Bangalore Crime: जिस्म की मौज में मौत की छाया

Bangalore Crime: 13 जनवरी, 2016 की दोपहर के यही कोई साढ़े 3 बजे बंगलुरु के थाना सोलादेवनहल्ली पुलिस को सप्तगिरि अस्पताल से सूचना मिली कि कुछ देर पहले श्रुति गौड़ा नाम की एक महिला शहर के जानेमाने एडवोकेट अमित मूर्ति को अस्पताल में इलाज के लिए लाई थी. उन की छाती में गोलियां लगी थीं.

डाक्टरों ने उन्हें बचाने की काफी कोशिश की, लेकिन वह बच नहीं सके. उन्हें लाने वाली श्रुति पैसों और खून का इंतजाम करने गई थी लेकिन लौट कर नहीं आई. सूचना के अनुसार, मामला आपराधिक यानी हत्या का लग रहा था, इसलिए थाना पुलिस ने तुरंत मामले की डायरी तैयार की. पुलिस अस्पताल जाने की तैयारी कर ही रही थी कि तभी 2 लोग थाने में दाखिल हुए. उन में एक नौजवान था और दूसरा बुजुर्ग.

नौजवान बुजुर्ग के हाथों से रिवौल्वर छीनने की कोशिश कर रहा था. वह रिवौल्वर छीन पाता, उस के पहले ही बुजुर्ग ने रिवौल्वर थानाप्रभारी की मेज पर रखते हुए कहा, ‘‘सर, आप मुझे गिरफ्तार कर लीजिए. मैं ने इस रिवौल्वर से एडवोकेट अमित मूर्ति की हत्या की है.’’

‘‘नहीं सर, यह सच नहीं है. एडवोकेट अमित मूर्ति की हत्या इन्होंने नहीं, मैं ने की है.’’ नौजवान ने कहा.

थानाप्रभारी बुजुर्ग को भी जानते थे और युवक को भी. बुजुर्ग का नाम गोपालकृष्ण गौड़ा था. नौजवान उन का बेटा राजेश गौड़ा था. गोपालकृष्ण को इलाके में कौन नहीं जानता था. वह समाजसेवक तो थे ही, एक राजनीतिक पार्टी से भी जुड़े थे. इसलिए थानाप्रभारी को एकबारगी विश्वास नहीं हुआ कि बापबेटे जिस हत्या की बात कर रहे हैं, ऐसा सचमुच कर सकते हैं. लेकिन थोड़ी ही देर पहले ही उन्हें सप्तगिरि अस्पताल से एडवोकेट अमित मूर्ति की हत्या की सूचना मिल चुकी थी, इसलिए उन्होंने सवालिया नजरों से गोपालकृष्ण की ओर देखा तो उन्होंने अपनी बात पर जोर देते हुए कहा, ‘‘सर, मेरा बेटा झूठ बोल कर मुझे बचाना चाहता है. उस की हत्या मैं ने ही की है.’’

इस के बाद राजेश ने आगे बढ़ कर कहा, ‘‘सर, मेरे पिता निर्दोष हैं. एडवोकेट अमित मूर्ति को मैं ने ही गोलियां मारी हैं, क्योंकि वह निहायत ही गिरा हुआ आदमी था. उस के मेरी पत्नी श्रुति गौड़ा से अवैध संबंध थे.’’

राजेश के इतना कहते ही थानाप्रभारी को समझते देर नहीं लगी कि मामला क्या था और एडवोकेट अमित मूर्ति की हत्या किस ने की है. फिर भी सच्चाई सामने लाने के लिए उन्होंने एक परीक्षा ली. उन्होंने कहा, ‘‘गुनहगार तो आप दोनों ही हैं, लेकिन असली गुनहगार कौन है, यह अभी साफ हो जाएगा.’’

अपनी बात कह कर उन्होंने मेज पर रखा रिवौल्वर गोपालकृष्ण गौड़ा के हाथों में देते हुए थोड़ी दूर पर रखी किसी चीज पर निशाना लगाने को कहा. जब वह उस चीज पर निशाना नहीं लगा सके तो साफ हो गया कि हत्या उन्होंने नहीं, उन के बेटे राजेश गौड़ा ने की थी. वह बेटे को बचाने के लिए झूठ बोल रहे थे. थानाप्रभारी ने दोनों को हिरासत में ले लिया और आगे की जांच के लिए सप्तगिरि अस्पताल जा पहुंचे. अस्पताल में थानाप्रभारी ने डाक्टरों का बयान ले कर मृतक अमित मूर्ति की लाश कब्जे में लेने की काररवाई पूरी की. तभी उन्हें पुलिस कंट्रोल रूम से सूचना मिली कि हिसार घाट स्थित तीनसितारा होटल राजबिस्टा की तीसरी मंजिल पर स्थित कमरा नंबर 301 में एक महिला ने आत्महत्या कर ली है.

थानाप्रभारी हत्या के एक मामले की जांच कर ही रहे थे, ऐसे में आत्महत्या की इस दूसरी घटना की सूचना पा कर वह थोड़ा खीझ से उठे. लेकिन वह कर ही क्या सकते थे. अपनी ड्यूटी तो उन्हें निभानी ही थी. उन्होंने फोन द्वारा इस घटना की जानकारी अधिकारियों को देने के साथ क्राइम टीम को भी बता दिया और तत्काल वहां की काररवाई निपटा कर होटल राजबिस्टा जा पहुंचे. थानाप्रभारी के पहुंचने तक पुलिस अधिकारियों के साथ क्राइम टीम भी वहां पहुंच चुकी थी. रिसैप्शन पर पूछताछ में पता चला कि रजिस्टर में आत्महत्या करने वाली महिला का नाम श्रुति गौड़ा लिखा है. थानाप्रभारी श्रुति का नाम सुबह से कई बार सुन चुके थे, इसलिए उन्हें मृतका की शिनाख्त की जरूरत नहीं पड़ी.

वह समझ गए कि आत्महत्या करने वाली श्रुति गौड़ा कोई और नहीं, थोड़ी देर पहले हिरासत में लिए गए गोपालकृष्ण गौड़ा की बहू यानी राजेश गौड़ा की पत्नी है, जिस ने मृतक एडवोकेट अमित मूर्ति को सप्तगिरि अस्पताल में भरती कराया था. थानाप्रभारी ने अधिकारियों की उपस्थिति में ही घटनास्थल की सारी काररवाई पूरी कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया और थाने आ गए. अब तक मिली जानकारी से स्पष्ट हो गया था कि मामला प्रेमत्रिकोण का है. इस प्रेमत्रिकोण में क्या और कैसे हुआ, इस बात की जानकारी राजेश गौड़ा से पूछताछ के बाद ही पता चल सकता थी. थाने में राजेश गौड़ा से की गई पूछताछ में इस मामले में जो सच्चाई सामने आई, वह इस प्रकार थी—

बंगलुरु-कोयंबटूर नेशनल हाईवे के किनारे स्थित कगलीपुर गांव के रहने वाले थे 78 वर्षीय गोपालकृष्ण गौड़ा. सुखी और संपन्न होने के साथसाथ वह समाजसेवी भी थे. साथ ही वह एक राजनीतिक पार्टी से भी जुड़े थे. यही वजह थी इलाके में उन्हें हर कोई जानता था. उन के परिवार में पत्नी के अलावा एक ही बेटा था राजेश गौड़ा. राजेश गौड़ा स्वस्थसुंदर और पढ़ालिखा युवक था. पढ़ाई पूरी होते ही उसे एक जानीमानी रियल एस्टेट कंपनी में अच्छी नौकरी मिल गई थी. सम्मानित परिवार का होने और बढि़या नौकरी मिलने के बाद राजेश के लिए तमाम रिश्ते आने लगे थे. आखिरकार गोपालकृष्ण ने रामनगर रामोहल्ली के रहने वाले एक कारोबारी की बेटी श्रुति को पसंद कर राजेश से उस की शादी कर दी थी.

श्रुति भी राजेश से किसी मामले में कम नहीं थी. वह सुंदर तो थी ही, उस की नौकरी भी राजेश से अच्छी थी. वह सरकारी नौकरी में थी. उस का पद था पंचायत डेवलपमेंट अफसर का. उसे सरकारी गाड़ी और मकान मिला हुआ था. साथ ही घर का काम करने के लिए सरकारी नौकर भी. श्रुति जैसी पढ़ीलिखी और कमाऊ पत्नी पा कर राजेश खुश ही नहीं था, बल्कि गर्व भी महसूस कर रहा था. राजेश की तरह उस के मांबाप भी श्रुति को बहुत मानते थे. धीरेधीरे 4 साल बीत गए. इस बीच श्रुति 2 बच्चों की मां बन गई. लेकिन यह भी सच है कि समय कभी किसी का नहीं हुआ. कब किस का समय बदल जाए, कोई नहीं जानता.

पंचायत डेवलपमेंट अफसर होने की वजह से श्रुति को कभीकभी क्षेत्र के लोगों के कामों के लिए पुलिस और वकीलों से भी मिलना होता था. उन्हीं वकीलों में एक अमित मूर्ति भी था. उसी से मिलतेमिलाते श्रुति के कदम बहक गए. अमित के रौबदार चेहरे, स्वस्थ व सुंदर कदकाठी और व्यवहार ने श्रुति को काफी प्रभावित किया था. यही हाल एडवोकेट अमित मूर्ति का भी था. 2 बच्चों की मां होने के बावजूद श्रुति की सुंदरता पर वह मर मिटा था. इस में उस का दोष भी नहीं था, खूबसूरत श्रुति की बातचीत करने की अदा ही कुछ ऐसी थी कि किसी को भी मन भा जाए.

अमित के पिता बंगलुरु के जानेमाने वकील तो थे ही, बार एसोसिएशन के अध्यक्ष भी थे. अमित उन का एकलौता बेटा था. उस की शादी ही नहीं हो चुकी थी, बल्कि वह 3 साल के एक बेटे का पिता भी था. अमित पिता के साथ ही वकालत कर रहा था. पिता उसे अपनी ही तरह अच्छा वकील बनाना चाहते थे, शायद इसीलिए उन्होंने उसे पढ़ने के लिए अमेरिका भेजा था.

अमित और श्रुति दोनों के ही मनों में एकदूसरे के लिए चाहत पैदा हो चुकी थी, इसलिए वे अपनीअपनी गरिमा भूल कर एकदूसरे से मिलनेजुलने लगे थे. श्रुति को मोटरसाइकिल की सवारी बहुत पसंद थी, इसलिए अकसर वह अमित के साथ मोटरसाइकिल से लंबी ड्राइव पर निकल पड़ती थी. चोरीचोरी दोनों ही जिंदगी का लुत्फ उठा रहे थे.

लेकिन यह भी सच है कि कोई भी काम कितना ही छिपा कर किया जाए, एक न एक दिन वह लोगों की नजरों में आ ही जाता है. राजेश गौड़ा को भी पत्नी की इस हरकत का पता चल गया. श्रुति की हकीकत जान कर राजेश के होश उड़ गए. उस ने सपने में भी नहीं सोचा था कि एक सभ्य परिवार की शिक्षित बहू, जो 2 बच्चों की मां भी थी, इस तरह की हरकत कर सकती है. चूंकि राजेश का परिवार समाज में प्रतिष्ठित था, इसलिए उस ने पत्नी को समझाना चाहा तों श्रुति ने लापरवाही से हंसते हुए कहा कि जैसा वह सोच रहा है, ऐसा कुछ भी नहीं है. अमित से सिर्फ उस की दोस्ती है और वह उस से काम के सिलसिले में मिलतीजुलती रहती है.

श्रुति ने भले ही सफाई दे दी थी, लेकिन राजेश को पत्नी की इस सफाई पर विश्वास नहीं हुआ था. इसलिए वह श्रुति पर नजर रखने लगा था. इस का नतीजा यह निकला कि एक दिन उस ने श्रुति को अमित मूर्ति के साथ एक होटल में बैठी पकड़ लिया. राजेश ने उसे जलील करते हुए कहा, ‘‘अगर तुम्हें अमित इतना ही पसंद है तो तुम इस के साथ चली क्यों नहीं जाती.’’

‘‘ठीक है, अगर तुम्हारी यही इच्छा है तो मैं तुम्हें तलाक दिए देती हूं.’’ श्रुति ने कहा और अमित के साथ होटल से बाहर निकल गई.

श्रुति की यह बात सुन कर राजेश तिलमिला उठा. उसे श्रुति से ऐसी उम्मीद बिलकुल नहीं थी. यह बात उस ने अपने घर वालों को बताई तो सभी परेशान हो उठे. जब इस का पता श्रुति के मातापिता को चला तो उन्होंने उस से बात की और अमित से संबंध खत्म करने का दबाव डाला. आखिर मांबाप के दबाव में श्रुति ने अपने मोबाइल से अमित का नंबर डिलीट करते हुए वादा किया कि अब वह अमित से कोई संबंध नहीं रखेगी.

मांबाप के दबाव में श्रुति ने अमित से न मिलने का वादा तो कर लिया, लेकिन वह मांबाप से किया वादा निभा नहीं सकी. किसी को संदेह न हो, इस के मद्देनजर श्रुति ने अमित मूर्ति से मिलनेजुलने का स्थान और समय बदल दिया. अब वे ऐसी जगह मिलते थे, जहां कोई नहीं जाता था. शहर से दूर निर्जन स्थानों पर जा कर दोनों निश्चिंत हो जाते थे. लेकिन राजेश निश्चिंत नहीं था. वह श्रुति पर नजरें जमाए था. श्रुति अकसर घर से जल्दी निकल जाती थी तो देर से लौट कर आती थी. पूछा जाता तो वह कह देती कि औफिस में काम ज्यादा था, इसलिए देर हो गई.

इसी बीच राजेश ने श्रुति के मोबाइल पर अमित का कोई संदेश पढ़ लिया. उस ने जब श्रुति से उस संदेश के बारे में पूछा तो उस ने यह कह कर बात खत्म कर दी कि अमित ने उसे परेशान करने के लिए संदेश भेजा है. चूंकि राजेश को श्रुति की बातों पर विश्वास नहीं था, इसलिए उस ने उस पर नजर रखने के लिए जनवरी, 2017 के पहले सप्ताह में उस की कार में चुपके से जीपीएस लगवा कर उसे अपने मोबाइल से कनेक्ट करवा लिया. 13 जनवरी, 2017 को श्रुति 1 बजे के करीब राजेश से यह कह कर घर से निकली कि वह एक जरूरी मीटिंग के लिए औफिस जा रही है, वापस आने में देर हो सकती है.

श्रुति के जाने के बाद राजेश ने मोबाइल में उस की लोकेशन देखी तो पता चला कि उस की कार औफिस की ओर जाने के बजाय रिंग रोड की ओर जा रही है. इस से राजेश का खून खौल उठा. उस ने अपने ड्राइवर कुमार से कार निकलवाई और श्रुति का खेल खत्म करने के लिए जाने लगा. उस के पिता गोपालकृष्ण गौड़ा भी यह कहते हुए कार में बैठ गए कि उन्हें बाजार से मकर संक्रांति की पूजा के लिए कुछ सामान खरीदना है. श्रुति की कार की लोकेशन आचार्य पीयूष कालेज के करीब मिली थी, इसलिए राजेश ने ड्राइवर से कार पीयूष कालेज की ओर ले चलने को कहा. राजेश की कार कालेज के करीब पहुंची तो उसे सुनसान जगह पर श्रुति की कार खड़ी दिखाई दे गई. राजेश ने अपनी कार रुकवाई और श्रुति की कार की ओर चल पड़ा.

कार से निकलते ही उस ने रिवौल्वर निकाल ली थी, जिसे गोपालकृष्ण गौड़ा ने देख लिया था. उन्हें किसी अनहोनी की आशंका हुई, इसलिए वह ड्राइवर कुमार के साथ राजेश की ओर दौड़े. उन के पहुंचने से पहले ही राजेश श्रुति की कार के पास पहुंच गया था. कार में श्रुति के साथ अमित को देख कर वह आपा खो बैठा और अमित के सीने को निशाना बना कर 2 गोलियां दाग दीं. वह श्रुति पर भी गोली चलाना चाहता था, लेकिन गोपालकृष्ण और ड्राइवर ने उसे पकड़ लिया. पिता ने उस के हाथ से रिवौल्वर छीन कर श्रुति से कहा कि वह घायल अमित को तुरंत अस्पताल ले जाए. इस के बाद उन्होंने ड्राइवर से थाने चलने को कहा.

यह संयोग ही था कि श्रुति राजेश के हाथों से मरतेमरते बच गई थी. लेकिन दुर्भाग्य ने उस का पीछा नहीं छोड़ा. डरीसहमी श्रुति ने घायल अमित को साथ ले जा कर सप्तगिरि अस्पताल में भरती कराया. अस्पताल से वह बाहर निकली तो उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे? क्योंकि अब वह किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रह गई थी. आखिर उस ने एक खतरनाक फैसला ले लिया और अपने मातापिता को इस घटना की सूचना दे कर वह होटल राजबिस्टा पहुंची. वहां अपना पैनकार्ड दिखा कर उस ने कमरा बुक कराया, जिस में जा कर उस ने पंखे से लटक कर आत्महत्या कर ली. इस तरह एक प्रेमकहानी का अंत हो गया.

14 जनवरी, 2017 को सोलादेवनहल्ली पुलिस ने गोपालकृष्ण गौड़ा और राजेश गौड़ा को अदालत में पेश किया, जहां से गोपालकृष्ण गौड़ा को न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. जबकि सबूत जुटाने के लिए पुलिस ने राजेश गौड़ा को 5 दिनों के रिमांड पर ले लिया. रिमांड अवधि समाप्त होने पर राजेश को दोबारा अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. Bangalore Crime

Crime Story: जीजा के प्यार की धार – शबाना हुई बंदिशों का शिकार

Crime Story: खंडवा थाने की रामनगर चौकी के प्रभारी एसआई सुभाष नावडे, को 29 जून, 2021 की सुबह 9 बजे किसी ने सूचना दी कि चीराखदान तालाब में एक लाश तैर रही है. यह लाश तालाब के पास खेलते हुए बच्चों ने देखी थी. सूचना मिलने के बाद चौकी इंचार्ज सुभाष नावड़े ने सूचना टीआई बी.एल. मंडलोई को दे दी और वह टीम के साथ उस तालाब के पास पहुंच गए, जहां लाश पड़ी होने की खबर मिली थी.

पुलिस ने सब से पहले लाश को पानी से बाहर निकलवाया. वह लाश चादर के साथ चटाई में लिपटी थी. थोड़ी देर में खंडवा थाने के टीआई बी.एल. मंडलोई वहां पहुंच गए. वह अर्द्धनग्न लाश किसी युवक की थी. पुलिस उस लाश की जांच करने में जुट गई. उस के सिर, गले और हाथ पर धारदार हथियार के निशान थे. तब तक आसपास भीड़ भी लग चुकी थी. संयोग से भीड़ में से एक व्यक्ति ने लाश  की पहचान संजय बामने उर्फ संजू के रूप में की. कुछ समय में वहां रोती हुई पहुंची महिला ने पुलिस को बताया कि लाश उस के पति की है और उस का नाम शबाना है.

777बरामद लाश को देख कर इतना तो साफ हो गया था कि उस की हत्या कर तालाब में फेंकी गई थी. उस का घर नजदीक के माता चौक पर मल्टी में बताया गया. इस की सूचना मिलते ही मृतक का भाई और परिवार के अन्य सदस्य भी वहां पहुंच गए. उन्होंने ही बताया कि शबाना संजय की ब्याहता पत्नी नहीं है, बल्कि वह उस के साथ पिछले 2 सालों से लिव इन में रह रही थी. उन्होंने हत्या का सीधा आरोप शबाना पर ही मढ़ दिया. घर वालों से शुरुआती पूछताछ के बाद पुलिस ने लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी.

एसपी (खंडवा) ललित गठरे ने इस केस का खुलासा करने के लिए एक पुलिस टीम का गठन किया. टीम में टीआई बी.एल. मंडलोई, एसआई राजेंद्र सोलंकी, चौकी इंचार्ज (रामनगर) सुभाष नावड़े, परिणीता बेलेकर, एएसआई रमेश मोरे, हिफाजत अली, हैड कांस्टेबल ललित कैथवास, पंकज सोलंकी, कांस्टेबल ब्रजपाल चंदेल, आकाश जादौन, लक्ष्मी चौहान, निकता तिवारी आदि को शामिल किया. आगे की जांच के लिए पुलिस मल्टी पहुंची, जहां मृतक संजय शबाना के साथ रहता था. टीआई मंडलोई ने उस के घर का बारीकी से मुआयना किया, वहां उन्हें खून के कुछ धब्बे मिले. उन में कुछ धब्बे मिटाने के भी निशान थे.

वहीं शबाना की 13 वर्षीया बेटी मिली. वह काफी घबराई हुई थी. कुछ पड़ोसी भी मौजूद थे. पूछताछ में उन्होंने बताया कि शबाना और संजय के बीच अकसर झगड़ा होता रहता था. संजय खूब शराब पीता था, शराब के नशे में शबाना के साथ वह मारपीट किया करता था.

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इस के अलावा घर में शबाना के बहनोई हाकिम का भी आनाजाना था. यह बात संजय को पसंद नहीं थी. हाकिम के जाने के बाद संजय शबाना पर बेहद नाराज होता था. इस जानकारी के आधार पर ही सीएसपी ललित गठरे ने शबाना और उस के बहनोई हाकिम को पूछताछ के लिए थाने बुलाया. पूछताछ के दौरान दोनों ने घुमाफिरा कर जवाब दिए. उन की बातों से पुलिस ने अंदाजा लगा लिया कि यह दोनों बहुत कुछ छिपा रहे हैं और हत्या की जानकारी देने से बचना चाहते हैं.

पुलिस ने जब उन के साथ थोड़ी सख्ती की और संजय के घर से बरामद सामान दिखाए तो वे दोनों टूट गए. फिर उन्होंने राज की सारी बातें बता दीं. उस में जीजासाली के बीच प्रेम कहानी का खुलासा हुआ. साथ ही उन की निशानदेही पर हत्या में इस्तेमाल किए गए ब्लेड, खून लगा सिलबट्टा और खून सने कपड़े बरामद कर लिए. शबाना और हाकिम की प्रेम कहानी के साथ शबाना और संजय के लिवइन रिलेशन की जो कहानी सामने आई वह इस प्रकार है—

कहानी की शुरुआत शबाना, उस की 32 वर्षीया बड़ी बहन जायरा और 46 वर्षीय हाकिम से होती है. बात तब की है, जब शबाना महज 16 साल की थी. वह खुद से करीब दोगुने उम्र के हाकिम से इश्क कर बैठी थी. उन की मोहब्बत पर उम्र के अंतर का कोई असर नहीं था. दोनों एकदूसरे से बेइंतहा मोहब्बत करते थे. शबाना हाकिम को अपना सब कुछ सौंप चुकी थी. वे निकाह भी करना चाहते थे, लेकिन जब इस की जानकारी उस के परिवार को हुई तब उन्होंने उम्र के अंतर को देखते हुए उस की बड़ी बहन जायरा का विवाह हाकिम से कर दिया.

उस के बाद हाकिम शबाना का प्रेमी से जीजा बन गया. हाकिम खूबसूरत जायरा को पा कर बेहद खुश हुआ, लेकिन उस के लिए शबाना को दिल से निकलना मुश्किल हो रहा था. जायरा जीजासाली के प्रेम संबंध को जानती थी, फिर भी उस ने हाकिम के साथ निकाह इसलिए कर लिया था कि उस की छोटी बहन शबाना ने उस से वादा किया था कि वह उस की खुशी के लिए अपने इश्क को दफन कर देगी. वह उन की जिंदगी से दूर चली जाएगी. दूसरी तरफ जायरा ने हाकिम पर ऐसी लगाम लगाई कि वह चाह कर भी शबाना से नहीं मिल पाता था.

जल्द ही शबाना का भी एक युवक के साथ निकाह हो गया, उस के बाद शबाना अपने वादे के मुताबिक जायरा और हाकिम की जिंदगी से दूर चली गई. उस की अपनी अलग गृहस्थी और दुनिया बस गई थी. 10 सालों के दौरान शबाना 3 बच्चों की मां भी बन गई. हालांकि शबाना अपने शौहर के व्यवहार से दुखी रहती थी, कारण शौहर को उस के निकाह से पहले के प्रेम संबंध की आधीअधूरी जानकारी हो चुकी थी. वह बारबार उस को अतीत के प्रेम को ले कर ताने देता था. जब भी किसी घरेलू मसले पर विवाद होता, तब बहस के दौरान कई बार उस ने गुस्से में कह दिया था कि वह अपने प्रेमी हाकिम के पास ही चली जाए.

पति की यह बात शबाना को न केवल चुभ जाती थी, बल्कि इस से उस की पुरानी मोहब्बत की यादें भी ताजा हो जाती थीं. वह एकदम से तिलमिला जाती थी. बारबार की इस चिकचिक से उस ने एक दिन शौहर से अलग रहने का निर्णय ले लिया और अपनी 10 साल की बेटी के साथ अलग रहने लगी. 2 बच्चे उस ने शौहर के पास ही छोड़ दिए. किशोरावस्था से ही इश्क का स्वाद ले चुकी शबाना के लिए किसी नए प्रेमी की तलाश करना मुश्किल नहीं था. जल्द ही उसे संजय बामने नाम का युवक मिल ही गया. संजय उम्र में छोटा था तो क्या हुआ वह उस की भावना को समझता था और उस के सेक्स की भूख भी मिटाता था.

जल्द ही संजय भी खुद से बड़ी उम्र की प्रेमिका को जीजान से प्यार करने लगा. अपना घरबार छोड़ कर बगैर शादी किए हुए शबाना के साथ रामनगर मल्टी में किराए के मकान में रहने लगा था. कुछ समय तक संजय और शबाना के बीच लिवइन की मधुरता बनी रही, लेकिन उन के रिश्ते में खटास तब आ गई जब शबाना का पूर्व प्रेमी यानी उस का जीजा हाकिम उस की जिंदगी में वापस आ गया. दरअसल, हाकिम ने जायरा से निकाह करना इसलिए स्वीकार कर लिया था, क्योंकि तब उसे लगा था कि शबाना उस से पहले की तरह ही मिलतीजुलती रहेगी. लेकिन ऐसा नहीं होने पर हाकिम उस की याद में बेचैन हो गया. जब उसे शबाना के अकेली रहने के बारे में मालूम हुआ, तब उस ने उस से मिलने की योजना बना ली.

