UP Crime: सीमा के स्वप्न संसार में सेंध

UP Crime: महत्त्वाकांक्षी होना बुरी बात नहीं है, लेकिन अतिमहत्त्वाकांक्षा हमेशा कष्टदायी होती है. सीमा अगर खुद पर नियंत्रण रख कर अपने पति पर भरोसा रखती तो उस का और उस के परिवार का ऐसा भयानक अंजाम कभी न होता.

उत्तर प्रदेश के जिला इटावा के कस्बा बकेवर के रहने वाले रामलाल तोमर के परिवार में पत्नी के अलावा एक बेटा व 3 बेटियां थीं, जिन में सीमा सब से बड़ी थी. वह अपने भाई बहनों से हर मामले में तेज थी. पढ़नेलिखने में भी वह पीछे नहीं थी. उस ने हाईस्कूल की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास की थी. सीमा जब जवान हुई तो उस के मातापिता को उस की शादी की चिंता होने लगी.  रामलाल तोमर ने सीमा के लिए रिश्ता देखना शुरू किया तो औरैया के मोहल्ला आर्यनगर का राकेश उर्फ राजू उन्हें पसंद आ गया. पेशे से ड्राइवर राजू का अपना मकान था. देखने में भी वह हृष्टपुष्ट था. उस का एक ही भाई था नरेश, जो प्राइवेट नौकरी करता था. लड़का भी ठीक था और उस का परिवार भी. रामलाल तोमर ने बेटी का रिश्ता उस के साथ तय कर दिया.

सीमा खूबसूरत लड़की थी. राकेश को भी वह पसंद आ गई. फलस्वरूप दोनों की शादी हो गई. यह सन 2006 की बात है. गोरा रंग, भरा हुआ चेहरा, कटीले नैननक्श, छरहरा बदन, ऊपर से भरपूर जवानी. राकेश को लगा जैसे सीमा के रूप में उसे हूर मिल गई है. वह उस की खूबसूरती में डूब कर रह गया. सीमा भी राकेश को पा कर खुश थी. दोनों का जीवन हंसीखुशी से कटने लगा. परिवार की स्थिति के अनुसार जीवन की लगभग हर आर्थिक जरूरत पूरी हो रही थी. विवाह के शुरुआती दिनों में तो पतिपत्नी दोनों खूब खुश थे, लेकिन जब जिम्मेदारियां बढ़ीं तो धीरेधीरे दोनों का एकदूसरे के प्रति आकर्षण कम होने लगा. वक्त के साथ राकेश को लगने लगा कि सीमा कुछ ज्यादा ही महत्त्वाकांक्षी औरत है.

वजह यह थी कि अब वह राकेश से तरहतरह की फरमाइशें करने लगी थी. जबकि ड्राइवरी कर के अपने परिवार का बोझ उठाने वाले राकेश के लिए उस की फरमाइशें पूरा करना आसान नहीं था. लेकिन यह बात सीमा की समझ में नहीं आती थी. वह पति की मजबूरी समझने के बजाय उस से लड़ाईझगड़ा करने लगती थी. सीमा के इसी स्वभाव की वजह से दोनों के दांपत्य जीवन में कटुता आने लगी. फिर भी विषम परिस्थितियों के बावजूद वक्त अपनी चाल चलता रहा. इस बीच सीमा एक बेटी हिना और एक बेटे रूपेश की मां बन गई थी.

सीमा अपने बच्चों का पालनपोषण अच्छी तरह से करना चाहती थी. वह उन्हें अच्छे स्कूल में पढ़ाना चाहती थी, लेकिन राकेश की सीमित आय में यह संभव नहीं था. सीमा बच्चों की परवरिश और उन की पढ़ाईलिखाई को ले कर अकसर पति से झगड़ती रहती थी. रोजरोज के झगड़े से राकेश तनाव में रहने लगा था. इस तनाव को दूर करने के लिए उस ने शराब का सहारा लेना शुरू कर दिया था. दिन भर के कामकाज से थका मादा राकेश अब ज्यादातर नशे में धुत हो कर देर रात घर लौटता था. घर आ कर वह थोड़ाबहुत खाना खाता और बिस्तर पर लुढक जाता. सीमा अभी जवान थी, उस की रातें बिस्तर पर करवटें बदलते गुजरतीं. उस का मन करता था कि उस का पति उसे प्यार करे, उस की शारीरिक जरूरतों को पूरा करे. लेकिन राकेश की उपेक्षा की वजह से वह मन मार कर रह जाती थी.

आर्यनगर मोहल्ले में ही सीमा के घर से कुछ दूरी पर सुरेश शर्मा का अपना मकान था, जहां वह सपरिवार रहता था. सुरेश शर्मा प्रौपर्टी डीलर था, साथ ही जरूरतमंदों को ब्याज पर पैसा भी देता था. उस ने अपने घर के भूतल पर प्रौपर्टी डीलिंग का औफिस बना रखा था. उस का काम अच्छा चल रहा था. एक दिन अचानक सीमा की बेटी हिना की तबियत खराब हो गई. उसे नर्सिंगहोम में भरती कराना पड़ा. सीमा को पैसों की जरूरत थी, इसलिए वह अपने पति राकेश के साथ प्रौपर्टी डीलर सुरेश शर्मा के औफिस जा पहुंची. खूबसूरत सीमा को देख कर सुरेश के दिल में हलचल मच गई. उस ने आने का कारण पूछा तो सीमा बोली, ‘‘शर्माजी, मेरी बेटी हिना अस्पताल में भरती है. मुझे 10 हजार रुपए चाहिए.’’

सुरेश शर्मा गोरी रंगत व तीखे नयननक्श वाली सीमा के चेहरे पर नजरें गड़ाते हुए बोला, ‘‘मैडम, आप जरूरतमंद हैं और मैं जरूरतमंदों को कभी निराश नहीं करता, लेकिन आप को मूल के साथसाथ ब्याज भी देना होगा.’’

‘‘यह मेरे पति राकेश हैं, ड्राइवर की नौकरी करते हैं. हम आप की पाईपाई चुका देंगे.’’ सीमा ने गारंटी सी दी.

सुरेश शर्मा सोचने लगा, ‘इतनी खूबसूरत औरत एक मामूली ड्राइवर की बीवी. इसे तो किसी उस जैसे दौलतवाले की होना चाहिए.’

सोचविचार कर शर्मा सीमा के पति से मुखातिब हुआ, ‘‘क्यों भाई राजू, तुम्हारी बीवी जो वादा कर रही है, उसे पूरा करोगे?’’

‘‘हां शर्माजी, मैं वादा करता हूं कि आप का पैसा ब्याज समेत चुका दूंगा.’’ राजू हाथ जोड़ कर बोला.

‘‘फिर ठीक है.’’ कह कर शर्मा ने 10 हजार रुपए सीमा को दे दिए. सीमा तो पैसे ले कर चली गई, लेकिन सुरेश शर्मा के दिल में खलबली मचा गई. दरअसल वह पहली ही नजर में उस के दिलोदिमाग पर छा गई थी. फलस्वरूप वह उसे हासिल करने के लिए तानेबाने बुनने लगा. उस ने थोड़ी छानबीन की तो उसे पता चला कि सीमा का पति राकेश शराब का लती है. सुरेश शर्मा खुद भी शराब का शौकीन था. उस ने कोशिश की तो पीनेपिलाने के नाम पर जल्द ही दोनों की दोस्ती हो गई. बस फिर क्या था, दोनों की राकेश के घर में महफिल जमने लगी. पीनेपिलाने के दौरान सुरेश शर्मा की नजरें सीमा पर ही टिकी रहती थीं.

30 वर्षीया सीमा 2 बच्चों की मां जरूर थी, लेकिन उस की खूबसूरती में कोई कमी नहीं आई थी. उस का गोरा रंग, मांसल शरीर तथा बड़ीबड़ी आंखें किसी को भी अपनी ओर आकर्षित कर सकती थीं. वह सजसंवर कर आंखों पर काला चश्मा पहन कर जब घर से निकलती तो किसी हीरोइन से कम नहीं लगती थी. अधेड़ उम्र का सुरेश शर्मा सीमा का दीवाना बन गया था. अपनी दीवानगी के चलते जबतब उस ने सीमा के घर आनाजाना शुरू कर दिया था. वह जब भी आता, बच्चों और सीमा के लिए कुछ न कुछ ले कर आता. वह सीमा से लच्छेदार बातें करता, जो उसे बहुत अच्छी लगतीं. रहीबची कमी उस के लाए उपहार पूरी कर देते. फलस्वरूप धीरेधीरे वह भी सुरेश शर्मा की ओर आकर्षित होने लगी.

सीमा महत्त्वाकांक्षी औरत थी. उसे लगा कि धनाढ्य सुरेश शर्मा के माध्यम से उस की महत्त्वाकांक्षा पूरी हो सकती है. एक रोज जब सुरेश शर्मा उस के घर आया तो वह उस के सामने खुलेपन से पेश आई. बातोंबातों में उस ने कहा, ‘‘शर्माजी, मेरी एक चाहत है. अगर आप चाहें तो पूरी कर सकते हैं.’’

सही मौका देख सुरेश शर्मा उस का हाथ पकड़ कर बोला, ‘‘बोलो, क्या चाहती हो?’’

‘‘मेरे पति राकेश दूसरे की वैन चलाते हैं. नौकरी से घर का खर्चा नहीं चल पाता. मैं चाहती हूं कि आप उन्हें एक वैन खरीदवा दें. कमाई का आधा रुपया वह आप को देंगे और बाकी रुपए से घर का खर्च चलता रहेगा.’’

सीमा की डिमांड बड़ी थी. सुरेश शर्मा खामोश हो गया. वह मन ही मन सोचने लगा, ‘सीमा वाकई चालाक औरत है. अभी पिछला कर्ज चुका नहीं पाई, दूसरी बड़ी डिमांड कर दी. लेकिन वह भी प्रौपर्टी डीलर है. घाटे का सौदा नहीं करेगा. सीमा कर्ज नहीं चुका पाएगी तो वह उस के शरीर से वसूल कर लेगा.’

सुरेश शर्मा को खामोश देख कर सीमा ने पूछा, ‘‘क्या बात है शर्माजी, आप को तो सांप सूंघ गया. कोई जोरजबरदस्ती नहीं है. मैं तो वैसे ही आप की एहसानमंद हूं. आप ने मदद न की होती तो पता नहीं मेरी बेटी का क्या हाल होता.’’

‘‘नहीं…नहीं सीमा, तुम निराश मत हो. तुम्हारी चाहत पूरी होगी.’’ इस के बाद महीना बीतते सुरेश शर्मा ने सीमा के पति राकेश को वैन खरीद कर दे दी. वैन पा कर राकेश शर्मा खुशी से झूम उठा. उस ने वैन को एक अंगे्रजी माध्यम स्कूल में अटैच करा लिया. दिन में वह बच्चों को ढोता और रात में शादी समारोह या बुकिंग पर चला जाता. इस तरह वह दोहरी कमाई करने लगा. कमाई बढ़ी तो घर की आर्थिक स्थिति भी ठीक हो गई. सुरेश शर्मा वैन की कमाई के रुपए लेने अकसर सीमा के घर आता रहता था. पहले वह आता था तो गंभीर बना रहता था. लेकिन अब वह सीमा से हंसीमजाक के साथ उस के शरीर से हलकीफुलकी छेड़छाड़ भी कर लेता था. सीमा न उस के मजाक का बुरा मानती थी, न शारीरिक छेड़छाड़ का.

कहते हैं, औरत मर्द की निगाहों की बेहद पारखी होती है. सीमा भी समझ गई थी कि प्रौपर्टी डीलर सुरेश शर्मा उस से क्या चाहता है. सीमा का पति बिस्तर पर उस का साथ नहीं देता था. वह शराब पी कर देर रात घर आता और खापी कर चारपाई पर लुढ़क जाता. वह रात भर तड़पती रहती. यही वजह थी कि जब सुरेश शर्मा ने उस से शारीरिक छेड़छाड़ शुरू की तो उस ने उसे रोकने की कोई कोशिश नहीं की. एक दिन एकांत पा कर सुरेश शर्मा ने जब सीमा को छेड़ा तो वह स्वयं को रोक नहीं सकी और मुसकराते हुए पूछ लिया, ‘‘शर्माजी, आप चाहते क्या हैं?’’

‘‘मैं तो तुम्हें चाहता हूं.’’ सुरेश शर्मा ने आगे बढ़ कर सीमा के कंधों पर हाथ रखते हुए मादक स्वर में कहा. उस वक्त उस के स्वर में ही नहीं, आंखों में भी मादकता तैर रही थी. सीमा चाह कर भी सुरेश शर्मा के हाथ को अपने कंधों से नहीं हटा सकी. सुरेश शर्मा का हौसला बढ़ा तो वह उस के शरीर से छेड़छाड़ करने लगा. फिर उस ने सीमा को अपनी बांहों में भर लिया. सीमा भी उस से लिपट गई. इस के बाद दोनों तभी अलग हुए, जब उन के चेहरों पर पूर्ण संतुष्टि के भाव उभर आए.

सुरेश शर्मा और सीमा के बीच जब एक बार नाजायज रिश्ते बन गए तो फिर यह सिलसिला दिनोंदिन बढ़ता ही गया. जब भी मौका मिलता, दोनों एकदूसरे में समा जाते. शर्मा से शारीरिक सुख मिलने लगा तो सीमा ने पति को दिल से ही निकाल दिया. वह केवल प्रौपर्टी डीलर सुरेश शर्मा की हो कर रह गई. कहते हैं, पाप कितना भी छिपा कर किया जाए, एक न एक दिन उजागर हो ही जाता है. धीरेधीरे सुरेश शर्मा और सीमा के अवैध रिश्तों को ले कर पासपड़ोस में तरहतरह की चर्चाएं होने लगीं. जब इस बात की भनक राकेश तोमर को लगी तो उस का माथा ठनका. उसे अपनी बीवी पर शक तो पहले से ही था, लेकिन लोगों की चर्चाओं ने उस के शक को पक्का कर दिया.

राकेश दोनों को रंगेहाथ पकड़ना चाहता था. इसलिए उस ने गुप्तरूप से सुरेश शर्मा और सीमा पर नजर रखनी शुरू कर दी. एक शाम राकेश यह कह कर घर से निकला कि वह वैन ले कर बुकिंग पर जा रहा है. अब वह सुबह तक आ पाएगा. राकेश के जाते ही सीमा ने सुरेश शर्मा को मोबाइल से यह जानकारी दे कर उसे घर बुला लिया. कुछ देर तक दोनों हंसीठिठोली करते रहे, फिर बिस्तर पर पहुंच गए. दोनों रंगरेलियां मना ही रहे थे कि दरवाजे पर दस्तक हुई. सीमा ने दरवाजा खोला तो सामने राकेश खड़ा था. उसे देख कर सीमा ने घबरा कर पूछा, ‘‘तुम तो सुबह आने को कह कर गए थे?’’

सीमा के अस्तव्यस्त कपड़े, उलझे बाल और घबराहट देख कर राकेश समझ गया कि कुछ न कुछ गड़बड़ जरूर है. वह सीमा को परे धकेल कर घर के अंदर कमरे में पहुंचा तो सुरेश शर्मा वहां मौजूद था. वह कपड़े पहन चुका था. शर्मा राकेश को देखते ही बोला, ‘‘तुम आ गए, दरअसल मुझे पैसों की सख्त जरूरत थी, इसलिए तुम्हारा इंतजार कर रहा था.’’

राकेश गुस्से में बोला, ‘‘शर्माजी, आज के बाद तुम मेरे घर में कदम भी नहीं रखोगे. पैसे मैं खुद देने आऊंगा. तुम्हारे कारण हमारी कितनी बदनामी हो रही है, इस का अंदाजा है तुम्हें? मैं तुम्हारे एहसान के बोझ तले दबा हूं, ऊपर से तुम्हारी उम्र का खयाल. वरना अब तक मेरे हाथ तुम्हारी गर्दन तक पहुंच गए होते.’’

राकेश के तेवर देख कर सुरेश शर्मा ने नजरें झुका लीं और वहां से चला गया. उस के जाते ही राकेश का सारा गुस्सा सीमा पर फूट पड़ा. उस ने उस की जम कर पिटाई की. सीमा चीखनेचिल्लाने लगी. पत्नी के साथ मारपीट कर के राकेश चारपाई पर जा कर लेट गया. कुछ देर में उसे नींद आग गई. जबकि सीमा रात भर दर्द से तड़पती रही. इस के बाद तो मारपीट का सिलसिला सा चल पड़ा. राकेश शराब तो पीता ही था, लेकिन अब वह कुछ ज्यादा ही पीने लगा. देर रात वह नशे में धुत हो कर आता. बातबेबात सीमा से उलझता और फिर उसे जानवरों की तरह पीटता. कभीकभी दोनों का झगड़ा घर से शुरू होता और सड़क पर आ जाता. पासपड़ोस के लोग बड़े मजे से दोनों का झगड़ा देखते. लेकिन सीमा की मदद के लिए कोई नहीं आता.

मारपीट और बदनामी के बावजूद सीमा ने सुरेश शर्मा का साथ नहीं छोड़ा. उसे जब भी मौका मिलता मोबाइल से बात कर के वह उसे बुला लेती और दोनों हमबिस्तर हो जाते. यह अलग बात थी कि अब वे सतर्कता बरतने लगे थे. लेकिन उन की सतर्कता के बावजदू एक दिन राकेश ने दोनों को फिर रंगेहाथों पकड़ लिया. उस दिन राकेश ने पहले सुरेश शर्मा की पिटाई की, उस के बाद सीमा को मारमार कर अधमरा कर दिया. सीमा कहीं उस के खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट न दर्ज करा दे, राकेश घर से गायब हो गया. इधर जब सुरेश शर्मा को इस बात का पता चला कि राकेश घर से गायब है तो वह सीमा का हालचाल जानने जा पहुंचा. सीमा उसे देख कर फफक कर रो पड़ी,

‘‘राकेश का जुल्म अब मुझ से बरदाश्त नहीं होता. उस ने पीटपीट कर मेरा पूरा शरीर काला कर दिया है. अब मैं उस से छुटकारा पाना चाहती हूं.’’

‘‘छुटकारा… मतलब… हत्या?’’ शर्मा चौंका.

‘‘हां, मेरे पति को मार डालो, वरना एक दिन वह हम दोनों को मार डालेगा.’’ सीमा ने मन की बात कह दी.

‘‘शायद, तुम ठीक कहती हो. लेकिन इस काम के लिए हम दोनों को प्रयास करना होगा. पैसा तो मैं खर्च कर सकता हूं, पर भरोसे का कोई आदमी चाहिए.’’ सुरेश शर्मा ने भी अपनी बात कह दी.

‘‘भरोसे का आदमी है, मैं उस की पत्नी से बात करती हूं.’’ सीमा ने कहा तो सुरेश शर्मा ने आश्चर्य से पूछा, ‘‘कौन है वह?’

‘‘मेरी सहेली छाया वर्मा का पति राजेश वर्मा.’’

‘‘सुपारी किलर राजेश वर्मा?’’ सुरेश ने चौंक कर पूछा.

‘‘हां, वही राजेश वर्मा, पर कितनी रकम लेगा, यह बात कर के बताऊंगी.’’

‘‘ठीक है, तुम बात करो. मैं पैसे का बंदोबस्त करता हूं.’’ शर्मा ने आश्वासन दिया.

इस के बाद सीमा शुक्ला टोला में रहने वाली अपनी सहेली छाया वर्मा से मिली और उस से पति से निजात दिलाने की बात कही. इस के लिए छाया वर्मा ने 2 लाख रुपए मांगे. लेकिन बातचीत के बाद एक लाख 60 हजार रुपए में सौदा तय हो गया. छाया वर्मा का पति राजेश वर्मा दिखावे के लिए तो कार ड्राइवर था, लेकिन असल में वह अपराधी था और पैसा ले कर हत्या जैसे जघन्य अपराध करता था. छाया वर्मा ने अपने पति राजेश वर्मा को राकेश उर्फ राजू तोमर की हत्या के लिए राजी कर लिया. सीमा ने सुरेश शर्मा की मुलाकात राजेश वर्मा व उस की पत्नी छाया वर्मा से करवाई और सुपारी किलर राजेश वर्मा को 20 हजार रुपए एडवांस दिलवा दिए. शेष रुपए काम हो जाने के बाद देने को कहा गया. सुपारी लेने के बाद राजेश वर्मा ने इस काम में अपने दोस्त कल्लू सक्सेना को भी शामिल कर लिया.

करीब एक सप्ताह तक इधरउधर घूमने के बाद राकेश घर लौट आया. अब वह पूरी तरह निश्चिंत था. क्योंकि सीमा ने पुलिस में कोई रिपोर्ट दर्ज नहीं कराई थी. उस ने बच्चों से प्यार भरी बातें कीं और सीमा के साथ भी सहज व्यवहार किया. यहां तक कि उस ने सीमा से मारपीट के लिए माफी भी मांग ली. सीमा के व्यवहार में भी बदलाव आ चुका था. दिखावे के लिए वह भी उस से प्यार करने लगी थी. राकेश को क्या मालूम था कि पत्नी का यह प्यार उस के लिए मौत की दस्तक है.

16 मार्च, 2015 की सुबह औरैया के कुछ लोगों ने शहर के पास वाली नहर के किनारे स्थित वीरेंद्र कुशवाहा के खेत में लगे ट्यूबवेल के कमरे के पास एक युवक की लाश पड़ी देख कर औरैया कोतवाली पुलिस को सूचना दी. सूचना मिलते ही कोतवाली प्रभारी अजय पाठक अपने सहयोगी उपनिरीक्षक मोहम्मद शाकिर व अनिल पांडेय के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. पाठक ने लाश पाए जाने की सूचना वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को दे दी और निरीक्षण में जुट गए. युवक की हत्या किसी तेज धार वाले हथियार से की गई थी. उस का गला आधे से ज्यादा कटा हुआ था. हाथ पर भी जख्म थे. मृतक की उम्र 35 साल के आसपास थी. जामातलाशी में उस के पास से ऐसा कुछ भी बरामद नहीं हुआ, जिस से उस का नामपता मालूम हो जाता. लाश को सैकड़ों लोगों ने देखा, लेकिन कोई भी मृतक को पहचान नहीं सका.

थानाप्रभारी अजय पाठक अभी लाश का निरीक्षण कर रहे थे कि सूचना पा कर एसपी मनोज तिवारी, एएसपी विपुल कुमार श्रीवास्तव और सीओ (सिटी) रमेशचंद्र भारतीय भी आ गए. उन्होंने डौग स्क्वायड को भी बुला लिया. वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने बारीकी से घटनास्थल का निरीक्षण किया और वहां मौजूद लोगों से पूछताछ की. लेकिन मृतक की पहचान नहीं हो सकी. खोजी कुत्ता भी लाश को सूंघ कर भौंकता हुआ नहर तक गया और वापस लौट आया. शिनाख्त न होने पर पुलिस ने लाश की फोटो वगैरह करा कर उसे पोस्टमार्टम हाउस भिजवा दिया. पुलिस अधीक्षक मनोज तिवारी ने मृतक और हत्यारों का पता लगाने के लिए एएसपी विपुल कुमार श्रीवास्तव के निर्देशन में एक सशक्त पुलिस टीम बनाई.

इस टीम में सीओ सिटी रमेशचंद्र भारतीय, कोतवाली प्रभारी निरीक्षक अजय पाठक, एसआई मोहम्मद शाकिर, अनिल पांडेय तथा सर्विलांस टीम को शामिल किया गया. यह पुलिस टीम 4 दिनों तक पसीना बहाती रही, लेकिन मृतक की हत्या का रहस्य खुलना तो दूर उस की शिनाख्त तक नहीं हो सकी. 21 मार्च, 2015 को आर्यनगर मोहल्ला निवासी नरेश तोमर ने थाना कोतवाली आ कर बताया कि उस का भाई राकेश उर्फ राजू तोमर करीब एक हफ्ते से गायब है. इस पर अजय पाठक ने उसे मृतक की फोटो दिखाई. फोटो देखते ही नरेश फफक पड़ा. उस ने बताया कि यह फोटो उस के भाई राकेश की है.

लाश की शिनाख्त होते ही पुलिस हरकत में आ गई. पुलिस टीम ने नरेश से पूछताछ की तो उस ने अपने भाई की हत्या का संदेह प्रौपर्टी डीलर सुरेश शर्मा और उस के बेटे शिवम शर्मा पर जाहिर किया. पुलिस ने दोनों को हिरासत में ले लिया. थाना कोतवाली ला कर जब पुलिस टीम ने सुरेश शर्मा से पूछताछ की तो वह टूट गया और उस ने हत्या का जुर्म कबूल लिया. पूछताछ में सुरेश शर्मा ने बताया कि राकेश की पत्नी सीमा से उस के नाजायज संबंध बन गए थे. राकेश इन संबंधों का विरोध करता था और सीमा को बुरी तरह पीटता था. आजिज आ कर सीमा और उस ने राकेश की हत्या की साजिश रची. इस के बाद उन दोनों ने सुपारी किलर राजेश वर्मा और उस की पत्नी छाया वर्मा से बात की.

बातचीत के बाद सीमा ने अपने सुहाग का सौदा एक लाख 60 हजार में कर डाला और एडवांस के तौर पर 20 हजार रुपए भी दे दिए. राजेश वर्मा ने ही राकेश की हत्या की है. सुरेश शर्मा के बयान के आधार पर पुलिस टीम ने ताबड़तोड़ छापे मार कर राजेश वर्मा, उस की पत्नी छाया वर्मा और मृतक की पत्नी सीमा तोमर को गिरफ्तार कर लिया. थाना कोतवाली में जब उन से पूछताछ की गई तो सभी ने अपना जुर्म कबूल कर लिया. राजेश वर्मा ने कत्ल में प्रयोग किया गया गंड़ासा भी बरामद करा दिया, जिसे उस ने नहर के किनारे झाडि़यों से छिपा दिया था. राजेश के पास से पुलिस टीम ने 7500 रुपए भी बरामद कर लिए. शेष रुपए वह खर्च कर चुका था.

राजेश वर्मा ने पूछताछ में बताया कि सुपारी लेने के बाद उस ने यह काम करने के लिए अपने दोस्त कल्लू सक्सेना को शामिल कर लिया था. पीनेपिलाने के दौरान उस ने राजू से दोस्ती गांठ ली थी. 15 मार्च को वह राजेश उर्फ राजू को शहर के बाहर नहर पर ले गया और फिर खेत पर वहां पहुंचा, जहां ट्यूबवेल था. ट्यूबवेल के पास कमरा था. राकेश वहीं पसर गया. सही मौका देख कर उस ने कल्लू की मदद से राजू की गर्दन गंड़ासे से काट दी और गंड़ासा छिपा दिया. उस के बाद राकेश की हत्या की सूचना सुरेश शर्मा को दे दी. राकेश की हत्या कर के राजेश और कल्लू सक्सेना घर लौट आए थे.

चूंकि अभियुक्तों ने हत्या का जुर्म कबूल कर लिया था, इसलिए थानाप्रभारी अजय कुमार पाठक ने मृतक के भाई नरेश को वादी बना कर भादंवि की धारा 302/201/120बी, के तहत, सुरेश शर्मा, राजेश वर्मा, छाया वर्मा, सीमा तोमर और कल्लू सक्सेना के विरुद्ध रिपोर्ट दर्ज कर ली. 24 मार्च, 2015 को पुलिस ने अभियुक्त सुरेश शर्मा, राजेश वर्मा, छाया वर्मा तथा सीमा तोमर को औरैया की कोर्ट में रिमांड मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया, जहां से उन्हें जिला कारागार भेज दिया गया. कल्लू सक्सेना फरार था. UP Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारि

Emotional Hindi Story: एक बेबसी एक अफसाना

Emotional Hindi Story: बरसों बाद जमील अपने पुराने घर के दरवाजे पर खड़ा था. इस के बावजूद वह अपने घर की सांकल खटका कर अपनी मां से क्यों नहीं मिल सका. हर किसी की नजरें उस के थिरकते पैरों पर टिकी थीं. लाल बौर्डर का गुलाबी अनारकली कुर्ता, काला पैजामा और काला सितारे जड़ा दुपट्टा लहरालहरा कर वह लशकारे मार रहा था. उस के दोनों साथियों की आवाजें जोश में बुलंद हो रही थीं. तालियों की थाप ने एक समां सा बांध रखा था. उन के फिल्मी गाने की लय मदहोश करने वाली थी, इसलिए सुनने वालों के भी कदम थिरक रहे थे.

औरतें और मर्द दूल्हे के सिर पर बेल उतार कर रुपए उन दोनों की झोलियों में डाल रहे थे. कदमों की थिरकन ऐसी थी, जैसे पांवों में बिजली भरी हो. अब तक गोरे खूबसूरत चेहरे पर पसीने के कतरे चमकने लगे थे. अचानक सुर रुक गए, कदम थम गए और वह थकी सी दरवाजे से टिक कर बैठ गई. उसे भीड़भाड़, रुपएपैसे और इस तमाशे से घबराहट सी होने लगी. किसी मेहरबान हाथ ने उस का थका चेहरा देख कर शरबत का गिलास पकड़ा दिया. शरबत पी कर उसे ताजगी सी महसूस हुई. वह चुपचाप दरवाजे से बाहर निकल गई. खानापीना बाकी था. उन्हें भी खा कर जाने के लिए कहा गया था.

शादी ठेकेदार के बेटे की थी. उन्हें खास खबर भिजवा कर पेटलाद से बड़ौदा बुलवाया गया था. अच्छीखासी कमाई की उम्मीद थी. लेकिन बड़ौदा की जमीन पर कदम रखते ही जैसे उस का दिल बेकाबू होने लगा था. एक अजीब सी उदासी उस की रगरग में उतरने लगी थी. गलियां जानीपहचानी थीं, वह घना बरगद का पेड़, उस के पास पुराने मकान की ड्योढ़ी, लकड़ी के दरवाजे, लंबी, जंग लगी सांकल, वह दरवाजे से टेक लगा कर बैठ गई. अंदर ही अंदर घुटती बेआवाज सिसकियां आंसुओं के रूप में उमड़ पड़ीं. जुदाई का अनकहा दुख प्यासी ड्योढ़ी को भिगोने लगा. लाख दिल चाहा कि सांकल बजा दे, पर हिम्मत नहीं हुई. इस दरवाजे से निकलने का मंजर एक बार फिर आंखों के आगे ताजा हो गया.

इस दुनिया में मर्द औरत के अलावा एक तीसरी जिंस भी है. उन्हें क्यों बनाया गया, इस का राज तो बनाने वाला ही जाने. उन का अस्तित्व दुनिया वालों में कभी मजाक तो कभी घृणा तो कभी तरस की वजह बनता है. लोग इन्हें किन्नर, जनखा, हिजड़ा वगैरहवगैरह कह कर बुलाते हैं. इन किस्मत के मारों की अपनी कोई खुशियां नहीं होतीं. न उन की शादी होती है न बालबच्चे. हां, ये बेचारे दूसरों की शादियों या जन्म पर नाचगा कर दुआएं दे कर जरूर खुशियां हासिल करते हैं, उन्हीं खुशी में अपने अरमान पूरे करते हैं, दुआएं दे कर नजराना वसूल करते हैं. ज्यादातर लोग खुशी से इनाम देते हैं. कभीकभी झिड़कियां और गालियां भी मिलती हैं, पर इन की रोजीरोटी ही नाच, गाना और दुआएं देना है.

आज से 18-19 साल पहले इसी ड्योढ़ी के अंदर एक हंसतीमुसकराती मां एक गोरेचिट्टे, खूबसूरत बच्चे को रेशमी कपड़े पहनाए गोद में लिए बैठी थी और किन्नर नाचगा कर दुआएं दे कर नजराना वसूल रहे थे. सारे घर में खुशी का माहौल था. मेहमान खानेपीने में व्यस्त थे. खाने की खुशबू, लोगों से उसे जो बधाइयां मिल रही थीं, उस से बच्चे की मां मैमूना के चेहरे पर बेटे की मां होने का गर्व और ममता का नूर था. पहले बच्चे के जन्म पर जी भर कर खुशियां मनाई गईं. उस का जन्म शानदार याद बन गया. दूसरा बेटा सजल जमील के एक साल बाद पैदा हुआ. मैमूना को अहसास हो गया कि जमील में कुछ गड़बड़ है. वह आम बच्चों की तरह नहीं है. शरम और हिचक से वह जमील को सब से छिपा कर तैयार करती, किसी पर कुछ जाहिर न होने देती.

