गए. उन के बीच कुछ ऐसी बातें हुईं कि दोनों ही एकदूसरे के लिए अपनापन महसूस करने लगे. इस के बाद उन के बीच अक्सर बातें होने लगीं. सीमा ने प्रभु को बता दिया था कि उस दिन उस ने अनजाने में नहीं, जानबूझ कर फोन किया था और वह भी उस का नंबर हासिल कर के. इतना ही नहीं, उन की मुलाकात भी हो चुकी है.

जब प्रभु ने मुलाकात के बारे में पूछा तो सीमा ने रेवती रेलवे स्टेशन पर हुई मुलाकात के बारे में बता दिया. प्रभु यह जान कर खुश हआ, क्योंकि उस दिन सीमा का खूबसूरत चेहरा आंखों के जरिए उस के दिल में उतर चुका था. इस के बाद दोनों की मुलाकातें होने लगीं. दिनोंदिन उन का प्यार प्रगाढ़ होता गया. सीमा दीवानगी की हद तक प्रभु को चाहने लगी थी. प्रभु इस बात को बखूबी जानता था, लेकिन उस के दिमाग में जातिधर्म की बात बैठी हुई थी, इसलिए उसे हमेशा सीमा को खो देने का डर सताता रहता था. प्रेम दीवानों के प्रेम की खुशबू जब जमाने तक पहुंचती है तो लोग उन दीवानों पर तमाम बंदिशें लगाने लगते हैं. यही सीमा के घर वालों ने भी किया.

सीमा का गैरधर्म के लड़के के साथ इश्क लड़ाना घर वालों को रास नहीं आया. उन्होंने सीमा पर प्रतिबंध लगाने शुरू कर दिए. लेकिन तमाम बंदिशों के बाद भी सीमा प्रभु से मिलने का मौका निकाल ही लेती थी. इसी बीच एक मुलाकात में प्रभु को उदास देखा. सीमा ने कारण पूछा, ‘‘तुम्हारे दिल में ऐसी क्या बात है, जिस की वजह से तुम्हारे चेहरे पर उदासी छाई है?’’

‘‘कुछ नहीं, तुम्हें ऐसे ही लग रहा है.’’ प्रभु ने टालने की कोशिश की.

‘‘मुझे ऐसे ही नहीं लग रहा, कोई बात है जिस की वजह से तुम उदास हो. तुम्हें मेरी कसम, बताओ क्या बात है?’’

‘‘सीमा मुझे डर है कि मैं तुम्हें खो न दूं.’’

‘‘क्यों, तुम्हें ऐसा क्यों लगता है?’’

‘‘हम दोनों की जाति तो छोड़ो, धर्म भी अलगअलग है. ऐसे में घर समाज ही नहीं, घर वाले ही हमारी शादी के लिए नहीं राजी होंगे.’’

‘‘सच्चा प्यार ऊंचनीच और जातिधर्म का मोहताज नहीं होता. लोग कहते हैं न कि जोडि़यां ऊपर वाला बनाता है. इसलिए हम दोनों में प्यार हुआ है तो इस का मतलब है कि ऊपर वाले को हमारा प्यार मंजूर है. फिर इस में संदेह की कोई बात कहां है.’’

‘‘लेकिन तुम्हरे घर वाले तो हमें दूर करने के लिए जमीनआसमान एक किए हुए हैं.’’

‘‘चिंता मत करो, मैं अपने घर वालों को किसी न किसी तरह समझा लूंगी. अगर नहीं समझा पाई तो हमारे सामने और भी रास्ते हैं. देखो प्रभु, हमें दुनिया से जितना लड़ना पड़े, हम लड़ेंगे और जीतेंगे भी. कोई ताकत हमें जुदा नहीं कर सकती.’’

इतना कह कर सीमा प्रभु के सीने से लग गई. ऐसी विपरीत परिस्थिति में भी सीमा ने हार नहीं मानी. उस की हिम्मत उस का प्यार था, जिसे वह हर हाल में अपने से जुदा नहीं कर सकती थी. फिर कुछ देर और बात कर के दोनों अपनेअपने घरों को लौट गए. सीमा ने अपने घर वालों से बात की, लेकिन वे राजी नहीं हुए, उल्टे उस की पिटाई कर दी. बंदिशों के बाद भी उन के चोरीछिपे मिलने की भनक सीमा के घरवालों को लग ही जाती थी. उसी बीच रामलीला मेले में प्रभु पर चाकू से जानलेवा हमला किया गया. लेकिन संयोग था कि प्रभु बच गया. पुलिस में शिकायत भी की गई, लेकिन पुलिस ने कोई काररवाई नहीं की.

इस घटना ने सीमा को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि अगर वे यहां रहें तो दोनें की जान को खतरा बना रहेगा. उन दोनों को अलग करने के लिए उस के घर वाले किसी भी हद तक जा सकते हैं, इसलिए उस ने एक फैसला लिया. 18 फरवरी को सीमा रेलवे स्टेशन पहुंची और प्रभु से भाग चलने की जिद करने लगी. प्रभु तैयार नहीं हुआ तो वह वहां खड़ी सद्भावना एक्सप्रेस के आगे लेट गई और जान देने की धमकी देने लगी. हार कर प्रभु को उस की बात माननी पड़ी. वह सीमा को वहां से अपने घर ले गया और छिपा दिया. रात में दोनों रेलवे स्टेशन पहुंचे और ट्रेन से हिमाचल प्रदेश चले गए. प्रभु घर से 10 हजार रुपए ले कर गया था. वहां दोनों ने विवाह कर लिया और पतिपत्नी की तरह रहने लगे.

इधर सीमा के घर वालों को प्रभु के साथ उस के भाग जाने की खबर लगी तो उन्होंने उस की खोजबीन शुरू कर दी. काफी खोजबीन के बाद भी जब उस का कुछ पता नहीं चला तो एक मार्च को सीमा के पिता भूरे ने विशारतगंज थाने में प्रभु और उस के चाचा रमेश पर तमंचे की नोक पर सीमा का अपहरण करने का आरोप लगाते हुए तहरीर दी. थानाप्रभारी शुजाउर रहीम ने प्रभु और रमेश के विरूद्ध भादंवि की धारा 363, 366, 452, 504 के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया. मुकदमा दर्ज होने के बाद पुलिस ने प्रभु के घरवालों और रिश्तेदारों पर दबाव बनाना शुरू किया तो प्रभु ने होली के एक दिन पहले 5 मार्च को एक भाजपा नेता के माध्यम से सीमा को पुलिस के हवाले कर दिया.

पुलिस ने उसे महिला थाना भेजने के बजाय बिना मैडिकल कराए ही परिजनों के हवाले कर दिया. 9 मार्च को उस के कोर्ट में बयान होने थे. इसी बीच 8 मार्च को देर रात पुलिस ने प्रभु को भी गिरफ्तार कर लिया.  9 मार्च की सुबह साढ़े 7 बजे भूरे विशारतगंज थाने पहुंचा कि किसी नकाबपोश ने सुबह 4 बजे सीमा की हत्या कर दी है. उस समय घर का मेनगेट खुला हुआ था. सीमा की मां नसीम टौयलेट गई थी, बाकी लोग सो रहे थे. अचानक गोली चलने की आवाज सुनाई दी तो सभी उठ कर दौड़े. पास जा कर देखा तो सीमा के सिर से खून बह रहा था और उस का शरीर शिथिल पड़ चुका था. उस की मौत हो चुकी थी. उन्होंने एक नकाबपोश को वहां से भागते देखा था, वह कोई और नहीं प्रभु था.

उस का आरोप सुन कर थानाप्रभारी शुजाउर रहीम ने कहा कि प्रभु तो उन की हिरासत में है, वह कैसे खून कर सकता है? बहरहाल, शुजाउर रहीम पुलिस फोर्स के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. मामले की गंभीरता को देखते हुए उन्होंने घटना की जानकारी उच्चाधिकारियों को दे दी और खुद सिपाहियों के साथ घटनास्थल के लिए रवाना हो गए. कुछ ही देर में एसपी (ग्रामीण) ब्रजेश श्रीवास्तव और सीओ (आंवला) धर्म सिंह मार्छाल भी घटनास्थल पर पहुंच गए. सीमा के सिर में काफी गहरा घाव था, जिस से अनुमान लगाया कि हत्यारे ने बहुत नजदीक से गोली चलाई थी. पुलिस अधिकारियों ने घर वालों से पूछताछ की तो सभी के बयान अलगअलग थे. शुरुआती जांच में और अब तक की पूछताछ में यह मामला औनर किलिंग का लग रहा था.

घटना के बाद से ही सीमा का बड़ा भाई इश्तियाक घर से गायब था. पुलिस ने आसपड़ोस में पूछताछ की तो पता चला कि देर रात तक सीमा के घरवाले जागते रहे थे. सीमा से लड़ाईझगड़ा होने की बात भी सामने आई. देर रात तक उन के घर में अफरातफरी का माहौल बना रहा था. उस के बाद कुछ समय के लिए सब शांत हो गया. सुबह 4 बजे गोली चलने की आवाज आई और फिर उस के बाद रोनेपीटने की आवाजें आने लगीं. इस के बाद सीमा की हत्या किए जाने की बात सामने आई. सीमा की हत्या में सारे हालात किसी अपने की ओर इशारा कर रहे थे. वह अपना कोई और नहीं, उस का बड़ा भाई इश्तियाक हो सकता था. वही घर से गायब था और उस का मोबाइल भी बंद था.

पूछताछ के बाद सीमा की लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी गई. इस के बाद पुलिस ने घर की तलाशी ली, लेकिन कुछ खास हाथ नहीं लगा. आगे की जांच में पता चला कि घटना की रात सीमा का मामा गुड्डू भी आया था. गुड्डू बरेली के थाना सिरौल के गांव हरदासपुर में रहता था. पुलिस ने उस के घर छापा मारा तो वह घर में ही था. लेकिन पुलिस को देखते ही वह छत के रास्ते भागने में सफल हो गया.

14 मार्च को थानाप्रभारी शुजाउर रहीम, एसआई चमन सिंह, प्रताप सिंह और अतुल दुबे की टीम ने गुड्डू को बदायूं के कुंवरगांव से गिरफ्तार कर लिया. उस के पास से हत्या में प्रयुक्त 315 बोर का तमंचा भी बरामद हो गया. दरअसल, सीमा का मामा गुड्डू पंजाब में फेरी लगा कर कबाड़ी का काम करता था. उसे फोन से सीमा के गैर धर्म के लड़के के साथ भाग जाने की जानकारी मिली तो वह क्रोध से जल उठा. जब पुलिस ने सीमा को बरामद कर घर वालों के हवाले किया तो गुड्डू ने भूरे से सीमा को समझाने को कहा. लेकिन सीमा प्रभु के पास जाने की जिद पर अड़ी थी. गुड्डू ने भी उसे समझाने की बहुत कोशिश की, लेकिन वह नहीं मानी. इस के बाद गुड्डू के सामने एक ही रास्ता बचा कि वह सीमा को खत्म कर दे.

8 मार्च की सुबह वह हावड़ा-अमृतसर एक्सपे्रस टे्रन से बरेली के आंवला स्टेशन पर उतरा. वहां से वह अपने गांव हरदासपुर गया और शाम को विशारतगंज आ गया. देर रात वह भूरे के घर पहुंचा. उस ने सीमा को अपनी जिद छोड़ने के लिए काफी समझाया, जिसे ले कर काफी देर तक बहस चलती रही. सीमा का बड़ा भाई इश्तियाक भी मामा गुड्डू के सुर में सुर मिला रहा था. जब किसी तरह बात नहीं बनी तो सीमा के सो जाने पर गुड्डू ने इश्तियाक के साथ मिल कर सीमा के सिर से तमंचा सटा कर गोली मार दी. एक ही झटके में सीमा मौत की नींद सो गई. इस के बाद दोनों वहां से फरार हो गए. कुछ लोगों ने गुड्डू का पीछा भी किया, लेकिन वह किसी के हाथ नहीं आया.

शुजाउर रहीम ने गुड्डू और इश्तियाक के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज करा कर गुड्डू को सीजेएम की अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक इश्तियाक फरार था. पुलिस उस की तलाश कर रही थी. गुड्डू को जरा भी कानून का ज्ञान होता तो सीमा की जान बच सकती थी. सीमा नाबालिग थी. ऐसी स्थिति में अदालत उसे उस के घर वालों को ही सौंपती न कि प्रेमी प्रभु को. UP News

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित.

Hindi Crime Story: तांत्रिक की तीसरी शादी

Hindi Crime Story: समझदार होते ही सोनू की समझ में आ गया था कि यह दुनिया मूर्खों से अटी पड़ी है, बस मूर्ख बनाने का तरीका मालूम होना चाहिए. इस के बाद उस ने तंत्रमंत्र सीखा और अंधविश्वास में डूबे लोगों को मूर्ख बनाने लगा. उस की पोल तो तब खुली, जब वह तीसरी शादी के चक्कर में पड़ा.