हालांकि शबाना और हाकिम के मिलने की राह में जायरा रोड़ा बनी हुई थी. बावजूद इस के लंबे समय बाद जब हाकिम अपनी साली और पुरानी प्रेमिका शबाना से मिलने उस के पास गया तब उस ने उसे बाहों में भर लिया. उस ने हाकिम की खूब आवाभगत की. उस की खिदमतगारी में कोई कोर कसर नहीं रहने दी. उन का अधूरा मोहब्बतनामा फिर से लिखा जाने लगा. लेकिन इस की जानकारी भी संजय को जल्द हो गई. शबाना अब 2-2 प्रेमियों के साथ लिव इन में रह रही थी. लेकिन लंबे समय तक इस तरह रहना आसान नहीं था. संजय ही शबाना के घरेलू खर्च और उस की बेटी के पालनपोषण का जिम्मा उठाए हुए था.

संजय को यह बात पता चल गई थी कि शबाना के पास उस का जीजा हाकिम भी आता है. इसलिए उस ने शबाना से साफसाफ कह दिया कि अपने घर में किसी दूसरे मर्द को वह नहीं देखना चाहता. इस पर शबाना ने रिश्ते की बात कह कर कुछ समय तक संजय को बहला दिया. फिर भी संजय ने हिदायत दी कि उस के नाजुक रिश्ते में किसी की भी दखलंदाजी नहीं होनी चाहिए. यदि ऐसा होता रहा तो वह हरगिज बरदाश्त नहीं करेगा. संजय की सख्ती और फरमानों को ले कर शबाना उस से नाराज रहने लगी. संजय की एक बुरी आदत शराब पीने की भी थी. शबाना उसे हमेशा कहती थी कि वह घर में शराब न पीए. उस की बड़ी हो रही बेटी भी साथ में रहती है. उस पर बुरा असर पड़ेगा.

जब से संजय और शबाना के बीच हाकिम को ले कर मतभेद उभरे थे, तब से संजय के शराब पीने की आदत बढ़ गई थी. बाहर तो पीता ही था, रात में भी घर आ कर भी बोतल खोल लेता था. एक दिन तो संजय ने हद ही कर दी. शराब पी कर आया और आते ही शबाना का गुस्सा उस की बेटी पर निकालने लगा. उसे बुरी तरह से डांटनेफटकारने लगा. उस के पकाए खाने में कमियां निकालने लगा. जब शबाना ने इस का विरोध किया और कहा कि वह ऐसा न करे, तब संजय ने उस पर हाथ उठा दिया. उस रोज संजय ने मांबेटी दोनों की शराब के नशे में पिटाई कर दी.

इस मारपीट में शबाना की बेटी के सिर में चोट भी आ गई और शबान भी जख्मी हो गई. गनीमत यह रही कि घर में डिटौल रखी थी, जिस से अपने और बेटी की चोटों के खून को बंद करने में सफल रही. सुबह होने पर संजय ने उन से रात की मारपिटाई को ले कर माफी मांग ली और अच्छी तरह से मरहमपट्टी के लिए पैसे दे कर चला गया. साथ में हिदायत भी दी कि इस बारे में किसी को भी न बताए. 2 दिनों तक तो घर में शांति बनी रही, लेकिन तीसरे दिन संजय फिर शबाना से दिन में ही उलझ गया. पड़ोसियों ने आ कर उसे समझाया तब गुस्से में चला गया. उसी रोज हाकिम भी शबाना से मिलने आया. शबाना और उस की बेटी ने रोरो कर संजय की ज्यादती उस से बयां की.

हाकिम यह सुन कर सन्न रह गया. उस ने शबाना को आस्वस्त किया कि वह इस का समाधान जल्द निकालेगा. इतना कह कर वह वहां से चला गया, लेकिन उस के मन में साजिश की योजना बन रही थी. उसी के अनुसार 28 जून, 2021 की तारीख मुकर्रर की गई. कैसे योजना को अंजाम देना है, इस बारे में शबाना से बात कर ली. फिर 22 तारीख की आधी रात को शबाना ने हाकिम को फोन कर के अपने घर बुला लिया. हाकिम बताए समय पर आ गया. फिर उस ने गहरी नींद में सो रहे संजय के सिर पर मसाला पीसने वाला सिलबट्टा दे मारा.

सिलबट्टे के हमले से संजय बेहोश हो गया. फिर हाकिम और शबाना ने मिल कर उस के गले को सर्जिकल ब्लेड से काट डाला. वह ब्लेड हाकिम अपने साथ ले कर आया था. संजय की हत्या के बाद सुबह के 4 बजे हाकिम ने संजय की लाश पहले अच्छी तरह चादर में लपेटी फिर चटाई में बांध कर पास के चीराखदान तालाब में फेंक आया. घर पर शबाना ने घर में बिखरे खून के धब्बे साफ किए. अगले रोज 29 जून, 2021 को पुलिस ने तालाब से संजय की लाश बरामद कर ली.

इस हत्याकांड की जांच पूरी होने के बाद हाकिम और शबाना पर हत्या एवं सबूत मिटाने की धाराएं लगा कर फाइल तैयार कर ली गई. जांचकर्ता पुलिस ने उन्हें कोर्ट में पेश किया, वहां से उन्हें अपराध का दोष साबित होने तक न्यायिक हिरासत में भेज दिया. Crime Story

Rajasthan Crime: आशिकी में बेटी की बलि : बेटी आई प्रेम के आड़े

Rajasthan Crime: राजस्थान के कोटा जिले के थाना बुढ़ादीव के गांव बोरखेड़ा में सुमित पुत्र हरदेव यादव अपनी पत्नी पुष्पा यादव उर्फ टीना (25 वर्ष) और इकलौती बेटी नंदिनी (4 साल) के साथ रहता था. सुमित सीधासादा इंसान था. वहीं उस की पत्नी टीना उर्फ पुष्पा रंगीनमिजाज युवती थी. सुमित का दिन जहां मेहनतमजदूरी करने में बीतता था, वहीं टीना का दिन मोबाइल देख कर गुजरता था.

सुमित और टीना की शादी को करीब 6 साल हो चुके थे. इन 6 सालों में टीना एक बेटी नंदिनी की मां बन गई थी. उस का बदन कसा था और हसरतें उफान पर थीं. वह चाहती थी कि सुमित उसे सारी रात बांहों में भर कर जन्नत की सैर कराए. मगर इस के उलट सुमित दिन भर कामधंधे में खपने के कारण इतना थक जाता था कि शाम को घर लौट कर खाना खा कर बिस्तर पर जा पड़ता था. टीना जब रसोई का काम निपटा कर पति के पास आती तो वह नींद में खर्राटे भरता मिलता था. यह देख कर टीना का मन कसैला हो जाता था. वह दिन भर इसी सोच में रहती कि आज पति उसे शारीरिक सुख देगा. मगर रात में थकामांदा पति उसे सोता मिलता.

वह कभीकभी सोचा करती कि कैसे मर्द से ब्याह किया जो घोड़े बेच कर हर रात सो जाता है. उसे तनिक भी बीवी को प्यार करने की इच्छा नहीं होती. औरत भूखी रह सकती है मगर वह बिना शारीरिक प्यार के नहीं रह सकती. सुमित कभीकभार ही टीना से शारीरिक संबंध बनाता था. मगर टीना चाहती थी कि उसे पति हर रात प्यार करे. वह पति से शर्म के मारे कह नहीं पाती थी. समय का पहिया घूमता रहा. एक दिन टीना किसी रिश्तेदार को मोबाइल पर फोन लगा रही थी. 3-4 बार घंटी बजने के बाद फोन उठा कर कोई शख्स बोला, ‘‘हैलो.’’

‘‘हां जी, आप कौन बोल रहे हैं?’’ टीना ने कहा तो फोन उठाने वाला बोला, ‘‘आप कौन हैं?’’

‘‘मैं तो टीना बोल रही हूं बोरखेड़ा, कोटा से.’’

‘‘टीना जी, मैं प्रह्लाद सहाय जयपुर से बोल रहा हूं. कहिए मैं आप की क्या सेवा करूं. फोन कैसे किया?’’ उस शख्स ने कहा.

सुन कर टीना बोली, ‘‘सौरी, आप को रौंग नंबर लग गया. मैं कहीं और फोन लगा रही थी.’’

‘‘रौंग नंबर लगा तो कोई बात नहीं. हम दोस्त तो बन ही सकते हैं. फोन पर बात कर के अच्छा लगा. वैसे आप की आवाज बड़ी मीठी और प्यारी है.’’ प्रह्लाद बोला.

‘‘तारीफ के लिए शुक्रिया. वैसे बातें आप भी बड़ी प्यारी करते हैं. मैं नंबर सेव कर लेती हूं. फुरसत में बात करते हैं.’’

‘‘ओके, मैं भी आप का नंबर सेव कर लेता हूं.’’ प्रह्लाद सहाय बोला.

टीना ने काल डिसकनेक्ट कर दी. दोनों ने एकदूसरे के नंबर सेव कर लिए.

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रौंग नंबर से शुरू हुई इस बातचीत के बाद वह दोनों अकसर फोन पर करने लगे. बात नहीं करने पर उन्हें कुछ भी अच्छा नहीं लगता था. एक दिन दोनों ने फोन पर बातों ही बातों में प्यार का इजहार कर दिया और टीना ने प्रेम आमंत्रण स्वीकार भी कर लिया. प्रह्लाद को टीना ने बता दिया था कि वह एक 6 साल की बेटी नंदिनी की मां है. प्रह्लाद ने टीना से कहा कि वह नंदिनी को अपनी बेटी बना लेगा और पालनपोषण करेगा.

टीना यादव यह जान कर बहुत खुश हुई कि उस का प्रेमी उस की बेटी को अपना रहा है. वह उस की प्यार भरी बातों के जाल में उलझती चली गई. वह भूल गई कि वह शादीशुदा और एक बेटी की मां है. टीना भूल गई कि उस के मातापिता ने उसे डोली में बिठा कर विदा करते हुए कहा था, ‘‘बेटी, सुखदुख, अमीरीगरीबी आतेजाते रहेंगे. मगर ससुराल के घर से तेरी अर्थी ही उठनी चाहिए. इस के अलावा ससुराल के घर से कभी कदम बाहर नहीं रखना.’’

टीना प्रह्लाद पर इतना विश्वास करने लगी कि वह पति का घर छोड़ कर उस के पास जाने को तैयार हो गई थी. पति के साथ अग्नि के समक्ष सात फेरे ले कर जन्मों तक साथ निभाने की कसमें खाने वाली टीना शादी के मात्र 6 साल बाद ही पति की पीठ में खंजर घोंप कर प्रेमी का घर आबाद करने को उतावली हो रही थी. सुमित को तो अपने कामधंधे से ही फुरसत नहीं थी. उसे पता नहीं था कि जिस की खुशी के लिए वह मेहनतमजदूरी करता है कि उसे किसी तरह की परेशानी नहीं हो. लेकिन वही बीवी किसी गैरमर्द को अपना बना चुकी है और वह घर से फुर्र होने वाली है.

सुमित तो सोचता था कि टीना उस के साथ खुश है. वह उस की खुशी के लिए क्या कुछ नहीं करता था. 11 नवंबर, 2020 को भी हर रोज की तरह सुमित काम पर निकल गया. शाम को घर लौटा तो उस की बीवी टीना और बेटी नंदिनी घर पर नहीं थी. आसपड़ोस में सुमित ने बीवी और बेटी की खोजबीन की मगर वे नहीं मिलीं. सुमित ने टीना के मोबाइल पर भी फोन किया. मगर मोबाइल स्विच्ड औफ था. सुमित कई दिन तक अपने स्तर पर बीवी और बेटी की खोजबीन करता रहा. जब उन की कोई खोजखबर नहीं मिली तो थकहार कर वह 16 दिसंबर, 2020 को बुढ़ादीत थाने पहुंचा. सुमित ने थानाप्रभारी अविनाश कुमार को सारी बात बता कर पत्नी और बेटी नंदिनी की गुमशुदगी लिखा दी.

गुमशुदगी दर्ज होने के बाद पुलिस की बहुत दिन तक नींद नहीं खुली. जब सुमित थाने के चक्कर पर चक्कर काटने लगा तो पुलिस हरकत में आई. इस के बाद इटावा डीएसपी विजयशंकर शर्मा के निर्देशन व थाना बुढ़ादीत थानाप्रभारी  अविनाश कुमार के नेतृत्व में एक पुलिस टीम गठित की गई. इस पुलिस टीम में थानाप्रभारी अविनाश कुमार के अलावा हैडकांस्टेबल सुरेशचंद्र वर्मा, सतपाल, प्रह्लाद, पूरन सिंह, महिला कांस्टेबल माली को शामिल किया गया. पुलिस टीम ने मामले की जांच शुरू की. तकनीकी जांच और मुखबिर से पता चला कि सुमित की पत्नी टीना उर्फ पुष्पा जयपुर जिले के थाना मनोहरपुर के गांव उदावाला में प्रेमी प्रह्लाद सहाय के साथ रह रही है.

पुलिस टीम ने 13 मई, 2021 को सुमित की पत्नी टीना और उस के प्रेमी प्रह्लाद सहाय को हिरासत में ले लिया. लेकिन टीना के साथ उस की बेटी नंदिनी नहीं थी. टीना और प्रह्लाद से पुलिस टीम ने नंदिनी के बारे में पूछताछ की. टीना ने बताया कि नंदिनी अपने दादादादी के पास है. पुलिस ने पता किया. दादादादी के पास नंदिनी नहीं थी. तब पुलिस ने प्रह्लाद सहाय से और टीना से अलगअलग पूछताछ की. टीना ने बताया कि नंदिनी को बसस्टैंड पर अकेली छोड़ दिया था. पुलिस को उस की बातों पर यकीन नहीं था. इस कारण पुलिस ने गुमराह कर रहे प्रह्लाद व टीना से कड़ी पूछताछ की तो दोनों ने नंदिनी की हत्या की बात कबूल ली.

टीना को जब पता चला कि उस के प्रेमी ने नंदिनी की हत्या की स्वीकारोक्ति कर ली है, तब टीना भी टूट गई. उस ने भी बेटी की हत्या का गुनाह कबूल कर लिया. प्यार की खातिर मासूम बेटी की हत्या की बात सुन कर पुलिस भी आश्चर्यचकित रह गई. पूछताछ करने पर टीना की एक ऐसी कुमाता वाली छवि उभर कर सामने आई, जिस ने अपने से 20 बरस बड़े प्रेमी प्रह्लाद की खातिर इकलौती बेटी की हत्या कर उस का शव सरिस्का जंगल में फेंक दिया.

दोनों आरोपियों से की गई पूछताछ के बाद प्यार में अंधी एक औरत की जो कहानी प्रकाश में आई, इस प्रकार है—

राजस्थान के कोटा जिले के बुढ़ादीत थानांतर्गत बोरखेड़ा गांव निवासी सुमित यादव से टीना उर्फ पुष्पा की शादी हो जरूर गई थी, लेकिन वह उस से खुश नहीं थी. क्योंकि वह उस की शारीरिक जरूरत को नहीं समझता था. इसीलिए वह अपने पति को पसंद नहीं करती थी. मगर लोकलाज के कारण वह उसे ढो रही थी. टीना की हसरतें उफान मारती थीं. मगर सुमित को इस की परवाह नहीं थी. टीना 4 साल की बेटी की मां हो गई थी, लेकिन वह इतनी खूबसूरत थी कि उस का गदराया बदन देख कर कोई भी मर्द उसे पाने को बेताब हो उठता था.

ऐसे में जयपुर के गांव उदावाला, निवासी प्रह्लाद सहाय से रौंग काल के जरिए उस की बात हुई तो उसे लगा कि प्रह्लाद उस के लिए ही बना है. इसलिए उस ने उस से नजदीकी बढ़ा ली. बातोंबातों में दोनों इतने खुल गए कि फोन पर प्यार का इजहार हो गया. इतना ही नहीं, दोनों ने जीवन भर साथ निभाने का फैसला भी ले लिया. एक दिन उस से प्रह्लाद ने कहा, ‘‘मैं तुम्हारी बेटी को अपनी बेटी के रूप में स्वीकार कर लूंगा. तुम उसे ले कर जयपुर के लिए निकल जाओ. मैं तुम दोनों को घर ले आऊंगा.’’

यह सुन कर टीना खुश हो गई. फिर वह 11 नवंबर, 2020 को पति सुमित के काम पर जाने के बाद अपनी बेटी नंदिनी को ले कर बोरखेड़ा से जयपुर आ गई, जहां से प्रह्लाद टीना और नंदिनी को ले कर अपने गांव उदावाला आ गया. टीना और प्रह्लाद पतिपत्नी की तरह रहने लगे. प्रह्लाद ने आसपड़ोस में कहा कि उस ने टीना से लव मैरिज की है. प्रह्लाद अधेड़ उम्र का था वहीं टीना जवान थी. टीना जैसी सुंदर प्रेमिका पा कर प्रह्लाद निहाल हो गया था. प्रह्लाद ने टीना को तनमनधन से सुख दिया. टीना अपने प्रेमी की दीवानी हो गई. प्रह्लाद भी स्त्री सुख से वंचित था. अधेड़ उम्र में जब जवान प्रेमिका मिली तो वह रोजाना अपनी हसरतें पूरी करता.

दोनों मौजमस्ती से दिन गुजार रहे थे. 9 जनवरी, 2021 की शाम नंदिनी सीढि़यों से गिर कर घायल हो गई. अगले दिन 10 जनवरी को नंदिनी को प्रह्लाद और टीना शाहपुरा अस्पताल ले गए. डाक्टर ने नंदिनी को देख कर कहा कि उसे जयपुर ले जाओ. इस पर प्रह्लाद व टीना नंदिनी को उदावाला घर ले आए. प्रह्लाद ने टीना से कहा, ‘‘टीना, अगर नंदिनी को जयपुर ले जाएंगे तो लाखों रुपए इलाज में खर्च होंगे. इस के बाद भी क्या पता नंदिनी बचे कि नहीं. ऐसा करते हैं कि पैसा बचाने के लिए नंदिनी को ही मार डालते हैं.’’

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सुन कर मां की ममता पसीजने के बजाय बोली, ‘‘सही कह रहे हैं, आप. वैसे सुमित के खून को हमतुम क्यों पालेंपोसें.’’

उसी रात नंदिनी को सोते हुए शाल मुंह पर दबा कर टीना और प्रह्लाद ने मार डाला. रात भर लाश वहीं पड़ी रही. अगले दिन 11 जनवरी, 2021 को नंदिनी का शव ले कर प्रह्लाद और टीना अलवर जिले के सरिस्का जंगल में पहुंचे और सुनसान जगह पर डाल कर वापस उदावला लौट आए. शाम को उदावला आने पर प्रह्लाद के आसपड़ोस के लोगों ने जब नंदिनी के बारे में पूछा. तब उन से कहा कि नंदिनी को दादादादी के पास छोड़ आए हैं. टीना ने अपनी 4 बरस की बेटी को मारने के बावजूद टीना सामान्य बनी रही.

उस के चेहरे पर शिकन तक नहीं थी. उलटे वह तो अपने को आजाद महसूस कर रही थी. उधर टीना और नंदिनी के 11 नवंबर, 2020 को घर से गायब होने पर टीना का पति सुमित यादव दोनों की रिश्तेदारी में एक महीने से ज्यादा समय तक खोजबीन करता रहा. जब कहीं भी बीवी और बेटी का पता नहीं चला तब वह थकहार कर 16 दिसंबर, 2020 को थाना बुढ़ादीत पहुंच कर बीवी टीना उर्फ पुष्पा और बेटी नंदिनी की गुमशुदगी दर्ज कराई. यानी गुमशुदगी दर्ज कराने से पहले ही नंदिनी की हत्या कर दी गई थी. गुमशुदगी के बाद भी पुलिस की नींद देर से खुली.

टीना और नंदिनी के गायब होने के तुरंत बाद अगर सुमित पुलिस थाने में गुमशुदगी की प्राथमिकी दर्ज करा देता और पुलिस समय पर काररवाई करती तो नंदिनी जिंदा होती. प्रह्लाद सहाय और टीना उर्फ पुष्पा से पूछताछ के बाद पुलिस ने उन्हें कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. Rajasthan Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Gwalior Murder Case: एक गुनाह मोहब्बत के नाम – कातिल बेटी

Gwalior Murder Case: मध्य प्रदेश के शहर ग्वालियर के थाना थाटीपुर के थानाप्रभारी आर.बी.एस. विमल 5 अगस्त की रात करीब 3 बजे इलाके की गश्त लगा कर थोड़ा सुस्ताने के मूड में थे. तभी उन के पास किसी महिला का फोन आया. महिला ने कहा, ‘‘सर, मैं तृप्तिनगर से बोल रही हूं. मेरे पति रविदत्त दूबे का मर्डर हो गया है. उन की गोली मार कर हत्या कर दी गई है,’’ इतना कहने के बाद महिला सिसकने लगी. अपना नाम तक नहीं बता पाई.

थानाप्रभारी ने उस से कहा भी, ‘‘आप कौन बोल रही हैं? घटनास्थल और आसपास की लोकेशन के बारे में कुछ बताइए. वहां पास में और कौन सी जगह है, कोई चर्चित दुकान, शोरूम या स्कूल आदि है तो उस का नाम बोलिए.’’

‘‘सर, मैं भारती दूबे हूं. तृंिप्तनगर के प्रवेश द्वार के पास ही लोक निर्माण इलाके में टाइमकीपर दूबेजी का मकान पूछने पर कोई भी बता देगा.’’ महिला बोली.

घटनास्थल का किसी भी तरह की छेड़छाड़ नहीं करने की सख्त हिदायत देने के कुछ समय बाद ही थानाप्रभारी पुलिस टीम के साथ घनी आबादी वाले उस इलाके में पहुंच गए. थानाप्रभारी आर.बी.एस. विमल और एसआई तुलाराम कुशवाह के नेतृत्व में पुलिसकर्मियों को अल सुबह देख कर वहां के लोग चौंक गए. लोगों से भारती दूबे का घर मालूम कर के वह वहां पहुंच गए. जब वह पहली मंजिल पर पहुंचे तो एक कमरे में भारती के पति रविदत्त दूबे की लाश पड़ी थी. पुलिस के पीछेपीछे कुछ और लोग भी वहां आ गए. उन में ज्यादातर परिवार के लोग ही थे.

थानाप्रभारी ने लाश का मुआयना किया तो बिस्तर पर जहां लाश पड़ी थी, वहां भारी मात्रा में खून भी निकला हुआ था. उन के पेट में गोली लगी थी. मुंह से भी खून निकल रहा था, लाश की स्थिति को देख कर खुद गोली मार कर आत्महत्या का भी अनुमान लगाया गया, किंतु वहां हत्या का न कोई हथियार नजर आया और न ही सुसाइड नोट मिला. घर वालों ने बताया कि उन्हें किसी ने सोते वक्त गोली मारी होगी. हालांकि इस बारे में सभी ने रात को किसी भी तरह का शोरगुल सुनने से इनकार कर दिया. थानाप्रभारी ने मौके पर फोरैंसिक टीम भी बुला ली.

पुलिस को यह बात गले नहीं उतरी. फिर भी थानाप्रभारी ने हत्या के सुराग के लिए कमरे का कोनाकोना छान मारा. उन्होंने घर का सारा कीमती सामान भी सुरक्षित पाया. इस का मतलब साफ था कि बाहर से कोई घर में नहीं आया था. अब बड़ा सवाल यह था कि जब बाहर से से कोई आया ही नहीं, तो रविदत्त  को गोली किस ने मारी? फोरैंसिक एक्सपर्ट अखिलेश भार्गव ने रविदत्त के पेट में लगी गोली के घाव को देख कर नजदीक से गोली मारे जाने की पुष्टि की.

जांच के लिए खोजी कुत्ते की मदद ली गई. कुत्ता लाश सूंघने के बाद मकान की पहली मंजिल पर चक्कर लगाता हुआ नीचे बने कमरे से आ गया. वहां कुछ समय घूम कर बाहर सड़क तक गया, फिर वापस बैडरूम में लौट आया. बैड के इर्दगिर्द ही घूमता रहा. उस ने ऐसा 3 बार किया. फिगरपिं्रट एक्सपर्ट की टीम ने बैडरूम सहित अन्य स्थानों के सबूत इकट्ठे किए. इन सारी काररवाई के बाद शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया. साथ ही भादंवि की धारा 302/34 के तहत अज्ञात के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कर लिया गया. पुलिस को दूबे परिवार के बारे में भारती दूबे से जो जानकारी मिली, वह इस प्रकार थी—

ग्वालियर के थाटीपुर के तृप्तिनगर निवासी 58 वर्षीय रविदत्त दूबे अपनी पत्नी भारती, 2 बेटियों और एक बेटे के साथ रहते थे. रविदत्त लोक निर्माण विभाग में टाइमकीपर की नौकरी करते थे. उन की नियुक्ति कलेक्टोरेट स्थित निर्वाचन शाखा में थी. साल 2006 में पहली पत्नी आभा की बेटे के जन्म देते वक्त मौत हो गई थी. उस के बाद उन्होंने साल 2007 में केरल की रहने वाली भारती नाम की महिला से विवाह रचा लिया था. वह अहिंदी भाषी और भिन्न संस्कार समाज की होने के बावजूद दूबे परिवार में अच्छी तरह से घुलमिल गई थी.

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दूबे ने भारती से कोर्टमैरिज की थी. शादी के बाद भारती ने दिवंगत आभा के तीनों बच्चों को अपनाने और उन की देखभाल में कोई कमी नहीं रहने दी थी. बड़ी बेटी कृतिका की शादी नयापुरा इटावा निवासी राममोहन शर्मा के साथ हो चुके थी, किंतु उस का ससुराल में विवाद चल रहा था, इस वजह से वह पिछले 3 सालों से अपने मायके में ही रह रही थी. छोटी बेटी सलोनी अविवाहित थी. पुलिस ने इस हत्या की गुत्थी को सुलझाने के लिए कई बिंदुओं पर ध्यान दिया. मृतक की पत्नी भारती और बड़ी बेटी कृतिका समेत छोटी बेटी सलोनी ने पूछताछ में बताया कि 4-5 अगस्त की आधी रात को तेज बारिश होने कारण लाइट बारबार आजा रही थी.