उस के बारे में सोचसोच कर दुखी होती, लेकिन जमाल का चेहरा देख कर दिल खुश हो जाता. गोरा रंग बड़ीबड़ी कजरारी आंखें, खड़ी नाक, गुलाब की पंखुडि़यों की तरह नाजुक गुलाबी होंठ, ऐसी मोहनी सूरत कि निगाह हटाने को जी न चाहे. इतना खूबसूरत बच्चा तीसरी जिंस से ताल्लुक रखता है, यह सोच कर उस का दिल खून के आंसू रोता. इस के बाद बच्चे की मोहनी अदाएं, मीठी आवाज सुन कर खुद को बहला लेती. जमील 5 साल का हुआ तो मैमूना ने बड़े अरमानों से उस का दाखिला सरकारी स्कूल में करा दिया. पर उस के दिल में यही डर बना रहता कि कोई उसे कुछ कह न दे. कुछ वक्त तो ठीकठाक गुजरा, लेकिन उस के बाद जब भी जमील स्कूल से आता, उस की आंखें गीली रहतीं. अनमने ढंग से थोड़ाबहुत खाना खाता तो कभी मां के आंचल में मुंह छिपा कर सिसकने लगता. उस के लिए मां की गोद पेड़ की घनी छांव की तरह थी.

जब बच्चे गलियों में खेलते, मस्ती करते, खामोश उदास जमील मां के पास बैठा काम में उस की मदद करता या चुपचाप कमरे में पड़ा रहता. उसे अहसास हो गया था कि वह दूसरे बच्चों से अलग है. उन के मजाक और तानों ने शायद उस चेता दिया था. ऐसे लोग जिन्हें समाज न मर्दों में गिनता है न औरतों में, उन के लिए पता नहीं क्यों जिंदगी का दायरा इतना तंग हो जाता है, जबकि न वे किसी का कुछ बिगाड़ते हैं न किसी को कुछ तकलीफ पहुंचाते हैं, फिर भी न जाने क्यों उन के लिए लोगों की नजरों में नफरत होती है. 3-4 सालों में ही स्कूल जमील के लिए एक दहशतगाह बन गया. जहां उस के मासूम जेहन पर अश्लील वाक्यों और तानों के हथौड़े पड़ते रहते थे.

कभी उस की चाल का तो कभी उस की आवाज का मजाक बनाया जाता. कभी उस की कमर पकड़ कर गोलगोल घुमा दिया जाता. आखिर उस की हिम्मत जवाब दे गई और उस ने मां से साफसाफ कह दिया कि अब वह स्कूल नहीं जाएगा. मैमूना उस का दुख समझती थी. सोचा कुछ दिनों में समझाबुझा कर राजी कर लेगी. मगर उस पर कयामत तब टूटी, जब छोटे बेटे सजल ने उस से कहा, ‘‘मैं भाई के साथ स्कूल नहीं जाऊंगा. अगर भाई उस स्कूल में पढ़ेगा तो मैं पढ़ाई छोड़ दूंगा. सब लड़के उस के साथ मेरा भी मजाक उड़ाते हैं, आप भाई को घर पर ही रखो.’’

यह सुन कर मैमूना सन्न रह गई. उस दिन देर रात तक मैमूना और उस का शौहर आसिम इस मसले का हल ढूंढ़ते रहे, पर मायूसी के सिवा कुछ हाथ न आया. आसिम भी जमील को बहुत प्यार करता था. उसे जमाने की गरम हवा से बचा कर रखना चाहत था. पर समस्या ऐसी थी कि वह कुछ करने में नाकाम था सिवाय आंसू भरी आंखों से देखने के. अब तो हमदर्दी भी बेअसर लगती थी. जमील ने स्कूल जाना बंद कर दिया था. अब वह सिर्फ मसजिद जाता था. मौलाना उसे बहुत पसंद करते थे. वह उसे कुरानशरीफ के साथसाथ दूसरी किताबें भी पढ़ाते थे, पर वहां भी कभी कोई मिल जाता, जो उस के दिल को चोट पहुंचा देता.

कभीकभी जमील जिंदगी से बेजार हो कर कहता, ‘‘अम्मी, आप ने मुझे क्यों पैदा किया? काश! पैदा होते ही मुझे मार दिया होता तो आज मुझे ये कष्ट नहीं सहने पड़ते. आखिर मेरे साथ ऐसा क्या हुआ है, जो लोग मुझे छेड़ते हैं, परेशान करते हैं? सजल को तो कोई कुछ नहीं कहता, वह तो अच्छा है.’’

मैमूना के पास बेटे के इन सवालों का कोई जवाब नहीं होता. उस दिन शाम को वह मसजिद से पढ़ कर लौट रहा था तो कुछ आवारा लड़कों ने उसे घेर लिया और छेड़ने लगे, ‘‘ओए जमीले जरा मटक कर दिखा. क्या लचक है तेरी कमर में क्या नजाकत है, क्या हुस्न है.’’

वह उन से जान छुड़ा कर ड्योढ़ी में दाखिल हुआ. हांफता हुआ वह दहलीज पर बैठ गया. उस का चेहरा आंसुओं से भीगा हुआ था. मां ने दौड़ कर उसे सीने से लगाया, आंचल से आंसू पोंछे. फिर दरवाजा खोल कर उन लड़कों पर चिल्लाने लगी, जो अपनी मस्ती में बरगद के नीचे खडे़ कहेकहे लगा रहे थे. वह कह रही थी, ‘‘नामुरादों, क्यों मेरे बच्चे के पीछे पड़े हो, उस मासूम ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है? खुदा का शुक्र अदा करो कि उस ने तुम्हें ठीकठाक पैदा किया, उस के अधूरे बंदों का क्यों मजाक उड़ाते हो?’’

जमील मां की बांहों में बेहोश हो गया. उसे तेज बुखार चढ़ गया. कई दिनों तक वह बुखार में तपता रहा. दूसरी ओर जमील की ज्यादा देखभाल और लाडप्यार से सजल का दिमाग अलग खराब रहता. धीरेधीरे उस की चिढ़ नफरत में बदल गई थी. मैमूना जैसे तलवार की धार पर खड़ी थी. वह उसे कैसे समझाए, कैसे अपनी मजबूरी बताए? काश! वह अपने मासूम बेगुनाह बच्चे को अपने सीने में छिपा सकती. बुखार के बाद से जमील काफी खामोश रहने लगा. वह घर में पड़ा रहता. मौलाना अकसर उस से मिलने आते, उसे दुनिया के दूसरे दुखी लोगों के बारे में बताते. अच्छीअच्छी जानकारी दे कर उसे ढांढ़स बंधाते. धीरेधीरे वह मसजिद जाने लगा और मौलाना से पढ़ने भी लगा. मांबाप ने राहत की सांस ली.

वक्त अपनी रफ्तार से गुजरता रहा. उस दिन सजल को किसी ने जमील के नाम से छेड़ दिया. फिर तो उस ने सारा घर सिर पर उठा लिया. जमील को बहुत बुराभला कहा. मैमूना ने बड़ी मुश्किल से उसे शांत किया. जमील उदास आंखों से आसमान देखता रहा, दिल ही दिल खुदा से शिकवा करता रहा. अजान की आवाज सुन कर वह मसजिद चला गया. दरवाजे पर शोर सुन कर मैमूना दौड़ी आई. दरवाजा खोला तो देखा 2-3 किन्नर खड़े थे. उन्होंने जमील को गोद में उठा रखा था. उसे कई जगह चोटें लगी थीं, नाक और मुंह से खून बह रहा था. उन्होंने बताया कि जमील नमाज पढ़ कर लौट रहा था तो कुछ बदमाश बच्चों ने उसे तंग करना शुरू कर दिया. बच्चों ने उसे नाचने के लिए कहा. जमील से बरदाश्त नहीं हुआ तो उस ने उन्हें पत्थर उठा कर मार दिया.

बस फिर तो कयामत आ गई. सब ने मिल कर जमील को पीटना शुरू कर दिया. उन्होंने देखा तो दौड़ कर उसे उन लड़कों से छुड़ाया और उठा कर यहां ले आए. मैमूना ने उन की मदद से उसे चारपाई पर लिटाया. उस के जख्मों को साफ कर के दवा लगाई. हल्दी डाल कर दूध पिलाया. आसिम भी खबर पा कर दुकान से भागा आया. बेटे को जख्मी और बेहाल देख कर परेशान हो गया. जमील बेबसी से मांबाप और उन किन्नरों को देख रहा था. सब खामोश और उदास थे. उन में से एक बड़ी उम्र का किन्नर अदब से बोला, ‘‘यह बच्चा हमारी तरह है, इसे आप के समाज के लोग जीने नहीं देंगे. यह हमारी अमानत है, इसे आप हमें दे दीजिए. इसे हम बड़े प्यार से रखेंगे. हमारे बीच बच्चे को कुछ अलग होने का अहसास भी नहीं होगा. यह हमारे साथ रचबस जाएगा, वरना यहां यह पिटता रहेगा और घुटघुट कर जीता रहेगा.’’

वह मैमूना और आसिम के आगे हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया. मैमूना बिलख उठी, ‘‘मैं अपने दिल के टुकड़े को कैसे तुम्हें दे दूं, मैं इस के बिना कैसे रहूंगी?’’

सजल चीख पड़ा, ‘‘अम्मी इसे जाने दो, यहां यह न खुद सुख से रहेगा और न हमें रहने देगा. हमेशा हमारी जिंदगी में परेशानी और जिल्लत बना रहेगा.’’

वही किन्नर फिर बोला, ‘‘साहब, आप क्यों इस मासूम बच्चे की जिंदगी नरक बना रहे हैं. यहां इसे सिवाय दुख के और कुछ नहीं मिलेगा. यह हमेशा हीनभावना में घुटता रहेगा.’’

आसिम ने भर्राई आवाज में कहा, ‘‘मैमूना, जमील को इन के साथ जाने दो. शायद वहां यह इन सब के साथ खुश रह सके. यहां तो हम इसे नफरत और तिरस्कार के अलावा और कुछ नहीं दे सकते. यही इस का नसीब है. हम कुदरत से नहीं लड़ सकते.’’

जमील को मैमूना ने सीने से लगा लिया. रो कर कहने लगी, ‘‘नहीं…नहीं, मैं अपने लाल को किसी को नहीं दे सकती.’’

आसिम ने उठ कर उस से जमील को अलग करते हुए कहा, ‘‘मैमूना, तुम्हारी ममता जमील को बरबाद कर देगी, इसे जाने दो.’’

जमील को खूब प्यार करने के बाद आसिम ने उसे किन्नरों को सौंप दिया. उन्होंने बड़े प्यार से किसी कीमती चीज की तरह उसे समेट लिया. जमील फटीफटी आंखों से अपनी किस्मत का फैसला होते देख रहा था, पर जुबां चुप थी, आंसू बह रहे थे. तीनों किन्नर उसे संभाल कर रिक्शे पर बैठ कर चले गए. ड्योढ़ी पर बैठी मां सिसकती रही. जहां वे लोग जमील को ले कर गए थे, वह कस्बा पेटलाद का पुराना सा मोहल्ला था. लकड़ी के फाटक वाला एक बड़ा सा पुराना घर था. एक अधेड़ उम्र किन्नर ने दरवाजा खोला. उस ने सफेद सादी सी साड़ी पहन रखी थी. जब उसे जमील के बारे में बताया गया तो वह प्यार से आगे बढ़ी और जमील का माथा चूम कर गले से लगाते हुए बोली, ‘‘मेरी सोहनी, मेरे चांद परेशान न हो, मुझे अपनी मां समझ. यह दुनिया बड़ी जालिम है. यह हमारा मजाक तो बना सकती है, पर हमें चैन से जीने नहीं दे सकती.’’

जमील के दिमाग में एक कौंध सा लपका, ‘‘क्या अब मुझे इन्हीं लोगों की तरह रहना होगा?’’ उस का मासूम दिल लरज उठा. फिर एक ढांढ़स सी बंधी कि जब लड़के की तरह जीना मुमकिन नहीं तो यही सही. भीगी आंखों से उस ने इस सच को स्वीकार कर लिया. जिंदगी का यही रूप सही.

‘‘न…न मेरी सोहनी रोते नहीं, यह कुदरत की तरफ से एक इम्तहान है, इस में तुझे कामयाब होना है, मुकाबला करना है. खुदा ने तुझे कुछ गुण भी दिए हैं. यह खूबसूरती यह मासूमियत, जिस्म में लचक.’’ एक बुजुर्ग किन्नर ने उसे तसल्ली दी.

अब जमील की जिंदगी एक नए ढर्रे पर चल पड़ी. धूमधाम से उस का नया नाम रखा गया, ‘सोहनी.’ ढेर से रेशमी रंगबिरंगे कपड़े दिलाए गए. मेकअप का सामान, आर्टीफिशियल गहने भी. इन चीजों से उस का हुस्न लड़कियों को मात देता था. एक डांस मास्टर रखा गया, जिस ने उसे अलगअलग अंदाज के डांस सिखाए. एक तो जमील खूबसूरत था, दूसरे नाजुक जिस्म और होशियार भी, इसलिए जल्दी ही नाचगाने में निपुण हो गया. इस के बाद वह किन्नरों के साथ जाने की तैयारी करने लगा. उस के लिए बढि़या कपड़े बनवाए गए, गहने लाए गए. किसी बड़े आदमी के यहां बरसों बाद बच्चा हुआ था, वे जमील को वहां ले कर गए.

उस के हसीन नाजुक जिस्म, उस के नाचगाने और अदाओं ने धूम मचा दी. खूब महफिल जमी. उस के डांस की फरमाइश किसी हाल न रुक रही थी. आखिर वह थक कर बैठ गई. उस दिन उन की आमदनी हजारों में हुई, कपड़े भी मिले. दूसरे किन्नर भी नाच रहे थे, पर जो बात जमील में थी, वह किसी और में न थी. वह उन लोगों के लिए बहुत लकी साबित हुआ. उन के यहां धन की बरसात होने लगी. उस घर में कुल 6 किन्नर रहते थे. बुर्जुग का नाम चंपा था, जो उन सब की गुरु थी. किन्नरों की बिरादरी का भी एक निजाम होता है. बड़ी उम्र का किन्नर दल का मुखिया होता है, उसे सब गुरु कहते हैं, साथ रहने वाले उस के चेले कहलाते हैं.

जब गुरु बनाया जाता है तो पगड़ी बांधने की रस्म होती है. दावत रखी जाती है, जिस में उन्हीं के बिरदारी के लोगों को बुलाया जाता है. मेहमान तोहफे और पैसे भेंट में देते हैं. शानदार जश्न होता है, जिस में नाचगाने की महफिल भी जमती है. गुरु का काम घर चलाना, खर्च देखना, चेलों को ट्रेंड करना होता है. बीमार पड़े तो दवा इलाज की भी जिम्मेदारी उसी की होती है. प्रोग्राम की तैयारी करवाना, कपड़ों का इंतजाम करना, सब वही करता है. खर्च के बाद हर एक की कमाई का हिसाब रखना, उन के पैसे जमा करना यानी कि पूरा मैनेजमेंट वही देखता है. सब से अच्छी बात यह है कि उन के यहां न कोई हिंदू होता है, न कोई मुसलमान. वहां सब एक हैं. सभी अधूरेपन के धागे से बंधे एक दूसरे के सुखदुख के साथी होते हैं.

कुछ अरसा जमील अपसेट रहा, फिर उस ने अपनी असलियत के साथ जीने का हुनर सीख लिया. उस के रूप और अच्छे नाचगाने की वजह से काफी कमाई होती थी, जो उस के नाम से बैंक में जमा हो रही थी. आज भी वह हाथ बढ़ा कर पैसे नहीं लेता था, उस के साथी ही पैसे जमा करते थे. आज सवेरे जब वह टैक्सी में बैठा तो उसे पता नहीं था कि वे लोग बड़ौदा जा रहे हैं. यहां पहुंच कर उस के जख्म हरे हो गए थे. उसी के मोहल्ले में ठेकेदार के यहां शादी थी. नाचगाने के बाद वह बेहाल, बेखुद सा अपने घर की ड्योढ़ी पर बैठा सिसक रहा था. उस के कांपते हाथों में इतनी ताकत नहीं थी कि वह हाथ उठा कर सांकल खटका देता.

वह फिर से दुखियारी मां को नया गम नहीं देना चाहता था. पीछे टैक्सी से गुलाबी और लाली उतर कर आगे आईं और उसे बांहों में समेट कर गाड़ी में बैठाया. जमील हसरत से अपने घर के दरवाजे को देखता रहा, जो किस्मत ने उस के लिए कब का बंद कर दिया था. Emotional Hindi Story

Love Story: एक बहन ऐसी भी

Love Story: आरती जिस अनमोल को प्यार करती थी, उस की बड़ी बहन पूजा भी उसी से प्यार करती थी. जबकि अनमोल सिर्फ आरती से प्यार करता था. अंत में पूजा ने ऐसा क्या किया कि अनमोल न उस का हो सका और न आरती का  पूजा ने अपनी छोटी बहन को डांटने वाले अंदाज में कहा, ‘‘आरती, मैं ने तुम से कितनी बार कहा कि पड़ोसियों के घरों में ताकझांक मत किया करो, पर तुम हो कि सुनती ही नहीं हो.’’

‘‘नहीं दीदी, मैं ताकझांक नहीं कर रही थी. बिल्ली रसोई की ओर जा रही थी, मैं तो उसे भगा रही थी.’’ आरती ने अपनी सफाई में कहा तो पूजा हलके गुस्से में बोली, ‘‘जानती हूं, कौन सी बिल्ली थी और कौन सा बिल्ला. तुम जल्दी से तैयार हो जाओ, टयूशन का वक्त हो गया है. और हां, सीधे जाना और सीधे लौट आना. रास्ते में बिल्लीबिल्ले का खेल मत खेलना, समझी.’’

आरती बड़बड़ाती हुई कमरे में चली गई और पूजा घर के कामों में लग गई. 17 वर्षीया आरती शर्मा और 20 वर्षीया पूजा शर्मा, दोनों सगी बहनें थीं. दोनों में बहुत प्रेम था. दोनों बहनों की तरह नहीं, बल्कि सखीसहेलियों की तरह मिलजुल कर रहती थीं, मिलबांट कर खाना, मिलबांट कर पहनना, सब कुछ साथसाथ चलता था. लेकिन पिछले करीब 2 महीनों से दोनों बहनें एकदूसरे को फूटी आंख नहीं सुहाती थीं, खास कर पूजा को आरती. आरती पूजा की आंखों में हर समय खटकती रहती थी, इसीलिए दोनों बहनों में छोटीछोटी बात को ले कर तकरार होने लगती थी. ऐसे में छोटी होने के नाते आरती को ही चुप रह जाना पड़ता था.

लुधियाना के औद्योगिक क्षेत्र ढंडारी खुर्द में वीरेंद्र शर्मा का परिवार रहता था. शर्माजी के परिवार में पत्नी संजू शर्मा व 3 बेटियां क्रमश: पूजा, आरती और कुसुम तथा 10 साल का एक बेटा था. वीरेंद्र शर्मा मूलत: समस्तीपुर, बिहार के निवासी थे. कई साल पहले वह यहां काम की तलाश में आए थे. बाद में जब उन्हें एक इलैक्ट्रिकल फैक्ट्री में काम मिल गया तो उन्होंने किराए का मकान लेकर अपनी पत्नी और बच्चों को भी लुधियाना बुलवा लिया. फिलहाल वह मकान नंबर 950, नजदीक सुजीत सिनेमा, बलदेव सिंह दा बेहड़ा, ढंडारी कला, लुधियाना में रह रहे थे. वीरेंद्र शर्मा ने अपनी पत्नी संजू को भी पास की एक एक्सपोर्ट गारमेंट की फैक्ट्री में अच्छे मासिक वेतन पर लगवा दिया था. परिवार का गुजरबसर बड़े मजे से हो रहा था. पूजा और आरती 10वीं में पढ़ रही थीं. छोटी बेटी कुसुम भी सातंवी में थी. घर में किसी प्रकार की कमी नहीं थी.

वीरेंद्र शर्मा की बड़ी बेटी पूजा पढ़ाई के साथसाथ एक डाक्टर के क्लिनिक पर नर्सिंग एंड कंपाउंडर का काम भी सीख रही थी. शर्मा दंपति के काम पर चले जाने के बाद पूजा ही छोटी बहनों एवं भाई का ख्याल रखती थी. उन के खानपान से ले कर स्कूल भेजने तक का जिम्मा उसी पर था, जिसे वह बखूबी निभा रही थी. लेकिन इन दिनों अपनी छोटी बहन आरती को ले कर पूजा काफी परेशान थी. उस की इस परेशानी का कारण था अनमोल. अनमोल जिस दिन शर्मा परिवार के पड़ोस में रहने आया था, उसी दिन से पूजा की मुश्किलें बढ़ गई थीं. अनमोल 20 साल का सुदंर और स्मार्ट युवक था, स्वभाव से हंसमुख और मिलनसार. वह मूलत: गया, बिहार का रहने वाला था और लुधियाना के फोकल प्वाइंट क्षेत्र की किसी फैक्ट्री में काम करता था.

अपने अच्छे व्यवहार के कारण वह जल्दी ही पूरे मोहल्ले वालों से घुलमिल गया था. मोहल्ले की कई जवान लड़कियां उसे पसंद करती थीं. जबकि अनमोल किसी की ओर आंख तक उठा कर नहीं देखता था. वह बस अपने काम से मतलब रखता था. सुबह जल्दी उठ कर वर्जिश करना, फिर स्नान वगैरह से फारिग हो कर खाना बनाना और साढ़े 8 बजे तक काम पर चले जाना. शाम को 7 बजे काम से लौट कर खाना बनाना, अपने कमरे में बैठ कर टीवी देखना, खाना और उस के बाद सो जाना. अनमोल की रोजाना की यही दिनचर्या थी. छुट्टी वाले दिन भी अधिकांश समय वह अपने कमरे में बैठ कर गुजारता था. आरती ने जब से अनमोल को देखा था, तभी से वह उस की दीवानी बन गई थी. उस की नजरें अक्सर अनमोल का पीछा किया करती थीं.

सुबह काम पर जाने से ले कर, छत पर एक्सरसाइज करने तक आरती अनमोल को देखा करती थी, इस के बावजूद अभी तक उसे अनमोल से बात करने का एक भी मौका नहीं मिला था. उस के मन में यह डर भी बना हुआ था कि कहीं अनमोल उस की किसी बात का बुरा न मान जाए. कमोबेश यही हालात अनमोल की भी थी. वह भी मन ही मन आरती को चाहने लगा था. आरती भी इतनी खूबसूरत थी कि कोई भी उसे देख कर नजरअंदाज नहीं कर सकता था. गोरा रंग, गोल चेहरा, पूरी पीठ पर घने बाल, गुदाज शरीर और गजगामिनी जैसी चाल. मोहल्ले के कई युवक उसे देख कर आहें भरा करते थे, परंतु आरती केवल अनमोल की ओर आकर्षित थी.

चाहत दोनों ओर थी. आखिर एक दिन अनमोल के दिल ने आरती के दिल की बात सुन ली. उस दिन अनमोल के मकान मालिक घर पर नहीं थे. आरती का परिवार भी कहीं गया हुआ था. दोनों अपनेअपने घरों में अकेले थे. आरती को यह मौका सही लगा. वह अपनी नोटबुक उठा कर गणित का एक सवाल पूछने के बहाने अनमोल के कमरे पर जा पहुंची. आरती को इस तरह अपने सामने, अपने कमरे में देख कर अनमोल चौंका. उस ने अपनी घबराहट पर काबू पा कर आरती से पूछा.‘‘आप,आप यहां..?’’

‘‘जी हां, आप से मिलना चाहती थी, इसलिए चली आई.’’

‘‘अच्छा किया आपने. आइए बैठिए.’’ अनमोल ने कहा तो आरती कमरे में बिछे एकमात्र तख्त पर बैठते हुए बोली,‘‘अनमोलजी, सच कहूं, मैं आई तो गणित का सवाल पूछने के बहाने हूं, पर सच्चाई यह है कि मैं आप से दोस्ती करना चाहती हूं,’’ आरती ने अनमोल की आखों में झांकते हुए कहा, ‘‘बताइए, करेंगे मुझ से दोस्ती?’’

आरती द्वारा दिए गए इस खुले निमंत्रण से अनमोल गदगद हो उठा. वह आरती के पास आ कर पर बैठ गया और उस का हाथ अपने हाथ में ले कर बोला, ‘‘आरती, मैं तुम्हें दिल की गहराइयों से प्यार करता हूं. अगर तुम मुझ से शादी करने का वादा करो तो मुझे तुम्हारी दोस्ती स्वीकार है, मैं केवल टाइम पास करने के लिए तुम से दोस्ती नहीं करना चाहता.’’

अनमोल की बातें सुन कर आरती जैसे उस की दीवानी हो गई. उस ने अपने आप को अनमोल की बाहों के  हवाले करते हुए मन की गहराइयों से कहा, ‘‘मैं मरते दम तक अपना प्यार निभाऊंगी अनमोल.’’

उस दिन के बाद से आरती और अनमोल के बीच प्रेम का अटूट बंधन बंध गया. इस के बाद आरती के स्कूल जाते समय रास्ते में, अनमोल के काम पर जाने या वापस लौटते वक्त, फिर सुबह छत पर उस के वर्जिश करते समय, जहां कहीं भी मौका मिलता, दोनों मिल लेते. इस मामले में दोनों बहुत ऐहतियात बरतते थे कि किसी को उन के प्रेम की भनक न लगे. पर इश्कमुश्क ऐसी चीजें हैं, जो कभी छिपाए नहीं छिपतीं. आखिर एक दिन उन दोनों की प्रेम कहानी की भनक आरती की बहन पूजा को लग ही गई. एक बार अनमोल के मकान मालिक 2 दिनों के लिए शहर से बाहर गए हुए थे. शर्मा दंपति अपनेअपने काम पर चले गए. पूजा की छोटी बहन और भाई स्कूल गए हुए थे. दोपहर बाद पूजा डाक्टर के क्लिनिक पर चली गई. घर पर केवल आरती ही थी. उस दिन अनमोल ने भी काम से छुट्टी ले रखी थी और अपने कमरे पर आरती का इंतजार कर रहा था.

पूजा के क्लिनिक पर चले जाने के बाद आरती अनमोल के कमरे पर पहुंच गई. अंदर से कमरे का दरवाजा बंद कर के दोनों एकदूसरे की बाहों में समा गए. जब 2 युवा दिल एकदूसरे की बाहों में सिमट कर एक साथ धड़कने लगते हैं तो सारी दूरियां खुद ब खुद खत्म हो जाती हैं. आरती और अनमोल के साथ भी यही हुआ. सारे बंधन तोड़ कर अनमोल और आरती एकाकार हो गए. इत्तफाक से उस दिन किसी वजह से पूजा क्लिनिक से घर लौट आई . उस वक्त घर पर आरती नहीं थी.

‘घर खुला छोड़ कर कहां चली गई यह लड़की?’ बड़बड़ाते हुए पूजा आरती को खोजने के लिए घर से बाहर निकल आई. तभी अचानक उस की नजर साथ वाले मकान पर गई. पूजा ने देखा, आरती अनमोल के कमरे से बाहर निकल रही थी. उस के पीछे अनमोल भी था. आरती के बाल और कपड़े अस्तव्यस्त थे. आरती की हालत देख कर पूजा को समझते देर नहीं लगी कि आरती अनमोल के साथ बंद कमरे में कौन सा खेल खेल कर निकली है. पूजा को खड़ा देख कर अनमोल अपने कमरे में लौट गया, जबकि आरती सिर झुकाए अपने घर आ गई. पूजा ने आरती को आड़े हाथों लिया और साथ ही कभी फिर अनमोल से न मिलने की चेतावनी दी.

पूजा ने उसे कलमुंही, बदचलन और बेशरम तक कहा. आखिर अपने अपमान से तिलमिला कर आरती ने अपने और अनमोल के संबंधों के बारे में सब कुछ उजागर करते हुए कह दिया, ‘‘दीदी, मैं कोई आवारा या बदचलन नहीं हूं. मैं अनमोल से प्यार करती हूं और हम दोनों शादी करना चाहते हैं.’’

‘‘अच्छा, अपनी अय्याशी को प्यार का नाम दे कर प्रेम शब्द को ही बदनाम करने लगी. अभी तू इतनी बड़ी नहीं हुई है कि अपनी शादी के फैसले खुद ही करने लगी,’’ पूजा ने चीखते हुए कहा, ‘‘एक बात कान खोल कर सुन ले. तेरी या मेरी शादी वहीं होगी, जहां मम्मीपापा चाहेंगे.’’

अनमोल को ले कर दोनों बहनों में खूब तकरार हुई. बढ़तेबढ़ते बात यहां तक पहुंच गई कि आरती ने चुनौती दे दी कि वह अनमोल से शादी कर के दिखाएगी. जबकि पूजा कह रही थी कि उस के जीते जी उस का यह सपना पूरा नहीं होगा. दरअसल, आरती को अनमोल से मिलने के लिए रोकना पूजा का फर्ज नहीं, बल्कि स्वार्थ था. वह अनमोल पर बुरी तरह से फिदा थी और चाहती थी कि उस की शादी अनमोल से हो जाए. अपने इसी स्वार्थ की वजह से पूजा ने आरती और अनमोल के संबंधों को ले कर अपने मम्मीपापा के कान भरने शुरू कर दिए. उन्होंने भी आरती को खूब बुराभला कहा और घर से बाहर निकलने पर पाबंदी लगा दी.

दरअसल, आरती पटना में अपने दादादादी के पास रह कर पढ़ती थी. यहां वह केवल एग्जाम की तैयारी के लिए आई थी, ताकि पढ़ने में आसानी रहे. पटना में आरती के एग्जाम 17 मार्च को शुरू होने थे. 13 मार्च, 2015 को आरती को अपने पिता वीरेंद्र शर्मा के साथ एग्जाम देने पटना जाना था. इस के लिए अभी एक, डेढ़ महीने का समय था. इसलिए वीरेंद्र शर्मा ने पूजा को सख्त निर्देश दे कर आरती पर नजर रखने का जिम्मा सौंप दिया. कहते हैं, प्रेमियों पर अगर अंकुश लगा दिया जाए तो उन की भावनाएं और ज्यादा भड़कती हैं. यही हाल आरती का भी हुआ. हर वक्त पूजा द्वारा रोकटोक करने से आरती इतना परेशान हो गई कि एक दिन दोपहर के समय वह पूरी तैयारी के साथ अनमोल की फैक्ट्री जा पहुंची.

उस ने अनमोल को सब कुछ साफसाफ बता कर कहा ‘‘अनमोल, मैं रोजरोज के लड़ाईझगड़ों से तंग आ चुकी हूं. इसलिए आज मैं हमेशा के लिए अपना घर छोड़ कर तुम्हारे पास आ गई हूं. हम दोनों शादी कर के अपनी अलग दुनिया बसाएंगे, जहां रोकनेटोकने वाला कोई नहीं होगा.’’

आरती का इरादा जानने के बाद अनमोल घबरा गया. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि उसे कैसे समझाए. ऐसा नहीं था कि अनमोल आरती से प्यार नहीं करता था. वह वाकई उसे बहुत चाहता था, वह उस से अलग रहने की कल्पना तक नहीं कर सकता था, लेकिन जैसा आरती कह रही थी, ऐसा करने के लिए उस ने अभी सोचा नहीं था. अनमोल चाहता था कि यह शादी आरती के मातापिता के आशीर्वाद से हो. लेकिन जब आरती अपनी जिद पर अड़ी रही तो वह उसे अपने एक दोस्त के घर ले गया. 2 दिनों तक दोनों उस दोस्त के घर ठहरे. इस बीच वह आरती को हर तरह से समझाने का प्रयास करता रहा. उस ने आरती से वादा किया कि जल्द ही वह अपने मातापिता से बात कर के उन्हें उस के मम्मीपापा के पास भेजेगा. इस वादे के बाद आरती अपने घर वापस लौटने को तैयार हो गई.

