एसडीएम पत्नी का हत्यारा बना पति – भाग 2

बड़ी बहन ने बताया निशा के पति का सच

2021 से पहले स्वप्निल निशा के पास रह कर ही स्कूल की पढ़ाई करता था, बाद में निशा की शादी मनीष से होने पर मनीष ने ऐतराज जताया तो मनीष के कहने पर निशा ने अपने पास रखने से मना कर दिया था.

छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर में रहने वाली निशा नापित ने छत्तीसगढ के अंबिकापुर में चौपड़ा कालोनी में रह कर अपनी पढ़ाई की थी. उन के पापा ज्ञानचंद नापित और मम्मी का पहले ही निधन हो चुका था. निशा की बड़ी बहन के अलावा उन का कोई नहीं था.

निशा बचपन से ही प्रशासनिक अधिकारी बनने का सपना देख रही थीं. वह जिंदगी को अपने तरीके से जीना चाहती थीं. प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करतेकरते शादी की उम्र होने पर बड़ी बहन नीलिमा ने निशा से कहा, ”अब तू शादी कर ले, अधिकारी बनने के चक्कर में तेरी उम्र निकल रही है.’’

इस पर निशा ने अपना रुख साफ करते हुए कहा, ”दीदी, जब तक मैं अपना करिअर नहीं बना लेती, तब तक शादी हरगिज नहीं करूंगी.’’

निशा के इस जबाब पर नीलिमा के पास चुप रह जाने के अलावा कोई दूसरा रास्ता भी नहीं था. निशा नापित ने 15 मार्च, 2003 को नायब तहसीलदार के पद पर सेवाएं मध्य प्रदेश के छिंदवाडा जिले से शुरू की थी. पदोन्नत हो कर पहले वह तहसीलदार बनीं और उस के बाद डिप्टी कलेक्टर के पद पर पदस्थ हुई थीं. 2010 में निशा तहसीलदार बना कर सतना भेजी गईं और 2020 में उन का प्रमोशन डिप्टी कलेक्टर के रूप में हो गया. उस समय निशा मंडला में पोस्टेड थीं.

निशा ने दूसरी जाति के युवक से की थी शादी

प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों ने जब उन की बहन नीलिमा को पूरा घटनाक्रम बताया तो उन्होंने निशा के पति मनीष को ही मौत का जिम्मेदार बताया. छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर की रहने वाली निशा नापित और ग्वालियर के रहने वाले मनीष शर्मा ने लवमैरिज की थी. निशा नाई जाति की थीं जबकि मनीष ब्राह्मण था.

दोनों की मुलाकात एक मैट्रीमोनियल साइट ‘शादी डौटकौम’ के जरिए हुई थी. दोनों ने एकदूसरे को पसंद कर लिया और अक्तूबर 2020 में मंडला के गायत्री मंदिर में उन्होंने शादी कर ली थी.

एसडीएम जैसे ओहदे पर बैठीं निशा नापित की मनीष से जानपहचान एक मैट्रीमोनियल साइट के जरिए हुई थी. उस समय निशा की उम्र 46 साल हो चुकी थी. घर वाले भी निशा के लिए रिश्ते तलाश रहे थे. ऐसे ही समय निशा को मनीष की प्रोफाइल ठीक लगी.

मनीष उस समय 40 साल का था और निशा से शादी करने तैयार था. एकदूसरे को जानने समझने के लिए फोन पर शुरू हुआ बातचीत का सिलसिला मुलाकातों में बदल गया और जल्द ही दोनों में प्यार भी हो गया.

इस मामले में निशा ने अपनी बड़ी बहन नीलिमा से चर्चा की तो नीलिमा ने मनीष से बातचीत कर उस के बारे में तहकीकात की. मनीष से हुई बातचीत में नीलिमा को मनीष के व्यवसाय को ले कर शक भी हुआ था और नीलिमा ने निशा को आगाह भी किया था कि वह सोच समझ कर फैसला ले.

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नीलिमा नापित 

इस के बाद निशा ने परिवार को बिना बताए शादी कर ली थी. परिवार के लोगों को बाद में जानकारी लगी. निशा एक बार नीलिमा से मिलने घर आई तो पति मनीष भी साथ में था. मंडला में पोस्टिंग के दौरान भी दोनों के बीच खूब विवाद हुआ था. तत्कालीन एसपी ने दोनों को समझाया था.

निशा छत्तीसगढ़ की रहने वाली थीं और उन की शादी ग्वालियर में हुई थी. वह बतौर डिप्टी कलेक्टर जुलाई, 2023 में डिंडोरी जिले में पदस्थ हुई थीं और उन्हें 2023 के विधानसभा चुनाव से पहले शहपुरा एसडीएम की कमान सौंपी गई थी.

निशा को कुत्ते पालने का बहुत शौक था, जब वह सतना में पोस्टेड थीं, तब उन के पास 3 डौग्स थे और शहडोल जिले के अनूपपुर आने के बाद 2 डौग और रख लिए थे. मनीष से शादी होने के कुछ ही महीने बाद उन्होंने वो सारे डौग्स अपने घर अंबिकापुर भेज दिए थे.

बाद में निशा की बड़ी बहन नीलिमा नापित ने पुलिस को बताया कि शादी के तीसरे दिन से ही मनीष निशा को पैसों के लिए प्रताडि़त करने लगा था. उस का कई दूसरी महिलाओं से भी अफेयर था.

पति की इन हरकतों से परेशान निशा ने नीलिमा के बेटे स्वप्निल को सरकारी दस्तावेजों में अपना नौमिनी बना दिया था. इस से मनीष झल्लाया रहता था, क्योंकि आमतौर पर तमाम रिकौर्डों में जीवनसाथी को ही नौमिनी बनाया जाता है.

शादी के चंद दिनों बाद ही निशा को समझ आ गया था कि अकसर घर से गायब रहने वाले मनीष ने उस के रुतबेदार ओहदे, पगार और पैसों से शादी की है. आए दिन वह निशा से पैसे मांगता रहता था. एक बार तो धंधे रोजगार के लिए निशा ने बैंक लोन ले कर भी उसे 5 लाख रुपए दिए थे. मनीष शराब भी पीता था और आवारा, मनचले भंवरों की तरह तितलियों पर मंडराना भी उस की फितरत थी. जाहिर है, प्यार का भूत निशा के सिर से उतर चुका था. निशा जल्दबाजी में लिए गए अपने शादी के फैसले पर पछता रही थी.

मनीष ने निशा ने क्यों छिपाई सच्चाई

मनीष शर्मा का परिवार ग्वालियर में  रहता है. मनीष जब 14 साल का था, तभी उस ने घर छोड़ दिया था. वह घर से अलग ही रहता था. 2009 में वह घर आया था, तब उस ने कहा था कि मुझे खेती में हिस्सा चाहिए. उस के भाई नीलेश ने उस के हिस्से की 3 बीघा जमीन उस के नाम कर दी थी. इस के बाद हमारा उस से कोई रिश्ता नहीं रहा.

2018 में वह एक बार फिर घर आया और मां से कहने लगा कि मेरी उम्र 40 साल हो गई है. शादी नहीं हुई है. मेरे लिए एक रिश्ता आया है. मां ने पहले इनकार किया, लेकिन सब रिश्तेदारों ने सोचा कि चलो शादी के बाद सुधर जाएगा. यही सोच कर उस की शादी कर दी.

शादी के 3 महीने ही हुए थे कि मनीष ने उस लड़की से भी झगड़ा शुरू कर दिया. जब मां उस के कमरे में गई तो वह बोला कि तुम मेरे लिए मर गए हो. फिर हम ने अपने मामा से बात की. मामा ने समझाने की कोशिश की तो मनीष ने कहा कि तुम सब मेरे लिए मर चुके हो. बाद में फिर मनीष का उस लड़की से तलाक हो गया.

शादी डौटकौम पर अपनी प्रोफाइल में अपने आप को प्रौपर्टी डीलर बताने वाले मनीष शर्मा की जब निशा से शुरुआती मुलाकात हुई तो वो खुद को एक इंजीनियर बताता था. रिश्ते के लिए जब निशा की बड़ी बहन नीलिमा ने बात की तो वह उन के सवालों का ठीक से जवाब नहीं दे पाया. लेकिन निशा ने परिवार के मना करने के बावजूद एक दिन फोन कर बताया कि उन्होंने शादी कर ली है.

एसडीएम पत्नी का हत्यारा बना पति – भाग 1

शाहपुरा पुलिस फोरैंसिक टीम के साथ जब जांच के लिए एसडीएम बंगले पर पहुंची तो पाया कि एसडीएम निशा की मौत जिस कमरे में हुई थी, वहां के बैड की बैडशीट और तकिया का कवर वहां मौजूद नहीं था.  पुलिस टीम ने जब मनीष से इस के बारे में पूछा तो उस ने कहा, ”मैडम को उल्टी होने पर नाक से ब्लड आया था, जिस से कपड़े खराब हो गए थे. इसी वजह से उस ने बैडशीट और तकिए का कवर मशीन में धोने के लिए डाला था.’’

पुलिस टीम ने जब वाशिंग मशीन का ढक्कन खोला तो बैडशीट और तकिए के कवर के साथ एसडीएम निशा के कपड़े भी मशीन के सुखाने वाले पोर्शन में पड़े हुए थे. पुलिस टीम यह सोच कर हैरान थी कि एसडीएम बंगले पर मौजूद कर्मचारी से कपड़े मशीन में धुलवाने के बजाय मनीष ने खुद यह काम क्यों किया. मनीष के इसी बयान पर पुलिस का शक यकीन में बदल गया.

रविवार 28 जनवरी, 2024 का दिन था और मौसम का सब से सर्द दिन. ऐसे में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में तैनात सीनियर डा. रत्नेश द्विवेदी अपने सरकारी आवास पर बैठे धूप का आनंद ले रहे थे, तभी दोपहर करीब 2 बजे उन के मोबाइल फोन पर घंटी बजी.

जैसे उन्होंने काल रिसीव की तो दूसरी तरफ से हड़बड़ी में एक आवाज सुनाई दी, ”डाक्टर साहब, मैं गाड़ी भेज रहा हूं, जल्दी से एसडीएम के बंगले पर आ जाइए. मैडम की तबीयत ज्यादा खराब है.’’

फोन मध्य प्रदेश के डिंडोरी जिले की तहसील शहपुरा की एसडीएम निशा नापित के बंगले से आया था, लिहाजा डा. रत्नेश द्विवेदी बिना देर किए तैयार हो गए और जैसे ही गाड़ी आई, उस में बैठ कर वह एसडीएम बंगले पर पहुंच गए.

बंगले के बाहर एक शख्स उन का बेसब्री से इंतजार कर रहा था. जैसे ही डा. द्विवेदी गाड़ी से उतरे तुरंत ही उस शख्स ने कहा, ”डाक्टर साहब, अंदर चलिए. मैडम सुबह 10 बजे के बाद से ही कुछ बोल नहीं रहीं.’’

डा. रत्नेश द्विवेदी उस शख्स के साथ बंगले के अंदर दाखिल हुए. एसडीएम निशा नापित अपने बैड पर बेहाल पड़ी थीं. डा. द्विवेदी ने स्टेथस्कोप के एक सिरे को अपने कानों से  और उस का दूसरा सिरा मैडम के सीने के बाईं ओर लगाया और उस शख्स से मुखातिब होते हुए बोले, ”मैडम की ऐसी हालत कब से है?’’

”डाक्टर साहब, कल शनिवार को उन का व्रत था और मेरे मना करने के बाद भी वह 2 अमरूद खा गईं. मैडम का एक ही गुर्दा काम करता है और उन को सर्दीखांसी की हमेशा दिक्कत रहती थी. शायद इसी वजह से आज 10 बजे के आसपास उन को उल्टी हुई, फिर उन की नाक से ब्लड आया. इसे ले कर हमारी बहस भी हुई. वह नहीं मानीं, गुस्से में सो गईं तो मैं भी गुस्से में बाहर आ गया.’’ एसडीएम बंगले पर मौजूद उस शख्स ने बताया.

”जब उल्टी होने पर नाक से ब्लड आया था, तभी आप को मुझे फोन करना था.’’ डा. रत्नेश द्विवेदी बोले.

”रविवार को कोई काम रहता नहीं, इसलिए मैं ने जगाया ही नहीं. 10 बजे काम वाली बाई आई तो मैं घूमने चला गया. फिर बाई ने खाना बनाया और चली गई. फिर एक बजे के आसपास मैं ने सोचा खाने के लिए मैडम को जगा दूं. जब वह नहीं जागीं तो मैं ने आप को काल किया.’’

”मैडम को तत्काल अस्पताल ले चलो. हाइपरटेंशन या फिर ब्रेन हेमरेज की वजह से नाक से खून निकलता है.’’ कान से स्टेथस्कोप निकालते हुए डा. द्विवेदी ने कहा.

यह घटना 28 जनवरी, 2024 दोपहर 3 बजे की थी. उप जिलाधिकारी (एसडीएम) निशा को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र शहपुरा लाया गया, जहां पर मौजूद डाक्टरों ने जांच के बाद बताया कि उन की मौत हो चुकी है. तहसील के सब से बड़े अधिकारी की मौत का मामला था, ऐसे में डा. रत्नेश द्विवेदी ने उन की मौत की सूचना जिले के वरिष्ठ अधिकारियों को दे दी.

वाशिंग मशीन देख कर पुलिस क्यों हुई हैरान

सूचना मिलते ही डिंडोरी जिले के कलेक्टर विकास मिश्रा और एसपी अखिल पटेल, बालाघाट रेंज के डीआईजी मुकेश श्रीवास्तव भी शहपुरा अस्पताल पहुंच गए. संदिग्ध हालात में मौत की वजह से पुलिस ने एसडीएम का बंगला सील कर दिया और निशा नापित के घर वालों को भी सूचना दे दी गई.

एसपी अखिल पटेल

सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के डाक्टरों को शक होने पर पुलिस को खबर दे कर एसडीएम निशा का इलाज शुरू किया तो पाया कि निशा की मौत तो कोई 4-5 घंटे पहले ही हो चुकी थी.

मध्य प्रदेश के आदिवासी जिले डिंडोरी की शहपुरा तहसील में पिछले साल ही तहसीलदार पद से प्रमोट हुई निशा एसडीएम बनी थीं, इसलिए कस्बे में उन्हें हर कोई जानता था. शहपुरा पुलिस आई और उस ने एसडीएम के साथ रहने वाले उन के पति मनीष से पूछताछ की तो वह एक ही कहानी दोहराता रहा. पुलिस ने उन के ड्राइवर और घर के अन्य कर्मचारियों से भी पूछताछ की.

पुलिस की पूछताछ में मनीष ने कहा कि वह प्रौपर्टी ब्रोकर है और पत्नी निशा के पास आता जाता रहता है. पुलिस के शक की सुई मनीष की ओर ही घूम रही थी. एसपी अखिल पटेल ने मामले को गंभीरता से लेते हुए एसडीओपी मुकेश अविंदा के नेतृत्व में एक टीम का गठन किया, जिस में जांच शहपुरा पुलिस थाने के टीआई एस.एल. मरकाम को सौंप दी.

एसडीएम निशा की मौत की खबर जैसे ही उन के घर वालों को लगी तो उन्हें पहले तो विश्वास ही नहीं हुआ. शहपुरा में पोस्टमार्टम के बाद 30 जनवरी को निशा का पार्थिव शरीर छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर ले जाया गया, जहां उन के परिवार के लोगों की मौजूदगी में अंतिम संस्कार किया गया. निशा का अंतिम संस्कार बहन नीलिमा के बेटे स्वप्निल ने किया.

पैसा बना जान का दुश्मन

पैसा बना जान का दुश्मन – भाग 3

कहा जाता है कि बेटेबेटी का सुख मांबाप के लिए अमृत है. लेकिन यही अमृत अगर जहर बन जाए तो उन के लिए बरदाश्त करना मुश्किल हो जाता है. ऐसा ही कुछ शकुंतला के साथ हुआ. जब उन्हें पता चला कि मधुमती का पति एक नंबर का शराबी और निकम्मा है तो वह टूट कर बिखर गईं. बेटी के गम में वह बीमार रहने लगीं. उन के इस गम ने उन्हें मौत तक पहुंचा दिया.

शकुंतला की मौत से अगर किसी को खुशी हुई थी तो वह गिरीश था. अब उस फ्लैट में वह जैसे चाहेगा, रह सकेगा. मां की मौत के बाद मधुमती बेटे के साथ अपने फ्लैट में रहने आ गई. फ्लैट में आते ही गिरीश उसे बेचने के चक्कर में रहने लगा. वह उस फ्लैट को बेच कर उस का सारा पैसा अय्याशी मे उड़ा देना चाहता था. इस के लिए वह शातिर चाल भी चलने लगा.

मधुमती से शादी करते समय जिस तरह वह संत बन गया था, फ्लैट बिकवाने के लिए भी उसी तरह एक बार फिर  संत बन गया. मधुमती और बेटे से खूब प्यार करने लगा. मधुमती के दिल में एक अच्छे आदमी की इमेज बनाने के लिए वह नौकरी भी ढूंढ़ने लगा. जब गिरीश को लगा कि मधुमती उस पर विश्वास करने लगी है, तब उस ने अपनी नायाब चाल चली. मजे की बात, मधुमती उस में फंस भी गई.

भोलीभाली मधुमती को विश्वास में ले कर उस ने बिजनैस की योजना बनाई और उस में 50 लाख रुपए लगाने की बात की. इस के बाद मधुमती का फ्लैट 43 लाख रुपए में बेच कर सारा पैसा अपने नाम जमा करा लिया और रहने के लिए भायंदर के नक्षत्र टावर के 14वीं मंजिल पर एक फ्लैट किराए पर ले लिया.

जैसे ही फ्लैट का पैसा गिरीश के पास आया, वह एकदम से बदल गया. उस के पास लाखों रुपए आ गए थे, इसलिए वह लखपतियों की तरह ठाठ से रहने लगा. वह बीयर बारों में जा कर अपने ऊपर तो शराब शबाब पर पैसे लुटाता ही था, अपने साथ दोस्तों को भी ले जाता था. उन का खर्च भी वह स्वयं ही उठाता था. मधुमती जब भी उसे रोकने की कोशिश करती, उस से लड़ाईझगड़ा ही नहीं करता, बल्कि उसे मारतापीटता भी. उसे कतई पसंद नहीं था कि वह उस की मौजमसती में दखल दे.

गिरीश जिस तरह अय्याशी पर पैसे लुटा रहा था, उसे देख कर मधुमती को अपने और बेटे के भविष्य की चिंता सताने लगी. उसे लगा कि अगर गिरीश का यही हाल रहा तो उसे भिखारी बनने में ज्यादा समय नहीं लगेगा. वैसे भी उस ने उसे घर से बेघर कर दिया था.

पति की हरकतों से परेशान हो कर मधुमती ने तय किया कि वह गिरीश से तलाक ले कर अपने बचे हुए पैसों और बेटे के साथ नानी के पास फ्रांस चली जाएगी.

इस के लिए उस ने नानी से बात भी कर ली. लेकिन जब इस बात की जानकारी श्रीरंग पोटे को हुई तो वह परेशान हो उठे. क्योंकि इस से समाज में उन की काफी बदनामी होती. बेटे ने तो वैसे ही इज्जत बरबाद कर रखी थी. रहीसही इज्जत बहू के साथ जाने वाली थी. वह पत्नी को ले कर भायंदर पहुंचे और बहू को समझाने के साथ गिरीश को काफी खरीखोटी सुनाई. इस के बाद वह पोते को साथ ले कर माहीम चले आए.

पिता की डांटफटकार और मधुमती के फैसले के बारे में जान कर गिरीश का पारा आसमान पर जा पहुंचा. वह यह कतई नहीं चाहता था कि मधुमती उसे छोड़ कर फ्रांस चली जाए. क्योंकि उस के जाते ही वह भिखारी बन जाता. अब इसी बात को ले कर गिरीश अकसर मधुमती से लड़ाईझगड़ा और मारपीट करने लगा.

3 दिसंबर को भी पैसों को ले कर गिरीश और मधुमती के बीच कहासुनी शुरू हुई तो बात मारपीट तक पहुंच गई. गिरीश ने मधुमती को इस कदर मारा कि वह बेहोश हो कर गिर पड़ी. इस पर भी उस का गुस्सा शांत नहीं हुआ तो उस ने उस का गला दबा दिया. इसी गला दबाने में मधुमती की मौत हो गई.

लेकिन गिरीश को पता नहीं चला कि मधुमती मर चुकी है. उसे लगा कि वह बेहोश होने का नाटक कर रही है, ताकि वह मारना बंद कर दे. वह उसे मारतेमारते थक गया था, इसलिए उसे वैसी ही छोड़ कर गुस्सा शांत करने के लिए बाहर चला गया. काफी देर तक आवारा दोस्तों के साथ रहने के बाद वह घर आया तो उसे यह देख कर हैरानी हुई कि वह मधुमति को जिस स्थिति में छोड़ कर गया था, वह अभी भी उसी स्थिति में पड़ी थी.

गिरीश ने मधुमती को उठाने की कोशिश की तो पता चला कि उस का शरीर ठंडा पड़ कर अकड़ चुका है. उसे समझते देर नहीं लगी कि मधुमती मर चुकी है. उस के होश उड़ गए. वह घबरा गया कि अब क्या करे.

गिरीश बुरी तरह डर गया था. उसे हथकड़ी और जेल के सींखचे नजर आने लगे. इस सब से कैसे बचा जाए, वह तरहतरह की योजनाएं बनाने लगा. मधुमती की लाश को इस तरह बाहर ले जा कर फेंकना उस के लिए संभव नहीं था. क्योंकि लाश की शिनाख्त होने पर वह पकड़ा जाता. तब उस ने ऐसी योजना बनाई कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे.

उस ने तय किया कि वह मधुमती के लाश के छोटेछोटे टुकड़े कर के समुद्र में फेंक देगा, जहां समुद्री मछलियां उन्हें खा जाएंगी. इस के बाद मधुमती की लाश ही नहीं मिलेगी तो कानून उस का कुछ नहीं कर पाएगा. अगर कोई मधुमती के बारे में पूछेगा तो वह कह देगा कि मधुमती उस से लड़ाईझगड़ा कर के अपनी नानी के पास फ्रांस चली गई है. इस तरह उस की हत्या का यह राज राज ही रह जाएगा.

लेकिन इस में भी एक समस्या थी. गिरीश मधुमती की लाश के टुकड़े तो कर सकता था, लेकिन उन टुकड़ों को अकेले ले जा कर फेंक नहीं सकता था. उस ने काफी सोचाविचारा तो उसे अपनी बुआ के बेटे नितिन की याद आई. वह उस का दोस्त भी था, इसलिए उस पर विश्वास भी किया जा सकता था. उसे यह भी विश्वास था कि नितिन उस की मदद भी करेगा.

यही सोच कर गिरीश ने नितिन को फोन कर के अपने पास बुलाया और उसे साथ ले कर भायंदर मौल गया. लेकिन जब गिरीश ने नितिन को सच्चाई बताई तो उसे लगा कि अगर उस ने गिरीश की मदद की तो उस के साथ उसे भी जेल जाना होगा. इसलिए वह चुप के से वहां से खिसक गया. इस के बाद उसी की वजह से यह मामला पुलिस तक जा पहुंचा.

नितिन के चले जाने के बाद गिरीश अपने फ्लैट पर पहुंचा और मधुमती की लाश के कई टुकड़े किए. फ्लैट में दुर्गंध न फैले, इस के लिए उस ने उन टुकड़ों की अच्छी तरह पैकिंग कर के कुछ टुकड़े फ्रिज में रख दिए तो कुछ कमरे में बैड के नीचे छिपा दिए. मौका देख कर वह उन्हें ले जा कर फेंक देता. लेकिन उसे इस का मौका ही नहीं मिला, क्योंकि मदद के बहाने नितिन ने फोन कर के उसे बुलाया तो वह शेवारे पार्क में आ गया, जहां से पुलिस ने उसे पकड़ लिया.

पूछताछ के बाद पुलिस ने गिरीश को अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक गिरीश जेल में बंद था.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

पैसा बना जान का दुश्मन – भाग 2

रिमांड के दौरान पूछताछ में गिरीश ने जो बताया, वह एक शराबी पति की हैवानियत की कहानी थी. गिरीश ने बड़ी ही होशियारी से अमीर घर की मधुमती को धोखे में रख विवाह किया.

इस के बाद वह उस की दौलत को शराब और अय्याशी में लुटाने लगा. जब उस ने मना किया तो उस के साथ मारपीट करने लगा. जब वह उस से संबंध तोड़ कर फ्रांस में रह रही अपनी नानी के यहां जाने की तैयारी करने लगी तो उस ने उस की हत्या कर दी. वह उस के शव को समुद्र में फेंक कर मछलियों को खिला देना चाहता था. लेकिन उस के पहले ही वह पकड़ा गया.

श्रीरंग पोटे सीधेसादे, उच्च विचार के महाराष्ट्री ब्राह्मण थे. वह महानगर मुंबई के उपनगर माहीम में रहते थे. उन के परिवार में पत्नी के अलावा एकलौता बेटा गिरीश था. एकलौता होने की वजह से गिरीश मातापिता का कुछ ज्यादा ही लाडला था. शायद यही वजह थी कि वह जिद्दी और उद्दंड हो गया.

श्रीरंग पोटे ने गिरीश को बुढ़ापे का सहारा मान कर उस की हर इच्छा पूरी की थी. उसे किसी भी चीज का अभाव नहीं होने दिया था. मगर जैसे जैसे गिरीश बड़ा होता गया, उन की आशाएं धूमिल होती गईं, क्योंकि गिरीश वैसा नहीं बन सका, जैसा उन्हें और उन की पत्नी को उम्मीद थी. उस की आदतें बिगड़ती चली गईं और वह अक्खड़ और जिद्दी बन गया. श्रीरंग पोटे के काफी प्रयास के बाद भी वह किसी काबिल नहीं बन सका.

गिरीश दिन भर अपने आवारा दोस्तों के साथ घूमताफिरता और राह चलती लड़कियों को छेड़ता. खर्च के लिए वह मां से लड़झगड़ कर पैसे ले ही लेता था. आवारा दोस्तों के साथ रहते हुए वह शराब भी पीने लगा था. बेटे की इन हरकतों से श्रीरंग पोटे और उन की पत्नी परेशान रहती थीं. लेकिन अब उन के वश में कुछ भी नहीं था क्योंकि वे बेटे को सुधारने की हर कोशिश कर के हार चुके थे.

श्रीरंग पोटे और उन की पत्नी बेटे को सुधारने में पूरी तरह नाकाम रहे तो नातेरिश्तेदारों ने उन्हें सलाह दी कि वे उस की शादी कर दें. उन का मानना था कि जब जिम्मेदारियों का बोझ उस पर पड़ेगा तो वह अपनेआप सुधर जाएगा. यही पुराने लोगों का विचार रहा है, जो एक हद तक सही भी है.

शादी के बाद बेटा सुधर जाएगा, इस की उम्मीद श्रीरंग पोटे को कम ही थी. फिर भी बेटे के सुधरने की उम्मीद में वह उस की शादी करने के लिए तैयार हो गए.

श्रीरंग पोटे ने बेटे की शादी के लिए बात करनी शुरू की तो रिश्ते भी आने लगे, क्योंकि गिरीश उन की एकलौती औलाद थी. आजकल लोग वैसे भी छोटा परिवार ढूंढ़ते हैं. मांबाप यही चाहते हैं कि उन की बेटी को ज्यादा काम न करना पड़े.

यही सोच कर गिरीश के लिए रिश्ते तो बहुत आए, मगर जब उन्हें उस के बारे में पता चलता तो वे पीछे हट जाते. इस बात से श्रीरंग पोटे और उन की पत्नी को तकलीफ तो बहुत होती, लेकिन वे कर ही क्या सकते थे. जब उन्हीं का सिक्का खोटा था तो वे दूसरों को क्या दोष देते.

शायद वे भाग्यशाली लड़कियां थीं, जिन की शादी गिरीश जैसे बिगड़े हुए युवक से होतेहोते रह गई. लेकिन मधुमती उन में नहीं थी. उस का भाग्य खराब था, जिस की वजह से उस की शादी गिरीश से हो गई.

सुंदर सुशील हंसमुख मधुमती भी अपने मातापिता की एकलौती संतान थी. जिस लाड़प्यार से गिरीश की परवरिश हुई थी, उस से कहीं अधिक लाड़प्यार मधुमती को मिला था. वह छोटी थी, तभी उस के पिता की मौत हो गई थी. इस के बाद बाप का भी प्यार उसे उस की मां शकुंतला ने दिया था. बेटी को उन्होंने किसी चीज का आभाव नहीं होने दिया था. उस की हर ख्वाहिश उन्होंने पूरी की थी. वह खुद नौकरी करती थीं, इसलिए बेटी के पालनपोषण में उन्हें कोई परेशानी नहीं हुई थी.

जब पति की मौत हुई थी, शकुंतला जवान थीं. उन से शादी के लिए तमाम रिश्ते आए थे, लेकिन उन्होने शादी नहीं की थी. उन्होंने अपना जीवन बेटी को न्यौछावर कर दिया था.

मधुमती मां शकुंतला से कहीं ज्यादा अपनी नानी अहिल्या की लाडली थी. वह रहती तो फ्रांस में थीं, लेकिन उस का हमेशा खयाल रखती थीं. शकुंतला का जो पैसा खर्च से बचता था. वह उसे मधुमती के नाम से जमा करती थीं.

इस के अलावा एक हजार डालर हर महीने मधुमती की नानी उस के एकाउंट में जमा करती थीं. इस तरह मधुमती के नाम करोड़ों रुपए जमा हो गए थे. इस के अलावा मधुमती अपनी मां शकुंतला के साथ जिस फ्लैट में रहती थी, वह भी मधुमती के ही नाम था.

करोड़पति मधुमति के बारे में पता चलते ही श्रीरंग पोटे के मुंह में पानी आ गया. जब इस रिश्ते के बारे में गिरीश को बताया गया तो उस के भी मन में लड्डू फूटने लगे. उसे लगा कि अगर उस की शादी मधुमती से हो गई तो वह भी करोड़पति हो जाएगा. इस के बाद उस की जिंदगी आराम से कटेगी. इसलिए वह इस रिश्ते को किसी भी सूरत में हाथ से निकलने नहीं देना चाहता था.

मधुमती से शादी के लिए गिरीश एकदम से संन्यासी बन गया. सारी बुराइयों को छोड़ कर वह आटोरिक्शा चलाने लगा. वह दिनभर  में जो कमाता, ईमानदारी से ला कर पिता श्रीरंग पोटे के हाथों में रख देता. वह जब भी मधुमती और उस की मां से मिलता, निहायत ही सादगी से मिलता.

गिरीश में आए इस बदलाव से श्रीरंग पोटे और उन की पत्नी बहुत खुश थे. उन्हें लग रहा था कि उन के घर बहू नहीं, देवी आ रही है, जिस के रिश्ते की बात चलते ही उन का बेटा सीधे रास्ते पर आ गया. उन्हें लगा कि शादी के बाद बहू घर आ जाएगी तो वह पूरी तरह से सुधर जाएगा. लेकिन ऐसा हो नहीं सका.

मधुमती और गिरीश की शादी हो गई. विवाह के बाद कुछ दिनों तक तो गिरीश ठीक रहा. लेकिन कुछ दिनों बाद वह अपने पुराने रास्ते पर फिर चल पड़ा. बहलाफुसला कर मधुमती से पैसे लेता और शराब तथा शबाब पर लुटा देता.

वह लगभग रोज ही बीयरबारों में जाने लगा. पति की हरकतों से मधुमती रो पड़ती, क्योंकि मां और नानी ने मेहनत की जो कमाई उस के भविष्य के लिए उस के नाम जमा की थी, गिरीश उसे शराब, शबाब और अय्याशी पर उड़ा रहा था.

जब कभी मधुमती और मांबाप गिरीश को समझाने और कामकाज के बारे में कहते, वह बड़े शान से कहता, ‘‘जिस की पत्नी करोड़पति हो, उसे कामधाम करने की क्या जरूरत है. आखिर ये करोड़ों रुपए किस दिन काम आएंगे.’’

समय का पहिया अपनी गति से चलता रहा. मधुमती एक बेटे की मां बन गई. बेटे के जन्म से मधुमती के मन में उम्मीद जागी कि बच्चे का मुंह देख कर शायद गिरीश सुधर जाए. मगर उस का भी गिरीश पर कोई फर्क नहीं पड़ा. उसे अपने सुख के आगे किसी की कोई चिंता नहीं थी.

पैसा बना जान का दुश्मन – भाग 1

नितिन चाय पी कर कप रखने जा रहा था कि उस के मामा के बेटे गिरीश का फोन आ गया. उस ने कप मेज पर रख कर फोन रिसीव किया तो दूसरी ओर से गिरीश ने कहा, ‘‘मैं अपनी इमारत के नीचे खड़ा हूं. बहुत जरूरी काम है. तुम जल्दी से आ जाओ.’’

आने वाली आवाज से गिरीश काफी परेशान लग रहा था, इसलिए नितिन ने पूछा, ‘‘क्या बात है भाई, तुम कुछ परेशान से लग रहे हो?’’

‘‘तुम आ कर मिलो तो… आने पर ही बता पाऊंगा कि परेशानी क्या है?’’ गिरीश ने कहा.

‘‘ठीक है, मैं 10 मिनट में पहुंच रहा हूं.’’

‘‘भाई, जल्दी आ,’’ कह कर गिरीश ने फोन काट दिया.

नितिन कुछ देर तक खड़ा सोचता रहा. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि गिरीश इतना परेशान क्यों था? उसे जल्दी से जल्दी आने को कहा था. इस के पहले उस ने न कभी इस तरह बात की थी और न इस तरह बुलाया था. इसलिए जल्दी से तैयार हो कर नितिन नीचे आया और आटो पकड़ कर अपने ममेरे भाई गिरीश के घर की ओर रवाना हो गया. गिरीश सचमुच इमारत के नीचे खड़ा उस का इंतजार कर रहा था. नितिन के पहुंचते ही वह पास आया और उसी आटो से उस के साथ भायंदर मौल की ओर चल पड़ा.

मौल से गिरीश ने तेज धार वाले 2 बड़ेबड़े चाकू, प्लास्टिक के बड़ेबड़े 2 बैग, एक बड़ी बोतल फिनाइल, टेप और पैकिंग का सामान खरीदा तो नितिन परेशान हो उठा. उस से रहा नहीं गया तो उस ने पूछा, ‘‘इन सब चीजों की तुम्हें क्या जरूरत पड़ गई?’’

‘‘आज मारपीट करते समय मधुमती की मौत हो गई है. उसी की लाश को ठिकाने लगाना है,’’ गिरीश ने कहा, ‘‘इस काम में मुझे तुम्हारी मदद चाहिए.’’

गिरीश पोटे ने लाश ठिकाने लगाने में मदद मांगी तो नितिन के होश उड़ गए. क्योंकि उसे पता था कि मामला निश्चित पुलिस तक पहुंचेगा, तब पकड़े जाने पर उसे भी जेल जाना पड़ेगा. लेकिन उसे गिरीश की बात पर विश्वास भी नहीं हो रहा था, क्योंकि गिरीश जब भी नशे में होता था, अकसर इसी तरह की ऊटपटांग बातें करता रहता था.

इस के बावजूद गिरीश ने जो सामान मौल से खरीदा था, उसे देख कर नितिन को उस की नीयत ठीक नहीं लगी. वह जिस काम में मदद मांग रहा था, वह नितिन के वश का नहीं था. इसलिए मौल में भीड़ का फायदा उठा कर वह भाग निकला.

बाहर आ कर उस ने मधुमती को फोन किया. लेकिन उस का फोन बंद था, इसलिए बात नहीं हो सकी. उस ने न जाने कितनी बार मधुमती का नंबर मिला डाला. जब मधुमती का फोन स्विच औफ ही बताता रहा तो वह घबरा गया.

काफी प्रयास के बाद भी मधुमती से संपर्क नहीं हो सका तो नितिन ने गिरीश के पिता यानी अपने मामा श्रीरंग पोटे को फोन किया. उन्हें पूरी बात बता कर जब उस ने अपनी आशंका बताई तो श्रीरंग पोटे की हालत खराब हो गई. उन का बेटा गिरीश ऐसा भी कुछ कर सकता है, इस बात की उन्हें जरा भी आशंका नहीं थी.

लेकिन नितिन ने जो बताया था, उसे भी एकदम से नकारा नहीं जा सकता था. वह तुरंत भायंदर के लिए निकल पड़े. भायंदर पहुंचने में उन्हें आधा घंटा लगा. वह गिरीश के फ्लैट पर पहुंचे तो फ्लैट अंदर से बंद था. बारबार डोरबेल बजाने और दरवाजा खटखटाने पर भी जब दरवाजा नहीं खुला तो उन का कलेजा मुंह को आ गया. वह अपना सिर थाम कर बैठ गए.

श्रीरंग को नितिन की आशंका सच नजर आने लगी. उन का मन किसी अनहोनी से कांप उठा. इस की वजह यह थी कि उन दिनों गिरीश और मधुमती का रिश्ता काफी नाजुक मोड़ से गुजर रहा था. दोनों के बीच इतना अधिक तनाव था कि अकसर लड़ाईझगड़े होते रहते थे. कभीकभी नौबत मारपीट तक पहुंच जाती थी. ऐसे में नितिन ने जो बताया था, वैसा होना असंभव नहीं था.

लाख प्रयास के बाद भी जब फ्लैट का दरवाजा नहीं खुला तो श्रीरंग पोटे नितिन को साथ ले कर मुंबई से सटे जनपद थाना के उपनगर भायंदर के थाना नवाघर जा पहुंचे. उस समय ड्यूटी पर असिस्टैंट इंसपेक्टर सतीश शिवरकर थे. उन्होंने श्रीरंग पोटे और नितिन को बैठा कर आने की वजह पूछी तो श्रीरंग पोटे और नितिन ने उन के सामने अपनी आशंका व्यक्त कर दी.

किसी की जिंदगी का सवाल था, इसलिए असिस्टैंट इंसपेक्टर सतीश शिवरकर ने दोनों की आशंका को गंभीरता से लिया और सच्चाई का पता लगाने के लिए तत्काल हेडकांस्टेबल मोहन परकाले, आनंद मिक्कारे को ले कर गिरीश के फ्लैट पर जा पहुंचे. फ्लैट अभी भी उसी तरह बंद था.

पुलिस ने भी फ्लैट को खुलवाने की कोशिश की. लेकिन जब दरवाजा नहीं खुला तो आसपड़ोस के कुछ लोगों को बुला कर फ्लैट का दरवाजा तोड़ दिया गया. दरवाजा खुला तो श्रीरंग पोटे और नितिन ने जो आशंका व्यक्त की थी, वह सच निकली. फ्लैट के अंदर की स्थिति देख कर सभी स्तब्ध रह गए. ममला गंभीर था, इसलिए असिस्टैंट इंसपेक्टर सतीश शिवरकर ने इस की सूचना तुरंत सीनियर इंसपेक्टर दिनकर पिंगले और पुलिस कंट्रोल रूम को दे दी.

सूचना मिलने के थोड़ी देर बाद ही सीनियर इंसपेक्टर दिनकर पिंगले भी घटनास्थल पर पहुंच गए. उन्हीं के साथ थाना जनपद के ज्वाइंट सीपी अनिल कुंभारे और एसीपी संग्राम सिंह भी पहुंच गए थे. फ्लैट के अंदर का मंजर बड़ा ही भयानक था. कमरे में रखी वाशिंग मशीन के ऊपर खून से सने वे दोनों चाकू रखे थे, जिन्हें गिरीश ने नितिन के समने भयंदर मौल से खरीदे थे.

गिरीश पोटे ने उन्हीं चाकुओं से अपनी पत्नी मधुमती के शरीर के कई टुकड़े किए थे. उन से बदबू न आए, इसलिए उन्हें उठा कर फ्रिज में रख दिया था. कुछ टुकड़ों को उस ने पार्सल की तररह पैक कर के बेडरूम में पड़े पलंग के नीचे छिपा दिया था. कमरे के फर्श को फिनाइल डाल कर साफ करने की कोशिश की गई थी.

एक ओर जहां पुलिस अधिकारी घटनास्थल का निरीक्षण और मधुमती की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेजने की तैयारी कर रहे थे, वहीं दूसरी ओर सीनियर इंसपेक्टर दिनकर पिंगले के निर्देश पर असिस्टैंट इंसपेक्टर सतीश शिवरकर हेडकांस्टेबल मोहन परकाले और आनंद मिल्लारे के साथ गिरीश पोटे की गिरफ्तारी की कोशिश में लग गए थे.

इस के लिए वह गिरीश की बुआ के बेटे नितिन की मदद ले रहे थे. नितिन की ही मदद से असिस्टैंट इंसपेक्टर सतीश सिवरकर ने गिरीश को रात 11 बजे भायंदर के शेवारे पार्क से गिरफ्तार कर लिया. यह 3 दिसंबर, 2013 की बात थी.

गिरीश के थाने पहुंचने तक सीनियर इंसपेक्टर दिनकर पिंगले मधुमती की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा कर थाने आ गए थे. अब तक रात के लगभग 12 बज चुके थे. इसलिए पुलिस ने गिरीश से पूछताछ  करने के बजाय लौकअप में बंद कर दिया. अगले दिन उसे मजिस्ट्रेट के सामने पेश कर के पूछताछ एवं सुबूत जुटाने के लिए 7 दिनों के पुलिस रिमांड पर लिया गया.

दर्द जब हद से गुजर जाए

दर्द जब हद से गुजर जाए – भाग 3

अब  मुन्नालाल की परेशानी और बढ़ गई, क्योंकि वह जानता था कि बाबा पत्नी के लिए नहीं, सगुना के लिए नौकरी छोड़ कर आया था. जब उसे कोई राह नहीं सूझी तो उस ने ससुर को बुला कर सगुना के बारे में सब कुछ बता दिया.

डबली ने बेटी को खूब डांटा. इज्जत और दोनों बच्चों का हवाला दे कर समझाया भी लेकिन सगुना के मन को अब सिर्फ बाबा जानता था. इसीलिए जब उस ने बाबा को फोन कर के कहा कि वह इस माहौल में कतई नहीं रह सकती, किसी दिन आत्महत्या कर लेगी तो एक बार फिर बाबा सगुना को ले उड़ा.

रेखा को जब पता चला कि उस का पति 2 बच्चों की मां के इश्क में पड़ा है तो वह परेशान हो उठी. क्योंकि अब वह खुद भी बाबा के एक बेटे की मां बन चुकी थी. इस बार मुन्नालाल को लगा कि अब उस की गृहस्थी नहीं बच सकती तो उस ने थाने जा कर बाबा के खिलाफ पत्नी को भगा ले जाने की रिपोर्ट दर्ज करा दी.

थानाप्रभारी ए.एम. काजी ने मुलायम सिंह को बुला कर बाबा और सगुना को ढूंढ़ कर लाने का दबाव बनाया. बाबा की इस हरकत से मुलायम सिंह ही नहीं, उस के बेटे सुभाष, धर्मेंद्र, प्रमोद और सर्वेश भी परेशान थे. पुलिस के दबाव में उन्होंने सगुना और बाबा को ढूंढ निकाला. सगुना को ला कर उन्होंने मुन्नालाल के हवाले कर दिया तो उन की जान छूटी.

सगुना घर तो आ गई थी, लेकिन क्या गारंटी थी कि वह ऐसा काम फिर नहीं करेगी. फिर ऐसा न हो, इस के लिए मुन्नालाल ने पंचायत बुलाई. सगुना और बाबा को भी पंचायत में बुलाया गया. गांव वालों ने फैसला किया कि अगर बाबा ने फिर इस तरह की कोई हरकत की तो उस के परिवार से गांव का कोई आदमी संबंध नहीं रखेगा. सगुना को भी गांव से निकाल दिया जाएगा.

पंचायत के इस फैसले से मुलायम सिंह और उस के बेटे घबरा गए. उन्होंने बाबा और उस की पत्नी को दिल्ली भेज दिया. रेखा भी बाबा के व्यवहार से आहत थी. उस ने धमकी दी कि अगर फिर उस ने इस तरह की कोई हरकत की तो वह उस के खिलाफ कानूनी काररवाई करेगी. बाबा ने भी सोचा कि अब वह दिल्ली में ही रहेगा, जिस से उस के घर वालों को कोई परेशानी न हो.

पंचायत ने भले ही 2 प्रेमियों को अलग कर दिया था, लेकिन दिल से वे अलग नहीं हो पाए थे. सगुना की तड़प बढ़ती जा रही थी. इसे मिटाने के लिए वह देर रात तक प्रेमी से फोन पर बातें करती रहती थी. इस से मुन्नालाल काफी तनाव में रहता था. उस का गुस्सा बढ़ता ही जा रहा था और यह गुस्सा सगुना पर ही उतारता था. उस के दोनों बेटे मांबाप के इस व्यवहार से बहुत डरे रहते थे.

मुन्नालाल को लगता था कि हालात उस के काबू से बाहर होते जा रहे हैं सगुना के प्रति उस की नफरत बढ़ने लगी. फिर भी अपने घर को बचाने के लिए उस ने एक बार कोशिश की. उस ने सगुना को अपने पास बैठा कर समझाया, ‘‘देखो सगुना, तुम जो कर रही हो, वह अच्छा नहीं है. खुद को संभालो, क्योंकि तुम्हारी इन हरकतों का बच्चों पर बुरा असर पड़ रहा है.’’

सगुना ने कहा, ‘‘पहले तुम अपने व्यवहार को देखो. तुम पत्नी को आदमी नहीं, जानवर समझते हो. अगर तुम्हारा ही व्यवहार अच्छा होता तो यह सब नहीं होता, जो हुआ है. पहले खुद को संभालो, उस के बाद मुझ से कहना. तुम्हारी पहली दोनों बीवियां भी तुम से कहां खुश थीं.’’

‘‘लेकिन वे चरित्रहीन तो नहीं थीं.’’

‘‘हां, मैं चरित्रहीन हूं. तुम से शादी करने का मतलब यह तो नहीं कि मुझे 2 पल की खुशी न मिले. तुम ने मेरे जीवन को नरक बना दिया है. तुम न 2 पल की खुशी दे सकते हो न जहां से मिल रही है, वहां से मिलने देते हो. अगर मैं 2 पल की खुशी कहीं से हासिल करना चाहती हूं तो तुम उस में रोड़ा बन जाते हो.’’

मुन्नालाल समझ गया कि यह बाबा को नहीं छोड़ेगी. यह इसी तरह उस की इज्जत से खेलती रहेगी. उसे गुस्सा आ गया. उस ने तय कर लिया कि अब वह इसे इज्जत से खिलवाड़ करने के लिए जिंदा नहीं छोड़ेगा. इरादा पक्का कर के वह घर से निकल गया.

देर रात उस ने अपने दोनों बेटों को दूसरे कमरे में लेटा कर फावड़े से सगुना को काट कर मार डाला. गुस्से में उस ने खून तो कर दिया, लेकिन लाश देख कर घबरा गया. जब उस की समझ में कुछ नहीं आया तो गड्ढा खोद कर उस ने लाश को उसी में गाड़ दिया.

मुन्नालाल ने सारे सुबूत तो मिटा दिए, लेकिन उसे लगा कि जब लोग उस से पूछेंगे कि सगुना कहां गई है तो वह क्या जवाब देगा?

अब उसे पुलिस का डर सताने लगा. काफी सोचविचार कर उस ने दोनों बेटों को लिया और मैनपुरी में रहने वाली नरेश की बेटी के यहां जा पहुंचा. उसे लग रहा था कि वह किसी भी हालत में पुलिस से नहीं बच पाएगा. उस की अंतरात्मा भी उसे धिक्कारने लगी थी कि उस ने ठीक नहीं किया. जब मन पर बोझ बहुत ज्यादा हो गया तो उस ने बच्चों को वहीं छोड़ दिया और खुद वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक शलभ माथुर के सामने जा कर अपना अपराध स्वीकार कर लिया.

वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक शलभ माथुर ने थाना बेवर के थानाप्रभारी ए.एम. काजी को बुला कर मुन्नालाल को उन के हवाले कर दिया. थानाप्रभारी ने गांव जा कर मुन्नालाल की निशानदेही पर सगुना की लाश और फावड़ा बरामद कर लिया. पूरा गांव मुन्नालाल की इस हरकत पर हैरान था. पुलिस ने अपनी काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया और मुन्नालाल को ले कर थाने आ गई.

इस के बाद मुन्नालाल के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर के अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. इस तरह गुस्से में मुन्नालाल ने अपना घर बरामद कर के अपने बच्चों को अनाथ कर दिया.

दर्द जब हद से गुजर जाए – भाग 2

उसी बीच बाबा दिल्ली से आया तो सगुना से मिलने उस के घर जा पहुंचा. सगुना मुंह लटकाए दरवाजे पर बैठी थी. उस तरह बैठी देख कर बाबा ने कहा, ‘‘भाभी, लगता है आज तुम खुश नहीं हो, क्या बात है, मुझे बताओ. मैं भी तो तुम्हारा कुछ लगता हूं.’’

‘‘नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है. तुम्हारे भैया से कब से एक फोन के लिए कह रही हूं. उन के पास पैसा ही नहीं रहता कि एक फोन ला कर दे दें. फोन न होने की वजह से मायके का हालचाल भी नहीं मिल पाता.’’

‘‘बस, इतनी सी बात के लिए मुंह लटकाए बैठी हैं. इस बार आऊंगा तो आप के लिए मोबाइल ले कर आऊंगा.’’ बाबा ने कहा.

सगुना ने उसे घूर कर देखा. वह उस के लिए इतने पैसे खर्च करने को तैयार है. उस का कितना खयाल रखता है. अगले दिन बाबा दिल्ली चला गया. लेकिन अगली बार आया तो सगुना के हाथ पर एकदम नया मोबाइल रख दिया. सगुना हैरान रह गई. वह पति से कब से मोबाइल लाने को कह रही थी. वह सुन ही नहीं रहा था. बाबा से सिर्फ जिक्र किया और उस ने मोबाइल ला कर दे दिया. यह उस का कितना खयाल रखता है.

सगुना को हैरान और सोच में डूबा देख कर बाबा ने कहा, ‘‘भाभी, तुम हैरान क्यों हो रही हो. सच्चाई यह है कि मैं तुम से प्यार करता हूं. इसलिए तुम्हें वे सारी खुशियां देना चाहता हूं, जो मुन्नाभाई तुम्हें नहीं दे पा रहे हैं.’’

‘‘यह कैसे हो सकता है देवरजी.’’ सगुना ने उलझन में कहा, ‘‘मैं शादीशुदा हूं. मैं तुम से प्यार कैसे कर सकती हूं?’’

‘‘प्यार करने वाले कुछ नहीं देखते. उन्हें सिर्फ अपने प्यार की चिंता होती है. अच्छा, यह बताओ, क्या तुम मुझ से प्यार नहीं करती?’’ बाबा ने सगुना की आंखों में झांकते हुए पूछा.

सगुना ने सिर झुका लिया. बाबा ने इधरउधर देखा, कोई दिखाई नहीं दिया तो उस ने उस के गालों को छू कर होंठों से लगाया और मुसकराते हुए चला गया. सगुना उसे तब तक देखती रही, जब तक बाबा दिखाई देता रहा. आंखों से ओझल होते समय बाबा ने हाथ हिलाया तो उसी तरह हाथ हिला कर सगुना ने भी जवाब दिया.

बाबा का दिया मोबाइल सगुना ने छिपा कर रख दिया. फिर 2 दिनों बाद वह मायके गई और वहां से लौटी तो मुन्नालाल को बताया कि भाई ने उसे मोबाइल खरीद कर दे दिया है. मुन्नालाल ने सोचा, चलो अच्छा ही हुआ, अब सगुना उसे मोबाइल के लिए परेशान तो नहीं करेगी. उसे क्या पता था कि यह मोबाइल उस का घर बारबाद करने के लिए आया है.

इस के बाद सगुना और बाबा के बीच बात होने लगी. इस बातचीत ने दोनों को और करीब ला दिया. फिर अगली बार बाबा गांव आया तो बेखौफ सगुना से मिला और पति के प्यार की प्यासी सगुना को बाबा से इतना प्यार मिला कि वह मुन्नालाल के प्रति बेवफा हो गई. दिल में उस ने मुन्नालाल की जगह बाबा को बैठा लिया.

कुछ दिनों तक तो सगुना और बाबा के संबंधों की किसी को खबर नहीं लगी. लेकिन जब बाबा का मुन्नालाल के घर कुछ ज्यादा ही आनाजाना हो गया तो उसे ले कर कानाफूसी होने लगी. किसी पड़ोसी ने जब मुन्नालाल को बताया कि बाबा उस की गैरमौजूदगी में उस के घर आताजाता है तो पहले तो उस ने जम कर सगुना की ठुकाई की, उस के बाद बोला, ‘‘आज के बाद बाबा घर में दिखाई दिया तो अच्छा नहीं होगा.’’

इस के बाद उस ने सगुना का मोबाइल फोन ले कर देखा तो उस की जिस नंबर पर सब से ज्यादा बात हुई थी वह बाबा का नंबर था. मुन्नालाल के मन में शक का बीज पड़ गया. उसे एक बार फिर अपनी गृहस्थी बरबाद होती नजर आने लगी.

शक ने मुन्नालाल को पागल कर दिया. वह बातबात में सगुना से लड़ाईझगड़ा और मारपीट करने लगा. उस की मारपीट से तंग आ कर एक दिन सगुना ने फोन पर बाबा से साफ कह दिया, ‘‘तुम्हारी वजह से मैं रोज पिटती हूं. तुम मुझे अपने साथ ले चलो, वरना मुझे छोड़ दो.’’

‘‘ठीक है, तुम तैयार रहना मैं जल्दी ही घर आ रहा हूं. इस बार मैं तुम्हें भी साथ ले आऊंगा.’’ बाबा ने कहा.

इस के बाद एक दिन सगुना गायब हो गई. परेशान मुन्नालाल भाई नरेश के पास पहुंचा और सारी बात बताई. नरेश तो कुछ नहीं बोला, लेकिन उस के बेटे सुलखान ने कहा, ‘‘चाची की वजह से गांव में हमारी बहुत बदनामी हुई है. अगर चाची लौट कर नहीं आती तो समाज में हमारा उठनाबैठना मुश्किल हो जाएगा.’’

इस के बाद काफी सोचविचार कर दोनों भाई बाबा के पिता मुलायम सिंह के पास पहुंचे, जब इन लोगों ने उसे बताया कि बाबा सगुना को भगा ले गया है तो पहले उसे विश्वास ही नहीं हुआ. लेकिन जब इन लोगों ने उसे धमकी दी कि अगर उस ने सगुना को बाबा के पास से ला कर उन के हवाले नहीं किया तो वे बापबेटे के खिलाफ सगुना को बरगला कर भगा ले जाने की रिपोर्ट दर्ज करा देंगे.

ग्रामप्रधान ने भी मुलायम सिंह पर दबाव बनाया तो मुलायम सिंह ने बेटे को फोन किया. सचमुच सगुना उसी के साथ थी. उस ने उसे गांव ले कर आने को कहा. इस तरह लगभग सप्ताह भर बाद सगुना एक बार फिर मुन्नालाल के पास आ गई.

बेटा दोबारा इस तरह का काम न करे, मुलायम सिंह ने उस के लिए लड़की तलाशने लगा. जल्दी ही उस ने हरदोई में उस की शादी तय कर दी. जब इस बात की जानकारी सगुना को हुई तो उस ने बाबा को फोन कर के साफसाफ कह दिया कि अब वह उस के बिना कतई नहीं रह सकती. तब उस ने उसे आश्वासन दिया कि शादी के बाद भी वह उसी का रहेगा.

मुन्नालाल पत्नी पर नजर रखता था. लेकिन बाबा के प्यार में पागल सगुना को अब उस की जरा भी परवाह नहीं रह गई थी. यही वजह थी कि अब वह आक्रामक होती जा रही थी. दूसरी ओर मुन्नालाल परेशान  था कि अगर सगुना चली गई तो इस के बाद कोई उसे अपनी लड़की देने वाला नहीं है.

बाबा की शादी रेखा से हो गई थी. बाबा के घर वाले चाहते थे कि वह अपनी पत्नी को दिल्ली ले जाए. इस शादी से मुन्नालाल ने भी राहत महसूस की थी कि बाबा नईनवेली दुलहन पा कर सगुना को भूल जाएगा. लेकिन यह उस का भ्रम था. क्योंकि कुछ दिनों बाद बाबा नौकरी छोड़ कर गांव आ गया.

दर्द जब हद से गुजर जाए – भाग 1

उत्तर प्रदेश के जिला मैनपुरी के थाना बेवर के गांव बर्रा के रहने वाले मुन्नालाल कठेरिया का दांपत्य  जीवन गुस्से की वजह से कभी भी  सुखमय नहीं रहा. गुस्से की ही वजह से आज वह अपनी तीसरी पत्नी की हत्या के आरोप में जेल में है. उस की पहली पत्नी की मौत हो गई थी तो उस के गुस्सैल स्वभाव से आजिज आ कर दूसरी पत्नी ने उस के साथ रहने से मना कर दिया था. काफी कोशिश कर के उस के भाई नरेश ने उस की तीसरी शादी औरैया के रमपुरा कटरा के रहने वाले डबली की बेटी सगुना से करा कर एक बार फिर उस की गृहस्थी आबाद करा दी थी.

डबली के 2 बेटे, उमेश और सतीश के अलावा एक बेटी सगुना थी. लेकिन घर के हालात कुछ ऐसे थे कि उसे अपनी एकलौती बेटी का ब्याह मुन्नालाल जैसे आदमी से करना पड़ा था, जिस की 2 शादियां पहले ही हो चुकी थीं. मांबाप की मजबूरी की वजह से सगुना कुर्बान हो गई थी. लेकिन मुन्नालाल से उसे कभी वह जुड़ाव नहीं हो सका था, जो पतिपत्नी में होता है. इस की वजह थी मुन्नालाल का गुस्सैल स्वभाव और उम्र में अंतर.

सगुना गरीब बाप की बेटी थी, इसलिए उसे पता था कि ब्याह के बाद अब उस के लिए मायके का दरवाजा बंद हो चुका है. न चाहते हुए भी वह मुन्नालाल से जुड़ने की कोशिश करने लगी थी.  समय के साथ मुन्नालाल सगुना के 2 बच्चों अलकेश और अतुल का बाप बन गया. इस के बावजूद उस के स्वभाव में कोई बदलाव नहीं आया. बातबात में भड़क उठने वाले मुन्नालाल को गुस्सा चढ़ता तो उसे अच्छेबुरे का खयाल नहीं रहता.

ऐसे में सगुना का मन आहत होता रहता, क्योंकि मुन्नालाल गुस्से में गालीगलौज तो करता ही था, मारपीट करने में भी पीछे नहीं रहता था. सगुना ने जब इस बात की शिकायत मांबाप से की तो मांबाप ने ही नहीं, भाइयों ने भी साफसाफ कह दिया था कि अब उस का घर वही है और उसे अपनी तरह से संभालना है. हां, भाइयों ने इस बात का आश्वासन जरूर दिया था कि वे मुन्नालाल को समझाएंगे. इन बातों से साफ हो गया था कि चाहे जो भी हो, उसे हर हाल में मुन्नालाल के साथ ही रहना था.

चारों ओर से निराश सगुना मुन्नालाल में मन लगाने की कोशिश कर रही थी कि तभी अचानक एक दिन मायके से लौटते समय बेवर बसस्टैंड पर उस की मुलाकात गांव के ही रहने वाले बाबा से हो गई. गांव के रिश्ते से वह उस का देवर लगता था. वह बच्चों को ले कर टैंपो पकड़ने के लिए सड़क की ओर बढ़ रही थी, तभी बाबा ने उस के पास आ कर कहा था, ‘‘कहां से आ रही हो भाभी?’’

‘‘मां के यहां गई थी, वहीं से आ रही हूं.’’

‘‘मैं भी घर चल रहा हूं.’’ सगुना का बैग उठाते हुए बाबा ने कहा, ‘‘लाइए, अनुज को मुझे दे दीजिए.’’

बाबा ने सड़क पर आ कर टैंपो रुकवाया और सगुना के बगल में बैठ कर एक बच्चा उस की गोद में बैठा दिया और दूसरा अपनी गोद में बैठा लिया. टैंपो चला तो बाबा ने पूछा, ‘‘भाभी, आप मुन्नाभाई के साथ कैसे रह लेती हो?’’

‘‘मजबूरी है, क्या कर सकती हूं. इस के अलावा कोई दूसरा उपाय भी तो नहीं है.’’ सगुना ने उदास हो कर कहा.

‘‘भाभी, आप जवान भी हैं और खूबसूरत भी. मुन्ना भाई जैसे आदमी को ले कर क्या बैठी हैं.’’

‘‘भैया, 2 बच्चों की मां को कौन पूछेगा?’’

‘‘लेकिन मुझे तो आप बहुत अच्छी लगती हैं.’’ बाबा ने कहा तो सगुना हैरानी से उस की ओर देखते हुए बोली, ‘‘क्या मतलब?’’

‘‘आप मुझे अच्छी लगती हैं तो अच्छी लगती हैं. इस में मतलब की क्या बात?’’ बाबा ने कहा.

सगुना बेवकूफ नहीं थी कि अच्छी लगने का मतलब न समझती. लेकिन वह 2 बच्चों की मां थी तो बाबा कुंवारा था. हालांकि दोनों की उम्र में बहुत ज्यादा अंतर नहीं था. लेकिन एकाएक उस पर विश्वास भी तो नहीं किया जा सकता था. फिर भी सगुना बाबा के बारे में सोचने को मजबूर हो गई थी.

बाबा गांव के ही मुलायम सिंह का बेटा था. वह दिल्ली में रह कर किसी फैक्ट्री में नौकरी करता था. महीने-2 महीने पर गांव आता रहता था. शहर में रहने की वजह से वह बनठन कर रहता था, इसलिए मुन्नालाल जैसे लोग उसे शोहदा कहते थे. यही वजह थी कि एक दिन जब सगुना को बाबा से बात करते मुन्नालाल ने देख लिया तो बोला, ‘‘तुझे बात करने के लिए यही शोहदा मिला था. ऐसे लोगों को मुंह लगाना ठीक नहीं है.’’

‘‘दिल्ली में कमाता है, इसलिए बनठन कर रहता है. मुझे तो उस में शोहदे वाले कोई लक्षण नहीं दिखाई देते.’’ सगुना ने कहा.

‘‘तू मुझ से ज्यादा जानती है क्या. मुझे पता है, वह क्या करता है और कैसे रहता है.’’

मुन्नालाल ने पत्नी को झिड़का तो सगुना चुप हो गई. वह जानती थी इस से बहस करना ठीक नहीं है. इसे कब गुस्सा आ जाए, पता नहीं. गुस्सा आ गया तो वह मारपीट भी कर सकता था. इसलिए बात बदलते हुए उस ने कहा, ‘‘तुम तो मोबाइल फोन लाने गए थे. उस का क्या हुआ?’’

‘‘ला दूंगा भई मोबाइल फोन. मैं भी चाहता हूं कि हमारे पास भी मोबाइल हो, लेकिन अभी पैसे नहीं हैं. कुछ दिन और रुको. पैसों की व्यवस्था कर के खरीद दूंगा.’’

सगुना को लगता था कि अगर उस के पास भी मोबाइल फोन हो तो घर बैठे वह मांबाप और भाइयों का हालचाल ले लेती. आज सब के पास तो मोबाइल है. मुन्नालाल जिस घर में रहता था, उसी के आधे हिस्से में उस का भाई नरेश पत्नी रामकली तथा 5 बच्चों के साथ रहता था. सगुना को जब कभी मांबाप का हालचाल लेना होता था, जेठ के घर जा कर फोन कर लेती थी.