रात तकरीबन 9 बजे खाना खाने के बाद वे अपने घर की पहली मंजिल पर बने बैडरूम में सोने के लिए चली गई थीं. घटना के समय परिवार के सभी बाकी सदस्य एक ही कमरे में सोए हुए थे. भारती और बड़ी बेटी कृतिका को रात के ढाई बजे हलकी सी आवाज सुनाई दी थी तो उन्होंने हड़बड़ा कर उठ कर लाइट का स्विच औन किया. इधरउधर देखा. वहां सब कुछ ठीक लगा. वह तुरंत बगल में रविदत्त दूबे के कमरे में गई. देखा बैड पर वह खून से लथपथ पड़े थे. उन के पेट से खून निकल रहा था.

कृतिका और भारती ने उन्हें हिलायाडुलाया तब भी उन में कोई हरकत नहीं हुई. नाक के सामने हाथ ले जा कर देखा, उन की सांस भी नहीं चल रही थी. फिर भारती ने दूसरे रिश्तेदारों को सूचित करने के बाद पुलिस को सूचित कर दिया. थानाप्रभारी को दूबे हत्याकांड से संबंधित कुछ और जानकारी मिल गई थी, फिर भी वह हत्यारे की तलाश के लिए महत्त्वपूर्ण सबूत की तलाश में जुटे हुए थे. घटनास्थल पर तहकीकात के दौरान एसआई तुलाराम कुशवाहा को दूबे की छोटी बेटी पर शक हुआ था.

कारण उस के चेहरे पर पिता के मौत से दुखी होने जैसे भाव की झलक नहीं दिखी थी. उन्होंने पाया कि सलोनी जबरन रोनेधोने का नाटक कर रही थी. उस की आंखों से एक बूंद आंसू तक नहीं निकले थे. घर वालों के अलगअलग बयानों के कारण दूबे हत्याकांड की गुत्थी सुलझने के बजाय उलझती ही जा रही थी. उसे सुलझाने का एकमात्र रास्ता काल डिटेल्स को अपनाने की योजना बनी. मृतक और उस के सभी परिजनों के मोबाइल नंबर ले कर उन की काल डिटेल्स निकलवाई गई. कब, किस ने, किस से बात की? उन के बीच क्याक्या बातें हुईं? उन में बाहरी सदस्य कितने थे, कितने परिवार वाले? वे कौन थे? इत्यादि काल डिटेल्स का अध्ययन किया गया. उन में एक नंबर ऐसा भी निकला, जिस पर हर रोज लंबी बातें होती थीं.

पुलिस को जल्द ही उस नंबर को इस्तेमाल करने वाले का भी पता चल गया. रविदत्त दूबे की छोटी बेटी सलोनी उस नंबर पर लगातार बातें करती थी. पुलिस ने उस फोन नंबर की जांच की तो वह नंबर परिवार के किसी सदस्य या रिश्तेदार का नहीं था बल्कि ग्वालियर में गल्ला कठोर के रहने वाले पुष्पेंद्र लोधी का निकला. पुलिस इस जानकारी के साथ पुष्पेंद्र के घर जा धमकी. वह घर से गायब मिला. इस कारण उस पर पुलिस का शक और भी गहरा हो गया. फिर पुलिस ने 14 अगस्त की रात में उसे दबोच लिया. उस से पूछताछ की. पहले तो उस ने पुलिस को बरगलाने की कोशिश की, लेकिन बाद में सख्ती होने पर उस ने दूबे की हत्या का राज खोल कर रख दिया.

साथ ही उस ने स्वीकार भी कर लिया कि रविदत्त दूबे की हत्या उस ने सलोनी के कहने पर की थी. उन्हें देशी तमंचे से गोली मारी थी. पुष्पेंद्र ने पुलिस को हत्या की जो वजह बताई, वह भी एक हैरत से कम नहीं थी. पुलिस सुन कर दंग रह गई कि कोई जरा सी बात पर अपने बाप की हत्या भी करवा सकता है. बहरहाल, पुष्पेंद्र के अपराध स्वीकार किए जाने के बाद पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर उस की निशानदेही पर हत्या में इस्तेमाल .315 बोर का तमंचा भी बरामद कर लिया. पुलिस द्वारा की गई पूछताछ में पुष्पेंद्र लोधी ने बताया कि वह पिछले एक साल से सलोनी का सहपाठी रहा है. सलोनी के एक दूसरे सहपाठी करण राजौरिया से प्रेम संबंध थे. दोनों एकदूसरे को दिलोजान से चाहते थे. उस की तो सलोनी से केवल दोस्ती थी.

उस ने बताया कि एक बार करण के साथ सलोनी को रविदत्त दूबे ने घर पर ही एकदूसरे की बांहों में बांहें डाले देख लिया था. अपनी बेटी को किसी युवक की बांहों में देखना रविदत्त को जरा भी गवारा नहीं लगा. उन्होंने उसी समय सलोनी के गाल पर तमाचा जड़ दिया. बताते हैं कि तमाचा खा कर सलोनी तिलमिला गई थी. उस ने अपने गाल पर पिता के चांटे का जितना दर्द महसूस नहीं किया, उस से अधिक उस के दिल को चोट लगी. उस वक्त करण तो चुपचाप चला गया, लेकिन सलोनी बहुत दुखी हो गई. यह बात उस ने अपने दोस्त पुष्पेंद्र को फोन पर बताई.

फोन पर ही पुष्पेंद्र ने सलोनी को समझाने की काफी कोशिश की, लेकिन वह उस की सलाह सुनने को राजी नहीं हुई. करण के साथ पिता द्वारा किए गए दुर्व्यवहार और उस के सामने थप्पड़ खाने से बेहद अपमानित महसूस कर रही थी. अपनी पीड़ा दोस्त को सुना कर उस ने अपना मन थोड़ा हलका किया. उस ने बताया कि उस घटना से करण भी बहुत दुखी हुआ था. उस के बाद से उस ने एक बार भी सलोनी से बात नहीं की, जिस से उसे कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था. सलोनी समझ रही थी कि उस के पिता उस की मोहब्बत के दुश्मन बन बैठे हैं.

इस तरह सलोनी लगातार फोन पर पुष्पेंद्र से अपने दिल की बातें बता कर करण तक उस की बात पहुंचाने का आग्रह करती रही. एक तरफ उसे प्रेमी द्वारा उपेक्षा किए जाने का गम था तो दूसरी तरफ पिता द्वारा अपमानित किए जाने की पीड़ा. सलोनी बदले की आग में झुलस रही थी. उस ने पिता को ही अपना दुश्मन समझ लिया था. कुछ दिन गुजरने के बाद एक दिन पुष्पेंद्र की बदौलत सलोनी की करण से मुलाकात हो गई. उस ने मिलते ही करण से माफी मांगी, फिर कहा, ‘‘तुम अब भी दुखी हो?’’

‘‘मैं कर भी क्या सकता था उस वक्त?’’ करण झेंपते हुए बोला.

‘‘सारा दोष पापा का है, उन्होंने तुम्हें बहुत भलाबुरा कहा,’’ सलोनी बोली.

‘‘तुम्हें भी तो थप्पड़ जड़ दिया. कम से कम वह तुम्हारी राय तो जान लेते, एक बार…’’ करण बोला.

‘‘यही तकलीफ तो मुझे है. आव न देखा ताव, सीधे थप्पड़ जड़ दिया. मां रहती तो शायद यह सब नहीं होता. मां सब कुछ संभाल लेती.’’ कहती हुई सलोनी की आंखें नम हो गईं.

‘‘कोई बात नहीं, मैं उन से एक बार बात कर लूं?’’ करण ने सुझाव दिया.

‘‘अरे, कोई फायदा नहीं होने वाला, दीदी को ले कर वह हमेशा गुस्से में रहते हैं. दीदी की मरजी से शादी नहीं हुई थी. नतीजा देखो, उस का घर नहीं बस पाया. न पति अच्छा मिला और न ससुराल. 3 साल से मायके में हमारे साथ बैठी है.’’ सलोनी बिफरती हुई बोली.

‘‘तुम्हारी भी शादी अपनी मरजी से करवाना चाहते हैं क्या?’’ करण ने पूछा.

‘‘ऐसा करने से पहले ही मैं उन को हमेशा के लिए शांत कर दूंगी,’’ सलोनी गुस्से में बोली.

‘‘क्या मतलब है तुम्हारा?’’ करण ने पूछा.

‘‘मेरा मतलब एकदम साफ है. बस, तुम को साथ देना होगा. उन के जीते जी हम लोग एक नहीं हो पाएंगे. हमारा विवाह नहीं हो पाएगा.’’ सलोनी बोली.

‘‘मैं इस में क्या मदद कर सकता हूं?’’ करण ने पूछा.

इस पर सलोनी उस के कान के पास मुंह ले जा कर धीमे से जो कुछ कहा उसे सुन कर करण चौंक गया, अचानक मुंह से आवाज निकल पड़ी, ‘‘क्या? यह क्या कह रही हो तुम?’’

‘‘हां, मैं बिलकुल सही कह रही हूं, पापा को रास्ते से हटाए बगैर कुछ नहीं होगा. और हां, यह काम तुम्हें ही करना होगा.’’ सलोनी बोली.

‘‘नहींनहीं. मैं नहीं कर सकता हत्या जैसा घिनौना काम.’’ करण ने एक झटके में सलोनी के प्रस्ताव पर पानी फेर दिया. उस ने नसीहत देते हुए उसे भी ऐसा करने से मना किया.

सलोनी से दोटूक शब्दों में उस ने कहा कि भले ही वह उस से किनारा कर ले, मगर ऐसा वह भी कतई न करे. उस के बाद करण अपने गांव चला गया. उस ने अपना मोबाइल भी बंद कर लिया. करण से उस का एक तरह से संबंध खत्म हो चुका था. यह बात उस ने पुष्पेंद्र को बताई. पुष्पेंद्र से सलोनी बोली कि करण के जाने के बाद उस का दुनिया में उस के सिवाय और कोई नहीं है, इसलिए दोस्त होने के नाते वह उस की मदद करे. उस ने तर्क दिया कि अगर उस ने साथ नहीं दिया तो उस का हाल भी उस की बड़ी बहन जैसा हो जाएगा. एक तरह से सलोनी ने पुष्पेंद्र से हमदर्दी की उम्मीद लगा ली थी.

पुष्पेंद्र सलोनी की बातों में आ गया. वह उस की लच्छेदार बातों और उस के कमसिन हुस्न के प्रति मोहित हो गया था. मोबाइल पर घंटों बातें करते हुए सलोनी ने एक बार कह दिया था वह उसे करण की जगह देखती है. उस से प्रेम करती है. करण तो बुजदिल और मतलबी निकला, लेकिन उसे उस पर भरोसा है. यदि वह उस का काम कर दे तो दोनों की जिंदगी संवर जाएगी. उस ने पुष्पेंद्र को हत्या के एवज में एक लाख रुपए भी देने का वादा किया. पुष्पेंद्र पैसे का लालची था. उस ने सलोनी की बात मान ली और फिर योजनाबद्ध तरीके से 4 अगस्त, 2021 की रात को तकरीबन 10 बजे उस के घर चला गया. सलोनी ने उसे परिवार के लोगों की नजरों से बचा कर नीचे के कमरे में छिपा दिया, जबकि परिवार के लोग पहली मंजिल पर थे.

कुछ देर बाद जब घर के सभी सदस्य गहरी नींद में सो गए तो रात के ढाई बजे सलोनी नीचे आई और पुष्पेंद्र को अपने साथ पिता के उस कमरे में ले गई, जहां वह सो रहे थे. रविदत्त अकेले गहरी नींद में पीठ के बल सो रहे थे. पुष्पेंद्र ने तुरंत तमंचे से रविदत्त के पास जा कर गोली मारी और तेजी से भाग कर अपने घर आ गया. पुलिस के सामने पुष्पेंद्र द्वारा हत्या का आरोप कुबूलने के बाद उसे हिरासत में ले लिया गया. सलोनी को भी तुरंत थाने बुलाया गया. उस से जैसे ही थानाप्रभारी ने उस के पिता की हत्या के बारे में पूछा, तो वह नाराज होती हुई बोली, ‘‘सर, मेरे पिता की हत्या हुई है और आप मुझ से ही सवालजवाब कर रहे हैं.’’

यहां तक कि सलोनी ने परेशान करने की शिकायत गृहमंत्री तक से करने की धमकी भी दी. थानाप्रभारी बी.एस. विमल ने जब पुष्पेंद्र लोधी से मोबाइल पर पिता की हत्या से पहले और बाद की बातचीत का हवाला दिया, तब सलोनी के चेहरे का रंग उतर गया. तब थानाप्रभारी विमल ने पुष्पेंद्र द्वारा दिए गए बयान की रिकौर्डिंग उसे सुना दी. फिर क्या था, उस के बाद सलोनी अब झूठ नहीं बोल सकती थी. अंतत: सलोनी ने भी कुबूल कर लिया कि पिताजी की हत्या उस ने ही कराई थी.

पुलिस ने दोनों अभियुक्तों को रविदत्त दूबे की हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश कर दिया. वहां से उन्हें हिरासत में ले कर जेल भेज दया गया. Gwalior Murder Case

Hindi True Crime: जुर्म बोलता है

Hindi True Crime: पत्नी की मौत के बाद डा. अशोक सिंघल अपनी दोस्त रीना से अपने मन की बात कर लेते थे, लेकिन डा. अशोक के एकलौते बेटे अंकित को पिता की यह दोस्ती पसंद नहीं थी. फिर वह ऐसा जुर्म कर बैठा कि…

डा. अशोक सिंघल लंबीचौड़ी जिस आलीशान कोठी में रहते थे, उस कोठी के सामने 21 मई की सुबह पुलिस की कई गाडि़यां आ कर रुकीं. उन की कोठी के सामने अचानक आई पुलिस को देख कर आसपड़ोस के लोग चौंके कि आखिर ऐसी क्या बात हो गई जो सुबहसुबह इतनी पुलिस आई है. पुलिस की गाडि़यों के आते ही कोठी के अंदर से विलाप करने की आवाज भी आने लगी. माजरा समझ में न आने पर लोग आपस में कानाफूसी करने लगे. पुलिस के पीछेपीछे कुछ लोग कोठी में पहुंचे तो पता चला कि किसी ने डा. अशोक सिंघल की हत्या कर दी है.

उन की हत्या की बात सुन कर लोग हैरत में पड़ गए. क्योंकि वह निहायत सज्जन इंसान थे. उसी दौरान डौग स्क्वायड और फोरेंसिक एक्सपर्ट्स की टीमें भी वहां पहुंच गई थीं. यह वारदात उत्तर प्रदेश के जिला मेरठ की पौश कालोनी शास्त्री नगर के एच ब्लौक में घटी थी. थानाप्रभारी हरशरण शर्मा ने कोठी का मुआयना किया तो देखा कि डा. अशोक सिंघल का खून से लथपथ शव कोठी के बाहरी हिस्से में बने बैडरूम में फर्श पर पड़ा था. देख कर लग रहा था जैसे किसी भारी चीज से उन के सिर पर प्रहार किया गया है. उन का सिर फटा हुआ था. मौके पर इधरउधर खून बिखरा हुआ था.

लाश बिस्तर पर नहीं थी, इस से लगता था कि मरने से पहले उन्होंने हत्यारे से संघर्ष किया था. बैडरूम के अलावा साथ लगे कमरे का सामान भी बिखरा पड़ा था. कमरे में रखी अलमारी के कपड़े बाहर पड़े थे तथा लौकर भी खुला था. अलमारी वाले कमरे से ही लगा हुआ उन के बेटे अंकित का कमरा था, लेकिन बदमाशों ने उसे खोला तक नहीं था. जिस कमरे में लाश पड़ी थी, वहीं पर डा. अशोक सिंघल का मोबाइल फोन व लैपटौप रखा था. वहीं पर खून से सनी एक अंगूठी भी पड़ी थी. सारे सबूतों को पुलिस ने अपने कब्जे में ले लिया. क्राइम सीन देख कर पहली नजर में लग रहा था कि उन की हत्या लूटपाट की खातिर की गई थी.

मामला गंभीर था, इसलिए थानाप्रभारी ने इस की सूचना अधिकारियों को भी दे दी थी. सूचना मिलने पर एसएसपी डी.सी. दुबे, एसपी (सिटी) ओमप्रकाश सिंह और सीओ (सिविल लाइंस) विनीत भटनागर घटनास्थल पर पहुंच गए थे. पुलिस अधिकारियों ने भी घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया. मौके पर पहुंचा खोजी कुत्ता कोठी के दरवाजे से बाहर सड़क तक जा कर वापस आ गया और कोठी में ही घूमता रहा. उस ने 3 बार ऐसा किया. फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट की टीम ने लौकर समेत अन्य स्थानों से सावधानीपूर्वक प्रिंट एकत्र कर लिए. दरवाजे के पीछे एक बेसबौल बैट रखा था. हो सकता है, उस से वारदात को अंजाम दिया गया हो, यह सोच कर टीम ने उस के ऊपर से भी फिंगरप्रिंट उठा लिए.

इस कोठी में 58 वर्षीय डा. अशोक सिंघल अपने बेटे अंकित, पुत्रवधू दीप्ति व उस की 4 महीने की बेटी ओजस्वी के साथ रहते थे. अशोक सिंघल आयुर्वेद के डाक्टर थे. साथ ही उन का दवाओं का भी कारोबार था. जिस की सप्लाई मेरठ के आसपास के जिलों में होती थी. एमबीए पास उन का बेटा भी उन के साथ कारोबार से जुड़ा था. अशोक की एक बेटी आस्था थी, जिस की वह शादी कर चुके थे. वारदात की सूचना पर वह भी वहां आ गई थी. वह शहर में ही रहती थी. पुलिस ने वहां मौजूद बेटे अंकित से प्रारंभिक पूछताछ की तो उस ने बताया, ‘‘पापा बैडरूम में सोते थे, जबकि मैं दीप्ति के साथ कोठी के ऊपरी हिस्से में बने कमरे में सोता था.

आज तड़के करीब साढ़े 4 बजे दीप्ति बेटी के लिए दूध गरम करने नीचे आई, क्योंकि किचन नीचे ही है. जब वह बैडरूम की तरफ पहुंची तो लकड़ी का दरवाजा खुला हुआ था, लेकिन बैडरूम में अंधेरा था.

‘‘उस ने कई आवाजें दीं, लेकिन बैडरूम से कोई आवाज नहीं आई. तब दीप्ति ने बिजली बोर्ड से लाइट का स्विच औन किया. कमरे में रौशनी होते ही उस की नजर बैड से होते हुए फर्श पर गई तो वह भौचक्की रह गई. वहां पर पापा खून से लथपथ पड़े थे.

‘‘वह रोती हुई ऊपर आई और मुझे जगा कर यह बात बताई. पत्नी की बात सुन कर मेरे होश उड़ गए. मैं तुरंत तेज कदमों से नीचे आया तो वास्तव में बैडरूम में पापा की लाश पड़ी थी. पापा की हत्या की जानकारी मैं ने फोन द्वारा अपने रिश्तेदारों को दी, उस के बाद पुलिस को फोन किया?’’

पुलिस ने ऊपर के कमरे में सोने की वजह मालूम की तो उस ने बताया, ‘‘दरअसल, पापा को सिगरेट पीने की आदत थी. वह अकसर रात में कई बार सिगरेट पीते थे. इस से मुझे और मेरी पत्नी को परेशानी होती थी. इसलिए रात का खाना वगैरह खा कर हम दोनों ऊपर के कमरे में सोने के लिए चले जाते थे.’’

उस ने यह भी बताया कि पापा ड्राइंगरूम का दरवाजा खुला रख कर सोते थे और कोठी का मुख्य दरवाजा भी अंदर से बंद रहता था, परंतु पत्नी के मुंह से पापा की हत्या की बात सुनने के बाद जब वह नीचे आया तो देखा कि मुख्य दरवाजा बंद तो था, लेकिन उस का कुंडा नहीं लगा था. उन के चीखने की आवाज भी किसी ने नहीं सुनी थी. पुलिस अधिकारियों ने क्राइम सीन को पुन: समझा. जांच में 3 बातें स्पष्ट हुईं. एक तो यह कि सिर पर किसी भारी चीज से प्रहार किया गया था. दूसरा यह कि मामला हत्या का ज्यादा लग रहा था, न कि लूटपाट में हुई हत्या का. हालांकि अंकित लौकर से करीब एक लाख रुपए की नकदी गायब होने की बात कह रहा था, जबकि महंगा मोबाइल फोन व लैपटौप कमरे में ही रखे थे. आमतौर पर बदमाश ऐसी चीजें नहीं छोड़ते. इस के अलावा लूटपाट करने वालों ने अंकित के कमरे को खोला तक नहीं था, जबकि उस के दरवाजे पर ताला नहीं था.

तीसरी बात यह कि वारदात में किसी एक ऐसे नजदीकी व्यक्ति का हाथ होने की संभावना लग रही थी, जो घर की स्थिति को जानता था. वह व्यक्ति यह बात तक जानता था कि डा. अशोक दरवाजा खुला रख कर सोते हैं. बहरहाल, कातिल जो भी था, उस ने जुर्म को छिपाने की हर संभव कोशिश की थी. पुलिस ने मौके से जो अंगूठी बरामद की थी, वह भी डा. अशोक की नहीं थी. अंकित ने उसे पहचानने से इनकार कर दिया. पुलिस को लगा कि वह शायद हत्यारे की होगी. घटनास्थल की औपचारिकताएं पूरी करने के बाद डा. अशोक की लाश को पुलिस ने पोस्टमार्टम के लिए मैडिकल कालेज भिजवा दिया.

इस के साथ ही अज्ञात लोगों के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कर लिया गया. मामला संगीन था, इसलिए एसएसपी डी.सी. दुबे ने केस के खुलासे के लिए थानाप्रभारी हरशरण शर्मा की अध्यक्षता में एक टीम का गठन कर दिया. टीम का निर्देशन एसपी ओमप्रकाश सिंह कह रहे थे. अपराध शाखा भी टीम को जांच में सहयोग कर रही थी. अगले दिन पुलिस को पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिल गई. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत की वजह सिर पर घातक प्रहार बताया गया था. मौत का समय रात 10 बजे से 2 बजे के बीच का था. इसलिए पुलिस ने सीसीटीवी कैमरों की रात 10 बजे से ले कर 3 बजे तक की फुटेज देखी. लेकिन इस से कोई सुराग नहीं मिला. फुटेज में कोई भी शख्स आताजाता दिखाई नहीं दिया.

पुलिस ने अंकित से पूछताछ की, लेकिन वह गमजदा था और बीमार भी, इसलिए वह कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे सका. पुलिस को लग रहा था कि डाक्टर की हत्या किसी नजदीकी व्यक्ति ने ही की है, इसलिए पुलिस ने उन के पड़ोसियों, रिश्तेदारों के अलावा परिचितों से भी पूछताछ कर के जानना चाहा कि उन के यहां किनकिन लोगों का ज्यादा आनाजाना था. इस पूछताछ में पुलिस को यह पता चला कि उन के पास कभीकभी एक महिला आया करती थी. वह महिला कौन थी, इस बारे में पता नहीं चल सका. देखतेदेखते 2 दिन गुजर गए, लेकिन उस महिला का पता न लगा. उधर मामले का खुलासा न होने पर कुछ संभ्रांत लोगों ने एसएसपी डी.सी. दुबे से मुलाकात की और हत्या का जल्द खुलासा करने की मांग की. इस के बाद पुलिस टीम ने पारिवारिक बिंदु पर जांच केंद्रित कर दी.

पुलिस ने परिजनों के मोबाइल नंबर ले कर उन की काल डिटेल्स निकलवाईं. काल डिटेल्स का अध्ययन करने पर पता चला कि डा. अशोक एक नंबर पर सब से ज्यादा बातें किया करते थे. उस नंबर की जांच हुई तो वह उत्तर प्रदेश के जिला बिजनौर की रहने वाली एक महिला रीना का निकला. रिश्तेदारों और पड़ोसियों से भी पता चला कि डा. अशोक के पास एक महिला आती थी. कहीं वह महिला वही तो नहीं है, जिस से वह फोन पर ज्यादा बातें करते थे, जानने के लिए पुलिस टीम बिजनौर में रीना के घर गई और उसे पूछताछ के लिए थाने ले आई. कई तरह से की गई पूछताछ के बाद पुलिस को यह जानकारी मिली कि रीना से डा. अशोक की दोस्ती तो थी लेकिन उन की हत्या में उस का कोई हाथ नहीं था. रीना ने यह भी बताया कि इस मित्रता को ले कर डा. अशोक से अपने बेटे अंकित का विवाद भी होता रहता था. यह बात डा. अशोक ने उस से बताई थी.

रीना द्वारा दी गई यह जानकारी बड़े काम की थी. पुलिस का शक अब परिवार के इर्दगिर्द ही घूमने लगा, यह भी संभव था कि बेटा ही पिता का कातिल बन गया हो, लेकिन पुलिस को यकीन नहीं हो रहा था कि कोई बेटा ऐसा कांड कैसे कर सकता है. एक और अहम बात यह थी कि अंकित ने हत्या की खबर अपने पड़ोसियों तक को नहीं दी थी. पुलिस के पहुंचने पर ही पड़ोसियों को हत्या का पता चला था. पुलिस ने कुछ बिंदुओं पर एक बार फिर अंकित से पूछताछ की. उस ने बिना डरे सफाई से सभी सवालों के जवाब दिए. पिता से एक महिला की मित्रता के विरोध की बात तो उस ने स्वीकार की, लेकिन उन की हत्या करने की बात नकार दी. थानाप्रभारी हरशरण शर्मा ने उस से पूछा, ‘‘तुम्हारे पिता की किसी से कोई ऐसी रंजिश थी, जो हत्या की वजह बनी हो?’’

‘‘मेरी जानकारी में उन का कोई विवाद नहीं था. यदि होता तो वह मुझे जरूर बताते.’’ अंकित ने आत्मविश्वास के साथ जवाब दिया.

‘‘तुम्हें किसी पर शक है?’’

‘‘नहीं.’’

‘‘तो फिर हत्या कौन कर सकता है?’’