इधर आरती के लापता होने से शर्मा दपंति परेशान थे, सब से अधिक पेरशानी पूजा को थी. उसे डर था कि कहीं आरती और अनमोल शादी न कर लें. खैर, सब मिल कर आरती को ढूंढते रहे. इसी बीच 2 दिनों बाद आरती सकुशल घर लौट आई तो सब ने चैन की सांस ली. शर्मा दंपति ने तय किया कि आरती पर अब भविष्य में इतनी सख्ती न की जाए. लेकिन पूजा अपनी हरकतों से बाज नहीं आई. मौका मिलते ही वह आरती को जलीकटी सुनाने से बाज नहीं आती थी. बहरहाल वक्त इसी तरह गुजरता रहा. आरती और अनमोल का छिपछिप कर मिलना जारी रहा, दोनों मोबाइल फोन पर भी आपस में बातें कर लिया करते थे. चाह कर भी पूजा आरती का कुछ नहीं बिगाड़ पा रही थी.

28 फरवरी, 2015 की बात है. प्रदीप सिंह अपने घर से खेतों की ओर जा रहा था. रास्ते में उस के ताऊ बलदेव सिंह का मकान पड़ता था. हालांकि बलदेव सिंह इस मकान में नहीं रहते थे. यह मकान उन्होंने वीरेंद्र शर्मा को किराए पर दे रखा था. इस मकान की देखभाल का जिम्मा उन्होंने अपने भतीजे प्रदीप सिंह को सौंप रखा था. प्रदीप सिंह जब अपने ताऊ के घर के पास पहुंचा तो उस ने मकान के अंदर चीखनेचिल्लाने की आवाजें सुनीं.

‘‘बचाओ… बचाओ, मार दिया… ओह.’’ का शोर सुन कर वह रुक गया. तभी उस ने देखा वीरेंद्र शर्मा की बड़ी बेटी तेजी से मकान से निकल कर एक ओर चली गई. उस के पीछे शर्मा की छोटी बेटी कुसुम चिल्लाते हुए निकली, ‘‘पूजा ने आरती को मार डाला, बचाओ.’’

शोर सुन कर प्रदीप सिंह ने मकान के भीतर जा कर देखा तो आरती रसोई में फर्श पर खून से लथपथ पड़ी थी. उस के शरीर पर गहरेगहरे घाव साफ दिखाई दे रहे थे. आरती की छोटी बहन कुसुम जोरजोर से रो रही थी. प्रदीप सिंह ने नीचे झुक कर आरती की नब्ज टटोल कर देखी, वह मर चुकी थी. समय व्यर्थ न करते हुए प्रदीप सिंह ने तुरंत इस घटना की सूचना थाना फोकल प्वाइट को दी, साथ ही उस ने वीरेंद्र शर्मा को भी आरती की मौत के बारे में बता दिया. वह अभी फोन कर के हटे ही थे कि अस्पताल की एंबुलैंस वहां आ गई. दरअसल पुलिस को गुमराह करने के लिए पूजा ने ही 108 नंबर पर एंबुलैंस के लिए फोन किया था कि उस की छोटी बहन आरती गिर कर घायल हो गई है.

कुछ ही देर में थाना फोकल प्वाइंट के थानाप्रभारी इंसपेक्टर सुरेंद्र सिंह पुलिस चौकी ढडारी के इंचार्ज एएसआई जोगिदंर सिंह, चौकीइंचार्ज ईश्वर कालोनी एएसआई जसबीर सिंह, हेडकांस्टेबल जसपाल सिंह, कांस्टेबल बलजीत कुमार व लेडी कांस्टेबल किरनपाल घटनास्थल पर पहुंच गए. घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया गया. मृतका आरती के शरीर पर अनगिनत गहरे घाव थे, जिन में से उस समय भी खून रिस रहा था. घाव देख कर ऐसा लगता था, जैसे मृतका की हत्या गहरी रंजिश और नफरत के तहत की गई थी. जिस छुरी से उस की हत्या की गई थी, वह भी घटनास्थल से बरामद हो गई थी. कुछ ही देर में क्राइम टीम व डीसीपी जसवंत संधु, एसीपी रूपेंद्र कौर तथा मृतका के मातापिता भी घटनास्थल पर पहुंच गए थे. क्राईम टीम ने कई कोणों से लाश के फोटो लिए और कई जगह से फिंगरप्रिंट उठाए.

सुरेंद्र सिंह ने मृतका के पिता वीरेंद्र शर्मा और मां संजू शर्मा के बयान लिए गए. वीरेंद्र शर्मा के अनुसार, मृतका आरती के पड़ोस में रहने वाले युवक अनमोल के साथ प्रेमसंबंध थे. घटना वाले दिन से पहले 27 फरवरी को अनमोल उन के पड़ोस वाला कमरा खाली कर के कहीं चला गया था. इसी बात को ले कर आरती की अपनी बड़ी बहन पूजा के साथ तकरार हुई थी. शायद वैसा आज भी हुआ हो और उसी झगड़े में आरती की हत्या हो गई हो. बहरहाल, सुरेंद्र सिंह ने मृतका के पिता व पड़ोसियों के बयान दर्ज करने के बाद लाश को अपने कब्जे में ले कर लाश पोस्टमार्टम के लिए सिविल अस्पताल भिजवा दी. थाने लौट कर सुरेंद्र सिंह ने इस मामले को पूजा को नामजद करते हुए हत्या का मुकदमा दर्ज कर उस की तलाश शुरू कर दी.

अपनी बहन आरती की हत्या कर के पूजा घटनास्थल से फरार तो हो गई थी, पर उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह कहां जाए? क्योंकि उस समय उस के पास एक भी पैसा नहीं था. यह बात सुरेंद्र सिंह भी अच्छी तरह जानते थे. वह यह भी समझते थे कि अक्सर बिना पैसे वाले लोग ट्रेन में ही यात्रा करते हैं. इसलिए उन्होंने एएसआई जसबीर सिंह को ढंडारी रेलवे स्टेशन की ओर भेजा. इंसपेक्टर सुरेंद्र सिंह का अनुमान सही निकला. ढंडारी रेलवे स्टेशन के पास से ही एएसआई जसबीर सिंह ने पूजा को गिरफ्तार कर लिया.

थाने में हुई पूछताछ में पूजा ने स्वीकार कर लिया कि गुस्से में उसी ने अपनी छोटी बहन आरती की हत्या की थी. पूजा ने बताया कि आरती के पड़ोस में रहने वाले अनमोल के साथ प्रेमसंबंध थे. आरती के संबंध का पूरा परिवार विरोध करता था. पिताजी की इच्छा थी कि आरती पढ़लिख कर उच्चशिक्षा प्राप्त करे. 17 मार्च, 2015 को आरती के एग्जाम पटना सरकारी स्कूल में होने वाले थे. पिताजी उसे ले कर 13 मार्च को पटना जाने वाले थे. अनमोल ने जब हमारे पड़ोस वाला कमरा खाली किया तो हमें संदेह हुआ कि कहीं आरती और अनमोल की यह कोई चाल न हो. अनमोल ने शायद किसी योजना के अंतर्गत कमरा खाली किया है.

अब दोनों घर से भाग जाना चाहते हैं. क्योंकि इस घटना से लगभग डेढ़ महीना पहले आरती कहीं चली गई थी. अनमोल भी 2 दिन अपने घर से गायब रहा था. 2 दिनों बाद आरती घर लौट आई थी. हमें संदेह था कि आरती अनमोल, दोनों घर से भागने की नीयत से गायब हुए थे और किन्हीं कारणों से वापस लौट आए थे. इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए जब अनमोल ने अपना कमरा खाली किया तो हमें संदेह हुआ कि यह आरती और अनमोल के घर से भागने की योजना है. यह बात मैं ने मातापिता को बता कर अपना संदेह व्यक्त किया और उसी दिन से मैं आरती पर नजर रखने लगी. अनमोल के कमरा बदलने के बाद आरती लगातार फोन द्वारा अनमोल से संपर्क बनाए रही.

घटना वाले दिन भी सुबहसुबह काफी देर आरती फोन पर किसी से बातें करती रही. मुझे यकीन था कि वह फोन अनमोल का ही था. उस के बाद मैं नहाने के लिए बाथरूम में गई. नहाने के लिए जैसे ही मैं कपड़े उतारने लगी, तभी जिद कर के आरती जबरदस्ती नहाने बैठ गई. उस ने कहा.‘‘सौरी दीदी, मुझे जरा जल्दी है, कहीं जाना है.’’

उस की यह बात सुन कर मुझे विश्वास हो गया कि आरती अनमोल के साथ भाग जाने वाली है. अभी मैं यह सोच ही रही थी कि तभी आरती के फोन पर किसी का फोन आया. नहाना छोड़ कर आरती फोन सुनने लगी. मैं ने आरती को यह कहते सुना, ‘तुम थोड़ा इंतजार करो, मैं तैयार हो कर अभी आती हूं.’

यह सुनते ही मेरा संदेह विश्वास में बदल गया. मैं ने आरती से पूछा, ‘‘क्या तुम अनमोल के साथ कहीं भाग जाना चाहती हो?’’

मेरी बात सुन कर आरती आगबबूला हो गई, जैसे उस की चोरी पकड़ी गई हो. उस ने चिल्लाते हुए कहा, ‘तुम ऐसे ही मेरा पीछा करोगी तो नहीं भागना होगा, तब भी भाग जाऊंगी.’ आरती की इस विद्रोही भाषा से मेरे तनबदन में आग लग गई. मैं ने आव देखा न ताव, पास में पड़ी सब्जी काटने वाली छुरी उठा कर आरती पर अंधाधुंध वार कर के उस की हत्या कर दी. जो लड़की कुल की मर्यादा को कलंकित करे, उस का मर जाना ही बेहतर है. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, आरती के शरीर पर कुल 20 घाव थे. सब से घातक घाव वे थे जो आरती के पेट पर किए गए थे. इन्ही घावों की वजह से आरती के फेफड़े फट गए थे और हार्ट पंक्चर हो गया था, जिस से उस ने दम तोड़ दिया था.

पूछताछ के बाद एसआई अश्विनी कुमार ने 1 मार्च, 2015 को पूजा को सीजीएम रणजीव कुमार की आदलत में पेश कर के 2 दिनों के पुलिस रिमांड पर लिया. हत्या में प्रयुक्त छुरी पहले ही बरामद हो चुकी थी, सो रिमांड अवधि समाप्त होने के बाद पूजा को 3 मार्च, 2015 को अदालत में दोबारा पेश किया गया, जहां से उसे न्यायिक अभिरक्षा में जिला कारगार भेज दिया गया. Love Story

कथा पुलिस सुत्रों पर आधारित.

 

UP Crime: दबंगई का तेजाब

UP Crime: एडवोकेट मनी बिश्नोई अपने फार्महाउस में काम करने वाले हरिसिंह की बेटी राधिका पर बुरी नजर रखता था. एक दिन उस ने जबरदस्ती करनी चाही, जिस का राधिका ने विरोध किया…

मुरादाबाद से 30 किलोमीटर दूर हरिद्वार रोड पर स्थित है कस्बा कांठ. इसी कस्बे के मोहल्ला पट्टीवाला में नए साल 2015 के पहले दिन दबंगई का एक ऐसा खेल खेला गया, जिस की गूंज मीडिया द्वारा पूरे देश में पहुंच गई. गौर करने वाली बात तो यह है कि इंसानियत को शर्मसार करने वाली इस घटना को रफादफा करने की पुलिस ने पूरी कोशिश की थी. बात पहली जनवरी, 2015 को दोपहर के समय की है. राधिका सैनी अपने घर में कपड़े सिल रही थी. उस समय वह घर में अकेली थी. राधिका बीए द्वितीय वर्ष में पढ़ रही थी. उस के घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी, इसलिए वह खाली समय में घर पर ही कपड़े सिल लिया करती थी, जिस से कुछ पैसों की आमदनी हो जाती थी.

उसी समय कांठ का ही रहने वाला मनी बिश्नोई नाम का एक युवक उस के घर आ गया. वह वकील था. अपने घर में अचानक उसे देख कर वह डर गई. इस से पहले कि वह उस से कुछ कहती, मनी ने उस के साथ छेड़छाड़ शुरू कर दी. राधिका ने इस का विरोध किया, लेकिन वह नहीं माना. राधिका ने शोर मचाने की धमकी दी तो मनी ने अपने साथ लाए डिब्बे का तेजाब उस के मुंह पर उड़ेल दिया. तेजाब की जलन से राधिका चीखनेचिल्लाने लगी. उस की नानी प्रेमवती सैनी उस समय घर के बाहर बैठी कुछ औरतों से बातें कर रही थीं. जैसे ही उन्होंने राधिका के चीखने की आवाज सुनी, वह तेजी से घर की तरफ भागीं. घर से उन्होंने मनी बिश्नोई को भागते देखा, उस के हाथ में प्लास्टिक का एक डिब्बा था. उन्होंने कमरे में राधिका को दर्द से छटपटाते देखा.

उस का चेहरा जैसे उधड़ा हुआ था. कमरे से तेजाब की गंध भी आ रही थी. वह समझ गईं कि मनी ही उस के ऊपर तेजाब डाल कर भागा है. प्रेमवती ने उसी समय शोर मचा दिया तो मोहल्ले के तमाम लोग घर में आ गए. प्रेमवती ने सब को बता दिया कि मनी राधिका के ऊपर तेजाब डाल कर भाग गया है. मनी बिश्नोई का घर थोड़ी ही दूर पर था. वह दबंग परिवार से था, इसलिए सब कुछ जानते हुए भी किसी की हिम्मत नहीं हुई कि कोई उस के यहां जा कर शिकायत करे. खबर मिलते ही राधिका के पिता हरिसिंह सैनी और मां भारती सैनी भी घर पहुंच गईं. वे मनी बिश्नोई के फार्महाउस पर ही काम करते थे. बेटी की हालत देख कर उन का दिल कांप उठा. वे शिकायत करने के लिए दौड़ेदौड़े मनी बिश्नोई के घर गए और उस के पिता अनिल बिश्नोई से इस हादसे की शिकायत की.

अनिल बिश्नोई ने बेटे की करतूत को गंभीरता से लेने के बजाय उलटे जवाब दिया, ‘‘ऐसी कौन सी बड़ी बात हो गई, जो मुंह फाड़े जा रहे हो. बेटे ने गलती कर दी है तो तुम्हारी बेटी का इलाज करवा दूंगा और मनी को भी डांट दूंगा.’’  अनिल ने उन्हें धमकाते हुए कहा, ‘‘यदि कोई पूछे तो बता देना कि टौयलट में रखी तेजाब की बोतल धोखे से गिर गई थी. याद रखो, तुम ने मेरा नमक खाया है यदि नमकहरामी की तो अंजाम बुरा होगा. मैं जो कह रहा हूं, उसी में तुम्हारी भलाई है. इसलिए जो मैं कह रहा हूं, एक कागज पर मुझे लिख कर दे दो और हां, ध्यान रखो कि तुम पुलिस के पास गए तो तुम्हें अपनी जान से हाथ धोना पड़ सकता है.’’

हरिसिंह अपनी पत्नी के साथ उस के फार्महाउस पर काम करते थे. इसलिए जैसा उस ने कहा, मजबूरी में उन्होंने उसे लिख कर दे दिया. उधर तेजाब की जलन से राधिका बुरी तरह तड़प रही थी. वह छटपटा रही थी. अनिल बिश्नोई उस का इलाज कराने के लिए एक निजी चिकित्सक के पास ले गया. वह काफी झुलस चुकी थी. उस की हालत गंभीर बनी हुई थी. डाक्टर ने प्राथमिक उपचार करने के बाद राधिका को सरकारी अस्पताल ले जाने की सलाह दी. लेकिन अनिल उसे मुरादाबाद के सरकारी अस्पताल ले जाने के बजाय उसे उस के घर छोड़ आया. राधिका की हालत गंभीर होने के बावजूद भी उस का इलाज न कराना गांव वालों को भी बुरा लगा. मोहल्ले के कुछ असरदार और पढ़ेलिखे लोगों ने हरिसिंह को थाने जाने की सलाह दी.

यह बात हरिसिंह की भी समझ में आ गई तो वह पत्नी को ले कर थाना कांठ पहुंच गए. थानाप्रभारी को उन्होंने बेटी पर तेजाब डालने वाली बात बताई तो थानाप्रभारी ने मनी बिश्नोई के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर के राधिका को कांठ के सरकारी अस्पताल में भरती करा दिया. उस की गंभीर हालत देख कर कांठ के अस्पताल से उसे मुरादाबाद के सरकारी अस्पताल भेज दिया गया. उस की हालत गंभीर होने की वजह से पुलिस ने कोर्ट में उस के बयान भी नहीं कराए. हालत में सुधार होने पर 2 जनवरी को कोर्ट में बयान कराना था. अनिल को जब पता चला कि हरिसिंह ने उस के बेटे के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा दी है तो उसे बहुत बुरा लगा. उस ने धमकी दी कि यदि उस ने रिपोर्ट वापस नहीं ली तो पूरे परिवार को खत्म कर देगा.

इतना ही नहीं, 2 जनवरी को अनिल अपने 25-30 समर्थकों के साथ हरिसिंह के घर पहुंच गया और अपनी हेकड़ी दिखाते हुए परिवार को धमकाया तथा उसी समय राधिका के छोटे भाई सचिन का अपहरण कर के ले गया. जाते समय अनिल ने यह धमकी दी थी कि 2 जनवरी, 2015 को राधिका ने कोर्ट में हमारे खिलाफ बयान दिया तो सचिन की हत्या कर दी जाएगी. इस धमकी पर राधिका ही नहीं, उस के घर वाले भी डर गए. भाई की जान बचाने के लिए राधिका ने कोर्ट में वही बयान दिया, जैसा अनिल बिश्नोई चाहता था. उस ने कोर्ट में कहा कि टौयलट में रखा तेजाब उस के ऊपर धोखे से गिर गया था, जिस से वह झुलस गई.

जब मनी के घर वालों को पता चला कि राधिका ने उन के पक्ष में ही बयान दिया है तो वे बहुत खुश हुए. अब उन्हें तसल्ली हो गई कि पुलिस भी उन का कुछ नहीं बिगाड़ पाएगी. पक्ष में बयान देने के बावजूद भी उन्होंने सचिन को रिहा नहीं किया. हरिसिंह ने उस से अपने बेटे को रिहा करने की गुहार लगाई, तब कहीं जा कर 2 दिनों बाद उस ने उसे आजाद किया. उधर मीडिया द्वारा यह तेजाब कांड सुर्खियों में आया तो कई सामाजिक संगठन कांड के विरोध में सामने आ गए. सैनी समाज हरिसिंह के साथ जुड़ गया. मुरादाबाद की समाजसेविका व अधिवक्ता सीता सैनी ने हरिसिंह के परिवार वालों से मुलाकात की और उन्हें विश्वास दिलाया कि वह उन्हें हर तरह का सहयोग देने को तैयार हैं और जब तक उस दरिंदे को सजा नहीं मिल जाती, वह भी चुप नहीं रहेंगी. उन्होंने डरीसहमी राधिका की भी हिम्मत बंधाई और शांत न बैठने की सलाह दी.

उधर मुरादाबाद के सरकारी अस्पताल में भरती राधिका की हालत दिनबदिन बिगड़ती जा रही थी. उस का संक्रमण बढ़ रहा था, जिस की वजह से अस्पताल के डाक्टरों ने भी हाथ खड़े कर दिए. उन्होंने सुझाव दिया कि यदि राधिका का अच्छा इलाज करवाना है तो उसे दिल्ली के बड़े अस्पताल ले जाएं. पीडि़त लड़की के घर वालों की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि वे उसे दिल्ली ले जाएं. मगर इस काम में राष्ट्रीय मानवाधिकार संरक्षक समिति के सदस्य आगे आए. वे 18 जनवरी, 2015 को राधिका को मुरादाबाद से दिल्ली ले गए और दिल्ली के डा. राममनोहर लोहिया अस्पताल में उन्होंने उसे एडमिट करवा दिया. सीता सैनी और अन्य लोगों के समझाने पर राधिका और उस के घर वालों की उम्मीद जागी कि अब शायद उन्हें न्याय मिलेगा.

फिर 9 जनवरी, 2015 को राधिका के मातापिता ने सीता सैनी के साथ मुरादाबाद के एसएसपी लव कुमार से मुलाकात कर के कहा कि राधिका ने 2 जनवरी को कोर्ट में जो बयान दिया था, वह अपने भाई की जान बचाने के लिए डर की वजह से दिया था. उन्होंने कोर्ट में फिर से बयान दर्ज कराने की मांग की. साथ ही गुहार लगाई कि इस केस की जांच कांठ के थानाप्रभारी के बजाय अन्य किसी अधिकारी से कराई जाए. उन की मांग पर एसएसपी ने यह मामला एसपी (ग्रामीण) प्रबल प्रताप सिंह के हवाले कर दिया और भरोसा दिया कि पीडि़त परिवार की सुरक्षा की जाएगी. घर वालों की मांग पर एसएसपी ने मामले की जांच कांठ के थानाप्रभारी से हटा कर कांठ के सीओ राहुल कुमार को सौंप दी.

एसएसपी के आदेश देते ही कांठ पुलिस हरकत में आ गई. सीओ राहुल कुमार ने अभियुक्त मनी बिश्नोई की गिरफ्तारी के लिए एक पुलिस टीम उस के घर भेज दी. लेकिन उस के घर पर कोई नहीं मिला. घर के सभी लोग फरार हो चुके थे. इस के बाद पुलिस को चकमा दे कर अभियुक्त मनी बिश्नोई ने मुरादाबाद के एसीजेएम-5 के न्यायलय में आत्मसमर्पण कर दिया, जहां से उसे 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. चूंकि अनिल बिश्नोई एक दबंग व्यक्ति था. अपने वकील बेटे के जेल जाने पर वह अपनी बेइज्जती महसूस कर रहा था. इसलिए थाने में दर्ज कराई रिपोर्ट वापस कराने के लिए वह हरिसिंह सैनी को धमकियां देने लगा. हरिसिंह ने इस की शिकायत सीओ से की तो उन्होंने केस में पीडि़त परिवार को धमकाने और अपहरण की धाराएं बढ़ा दीं.

पुलिस को अभियुक्त मनी से पूछताछ भी करनी थी. इसलिए जांच अधिकारी ने अदालत में दरख्वास्त की तो अदालत ने उसे 6 घंटे के पुलिस रिमांड पर दे दिया. रिमांड अवधि में उस से पूछताछ के बाद तेजाब का खाली डिब्बा भी पुलिस ने अपने कब्जे में ले लिया. उस ने राधिका के ऊपर तेजाब फेंकने की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार थी—

उत्तर प्रदेश के महानगर मुरादाबाद के बंगला गांव निवासी हरिसिंह सैनी की शादी करीब 22 साल पहले कांठ के पट्टीवाला मोहल्ले की भारती के साथ हुई थी, जिस से उस के 2 बेटियां व एक बेटा पैदा हुआ. राधिका परिवार में बड़ी बेटी थी. हरिसिंह पहले मुरादाबाद की ही एक पीतल फर्म में काम करता था. काम मंदा होने पर वह परेशान हो गया’ तब वह अपनी सास प्रेमवती के कहने पर बीवीबच्चों के साथ अपनी ससुराल कांठ चला गया. कांठ के ही अलगअलग स्कूलकालेज में उस ने अपने बच्चों का दाखिला करा दिया. प्रेमवती ने अपनी बेटी भारती और दामाद हरिसिंह की कांठ में ही अनिल बिश्नोई के फार्महाउस में नौकरी लगवा दी.

खेतों में दोनों पतिपत्नी मेहनतमजदूरी कर के जो कमा रहे थे, उस से उन के परिवार की गाड़ी चल रही थी. बच्चों की पढ़ाई भी ठीक चल रही थी. राधिका बीए द्वितीय वर्ष में पढ़ रही थी. 19 साल की राधिका पढ़ाई में होशियार थी. घर पर उस का जो खाली समय बचता था, उस में वह छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ा देती और कपड़े सिल लिया करती थी. जबकि उस के मातापिता अनिल बिश्नोई के फार्महाउस पर काम करने निकल जाते थे. वैसे तो उन्हें खाना देने के लिए उस के छोटे भाईबहन चले जाते थे, लेकिन कभीकभी राधिका भी उन्हें खाना देने फार्महाउस चली जाती थी. उसी दौरान अनिल बिश्नोई के बेटे एडवोकेट मनी बिश्नोई की नजर उस पर पड़ी तो वह उस के पीछे पड़ गया.

राधिका उस के मंसूबों को समझ गई थी, लेकिन वह उस का विरोध इसलिए नहीं कर रही थी कि वह एक दबंग आदमी का बेटा था और दूसरे उस के मांबाप भी उस के यहां काम करते थे. राधिका के चुप रहने पर मनी की हिम्मत और बढ़ गई. अब वह उस से अश्लील मजाक करने लगा. किसी न किसी बहाने उस ने उस के घर भी आना शुरू कर दिया. वहां भी वह उसे ही टकटकी लगाए देखता रहता था. एक दिन राधिका ने मनी की शिकायत अपने मातापिता से कर दी. मातापिता मनी से तो कुछ कह नहीं सकते थे, इसलिए उन्होंने उस बिगड़ैल की शिकायत उस के पिता अनिल बिश्नोई से की. बेटे द्वारा अपने नौकर की बेटी का पीछा करने की बात अनिल बिश्नोई को भी बुरी लगी. उन्होंने मनी को बहुत डांटा और कहा कि यह कदम उठाने से पहले वह कम से कम अपना और उस का स्तर तो देख लेता.

परंतु बेटे के ऊपर तो राधिका को पाने का जुनून सवार था, लिहाजा पिता की डांट और समझाने का उस पर कोई असर नहीं हुआ. वह उसे हासिल करने की जुगत में लगा रहा. कालेज आतेजाते समय वह उसे परेशान करता. इस की शिकायत हरिसिंह ने फिर से अनिल से की. बेटे की शिकायतें सुनसुन कर अनिल भी परेशान हो गया. तब उस ने मनी की यह सोच कर शादी कर दी कि बीवी के आने पर उस की नकेल कस जाएगी. लेकिन अनिल की यह सोच भी गलत साबित हुई. शादी होने के बावजूद भी वह राधिका को परेशान करता रहा. दिसंबर, 2014 के आखिरी सप्ताह में एक दिन उस ने राधिका को रास्ते में रोक लिया और उस ने धमकी दी कि यदि उस ने उस के साथ शादी नहीं की तो उस के पूरे परिवार को खत्म कर देगा.

डरीसहमी राधिका ने कोई जवाब नहीं दिया. घर आ कर उस ने यह बात अपने घर वालों को बता दी. जिस की शिकायत हरिसिंह ने फिर से अनिल बिश्नोई से की. तब अनिल बिश्नोई ने भी मनी को डांटा. इस से मनी और ज्यादा बौखला गया. उस ने घटना से 2 दिनों पहले राधिका को कालेज जाते समय रास्ते में रोक कर कहा कि अगर तू मेरी नहीं हुई तो तेरा चेहरा बिगाड़ दूंगा. राधिका उस की हरकतों से परेशान हो चुकी थी. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. उसे उस से निजात कैसे मिले. पहली जनवरी, 2015 को दोपहर के समय वह अपने घर में बैठी कपड़े सिल रही थी. उस के मांबाप अपने काम पर गए हुए थे, तभी मनी बिश्नोई तेजाब का डिब्बा ले कर उस के यहां पहुंचा. उस ने राधिका के साथ छेड़छाड़ शुरू कर दी. राधिका के विरोध करने पर जब उसे लगा कि उस का मकसद पूरा नहीं होगा तो उस ने डिब्बे में भरा तेजाब उस के चेहरे पर उड़ेल दिया.

अभियुक्त मनी बिश्नोई से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने रिमांड अवधि खत्म होने से पूर्व ही उसे न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया. कथा संकलन तक उस की जमानत नहीं हो सकी थी और राधिका का दिल्ली के डा. राममनोहर लोहिया अस्पताल में इलाज चल रहा था.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित, राधिका परिवर्तित नाम है.

Crime Story: ब्लैकमेलर

Crime Story: मनोरमा और राजकमल दोनों ही उच्च श्रेणी के डांसर्स थे. लेकिन राजकमल की महत्त्वाकांक्षाओं ने ऐसा जोर मारा कि वह अपनी पत्नी के साथ अपराध के जाल में फंस गया. मोहन मोहंती, मोना और नरसिंह आखिर कैसे पहुंचे उन तक?

एम 3 ग्रुप का चीफ मोहन मोहंती मुंबई लेखा परीक्षक के औफिस के पास स्थित मथीरन की पहाडि़यों पर ट्रैकिंग के लिए जाने की योजना बना रहा था, लेकिन समूह के एक निदेशक दिनेश मूलचंदानी का फोन आ गया. निदेशक ने उसे इमरजेंसी मीटिंग के लिए बुलाया था. फोन आने के एक घंटे के भीतर वह निदेशक के आलीशान बंगले पर पहुंच गया. मोहन दिनेश मूलचंदानी के बंगले में प्रविष्ट हुआ तो दिनेश और उस की पत्नी उसे स्टडी रूम में ले गए और कमरे का दरवाजा बंद कर लिया. दोनों परेशानी के आलम में थे और काफी घबराए हुए थे. सोनिया ने कुछ कहने की कोशिश की लेकिन उस के शब्द गले में अटक कर रह गए. दिनेश मूलचंदानी से भी कुछ नहीं बोला जा रहा था.

उन्होंने एक फोटो और एक कागज का टुकड़ा मोहन के हाथ में थमा दिया. मोहन ने फोटो पर एक नजर डाल कर कागज पर लिखी इबारत को पढ़ना शुरू किया. लिखा था— तुम इस बात से इनकार नहीं कर सकते कि फोटो बेहद शर्मनाक है. मैं मानता हूं कि यह कारनामा कंप्यूटर के किसी आधुनिक सौफ्टवेयर की मदद से किया गया है, लेकिन है शानदार. मुझे अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि तुम इसे गलत साबित नहीं कर पाओगे. अगर कोशिश भी करोगे तो काफी दिन लग जाएंगे और तब तक तुम्हारे परिवार की इज्जत मिट्टी में मिल जाएगी. इस लिए एक अच्छे आदमी की तरह इसे अपनी किस्मत समझ कर स्वीकार कर लो.

आगे लिखा था— नताशा पूरे सम्मान के साथ डोली में बैठ कर अपनी ससुराल जाएगी, लेकिन यह तुम्हारे हाथ में है. वैसे हमारा कंप्यूटर एक्सपर्ट आजकल खाली है, वह ऐसी कई तस्वीरें बना सकता है. मुझे उम्मीद है कि एक शरीफ पिता की तरह तुम मानसिक रूप से तैयार हो जाओगे. पैसा कहां पहुंचाना है, इस के लिए जगह और समय बाद में बताया जाएगा. मोहन ने जिज्ञासा भरी एक नजर फोटोग्राफ पर डाली. जैसा कि पत्र में लिखा गया था, दिनेश और सोनिया की सब से बड़ी बेटी नताशा मूलचंदानी अपनी ही उम्र के एक लड़के के साथ आपत्तिजनक हालत में बिस्तर पर दिखाई दे रही थी. जिस का अधिकतर हिस्सा चादर से ढका हुआ था, केवल चेहरा, कंधे और पैर दिखाई पड़ रहे थे. मोहंती ने नोटिस किया कि फोटो में कंधे और पैर नंगे थे.

दिनेश मूलचंदानी फट पड़ा, ‘‘ब्लैकमेलर ने धमकी दी है कि अगर पैसा नहीं दिया गया तो ऐसे कुछ फोटोग्राफ्स हमारे समधी के यहां भेज देगा. मोहंती तुम जानते हो कि आज से 14 दिन बाद नताशा की शादी होने वाली है. पता नहीं उस का अगला लेटर कब आ जाए.’’

