फेसबुकिया प्यार में डबल मर्डर – भाग 1

सुबह पौने 7 बजे रविरतन वर्मा सो कर उठा तो उस का सिर भारी था और शरीर भी बेजान, ढीलाढाला लग रहा था. पूरी रात वह घोड़े बेच कर सोया था. रवि को हैरानी थी कि वह बीती रात एक बार भी न पानी पीने उठा था, न बाथरूम जाने के लिए, जबकि रात में एकाध बार वह जरूर उठ जाता था. फ्रैश होने से पहले उसे एक प्याला चाय चाहिए होती थी.

उस ने सिर घुमा कर पास में सोई पत्नी मोनिका वर्मा की ओर देखा, वह गहरी नींद में थी. दोनों के बीच में पलंग पर उन का बेटा भी सो रहा था. रवि रतन ने हाथ से झकझोर कर मोनिका को हिलाया, ‘‘मोनिका उठो, मुझे चाय की तलब लगी है.’’

मोनिका वर्मा कसमसाई. फिर उस ने आंखें खोल दीं. बिस्तर से नीचे उतर कर उस ने अपनी साड़ी ठीक की और दरवाजे की तरफ बढ़ गई. उस की नजर स्टोर रूम के दरवाजे पर चली गई. वह खुला हुआ था और उस के अंदर सामान बिखरा हुआ था.

“यह… यह स्टोर रूम किस ने खोला है?’’ वह चौंक कर बड़बड़ाई और तेजी से बाहर आ कर स्टोर रूम की तरफ बढ़ गई. स्टोर रूम में सामान बिखरा हुआ था और अलमारी खुली हुई थी. उस में रखा कीमती सामान गायब था.

“ऐजी सुनते हो,’’ मोनिका ने जोर से अपने पति को आवाज लगाई, ‘‘घर में चोरी हुई है.’’

रविरतन सुन कर दौड़ता हुआ कमरे से स्टोर रूम में आ गया. बिखरा सामान देख कर उस को यह आभास हो गया कि घर में रात को चोर घुस आए थे, यदि वह ऊपर स्टोर रूम तक आए थे तो अवश्य ही नीचे भी उन्होंने हाथ साफ किया होगा. यह विचार मन में आते ही रवि सीढिय़ों की ओर झपटा. उस के पीछे मोनिका भी दौड़ी.

रवि जैसे ही भूतल पर अपने मम्मीपापा के कमरे मे आया. उस के मुंह से चीख निकल गई. कमरे में उस के मम्मीपापा खून से तरबतर पड़े थे. उन के गले कटे हुए थे. रवि फटीफटी आंखों से मम्मीपापा की लाशें देखता रहा. वह कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं था, लेकिन पीछे आ चुकी मोनिका ने यह दृश्य देखा तो वह जोरजोर से चीखने लगी, ‘‘खून…खून हो गया…चोरों ने मम्मीपापा की हत्या कर दी.’’

डबल मर्डर से फैली सनसनी

सुबहसुबह रवि के घर में से मोनिका की चीखें सुन कर पड़ोसी दौड़ कर उन के दरवाजे पर आ गए. बाहर से किसी ने ऊंची आवाज में पूछा, ‘‘क्या हुआ रवि? बहू क्यों चीख रही है.’’

रवि को होश सा आया, वह घबराया हुआ दरवाजे पर आया और उस ने अंदर से बंद दरवाजा खोल दिया.

“क्या हुआ, घर में सब ठीक तो है?’’ एक बुजुर्ग ने हैरानी से पूछा.

“मम्मीपापा को कोई जान से मार गया है,’’ रवि रोते हुए बोला, ‘‘उन की लाशें कमरे में पड़ी हैं.’’

पड़ोसियों ने अंदर आ कर देखा. पलंग पर रवि के पिता राधेश्याम की गरदन कटी लाश पड़ी थी. पलंग के साथ में बिछी चारपाई पर रवि की मां बीना देवी की लाश थी. उन की भी गरदन तेज धारदार हथियार से काट दी गई थी. दोनों लाशें खून से तरबतर थीं. घर में सामान भी बिखरा हुआ था. इस डबल मर्डर से सनसनी फैल गई.

“घर में चोरी भी हुई है रवि! तुम तुरंत पुलिस को सूचना दे दो.’’ किसी ने सलाह दी.

रवि ने मोबाइल से पुलिस कंट्रोल रूम का नंबर डायल किया और गोकलपुरी क्षेत्र में भागीरथ विहार की गली नंबर 13/6 में हुए इस डबल मर्डर केस की सूचना दे दी. पुलिस की वैन जब घटनास्थल पर पहुंची, वहां काफी भीड़ एकत्र हो चुकी थी. पुलिस को देखते ही भीड़ आजूबाजू हट गई.

उसी समय गोकलपुरी थाने के एसएचओ प्रवीण कुमार मय स्टाफ के वहां आ गए थे. इस दोहरे बुुजुर्ग दंपति हत्याकांड की सूचना उन्होंने विभाग के उच्चाधिकारियों को भी दे दी थी. एसएचओ प्रवीण कुमार ने घटना वाले कमरे में प्रवेश किया तो उन्हें वहां घर की बहू मोनिका जोरजोर से विलाप करती नजर आई. उन्होंने साथ आई महिला पुलिस को इशारा किया तो वह मोनिका को उठा कर कमरे से बाहर ले गई.

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एसएचओ प्रवीण कुमार ने दोनों लाशों की स्थिति देखी. कातिल ने राधेश्याम को नींद में ही दबोचा लगता था, वह सीधे सोए होंगे. उसी हालत में उन की गरदन पर वार किया गया था. जबकि सीमा देवी द्वारा कातिल से संघर्ष करने के संकेत मिल रहे थे, क्योंकि उन की चूडिय़ां टूट कर इधरउधर फैली हुई थीं, उन की जबरन गरदन काटी गई थी. श्री प्रवीण कुमार ने घर में बिखरा सामान और पूजा घर में खुली हुई अलमारी के अलावा ऊपरी तल पर स्टोर रूम का भी जायजा लिया. रवि रतन उन के साथ ही था.

“क्या पुलिस को तुम ने ही फोन किया था?’’ एसएचओ ने रवि से पूछा.

“जी हां सर, जिन की हत्या हुई है, वह मेरे मम्मीपापा हैं. मैं उन का इकलौता बेटा हूं.’’ रवि ने भर्राए स्वर में बताया.

“वह यहां रुदन कर रही थी, शायद तुम्हारी पत्नी है?’’

“हां,’’ रवि ने सिर हिलाया, ‘‘वह मेरी पत्नी मोनिका है.’’

“चोर अंदर कैसे घुसे… क्या तुम लोग दरवाजा खोल कर सोते हो?’’ एसएचओ ने गंभीर स्वर में पूछा.

“नहीं सर, मैं ने रात को सामने का दरवाजा भीतर से बंद किया था. चोरों ने अंदर प्रवेश कैसे किया, मेरी खुद की समझ में नहीं आ रहा है.’’

“क्या सुबह दरवाजा तुम्हें खुला मिला था?’’

“दरवाजा तो मैं ने अपने हाथों से ही खोला था. हां सर, पीछे गली में भी एक दरवाजा है, मैं ने वह चैक नहीं किया है.’’ कुछ याद आने पर चौंकते हुए रवि ने कहा तो एसएचओ ने उसे घूरा, ‘‘चलो, वह दरवाजा दिखाओ मुझे.’’

जांच में मिले सुराग

रवि उन्हें पीछे के दरवाजे पर लाया. वह अंदर से खुला था. एसएचओ ने दरवाजे को ध्यान से देखा. उस का कुंडा मोटा था, जिसे बाहर से किसी भी तरह नहीं खोला जा सकता था.

“इसे क्या खुला रखते हो तुम लोग?’’ एसएचओ ने पूछा.

“नहीं सर. पीछे तो हमें कोई काम नहीं पड़ता है, आनाजाना हम लोगों का सामने वाले गेट से ही होता था. यह दरवाजा तो बंद ही रहता था, शायद चोर किसी तरह इसे खोल कर अंदर घुसे थे. यहीं से वे हत्या कर के और लूटपाट कर के भाग गए हैं.’’

“हूं.’’ एसएचओ ने दिखाने को सिर हिलाया, लेकिन वह भली प्रकार यह अनुमान लगा चुके थे कि चोरों ने घर में फ्रैंडली एंट्री ली थी.’’

“घर से कितने की चोरी हुई है?’’ एसएचओ ने पूछा.

“सर, घर से साढ़े 3 लाख नकद और मम्मी की ज्वैलरी गायब है. यह साढ़े 3 लाख रुपया पापा को मकान का आधा हिस्सा 50 लाख में खुर्शीद प्रौपर्टी डीलर को बेच देने की टोकन मनी में से था. 5 लाख की टोकन मनी में से मैं ने डेढ़ लाख ऊपर अपने पास रखे थे. साढ़े 3 लाख रुपए मम्मी ने पूजा के कमरे की अलमारी में रख दिए थे, उसी में मम्मी की ज्वैलरी भी रखी हुई थी.’’

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नार्थ ईस्ट डिस्ट्रिक्ट दिल्ली के पुलिस कमिश्नर भी जाय टिर्की भी वहां आ गए थे. उन्होंने लाशों का निरीक्षण किया. ऊपरी तल और नीचे की पूरी लोकेशन देखने के बाद वह एसएचओ से बोले, ‘‘घर में 2 हत्याएं हुईं, चोरों ने पूजा घर में सामान टटोला. ऊपर भी गए और स्टोर रूम में भी सामान बिखेरा, लेकिन बेटाबहू सोते रहे, उन्हें जरा भी आहट नहीं मिली. यह सोचने का विषय है, दूसरा वह पिछला दरवाजा.. जो बंद रखा जाता था, खुला हुआ मिला. इस से तो यही लगता है, सब एक साजिश के तहत हुआ है. कातिलों ने घर में एंट्री घर के किसी सदस्य के द्वारा ही की है.’’

“जी सर, मेरा भी यही मानना है.’’ एसएचओ ने धीरे से कहा, ‘‘घर की बहू रोनेधोने का ज्यादा ही दिखावा भी करती मिली है. आप इसे ध्यान में रख कर केस पर काम करिए, सफलता अवश्य मिल जाएगी. फोरैंसिक जांच के बाद आप प्रारंभिक काररवाई कर के लाशों को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दीजिए.’’

“ठीक है सर.’’

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कुछ आवश्यक निर्देश दे कर पुलिस डीसीपी जाय टिर्की वापस चले गए तो तभी फोरैंसिक जांच टीम भी वहां आ गई. टीम ने भी सूक्ष्मता से घटनास्थल की जांच की. इस के बाद एसएचओ ने वहां की काररवाई पूरी की और लाशों को जीटीबी अस्पताल की मोर्चरी में भिजवा दिया. इस के बाद एसएचओ अपने स्टाफ के साथ थाने लौट आए. यह डबल मर्डर केस भादंवि की धाराओं 457/392/397/302 के तहत दर्ज कर लिया गया और इस की जांच एसएचओ प्रवीण कुमार ने स्वयं अपने हाथ में ले ली.

                                                                                                                                       क्रमशः

प्रेमिका से शादी के लिए मां बाप से खूनी दुश्मनी

28 अप्रैल, 2018 को दिल्ली के कंट्रोल रूम को सूचना मिली कि जाकिर नगर की गली नंबर 7 में रहने वाले शमीम अहमद का दरवाजा अंदर से बंद है. काफी आवाजें देने के बावजूद भी उन के कमरे से कोई प्रतिक्रिया नहीं हो रही.

चूंकि यह मामला दक्षिणपूर्वी दिल्ली के थाना जामिया नगर के अंतर्गत आता है, इसलिए पुलिस कंट्रोल रूम से वायरलेस द्वारा यह सूचना थाना जामिया नगर को दे दी गई. सूचना मिलते ही थानाप्रभारी संजीव कुमार पुलिस टीम के साथ मौके पर पहुंच गए. वहां पर शमीम अहमद के बेटे अब्दुल रहमान के अलावा आसपास के लोग भी जमा थे.

अब्दुल रहमान ने पुलिस को बताया कि कल रात खाना खाने के बाद उस के अम्मीअब्बू अपने कमरे में सोने के लिए चले गए थे, जबकि वह दूसरे कमरे में सो गया था. रोजाना उस के अम्मीअब्बू ही सुबह पहले उठते थे. वही उसे जगाते भी थे, लेकिन आज वह अभी तक नहीं उठे. मैं ने काफी देर दरवाजा खटखटाया इस के बावजूद भी अंदर से कोई आवाज नहीं आ रही. वहां मौजूद पड़ोसियों ने भी अब्दुल रहमान की हां में हां मिलाई.

अब्दुल रहमान की बात सुनने के बाद थानाप्रभारी संजीव कुमार ने भी दरवाजा खटखटाया लेकिन वास्तव में अंदर कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई तो उन्हें भी शक होने लगा. तब उन्होंने लोगों की मौजूदगी में दरवाजा तोड़ दिया. दरवाजा तोड़ने के बाद जैसे ही पुलिस अंदर घुसी तो पहले कमरे में ही फर्श पर शमीम अहमद और उन की पत्नी तसलीम बानो की लाशें पड़ी थीं.

रहस्यमय मौतें

अम्मी और अब्बू की लाशें देख कर रहमान दहाडें़े मार कर रोने लगा. पड़ोसी भी हतप्रभ थे कि दोनों की मौत कैसे हो गई. उन के शरीर पर किसी चोट आदि का निशान भी नहीं था. दोनों की मौत कैसे हुई उस समय इस का पता लगाना संभव नहीं था. थानाप्रभारी संजीव कुमार ने इस मामले की जानकारी डीसीपी चिन्यम बिश्वाल को दे दी. साथ ही क्राइम इन्वैस्टीगेशन टीम को भी मौके पर बुलवा लिया.