‘‘सर, मैं कह रहा हूं, यह काम लुटेरों का है. घर में यदि लुटेरे नहीं आए तो फिर लौकर से रुपए कैसे गायब हुए. वे पैसे मैं ने ही उस शाम को लौकर में रखे थे.’’ अंकित ने जवाब दिया.

अंकित अपनी जगह ठीक हो सकता था, लेकिन सीसीटीवी फुटेज के आधार पर इस पर विश्वास नहीं किया जा सकता था. जब कोठी में कोई आया ही नहीं तो लूट कैसे हो गई. पुलिस को अंकित के खिलाफ ऐसे कोई मजबूत सबूत नहीं मिल रहे थे, जिन के आधार पर उसे थाने ले जा कर सख्ती से पूछताछ की जा सके. पुलिस टीम जांच में उलझ गई. पुलिस ने सीसीटीवी कैमरों की फुटेज एक बार ध्यान से फिर देखी. इस का नतीजा पहले जैसा ही निकला. उस में कोई भी मृतक की कोठी की तरफ आताजाता नहीं दिखा. इंस्पेक्टर हरशरण शर्मा ने एसपी ओमप्रकाश सिंह व सीओ विनीत भटनागर को जांच से अवगत कराया.

पुलिस अधिकारियों ने विचारविमर्श किया. सीसीटीवी कैमरे की इस सच्चाई को किसी भी सूरत में झुठलाया नहीं जा सकता था. अब सब से बड़ा सवाल यह था कि जब उन की कोठी में कोई बाहरी व्यक्ति आया ही नहीं तो डा. अशोक की हत्या किस ने की? पुलिस ने अंकित को ही शक के दायरे में रख कर जांच में परिवर्तन किया. इस बार पुलिस ने अंकित के मोबाइल फोन की लोकेशन हासिल कर ली. पता चला कि 21 मई की तड़के करीब साढ़े 4 बजे उस के मोबाइल की लोकेशन कोठी से दूर पाई गई. यह बेहद चौंकाने वाली बात थी. साफ था कि अंकित तड़के कोठी से बाहर गया था. वह क्यों गया था, इस का जवाब उस से पूछताछ के बाद ही मिल सकता था. जबकि उस ने बताया था कि पत्नी के जगाने पर उसे पिता की हत्या का पता चला था.

मोबाइल की लोकेशन को पुख्ता करने के लिए पुलिस टीम ने इस बार रात 3 बजे के बाद की सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखी. इस फुटेज से पता चला कि अंकित सुबह 4 बजे के बाद अपनी कार ले कर कोठी से गया था और आधे घंटे बाद ही वापस आ गया था. उस के झूठ की पोल खुल गई थी. अब उस के खिलाफ पुलिस को पुख्ता सबूत मिल गए थे. शक व सबूतों के जाल में वह पूरी तरह फंस चुका था. बिना देर किए 26 मई, 2015 को पुलिस ने पूछताछ के लिए उसे हिरासत में ले लिया और थाने ले आई. पुलिस ने इस बार सबूतों के आधार पर उस से मनोवैज्ञानिक ढंग से पूछताछ की. वह पुलिस की बात को झुठला नहीं सका. आखिर सच बोलते हुए उस ने कहा, ‘‘साहब, अपने पिता को अकेले मैं ने ही मारा है. मुझे बहुत गुस्सा आ गया था.’’

उस से गहराई से पूछताछ की गई तो इस हत्याकांड के पीछे दरकते रिश्तों की चौंकाने वाली कहानी निकल कर सामने आई. सरल स्वभाव के डा. अशोक सिंघल आयुर्वेदिक दवाओं का कारोबार करते थे. उन के 2 बच्चे थे, एक बेटा अंकित और दूसरी बेटी आस्था. कुछ सालों पहले वह बेटी का विवाह कर चुके थे. अंकित भी पिता के काम में हाथ बंटाता था. कुछ दर्द ऐसे होते हैं, जिन की भरपाई कभी नहीं होती. इंसान बाहर से तो खुश नजर आता है, लेकिन अंदर से वह परेशान रहता है. अशोक सिंघल के साथ भी कुछ ऐसा ही था. डा. अशोक की जिंदगी दिखावे के तौर पर यूं तो खुशहाल थी, लेकिन उन की जिंदगी में एक ऐसा गम था, जो उन्हें अकसर परेशान किया करता था. दरअसल उन की पत्नी मीनाक्षी की कई सालों पहले मृत्यु हो गई थी. इस के बाद वह अकेले से हो गए थे. किसी तरह उन की जिंदगी बीत रही थी.

2 साल पहले उन्होंने अंकित का विवाह दीप्ति से कर दिया. दीप्ति एमबीए की पढ़ाई कर रही थी. अंकित को शराब पीने की लत थी. पिता ने उसे कई बार समझाया, लेकिन वह नहीं सुधरा तो उन्होंने इसे नियति मान लिया. डा. अशोक अपनी दवाओं की सप्लाई के लिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई जिलों के अलावा उत्तराखंड भी जाया करते थे. इसी दौरान जनवरी, 2015 में उन की मुलाकात बिजनौर की एक महिला रीना से हुई. रीना एक हर्बल कंपनी में दवाओं की सप्लाई का काम करती थी. अशोक की जिंदगी में पत्नी के गुजर जाने के बाद नीरसता छाने लगी थी.

रीना से उन्हें भावनात्मक लगाव हो गया. रीना भी उन से स्नेह करती थी. दोनों के बीच अकसर मोबाइल पर भी बातें होने लगी थीं. वक्त के साथ दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ने लगी थीं. इस से डा. अशोक के जीवन में खुशी जरूर आ गई थी. रीना चूंकि कंपनी के काम से बाहर जाती रहती थी और डा. अशोक का काम भी बाहर घूमने का था, इसलिए दोनों साथसाथ घूमते थे. इस दौरान वे एकसाथ होटल में ही रुकते थे. जिन जगहों पर डा. अशोक दवा सप्लाई करते थे, वहां के लोगों से अंकित का भी संपर्क था. उन्हीं लोगों से अंकित को यह बात पता चल गई कि उस के पिता की किसी महिला से दोस्ती हो गई है और दोनों साथसाथ घूमते हैं.

अंकित को यह बात बरदाश्त नहीं हुई. उस ने पिता से इस मुद्दे पर एक दिन बात की. तब उन्होंने अंकित को समझाते हुए कहा, ‘‘तुम काम पर ध्यान दो अंकित. क्या बात अच्छी है क्या बुरी, यह मैं तुम से ज्यादा समझता हूं.’’ पिता के इस जवाब से वह चुप तो हो गया, लेकिन अंदर ही अंदर कुढ़ गया. क्योंकि वह उन का कर भी क्या सकता था. इस के बाद उसे जैसेजैसे पिता की रीना से मेलमुलाकातों का पता चलता गया, वैसेवैसे उस का अपने पिता से मनमुटाव बढ़ता गया. रीना से संबंधों को ले कर दोनों के बीच कई बार विवाद भी हुआ. इसी तनाव में उस ने ज्यादा शराब पीनी शुरू कर दी. इसी बीच वह पीलिया की बीमारी से ग्रस्त हो गया. बीमारी बढ़ गई तो डा. अशोक ने उसे शहर के एक नामी अस्पताल में भरती करा दिया. अस्पताल में एक महीने रहने के बाद वह ठीक हो सका.

जिस समय वह अस्पताल में भरती था, उस दौरान रीना उस के पिता के साथ कोठी में भी रुकी थी. अंकित को यह पता चला तो उसे नागवार लगा. अंकित को इस बात का डर था कि उस के पिता रीना के साथ कहीं शादी न कर लें. यदि उन्होंने ऐसा कर लिया तो वह उन की दौलत की हकदार हो जाएगी. मई के पहले सप्ताह में अंकित अस्पताल से डिस्चार्ज हो कर घर आ गया. अशोक को सिगरेट पीने की आदत थी. वह रात को भी जाग कर कई दफा सिगरेट पीने बैठ जाते थे. इस से अंकित और उस की पत्नी परेशान हो जाते थे. इसलिए अंकित व दीप्ति ऊपर वाले कमरे में जा कर सो जाया करते थे.

रीना को ले कर पितापुत्र में तकरार इतनी बढ़ गई थी कि उन्होंने एकदूसरे से बात करनी छोड़ दी थी. कुछ दिनों बाद डा. अशोक बाहर गए. अंकित को पता चल गया कि उन के साथ रीना भी गई थी. अब की बार अंकित ने तय कर लिया कि पिता के लौटने पर वह उन से दो टूक बात करेगा. डा. अशोक अपने बिजनेस टूर से वापस आए तो 19 मई की शाम को अंकित ने उन से दो टूक कहा, ‘‘मैं चाहता हूं कि उस महिला से आप दूर हो जाएं.’’

यह सुन कर डा. अशोक आगबबूला होते हुए बोले, ‘‘तुम मेरे बेटे हो, इसलिए अपनी हद में रहो, वरना घर से बाहर का रास्ता दिखा दूंगा.’’

‘‘बेटा होने के नाते ही कह रहा हूं कि आप को यह बात शोभा नहीं देती. आप अपनी मर्यादा का ध्यान रखें.’’ अंकित ने तेवर दिखाए. बेटे के तेवर देख कर अशोक को भी ताव आ गया. उन्होंने अंकित के गाल पर थप्पड़ रसीद करते हुए चेतावनी दी, ‘‘खबरदार, आज के बाद इस मुद्दे पर बात मत करना और सुबह होते ही बीवीबच्चों को ले कर घर से निकल जाना. अब मैं तुझे अपने साथ नहीं रख सकता.’’

पिता के इस व्यवहार पर अंकित खून का घूंट पी कर ऊपर चला गया. उस के पिता द्वारा घर से निकालने की चेतावनी ने उस के होश उड़ा दिए. उस ने ऊपर जा कर शराब पी. वह पिता की आदत से वाकिफ था कि उन्होंने उस से जो कहा है, वह कर भी देंगे. यही बात सोच कर उसे उस रात ठीक से नींद नहीं आई. करीब 3 बजे आंख खुली तो वह पिता से फाइनल बात करने नीचे आ गया. बैडरूम का दरवाजा खुला था. उधर बेटे के रवैये से अशोक भी परेशान थे. शायद उन्हें भी नींद नहीं आ रही थी. वह बैठे सिगरेट पर सिगरेट पिए जा रहे थे.

अंकित ने एक बार फिर रीना के मुद्दे पर उन से बात शुरू की. लेकिन इस बार उन के बीच बात इतनी बढ़ गई कि दोनों के बीच मारपीट हो गई. उसी दौरान अंकित ने कमरे में रखा बेसबौल बैट उठा कर पिता के सिर पर कई वार कर दिए. उन के सिर से खून का फव्वारा फूट पड़ा. अशोक ने अपने बचाव के लिए संघर्ष भी किया. आखिर उन्होंने तड़प कर दम तोड़ दिया. इस दौरान अंकित की अंगूठी वहीं गिर गई. गुस्से में अंकित ने पिता की हत्या तो कर दी. लेकिन हत्या का इल्जाम उस के ऊपर न आए, इस के लिए उस ने लूट का ड्रामा रचने की प्लानिंग की. सोचविचार के बाद उस ने कमरे में लूटपाट दिखाने के लिए सामान फैला दिया. लौकर से रुपए भी निकाल लिए.

हत्या के वक्त उस के कपड़े खून से सन गए थे. उस ने बाथरूम में हाथपांव धोए. फ्रेश हो कर उस ने अपने कपड़े बदले और खून से सने कपड़े एक पौलीथिन में रख लिए. उस ने बेसबौल बैट भी साफ किया और उसे घर में ही छिपा कर रख दिया. वह कार निकाल कर कपड़ों वाली पौलीथिन फेंकने चला गया. इत्तफाक से उस समय किसी सिक्योरिटी गार्ड ने उसे नहीं देखा. कार से वह सूरजकुंड इलाके में पहुंचा और पौलीथिन नाले में फेंक कर वापस आ गया. उस ने वापस आ कर लौकर से निकाले रुपए भी कोठी में कहीं छिपा दिए. फिर ऊपर जा कर आंखें बंद कर के चुपचाप लेट गया. इतना कुछ हो गया था, लेकिन नींद में होने की वजह से दीप्ति को कुछ पता नहीं चल सका.

तड़के बच्ची का दूध गरम करने के लिए दीप्ति नीचे आई तो अपने ससुर की लाश देख कर वह चीखती हुई वापस अपने कमरे में पहुंची. पत्नी के रोने पर वह जागा. पुलिस केवल उस से ही ज्यादा पूछताछ न करे, इसलिए उस ने अपने रिश्तेदारों को फोन कर के सब से पहले बुलाया, फिर दीप्ति के मोबाइल से पुलिस को सूचना दी. इस के पीछे उस की सोच यह थी कि वह नहीं चाहता था कि उस का मोबाइल नंबर पुलिस को पता चले. पुलिस के आने के बाद वह घटना से पूरी तरह अंजान बना रहा. लूट के लिए हत्या होने की बात पर जोर देता रहा. पुलिस के सवालों का भी उस ने चालाकी से आत्मविश्वास के साथ सामना किया. उस ने अपने जुर्म को छिपाने की लाख कोशिश की, लेकिन पकड़ में आ ही गया.

अंकित ने जब अपना अपराध स्वीकार कर लिया, तो पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर के उस की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त बेसबौल बैट व खून सने कपड़े बरामद कर लिए. पुलिस ने उसे कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. अंकित ने पिता को प्यार से समझाने में नातेरिश्तेदारों की मदद ले कर विवेक का परिचय दिया होता तो शायद ऐसी नौबत कभी नहीं आती. अंकित का कहना था कि उसे पिता की हत्या करने का पछतावा है, वह जोश में होश खो कर एक बड़ा अपराध कर बैठा. कथा लिखे जाने तक वह जेल में था. उस की जमानत नहीं हो सकी थी. Hindi True Crime

(कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित, रीना परिवर्तित नाम है.)

 

Delhi Crime Story: कंबल में लपेट दिया अपना रिलेशन

Delhi Crime Story: पति की हत्या के आरोप में जेल गई अनीता, जमानत पर छूटने के बाद अपनी सहेली पुष्पा के भाई शिवनंदन के साथ ही लिवइन रिलेशन में रहने लगी. इसी दौरान उन दोनों के बीच ऐसा क्या हुआ कि शिवनंदन ने लिवइन रिलेशन को कंबल में लपेट कर रख दिया.

बात पहली जून, 2015 की है. सुबह करीब साढ़े 8 बजे दिल्ली के उत्तर पश्चिमी जिले के थाना आदर्श नगर के ड्यूटी औफिसर को पुलिस नियंत्रण कक्ष द्वारा सूचना मिली कि मजलिस पार्क के मकान नंबर ए/308 से दुर्गंध आ रही है और दरवाजे पर ताला लगा है. ड्यूटी औफिसर ने इस काल के बारे में थानाप्रभारी संजय कुमार को अवगत करा दिया. बंद मकान से बदबू आने की बात सुन कर ही थानाप्रभारी समझ गए कि वहां कुछ न कुछ गड़बड़ जरूर है. क्योंकि इस तरह की जो भी काल आती हैं, उन में से ज्यादातर मामले हत्या के ही निकलते हैं. यानी कोई किसी की हत्या कर के लाश को कमरे में छिपा कर दरवाजा बंद कर के फरार हो जाता है.

बहरहाल थानाप्रभारी पुलिस टीम के साथ मजलिस पार्क की तरफ निकल गए. जहां से बदबू आने की बात कही गई थी, वह पहली मंजिल पर था. पुलिस ने भी उस मकान से आती हुई दुर्गंध को महसूस किया. वहीं पर करीब 20 साल का एक युवक नीरज भी था. वह उस मकान में रहने वाले शिवनंदन का सौतेला बेटा था. नीरज ने पुलिस को बताया कि मकान की चाबी उस के पिता के पास है और वह पता नहीं कहां चले गए. तभी आसपास रहने वाले लोग भी वहां आ गए. उन्होंने भी दुर्गंध वाली बात उन्हें बताई. वहां मौजूद लोगों की मौजूदगी में पुलिस ने दरवाजे पर लगा ताला तोड़ कर जैसे ही किवाड़ खोले तो बदबू और बढ़ गई. नाक पर रुमाल रख कर पुलिस घर में घुसी और यह खोजने लगी कि यह बदबू आ कहां से रही है.

दरवाजे के पास ही एक बरामदा था. फिर एक कमरा बना था. उस के बराबर में किचन थी. किचन के पास बाथरूम था. फिर उस के बराबर में एक कमरा था. कमरे के पीछे बालकनी थी. पुलिस ने कमरे और बाथरूम को छान मारा लेकिन वहां कुछ नहीं मिला. इस के बाद पुलिस किचन में पहुंची तो वहां 2 चूहे मरे मिले. उन चूहों से तेज बदबू आ रही थी इसलिए पुलिस ने नीरज से उन चूहों को फिकवा दिया. पुलिस तो बदबू के दूसरे ही मायने लगा रही थी, लेकिन वहां मामला दूसरा ही निकला. लिहाजा थानाप्रभारी राहत की सांस ले कर वहां से चले गए. करीब साढ़े 9 बजे थानाप्रभारी के मोबाइल पर नीरज का फोन आया. उस ने उन्हें बताया कि मकान से बदबू अभी भी आ रही है. मकान का कोनाकोना छान मारा. लेकिन अब कोई मरा हुआ चूहा भी नहीं मिला. फिर भी पता नहीं बदबू कहां से आ रही है.

थानाप्रभारी एसआई प्रवीण कुमार के साथ एक बार फिर मजलिस पार्क में उसी मकान पर पहुंच गए. इस बार वहां नीरज के साथ उस का सौतेला पिता शिवनंदन भी मिल गया. बदबू महसूस होने पर पुलिस ने एक बार फिर से खोजबीन शुरू कर दी. इस बार भी बदबू किचन की तरफ से ही आ रही थी. पुलिस ने सोचा कि पहले की तरह कोई चूहा ही मरा पड़ा होगा. वह किचन में खोजबीन करने लगी. लेकिन वहां कुछ दिखाई नहीं दे रहा था. तभी पुलिस की नजर ऊपर की तरफ स्लैब पर बने लकड़ी के रैक पर गई. उस रैक को जैसे ही खोला तो बदबूदार भभका आया.  रैक में एक कंबल दिखाई दिया. देखने पर लग रहा था जैसे उस कंबल में कोई इंसान लिपटा हुआ हो.

पुलिस ने वह कंबल उतार कर खोला तो उस में एक युवती की लाश निकली उस की उम्र करीब 40 साल थी. वह महिला क्रीम कलर का सूट पहने हुए थी. जिस पर ब्राउन कलर के फूल थे. जामुनी रंग की चुन्नी भी उस के गले में थी. लाश को देखते ही नीरज चीखते हुए बोला कि यह तो मेरी मां अनीता है. शिवनंदन भी रो रहा था क्योंकि वह उसी के साथ पत्नी बन कर लिवइन रिलेशन में रह रही थी. शिवनंदन और उस के सौतेले बेटे से पुलिस ने अनीता की हत्या के बारे में पूछा तो दोनों ने बताया कि अनीता की हत्या किस ने की, इस बारे में उन्हें कुछ पता नहीं है. गम के माहौल में पुलिस ने उन दोनों से ज्यादा पूछताछ तो नहीं की लेकिन पुलिस के शक की सुई दोनों बापबेटों पर ही टिकी थी.

मौके पर क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम को बुला कर पुलिस ने घटनास्थल की जरूरी काररवाई पूरी की और लाश को पोस्टमार्टम के लिए जहांगीरपुरी के बाबू जगजीवनराम मेमोरियल अस्पताल भिजवा दिया. हत्या के इस मामले को सुलझाने के लिए थानाप्रभारी संजय कुमार के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई गई, जिस में इंसपेक्टर राकेश कुमार, एसआई प्रवीण कुमार, हेडकांस्टेबल बालकिशन, राजेंद्र सिंह, अंगद सिंह, कांस्टेबल नवीन कुमार, गजेंद्र, विकास, मनोज आदि को शामिल किया गया. जिस मकान में अनीता की लाश मिली थी, उस में शिवनंदन और अनीता का बेटा नीरज भी रहता था. उन दोनोें के होते हुए कोई मकान में वारदात कर के चला जाए और इस बात की भनक उन्हें न लगे, ऐसी संभावना बहुत कम थी.

दोनों में से कोई न कोई हत्या का राज जरूर जानता होगा. ऐसा पुलिस का मानना था. लिहाजा उन दोनों से पूछताछ करने के लिए पुलिस ने उन्हें थाने बुला लिया. पूछताछ में शिवनंदन ने बताया कि वह आजादपुर मंडी में काम करता है. रोजाना सुबह जल्दी घर से निकलने के बाद देर रात को घर लौटता है. नीरज भी सब्जीमंडी में दूसरी जगह काम करता था. वह भी सुबह घर से जाने के बाद शाम को घर लौटता है.

‘‘जब तुम लोग घर से निकल जाते थे तो घर पर अनीता ही रह जाती होगी?’’ थानाप्रभारी ने उन से पूछा.

‘‘हां, घर पर वही रहती थी.’’ शिवनंदन बोला.

‘‘तो कौन से दिन वह घर पर नहीं मिली?’’ थानाप्रभारी ने जानना चाहा.

‘‘29 मई को जब हम शाम को घर आए तो वह घर से गायब मिली.’’ शिवनंदन ने बताया.

‘‘फिर तुम ने उस की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई?’’ थानाप्रभारी ने पूछा.

‘‘नहीं, पुलिस में खबर इस वजह से नहीं की क्योंकि वह कईकई दिनों के लिए घर से गायब हो जाती थी. यही सोचा कि वह 2-4 दिनों में आ जाएगी.’’ शिवंनदन ने कहा.

‘‘बाहर…बाहर कहां और क्यों जाती थी?’’ थानाप्रभारी चौंके.

‘‘सर, पता नहीं कहां जाती थी. मगर इतना पता है कि एक बार वह जिस्मफरोशी के आरोप में चंडीगढ़ पुलिस द्वारा और नशीले पदार्थ की तस्करी के आरोप में पंचकुला पुलिस द्वारा गिरफ्तार की गई थी.’’ शिवनंदन ने बताया.

यह सुन कर पुलिस समझ गई कि अनीता जरूर आवारा और आपराधिक प्रवृत्ति की रही होगी. चाहे वह जैसी भी रही हो, उस का मर्डर तो हुआ ही था. एक बात तो तय थी कि उस का मर्डर बड़ी तसल्ली से उस घर में ही किया गया था. यह काम घर का कोई नजदीकी व्यक्ति ही कर सकता है. वह व्यक्ति कौन हो सकता है, जानने के लिए थानाप्रभारी ने शिवनंदन से पूछा कि उन के घर में और कौनकौन आता था?  जब शिवनंदन ने बताया कि कोई नहीं आता था तो पुलिस को शिवनंदन पर शक गहरा गया. उस से सख्ती से पूछताछ की तो उस ने स्वीकार कर लिया कि अनीता की हत्या उस ने ही की थी.

अनीता ने उस के सामने ऐसे हालात पैदा कर दिए थे जिस की वजह से उसे यह कदम उठाने के लिए मजबूर होना पड़ा था. उस ने अनीता की हत्या करने के पीछे की जो कहानी बताई वह बड़ी दिलचस्प निकली. शिवनंदन मूल रूप से उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के अथर गांव के रहने वाले गयाप्रसाद का बेटा था. शिवनंदन के अलावा गया प्रसाद के एक बेटा और 5 बेटियां थीं. गयाप्रसाद खेतीबाड़ी कर के अपने परिवार का भरणपोषण कर रहे थे. जैसेजैसे बच्चे जवान होते गए वह उन की शादी करते गए. उन्होंने मंझली बेटी पुष्पा की शादी उत्तर पश्चिमी दिल्ली के मजलिस पार्क में रहने वाले रमेश चंद से की थी. रमेश आजादपुर सब्जी मंडी में काम करता था.

रमेश का काम अच्छा चल रहा था. 10 साल की उम्र में शिवनंदन भी अपने बहनोई रमेश के पास दिल्ली आ गया. रमेश ने उसे पढ़ाना चाहा लेकिन उस का पढ़ाई में मन नहीं लगा तो रमेश उसे अपने साथ ही काम पर सब्जीमंडी में ले जाने लगा. कुछ दिनों में ही वह मंडी का काम समझ गया. इस तरह वह 14-15 साल की उम्र में ही पैसे कमाने लगा था. वह जो पैसे कमाता उन्हें अपने पिता के पास भेज देता था. इस बीच अनीता 2 बेटों और एक बेटी की मां बन गई थी. बताया जाता है कि शिवनंदन की बहन पुष्पा के अपने भतीजे से ही नाजायज संबंध हो गए थे. इस बात की जानकारी रमेश को हुई तो उस ने पत्नी पुष्पा को समझाया.

पुष्पा को जब लगा कि उस के अवैध संबंधों में पति बाधक है तो उस ने सन 2004 में पति की हत्या कर दी. पति की हत्या के आरोप में पुष्पा को जेल जाना पड़ा. तब शिवनंदन ने ही अपने दोनों भांजों और भांजी की परवरिश की. एक साल बाद जेल में ही पुष्पा की मुलाकात अनीता से हुई. अनीता मूलरूप से बिहार के मुजफ्फरपुर जिले की रहने वाली थी. उस की शादी दिल्ली के खजूरी खास क्षेत्र के रहने वाले देवेंद्र सिंह से हुई थी. बताया जाता है कि सन 2005 में उस ने भी अपने पति की हत्या कर दी थी. पति की हत्या के आरोप में उसे जेल जाना पड़ा था. अनीता के 2 बेटे थे नीरज और सूरज. उस के जेल जाने के बाद बच्चों को लक्ष्मीनगर में रहने वाली उन की मौसी ले गई थी.

पुष्पा और अनीता हमउम्र थीं इसलिए जेल में वे दोनों अच्छी दोस्त बन गई थीं. शिवनंदन जेल में अपनी बहन से मिलने जाता ही था. वहीं पर बहन ने उस की मुलाकात अनीता से कराई थी. अविवाहित शिवनंदन अनीता से मिल कर बहुत प्रभावित हुआ. वह उसे मन ही मन चाहने लगा. अनीता की वजह से वह जल्दजल्द बहन से मिलने जाने लगा. इसी बीच पुष्पा को सजा हो गई तो वह सजा पूरी कर के घर आ गई. कई साल पहले अनीता के मांबाप की मौत हो चुकी हो चुकी थी. दिल्ली के लक्ष्मीनगर में जो उस की बहन रह रही थी, वह भी ऐसी नहीं थी जो उस की जमानत करा सके. उस की जमानत कराने वाला कोई नहीं था जिस से वह जेल में ही बंद थी.