इस बीच सोनिया की हालत कुछ सुधर गई थी और वह बोलने लायक हो गई थी. उस ने लगभग रोते हुए कहा, ‘‘मेरी बेटी की जिंदगी बर्बाद हो जाएगी. मेहरबानी कर के कोई चांस मत लो, इस मक्कार आदमी को वह दे दो जो वह चाहता है ताकि मामला यहीं खत्म हो जाए.’’

‘‘मैडम, पैसे देना समस्या का समाधान नहीं है. वक्तवक्त पर ब्लैकमेलर की मांग बढ़ती जाएगी. मुझे 3 दिन का समय दीजिए. देर शाम तक मैं आप को सारी रिपोर्ट दे दूंगा, उस के बाद आप को तय करना होगा कि क्या करना है.’’ मोहंती ने आश्वासन देने की कोशिश की.

सोनिया और दिनेश के दिल में मोहन के लिए बेहद सम्मान था, इसीलिए उन्होंने सब से पहले इन स्थितियों से निपटने के लिए उसे ही बुलाया था. उस की बातों से सोनिया को कुछ तसल्ली हो गई थी, उस ने मोहन से नाश्ते के लिए कहा, लेकिन मोहन ने मना कर दिया. जिस लिफाफे में फोटोग्राफ और पत्र आया था, उसे ले कर मोहन अपने औफिस की ओर चल दिया. रास्ते से ही उस ने अपनी सचिव मोना और अपने असिस्टेंट नरसिंह को फोन कर के तुरंत औफिस पहुंचने के लिए कहा. जैसी कि उम्मीद थी, मोना ने मना कर दिया, ‘‘शनिवार को औफिस क्यों? अगर तुम किसी मामले में मेरे साथ विचारविमर्श करना चाहते हो तो यह फाइव स्टार होटल या कौफी शौप में भी हो सकता है.’’

मोहन के पास इस के अलावा कोई चारा नहीं था कि मीटिंग की जगह बदले. फलस्वरूप 30 मिनट बाद वे तीनों ताजमहल होटल की कौफी शौप की एक टेबल पर बैठे कौफी पी रहे थे. मोहन ने उन दोनों को पत्र और तसवीर दिखाने के बाद पूरी कहानी सुनाई. फिर कहा, ‘‘ब्लैक मेलर ने खुद स्वीकार किया है कि तस्वीरें नकली हैं. फिर भी अगर ये तसवीरें नताशा की ससुराल भेज दी जाएं तो उस की जिंदगी बर्बाद हो जाएगी. हमें सोमवार की शाम तक हर हालत में ब्लैकमेलर को ढूंढ निकालना है. मैं मानता हूं कि हमारे पास समय कम है, लेकिन हमें यह करना होगा.’’

‘‘हमारे पास किसी मामले को आराम से हल करने का समय कब होता है? और यह हमेशा शनिवार की सुबह ही क्यों होता है? अब, मेरा पूरा हफ्ता बरबाद हो जाएगा.’’ मोना बड़बड़ाई.

मोहन ने मोना की बड़बड़ाहट को नजरअंदाज कर दिया, वह जानता था कि अगर एक बार मोना ने तगड़ा सा नाश्ता कर लिया तो उस में अगाथा क्रिस्टी की आत्मा समा जाएगी. इस के लिए उस ने मोना को नाश्ते का आर्डर देने को कहा. नरसिंह राव को लोग ‘आइसबर्ग’ के नाम से पुकारते थे. मोहन की नजर में वह जितना समझदार और स्मार्ट नजर आता था, वह उस की मूल योग्यता और स्मार्टनैस का केवल दसवां हिस्सा भर ही था. नरसिंह ने करीब 6 साल पहले मोहन का औफिस ज्वाइन किया था. उस समय औफिस का प्रशासनिक विभाग आए दिन औफिस में होने वाली चोरियों से परेशान था. हर दूसरे दिन औफिस से कोई कीमती चीज या किसी का महंगा मोबाइल फोन गायब हो जाता था.

प्रशासनिक विभाग के प्रभारी ने इस की शिकायत मोहन से की, तो उस ने यह मामला नरसिंह के हवाले कर दिया. इस के चौथे दिन ही नरसिंह ने बता दिया कि चोर सैमुअल है. जब मोहन ने उस से पूछा कि वह ऐसा किस आधार पर कह रहा है और कैसे साबित करेगा कि वह चोर है, तो नरसिंह ने चोर को रंगेहाथों पकड़ने की अनुमति मांगी. उस ने अपनी योजना भी मोहन को बता दी. अगले दिन नरसिंह ने लंचटाइम में नया लेकिन सस्ता सा चाइनामेड फोन औफिस की टायलेट के पास रख छोड़ा. जैसी कि उम्मीद थी, एक घंटे बाद फोन वहां नहीं था. दो घंटे बाद मोहन और नरसिंह सैमुअल के केबिन में जा कर उस के सामने बैठ गए. नरसिंह ने अपने फोन से एक नंबर डायल किया तो अचानक मोबाइल की घंटी बज उठी. आवाज सैमुअल के लैपटौप बैग से आ रही थी. विश्वास से भरे नरसिंह ने बैग खोला और मोबाइल फोन बाहर निकाल लिया.

ऐसा लगा जैसे सैमुअल गूंगा हो गया हो. उस ने सफाई देने की कोशिश की, ‘‘यह मोबाइल फोन मुझे टायलेट के पास मिला था और मैं प्रशासनिक औफिस में जमा कराने जाने ही वाला था.’’

नरसिंह ने अपनी बात पर जोर दे कर कहा, ‘‘नहीं जनाब, आप उसे साथ ले कर कहीं नहीं जाने वाले थे. अगर ऐसा होता तो आप फोन से सिम कार्ड नहीं निकालते. लेकिन दुर्भाग्य से आप यह नहीं जान पाए कि चीन के बने फोन थोड़े अलग तरह के होते हैं. इस मोबाइल फोन में दो सिम हैं. इन दो सिमों में से एक सिम छिपा रहता है.’’

उसी दिन सैमुअल को कंपनी से निकाल दिया गया. मोहन आश्चर्य में रह गया, उस ने नरसिंह से पूछा कि सैमुअल पर उस ने कैसे फोकस किया? इस के जवाब में उस ने बताया कि जिसजिस दिन चोरियां हुईं थीं. मैं ने उन दिनों का औफिस में ड्यूटी पर आने वालों का रिकौर्ड खंगाला. मैं ने देखा कि जिस दिन सैमुअल औफिस नहीं आता था, उस दिन चोरी नहीं होती थी. इस का मतलब था कि चोरी सैमुअल ही करता था. मोहन ने नरसिंह को शाबाशी दी और प्यार से उस का नाम ‘आइसबर्ग’ रख दिया. नाश्ता आ चुका था और मोना उस के साथ पूरापूरा न्याय कर रही थी. आश्चर्यचकित मोहन सोच रहा था कि इतना मक्खन, पनीर, क्रीम, इडली और इतने मीठे रस मोना की बौडी में ठहर क्यों नहीं रहे हैं. उसे अपनी तरफ निहारते हुए देख कर मोना ने कहा, ‘‘मोहन, मेरी कैलोरीज गिनना बंद करो और नाश्ते का मजा लो नहीं तो कपंनी का पैसा बरबाद होगा.’’

मोहन और आइसबर्ग ने भी मोना का साथ देना शुरू कर दिया. जब मोना भरपेट खा चुकी तो उस ने एक कप कौफी का और्डर दिया और धमकी वाले पत्र और फोटो में खो गई. मोहन ने आंखें चमकाते हुए आइसबर्ग को देखा, दोनों जानते थे कि जल्द ही अब कुछ पता लगने वाला है. करीब 10 मिनट पत्र का परीक्षण करने, पढ़ने और सोचने के बाद मोना ने बोलना शुरू किया, ‘‘ऐसा लगता है कि ब्लैकमेलर का कुछ न कुछ संबंध कुमाऊं क्षेत्र है, पत्र में लिखे गए शब्द दाज्यू का मतलब है आदणीय बड़े भाई, जो कुमाऊं में बोला जाता है.’’

‘‘बहुत खूब.’’ मोहन ने मोना की हिम्मत बढ़ाई.

‘‘फोटोग्राफ इंडिया में ही खींचा गया है. यह बात मैं इस आधार पर कह सकती हूं क्योंकि जिस चादर में जोड़ा लिपटा हुआ है, वह बौंबे डाइंग की है. नरसिंह लड़के लड़की की त्वचा का रंग देखो, यह भी किसी चीज की ओर इंगित कर रहा है.’’ कहते हुए मोना ने फोटो आइसबर्ग के हाथ में थमा दी.

‘‘त्वचा का रंग? मुझे देखने दो.’’ आइसबर्ग ने एक मिनट तक फोटो को ध्यान से देखने के बाद कहा, ‘‘बहुत अच्छा पकड़ा, केवल लड़की का चेहरा ही नहीं बल्कि लड़के का चेहरा भी बदला गया है. आम तौर पर कंधों का रंग चेहरे से अधिक गोरा होता हे, लेकिन इस फोटो में चेहरे कंधों से अधिक गोरे हैं.’’

‘‘शाबाश मोना, आइसबर्ग अब तुम्हारी बारी है. देखते हैं, तुम्हें क्या मिलता है.’’ मोहन ने आइसबर्ग को चुनौती देने वाले अंदाज में कहा. आइसबर्ग ने तुरंत धमकी वाला पत्र और फोटोग्राफ ले लिए. और गौर से देखने लगा. कंप्यूटर संबंधी चीजों का अध्ययन करने के बाद वह फोटो को गौर से देखते हुए बोला, ‘‘इस पत्र और फोटो में जो कागज इस्तेमाल किया गया है वह जनता कंपनी का एक्सएल साइज है. लेबल के जिस कागज पर पता लिखा गया है, वह कैमलिन ब्रांड का है और बहुत ही अच्छी क्वालिटी का है.’’

निस्संदेह ये तीनों चीजें महंगी और अच्छी गुणवता वाली हैं, लेकिन जिस प्रिंटर पर प्रिंट निकाला गया है, वह इंक जेट प्रिंटर से निकाला गया है. प्रिंट की गुणवत्ता से पता चलता है कि इस में रीफिल्ड कार्टि्रज इस्तेमाल किया गया है.’’

‘‘बहुत अच्छा, इस के अलावा और कुछ?’’ मोहन ने सराहना भरे लहजे में कहा.

‘‘हां, पत्र में शायद गोथिक फौंट का इस्तेमाल किया गया है, यह फोंट इंक का खर्च 30 प्रतिशत तक कम कर देता है. कार्टि्रज के खर्च को कम करने के लिए फौंट का साइज भी 11 के बजाय 10 रखा गया है, जिस से पता चलता है कि ब्लैकमेलर को कागज के कीमती होने की पूरी जानकारी है.’’ आइसबर्ग ने निष्कर्ष निकाला.

मोहन आइसबर्ग के विश्लेषण पर हामी भरते हुए मोना की ओर देख कर बोला, ‘‘तुम दोनों ने बहुत अच्छा विश्लेषण किया है. अब जो मैं ने देखा है उस की ओर आते हैं. लिफाफे पर लगी डाकघर की मुहर को देखो, यह शहर के ही नेहरू नगर के डाकघर की मुहर है. यह तो तुम्हें पता ही होगा कि नेहरू नगर क्षेत्र में एक बहुत बड़ी रिहाइश कुमाऊं के लोगों की है. दस साल पहले आए भूकंप में जो तबाही हुई थी, उस से प्रभावित लोगों को नेहरू नगर में फ्लैट आवंटित किए गए थे.

‘‘अब हम इस घटना को अपनी विश्लेषणात्मक दृष्टि से देखते हैं. लेकिन याद रहे कि यह धारणा बगैर किसी सबूत की होगी. सबूतों के लिए हमारे पास 2 दिन हैं.’’ मोहन ने टिप्पणी करते हुए अपनी बात कहना जारी रखी, ‘‘इस सब के पीछे नेहरू नगर में रहने वाला कोई कुमाऊंनी जोड़ा है. इस जोड़े ने अपने ही फोटोग्राफ का इस्तेमाल किया है और अपने चेहरे की जगह पर नताशा और किसी दूसरे लड़के के चेहरे पेस्ट किए हैं. इस के लिए उन्होंने मार्फिंग सौफ्टवेयर का इस्तेमाल किया है. यह मार्फिंग सौफ्टवेयर शायद फैंटामार्फ 5 या मारफेस होगा, जो इन लोगों ने अपने घर पर कंप्यूटर में लगा रखा होगा. निस्संदेह वह किसी नामी कंपनी में काम करता है, जहां से इतनी महंगी चीजें चुरा कर घर के इंकजेट प्रिंटर से प्रिंट निकालता है.’’

आइसबर्ग ने बीच में टोका, ‘‘मोहनजी, इस तस्वीर को जितनी खूबसूरती से मार्फ किया गया है, उस से लगता है कि यह फैंटामार्फ 5 सौफ्टवेयर से किया गया है. यह सौफ्वेयर कार्ड द्वारा भुगतान कर के इंटरनेट से डाउनलोड किया जा सकता है लेकिन मुझे लगता है कि यह डाउनलोड नहीं किया गया है. संभव है यह पायरेटेड हो और शहर के कंप्यूटर मार्केट से खरीदा गया हो.’’

मोना भी पीछे रहने वाली नहीं थी, उस ने भी चरचा में भाग लेते हुए कहा, ‘‘हमें यह भी पता लगाना है कि नताशा की तसवीर ब्लैकमेलर के पास कैसे पहुंची? यह काम घर के किसी आदमी का है या उस ने नताशा की तसवीर कहीं से उठा कर ऐसा किया है?’’

मोहन को अच्छा लगा कि उसे इतने अच्छे सहायक मिले, वह बोला, ‘‘अब हमारा आज का काम यह है आइसबर्ग कि तुम कंप्यूटर मार्केट जाओ और सौफ्टवेयर बेचने वालों के बारे में पता करो. मोना तुम मूलचंदानी के घर जाओ और पता करने की कोशिश करो कि नताशा का फोटो ब्लैकमेलर के पास कैसे पहुंचा? मैं नेहरू नगर जा कर वहां से जानकारी प्राप्त करने की कोशिश करता हूं.’’

मोना के चेहरे पर एक नजर डालते हुए मोहन ने घोषणा की, ‘‘दोपहर 2 बजे हम फिर यहीं मिलेंगे और अपनी दिन भर की जानकारी पर डिस्कस करेंगे. अब तक मोना पर अगाथा क्रिस्टी की आत्मा पूरी तरह से हावी हो चुकी थी और फाइव स्टार होटल के महंगे लंच में उस की कोई दिलचस्पी नहीं रह गई थी. उस ने कहा, ‘‘नहीं मोहन, हम औफिस में मिलेंगे. मामला गंभीर है और हम नहीं चाहते कि लोग अनुमान लगाएं कि एम 3 चंदानी समूह में कुछ ऐसावैसा हुआ है. मैं औफिस में ही लंच की व्यवस्था कर लूंगी.’’

मोना ने धमकी वाला पत्र और तसवीरें अपने पर्स में डाल लीं, फिर तीनों अपनेअपने रास्ते चले गए. निदेशक मूलचंदानी का बंगला होटल के सब से नजदीक था, इसलिए मोना सब से पहले अपने लक्ष्य पर पहुंच गई. एक दिन पहले तक नताशा की शादी को ले कर वहां पर बहुत गहमागहमी थी, मगर आज सारी तैयारियां रुकी सी लग रही थीं. दिनेश और सोनिया मोहन द्वारा किसी खबर का इंतजार कर रहे थे. मोना के आने से उन के चेहरे पर कुछ राहत के आसार दिखाई दिए. सोनिया ने मोना का हाथ अपने हाथ में ले कर बड़े अपनेपन से पूछा, ‘‘तुम्हें कुछ पता चला क्या?’’

‘‘सोनिया मैडम, आप चिंतित न हों. हमारे बड़े सर मोहनजी अपना काम कर रहे हैं. अब तो ब्लैकमेलर को चिंता करनी चाहिए. मैं आप से जानना चाहती हूं कि उस हरामजादे के पास नताशा का फोटो कैसे पहुंचा?’’ मोना ने नताशा के फोटो के संबंध में और भी कई सवाल पूछे.

एमके बाजार को लोग कंप्यूटर से संबंधित सामान के लिए देश की सब से बड़ी मार्केट कहते हैं. आमतौर पर माना जाता है कि अगर कहीं भी कोई सौफ्टवेयर या हार्डवेयर बना है तो वह यहां मिल जाता है. असल या पाइरेटेड किसी भी रूप में. वहां पर तमाम दुकानें तो थीं ही, लेकिन इस के साथ कई लड़के भी घूम कर कारोबार करते थे. ये सभी जवान थे, अधिकतम 25 साल की उम्र तक के. उन में से कोई भी ज्यादा पढ़ालिखा नहीं था. रहे होंगे ज्यादा से ज्यादा दसवीं पास. ये लोग डुप्लीकेट हार्डवेयर और पायरेटेड सौफ्टवेयर का व्यापार करते थे, इसलिए उन की कोई स्थाई दुकान नहीं थी.

वहां पर मोहन के कुछ जानकार थे. उन्हें मोहन के सहयोगी नरसिंह के आगमन के बारे में भी पता लग गया और उस के उद्देश्य के बारे में भी. नरसिंह वर्मा से मिला, वह वहां काम करने वाले लोगों में सब से पुराना था और अब वहां के इज्जतदार दुकानदारों में था. उस के पास कई अच्छी कंपनियों की एजेंसियां थीं. उन में से कई एजेंसियां उसे मोहन की सिफारिश पर ही मिली थीं.

‘‘मैं एक ऐसे खरीदार को ढूंढ़ रहा हूं जिस ने मार्फिंग सौफ्टवेयर खरीदा हो. मुझे विश्वास है कि यह सौफ्टवेयर यहां के किसी लड़के से पिछले 2-3 सप्ताह के अंदर खरीदा गया है.’’ नरसिंह ने वर्मा से कहा.

वर्मा एक अजीब सी नजर उस के चेहरे पर डाल कर बोला, ‘‘नरसिंह, मुझे तुम से ऐसी मूर्खतापूर्ण बात की उम्मीद नहीं थी. हम दिन भर में दर्जनों सौफ्टवेयर बेचते हैं और तुम हम से उस आदमी की पहचान बताने को कह रहे हो जिस ने हम से 2-3 सप्ताह पहले सौफ्टवेयर खरीदा था.’’

नरसिंह ने इस बात को अनसुना कर के कहना जारी रखा, ‘‘ज्यादा उम्मीद यही है कि वह कुमाऊं का रहने वाला रहा होगा और वहीं के लोगों जैसा दिखता होगा.’’

‘‘नरसिंह, तुम मेरे लड़कों को जानते हो, वे कश्मीरी या बंगाली में बात नहीं कर पाते. तुम उन से बात करोगे तो वे सोचेंगे कि कुमाऊं गूगल कोई नया सौफ्टवेयर है.’’ वर्मा ने यह बात बड़ी उदासीनता से कही थी, लेकिन नरसिंह के चेहरे पर छाई हुई निराशा को देख कर उस ने उस की मदद करने का फैसला किया.

‘‘वैसे तो तुम जो सोच रहे हो, वह भूसे के ढेर में से सुई निकालने जैसा है, फिर भी मैं किसी ऐसे खरीदार के बारे में जानने की कोशिश करता हूं.’’

वर्मा ने पूरे बाजार में यह संदेश पहुंचा दिया और थोड़ी देर में उस के पास तमाम तरह की जानकारी आ गईं. मसलन एक स्टूडेंट जैसा लड़का आया था, वह पैसे के बारे में बहुत चर्चा कर रहा था.  एक आर्किटेक्ट ने सौफ्टवेयर खरीदा था, वह पायरेटेड सौफ्टवेयर का बिल मांग रहा था. एक क्लर्क था जो खरीद पर कमीशन मांग रहा था. तरहतरह की जानकारी आईं, लेकिन कोई भी काम की नहीं थी. नरसिंह समझ गया कि उस की सारी मेहनत बेकार गई, फिर भी उस ने वर्मा को धन्यवाद दिया और उस से गर्मजोशी से हाथ मिलाते हुए कहा कि अगर इस बारे में कुछ भी पता लगे तो से सूचना जरूर दे दें. इस के बाद वह दुकान से निकल आया.

उधर मोहन ने शहर के दूसरे हिस्से नेहरू नगर में अपनी कार एक दुकान के सामने रोकी. इस दुकान पर एवन कंप्यूटर का बोर्ड टंगा हुआ था. यह पता उसे जस्ट डायल सेवा से लगा था कि एवन कंप्यूटर मेंटनेंस का ठेका लेता है. दुकान में प्रवेश करते ही मोहन को अंदाजा हो गया कि उस दुकान का कंप्यूटर से कोई ज्यादा लेनादेना नहीं है, बस दुकान पर कंप्यूटर मेंटनेंस का बोर्ड ही लगा था. दुकान में कंप्यूटर से जुड़ी अगर कोई चीज थी तो वह माउस और पैड ही थे. वास्तव में यह एक तरह से कंप्यूटर स्टेशनरी की दुकान थी. दूसरी दुकान तिकरोडील (पंजीकृत) कंप्यूटर थी, जिस पर पंजीकृत काफी बड़ा लिखा था. लेकिन मोहन को निराशा ही मिली. इस दुकानदार का भी कंप्यूटर से कोई लेनादेना नहीं था, उस का असली काम विदेशों में अवैध तरीके से सस्ती काल कराना था.

यह सब देख कर मोहन पर थोड़ी खीझ सवार होने लगी थी, लेकिन फिर भी वह उस तीसरी दुकान पर पहुंचा, जिस का पता जस्ट डायल से मिला था. दुकान के बाहर लगे बोर्ड पर बड़े अक्षरों में ‘24 कैरेट कंप्यूटर्स’ लिखा हुआ था. दुकान के नाम से पता लगता था कि निश्चय ही उस का मालिक सामान की गुणवत्ता पर ध्यान देता होगा. इसीलिए उस ने दुकान का नाम 24 कैरेट रखा है. वैसे भी यह दुकान सही रूप से कंप्यूटर की दुकान थी. इस दुकान पर कंप्यूटर्स की रिपेयरिंग होती थी. मोहन को अंदर आते देख दुकानदार ने समझा कि शायद वह उस का नया ग्राहक है, इसलिए उस ने गर्मजोशी से मोहन का स्वागत किया, लेकिन जब मोहन ने अपने आने की मूल वजह बताई तो उस के उत्साह पर पानी पड़ गया.

मौके की नजाकत को समझते हुए मोहन ने वादा किया कि वह उस के बहुमूल्य समय की कीमत जरूर चुकाएगा. फिर उस से पूछा, ‘‘क्या वह इस क्षेत्र में किसी ऐसे व्यक्ति को जानता है जिस के घर पर कंप्यूटर और प्रिंटर हो, और वह अपने इंकजेट प्रिंटर में रीफिल कार्टि्रज इस्तेमाल करता हो?’’

‘‘नेहरू नगर जैसे पिछड़े क्षेत्र में कौन असली कार्टि्रज इस्तेमाल करेगा. वह इतनी महंगी होती है कि इस क्षेत्र का रहने वाला कोई भी वहन नहीं कर सकता. क्योंकि कालोनी में अधिकांश क्लर्क और छोटे दुकानदार ही रहते हैं.’’

‘‘क्या तुम ऐसे किसी पहाड़ी आदमी को जानते हो, जो कुमाऊं क्षेत्र का रहने वाला हो और ऐसे प्रिंटर का उपयोग करता हो?’’

‘‘हमारे यहां कौन आएगा? ये सारे क्लर्क और दुकानदार जानते हैं कि कंप्यूटर, प्रिंटर कैसे रिपेयर किया जाता है. इस क्षेत्र में कंप्यूटर मरम्मत की 17 दुकानें हैं और सारे के सारे इस क्षेत्र से जाने या यह काम छोड़ने की सोच रहे हैं.’’

मोहन ने तीसरा सवाल पूछने का विचार छोड़ दिया और दुकानदार को अपने विजिटिंग कार्ड के साथ सौ रुपए का नोट थमा कर दुकान से बाहर आ गया. मोहन और नरसिंह दोनों निराशा भरी थकान के साथ औफिस पहुंचे. उन्हें लग रहा था कि उन की अब तक की सारी मेहनत बेकार गई. अब वे यह सोच कर परेशान हो रहे थे कि इस मामले को कैसे आगे बढ़ाएं. पहली नजर में सौफ्टवेयर बेचने वाले के माध्यम से फैंटामोर्फ 5 सौफ्टवेयर के खरीदार तक पहुंचना अथवा कंप्यूटर मरम्मत की दुकान के माध्यम से प्रिंटर तक पहुंचना, दोनों ही आइडिए बेकार साबित हुए थे. जासूसी के बारे में प्रसिद्ध कहावत है कि अगर सौ बातों में एक बात भी काम की मिल जाए, तो खुद को भाग्यशाली समझो. बस यह सोच कर उन्हें थोड़ी तसल्ली हुई.

अब सारा दारोमदार मोना पर था. सारी उम्मीदें उसी से जुड़ी थीं, क्योंकि उन्हें विश्वास था कि हमेशा की तरह वह इस बार भी उन्हें निराश नहीं करेगी और हुआ भी ऐसा ही. उस ने जांच का सारा रुख ही पलट दिया. जब उस ने कमरे में प्रवेश किया तो उस के हाथों में सब के लिए बर्गर के पैकेट थे.

‘‘मोहन, मुझे लगता है कि इस धमकी वाले पत्र का कोई न कोई संबंध जरूर मलायका डांस इंस्टीट्यूट से है. नताशा मूलचंदानी. पिछले कई वर्षों से इस संस्थान में शास्त्रीय नृत्य सीख रही है. यह संस्थान हर साल अपनी कामों की एक रिपोर्ट प्रकाशित करता है, जिस में उन के कार्यों और डांस सीखने वालों के बारे में छापा जाता है. इस में कई प्रशंसकों के विज्ञापन भी प्रकाशित किए जाते हैं.’’

मोना ने कहना जारी रखा, ‘‘मैं यह जानना चाहती थी कि नताशा की यह खास फोटो ब्लैकमेलर के पास कैसे पहुंची. मैं ने नताशा से इस तसवीर को देख कर याद कर के बताने को कहा कि उस ने इस तरह की तसवीर कहां और कब खिंचाई थी. उस ने याद कर के बताया कि यह फोटो डांस इंस्टीट्यूट की वार्षिक पत्रिका में छपी थी. यह सुन कर सोनिया मैडम संस्थान की पत्रिका उठा लाईं और सौभाग्य से यह तसवीर उस में मिल गई. लेकिन इस पत्रिका से एक नहीं 2 तस्वीरें ली गई थीं.’’

मोहन और नरसिंह दोनों एकसाथ बोल पड़े, ‘‘वाह, क्या बात है. तुम्हारे कहने का मतलब है कि तुम्हें मैगजीन में दोनों फोटो मिल गईं?’’

‘‘हां, नताशा का चेहरा भी इसी मैगजीन से लिया गया है, और लड़के का चेहरा भी इसी पत्रिका से. यह फेयर क्रीम का विज्ञापन ध्यान से देखो, मौडल का चेहरा ब्लैकमेलर के मार्फ किए गए फोटोग्राफ से मिलता है.’’ कहते हुए मोना ने संस्थान की पत्रिका का एक पृष्ठ खोल कर सामने रख दिया. मोहन और नरसिंह ने पत्रिका में छपे नताशा और मौडल के चेहरे को कई बार बहुत बारीकी से देखा और उन की तुलना धमकी वाले पत्र के साथ आए फोटोग्राफ्स से की. मोना का निशाना बिलकुल सही जगह लगा था.

‘‘मेरे पास बताने के लिए एक चीज और है. दरअसल, धमकी वाले पत्र के साथ आई तसवीर किसी डांस शो के ठीक बाद खींची गई थी.’’

‘‘मोना ने सब वे से लाए बर्गर के पैकेट को खोलते हुए कहना जारी रखा,’’ धमकी वाले पत्र को ध्यान से देखो और बताओ कि मैं ने यह कैसे जाना?  मोहन और राव ने सब वे के बर्गर भूल कर आंखें फाड़फाड़ कर फोटो को अपनी माइक्रोस्कोपिक नजरों से देखना शुरू किया. लेकिन उन्हें ऐसा कुछ नजर नहीं आया, जिस के आधार पर वह कह सकते कि फोटो किसी डांस शो के ठीक बाद खींची गई थीं.

‘‘लड़कों की सोच हमेशा एक जैसी ही रहेगी, वह किसी सैक्सी फोटोग्राफ को देखेंगे और उन के मस्तिष्क का खून शरीर के दूसरे हिस्से की ओर दौड़ना शुरू हो जाएगा.’’ मोना ने दोनों का अजीब सा मजाक उड़ाते हुए कहा, ‘‘इस फोटो में छिपे दोनों लोगों के पैरों को देखो, लड़की के पैर लाल रंग से रंगे गए हैं, लेकिन लड़के के पैर बिलकुल साफ हैं. दरअसल भरतनाट्यम में लड़की के पैरों पर लाल रंग का आलता लगाना मेकअप का ही एक हिस्सा माना जाता है.’’

‘‘और हां, अब बेवकूफों की तरह मुझे देखना बंद कर के जल्दी से बात खत्म करो, हमें काम करना है.’’ मोना ने आदेश दिया, जिसे उन दोनों ने मान लिया.

मोना ने अपना लंच खत्म किया और गिलास से पानी का घूट भरते हुए बोली, ‘‘हम मान लेते हैं कि ब्लैकमेलर का कुछ न कुछ संबंध मलायका डांस इंस्टीट्यूट से जरूर है. नताशा ने मुझे बताया कि इंस्टीट्यूट में इस वक्त 57 छात्र हैं, लेकिन इन में से केवल 18 ही सीनियर ऐज ग्रुप के हैं शेष 39 ऐसी योजना तैयार करने के हिसाब से बहुत छोटे हैं.’’

नरसिंह ने उस की बात से प्रभावित होते हुए कहा, ‘‘क्या तुम चाहती हो कि मैं इंस्टीट्यूट के लड़कों की जांच करूं?’’

‘‘नहीं, इस से कोई फायदा नहीं होगा.’’ मोना ने उसे आइसबर्ग कह कर चिढ़ाते हुए कहा.

‘‘क्या तुम मुझे यह बात समझा सकती हो कि इस से कोई मदद क्यों नहीं मिलेगी?’’ जवाब में नरसिंह ने थोड़े गुस्से में पूछा.

‘‘सीधी सी बात है, मेरे आइसबर्ग, बहुत सीधी.’’ मोना ने बिलकुल शरलक होम्स की नकल उतारते हुए कहा, ‘‘मैं ने पहले ही पता कर लिया है. नताशा ने मुझे बताया है कि इस समय इंस्टीट्यूट में केवल 2 ऐसे बौय स्टूडेंट हैं जो सीनियर एज ग्रुप में हैं. वे दोनों भाई हैं और मुंबई के एक धनीमानी परिवार से संबंधित हैं. वे ऐसे अपराध में शामिल नहीं हो सकते. एक बात और, फोटो में दिखाई देने वाला लड़का स्टूडेंट नहीं हो सकता.’’

‘‘बहुत खूब मोना, पहली बात तो वार्षिक पत्रिका और फिर पांवों पर मौजूद लाल रंग का आलता. इस से यह बात तो निश्चित है कि पत्र लिखने वाले का संबंध मलायका इंस्टीट्यूट से जरूर है. हमें शाम को इंस्टीट्यूट चलना चाहिए.’’ मोहन ने कहा. शाम को मोहन और मोना दोनों इंस्टीट्यूट पहुंचे. दोनों ही मुंबई के बाहरी इलाके में अरब सागर के किनारे बने हुए लाल रंग के पुराने शैली के बंगले की सुंदरता देख कर बहुत प्रभावित हुए. रिसेप्शन पर उन्होंने इंस्टीट्यूट के मालिक और शिक्षक केशव कमल से मिलने की इच्छा जताई. रिसेप्शन पर बैठी महिला ने बहुत ही आदर से बात की और उन्हें कुछ देर इंतजार करने को कहा, क्योंकि गुरु जी डांस क्लास में थे.