निशा उन दिनों कुछ ज्यादा ही परेशान थी. उस की परेशानी का आलम यह था कि उसे खानेपीने तक की सुध नहीं रहती थी. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर यह सब हो क्या रहा है? पिछले 2-3 महीने से कुछ ऐसा उलटा चक्कर चल रहा था कि उस का अच्छाखासा चल रहा घर डूबते जहाज की तरह हिचकोले लेने लगा था. पहले मां बीमार हुई, उस के बाद छोटे भाई का हाथ टूट गया. उन दोनों को संभालने के चक्कर में उस की अपनी नौकरी चली गई. मां कुछ ठीक हुई तो उस ने दौड़भाग कर छोटामोटा काम ढूंढा, लेकिन मां एक बार फिर बीमार पड़ गई.

रोज कुआं खोद कर पानी पीने वालों के घर पैसा होता ही कहां है? निशा ने जो थोड़ाबहुत जमा कर रखा था, वह सब मां और भाई के इलाज पर खर्च हो गया. अब मां का इलाज कराने की कौन कहे, खाने के भी लाले पड़ गए. वह मां का इलाज कराए या खाने का इंतजाम करे. मकान मालिक का किराया भी वह 3 महीने से नहीं दे पाई थी. निशा परेशान थी कि ऐसे में कैसे क्या होगा? वह मां के इलाज और खानेपीने का जुगाड़ करने में जूझ ही रही थी कि एक अन्य खबर ने उसे झकझोर कर रख दिया. मकान मालिक ने उसे बुला कर कहा कि वह उस का पिछला सारा किराया अदा कर के मकान खाली कर दे.

निशा ने गिड़गिड़ाते हुए कहा, ‘‘अंकलजी, आप का किराया मैं धीरेधीरे अदा कर दूंगी. रही बात मकान खाली करने की तो इस हालत में हम कहां जाएंगे? अचानक मकान खाली करना हमारे लिए आसान नहीं है अंकलजी. पहले आप अपना पिछला किराया तो अदा हो जाने दीजिए. उस के बाद हम कोई इंतजाम कर के आप का मकान खाली करेंगे. आप हमें थोड़ी मोहल्लत दीजिए.’’

‘‘भई, मोहल्लत देने का सवाल ही नहीं उठता. तुम लोगों का हर महीने का यही तमाशा है. वैसे भी अगले महीने मेरे घर बेटी की शादी है. नातेरिश्तेदार आएंगे तो उन के उठनेबैठने के लिए जगह तो चाहिए. जब अपने पास जगह है तो बाहर इंतजाम करने की क्या जरूरत है. इसलिए तुम मेरा मकान खाली कर दो.’’ मकान मालिक ने साफसाफ कह दिया. निशा के लिए मकान खाली करना इतना आसान नहीं था. क्योंकि मकान का बकाया किराया, राशन और दूध वाले को मिला कर लगभग 15 हजार रुपए होते थे. अगर वह मकान खाली करती तो नए मकान का एडवांस किराया, सामान वगैरह की ढुलाई आदि को ले कर इतने ही रुपए और चाहिए थे.

इतनी बड़ी रकम का इंतजाम वह कहां से कर सकती थी? जबकि उस के पास उस समय 20 रुपए भी नहीं थे. अपनी यह परेशानी निशा ने अपनी सहेली सुधा से बताई तो सहेली की परेशानी सुन कर वह भी सोच में पड़ गई. अगर उस के पास पैसे होते तो इस हालत में वह अवश्य ही सहेली की मदद कर देती. अचानक उसे जैसे कुछ याद आया हो तो वह बोली, ‘‘निशा, मुझे लगता है तुझे सोनू तांत्रिक से मिलना चाहिए. वह तेरी समस्या का कोई न कोई समाधान जरूर कर देगा.’’

‘‘यह सोनू तांत्रिक कौन है और वह हमारी समस्या का समाधान कैसे कर सकता है?’’

‘‘यह तो वहां चलने पर ही पता चलेगा. लेकिन जहां तक मुझे उस के बारे में जानकारी मिली है, वह हर छोटीबड़ी समस्या का समाधान चुटकी बजा कर कर देता है. बस तू तैयार हो जा, कौन हमें दूर जाना है. यहीं न्यू कंपनी बाग की गली नंबर 3 में उस की कोठी है.’’

‘‘लेकिन सुधा, मैं तंत्रमंत्र के चक्कर में नहीं पड़ना चाहती. मुझे अपने कर्म पर भरोसा है. आज नहीं तो कल हालात बदल ही जाएंगे.’’ निशा ने कहा.

निशा तांत्रिक सोनू के पास जाना नहीं चाहती थी, लेकिन सुधा की जिद के आगे उसे झुकना पड़ा. निशा सुधा के साथ जिस समय तांत्रिक सोनू की कोठी पर पहुंची, वह कमरे में पूजा कर रहा था, इसलिए उन्हें बाहर बैठ कर पूजा खत्म होने का इंतजार करना पड़ा. पूजा खत्म होते ही सोनू ने दोनों को अपने कमरे में बुलाया. तांत्रिक को देख कर निशा हैरान रह गई, क्योंकि वह तांत्रिक जैसा लग ही नहीं रहा था. सोनू तांत्रिक 32-35 साल का राजकुमार जैसा युवक था. आसमानी रंग के सफारी सूट में वह किसी प्रतिष्ठित परिवार का लड़का लग रहा था. निशा के मन में तांत्रिक की जो छवि थी, वह उस के एकदम विपरीत था. उस ने तो सोचा था कि काले से कू्रर चेहरे पर बड़ीबड़ी दाढ़ीमूंछें और गले में ढेरों रुद्राक्ष की मालाएं पहने कोई आदमी बैठा होगा. लेकिन यहां तो मामला एकदम उलटा था.

बहरहाल, तांत्रिक सोनू को प्रणाम कर के दोनों बैठ गईं. सुधा ने निशा का परिचय करा कर उस की समस्या बतानी चाही तो तांत्रिक सोनू ने अपना दायां हाथ उठा कर उसे रोकते हुए कहा, ‘‘देवी, अगर आप ही सब कुछ बता देंगी तो मेरी साधना किस काम आएगी? मुझे पता नहीं है क्या कि आजकल देवी किन हालात से गुजर रही हैं? मां की दवा के लिए भी अभी तक इंतजाम नहीं कर पाई हैं. रात के खाने की भी व्यवस्था करनी है. लेकिन अब चिंता की कोई बात नहीं है. आप मेरे यहां आ गई हैं, अब आप की सारी समस्याएं दूर हो जाएंगीं.’’

सोनू द्वारा अपने घर की स्थिति बताने से जहां निशा शरम से पानीपानी हो गई थी, वहीं वह उस की इस बात से काफी प्रभावित भी हुई. क्योंकि बिना कुछ बताए ही उस ने उस के बारे में सब कुछ जान लिया था. इस तरह पहली ही मुलाकात में वह उस की अंधभक्त बन गई. सोनू ने अंगुलियों पर कुछ गणना कर के कहा, ‘‘मैं नाम तो नहीं बताऊंगा, लेकिन तुम्हारे किसी अपने बहुत खास ने ही तुम्हारे परिवार पर ऐसा इल्म चलवाया है कि तुम दानेदाने को मोहताज हो जाओ. आज रात को मैं उस इल्म को कील दूंगा और फिर किसी दिन श्मशान पूजा कर के उस डाकिनी को भस्म कर दूंगा.’’

निशा मंत्रमुग्ध भाव से सोनू को देखती रही. उस ने होंठों ही होंठों में कुछ मंत्र पढ़े और निशा पर फूंक मारे. इस के बाद सुधा को बाहर भेज कर अपनी गद्दी के नीचे से 5 सौ रुपए का एक नोट निकाल कर निशा की ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘‘लो मांजी के लिए दवाओं और आज के खानेपीने की व्यवस्था कर लेना. कल की कल देखी जाएगी.’’

‘‘नहीं, मैं आप के रुपए कैसे ले सकती हूं.’’

‘‘यह मेरा नहीं, मां का आदेश है. मां काली ने मुझे अभीअभी आदेश दिया है कि मैं तुरंत तुम्हारी मदद करूं. मैं मां का सेवक हूं, इसलिए मुझे उन की आज्ञा का पालन करना ही होगा. तुम नि:संकोच ये रुपए रख लो.’’ इस तरह मां के नाम पर सोनू ने निशा को 5 सौ रुपए का नोट लेने पर मजबूर कर दिया.

निशा रुपए ले कर घर आ गई. वह यह सोचसोच परेशान थी कि उस के घर की एकएक बात की जानकारी तांत्रिक सोनू को कैसे हो गई? मकान मालिक ने मकान खाली करने के लिए कहा था, यह बात भी उसे मालूम थी. अगले दिन स्वयं सोनू तांत्रिक निशा के घर आ पहुंचा. वह मां की दवाएं और कुछ सामान भी साथ लाया था. स्वयं को संस्कारी दिखाने के लिए आते ही उस ने निशा की मां के पांव छुए. न चाहते हुए भी निशा को सोनू तांत्रिक की मदद लेनी पड़ी. क्योंकि इस के अलावा उस के पास कोई उपाय भी नहीं था. इस के बाद सोनू निशा और उस के घर वालों की हर तरह से मदद करने लगा.

तंत्रमंत्र और पूजापाठ के नाम पर वह निशा को अपनी कोठी पर बुलाता. थोड़ी देर पूजापाठ कर के निशा से इधरउधर की बातें करने लगता. इस बातचीत में वह उस के घरपरिवार के प्रति चिंता व्यक्त करते हुए हमदर्दी दिखाने की कोशिश करता. निशा के मकान खाली करने की बात आई तो सोनू तांत्रिक ने मकान मालिक का बकाया अदा कर के निशा को रहने के लिए गली नंबर शून्य वाला अपना मकान दे दिया. सोनू से मिलने के बाद निशा और उस के घर वालों की मुसीबतें लगभग खत्म हो गईं. इस तरह उन की सभी समस्याओं का समाधान हो गया.

धीरेधीरे सोनू तांत्रिक ने निशा और उस के घर के हर सदस्य पर अपना वर्चस्व कायम कर लिया. घर में था ही कौन, मांबेटी और एक लड़का. निशा के उस घर में अब वही होता था, जो सोनू चाहता था. निशा के घर वालों को भी सोनू का उन के घर में दखल देना अच्छा लगता था. इस में वे अपनी शान भी समझते थे, क्योंकि सोनू तांत्रिक से उन के संबंध थे. सोनू तांत्रिक धनी तो था ही, इलाके में उस का काफी दबदबा भी था. तांत्रिक होने की वजह से लोग उस की इज्जत तो करते ही थे, डरते भी थे. लोग उस के आशीर्वाद के लिए उस के घर के चक्कर लगाते थे.

यही वजह थी कि निशा और उस के घर वाले सोनू तांत्रिक की कृपा पा कर स्वयं को गौरवान्वित महसूस कर रहे थे. बड़ी होशियारी से सोनू तांत्रिक ने निशा के दिल में अपनी जगह बना ली थी. इस के बाद एक रात उस ने डाकिनी पूजा के नाम पर निशा को अपने घर बुलाया. निशा सोनू की कोठी पर जा पहुंची. थोड़ी देर बाद उस ने पूजा शुरू की. पूजा खत्म होने के बाद उस ने कहा कि उस ने उस डाकिनी को भस्म कर दिया है, जो उस के घर वालों को तकलीफ पहुंचाती थी. अब चिंता की कोई बात नहीं है. तथाकथित डाकिनी के खत्म हो जाने की बात पर निशा बहुत खुश हुई. पूजा खत्म होने के बाद सोनू ने निशा का हाथ अपने हाथों में ले कर कहा,

‘‘निशा, आज मैं तुम से अपने मन की एक ऐसी बात कहने जा रहा हूं, जिस का जवाब तुम्हें काफी सोचसमझ कर देना होगा.’’

हैरानी से निशा ने पूछा, ‘‘ऐसी कौन सी बात है महाराज? खैर, कोई भी बात हो, आप मुझे बताएं क्या, आदेश करें.’’

‘‘निशा, ऐसे मामलों में जोरजबरदस्ती या आदेश नहीं दिया जाता. यह सब प्रेम की भावना के अंतर्गत होता है. प्रेम में वह ताकत होती है, जो 1-2 क्या, हजारों डाकिनीशाकिनी के मुंह मोड़ सकती है. बहरहाल तुम इतना जान लो कि मैं तुम से प्रेम करता हूं और तुम से विवाह करना चाहता हूं.’’ सोनू ने निशा को फंसाने के लिए जाल फेंका.

सोनू की बात सुन कर निशा सन्न रह गई. उस के मुंह से सिर्फ इतना ही निकला, ‘‘महाराज, आप यह क्या कह रहे हैं. कहां आप और कहां मैं? आप में और मुझ में जमीन आसमान का अंतर है.’’

तंत्रमंत्र की दुकान चलाने वाले सोनू ने निशा को अपनी बाहों में ले कर कहा, ‘‘जब मेरा और तुम्हारा मिलन हो जाएगा तो सारे अंतर स्वयं ही खत्म हो जाएंगे. यह मिलन सभी भेदभाव खत्म कर देगा.’’