पुष्पा चाहती थी कि किसी तरह अनीता भी जेल से बाहर आ जाए. इसलिए एक दिन उस ने शिवनंदन से उस की जमानत कराने को कहा. शिवनंदन भी यही चाहता था, इसलिए उस ने सन 2010 में किसी तरह अनीता की जमानत करा दी. जमानत के बाद अनीता को पुष्पा ने अपने घर ही रख लिया. शिवनंदन की कमाई से ही घर का खर्चा चल रहा था. एक ही घर में रहने की वजह से शिवनंदन और अनीता एकदूसरे के बेहद नजदीक आ गए. पुष्पा को उन के संबंधों की भनक लग चुकी थी. उन से इस बारे में कुछ कहने के बजाय उस ने मुंह फेर लिया.

इतना ही नहीं, पुष्पा का उत्तरी दिल्ली के बुराड़ी क्षेत्र में एक मकान और था. वह अपने तीनों बच्चों को ले कर बुराड़ी चली गई. मजलिस पार्क वाले मकान में शिवनंदन ही रहने लगा, मगर वह इस के बदले बहन को किराया दे देता था. शिवनंदन और अनीता ने जब महसूस किया कि उन के संबंधों पर पुष्पा को कोई आपत्ति नहीं है तो उन की हिम्मत और बढ़ गई. इस के बाद वे बिना शादी किए पतिपत्नी की तरह रहने लगे. हालांकि अनीता उस से उम्र में 15 साल बड़ी थी, इस के बाद भी दोनों के इस तरह रहने पर पुष्पा भी खुश थी. अनीता ने अपने दोनों बेटों को भी अपने पास बुला लिया. बड़ा बेटा सूरज अपने किसी जानकार के साथ नौकरी के लिए मुंबई चला गया. तब से वह मुंबई में ही है. जबकि छोटा 20 साल का नीरज मां के साथ ही रह रहा था. नीर को शिवनंदन ने आजादपुर सब्जी-मंडी में काम पर लगवा दिया.

शिवनंदन तो सुबह ही घर से मंडी के लिए निकल कर देर शाम को ही घर लौटता था. इस दौरान अनीता अकेली ही घूमने के लिए निकल जाती थी. वह कहां जाती और किस के साथ घूमती थी, यह बात वह पुष्पा को भी नहीं बताती थी. शिवनंदन को जब अनीता की इस हरकत की जानकारी मिली तो उस ने उसे समझाया लेकिन वह नहीं मानी. इस के बाद तो उस की हिम्मत इतनी बढ़ गई कि वह कईकई दिनों तक घर से बाहर रहने लगी. इस दौरान वह अपना फोन भी स्विच्ड औफ कर लेती थी. अनीता जब अपनी मनमरजी करने लगी तो शिवनंदन ने भी उस से कहनासुनना बंद कर दिया.

शिवनंदन को पता नहीं था कि वह गलत धंधा भी करने लगी है. वह गलत धंधा क्या है इस का पता उसे तब लगा जब वह 3 साल पहले नशीले पदार्थ के साथ पंचकुला पुलिस द्वारा गिरफ्तार की गई. ड्रग की खेप वह दिल्ली से पंजाब पहुंचाने जा रही थी. पुष्पा को अनीता के गिरफ्तार होने की जानकारी मिली तो वह हैरान रह गई. उसे लगा कि अनीता शायद गलत तरह के लोगों के बीच फंस गई है और वे लोग उस से ड्रग सप्लाई करा रहे हैं. वह उस से बात कर के सच्चाई जानना चाहती थी. इसलिए वह उस से जेल में मिलने पहुंच गई. पुष्पा को देखते ही अनीता फूटफूट कर रोई. अनीता ने उसे बताया कि ड्रग सप्लाई का काम वह किसी के दबाव में कर रही थी. यानी पुष्पा जैसा सोच रही थी, बात वही निकली.

बहरहाल पुष्पा को अनीता पर दया आ गई. और उस ने भाई से कह कर उस की जमानत करा ली. वह फिर से शिवनंदन के साथ ही रहने लगी. कुछ दिनों तक तो अनीता वहां ठीक रही, बाद में वह अपने पुराने ढर्रे पर उतर आई. बिना बताए घर से निकल कर देर रात घर लौटना जैसे उस का रोज का नियम बन गया था. शिवनंदन उसे डांटता तो वह 2-4 दिन तो ठीक रहती उस के बाद वही उस का घूमनाफिरना शुरू हो जाता था. पुष्पा को कभीकभी गुस्सा आता कि वह उसे घर से निकाल दे लेकिन यह सोच कर खयाल भी आ जाता था कि इस के मांबाप तो हैं नहीं. यहां के बाद ये जाएगी कहां. इसलिए वह बारबार अनीता को समझाती ही रहती थी.

शिवनंदन को कोई परेशानी न हो इसलिए उस ने अपने घर के दरवाजे पर लगने वाले ताले की दूसरी चाबी अपने पास रख ली. करीब एक साल पहले वह अचानक घर से फिर गायब हो गई. उस का मोबाइल फोन भी स्विच्ड औफ था. शिवनंदन और पुष्पा ने उसे संभावित जगहों पर तलाशा लेकिन वह कहीं नहीं मिली. फिर 4-5 दिनों बाद पुष्पा के मोबाइल पर चंडीगढ़ पुलिस का फोन आया. पुलिस ने बताया कि अनीता वेश्यावृत्ति के आरोप में गिरफ्तार की गई है. यह खबर मिलते ही पुष्पा चौंक गई. इस के बाद वह समझ गई कि अनीता कईकई दिनों तक बाहर क्यों रहती है. उस ने यह बात शिवनंदन को बताई तो वह भी हैरान रह गया.

अब की बार शिवनंदन ने तय कर लिया कि वह अनीता से न तो जेल में मिलने जाएगा और न ही उस की जमानत कराएगा लेकिन पुष्पा के मन में तो अब भी उस के लिए दया थी. आखिर उस ने शिवनंदन को चंडीगढ़ जाने के लिए तैयार कर लिया. दोनों ने उस से जेल में मुलाकात की. अनीता ने इस बार भी लाख सफाई दी कि उसे झूठे आरोप में फंसाया गया है, वह बेकुसूर है. लेकिन शिवनंदन को उस पर विश्वास नहीं हुआ क्योंकि वह उस का विश्वास पहले ही तोड़ चुकी थी. अनीता पुष्पा से इस बार और माफ करने के लिए गिड़गिड़ाने लगी. उस के आंसू देख कर पुष्पा का दिल फिर से पसीज गया. लिहाजा भाई से कहसुन कर उस ने अनीता की फिर से जमानत करा ली.

इस बार उस ने अनीता को हिदायत दी कि वह अब कोई ऐसावैसा काम न करे जिस से उन्हें परेशानी हो. अनीता ने वादा तो कर लिया लेकिन उसे निभा नहीं पाई. फिलहाल उस ने घर से बाहर निकलना तो बंद कर दिया था, पर वह घर पर ही अपने फोन से पता नहीं किसकिस से बतियाती रहती थी. शिवनंदन उस के आचरण को जान ही चुका था. इसलिए उसे इस बात का शक था कि वह अपने किसी यार से ही बात करती होगी. उस ने इस बारे में अनीता से पूछा भी पर अनीता यही कह देती कि अपनी सहेलियों से बातें करती है. 29 मई, 2015 को अनीता का बेटा नीरज सब्जीमंडी गया हुआ था. शिवनंदन घर पर ही था. अनीता उस दिन भी अपने फोन पर काफी देर से किसी से बातें कर रही थी. शिवनंदन मन ही मन कसमसा रहा था. जैसे ही अनीता की बात खत्म हुई तो शिवनंदन ने पूछा, ‘‘किस का फोन था जो इतनी लंबी बात चली?’’

‘‘तुम्हें क्यों बताऊं किस का फोन था. जब तुम किसी से बातें करते हो तो मैं क्या तुम से पूछती हूं?’’ अनीता बोली.

‘‘मैं इतनी देर तक किसी से बात भी तो नहीं करता. और यदि तुम्हारे पूछने पर मैं नहीं बताता तो कहती.’’ उस ने कहा.

‘‘देखोजी, मैं किसी से बात करूं या ना करूं इस से तुम्हें कोई मतलब नहीं होना चाहिए.’’ अनीता तुनक कर बोली.

इसी बात पर अनीता और शिवनंदन के बीच कहासुनी हो गई. अनीता ने शिवनंदन पर हाथ छोड़ दिया. शिवनंदन भी आपा खो बैठा उस ने दोनों हाथों से अनीता का गला दबा दिया. कुछ ही देर में अनीता का दम घुट गया. उस के मरते ही शिवनंदन घबरा गया. उस ने गुस्से में अनीता को मार तो दिया, लेकिन अब उस के सामने समस्या यह थी कि वह उस की लाश को ठिकाने कहां लगाए. अगर वह उसे कहीं बाहर ले जाए तो उस के पकड़े जाने की संभावना थी. लिहाजा वह उसी घर में उसे ठिकाने लगाने की सोचने लगा. काफी सोचनेविचारने के बाद उस ने एक कंबल में उस की लाश लपेट ली. फिर उसे किचन के ऊपर के स्लैब पर बनी लकड़ी की रैक में छिपा दिया. इस के बाद वह मकान के दरवाजे पर ताला लगा कर सब्जीमंडी चला गया.

शाम को शिवनंदन और नीरज सब्जीमंडी से लौटे तो नीरज ने घर में मां को नहीं देखा तो वह चौंका. तब शिवनंदन ने कह दिया कि वह पहले की तरह कहीं गई होगी. अनीता कईकई दिनों के लिए अचानक घर से गायब हो जाती थी, इसलिए वह कुछ नहीं बोला. उसे पता नहीं था कि उस की मां अब इस दुनिया में नहीं है. 2-3 दिनों बाद लाश सड़ने लगी तो शिवनंदन ने किचन में खाना बनाना बंद कर दिया ताकि नीरज को कोई शक न हो. वह बाजार से ही खाना मंगाने लगा. उधर अनीता की लाश से बदबू वाला तरल पदार्थ रिसने लगा. उस तरल पदार्थ को शायद किचन में गए चूहों ने पीया होगा, जिस से उन की मौत हो गई. शिवनंदन और नीरज रोजाना ही उसी घर में सोते थे. बदबू बढ़ने पर नीरज ने उस से पूछा भी लेकिन शिवनंदन ने कोई चूहा मरने की बात कह कर उस की बात टाल दी.

पहली जून को शिवनंदन और नीरज अपने काम पर निकल गए. नीरज किसी काम से घर आया तो उस से पड़ोसियों ने बदबू आने वाली बात बताई. उसी दौरान किसी ने पुलिस को फोन कर दिया. फोन काल पर पुलिस वहां आई और मरे हुए चूहे निकलवा कर चली गई. एकडेढ़ घंटे बाद शिवनंदन भी वहां आ गया. उसे जब पता चला कि किचन में जाने के बावजूद भी पुलिस लाश का पता नहीं लगा पाई तो वह बहुत खुश हुआ. उस ने सोचा कि अब वह पकड़ा नहीं जाएगा. लेकिन उस की यह खुशी केवल कुछ देर तक ही रही. क्योंकि उसी दौरान बदबू आने की शिकायत पुलिस से दोबारा जो कर दी गई थी. दूसरी बार पहुंची पुलिस ने बदबू की वजह ढूंढ ही निकाली.

शिवनंदन से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उसे हत्या और लाश ठिकाने लगाने के आरोप में गिरफ्तार कर के जिला एवं सत्र न्यायालय रोहिणी के महानगर दंडाधिकारी कपिल कुमार के समक्ष पेश किया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. शिवनंदन और पुष्पा ने अनीता को सुधरने के कई मौके दिए थे लेकिन अनीता अपनी बढ़ती महत्त्वाकांक्षाओं के चलते गलत पर गलत काम करती रही. यदि वह सही रास्ते पर चलती तो शायद शिवनंदन के हाथों नहीं मारी जाती. बहरहाल, अनीता का बेटा सूरज मां की मौत के बाद भी मुंबई से नहीं आया. मामले की तफ्तीश इंसपेक्टर राकेश कुमार कर रहे हैं. Delhi Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित.

Crime Story: डंस गया देहधंधे की कमाई का सांप

Crime Story: मानो ने देह की कमाई से जो रुपए कमाए थे, उस पर उस की एक परिचित कीर्ति देवी की नजर पड़ गई. फिर उन रुपयों को हड़पने के लिए उस ने जो किया, बेचारी मानो जान से गई…

मनजीत कौर उर्फ मानो पति शीशपाल सिंह को छोड़ कर अंबाला शहर के काजीवाड़ा में अकेली ही रहती थी. आसपड़ोस के लोग उसे एक धार्मिक और समाजसेवी औरत के रूप में जानते थे. इस की वजह यह थी कि वह गरीबों की काफी मदद करती थी और पीर की मजार पर भी नियमित जाती थी. मानो के घर के ठीक सामने वाली गली में रहते थे बलदेव राज. 13 दिसंबर, 2012 की सुबह 9 बजे बलदेव राज बगीचे से घूम कर लौट रहे थे तो उन्हें मानो के घर के सामने कुछ लोग खड़े दिखाई दिए. पूछने पर पता चला कि मानो का कत्ल हो गया है और उस की लाश घर के अंदर पड़ी है.

उत्सुकतावश बलदेव राज भी उस के घर चले गए. अंदर वाले कमरे में बिछी चारपाई पर मानो का शव पड़ा था. उस के बाएं कान, नाक और मुंह से खून रिस रहा था. गले पर नीला निशान था. कमरे का सामान भी इधरउधर बिखरा पड़ा था. बलदेव राज मोबाइल लिए थे. उन्होंने तुरंत इस की सूचना पुलिस को दे दी. थोड़ी ही देर में चौकी नंबर 3 से एसआई महावीर सिंह 2 सिपाहियों के साथ वहां आ पहुंचे. घटनास्थल की स्थिति देख कर उन्होंने इस घटना की जानकारी थाना सिटी को दे दी. चौकी नंबर 3 इसी थाने के अंतर्गत आती थी.

सूचना मिलते ही थानाप्रभारी सिपाहियों के साथ घटनास्थल के लिए रवाना हो गए. घटनास्थल पर पहुंचते ही उन्होंने सब से पहले बलदेव राज के बयान के आधार पर तहरीर भिजवा कर अपराध क्रमांक 509 पर भादवि की धाराओं 302, 20 व 120 बी के तहत अज्ञात अपराधियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा दिया. इस के बाद घटनास्थल की अन्य तमाम काररवाई निपटा कर मौके पर मौजूद लोगों के बयान दर्ज किए गए. उस के बाद शव को पोस्टमार्टम के लिए सिविल अस्पताल भिजवा दिया गया, जहां डाक्टरों ने पोस्टमार्टम के बाद मौत की वजह दम घुटना बताया.

मानो के 2 बेटे थे, जिन में से एक नशामुक्ति केंद्र में दाखिल था तो दूसरा देवेश हत्या के एक मामले में अंबाला जेल में सजा भुगत रहा था. दरअसल अंबाला शहर के जगाधरी गेट पुली से कुमाहार मोहल्ला को जाने वाली सड़क पर सरकारी अनाज का डिपो था. डिपो पर बलदेव उर्फ बल्ली निवासी काजीवाड़ा नौकरी करता था. 23 अक्टूबर, 2010 की बात है. दोपहर में डिपो पर सरकारी गेहूं आया था, जिसे बल्ली करीने से रखवाने लगा. तभी देवेश वहां आ गया. बल्ली उस के पड़ोस में रहता था, इसलिए उस पर वह अपना काफी अधिकार मानता था. आते ही उस ने कहा कि उसे 50 किलोग्राम गेहूं तुरंत चाहिए. बल्ली ने उस से डिपो के मालिक से बात करने को कहा. उस ने मालिक से बात की तो डिपो के मालिक हिमांशु ने उसे समझाया कि सरकारी गेहूं ऐसे नहीं दिया जाता, यह राशनकार्ड पर दर्ज सदस्यों के हिसाब से दिया जाता है.

इस पर देवेश हिमांशु से झगड़ा करने लगा. जरा ही देर में झगड़ा इतना बढ़ गया कि देवेश ने कपड़ों में छिपा कर रखा चाकू निकाल कर हिमांशु पर हमला कर दिया. बल्ली ने किसी तरह बीचबचाव कर के हिमांशु को बचाया. उसी बीच मौका पा कर देवेश भाग खड़ा हुआ. हिमांशु बुरी तरह घायल हो गया था. पुलिस को सूचना दी गई. पुलिस ने उसे सिविल अस्पताल में भरती करवा कर उस के बयान के आधर पर थाना अंबाला सिटी में भादंवि की धाराओं 323, 324, 307 व 506 के तहत मुकदमा दर्ज करा कर देवेश को गिरफ्तार कर लिया. बाद में हिमांशु की मौत हो गई तो इस मुकदमें में धारा 302 भी जोड़ दी गई.

देवेश पर कत्ल का मुकदमा चला, जिस में उसे सजा हो गई. वह अंबाला की जेल में सजा भुगत रहा है. जब उसे अपनी मां की हत्या की सूचना मिली तो मां का अंतिम संस्कार करवाने के लिए जेल प्रशासन से अनुमति मांगी, क्योंकि उस का भाई नशामुक्ति केंद्र में था. पुलिस उसे साथ ले कर आई और अंतिम संस्कार करा कर साथ ले कर चली गई. मानो की हत्या का मामला पुलिस के लिए सिरदर्द था, क्योंकि इस मामले में उस के पास कोई सुराग नहीं था. हत्यारों का पता लगाने की पुलिस ने काफी कोशिश की, मगर पुलिस के हाथ कोई सुराग नहीं लग पाया. इस से मीडिया में पुलिस की काफी किरकिरी हो रही थी. स्थानीय लोग भी इस बात से काफी खफा थे कि पुलिस के हाथ मानो के हत्यारों तक क्यों नहीं पहुंच पा रहे हैं.

मानो के पड़ोसियों ने एक बात नोट की थी कि उस की मौत के बाद उस के यहां आनेजाने वाले तमाम लड़केलड़कियां न जाने कहां गायब हो गए थे. वह एक धार्मिक एवं सामाजिक महिला के रूप में मशहूर थी, जबकि अब उस के यहां कोई नहीं आजा रहा था. यह बात पुलिस को भी बताई गई थी. इस के बावजूद तमाम रहस्य वहीं के वहीं थे. मैं उन दिनों अंबाला और पंचकूला जिले का संयुक्त रूप से पुलिस कमिश्नर था. थाना पुलिस मामलों को हल करने में असमर्थ रही तो मैं ने इस केस को हल करने का जिम्मा सीआईए (क्रिमिनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी) को सौंप दिया.

सीआईए के इंचार्ज इंसपेक्टर कुलभूषण ने मामले की जांच की जिम्मेदारी मिलते ही फाइल मंगा कर अब तक की जांच को गौर से अध्ययन किया. उस के बाद अपनी एक विशेष टीम बना कर मानो हत्याकांड की जांच में जुट गए. उन्होंने जेल में बंद मानो के बेटे देवेश से संपर्क किया और उस से यह जानने की कोशिश की कि किसी पर शक तो नहीं है. उस ने 4 लोगों के नाम लिए, जिन में एक उस हिमांशु का सगा भाई आशीष था, जिस की हत्या के आरोप में वह सजा काट रहा था. दूसरा था इनायत अहमद, निवासी रामनगर कालोनी अंबाला शहर, जो स्मैक के केस में जेल में बंद था. जेल में ही एक बार उस का देवेश से काफी झगड़ा हुआ था. तब उस ने उसे धमकी दी थी कि वह चाहे तो जेल में बैठेबैठे उस का खानदान तबाह कर सकता है.

तीसरा आदमी था जूनियर जौनी, निवासी जग्गी कौलोनी, अंबाला शहर और चौथा महेश निवासी कैथमाजरी, अंबाला शहर. पुलिस ने इन चारों लोगों को सीआईए के पूछताछ केंद्र में बुला कर मनोवैज्ञानिक तरीके से गहन पूछताछ की. पूछताछ में चारों निर्दोष पाए गए. अब मानो हत्याकांड का मामला फिर वहीं का वहीं आ कर अटक गया था. सीआईए के पास गए इस केस को 3 महीने से ज्यादा का समय गुजर गया. इस बीच शक के आधार पर जाने कितने लोगों से पूछताछ कर ली गई, लेकिन अपराधियों का कोई सुराग पुलिस के हाथ नहीं लगा. जो मुखबिर इस काम पर लगाए गए थे, वे भी किसी काम के नहीं निकले. जो थोड़ीबहुत सूचनाएं लाए भी, वे सब गलत साबित हुईं.

सीआईए जिला पुलिस की एक ऐसी अहम इकाई होती है, जहां पर न केवल सुयोग्य पुलिसकर्मियों को तैनात किया जाता है, पूछताछ के तमाम वांछित साधन भी थानों के मुकाबले काफी ठीकठाक मुहैया कराए जाते हैं. यही वजह है कि किसी केस को हल करने में जब थाना पुलिस फेल हो जाती है तो केस सीआईए के हवाले कर दिया जाता है. ऐसे में सीआईए मामले को चुनौती की तरह लेती है और हर हाल में मामले को हल कर लेती है. मानो मर्डर केस एक ऐसी चुनौती बन गया था कि फिलहाल सीआईए के पास भी इस चुनौती का कोई तोड़ नहीं था. समूचा सीआईए विभाग हैरान था कि मानो को कत्ल करने वाले आखिर कौन लोग थे, जिन के बारे में पुलिस को कहीं से कोई जानकारी नहीं मिल रही थी.

उस दिन संयोग ही था कि एसआई गुरदयाल सिंह एक समारोह में गए थे और कुछ शराबियों ने खुद ही मानो मर्डर केस से पर्दा उठाने की बात कर दी. मजे की बात यह थी कि मानो मर्डर केस हल करने के लिए जिस विशेष टीम का गठन किया गया था, गुरदयाल सिंह उस टीम के वरिष्ठ सदस्य थे. फरवरी, 2013 के अंतिम सप्ताह में गुरदयाल सिंह अपने किसी रिश्तेदार के यहां किसी समारोह में गए थे. वहां ज्यादातर लोगों को मालूम नहीं था कि वह पुलिस में हैं. उन्होंने वरदी भी नहीं पहन रखी थी. शगुन डालने के बाद उन का कौफी पीने का मन हुआ तो वह बेयरे से कौफी मंगवा कर पीने के लिए एक किनारे खाली जगह पर जा कर बैठ गए.

वहीं से कुछ दूरी पर कुछ लोग शराब पीते हुए आपस में बातें कर रहे थे. अचानक गुरदयाल सिंह का ध्यान शराब पी रहे लोगों की बातों पर चला गया. बातें उन के कानों में क्या पड़ीं, उन्होंने उन की बातें सुनने के लिए कान खड़े कर लिए. उन में से एक कह रहा था, ‘‘यार, मानो के मरने से ऐश के सारे रास्ते बंद हो गए, क्या एक से बढि़या एक लड़की सप्लाई करती थी. मजे की बात यह कि उस पर किसी को शक नहीं होता था. वह एक धार्मिक और दयालु औरत थी, सोशल वर्कर थी, अपने भले के लिए लड़केलड़कियां उस के यहां आते हैं, आम लोग उस के बारे में यही सब जानते थे.’’

‘‘अपने ग्राहकों के अलावा अन्य किसी को अहसास नहीं होने देती थी कि वह देहधंधे से जुड़ी लड़कियां सप्लाई करती है.’’ दूसरे आदमी ने कहा.

इस के बाद तीसरे ने कहा, ‘‘जो भी था, उस के पास एकदम मस्त लड़कियां थीं, मस्ती का खेल खेलने के सब गुर जानती थीं. मानो का मर्डर क्या हुआ, साली सब की सब भाग कर न जाने कहां छिप गईं. अरे अपना धंधा तो मत चौपट करो, कहीं और अड्डा जमा कर पहले जैसी कमाई करती रहो, हम रंगीनमिजाजों का काम चलता रहे, कहीं कोई टकर जाए तो उसे समझाऊं. लेकिन पता नहीं सब कहां गायब हो गईं’’‘‘दरअसल, मानो हत्याकांड का रहस्य न खुल पाने से वे घबरा गई हैं. कहीं शक की वजह से पुलिस उन्हें पकड़ न ले, यही सोच कर वे इधरउधर भाग गई हैं. वैसे है न कमाल की बात कि दुनिया जानती है कि मानो की हत्या किस ने की? लेकिन पुलिस हाथ पर हाथ धरे बैठी है.’’ पहले वाले ने कहा.

‘‘नहीं यार, ऐसा कैसे हो सकता है. तुम्हें शायद पता नहीं कि यह मामला पुलिस के लिए भारी सिरदर्दी बना हुआ है. पुलिस के बड़े अफसरों ने यह केस थाना से ले कर दूसरी किसी एजेंसी, मेरा ख्याल है सीआईए को दे रखा है. पुलिस की तो नींद उड़ा रखा है इस केस ने और तुम कह रहे हो कि कातिलों के बारे में दुनिया जानती है. 4 महीने हो गए हैं मानो का कत्ल हुए.’’

‘‘तो तुम्हें क्या लग रहा है कि मैं झूठ बोल रहा हूं? मैं जो कह रह हूं, एकदम सही कह रहा हूं.’’

‘‘ऐसा है तो बताओ जरा कौन हैं मानो के कातिल?’’

अपने इस साथी के सवाल पर उस आदमी ने गर्दन घुमा कर इस बात का जायजा लिया कि आसपास कोई उन की बातें तो नहीं सुन रहा. गुरदयाल सिंह अंधेरे में बैठे थे, शायद इस वजह से वह उन्हें दिखाई नहीं दिए. आश्वस्त हो कर उस ने कहा, ‘‘पीर की मजार पर जाते रहते हो न?’’

‘‘हां… हां, वहां तो हम लोग अक्सर जाया करते हैं. मानो भी तो वहां की परम भक्तिन थी, मजार पर जा कर लंगर लगवाया करती थी, गरीबों को कपड़े व पैसे भी दान किया करती थी. वहीं एक औरत आती है, जिसे सब माई कहते हैं.’’