अपनी आदत के अनुसार मोहन ने वहां के कक्षों का निरीक्षण शुरू कर दिया और मोना रिसैप्शनिस्ट से बातें करने में व्यस्त हो गई. दीवार पर करीने से लगे फोटोग्राफ्स, प्रमाणपत्र और अखबारों की कटिंग का मुआयना करने के बाद मोहन ने निष्कर्ष निकाला कि गुरूजी की उम्र तकरीबन 63 साल होगी, और उन का संबंध उत्तर प्रदेश के फैजाबाद के भरत नाट्यम परिवार से रहा होगा. वह बंगला सेठ सीताराम नवल का बनवाया हुआ था. दीवार पर लिखी इबारतों से यह भी पता लगता था कि मलायका, सेठ सीताराम की लड़की का नाम था, जो गुरूजी की शिष्य थी और उसे डांस में महारत हासिल थी. लेकिन दुर्भाग्य से करीब 20 साल पहले उस की एक सड़क दुर्घटना में मौत हो गई थी. उस की मृत्यु के बाद सेठजी ने उस की याद में डांस इंस्टीट्यूट स्थापित किया और इस के लिए नाममात्र किराए पर अपना यह बंगला गुरू जी को दे दिया था.

निरीक्षण करने के बाद मोहन मोना के पास आया और वे दोनों सिर जोड़ कर बैठ गए. मोहन ने मोना से कहा, ‘‘गुरूजी इस संस्थान को पिछले कई सालों से चला रहे हैं और इस बंगले में ही अपनी पत्नी, बेटी और दामाद के साथ रहते हैं. दामाद राजकमल संस्थान में भरतनाट्यम सिखाने के साथसाथ प्रशासनिक मामले भी देखता है. यह बंगला सेठ सीताराम नवल परिवार के माध्यम से चलाए जाने वाले एक ट्रस्ट की संपत्ति है.’’

जब वे दोनों बातें कर रहे थे, तो उन्होंने एक व्यक्ति को अपनी ओर आते हुए देखा. उस के पहनावे से अनुमान होता था कि वे ही गुरू केशव कमल जी हैं. उस व्यक्ति ने पास आ कर बड़े सभ्य तरीके से अपना परिचय दिया, ‘‘नमस्कार, मेरा नाम केशव कमल है और मैं इस संस्थान में भरतनाट्यम सिखाता हूं. बताइए, मैं आप की क्या मदद कर सकता हूं?’’

मोहन ने अपना परिचय एक कंपनी के प्रतिनिधि के रूप में देते हुए कहा कि उन की कंपनी सांस्कृतिक कार्यक्रम कराती है. अपने आने का उद्देश्य बताते हुए मोहन बोला, ‘‘गुरू जी, हमारा समूह अगले महीने वार्षिक कार्यक्रम करने जा रहा है. हमारा इरादा है कि अन्य कला प्रदर्शनों के साथ इस में एक भारतीय शास्त्रीय नृत्य का कार्यक्रम भी रखा जाए, क्योंकि हमारे इस कार्यक्रम में हमारे विदेशी कस्टमर भी बतौर अतिथि शामिल होंगे. हमारी इच्छा है कि इस कार्यक्रम में आप के संस्थान के छात्र अपना प्रदर्शन करें.’’

‘‘बहुत अच्छा विचार है, यह हमारे लिए बड़ी खुशी की बात होगी. हमारे स्टूडेंट्स विभिन्न अवसरों पर अपनी कला का प्रदर्शन करते रहते हैं, इसलिए कार्यक्रम की तैयारी की कोई समस्या नहीं होगी. इस के लिए आप के पास कोई विचार हो तो बता दीजिए.’’

मोहन ने उत्तर में कहा, ‘‘मैं चाहता हूं कि हम कल आप के संस्थान आएं और प्रदर्शन देख कर ही फाइनल फैसला करें. क्या ऐसा हो सकता है कि आप अपने स्टूडेंट्स को कल फोन कर के बता दें, क्योंकि कल रविवार है?’’

‘‘रविवार का होना कोई मुद्दा नहीं है, हमारी साप्ताहिक छुट्टी सोमवार को होती है. वैसे भी हम कलाकार हैं, अगर जरूरत हो तो सप्ताह भर बिना छुट्टी के काम करते हैं.’’

मोहन ने मेहनताने के बारे में पूछा तो गुरू जी बोले, ‘‘पैसे के लेनदेन का मामला मेरा दामाद राजकमल ही देखता है. कल जब आप आएंगे तभी यह मामला भी तय हो जाएगा. इस समय वह क्लास ले रहा है.’’

अगली सुबह, मोहन मोना और नरसिंह तीनों संस्थान पहुंचे, जहां गुरूजी और उन के परिवार ने उन का बड़ी गर्मजोशी से स्वागत किया. गुरूजी की बेटी मनोरमा ने उन्हें नाश्ते के लिए कहा लेकिन उन्होंने बड़ी खूबसूरती से मना कर दिया. सभी मुख्य हाल में पहुंचे, जहां पहले से ही लड़के और लड़कियां डांस का अभ्यास कर रहे थे. वे सब वहां पर बिछी कुर्सियों पर बैठ गए. मोहन के अनुरोध पर कमल और मनोरमा ने अपने लड़केलड़कियों का परिचय कराना शुरू कर दिया. मोना व उस के साथियों को उन के लड़के व लड़कियों में कोई ऐसी बात नहीं दिखाई दी, जिस से उन पर किसी तरह का संदेह किया जा सके. वे सभी बहुत अच्छे परिवारों से संबंध रखते थे, जिस से अनुमान होता था कि उन में से कोई भी इस तरह की घटिया हरकत में शामिल नहीं हो सकता. मोना उन से डांस थीम का विवरण पूछने लगी.

मोहन अपने मोबाइल से सारे स्टूडेंट्स की तसवीरें लेने लगा. उस ने राजकमल और संस्थान के 2 सीनियर स्टडेंट से भी फोटो खिंचवाने को कहा. तीनों हंसीखुशी राजी हो गए. मोहन ने तुरंत वह तस्वीरें एमएमएस के माध्यम से एम के बाजार के दुकानदार वर्मा को भेज दीं. राजकमल ने सलाह दी, ‘‘मैडम, हमारे पास कई डांस थीम हैं. वैसे हमारा सब से प्रसिद्ध कृष्ण लीला का डांस है, जो कृष्ण की कई लीलाओं को डांस के माध्यम से दर्शाता है. इस के अलावा हमारे पास पूरी रामलीला का कौन्सेप्ट भी है, इस में डांस के माध्यम से ही मंच पर पूरी रामलीला दिखाई जाती है.’’

‘‘क्या आप के पास भारतीय संस्कृति पर कोई डांस तैयार है? हम कुछ ऐसा चाहते हैं, जिस में भारत के डांस की कई विधाएं प्रदर्शित हो सकें.’’ मोहन ने पूछा.

‘‘यह अच्छा विचार है.’’ मनोरमा ने कहा, ‘‘हम एक कार्यक्रम तैयार कर सकते हैं, जिस में भारतीय विधाओं का मिलाजुला रूप हो, जैसे कि भरतनाट्यम, कथकली, कुचिपुड़ी, ओडिसी और कथक.’’

मोना ने कह दिया, ‘‘हां, हमें कुछ इसी तरह का चाहिए. इस में आप गरबा और लावनी को भी शामिल कर सकते हैं.’’

मोना ने फिर खुशी व्यक्त करते हुए कहा, ‘‘कितना दिलचस्प होगा यह, बहुत मजा आएगा.’’

‘‘बिलकुल सही कहा मैडम, हमारी शादी भी डांस की वजह से ही हुई थी, अब हमारी इच्छा है कि हम अपने कौशल को दुनिया के सामने पेश करें.’’ मनोरमा ने एक ठंडी सांस लेते हुए कहा.

इस के बाद उन्होंने लगभग एक घंटे तक स्टूडेंट्स के कोरस का प्रदर्शन देखा और उन की सराहना की. नरसिंह यानी आइसबर्ग हाल में आया तो मोहन ने उस के चेहरे की प्रतिक्रिया देखी और समझ गया कि उसे कोई विशेष बात पता चली है. अचानक, आइसबर्ग खड़ा हो कर बोला, ‘‘मैं जानता हूं कि राज कमल जी और उन की पत्नी मनोरमा बहुत उच्चकोटि के नर्तकों में हैं. मैं ने 8 महीने पहले भोलाभाई सभागार में उन का कृष्ण लीला वाला कोरस देखा था. कितना अच्छा नृत्य था.’’

आइसबर्ग का इशारा समझते हुए मोहन ने राजकमल से कहा, ‘‘क्या वह इस कार्यक्रम की सीडी देख सकते हैं, यदि संभव हो तो?’’ यह सुनते ही मनोरमा अपना लैपटौप उठा लाई और डांस की क्लिपिंग दिखानी शुरू कर दी. मोहन और मोना दोनों को इस में वह नजर आ गया जो आइसबर्ग उन्हें दिखाना चाहता था. चूंकि अब वहां रुकने का कोई कारण नहीं बचा था, इसलिए मोहन ने उन के इंस्टीट्यूट का एक कार्यक्रम कराने पर सहमति जताते हुए मेहनताने की बात की. राज कमल ने एक लाख रुपए प्रति कार्यक्रम के हिसाब से अपनी फीस बता दी. मोहन ने भी इस धन राशि पर अपनी सहमति दे दी.

चूंकि मोहन आसानी से राजी हो गया था, इसलिए मनोरमा ने कुछ अग्रिम के लिए इशारा किया ताकि विश्वास हो जाए कि बात पक्की हो गई है. मोना ने अपना पर्स खोला और हजारहजार के नोटों की शक्ल में 10 हजार रुपए मनोरमा के हाथ पर रख दिए. जैसे ही वे लोग इंस्टीट्यूट से बाहर आए और अपनी कार में बैठे, मोना ने आइसबर्ग को चिढ़ाते हुए कहा, ‘‘मुझे उम्मीद है कि तुम ने कुछ ऐसा पता लगा या होगा जो दस हजार रुपए से ज्यादा कीमती होगा. तुम्हारे चमकते चेहरे को देख कर ही मैं ने यह पैसा खर्च किया है.’’

‘‘मोना, तुम जानती हो, हमारे पास उस से अधिक है, जितने की हमें उम्मीद थी. अब ब्लैकमेलर का पता चल चुका है, बस हमें जा कर उसे पकड़ना बाकी है.’’

मोहन जो उस समय कार ड्राइव कर रहा था, वह भी उन की इस नोक झोंक मे शामिल होते हुए बोला, ‘‘मुझे भूख लग रही है, हम पहले ताज चल रहे हैं और वहीं लंच करते वक्त अपनी जानकारी पर विचार करेंगे.’’

जासूसों की यह टीम सीधे ताज के भोजन कक्ष में गई और कुर्सियों पर कब्जा जमा लिया. मोना और मोहन को इस बात का पूरा विश्वास हो गया था कि राज कमल और मनोरमा ही इस मामले के सूत्रधार हैं, लेकिन वह आइसबर्ग से उसे मिली जानकारी के बारे में जानना चाहता था. एम के बाजार के वर्मा ने फोन कर के बताया था कि कुछ दिन पहले उस के लड़कों ने राजकमल को एम के बाजार में देखा था. वह फैंटामार्फ 5 सौफ्टवेयर तलाश रहा था. लड़के को चेहरा इसलिए याद रह गया क्योंकि राज कमल उस समय अजीब ड्रेस में था, उस ने शर्ट के साथ भरत नाट्यम के दौरान पहले जाने वाली धोती बांध रखी थी.

आइसबर्ग ने अपना मुंह खोला, ‘‘मैं बाहर गया और संस्थान का औफिस चेक किया. सौभाग्य से मुझे वह सारी चीजें मिल गईं, जिन की हमें तलाश थी. पुराना सा इंकजेट प्रिंटर जिस में रीफिल कार्टि्रज पड़ी हुई थीं. महंगी स्टेशनरी और कंप्यूटर, जिस में गोथिक फौंट भी इंस्टौल्ड था, के साथ मुझे राजकमल और मनोरमा का वह मूल फोटो भी मिल गया जिस पर नताशा और पुरुष मौडल चेहरे चिपकाए गए थे.’’

‘‘और इस डांस वीडियो में जो मनोरमा हमें दिखाई दी थी, उस में महिला के रंग और पुरुष के सादे पैर साफ दिखाई दे रहे थे. यह तो मेरी समझ में आ गया कि फोटो शो के बाद ही खींचा गया था. जबकि मैं यह नहीं समझ पा रही हूं कि उन्होंने ऐसी बेवकूफी क्यों की?’’ मोना ने आश्चर्य से पूछा.

‘‘इस के पीछे राजकमल का मन रहा होगा, उस ने अपनी पत्नी को यह कह कर बहकाया होगा कि हम दोनों बहुत अच्छे डांसर्स हैं और अगर हमें एक बार भी अंतर्राष्ट्रीय मंच पर प्रदर्शन करने का मौका मिल गया तो फिर हमें रोकने वाला कोई नहीं होगा. इस तरह इंटरनेशनल टूर के लिए राशि की व्यवस्था करने के लिए मनोरमा भी इस अपराध में भागीदार बन गई होगी.’’ आइसबर्ग ने टिप्पणी की. चूंकि दिनेश मूलचंदानी को भेजी गई नताशा के फोटो की मूल कापी मिल गई थी, इसलिए ब्लैकमेलिंग का कोई डर नहीं था. मोहन ने यह बात मूलचंदानी परिवार को बता दी कि वे लोग निश्चिंत हो कर शादी करें. इस के बाद उस ने राजकमल और मनोरमा को कुछ इस तरह डराया कि वे चुप रहने के अलावा कुछ न कर सके. Crime Story

 

Hindi Stories: जिस्म का स्वाद

Hindi Stories: हलकीहलकी बरसात से मौसम ठंडा हो चला था. हवा तेज नहीं थी. शाम गहराती जा रही थी. दिल्ली से पंजाब जाने वाली बसें एकएक कर के रवाना हो रही थीं. दिल्ली बसअड्डे पर आज भीड़ नहीं थी. दिल्ली से संगरूर जाने वाली बस आधी ही भरी थी. पौने 7 बज चुके थे. सूरज डूब चुका था. बस की रवानगी का समय हो चला था. 10 मिनट और इंतजार करने के बाद बस कंडक्टर ने सीटी बजाई. ड्राइवर ने इंजन स्टार्ट किया. गियर लगते ही बस लहरा कर भीड़ काटते हुए बसअड्डे का गेट पार कर बाहर आई और रिंग रोड की चौड़ी सड़क पर तेजी से दौड़ने लगी.

बस की रफ्तार बढ़ने के साथसाथ हलकीहलकी बरसात भी तेज बरसात में बदल गई. बस के सामने के शीशों पर लगे वाइपर भी तेजी से चलने लगे. पीरागढ़ी चौक तक आतेआते साढ़े 7 बज चुके थे. वहां पर आधा मिनट के लिए बस रुकी. 4-5 सवारियां भी चढ़ीं, पर बस अभी भी पूरी तरह से नहीं भरी थी. बस आगे बढ़ी. नांगलोई, फिर बहादुरगढ़ और फिर रोहतक. बरसात बदस्तूर जारी थी. हवा भी तेज होती जा रही थी. रोहतक बसस्टैंड पर बस 5 मिनट के लिए रुकी. भारी बरसात के चलते बसस्टैंड सुनसान था.

रोहतक पार होतेहोते बरसात भयंकर तूफान में बदल गई. 20 मिनट बाद बस लाखनमाजरा नामक गांव के पास पहुंची. वहां बड़ेबड़े ओले गिरने लगे थे. साथ ही, आंधी भी चलने लगी थी. सड़क के दोनों किनारे खड़े कमजोर पेड़ हवा के जोर से तड़तड़ कर टूटे और सड़क पर गिरने लगे. बस का आगे बढ़ना मुमकिन नहीं था. सारा रास्ता जो बंद हो गया था. ड्राइवर ने बस रोक दी और इंजन भी बंद कर दिया. जल्दी ही बस के पीछे तमाम दूसरी गाडि़यों की कतार भी लग गई. अब भीषण बरसात तूफान में बदल गई. क्या करें? कहां जाएं? दिल्ली से संगरूर का महज 6 घंटे का सफर था. ज्यादातर मुसाफिर यही सोच कर चले थे कि रात के 12 बजे तक वे अपनेअपने घर पहुंच जाएंगे, इसलिए उन्होंने खाना भी नहीं खाया था. अब तो यहीं रात के 12 बज गए थे और उन के पेट भूख से बिलबिला रहे थे.

सब ने मोबाइल फोन से अपनेअपने परिवार वालों को कहा कि वे खराब मौसम के चलते रास्ते में फंसे हुए हैं. मगर, बस के मुसाफिर कब तक सब्र करते. खाने का इंतजाम नहीं था. पानी के लिए सब का गला सूख रहा था. लाखनमाजरा गांव था. खराब मौसम के चलते वहां रात को कोई दुकान नहीं खुली थी. कहीं कोई हैंडपंप, प्याऊ वगैरह भी नजर नहीं आ रहा था.

‘‘यहां एक गुरुद्वारा है. इस में कभी गुरु तेग बहादुर ठहरे थे. गुरुद्वारे में हमें जगह मिल जाएगी,’’ एक मुसाफिर ने कहा. बस की सवारियों का जत्था गुरुद्वारे के मेन फाटक पर पहुंचा. मगर फाटक खटकाने के बाद जब सेवादार बाहर आया तो उस ने टका सा जवाब देते हुए कहा, ‘‘रात के 11 बजे के बाद गुरुद्वारे का फाटक नहीं खुलता है. नियमों को मानने के लिए गुरुद्वारा कमेटी द्वारा सख्त हिदायत दी गई है.’’

सब मुसाफिर बस में आ कर बैठ गए. बस में सत्यानंद नामक संगरूर का एक कारोबारी भी मौजूद था. वह अपने 4-5 कारोबारी साथियों के साथ दिल्ली माल लेने के लिए आया था. हर समस्या का समाधान होता है. इस बात पर यकीन रखते हुए सत्यानंद बस से उतरा और सुनसान पड़े गांव के बंद बाजार में घूमने लगा. 2 शराबी शराब पीने का लुत्फ उठाते हुए एक खाली तख्त पर बैठे उलटीसीधी बक रहे थे.

‘‘क्यों भाई, यहां कोई ढाबा या होटल है?’’ सत्यानंद ने थोड़ी हिम्मत कर के पूछा.

‘‘क्या कोई इमर्जैंसी है?’’ नशे में धुत्त एक शराबी ने सवाल किया.

‘‘तूफान में हमारी बस फंस गई है. हम शाम को दिल्ली से चले थे. अब यहीं आधी रात हो गई है. कुछ खाने को मिल जाता तो…’’ सत्यानंद ने अपनी मजबूरी बताई.

‘‘यह ढाबा है. इसे एक औरत चलाती है. मैं उसे जगाता हूं,’’ वह शराबी बोला.

‘‘साहब, इस समय रोटी, अचार और कच्चे प्याज के सिवा कुछ नहीं मिलेगा,’’ थोड़ी देर में एक जवान औरत ने बिजली का बल्ब जलाते हुए कहा.

‘‘ठीक है, आप रोटी और अचार ही दे दें.’’

थोड़ी देर में बस के सभी मुसाफिरों ने रोटी, अचार और प्याज का लुत्फ उठाया. अपने पैसे देने के बाद सत्यानंद ने पूछा, ‘‘चाय मिलेगी क्या?’’

‘‘जरूर मिलेगी,’’ उस औरत ने कहा.

तब तक दूसरे मुसाफिर बस में चले गए थे.

चाय सुड़कते हुए सत्यानंद ने उस औरत की तरफ देखा. वह कड़क जवान देहाती औरत थी.

‘‘साहब, कुछ और चाहिए क्या?’’ उस औरत ने अजीब सी नजरों से देखते हुए पूछा.

‘‘क्या मतलब…’’

‘‘आप आराम करना चाहो तो अंदर बिस्तर लगा है,’’ दुकान के पिछवाड़े की ओर इशारा करते हुए उस औरत ने कहा.

सत्यानंद अधेड़ उम्र का था. उसे अपनी पूरी जिंदगी में ऐसा ‘न्योता’ नहीं मिला था.

एक घंटा ‘आराम’ करने के बाद उन्होंने उस औरत से पूछा, ‘‘क्या दूं?’’

‘‘जो आप की मरजी,’’ उस औरत ने कपड़े पहनते हुए कहा.

100 रुपए का एक नोट उसे थमा कर सत्यानंद बस में आ बैठा. इतनी देर बाद लौटने पर दूसरे मुसाफिर उसे गौर से देखने लगे. सुबह होने के बाद ही बस आगे बढ़ी. सत्यानंद ने संगरूर बसस्टैंड से घर के लिए रिकशा किया. भाड़ा चुकाने के लिए जब उस ने अपनी कमीज की जेब में हाथ डाला तो जेब में कुछ भी नहीं था. पैंट की जेब में से पर्स निकाला, पर वह भी खाली था. हाथ में बंधी घड़ी भी नदारद थी. सत्यानंद ने पत्नी से पैसे ले कर रिकशे का भाड़ा चुकाया. उस भोलीभाली दिखती देहाती औरत ने पता नहीं कब सब पर हाथ साफ कर दिया था. जेब में 500 रुपए थे. पर्स में 7,000 रुपए और 5,000 रुपए की घड़ी थी. कड़क रोटियों के साथसाथ उस कड़क औरत के जिस्म का स्वाद सत्यानंद जिंदगी में कभी भूल नहीं पाएगा. Hindi Stories

Crime Story: दिखावटी रईस – निकला बड़ा ठग

Crime Story: कहते हैं कि इंसान बड़ा तिकड़मी होता है. कोई अपने तिकड़म अच्छे कामों के लिए लगाता है तो कोई अपने तिकड़म से दुनिया को झुकाने की फितरत रखता है. केरल के एक आदमी ने आसानी से पैसा कमाने के लिए जोरदार तिकड़म लगाया. 10 करोड़ की ठगी के मामले में 25 सितंबर, 2021 की रात को केरल की क्राइम ब्रांच ने उसे गिरफ्तार कर लिया.

गिरफ्तारी के बाद जब उस के कारनामों का खुलासा हुआ तो लोग उस की चर्चा करते नहीं थक रहे हैं. क्योंकि अपने तिकड़म से उस ने देश के जानेमाने ठग नटवरलाल को भी पीछे छोड़ने की कोशिश की है. 51 साल के उस आदमी का नाम है मोनसन मावुंकल. वह केरल के जिला अलप्पुझा के चेरथला का रहने वाला है. इस ठग ने स्वयंप्रसिद्धि द्वारा अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई थी.

अपनी वेबसाइट पर उस ने जरा भी कंजूसी किए बगैर बड़ी ही उदारता के साथ अपनी पहचान इस तरह दी थी— डा. मोनसन मावुंकल, प्राचीन और दुर्लभ वस्तुओं का अंतरराष्ट्रीय सौदागर. विश्व शांति के प्रणेता और वर्ल्ड पीस काउंसिल का मेंबर. प्रवासी मलयाली फैडरेशन पेट्रन, पुरातत्त्वविज्ञान के मास्टर, डाक्टरेट इन कौस्मेटोलौजी और उस में पोस्टडाक्टरल, शिक्षाशास्त्री, प्राचीन ज्वैलरी के निर्यातक, मोटिवेशनल स्पीकर और प्रख्यात यूट्यूबर.

यह आदमी काम क्या करता था? कोच्चि में एक आलीशान कोठी किराए पर ले कर उस में उस ने प्राचीन और दुर्लभ वस्तुओं का म्यूजियम बना रखा था. इस के अलावा कोठी के एक फ्लोर पर वह सौंदर्य चिकित्सा करता था. वहां एक स्पा भी था. कोठी के विशाल कंपाउंड में उस की लगभग 30 कारें खड़ी थीं. उस की कारों के इस काफिले में पोर्शे बाक्सटर, रोल्स रायस, रेंजरोवर, लैंडक्रूजर, डौज, मर्सिडीज एस क्लास और लेक्सस जैसी महंगीं कारें थीं.

उस के म्यूजियम में जो दुर्लभ चीजें थीं, वह सोनेचांदी की प्राचीन ज्वैलरी के अलावा देशी और विदेशी प्रवासियों को अमूल्य और दुर्लभ नमूने भी बेचता था. उस की सूची में ईसा मसीह जो कपड़े पहनते थे, उस का एक टुकड़ा, जीसस को धोखा देने के लिए घूल जुडासन ने जो 30 चांदी के सिक्के दिए थे, वे सिक्के. मोहम्मद पैगंबर जिस कटोरे में खाते थे, वह कटोरा. टीपू सुलतान का सिंहासन, लियोनार्डो दा विंची और राजा रवि वर्मा के बनाए असली चित्र, छत्रपति शिवाजी महाराज हमेशा अपने साथ जो भगवद्गीता रखते थे, वह भगवद् गीता, मोजिस का अधिकार दंड, नारायण गुरु की लाठी, त्रावणकोर के महाराजा का सिंहासन, विश्वप्रसिद्ध पैलेस का ओरिजिनल टाइटल डीड.

दुनिया की पहली ग्रामोफोन मशीन, बाइबल की सर्वप्रथम छपी पहली कौपी, सद्दाम हुसैन अपने साथ जो कुरान शरीफ रखता था, वह पवित्र कुरान शरीफ, केरल का प्रसिद्ध शबरीमाला मंदिर जब बना था, तब की उस की धार्मिक विधियों के लिए दस्तावेज के रूप में जो ताम्रपत्र बनाया गया था, वह दुर्लभ ताम्रपत्र, इस तरह की अनेक दुर्लभ प्राचीन चीजें मोनसन मावुंकल के खजाने में थीं. छोटे ग्राहकों के लिए हाथीदांत की कलाकृतियां और व्हेल मछली की हड्डियों से बने खिलौने भी उस के म्यूजियम में थे. फिल्मी हीरो जैसे लगने वाले और अपनी बोलने की कला से सामने वाले व्यक्ति को प्रभावित करने की उस में गजब की शक्ति थी.

इस के अलावा उस के इस म्यूजियम और वैभवशाली 30 कारों के काफिले के कारण किसी को भी प्रभावित करने में उसे जरा भी दिक्कत नहीं होती थी. 2-3 सशस्त्र बौडीगार्ड हमेशा उस के साथ रहते थे. प्रसिद्धि का भूखा मोनसन डौन की स्टाइल में अपने फोटो वेबसाइट और सोशल मीडिया पर अकसर डालता रहता था. सामान्य आदमी तो ठीक, केरल के फिल्मी कलाकार, राजनेता और बड़ेबड़े पुलिस अधिकारी भी उस का म्यूजियम देखने आते थे.

उस से मिलने वालों में राज्य के डीजीपी लोकनाथ बेहरा, असिस्टेंट आईजीपी मनोज अब्राहम, सुपरस्टार मोहनलाल, कांग्रेस पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष के. सुधाकरन, वर्तमान सरकार के मंत्री रोशी आंगस्टाइन, अहमद देवरकोविल, आईजी लक्ष्मण गुगुलोथ, पूर्व डीआईजी सुरेंद्रन, आईपीएस श्रीलेखा, सांसद हीबी एडन, पूर्व मंत्री मोना जोसेफ जैसे अनेक महारथियों के फोटोग्राफ्स उस के म्यूजियम में थे. इस तरह के वीआईपी मेहमानों के भव्य स्वागत में मोनसन मावुंकल कोई कसर नहीं छोड़ता था. इन लोगों के साथ के फोटो वह तुरंत सोशल मीडिया पर वायरल कर देता था. वह पुलिस अधिकारियों को छोटामोटा सामान उपहार में दे कर खुश रखता था.

पुलिस विभाग में चलने वाली चर्चाओं के अनुसार, मोनसन ने एक बड़े पुलिस अधिकारी को 55 लाख की कोरल एडमिरल कलाई घड़ी उपहार में दी थी. पुलिस विभाग से मधुर संबंध होने की वजह से उस की कोठी और अलप्पुझा जिले में स्थित उस के घर, दोनों जगहों पर पुलिस बीट बौक्स की व्यवस्था हो गई थी. आखिर यह ठग पकड़ा कैसे गया? जून, 2017 से नवंबर, 2020 के बीच मोनसन मावुंकल ने अलग अलग 6 लोगों से कुल 24 करोड़ रुपए उधार लिए थे. अंतरराष्ट्रीय हीरा व्यापारी और एंटीक बिजनैस डीलर के रूप में उस ने इन लोगों से अपना परिचय कराया था.

बाद में जब इन लोगों ने अपना पैसा वापस मांगना शुरू किया तो मोनसन मावुंकल इन से कहने लगा कि फारेन एक्सचेंज मैनेजमेंट एक्ट (फेमा) के अधिकारियों ने उस का पैसा रोक रखा है. उसे पाने के लिए केंद्र सरकार से उस की कानूनी लड़ाई चल रही है. उन लोगों को मोनसन की बात पर विश्वास नहीं था, इसलिए वे लोग उस के घर आए. आलीशान कोठी, लग्जरी कारों का काफिला, उस की आलीशान जीवनशैली और माननीय लोगों के साथ उस की फोटो देख कर उन्हें मोनसन की बात पर विश्वास हो गया. इस के अलावा विश्वास जमाने के लिए मोनसन मावुंकल ने उन लोगों को एचएसबीसी बैंक का स्टेटमेंट भी दिखाया.

मोनसन मावुंकल का पार्टनर कोई वी.आई. पटेल (यह वी.आई. पटेल कौन हैं, इस के बारे में केरल पुलिस आज तक पता नहीं कर सकी है) के साथ के उस के एकाउंट में छोटीमोटी नहीं, 2.62 लाख करोड़ की रकम जमा थी. मोनसन मावुंकल ने उन से यह भी कहा था कि 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिल कर उस ने अपना पैसा पाने की बात भी की है. प्रवासी मलयाली फेडरेशन की वैश्विक महिला कोआर्डिनेटर रह चुकी अनीता पुल्लाइल इस समय इटली में रहती हैं. मोनसन मावुंकल के किसी लेनदार ने जब उन से व्यक्तिगत रूप से इस बारे में बात की तो उन्होंने सलाह दी कि उस चीटर के खिलाफ तुरंत पुलिस में शिकायत कर दीजिए. अगर आप को जरूरत महसूस हो तो मेरे नाम का भी उपयोग कर सकते हो.

अनीता ने यह भी कहा था कि पता चला है कि उस नालायक ने उस की कोठी में काम करने वाली नौकरानी की 17 साल की बेटी के साथ दुष्कर्म भी किया है. यह पता चलते ही उन्होंने उस शैतान से सारे संबंध तोड़ लिए हैं. इस के बाद उन लेनदारों ने मोनसन मावुंकल के खिलाफ शिकायत करने के साथसाथ उस शिकायत पर काररवाई के लिए राज्य के मुख्यमंत्री पी. विजयन के यहां शिकायत की. उन्हीं की शिकायत के आधार पर लोकल पुलिस को अंधेरे में रख कर राज्य की क्राइम ब्रांच ने इस मामले को अपने हाथ में लिया.

25 सितंबर, 2021 को मोनसन मावुंकल की बेटी की सगाई की आलीशान पार्टी थी. उसी रात क्राइम ब्रांच के अधिकारियों ने उसे गिरफ्तार कर लिया. जिस समय उसे गिरफ्तार किया गया, उस की जेब में 3 महंगे आईफोन, दाहिने हाथ में एप्पल की घड़ी, बाएं हाथ में सोने का वजनदार लकी ब्रेसलेट और गले में मोटी सी सोने की चेन थी. अपनी स्वयंप्रसिद्धि के कारण मोनसन मावुंकल ने केरल में ‘हू इज हू’ की सूची में स्थान प्राप्त कर लिया था. गिरफ्तारी के बाद मोनसन मावुंकल मीडिया में छा गया.