थानाप्रभारी ने मौकामुआयना किया तो पता चला कि उस दरवाजे पर औटोमैटिक लौक लगा हुआ था, जो अंदर और बाहर दोनों तरफ से बंद हो जाता था. उन के कमरे में सवा 5 लाख रुपए की नकदी के अलावा ज्वैलरी भी मिली. इस से वहां पर लूट की संभवना नजर नहीं आई. कमरे में 2 लोग सो रहे थे, दोनों की ही संदिग्ध मौत हो गई थी.

ऐसा भी नहीं था कि उन की मौत कमरे में मौजूद किसी जहरीली गैस की वजह से हुई हो क्योंकि जब कमरे का दरवाजा तोड़ा गया था तो उस समय कमरे में किसी जहरीली गैस आदि की स्मैल भी नहीं आ रही थी. यानी उस समय कमरे में पर्याप्त मात्रा में औक्सीजन थी. लग रहा था कि उन दोनों के खाने में कोई जहरीली पदार्थ मिला दिया गया होगा.

बहरहाल इन दोनों की मौत कैसे हुई यह पोस्टमार्टम के बाद ही पता लग सकता था. लिहाजा थानाप्रभारी ने जरूरी काररवाई कर के दोनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. डीसीपी चिन्मय बिश्बाल ने भी घटनास्थल का दौरा किया. अब्दुल रहमान शमीम अहमद का इकलौता बेटा था. वही उन के साथ रहता था, इसलिए पुलिस ने अब्दुल रहमान से कहा कि जब तक इस केस की जांच पूरी न हो जाए वह दिल्ली छोड़ कर कहीं न जाए.

2-3 दिन बाद पुलिस को पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिल गई. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में बताया गया था कि उन की मौत दम घुटने की वजह से हुई थी. यानी किसी ने उन का दम घोट कर हत्या की थी. पुलिस इस बात का पता लगाने में जुट गई कि उन का कातिल कौन है.

उधर मृतकों का बेटा अब्दुल रहमान थाने और डीसीपी औफिस के चक्कर काट कर अपने मातापिता के हत्यारे का पता लगा कर उसे गिरफ्तार करने की मांग कर रहा था. जबकि पुलिस अलगअलग तरीके से जांच कर केस को खोलने की कोशिश में लगी थी.

इस दौरान थानाप्रभारी संजीव कुमार ने अब्दुल रहमान से भी 2 बार पूछताछ की थी. लेकिन उस से कोई क्लू नहीं मिल सका था. उन के यहां जिनजिन रिश्तेदारों या परिचितों का आनाजाना था, पुलिस ने उन्हें भी थाने बुला कर पूछताछ की.

इतना ही नहीं पुलिस ने उन पेशेवर हत्यारों को भी उठा लिया जो उस समय जेल से बाहर थे. लेकिन उन से भी कोई जानकारी नहीं मिली. इधर मामले को ले कर पुलिस भी परेशान थी. घटना के 3 सप्ताह बाद पुलिस ने अब्दुल रहमान को एक बार फिर थाने बुलाया. थाना प्रभारी और इंसपेक्टर भारत कुमार की टीम ने उस से फिर पूछताछ की. सख्ती से की गई पूछताछ में अब्दुल रहमान ने अपना मुंह खोलते हुए कहा कि अपने मांबाप का हत्यारा मैं ही हूं. मैं ने ही अपने दोस्तों के साथ उन की हत्या की थी.

उस की बात सुन कर एक बार तो पुलिस भी आश्चर्यचकित रह गई कि वह अपने मांबाप का एकलौता बेटा था तो ऐसी क्या बात हो गई कि घर के इसी चिराग ने अपने मांबाप का ही खून कर दिया. पुलिस ने अब्दुल रहमान से मांबाप की हत्या करने की वजह जानने के लिए पूछताछ की तो उस ने उन की हत्या की जो कहानी बताई वह हैरान करने वाली थी.

फेसबुक की दोस्त बनी महबूबा

अब्दुल रहमान अपने मांबाप की इकलौती संतान था. पिता शमीम अहमद और मां तसलीम बानो ने उसे हमेशा अपनी पलकों पर बिठा कर रखा था. वह उस की हर फरमाइश पूरी करते थे. मांबाप का लाडला अब्दुल रहमान पढ़ाई में भी होशियार था. उस का माइंड क्रिएटिव था इसलिए उस ने एनिमेशन में डिप्लोमा किया.

मांबाप चाहते थे कि उन के बेटे की कहीं अच्छी जगह नौकरी लग जाए. शमीम अहमद ने करीब डेढ़ साल पहले उस की शादी कर दी थी, लेकिन किसी वजह से उस की पत्नी से नहीं बनी. दोनों के विचारों में विरोधाभास था, इसलिए उस ने पत्नी को तलाक दे दिया. इस के बाद फेसबुक के माध्यम से अब्दुल रहमान की दोस्ती कानपुर की रहने वाली एक लड़की से हो गई.

यह दोस्ती इतनी गहरी हो गई कि दोनों ही एकदूसरे को दिलोजान से चाहने लगे. यहां तक कि दोनों शादी के लिए भी तैयार हो गए. लड़की ने कह दिया कि वह उस के लिए अपने घर वालों तक को छोड़ने के लिए तैयार है. अब बात अब्दुल रहमान को फाइनल करनी थी. वह तो तैयार था लेकिन उसे उम्मीद थी कि शायद उस के घर वाले कानपुर वाली उस की दोस्त से शादी करने के लिए तैयार नहीं होंगे.

फिर भी अब्दुल रहमान ने अपने मातापिता से कानपुर वाली अपनी दोस्त के बारे में बताया और कहा कि वह उस से शादी करना चाहता है. शमीम अहमद ने साफ कह दिया कि वह अपनी बिरादरी की लड़की के साथ ही उस की शादी करना पसंद करेंगे. इसलिए कानपुर वाली उस लड़की को वह भूल जाए. उस के साथ उस की शादी नहीं हो सकती.

मांबाप पर भारी पड़ी प्रेमिका

पिता ने जितनी आसानी से भुला देने वाली बात कही थी, वह अब्दुल रहमान के लिए उतनी आसान नहीं थी. बहरहाल घर वालों की बातों को दरकिनार करते हुए वह अपनी उस फेसबुक फ्रेंड के संपर्क में बना रहा. इतना ही नहीं वह उस से मिलने भी जाता था. इसी दौरान घर वालों ने अब्दुल रहमान की दूसरी शादी कर दी. घर वालों के दबाव में उस ने शादी कर जरूर ली थी लेकिन उस के दिल में तो उस की कानपुर वाली प्रेमिका बसी हुई थी.

दूसरी शादी हो जाने के बाद भी वह अपनी प्रेमिका को नहीं भूला था. वह एक काल सेंटर में नौकरी करता था, इसलिए प्रेमिका को महंगे गिफ्ट आदि देने और उस से मिलने के लिए कानपुर जाता रहता था. वह अब्दुल रहमान पर शादी के लिए दबाव डाल रही थी. वह भी सोचता था कि यदि प्रेमिका ही उस की पत्नी बन जाए तो उस का जीवन हंसीखुशी से बीतेगा. लेकिन इस काम में सब से बड़ी रुकावट उस के मांबाप ही थे.

अब्दुल रहमान ने एक बार फिर से अपने मांबाप को मनाने की कोशिश की कि वह उस की कानपुर वाली दोस्त के साथ उस की शादी कर दें. लेकिन शमीम अहमद ने बेटे को न सिर्फ जम कर फटकार लगाई बल्कि हिदायत भी दी कि वह उस लड़की को भूल कर अपनी घरगृहस्थी में ध्यान लगाए.

अब्दुल रहमान की कोशिश नाकाम हो चुकी थी पर वह हारना नहीं चाहता था. आखिर उस ने भी एक सख्त फैसला ले लिया कि चाहे कुछ भी हो जाए वह अपनी प्रेमिका को दुलहन बना कर घर लाएगा. इस के लिए उस ने अपने मांबाप को रास्ते से हटाने का फैसला ले लिया. यानी प्रेमिका की खातिर उस ने मांबाप तक की हत्या करने की ठान ली.

इतना बड़ा काम वह खुद नहीं कर सकता था. इस बारे में उस ने दिल्ली के नांगलोई इलाके के रहने वाले अपने दोस्त नदीम खान (32) और गुड्डू से बात की. दोनों ढाई लाख रुपए में यह काम करने के लिए तैयार हो गए. तीनों ने शमीम अहमद और तसलीम बानो की हत्या करने की पूरी योजना बना ली.

योजना के अनुसार 27-28 अप्रैल की रात नदीम खान और गुड््डू जाकिर नगर इलाके में आ गए. अब्दुल रहमान के मातापिता जब खाना खा कर अपने कमरे में सोने के लिए चले गए तो रात 11 बजे के करीब अब्दुल रहमान ने फोन कर के अपने दोनों दोस्तों को घर बुला लिया. उन के घर आने के बाद अब्दुल रहमान उन्हें अपने मातापिता के कमरे में ले गया. उन के दरवाजे पर आटोमैटिक लौक लगा था जो दोनों तरफ से बंद हो जाता था.

इन लोगों ने मुंह पर तकिया रख कर एकएक कर दोनों का दम घोंट दिया और उन की लाशें बेड से उतार कर फर्श पर डाल दीं. इस के बाद अब्दुल रहमान ने दरवाजे को बंद कर दिया. अपना काम कर के नदीम खान और गुड्डू रात में ही वहां से चले गए. अब्दुल रहमान अपने कमरे में आ गया. इस के बाद उसे रात भर नींद नहीं आई. सुबह होने पर उस ने मोहल्ले के लोगों को यह कह कर इकटठा कर लिया कि पता नहीं क्यों आज अम्मी और अब्बू दरवाजा नहीं खोल रहे.

अब्दुल रहमान से पूछताछ के बाद पुलिस ने नदीम खान को भी गिरफ्तार कर लिया जबकि गुड्डू फरार हो गया था. दोनों से पूछताछ के बाद पुलिस ने उन्हें न्यायालय में पेश किया जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. पुलिस मामले की तफ्तीश कर रही है.

प्रेमिका और पत्नी के बीच मौत का खेल

इसी साल मार्च और अप्रैल महीने में महाराष्ट्र में जिस प्रकार से 5 शिवसेना तालुका उप प्रमुखों और नगर सेवकों की हत्याएं हुई थीं, उस से राजधानी मुंबई और उस से सटे ठाणे जनपद के पुलिस अधिकारियों की नींद उड़ गई थी. शिवसेना महाराष्ट्र राज्य की एक बड़ी और जानीमानी पार्टी है.

इन दो महीनों में शिवसेना के 5 नेताओं की हत्या के मामले को राज्य सरकार के गृह विभाग ने भी गंभीरता से लिया था. इन मामलों में से कुछ को तो स्थानीय पुलिस और क्राइम ब्रांच ने सुलझा लिया था. पर कुछ शेष थे. इन में से एक मामला शिवसेना के शाहपुर तालुका उपप्रमुख और नगर सेवक शैलेश निमसे की हत्या का भी था.

पुलिस ने शिवसेना के अन्य नेताओं की हत्या के जो मामले खोले थे उन में वजह उन की स्वयं की दुश्मनी, बिजनैस, प्रौपर्टी और रंगदारी की बात सामने आई थी. लेकिन क्राइम ब्रांच ने जब नगर सेवक और ताल्लुका उपप्रमुख शैलेश निमसे की हत्या का मामला खोला तो लोग स्तब्ध रह गए.

घटना 20 अप्रैल, 2018 की थी. थाणे जनपद के भिवड़ी तालुका गणेशपुरी पुलिस थाने में उस समय अफरातफरी मच गई थी, जिस समय चिनचेली गांव के काशीनाथ पाटिल ने थाने आ कर ड्यूटी पर तैनात पीआई शेखर डोबे को यह खबर दी कि देवचोले परिसर की सीमा से लगे दाल्या माला शिखर की पहाडि़यों की झाडि़यों के बीच एक व्यक्ति का झुलसा हुआ शव पड़ा है.

उस समय दिन के यही कोई 10 बज रहे थे. पीआई शेखर डोबे ने पाटिल की इस सूचना को गंभीरता से लिया और मामले की जानकारी थानाप्रभारी के अलावा पुलिस कंट्रोल रूम को देने के बाद पुलिस टीम ले कर घटनास्थल की तरफ रवाना हो गए. जिस समय पुलिस टीम घटनास्थल पर पहुंची थी उस समय तक घटना की खबर पूरे इलाके में भी फैल गई थी. देखते ही देखते घटनास्थल पर काफी लोगों की भीड़ जमा हो चुकी थी. पुलिस ने घटनास्थल का मुआयना किया.

युवक का शव अधजली अवस्था में पड़ा था. वह एक मजबूत कदकाठी वाला था. पुलिस ने अनुमान लगाया कि उस की हत्या कहीं और करने के बाद यहां ला कर लाश को जलाने की कोशिश की गई होगी ताकि लाश की शिनाख्त न हो सके. पीआई शेखर डोबे अभी अपने सहायकों के साथ घटनास्थल और शव का निरीक्षण कर ही रहे थे कि मामले की सूचना पा कर थाणे के डीसीपी प्रशांत कदम, एसीपी कृष्णकांत काटकर भी मौके पर पहुंच गए. उन के साथ फोरेंसिक टीम के अधिकारी भी थे.

फोरेंसिक टीम के काम खत्म होने के बाद डीसीपी प्रशांत कदम और एसीपी कृष्णकांत काटकर ने शव और घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण कर आपस में विचार विमर्श किया. मामले की तफ्तीश के विषय में पीआई शेखर डोबे को आवश्यक निर्देश दे कर वह वहां से अपने औफिस लौट गए.

इस के बाद पीआई शेखर डोबे ने वहां मौजूद लोगों से लाश की शिनाख्त कराने की कोशिश की लेकिन कोई भी उस लाश को नहीं पहचान सका. यह साबित हो गया था कि मृतक उस इलाके का नहीं है. पुलिस को घटनास्थल से भी कोई ऐसा सबूत नहीं मिला जिस से शव की शिनाख्त और तफ्तीश में कोई मदद मिल सके.

शेखर डोबे ने घटनास्थल की सारी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद शव को पोस्टमार्टम के लिए जे.जे. अस्पताल भेज दिया. थाने लौट कर उन्होंने काशीनाथ पाटिल के बयान पर अज्ञात हत्यारे के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर के मामले की तफ्तीश अपने हाथों में ले ली.

लेकिन उन के सामने समस्या यह थी कि मृतक की शिनाख्त के बिना तफ्तीश कैसे आगे बढ़ाई जाए, दूसरे घटनास्थल से भी कोई सूत्र नहीं मिला था मगर उन्हें केस की जांच तो करनी ही थी. इसलिए उन्होंने जिले के सभी थानों में अज्ञात युवक की लाश बरामद होने का मैसेज वायरलैस से प्रसारित कर दिया था. साथ ही यह भी जानने की कोशिश की कि कहीं किसी थाने में उस हुलिए के युवक की कोई गुमशुदगी तो दर्ज नहीं है. इस कोशिश के बाद भी उन्हें कोई सफलता नहीं मिली.

तफ्तीश जटिल थी लेकिन पुलिस टीम निराश नहीं हुई. इस से पहले कि पुलिस तफ्तीश की कोई दूसरी रूप रेखा तैयार करती टीम को एक अहम जानकारी मिली. पुलिस को पता चला कि घटनास्थल से करीब डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर उसी दिन से हुंडई की एक सोनाटा इंबेरा कार लावारिश स्थित में  खड़ी है, जिस दिन पुलिस ने वह अज्ञात व्यक्ति की लाश बरामद की थी.

क्या कार से मृतक का कोई संबंध हो सकता है, यह सोच कर पीआई शेखर डोबे उस कार का निरीक्षण करने पहुंच गए. उन्होंने जब उस कार के पेपर चेक किए तो वह कार शिवसेना के शाहपुर तालुका उपप्रमुख और नगरसेवक शैलेश निमसे की निकली जो अधई गांव के रहने वाले थे.

पुलिस टीम जब शैलेश के घर पहुंची तो उन की पत्नी साक्षी उर्फ वैशाली ने बताया कि उस रात करीब एक बजे पति के मोबाइल पर किसी का फोन आया था. फोन रिसीव करने के बाद वह कार ले कर निकल गए थे. जाते समय वह दरवाजे को बाहर से ही बंद कर गए थे. वह कहां गए और क्यों गए थे इस विषय में उसे कोई जानकारी नहीं है. पुलिस ने साक्षी को अस्पताल ले जा कर वह अधजला शव दिखाया तो वह शव को देखते ही दहाड़े मार कर रोने लगी. इस से पुलिस समझ गई कि मृतक साक्षी का पति ही है.

साक्षी से पूछताछ के बाद पुलिस को पता चला कि मृतक शैलेश निमसे उस का पति था और वह शिवसेना का शाहपुर तालुका का उपप्रमुख और नगर सेवक था. जैसे ही शिवसेना के नेताओं और कार्यकर्ताओं को शैलेश निमसे की हत्या की जानकारी मिली, वह पुलिस मुख्यालय के सामने इकट्ठे होने लगे. उन्होंने हत्यारे की गिरफ्तारी और शिवसेना के नेताओं की सुरक्षा की मांग को ले कर नारेबाजी शुरू कर दी.

मामले को तूल पकड़ते देख कर पुलिस आयुक्त, पुलिस उपायुक्त और एसीपी तुरंत प्रदर्शनकारियों के बीच पहुंच गए. अधिकारियों ने जैसेतैसे कर के प्रदर्शन कर रहे शिवसैनिकों को समझाया. उन्होंने उन्हें भरोसा दिया कि इस केस की जांच क्राइम ब्रांच से करा कर जल्द ही हत्यारों को गिरफ्तार कर लिया जाएगा. तब कहीं जा कर प्रदर्शनकारी शांत हुए.

इस के बाद पुलिस कमिश्नर ने इस केस को सुलझाने के लिए क्राइम ब्रांच के सीनियर पीआई व्यंकट आंधले के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई. टीम में सहायक पीआई प्रमोद बड़ाख, एसआई अभिजीत टेलर, बजरंग राजपूत, विशाल वायकर, हेड कांस्टेबल अशोक पाटिल, विजय ढेगरे और मनोज चव्हाण को शामिल किया गया.

क्राइम ब्रांच की टीम ने कई पहलुओं को ध्यान में रखते हुए जांच की लेकिन शैलेश निमसे के मामले में राजनैतिक, प्रौपर्टी, आपसी रंजिश आदि का मामला नजर नहीं आया. तब क्राइम ब्रांच ने शैलेश के घर से ही जांच की शुरुआत की.

घर की कुंडली खंगालने पर पता चला कि शैलेश निमसे के किसी महिला के साथ अवैध संबंध थे. जिस की वजह से शैलेश की अपनी पत्नी साक्षी उर्फ वैशाली से अकसर लड़ाई होती रहती थी. वह उस के साथ मारपीट करता था. इस बात की जब गहराई से जांच की गई तो शैलेश की पत्नी साक्षी उर्फ वैशाली पर पुलिस को शक होने लगा. लेकिन मामला एक सभ्य और सम्मानित परिवार से संबंधित था इसलिए पुलिस ने बिना किसी पुख्ता सबूत के उस पर हाथ डालना ठीक नहीं समझा.

दूसरी ओर एपीआई प्रमोद बड़ाख ने शैलेश निमसे के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स व सीसीटीवी कैमरों की फुटेज को जांचा तो प्रमोद बबन लुटे नाम के एक शख्स की स्थिति संदिग्ध नजर आई. यह जानकारी उन्होंने अपने वरिष्ठ अधिकारियों को दी.

वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के निर्देश पर एपीआई ने प्रमोद बबन लुटे को थाने बुलवा लिया. उस से शैलेश की हत्या के बारे में मनोवैज्ञानिक तरीके से पूछताछ की और उस के सामने फोन की काल डिटेल्स व सीसीटीवी फुटेज रखी तो उस के होश उड़ गए. ऐसे में उस के सामने अपना अपराध स्वीकार करने के अलावा और कोई दूसरा चारा नहीं था. लिहाजा वह टूट गया और अपना अपराध स्वीकार करते हुए शैलेश की हत्या की उस ने जो कहानी बताई, वह हैरान कर देने वाली निकली.

प्रमोद लुटे के बयान के आधार पर पुलिस ने उसी समय शैलेश निमसे की पत्नी साक्षी उर्फ वैशाली को भी पति की हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर लिया. मजे की बात यह थी कि साक्षी के चेहरे पर अपने पति की हत्या का जरा भी अफसोस नहीं था. उसने बिना किसी दबाव के पति की हत्या का अपराध स्वीकार कर लिया.

43 वर्षीय शैलेश निमसे एक संभ्रांत परिवार का युवक था. वह अपने परिवार के साथ ठाणे जनपद के तालुका शाहपुर के अधई गांव में रहता था. मांबाप की अकेली संतान होने के कारण उस का परिवार में कुछ ज्यादा ही प्यारदुलार था. ज्यादा प्यार के कारण वह पढ़लिख भी नहीं सका.

उस की दिलचस्पी नेतागिरी में अधिक थी. स्कूल छोड़ने के बाद वह पूरी तरह से शिवसेना पार्टी का सक्रिय कार्यकर्ता बन गया था. इस के बाद उस की इलाके में धाक बन गई थी, जिस के चलते वह अपना अवैध काम भी करने लगा था. नेतागिरी से उसे कमाई होने लगी तो वह पार्टी को भी चंदे के रूप में मोटी रकम देने लगा. यही कारण था कि वह पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के काफी करीब आ गया था. तब पार्टी ने उसे शाहपुर का तालुका का उपप्रमुख और नगर सेवक बना दिया था.

करीब 15 साल पहले शैलेश की शादी साक्षी उर्फ वैशाली से हुई थी. उस का अच्छा स्वभाव था. वह शैलेश निमसे को बहुत प्यार करती थी. वक्त के साथ वह 3 बच्चों की मां भी बन गई थी. शादी के 10 सालों तक तो शैलेश ने अपने परिवार का काफी ध्यान रखा. लेकिन 2013 में उस के जीवन में एक ऐसी लड़की ने प्रवेश किया कि उस के परिवार की नींव हिल गई.

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जो शैलेश अपने परिवार के बिना एक क्षण नहीं रह सकता था वह धीरेधीरे अपने परिवार से दूरियां बनाने लगा. वह न तो पत्नी से ठीक तरह से बात करता और न ही बच्चों को प्यारदुलार करता था. धीरे धीरे उस ने घर में भी आना कम कर दिया तो साक्षी परेशान हो उठी.

पहले तो साक्षी को लगा कि पति को कोई पार्टी का तनाव या परेशानी होगी जिस से वह बच्चों और उसे समय नहीं दे पा रहे हैं. लेकिन जब सच्चाई सामने आई तो साक्षी के होश उड़ गए. साक्षी ने पहले शैलेश को समझाने और मनाने की कोशिश की, उस ने अपने और बच्चों के भविष्य का वास्ता दिया.  लेकिन शैलेश पर उस की बातों का कोई असर नहीं हुआ.

दलदल में डूबे शैलेश ने अपनी पत्नी और बच्चों की बातों को नजरअंदाज करते हुए अपनी प्रेमिका को रहने के लिए फ्लैट दे दिया. यह सब जान कर साक्षी के धैर्य का बांध टूट गया. अब आए दिनों उस की प्रेमिका को ले कर घर का माहौल खराब होने लगा. घर में लड़ाईझगड़े होने शुरू हो गए थे.

इस का नतीजा यह हुआ कि शैलेश ने अपनी पत्नी साक्षी को तलाक दे कर अपनी सारी प्रौपर्टी से बेदखल कर देने का मन बना लिया. इस के लिए उस ने साक्षी को धोखे में रख कर उस से तलाक के पेपरों पर हस्ताक्षर भी करा लिए. ताकि अपनी सारी प्रौपर्टी अपनी प्रेमिका को दे सके.

पति के इस चक्रव्यूह की जानकारी जब साक्षी को हुई तो उस के पैरों के नीचे की जैसे जमीन सरक गई. उस की समझ में यह नहीं आ रहा था कि अब वह क्या करे. अगर पति ने ऐसा किया तो वह फिर क्या करेगी. वह अपने छोटेछोटे बच्चों को ले कर कहां जाएगी. उस के और बच्चों के भविष्य का क्या होगा.

इस के लिए उस ने पति को फिर समझाया. उस के सामने रोई, गिड़गिड़ाई, लेकिन शैलेश को बच्चों और पत्नी पर कोई दया नहीं आई. वह अपने फैसले पर अटल रहा. बल्कि उस ने पत्नी को घर छोड़ कर जाने की तारीख भी बता दी थी. पति का यह निर्णय जान कर साक्षी उर्फ वैशाली ने अपना आपा खो दिया और उस ने अपने पति शैलेश निमसे के प्रति एक खतरनाक फैसला कर लिया. उस ने बेवफा पति को सजा देने की योजना बना डाली.

जिस दिन शैलेश पत्नी और बच्चों को अपनी प्रौपर्टी से बेदखल कर अपनी प्रेमिका के साथ रहने को जाने वाला था. उस से एक दिन पहले ही साक्षी ने अपने फैसले के अनुसार पति को सदासदा के लिए नींद के आगोश में भेज दिया. इस में उस का साथ शैलेश के एक किराएदार प्रमोद बबन लुटे ने दिया था.

दरअसल पति के निर्णय से आहत साक्षी को पति से सख्त नफरत हो गई थी. अपनी दर्दभरी कथा जब उस ने अपने यहां रहने वाले किराएदार प्रमोद लुटे को सुनाई तो वह उस की मदद करने के लिए तैयार हो गया. पर इस के लिए उस ने साक्षी के सामने पैसों की मांग रखी. जो साक्षी उसे देने के लिए तैयार हो गई. डेढ़ लाख रुपए की सुपारी लेने के बाद प्रमोद बबन लुटे अपने 2 साथियों को साथ ले कर शैलेश की हत्या की रूप रेखा तैयार करने में जुट गया. अपनी तैयारी पूरी करने के बाद प्रमोद ने इस की जानकारी साक्षी को भी दे दी थी.

19 अप्रैल, 2018 को अपनी मौत से अनभिज्ञ शैलेश जब अपने घर पर आया तो बहुत खुश था. उस ने साक्षी से कहा कि वह आज की रात और इस घर में रह ले. कल सुबह ही वह उसे और उस के बच्चों के साथ इस घर और अपनी पूरी प्रौपर्टी से बेदखल कर के वह अपनी प्रेमिका के साथ रहने के लिए चला जाएगा.

लेकिन उसे क्या पता था कि कौन घर छोड़ कर जाएगा. प्रेमिका के साथ रहने का सपना उस का सपना ही रह जाएगा. साक्षी ने रोजाना की तरह पति को शाम का खाना परोस कर दिया. खाना खाने के बाद उस ने साक्षी की तरफ नफरत से देखा और सो गया. उस के सो जाने के बाद साक्षी उस का कमरा खुला छोड़ कर दूसरे कमरे में सोने के लिए चली गई. लेकिन नींद उस की आंखों से कोसों दूर थी. उसे प्रमोद लुटे के आने का इंतजार था.

रात करीब एक बजे जब प्रमोद लुटे के आने की आहट हुई तो साक्षी ने उठ कर घर का मेन दरवाजा खोल दिया. प्रमोद लुटे अपने 2 साथियों के साथ एक मोटरसाइकिल से आया था. नींद में सोए शैलेश की उन लोगों ने गला दबा कर हत्या कर दी. शैलेश की हत्या करने के बाद तीनों ने शव को उठा कर के उस की हुंडई सोनाटा इंबेरा कार की डिक्की में डाला और उसे ठिकाने लगाने के लिए प्रमोद लुटे अपने एक साथी के साथ गणेशपुरी पुलिस थाने की सीमा में ले गया.

शव को झाडि़यों में डाल कर उन्होंने उस के ऊपर पेट्रौल डाला और आग लगा दी. इस के बाद उस की कार को घटनास्थल से लगभग डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर ले जा कर लावारिश हालत में छोड़ कर वे फरार हो गए. लाश ठिकाने लगाने की जानकारी प्रमोद ने साक्षी को भी दे दी थी.

अभियुक्तों ने पुलिस से बचने की लाख कोशिश की लेकिन क्राइम ब्रांच अधिकारियों की नजर से अधिक दिनों तक फरार नहीं रह सके. 24 अप्रैल, 2018 को क्राइम ब्रांच ने प्रमोद बबन लुटे और शैलेश की पत्नी साक्षी निमसे को अपनी गिरफ्त में ले लिया. दोनों से विस्तृत पूछताछ के बाद क्राइम ब्रांच ने उन्हें आगे की तफ्तीश के लिए गणेशपुरी पुलिस थाने के अधिकारियों को सौंप दिया.

गणेशपुरी पुलिस ने उन के विरुद्ध भादंवि की धारा 302, 201, 120बी के तहत मुकदमा दर्ज कर उन्हें तलोजा जेल भेज दिया. कथा लिखने तक इस हत्याकांड में शामिल 2 अन्य अभियुक्तों का पुलिस पता नहीं लगा सकी थी.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

प्यार में जब पति ने अड़ाई टांग – भाग 2

आत्महत्या की बात पर अड़ी रही शिवानी

पलंग के ऊपर एक देशी तमंचा और पलंग के दाहिनी ओर फर्श पर एक खाली खोखा पड़ा हुआ था. श्री त्रिपाठी ने सावधानी बरतते हुए वह तमंचा रुमाल द्वारा उठाया और खाली कारतूस के खोखे को भी कब्जे में ले लिया. रोने के कारण कपिल की पत्नी शिवानी की आंखें लाल हो गई थीं. वह पास ही खड़ी हो कर अभी भी सुबक रही थी.

“यह घटना कितने बजे की है शिवानी, जब कपिल ने आत्महत्या करने के लिए गोली चलाई?’’ श्री त्रिपाठी ने शिवानी से प्रश्न किया.

“उस वक्त घड़ी में ढाई बज रहे थे साहब. मैं सोई हुई थी. गोली चलने की आवाज से मैं अपनी चारपाई पर उठ कर बैठ गई. पति के कराहने की आवाजें कानों में पड़ी तो मैं चौंक कर इन के कमरे में आई. वो बिस्तर पर गिरे तड़प रहे थे. मैं ने तुरंत अपनी ससुराल फलावदा में इन के भतीजे सचिन को फोन द्वारा इन के आत्महत्या करने की जानकारी दी और मकान मालिक तथा पड़ोसियों की मदद से इन्हें एमएमजी अस्पताल ले कर भागी.’’

“कपिल ने आत्महत्या क्यों की?’’ शिवानी के चेहरे पर नजरें गड़ा कर श्री त्रिपाठी ने पूछा.

“कई दिनों से यह परेशान चल रहे थे, मैं पूछती थी तो कह देते थे कि कामधंधे में सौ प्रकार के टेंशन होते हैं, तुम्हें क्या बताऊं, मैं खामोश हो जाती थी. उसी टेंशन में इन्होंने रात को खुद को गोली मार ली.’’

“तुम पतिपत्नी के बीच सब कुछ ठीक चल रहा था?’’ श्री त्रिपाठी ने पूछा.

“हम खुश थे साहब. कपिल कभी टेंशन नहीं देते थे. काम पर से लौटते थे तो मेरे और बच्चों के लिए खानेपीने का सामान ले कर आते थे. कल भी वह आम ले कर आए थे. हम ने साथ खाना खाया था, वह 10 बजे सोने के लिए अपने पलंग पर आ जाते थे. रात को भी वह 10 बजे अपने पलंग पर सोने के लिए चले गए थे. मैं बच्चों के साथ अपने कमरे में जा कर सो गई थी कि रात को इन्होंने खुद को गोली मार ली.’’

“तुम कैसे कह सकती हो कि गोली कपिल ने खुद चला कर आत्महत्या की है, कोई दूसरा भी तो गोली चला सकता है.’’ श्री त्रिपाठी ने गंभीरता से अपनी बात कही.

“तमंचा तो इन्हीं का ही था साहब. कोई बाहरी व्यक्ति यदि इन्हें मारने आता तो अपना हथियार ले कर आता न कि इन का तमंचा संदूक से निकाल कर इन्हें गोली मारता.’’

“बात तो तुम ठीक कह रही हो.’’ श्री त्रिपाठी ने होंठों को सिकोड़ कर मन ही मन शिवानी के तर्क की प्रशंसा की, लेकिन उन्हें शिवानी के तर्क में एक खामी भी नजर आ गई. वह यह कि कमरे में कपिल की हत्या करने आए व्यक्ति को संदूक से कपिल का तमंचा निकाल कर भी दिया जा सकता है. और यह काम शिवानी ही कर सकती है, क्योंकि उस घर में कपिल के साथ शिवानी ही मौजूद थी.

‘शिवानी ने यदि ऐसा किया है तो क्यों?’ श्री त्रिपाठी को इसी का उत्तर तलाश करना था.

“क्या रात को तुम ने दरवाजा खुला छोड़ा था?’’ श्री त्रिपाठी ने शिवानी के चेहरे पर नजरें जमा कर पूछा.

शिवानी के खिलाफ मिलते गए ठोस सबूत

शिवानी के चेहरे के भाव बदले. वह थोडा घबराई, फिर खुद को संभालते हुए जल्दी से बोली, ‘‘मैं क्यों दरवाजा खुला छोड़ूंगी साहब, मैं ने रात को अच्छे से दरवाजा बंद किया था. मेरे पति ने जब गोली मारी, तब पड़ोसियों की मदद लेने के लिए मैं ने खुद दरवाजा खोला था.’’

“ठीक है,’’ श्री त्रिपाठी ने खून के नमूने और अन्य साक्ष्य एकत्र करने का काम एसआई हरेंद्र सिंह को सौंप कर उन्हें यह भी हिदायत दे दी कि वह आसपास पड़ोसियों से शिवानी के चरित्र की जानकारी भी गुप्त तरीके से एकत्र करें और उन्हें रिपोर्ट करें. हिदायत देने के बाद श्री त्रिपाठी थाना नंदग्राम की ओर लौट गए.

एसएचओ प्रदीप कुमार त्रिपाठी की आंखों में तीखी चमक उभर आई. वह आगे की ओर झुक गए. उन के सामने एसआई हरेंद्र, हैडकांस्टेबल सगीर खान और कांस्टेबल सोनू मावी बैठे हुए थे. एसआई हरेंद्र ने कुछ ही देर पहले श्री त्रिपाठी को कपिल की संभावित हत्या के पीछे की एक खास जानकारी दी थी. एसआई हरेंद्र की आंखों में झांक कर श्री त्रिपाठी ने पूछा, ‘‘तुम ने जो जानकारी जुटाई है, वह सही है न?’’

“बिलकुल सही है सर. कपिल के आसपास हम ने गुप्त तरीके से शिवानी के चरित्र के विषय में पूछताछ की. 2-4 जगह से हमें बताया गया है कि शिवानी का किसी युवक से इश्कविश्क का चक्कर चल रहा है.  मृतक कपिल और शिवानी के बीच उन्होंने उस युवक को ले कर झगडऩे की आवाजें भी सुनी हैं, जो कभीकभी रात के सन्नाटे में उन्हें सुनाई दे जाती थीं. कपिल शायद अपनी इज्जत को डरता रहा है, इसलिए उस ने कभी ऊंची आवाज में उस युवक को ले कर शिवानी से झगड़ा नहीं किया.

“उस युवक का नामपता मालूम हुआ?’’ श्री त्रिपाठी ने पूछा.

“नहीं, लेकिन मैं ने मुखबिरों को यह पता लगाने के काम पर लगा दिया है सर, बहुत जल्द उस युवक का नामपता मालूम हो जाएगा.’’

“शिवानी को फिलहाल अंधेरे में रखना है मिस्टर हरेंद्र. हमें शिवानी के खिलाफ ठोस सबूत मिल जाएं, तभी शिवानी पर हाथ डाला जाएगा.’’

“ठीक है सर.’’ एसआई ने कहा, ‘‘बहुत सावधानी से मैं उस युवक की जानकारी हासिल करूंगा.’’ एसआई हरेंद्र ने कहा और कुरसी छोड़ दी, ‘‘इजाजत चाहूंगा सर.’’

श्री त्रिपाठी ने सिर हिला दिया. एसआई हरेंद्र हेडकांस्टेबल सगीर खान को साथ ले कर कक्ष से बाहर निकल गए. कपिल की पोस्टमार्टम रिपोर्ट आ गई थी, उस से श्री प्रदीप त्रिपाठी के इस शक की पुष्टि हो गई कि कपिल ने आत्महत्या नहीं की है, उस की गोली मार कर हत्या की गई है.

प्रेमी अंकुश तक पहुंच गई पुलिस

पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, कपिल को हत्या से पहले नींद की गोलियां खिलाई गई थीं. उस को बाईं कनपटी पर बहुत नजदीक से गोली मारी गई थी, जो खोपड़ी के दाहिनी ओर से निकल गई थी. इसी से कपिल की मौत हुई थी. जिस रात कपिल की हत्या की गई, कमरे में उस की पत्नी शिवानी और छोटे बच्चे ही थे. जाहिर था, कपिल को शिवानी ने ही नशे की गोलियां खाने या दूध में मिला कर दी होंगी.

शिवानी शक के दायरे में थी, लेकिन श्री त्रिपाठी उसपर हाथ डालने से पहले उस युवक तक पहुंचना जरूरी समझते थे ताकि शिवानी को गुनाह कुबूल करवाया जा सके.  एसएचओ प्रदीप त्रिपाठी का सोचना था कि शिवानी ने अपने प्रेमी से पति को गोली मरवाई है. कपिल कुमार की हत्याकी पुष्टि हो जाने के बाद 16 मार्च, 2023 को कपिल के भतीजे सचिन की ओर से भादंवि की धारा 302 के तहत रिपोर्टदर्ज कर ली गई.

सवालों के घेरे में मोटिव, मर्डर, वेपन और चश्मदीद

प्यार में जब पति ने अड़ाई टांग – भाग 1

गाजियाबाद शहर के नंदग्राम थाने में किसी अज्ञात व्यक्ति ने फोन कर सूचना दी कि नंदग्राम में एक व्यक्ति ने गोली मार कर खुद को घायल कर लिया है, उसे इलाज के लिए एमएमजी अस्पताल में भरती करवाया गया है. उस वक्त रात के 3 बज रहे थे.  सूचना मिलते ही नंदग्राम थाने के एसएचओ प्रदीप कुमार त्रिपाठी तुरंत 2 कांस्टेबलों को साथ ले कर एमएमजी अस्पताल के लिए खाना हो गए. वह अस्पताल पहुंचे तो मालूम हुआ कि उस घायल व्यक्ति की हालत काफी नाजुक थी, इसलिए उसे यूपी से दिल्ली के जीटीबी अस्पताल के लिए रेफर कर दिया गया है. यह घटना 4 मार्च, 2023 की है.

एसएचओ प्रदीप कुमार त्रिपाठी दिल्ली के जीटीबी अस्पताल में आ गए. यहां उन्हें बताया गया कि उस व्यक्ति की मृत्यु हो गई है. श्री त्रिपाठी भारी मन से उस व्यक्ति की लाश का निरीक्षण किया तो चौंक पड़े. उस व्यक्ति के बाईं कनपटी पर गोली का गहरा जख्म था. गोली बाईं कनपटी पर चलाई गई थी, जो उस के सिर के दाहिनी ओर से निकल गई थी. यह देखने से अनुमान लगाया गया कि यह व्यक्ति लेफ्ट हैंडर रहा है.

कनपटी पर मारी थी गोली

लाश के पास एक युवक और एक महिला बैठे रो रहे थे. एसएचओ त्रिपाठी ने युवक के कंधे पर सहानुभूति से हाथ रख कर सांत्वना देते हुए कहा, ‘‘इस की मौत का मुझे गहरा दुख है. क्या तुम इस के बेटे हो?’’

“जी नहीं.’’ वह युवक उठ कर सुबकते हुए बोला, ‘‘यह मेरे चाचा कपिल कुमार थे.’’

“ओह!’’ श्री त्रिपाठी ने युवक के चेहरे पर नजरें जमा कर पूछा, ‘‘क्या तुम्हारे चाचा लेफ्ट टेंडर थे?’’

“नहीं साहब, मेरे चाचा अपने दाहिने हाथ से सारा काम करते थे.’’

श्री त्रिपाठी के माथे पर बल पड़ गए. उन्होंने फिर से लाश का जख्म देखा. गोली बाईं कनपटी पर ही सटा कर चलाई गई थी. ऐसा कोई दाहिने हाथ से हर काम करने वाला व्यक्ति कभी नहीं कर सकता था. स्पष्ट था कि गोली मृतक ने स्वयं नहीं चलाई है, यानी इसे किसी दूसरे व्यक्ति ने गोली मारी है. सीधेसीधे यह हत्या का केस था.

“अपने चाचा का नाम, पता नोट करवाओ.’’ एसएचओ प्रदीप कुमार त्रिपाठी ने बेभीर स्वर में कहा और साथ आए कांस्टेबल सोनू मावी को नामपता नोट करने का हुक्म दे कर वह कुछ दूरी पर चले गए. उन्होंने इस संदिग्ध घटना की जानकारी डीसीपी निपुण अग्रवाल और एसीपी आलोक दुबे को दे दी. अधिकारियों को यहां आने में समय लग सकता था. श्री त्रिपाठी ने मृतक के भतीजे से घटना की जानकारी लेने के लिए

उस से पूछा, ‘‘तुम्हें इस घटना की जानकारी कैसे हुई?’’

उस युवक का नाम सचिन था. आसू पोंछते हुए उस ने कहा, ‘‘सर, मैं कस्बा फलावदा, मेरठ में रहता हूं. रात को मैं जब अपने कमरे में सो रहा था, मेरे मोबाइल की घंटी बजी तो मेरी नींद टूट गई. इतनी रात को कौन फोन कर रहा है, यह जानने के लिए मैं ने मोबाइल उठाया तो उस पर मेरी चाची शिवानी का नंबर था. चाची शिवानी ने मुझे बताया कि चाचा कपिल ने खुद को गोली मार ली है.

“मैं ने तुरंत घर के लोगों को यह बात बताई और बाइक से नंदग्राम के लिए निकल पड़ा. रास्ते में ही चाची से मालूम हुआ कि चाचा को दिल्ली जीटीबी अस्पताल में रेफर कर दिया गया है, इसलिए मैं सीधा यहां आ गया. यहां डाक्टरों ने चाचा को मृत घोषित कर दिया था.’’

“तुम्हारी चाची शिवानी ने तुम्हें बताया कि तुम्हारे चाचा ने आत्महत्या कर ली है, लेकिन मेरा अनुमान है यह सुसाइड नहीं बल्कि हत्या का मामला है. क्या तुम बता सकते हो, तुम्हारे चाचा को कौन गोली मार सकता है?’’

सच की तलाश में जुटी पुलिस

इस खुलासे से सचिन चौंक पड़ा. उस ने हैरत से एसएचओ त्रिपाठी की ओर देखा और बोला, ‘‘चाचा कपिल तो बहुत सज्जन आदमी थे साहब, उन की तो किसी से दुश्मनी भी नहीं थी.’’

“तुम्हारी चाची और चाचा के बीच कोई अनबन चल रही हो, ऐसा कुछ तुम्हें मालूम है?’’

“पतिपत्नी के बीच हर घर में थोड़ी बहुत खटपट होती ही रहती है साहब. दोनों के बीच कोई बड़ा झगड़ा तो कभी नहीं हुआ और न चाची कभी रूठ कर अपने मायके गईं. मैं अकसर चाचा के घर आताजाता रहता हूं, वहां सब कुछ सामान्य दिखाई देता था. यदि चाचा की हत्या का शक आप को है तो मेरी प्रार्थना है कि आप इस केस की गहराई से जांच करें.’’

“वह तो मैं करूंगा ही, तुम्हारी चाची का भी बयान मुझे लेना पड़ेगा. चूंकि अभी वह बयान देने की स्थिति में नहीं है, उस से बाद में बात की जाएगी.’’ श्री त्रिपाठी ने कहा और दूसरी आवश्यक काररवाई निपटाने में लग गए. करीब एक घंटे बाद गाजियाबाद से डीसीपी निपुण अग्रवाल और एसीपी आलोक दुबे अस्पताल में आ गए. दोनों अधिकारियों ने लाश का निरीक्षण करने के बाद यही शंका प्रकट की कि कपिल ने आत्महत्या नहीं की है, उस की हत्या की गई है.

एसीपी आलोक दुबे ने अपने निर्देशन में इस मामले की गहनता से जांच करने के लिए थाना नंदग्राम के एसएचओ प्रदीप कुमार त्रिपाठी के नेतृत्व में पुलिस टीम का गठन कर दिया. इस में एसआई हरेंद्र सिंह, हैडकांस्टेबल सगीर खान, कांस्टेबल सोनू मावी आदि को शामिल किया गया. कागजी काररवाई पूरी कर के कपिल की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया. निर्देश देने के बाद पुलिस अधिकारी वापस चले गए.

कपिल के पैतृक गांव फलावदा से उस के कई रिश्तेदार जीटीबी अस्पताल आ गए थे. सभी कपिल की पत्नी शिवानी को अपने साथ ले कर नंदग्राम लौट गए. उन के साथ एसएचओ श्री त्रिपाठी भी नंदग्राम के लिए निकले. उन्हें उस जगह की जांच करनी थी, जहां कपिल द्वारा गोली मार कर आत्महत्या करने की बात शिवानी ने बताई थी. वह देखना चाहते थे कि कपिल की पत्नी शिवानी की बात में कितनी सच्चाई है.

घटनास्थल पर मिले कुछ सबूत

कपिल कुमार कस्बा फलावदा, जिला मेरठ का मूल निवासी था. उस के पिता बलवीर सिंह की मृत्यु हो चुकी थी. कपिल कुछ साल पहले काम के सिलसिले में उत्तर प्रदेश के शहर गाजियाबाद के नंदग्राम में आ कर रहने लगा था.  नंदग्राम में वह अपनी पत्नी शिवानी उर्फ सीमा और 2 बेटों के साथ कुंदन सिंह रावत के मकान में किराए पर रहता था. कपिल हंसमुख और मिलनसार व्यक्ति था. उस के परिवार में भी किसी प्रकार की परेशानी नहीं थी. अपनी पत्नी और बच्चों को खुश रखने के लिए वह कोई कमी नहीं छोड़ता था.

बेवफाई का सिला कुछ ऐसा मिला

26 जनवरी, 2017 को इलाहाबाद के यमुनानगर इलाके के थाना नैनी में गणतंत्र दिवस के ध्वजारोहण की तैयारी चल रही थी. इंसपेक्टर अवधेश प्रताप सिंह एवं अन्य पुलिसकर्मी सीओ अलका भटनागर के आने का इंतजार कर रहे थे. उसी समय एक दुबलापतला युवक आया और एक सिपाही के पास जा कर बोला, ‘‘स…स… साहब, बड़े साहब कहां हैं, मुझे उन से कुछ कहना है.’’

इंसपेक्टर अवधेश प्रताप सिंह वहीं मौजूद थे. उस युवक की आवाज उन के कानों तक पहुंची तो उन्होंने उसे अपने पास बुला कर पूछा, ‘‘कहो, क्या बात है?’’

‘‘साहब, मेरा नाम इंद्रकुमार साहू है. मैं चक गरीबदास मोहल्ले में मामाभांजा तालाब के पास रहता हूं. मैं ने अपनी पत्नी और उस के प्रेमी को मार डाला है.’’ इंद्रकुमार के मुंह से 2 हत्याओं की बात सुन कर अवधेश प्रताप सिंह दंग रह गए. उन्होंने उस के ऊपर एक नजर डाली, उस के उलझे बाल, लाललाल आंखों से वह पागल जैसा नजर आ रहा था. चेहरे के हावभाव देख लग रहा था कि वह रात भर नहीं सोया था.

वहां मौजूद सभी पुलिसकर्मी इंद्रकुमार को हैरानी से देख रहे थे. थाना पुलिस कुछ करने का सोच रही थी, तभी सीओ अलका भटनागर भी थाना आ पहुंचीं. इंद्रकुमार द्वारा दो हत्याएं करने की बात सुन वह भी दंग रह गईं. सीओ के इशारे पर अवधेश प्रताप सिंह ने उसे हिरासत में ले लिया.

ध्वजारोहण की औपचारिकताएं पूरी करने के बाद अवधेश प्रताप सिंह इंद्रकुमार को अपनी जीप में बैठा कर उस के घर ले गए. अलका भटनागर भी साथ गईं. इंद्रकुमार पुलिस को उस कमरे में ले गया, जहां पत्नी गीता साहू और उस के प्रेमी रीतेश सोनी की लाशें पड़ी थीं.

पुलिस के पहुंचने पर इस दोहरे हत्याकांड की खबर पासपड़ोस वालों को मिली तो सभी इकट्ठा हो गए. पुलिस दोनों लाशों का बारीकी से निरीक्षण करने लगी. पुलिस अधिकारी यह देख कर हतप्रभ थे कि दोनों लाशों पर नोचखसोट या चोट के कोई निशान नहीं थे. गीता के गले पर लाल धारियां जरूर पड़ी थीं. रीतेश के गले पर भी वैसे ही निशान देख कर लग रह था कि उन की हत्या गला घोंट कर की गई थी.

मोहल्ले वालों से खबर पा कर उस के घर वाले रोतेबिलखते घटनास्थल पर आ गए थे. मौके की जरूरी काररवाई पूरी करने के बाद पुलिस ने दोनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दिया. इस के बाद इंद्रकुमार को थाने ला कर उस से इस दोहरे हत्याकांड के बारे में पूछताछ की तो उस ने पत्नी की बेवफाई की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार थी—

इंद्रकुमार साहू उत्तर प्रदेश के जिला इलाहाबाद के थाना नैनी के मोहल्ला गरीबदास में अपनी 32 साल की पत्नी गीता और 4 बच्चों के साथ रहता था. उस की बड़ी बेटी 15 साल की थी. इंद्रकुमार ने अपने मकान के आगे वाले हिस्से में किराना और चायनाश्ता की दुकान खोल रखी थी. उस का काम अच्छा चल रहा था. घर के काम से फारिग होने के बाद गीता भी दुकानदारी के काम में उस का हाथ बंटाती थी.

इंद्रकुमार के घर से कुछ दूरी पर बनारसीलाल सोनी रहता था. उस का बेटा रीतेश सोनी सिगरेट और गुटखा का शौकीन था. इसी वजह से उस का इंद्रकुमार की दुकान पर आनाजाना लगा रहता था. मोहल्ले के रिश्ते से गीता उस की भाभी लगती थी. इसी नाते वह अकसर उस से इंद्रकुमार के सामने ही हंसीमजाक कर लिया करता था.

अपने से 9 साल छोटे रीतेश की बातों का गीता भी हंस कर जवाब दे दिया करती थी. स्वभाव से सीधा और सरल इंद्रकुमार इस का कतई बुरा नहीं मानता था. इंद्रकुमार दुकान का सामान लेने अकसर इलाहाबाद शहर जाता रहता था. ऐसे में गीता ही दुकान संभालती थी.इस बीच रीतेश गीता को रिझाने के लिए उस की तारीफ किया करता था. एक बार उस ने कहा, ‘‘भाभी, तुम्हें देख कर कोई नहीं कह सकता कि तुम 4 बच्चों की मां हो. तुम तो अभी भी जवान दिखती हो.’’

अपनी तारीफ सुन कर गीता गदगद हो गई थी. इस के बाद एक दिन उस ने कहा, ‘‘भाभी, तुम में गजब का आकर्षण है. कहां तुम और कहां इंदर भाई. दोनों की कदकाठी, रंगरूप और उम्र में जमीनआसमान का अंतर है. तुम्हारे सामने तो वह कुछ भी नहीं है.’’

अपनी तारीफ सुन कर गीता अंदर ही अंदर जहां एक ओर फूली नहीं समाई, वहीं दिखावे के लिए उस ने मंदमंद मुसकराते हुए रीतेश की ओर देखते हुए कहा, ‘‘झूठे कहीं के, तुम जरूरत से ज्यादा तारीफ कर रहे हो? मुझे तुम्हारी इस तारीफ में दाल में कुछ काला नजर आ रहा है, तुम्हारे भैया जो मरियल से दिखते हैं, आने दो बताती हूं उन से.’’

इतना कह कर वह जोरजोर से हंसने लगी. हकीकत यह थी कि गीता रीतेश को मन ही मन चाहती थी. उस ने केवल दिखावे के लिए यह बात कही थी. रीतेश हर हाल में उसे पाना चाहता था. गीता के हावभाव से वह समझ चुका था कि गीता भी उसे पसंद करती है. लेकिन वह इजहार नहीं कर पा रही है.

एक दिन दोपहर को गीता के बच्चे स्कूल गए थे. इंद्रकुमार बाजार गया हुआ था. गरमी के दिन थे. दुकान पर सन्नाटा था. रीतेश ऐसे ही मौके की तलाश में था. वह गीता की दुकान पर पहुंच गया. इधरउधर की बातों और हंसीमजाक के बीच रीतेश ने गीता का हाथ अपने हाथ में ले लिया.

गीता ने इस का विरोध नहीं किया. चेहरेमोहरे से गोरेचिट्टे गबरू जवान रीतेश के हाथों का स्पर्श कुछ अलग था. गीता का हाथ अपने हाथ में ले कर रीतेश सुधबुध खो कर एकटक उस के चेहरे पर निगाहें टिकाए रहा. अचानक रीतेश की तंद्रा भंग करते हुए गीता ने कहा, ‘‘अरे ओ देवरजी, किस दुनिया में सो गए. छोड़ो मेरा हाथ. अगर किसी ने देख लिया तो जानते हो कितनी बड़ी बेइज्जती होगी?’’

गीता की बात सुन कर रीतेश ने कहा, ‘‘यहां बाहर कोई देख लेगा तो अंदर कमरे में चलें?’’

‘‘नहीं…नहीं… आज नहीं, अभी उन के आने का समय हो गया है. वह किसी भी समय आ सकते हैं. फिर कभी अंदर चलेंगे.’’ गीता ने कहा तो रीतेश ने उस का हाथ छोड़ दिया.

लेकिन वह मन ही मन बहुत खुश था, क्योंकि उसे गीता की तरफ से हरी झंडी मिल गई थी. इस के बाद मौका मिलते ही दोनों ने मर्यादा की दीवार तोड़ डाली. इस के बाद इंद्रकुमार की आंखों में धूल झोंक कर गीता रीतेश के साथ मौजमस्ती करने लगी. अवैधसंबंधों का यह सिलसिला करीब 3 सालों तक चलता रहा.

अवैध संबंधों को कोई लाख छिपाने की कोशिश क्यों न करे, लेकिन वह छिप नहीं पाते. किसी तरह पड़ोसियों को गीता और रीतेश के अवैध संबंधों की भनक लग गई. इंद्रकुमार के दोस्तों ने कई बार उसे उस की पत्नी और रीतेश के संबंधों की बात बताई, लेकिन वह इतना सीधासादा था कि उस ने दोस्तों की बातों पर ध्यान नहीं दिया. क्योंकि उसे पत्नी पर पूरा विश्वास था. जबकि सच्चाई यह थी कि वह उस के साथ लगातार विश्वासघात कर रही थी.

सही बात तो यह थी कि गीता पति को कुछ समझती ही नहीं थी. आखिर 6 महीने पहले एक दिन इंद्रकुमार ने अपनी पत्नी और रीतेश को अपने ही घर में आपत्तिजनक स्थिति में रंगेहाथों पकड़ लिया. रीतेश ने जब इंद्रकुमार को देखा तो वह फुरती से वहां से भाग गया. उस ने भी उस से कुछ नहीं कहा. पर उस ने गीता को खूब खरीखोटी सुनाई और दोबारा ऐसी हरकत न करने की हिदायत दे कर छोड़ दिया.

उस दिन के बाद से कुछ दिनों तक रीतेश का गीता के यहां आनाजाना लगभग बंद रहा. पर यह पाबंदी ज्यादा दिनों तक कायम न रह सकी. मौका मिलने पर दोनों फिर से इंद्रकुमार की आंखों में धूल झोंकने लगे. पर अब वे काफी सावधानी बरत रहे थे. गीता ने अपने दोनों बड़े बच्चों बेटी और बेटे को पूरी तरह से अपने पक्ष में कर लिया था.

रीतेश भी बच्चों को पैसे और खानेपीने की चीजें ला कर देता रहता था, जिस से बच्चे रीतेश के घर में आने की बात अपने पिता को नहीं बताते थे. इस के बावजूद इंद्रकुमार ने दोनों की चोरी दोबारा पकड़ ली. इस बार उस ने गीता की जम कर धुनाई की और बच्चों को भी डांटाफटकारा.

अब वह गीता पर और ज्यादा निगाह रखने लगा. मगर गीता पर इस का विपरीत असर हुआ. वैसे भी वह पहले ही पति की परवाह नहीं करती थी. अब उस का डर बिलकुल मन से निकल गया था. वह पूरी तरह बेशर्मी पर उतर आई. पति की मौजूदगी में ही वह प्रेमी रीतेश से खुलेआम मिलने लगी.

इंद्रकुमार दुकान पर बैठा रहता तो रीतेश उस के सामने ही घर के अंदर उस की पत्नी के पास चला जाता. वह जानता था कि रीतेश और गीता उस से ज्यादा ताकतवर हैं, इसलिए वह चाह कर भी कुछ नहीं कह पाता था. लाचार सा वह दुकान पर ही बैठा रहता था.

पत्नी पर अब उस का कोई वश नहीं रह गया था. वह 15 साल की बड़ी बेटी की दुहाई देते हुए पत्नी को समझाता, पर पत्नी पर उस के समझाने का कोई फर्क नहीं पड़ता था. बल्कि वह और भी ज्यादा मनमानी करने लगी थी.

अपनी आंखों के सामने अपनी इज्जत का जनाजा उठते देख उस का धैर्य जवाब देने लगा. अब उस से पत्नी की बेवफाई और बेहयाई बिलकुल बरदाश्त नहीं हो रही थी. इसी सब का नतीजा था कि उस ने मन ही मन एक खतरनाक मंसूबा पाल लिया. वह मंसूबा था रीतेश और बेवफा पत्नी की हत्या का.

घटना से 8-10 दिन पहले से ही वह अपने मंसूबे को अमलीजामा पहनाने में लग गया था. मसलन दोनों को मौत के आगोश में सुलाने की उस ने एक खतरनाक योजना बना ली थी. अपनी इस योजना के तहत वह खुद भी पत्नी के प्रेमी रीतेश से ऐसे बातें करने लगा, जैसे कि कुछ हुआ ही न हो.

योजना के अनुसार, 25 जनवरी, 2017 को वह एक मैडिकल स्टोर से नींद की 20 गोलियां खरीद लाया. दोनों बड़े बच्चों को वह उन की मौसी के घर छोड़ आया. जबकि छोटे दोनों बच्चे घर में ही थे.

रात 9 बजे के आसपास उस ने दुकान बंद की. घर के भीतर गया तो देखा गीता खाना बनाने की तैयारी कर रही थी. उस का प्रेमी रीतेश कमरे में बैठा टीवी देख रहा था. उसे देख कर अंदर ही अंदर उस का खून खौल रहा था. हत्या के इरादे से इंद्रकुमार ने खुद ही चाय बनाई और पत्नी तथा रीतेश की चाय में नींद की दवा मिला कर चाय उन्हें दे दी. एक कप में ले कर वह खुद भी चाय पीने लगा.

चाय पीने के बाद भी दोनों बेहोश नहीं हुए तो इंद्रकुमार अवाक रह गया. क्योंकि उस दिन उस ने दोनों को मौत के घाट उतारने की पूरी तैयारी कर ली थी. जब उन दोनों पर नींद की गोलियों का कोई असर नहीं हुआ तो उस ने रीतेश से कहा, ‘‘भाई रितेश कल 26 जनवरी है. कल शराब की सारी दुकानें बंद रहेंगी. आज मेरा मन शराब पीने का कर रहा है. क्यों न आज हम 3-3 पैग लगा लें.’’

इंद्रकुमार की बात पर रीतेश खुश हो गया. उस ने कहा, ‘‘हांहां, क्यों नहीं. जब तक गीता भाभी खाना बना रही हैं, तब तक हम दोनों अपना काम कर लेते हैं.’’ इस के बाद दोनों शराब की दुकान पर गए और वहां से एक बोतल खरीद कर लौट आए. उन के बीच शराब का दौर शुरू हुआ. अब तक गीता और रीतेश पर गोलियों का असर होने लगा था.

बातोंबातों में इंद्रकुमार ने रीतेश को ज्यादा शराब पिला दी. बिना खाएपिए दोनों आधी रात तक शराब पीते रहे. इस बीच गीता को नींद आने लगी. दोनों बच्चों के साथ गीता ने खाना खा लिया. उस ने रीतेश और पति को कई बार खाने को कहा. लेकिन जब उस ने देखा कि दोनों पीने में मस्त हैं तो वह बच्चों के साथ दूसरे कमरे में सोने चली गई. थोड़ी देर बाद नशा हावी होते ही रीतेश भी वहीं पसर गया.

इंद्रकुमार को इसी मौके का इंतजार था. वह रीतेश को खींच कर दुकान के पीछे वाले कमरे में ले गया और पूरी ताकत से उस का गला दबा दिया. थोड़ी देर में उस का शरीर हमेशाहमेशा के लिए शांत हो गया.

इस के बाद वह गीता को भी उसी कमरे में खींच लाया. लेकिन गीता पूरी तरह बेहोश नहीं थी. उस ने इंद्रकुमार से बचने की भरपूर कोशिश की, विरोध भी किया, लेकिन इंद्रकुमार ने दुपट्टे से उस का गला कस दिया. जिस के चलते उस के भी त्रियाचरित्र का अध्याय हमेशा के लिए समाप्त हो गया.

इंद्रकुमार साहू से विस्तार से पूछताछ कर के पुलिस ने भादंवि की धारा 302, 308 के तहत गिरफ्तार कर उसे न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे जिला कारागार भेज दिया गया.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

बालम की सेज पर नौकर का धमाल

बहुचर्चित लीना शर्मा हत्याकांड : कंस मामा को मिली सजा – भाग 3

29 अप्रैल, 2016 को जब लीना अपने साथ सोहागपुर से ही तारबंदी का सामान ले कर प्रताप कुशवाहा और दूसरे लोगों के साथ अपने खेत पर पहुंची तो तारबंदी करने को ले कर उस का मामा प्रदीप से विवाद इतना बढ़ा कि प्रदीप ने लीना के साथ आए लोगों को यह कह कर वहां से खदेड़ दिया कि ‘‘ये हमारा आपस का मामला है, हम दोनों निपटा लेंगे.’’

तड़पा कर की थी लीना की हत्या…

लीना के साथ आए लोगों के वहां से जाने के बाद प्रदीप शर्मा उसे अपने खेत पर बने घर पर ले गया. वहां पहुंच कर प्रदीप ने लीना के सिर पर डंडे से हमला कर दिया. तभी प्रदीप के नौकर गोरेलाल, राजेंद्र ने उस के सिर पर पत्थर से हमला कर दिया. सिर में गहरी चोट लगने से वह जमीन पर गिर गई और थोड़ी देर तक तड़पने के बाद उस की मौत हो गई. लीना की मौत के बाद प्रदीप ने दोनों नौकरों से कहा, ‘‘जाओ, जल्दी से ट्रैक्टर ट्रौली ले कर आओ. लाश को ठिकाने लगाना पड़ेगा.’’

“जी मालिक, अभी लाते हैं. मगर किसी ने देख लिया तो सीधे जेल ही जाएंगे.’’ गोरेलाल डर के मारे बोला.

“मेरे बीवीबच्चों का क्या होगा मालिक.’’ राजेंद्र ने भी आशंका व्यक्त करते हुए कहा.

“डरने की बात नहीं है, जो हुआ उसे भूल जाओ और लाश ठिकाने लगाने में मेरी मदद करो. आज के बाद किसी से इस बात की चर्चा भी नहीं करना.’’ प्रदीप शर्मा ने दोनों को भरोसा दिलाते हुए कहा. प्रदीप शर्मा के कहने पर गोरेलाल और राजेंद्र कुछ ही देर में ट्रैक्टर ट्रौली ले कर आ गए. तीनों ने मिल कर लीना की लाश को ट्रैक्टर ट्रौली में रखा और उस के ऊपर घासफूस रख कर नौकरों के साथ सतपुड़ा टाइगर रिजर्व क्षेत्र के कामती के जंगल में पहुंच गए.

वहां बरसाती नाले में सब से पहले गोरेलाल और राजेंद्र ने गड्ढा खोदा और उस गड्ïढे में नमक और यूरिया खाद डाल दी. बाद में लीना के शरीर के कपड़े उतार कर उसे दफना दिया. 14 मई, 2016 को प्रदीप शर्मा की निशानदेही पर पुलिस टीम ने और तहसीलदार की मौजूदगी में नगरपालिका के कर्मचारियों के सहयोग से लीना की लाश निकाली.

शव पर मिले टैटू और ब्रेसलेट से लीना शर्मा की बहन हेमा शर्मा ने शिनाख्त की. बाद में लीना शर्मा के सैंपल से हेमा शर्मा का डीएनए भी मैच कराया गया. प्रदीप ने लीना के कपड़ों में मिले पर्स से वसीयतनामा निकाल कर उस की जींस पैंट और पर्स को अपने घर के पीछे खेत की मेड़ पर जला दिया था, जबकि वसीयतनामा को अपने पास रख लिया था.

3 डाक्टरों के पैनल ने किया था पोस्टमार्टम…

14 मई को जिस तरह की हालत में लीना का शव मिला था, उस से दुष्कर्म की आशंका भी जताई जा रही थी. इस वजह से 3 डाक्टरों के पैनल ने पोस्टमार्टम किया. शव 15 दिन पुराना होने से बुरी तरह सड़ चुका था. पुलिस को पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिली तो डाक्टरों ने सिर में गहरी चोट से फ्रैक्चर होना और उसी वजह से मौत होने की बात कही थी.

पोस्टमार्टम करते समय डाक्टरों ने दुष्कर्म जैसी घटना की आशंका को देखते हुए वैजाइनल स्लाइड भी बनाई. सभी नमूनों की जांच सागर फोरैंसिक लेबोरेटरीज में कराई गई थी. पोस्टमार्टम के बाद 15 मई, 2016 को लीना की बहन हेमा और बहनोई ने सोहागपुर आ कर लीना का अंतिम संस्कार किया था. पुलिस की दिन भर हुई पूछताछ में प्रदीप ने कई राज उगले थे. उस ने बताया कि लीना की मौत सिर में चोट लगने से नहीं, बल्कि पत्थरों से कुचलने और गला दबाने से हुई थी.

दृश्यम फिल्म की तरह रची गई कहानी…

2015 में आई अजय देवगन की फिल्म ‘दृश्यम’ की कहानी से इस मामले की कहानी मिलतीजुलती है. लीना के हत्यारों ने भी उस के 2 सेलफोन में से एक को घटनास्थल से करीब 30 किलोमीटर दूर पिपरिया (होशंगाबाद) रेलवे स्टेशन पर फेंक दिया था, ताकि पुलिस उस की लोकेशन को ले कर भ्रमित होती रहे.

इत्तेफाक से यह मोबाइल जिस यात्री को मिला, उस ने सिम कार्ड फेंकने के बाद मोबाइल फोन अपने पास रख लिया. बाद में 5 मई को पिपरिया में एक व्यक्ति को यह सिम मिला तो उस ने इसे दूसरे फोन सेट में डाला. जब लीना के दोस्त का फोन काल आया तो उस ने लीना के साथ कुछ गलत होने के बारे में उसे सतर्क कर दिया गया.

इसी मोबाइल की काल डिटेल्स से पूरे मामले की कडिय़ां जुड़़ती गईं और लापता होने के 15वें दिन पुलिस ने एसडीएम, तहसीलदार की उपस्थिति में गड्ïढा खुदवा कर लीना की लाश को निकलवाया. प्रदीप ने पुलिस के सामने यह प्रदर्शित करने का प्रयास किया कि उस के आदमियों ने लीना पर रौड और पत्थरों से हमला किया था, क्योंकि लीना ने 29 अप्रैल, 2016 को भूमि विवाद को ले कर उस पर हमला किया था.

लेकिन होशंगाबाद (अब नर्मदापुरम) पुलिस की जांच से पता चला कि यह एक पूर्व नियोजित हत्या थी. ‘‘लीना के प्रदीप पर हमला करने के कोई निशान नहीं मिले थे. जिस तरह से लीना के सामान को नष्ट कर दिया गया और उस के शरीर को कामती जंगल (डूडादेह गांव से 4 किलोमीटर दूर) में फेंक दिया गया और उस के सेलफोन को ट्रेन में फेंकने का प्रयास किया गया. उस से पता चलता है कि हत्या पूर्व नियोजित थी.

इस के अलावा, हत्या के सबूत नष्ट करने के लिए दफनाने से पहले उस के शरीर पर यूरिया और नमक छिडक़ने की हरकत भी इस ओर इशारा करती है कि यह एक पूर्व नियोजित हत्या थी.

साल भर के भीतर मिली जमानत…

लीना शर्मा की लाश काफी सड़ चुकी थी. उस की पहचान कराने के लिए बहन हेमा शर्मा का भोपाल में डीएनए टेस्ट कराया था. डीएनए रिपोर्ट से लीना के शव की पहचान हुई थी. हत्या के खुलासे के बाद लीना के मामा प्रदीप शर्मा, नौकर गोरेलाल, राजेंद्र को हत्या के आरोप में सोहागपुर पुलिस ने गिरफ्तार कर कोर्ट में चालान पेश किया, जहां से तीनों को जेल भेज दिया गया था.

प्रदीप शर्मा के परिवार के लोगों ने जमानत के लिए एड़ीचोटी का जोर लगा दिया था. जबकि लीना की तरफ से कोई पहल नहीं हुई थी. यही वजह रही कि प्रदीप शर्मा के घर वाले कोर्टकचहरी में पानी की तरह पैसा बहा रहे थे. और उन की कोशिश कामयाब भी रही. एक साल के अंदर ही तीनों आरोपियों को कोर्ट से जमानत मिल गई. लीना की हत्या के 9 महीने बाद 22 फरवरी, 2017 को प्रदीप शर्मा को कोर्ट ने जमानत दे दी. इसी तरह 11 महीने बाद पहली अप्रैल, 2017 को गोरेलाल और राजेंद्र भी जमानत पर बाहर आ गए.

21 मार्च, 2023 को कोर्ट का फैसला आते ही कोर्ट रूम में मौजूद सोहागपुर पुलिस ने प्रदीप शर्मा, गोरेलाल और राजेंद्र को गिरफ्तार कर लिया और उप जेल पिपरिया भेज दिया गया. जिस जमीन पर कब्जे के लिए लीना ने जान गंवाई, उस पर मामा प्रदीप शर्मा का कब्जा आज भी कायम है. उस पर प्रदीप शर्मा के घरपरिवार के लोग फसल उगा रहे हैं. लीना शर्मा की बहन हेमा मिश्रा, जो अपने पति के साथ कर्नाटक के बेंगलुरु में ही रहती है. वारदात के बाद वो इतनी डर गई थी कि कभी जमीन को पाने वो गांव नहीं आई.

—कथा कोर्ट के फैसले, लोक अभियोजक शंकरलाल मालवीय से बातचीत और मीडिया रिपोर्ट पर आधारित

मौत का खेल खेलने वाला मास्टर

4 मार्च, 2017 की रात लैंडलाइन फोन की घंटी बजी तो नाइट ड्यूटी पर तैनात एसआई सुरेश कसवां ने रिसीवर उठा कर कहा, ‘‘कहिए, हम आप की क्या सेवा कर सकते हैं?’’

‘‘साहब, मैं खेरूवाला से यूनुस खान बोल रहा हूं. मेरे दोस्त जसवंत मेघवाल पर अज्ञात लोगों ने जानलेवा हमला कर दिया है. साहब, कुछ करिए, उस के साथ महिलाएं और बच्चा भी है.’’ डरेसहमे स्वर में यूनुस खान ने कहा था.

‘‘ठीक है, अपने दोस्त की लोकेशन बताओ, पुलिस हरसंभव मदद करेगी.’’ सुरेश कसवां ने कहा.

यूनुस खान ने लोकेशन बताई तो 5 मिनट में ही सुरेश कसवां सिपाहियों के साथ हाथियांवाला खैरूवाला मार्ग स्थित घटनास्थल पर पहुंच गए. पुलिस की गाड़ी को देख कर सरसों के खेत में छिपा एक आदमी भागता हुआ सुरेश कसवां के सामने आ कर खड़ा हो गया. उस ने गिड़गिड़ाते हुए कहा, ‘‘साहब, हमें बचा लीजिए. वे दोनों मेरे परिवार को खत्म कर देना चाहते हैं. उन्होंने हमारे ऊपर बरछीतलवारों से हमला कर दिया है. मैं तो उन्हें चकमा दे कर भाग आया, पर मेरी सास, पत्नी और बेटा उन के कब्जे में है.’’

इतना कह कर डरेसहमे उस आदमी ने अपने दोनों हाथ जोड़ कर एसआई सुरेश कसवां के सामने किए तो चांदनी रात में उस के हाथों से टपकता हुआ खून उन्हें साफ दिखाई दे गया.

मामला काफी गंभीर था. पुलिस फोर्स के सामने 2 महिलाओं और एक बच्चे की सकुशल बरामदगी चुनौती बन गई. एक पल गंवाए बिना सुरेश कसवां ने उसी मार्ग पर खड़ी कार ढूंढ निकाली, जिस में पीछे की सीट पर 28-29 साल की एक युवती गंभीर हालत में घायल पड़ी थी. अगली सीट पर दो-ढाई साल का एक बच्चा गुमसुम बैठा था. उस की भरी हुई आंखें बता रही थीं कि कुछ देर पहले तक वह जारजार रोया था.

सुरेश कसवां ने घायल युवती की नब्ज टटोली तो उन्हें लगा कि इस की सांसें चल रही हैं. घायल आदमी और युवती को ले कर पुलिस टीम तुरंत स्वास्थ्य केंद्र पहुंची, जहां डाक्टरों ने उस घायल युवती की जांच की तो पता चला कि वह मर चुकी है. घायल व्यक्ति को भरती कर के उस का इलाज शुरू कर दिया गया. यह घटना राजस्थान के जिला श्रीगंगानगर की सादुल शहर तहसील में 4 मार्च, 2017 की आधी रात को घटी थी. घायल व्यक्ति का नाम जसवंत मेघवाल था और जो महिला मर गई थी, वह उस की पत्नी राजबाला थी. कार में मिला बच्चा उसी का बेटा रुद्र था.

इस के बाद थाना सादुल शहर के थानाप्रभारी भूपेंद्र सोनी के निर्देश पर जसवंत मेघवाल के बयान के आधार पर अज्ञात लोगों के खिलाफ अपराध संख्या 56/17 पर भादंवि की धाराओं 302, 307, 323, 342 हरिजन उत्पीड़न और धारा 34 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया गया. जसवंत की सास परमेश्वरी का अभी तक कुछ अतापता नहीं था. सुबह उस की तलाश में पुलिस टीम घटनास्थल पर पुन: पहुंची तो सड़क पर खड़ी कार से लगभग 200 मीटर दूर परमेश्वरी का लहूलुहान शव पुलिस को मिल गया. इस के बाद अपनी काररवाई कर पुलिस ने परमेश्वरी और उस की बेटी राजबाला की लाश को पोस्टमार्टम करा कर दोनों शव घर वालों को सौंप दिए गए.

दोनों हत्याओं की जानकारी पा कर श्रीगंगानगर के एसपी राहुल कोटकी सादुल शहर पहुंच गए थे. चूंकि इस मामले में हरिजन एक्ट लगा था, इसलिए इस मामले की जांच डीएसपी दिनेश मीणा को सौंपी गई.

स्वास्थ्य केंद्र में उपचार करा रहे जसवंत मेघवाल ने अपने बयान में बताया था कि उस ने सालासर बालाजी धाम में बेटे रुद्र मेघवाल का मुंडन कराने की मन्नत मांगी थी. इसीलिए 2 मार्च की सुबह उस ने अपनी सास परमेश्वरी से फोन पर इस बारे में बात की तो उन्होंने चलने के लिए हामी भर दी. तब वह 3 मार्च की रात अपनी कार से सास परमेश्वरी, पत्नी राजबाला और बेटे रुद्र को ले कर निकल पड़ा.

लगभग 10 किलोमीटर चलने पर 2 लोगों ने हाथ का इशारा कर कार रोकने को कहा तो उस की सास ने उन लोगों को अपना परिचित बता कर कार रुकवा दी. उस की सास ने उन दोनों को भी पिछली सीट पर अपने पास बैठा लिया. वह कुछ दूर ही गया था कि उन अज्ञात लोगों ने खंजर निकाला और उस पर तथा उस की पत्नी राजबाला पर हमला कर दिया.

अचानक हुए हमले से वह घबरा गया और ड्राइविंग सीट से कूद कर नजदीक के खेत में जा छिपा. इस के बाद उस ने अपने मित्र यूनुस खान को मोबाइल से फोन कर के इस घटना के बारे में बता कर मदद मांगी. उस ने रोते हुए कहा था, ‘‘साहब, कुछ दिनों पहले भी मेरी सास ने मुझ पर हमला करवाया था, तब मैं बच गया था. कल रात हुआ हमला भी मेरी सास द्वारा करवाया गया था. वह मेरी जायदाद हड़पने के लिए मुझे मरवाना चाहती थी.’’

जांच अधिकारी दिनेश मीणा ने जसवंत के बयान पर गौर किया तो उन्हें संदेह हुआ. जसवंत हमले को सास की साजिश बता रहा था, जबकि सास खुद मारी गई थी. इस से उन्हें जसवंत के आरोप बेबुनियाद लगे थे. उन की नजर में वही संदिग्ध हो गया. उस के दाहिने हाथ पर मामूली खरोंच थी, जबकि बाएं हाथ पर थोड़ा आड़ेतिरछे गहरे घाव थे.

दिनेश मीणा ने जसवंत के हाथों के जख्मों के बारे में डाक्टरों से राय ली तो उन का संदेह यकीन में बदलने लगा. डाक्टरों का कहना था कि खंजर के वार आड़ेतिरछे थे, जो मात्र बाएं हाथ पर थे. दाहिने हाथ पर मात्र खरोंच के निशान थे. अगर कोई वार करता तो गहरे घाव होते. घावों को देख कर यही लगता है कि खुद ही वार किए गए थे.

दिनेश मीणा ने हमले को जर, जोरू और जमीन के तराजू पर तौला तो उद्देश्य भी सामने आ गया. कत्ल के पीछे परमेश्वरी की बेशकीमती खेती की जमीन थी. राजबाला के कत्ल की वजह उस का अनपढ़, साधारण रंगरूप और फूहड़ होना था. पढ़ालिखा जसवंत राजबाला की मौत के बाद किसी सुंदर पढ़ीलिखी युवती से विवाह करना चाहता था. दिनेश मीणा ने स्वास्थ्य केंद्र में उपचार करा रहे जसवंत के पास जा कर पूछा, ‘‘कहो जसवंत, कैसे हो? तुम्हारी तबीयत कैसी है?’’

‘‘साहब, हमलावरों ने अपनी समझ से तो मुझे मार ही डाला था, पर संयोग से मैं बच गया. हाथ में हुए घाव बहुत गहरे हैं. असहनीय पीड़ा हो रही है.’’ जसवंत ने कहा.

‘‘भई, तुम्हारी सास तो बड़ी शातिर निकली. अपने ही दामाद पर हमला करवा दिया. खैर, घबराने की कोई बात नहीं है, 2 दिनों में घाव ठीक हो जाएंगे. पूरा पुलिस विभाग तुम्हारी सुरक्षा में लगा है. मुझे आशंका है कि परमेश्वरी के गुंडे तुम पर यहां भी हमला कर सकते हैं, इसलिए मैं ने तुम्हारी सुरक्षा के लिए यहां गनमैन तैनात कर दिए हैं.’’

दिनेश मीणा ने घायल पड़े जसवंत के चेहरे पर गौर किया तो उन्हें जसवंत के चेहरे पर कुटिल मुसकान तैरती नजर आई. शायद वह सोच रहा था कि उस की समझ व सोच के अनुरूप ही पुलिस ने उस की कहानी पर विश्वास कर लिया है. उस की सुरक्षा की व्यवस्था भी कर दी है.

दूसरी तरफ दिनेश मीणा के होंठों पर भी मुसकराहट तैर रही थी कि पुलिस ने डबल मर्डर के आरोपी जसवंत की खुराफात बेपरदा कर उसे निगरानी में ले लिया है. अगले दिन जसवंत को स्वास्थ्य केंद्र से डिस्चार्ज करा कर थाने लाया गया. दिनेश मीणा ने उस से गंभीरता से पूछताछ की तो आखिर उस ने बिना हीलाहवाली के अपना अपराध स्वीकार कर लिया.

इस के बाद जसवंत को सादुल शहर के एसीजेएम की अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे पूछताछ के लिए 8 दिनों के पुलिस रिमांड पर ले लिया गया. थाने में दर्ज मुकदमे में अज्ञात की जगह जसवंत मेघवाल का नाम दर्ज कर लिया गया था.

रिमांड के दौरान जसवंत मेघवाल से की गई विस्तृत पूछताछ में उस का ऐसा वीभत्स कृत्य सामने आया कि जान कर हर कोई दंग रह गया. उस ने अपनी सास की जमीन हड़पने और अनपढ़ पत्नी से छुटकारा पाने के लिए अपनों के ही खून से हाथ रंग लिए थे. टीवी पर आने वाले आपराधिक धारावाहिकों को देख कर उस ने घटना का तानाबाना बुना था.

सादुल शहर तहसील के 2 गांव अलीपुरा और नूरपुरा आसपास बसे हैं. अलीपुरा में जसवंत रहता था तो नूरपुरा में परमेश्वरी. दोनों गांवों के बीच लगभग 5 किलोमीटर की दूरी है. जसवंत 20 बीघा सिंचित खेती की जमीन का एकलौता मालिक था तो वहीं परमेश्वरी भी 35 बीघा सिंचित खेती की जमीन की मालकिन थी.

दोनों ही परिवार भले ही हरिजन वर्ग से  आते थे, पर दोनों ही परिवारों की गिनती धनाढ्य और रसूखदार परिवारों में होती थी. परमेश्वरी की एकलौती संतान राजबाला थी. लाड़प्यार में पली राजबाला का प्राथमिक शिक्षा के बाद शिक्षा से मोह भंग हो गया था, वहीं जसवंत के दिल में शिक्षा के प्रति गहरा लगाव था. यही वजह थी कि उस ने एमए, बीएड तक की पढ़ाई की थी.

विधवा परमेश्वरी जवान हो चुकी बेटी राजबाला के लिए वर की तलाश में जुटी थी, पर उस की जातिबिरादरी में उस की हैसियत का घर व वर नहीं मिल रहा था. किसी रिश्तेदार ने अलीपुरा निवासी उच्चशिक्षित जसवंत का नाम सुझाया तो यह रिश्ता उसे जंच गया.बात चली तो राजबाला के अनपढ़ होने की बात कह कर जसवंत नानुकुर करने लगा. पर बिचौलिए रिश्तेदारों ने कार सहित लाखों का दहेज मिलने का लालच दे कर जसवंत को शादी के लिए तैयार कर लिया.

इस के बाद मार्च, 2012 में राजबाला और जसवंत की शादी हो गई. राजबाला के आने के साथ ही जसवंत का घर दहेज में मिले सामान से भर गया था. घर के दालान में खड़ी नईनवेली कार ने तो जसवंत के रुतबे में चारचांद लगा दिया था.

शादी के बाद जसवंत पैरा टीचर के रूप में नियुक्त हो गया तो खेतों को बटाई पर उठा दिया. कार और ठीकठाक पैसा होने की वजह से जसवंत के दोस्तों का दायरा बढ़ गया. कभी दोस्तों को अपने घर पर तो कभी दोस्तों के यहां होने वाली पार्टियों में वह पत्नी के साथ शामिल होता. दोस्तों की बीवियों के सामने उसे अपनी अनपढ़ पत्नी राजबाला फूहड़ नजर आती.

सच्चाई यह थी कि उच्च और शिक्षित समाज की होने वाली पार्टियों में सामंजस्य बिठा पाना राजबाला के बूते में नहीं था. उस का अनपढ़ और फूहड़ होना जसवंत के दिमाग पर हावी होने लगा. अब वह उस से ऊब चुका था, जिस की वजह से घर में रोजरोज किचकिच होने लगी. उसी बीच राजबाला ने पहली संतान के रूप में बेटे को जन्म दिया, जिस का नाम रुद्र रखा गया. इस के बाद जसवंत राजबाला की उपेक्षा करने लगा. पति के प्यार व अपनत्व से वंचित राजबाला विद्रोही बन गई. उस ने अपनी मां को फोन कर के जसवंत के खिलाफ भर दिया.

कहा जाता है कि राजबाला ने मां से कहा था कि जसवंत किसी बाजारू लड़की के चक्कर में फंस कर न केवल पैसे बरबाद कर रहा है बल्कि उस की गृहस्थी उजाड़ रहा है. यह जान कर परमेश्वरी आगबबूला हो उठी और जसवंत के घर आ धमकी. आते ही उस ने कहा, ‘‘जवाईंराजा, क्यों पराई औरतों के चक्कर में पड़ कर अपना घर उजाड़ रहे हो? तुम यह जो कर रहे हो, ठीक नहीं है.’’

‘‘नहीं मांजी, ऐसी कोई बात नहीं है. जिस ने भी यह कहा है, सरासर झूठ है.’’ सफाई में जसवंत ने कहा.

पति की इस सफाई पर नाराज राजबाला भी बीच में कूद पड़ी. इस के बाद पतिपत्नी में लड़ाई होने लगी. परमेश्वरी भी बेटी का पक्ष ले कर लड़ रही थी.

‘‘मांजी, राजबाला अनपढ़ है, इसलिए मेरी पढ़ाई और रहनसहन को ले कर जलती है. आप इसे समझाने के बजाए मुझ पर ही आरोप लगा रही हैं.’’ मामले को संभालने की कोशिश करते हुए जसवंत ने कहा, ‘‘इस से ब्याह कर के तो मेरा भाग्य ही फूट गया है.’’

‘‘बेटा, यह तो तुम्हें शादी से पहले सोचना चाहिए था. मैं ने तुम्हारे साथ कोई जबरदस्ती तो नहीं की थी.’’ परमेश्वरी ने कहा.

‘‘तुम लोगों ने मेरे साथ धोखा किया है. कार और दहेज का लालज दे कर मुझे फंसा दिया.’’ कह कर जसवंत घर से बाहर निकल गया.

इस झगड़े ने जसवंत का दिमाग खराब कर दिया. अब राजबाला के साथ उस की मां परमेश्वरी भी उस के दिमाग में खटकने लगी. फिर क्या था, खुराफाती और उग्र दिमाग के जसवंत ने मांबेटी का अस्तित्व ही मिटाने का खतरनाक निर्णय ले लिया. अपने इस निर्णय को अंजाम तक पहुंचाने के लिए उस ने हर पहलू को नफेनुकसान के तराजू पर तौला. इस के बाद किसी पेशेवर बदमाश से दोनों को सुपारी दे कर मरवाने का विचार किया. जसवंत का सोचना था कि अगर वह दोनों को मरवा देता है तो न केवल सुंदर और शिक्षित लड़की से शादी कर सकेगा, बल्कि परमेश्वरी की 35 बीघा बेशकीमती जमीन भी उस के बेटे रुद्र को मिल जाएगी.

अगर वह पकड़ा भी गया तो हत्या के आरोप में होने वाली 18 साल की जेल काटने के बाद बाहर आने पर बाकी की जिंदगी बेशुमार दौलत के सहारे ऐशोआराम से काटेगा. तब तक बालिग होने वाला बेटा रुद्र सोनेचांदी में खेलेगा. जसवंत को लगा कि उस के दोनों हाथों में लड्डू हैं. महत्त्वाकांक्षी और ऐशोआराम की जिंदगी जीने की चाहत रखने वाला जसवंत अपने इस निर्णय पर बहुत खुश हुआ. उस ने पेशेवर हत्यारे की तलाश शुरू कर दी. काफी दिनों बाद नूरपुर का रहने वाला जसवंत का खास मित्र तुफैल खां मिला तो उस ने कहा, ‘‘अरे जसवंत भैया, बड़े परेशान दिख रहे हो? आज फिर भाभी से झगड़ा हो गया है क्या?’’

‘‘भाई, आप से क्या छिपाना, मांबेटी ने मेरा जीना हराम कर दिया है. मन करता है, आत्महत्या कर लूं. पर बेटे के मोह के आगे बेबस हूं. लगता है, मांबेटी को ही मारना पड़ेगा.’’ जसवंत ने कहा, ‘‘तुफैल भाई, तुम कोई ऐसा आदमी ढूंढो, जो पैसे ले कर मेरा यह काम कर दे.’’

‘‘जसवंत भाई, बहुत ही गंभीर मामला है. फंस गए तो जिंदगी तबाह हो जाएगी. सारी जिंदगी जेल में पड़े रहेंगे.’’

‘‘इतना घबराते क्यों हो, मैं हूं न. फंस भी गए तो पैसा पानी की तरह बहा दूंगा.’’ जसवंत ने कहा.

तुफैल 2 दिनों बाद कीकरवाली निवासी हैदर अली को साथ ले कर जसवंत से मिला. तीनों के बीच पैसों को ले कर बात चली तो हैदर और तुफैल ने 3 लाख रुपए मांगे. जबकि जसवंत एक लाख रुपए देने को तैयार था. आखिर डेढ़ लाख में सौदा तय हो गया. लेकिन उस समय पैसे की व्यवस्था न होने से जसवंत ने डेढ़ लाख रुपए का चैक तुफैल और हैदर को दे दिया. काम होने के बाद जसवंत को नकद पैसे देने थे.

व्यवस्था के लिए हैदर अली ने जसवंत से 20 हजार रुपए लिए. काम कब करना है, यह जसवंत को तय करना था. इस के बाद हनुमानगढ़ की एक दुकान से जसवंत ने 2 खंजर खरीद कर उन की धार तेज करवाई और हैदर अली को सौंप दिए. इस के बाद जसवंत का ज्यादातर समय टीवी पर चलने वाले आपराधिक धारावाहिकों को देखने में बीतने लगा. जसवंत का सोचना था कि अपराधी अपनी गलती की वजह से पकड़े जाते हैं, पर वह इस तरह काम करेगा कि पुलिस उस तक पहुंच नहीं पाएगी.

आखिरकार जसवंत ने पत्नी और सास की हत्या की योजना बना डाली. इस के बाद उस पर खूब सोचाविचारा. उस की नजर में योजना फूलप्रूफ लगी. अपनी इसी योजना के अनुसार, 3 मार्च की सुबह चिकनीचुपड़ी बातें कर के उस ने अपनी सास को सालासर जाने के बहाने अपने घर बुला लिया. जब सारी तैयारी हो गई तो जसवंत ने फोन कर के तुफैल को रात 10 बजे सालासर जाने की बात बता कर मुख्य सड़क पर काम निपटाने को कह दिया. तय समय पर जसवंत पत्नी राजबाला, सास परमेश्वरी और बेटे रुद्र को ले कर कार से चल पड़ा.

मुख्य सड़क पर मोटरसाइकिल से आए तुफैल और हैदर अली मिल गए. दोनों ने हाथ के इशारे से जसवंत की कार रुकवाई और कार में बैठ गए. कुछ दूर जाने के बाद हैदर और तुफैल ने खंजर निकाल कर परमेश्वरी पर वार किए तो जान बचाने के लिए वह दरवाजा खोल कर कूद पड़ी. जसवंत ने भी कार रोक दी. तुफैल और हैदर अली ने नीचे उतर कर उस का काम तमाम कर दिया. इस के बाद राजबाला का भी काम तमाम कर दिया गया. दोनों को मार कर जसवंत ने अपने दोस्त युनुस को फोन कर के मनगढं़त कहानी सुना कर पुलिस से मदद की गुहार लगाई.

रिमांड अवधि के दौरान पुलिस ने जसवंत के दोनों साथियों तुफैल और हैदर अली को गिरफ्तार कर खंजर, कार और चैक बरामद कर लिया था. रिमांड अवधि समाप्त होने पर तीनों को अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें न्यायिक अभिरक्षा में भिजवा दिया गया.

ग्लैमर की चकाचौंध में फंसे जसवंत ने खुद ही अपनी गृहस्थी और जिंदगी बरबाद कर ली, साथ ही 2 भोलेभाले लोगों को भी हत्या जैसे अपराध में जेल भिजवा दिया. आखिर परमेश्वरी के मरने के बाद उस की सारी जायदाद उसे ही मिलनी थी. तीनों आरोपियों का भविष्य अब अदालत का निर्णय ही तय करेगा.?

– कथा पुलिस सूत्रों के आधार पर