सम्मोहित सी निशा सोनू तांत्रिक की बातें सुनती रही. इतने बड़े तांत्रिक ने उसे इस योग्य समझा, यह जान कर वह खुद को बड़ी भाग्यशाली समझ रही थी. निशा की कमर में हाथ डाल कर सोनू उसे बैडरूम में ले गया, जहां उस ने वह सब पा लिया, जिस के लिए उस ने इतने बड़े चक्रव्यूह की रचना की थी. दरअसल, सोनू तांत्रिक न हो कर एक ऐसा धूर्त था, जो लोगों की अंधी आस्था की बदौलत उन का आर्थिक एवं शारीरिक शोषण करता था. लोगों को बेवकूफ बना कर वह दोनों हाथों से धन बटोर रहा था. इस के पीछे उस का कोई दोष नहीं था, लोग खुद ही उस के पास अपना शोषण कराने आते थे. अपनी खूनपसीने की कमाई उसे अय्याशी के लिए सौंप रहे थे. समस्या समाधान के नाम पर अपनी बहनबेटियों की इज्जत से खिलवाड़ करा रहे थे.

दुनिया कितनी भी आधुनिक क्यों न हो जाए, मंगल ग्रह पर पहुंच जाए या किसी नए ब्रह्मांड की खोज कर ले, पर इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि लोगों के मन में जो अंधविश्वास बैठा है, उसे निकालना आसान नहीं है. जब तक दुनिया में अंधविश्वास है, तब तक सोनू जैसे तथाकथित ढोंगी आम लोगों की बहूबेटियों की इज्जत से खेलते रहेंगे और तंत्रमंत्र का भय दिखा कर लूटते रहेंगे.’

सोनू तांत्रिक यानी सोनू शर्मा मूलरूप से हरियाणा के जिला जींद के रहने वाले चंद्रभान शर्मा का मंझला बेटा था. चंद्रभान धार्मिक प्रवृत्ति के शरीफ इंसान थे. वह कर्म को पूजा मानते थे. लेकिन उन के बेटे सोनू शर्मा की नीति उन के एकदम विपरीत थी. सोनू शुरू से ही अतिमहत्त्वाकांक्षी और आपराधिक प्रवृत्ति का युवक था. जल्दी ही उस की समझ में आ गया था कि दुनिया मूर्ख है. बस उसे मूर्ख बनाने वाला होना चाहिए. जो मजा लोगों को बेवकूफ बना कर कमाने में है, वह हाड़तोड़ मेहनत करने में नहीं है. उसे पता चल ही गया था कि अंधी आस्था को ले कर लोग अपना सर्वस्व तक लुटाने को तैयार रहते हैं.

और मजे की बात यह कि लुटने के बाद किसी को बताते भी नहीं. यह एक ऐसा कारोबार था, जिस में कुछ खास लगाना भी नहीं था, जबकि कमाई इतनी मोटी थी कि इस का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता. इस के अलावा लोग उसे पूजते भी भगवान की तरह हैं. यही सब देखसुन कर सोनू को इस कारोबार से अच्छा और कोई दूसरा कारोबार नहीं लगा. इस के बाद कुछ तंत्रमंत्र और टोटके सीख कर वह तांत्रिक बन गया. हरियाणा के कई शहरों में तंत्रमंत्र की छोटीमोटी ठगी करते हुए वह हिमाचल के जिला कांगड़ा जा पहुंचा. वहां उस का यह ठगी का धंधा तो चल ही निकला, वहीं उस की मुलाकात सोनिया से हुई.

सोनिया राजेश शर्मा की बेटी थी. उन का अच्छाखासा कारोबार था, लेकिन किन्हीं वजहों से उन के कारोबार में घाटा होने लगा तो उन की आर्थिक स्थिति कुछ खराब हो गई. सोनिया अपनी ऐसी ही किसी समस्या के समाधान के लिए सोनू तांत्रिक के पास गई तो पहली ही मुलाकात में वह सोनू की नजरों में ऐसी चढ़ी कि वह उसे किसी भी कीमत पर हासिल करने को तैयार हो गया. लेकिन राजेश शर्मा का परिवार एक संस्कारी परिवार था. वही संस्कार सोनिया में भी थे. इसलिए सोनू ने सोनिया को जो सब्जबाग दिखाए, उन का सोनिया पर कोई असर नहीं हुआ. तब उसे पाने के लिए सोनू ने उस से शादी का फैसला कर लिया और इस के बाद सोनिया के मातापिता की सहमति से दिसंबर, 2003 में उस ने सोनिया के साथ विवाह कर लिया.

समय के साथ दोनों 2 बच्चों के मातापिता बने, जिन में 8 साल का आदित्य और 6 साल की एलियन है. इस बीच सोनू हिमाचल के अलावा पंजाब के भी कई शहरों में अपने पांव जमाने की कोशिश करता रहा. कई शहरों के चक्कर लगाने के बाद उसे लुधियाना कुछ इस तरह पसंद आया कि वहां टिब्बा रोड पर उस ने तंत्रमंत्र की अपनी स्थाई दुकान खोल ली. यह सन् 2010 की बात है. लुधियाना का टिब्बा रोड इलाका हिंदूमुस्लिम और अमीरगरीब सभी तरह के लोगों से भरा है. जल्दी यहां सोनू का प्रभाव इस तरह बढ़ा कि लोग उस की पूजा करने लगे. यहां से कमाई दौलत से उस ने 2 मकान और एक आलीशान कोठी अपने लिए बनवा डाली.

यहां आने के बाद वह धीरेधीरे कांगड़ा में रह रही अपनी पत्नी सोनिया और बच्चों को लगभग भूल सा गया. अब वह कईकई महीनों बाद उन से मिलने कांगड़ा जाता था. लुधियाना में रहते हुए सोनू ने अपने लिए नई लड़की की तलाश शुरू कर दी, क्योंकि सोनिया अब उसे पुरानी लगने लगी थी. उसी बीच किसी शादी समारोह में उस की नजर स्टेज पर थिरकती निशा पर पड़ी तो वह उस पर मर मिटा. निशा एक आर्केस्ट्रा ग्रुप में डांस करती थी. निशा की एक ही झलक में सोनू उस का दीवाना बन गया था और हर कीमत पर उसे पा लेना चाहता था. सोनू तांत्रिक की एक आदत यह भी थी कि जो चीज उसे पसंद आ जाती थी, उसे वह हर हाल में पा लेना चाहता था.

पसंद आने के बाद उस ने निशा को हासिल करने के प्रयास शुरू किए तो सब से पहले उस ने उस के और उस के घर वालों के बारे में पता किया. सोनू को पता चला कि निशा के पिता प्रेमशाही ठाकुर की कई सालों पहले उस समय मृत्यु हो गई थी, जब बच्चे छोटेछोटे थे. निशा की मां ने मेहनतमजदूरी कर के किसी तरह बच्चों को पालपोस कर बड़ा किया था. युवा होने पर निशा ने छोटीमोटी नौकरी कर के परिवार का खर्च चलाने की कोशिश की. वह खूबसूरत थी, उस की अदाएं इतनी कातिल थीं कि कोई भी उसे देख कर पागल हो सकता था. इसीलिए जब आर्केस्ट्रा ग्रुप ने उसे अपने डांस ग्रुप में शामिल होने को कहा तो वह उस में मिलने वाली मोटी रकम के लालच में उस में शामिल होने के लिए खुशीखुशी तैयार हो गई थी.

अपनी खूबसूरती, मेहनत और अच्छे डांस की वजह से वह जल्दी ही प्रसिद्ध हो गई. आर्केस्ट्रा में डांस कर के निशा की इतनी कमाई हो जाती थी कि पूरा परिवार मजे से रह रहा था. सोनू को जब पता चला कि निशा ही अपने परिवार का एकमात्र सहारा है तो सब से पहले उस ने अपने प्रभाव से निशा को उस आर्केस्ट्रा से निकलवा दिया, जिस में वह डांस करती थी. काम छूटा तो निशा के घर की आर्थिक स्थिति बिगड़ गई. अचानक राह चलते निशा के भाई को किसी मोटरसाइकिल वाले ने टक्कर मार दी, जिस से उस का एक हाथ टूट गया. मां पहले से ही बीमार रहती थी.

इस तरह निशा चारों ओर से टूट गई तो सोनू के इशारे पर ही मकान मालिक ने उस से मकान खाली करने के लिए कह दिया. इस के बाद अचानक सोनू तांत्रिक ने हीरो की भांति उस के जीवन में एंट्री मारी और अपने तंत्रमंत्र का नाटक कर के निशा और उस के घर की समस्याओं का समाधान कर दिया. इस से वह उन की नजरों में भगवान बन बैठा. बहरहाल, सोनू ने जैसा चाहा था, ठीक वैसा ही हुआ था. लगभग हर रात निशा सोनू के पहलू में होती थी. क्योंकि उसे पूरा विश्वास था कि सोनू उस से शादी करेगा. लेकिन यह उस की गलतफहमी थी. उस का यह भ्रम 13 मार्च, 2015 को बैसाखी वाले दिन तब टूटा, जब उसे पता चला कि सोनू किसी खूबसूरत लड़की के साथ चंडीगढ़ रोड स्थित मोहिनी रिसौर्ट में शादी कर रहा है.

यह जानकारी मिलने के बाद निशा के पैरों तले से जमीन खिसक गई. इस का सीधा मतलब यह था कि शादी का झांसा दे कर सोनू तांत्रिक ने 2 सालों तक उस की इज्जत से खेला था और अब मन भर जाने के बाद दूसरी लड़की से शादी कर रहा था. यह बात भला निशा कैसे बरदाश्त कर सकती थी. वह सीधे मोहिनी रिसौर्ट पहुंची, ताकि सोनू तांत्रिक की शादी रुकवा सके. लेकिन सोनू के गुर्गों ने उसे अंदर जाने नहीं दिया और बाहर से ही भगा दिया. सोनू और गीता चड्ढा का विवाह आराम से हो गया. जबकि अपने भाग्य पर आंसू बहाते हुए निशा घर लौट आई. वह घर तो लौट आई, लेकिन उसे चैन नहीं मिल रहा था. चैन मिलता भी कैसे, सोनू ने उस के साथ जो बेवफाई की थी, उसे वह भुला नहीं पा रही थी.

अगले दिन शाम को निशा को पता चला कि सोनू तांत्रिक अपनी नईनवेली दुलहन गीता के साथ गली नंबर 3 वाली कोठी में मौजूद है तो एक बार फिर हिम्मत कर के निशा उस से बात करने के लिए उस की कोठी पर जा पहुंची. इस बार सोनू से उस का सामना हो गया. उस ने हंगामा खड़ा करते हुए सोनू से पूछा, ‘‘तुम शादी का वादा कर के 2 सालों तक मेरे शरीर से खेलते रहे. जबकि अब शादी किसी और से कर ली. तुम ने यह ठीक नहीं किया. मैं ऐसा कतई नहीं होने दूंगी.’’

‘‘अब तो जो होना था, वह हो गया. मुझे जिस से शादी करनी थी, कर ली. अब तुम कर ही क्या सकती हो? मैं ने तुम से शादी का जो वादा किया था, वह वादा ही रहा. अगर मैं वादा करने वाली हर लड़की से शादी करने लगूं तो पता चला कि मैं हर साल शादी कर रहा हूं.’’ इस के बाद निशा को घूरते हुए बोला, ‘‘अच्छा यही होगा कि तुम चुपचाप यहां से चली जाओ. फिर कभी दिखाई भी मत देना, वरना मुझ से बुरा कोई नहीं होगा.’’

सोनू से अपमानित हो कर निशा घर तो आ गई, लेकिन उस के साथ जो छल हुआ था वह उसे पचा नहीं पा रही थी. काफी देर तक वह रोती रही. और जब मन का गुबार निकल गया तो उस ने तय किया कि वह सोनू जैसे ढोंगी और धोखेबाज को अवश्य सबक सिखाएगी. अगर उस ने उसे सबक न सिखाया तो वह उस जैसी न जाने कितनी लड़कियों की इसी तरह जिंदगी बरबाद करता रहेगा. दृढ़ निश्चय कर के निशा थाना बस्ती जोधेवाल पहुंची और थानाप्रभारी इंसपेक्टर हरपाल सिंह से मिल कर उन्हें अपनी आपबीती सुनाई.

हरपाल सिंह ने निशा की पूरी बात सुनने के बाद टिब्बा रोड पुलिस चौकी के इंचार्ज एएसआई हरभजन सिंह को आदेश दिया कि वह निशा के बयान के आधार पर सोनू तांत्रिक के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर के तुरंत काररवाई करें. इस के बाद एएसआई हरभजन सिंह ने निशा के बयान के आधार पर 16 मार्च, 2015 को सोनू तांत्रिक के खिलाफ शादी का झांसा दे कर यौन शोषण करने और धोखाधड़ी का मामला दर्ज कर के पूछताछ के लिए उसे पुलिस चौकी बुलवाया. लेकिन सफाई देने के लिए चौकी आने के बजाय सोनू गायब हो गया.