‘‘हां… हां, माई के साथ उस का बेटा रहता है, वह भी अपनी मां के साथ वहां आने वालों की सेवा करता है.’’

‘‘बिलकुल सही पहचाना. उन्हीं लोगों ने मारा है मानो को.’’

‘‘इस का मतलब माई और उस के बेटे ने मानो को मारा है?’’

‘‘और लोग भी हो सकते हैं, लेकिन मेरी जानकारी के हिसाब से ये दोनों इस कत्ल में शामिल थे.’’

यह सुन कर गुरदयाल सिंह के हाथ जैसे बटेर आ गई. उन्होंने अंधेरे में ही एक किनारे जा कर धीमी आवाज में इंसपेक्टर कुलभूषण के मोबाइल पर बात की. इंसपेक्टर ने डीसीपी अशोक कुमार के नोटिस में बात लाई और डीसीपी ने दिशानिर्देश के लिए मेरा फोन मिला दिया. मैं ने सुझाव दिया कि शराबियों पर अभी बिलकुल हाथ मत डालना. मजारों पर अच्छे लोगों के अलावा बुरे लोग भी आते हैं, स्वार्थ की खातिर वह डेरा भी डाल देते हैं. मगर ऐसी जगहें पवित्र होती हैं और वहां का माहौल बड़ा नाजुक होता है. वहां पर पुलिस न भेज कर मुखबिरों का सहारा लिया जाए. मुखबिर जो जानकारियां ला कर दें, पहले उन की जांच की जाए, उस के बाद आगे की योजना बनाई जाए.

ऐसा ही किया गया. हालांकि इस बीच गुरदयाल सिंह ने किसी तरह उन शराबियों के नामपते और वे क्या काम करते हैं की तमाम जानकारी जुटा ली थीं. अंबाला में गुरदयाल सिंह के कुछेक ऐसे खास मुखबिर थे, जिन पर उन्हें काफी भरोसा था. सारी स्थिति समझा कर उन्होंने अपने उन मुखबिरों को मजार पर लगा दिया. वे वहां सेवा करने का दिखावा करते हुए माई और उस के बेटे की जासूसी करने लगे. वहां के लोगों से मुखबिरों को पता चला कि माई पहले बहुत खुश रहते हुए काफी जोश में काम किया करती थी. लेकिन मानो के कत्ल के बाद से वह बहुत सहमी सी रहने लगी है. मानो की बात छिड़ जाने पर वह एकदम से खामोश हो जाती है.

मुखबिरों की समझ में आ गया कि माई के भीतर ऐसा कुछ है, जो अंदर ही अंदर उसे खाए जा रहा है. मगर ऐसी कोई पुख्ता जानकारी अभी तक सामने नहीं आई थी कि जो यह साबित करती कि वाकई मानो का कत्ल उन्हीं लोगों ने किया था. ऐसी स्थिति में हम उन पर हाथ नहीं डाल सकते थे. ऐसे में शक हो जाने पर वे कहीं भाग कर भूमिगत भी हो सकते थे. उन की गिरफ्तारी का कोई सीधा रास्ता न देख कर हम ने एक योजना बनाई. अब तक मैं भी इस मामले से पूरी तरह जुड़ गया था. अपनी योजना के अनुसार, एसआई गुरदयाल सिंह से उन शराबियों से संपर्क किया, जिन्होंने समारोह में मानो के कत्ल में माई और उस के बेटे का हाथ होने की बात कही थी. उन्हें समझाया गया कि एक सच्चे नागरिक की तरह अपराध की पूरी कहानी बता कर पुलिस और कानून की मदद करना उन का फर्ज बनता है.

बात उन लोगों की समझ में आ गई तो उन से पूछा गया कि मानो मर्डर केस में वे पुलिस की क्या और कैसे मदद कर सकते हैं? इस से पहले कि वे इस संबंध में कुछ कहते, गुरदयाल सिंह ने कहा, ‘‘मेरी बात जरा गौर से सुनो, अगर माई और उस का बेटा वाकई मानो मर्डर केस में शामिल है तो उन्हें समझाओ कि वे किसी के माध्यम से पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दें. ऐसे में पुलिस उन से मारपीट करने के बजाय उन की मदद करेगी. इस केस में और लोग भी शामिल हुए तो माई और उस के लड़के को वादा माफ गवाह बना कर रिहा भी किया जा सकता है. हां, उन्होंने ऐसा नहीं किया और उन के खिलाफ सबूत हाथ लग जाने पर पुलिस ने उन्हें उठा लिया तो फिर न उन्हें कोई पुलिस के कहर से बचा सकता है और न ही इस केस में सजा होने से. तब पुलिस यही कोशिश करेगी कि उन्हें हर हाल में सजा हो.’’

गुरदयाल सिंह की इन बातों के जवाब में एक शराबी ने कहा, ‘‘ऐसा है साहब, मानो के कत्ल में माई और उस का बेटा बिलकुल शामिल है. माई से मेरा अच्छा परिचय है और उस ने खुद मुझ से यह बात बता कर अपने बचाव के लिए सलाह मांगी थी. तब मैं ने उसे समझाया था कि कानून के हाथ बड़े लंबे होते हैं, अपराध किया है तो एक न एक दिन पुलिस के हत्थे चढ़ेगी ही. आप की नसीहत जंच रही है, कहे तो मैं उस से बात कर के देखूं.’’

‘‘देख लो.’’ कहने के साथ ही गुरदयाल सिंह के चेहरे पर चमक आ गई. वह आशावान हो गए कि उन का तीर सही निशाने पर लगा है. सुखद परिणाम यह रहा कि अगले ही दिन माई अपने बेटे के साथ सीआईए औफिस आ पहुंची. जरा ही देर में उस ने अपने अपराध की पूरी कहानी सुना दी, जिस से मानो हत्याकांड का रहस्य इस तरह से खुला:

मनजीत कौर उर्फ मानो पहले ऐसी नहीं थी. लेकिन पति का सहारा उठ गया तो आमदनी का कोई साधन नहीं रहा. इस के बाद वह देहधंधा से जुड़ गई. इस से उसे अच्छी कमाई होने लगी. बच्चों की ठीकठाक परवरिश होने लगी. उम्र ढलने लगी तो वह अपने साथ अन्य लड़कियों को जोड़ कर उन की कमाई से कमीशन खाने लगी. उस के संपर्क में काफी अच्छीअच्छी कमसिन लड़कियां थीं, जिन की वजह से उसे पहले से भी ज्यादा कमाई होने लगी. इस बीच उस ने रहने का ठिकाना बदल कर अपनी बढि़या छवि बना ली.

पीर की मजार की काफी मान्यता थी. दूरदूर से लोग वहां शीश नवाने आते थे. सुबह से शाम तक भीड़ लगी रहती थी. मानो भी वहां आनेजाने लगी. दिखावे के लिए वह एक भक्तिन की तरह शीश नवाने और सेवा करने जाया करती थी. गरीबों में कपड़ेपैसे भी बांटा करती थी, जबकि असलियत में वह अपने धंधे को बढ़ाने में लगी रहती थी. माई का नाम था कीर्ति देवी. उस के पति का नाम खैरातीलाल था. वह मजार पर हर वक्त रहती थी, हमेशा रहने की वजह से मानो की उस से जानपहचान हो गई. धीरेधीरे माई को उस के धंधे के बारे में पता चल गया तो वह उस से रुपएपैसे ले कर उसे ब्लैकमेल करने लगी.

12 अक्टूबर, 2012 को मानो फल्गु मेले पर माई के यहां आई तो उस के साथ सिमरन, आशा बंगालन और लवली पंजाबन नामक लड़कियां थीं. उन्हें साथ ले कर मानो कुछ दिनों से इधरउधर घूम रही थी. जब वह माई के यहां आई थी तो उस के पास बहुत बड़ा बैग था, जो नोटों से भरा हुआ था. उस ने काफी गहने भी पहन रखे थे, जिन्हें देख कर माई के मन में कुछ लालच आ गया. इस के बाद माई ने अपने बेटे प्रदीप से बात की तो उस ने कहा कि मानो से उस का पैसा और गहने छीन लेते हैं. उस ने यह काम अपने घर में करने से मना करते हुए कहा कि मानो इन लड़कियों को हिस्सा देने के बाद अकेली अपने घर जाएगी, तब वहीं जा कर यह काम किया जाएगा. रात में मानो लौट गई तो प्रदीप ने अपने दोस्तों, सुल्तान और राजेश को बुला कर लालच दे कर अपनी योजना में शामिल कर लिया.

रात में प्रदीप ने 9 सौ रुपए में इंडिका कार टैक्सी के रूप में बुक कराई और रात के साढे़ 12 बजे सभी मानो के घर पहुंचे. टैक्सी उन्होंने उस के मकान से थोड़ी दूरी पर खड़ी करा दी थी. मानो के घर पहुंच कर माई ने आवाज लगा कर दरवाजा खुलवाया. मानो जाग रही थी. उस ने माई से इस तरह अचानक आने के बारे में पूछा तो माई बोली, ‘‘प्रदीप का झगड़ा हो गया है. जिन के बेटे को पीट कर आया है, वे रात में इसे मारने आ सकते हैं. इसलिए इसे आप के पास छोड़ने आई हूं, मैं अभी लौट जाऊंगी.’’

‘‘अरे रात को कैसे वापस जाएगी और हां, ये 2 लड़के कौन हैं?’’

‘‘प्रदीप के दोस्त हैं सुल्तान और राजेश. ये दोनों भी इस के साथ रहेंगे. जब तक खतरा टल नहीं जाता, लड़के को अकेला नहीं छोड़ सकती.’’

‘‘कोई बात नहीं, तीनों लड़के ऊपर जा कर सो जाएंगे. तुम मेरे साथ सो जाना. इतनी रात गए अकेली कहां जाएगी.’’

इस के बाद तीनों लड़के ऊपर की मंजिल में चले गए और माई नीचे मानो के पास लेट गई. तभी किसी का फोन आया, जिसे रिसीव करते हुए मानो ने कहा, ‘‘हां सिमरन, तू पूरी रात लगा ले, मालदार आसामी है, जितना खुश रखेगी, उतनी मोटी कीमत देगा. घबराने वाली कोई बात नहीं है, पुराना जानकार है मेरा. तड़के सूरज निकलने से पहले लौट आना.’’

इस के बाद मानो ने लाइट बंद कर दी. जरा ही देर में प्रदीप, सुल्तान और राजेश अंधेरे में रास्ता टटोलते हुए नीचे आ गए. उन्होंने मोबाइल की रोशनी में देखने का प्रयास किया कि मानो कहां लेटी है. रोशनी पड़ते ही मानो हड़बड़ा कर उठ बैठी. वह कुछ बोल पाती, उन लोगों ने उस के मुंह पर हाथ रख कर उसे दबोच लिया. सुल्तान ने उस का मुंह दबोचा तो प्रदीप और राजेश ने गला दबाना शुरू कर दिया. माई ने उस के पैरों को पकड़ लिया. खुद को छुड़ाने की खातिर मानो हाथपैर चलाने लगी. लेकिन जल्दी ही वह शिथिल पड़ गई. उस के मर जाने के बाद भी उन लोगों ने माई की चुन्नी मानो के गले में डाल जोरों से कस दिया. इस के बाद तकिया मुंह पर रख कर भी दबाया.

पूरा इत्मीनान हो गया कि मानो मर गई है तो उन्होंने उस के घर की तलाशी ली. बैड के नीचे बौक्स में नोटों से भरा बैग मिल गया. सोनेचांदी के काफी गहने भी उन के हाथ लगे. मानो के पास 3 मोबाइल थे, वे भी उन्होंने ले लिए. कुल 15 मिनट में एक कत्ल और लाखों की लूटपाट कर के वे इत्मीनान से वहां पहुंचे, जहां टैक्सी वाले को खड़ा कर के आए थे. टैक्सी से सभी अपने घर पहुंचे. पहुंचते ही सारा सामान और रुपए आपस में बराबरबराबर बांट लिया. नकद पैसों में सब के हिस्से में कुल 11-11 हजार रुपए ही आए, गहने उन्होंने अंदाजे से बांट लिए थे. उन की कीमत लाखों में थी. मानो के मोबाइल फोन बंद कर के प्रदीप ने कहीं छिपा दिए थे.

माई और प्रदीप से पूछताछ कर के उन की निशानदेही पर लूट का उन के हिस्से का सामान बरामद कर के हम ने उन्हें अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. 2 मार्च, 2013 को इस मामले के सहअभियुक्त राजेश पुत्र नारायणीराम, निवासी इंदिरा कालोनी, पाई रोड, पुंडरी को भी गिरफ्तार कर के उस के पास से लूट का हिस्सा बरामद कर उसे भी जेल भेज दिया गया. इस केस का अन्य अभियुक्त सुल्तान पुत्र लज्जा सिंह, निवासी पुंडरी के बारे में हमें पता चला कि वह चोरी के एक अन्य मामले में न्यायिक हिरासत के तहत कैथल की जिला जेल में बंद था. मानो मर्डर केस में ट्रांजिट रिमांड पर ला कर व्यापक पूछताछ करने के बाद उसे वापस जेल भेज दिया गया.

निर्धारित अवधि के भीतर इस केस का चालान अदालत में पेश कर दिया गया था. इन दिनों यह केस अंबाला की सेशन कोर्ट में चल रहा है. Crime Story

 

UP Crime: डा. दंपति अपहरण कांड – अजय का अधूरा सपना

UP Crime: अजय सिंह ने कई अपहरण कर के लाखों रुपए कमाए थे. लेकिन उस का सपना लाखों का नहीं, बल्कि करोड़ों का था. जाहिर है, ऐसे सपने मुश्किल से पूरे हो पाते हैं, जिन की बुनियाद अपराध की जमीन पर रखी गई हो. अजय के साथ भी यही हुआ. आखिर वह…

6 मई, 2015 की दोपहर की बात है. करीब 2 बज कर 30 मिनट का समय हो रहा था. उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के गोमतीनगर विस्तार में स्थित शारदा अपार्टमेंट के चारों ओर खामोशी सी पसरी हुई थी. 11 मंजिल की इस इमारत में बने हर फ्लैट की खिड़कियां बंद थीं. कहीं पर किसी भी तरह की हलचल नजर नहीं आ रही थी. शारदा अपार्टमेंट के परिसर में जो इक्कादुक्का लोग दिख रहे थे, वे पुलिस के जवान थे, अलगअलग जगह पोजीशन लिए हुए ये लोग उत्तर प्रदेश और बिहार स्पैशल टास्क फोर्स के जवान थे. पुलिस ने शारदा अपार्टमेंट के गेटकीपर को पहले ही बता दिया था कि वहां रहने वाले को अपने फ्लैट में रहने के लिए कह दिया जाए.

क्योंकि अपार्टमेंट में बदमाश छिपे हैं. गेटकीपर ने सावधानी से वहां रहने वाले सभी लोगों को सचेत कर दिया था. आधे घंटे बाद करीब 3 बजे एसटीएफ के जवानों ने अपार्टमेंट की 9वीं मंजिल पर स्थित फ्लैट नंबर 906 को घेर लिया. पुलिस के जवानों से घिरा देख उस फ्लैट में रह रहे बदमाशों ने पुलिस के सामने आत्मसमर्पण करने में ही अपनी भलाई समझी. फ्लैट में मौजूद 8 में से 7 बदमाश आत्मसमर्पण की मुद्रा में पुलिस के सामने आ गए, जबकि उन का एक साथी सब से ऊपर वाली मंजिल की छत पर बनी पानी की टंकी पर चढ़ गया. यह देख एसटीएफ के जवानों ने बड़ी होशियारी के साथ पानी की टंकी को घेर कर उस पर चढ़े बदमाश को पकड़ लिया. उस का नाम अजय कुमार सिंह था. बाकी बदमाशों ने अपने नाम मृत्युंजय कुमार, बिट्टू कुमार, विजय कुमार, अमित सिंह, सुनील कुमार, श्रवण कुमार और अनिल सिंह बताए.

1 घंटे की कड़ी मशक्कत के बाद पुलिस ने जब सभी बदमाशों को पकड़ लिया, तब जा कर शारदा अपार्टमेंट में रहने वालों को पता चला कि फ्लैट नंबर 906 में रहने वाले लोग बिहार के मशहूर किडनैपर हैं, जिन का सरगना अजय कुमार सिंह था. पहनावे और रहनसहन से पुलिस जवान जैसे दिखने वाले बदमाशों को देख कर शारदा अपार्टमेंट के लोग हैरान थे. महीनों साथ रहने के बाद भी वे लोग बदमाशों को पहचान नहीं पाए थे. कभीकभी अजय की पत्नी उस से मिलने शारदा अपार्टमेंट वाले फ्लैट नंबर 906 में आती थी. अजय ने अपने फ्लैट के आसपास अपनी साफसुथरी छवि बना रखी थी. वह अकसर छोटेछोटे बच्चों को खाने के लिए टौफियां दिया करता था. साथ ही वाचमैन को भी खुश रखता था. वाचमैन और आसपास के लोग अजय को कोई बड़ा अफसर या कारोबारी समझते थे.

अजय ने अपने फ्लैट को सुखसुविधा की चीजों से सजा कर रखा था. फ्लैट में जापानी कंपनी का अल्ट्रा हाईडेफिनेशन का 40 इंच का एलईडी, 450 लीटर का डबलडोर फ्रिज, फ्रंट लोडिंग वाशिंग मशीन, माइक्रोवेव ओवन और लैपटौप जैसी महंगी चीजें मौजूद थीं. पुलिस ने तलाशी ली तो अजय के वार्डरोब में महंगे ब्रांड्स की 78 टीशर्ट और 47 जींस व ट्राउजर मिले. साथ ही वार्डरोब में महंगे ब्रांड्स के परफ्यूम भी थे. वहां पुलिस को ब्रांडेड अंडरगारमेंट्स के अलावा अजय के आधा दर्जन लेदर व स्पोर्ट्स शूज भी मिले, जो उस के उच्चस्तरीय रहनसहन की गवाही देते थे.

वह खुद को फिट रखने के लिए ट्रेडमिल और डंबल का इस्तेमाल करता था. शुगर के मरीज अजय ने अपना वजन चैक करने और ब्लडप्रेशर नापने के लिए मशीनें भी ले रखी थीं. उस का फ्रिज विभिन्न ब्रांडेड कंपनियों की खानेपीने की चीजों से भरा हुआ था. अजय ऐसी शानोशौकत भरी जिंदगी जीने के लिए ही अपराध करता था. अजय की पत्नी चाहती थी कि वह अपराध की दुनिया छोड़ दे, इसीलिए वह उस से दूर दिल्ली में रहती थी. अलबत्ता वह कभीकभी उसे समझाने के लिए लखनऊ जरूर आती रहती थी. वह उसे अपने किशोर बेटे का वास्ता भी देती थी. लेकिन अजय का इरादा कोई मोटा हाथ मार कर अपराध की राह छोड़ने का था, ताकि वह प्रौपर्टी डीलिंग जैसा कोई कारोबार कर सके.

इस के लिए उस ने लखनऊ के चारबाग में एक जगह भी देख ली थी. पत्नी को भी वह यही दलील दिया करता था. अनीता को मिन्नतें कर के वह उसे इसलिए लखनऊ बुलाया करता था, ताकि पासपड़ोस के लोगों को लगे कि वह बालबच्चों वाला आदमी है. अजय कुमार सिंह बिहार के गया जिले का रहने वाला था. उस के पिता मंगल सिंह बिहार पुलिस में पीपीएस औफिसर थे, जो प्रमोशन पा कर एसएसपी के पद से रिटायर हुए थे. अजय सिंह भी पुलिस विभाग में जाना चाहता था. दिखने में भी वह किसी पुलिस अफसर से कम नजर नहीं आता था. अजय पूरी शानोशौकत के साथ रहता था. वह ब्रांडेड कपड़े पहनता था. जींस और टीशर्ट उस का पसंदीदा पहनावा था. अजय ने कई बार प्रयास किया, लेकिन वह पुलिस विभाग में नौकरी पाने में असफल रहा.

इसी बीच उस की शादी डा. अनीता सिंह से हो गई. अनीता ने समाजशास्त्र में पीएचडी की थी. वह स्कूल में नौकरी करती थी. दोनों का एक बेटा भी है. पतिपत्नी के विचार कम ही मिलते थे. इसी वजह से अनीता अपने बेटे को ले कर गया से दिल्ली चली गई थी और वसंतकुंज के एक स्कूल में पढ़ाने लगी थी. पुलिस विभाग में नौकरी पाने में असफल रहने के बाद अजय सिंह की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे? उस की शादी हो चुकी थी. एक बेटा भी पैदा हो चुका था. पत्नी और बेटे की जिम्मेदारी अलग से बढ़ गई थी. जबकि छोटीमोटी नौकरी करना उसे पसंद नहीं था. ऐसे में अपनी ख्वाहिशों को पूरा करने के लिए अजय ने अपराध की दुनिया में कदम रख दिया. पहले छोटेमोटे अपराध किए, फिर उस ने अपना गिरोह बना लिया. गिरोह तैयार हो गया तो अजय ने पैसे वालों का अपहरण कर के फिरौती वसूल करने का धंधा शुरू कर दिया.

अजय सिंह के गिरोह में 8 से 10 लोग थे. ये सभी 20-22 साल की उम्र से ले कर 27-28 साल तक के थे. अजय अपने गिरोह के लिए महंगी गाडि़यों का इस्तेमाल करता था. इन गाडि़यों पर लाल या नीली बत्ती लगी होती थी. उसे पुलिस के लोगो लगी पुलिस की वरदी और पुलिस अफसरों का लाइफस्टाइल बहुत पसंद था. इसलिए उस ने अपने गिरोह में ऐसे युवकों को शामिल किया था, जो शारीरिक रूप से पुलिस वाले लगते थे. उस का गैंग बिहार, राजस्थान, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, झारखंड, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश तक अपना जाल फैलाए हुए था.

अजय सिंह के गिरोह ने 1995 में बोकारो के एक बड़े कारोबारी सुशील गर्ग को अगवा किया था. उस ने सुशील के घर वालों से कोलकाता के दमदम एयरपोर्ट पर फिरौती की रकम वसूली थी. इस के बाद उस ने हजारीबाग से लक्ष्मी सीमेंट के मालिक को अगवा कर के पटना में 5 करोड़ रुपए की फिरौती वसूल की थी. बिहार में उस समय अपराधियों के राजनीति में शामिल होने की होड़ लगी थी. राजनीतिक चोला पहन कर अपराधी नेता बन रहे थे. अजय ने सोचा कि अगर वह भी चुनाव लड़ कर जीत जाए तो उसे अपराध करने की जरूरत नहीं रह जाएगी. इस के बाद उस ने 1999 में समता पार्टी जौइन कर ली और औरंगाबाद से लोकसभा का चुनाव लड़ा.

समता पार्टी नईनई बनी थी, उस का अपना कोई आधार नहीं था. बिहार में समता पार्टी को केवल जार्ज फर्नांडीस के नाम से जाना जाता था. अजय सिंह के पास जो पैसा था, वह चुनाव में खर्च हो चुका था, जिस से उस की शानोशौकत की जिंदगी में रुकावट आने लगी. ऐसे में अजय ने फैसला किया कि वह फिर से अपहरण कर के लोगों से फिरौती वसूल करेगा. वैसे भी अपराध की दलदल से निकलना इतना आसान नहीं होता. अजय के साथ भी यही हुआ. उस की सोच उसे फिर से अपराध जगत में घसीट लाई. फलस्वरूप अजय ने फिर से अपराध की दुनिया में कदम रख दिए और लोगों का अपहरण कर के फिरौती वसूलने लगा. अजय चाहता था कि किसी बड़ी हस्ती का अपहरण कर के एक बार में इतना पैसा वसूल ले कि उसे अपराध करने की जरूरत ही न पड़े.

साल 2003 में अजय सिंह ने जयपुर, राजस्थान के डायमंड कारोबारी की पत्नी सुमेधा का अपरहण किया. वह डायमंड कारोबारी से ढाई सौ करोड़ की फिरौती वसूलने के चक्कर में था. अजय ने सुमेधा को 18 दिनों तक दिल्ली में रखा. इस के पहले कि वह फिरौती वसूल पाता, पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया. इस मामले में अजय को सजा भी हो गई, लेकिन साल 2011 में वह पैरोल पर जेल के बाहर आया और फरार हो गया. फरार होने के बाद उस ने फिर से अपहरण का पुराना धंधा शुरू कर दिया. इस बार उस ने राजस्थान के कोटावाला चेन के मालिक और छत्तीसगढ़ के एक इंजीनियर का अपहरण किया. अजय सिंह के गिरोह के लोग ऐसे अमीरों पर नजर रखते थे, जो महंगी गाडि़यों से चलते थे. ऐसे लोगों को अपनी गिरफ्त में लेने के लिए ये लोग क्लबों के बाहर रेकी करते थे. फिर मौका देख कर शिकार का अपहरण कर लिया जाता था.

अजय सिंह ने अपहृत लोगों को बंधक बना कर रखने के लिए लखनऊ के गोमतीनगर इलाके में 2 आलीशान अपार्टमेंट में किराए पर फ्लैट ले रखे थे. एक फ्लैट में अजय और उस के गैंग के लोग रहते थे तो दूसरे में ये लोग अपनी पकड़ को रखते थे. पकड़ को यहां तक लाते या ले जाते समय नशे का इंजेक्शन दे दिया जाता था, ताकि वह कोई विरोध न कर सके. अजय सिंह ने शारदा अपार्टमेंट का फ्लैट ब्रोकर के जरिए लिया था. यह फ्लैट इंग्लैंड में रहने वाले गौरव शर्मा का था. गौरव शर्मा ने यह फ्लैट लखनऊ विकास प्राधिकरण से अपने नाम अलाट कराया था. उन्होंने ब्रोकर के जरिए यह फ्लैट 40 हजार रुपए महीने किराए पर अजय सिंह को दिया था. अजय सिंह ने दूसरा फ्लैट गोमतीनगर क्षेत्र के विश्वासखंड में किराए पर लिया था. यह फ्लैट चीफ इंजीनियर संजय मिश्रा का था.