अखबारों और टीवी चैनलों में उस के नेताओं के साथ के संबंध और पुलिस अधिकारियों से सांठगांठ की चर्चा लगातार चलने लगी. उस के बाद बहुत बड़ा घोटाला सामने आया. इस के अलावा भी अनेक रहस्य बाहर आएंगे, ऐसा सभी को लग रहा है. फोटोग्राफ्स में जो महानुभाव थे, वे सब ढीले पड़ गए और अपनीअपनी सफाई देने लगे कि यह आदमी इतना बड़ा ठग है, उन्हें पता नहीं था. राज्य के डीजीपी लोकनाथ बेहरा ने तो मोनसन मावुंकल के म्यूजियम में महाराजा के स्टाइल में हाथ में तलवार के साथ पोज दिया था.

लोकनाथ इसी साल रिटायर हुए हैं. उन के रिटायर होने के बाद सरकार ने उन्हें तुरंत कोच्चि मेट्रो का मैनेजिंग डायरेक्टर बना दिया था. मोनसन मावुंकल के गिरफ्तार होते ही वह पत्नी की बीमारी का कारण बता कर अपने घर ओडिशा चले गए हैं. जैसेजैसे सच्चाई बाहर आने लगी, झूठ और मात्र झूठ के आधार पर खड़ा किया गया मोनसन मावुंकल का साम्राज्य भरभरा कर गिरने लगा. हाईस्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद मोनसन मावुंकल ने किसी कालेज का मुंह नहीं देखा था. फिर भी उस के नाम के साथ डाक्टरेट की डिग्री लगी है. उस के म्यूजियम के खजाने में जो पौराणिक वस्तुएं थीं, वे ज्यादातर नकली थीं.

हाथीदांत और व्हेल की हड्डियों से बनी जो चीजें थीं, वे तिरुवनंतपुरम के एक कारीगर से ऊंट की हड्डियों से बनवाई गई थीं. उस कारीगर का भी इस पर पैसा बाकी है, इसलिए उस ने भी मुकदमा कर रखा है. उस की 30 कारों में से एक भी कार के पूरे कागज नहीं मिले. महंगी पोर्शे कार 2007 में करीना कपूर के नाम रजिस्टर्ड हुई थी. उस में पिता का नाम रणधीर कपूर और पता भी उन्हीं के घर का है. मोनसन मावुंकल की पत्नी शिक्षिका थी. 1981-82 में वे दोनों इडुक्की जिले के एक गांव में रहते थे. उस समय के उस के पड़ोसियों का कहना है कि मोनसन मावुंकल तो उन के गांव में इलैक्ट्रिशियन वायरमैन का काम करता था. 1998 में उस ने कोच्चि में पुरानी कारों के खरीदनेबेचने का धंधा शुरू किया. तभी चोरी की कार बेचने के आरोप में पुलिस ने उसे गिरफ्तार भी किया था.

छोटीमोटी धोखाधड़ी करते हुए उस ने एक पूरा आभासी साम्राज्य खड़ा कर लिया. अपने लेनदारों को मोनसन मावुंकल बड़े शान से 2.62 लाख करोड़ की जमा रकम वाला एचएसबीसी बैंक का स्टेटमेंट दिखाता था. पुलिस जांच में सामने आया है कि इस आदमी का तो बैंक में कोई एकाउंट ही नहीं है. कोफिन में अंतिम कील जैसी घटना उस की गिरफ्तारी के बाद बाहर आई. उस की कोठी में काम करने वाली नौकरानी की बेटी 17 साल की थी, तब मोनसन मावुंकल ने उस के साथ उच्च शिक्षा के लिए दाखिला दिलाने के नाम पर दुष्कर्म किया था. पुलिस से मोनसन मावुंकल के संबंधों के कारण वह गरीब पुलिस से शिकायत करने से डरती रही.

मोनसन मावुंकल पकड़ा गया तो उस ने एर्नाकुलम थाने में शिकायत की है कि अब तक उस के साथ दुष्कर्म का सिलसिला चलता रहा था. गिरफ्तारी के 2 दिन पहले भी उस नराधम ने उस लड़की के साथ दुष्कर्म किया था. क्राइम ब्रांच ने मोनसन मावुंकल के खिलाफ आईपीसी की धाराओं 450, 506, 420, 421 के तहत कुल 14 एफआईआर दर्ज की हैं. इस में 19 अक्तूबर, 2021 को पोक्सो एक्ट के अंतर्गत भी मामला दर्ज किया गया था. डौन की तरह बौडीगार्ड के साथ मोनसन मावुंकल के फोटो खूब वायरल हुए थे. पुलिस जांच में पता चला कि सभी अंगरक्षकों के हाथों में जो हथियार दिख रहे थे, वे चाइनीज खिलौना राइफलें थीं. इस घटना का राजकीय प्रत्याघात भी जोरदार सामने आया है.

6 अक्तूबर, 2021 को केरल की विधानसभा में प्रश्नोत्तर के दौरान मोनसन मावुंकल एक बार फिर चर्चा में आया. राज्य के डीजीपी और अन्य उच्च अधिकारी मोनसन के म्यूजियम में क्या करने जाते थे, इस का जवाब देना मेरे लिए मुश्किल है. मुख्यमंत्री विजयन ने कहा. उन्होंने विश्वास दिलाया कि उस के दोनों घरों पर पुलिस बीट बौक्स की व्यवस्था किस ने कराई है, इस की जांच होगी.

विपक्षी नेता वी.डी. सतीश ने आक्रामक रुख अख्तियार करते हुए कहा है कि 2019 में पुलिस की इंटेलिजेंस विंग ने मोनसन मावुंकल को चीटर घोषित करते हुए जनवरी, 2020 में पूरी रिपोर्ट दी थी, फिर भी पुलिस ने उस के खिलाफ कुछ नहीं किया था. उसे राज्य के पुलिस अधिकारियों और सरकार की मदद मिलती रही थी. यह कह कर विपक्ष ने वाकआउट कर दिया था. लोगों को ठग कर इकट्ठा किया गया पैसा आखिर गया कहां? पुलिस अब इस दिशा में जांच कर रही है. पिछले 5 सालों में कोच्चि के पौश इलाके की प्रौपर्टी में जो बेनामी इनवैस्ट हुआ है, उस में सभी डीलरों का कहना है कि किसी ‘डाक्टर’ नाम के आदमी ने खासा बेनामी इनवैस्ट किया है.

पुलिस का मानना है कि वह डाक्टर कोई और नहीं, मोनसन मावुंकल ही होगा. इटली में रह रही अनीता पुल्लाइल भी पुलिस के शक के दायरे में है. वह बारबार केरल आ कर मोनसन मावुंकल से मिलती रहती थी. इस से पुलिस को आशंका है कि उस के माध्यम से मोनसन ने पैसा विदेश पहुंचाया है. पुलिस इस की भी जांच कर रही है. पुलिस का मानना है कि उन लेनदारों से अनीता ने जो शिकायत करने के लिए कहा था, उस समय मोनसन की पुलिस अधिकारियों से अच्छी सांठगांठ थी. इसलिए उन लोगों की शिकायत पर कुछ होगा नहीं, यह सोच कर उस ने यह सलाह दी थी.

दुनिया झुकती है, झुकाने वाला चाहिए, यह उक्ति मोनसन मावुंकल पर सच्ची ठहरती है. सारा नकली कारोबार कर के लोगों को ठगने और उन पर धाक जमाने के लिए नेताओं, अभिनेताओं और पुलिस अधिकारियों की तसवीरों का उपयोग किया, परंतु अंत में अपराध का घड़ा फूटा और अब वह नमूना जेल की सलाखें गिन रहा है.

Suspense Story: लिपस्टिक की चोरी

Suspense Story: स्वीटी लिपस्टिक जैसी मामूली चीज क्यों चोरी कराना चाहती है, यह बात निक की समझ में तब आई जब चोरी के बाद उसे पता चला कि वह लिपस्टिक कत्ल के एक केस में महत्त्वपूर्ण सुबूत बनने जा रही थी. एक रोमांचक कहानी…

निक वेल्वेट रात को एक क्लब से दूसरे क्लब में मारामारा फिर रहा था. इस की वजह ऐश करना नहीं, बल्कि ग्लोरिया से उस की लड़ाई हो जाना थी. दरअसल ग्लोरिया ने निक को किसी लड़की के साथ तनहाई में रंगेहाथों पकड़ लिया था. तभी से दोनों के बीच बातचीत बंद थी. इसी चक्कर में निक देर रात तब घर लौटता था, जब ग्लोरिया सो चुकी होती थी. सुबह को वह उस के उठने से पहले ही निकल जाता था. यह लड़ाई का तीसरा दिन था. निक बाहर अकेले खाना खाखा कर तंग आ चुका था.

उस दिन वह एक शानदार रेस्टोरेंट में बैठा खाना खा रहा था कि एक खूबसूरत लड़की उस से इजाजत ले कर उस के सामने आ बैठी. उस ने नीले रंग का चुस्त लिबास पहन रखा था. थोड़ी देर की चुप्पी के बाद लड़की ने उस से कहा, ‘‘मेरा नाम स्वीटी है मिस्टर निक वेल्वेट. मुझे आप के बारे में जैक्सन वड्स ने बताया था और आप से मिलने की सलाह दी थी. मैं बहुत परेशानी में हूं. आप की मदद की सख्त जरूरत है.’’

‘‘कैसी मदद? तुम मेरे बारे में क्या जानती हो?’’

‘‘मैं समझी थी कि जैक्सन का नाम सुन कर आप समझ जाएंगे, आप उन के लिए काम कर चुके हैं.’’

‘‘तुम मेरी शर्तों के बारे में जानती हो?’’ निक ने कहा तो वह बोली, ‘‘हां, आप किसी कीमती चीज को हाथ नहीं लगाते. ऐतिहासिक और राजनैतिक महत्त्व की कोई चीज भी नहीं चुराते. आप की फीस 25 हजार डौलर है, जो आप एडवांस में लेते हैं. मैं यह भी जानती हूं कि आप उसूलों के पक्के हैं.’’

निक ने उस लड़की को गौर से देखा, वह 24-25 साल की खूबसूरत लड़की थी. उस के चेहरे पर हलकी सी परेशानी थी. निक ने उस से पूछा, ‘‘तुम्हें कैसी मदद चाहिए? किस चीज की चोरी कराना चाहती हो?’’

‘‘एक लिपस्टिक की.’’ लड़की बोली.

‘‘बस एक लिपस्टिक…’’ निक ने हैरत से पूछा.

‘‘बात कुछ अजीब सी है, पर मेरे लिए यह बड़ी बात है, मेरी परेशानी भी समझ सकते हो. मैं काफी देर से तुम्हारा पीछा कर रही थी. अब जा कर तुम से बात करने का मौका मिला है.’’

पलभर रुक कर लड़की ने आगे कहा, ‘‘दरअसल मैं परफ्यूम और कौस्मेटिक बनाने वाली एक बड़ी कंपनी में काम करती हूं. मेरी कंपनी ‘लीलाली’ के नाम से एक नया प्रोडक्ट बाजार में लाने वाली है. यह प्रोडक्ट एक लिपस्टिक है, जो कई रंगों के अलावा हलके शेड्स में भी तैयार की जा रही है. मैं कंपनी के रिसर्च विभाग में काम करती हूं. अभी इस नए प्रोडक्ट को बाजार में आने में एक महीना बाकी है. माल की काफी बड़ी खेप तैयार हो चुकी है. एडवरटाइजमेंट भी शुरू हो गया है.

‘‘चंद रोज पहले कंपनी के प्रोडक्शन मैनेजर ने इसी स्टाक में से एक लिपस्टिक मुझे गिफ्ट कर दी थी. यह गैरकानूनी और उसूल के खिलाफ हरकत थी, पर उस वक्त मुझे यह बात समझ में नहीं आई. उसूली तौर पर कोई चीज मार्केट में आने से पहले कंपनी से बाहर नहीं जानी चाहिए, पर प्रोडक्शन मैनेजर मेरी मोहब्बत में कुछ ज्यादा इमोशनल हो गया और यह गलत काम कर बैठा. उस ने चोरीछिपे एक लिपस्टिक मुझे गिफ्ट कर दी.

‘‘पता नहीं कैसे एक बड़े अफसर और डिपार्टमेंट को यह बात पता चल गई कि एक लिपस्टिक कंपनी से बाहर जा चुकी है. अभी तक किसी ने प्रोडक्शन मैनेजर पर शक नहीं किया है, लेकिन अगर हमारे नाम सामने आ गए तो हमें नौकरी से निकाल दिया जाएगा. मुमकिन है गैरकानूनी काम करने की वजह से मैनेजर को पुलिस के हवाले कर दिया जाए.’’

‘‘पर इस मसले में मैं कहां फिट होता हूं?’’ निक ने कहा.

‘‘प्रौब्लम यह है कि मेरी एक दोस्त है क्लारा. कुछ दिनों पहले क्लारा ही वह लिपस्टिक मेरे घर से ले कर गई थी. अगर इस प्रोडक्ट का नाम भी लीक हो गया तो कंपनी को लाखों डौलर का नुकसान उठाना पड़ेगा. क्लारा एक करोड़पति बाप की बेटी है और मेरी बहुत अच्छी दोस्त है. मैं लिपस्टिक वापस मांग कर उसे नाराज नहीं करना चाहती. पर वह लिपस्टिक मैं हर कीमत पर वापस पाना चाहती हूं. 2 दिन पहले मैं ने मैनेजर जैक्सन से इस बात का जिक्र किया तो उस ने तुम्हारा नाम बताया. मेरा दोस्त प्रोडक्शन मैनेजर तुम्हारी फीस देने को तैयार है.’’ कह कर स्वीटी चुप हो गई.

‘‘ठीक है, इस लिपस्टिक की कोई खास पहचान है?’’

‘‘इस नाम की कोई और लिपस्टिक बाजार में मौजूद नहीं है. यह एक जामुनी शेड की लिपस्टिक है, जिस के ढक्कन पर खूबसूरती के लिए हीरे की तरह एक छोटा सा नगीना जड़ा है. यह इमिटेशन नगीना हर लिपस्टिक पर है और उस के नीचे आर्टिस्टिक ढंग से ‘लीलाली’ लिखा हुआ है,’’ स्वीटी ने बताया.

‘‘इस के लिए तुम मुझे कितना वक्त दोगी?’’ निक ने पूछा.

‘‘ज्यादा से ज्यादा एक हफ्ता, इस से ज्यादा देर हमारे लिए बहुत खतरनाक होगी. मैं तुम्हें क्लारा का पता दे देती हूं, तुम उस पते को आसानी से ढूंढ सकते हो.’’

स्वीटी ने क्लारा का पता और फोन नंबर लिख कर निक को देते हुए बताया कि वह 6 बजे के बाद घर पर ही होती है. उसे कभी भी फोन कर सकते हो. जाने से पहले स्वीटी ने एक मोटा सा लिफाफा निक वेल्वेट को सौंप दिया. उसी वक्त निक की नजर गेट पर पड़ी, जहां ग्लोरिया एक युवक के साथ दाखिल हो रही थी. चेहरे से ही वह बदमाश नजर आ रहा था. निक का खून खौल उठा. ग्लोरिया की नजर निक पर पड़ी तो वह एक पल के लिए ठिठक गई. फिर नजरें चुरा कर आगे बढ़ गई.

स्वीटी से इजाजत ले कर निक उठ खड़ा हुआ और तेजी से ग्लोरिया की तरफ बढ़ा. वह उस के पास जा कर बोला, ‘‘तुम इस वक्त यहां? और यह साहब कौन हैं?’’

‘‘तुम मनमानी करते फिरो. किसी के साथ भी ऐश करते रहो और मैं कहीं न जाऊं? मैं अपने दोस्त के साथ आई हूं. तुम्हें कोई ऐतराज है?’’

निक ग्लोरिया का हाथ पकड़ कर अपनी मेज की तरफ बढ़ गया. उस युवक ने बीच में आना चाहा तो निक ने उसे जोर का धक्का दे कर अलग हटा दिया. फिर ग्लोरिया से बोला, ‘‘आई एम सौरी, अब ऐसी भूल नहीं होगी. प्लीज मुझे माफ कर दो और लड़ाई भूल जाओ.’’

ग्लोरिया कुछ पल चुप रही, फिर मुसकरा कर निक के साथ उस की टेबल पर आ गई. निक ने ग्लोरिया को स्वीटी से मिलवाया. कुछ देर बैठ कर दोनों घर के लिए निकल पड़े. निक खुश था, क्योंकि ग्लोरिया से लड़ाई खत्म हो गई थी. क्लारा का बाप रेंबो स्मिथ काफी मशहूर और बहुत दौलतमंद आदमी था. वह मेक्सिको में तेल के 4 कुओं का मालिक था. साथ ही कई बड़ी कंपनियों का प्रेसीडेंट भी. क्लारा की उम्र 22-23 साल थी, वह स्वीटी की क्लासफेलो और अच्छी दोस्त थी. क्लारा को उस के बाप ने पूरी आजादी दे रखी थी. वह जो चाहती थी, करती थी. मां न होने की वजह से बाप के बेजा लाड़ ने उसे बिगाड़ दिया था.

दिन भर उस की निगरानी करने के बाद निक इस नतीजे पर पहुंचा कि उस से मिलना आसान नहीं है. वह अजनबियों को अपने करीब नहीं आने देती थी. न ही हर किसी से बात करती थी. उस की हिफाजत के भी अच्छे इंतजाम थे. लेकिन निक ने उस की एक कमजोरी ढूंढ निकाली. उसे पता चला कि क्लारा को डाक टिकट जमा करने का शौक है. शौक क्या जुनून है. एक जमाने में निक को भी डाक टिकट जमा करने का शौक था. यह क्लारा से मिलने का अच्छा बहाना हो सकता था. निक के पास डाक टिकट के कुछ नायाब और अनमोल नमूने थे, जिन की मुंहमांगी कीमत मिल सकती थी. एक टिकट तो भूतपूर्व शाह ईरान के जमाने का था, जिस पर शाह ईरान की तसवीर उलटी छपी थी. इस के अलावा एक और बहुत कीमती टिकट था. उसी टिकट जैसा एक टिकट न्यूयार्क में ढाई लाख डौलर में बिका था.

क्लारा के बारे में जानकारी हासिल करने के बाद निक ने स्वीटी के बारे में मालूमात की. वह वाकई कौस्मेटिक बनाने वाली कंपनी के रिसर्च डिपार्टमेंट में थी और प्रोडक्शन मैनेजर मिस्टर जैक्सन से उस का रोमांस चल रहा था. यह भी सच था कि कंपनी लीलाली नाम की एक नई लिपस्टिक बाजार में लाने वाली थी. इस से यह बात निश्चित हो गई कि स्वीटी झूठ नहीं बोल रही थी. उसी रात निक ने अपने स्टोर में रखे ट्रंक में से टिकटों वाला एलबम निकाला. उस ने उन में से कुछ खास टिकट निकाले. उसे यकीन था कि ये टिकट क्लारा से मिलने का जरिया बनेंगे. दूसरे दिन ग्लोरिया के दफ्तर जाने के बाद उस ने क्लारा को फोन किया. फोन किसी औरत ने उठाते ही कहा, ‘‘मिस्टर रेंबो स्मिथ बाहर गए हैं. एक हफ्ते बाद आएंगे.’’

निक जल्दी से बोला, ‘‘असल में मुझे उन की बेटी क्लारा से बात करनी है.’’

उधर से पूछा गया, ‘‘आप को मिस क्लारा से किसलिए मिलना है?’’

‘‘मेरे पास डाक टिकट के कुछ अनमोल नमूने हैं. इसी सिलसिले में मिस क्लारा से मिलना चाहता हूं.’’

‘‘एक मिनट होल्ड करें प्लीज.’’ दूसरी तरफ से कहा गया, फिर फोन में आवाज आई, ‘‘यस प्लीज.’’

‘‘मिस क्लारा, मैं जैकब बोल रहा हूं. मेरे पास डाक के कुछ नायाब टिकट हैं. मेरे दोस्त ने सलाह दी है कि मैं आप को दिखाऊं.’’ निक ने जल्दी से कहा.

‘‘किन देशों के टिकट हैं तुम्हारे पास?’’

‘‘मेरे पास ईरान, इराक और बहावलपुर रियासत के अलावा कई देशों के टिकट हैं.’’

‘‘मैं तुम्हारा कलेक्शन देखना पसंद करूंगी, शाम को मेरे घर आ जाओ.’’ क्लारा की आवाज में उत्साह था.

‘‘शाम को मुझे इन्हीं टिकटों के संबंध में किसी और क्लाइंट से मिलना है. फिलहाल मैं फ्री हूं.’’

‘‘ठीक है, अभी आ जाओ. मैं इंतजार कर रही हूं.’’

निक ने डाक टिकट संभाल कर लिफाफे में रखे और क्लारा के घर के लिए रवाना हो गया. रास्ता करीब 40 मिनट का था. वह क्लारा के घर पहुंच गया. गेट पर 2 हथियारबंद गार्ड खड़े थे. निक ने उन्हें अपने आने का मकसद बताया तो उन्होंने उसे उस शानदार इमारत के अंदर जाने की इजाजत दे दी. निक ने अपनी कार आगे बढ़ा दी. करीब 50 कमरों की वह इमारत बहुत बड़ी और शानदार थी. बाहर शानदार लौन था. उस ने अपनी गाड़ी पोर्च के करीब रोक दी. अधेड़ उम्र की एक औरत दरवाजा खोल कर बाहर आई और निक को अपने साथ अंदर ले गई. एक बड़ा कारीडोर पार कर के वह उस औरत के साथ शानदार लंबेचौड़े ड्राइंगरूम में पहुंचा और एक आरामदेह सोफे पर बैठ गया. करीब 5 मिनट बाद क्लारा ड्राइंगरूम में दाखिल हुई. उस ने खुलाखुला सा महीन कपड़े का गाउन पहन रखा था.

वह आते ही बोली, ‘‘माफ करना मिस्टर जैकब, मेरा आज कहीं जाने का इरादा नहीं था. जब घर में रहती हूं तो हलकीफुलकी ड्रेस पहनना पसंद करती हूं.’’

क्लारा उस के सामने बैठ गई. निक ने उस के हुस्न से आंखें चुराईं. दोनों की बातचीत शुरू हुई तो निक को जल्द ही अंदाजा हो गया कि डाक टिकटों के बारे में उसे बहुत अच्छी जानकारी है. अभी वे लोग बातें कर ही रहे थे कि 10-12 छोटेबड़े बच्चे दौड़ते हुए ड्राइंगरूम में आ गए और शोर मचाने लगे. शोर इतना ज्यादा था कि बात करना मुश्किल था.

‘‘माइ गौड, मैं तो तंग आ गई डैडी के इन रिश्तेदारों से.’’ क्लारा ने दोनों हाथों से सिर थाम लिया.

‘‘क्या ये तुम्हारे डैडी के रिश्तेदार हैं?’’ निक ने हैरत से बच्चों को देखते हुए पूछा.

‘‘डैडी के रिश्तेदारों के बच्चे हैं. वह महीने में 2 बार अपने तमाम रिश्तेदारों को घर पर इनवाइट करते हैं. यहां उन पर कोई पाबंदी नहीं रहती. मिस्टर जैकब, मेरा खयाल है, हम लोग मेरे कमरे में चल कर बैठें तो बेहतर होगा. ये लोग हमें चैन से बातें करने नहीं देंगे.’’

निक ने अपने एलबम संभाले और क्लारा के साथ ऊपर उस के कमरे में आ गया. उस का कमरा कीमती चीजों से भरा हुआ था, लेकिन साफसुथरा नहीं था. ड्रेसिंग टेबल पर मेकअप का सामान बिखरा पड़ा था. कमरे की अस्तव्यस्त हालत देखते हुए उस ने कहा, ‘‘लगता है, तुम्हारे नौकर ठीक से काम नहीं करते.’’

क्लारा झेंपते हुए बोली, ‘‘नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है. मैं अपने कमरे में किसी को नहीं आने देती. मेरी इजाजत के बिना यहां कोई कदम भी नहीं रख सकता. अपनी बात करूं तो मुझे कमरा ठीक करने का टाइम नहीं मिलता.’’

निक मुसकरा कर पलंग पर बैठ गया. उस ने एक एलबम खोला और क्लारा को टिकट दिखाते हुए उन के बारे में बताने लगा. एलबम के तीसरे पन्ने में बहावलपुर रियासत के टिकट लगे थे. उन्हें देख कर क्लारा की आंखें चमकने लगीं. टिकट पर कुदरती मंजर के बीच एक बैलगाड़ी की तसवीर थी, जिस में आगे एक किसान बैठा था और पीछे गोद में बच्चा लिए एक औरत लकडि़यों पर बैठी थी. क्लारा ने टिकट देखते हुए कहा, ‘‘मैं यह टिकट लेना पसंद करूंगी. इस की कीमत बताओ.’’

‘‘मुझे अफसोस है, इस टिकट का सौदा हो चुका है. मैं बहावलपुर के 2 टिकट और दिखाता हूं.’’ निक ने पेज पलटते हुए कहा.

वह क्लारा को शाह ईरान की उलटी तसवीर वाला टिकट भी दिखाना चाहता था, पर उसे याद आया कि वह उस टिकट वाला एलबम तो घर भूल आया है. क्लारा शाह ईरान का उलटी तसवीर वाला टिकट किसी भी कीमत पर खरीदना चाहती थी. निक ने उस से कहा, ‘‘अगर मुझे कल शाम का टाइम दो तो मैं तुम्हारे लिए शाह ईरान का टिकट जरूर ले कर आऊंगा.’’

‘‘उस टिकट के लिए मैं तुम्हें मुंहमांगी कीमत दूंगी. याद रखना, कल शाम 5 बजे मैं तुम्हारा इंतजार करूंगी.’’

‘‘निश्चिंत रहिए, मैं पहुंच जाऊंगा.’’ निक ने कहा.

‘‘तुम बेहिचक आ जाना, मैं गेट पर कह दूंगी. तुम्हें कोई नहीं रोकेगा.’’ क्लारा ने कहा.

निक जब क्लारा के घर से निकला तो उस के होठों पर हलकी मुसकराहट थी.

दूसरे दिन निक ठीक 5 बजे क्लारा के घर पहुंचा. इस बार किसी ने उसे नहीं रोका. क्लारा उसे ड्राइंगरूम के दरवाजे पर ही मिल गई. आज वह बड़े सलीके के कपड़े पहने हुई थी और बहुत अच्छी लग रही थी. उस के कमरे में पहुंच कर निक सोफे पर बैठ गया. उस से थोड़ी दूरी पर बैठते हुए क्लारा ने पूछा, ‘‘टिकट लाए हो?’’

‘‘हां,’’ कहते हुए निक ने जेब से एक लिफाफा निकाल कर उस के सामने रख दिया. क्लारा ने बड़ी सावधानी से लिफाफे से टिकट निकाला. वह ईरान के शाह का वही टिकट था, जिस पर उस की उलटी तसवीर छपी थी. टिकट देख कर क्लारा का चेहरा चमक उठा. वह देर तक टिकट को देखती रही. फिर बोली, ‘‘मैं ने तुम्हारे लिए सुबह ही रकम का बंदोबस्त कर लिया था. उस ने उठ कर अलमारी से नोटों की मोटी सी गड्डी निकाल कर निक के सामने रख दी.’’

‘‘आज मैं तुम्हारे लिए एक और अनमोल चीज ले कर आया हूं.’’ निक ने मुसकराते हुए जेब से एक छोटी सी डिबिया निकालते हुए कहा, ‘‘यह एक अनोखा टिकट है. इस में प्राचीन सभ्यता को बताया गया है. पूरी दुनिया में यह बस एक ही टिकट है. मैं इसे तुम्हें सिर्फ दिखाने के लिए लाया हूं.’’

निक वेल्वेट ने डिबिया खोल कर क्लारा की तरफ बढ़ा दी. डिबिया में एक बहुत ही पुराना डाक टिकट रखा था. उस ने क्लारा को चेताया, ‘‘यह बहुत पुराना है, जर्जर हालत में. हाथ मत लगाना. इस में एक अजीब सी महक है, सूंघ कर देखो. खास बात यह है कि इस की प्रिंटिंग में जो स्याही इस्तेमाल की गई थी, उस में खुशबू थी, जो आज तक बरकरार है.’’

क्लारा टिकट देख कर हैरान थी. डिबिया को नाक के करीब ले जा कर वह उसे सूंघने लगी. एक मीठी सी खुशबू उस के नथुनों से टकराई तो उस ने 2-3 बार सूंघा. जरा सी देर में वह बैठेबैठे लहराने लगी और फिर बेहोश हो कर वहीं लेट गई. निक के होठों पर मुसकान आ गई. क्लोरोफार्म में डूबे टिकट ने अपना काम कर दिया था. क्लारा ने पिछले दिन उसे बताया था कि उस के कमरे में बिना उस की इजाजत कोई नहीं आ सकता, इसीलिए निक ने यह रिस्क लिया था. क्लारा को ठीक से लिटाने के बाद उस ने कमरे का दरवाजा बंद किया और उस की ड्रेसिंग टेबल की तलाशी लेनी शुरू कर दी. ‘लीलाली’ वाली जामुनी रंग की लिपस्टिक ड्रेसिंग टेबल की दराज में मिल गई. उस ने लिपस्टिक का केस और पुराने टिकट की डिबिया अपने पास संभाल कर रख ली.

पैसों को उस ने हाथ भी नहीं लगाया. वह चाहता तो 3 लाख डौलर ले सकता था, पर यह उस के उसूल के खिलाफ था. नीचे आ कर वह बिना किसी रुकावट के अपनी कार तक पहुंच गया. जब वह कार में बैठ रहा था तो क्लारा की मेड सैंड्रा ने उस की ओर देख कर हाथ हिलाया. उस ने भी खुशदिली से हाथ हिला कर कार स्टार्ट कर दी. गार्ड्स ने भी फौरन गेट खोल दिया. निक आराम से गाड़ी बाहर निकाल ले गया. करीब 2-3 मील का फासला तय करने के बाद निक ने एक मोड़ पर गाड़ी घुमाई ही थी कि अचानक एक तेज रफ्तार कार ने पीछे से आ कर उस का रास्ता रोक दिया. निक ने फुरती से ब्रेक लगाया. इस के पहले कि निक संभल पाता, आने वाली गाड़ी से 2 आदमी उतरे और उस के दाईं और बाईं ओर खड़े हो गए.

तीसरा आदमी स्टीयरिंग पर बैठा था. उन की सूरत देखते ही निक समझ गया कि मामला गड़बड़ है. निक ने सोचा कि कहीं क्लारा की बेहोशी का राज तो नहीं खुल गया. हो सकता है उसी के आदमी पीछे आ गए हों. लेकिन उस ने यह खयाल दिमाग से निकाल दिया, क्योंकि क्लारा को इतनी जल्दी होश आना मुमकिन नहीं था.

आगेपीछे सड़क बिलकुल वीरान पड़ी थी. जो आदमी निक के पास खड़ा था, वह खिड़की पर झुका, उस के हाथ में भारी रिवाल्वर था. उस का दूसरा साथी भी पिस्तौल निकाल चुका था.

‘‘कौन हो तुम लोग, क्या चाहते हो?’’ निक ने पूछा.

‘‘मेरी तरफ देखो, मैं बताता हूं कि हम कौन हैं?’’ एक आदमी ने कहा तो निक ने गरदन घुमा कर उस की तरफ देखा. तभी उस के सिर पर जोरों से रिवाल्वर का दस्ता पड़ा और उस की आंखों के आगे अंधेरा छा गया.

होश में आते ही निक वेल्वेट ने अपनी जेबें टटोलीं. उस की जेबों में सब चीजें मौजूद थीं सिवाय ‘लीलाली’ वाली उस लिपस्टिक के, जिसे वह क्लारा के पास से चुरा कर लाया था. वह सोचने लगा, ‘अगर ये लुटेरे थे तो इन्हें लिपस्टिक में क्या दिलचस्पी हो सकती थी? जेब में करीब 4 हजार डौलर थे, घड़ी थी, लेकिन उन्होंने कुछ भी नहीं लिया था.’

उस ने घड़ी पर नजर डाली. साढ़े 7 बज रहे थे. इस का मतलब वह करीब 2 घंटे बेहोश रहा था. वह सिर सहला ही रहा था कि अचानक दिमाग में धमाका सा हुआ. उसे उस गाड़ी का नंबर याद रह गया था, जिस ने रास्ता रोका था. उस ने जल्दी से वह नंबर अपनी डायरी में नोट किया और गाड़ी स्टार्ट कर दी. उस की वह रात सिर की सिंकाई में गुजरी. निक की जिंदगी का यह पहला मौका था, जब कोई उसे इस तरह चूना लगा गया था. उन लोगों के बारे में सोचसोच कर उस का दिमाग थक गया, पर कुछ समझ में नहीं आया. इस का मतलब वह लिपस्टिक बहुत महत्त्व की थी.