तब हरभजन सिंह ने हेडकांस्टेबल जगजीत सिंह जीता, कांस्टेबल लखविंदर सिंह, दविंदर सिंह और जसबीर सिंह की एक टीम बना कर सोनू की तलाश के लिए उस के पीछे लगा दिया. सोनू की तलाश चल ही रही थी कि अखबारों में छपी खबर पढ़ कर कांगड़ा में रह रही उस की पहली पत्नी सोनिया शर्मा भी लुधियाना आ पहुंची. उस ने पुलिस चौकी जा कर बयान ही नहीं दर्ज कराया, बल्कि सोनू से अपनी शादी और 2 बच्चे होने के प्रमाण भी दिए. सोनिया के बयान के आधार पर उस की ओर से भी सोनू के खिलाफ धोखाधड़ी का मुकदमा दर्ज किया गया. फिर उसी दिन शाम को हेडकांस्टेबल जगजीत सिंह की टीम ने जालंधर बाईपास से सोनू तांत्रिक को उस समय गिरफ्तार कर लिया, जब वह बस से शहर छोड़ कर भागने के चक्कर में वहां पहुंचा था.

चौकी ला कर सोनू से पूछताछ की गई तो उस ने अपने ऊपर लगे सभी आरोपों को स्वीकार कर लिया. उसे अदालत में पेश कर के साक्ष्य जुटाने के लिए एक दिन के पुलिस रिमांड पर लिया गया. रिमांड अवधि समाप्त होने पर 18 मार्च, 2015 को उसे पुन: मैडम प्रीतमा अरोड़ा की अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. 20 मार्च, 2015 को निशा का मैडिकल कराया गया. मैडिकल रिपोर्ट के अनुसार वह सहवास की आदी पाई गई. मैडम प्रीतमा अरोड़ा की अदालत में धारा 164 के तहत उस के बयान भी दर्ज किए गए.

निशा ने यहां भी वही बयान दिए, जो उस ने आपबीती में बताया था. उस का कहना था कि ऐसे ढोंगी अपराधियों को सख्त से सख्त सजा मिलनी चाहिए. ऐसे लोग लोगों की धार्मिक व कोमल भावनाओं को भड़का कर उन का शारीरिक और आर्थिक शोषण करते हैं. Hindi Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित है, कथा में कुछ पात्रों के नाम बदले गए हैं.

Haridwar Crime Story: विद्रोही बीवी का दंश

Haridwar Crime Story: नफीस और गुफराना आपसी मतभेदों के चलते अलगअलग रहने लगे थे. जब गुफराना को पता चला कि नफीस दूसरी शादी के चक्कर में है तो उस की करोड़ों की जायदाद के चक्कर में उस ने गुनाह की ऐसी भूमिका बनाई कि पुलिस भी चकरा गई. 26 अप्रैल, 2015 को सुबह के 11 बज रहे थे. जिला हरिद्वार के रुड़की शहर की सिविल लाइंस कोतवाली के एसएसआई आर.के. सकलानी कोतवाली में ही थे. पिछले कुछ दिनों से एटीएम मशीनों के साथ छेड़छाड़ और ठगी की शिकायतें मिल रही थीं. इसलिए आर.के. सकलानी क्षेत्र की एटीएम मशीनों की सुरक्षा व्यस्था की चैकिंग करने की सोच रहे थे. तभी उन के मोबाइल की घंटी बजने लगी. सकलानी ने काल रिसीव की तो पता चला कि दूसरी ओर शहर के विधायक प्रदीप बत्रा हैं.

बातचीत हुई तो प्रदीप बत्रा ने सकलानी को बताया कि कोतवाली क्षेत्र स्थित मोहल्ला ग्रीनपार्क का रहने वाला 40 वर्षीय नफीस 9 अप्रैल से गायब है. उन्होंने यह भी बताया कि नफीस के घर वाले गांव बिझौली में रहते हैं और उसे सभी परिचितों और रिश्तेदारों के यहां ढूंढ़ चुके हैं. आर.के. सकलानी ने बत्रा साहब से कहा कि वह नफीस के घर वालों को उस के फोटो के साथ कोतवाली भेज दें. वह नफीस को ढूंढ़ने में उन की पूरी मदद करेंगे. थोड़ी देर बाद नफीस का भाई नसीर अपने 2 रिश्तेदारों के साथ कोतवाली सिविल लाइंस पहुंच गया. उसे चूंकि विधायकजी ने भेजा था, इसलिए सकलानी ने नफीस के लापता होने के मामले में पूरी दिलचस्पी लेते हुए नसीर से जरूरी बातें पूछीं.

उस ने बताया कि 9 अप्रैल को नफीस मोटरसाइकिल से अपने भतीजे साकिब के पास गया था. साकिब मदरसा जामिया तुलउलूम का छात्र था. शाम को उस ने साकिब को बाइक की चाबी दे कर कहा था कि वह थोड़ी देर में आ रहा है. लेकिन वह आज तक वापस नहीं लौटा. नसीर ने यह भी बताया कि उस के पास मोबाइल था, जो उसी दिन से बंद है.

‘‘नफीस की किसी से कोई दुश्मनी तो नहीं थी?’’ सकलानी के पूछने पर नसीर ने बताया कि नफीस सीधासादा इंसान था. उस की किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी. एसएसआई सकलानी ने नसीर से नफीस का फोटो ले कर उस की गुमशुदगी का मामला दर्ज करा दिया. उस का पता लगाने की जिम्मेदारी एसआई अजय कुमार को सौंपी गई. अजय कुमार ने भी नसीर से उस के भाई नफीस के बारे में विस्तृत पूछताछ की. चूंकि नफीस को गायब हुए 10 दिन हो चुके थे, इसलिए यह मामला थोड़ा गंभीर लग रहा था. अजय कुमार ने नफीस के कई रिश्तेदारों से पूछताछ भी की और उस के फोन की काल डिटेल्स भी निकलवाई. लेकिन कई दिनों की भागदौड़ के बाद भी कोई नतीजा नहीं निकला.

एक दिन सकलानी की एक वीआईपी ड्यूटी के बारे में पड़ोस की कोतवाली भगवानपुर के कोतवाल योगेंद्र सिंह भदौरिया से बात हुई तो बातोंबातों में भदौरिया ने बताया कि 20 दिनों पहले उन के इलाके में एक अज्ञात व्यक्ति की लाश मिली थी, जिस की शिनाख्त अभी तक नहीं हुई है. भदौरिया ने यह भी बताया कि मृतक क्रीम कलर की चैकदार शर्ट और मटमैले रंग की पैंट पहने था और उस का शरीर और चेहरा काफी हद तक कुचला हुआ था. यह सुन कर सकलानी ने सोचा कि कहीं वह लाश नफीस की ही न रही हो. यह बात दिमाग में आते ही उन्होंने एसआई अजय कुमार और मृतक के भाई नसीर को कोतवाली भगवानपुर भेजा.

चूंकि लाश काफी दिनों पहले मिली थी, इसलिए पुलिस ने 3 दिनों तक लाश की शिनाख्त का इंतजार करने के बाद उसे दफन करा दिया था. अलबत्ता लाश के कपड़े कोतवाली के मालखाने में ही रखे थे. पुलिस ने जब उन कपड़ों को नसीर को दिखाया तो वह उन्हें देखते ही रोने लगा. वे कपड़े नफीस के ही थे. भगवानपुर पुलिस ने बताया कि नफीस की लाश 9 से 10 अप्रैल, 2015 की रात को देहरादून रोड स्थित पुहाना गांव के तिराहे के पास मिली थी. लाश का चेहरा काफी हद तक कुचला हुआ था. इसीलिए उस की शिनाख्त नहीं हो सकी थी.

भगवानपुर कोतवाली के इंसपेक्टर योगेंद्र सिंह भदौरिया ने बताया कि वे इस मामले को दुर्घटना समझ रहे थे. फिर भी उन्होंने मृतक की शिनाख्त कराने का पूरा प्रयास किया था. मृतक की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भी उस की मृत्यु का कारण सिर की चोटों की वजह से अत्यधिक रक्तस्राव होना बताया गया था. शिनाख्त की काररवाई के बाद अजय कुमार रुड़की लौट आए. शाम को उन्होंने इस मामले में वरिष्ठ उपनिरीक्षक आर.के. सकलानी, कोतवाल बी.डी. उनियाल व एएसपी प्रहलाद नारायण मीणा से विचारविमर्श किया. लंबी बातचीत से पुलिस इस नतीजे पर पहुंची कि यह मामला एक्सीडेंट का नहीं, बल्कि कत्ल का था.

एएसपी प्रहलाद नारायण मीणा ने जांच अधिकारी अजय कुमार को निर्देश दिया कि वह मृतक नफीस की काल डिटेल्स देख कर उन लोगों से पूछताछ करें, जिन्होंने घटना वाले दिन उसे फोन किया था. साथ ही उस की पारिवारिक स्थिति की गोपनीय जानकारी भी जुटाएं. एसआई अजय कुमार ने नफीस की पारिवारिक जानकारी जुटाई तो पता चला कि थाना मंगलौर के अंतर्गत आने वाले गांव बिझौली का रहने वाला 40 वर्षीय नफीस खेतीबाड़ी करता था. 18 वर्ष पूर्व नफीस का निकाह पुरकाजी, मुजफ्फरनगर की गुफराना उर्फ सुक्खी से हुआ था. दोनों के 2 बच्चे थे अजमल और एहतराम. नफीस के पास बिझौली में खेती की जमीन भी थी और मकान भी.

इस के अलावा रुड़की शहर में भी उस का एक मकान था. उस की कुल संपत्ति करीब ढाई करोड़ की थी. यह भी पता चला कि नफीस अय्याश किस्म का इंसान था. इसी वजह से 3 साल पहले उस की गुफराना से अनबन हो गई थी. वह दोनों बच्चों के साथ अपने मायके पुरकाजी में ही रह रही थी. यह सारी बातें एसएसपी स्वीटी अग्रवाल को पता चलीं तो उन्होंने इस मामले की जांच में एसओजी टीम को भी शामिल कर दिया. एसओजी टीम ने जब नफीस के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स खंगालीं तो पता चला कि नफीस के लापता होने से पूर्व उस की एक नंबर पर बात हुई थी. उस नंबर पर एसओजी को कुछ संदेह हुआ. क्योंकि उस नंबर पर बात होने के बाद नफीस का मोबाइल स्विच औफ हो गया था.

एसओजी टीम के प्रभारी मोहम्मद यासीन ने जब उस नंबर की जांच की तो पता चला कि वह नंबर मोहल्ला झोझियान, पुरकाजी निवासी इकराम के नाम से था. पुलिस ने जब इकराम के बारे में सुरागरसी की तो मालूम हुआ कि वह कहने को तो ट्रक ड्राइवरी करता था, लेकिन आपराधिक प्रवृत्ति का था. 2 साल पहले वह एक मोटर- साइकिल लूट के मामले में थाना छपार, मुजफ्फरनगर में गिरफ्तार हो कर जेल भी गया था. फिलहाल वह घर से फरार है. इस के बाद सकलानी, अजय कुमार और एसओजी टीम ने इकराम की गिरफ्तारी के लिए मेरठ, गाजियाबाद व हापुड़ में उस के ठिकानों पर दबिश देनी शुरू कर दी.

आखिरकार 2 मई, 2015 को पुलिस ने इकराम को उस वक्त पुरकाजी से ही गिरफ्तार कर लिया, जब वह चोरीछिपे अपने घर वालों से मिलने आ रहा था. गिरफ्तारी के बाद पुलिस उसे रुड़की ले आई. कोतवाली में पुलिस ने जब उस से नफीस की हत्या के बारे में पूछताछ की तो उस ने स्वीकार कर लिया कि नफीस की हत्या की गई थी और वह हत्या की वारदात में शामिल था. उस ने यह भी बताया कि इस हत्या में उस की खुद की बीवी भूरी, महबूब और शमीम भी शामिल थे. जबकि हत्या की सुपारी नफीस की पत्नी गुफराना उर्फ सुक्खी ने दी थी. इकराम से पूछताछ के बाद इस मामले की हकीकत कुछ इस तरह सामने आई.

18 वर्ष पूर्व जब गुफराना और नफीस का निकाह हुआ था, इकराम काफी छोटा था. पुरकाजी में वह इन लोगों का पड़ोसी था. पड़ोसी होने के नाते इकराम गुफराना को फूफो कहता था. उस का एक भाई और 4 बहनें थीं. पैसे की कमी की वजह से उस की बहनों की शादियां नहीं हुई थीं. इकराम बाइक लूट के अपने मुकदमे की पैरवी के लिए मुजफ्फरनगर कोर्ट जाता रहता था. भूरी नाम की एक तलाकशुदा महिला भी अपने पति से चल रहे तलाक के मुकदमें की वजह से वहां आतीजाती थी. वहीं पर दोनों की मुलाकात हुई. धीरेधीरे मुलाकातें बढ़ने लगीं तो इकराम भूरी की मदद करने लगा.

बाद में इकराम ने भूरी से निकाह कर लिया और मुजफ्फरनगर के मोहल्ला लद्दावाला में किराए का मकान ले कर रहने लगा. एक बार इकराम पुरकाजी आया तो एक दिन फूफी गुफराना उसे मिल गई. दोनों की पुरानी जानपहचान थी, इसलिए खूब बातें हुईं. बातोंबातों में गुफराना ने उसे बताया कि उस का शौहर नफीस किसी औरत से दूसरा निकाह करने वाला है, इसलिए उस ने बच्चों सहित उसे घर से निकाल दिया है. गुफराना ने इकराम से यह भी कहा कि अगर किसी तरह वह नफीस को ठिकाने लगा दे तो वह उसे 8 लाख रुपए देगी. कुछ दिनों तक इकराम ने गुफराना की इस बात पर खास ध्यान नहीं दिया. लेकिन जब एक दिन उस ने बड़ी गंभीरता से कहा कि 8 लाख की रकम कम नहीं होती तो वह नफीस की हत्या करने के लिए तैयार हो गया. इस के बाद दोनों ने मिल कर नफीस की हत्या की योजना बना ली.

इस के बाद गुफराना ने इकराम को एडवांस के तौर पर 80 हजार रुपए भी दे दिए. गुफराना ने नफीस का मोबाइल नंबर भी इकराम को दे दिया. योजना के अनुसार, इकराम ने 19 मार्च, 2015 को रुड़की की रामपुर चुंगी के निकट भूरी के रहने के लिए किराए के एक कमरे का इंतजाम कर दिया. आगे की योजना के तहत एक दिन भूरी ने नफीस के मोबाइल पर मिसकाल की. इस के जवाब में नफीस ने लौट कर फोन किया और भूरी से लंबी बात की. इस के बाद भूरी और नफीस एकदूसरे को अकसर फोन करने लगे. कुछ ही दिनों में भूरी ने नफीस को अपने प्रेमजाल में फांस लिया. इस के बाद नफीस अकसर उस से मिलने उस के कमरे पर जाने लगा.

नफीस को सपने में भी गुमान नहीं था कि जिस खूबसूरत औरत के प्रेमजाल में फंस कर वह पैसा उड़ा रहा है, वह उस की मौत का तानाबाना बुन चुकी है. बहरहाल षडयंत्र से अनभिज्ञ नफीस भूरी के भ्रमजाल में फंसा रहा. योजना के तहत 9 अप्रैल, 2015 को इकराम ने देहरादून जाने के लिए 2500 रुपए में पुरकाजी निवासी सुनील की टैक्सी बुक की और शाम को अपने दोस्तों शमीम और जावेद के साथ रामपुर चुंगी स्थित भूरी के कमरे पर आ गया. टैक्सी ड्राइवर अर्जुन उन के साथ था. योजना के अनुसार, गुफराना का भाई महबूब भी उस वक्त भूरी के कमरे पर मौजूद था. शाम 7 बज कर 30 मिनट पर भूरी ने फोन कर के नफीस को अपने कमरे पर बुलवा लिया.

जब नफीस कमरे पर आया तो महबूब और जावेद बाहर खड़ी कार में बैठ गए. भूरी ने नफीस से कमरे पर मौजूद शमीम का परिचय अपने रिश्तेदार के रूप में कराया. इस के बाद वह दूध गरम करने लगी. उधर थोड़ी देर बैठे रहने के बाद इकराम ने टैक्सी चालक अर्जुन से कहा कि अभी बच्चों को तैयार होने में देर लगेगी, तब तक तुम जावेद के साथ जा कर अपनी शाम रंगीन कर लो. टैक्सी की चाबी मुझे दे दो, मैं इस में तेल डलवा देता हूं. इस के बाद टैक्सी चालक अर्जुन जावेद के साथ शराब के ठेके पर पहुंच गया, जहां उस ने खूब शराब पी. जावेद उसे पीने के लिए उकसा रहा था. दूसरी ओर भूरी ने नफीस की नजर बचा कर गर्म दूध में नशे की 4 गोलियां डाल दी थी. नफीस भूरी पर अंधविश्वास करता था. उस ने दूध पी लिया.

नशीला दूध पीने के बाद नफीस को नींद आने लगी तो वह वहीं सो गया. तभी शमीम और इकराम कमरे में आए. आते ही उन्होंने नफीस का गला दबा कर उस की हत्या कर दी. इस के बाद वे उस की लाश को टैक्सी की पिछली सीट पर डाल कर गांव सालियर होते हुए पुहाना जहाजगढ़ मार्ग पर ले आए. एक सुनसान जगह देख कर इन लोगों ने नफीस की लाश को सड़क के किनारे फेंक दिया. नफीस की लाश की शिनाख्त न हो सके, इस के लिए इकराम ने कई बार टैक्सी आगेपीछे कर के उस का मृत शरीर और चेहरा कुचल दिया, ताकि यह दुर्घटना का मामला लगे. इस के बाद तीनों वापस भूरी के कमरे पर आ गए.

ड्राइवर अर्जुन और जावेद नशे में धुत हो कर रात 12 बजे वापस लौटे. रात को सब वहीं सो गए. सुबह इकराम ने अर्जुन को उलाहना दिया कि तुम्हारे ज्यादा पीने की वजह से हम देहरादून नहीं जा सके. इकराम को यकीन था कि अर्जुन कुछ भी नहीं समझ पाया होगा. अगले दिन सुबह 7 बजे शमीम व जावेद बाइक से मुजफ्फरनगर चले गए तथा इकराम व भूरी टैक्सी से पुरकाजी लौट आए. नफीस की जेब से निकाला पैसों से भरा पर्स इकराम ने भूरी को सौंप दिया था.

नफीस की हत्या का खुलासा होने के बाद एसआई अजय कुमार ने नफीस की गुमशुदगी का मुकदमा भादंवि की धारा 302, 201, 328, 34 व 120 बी में परिवर्तित कर दिया. इस के बाद एसओजी प्रभारी मोहम्मद यासीन तथा उन की टीम के सदस्यों, अशोक, जाकिर, आशुतोष तिवारी, कपिल, शेखर, राहुल, अमित, पूरण, हेमंत, अंशु चौधरी और रश्मि गुज्यांल ने पुरकाजी व मुजफ्फरनगर में दबिशें दे कर गुफराना व भूरी को भी गिरफ्तार कर लिया और रुड़की ले आए. भूरी व गुफराना ने अपने बयानों में इकराम के बयानों का ही समर्थन किया. गुफराना ने बताया कि वह इकराम को अपने शौहर नफीस की हत्या की सुपारी के 80 हजार रुपए दे चुकी है तथा शेष रकम अपना आम का बाग बेच कर देती.

इस के बाद पुलिस ने भूरी की निशानदेही पर मृतक नफीस का पर्स उस के मुजफ्फरनगर स्थित मकान से बरामद कर लिया. उस की निशानदेही पर आर.के. सकलानी ने हत्या में इस्तेमाल इंडिका टैक्सी पुरकाजी से बरामद कर ली. 3 मई, 2015 को एसएसपी स्वीटी अग्रवाल ने इकराम, भूरी और गुफराना उर्फ सुक्खी को मीडिया के सामने पेश कर के नफीस हत्याकांड का खुलासा किया. तीनों आरोपियों की गिरफ्तारी की भनक पा कर अभियुक्त जावेद, शमीम व महबूब फरार हो गए थे. पुलिस उन की गिरफ्तारी के लिए प्रयासरत थी. Haridwar Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Short Hindi Story: सब्र की सीमा

Short Hindi Story: हर बात की एक सीमा होती है. समुद्र और सब्र की भी सीमा होती है. दोनों अपनी सीमा तोड़ दें तो अनर्थ हो जाएगा. प्रेम और धोखेबाजी की एक दुखांत कथा…

राजेंद्र तिवारी ने क्याक्या सपने नहीं संजोए थे, क्याक्या नहीं सोचा था, अपने लिए…उस के लिए और अपने भावी जीवन के लिए. जबकि वह जानता था कि सपने कभी सच नहीं होते, अपना सोचा कभी पूरा नहीं होता. शायद यही वजह थी कि आज उसे उस का खून अपने ही हाथों करने पर मजबूर होना पड़ा. दरअसल इस के अलावा कोई दूसरा रास्ता शायद उसे सूझा ही नहीं.  शादी के 10 महीनों का जीवन उस के लिए नारकीय था. हर पल उस की यही कोशिश रही कि यह जीवन किसी तरह सुखमय हो जाए. लेकिन कलयुग में शायद यह उस के लिए संभव नहीं था.

उस ने विश्वास किया तो दगा मिली. प्यार दिया तो घृणा हाथ लगी. जहर का घूंट पीतेपीते वह पूरी तरह थक चुका था. जब सहन की सीमा पार हो गई तो वह कर बैठा, जो कानून की नजरों में अपराध था. उस का कहना था कि यह अपराध तो बहुत पहले हो चुका होता, अगर वह गांधीवादी सोच का न होता. इतना घृणित दृश्य देखने के बाद शायद ही कोई अधिक समय तक चुप बैठता. लेकिन वह शांति का उपासक था, अहिंसा का पुजारी था, इसीलिए सोचता था कि बाकी जिंदगी अहिंसा और नेकी की राह पर चलते हुए कट जाए तो बेहतर होगा.

लेकिन ऐसा हो नहीं सका. क्योंकि वह जितना टालता, समस्या उतनी ही उलझती रही. एक बार तो उस ने उस की ओर से एकदम से निगाहें हटा लीं, परंतु उसे यह भी अच्छा नहीं लगा. मजबूर हो कर यह कठोर कदम उठाना पड़ा. वह मानता है कि इस सब का गुनहगार वही है. लेकिन उस के द्वारा किए गए इस अपराध का एक अच्छा परिणाम यह निकला कि समाज को कलंकित करने वाला सदा के लिए मिट गया. उस का मानना है कि उस ने अपराध नहीं, समाज पर एहसान किया है.

उसे वह पहली मुलाकात आज भी अच्छी तरह याद है. वह लखनऊ के हजरतगंज में एक कंप्यूटर इंस्टीट्यूट में प्रशिक्षक था. वह इंस्टीट्यूट अखिलेश अग्रवाल का था. अग्रवाल शिक्षा विभाग में नौकरी करते थे. वह कभीकभार ही वहां आते थे. इंस्टीट्यूट की देखभाल की पूरी जिम्मेदारी राजेंद्र तिवारी पर ही थी.

उस दिन क्लास के बाद राजेंद्र औफिस में बैठा आराम कर रहा था, तभी एक लड़की उस के औफिस में आई. बहुत खूबसूरत थी वह. गजब का आकर्षण था उस में. वह अपलक उस की ओर देखता रहा.

‘‘मैं कंप्यूटर सीखना चाहती हूं.’’ उस के स्वर में मिठास थी.

राजेंद्र हड़बड़ा कर बोला, ‘‘हां..हां, बैठिए.’’

‘‘कितने दिनों में मैं कंप्यूटर सीख जाऊंगी.’’ सामने की कुरसी पर बैठते हुए उस ने पूछा.

‘‘यह तो सीखने वाले पर डिपेंड करता है. वैसे थोड़ी सी प्रैक्टिस से 6 महीने में अच्छाखासा सीख जाएंगी.’’

‘‘ठीक है, मुझे एडमीशन के लिए फार्म दे दीजिए.’’

‘‘आप का नाम?’’ मेज की दराज से फार्म निकाल कर उस की ओर बढ़ाते हुए राजेंद्र ने पूछा.

‘‘अमिता सक्सेना. मैं सर्विस करती हूं, इसलिए शाम को ही आ सकूंगी.’’

‘‘कोई बात नहीं, आप फार्म भर दीजिए.’’

उस ने सरसरी निगाह फार्म पर डाली. फिर कुछ सोचते हुए बोली, ‘‘मैं इसे भर कर बाद में ले आऊं तो कोई हर्ज है?’’

‘‘नहीं, कोई हर्ज नहीं है. फार्म के साथ आप फीस जमा कर दीजिएगा. उसी दिन आप का एडमीशन हो जाएगा.’’

‘‘ठीक है, मैं जब भी आऊंगी, इसे भर कर ले आऊंगी.’’ इतना कह कर अमिता चली गई.

अमिता राजेंद्र को अच्छी लगी थी. ऐसा नहीं कि वह कोई आशिकमिजाज था. लड़कियों से खासतौर पर वह दूर ही रहता था. पर अमिता में न जाने क्या खासियत थी कि वह काफी देर तक उस के खयालों में खोया रहा. उस ने जैसे उस के ऊपर कोई जादू कर दिया था. वह दोबारा उस की एक झलक पाने के लिए बेचैन हो उठा था. उस के बारे में उस के मन में इस बात का भी संदेह था कि कहीं वह विवाहित तो नहीं. वह अगले दिन अमिता का इंतजार करता रहा कि शायद वह आए, लेकिन निराशा ही हाथ लगी.

3 दिनों बाद अमिता आई. फार्म उस ने राजेंद्र को दे दिया. फार्म में उस के नाम के पहले ‘कुमारी’ शब्द देख कर उसे बड़ा सुकून मिला. फार्म पर सरसरी नजर डाल कर उस ने पूछा, ‘‘आप कहां नौकरी करती हैं?’’

‘‘स्टेशन रोड पर एक बिल्डर के औफिस में. यह इंस्टीट्यूट आप का है?’’

वह बीच में ही बोल उठा, ‘‘मुझे राजेंद्र तिवारी कहते हैं. मैं यहां प्रशिक्षक हूं. यह इंस्टीट्यूट अखिलेश अग्रवाल का है. लेकिन देखभाल मैं ही करता हूं. कभी कोई चीज समझ में न आए तो बिना झिझक पूछ लेना, शरमाना नहीं.’’

‘‘जी, वैसे मैं कल से जौइन करूंगी.’’ कह कर अमिता मुसकराई और कुरसी से उठ खड़ी हुई.

उस ने अगले दिन से जौइन कर लिया. कंप्यूटर सिखाते समय राजेंद्र की नजरें उसी पर टिकी रहतीं. अमिता ने उस का कहा माना था, मतलब उसे जो समझ में न आता, झट पूछ लेती. राजेंद्र भी पूरे मनोयोग से उसे कंप्यूटर सिखा रहा था.

कोई एक सप्ताह बाद एक दिन क्लास समाप्त होने पर अमिता औफिस में आई, ‘‘मुझे आप से कुछ पूछना है?’’

‘‘पूछो, क्या पूछना है?’’

उस ने कुछ सवाल पूछे. राजेंद्र ने उत्तर समझा दिए. बाद में व्यंग्य करते हुए उस ने कहा, ‘‘लगता है, मेरा बताया तुम्हारी समझ में नहीं आता.’’

‘‘नहीं, आप बतातेसिखाते तो बहुत अच्छा हैं, पर मेरी ही समझ में देर से आता है.’’ चेहरे पर मासूमियत लाते हुए वह बोली.

‘‘हां, बेवकूफों के साथ यही होता है.’’

राजेंद्र के इस मजाक पर उस ने हंसते हुए जवाब दिया, ‘‘चलिए, आप ने पहचान तो लिया. गुरु को अपना ही गुण शिष्य में दिखाई पड़ता है.’’

कुछ देर तक दोनों यूं ही हंसीमजाक करते रहे. बातोंबातों में अमिता बोली, ‘‘किसी दिन मेरे घर चाय पर आइए. मेरा घर पता है आप को?’’

उस ने राजेंद्र को बताया कि अमीनाबाद में वह अपने चाचा के साथ रहती है. उस के मातापिता लखनऊ में ही तालकटोरा थानाक्षेत्र स्थित राजाजीपुरम कालोनी में रहते हैं. राजेंद्र भी राजाजीपुरम में ही रहता था. यह बात उस ने अमिता को बताई तो उस ने पूछा, ‘‘आप किस ब्लौक में रहते हैं?’’

‘‘ई ब्लौक में.’’

‘‘अरे, मैं भी ई ब्लौक में रहती हूं.’’

‘‘तुम अब वहां क्यों नहीं रहती?’’

वह टालते हुए बोली, ‘‘ऐसे ही, अच्छा अब मैं चलूंगी, काफी देर हो गई है.’’

इस बातचीत के बाद दोनों काफी घुलमिल गए थे. इस बीच एक बार राजेंद्र उस के घर भी हो आया. उस के चाचा हंसमुख और मिलनसार लगे. उस ने लौटते समय अमिता के चाचा को अपने घर आने के लिए आमंत्रित किया. उस का अनुमान था कि उन के साथ अमिता भी आएगी. पर न तो चाचा आए और न अमिता. अचानक एक दिन राजेंद्र अमिता के औफिस जा पहुचा. ज्यादा बड़ा औफिस नहीं था. फिर भी 15-20 लोग काम करते थे. उसे देख कर अमिता मुसकरा दी. वह झेंप सा गया. उस समय उस की ड्यूटी समाप्त होने वाली थी. उसे बैठने के लिए कह कर वह एक केबिन में गई. शायद वह उस के बौस की केबिन थी, 2 मिनट बाद ही बाहर आ कर बोली, ‘‘आइए, चलें.’’

दोनों एक रेस्तरां में जा पहुंचे. कौफी पीते हुए उस ने राजेंद्र को छेड़ा, ‘‘आज इधर का रास्ता कैसे भूल गए?’’

‘‘तुम से मिलने का मन था, चला आया.’’

राजेंद्र की इस बात पर वह गुमसुम हो गई. उसे लगा, जैसे उस ने कुछ गलत कह दिया हो. झट सफाई दी, ‘‘मुझे गलत मत समझो.’’

‘‘नहीं, यह बात नहीं है. आज पहली बार मुझ से किसी ने इतने अपनत्व से बात की है, वरना सब मुझे काट खाने दौड़ते हैं. मातापिता से भी मुझे प्यार नहीं मिला. घर में हर एक ने मुझे दुत्कारा. मजबूरी में मैं चाचा के यहां रहने लगी. वहां सब मुझे ऊपर से तो प्यार दिखाते हैं, लेकिन अंदर ही अंदर जलते हैं. एक भी महीने अगर पूरी तनख्वाह उन्हें न दूं तो मुझ पर पहाड़ टूट पड़ता है. समझ में नहीं आता, मैं क्या करूं.’’ कहतेकहते अमिता की आंखें सजल हो गईं.

उस समय राजेंद्र को ऐसा लगा कि अमिता दुनिया में बिलकुल अकेली है, बेसहारा है. शायद वह अपने अंदर दुख ही दुख समेटे है. वह अपने को उस का सब से बड़ा हमदर्द समझ कर बोल पड़ा, ‘‘इस में इतना परेशान होने की क्या बात है? मैं तो हूं, सब ठीक हो जाएगा.’’

राजेंद्र की इस सहानुभूति ने अमिता को आत्मबल दिया. उस के काफी समझानेबुझाने पर वह सामान्य हो गई. इस के बाद दोनों काफी करीब आते गए. दोनों ने एकदूसरे के मोबाइल नंबर ले लिए. मुलाकातों का सिलसिला तेजी से चल निकला. रोज ही मिलना, बातें करना, साथ घूमना जैसे जरूरी हो गया. अमिता की बातों से राजेंद्र को लगता कि जैसे वह उस के बिना रह नहीं पाएगी. वह भी उस का जीवन सुखमय बनाना चाहता था. इसीलिए उस ने उस का हाथ थामने का निर्णय ले लिया. जबकि राजेंद्र उस से 4 साल छोटा था. लेकिन उस ने इस की भी परवाह नहीं की. उसे डर था कि उस के कदम पीछे खींच लेने से एक इंसान की जिंदगी चली जाएगी और उस का जिम्मेदार वह होगा.

राजेंद्र के पिता शिवप्रसाद तिवारी रायबरेली की डलमऊ तहसील स्थित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में हेड क्लर्क थे. रायबरेली में ही उस का पैतृक घर था. 3 भाइयों और एक बहन में वह दूसरे नंबर पर था. सब से बड़े भाई देवेंद्र कुमार तिवारी घर पर ही खेतीबाड़ी का काम देखते थे. उस से छोटा नरेंद्र और बहन थी. दोनों पढ़ रहे थे. राजेंद्र के इस निर्णय की जानकारी उस के पिता को होगी तो उन का क्या रुख होगा, यह उसे अच्छी तरह पता था. एक तो प्रेम विवाह, दूसरा अपने से बड़ी उम्र की लड़की से, तीसरा विजातीय. उस के निर्णय का पता चलते ही उन्होंने उस से संबंध तोड़ लिए. उस ने उन्हें समझाने का प्रयास किया, पर उन्होंने उस की एक न सुनी.

घर वालों से बगावत कर के राजेंद्र ने अमिता से प्रेम विवाह कर लिया. इस विवाह में दोनों के ही परिवारों के लोग शामिल नहीं हुए. शादी के बाद वह अमिता को राजाजीपुरम स्थित अपने मकान में ले आया. वैवाहिक जीवन हंसीखुशी बीतने लगा. इंस्टीट्यूट में नौकरी करने के साथसाथ राजेंद्र किसी अच्छी नौकरी की तलाश में था. शादी के बाद उस ने इस ओर खास ध्यान देना शुरू कर दिया. अमिता नियमित रूप से अपनी नौकरी पर जा रही थी.

एक दिन राजेंद्र अमिता के औफिस पहुंचा तो उस के बौस दिनेश मेहरा कहीं जाने की तैयारी में थे. अमिता ने राजेंद्र का परिचय उन से कराया तो वह तपाक से बोले, ‘‘अरे तुम राजेंद्र हो, कहो कैसी कट रही है?’’

‘‘सब बढि़या चल रहा है.’’ राजेंद्र ने जवाब दिया.

‘‘कभी कोई काम हो तो बताना.’’ कहते हुए उन्होंने राजेंद्र के कंधे पर हाथ रखा और आगे बढ़ गए. मेहराजी पहली मुलाकात में राजेंद्र को काफी भले आदमी नजर आए. उस समय उसे क्या पता था कि ऊपर से सज्जन लगने वाले यह शख्स उस की जिंदगी में जहर घोल कर रख देंगे. अमिता ने एक दिन उसे बताया कि मेहराजी बड़ी दिलचस्पी से हमारे घर की बातें पूछा करते हैं. यह बात उसे बड़ी अजीब लगी कि आखिर उन का उस के घर से क्या मतलब. बहरहाल उस ने उस समय इस बात पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया.

धीरेधीरे छोटीछोटी बातों पर अमिता राजेंद्र से झगड़ने लगी. उस की सही बात को भी गलत बताती. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर अमिता के व्यवहार में अचानक यह बदलाव क्यों आ गया. एक रात जब उस ने उस के व्यवहार में आए बदलाव के बारे में पूछा तो उस से मिली जानकारी से वह दंग रह गया. अमिता ने बताया कि मेहराजी अकसर उस के घर के बारे में राय दिया करते थे कि यह काम ऐसे होना चाहिए, फलां काम नहीं करना चाहिए. मेहराजी अमिता को जिस तरह की सलाह देते थे, उस के हिसाब से वह बिलकुल बेतुकी होती थीं. चूंकि अमिता पूरी तरह उन की सलाह पर चल रही थी, इसीलिए उन दोनों में मनमुटाव हो रहा था.

उस की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर यह कौन सी राजनीति है? आखिर मेहराजी उस के परिवार में कलह पैदा करने पर क्यों तुले हैं? राजेंद्र ने इस ओर गंभीरता से ध्यान शुरू किया. उसी बीच उसे पता चला कि उस की शादी के पहले से ही मेहराजी के अमिता से काफी आत्मीय संबंध थे. दरअसल शादी से पहले जब अमिता अपनी पारिवारिक स्थिति से परेशान थी तो मेहराजी उस के साथ सहानुभूति जता कर उस के हमदर्द बन गए थे. लेकिन शादी के बाद अमिता की स्थिति बदल गई थी. शायद यही कारण था कि मेहराजी ने कूटनीति अपना कर उस के वैवाहिक जीवन में फूट डालने की कोशिश शुरू कर दी थी, ताकि वे फिर अमिता के हितैषी बन सकें.

सीधे स्वभाव की अमिता को मेहराजी ने अपने व्यवहार से काफी प्रभावित कर रखा था. जबतब काम के बहाने वह उसे साथ ले जाते. घुमातेफिराते, ऊंचेऊंचे ख्वाब दिखाते, कीमती सामान खरीद कर देते. राजेंद्र ने अमिता को समझाने का भरसक प्रयास किया. पर उसे लगा कि वह मेहराजी से जलता है, इसलिए ऐसी बातें कर रहा है. यही वजह थी कि उस के समझानेबुझाने का उस पर कोई असर नहीं हुआ. मेहराजी से वह इतना अधिक प्रभावित थी कि उन के आगे उस की हर बात महत्त्वहीन थी. अब उसे विश्वास हो गया कि अमिता के सीधे और सरल स्वभाव का मेहरा नाजायज फायदा उठा रहा है.

राजेंद्र ने अमिता को बहुत समझाया, मेहराजी के साथ घूमनेफिरने से मना किया, उन की मक्कारी के बारे में बताया. एक बार तो अमिता को उस की बातें समझ में आ गईं. उस ने वादा किया कि अब वह कभी मेहराजी से औफिस के काम के अलावा कोई बात नहीं करेगी. कुछ दिनों तक तो सब ठीकठाक चलता रहा, लेकिन जल्दी ही मेहराजी ने उसे फिर बहकाना शुरू कर दिया. इस बार उन्होंने अमिता को स्वतंत्रता का पाठ पढ़ा दिया. अब जब भी राजेंद्र उसे समझाता तो जवाब मिलता, ‘‘मैं स्वतंत्र हूं, बंधुआ नहीं.’’

अजीब थी उस की स्वतंत्रता और मेहराजी का स्वतंत्रता पाठ. राजेंद्र के सामने ही उस का घर उजड़ रहा था और वह असहाय था. लेकिन वह कठोर कदम उठा कर मेहराजी को कोई आसान मौका नहीं देना चाहता था. वह नहीं चाहता था कि उस का घर बिखरे. राजेंद्र ने अमिता को समझाया कि ये पैसे वाले लोग उन की कमजोरी का फायदा उठाते हैं. पैसे के बल पर वे उन्हें खरीदने तथा गुलाम बनाने की कोशिश करते हैं. उन का हित इसी में है कि मेहनत से जो कुछ कमाएं, उसी में गुजारा करें. दूसरों के पैसों के पीछे न भागें.

अमिता ने महसूस किया कि राजेंद्र की बात सही है. इसीलिए उस ने फिर वादा किया कि अब वह मेहराजी की बातों पर ध्यान नहीं देगी. लेकिन अगले ही दिन जब वह औफिस से लौटी तो मेहराजी ने उस के सारे उपदेश गलत सिद्ध कर दिए. उसी शाम मेहराजी उस के घर आ धमके. उन्होंने राजेंद्र को चेतावनी दी, ‘‘अमिता तुम से जो कुछ कहे, वह तुम्हें मानना होगा. अगर ऐसा नहीं किया तो अंजाम ठीक नहीं होगा.’’

यह सुन कर राजेंद्र सन्न रह गया. शांत और विनम्र भाव से उस ने जवाब दिया, ‘‘ठीक है, जो आप चाहते हैं, वही होगा. साथ ही मैं कोशिश करूंगा कि जितनी जल्दी हो, अमिता की जिंदगी से दूर हो जाऊं.’’

राजेंद्र मेहराजी के सामने इसलिए विनम्र हो गया था कि शायद उस के दुख को समझ कर उन्हें सद्बुद्धि आ जाए. पर हुआ इस के विपरीत. मेहराजी ने अपनी जीत पर प्रसन्न हो कर राजेंद्र के सामने ही उस की पत्नी को ले कर घूमने चले गए. उन के जाने के बाद राजेंद्र आंसू बहाता रहा. सोचता रहा कि क्या दुनिया में कमजोर लोगों के साथ ऐसा ही होता है? लौटने पर अमिता को जब उस ने समझाया तो वह बोली, ‘‘मेहराजी तो मजाक कर रहे थे, आप बुरा मान गए.’’

उस के साथ मजाक? आखिर क्या रिश्ता है मेहराजी से उस का, जो वह उस से मजाक कर रहे थे? उस की समझ में नहीं आ रहा था. इसलिए चुप रह गया. इस गंभीर समसया के समाधान का वह रास्ता ढूंढने लगा. काफी माथापच्ची के बाद भी उसे कोई उपाय नहीं सूझा. हां, इस बीच मेहराजी और अमिता का मिलनाजुलना और भी आसान हो गया. हुआ यह कि गरमियों में राजेंद्र के मकान मालिक सपरिवार घूमने चले गए. इस बीच अमिता ने 15 दिनों की छुट्टी ले ली. राजेंद्र के नौकरी पर जाने के बाद घर में केवल अमिता ही रह जाती थी. मेहराजी उस की अनुपस्थिति में घर आ जाते. दोनों घंटों बैठ कर गपशप करते या फिर घूमने चले जाते.

राजेंद्र को इस बात का आभास तब हुआ, जब घर लौटने पर कमरे में मेहराजी का कोई न कोई सामान पड़ा मिलता. बरतन जूठे मिलते. आखिर एक दिन उस ने पूछ ही लिया, ‘‘क्या बात है, आज चाय बहुत बनी है?’’

‘‘मेहराजी आए थे.’’ अमिता ने बड़े तीखे स्वर में कहा. राजेंद्र चुप रह गया.

राजेंद्र ने उसे एक बार फिर समझाने की कोशिश की, पर असफल रहा. इसी बीच उस के इंस्टीट्यूट का समय भी बदल गया. जिस दिन समय बदला था, उस दिन जल्दी छुट्टी हो गई. वह घर आ गया. वहां बाउंड्री वाले मेनगेट पर अंदर से ताला बंद था. अंदर के दरवाजे भी बंद थे. ग्रिल वाला गेट फांद कर वह खिड़की के पास पहुंचा. एक कब्जा टूटा होने के कारण खिड़की ठीक से बंद नहीं होती थी. चुपके से उस ने अंदर झांका तो अमिता और मेहरा को आपत्तिजनक अवस्था में देख कर उस के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई. वह तो सिर्फ यही समझता था कि दोनों के बीच मामला केवल घूमनेफिरने तक ही सीमित था.

उस समय राजेंद्र की समझ में नहीं आया कि वह क्या करे. एक बार उस के मन में आया कि पड़ोसियों को बुला कर मेहराजी को मजा चखा दे. फिर यह सोच कर चुप रह गया कि इस में बदनामी उसी की होगी. गेट फांद कर वह फिर बाहर आ गया. कुछ देर इधरउधर चहलकदमी कर सोचता रहा, लेकिन कुछ समझ में नहीं आया. फिर कुछ देर बाद उस ने जोर से गेट भड़भड़ाया. अमिता बाहर निगली. गेट पर उसे देख कर चौंकी. उस ने ग्रिल वाले मेनगेट का ताला खोला. वह अंदर पहुंचा. सामने मेहराजी बैठे थे. उन्हें यह जाहिर नहीं होने दिया कि उस ने सब कुछ देख लिया था. वह बनावटी हंसी हंसता रहा. कुछ देर बाद मेहराजी चले गए.

राजेंद्र ने इस बारे में अमिता से भी कुछ नहीं कहा. लेकिन इधरउधर की बात कर उसे एक बार फिर समझाने की कोशिश की, पर कोई नतीजा नहीं निकला. वह बराबर यही कहती रही, ‘‘मेहराजी बहुत अच्छे आदमी हैं. तुम नाहक उन से जलते हो. वह हमारी हर तरह से मदद कर रहे हैं. उन का एहसान मैं जिंदगी भर नहीं भूल सकती.’’

उन्हीं दिनों अमिता ने अपने मातापिता के घर भी आनाजाना शुरू कर दिया. उस के मातापिता पास में ही रहते थे. अब वह सुबह बहुत जल्दी औफिस जाने के लिए निकलती और रात देर से घर लौटती. राजेंद्र फोन कर के पूछ भी नहीं सकता था कि वह कहां है और कब तक आएगी. जल्दी जाने और  देर से लौटने का कारण पूछने पर राजेंद्र को धमकी मिलती, ‘‘मेरी जो इच्छा होगी करूंगी, तुम मुझे रोक नहीं सकते.’’

राजेंद्र की विनम्रता और सीधेपन का नाजायज फायदा उठाया जाता रहा. वह उसे कमजोर और डरपोक समझ रही थी. वह नहीं चाहता था कि उस की इज्जत चौराहे पर नीलाम हो, लोग उस पर हंसें. लेकिन अब उसे इस बात का पश्चाताप हो रहा था कि उस ने मातापिता की बात नहीं मानी. उन के न चाहते हुए भी प्रेमविवाह क्यों कर लिया? अब महसूस हो रहा था कि मांबाप हमेशा अपनी संतान के हित की सोचते हैं. अपने अनुभवों के आधार पर ही संतान को उचित राय देते हैं. मांबाप की याद आते ही वह दुखी हो उठता. प्रेम के नाम से उसे नफरत होने लगी थी.

दूसरी ओर मेहराजी ने अमिता को यह आश्वासन दे रखा था कि अगर पति उसे छोड़ देगा तो वह उसे अपनी पत्नी बना लेंगे. मेहराजी की संपत्ति की वह मालकिन हो जाएगी. शायद यही वजह थी कि जब भी राजेंद्र उसे समझाने की कोशिश करता, वह बेबाक कह देती, ‘‘ठीक है, मैं मेहराजी के साथ जा रही हूं, रात देर से लौटूंगी.’’

मेहरा और अमिता ने राजेंद्र के सामने ऐसी स्थिति पैदा कर दी थी कि एक ही रास्ता शेष था कि वह उन के बीच से हट जाए. मेहरा के औफिस के तमाम कर्मचारी अमिता और बौस के रिश्ते को जान गए थे. इस से राजेंद्र को खुद पर शरम महसूस हो रही थी. वह अपने प्रेम और धोखेबाजी के बारे में सोचसोच कर परेशान हो रहा था. आखिर क्या उसे सारी जिंदगी यही देखना पड़ेगा. उस दिन तो वह जैसे आसमान से गिर पड़ा, जब अमिता को अपने सगे भाई अश्विनी के साथ आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया. उस ने भाईबहन के पवित्र रिश्ते पर बदनुमा दाग लगा दिया था. अब राजेंद्र समझ गया कि असली दोषी कौन है. वह अभी तक सारा दोष मेहराजी को ही दे रहा था, जबकि अपना ही सिक्का खोटा था. इस घटना के बाद वह पूरी तरह टूट गया.

आखिर कोई कब तक अपने स्वाभिमान को तिलांजलि देता रहेगा? कितना झुकेगा? कितना दबेगा? राजेंद्र ने काफी प्रयास किया कि बात उसी तक सीमित रहे, आगे न बढ़े. पर उस का चुप रहना उस की कमजोरी माना जा रहा था. वह इस विचार का था कि वह प्यार सच्चा नहीं होता, जिस में प्रेमी को क्षमा न किया जा सके. इसी कारण वह अमिता को समझाबुझा कर सही रास्ते पर लाने का असफल प्रयास करता रहा. लेकिन उस के मनमस्तिष्क को तो मेहराजी ने विकृत कर दिया था. ‘वाह रे मेहराजी, तुम ने अजीब राजनीति का खेल खेला. तुम समझते होगे कि राजेंद्र घुटघुट कर मर जाएगा या फिर जहर खा लेगा. फिर तुम मनचाहा राज करोगे.’ लेकिन राजेंद्र ऐसा करने वालों में नहीं था. शायद वह कोई कठोर कदम उठाने से रुक जाता था. उसे विश्वास था कि कुदरत उन्हें उन के कर्मों का दंड अवश्य देगा.

लेकिन हर चीज की एक सीमा होती है. समुद्र और सब्र की भी सीमा होती है. दोनों अगर अपनी सीमा तोड़ दें तो अनर्थ हो जाता है. किसी चीज की अति करने का अर्थ होता है विनाश. वे दोनों अति की ओर अग्रसर हो रहे थे. राजेंद्र शांत रह कर बुरे दिन टलने का इंतजार करता रहा. वह अपनी पत्नी को अब न तो कुछ समझाता था और न ही उस की किसी हरकत का विरोध करता था. उसे बिलकुल स्वच्छंद छोड़ दिया था, इसलिए कि शायद कभी ठोकर खा कर वह अपने कर्मों पर शर्मिंदगी महसूस करे. लेकिन वे घटनाएं रुकने का नाम नहीं ले रही थीं. एक दिन अमिता ने राजेंद्र से कहा, ‘‘आज मैं अपनी मां के साथ बाजार जाऊंगी.’’

राजेंद्र ने उस की बात पर कोई ध्यान नहीं दिया तो उस ने अपने कुछ कपड़े लिए और घर से निकल गई. उसे इस तरह कपड़े ले जाते देख उसे शक हुआ. उस के जाने के थोड़ी देर बाद वह घर से निकला और अपनी ससुराल जा पहुंचा. वहां मजदूर घर की पुताई कर रहे थे. अमिता की मम्मी और पापा बाजार गए थे. घर में केवल अमिता का भाई अश्विनी था. वह सीधे उस के कमरे की ओर बढ़ा. कमरे के दरवाजे को हाथ से धकेलने की कोशिश की, लेकिन वह अंदर से बंद था. उस ने अपना शक मिटाने के लिए खिड़की से अंदर झांका. वहां का दृश्य देख कर वह कांप उठा. वह चुपचाप वापस लौट आया.

राजेंद्र ने तय कर लिया कि अब वह यह घर छोड़ कर चला जाएगा. उस का मन वैराग्य की ओर मुड़ गया. लेकिन उस के संन्यासी हो जाने से उस के दुश्मनों का मतलब हल हो जाएगा. यह सोच कर उस ने तय किया कि दुनिया से पूछ लिया जाए कि आखिर कौन गलत है, कौन सही? जब उस का जीवन बरबाद हो ही गया है तो फिर सच उजागर करने में ज्यादा से ज्यादा उस की जान ही तो जाएगी. वैसे भी कैसा डर? इस जिंदगी से तो मौत ही अच्छी है. वह जानता था कि अन्याय करने वाले से ज्यादा दोषी अन्याय सहने वाला होता है. पर वह मजबूर था. किसी को दंड नहीं दे सकता था. क्योंकि किसी को दंड देने का कोई अधिकार उस के पास नहीं था. यही सोच कर उस का संन्यास ले लेने का निर्णय पक्का होता गया.

लेकिन शायद ऐसा नहीं होना था. 21 जनवरी को रात साढ़े 8 बजे अमिता औफिस से घर लौटी. उस के इतनी देर से आने के बावजूद राजेंद्र ने कुछ नहीं कहा. उस ने कपड़े बदले. वह विचारों में खोया था. अचानक उस के दिमाग में आया कि क्यों न घर छोड़ने से पूर्व अमिता को आखिरी बार समझाने की कोशिश करे. राजेंद्र ने उस से बात छेड़ी ही थी कि वह बिफर उठी. उसे दुत्कारने लगी. इस के बावजूद वह उसे समझाने की कोशिश करता रहा. उस के समझाने का उस पर कोई असर नहीं हुआ. उस ने उसे खरीखोटी सुनानी शुरू कर दी. वह भी थोड़ा उत्तेजित हुआ. दोनों में झगड़ा होने लगा. उस ने गुस्से में कहा, ‘‘तुम मेरे जीवन से निकल जाओ. तुम्हारे लिए अब मेरी जिंदगी में कोई जगह नहीं है. न ही अब मैं तुम्हारे साथ रहना चाहती हूं. अब मैं मेहराजी की पत्नी बन कर रहूंगी.’’

राजेंद्र ने उसे अपने प्यार की दुहाई दी. परंतु वह जानबूझ कर उस की खिल्ली उड़ा रही थी. वह अपना होश खो बैठा. मेज पर पड़ी कैंची उस के हाथ में आ गई. उस ने कैंची का भरपूर वार उस के पेट पर कर दिया. वह चीख उठी. परंतु उस पर तो जैसे शैतान सवार हो गया था. वह कैंची से उस के शरीर को गोदता चला गया. वह जमीन पर गिर पड़ी. कुछ देर तड़पने के बाद उस ने दम तोड़ दिया. अमिता की मृत देह देख कर राजेंद्र के सिर पर सवार शैतान उतर गया. सामने लाश देख कर वह कांप उठा. अब क्या होगा? उस की समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे. उस ने क्या सोचा था और क्या कर बैठा. कहां सब कुछ त्याग कर वह संन्यासी बनने चला था, कहां अब खूनी बन गया.

स्वयं को संतुलित कर उस ने आपबीती लिखनी शुरू की. उस के साथ जो कुछ हुआ था, सब लिख डाला. यह घटना स्पष्ट रूप से दिनेश मेहरा तथा अमिता के भाई के कारण ही हुई थी. राजेंद्र ने सब कुछ होशोहवास में लिखा था. 28 पृष्ठों के उस पत्र की कौपियां राष्ट्रपति, भारत सरकार, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री तथा गृहमंत्री और लखनऊ के जिलाधिकारी को आवश्यक काररवाई हेतु भेज दिया. राजेंद्र कुमार तिवारी द्वारा लिखे गए इस पत्र को पढ़ कर थाना तालकटोरा के थानाप्रभारी रामकुमार यादव की आंखें फटी रह गईं. हत्यारे ने न केवल अपना अपराध स्वीकार किया था, बल्कि हत्या के कारण को भी स्पष्ट लिख दिया था. हत्या करने के बाद ही यह पत्र लिखा गया था, क्योंकि पत्र के अंत में राजेंद्र कुमार ने अपने हस्ताक्षर करने के साथ खून की छींटें भी डाली थीं.

थानाप्रभारी को यह पत्र अमिता की लाश के समीप एक मेज पर मिला था, जिसे वह उसी समय पूरा पढ़ गए थे. मेज पर ही खून से सनी कैंची भी रखी थी. कमरे की दीवारों पर भी खून के छींटे पड़े थे. मृत अमिता के शरीर पर सलवारकुर्ता था. राजेंद्र कुमार तिवारी की मकान मालकिन श्रीमती बाधवा भी उसी मकान के एक हिस्से में रहती थीं. पूछताछ के दौरान श्रीमती बाधवा ने पुलिस को बताया कि बीती रात उन्होंने राजेंद्र तथा उस की पत्नी के बीच हुए झगड़े की आवाजें सुनी थीं. घटना वाली सुबह जब वह बाहर निकलीं तो राजेंद्र के घर का दरवाजा बंद था. उन्हें आश्चर्य हुआ, क्योंकि उस समय तक दोनों लौन में बैठ कर अखबार पढ़ते हुए दिखाई देते थे.

उन्होंने दरवाजा खटखटाया. राजेंद्र को आवाज दी, पर अंदर से कोई जवाब नहीं मिला. वह सशंकित हो उठीं. मकान के पिछले हिस्से की तरफ जाने पर उन्होंने बाथरूम के दरवाजे पर ताला बंद पाया. श्रीमती बाधवा ने यह बात अमिता के पिता को बता देना उचित समझा. उन का फोन नंबर उन के पास था. उन्होंने फोन कर के उन्हें पूरी बात बता दी. एकदो पड़ोसियों को साथ ले कर अमिता के पापा राजेंद्र के मकान पर पहुंचे. उन लोगों ने भी दरवाजा खटखटाया. ताला तोड़ने की कोशिश की, पर सफल न हो सके. राजेंद्र को फोन किया. उस का फोन बंद था. किसी अनिष्ट की आशंका से उन्होंने थाना तालकटोरा पुलिस को फोन किया. थानाप्रभारी रामकुमार यादव पुलिस दल के साथ मौके पर पहुंचे. ताला तोड़ कर जब उन्होंने अंदर प्रवेश किया तो वहां अमिता का शव पड़ा था.

रामकुमार यादव इस घटना से काफी परेशान हो उठे थे. सुबहसुबह उन के थानाक्षेत्र में 2 अन्य घटनाएं भी हो चुकी थीं. एक अन्य युवती की हत्या का मामला था और तालकटोरा थानाक्षेत्र के डी-ब्लौक स्थित रेलवे लाइन पर एक घायल युवक मिला था. उस युवक को कुछ लोग बेहोशी की हालत में उठा कर थाने ले आए थे. उसे उपचार हेतु अस्पताल भेज दिया गया था. युवक की शिनाख्त नहीं हो सकी थी. थानाप्रभारी ने संभावित स्थानों पर खोज की, परंतु राजेंद्र नहीं मिला. उस का फोन बंद ही था, इसलिए संपर्क नहीं हो सका. उस की तलाश में पुलिस टीम रायबरेली गई. वह अपने पिता के यहां भी नहीं मिला. पुलिस उस के पिता शिवप्रसाद तिवारी को अपने साथ लखनऊ ले आई. उन से पूछताछ के आधार पर पुलिस ने एक बार फिर राजेंद्र की तलाश की, पर उस का पता नहीं चला.

अचानक थानाप्रभारी का माथा ठनका कि कहीं रेलवे लाइन पर घायल मिला युवक ही राजेंद्र न हो. इस के बाद उन्होंने शिवप्रसाद तिवारी को साथ लिया और बलरामपुर अस्पताल जा पहुंचे. वह युवक अभी तक बेहोश था. शिवप्रसाद तिवारी उसे देखते ही रो पड़े. वह राजेंद्र ही था. उस की निगरानी के लिए 2 सिपाहियों को वहां तैनात कर दिया गया. तीन दिनों बाद 25 जनवरी को राजेंद्र को होश आ गया. पुलिस ने उस से पूछताछ की तो उस ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया. उस का कहना था, ‘‘मैं ने जो कुछ किया, उस का मुझे कोई दुख नहीं है. मलाल तो इस बात का है कि मेरा परिवार तबाह करने वालों को कानून ने कोई सजा नहीं दी. अब कुदरत ही उन के कर्मों का फल उन्हें देगा, ऐसा मेरा विश्वास है.’’

लेकिन सवाल उठता है कि क्या अमिता की हत्या के बाद राजेंद्र द्वारा लिखे गए पत्र में लगाए गए आरोपों की कोई सजा कथित दोषियों को मिल सकती है? क्या ऐसा नहीं हो सकता कि कुछ लोगों को बदनाम करने के लिए हत्या के बाद लिखे गए पत्र में राजेंद्र ने उन का नाम लिखा हो? शायद यही वजह है कि दिनेश मेहरा (55 वर्ष) का कहना है, ‘‘मेरा और अमिता का रिलेशन केवल औफिशियल था. राजेंद्र ने अपने पत्र में मेरा जिक्र क्यों किया, यह मुझे नहीं पता. हो सकता है, उस ने मुझे बदनाम करने के लिए ऐसा किया हो. जहां तक सवाल है कि राजेंद्र ने अमिता की हत्या क्यों की तो इस का पता लगाना पुलिस का काम है, मेरा नहीं. हां, मैं यह जरूर कह सकता हूं कि अमिता बहुत ही मेहनती महिला थी. औफिस का काम भी वह पूरी ईमानदारी और लगन से करती थी. उस की मौत का मुझे दुख है.’’

दूसरी ओर अमिता के भाई अश्विनी का कहना था, ‘‘मुझे जो कुछ कहना है, पुलिस के सामने या अदालत में कहूंगा. लेकिन इतना जरूर कहूंगा कि राजेंद्र न केवल सनकी, बल्कि पागल था. उस ने जो कुछ लिखा है, अपनी सनक और पागलपन की झोंक में लिखा है. हत्या के असली कारण से पुलिस का ध्यान हटाने के लिए उस ने ऊलजुलूल बातें अपने पत्र में लिखी हैं. आखिर इन बातों का कोई सुबूत तो होना चाहिए.’’

एक अहम सवाल यह भी है कि जब राजेंद्र अपना अपराध स्वीकार कर रहा है तो उसे हत्या का असली कारण छिपाने से क्या लाभ? उस ने अमिता से प्रेमविवाह किया था. दोनों साथसाथ रह रहे थे. दोनों ही सर्विस में थे. इसलिए न तो आर्थिक संकट जैसा कोई कारण था और न ही सर्विस को ले कर कोई मनमुटाव था. बहरहाल, पुलिस का कहना है कि उसे हत्या का अपराधी मिल गया है. पुलिस का काम तो हत्या के अपराधी को पकड़ने के साथ ही समाप्त हो गया है. किसी को सजा देने का काम अदालत का है. शायद इसी कारण पुलिस ने राजेंद्र द्वारा पत्र में लिखी गई बातों की वास्तविकता का पता नहीं लगाया और न ही इस संबंध में कोई छानबीन की.

थानाप्रभारी रामकुमार यादव इस बारे में कहते हैं, ‘‘राजेंद्र ने अपना जुर्म स्वीकार कर लिया है. उस ने अपने पत्र में किस पर क्या आरोप लगाया है, इस की जांच का काम हमारा नहीं है. हां, इतना जरूर है कि पाप का प्रायश्चित करने वाला व्यक्ति न झूठ बोल सकता है और न झूठ लिख सकता है. अदालत भले ही किसी को सजा न दे सके, लेकिन कुदरत जरूर सजा देगी.’’

कथा लिखे जाने तक राजेंद्र को अस्पताल से छुट्टी मिल गई थी. पुलिस ने उसे अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया था. पुलिस आरोपपत्र तैयार करने में जुटी थी. Short Hindi Story

—कथा सत्य घटना पर आधारित है. कथा में पात्रों एवं स्थानों के नाम बदले हुए हैं.

 

UP Crime News: सूटकेस में मिला कंकाल

UP Crime News: एक ऐसी हैरान कर देने वाली वारदात जिस ने हर किसी को झकझोर कर रख दिया है. नैशनल हाइवे के पास गन्ने के खेत में एक सूटकेस मिला, जिस में एक महिला का कंकाल मिला है. आखिर किस का है यह कंकाल और कौन है महिला का कातिल, यही बड़ा सवाल है. क्या छिपा है हत्या के राज में, जानने के लिए पढ़ें यह पूरी स्टोरी, जो आप को ऐसे अपराधों से करेगी सावधान.

महिला के कंकाल वाला यह सूटकेस उत्तर प्रदेश के हापुड़ जिले के नैशनल हाइवे 9 पिलखुवा क्षेत्र में गन्ने के खेत में मिला. सूटकेस के पास से शराब की बोतलें और तेजाब की खाली कंटेनर मिलने पर शक गहरा गया है कि मृतक की पहचान मिटाने के लिए शव को तेजाब से जलाया गया होगा. इस सनसनीखेज खोज ने पूरे इलाके में दहशत फैला दी है.

पुलिस अधिकारियों के अनुसार, यह कंकाल लगभग 10 से 12 दिन पुराना लग रहा है. महिला की पहचान स्थापित करने के लिए कई टीमों को सक्रिय कर दिया गया है. आसपास के जिलों से महिलाओं की गुमशुदगी रिपोर्ट भी मंगवाई जा रही है, ताकि पहचान का कोई सुराग मिल सके.

कस्तला कासमाबाद गांव के निवासी योगेंद्र सिंह रामा मैडिकल कालेज के पास सर्विस रोड किनारे लीज पर खेती करते हैं. सोमवार सुबह वह अपने खेत में गन्ने की कटाई करवा रहे थे, तभी दूर एक काला सूटकेस पड़ा दिखाई दिया. पहले उन्हें लगा कि शायद कोई कबाड़ फेंक गया होगा, लेकिन पास जा कर स्थिति बदल गई.

जैसे ही योगेंद्र ने सूटकेस खोला, भीतर महिला का कंकाल देख वह डर गए और तुरंत पुलिस को सूचना दी. सूचना मिलते ही एसएचओ श्यौपाल सिंह, सीओ जितेंद्र शर्मा, एसपी कुंवर ज्ञानंजय सिंह पुलिस टीम के साथ मौके पर पहुंच गए. पुलिस ने इलाके की घेराबंदी कर फोरैंसिक विशेषज्ञों को जांच में लगाया गया.

फोरैंसिक टीम ने सूटकेस में मौजूद महिला का कंकाल, एक लोअर और आसपास मिले सबूतों के नमूने इकट्ठे किए. शुरुआती जांच में यह साफ हुआ कि शव को खत्म करने और पहचान मिटाने की कोशिश की गई थी. अब पुलिस यह पता लगाने में जुट गई है कि यह हत्या किसी रंजिश, घरेलू विवाद या किसी संगठित अपराध का हिस्सा है. फिलहाल यह रहस्य गहराता जा रहा है. पुलिस मामले की जांच कर रही है. UP Crime News