पहली मंजिल पर स्थित इस फ्लैट को लेते समय अजय सिंह ने फर्जी वोटर आईडी का सहारा लिया था. फ्लैट लेते समय उस ने अपना नाम नीरज सिंह बताया था. उस वक्त वह अपनी पत्नी अनीता को भी साथ लाया था. नीरज यानी अजय ने यहां रहने वाले लोगों को बताया था कि बिहार में उस का कोल ब्लौक है. बाद में जब कोल ब्लौक के आवंटन रद्द हुए तो अजय ने कहा कि अब वह प्रौपर्टी के धंधे में हाथ आजमाना चाहता है. वह लखनऊ की एपी सेन रोड स्थित एक प्रौपर्टी को खरीद कर उस में कौंप्लेक्स बनाने की तैयारी भी कर रहा था. अजय हमेशा अपने घर में पढ़ेलिखे और सभ्य लोगों को बुलाता था, जिस से आसपास रहने वालों पर उस का इंप्रेशन बना रहे. अपने फ्लैट में अजय बहुत अच्छी कंपनियों का सामान रखता था. उस के रहनसहन को देख कर कोई भी उसे अपराधी नहीं मान सकता था.

अजय के गिरोह ने 22 जनवरी, 2015 को रोहतास जिले के कारोबारी रविरंजन उर्फ डंपू सिंह, उस के साथी अमरेश तथा ड्राइवर सद्दाम का अपहरण किया. इन लोगों ने रविरंजन की फार्च्युनर कार भी लूट ली थी. रविरंजन को 35 दिनों तक लखनऊ के शारदा अपार्टमेंट में बंधक बना कर रखा गया. अपहृत लोगों के घर वालों से 30 लाख की रकम वसूल करने के बाद छोड़ा गया था. अजय रविरंजन की फार्च्युनर का इस्तेमाल दूसरे अपहरणों में करने लगा था. बिहार पुलिस अभी रविरंजन अपहरण कांड को सुलझाने में ही लगी थी कि 1 मई, 2015 को इस गिरोह ने गया जिले के डा. पंकज गुप्ता और उन की पत्नी शुभ्रा का अपहरण कर लिया. डा. पंकज गुप्ता का गया में हीराहोंडा का शोरूम था और उन की पत्नी शुभ्रा रेडीमेड गारमेंट्स का बिजनैस करती थीं.

1 मई को पतिपत्नी गिरिडीह में अपने एक रिश्तेदार के यहां शादी समारोह में शामिल होने के लिए गए थे. वहां से लौटते समय ये लोग अजय सिंह के गिरोह के हत्थे चढ़ गए. अजय सिंह गिरोह के लोग डाक्टर और उन की पत्नी का अपहरण करने के बाद उन्हें लखनऊ के शारदा अपार्टमेंट में ले आए. शारदा अपार्टमेंट में करीब 188 फ्लैट हैं, जिन में 100 से अधिक फ्लैटों में लोग रहते हैं. यहां के एक फ्लैट की कीमत 50 लाख से ले कर 90 लाख के बीच है. फ्लैट नंबर 906 में पिछले 6 महीने से केवल युवक ही रहते देखे जा रहे थे. जब डा. पंकज गुप्ता और उन की पत्नी को वहां लाया गया तो अचानक एक महिला के वहां आने से आसपास के लोगों को किसी गलत काम की आशंका होने लगी.

डा. पंकज गुप्ता और उन की पत्नी के अपहरण की गुत्थी सुलझाने के लिए बिहार एसटीएफ ने रविरंजन का सहारा लिया. रविरंजन ने पुलिस को बताया कि उन्हें लखनऊ की जिस जगह पर रखा गया था, वह किसी फ्लाईओवर के पास थी. वहां आसपास कोई स्कूल भी था, जहां से स्कूल की घंटी बजने की आवाज आती थी. साथ ही पास में एक हाइवे भी दिखाई देता था. यह जानकारी मिलने पर बिहार पुलिस रविरंजन को ले कर लखनऊ आई और शारदा अपार्टमेंट तक पहुंचने में सफल हो गई. रविरंजन ने बिहार पुलिस को वह जगह भी दिखाई, जहां पर फिरौती की रकम दी गई थी. यह जगह लोहिया पार्क का गेट नंबर 2 थी. यहीं पास में विश्वासखंड भी है, जहां पर अजय ने किराए का फ्लैट ले रखा था.

इन सारी सूचनाओं को एकत्र करने के बाद बिहार के डीजीपी पी.के. ठाकुर ने उत्तर प्रदेश के डीजीपी ए.के. जैन से बात की और अपहरण के इस मामले को सुलझाने के लिए मदद मांगी. डीजीपी ए.के. जैन ने उत्तर प्रदेश एसटीएफ के आईजी सुजीत पांडेय और एसएसपी अमित पाठक को यह मामला सुलझाने का जिम्मा सौंपा. उधर गया जिले के एसपी सिटी राकेश कुमार ने पुलिस बल ले कर शारदा अपार्टमेंट की रेकी करनी शुरू कर दी. पुलिस को इस बात की जानकारी नहीं थी कि शारदा अपार्टमेंट के उस फ्लैट में कितने लोग हैं. यह भी डर था कि अगर जोरजबरदस्ती करने का प्रयास किया गया तो डाक्टर दंपति को कोई नुकसान पहुंच सकता है.

सारी बातों के मद्देनजर पुलिस के जवानों ने तरहतरह के भेष बना कर यहां की निगरानी शुरू की. कोई धोबी बना तो कोई भिखारी. कोई कारपेंटर बना तो कोई प्लंबर. कई बार ये लोग सामने के डिवाइडर पर धूप में लेट कर आनेजाने वालों पर निगाह रखते थे. प्लंबर और कारपेंटर के भेष वाले जवान फ्लैट में ताकाझांकी करने की कोशिश भी करते थे. 5 मई की शाम को गिरोह के लोग डाक्टर दंपति को कार में बिठा कर बाहर निकल गए. अंधेरे की वजह से पुलिस उन लोगों को देख नहीं पाई. देर रात गए जब कार वापस आई तो उस में डाक्टर दंपति नहीं थे. 6 मई की सुबह डा. पंकज गुप्ता के घर वालों ने जिले के डीआईजी को बताया कि डाक्टर पंकज और उन की पत्नी शुभ्रा पूर्वा एक्सप्रेस से वापस अपने घर आ गए हैं.

यह सूचना मिलते ही पुलिस ने शारदा अपार्टमेंट के फ्लैट नंबर 906 पर छापा मार कर डाक्टर दंपति का अपहरण करने वाले गिरोह के सरगना अजय कुमार सिंह को उस के 7 साथियों के साथ पकड़ लिया. 1 घंटे तक चली काररवाई के बाद जब अजय सिंह को पुलिस ने पकड़ा तो वह खुद को निर्दोष बताने लगा. उस ने कहा कि डाक्टर दंपति से कोई फिरौती नहीं मांगी गई थी. डीजीपी ए.के. जैन ने भी यह बात मानी कि अजय सिंह ने डाक्टर के परिवार से कोई फिरौती नहीं ली है. अपहृत डाक्टर दंपति से पूछताछ करने वाले आईजी पटना ने भी इस बात की पुष्टि की कि फिरौती में कोई रकम नहीं दी गई.

अजय सिंह के गिरोह ने पुलिस को बताया कि डाक्टर की पत्नी के साथ होने से काफी परेशानी होने लगी थी. इसलिए गिरोह के लोग उन्हें छोड़ कर चुपचाप भाग जाना चाहते थे. लेकिन पुलिस की निगरानी के चलते वे ऐसा करने से चूक गए. इस औपरेशन के खत्म होने पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने एसटीएफ टीम को 5 लाख रुपए नकद इनाम देने की घोषणा की. उत्तर प्रदेश के डीजीपी ए.के. जैन ने भी विभाग की तरफ 50 हजार रुपए इनाम देने की घोषणा की. UP Crime

 

True Crime: भाई की बदनीयती की शिकार सायरा

True Crime: हर बहन को अपने भाई से रक्षा की उम्मीद होती है लेकिन आरिफ ऐसा भाई था जो बहनों की रक्षा करना तो दूर उन के जिस्म से खेलना चाहता था. मां भूरी भी बेटियों की नहीं सुनती थी. इसी दौरान एक दिन तो…

23 मई, 2015 को सुबह के कोई 11 बजे रुखसार और शमीमा थाना काशीपुर के थानाप्रभारी के पास पहुंची. दोनों ही काफी परेशान सी दिख रही थीं. उन्हें देखते ही थानाप्रभारी समझ गए कि इन का कोई पारिवारिक झगड़ा हुआ होगा. उसी झगड़े की शिकायत करने आई होंगी. इसलिए उन्होंने उन से पूछा, ‘‘बोलो, क्या बात है?’’

उम्र में बड़ी दिखने वाली रुखसार ने बताया, ‘‘सर, हम लोग यहीं के ढेला बस्ती के मधुवननगर में रहते हैं. पिछले 16 दिनों से हमारी बहन सायरा गायब है. हमें शक है कि हमारे भाइयों व अम्मी ने मिल कर उस की हत्या कर दी है.’’

हत्या की बात सुन कर थानाप्रभारी चौंके, ‘‘क्या! यह तुम क्या कह रही हो?’’

‘‘हां, सर, मैं सही कह रही हूं. हमारे घर के एक कोने से तेज बदबू भी आ रही है.’’

यह सुन कर थानाप्रभारी हैरत में पड़ गए. पहली बार तो उन्हें उन की बातों पर विश्वास नहीं हुआ, लेकिन उन्होंने गहराई से सोचा तो उन्हें इन लड़कियों ने जरूर कोई ऐसीवैसी बात देखी होगी, तभी तो ये इस तरह की बात कह रही हैं. वह उसी समय दोनों बहनों को ले कर उन के घर पहुंच गए. घर पहुंचते ही दोनों बहनें थानाप्रभारी को अपने घर में उस जगह ले गईं, जहां पर मिट्टी खुदी नजर आ रही थी. वहां पहुंचते ही थानाप्रभारी ने तेज दुर्गंध महसूस की. उस वक्त उस घर में उन दोनों बहनों के अलावा कोई नहीं था. उस समय बाकी लोग कहीं गए हुए थे.

दुर्गंध से पुलिस को लगा कि ये जो भी कह रही थीं, वह सही हो सकता है. उस जगह उन्हें भी लाश दफन होने की आशंका दिखी, इसलिए उन्होंने इस की सूचना एएसपी कमलेश उपाध्याय, सीओ प्रकाश आर्य को फोन द्वारा दे दी तो दोनों पुलिस अधिकारी भी मधुवन नगर पहुंच गए. तब तक मोहल्ले के भी कुछ लोग वहां इकट्ठे हो चुके थे. जहां से दुर्गंध आती महसूस हो रही थी, पुलिस ने उस जगह पर खुदाई शुरू करा दी. जैसेजैसे उस स्थान की मिट्टी हटती गई, दुर्गंध बढ़ने लगी. कुछ ही देर की खुदाई के बाद सच्चाई सभी के सामने आ गई. लगभग 3 फुट नीचे गड्ढे में एक युवती दफन थी. लाश को देखते ही रुखसार और शमीमा रोने लगीं. उन्होंने बताया कि यह लाश उन की बहन सायरा की है.

सायरा की लाश के ऊपर काली पौलीथिन और प्लास्टिक के कट्टे डाले गए थे. उस की लाश को जल्दी गलाने के लिए ऊपर से नमक भी डाला गया था. लाश काफी गल चुकी थी, इस से लग रहा था कि घटना कई दिनों पहले की थी. मोहल्ले के लोगों को जैसे ही पता लगा कि सायरा की हत्या कर के उसी के घर में लाश दफना दी गई थी और उस लाश को पुलिस ने बरामद कर लिया है तो थोड़ी देर में सैकड़ों लोगों का वहां जमघट लग गया. शव को गड्ढे से निकलवाने के बाद पुलिस छानबीन में लग गई. पुलिस ने घर की तलाशी ली तो वहां लोहे की एक रौड मिली. उस रौड पर खून लगा हुआ था. अंदाजा लगया कि उसी रौड से उस की हत्या की गई होगी.

एएसपी कमलेश उपाध्याय ने रुखसार और शमीमा से पूछताछ की तो शमीमा ने बताया, ‘‘मैं अपनी बड़ी बहन रुखसार के पास हल्द्वानी में थी. जब घर आई तो मां भूरी ने बताया कि सायरा किसी के साथ भाग गई है. यह बात मुझे बड़ी अजीब लगी. फिर मैं ने देखा कि मां रोज आंगन के इस कोने में अगरबत्ती जलाती थी. वह जिस जगह अगरबत्ती जलाती थी, वहां से दुर्गंध उठ रही थी. तब मुझे शक होने लगा कि भाइयों ने कहीं सायरा को मार कर यहां दफना तो नहीं दिया है. आज मां जब अपने मायके गईं तो मैं ने यह बात हल्द्वानी में रह रही बड़ी बहन रुखसार को फोन से बता दी. खबर सुन कर रुखसार तुंरत ही काशीपुर आ गई. फिर हम दोनों थाने चली गईं.’’

इस मामले को ले कर पुलिस ने पड़ोसियों से पूछताछ की तो पड़ोसियों ने इस बारे में कुछ भी नहीं बताया. कुछ लोगों ने पुलिस को इतनी जानकारी जरूर दी कि जब भूरी से सायरा के बारे में पूछा जाता था तो वह केवल यही बात कहती थी कि वह घर से भाग गई है. घटनास्थल से सभी तथ्य जुटाने के बाद पुलिस ने सायरा की सड़ीगली लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. रुखसार की तहरीर पर पुलिस ने उस की मां भूरी, 2 भाइयों, नाजिम और आरिफ के खिलाफ हत्या और साक्ष्य छिपाने का मामला दर्ज कर लिया. फिर तीनों आरोपियों की धरपकड़ के लिए एएसपी ने 3 टीमें गठित कीं.

पुलिस ने भूरी के रिश्तेदारों के यहां दबिश डालनी शुरू कर दी. उसी दौरान पुलिस टीम को पता चला कि भूरी कहीं से अपने घर लौट रही है. महिला पुलिसकर्मियों के साथ एक पुलिस टीम उस के घर के पास पहुंच गई. जैसे ही वह एक युवक के साथ अपने घर पहुंची, पुलिस ने दोनों को हिरासत में ले लिया. भूरी के साथ युवक उस का बेटा नाजिम था. मामला खुल चुका है, इस बात का भूरी को पता नहीं था. पुलिस की गिरफ्त में आते ही वह दोनों घबरा गए. थाने ले जा कर उन से कड़ी पूछताछ की तो वे ज्यादा देर तक नहीं टिक सके. उन्होंने जल्दी ही अपना जुर्म कबूल कर लिया. पूछताछ के दौरान इस हत्याकांड की जो सचाई सामने आई, उस से मां की क्रूरता और भाईबहन के रिश्ते को कलंकित कर देने वाली कहानी उजागर हुई.

उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले की तहसील ठाकुरद्वारा के अंतर्गत आता है एक गांव रतपुरा. नाजिर हुसैन इसी गांव का निवासी था. वह घोड़ाबग्गी चला कर अपने गुजरबसर करता था. कई साल पहले उस ने रतपुरा का घर बेच कर उत्तराखंड के काशीपुर शहर के मधुवननगर में अपना मकान बना लिया था. काशीपुर आने के बाद उस ने घोड़ाबग्गी बेच दी और राजगीरी करने लगा. शहर में रहने पर उस के घर के खर्चे भी बढ़ गए थे. जितने पैसे वह कमाता था, उस से घर चलाने में भी दिक्कत आने लगी. नाजिम उस का सब से बड़ा बेटा था, वह कुछ समझदार हुआ तो उस ने ड्राइवरी सीख ली. वह कमाने लगा तो घर का खर्च आसानी से चलने लगा. नाजिर ने समय के साथ ही उस की शादी भी कर दी. शादी होने के कुछ समय बाद ही नाजिम परिवार से अलग रहने लगा.

नाजिम से छोटा आरिफ था. वह शुरू से ही आवारा किस्म के लड़कों के साथ रहता था. वह कोई कामधंधा भी नहीं करता था. जबकि उस से छोटा हारुन पिता के साथ राजगीरी करने लगा था. आरिफ और नाजिम दबंग किस्म के थे. दोनों की दबंगई की वजह से भी मोहल्ले में उन से कोई पंगा लेना नहीं चाहता था.  आरिफ तो छोटीछोटी बातों पर हर किसी से लड़ने के लिए तैयार रहता था. उस की इसी आवारागर्दी के कारण उस का पिता नाजिर उस से खफा रहता था. वह कभी उस से कोई कामधंधा करने को कहता तो वह अपने पिता से ही गालीगलौज करने लगता था. जबकि भूरी उसे जेबखर्च के लिए पैसे देती रहती थी. नाजिर ने पत्नी से उसे खर्च के लिए पैसे देने से मना किया तो वह नहीं मानी.

दरअसल, काशीपुर आने के बाद भूरी के कदम भी बहक गए थे, इसलिए वह पति को ज्यादा तवज्जो नहीं देती थी. आरिफ को पैसे देने की बात को ले कर दोनों मियांबीवी में मनमुटाव रहने लगा था. भूरी बेहद चालाक थी. उस ने सभी बच्चों को अपने पक्ष में कर रखा था. पति उसे जो भी कमा कर देता, वह उसे अपने और बच्चों के ऊपर ही खर्च कर डालती थी. नाजिर जब भी उसे समझाने की कोशिश करता वह उस की नहीं सुनती और न ही बच्चों को डांटने देती थी. लगभग 5 साल पहले नाजिर ने बड़ी बेटी रुखसार की शादी उत्तर प्रदेश के जिला रामपुर के गांव शाहपुरा निवासी मोहम्मद रफीक के साथ कर दी थी. शादी के बाद मोहम्मद रफीक रुखसार को ले कर हल्द्वानी के इंदिरानगर में आ कर रहने लगा.

रुखसार की शादी हो जाने के बाद आरिफ और भी ज्यादा बिगड़ गया था. हालांकि वह कबाड़ा खरीदने का काम करने लगा था, लेकिन उस से जितनी भी कमाई होती, उसे वह अय्याशी और शराब पर खर्च कर देता था. उसे मालूम था कि उस की अम्मी किस के साथ क्याक्या गुल खिलाती है. इसी वजह से वह उस से कुछ भी नहीं कह पाती थी. मां की शह मिलते ही वह अपने पिता के साथ बगावत पर उतर आता था. बीवी और बेटों से नाजिर बहुत तंग आ चुका था. उन के व्यवहार की वजह से उस का घर में रहना मुश्किल हो गया था. उन से आजिज आ कर वह कुछ दिन के लिए काम करने शहर से बाहर चला गया. उस के घर से निकलते ही भूरी और उस के बेटे पूरी तरह से आजाद हो गए.

इस के बाद भूरी और उस के बेटों की ही घर में चलने लगी. कुछ दिनों बाद नाजिर घर आया तो भूरी ने उसे टिकने नहीं दिया. जिस से वह अकसर बाहर रह कर काम करने लगा. भूरी हमेशा अपनी मस्ती में मस्त रहती और आरिफ शराब और शबाब में. इसी बीच आरिफ के अंदर ऐसी दरिंदगी पैदा हो गई कि वह अपनी सगी बहनों पर ही गलत नजरें रखने लगा. शराब के नशे में वह मौका देखते ही बहनों से अश्लील हरकतें करता. भाई की इस हरकत पर वे हैरान थीं. दबी जुबान में उन्होंने उस की शिकायत अम्मी से की तो उस ने भी बेटियों की शिकायत पर ध्यान नहीं दिया, जिस से आरिफ की हिम्मत और बढ़ गई.

इस के बाद उस ने कई बार अपनी छोटी बहन फरीदा के साथ जबरदस्ती नाजायज संबंध बनाने की कोशिश की. फरीदा जानती थी कि यदि वह अम्मी से शिकायत करेगी तो वह उलटे उसे ही डांटेगी, इसलिए बात को वह मन में ही दबाए रही. वह आरिफ से सतर्क रहने लगी. उसी दौरान फरीदा की भी शादी हो गई तो उस ने चैन की सांस ली. शादी के बाद वह अपनी ससुराल रुद्रपुर चली गई. फिर उस ने मायके की तरफ मुड़ कर नहीं देखा. फरीदा की शादी के बाद घर में 3 बहनें और जवान थीं. आरिफ के दिमाग में इतनी गंदगी भर गई थी कि वह हर वक्त उन्हें हवस भरी नजरों से देखता था. चूंकि घर में आरिफ की ही चलती थी, इसलिए किसी भी बहन की हिम्मत उस का विरोध करने की नहीं हो पाती थी.

बहनों ने एकदो बार मां के सामने मुंह खोला तो आरिफ ने उलटे उन पर ही दूसरों लड़कों के साथ अय्याशी का आरोप लगा कर उन्हें मां से पिटवा दिया. इतना ही नहीं, उस ने तीनों बहनों के बाहर आनेजाने पर पाबंदी भी लगा दी. नाजिर को पता नहीं था कि उस के पीछे घर में क्या हो रहा है. वह कभीकभी पत्नी से फोन पर बात कर लेता था. कभी वह बेटियों से बात कराने को कहता तो भूरी कोई बहाना बना कर बेटियों की उस से बात नहीं कराती. तीनों बहनें मां और भाई के जुल्मों से तंग आ चुकी थीं. एक दिन उन्होंने चोरीछिपे यह बात बड़ी बहन रुखसार को फोन पर बता दी.

सगे भाई द्वारा बहनों के साथ किए जा रहे कृत्यों की खबर पा कर उसे बहुत दुख हुआ. सोचने लगी कि यह भाई है या जानवर, जो अपनी ही बहनों का शोषण कर रहा है. एक दिन टाइम निकाल कर वह मायके आ गई. इस बात को ले कर उस ने अपनी अम्मी और भाई को समझाने की कोशिश की. लेकिन मांबेटे ने उस की एक न मानी, बल्कि उल्टे ही लड़कियों पर गलत राह पर चलने का आरोप लगा दिया. रुखसार पहले से ही जानती थी कि घर में आरिफ और अम्मी की चलती है. इसलिए अपने फर्ज के मुताबिक दोनों मांबेटों को समझाबुझा कर अपनी ससुराल लौट गई. उस के चले जाने के बाद आरिफ हैवानियत की हदें पार करने लगा. इस के बाद भूरी और उस के बेटों का रुखसार से मनमुटाव हो गया, जिस से रुखसार ने मायके आना बंद कर दिया.

उसी दौरान आरिफ की बहन शमीमा बड़ी बहन रुखसार के पास हल्द्वानी चली गई. शमीमा के घर से जाने के बाद घर में सायरा और सब से छोटी फरीदा रह गई. आरिफ ने सायरा को अपनी हवस का शिकार बनाने की कई बार कोशिश की, लेकिन हर बार सायरा ने उस का विरोध किया. जिस की वजह से वह अपने मंसूबे में सफल नहीं हो सका. शमीमा जब रुखसार के यहां चली गई तो आरिफ को डर लगने लगा कि कहीं वह रुखसार के सामने उस की पोल न खोल दे, इसलिए उस ने कई बार रुखसार को फोन कर के कहा भी कि वह शमीमा को काशीपुर भेज दे. लेकिन शमीमा घर आने को तैयार नहीं थी.

सायरा खुले मिजाज की थी. आधुनिक कपड़े पहनने का उसे शौक था. वह अकसर जींसटौप पहनती थी. एक दिन वह मोहल्ले के एक लड़के से कुछ बातचीत कर रही थी. आरिफ ने उसे देख लिया, लेकिन सायरा आरिफ को नहीं देख पाई. आरिफ ने यह बात अपनी अम्मी के सामने बढ़ाचढ़ा कर रख दी. फिर क्या था, भूरी ने सायरा को खूब खरीखोटी सुनाई. 5 मई को भूरी कहीं गई हुई थी. रात को घर पर आरिफ और उस की दोनों बहनें शमीमा और सायरा थीं. वह इस मौके को गंवाना नहीं चाहता था. शमीमा और सायरा गहरी नींद में सो रही थीं. तभी अपनी हसरतें पूरी करने के लिए वह सायरा की चारपाई पर पहुंच गया. जैसे ही उस ने उसे दबोचा, तभी सायरा की आंखें खुल गईं. उस ने भाई का विरोध किया. लेकिन वह उस के साथ जबरदस्ती पर उतारू था.

घबराहट में सायरा समझ नहीं पा रही थी कि दानवरूपी भाई के चंगुल से कैसे बचे. इत्तफाक से उसी समय किसी ने दरवाजा खटखटाया. आरिफ बुदबुदाता हुआ दरवाजा खोलने गया. सामने उस की अम्मी थी. अम्मी को देखते ही उस के अरमानों पर जैसे पानी फिर गया. लेकिन सायरा ने राहत की सांस ली थी. सायरा ने भाई की शिकायत अम्मी से की. उस के सामने वह खून के आंसू रोई, लेकिन भूरी ने उस की बात पर विश्वास नहीं किया. अम्मी का रवैया देख कर सायरा को लगा कि अब इस घर में उस का रहना सुरक्षित नहीं है. वह अपनी चारपाई पर ही सुबकसुबक कर रोती रही. उस ने तय कर लिया कि वह इस घर में वह नहीं रहेगी. मौका मिलते ही रात को यहां से कहीं भाग जाएगी.

उस दिन के बाद आरिफ को भी डर लगने लगा था कि कहीं सायरा यह बात घर के बाहर के किसी व्यक्ति को न बता दे. इस के लिए उस ने अम्मी से सायरा के बारे में उल्टीसीधी बात लगा कर उस के घर से निकलने की सख्त पाबंदी लगा दी. सायरा अब घर में कैद हो कर रह गई थी. 9 मई, 2015 को उसे मौका मिल गया और किसी तरह से चोरीछिपे घर से निकल कर वह काशीपुर रेलवे स्टेशन पहुंच गई. उस समय वहां से जाने वाली कोई गाड़ी नहीं थी. तब वह स्टेशन पर बैठ कर गाड़ी का इंतजार करने लगी. भूरी को जैसे ही पता चला कि सायरा घर पर नहीं है तो वह घबरा गई. उसे लगा कि घर से भाग कर या तो वह बसअड्डा गई होगी या फिर रेलवे स्टेशन. बसअड्डे के लिए उस ने आरिफ को भेज दिया और स्टेशन के लिए खुद निकल गई. सायरा उसे स्टेशन पर दिखाई दी तो उसे पकड़ कर घर ले आई.