दूसरे दिन सुबह नाश्ते के बाद वह सीधा मोटर व्हीकल रजिस्ट्रेशन के औफिस पहुंच गया. नंबर से पता चला कि वह गाड़ी किसी विलियम के नाम पर रजिस्टर्ड थी. यह जानकारी जुटा कर वह एक रेस्टोरेंट में घुस गया. वहां सुकून से बैठ कर उस ने ग्लोरिया को रेस्टोरेंट में आने को कहा. कौफी का और्डर दे कर वह उस की राह देखने लगा. ग्लोरिया 5-7 मिनट में पहुंच गई. निक ने उस से कहा, ‘‘ग्लोरिया, मुझे तुम से एक काम लेना है.’’

‘‘मैं पहले ही समझ गई थी कि कोई गड़बड़ है. इसलिए मैं लंच ब्रेक तक छुट्टी ले कर आई हूं.’’

‘‘यह तुम ने ठीक किया,’’ निक ने एक कागज उसे देते हुए कहा, ‘‘यह किसी विलियम का पता है. इस के बारे में पूरी मालूमात कर के आओ. मैं घर पर तुम्हारा इंतजार करूंगा. मेरा खयाल है कि तुम 12 बजे तक लौट आओगी.’’

‘‘ठीक है, अगर घर न आ सकी तो 12 बजे तक तुम्हें फोन कर दूंगी.’’ ग्लोरिया ने वादा किया.

कौफी पीने के बाद दोनों रेस्टोरेंट से निकल गए. करीब 12 बजे फोन की घंटी बजी. निक ने लपक कर फोन उठाया. फोन ग्लोरिया का ही था. वह अपने औफिस से बोल रही थी. वह बोली, ‘‘मैं ने विलियम के बारे में मालूम कर लिया है. वह एक बड़ा वकील है और आमतौर पर क्रिमिनल केस लेता है. उस के 2 असिस्टेंट भी हैं, जो उस के साथ ही रहते हैं. इत्तफाक से मैं उन दोनों को भी देख चुकी हूं.’’

ग्लोरिया ने उन दोनों का हुलिया भी बयान कर दिया.

‘‘गुड.’’ निक ने मुसकराते हुए कहा. हुलिए के हिसाब से वे दोनों वही थे, जिन्होंने उस की कार रोकी थी. तीसरे को वह इसलिए नहीं देख सका था, क्योंकि वह कार के अंदर ही बैठा था. उस ने ग्लोरिया को शाबाशी देते हुए कहा, ‘‘तुम ने काफी बड़ा काम कर दिखाया है.’’

निक ने टेलीफोन डायरैक्टरी के जरिए विलियम के औफिस का पता मालूम कर लिया. फिर वह फ्लैट से निकल गया. विलियम का औफिस एक तंग सी गली में तीसरी मंजिल पर था. निक ने कुछ आगे जा कर गली के मोड़ पर गाड़ी रोकी और पैदल ही विलियम के औफिस के ठीक सामने वाली इमारत में घुस गया. यह उस की खुशकिस्मती थी कि इस इमारत में रिहायशी फ्लैट थे. तीसरी मंजिल पर वह उस फ्लैट के दरवाजे पर रुक गया, जो गली के पार विलियम के दफ्तर के ठीक सामने था.

निक ने उस फ्लैट का दरवाजा खटखटाया. करीब 2 मिनट बाद दरवाजा खुला. दरवाजा खोलने वाला एक खस्ताहाल आदमी था, जिस ने पुराने मैले से कपडे़ पहन रखे थे. उसे देख कर निक समझ गया कि वह बड़ी गरीबी में दिन गुजार रहा है.

‘‘मिस्टर निक्सन?’’ निक ने सवालिया अंदाज में पूछा.

‘‘नहीं, मेरा नाम एडगर है.’’ उस ने जवाब दिया.

‘‘माफ करना मिस्टर एडगर, क्या तुम मुझे अंदर आने को नहीं कहोगे?’’ कहते हुए निक ने जेब से पर्स निकाला और उस में से 10 डौलर निकाले. डौलर देख कर एडगर की आंखों में चमक आ गई. उस ने जल्दी से कहा, ‘‘अरे आओ अंदर, मिस्टर…’’

निक ने अंदर आते ही नोट उस के हाथ में दे दिया. एडगर ने झट से दरवाजा बंद कर दिया. निक कमरा देखने लगा. फर्श पर फटापुराना कालीन बिछा था. फरनीचर काफी पुराना और सस्ता सा था. वह सिटिंग रूम था. निक दूसरे कमरे में गया, जिस की एक खिड़की सड़क पर खुलती थी. खिड़की पर मैला सा परदा पड़ा हुआ था. उस कमरे में एक बेड और अलमारी के सिवाय कुछ नहीं था. निक ने खिड़की का परदा उठा कर बाहर देखा. सामने ही विलियम के दफ्तर की खुली खिड़की थी. उस के औफिस में 4 लोग बैठे थे. उन में से 2 तो वही थे, जो उसे चोट पहुंचा कर लिपस्टिक ले गए थे. टेबल के पीछे रिवाल्विंग चेयर पर एक अजनबी आदमी बैठा था. वही शायद विलियम था.

निक एडगर की तरफ देख कर बोला, ‘‘तुम्हारी हालत बहुत खराब दिख रही है.’’

‘‘मैं एक रेस्टोरेंट में वेटर था, पर शराब की लत की वजह से मेरी नौकरी चली गई. 2 महीने से बेकार हूं. 2 दिनों से कुछ खाया भी नहीं है. तुम ने मेरी बड़ी मदद कर दी है.’’

‘‘निक्सन, मेरे बचपन के दोस्त का नाम है. 20 साल पहले उस से मेरी आखिरी मुलाकात इसी फ्लैट में हुई थी. पर अब वह यहां नहीं रहता. उसे कहीं और ढूंढने जाना होगा.’’

‘‘मुझे अफसोस है, तुम्हारे दोस्त से तुम्हारी मुलाकात नहीं हो सकी.’’

‘‘लेकिन मैं कुछ और ही सोच कर परेशान हूं. मैं ने यह जाने बगैर कि मेरा दोस्त यहां है या नहीं, अपने 2 दोस्तों को पुरानी यादें ताजा करने के लिए उन्हें भी यहां बुला लिया. आज रात वे यहां पहुंचने वाले हैं. हम यहां पुरानी यादें ताजा करना चाहते थे. पर सब गड़बड़ हो गया.’’ निक ने उदासी भरे स्वर में कहा.

‘‘अगर तुम्हारे दोस्त यहां आने वाले हैं तो मुझे कोई ऐतराज नहीं है. मैं तुम्हें डिस्टर्ब नहीं करूंगा.’’ एडगर ने खुशीखुशी कहा.

‘‘गुड. क्या यह मुमकिन है कि हम तीनों दोस्त यहां मस्ती करें और तुम आज रात कहीं दूसरी जगह चले जाओ. मेरा मतलब है कि किसी होटल वगैरह में. बात दरअसल यह…’’

‘‘मैं समझ गया.’’ एडगर ने कहा, ‘‘दोस्तों के बीच अजनबी का क्या काम?’’ एडगर ने चापलूसी से कहा. निक ने 50 डौलर उसे थमाए तो मारे खुशी के उस के हाथ कांपने लगे. वह जल्दी से बोला, ‘‘यह लो चाबी, मैं जा रहा हूं. बहुत भूख लगी है. मैं कल दोपहर बाद फ्लैट पर आऊंगा. तुम ताला लगा कर चाबी पड़ोस में दे देना. अगर खुला भी छोड़ दोगे तो कोई बात नहीं. क्योंकि कुछ जाने का डर नहीं है.’’

एडगर ने चाबी निक को थमाई और खुद बाहर निकल गया. उसे डर था कि कहीं वह पैसे वापस न मांग ले. निक उस की सादगी पर मुसकराया. उसे उम्मीद नहीं थी कि इतनी जल्दी काम बन जाएगा. एडगर के जाने के बाद वह भी फ्लैट से बाहर निकल गया. इस इमारत में निक वेल्वेट की वापसी रात को साढ़े 11 बजे हुई. उस वक्त इलाके में पूरी तरह सन्नाटा छा चुका था. किसीकिसी इमारत में हलकी सी रोशनी थी. इस बार भी निक ने अपनी गाड़ी फ्लैट से दूर ही खड़ी की थी. उस ने गाड़ी में से एक बंडल उठाया, जिस में 5-5 फुट के लोहे के 6 चूड़ीदार पाइप थे. ये पाइप निक ने आज दिन में ही खरीदे थे.

उस ने फ्लैट में पहुंच कर खिड़की खोल कर बाहर देखा. सड़क सुनसान थी. सामने वाली इमारत भी अंधेरे में डूबी थी. विलियम के औफिस में भी अंधेरा था. निक देर तक उस औफिस की खिड़की को ध्यान से देखता रहा. उस ने कुरसी पर बैठ कर एक सिगरेट सुलगा ली. रात के करीब डेढ़ बजे उस ने पाइप निकाले और उन्हें सौकिट की मदद से जोड़ने लगा. हर पाइप में चूडि़यां थीं, इसलिए सब आसानी से जुड़ गए. इस तरह 30 फुट लंबा पाइप तैयार हो गया. निक ने कमरे के बीच का दरवाजा भी खोल लिया था. पाइप तैयार होने के बाद उस ने ध्यान से बाहर देखा, कहीं कोई हलचल नहीं थी. अब मंसूबे पर काम करने का वक्त आ गया था. उस ने पाइप खिड़की से बाहर निकाला. एक इंच मोटा पाइप धीरेधीरे बाहर निकलने लगा.

उसे संभालने के लिए निक को बहुत ताकत लगानी पड़ रही थी, जैसेतैसे उस ने पाइप का दूसरा सिरा विलियम के औफिस के छज्जे पर टिका दिया. फिर उस ने पाइप को अच्छे से सेट कर के एक बार फिर नीचे देखा. नीचे बिलकुल सन्नाटा था. यह बात निक ने दिन में ही नोट कर ली थी कि गली करीब 20 फुट चौड़ी है. फिर भी उस ने सावधानी के लिए 30 फुट का पाइप लिया था. विलियम के औफिस तक पहुंचने का उसे बस यही एक रास्ता समझ में आया था. क्योंकि दिन में वह देख चुका था कि इमारत में 2-3 वर्दीवाले बंदूकधारी गार्ड्स रहते हैं और रात के वक्त उन्हें धोखा दे कर इमारत में दाखिल होना मुमकिन नहीं है. वह जो कर रहा था, उस में रिस्क तो था, पर रिस्क लिए बिना काम होना संभव नहीं था.

निक उछल कर खिड़की की चौखट पर चढ़ गया. फिर पाइप पर लटक कर वह धीरेधीरे विलियम के औफिस की तरफ बढ़ने लगा. वह सोच रहा था कि अगर किसी ने उसे इस तरह लटकते देख लिया तो बचना मुश्किल होगा. इस से बड़ा खतरा एक और भी था. दरअसल एडगर के फ्लैट की खिड़की पर पाइप का सिरा 6 फुट अंदर था, जबकि विलियम के औफिस की खिड़की का छज्जा डेढ़-2 फुट चौड़ा था. अगर पाइप छज्जे से हट जाता तो उस की हड्डियों का चूरा हो सकता था. तीसरी मंजिल से गिर कर बचना असंभव था. इसलिए वह बहुत सावधानी से बहुत धीरेधीरे आगे बढ़ रहा था, ताकि पाइप को झटका न लगे और वह अपनी जगह पर टिका रहे.

आखिर वह दूसरे किनारे पर पहुंच गया. पाइप छोड़ कर वह छज्जे से लटक गया. ऊपर चढ़ने में उसे कोई खास मुश्किल नहीं हुई. यह उस की खुशकिस्मती थी कि खिड़की अंदर से बंद नहीं थी. अंदर पहुंच कर निक ने फूली सांसें दुरुस्त कीं, फिर कमरे का निरीक्षण करने लगा. इस के लिए उस ने अपनी पेंसिल टौर्च निकाल ली थी. यह एक कमरे का औफिस था. दीवार में अलमारियां बनी हुई थीं, जिन में कानून की ढेरों किताबें रखी थीं. एक तरफ फाइल कैबिनेट थी. एक लोहे की तिजोरी लगी थी. निक वेल्वेट ने पहले दराजों की तलाशी ली, फिर तिजोरी पर ध्यान दिया. वालकाट कंपनी की तिजोरी का मेक देख कर निक खुश हो गया. इसे खोलना उस के बाएं हाथ का खेल था. वह अपने सामान के साथ तिजोरी पर झुक गया.

3 मिनट में उस ने तिजोरी खोल ली. तिजोरी में कई खास केसेज की फाइलें रखी हुई थीं. एक खाने में उसे लिपस्टिक भी मिल गई. उस ने उसे संभाल कर जेब में रखा, फिर उसी खाने में रखी एक फाइल उठा कर पढ़ने लगा. यह किसी के कत्ल का केस था. निक को यह केस खासा दिलचस्प लगा. वह देर तक फाइल देखता रहा, पढ़ता रहा. फिर उस ने फाइल वहीं रख कर तिजोरी बंद कर दी और खिड़की से निकल कर जिस रास्ते आया था, उसी रास्ते वापसी का सफर तय करने लगा. वह एडगर की खिड़की से करीब 4 फुट दूर था कि एक कार गली में दाखिल हुई. कार की छत पर जलने वाली नीलीलाल बत्ती बता रही थी कि वह पुलिस की पैट्रोलिंग कार थी. कार गली में ठीक पाइप के नीचे रुक गई.

निक को अपनी सांस रुकती हुई लगी. उस ने नीचे झांक कर देखा, 2 पुलिस वाले कार से निकल आए थे. उन में से एक के हाथ में रिवाल्वर था. उन्होंने निक वेल्वेट को देख लिया था. एक ने चीख कर कुछ कहा पर निक की समझ में नहीं आया. एक पुलिस वाला इमारत के दरवाजे की तरफ दौड़ा. निक तेजी से आगे बढ़ने लगा, 4 फुट का फासला उसे इस वक्त जैसे 4 मील का लग रहा था. पाइप को झटके लग रहे थे. उसे डर था कि दूसरी खिड़की के छज्जे से पाइप सरक न जाए.

आखिरकार वह खिड़की तक पहुंच गया. उस ने जैसे ही पाइप को छोड़ा, एक जोरदार झटका लगा. दफ्तर वाली खिड़की के छज्जे से पाइप हट गया और वह नीचे गिरने लगा. निक चौखट पर चढ़ चुका था. उस ने जैसे ही कमरे में छलांग लगाई, गली में पाइप के गिरने की आवाज आई. पाइप शायद पुलिस की कार पर गिरा था. निक वेल्वेट यूं ही दरवाजा बंद कर के फ्लैट से बाहर निकला तो नीचे सीढि़यों पर भारी कदमों की आवाज सुनाई दी. पुलिस वाले तेजतेज कदमों से ऊपर आ रहे थे. निक ने इधरउधर देखा और फौरन ऊपर जाने वाले जीने की तरफ दौड़ पड़ा. वहां से तीसरी इमारत में पहुंच कर पीछे के जीने से होता हुआ वह अपनी कार तक पहुंच गया. फिर उस ने इंजिन स्टार्ट कर तेजी से एक तरफ गाड़ी दौड़ा दी. अब वह पुलिस की पहुंच से बाहर था.

मिस स्वीटी और निक वेल्वेट की मुलाकात एक रेस्टोरेंट में हुई. निक के साथ ग्लोरिया भी थी. बातचीत के बाद निक ने जेब से लिपस्टिक निकाल कर स्वीटी को थमाते हुए कहा, ‘‘अच्छे से चैक कर लो, वही लिपस्टिक है न?’’

‘‘हां, बिलकुल वही है. बहुतबहुत शुक्रिया. तुम ने मुझे बड़ी मुसीबत से बचा लिया.’’ स्वीटी ने लिपस्टिक को ध्यान से देख कर कहा.

‘‘अब की बार तुम बच गई, लेकिन आइंदा ऐसी हरकत मत करना, वरना…’’ निक ने बात अधूरी छोड़ दी.

‘‘…वरना क्या?’’ स्वीटी ने उलझन भरी नजरों से निक की ओर देखते हुए कहा.

‘‘वरना यह भी हो सकता है कि फांसी का फंदा तुम्हारे गले में फिट हो जाए.’’ निक रूखे स्वर में बोला.

स्वीटी का चेहरा एकदम उतर गया. कुछ पल वह निक को देखती रही, फिर बिना कुछ कहे उठ खड़ी हुई और रेस्टोरेंट से बाहर निकल गई.

‘‘क्या मामला था निक?’’ ग्लोरिया ने पूछा तो निक बोला, ‘‘यह लिपस्टिक सुबूत के तौर पर एक कत्ल के मुकदमे में पेश होने वाली थी. अगर यह अदालत तक पहुंच जाती तो स्वीटी को सजाएमौत नहीं तो उम्रकैद जरूर हो सकती थी.’’

‘‘मैं समझी नहीं.’’

‘‘बात दरअसल यह है कि स्वीटी जेम्स नाम के एक आदमी से मोहब्बत करती थी. बहुत दिनों बाद राज खुला कि उस की दोस्त क्लारा भी जेम्स को चाहती थी. एक रात जब स्वीटी जेम्स के घर पहुंची तो वहां कोई भी नहीं था. वहां उसे ड्रेसिंग टेबल पर क्लारा का एक खत मिल गया, जो जेम्स के नाम था. उन दोनों ने किसी और जगह मुलाकात का प्रोग्राम बनाया था. स्वीटी जल कर रह गई. उस ने गुस्से में पर्स से लिपस्टिक निकाली और जेम्स की तसवीर पर, जो ड्रेसिंग टेबल पर रखी थी, कई आड़ीतिरछी लकीरें खींच दीं. तसवीर को उस ने क्रौस भी कर दिया.

‘‘यह लिपस्टिक प्रोडक्शन मैनेजर ने उसे उसी दिन दी थी, जो बदहवासी में उस ने ड्रेसिंग टेबल पर फेंक दी और पैर पटकती हुई बाहर निकल गई. इत्तफाक से थोड़ी देर बाद क्लारा वहां पहुंच गई. उस ने लिपस्टिक उठा कर अपने पर्स में डाली और वहां से चली गई.

‘‘उसी रात किसी ने जेम्स को कत्ल कर दिया. पुलिस के ख्याल में कातिल वही था, जिस ने लिपस्टिक से जेम्स की तसवीर पर क्रौस का निशान लगाया था. पुलिस को इस लिपस्टिक की तलाश थी, ताकि उस के मालिक का पता लगाया जा सके. जेम्स के भाई ने विलियम को वकील किया, विलियम को इस लिपस्टिक की तलाश थी, ताकि इसे सुबूत के तौर पर अदालत में पेश कर सके.

‘‘विलियम को स्वीटी पर शक था. किसी तरह उसे पता चल गया था कि स्वीटी को भी उस लिपस्टिक की तलाश है. उसे यह मालूम हो गया था कि वही लिपस्टिक मिस क्लारा के कब्जे में है. उसे यह भी पता चल गया था कि स्वीटी मेरे जरिए वह लिपस्टिक हासिल करना चाहती है. इस के बाद उस ने मेरे पीछे अपने आदमी लगा दिए.

‘‘मैं जैसे ही क्लारा के घर से लिपस्टिक चुरा कर निकला, विलियम के आदमियों ने मुझे घेर लिया और मुझे बेहोश कर के लिपस्टिक ले उड़े. गनीमत यही थी कि मुझे उस की गाड़ी का नंबर याद रह गया था. फिर मैं ने तुम्हारे जरिए उस गाड़ी के मालिक के बारे में मालूमात हासिल की और पिछली रात जुगाड़ कर उस के दफ्तर में जा घुसा, जहां से यह लिपस्टिक हासिल की.

‘‘उस के दफ्तर में कत्ल के केस की एक फाइल मुझे दिखी, मैं ने उसे पढ़ा तो पता चला कि कत्ल किसी और ने किया था, पर विलियम और जेम्स का भाई जेम्स के कत्ल का इल्जाम स्वीटी पर लगा कर उसे फंसाना चाहते थे. वे उसी लिपस्टिक को सुबूत के तौर पर स्वीटी के खिलाफ पेश करना चाहते थे.

‘‘लेबोरेटरी टेस्ट से जब यह साबित हो जाता कि जेम्स की तसवीर पर लकीरें स्वीटी की लिपस्टिक से लगाई गई थीं तो उन के लिए यह प्रूव करना मुश्किल नहीं था कि नफरत और जलन की भावना से तैश में आ कर पहले उस ने उस की तसवीर बिगाड़ी, फिर उसे कत्ल कर दिया. यह स्वीटी की खुशकिस्मती थी कि वह लिपस्टिक मुझे मिल गई थी.’’

‘‘ओह तो यह चक्कर था.’’ ग्लोरिया ने ताज्जुब से कहा.

‘‘यह चक्कर तो अब खत्म हो गया, पर इस बार मुझे बहुत पापड़ बेलने पड़े. मेरी जान तक खतरे में पड़ गई.’’

बातचीत के बाद दोनों रेस्टोरेंट से निकल कर दरिया के किनारे सैर को निकल गए. Suspense Story

 

Hindi Stories: सूखा पत्ता – संगीता के साथ क्या हुआ

Hindi Stories: 6 महीने पहले ही रवि की शादी पड़ोस के एक गांव में रहने वाले रघुवर की बेटी संगीता से हुई थी. उस के पिता मास्टर दयाराम ने खुशी के इस मौके पर पूरे गांव को भोज दिया था. अब से पहले गांव में इतनी धूमधाम से किसी की शादी नहीं हुई थी. मास्टर दयाराम दहेज के लोभी नहीं थे, तभी तो उन्होंने रघुवर जैसे रोज कमानेखाने वाले की बेटी से अपने एकलौते बेटे की शादी की थी. उन्हें तो लड़की से मतलब था और संगीता में वे सारे गुण थे, जो मास्टरजी चाहते थे.

पढ़ाई के बाद जब रवि की कहीं नौकरी नहीं लगी, तो मास्टर दयाराम ने उस के लिए शहर में मोबाइल फोन की दुकान खुलवा दी. शहर गांव से ज्यादा दूर नहीं था. रवि मोटरसाइकिल से शहर आनाजाना करता था. शादी से पहले संगीता का अपने गांव के एक लड़के मनोज के साथ जिस्मानी रिश्ता था. गांव वालों ने उन दोनों को एक बार रात के समय रामदयाल के खलिहान में सैक्स संबंध बनाते हुए रंगे हाथों पकड़ा था.

गांव में बैठक हुई थी. दोनों को आइंदा ऐसी गलती न करने की सलाह दे कर छोड़ दिया गया था. संगीता के मांबाप गरीब थे. 2 बड़ी लड़कियों की शादी कर के उन की कमर पहले ही टूट हुई थी. उन की जिंदगी की गाड़ी किसी तरह चल रही थी. ऐसे में जब मास्टर दयाराम के बेटे रवि का संगीता के लिए रिश्ता आया, तो उन्हें अपनी बेटी की किस्मत पर यकीन ही नहीं हुआ था. उन्हें डर था कि कहीं गांव वाले मनोज वाली बात मास्टर दयाराम को न बता दें, पर ऐसा कुछ नहीं हुआ था. वही बहू अब मनोज के साथ घर से भाग गई थी. रवि को फोन कर के बुलाया गया. उसे यकीन नहीं हो रहा था कि उस की बीवी किसी गैर मर्द के साथ भाग सकती है, उस की नाक कटवा सकती है.

‘‘थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई जाए,’’ बिरादरी के मुखिया ने सलाह दी. ‘‘नहीं मुखियाजी…’’ मास्टर दयाराम ने कहा, ‘‘मैं रिपोर्ट दर्ज कराने के हक में नहीं हूं. रिपोर्ट दर्ज कराने से क्या होगा? अगर पुलिस उसे ढूंढ़ कर ले भी आई, तो मैं उसे स्वीकार कैसे कर पाऊंगा.

‘‘गलती शायद हमारी भी रही होगी. मेरे घर में उसे किसी चीज की कमी रही होगी, तभी तो वह सबकुछ ठुकरा कर चली गई. वह जिस के साथ भागी है, उसी के साथ रहे. मुझे अब उस से कोई मतलब नहीं है.’’ ‘‘रवि से एक बार पूछ लो.’’

‘‘नहीं मुखियाजी, मेरा फैसला ही रवि का फैसला है.’’ शहर आ कर संगीता और मनोज किराए का मकान ले कर पतिपत्नी की तरह रहने लगे. संगीता पैसे और गहने ले कर भागी थी, इसलिए उन्हें खर्चे की चिंता न थी. वे खूब घूमते, खूब खाते और रातभर खूब मस्ती करते.

सुबह के तकरीबन 9 बज रहे थे. मनोज खाट पर लेटा हुआ था… तभी संगीता नहा कर लौटी. उस के बाल खुले हुए थे. उस ने छाती तक लहंगा बांध रखा था.

मनोज उसे ध्यान से देख रहा था. साड़ी पहनने के लिए संगीता ने जैसे ही नाड़ा खोला, लहंगा हाथ से फिसल कर नीचे गिर गया. संगीता का बदन मनोज को बेचैन कर गया. उस ने तुरंत संगीता को अपनी बांहों में भर लिया और चुंबनों की बौछार कर दी. वह उसे खाट पर ले आया.

‘‘अरे… छोड़ो न. क्या करते हो? रातभर मस्ती की है, फिर भी मन नहीं भरा तुम्हारा,’’ संगीता कसमसाई. ‘‘तुम चीज ही ऐसी हो जानेमन कि जितना प्यार करो, उतना ही कम लगता है,’’ मनोज ने लाड़ में कहा.

संगीता समझ गई कि विरोध करना बेकार है, खुद को सौंपने में ही समझदारी है. वह बोली, ‘‘अरे, दरवाजा तो बंद कर लो. कोई आ जाएगा.’’ ‘‘इस वक्त कोई नहीं आएगा जानेमन. मकान मालकिन लक्ष्मी सेठजी के घर बरतन मांजने गई है. रही बात उस के पति कुंदन की, तो वह 10 बजे से पहले कभी घर आता नहीं. बैठा होगा किसी पान के ठेले पर. अब बेकार में वक्त बरबाद मत कर,’’ कह कर मनोज ने फिर एक सैकंड की देर नहीं की.

वे प्रेमलीला में इतने मगन थे कि उन्हें पता ही नहीं चला कि बाहर आंगन से कुंदन की प्यासी निगाहें उन्हें देख रही थीं.

दूसरे दिन कुंदन समय से पहले ही घर आ गया. जब से उस ने संगीता को मनोज के साथ बिस्तर पर मस्ती करते देखा था, तभी से उस की लार टपक रही थी. उस की बीवी लक्ष्मी मोटी और बदसूरत औरत थी. ‘‘मनोज नहीं है क्या भाभीजी?’’ मौका देख कर कुंदन संगीता के पास आ कर बोला.

‘‘नहीं, वह काम ढूंढ़ने गया है.’’ ‘‘एक बात बोलूं भाभीजी… तुम बड़ी खूबसूरत हो.’’

संगीता कुछ नहीं बोली. ‘‘तुम जितनी खूबसूरत हो, तुम्हारी प्यार करने की अदा भी उतनी ही खूबसूरत है. कल मैं ने तुम्हें देखा, जब तुम खुल कर मनोज भैया को प्यार दे रही थीं…’’ कह कर उस ने संगीता का हाथ पकड़ लिया, ‘‘मुझे भी एक बार खुश कर दो. कसम तुम्हारी जवानी की, किराए का एक पैसा नहीं लूंगा.’’

‘‘पागल हो गए हो क्या?’’ संगीता ने अपना हाथ छुड़ाया, पर पूरी तरह नहीं. ‘‘पागल तो नहीं हुआ हूं, लेकिन अगर तुम ने खुश नहीं किया तो पागल जरूर हो जाऊंगा,’’ कह कर उस ने संगीता को अपनी बांहों में भर लिया.

‘‘छोड़ो मुझे, नहीं तो शोर मचा दूंगी,’’ संगीता ने नकली विरोध किया. ‘‘शोर मचाओगी, तो तुम्हारा ही नुकसान होगा. शादीशुदा हो कर पराए मर्द के साथ भागी हो. पुलिस तुम्हें ढूंढ़ रही है. बस, खबर देने की देर है.’’

संगीता तैयार होने वाली ही थी कि अचानक किसी के आने की आहट हुई. शायद मनोज था. कुंदन बौखला कर चला गया. मनोज को शक हुआ, पर कुंदन को कुछ कहने के बजाय उस ने उस का मकान ही खाली कर दिया.

उन के पैसे खत्म हो रहे थे. महंगा मकान लेना अब उन के बस में नहीं था. इस बार उन्हें छोटी सी खोली मिली. वह गंगाबाई की खोली थी. गंगाबाई चावल की मिल में काम करने जाती थी. उस का पति एक नंबर का शराबी था. उस के कोई बच्चा नहीं था. मनोज और संगीता जवानी के खूब मजे तो ले रहे थे, पर इस बीच मनोज ने यह खयाल जरूर रखा कि संगीता पेट से न होने पाए. पैसे खत्म हो गए थे. अब गहने बेचने की जरूरत थी. सुनार ने औनेपौने भाव में उस के गहने खरीद लिए. मनोज को कपड़े की दुकान में काम मिला था, पर किसी बात को ले कर सेठजी के साथ उस का झगड़ा हो गया और उन्होंने उसे दुकान से निकाल दिया.

उस के बाद तो जैसे उस ने काम पर न जाने की कसम ही खा ली थी. संगीता काम करने को कहती, तो वह भड़क जाता था. संगीता गंगाबाई के कहने पर उस के साथ चावल की मिल में जाने लगी. सेठजी संगीता से खूब काम लेते, पर गंगाबाई को आराम ही आराम था. वजह पूछने पर गंगाबाई ने बताया कि उस का सेठ एक नंबर का औरतखोर है. जो भी नई औरत काम पर आती है, वह उसे परेशान करता है. अगर तुम्हें भी आराम चाहिए, तो तुम भी सेठजी को खुश कर दो. ‘‘इस का मतलब गंगाबाई तुम भी…’’ संगीता ने हैरानी से कहा.

‘‘पैसों के लिए इनसान को समझौता करना पड़ता है. वैसे भी मेरा पति ठहरा एक नंबर का शराबी. उसे तो खुद का होश नहीं रहता, मेरा क्या खयाल करेगा. उस से न सही, सेठ से सही…’’ संगीता को गंगाबाई की बात में दम नजर आया. वह पराए मर्द के प्यार के चक्कर में भागी थी, तो किसी के भी साथ सोने में क्या हर्ज?

अब सेठ किसी भी बहाने से संगीता को अपने कमरे में बुलाता और अपनी बांहों में भर कर उस के गालों को चूम लेता. संगीता को यह सब अच्छा न लगता. उस के दिलोदिमाग पर मनोज का नशा छाया हुआ था. वह सोचती कि काश, सेठ की जगह मनोज होता. पर अब तो वह लाचार थी. उस ने समझौता कर लिया था. कई बार वह और गंगाबाई दोनों सेठ को मिल कर खुश करती थीं. फिर भी उन्हें पैसे थोड़े ही मिलते. सेठ ऐयाश था, पर कंजूस भी.

एक दिन मनोज बिना बताए कहीं चला गया. संगीता उस का इंतजार करती रही, पर वह नहीं आया. जिस के लिए उस ने ऐशोआराम की दुनिया ठुकराई, जिस के लिए उस ने बदनामी झेली, वही मनोज उसे छोड़ कर चला गया था. संगीता पुरानी यादों में खो गई. मनोज संगीता के भैया नोहर का जिगरी दोस्त था. उस का ज्यादातर समय नोहर के घर पर ही बीतता था. वे दोनों राजमिस्त्री का काम करते थे. छुट्टी के दिन जीभर कर शराब पीते और संगीता के घर मुरगे की दावत चलती.

मनोज की बातबात में खिलखिला कर हंसने की आदत थी. उस की इसी हंसी ने संगीता पर जादू कर दिया था. दोनों के दिल में कब प्यार पनपा, पता ही नहीं चला. संगीता 12वीं जमात तक पढ़ चुकी थी. उस के मांबाप तो उस की पढ़ाई 8वीं जमात के बाद छुड़ाना चाहते थे, पर संगीता के मामा ने जोर दे कर कहा था कि भांजी बड़ी खूबसूरत है. 12वीं जमात तक पढ़ लेगी, तो किसी अच्छे घर से रिश्ता आ जाएगा.

पढ़ाई के बाद संगीता दिनभर घर में रहती थी. उस का काम घर का खाना बनाना, साफसफाई करना और बरतन मांजना था. मांबाप और भैया काम पर चले जाते थे. नोहर से बड़ी 2 और बहनें थीं, जो ब्याह कर ससुराल चली गई थीं. एक दिन मनोज नशे की हालत में नोहर के घर पहुंच गया. दोपहर का समय था. संगीता घर पर अकेली थी. मनोज को इस तरह घर में आया देख संगीता के दिल की धड़कन तेज हो गई.

उन्होंने इस मौके को गंवाना ठीक नहीं समझा और एकदूसरे के हो गए. इस के बाद उन्हें जब भी समय मिलता, एक हो जाते. एक दिन नोहर ने उन दोनों को रंगे हाथों पकड़ लिया. घर में खूब हंगामा हुआ, लेकिन इज्जत जाने के डर से संगीता के मांबाप ने चुप रहने में ही भलाई समझी, पर मनोज और नोहर की दोस्ती टूट गई.

संगीता और मनोज मिलने के बहाने ढूंढ़ने लगे, पर मिलना इतना आसान नहीं था. एक दिन उन्हें मौका मिल ही गया और वे दोनों रामदयाल के खलिहान में पहुंच गए. वे दोनों अभी दीनदुनिया से बेखबर हो कर एकदूसरे में समाए हुए थे कि गांव के कुछ लड़कों ने उन्हें पकड़ लिया.

समय गुजरा और एक दिन मास्टर दयाराम ने अपने बेटे रवि के लिए संगीता का हाथ मांग लिया. दोनों की शादी बड़ी धूमधाम से हो गई.

संगीता ससुराल आ गई, पर उस का मन अभी भी मनोज के लिए बेचैन था. पति के घर की सुखसुविधाएं उसे रास नहीं आती थीं. दोनों के बीच मोबाइल फोन से बातचीत होने लगी. संगीता की सास जब अपने गांव गईं, तो उस ने मनोज को फोन कर के बुला लिया और वे दोनों चुपके से निकल भागे.

अब संगीता पछतावे की आग में झुलस रही थी. उसे अपनी करनी पर गुस्सा आ रहा था. गरमी का मौसम था. रात के तकरीबन 10 बज रहे थे. उसे ससुराल की याद आ गई. ससुराल में होती, तो वह कूलर की हवा में चैन की नींद सो रही होती. पर उस ने तो अपने लिए गड्ढा खोद लिया था.

उसे रवि की याद आ गई. कितना अच्छा था उस का पति. किसी चीज की कमी नहीं होने दी उसे. पर बदले में क्या दिया… दुखदर्द, बेवफाई. संगीता सोचने लगी कि क्या रवि उसे माफ कर देगा? हांहां, जरूर माफ कर देगा. उस का दिल बहुत बड़ा है. वह पैर पकड़ कर माफी मांग लेगी. बहुत दयालु है वह. संगीता ने अपनी पुरानी दुनिया में लौटने का मन बना लिया.

‘‘गंगाबाई, मैं अपने घर वापस जा रही हूं. किराए का कितना पैसा हुआ है, बता दो?’’ संगीता ने कहा. ‘‘संगीता, मैं ने तुम्हें हमेशा छोटी बहन की तरह माना है. मैं तेरी परेशानी जानती हूं. ऐसे में मैं तुम से पैसे कैसे ले सकती हूं. मैं भी चाहती हूं कि तू अपनी पुरानी दुनिया में लौट जा. मेरा आशीर्वाद है कि तू हमेशा सुखी रहे.’’

मन में विश्वास और दिल के एक कोने में डर ले कर जब संगीता बस से उतरी, तो उस का दिल जोर से धड़क रहा था. वह नहीं चाहती थी कि कोई उसे पहचाने, इसलिए उस ने साड़ी के पल्लू से अपना सिर ढक लिया था. जैसे ही वह घर के पास पहुंची, उस के पांव ठिठक गए. रवि ने उसे अपनाने से इनकार कर दिया तो… उस ने उस दोमंजिला पक्के मकान पर एक नजर डाली. लगा जैसे अभीअभी रंगरोगन किया गया हो. जरूर कोई मांगलिक कार्यक्रम वगैरह हुआ होगा.

‘‘बहू…’’ तभी संगीता के कान में किसी औरत की आवाज गूंजी. वह आवाज उस की सास की थी. उस का दिल उछला. सासू मां ने उसे घूंघट में भी पहचान लिया था. वह दौड़ कर सासू मां के पैरों में गिरने को हुई, लेकिन इस से पहले ही उस की सारी खुशियां पलभर में गम में बदल गईं. ‘‘बहू, रवि को ठीक से पकड़ कर बैठो, नहीं तो गिर जाओगी.’’

संगीता ने देखा, रवि मोटरसाइकिल पर सवार था और पीछे एक औरत बैठी हुई थी. संगीता को यह देख कर धक्का लगा. इस का मतलब रवि ने दूसरी शादी कर ली. उस का इंतजार भी नहीं किया.

इस से पहले कि वह कुछ सोच पाती, मोटरसाइकिल फर्राटे से उस के बगल से हो कर निकल गई. संगीता ने उन्हें देखा. वे दोनों बहुत खुश नजर आ रहे थे.

तभी वहां एक साइकिल सवार गुजरा. संगीता ने उसे रोका, ‘‘चाचा, अभी रवि के साथ मोटरसाइकिल पर बैठ कर गई वह औरत कौन है?’’ ‘‘अरे, उसे नहीं जानती बेटी? लगता है कि इस गांव में पहली बार आई हो. वह तो रवि बाबू की नईनवेली दुलहन है.’’

‘‘नईनवेली दुलहन?’’ ‘‘हां बेटी, वह रवि बाबू की दूसरी पत्नी है. पहली पत्नी बड़ी चरित्रहीन निकली. अपने पुराने प्रेमी के साथ भाग गई. वह बड़ी बेहया थी. इतने अच्छे परिवार को ठोकर मार कर भागी है. कभी सुखी नहीं रह पाएगी,’’ इतना कह कर वह साइकिल सवार आगे बढ़ गया.

संगीता को लगा, उस के पैर तले की जमीन खिसक रही है और वह उस में धंसती चली जा रही है. अब उस से एक पल भी वहां रहा नहीं गया. जिस दुनिया में लौटी थी, वहां का रास्ता हमेशा के लिए बंद हो चुका था. उसे चारों तरफ अंधेरा नजर आने लगा था. तभी संगीता को अंधेरे में उम्मीद की किरण नजर आने लगी… अपना मायका. सारी दुनिया भले ही उसे ठुकरा दे, पर मायका कभी नहीं ठुकरा सकता. भारी मन लिए वह मायके के लिए निकल पड़ी.

किवाड़ बंद था. संगीता ने दस्तक दी. मां ने किवाड़ खोला. ‘‘मां…’’ वह जैसे ही दौड़ कर मां से लिपटने को हुई, पर मां के इन शब्दों ने उसे रोक दिया, ‘‘अब यहां क्या लेने आई है?’’

‘‘मां, मैं यहां हमेशा के लिए रहने आई हूं.’’ ‘‘हमारी नाक कटा कर भी तुझे चैन नहीं मिला, जो बची इज्जत भी नीलाम करने आई है. यह दरवाजा अब तेरे लिए हमेशा के लिए बंद हो चुका है.’’

‘‘नहीं मां….’’ वह रोने लगी, ‘‘ऐसा मत कहो.’’ ‘‘तू हम सब के लिए मर चुकी है. अच्छा यह है कि तू कहीं और चली जा,’’ कह कर मां ने तुरंत किवाड़ बंद कर दिया.

संगीता किवाड़ पीटने लगी और बोली, ‘‘दरवाजा खोलो मां… दरवाजा खोलो मां…’’ पर मां ने दरवाजा नहीं खोला. भीतर मां रो रही थी और बाहर बेटी.

संगीता को लगा, जैसे उस का वजूद ही खत्म हो चुका है. उस की हालत पेड़ से गिरे सूखे पत्ते जैसी हो गई है, जिसे बरबादी की तेज हवा उड़ा ले जा रही है. दूर, बहुत दूर. इस सब के लिए वह खुद ही जिम्मेदार थी. उस से अब और आगे बढ़ा नहीं गया. वह दरवाजे के सामने सिर पकड़ कर बैठ गई और सिसकने लगी. अब गंगाबाई के पास लौटने और सेठ को खुश रखने के अलावा कोई चारा नहीं था… पर कब तक? Hindi Stories

Hindi Story: उसका दुख – नई दुल्हन का सफर

Hindi Story: टैक्सी हिचकोले खा रही थी. कच्ची सड़क पार कर पक्की सड़क पर आते ही मैं ने अपने माथे से पंडितजी द्वारा कस कर बांधा गया मुकुट उतार दिया. पगड़ी और मुकुट पसीने से चिपचिपे हो गए थे. बगल में बैठी सिमटीसिकुड़ी दुलहन की ओर नजर घुमा कर देखा, तो वह टैक्सी की खिड़की की ओर थोड़े से घूंघट से सिर निकाल कर अपने पीछे छोड़ आए बाबुल के घर की यादें अपनी भीगी आंखों में संजो लेने की कोशिश कर रही थी.

मैं ने धीरे से कहा, ‘‘अभी बहुत दूर जाना है. मुकुट उतार लो.’’

चूड़ियों की खनक हुई और इसी खनक के संगीत में उस ने अपना मुकुट उतार कर वहीं पीछे रख दिया, जहां मैं ने मुकुट रखा था. चूड़ियों के इस संगीत ने मुझे दूर यादों में पहुंचा दिया. मुझे ऐसा लगने लगा, जैसे मेरे अंदर कुछ उफनने लगा हो, जो उबाल आ कर आंखों की राह बह चलेगा. आज से 15 साल पहले मैं इसी तरह नंदा को दुलहन बना कर ला रहा था. तब नएपन का जोश था, उमंग थी, कुतूहल था. तब मैं ने इसी तरह कार में बैठी लाज से सिकुड़ी दुलहन का मौका देख कर चुपके से घूंघट उठाने की कोशिश की थी. वह मेरा हाथ रोक कर और भी ज्यादा सिकुड़ गई थी.

मैं ने उसे अभी तक देखा ही नहीं था. मैं ने चाचाजी की पसंद को ही अपनी पसंद मान लिया था. अब उसे देखने के लिए मन उतावला हो रहा था. नंदा को पा कर मैं फूला नहीं समा रहा था. वह भी खुश थी. भरेपूरे परिवार में वह जल्दी ही हिलमिल गई. मां उस की तारीफ करते नहीं अघाती थीं. घर में जो भी औरतें आतीं, वे अपनी बहू से उन्हें जरूर मिलाती थीं. अपने 5 बेटों और बड़ी बहू का वे उतना ध्यान नहीं रखतीं, जितना उस का रखती थीं. सासससुर की देखरेख, देवरननदों की पढ़ाई की सुविधा जुटाना, मुझे कालेज में जाने के लिए कपड़े, जूते, किताबें तैयार कराना, नौकरचाकरों को अपनी देखरेख में काम कराना उस के जिम्मे लगने लगा था.

अगर मैं कभीशहर घूम आने या अपने दोस्तों के यहां चलने के लिए कहता, तो वह धीरे से कह देती, ‘ससुरजी को दवा देनी है. नौकरों से सब्जी की गुड़ाई करानी है. जानवरों के सानीपानी देना है. जेठानीजी अकेले कहां करा पाएंगी इतना सारा काम? मैं चली जाऊंगी, तो सासूमां को तकलीफ उठानी पड़ेगी. आज नहीं, फिर कभी.’

उस की ऐसी दलीलों को सुन कर मन मसोस कर मुझे चुप रह जाना पड़ता. जोशीजी की पत्नी ताना दे कर कहतीं, ‘‘मास्टरजी, कभी बहू को तो यहां लाया करो. आप ने तो उन्हें ऐसे छिपा लिया है, जैसे हम नजर लगा देंगे.’’

कालेज से जब घर लौटता, तो थक कर चूर हो जाता था. कभीकभी तो आठों पीरियड पढ़ाने पड़ जाते थे. मेरी तकलीफ नंदा जानती थी. समय निकाल कर जिद कर के वह मालिश करने लग जाती. एक दिन वह मुझ से नाराज थी. रात को बिना खाए ही सो गई. बात यह थी कि उस ने उस दिन मेरे पास आ कर कहा था, ‘‘पतिजी, एक बात कहूं? अगर आप मानोगे, तो तब कहूंगी,’’ वह बड़ी ही मासूमियत से बोली थी. वह अकेले में मुझे ‘पतिजी’ कहती थी.

मैं ने प्यार से कहा, ‘‘कहो तो सही.’’

‘‘पहले मानूंगा कहो,’’ वह बोली.

‘‘अच्छा बाबा, मानूंगा,’’ मैं बोला.

‘‘मुझे कुछ ज्यादा पैसे चाहिए,’’ उस ने कहा.

‘‘किसलिए चाहिए, यह तो बताओ?’’

‘‘अभी यह मत पूछो. तुम्हें अपनेआप पता चल जाएगा. मुझे 3 सौ रुपए की जरूरत है,’’ वह बोली.

‘‘जब तक तुम वजह नहीं बताओगी, पैसे नहीं मिलेंगे,’’ मैं ने भी अपना फैसला सुना दिया.

इस के बाद वह रात को मुझ से नहीं बोली. सब को खाना खिला कर वह बिना खाए ही सो गई.

दूसरे दिन मांजी को नंदा से कहते हुए सुना, ‘‘क्या बात है, जसौद हरीश व हंसी को साथ ले कर नैनीताल नंदा देवी देखने ले जाने वाला था, अभी तक तैयार नहीं हुए?’’

‘‘पैसों का इंतजाम नहीं हो पाया मांजी. अगर आप थोड़ा पैसों की मदद कर दें, तो मैं उन से मांग कर आप को दे दूंगी, नहीं तो बच्चों का दिल टूट जाएगा. वे एक हफ्ते से कितने बेचैन हैं?’’ कहते हुए वह मांजी की ओर याचना भरी नजरों से देख रही थी.

‘‘ऐसा था, तो अभी तक क्यों नहीं कहा… मैं तो सोच रही थी कि शायद तुम्हारे जाने का प्रोग्राम बदल गया है,’’ मां बोलीं.

‘‘मांजी, मैं ने सोचा कि उन से कह कर…’’ मुझे देख कर वह चुप हो गई.

मैं कालेज जाने की तैयारी कर रहा था. सासबहू की बातें मेरे कानों में पड़ीं, तो मैं उन के पास पहुंचा और जेब से पैसे निकाल कर नंदा को थमाते हुए बोला, ‘‘अरे भई, पहले ही कह दिया होता. वजह तो मैं पूछ ही रहा था. मैं ने कभी मना किया है तुम्हें?’’

वह मुसकराते हुए पैसे ले कर अंदर की ओर चल दी. वह देवरननद को यह खुशखबरी देने की बेचैनी अपने में नहीं रोक सकी. देवर व ननद से इतना लगाव देख कर मुझे उस से और भी प्यार हो आया. हमारी खुशहाल जिंदगी के 2 साल बीत गए. इस बीच हमारी गोद में एक नन्हा मुन्ना भी आ गया. बच्चे की जिम्मेदारी मांजी ने अपने ऊपर ले ली थी. वे ही उसे नहलातींधुलातीं, देखरेख करतीं. नंदा केवल अपना दूध पिलाने और रात को पास में ही सुलाने की ड्यूटी निभाती.n सब ठीक ही चल रहा था. बोझ का एहसास तो तब हुआ, जब 4 साल और 2 साल के फर्क में लड़कियां और चली आईं.

उस दिन मेरा बेटा नवीन मेरे पलंग पर आ कर सो गया था. बड़ी बेटी मां के पास सो रही थी. छोटी बेटी को नंदा थपकी दे कर अपनी चारपाई पर सुला रही थी. मैं ने नंदा के मन को टटोलने के लिए पूछ लिया, ‘‘आधा दर्जन पूरा होने में 3 ही अदद की तो कमी रह गई. तुम्हारा क्या विचार है?’’

वह झुंझला कर बोली, ‘‘तुम भी कैसी बात करते हो जी? इन 2 लड़कियों की फिक्र ही मेरा दिमाग चाट रही है. 2-1 और हो जाएं, तो घर का भट्ठा ही बैठ जाएगा. ब्याहने के लिए कहां से लाओगे इतने पैसे?’’

मैं ने उस से कहा, ‘‘तुम ठीक कह रही हो. वह तो मैं ने तुम्हारे विचार जानने के लिए कहा था. सोच रहा हूं कि इस आने वाले जाड़ों में परिवार नियोजन करा लूं.’’

यह सुन कर वह चौंक पड़ी. कुछ देर वह मेरी ओर ताकती रही, फिर मेरे पास आ कर कंधे पर हाथ रखते हुए बोली, ‘‘तुम इतने कमजोर हो. कहीं तुम्हें कुछ हो गया, तो मैं क्या करूंगी? मैं तो कहीं की नहीं रहूंगी. मुझे ही फैमिली प्लानिंग करा लेने दो. तुम जब कहो, तब मैं अस्पताल चल दूंगी.’’

मैं खीझ उठा, ‘‘तुम्हारी सोच तो बस जिद करने की आदत है. तुम यह क्यों नहीं समझतीं कि मर्द को फैमिली प्लानिंग में ज्यादा मुश्किल नहीं होती. औरत के लिए दिक्कत होती है. अस्पताल में कम से कम 2 दिन रुकना पड़ता है. दूसरा कोई आसान तरीका अभी नहीं निकला है. तुम निश्चिंत रहो. मुझे कुछ नहीं होने वाला है.’’

‘‘नहीं, तुम यह कभी मत करना. मैं ने सुना है कि मर्द कमजोर हो जाते हैं. मैं सारी तकलीफ झेलने को तैयार हूं, पर तुम्हें आपरेशन नहीं कराने दूंगी.’’

उस के मासूम चेहरे को देख कर मुझे ‘हां’ कहने के अलावा और कोई चारा नहीं दिखा.

3 महीने भी नहीं गुजरे थे कि सरकारी आदेश आ गया. 2 बच्चों से ज्यादा जिन के बच्चे हैं, तुरंत नसबंदी कराने के सख्त आदेश कर दिए. उन दिनों इमर्जैंसी चल रही थी. चमचों और पिछलग्गुओं की बन आई थी. नेताओं को खुश करने के लिए, सरकार को खुश करने के लिए जनता पर जीतोड़ कहर ढाया जा रहा था. तब प्रिंसिपल भी भला पीछे क्यों रहें. उन के तो दोनों हाथ में लड्डू थे. सरकार को भी खुश करो और दर्जनभर केस दिलवा कर एक इंक्रीमैंट और जुड़वा लो.

मैं ने आपरेशन कराने से पहले नंदा की रजामंदी ले लेना ठीक समझा, वरना उसे मनाना मुश्किल होगा. इन दिनों वह बच्चों को ले कर रामगढ़ गई हुई थी. जब उसे मालूम हुआ कि मैं आपरेशन कराने वाला हूं, वह दौड़ीदौड़ी चली आई. मेरे समझाने पर भी वह नहीं मानी.

आपरेशन की ड्रैस पहना कर जब नर्सें उसे आपरेशन रूम में ले जा रही थीं, तब मेरा कलेजा काटने को आ रहा था. मैं अपने को धिक्कार रहा था कि मैं उसे क्यों अस्पताल ले आया? क्यों उस की बात मानी?

आपरेशन रूम से बाहर लाने में तकरीबन आधा घंटा लगा होगा. मुझे वे पल घंटों लंबे लगे. स्ट्रेचर पर सफेद कपड़ों में उसे बेहोश देख कर मुझे एकबारगी रोना सा आ गया. गला ऐसा भर आया, मानो कोई गला घोंटने लगा हो. बेहोशी में कराह के बीच उस का पहला साफ शब्द था, ‘‘पतिजी…’’

3 साल बाद शादी की 13वीं सालगिरह की मनहूस आखिरी रील चल रही थी. इस रील के प्रमुख पात्र थे. मैं नायक था, नायिका नंदा थी और खलनायक खुद ऊपर वाला. खलनायक को नंदा का मेरे पास रहना अब नागवार सा लगा. फिर क्या था, उस ने उसे मुझ से छीनने की साजिश रच डाली.

चिनगारी बुझने से पहले खूब रोशनी करती है न, ऊपर वाले ने नंदा की जिंदगी का भी यही सब से अच्छा सुनहरा साल चला दिया.

उस का छोटा भाई अपनी दीदी से मिलने आया था. नंदा अपनी खुशी को नहीं संभाल पा रही थी. अंदरबाहर इधरउधर वह तितली सी फुदक रही थी. रात को जब सब लोग मेरे बैडरूम में रेडियो के गानों के बीच गपशप में मशगूल थे, तो नंदा ने मुझ से अपनी तकलीफ जाहिर की, ‘‘आज मैं खाना नहीं खा सकी. मेरे जबड़े में बहुत तेज दर्द हो रहा है.’’

‘‘ज्यादा बोलती है न, इसलिए जबड़ा दर्द करेगा ही,’’ मैं ने बात हंसी में टाल दी.

सुबह अपने भाई को विदा कर वह मेरे पास आ रही थी. आते ही वह सिसकियों से भर गई. आखिर इतना दुख वह कब से अपने में रोके थी? मैं हैरान रह गया. शायद भाई की जुदाई हो.

पर ऐसी कोई बात न थी. उस का रोना शारीरिक दुख था. वह अपना मुंह पूरी तरह नहीं खोल पा रही थी. जबड़े दर्द के साथसाथ कसते चले जा रहे थे. मात्र उंगली डालने लायक जगह बची थी. मैं सहम गया.

उस ने मुझे छुट्टी ले कर अस्पताल चलने को कहा. मैं तुरंत उसे ले कर डाक्टर मेहरा के प्राइवेट अस्पताल को चल दिया. राधा भाभी को भी अपने साथ ले लिया.

डाक्टर मेहरा ने देखा और पूछा, ‘‘कहीं चोट तो नहीं लगी है?’’

नंदा ने सिर हिला कर जवाब दिया, ‘‘नहीं.’’

‘‘कहीं कील या ब्लेड तो नहीं चुभा था?’’

जवाब था, ‘‘नहीं.’’

‘‘इधर महीनेभर के अंदर कोई ऐसी बात याद करो कि तुम्हारे शरीर से खून निकला हो या शरीर में कुछ चुभा हो या फिर तुम ने किसी पिन, सूई जैसी किसी चीज से दांत खुरचा हो?’’

कुछ देर सोचने के बाद उस ने ही कहा, ‘‘कुछ याद नहीं पड़ता.’’

मैं डाक्टर के चेहरे को पढ़ने की कोशिश कर रहा था. डाक्टर के चेहरे पर हैरानी और उतारचढ़ाव साफ जाहिर हो रहा था.

डाक्टर बोला, ‘‘ऐसा नहीं हो सकता. जरूर कुछ न कुछ हुआ होगा, जो तुम याद नहीं कर पा रही हो. बिना चोट के तो यह मुमकिन ही नहीं है.’’

फिर डाक्टर ने मेरी ओर देख कर कहा, ‘‘मुझे टिटनैस का डर लग रहा है. आप इन्हें जितनी जल्दी हो सके, सरकारी अस्पताल में भरती करा दें.’’

बीमारी का नाम सुनते ही मेरे पैरों की जमीन खिसकने लगी. मैं घबरा गया और उन से पूछा, ‘‘डाक्टर साहब, कहीं खतरा तो नहीं है?’’

‘‘नहीं, ऐसी कोई बात नहीं. अगर समय पर टिटनैस के इंजैक्शन लग जाएंगे, तो ठीक हो जाएंगी.’’

मुझे याद नहीं कि मैं ने कब परचा लिया और कब हम तीनों सरकारी अस्पताल पहुंच गए. हम में से किसी को होश नहीं था. खतरे का डर सब को हो गया था, क्योंकि इस बीमारी की भयंकरता सब ने सुन रखी थी. डाक्टर ने देखा, जांचा, परखा, पूछा आखिर में पहले डाक्टर की बात का समर्थन करते हुए नंदा को स्पैशल वार्ड में दाखिल कर दिया. एटीएस के 50,000 पावर के इंजैक्शन का इंतजाम भी मुझे ही करना था. वह इंजैक्शन अस्पताल में नहीं था. देर करना खतरनाक था. नंदा के पास भाभी को छोड़ कर मैं सब्र से काम लेने के लिए कह कर जाने लगा, तो वे दोनों मुंह दबा कर फफक कर रो उठीं.

मैं ने अपने को भरसक संभाला. लगा, जैसे सीना फट जाएगा. समय गंवाना ठीक न समझ कर मैं शहर को चल दिया. घंटेभर बाद इंजैक्शन का भी इंतजाम हो गया. घर में सूचना देते समय मेरा गला भर गया, आंखें बरसने लगीं. सारे घर में अजीब सा सन्नाटा छा गया. पहली रात हलकीहलकी कराहने की आवाजें आती रहीं. मैं उस के साथ था. मैं उस के माथे को सहला रहा था. उस ने अपना पर्स, कानों के कनफूल, मंगलसूत्र सब मुझे थमाते हुए कहा, ‘‘पतिजी, इन्हें रख लो. अपना खयाल रखना. बच्चों का खयाल रखना,’’ वह आगे कुछ न कह सकी. आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे.

मैं ने उसे हिम्मत बंधाते हुए कहा, ‘‘चिंता मत करो, तुम बिलकुल ठीक हो जाओगी.’’

हम दोनों को ही एहसास हो चुका था कि अलविदा का समय नजदीक आ चुका है. शायद रातभर में हम इतना ही बोले थे.

दूसरे दिन तक सारे गांव, इलाके, रिश्तेदारों तक को सूचना मिल गई थी. अस्पताल में भीड़ रोके नहीं रुक रही थी. अब नंदा का रूम डार्करूम बना दिया गया था. आंखों पर पट्टी रख दी गई थी. उस के आसपास आवाज करने की मनाही कर दी गई थी.

अगले दिन उस के पैरों में जकड़न चालू हो गई. पीठ में दर्द, ऐंठन बढ़ गई. दांत आपस में भिंच गए. धीरेधीरे जकड़न व ऐंठन सारे बदन में दाखिल हो गई. हलकेहलके झटके भी पड़ने चालू हो गए.

जब झटके पड़ते, ऐंठन होती, तो हम लोग उस के हाथ, पैर, सीना हलके से मलते. ग्लूकोज की बोतलों में तरहतरह की दवाओं का मिश्रण उसे दिया जा रहा था. एटीएस का तब तक दूसरा भी 50,000 पावर का इंजैक्शन लगा दिया गया था.

एकएक दिन खिसक रहे थे और उस की हालत दिनबदिन खराब होती जा रही थी. उस का शरीर इंजैक्शनों से छलनी हो गया था. पानी के बिना वहां सूखी पपड़ियां तड़क आई थीं. दांत कसने से खून बह रहा था. जूस व पानी के लिए वह संकेत करती, लेकिन डाक्टर की इजाजत नहीं थी. दिल मसोस कर रह जाना पड़ता. फट आए होंठों में ग्रीसलीन लगा कर तर करने की कोशिश की. पानी की 2-4 बूंदें तो दरारों में ही समा जाती थीं. इधर झटके तेज होते गए. दौरों की लंबाई भी बढ़ती गई. दर्द से छुटकारा दिलाने के लिए उसे नींद के इंजैक्शन दिए जा रहे थे, पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा था.

अब ग्लूकोज को भी शरीर ने खींचना छोड़ दिया था. निराशा में सब का दिल डूबने लगा. अभी छठे दिन की पौ नहीं फटी थी. रात को बारिश के बाद धुंधला सा उजाला होने लगा था. नर्स नींद का इंजैक्शन दे कर चली गई. कुछ समय बाद मैं दूसरे लोगों की देखरेख में नंदा को सौंप कर नहानेधोने चला गया. जब लौट कर आया, तब तक नंदा नहीं रही थी. अब न कोई झटके थे. न दौरे थे. न दर्द था. न कराहें थीं. थीं तो बस घर वालों की, दोस्तों की घुटती सिसकियां.

मेरा सबकुछ लुट गया था. मैं खोयाखोया सा रहने लगा. छोटी बच्चियां जब टकटकी लगा कर मेरी ओर देखतीं, कलेजा मुंह में आने को हो जाता. थपकियां दिला कर, सीने से लगाए उन्हें सुला देता. नवीन ने चुप्पी साध ली थी. चुपचाप आ कर पुस्तक पढ़ने लग जाता. अब मांजी ही बच्चों की परवरिश कर रही थीं. धीरेधीरे 2 साल निकल गए. मांजी बच्चों की खातिर दोबारा शादी करने की बात छेड़तीं, तो मैं टाल जाता था. ससुराल वालों ने भी शादी के लिए कहना शुरू कर दिया. कई जगह से रिश्ते भी आने शुरू हो गए, लेकिन मैं साफ मना कर देता. भला पराए बच्चों को कौन नवेली अपना लेगी?

सासजी को शादी के लायक हो आई अपनी बेटी खुशी की उतनी चिंता न थी, जितनी मेरी और मेरे बच्चों की. मैं ने खुशी के लिए योग्य लड़का तलाश कर सूचना भेजी, तो जवाब आया कि खुशी ने इसलिए इनकार कर दिया है कि जब तक जीजाजी शादी नहीं कर लेंगे, वह भी शादी नहीं करेगी. बात बिगड़ती देख ससुराल वालों ने प्रस्ताव रखा कि क्यों न खुशी से ही मेरी शादी कर दी जाए. खुशी ने भी अपनी दीदी के बच्चों की खातिर अपना त्याग स्वीकार कर लिया. लेकिन मैं इसे कैसे स्वीकार कर लेता?

मैं ने उसे समझाया, ‘‘खुशी, तुम यह क्या कर रही हो? जरा सोचो तो… मेरी उम्र का 38वां साल पार होने जा रहा है, जबकि तुम अभी 20 साल की होगी. फिर मैं 3 बच्चों का पिता भी हूं. मेरी खातिर अपनी जिंदगी क्यों बरबाद करने पर तुली हो? यह सही नहीं है.’’

वह धीरे से बोली, ‘‘आप मेरी चिंता न करें. सब सोचसमझ कर ही तो मैं ने हां की है. उम्र की क्या कहते हैं? माथे में उम्र लिखी होती, तो दीदी यों ही हमें छोड़ कर चली थोड़े ही जातीं? बच्चे मुझ से हिलेमिले हैं. मां का दुख भूल जाएंगे.

‘‘दीदी पर जितना हक आप का था, क्या मेरा हक नहीं? मुझे भी तो उस का दुख उतना ही है, जितना आप को,’’ उस के अंदर अपनापन और त्याग की भावना साफ झलक रही थी.

बहुत समझाने पर भी उस ने अपना इरादा नहीं बदला, तब मुझे भी सहमति देनी पड़ी. आखिर किसकिस का मुंह संभालता? टैक्सी ने हिचकोला खाया, तो मेरी पिछली यादें टूट गईं. मैं अपनी यादों में इतना खो गया था कि मुझे यह ध्यान ही नहीं रहा कि मैं वर बना बैठा हूं. एक दुलहन भीगी पलकों से मुझे ही निहार रही है. मुझे पढ़ रही है. समझ रही है. शायद तब तक मेरी आंखों के रास्ते कुछ बह कर सूख गया था. वह मुझ पर लुढ़क गई और मेरी गोदी में सो गई.