सायरा घर आ तो गई, लेकिन उस की इस हिम्मत को देख कर आरिफ डर गया. उसे डर था कि अगर सायरा आईंदा घर से निकल गई तो उस की पोल जरूर खोल देगी. इसी डर की वजह से उस ने उसे मौत की नींद सुलाने का प्लान बना लिया. इस काम में वह अम्मी और भाई को भी शामिल करना चाहता था. इस के लिए उस ने एक दिन अम्मी और भाई नाजिम से कहा, ‘‘सायरा का किसी लड़के के साथ चक्कर चल रहा है. वह आज नहीं तो कल जरूर उस के साथ भाग जाएगी. उस के बाद सारे शहर में हमारी बहुत ही बदनामी होगी. इस से पहले वह घर से भागे, उसे खत्म कर देने में ही भलाई है.’’  भूरी भी उस के कहने में

आ गई. माता कुमाता बन गई तो आरिफ को उसे खत्म करने का साफ रास्ता मिल गया. फिर अगले दिन 10 मई, 2015 को दोपहर में नाजिम और अम्मी के साथ मिल कर सायरा की उस वक्त हत्या कर दी, जब वह गहरी नींद में सोई हुई थी. आरिफ ने सब से पहले सोती हुई सायरा के सिर पर लोहे की रौड से वार किया. इस के बाद उस की ही चुन्नी से उस का मुंह दबा दिया. उसी दौरान उस का कर उस की हत्या कर दी. हत्या करने के बाद समस्या लाश को ठिकाने लगाने की थी. आपस में सलाहमशविरा करने के बाद उन्होंने घर में ही लाश ठिकाने लगाने का फैसला कर लिया. उन के कमरे के पीछे एक टिन शेड था. उस दिन शेड के नीचे ही उन्होंने 3-4 फुट गहरा गड्ढा खोदा. उसी गड्ढे में उस की लाश को दफन कर दिया.

दफन करने से पहले सायरा की लाश पर नमक डाल कर पौलीथिन डाल दी. ताकि लाश जल्दी से गल सके. लाश ठिकाने लगाने के बाद उस जगह को लेवल में कर के भूरी ने गोबर से लिपाई कर दी. बेटी को घर में ही दफन करने के बाद भूरी रोजाना ही उस जगह को गोबर से लीपती और अगरबत्ती लगाती थी, ताकि लाश के सड़ने की बदबू महसूस नहीं हो. सब से हैरत वाली बात तो यह थी कि भूरी उस के पास में ही रोज खाना बनाती और वहीं पर दरी भी बुनती थी.

आरिफ ने सायरा को मौत के घाट उतार तो दिया था, लेकिन इस के बाद भी उस के मन को तसल्ली नहीं मिली थी. उस की नजरों में अभी भी शमीमा चढ़ी हुई थी. वह उस के साथ भी सोते वक्त कई बार अश्लील हरकतें कर चुका था. लेकिन इस से आगे बढ़ने का उसे मौका नहीं मिला. उसे इस वक्त शमीमा से भी बहुत डर लग रहा था. उसे मालूम था कि शमीमा ने जरूर अपने साथ घटी घटना रुखसार को बता दी होगी. इसी कारण उस ने अम्मी को उस के खिलाफ भी भड़का कर उसे रुखसार के पास से बुलाने के लिए हल्द्वानी भेज दिया.

भूरी शमीमा को बुलाने के लिए हल्द्वानी पहुंच गई. हल्द्वानी जाते ही भूरी ने रुखसार को आड़े हाथों लिया, ‘‘तू हर वक्त अपनी बहनों का ही पक्ष लेती रहती है. तू ने सभी को बिगाड़ कर रख दिया है. अब सायरा की करतूत भी सुन ले. वह किसी लड़के के साथ भाग गई है. उस ने सारे मोहल्ले में हमारी नाक कटवा कर रख दी है. घर से बाहर निकलते ही लोग तरहतरह के सवालजवाब करते हैं. अब किस को क्या जवाब दूं, समझ में नहीं आता.’’

अम्मी की बात सुनते ही रुखसार चौंकी, ‘‘सायरा घर से भाग गई? किस के साथ?’’

‘‘मुझे क्या पता कि वह किस के साथ भागी है?’’ इतना कहते ही भूरी ने कहा, ‘‘अब तू ही उस का पता लगाती रहना. मैं तो शमीमा को लेने आई थी, उसे ले कर जा रही हूं. जब भी तुझे टाइम मिले आ जना.’’

शमीमा उस वक्त रुखसार के पास ही बैठी थी. उसे अम्मी की बातों पर बिलकुल विश्वास नहीं हो रहा था. डर की वजह से वह उस के साथ घर जाना नहीं चाहती थी. उस ने साफ मना कर दिया कि वह अम्मी के साथ काशीपुर नहीं जाएगी. शमीमा की बात सुनते ही भूरी आगबबूला हो उठी, ‘‘एक तो नाक कटा गई. अब तेरी बारी है. तेरा भी क्या पता कि तू यहां रह कर क्या गुल खिला रही है. इसलिए मैं इस वक्त तुझे यहां हरगिज नहीं छोड़ सकती. तेरी भलाई इसी में है कि तू जल्दी से तैयार हो कर मेरे साथ चल.’’

शमीमा ने उस के साथ जाने से साफ मना कर दिया तो भूरी गुस्से में अकेली ही काशीपुर चली आई. आरिफ ने जब देखा कि मां के साथ शमीमा नहीं आई है तो उसे बहुत गुस्सा आया. उस ने उसी समय रुखसार को फोन कर के उल्टासीधा कहा. तब रुखसार ने कहा कि शमीमा को साथ ले कर वह परसों काशीपुर पहुंच जाएगी. तीसरे दिन रुखसार शमीमा को साथ ले कर काशीपुर पहुंची तो उस ने वहां छोटी बहन फरीदा को भी परेशान देखा. रुखसार ने उस से उस की उदासी की वजह पूछी. लेकिन फरीदा ने अम्मी के सामने अपना मुंह बंद रखा. रुखसार को लग रहा था कि फरीदा किसी गहरे सदमे में है. उसे इस हालत में देख कर वह समझ चुकी थी कि उस के साथ जरूर कुछ न कुछ घटा है.

उसी दौरान रुखसार को घर में से दुर्गंध आती महसूस हुई तो उस ने चारों तरफ देखा, लेकिन उसे कहीं भी कुछ नहीं दिखाई दिया. उस ने अम्मी से भी इस बारे में जिक्र किया. जिस पर भूरी ने सफाई दी कि यह दुर्गंध उस के पड़ोस वाले घर से आ रही है. वहां कोई चूहा मर गया होगा. कुछ देर बातचीत करने के बाद रुखसार शमीमा को घर छोड़ कर हल्द्वानी चली गई. 23 मई, 2015 को भूरी किसी काम से अपने मायके भोजपुर गई थी. उसी दौरान मौका पाते ही फरीदा ने अपनी आंखों देखी बात शमीमा को सुना दी.  फरीदा ने बताया, ‘‘10 मई, 2015 को दोपहर की बात है. अम्मी ने मुझ से कहा था कि तू इन मुरगों को बाहर घुमा ला, ये घर में सारे दिन गंदगी करते हैं. जबकि उस वक्त बाहर बहुत तेज धूप थी. उन्होंने यह भी कहा था कि घर आने में जल्दीबाजी नहीं करना.

‘‘मेरे घर से निकलते ही उन्होंने घर के किवाड़ बंद कर लिए. उस वक्त सायरा घर में ही सो रही थी. देर बाद जब मैं घर आई तो घर के किवाड़ अंदर से बंद मिले. मुझे कुछ शंका हुई. उसी वक्त मैं ने आहिस्ते से बाहर वाली खिड़की पर लगी पौलीथिन हटा कर अंदर झांक कर देखा तो अम्मी और दोनों भाई आरिफ व नाजिम सायरा की चारपाई को घेरे खड़े थे. उन्हें इस तरह से खड़े देख कर मुझे डर लग रहा था. मैं वापस चली गई.

‘‘काफी देर बाद मैं फिर लौटी तो उस समय भी किवाड़ नहीं खुले थे. मैं ने डरते हुए दरवाजा खटखटाया तो अम्मी ने दरवाजा खोला. मुझे देखते ही वह बोली, ‘‘तू यहीं रहना. अभी अंदर नहीं आना. काफी देर बाद मुझे घर में जाने दिया. मुझे घर में सायरा दिखाई नहीं दी. पता नहीं इन लोगों ने सायरा के साथ क्या किया. उस दिन के बाद अम्मी और भाइयों ने मुझे टिन शैड की तरफ नहीं जाने दिया. अगले दिन मैं ने अम्मी से सायरा के बारे में पूछा तो मुझ से कहा कि वह घर से भाग गई है, तू उस के बारे में क्यों पूछ रही है, अपने काम से काम रख. फिर डर की वजह से मैं भी चुप हूं.’’

फरीदा की बातें सुनने के बाद शमीमा को भी शक हो गया कि कहीं अम्मी और भाइयों ने सायरा को मार तो नहीं डाला. अपनी शंका दूर करने के लिए शमीमा ने टिन शेड के नीचे की जमीन थोड़ी खोदी तो उसे बदबू तेज आती महसूस हुई. इस से उसे पूरा विश्वास हो गया कि सायरा की लाश वहीं पर दफन है. फरीदा ने उसी समय बड़ी बहन रुखसार को फोन कर के सारी हकीकत बताते हुए जल्दी से काशीपुर आने को कहा. खबर पाते ही रुखसार काशीपुर आ गई और थाने पहुंच कर इस की सूचना काशीपुर के थानाप्रभारी विनोद कुमार जेठा को दे दी. तब कहीं इस केस का खुलासा हो सका. सायरा को ठिकाने लगाने के बाद आरिफ शमीमा को भी मौत की नींद सुलाना चाहता था, लेकिन अम्मी के साथ आने से इनकार करने के कारण ही वह जिंदा बच सकी, वरना वह भी सायरा की तरह घर में ही मौत की नींद सो रही होती.

कहते हैं कि एक बार बाप दरिंदा हो सकता है, लेकिन माता कुमाता नहीं हो सकती. लेकिन यहां एक मां इतनी कू्रर हो सकती है, इस का अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता. लाश के सड़ने की किसी को बदबू न आए, इसलिए वह उस की कब्र पर अगरबत्ती जलाती रही. उस ने किसी को अहसास तक नहीं होने दिया कि जवान लड़की को घर में ही दफनाया हुआ है. लोगों से कहती रही कि सायरा अपने किसी प्रेमी के साथ भाग गई है. उन दोनों की निशानदेही पर पुलिस ने मुख्य अभियुक्त आरिफ को भी गिरफ्तार कर लिया. उस ने भी हत्या की पूरी कहानी पुलिस के सामने दोहरा दी. पुलिस ने तीनों अभियुक्तों भूरी, आरिफ और नाजिम को भादंवि की धारा 302/201/34 के तहत गिरफ्तार कर के 2 मई, 2015 को न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया.

मामले की तफ्तीश थानाप्रभारी विनोद कुमार जेठा कर रहे हैं. True Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित कथा में कुछ पात्रों के नाम परिवर्तित हैं.

Suspense Story: जहरीलों निगाहों का निशाना

Suspense Story: प्रगट मसीह ने सुमन से शादी सिर्फ इसलिए की थी, क्योंकि उस की मां के पास लाखों का मकान था. इस के बाद प्रगट ने उस मकान को हासिल करने के लिए ऐसा क्या किया कि उसे जेल जाना पड़ा?

‘‘सा हब, मेरे बेटे को ढूंढ दीजिए. मैं गरीब विधवा औरत हूं, मेरे बेटे के सिवाय मेरा कोई और सहारा नहीं है.’’ कृष्णा नामक एक विधवा औरत ने थाना सदर के अंतर्गत पड़ने वाली पुलिस चौकी मरांडो के प्रभारी बलबीर सिंह के पास जा कर गुहार लगाई. कृष्णा के साथ समाजसेवक सरदार प्रगट सिंह भी थे, जो ग्राम प्रधान भी थे. चौकीप्रभारी ने पूरी बात विस्तार से बताने के लिए कहा तो कृष्णा ने बताया कि वह न्यू गुरु तेगबहादुर नगर के मकान नंबर 15 में रहती है. काफी समय पहले उस के पति मगट सिंह की मृत्यु हो चुकी है. उस की 2 संताने हैं, एक 32 वर्षीय बेटा वीर सिंह, दूसरी 28 वर्षीया बेटी सुमन. 7 साल पहले सुमन की शादी प्रगट मसीह के साथ हुई थी.

कृष्णा ने आगे बताया, ‘‘मेरे घर पर केवल मैं और मेरा बेटा वीर सिंह ही रहते थे. 27 जुलाई, 2014 को वीर सिंह कोल्डड्रिंक पीने के लिए गली के कोने तक गया. उस के बाद लौट कर नहीं आया. मैं ने उस की तलाश उन जगहों पर कर ली है, जहां उस के मिलने की संभावना थी. इसलिए साहब, आप से निवेदन है कि आप मेरे बेटे को ढूंढने में मेरी मदद करें.’’

यह 28 जुलाई, 2014 की बात है. चौकीप्रभारी बलबीर सिंह ने समाजसेवक सरदार प्रगट सिंह और कृष्णा देवी के बयान के आधार पर वीर सिंह की गुमशुदगी दर्ज कर के उस की तलाश शुरू कर दी. लेकिन वह किसी नतीजे पर पहुंच पाते इस के पहले ही उन का तबादला हो गया. उन की जगह चौकी का प्रभार एएसआई निशान सिंह ने संभाला. निशान सिंह ने गुमशुदा वीर सिंह के फोटो की कौपी सभी थानों को भेज दी. लुधियाना व निकटवर्ती शहर के थानों को वीर सिंह का हुलिया बता कर वायरलैस मैसेज करवा दिए गए. इस के बावजूद वीर सिंह का कोई सुराग नहीं मिला.

निशान सिंह ने वीर सिंह के पड़ोसियों से भी पूछताछ की. उन के अनुसार वीर सिंह सीधासादा मंदबुद्घि इंसान था. अब तक की गई तफ्तीश से यह बात स्पष्ट हो गई थी कि वीर सिंह का अपहरण नहीं हुआ था. ऐसे में एक संभावना यह बनती थी कि मंदबुद्धि होने की वजह से वह खुद ही कहीं चला गया हो. इस के अलावा एक संभावना यह भी थी कि कहीं किसी दुश्मनी की वजह से किसी ने उसे न उठा लिया हो. बहरहाल, निशान सिंह ने समाजसेवक प्रगट सिंह से इस बारे में बात की तो एक नई बात यह पता चली कि लापता होने वाले दिन वीर सिंह अपने बहनोई प्रगट मसीह के साथ बाइक पर बैठ कर कहीं जाते देखा गया था. मोहल्ले में की गईं पूछताछ के दौरान एक प्रौपर्टी डीलर ने यह भी बताया कि कृष्णा देवी अपना मकान बेचना चाहती थीं.

इस बारे में निशान सिंह ने जब कृष्णा से पूछा तो उस ने इस बात से इनकार करते हुए बताया कि उस ने अपना मकान बेचने की बात कभी नहीं की. हां, उस का दामाद प्रगट मसीह उस पर मकान बेचने के लिए दबाव जरूर डाल रहा था. यहां तक कि उस का बेटा वीर सिंह भी इस बात का विरोध कर रहा था. इन 2 लोगों के बयानों से इस केस की जांच को नई दिशा मिल गई. निशान सिंह का शक विश्वास मे बदलने लगा. उन्होंने प्रगट मसीह की तलाश काररवाईं तो वह घर से फरार मिला. इस के बाद पुलिस ने उस की तलाश में छापेमारी शुरू कर दी. आखिर कई महीनों की मेहनत के बाद 25 मार्च, 2015 को प्रगट मसीह को मलेरकोटला रोड से गिरफ्तार कर लिया गया. उस से पूछताछ के बाद निशान सिंह ने उस की निशान देही पर गांव लोहारा में दबिश दे कर उस के साथी निर्मल सिंह उर्फ मिंटू को भी गिरफ्तार कर लिया.

गिरफ्तारी के बाद हुई पूछताछ के दौरान दोनों ने हर अपराधी की तरह अपने आप को निर्दोष बताया, लेकिन जब निशान सिंह ने थोड़ी सख्ती की तो दोनों की जुबान खुल गई. अपना अपराध स्वीकार करते हुए प्रगट मसीह ने जो कहानी बताई, वह प्रेम और विश्वास में धोखा देने वाले एक धूर्त इंसान की शर्मनाक कहानी थी. मगट सिंह व उन की पत्नी कृष्णा देवी निहायत ही शरीफ और सीधेसादे लोग थे. उन की 2 संतानें थीं, बेटा वीर सिंह और बेटी सुमन. वीर सिंह मंदबुद्धि था. उसे पागल कहना बेईमानी होगी, क्योंकि वह जो भी काम करता था, उसे भले ही धीरेधीरे करे, लेकिन काफी सोचविचार कर करता था. मगट सिंह ने दोनों बच्चों की पढ़ाई का पूरा खयाल रखा. उस वक्त वह पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी में लिपिक थे. घरपरिवार अच्छे से चल रहा था.

सन 2001 में मगट सिंह अपनी नौकरी से रिटायर हो गए. रिटायरमेंट में उन्हें अच्छाखासा पैसा मिला. उन पैसों से उन्होंने गिल गांव की हरगोविंद कालोनी में 100 गज का प्लौट खरीद कर अपना मकान बना लिया. फिलहाल इस मकान की कीमत लाखों में है. सब कुछ ठीकठाक चल रहा था कि अचानक एक सुबह सैर करते समय प्रगट सिंह फिसल कर गिर गए. उन की रीढ़ की हड्डी में गंभीर चोट आई. वह बिस्तर पर पड़ गए. उन का चलनाफिरना बंद हो गया. वक्त का पहिया ऐसा उल्टा घूमा कि उन्होंने एक बार बिस्तर पकड़ा तो फिर वह उन की मौत के बाद ही छूट पाया. उन की मौत के बाद कृष्णा देवी ने अकेले ही अपने दम पर बच्चों की परवरिश की. मंदबुद्धि होने के कारण वीर सिंह ज्यादा नहीं पढ़ सका, इसलिए कृष्णा ने उसे मशीन का काम सीखने पर लगा दिया.

कृष्णा की बेटी सुमन जवान हो चुकी थी. उसी दौर में उस की मुलाकात प्रगट मसीह से हुई. दरअसल सुमन को पास वाले गांव में अपनी किसी सहेली के विवाह समारोह में जाना था. वह मेन रोड पर खड़ी हो कर आटो का इंतजार कर रही थी. सर्दियों के दिन थे, ऊपर से हलकीहलकी बूंदाबांदी हो रही थी. काफी इंतजार के बाद भी उसे कोई साधन नहीं मिला. बारिश की वजह से सुमन के कपड़े भीगने लगे थे कि तभी सुमन के पास एक कार आ कर रुकी. ड्राइविंग सीट पर बैठा युवक प्रगट मसीह था. उस ने सुमन से बड़ी शालीनता से कहा, ‘‘आइए, मैं आप को छोड़ देता हूं.’’

संकोचवश सुमन ने एक बार तो मना कर दिया, पर मौसम का मिजाज और प्रगट मसीह की शालीनता देख कर उस ने बात मान ली. वह कार में बैठ गई. प्रगट मसीह ने उसे उस की सहेली के गांव पहुंचाया ही नहीं, बल्कि अगले दिन सहेली के घर से वापस भी ले आया. प्रगट मसीह के इस व्यवहार से सुमन काफी प्रभावित हुई. इस मुलाकात के बाद रास्ते में आतेजाते कहीं न कहीं प्रगट मसीह सुमन को दिखाई देने लगा. दोनों मिलते तो 2-4 बातें भी हो जातीं. सुमन भी धीरेधीरे उस की ओर आकर्षित होने लगी. फिर जल्दी ही वह दिन भी आ गया जब एक दिन दोनों ने अपनेअपने प्यार का इजहार कर दिया.

इस के बाद दोनों की रोजाना कहीं न कहीं मुलाकातें होने लगीं. जल्दी ही दोनों ने शादी करने का फैसला कर लिया. सुमन की मां कृष्णा इस के पक्ष में नहीं थी, वह उस की शादी अपनी बिरादरी में करना चाहती थी, किसी ईसाई के साथ नहीं. लेकिन सुमन हर हाल में प्रगट मसीह से ही शादी करना चाहती थी. अंतत: उस ने मां से विद्रोह कर के अप्रैल, 2007 में प्रगट मसीह के साथ कोर्टमैरिज कर ली. दरअसल, कहानी वह नहीं थी, जो प्रत्यक्ष में दिखाई दे रही थी. हकीकत में प्रगट मसीह लोहरा गांव निवासी पाल सिंह का बेटा था. वह बचपन से ही आवारा और आपराधिक प्रवृत्ति का था, वह बिना हाथपैर हिलाए खूब पैसा कमाना चाहता था. युवा होते ही उस ने आवारा दोस्तों की एक मंडली बना ली थी और उन के साथ शराबजुआ चोरीचकारी आदि करता रहता था.

सुमन से उस की मुलाकात इत्तफाक से नहीं, बल्कि सोचीसमझी योजना के तहत हुई थी. प्रगट ने कालोनी के बसस्टौप पर सुमन को खड़ी देखा था. उस ने अपने दोस्तों से जब उस के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया, ‘‘गुरु, यह सोने का अंडा देने वाली मुर्गी है.’’

‘‘क्या मतलब?’’

‘‘मतलब यह कि इस की मां विधवा है. भाई मंदबुद्धि और इन का मकान लाखों रुपए का है. अगर इस चिडि़या को जाल में फांस लो तो समझो लाखों रुपए का मकान तुम्हारा.’’

बस, उसी दिन से वह सुमन को अपने जाल में फांसने की योजना बनाने लगा. सुमन अपनी सहेली की शादी में पास के गांव जाएगी, यह बात प्रगट मसीह को पहले ही पता लग गई थी. इसीलिए वह सुमन को लिफ्ट देने और उस पर अपना प्रभाव जमाने के लिए अपने एक दोस्त की कार मांग लाया था. बहरहाल, सुमन से शादी होने के बाद प्रगट मसीह सुमन के घर पर ही रहने लगा. जबकि यह बात न सुमन को अच्छी लगती थी और न उस की मां को. इस बात को ले कर घर में क्लेश शुरू हो गया. धीरेधीरे झगड़ा इतना बढ़ा कि मजबूरन प्रगट मसीह को अपनी ससुराल छोड़ कर अपने घर लोहारा जाना पड़ा.

समय अपनी गति से चलता रहा. इसबीच एकएक कर सुमन 5 बच्चों की मां बन गई. प्रगट मसीह को जब भी मौका मिलता, वह अपनी सास कृष्णा देवी पर दबाव डालता कि वह यह मकान बेच कर चंडीगढ़ रोड पर मकान ले ले. पर कृष्णा उस की बातों में कभी नहीं आई. इस के बावजूद प्रगट ने इलाके के कई प्रौपर्टी डीलरों को मकान बेचने के लिए कह रखा था. प्रगट मसीह और सुमन की शादी को लगभग 7 साल हो चुके थे. मकान हथियाने के जिस मकसद से प्रगट सुमन से शादी की थी, वह अभी तक पूरा नहीं हुआ था. आखिर उस ने अपना मकसद पूरा करने के लिए एक योजना बनाई. अपनी योजना में उस ने अपने दोस्त निर्मल सिंह उर्फ मिठू को भी शामिल कर लिया था. निर्मल पेंटर का काम करता था. प्रगट ने योजना पूरी होने के बाद उसे एक लाख रूपए देने का वादा किया था.

अपनी योजना को अंजाम देने के लिए प्रगट ने 28 जुलाई, 2014 की तारीख तय की और निर्मल के साथ घात लगा कर अपनी ससुराल वाली गली के नुक्कड़ पर बैठ गया. उस समय शाम का वक्त था और वह जानता था कि उस का साला इस वक्त टहलने और कोल्डड्रिंक पीने गली से निकल कर रोड तक आता है. वीर सिंह जैसे ही दुकान पर कोल्डड्रिंक पी कर मुड़ा, प्रगट मसीह ने उसे आवाज दे कर रोक लिया और घुमाने के बहाने बाइक पर बैठा कर नहर की ओर चल दिया. बाइक प्रगट मसीह खुद चला रहा था. बीच में वीर सिंह और पीछे निर्मल सिंह बैठा था. रास्ते में बाइक रोक कर प्रगट मसीह ने शराब खरीद ली.

घवदी नहर पर आगे जा कर प्रगट मसीह ने बाइक रोक ली उस के बाद वहीं बैठ कर तीनों ने शराब पी. वीर सिंह को नशा हो गया तो निर्मल सिंह की मदद से उस ने अंगोछे से वीर सिंह का गला घोंट कर उस की हत्या कर दी. तत्पश्चात दोनों ने मिल कर उस की लाश नहर में फेंक दी और वापस लौट आए. किसी को उस पर शक न हो, इस के लिए वह अपनी सास व प्रधान के साथ मिल कर वीर सिंह की तलाश का नाटक करता रहा. एएसआई निशान सिंह ने प्रगट मसीह और निर्मल सिंह के बयान दर्ज कर के दोनों को 25 मार्च, 2015 को मैडम अमनदीप कौर की अदालत में पेश कर के 2 दिनों के पुलिस रिमांड पर लिया. रिमांड अवधि के दौरान दोनों अभियुक्तों की निशानदेही पर मृतक वीर सिंह का पर्स, आधार कार्ड, अंगोछा और बाइक बरामद कर ली गई.

रिमांड की अवधि समाप्त होने पर 27 मार्च, 2015 को दोनों को पुन: अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जिला भेज दिया गया. चूंकि अब वीर सिंह की हत्या हो चुकी थी, इसलिए अपहरण की धारा 365 के साथ हत्या की धारा 302, 201, 34 और जोड़ दी गईं. एएसआई निशान सिंह ने नहर में बड़ी दूर तक जाल डलवा कर वीर सिंह की लाश तलाशने का प्रयास किया, पर कथा लिखे जाने तक लाश बरामद नहीं हो सकी थी. शायद पानी के तेज बहाव के कारण लाश दूर तक चली गई थी. Suspense Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित