मारवाड़ के लुटेरों पर पुलिस का दांव – भाग 2

पुलिस घबरा गई और हमलावरों का मुकाबला करने के बजाय वहां से भागने लगी. इसी बीच लोहे के गेट पर चढ़ रहे इंसपेक्टर टी.वी. पेरियापांडियन को गोली लग गई, जिस से वह वहीं गिर गए. जबकि उन के साथी भाग गए थे. मौका पा कर हमला करने वाले सभी लोग वहां से भाग निकले. इस हमले में टीम के कुछ अन्य लोग भी घायल हो गए थे.

थोड़ी दूर जा कर जब पुलिस टीम को पता चला कि टी.वी. पेरियापांडियन साथ नहीं हैं तो सभी वापस लौटे. भट्ठे पर जा कर देखा तो टी.वी. पेरियापांडियन घायल पड़े थे.

उन्हें जैतारण के अस्पताल ले जाया गया, जहां डाक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया. अभी तक स्थानीय पुलिस को इस घटना की कोई जानकारी नहीं थी. स्थानीय पुलिस को जैतारण अस्पताल प्रशासन से इस घटना की जानकारी मिली. इस घटना की जानकारी एसपी दीपक भार्गव को भी मिल गई.

सूचना पा कर सारे पुलिस अधिकारी अस्पताल पहुंचे और चेन्नै पुलिस से घटना के बारे में पूछताछ की. पता चला कि छापा मारने के दौरान नाथूराम ने अपने 8-10 साथियों के साथ उन पर हमला किया था. इस हमले में इंसपेक्टर टी.वी. पेरियापांडियन उन के बीच फंस गए थे. इन्होंने उन की सरकारी पिस्टल छीन ली और उसी से उन्हें गोली मार दी, जिस से उन की मौत हो गई.

पाली के पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का निरीक्षण किया तो चेन्नै से आई पुलिस ने उन्हें जो कुछ बताया, वह उन के गले नहीं उतरा. फिर भी थाना जैतारण में चेन्नै पुलिस की ओर से नाथूराम जाट, दीपाराम जाट और दिनेश चौधरी व अन्य लोगों के खिलाफ हत्या, जानलेवा हमला करने और सरकारी काम में बाधा डालने का मुकदमा दर्ज कर लिया गया.

पाली पुलिस को घटनास्थल पर गोली का एक खोखा मिला था, जो पुलिस की पिस्टल का था. एफएसएल टीम ने भी घटनास्थल पर जा कर जरूरी साक्ष्य जुटाए. पुलिस के लिए जांच का विषय यह था कि गोली किस ने और कितनी दूरी से चलाई. वह गोली एक्सीडेंटल चली थी या डिफेंस में चलाई गई थी. जैतारण पुलिस ने हमलावरों में से कुछ को पकड़ लिया, लेकिन नाथूराम नहीं पकड़ा जा सका था. पुलिस उस की तलाश में सरगर्मी से जुटी थी.

जोधपुर के मथुरादास माथुर अस्पताल में इंसपेक्टर टी.वी. पेरियापांडियन की लाश का पोस्टमार्टम मैडिकल बोर्ड द्वारा कराया गया. इस के बाद 14 दिसंबर को हवाई जहाज द्वारा उन के शव को चेन्नै भेज दिया गया. चेन्नै में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री पलानीसामी, उपमुख्यमंत्री ओ. पन्नीरसेल्वम, डीजीपी टी.के. राजेंद्रन, पुलिस कमिश्नर ए.के. विश्वनाथन और विपक्ष के नेता एम.के. स्टालिन सहित तमाम राजनेताओं और पुलिस अफसरों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी.

इस मौके पर तमिलनाडु के मुख्यमंत्री पलानीसामी ने दिवंगत इंसपेक्टर टी.वी. पेरियापांडियन के घर वालों को 1 करोड़ रुपए की राशि बतौर मुआवजा और घायल पुलिसकर्मियों को एकएक लाख रुपए देने की घोषणा की. इस के बाद टी.वी. पेरियापांडियन के शव को उन के पैतृक गांव जिला तिरुनलवेली के मुवेराथली ले जाया गया, जहां राजकीय सम्मान के साथ उन का अंतिम संस्कार कर दिया गया.

14 दिसंबर को चेन्नै पुलिस के जौइंट पुलिस कमिश्नर संतोष कुमार जैतारण पहुंचे और डीएसपी वीरेंद्र सिंह तथा चेन्नै के पुलिस इंसपेक्टर मुनिशेखर से घटना के बारे में जानकारी ली. घटनास्थल का भी निरीक्षण किया गया. इस के बाद एसपी दीपक भार्गव ने भी पाली जा कर घटना के बारे में तथ्यात्मक जानकारी ली और आरोपियों की गिरफ्तारी और लूटी गई ज्वैलरी की बरामदगी के बारे में चर्चा की.

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इंसपेक्टर टी.वी. पेरियापांडियन की मौत की जांच के लिए पाली पुलिस के बुलाने पर जयपुर से पहुंचे बैलेस्टिक एक्सपर्ट ने भी घटनास्थल का निरीक्षण किया. उन्होंने चेन्नै पुलिस के दोनों इंसपेक्टरों की पिस्टल, घटनास्थल तथा लाश के फोटोग्राफ और वीडियो फुटेज आदि राज्य विधिविज्ञान प्रयोगशाला जयपुर पर मंगवाए.

गोली की बरामदगी के लिए पाली पुलिस ने मेटल डिटेक्टर से घटनास्थल के आसपास जांच कराई, लेकिन गोली नहीं मिली. जबकि मृतक इंसपेक्टर की लाश में भी गोली नहीं मिली थी.

इस बीच 14 दिसंबर, 2017 को जोधपुर के थाना रातानाड़ा की पुलिस ने चेन्नै के महालक्ष्मी ज्वैलर्स के शोरूम में हुई सवा करोड़ रुपए के गहनों की लूट के मुख्य आरोपी नाथूराम के साथी जोधपुर के बिलाड़ा निवासी दिनेश जाट को गिरफ्तार कर लिया था. दिनेश जाट बिलाड़ा थाने का हिस्ट्रीशीटर था. उस के खिलाफ कई मुकदमे दर्ज थे. पुलिस ने उस की गिरफ्तारी के लिए स्टैंडिंग वारंट भी जारी कर रखा था.

15 दिसंबर को जोधपुर रेंज के आईजी हवा सिंह घुमारिया भी जैतारण पहुंचे और घटनास्थल का निरीक्षण किया. इस बीच पाली पुलिस ने घटनास्थल पर जा कर मृतक इंसपेक्टर टी.वी. पेरियापांडियन की मौत का क्राइम सीन दोहराया.

चेन्नै एवं राजस्थान के पुलिस अधिकारियों और एफएसएल विशेषज्ञों की उपस्थिति में दोहराए गए क्राइम सीन में सामने आया कि जब टी.वी. पेरियापांडियन ने लोहे के गेट पर चढ़ कर भागने की कोशिश की थी, तब पहले गेट से बाहर निकल चुके चेन्नै पुलिस के इंसपेक्टर मुनिशेखर की पिस्टल से एक्सीडेंटल गोली चल गई थी. इसी गोली से पेरियापांडियन की मौत हुई थी.

चेन्नै पुलिस के इंसपेक्टर की मौत का सच सामने आने के बाद थाना जैतारण पुलिस ने 15 दिसंबर को हमलावर तेजाराम जाट, उस की पत्नी विद्या देवी और बेटी सुगना को गिरफ्तार कर लिया.

लेकिन उन्हें हत्या का आरोपी न बना कर भादंवि की धारा 307, 331 व 353 के तहत गिरफ्तार किया गया था. चूना भट्ठे के उस कमरे में तेजाराम का परिवार रहता था.

हमलावर तेजाराम और चेन्नै पुलिस टीम से की गई पूछताछ में पता चला कि 12 दिसंबर की रात चेन्नै पुलिस ने जब चूना भट्ठे पर छापा मारा था, तब दोनों इंसपेक्टरों ने अपनी पिस्टल लोड कर रखी थीं.

पुलिस टीम जैसे ही अंदर हाल के पास पहुंची, पदचाप सुन कर तेजाराम जाग गया. पुलिस वालों को चोर समझ कर वह चिल्लाया तो हाल में सो रही उस की पत्नी, बेटियां व अन्य लोग जाग गए और उन्होंने लाठियों से पुलिस पर हमला कर दिया.

उस समय नाथूराम भी वहां मौजूद था. वह समझ गया कि ये चोर नहीं, चेन्नै पुलिस है, इसलिए वह भागने की युक्ति सोचने लगा. अचानक हुए हमले से घबराई चेन्नै पुलिस भागने लगी. इंसपेक्टर मुनिशेखर और अन्य पुलिस वाले तो दीवार फांद कर बाहर निकल गए.

अतीक अहमद : खूंखार डौन की बेबसी – भाग 2

उस के बाद पुलिस ने उसे छोड़ दिया. लेकिन ऐसे ही नहीं. अतीक भेष बदल कर अपने एक साथी के साथ बुलेट से कचहरी पहुंचा. उस ने एक पुराने मामले की जमानत तुड़वा कर आत्मसमर्पण कर दिया और जेल चला गया. उस के जेल जाते ही पुलिस उस पर टूट पड़ी. उस पर एनएसए लगा दिया. इस से लोगों को लगा कि अतीक बरबाद हो गया है.

एक साल बाद वह जेल से बाहर आ गया. उसे कांग्रेसी सांसद का साथ मिल ही रहा था, जिस की वजह से वह जिंदा बचा था. इस बात से अतीक को पता चल गया था कि उसे अब राजनीति ही बचा सकती है. फिर उस ने किया भी यही.

1989 में उत्तर प्रदेश में विधानसभा का चुनाव होना था. अतीक अहमद ने इलाहाबाद पश्चिमी सीट से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में पर्चा भर दिया. सामने उम्मीदवार के रूप में था चांदबाबा. चांदबाबा और अतीक में अब तक कई बार गैंगवार हो चुकी थी.

अपराध जगत में अतीक की तरक्की चांदबाबा को खल रही थी. चांदबाबा के आतंक से छुटकारा पाने के लिए आम लोगोें ने ही नहीं, पुलिस और राजनीतिक पार्टियों ने भी अतीक अहमद का समर्थन किया. परिणामस्वरूप चांदबाबा चुनाव हार गया. इस तरह अतीक अहमद पहली बार विधायक बन गया.

विधायक चुने जाने के कुछ ही महीनों बाद अतीक अहमद ने चांदबाबा की भरे बाजार हत्या करा दी. इस के बाद चांदबाबा के पूरे गैंग का सफाया हो गया. कुछ मारे गए तो कुछ भाग गए. जो बचे वे अतीक के साथ मिल गए.

अब इलाहाबाद पर एकलौते डौन अतीक अहमद का राज हो गया. अतीक अहमद ने अपना एक पूरा गैंग बना लिया. उसे राजनीतिक सपोर्ट भी मिल रहा था. विधायक बनने के बाद तो व्यापारियों का अपहरण, रंगदारी की वसूली, सरकारी ठेके लेना अतीक अहमद का धंधा बन गया.

अतीक अहमद का इलाहाबाद में ऐसा आतंक छा गया था कि इलाहाबाद पश्चिमी सीट से लोग चुनाव में विधायकी का टिकट लेने से खुद ही मना कर देते थे.

राजनीति में आने के बाद ज्यादातर अपराधी धीरेधीरे अपराध करना छोड़ देते हैं, पर अतीक के मामले में इस का उल्टा था. अतीक भले ही नेता बन गया था, लेकिन उस ने अपनी माफिया वाली छवि नहीं बदली.

सफेदपोश बनने के बाद उस के द्वारा किए जाने वाले अपराध और बढ़ गए थे. राजनीति की आड़ में वह अपना आपराधिक साम्राज्य और मजबूत करता रहा. यही वजह है कि उस पर दर्ज होने वाले ज्यादातर आपराधिक मुकदमे विधायक, सांसद रहते हुए ही दर्ज हुए.

वह अपने विरोधियों को किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ता था. कोई एक अपराध नहीं था उस का. 1999 में चांदबाबा की हत्या, 2002 में नस्सन की हत्या, 2004 में मुरली मनोहर जोशी के करीबी बताए जाने वाले भाजपा नेता अशरफ की हत्या, 2005 में राजू पाल की हत्या उस के खाते में दर्ज हुईं.

जो भी अतीक के खिलाफ सिर उठाता था, वह मारा जाता था. इलाहाबाद के कसारी मसारी, बेली गांव, चकिया, मरियाडीह और धूमनगंज इलाके में उस की अक्सर गैंगवार होती रहती थी.

विधायक बनने के बाद अतीक ने अपराध करना और बढ़ा दिया था. 1991 और 1993 के विधानसभा के चुनाव में भी अतीक अहमद निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में विधायक चुना गया.

1996 के विधानसभा के चुनाव में मुलायम सिंह ने अतीक अहमद को अपनी समाजवादी पार्टी से टिकट दिया. इस तरह चौथी बार अतीक अहमद समाजवादी पार्टी से फिर विधायक चुना गया.

बाद में किसी वजह से अतीक अहमद के समाजवादी पार्टी से संबंध बिगड़ गए तो 1999 में अतीक अहमद अपना दल में शामिल हो गया. सोनेलाल पटेल द्वारा बनाई गई पार्टी अपना दल में अतीक अहमद 1999 से 2003 तक इलाहाबाद का पार्टी का जिला अध्यक्ष रहा. 1999 में उस ने अपना दल से चुनाव लड़ा, परंतु हार गया. उस के बाद 2003 में फिर एक बार अपना दल के टिकट से अतीक अहमद पांचवीं बार विधायक बना.

विदेशी गाडि़यों और हथियारों का शौक

जिस सांसद ने अतीक पर हाथ रखा था, वह इलाहाबाद के बड़े कारोबारी थे. कहते हैं कि उस समय शहर में सिर्फ उन्हीं के पास निसान और मर्सिडीज जैसी विदेशी गाडि़यां थीं. लेकिन जल्दी ही अतीक को भी इस का चस्का लग गया. विधायक बनने के कुछ ही दिनों बाद उस ने भी विदेशी गाड़ी खरीद ली. जल्दी ही उस का नाम सांसद से भी बड़ा हो गया.

सांसद को यह बात इतनी नागवार गुजरी कि उन्होंने विदेशी गाडि़यां रखनी ही छोड़ दीं. गाडि़यों के बाद नंबर था हथियारों का. इस तरह के आदमी को तो वैसे भी हथियारों की जरूरत होती है. उस ने विदेशी हथियार खरीदने शुरू किए. उस ने विदेशी गाडि़यों का तो पूरा काफिला ही खड़ा कर दिया था.  अतीक चकिया तक ही सीमित नहीं रहना चाहता था. इसलिए वह विरोधियों को खत्म कर देता था.

अतीक अहमद का एक रहस्य और भी दिलचस्प है. वह चुनाव के दौरान चंदा किसी को फोन कर के या डराधमका कर नहीं मांगता था. वह शहर के पौश इलाके में बैनर लगवा देता था कि आप का प्रतिनिधि आप से सहयोग की अपेक्षा रखता है. इस के बाद लोग खुद ही अतीक के औफिस में चंदा पहुंचा देते थे.

अगर अतीक को अपने गुर्गों को कोई संदेश देना होता तो वह बाकायदा अखबारों में विज्ञापन निकलवा देता कि क्या करना है और क्या नहीं करना.

उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव की सरकार थी. 2004 में लोकसभा चुनाव की घोषणा हुई. मुलायम सिंह को बाहुबली नेताओं की जरूरत थी. मुलायम सिंह के कहने पर अतीक अहमद फिर समाजवादी पार्टी में शामिल हो गया तो इलाहाबाद की फूलपुर संसदीय सीट से सपा ने अतीक अहमद को उम्मीदवार बनाया. अतीक अहमद चुनाव जीत गया और सांसद बन गया.

अतीक अहमद के सांसद बन जाने पर इलाहाबाद पश्चिमी विधानसभा की सीट खाली हो गई. इस पर अतीक अहमद ने अपने भाई अशरफ को चुनाव लड़ाया. अशरफ के सामने एक समय अतीक अहमद का ही दाहिना हाथ रहे राजू पाल को बहुजन समाज पार्टी ने उम्मीदवार बनाया. उस समय राजू पाल पर 25 मुकदमे दर्ज थे. इस चुनाव में अतीक का भाई अशरफ 4 हजार वोटों से चुनाव हार गया और राजू पाल चुनाव जीत गया.

राजू पाल की यह जीत अतीक अहमद से हजम नहीं हुई और परिणाम आने के महीने भर बाद यानी नवंबर, 2004 में राजू पाल के औफिस के पास बमबाजी और फायरिंग हुई. दिसंबर में उस की गाड़ी पर फायरिंग हुई. पर इन दोनों हमलों मे वह बच गया.

25 जनवरी, 2005 को राजू पाल की कार पर एक बार फिर हमला हुआ. इस में राजू पाल को कई गोलियां लगीं. हमलावर फरार हो गए. गोलीबारी में घायल राजू पाल के साथी उसे टैंपो से अस्पताल ले जा रहे थे तो हमलावरों को लगा कि राजू पाल अभी जिंदा है तो उस पर दोबारा हमला किया गया. इस बार उस पर अंधाधुंध गोलियां बरसाई गईं. जब तक राजू जीवनज्योति अस्पताल पहुंचता, उस की मौत हो चुकी थी. उसे 19 गोलियां लगी थीं.

इस हत्या का एक कारुणिक पहलू यह था कि हत्या के 9 दिन पहले ही राजू पाल की शादी हुई थी. उस की पत्नी पूजा पाल ने अतीक, उस के भाई अशरफ, फरहान और आबिद समेत कई लोगों पर नामजद हत्या का मुकदमा दर्ज कराया.

मारवाड़ के लुटेरों पर पुलिस का दांव – भाग 1

राजस्थान का अपना गौरवशाली इतिहास रहा है. मेवाड़ और मारवाड़ की धरती शूरवीरता के लिए जानी जाती है. रेतीले धोरों और अरावली पर्वतमालाओं से घिरे इस सूबे के लोगों को भले ही जान गंवानी पड़ी, लेकिन युद्ध के मैदान में कभी पीठ नहीं दिखाई. इस के इतर राजस्थान की कुछ जनजातियां अपराध के लिए भी जानी जाती रही हैं.

लेकिन अब समय बदल गया है. ऐसे तमाम लोग हैं, जो कामयाब न होने पर अपने सपने पूरे करने के लिए जनजातियों की तरह अपराध की राह पर चल निकले हैं. अन्य राज्यों के लोगों की तरह राजस्थान के भी हजारों लोग भारत के दक्षिणी राज्यों में रोजगार की वजह से रह रहे हैं.

मारवाड़ के रहने वाले कुछ लोगों ने अपने विश्वस्त साथियों का गिरोह बना कर तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में करोड़ों की चोरी, लूट और डकैती जैसे संगीन अपराध किए हैं. ये वहां अपराध कर के राजस्थान आ जाते हैं और अपने गांव या रिश्तेदारियों में छिप जाते हैं. कुछ दिनों में मामला शांत हो जाता है तो फिर वहां पहुंच जाते हैं. उन्हें वहां किसी तरह की परेशानी भी नहीं होती, क्योंकि वहां रहतेरहते ये वहां की भाषा भी सीख गए हैं. स्थानीय भाषा की वजह से ये जल्दी ही वहां के लोगों में घुलमिल जाते हैं.

मारवाड़ के इन लुटेरों ने जब वहां कई वारदातें कीं तो वहां की पुलिस इन लुटेरों की खोजबीन करती हुई उन के गांव तक पहुंच गई. लेकिन राजस्थान पहुंचने पर दांव उल्टा पड़ गया. इधर 3 ऐसी घटनाएं घट गईं, जिन में लुटेरों को पकड़ने आई तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश की पुलिस खुद अपराधी बन गई. यहां तक कि चेन्नै के एक जांबाज इंसपेक्टर को जान से भी हाथ धोना पड़ा.

चेन्नै के थाना मदुरहोल के लक्ष्मीपुरम की कडप्पा रोड पर गहनों का एक काफी बड़ा शोरूम है महालक्ष्मी ज्वैलर्स. यह शोरूम मुकेश कुमार जैन का है. वह मूलरूप से राजस्थान के जिला पाली के गांव बावरा के रहने वाले हैं. वह रोजाना दोपहर के 1 बजे के करीब शोरूम बंद कर के लंच के लिए घर चले जाते थे. कुछ देर घर पर आराम कर के वह शाम करीब 4 बजे शोरूम खोलते थे.

16 नवंबर, 2017 को भी मुकेश कुमार जैन अपना जवैलरी का शोरूम बंद कर के लंच करने घर चले गए थे. शाम करीब 4 बजे जब उन्होंने आ कर शोरूम खोला तो उन के होश उड़ गए. शोरूम की छत में सेंध लगी हुई थी. अंदर रखे डिब्बों से सोनेचांदी के सारे गहने गायब थे. 2 लाख रुपए रकद रखे थे, वे भी नहीं थे. मुकेश ने हिसाब लगाया तो पता चला कि साढ़े 3 किलोग्राम सोने और 5 किलोग्राम चांदी के गहने और करीब 2 लाख रुपए नकद गायब थे.

दिनदहाड़े ज्वैलरी के शोरूम में छत में सेंध लगा कर करीब सवा करोड़ रुपए के गहने और नकदी पार कर दी गई थी. चोरों ने यह सेंध ड्रिल मशीन से लगाई थी. उन्होंने गहने और नकदी तो उड़ाई ही, शोरूम में लगे सीसीटीवी कैमरे भी उखाड़ ले गए थे.

मुकेश ने वारदात की सूचना थाना मदुरहोल पुलिस को दी. पुलिस ने घटनास्थल पर आ कर जांच की. जांच में पता चला कि शोरूम की छत पर बने कमरे से ड्रिल मशीन द्वारा छेद किया गया था.

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शोरूम के ऊपर बने कमरे में कपड़े की दुकान थी. वह दुकान नाथूराम जाट ने किराए पर ले रखी थी. वह भी राजस्थान के जिला पाली के गांव रामावास का रहने वाला था. उसी के साथ दिनेश और दीपाराम भी रहते थे. दिनेश थाना बिलाड़ा का रहने वाला था तो दीपाराम पाली के खारिया नींव का रहने वाला था. ये तीनों पुलिस को कमरे पर नहीं मिले. पुलिस ने शोरूम के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगाली तो पता चला कि मुकेश के ज्वैलरी शोरूम में नाथूराम और उस के साथियों ने ही लूट की थी.

लूट के 2 दिनों बाद चेन्नै पुलिस ने शोरूम के मालिक मुकेश जैन को साथ ले कर अभियुक्तों की गिरफ्तारी के लिए राजस्थान के जिला पाली आ कर डेरा डाल दिया. पुलिस ने पूछताछ के लिए कुछ लोगों को पकड़ा भी, लेकिन नाथूराम जाट और उस के साथियों के बारे में कुछ पता नहीं चला तो चेन्नै पुलिस लौट गई.

11 दिसंबर, 2017 को एक बार फिर चेन्नै पुलिस पाली आई. इस टीम में इंसपेक्टर टी.वी. पेरियापांडियन और इंसपेक्टर टी.एम. मुनिशेखर के अलावा 2 हैडकांस्टेबल अंबरोस व गुरुमूर्ति और एक कांस्टेबल सुदर्शन शामिल थे. यह टीम पाली के एसपी दीपक भार्गव से मिली तो उन्होंने टीम की हर तरह से मदद मरने का आश्वासन दिया. उन्होंने कहा कि जब भी उन्हें काररवाई करनी हो, बता दें. स्थानीय पुलिस हर तरह से उन की मदद करेगी.

इस के बाद चेन्नै से आई पुलिस अपने हिसाब से आरोपियों की तलाश करती रही. पुलिस ने नाथूराम के 2 नजदीकी लोगों को हिरासत में ले कर उन से पूछताछ की. उन्होंने बताया कि नाथूराम पाली में जैतारण-रामवास मार्ग पर करोलिया गांव में खारिया नींव के रहने वाले दीपाराम जाट के बंद पड़े चूने के भट्ठे पर मिल सकता है.

इस सूचना पर चेन्नै पुलिस ने पाली पुलिस को बिना बताए 12 दिसंबर की रात करीब ढाई-तीन बजे करोलिया गांव स्थित दीपाराम के चूने के भट्ठे पर बिना वर्दी के छापा मारा. पुलिस की यह टीम सरकारी गाड़ी के बजाय किराए की टवेरा कार से गई थी.

टीम की अगुवाई कर रहे इंसपेक्टर पेरियापांडियन और इंसपेक्टर मुनिशेखर के पास सरकारी रिवौल्वर थी. पुलिस टीम के पहुंचते ही भट्ठे पर बने एक कमरे में सो रहे लोग जाग गए. उस समय वहां 3 पुरुष, 6 महिलाएं और कुछ लड़कियां थीं. उन सब ने मिल कर लाठीडंडों से पुलिस पर हमला बोल दिया.

जिस्म के धंधे में धकेली 200 लड़कियां

मध्य प्रदेश सरकार द्वारा गठित स्पैशल इनवैस्टिगेशन टीम (एसआईटी) के आला अधिकारियों द्वारा भोपाल में सितंबर 2021 के अंतिम सप्ताह में एक अहम बैठक की गई. इस दौरान मानव तस्करी समेत हनीट्रैप के बढ़ते मामले को ले कर चिंता जताई गई.

राज्य में विगत कुछ माह में ऐसे मामले बढ़ गए थे. राजधानी भोपाल और दूसरे बड़े शहर इंदौर एवं ग्वालियर में एमएलए, एमपी, ब्यूरोक्रेट, बिजनैसमैन या बड़े उद्योगपति को लड़की द्वारा सैक्स जाल में फंसाने और उन से वसूली की कई शिकायतें आ चुकी थीं. अधिकतर मामलों में लड़की द्वारा फार्महाउस, गेस्ट हाउस, रेंटेड फ्लैट या होटल के कमरे में अवैध सैक्स के वीडियो छिपे कैमरे से बनाए जाते थे. फिर उन से मोटी रकम वसूली जाती थी. इस काम को बड़े ही सुनियोजित तरीके से अंजाम दिया जा रहा था.

जबकि पुलिस के बड़े अफसरों पर ऐसे गिरोह को धर दबोचने का पौलिटिकल प्रेशर भी बना हुआ था. कब कौन किस तरह से हनी ट्रैप का शिकार हो जाए, कहना मुश्किल था. वे टेक्नोलौजी, ऐप्स और सोशल साइटों का इस्तेमाल करते हुए बच निकलते थे.

इसी तरह पिछले कुछ महीनों से आए दिन होटल, गेस्टहाउस, स्पा और मसाज सेंटर से सैक्स रैकेट का भी भंडाफोड़ हो रहा था. दूसरे राज्यों से आई जिस्फरोशी में लिप्त लड़कियां वहां से पकड़ी जा रही थीं, लेकिन उन का सरगना गिरफ्त से बाहर था. 2-3 से ले कर कभी 11, तो कभी 15 या 21 पकड़ी गई लड़कियों में अधिकतर बांग्लादेश की होती थीं.

वे वहां तक कैसे पहुंचीं, उन का मुखिया कौन है, उन के बारे में कोई विशेष जानकारी नहीं होती थी. यहां तक कि वे ठीक से हिंदी भी नहीं बोल पाती थीं. अपना सही पताठिकाना तक नहीं बता पाती थीं.

इन्हीं सब बातों को ले कर एसआईटी की बुलाई गई विशेष बैठक में बडे़ अफसरों ने इंदौर, भोपाल और ग्वालियर की पुलिस को आड़ेहाथों लिया था. उन्हें जबरदस्त डांट पिलाई थी.

उसी सिलसिले में सैंडो, आफरीन, बबलू सरकार, दिलीप बाबा, प्रमोद पाटीदार, उज्ज्वल ठाकुर एवं विजयदत्त उर्फ मुनीरुल रशीद का नाम भी सामने आया. पता चला कि मुनीरुल ही इस गैंग का सरगना है. उसे मुनीर कह कर बुलाते थे.

इस पर यह सवाल भी उठा कि मुनीर पिछले 11 महीने से क्यों फरार है, जबकि उस पर 10 हजार रुपए का ईनाम भी है. वह पकड़ा क्यों नहीं गया?

उल्लेखनीय है कि पिछले साल दिसंबर में इंदौर के विजय नगर और लसूडि़या इलाके में सैक्स रैकेट के खिलाफ औपरेशन चलाया गया था. तब कुल 15 लड़कियां पकड़ी गई थीं.

उन से मिली जानकारी के आधार पर ही उन आरोपियों के खिलाफ मामले दर्ज किए गए थे. उस वक्त मुख्य आरोपी मुनीर भाग निकला था. उसे पकड़ने के लिए 10 हजार रुपए ईनाम की भी घोषणा की गई थी.

उस के बाद ही इंदौर में हाईप्रोफाइल सैक्स रैकेट और मानव तस्करी की जांच के लिए डीआईजी ने दिसंबर 2020 में ही एसआईटी बनाई थी. इस में पूर्व क्षेत्र के एएसपी राजेश रघुवंशी, विजय नगर सीएसपी राकेश गुप्ता, एमआईजी टीआई विजय सिसौदिया और विजय नगर टीआई तहजीब काजी को रखा गया था.

फिर एसआईटी ने सैक्स रैकेट के खिलाफ एक अभियान छेड़ दिया था और जगहजगह सैक्स रैकेट के अड्डों पर लगातार छापेमारी की गई थी, लेकिन मुनीर पकड़ा नहीं जा सका था. वह पुलिस की आंखों में धूल झोंक कर हमेशा बच निकलता था.

एसआईटी को मुनीर के सूरत में छिपे होने की सूचना मिली थी. वह बारबार अपना ठिकाना बदलने में माहिर था, उस की लोकेशन की पूरी जानकारी पुख्ता होने के बाद ही एसपी ने उसे पकड़ने के निर्देश दिए.

इस के लिए टीम ने एक सप्ताह तक सूरत में डेरा डाल दिया. टीम को बताया गया था कि वह अपना धंधा वीडियो कालिंग के जरिए करता है. वाट्सऐप से मैसेज करता है.

इसे ध्यान में रखते हुए उस की ट्रैकिंग पूरी मुस्तैदी के साथ मोबाइल टेक्नोलौजी का इस्तेमाल करते हुए की जानी चाहिए. जरा सी भी चूक या नजरंदाजी से वह बच निकल सकता था.

टीम के एक्सपर्ट पुलिसकर्मियों ने आखिरकार मोबाइल लोकेशन के आधार पर मुनीर को 30 सितंबर, 2021 की रात को पकड़ ही लिया.

पकड़े जाने पर उस ने पहले तो अपनी पहचान छिपाने की हरसंभव कोशिश की, किंतु इस में वह सफल नहीं होने पर तुरंत रुपए ले कर छोड़ने का दबाव बनाया. इस में भी उसे सफलता नहीं मिली. अंतत: टीम उसे पकड़ कर पहली अक्तूबर को इंदौर के पुलिस हैडक्वार्टर ले आई.

इंदौर में एसआइटी के सामने सख्ती से पूछताछ में उस ने कई ऐसे राज खोले, जिसे सुन कर सभी को काफी हैरानी हुई. उस ने मानव तस्करी से ले कर लड़कियों को डरानेधमकाने, प्रताडि़त करने, यौन उत्पीड़न किए जाने, बांग्लादेश का बौर्डर पार करवाने, देह के बाजार के लिए बिकाऊ बनाने के वास्ते ट्रेनिंग देने और कानून को झांसा देने के लिए फरजी शादियां करने तक के कई खुलासे किए. उस के अनुसार जो तथ्य सामने आए वे इस प्रकार हैं.

मूलत: बांग्लादेश का रहने वाला विजयदत्त उर्फ मुनीरुल रशीद उर्फ मुनीर पिछले 5 सालों से मानव तस्करी के धंधे में था. बांग्लादेश के जासोर में उस का पुश्तैनी घर है. गर्ल्स स्मगलिंग में तो वह एक माहिर और मंझा हुआ खिलाड़ी था.

उस की नजर हमेशा बांग्लादेश के उन गरीब परिवारों पर टिकी रहती थी, जिन में लड़कियां होती थीं. उन की उम्र 16-17 के होते ही उन के परिवार वालों को भारत में काम दिलाने के बहाने अच्छी कमाई का लालच दे कर मना लेता था.

शक से बचने के लिए कई बार लड़कियों को वह दुलहन बना कर लाता था. इस के लिए बाकायदा निकाहनामा साथ रखता था, लड़की का पासपोर्ट और टूरिस्ट वीजा बनने में अड़चन नहीं आती थी, भारत में ला कर उन्हें लड़कियों की मांग के आधार पर मुंबई, आगरा, अहमदाबाद, सूरत, इंदौर, भोपाल, दिल्ली आदि में सप्लाई कर देता था.

वह भारत में रहते हुए भारत-बांग्लादेश के पोरस बौर्डर पर बने नाले या तार के बाड़ों से हो कर गुप्त रास्ते से पश्चिम बंगाल से सटे बांग्लादेश आताजाता रहता था. इस कारण अपने पसंद की लड़कियों को भी आसानी से बौर्डर पार करवा लेता था.

लड़कियों को एक दिन अपने पास के गांव में एजेंटों के यहां ठहरा देता था.  उन्हें वहां 15 दिनों तक छोटे कपड़े पहना कर रखा जाता और उन्हें हल्दी की उबटन भी लगाई जाती ताकि वे मौडर्न और खूबसूरत दिखें. फिर पश्चिम बंगाल में मुर्शिदाबाद ला कर उन्हें महाराष्ट्र और गुजरात में पहले से तैनात एजेंटों को 75 से एक लाख रुपए में बेच देता था.

कुंवारी लड़कियों की कीमत अधिक मिलती थी. कुछ लोग उन लड़कियों का नकली आधार कार्ड और दूसरे कागजात बनाने का काम भी करते थे. एजेंट उन्हें ग्राहकों के सामने पेश करने से पहले दुलहन की तरह सजाता था. हलका मेकअप करने और अच्छे ग्लैमरस कपड़ों में रईस ग्राहकों के पास भेज देता था.

हालांकि इस के लिए सभी लड़कियों को नौकरी के लिए इंटरव्यू का झांसा ही दिया जाता था. जो ऐसा करने से इनकार करती थी या भागने का प्रयास करती थी, उन्हें भूखाप्यासा कमरे में बंद रखा जाता था. बाद में उसे मजबूरन देहव्यापार के धंधे में उतरना पड़ता था.

इंदौर के विजय नगर में छापेमारी के दौरान पकड़ी गई 11 लड़कियों में एक लड़की ने पुलिस को अपनी आपबीती सुनाई थी. उस ने बताया था कि साल 2009 में वह 15 साल की थी. उस की मां का निधन हो गया था. तब वह नौवीं कक्षा में पढ़ रही थी. पिता पहले ही गुजर चुके थे.

मां की मौत के बाद वह एकदम से अनाथ हो गई थी. पढ़ाई बंद चुकी थी. पढ़ना चाहती थी. स्कूल की फीस भरने की चिंता में वह एक दिन पेड़ के नीचे बैठी रो रही थी.

तभी उस के पास एक युवती आई. उस से बोली कि बांग्लादेश में कुछ नहीं रखा है. यहां से अच्छा भारत है. वहां बहुत तरह के काम मिल जाते हैं. कंपनियों में अच्छी नौकरी मिल जाती है. कुछ नहीं हुआ तो मौल या बड़ेबड़े होटलों या अस्पतालों में काम मिल जाता है.

वहां चाहे तो पढ़ाई भी कर सकती है. वहां दूसरे देशों से आए लोगों के लिए सरकार ने कई शहरों में शेल्टर बना रखे हैं. दिल्ली में तो बांग्लादेशियों के रहने का एक बड़ा मोहल्ला तक बसा हुआ है. इसी के साथ युवती ने अपने बारे में बताया कि भारत अकसर आतीजाती रहती है. वहीं उस ने एक युवक से शादी कर ली है. वह भी बांग्लादेशी है. बिल्डिंग बनाने की ठेकेदारी का काम करता है. अच्छी आमदनी हो जाती है.

दूर बैठे एक युवक की तरफ इशारा करते उस ने लड़की को बताया कि वह उस का शौहर है. उस युवती ने लड़की को उस की भी अच्छी शादी हो जाने के सपने दिखाए. उस ने कहा कि भारत में रह रहे बांग्लादेश के कई अविवाहित युवक चाहते हैं कि वह अपने ही देश की लड़की से शादी करे.

वह लड़की न केवल पूरी तरह से उस युवती और युवक की बातों में आ गई, बल्कि वह उन के साथ भारत जाने को राजी भी हो गई. उसे अगले रोज सूरज निकलने से पहले इंडोबांग्ला बौर्डर तक पहुंचने के लिए कहा गया.

उस ने ऐसा ही किया, किंतु उसे बौर्डर तक पहुंचने में पूरी रात पैदल चलना पड़ा. वहीं युवकयुवती उस का इंतजार करते हुए मिल गए और उसे बौर्डर पार करवा दिया.

कुछ समय बाद ही लड़की उन के साथ मुर्शिदाबाद चली गई. वहीं उसे एक दूसरे आदमी के यहां ठहराया गया और एकदूसरे को मियांबीवी बताने वाले दंपति चले गए. दोनों फिर लड़की को कभी नहीं मिले.

लड़की को जिस व्यक्ति के पास ठहराया गया था, वहां अगले रोज एक दूसरा युवक आया. उस का परिचय मुनीर नाम के व्यक्ति से करवाया गया. उस के साथ लड़की का निकाह करवा दिया गया. लड़की को बताया गया कि इस से उस के भारत में रहने और ठहरने का प्रमाणपत्र बन जाएगा.

फिर मुनीर नवविवाहिता लड़की के साथ गुजरात के सूरत शहर चला आया. मुनीर ने लड़की को अपने साथ 2 दिनों तक एक किराए के कमरे में रखा. इस बीच मुनीर ने उसे छुआ तक नहीं. उसे सिर्फ इतना बताया गया कि दोनों को मुंबई जाना है.

तीसरे दिन मुनीर ने लड़की को एक व्यक्ति के हाथों बेच दिया. लड़की को कहा कि उसे उस के साथ जाना होगा, वहीं उस की नौकरी लग जाएगी. सूरत का कुछ जरूरी काम निपटा कर 2 दिन बाद वह भी आ जाएगा. लड़की को मुनीर भी दोबारा कभी नहीं मिला.

इस बात को मुनीर ने भी पूछताछ के दौरान स्वीकार कर लिया था. उस ने बताया कि तब उस का इस धंधे में रखा गया पहला कदम ही था, जिस में उसे सफलता मिलने के बाद उस का उत्साह बढ़ गया था.

मुनीर ने बताया कि वह इसी तरह करीब 200 लड़कियों से शादी कर चुका है, लेकिन उसे याद भी नहीं है कि वे लड़कियां इस समय कहां हैं. लड़कियों को ट्रैप करने और उन्हें बहलाफुसला कर अपने जाल में फंसाने के लिए वह तरहतरह के तरीके अपनाता था.

मोबाइल के सहारे वह सारा काम निपटाता था, लेकिन हर महीने 2 महीने पर नया सिम बदल लेता था. उस का टारगेट होता था कि हर महीने कम से कम 50 लड़कियों को बांग्लादेश से ट्रैप करे और उन्हें मानव तस्करी में शामिल एजेंटों के हाथों बेच डाले.

इसी के साथ उस ने स्वीकार कर लिया कि वह 200 से अधिक लड़कियों को जिस्मफरोशी में धकेल चुका है. देखते ही देखते वह पुलिस की निगाह में बांग्लादेशी लड़कियों का एक बडा तस्कर बन चुका था. छापेमारी के दौरान जब भी बांग्लादेशी लड़कियां गिरफ्तार होतीं, तब उस का नाम जरूर आता था.

मुनीर ने बताया कि उस ने इंदौर में अड्डा जमाने के लिए यहीं के लसूडि़या थानाक्षेत्र के रहने वाले एजेंट सैजल से संपर्क किया था. सैजल ने कुछ साल पहले ही मुंबई के दलाल जीवन बाबा की बेटी से शादी की थी.

इस के बाद वह इंदौर आ गया. फिर जीवन बाबा ने उसे लड़कियों की दलाली के काम में शामिल कर लिया.

मुनीर का एक बड़ा नेटवर्क था, जिस में ज्यादातर पुरुष थे, लेकिन उन में 20 फीसदी के करीब महिलाएं भी थीं. एजेंट महिलाएं बांग्लादेश में लड़कियों को फंसाने और बांग्लादेश के गांवों से बौर्डर तक पहुंचाने या फिर भारत में बौर्डर के पास के इलाके मुर्शिदाबाद तक लाने का ही काम करती थीं.

वे औरतें बौर्डर पर तैनात बीएसएफ के जवानों के लिए खानेपीने का सामान ला कर देती थीं. बदले में लड़कियों को बौर्डर पार करने की थोड़ी छूट मिल जाती थी.

एजेंटों द्वारा लड़कियों को मानव तस्करी के लिए जैसोर और सतखिरा से बांग्लादेश में गोजादंगा और हकीमपुर लाया जाता है. कारण वहां के बौर्डर पर कंटीले तारों के बाड़ नहीं लगे हैं. साथ ही वहां की अबादी भी घनी है. इस कारण रोजाना की जरूरतों के लिए भारत और बांग्लादेश में लोगों का आनाजाना लगा रहता है.

उसे बेनोपोल बौर्डर के नाम से जाना जाता है, दक्षिणपश्चिम के  इस हिस्से में खुली जमीन होने के कारण लोग बौर्डर को आसानी से पार लेते हैं. बौर्डर पर पकड़े जाने पर लोग 200 से 400 टका (बांग्लादेश की मुद्रा) दे कर आसानी से छूट जाते हैं.

मानव तस्करी के लिए बदनाम अन्य जिलों में कुरीग्राम, लालमोनिरहाट, नीलफामरी, पंचगढ़ी, ठाकुरगांव, दिनाजपुर, नौगांव, चपई नवाबगंज और राजशाही भी है.

पुलिस ने विजय दत्त उर्फ मुनीरुल रशीद उर्फ मुनीर से पूछताछ करने के बाद उसे कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया.

अतीक अहमद : खूंखार डौन की बेबसी – भाग 1

उत्तर प्रदेश के माफिया डौन अतीक अहमद की 300 करोड़ की 27 से अधिक संपत्तियों पर योगी सरकार ने बुलडोजर चलवा दिया है. जबकि अतीक अहमद इस समय गुजरात के अहमदाबाद की साबरमती जेल में बंद है.

यह माफिया डौन 5-5 बार उत्तर प्रदेश विधानसभा का इलाहाबाद पश्चिमी सीट से चुनाव जीत कर विधायक, तो एक बार इलाहाबाद की फूलपुर संसदीय सीट से सांसद रह चुका है. अतीक अहमद पर इस समय हत्या, अपहरण, वसूली, मारपीट सहित 188 मुकदमे दर्ज हैं. जून, 2019 से अतीक अहमद गुजरात के अहमदाबाद की साबरमती जेल में हाई सिक्युरिटी जोन में बंद है.

माफिया डौन अतीक अहमद का इतना आतंक है कि उत्तर प्रदेश की 4-4 जेलें उसे संभाल नहीं सकीं. इन जेलों के जेलरों ने स्वयं सरकार से कहा कि हम इस डौन को नहीं संभाल सकते.

इस का कारण यह था कि अतीक जब उत्तर प्रदेश के जिला देवरिया की जेल में बंद था, तब उस ने अपने गुंडों से लखनऊ के एक बिल्डर मोहित जायसवाल को जेल में बुला कर बहुत मारापीटा था और उस से उस की प्रौपर्टी के कागजों पर दस्तखत करा लिए थे.

अतीक अहमद ने अपना आतंक फैलाने के लिए इस मारपीट का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया था, जिस से लोगों में उस की दहशत बनी रहे. इस वीडियो को देखने के बाद राज्य में हड़कंप मचा तो अतीक अहमद को देवरिया की जेल से बरेली जेल भेजा गया. पर बरेली जेल के जेलर ने स्पष्ट कह दिया कि इस आदमी को वह नहीं संभाल सकते.

लोकसभा के चुनाव सामने थे. अतीक को कड़ी सुरक्षा में रखना जरूरी था. इसलिए इस के बाद उसे इलाहाबाद की नैनी जेल में शिफ्ट किया गया. उधर देवरिया जेल कांड का मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया. कोर्ट ने सीबीआई को मुकदमा दर्ज कर जांच के आदेश दिए.

सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर अतीक अहमद, उस के बेटे के अलावा 4 सहयोगियों सहित 10-12 अज्ञात लोगों के खिलाफ मामला दर्ज हुआ. जब अतीक के सारे कारनामों की जानकारी सुप्रीम कोर्ट को हुई तो सुप्रीम कोर्ट ने 23 अप्रैल, 2019 को यूपी सरकार को अतीक अहमद को राज्य के बाहर किसी अन्य राज्य की जेल में शिफ्ट करने का आदेश दिया.

सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर भेजा गुजरात

सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर 3 जून, 2019 को उत्तर प्रदेश सरकार ने गुजरात सरकार के नाम 3 लाख रुपए का ड्राफ्ट जमा करा कर अतीक को फ्लाइट से अहमदाबाद भेजा. फिलहाल वह गुजरात के अहमदाबाद की साबरमती जेल में बंद है.

यह 3 लाख रुपए का ड्राफ्ट अतीक अहमद को जेल में रखने का मात्र 3 महीने का खर्च था. उस के बाद हर 3 महीने पर अतीक अहमद को अहमदाबाद की जेल में रखने का खर्च उत्तर प्रदेश का कारागार विभाग गुजरात सरकार को भेजता है.

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पिछले 40 सालों में अतीक अहमद ने अपनी धाक राजनीतिक पहुंच के बल पर ऐसी बनाई है कि उस के सामने कोई आंख मिला कर बात करने का साहस नहीं कर सकता. 5 फुट 6 इंच की ऊंचाई और जबरदस्त शरीर वाले अतीक अहमद की आंखें ही इतनी खूंखार हैं कि किसी को उस के सामने देख कर बात करने का साहस ही नहीं होता.

अतीक अहमद के सामने जो भी सीना तान कर आया, उस की हत्या करा दी गई. उस पर 6 से अधिक हत्या के मामले चल रहे हैं. इस डौन के गैंग में 120 से भी अधिक शूटर हैं. पुलिस ने अतीक अहमद के गैंग का नाम आईएस (इंटर स्टेट) 227 रखा है. इस के गैंग का मुख्य कारोबार इलाहाबाद और आसपास के इलाके में फैला है. अतीक अहमद ने साबित कर दिया है कि पुलिस गुलाम है और सरकार के नेता वोट के लालच में कुछ भी कर सकते हैं. किसी भी डौन को नेता बना सकते हैं. अतीक अहमद की कहानी में मोड़ 1979 से आया.

10 अगस्त, 1962 को पैदा हुए अतीक अहमद के पिता इलाहाबाद में तांगा चलाते थे. इलाहाबाद के मोहल्ला चकिया के रहने वाले फारुक तांगे वाले के रूप में मशहूर पिता के संघर्ष को अतीक ने करीब से देखा था. हाईस्कूल में फेल हो जाने के बाद उस ने पढ़ाई छोड़ दी थी. 17 साल की उम्र में उस पर कत्ल का पहला इल्जाम लगा था. उस के बाद वह अपराध की दुनिया में कूद पड़ा.

यह तब की बात है, जब इलाहाबाद में नए कालेज बन रहे थे, उद्योग लग रहे थे. जिस की वजह से खूब ठेके बंट रहे थे. तभी कुछ नए लड़कों में अमीर बनने का ऐसा चस्का लगा कि वे अमीर बनने के लिए कुछ भी करने को तैयार थे. कुछ भी यानी हत्या, अपहरण और रंगदारी की वसूली.

अमीर बनने का चस्का अतीक को भी लग चुका था. 17 साल की उम्र में ही उस पर एक कत्ल का इल्जाम लग चुका था, जिस की वजह से लोगों में उस की दहशत बैठ गई थी. उस का भी धंधा चल निकला. वह ठेके लेने लगा, रंगदारी वसूली जाने लगी.

उस समय इलाहाबाद का डौन चांदबाबा था. पुराने शहर में उस का ऐसा खौफ था कि उस के सामने किसी की बोलने की हिम्मत नहीं होती थी. चौक और रानीमंडी के उस के इलाके में पुलिस भी जाने से डरती थी. कहा जाता है कि उस के इलाके में अगर कोई खाकी वर्दी वाला चला जाता था तो बिना पिटे नहीं आता था.

तब तक अतीक 20-22 साल का ठीकठाक गुंडा माना जाने लगा था. चांदबाबा का खौफ खत्म करने के लिए नेता और पुलिस एक खौफ को खत्म करने के लिए दूसरे खौफ को शह दे रहे थे. इसी का नतीजा था कि अतीक बड़े गुंडे के रूप में उभरने लगा. परिणाम यह निकला कि वह चांदबाबा से ज्यादा पुलिस के लिए खतरा बनता गया.

अतीक ने बना लिया अपना गैंग

अतीक अहमद ने इलाहाबाद में अपना गैंग बना लिया था. अपने इसी गैंग की मदद से वह इलाहाबाद के लिए ही नहीं, अगलबगल के कस्बों के लिए भी आतंक का पर्याय बन गया था. केवल गैंग बना लेना ही बहादुरी नहीं होती, गैंग का खर्च, उन के मुकदमों का खर्च, हथियार खरीदने के लिए पैसे आदि की भी व्यवस्था करनी होती है. इस के लिए अतीक गैंग की मदद से इलाहाबाद के व्यापारियों का अपहरण कर फिरौती तो वसूलता ही था, शहर में रंगदारी भी वसूली जाने लगी थी.

इस तरह अतीक अहमद पुलिस के लिए चांदबाबा से भी ज्यादा खतरनाक बन गया था. पुलिस उसे और उस के गैंग के लड़कों को गलीगली खोज रही थी.

आखिर एक दिन पुलिस बिना लिखापढ़ी के अतीक को उठा ले गई. उसे कहां ले जाया गया, कुछ पता नहीं था. यह सन 1986 की बात है.

उस समय राज्य में वीर बहादुर सिंह की सरकार थी तो केंद्र में राजीव गांधी की. अतीक को पुलिस कहां ले गई, इस की किसी को खबर नहीं थी. सभी को लगा कि अब उस का खेल खत्म हो चुका है.

काफी खोजबीन की गई. जब कहीं उस का कुछ पता नहीं चला तो इलाहाबाद के ही एक कांग्रेसी सांसद को सूचना दी गई. कहा जाता है कि वह सांसद राजीव गांधी के बहुत करीबी थे. उन्होंने राजीव गांधी से बात की. दिल्ली से लखनऊ फोन आया और लखनऊ से इलाहाबाद.

स्टेशन पर चलता था सेक्स रैकेट

अलंकृत कश्यप  

गोरखपुर पूर्वोत्तर रेलवे मंडल के मंडल सुरक्षा आयुक्त अमित कुमार मिश्रा के निर्देश पर मंडल के सभी रेलवे स्टेशनों एवं ट्रेनों में सघन जांच का अभियान चलाया जा रहा था. दरअसल, अमित कुमार मिश्रा को सूचना मिली थी कि कुछ ऐसे गैंग सक्रिय हैं, जो कम उम्र की लड़कियों को अपने जाल में फांस कर जिस्मफरोशी का धंधा कराते हैं. उन के निर्देश पर बादशाह नगर रेलवे सुरक्षा बल के एसआई वंशबहादुर यादव 25 सितंबर, 2019 की सुबह आनेजाने वाली ट्रेनों की जांच कर रहे थे. ट्रेनों की जांच करने के बाद उन की नजर प्लेटफार्म नंबर-1 पर बैठे बालकों पर पड़ी.

एक पेड़ के निकट रुक कर वह उन को निहारने लगे. वहां 2 किशोरों के साथ 2 किशोरियां थीं. उन्हें देख कर पहले उन्होंने सोचा कि शायद ये ट्रेन में भीख मांग कर गुजारा करने वाले खानाबदोश या बंगलादेशियों के बच्चे होंगे और सामान एकत्रित कर के अपने गंतव्य स्थान पर कुछ देर में चले जाएंगे, किंतु पेड़ की आड़ में छिप कर देखने के बाद उन्हें उन की गतिविधियां कुछ संदिग्ध लगीं.

तब उन के नजदीक जा कर उन्होंने उन से पूछा, ‘‘तुम लोग कौन हो? सुबहसुबह यहां प्लेटफार्म पर क्या कर रहे हो?’’

पुलिस वाले को अपने पास देख कर वे चारों सहम गए और सुबकने लगे. उन चारों को सुबकते देख एसआई वंशबहादुर यादव को मामला कुछ संदिग्ध लगा. उन्होंने सहानुभूति दिखाते हुए उन चारों को चाय पिला कर ढांढस बंधाते हुए पूछा, ‘‘आखिर बात क्या है, बताओ. तुम इस तरह रो क्यों रहे हो? कुछ तो बताओ, तभी तो मैं तुम्हारे लिए कुछ करूंगा.’’

कुछ देर खामोश रहने के बाद किशोरों के साथ बैठी दोनों किशोरियों ने अपनी आपबीती एसआई वंशबहादुर को सुनाई. उन्होंने बताया कि एक दिव्यांग व्यक्ति ने उन्हें अपने कब्जे में कर रखा था और वह उन से जिस्मफरोशी का धंधा कराता था. किसी तरह वे उस के चंगुल से निकल कर आई हैं.

उन की व्यथा सुन कर एसआई आश्चर्य में पड़ गए. उन का दिल करुणा से भर आया. उन दोनों किशोरियों ने अपने नाम गुंजा व मंजुला खातून और किशोरों ने विजय व आनंद बताए. किशोरियों ने बताया कि यहां से वे वैशाली एक्सप्रैस से अपनी रिश्तेदारी में बहराईच जाने के लिए प्लेटफार्म पर बैठी हुई ट्रेन का इंतजार कर रही थीं.

एसआई वंशबहादुर यादव ने उन की व्यथा सुनने के बाद यह जानकारी ऐशबाद रेलवे स्टेशन पर स्थित आरपीएफ के थानाप्रभारी एम.के. खान को फोन द्वरा दे दी.

चूंकि मामला गंभीर था इसलिए उस दिव्यांग व्यक्ति को तलाशने के लिए उन्होंने सिपाही उमाकांत दुबे, धर्मेंद्र चौरसिया, महिला सिपाही अंजनी सिंह व अर्चना सिंह को एसआई वंशबहादुर के पास भेज दिया. इस के बाद वंशबहादुर पुलिस टीम के साथ उस दिव्यांग की तलाश में मुंशी पुलिया के पास उस के अड्डे पर गए, लेकिन वह वहां नहीं मिला.

उन किशोरियों ने बताया था कि वह दिव्यांग व्यक्ति उन दोनों को ही ढूंढ रहा होगा. वह उन्हें ढूंढता हुआ बादशाह नगर प्लेटफार्म तक जरूर आएगा. इस के बाद पुलिस टीम इधरउधर छिप कर उस के आने का इंतजार करने लगी. कुछ देर बाद करीब 11 बजे के वक्त वह दिव्यांग व्यक्ति बादशाह नगर रेलवे स्टेशन पर आता हुआ दिखाई दिया. किशोरियों ने उसे पहचान लिया.

उन्होंने बताया कि वह करीब एक साल से इसी व्यक्ति के चंगुल में थीं. पुलिस टीम ने उस दिव्यांग को हिरासत में ले लिया और उसे बादशाह नगर रेलवे पुलिस चौकी ले आए.

पुलिस ने उस से पूछताछ की तो उस ने उन दोनों किशोरियों एवं किशोरों को पहचानते हुए यह स्वीकार किया कि इन लड़कियों से अनैतिक कार्य और किशोरों से भीख मांगने का धंधा कराता था. रेलवे पुलिस को यह भी पता चला कि मुंशी पुलिया के निकट यह दिव्यांग व्यक्ति पुलिस चौकी के पीछे झोपड़ी में रहता था. उस ने अपना नाम विजय बद्री उर्फ बंगाली बताया. वह पश्चिमी बंगाल का निवासी था.

आरोपी की गिरफ्तारी की सूचना पर रेलवे सुरक्षा बल ऐशबाद के थानाप्रभारी एम.के. खान भी बादशाह नगर रेलवे पुलिस चौकी पर पहुंच गए.

चूंकि मामला सिविल पुलिस का था, इसलिए थानाप्रभारी के निर्देश पर एसआई वंशबहादुर मेमो डिटेल बना कर उन दोनों किशोरों विजय व आनंद और दोनों किशोरियों गुंजा और मंजुला खातून को साथ ले कर थाना गाजीपुर पहुंचे.

उन्होंने गाजीपुर थानाप्रभारी राजदेव मिश्रा को पूरी बात बताई तो उन्होंने विजय बद्री के खिलाफ भादंवि की धारा 365, 370, 370ए के अंतर्गत 25 सितंबर, 2019 को मुकदमा दर्ज कर लिया.

गाजीपुर थाने में मुकदमा दर्ज हाने के बाद थानाप्रभारी ने उक्त प्रकरण की जांच विकास नगर पुलिस चौकी के इंचार्ज एसआई दुर्गाप्रसाद यादव को सौंप दी. जांच मिलते ही दुर्गाप्रसाद ने आरोपी दिव्यांग विजय बद्री से पूछताछ की तो उस ने अन्य आरोपियों सुमेर व शमीम के नाम भी बताए. पुलिस ने अन्य आरोपियों की खोजबीन शुरू कर दी.

एसआई दुर्गाप्रसाद यादव ने दोनों किशोरियों से पूछताछ की तो पता चला कि उन में से एक असम व एक बिहार की रहने वाली थी. उन के पिता लखनऊ शहर आ कर रिक्शा चलाते थे. उन के घर की हालत खस्ता थी. किसी तरह से केवल पेट भरने लायक रोटी मिल पाती थी.

मंजुला खातून विकासनगर के पास स्थित गांव चांदन में अपने पिता के साथ रहती थी. वहीं से वह कामधंधे की तलाश में निकली तो वह मुंशी पुलिया के पास झुग्गी में रहने वाले दिव्यांग विजय बद्री के संपर्क में आई. कुछ दिनों तक बद्री ने मंजुला की काफी मेहमाननवाजी की.

विजय बद्री के पास कुछ औरतें आती थीं. उस ने मंजुला को उन औरतों से मिलवाया. उन महिलाओं ने मंजुला को गोमतीनगर, इंदिरानगर और विकास नगर की पौश कालोनियों में भीख मांगने के काम पर लगा दिया.

इसी बीच गुंजा भी विजय बद्री के संपर्क में आ गई. गुंजा को भी उस ने मंजुला के साथ भीख मांगने के काम पर लगा दिया. बाद में उन दोनों को बादशाह नगर चौराहे व रेलवे स्टेशन के आसपास भेजा जाने लगा. वे ट्रेन में भी भीख मांगने लगीं. अधिकांशत: गुंजा व मंजुला खातून बादशाह नगर स्टेशन से ट्रेन में सवार हो कर काफी दूर तक भीख मांगने निकल जाया करती थीं.

शाम को वह अपने अड्डे पर जब वापस नहीं पहुंचतीं तो विजय बद्री खुद उन की तलाश में निकल पड़ता था. धीरेधीरे उस के यहां काम करने के दौरान गुडंबा निवासी विजय व आनंद से उन का संपर्क हुआ. ये दोनों किशोर भी भीख मांगने का धंधा किया करते थे. ये चारों दिन भर में लगभग एकएक हजार रुपए कमा कर लाते थे. विजय बद्री इस काम के लिए उन्हें रोजाना 200 रुपए दिया करता था.

गुंजा व मंजुला दोनों किशोरियों ने जांच के दौरान पुलिस को बताया कि विजय बद्री ने मुंशी पुलिया पुलिस चौकी के पीछे गोल्फ चौराहे पर ठहरने का अड्डा बना रखा था. जांच में पता चला कि विजय बद्री पश्चिमी बंगाल से आ कर उत्तर प्रदेश में बस गया था.

वह कई दशक पहले प्रयागराज में चोरीछिपे अनैतिक काम करता था. किंतु पुलिस के बढ़ते दबाव के कारण उस ने वहां से लखनऊ आ कर शरण ली थी. तब से वह खुद को उत्तर प्रदेश का मूल निवासी बताने लगा था.

लखनऊ में इस ने ठहरने के कई अड्डे बना रखे थे. पुलिस की सख्ती होने पर वह जगह बदलबदल कर गैरकानूनी गतिविधियां संचालित करता था. इन दोनों किशोरियों के द्वारा भीख मांगने को इनकार करने पर वह इन से जिस्मफरोशी का धंधा करने को मजबूर करता था.

पुलिस को पता चला कि विजय बद्री के चंगुल में एक दरजन से अधिक नाबालिग बच्चे थे, जो इस के बताए हुए अलगअलग जगहों पर भीख मांगने का धंधा किया करते थे.

इस से पहले गाजीपुर थानाप्रभारी राजदेव मिश्रा ने एक शिकायत के आधार पर विजय बद्री को 26 जुलाई, 2019 को गाजीपुर थाना क्षेत्र से पकड़ा था किंतु जमानत पर रिहा हो कर वह फिर से अपराध में मशगूल हो गया था.

पता चला कि वह युवतियों को बुरी तरह प्रताडि़त भी करता था और भीख मांगने के लिए विवश करने के लिए वह उन्हें भूखा रखता था तथा सिगरेट आदि से जलाता था.

अपने गैंग में शामिल करने के लिए वह बच्चों को खोजता रहता था. बच्चे खोजने के लिए वह खुद भी भीख मांगतेमांगते असम और बिहार तक चला जाता था. वहां कुछ दिन रुक कर कुछ सस्ते दामों में भोलीभाली गरीब बच्चियों को अपने अड्डे पर ले आता था.

वह किशोरियों से भीख ही नहीं मंगवाता था बल्कि उन से जिस्मफरोशी का धंधा भी करवाता था. वह उन्हें होटलों में भेजता था. इस से उसे अच्छी कमाई हो जाती थी. बताया जाता है कि उस के पास 30 किशोरियां थीं.

विजय बद्री के गैंग में जो भी लड़कियां आती थीं, सब से पहले वह उन्हें नशे की लत लगाता था. वह उन्हें अफीम, गांजा, भांग व दारू के नशे की आदत डालता था. जब वे नशे की आदी हो जाती थीं तो वह उन्हें जिस्मफरोशी के दलदल में ढकेल देता था.

मना करने पर रात को बेहोशी में सोने के दौरान नशे के इंजेक्शन दे कर उन्हें नशेड़ी बनाता. इतना ही नहीं ब्लेड से उन किशोरियों के शरीर पर गहरा चीरा लगा कर खून निकालता फिर उस खून से पट्टियां भिगो कर अपने कटे हुए दिव्यांग अंगों पर बांध लेता जिस से लोगों को लगे कि उस के जख्मों से खून निकल रहा है. इस से उसे भीख में ज्यादा पैसे मिलते थे.

विजय बद्री दाहिने पैर से विकलांग था. उस का घुटनों से ऊपर पैर कटा हुआ था और सुबह को यह खून से भीगी पट्टी पैर के कटे हुए भाग पर बांध कर नाटक बनाने के बाद भीख मांगने के लिए खुद भी ट्रेन में निकल जाता था.

भीख मांगते समय बद्री मौका मिलते ही यात्रियों का मोबाइल आदि भी चोरी कर लिया करता था. वह विकलांग जरूर था लेकिन दिमाग से बहुत शातिर था.

गुंजा व मंजुला ने बताया कि उन्होंने कई बार मुंशी पुलिया पुलिस चौकी पर जा कर मदद की गुहार लगाई थी, किंतु पुलिस ने उन्हें हर बार डपट कर भगा दिया था. विजय बद्री ने पुलिस को बताया कि नाबालिग किशोरियां जल्दी बड़ी दिखने लगें, इस के लिए वह उन्हें रात में हारमोंस के इंजेक्शन लगाता था.

गाजीपुर पुलिस के द्वारा विजय बद्री द्वारा बताए स्थानों की सघन तलाशी कराई गई तो पुलिस को पता चला कि आरोपी विजय बद्री तो गैंग का एक मामूली मोहरा था. उस के पीछे जिस्मफरोशी का रैकेट चलाने वाले सफेदपोश लोगों का हाथ था.

गैंग को संचालित करने वाले 3 लोगों के नाम सामने आए, जिस में एक शर्मीला नाम की औरत बताई जाती है. उस महिला ने पुलिस को बताया कि वह केवल विजय बद्री के यहां रोटीपानी के लिए काम करती थी. ये सफेदपोश लोग बाहर से युवतियां खरीद कर विजय बद्री के हाथ अड्डे पर बेच जाया करते थे. उस के बदले उन्हें बद्री मोटी रकम दिया करता था.

गाजीपुर पुलिस को छानबीन में पता चला कि विजय बद्री उर्फ बंगाली ने अब तक अपने जीवन में 30 लड़कियों को जिस्मफरोशी के  लिए चारबाग रेलवे स्टेशन के बाहर 10 हजार से ले कर 40 हजार रुपए तक में बेचा था.

इस काले धंधे को पूर्ण अंजाम तक पहुंचाने के लिए सीतापुर रोड के कल्याणपुर निवासी सुमेर नाम के व्यक्ति का पूरा सहयोग रहता था. गाजीपुर पुलिस ने सुमेर को पकड़ कर 18 सितंबर, 2019 को जेल भेजा था. सुमेर ने पुलिस की गिरफ्त में आने के बाद शमीम नामक व्यक्ति के संपर्क में आ कर इस मानव तस्करी में लिप्त रहने की बात कबूली थी.

सुमेर व विजय बद्री को न्यायालय में पेश किया गया जहां से दोनों को जेल भेज दिया गया. वहीं दोनों युवतियां गुंजा व मंजुला खातून को मोहान रोड स्थित महिला सुधार गृह और दोनों बालकों को बाल सुधार गृह में दाखिल करा दिया गया.

5 अक्तूबर, 2019 को जांच पूरी करने के बाद थानाप्रभारी राजदेव मिश्रा आरोपियों के खिलाफ शीघ्र ही आरोप पत्र दाखिल करने की तैयारी में थे.

—कथा में कुछ नाम काल्पनिक हैं. कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

सौजन्य- सत्यकथा, नवंबर 2019

 

क्या मिला प्रियंका तनेजा को हनीप्रीत बनकर

प्रियंका तनेजा को भले ही कम लोग जानते हैं, लेकिन हनीप्रीत की चर्चा आज घरघर में हो रही है. हनीप्रीत का नाम लेते ही मेकअप से लकदक जो लुभावना चेहरा आंखों के सामने आता है, वह दुष्कर्म के जुर्म में 20 साल की सजा पाए कथित संत गुरमीत राम रहीम द्वारा बनाई गई फिल्मों की नायिका ही नहीं, उन की सहनिर्देशक एवं सहनिर्मात्री भी थी. लेकिन सब के बीच बाबा गुरमीत राम रहीम उसे अपनी दत्तक पुत्री कहते थे.

बाबा के जेल जाते ही हनीप्रीत अचानक गायब हो गई. कई राज्यों की पुलिस उस की तलाश में मारीमारी फिरती रही, पर उस के बारे में पता नहीं कर सकी. उस के नेपाल में होने की आशंका पर वहां भी उस की तलाश की गई, लेकिन उस का कुछ पता नहीं चला.

उसी बीच वकील प्रदीप कुमार आर्य ने हनीप्रीत की ओर से दिल्ली हाईकोर्ट में 25 सितंबर, 2017 को एक याचिका दाखिल की, जिस में हनीप्रीत 3 सप्ताह की अंतरिम ट्रांजिट जमानत मांग रही थी. इस याचिका में उस ने कहा था कि उस की जान को खतरा है. इस याचिका में उसे अदालत में पेश न होने की अनुमति मिल गई थी.

26 सितंबर की सुबह साढ़े 10 बजे वकील प्रदीप कुमार आर्य ने कार्यवाहक चीफ जस्टिस गीता मित्तल के सम्मुख पेश हो कर कहा था कि उन की मुवक्किल हनीप्रीत को जान का खतरा है, इसलिए उन्हें 3 सप्ताह के लिए अंतरिम ट्रांजिट जमानत दी जाए.

अदालत द्वारा जब पूछा गया कि हनीप्रीत को किस से जान का खतरा है तो वकील प्रदीप कुमार आर्य ने बताया, ‘‘ड्रग माफिया से. वे हनीप्रीत को ढूंढ रहे हैं और मिलते ही उसे नुकसान पहुंचा सकते हैं.’’

‘‘पर पूरा देश तो यह जानना चाहता है कि हनीप्रीत कहां है? सिंगल बेंच आप के मामले की सुनवाई करेगा. सब को नोटिस भेजे जा चुके हैं.’’ यह कहते हुए जस्टिस गीता मित्तल ने वकील प्रदीप कुमार आर्य को फारिग कर दिया.

दोपहर बाद पौने 3 बजे जस्टिस संगीता ढींगरा सहगल की अदालत में इस मामले की सुनवाई शुरू हुई. दिल्ली पुलिस की ओर से स्टैंडिंग काउंसिल राहुल मेहरा, एपीपी अनिल अहलावत, वकील जैमल अख्तर तथा हरियाणा सरकार की ओर से एएजी अनिल ग्रोवर, वकील नूपुर सिंघल के साथ पेश हुए.

वकील प्रदीप कुमार आर्य के साथ उन के आधा दरजन से ज्यादा सहयोगी वकील भास्कर भारद्वाज,राजकरन शर्मा, कपिल ढाका, राणा कुनाल, अमरेश आनंद, अश्विन कालरा और के.के. छाबड़ा आए थे.

बहस शुरू होते ही वकील प्रदीप कुमार आर्य ने अदालत के सामने दलील रखी कि हनीप्रीत के खिलाफ कोई सबूत नहीं है, सिर्फ बयानों से कोई अपराधी नहीं बन जाता. वह एक शांतिप्रिय और कानून को मानने वाली नागरिक है. ड्रग माफिया से उसे पहले से ही खतरा था और अब उस पर ये आरोप लगा दिए गए हैं.

इस के जवाब में राहुल मेहरा ने कहा, ‘‘किसी भी आरोपी की मदद करना ठीक नहीं है. हनीप्रीत तो कहती है कि उस के पिता भगवान हैं, फिर उसे खतरा किस बात का है?’’

अनिल ग्रोवर का कहना था कि हनीप्रीत को सिर्फ अपनी गिरफ्तारी का खतरा है, बाकी उसे किसी से कोई खतरा नहीं है. उस पर पंचकूला में हिंसा करवाने का गंभीर आरोप है, इसीलिए पुलिस उस की तलाश कर रही है.

दोनों तरफ की दलीलें सुन कर जस्टिस संगीता ढींगरा सहगल ने कहा कि जमानत देने के बाद भी हनीप्रीत को पंजाब अथवा हरियाणा की कोर्ट में जाना पड़ेगा. इसलिए वह सीधे वहीं क्यों नहीं जाती. जाने में 4 घंटे तो ही लगेंगे. आत्मसमर्पण ही उस के लिए सब से आसान रास्ता है.

कोर्ट ने हनीप्रीत की जमानत याचिका पर कोई फैसला सुनाने के बजाय उसे रिजर्व कर लिया. हनीप्रीत का क्या हुआ, यह जानने से पहले आइए थोड़ा उस के बारे में जान लेते हैं.

कौन है हनीप्रीत हनीप्रीत का असली नाम प्रियंका तनेजा उर्फ अनु था. सन 1975 में वह रामानंद तनेजा के घर पैदा हुई थी. हरियाणा के नगर फतेहाबाद के जगजीवनपुरा के रहने वाले रामानंद का नैशनल हाइवे पर किसान टायर्स नाम से शोरूम था.

रामानंद के पिता यानी प्रियंका के दादाजी सिरसा स्थित डेरा सच्चा सौदा के प्रबल अनुयायी थे और नियमित वहां जाते थे. धीरेधीरे इस परिवार के सभी लोग डेरा से जुड़ गए. हनीप्रीत भी घर वालों के साथ डेरे पर जाती थी.

जल्दी ही प्रियंका डेरा प्रमुख गुरमीत राम रहीम इंसां की करीबी बन गई. बाबा उसे पसंद करते थे, इसलिए उसे खुश करने की कोशिश करते रहते थे. उसी बीच बाबा ने उसे अपनी दत्तक पुत्री घोषित कर के उस का नया नाम रखा हनीप्रीत इंसां.

सन 1999 में बाबा ने डेरा के ही एक अनुयायी के बेटे विश्वास गुप्ता से हनीप्रीत की शादी करा दी. बाबा जहां हनीप्रीत को अपनी दत्तक पुत्री कहते थे, वहीं विश्वास गुप्ता को बेटा कहते थे. जबकि विश्वास गुप्ता का कहना है कि उस के साथ बहुत बड़ा धोखा हुआ था. कहने को हनीप्रीत उस की ब्याहता थी, लेकिन उस के बाबा गुरमीत राम रहीम से संबंध थे.

विश्वास गुप्ता के अनुसार, बाबा ने एक दिन कहा कि डेरे के खास लोगों के साथ वह ‘बिग बौस’ खेलेंगे. उस में बाबा के परिवार के भी लोग शामिल थे. हनीप्रीत और विश्वास गुप्ता खास लोगों में थे, इसलिए उन्हें भी शामिल किया गया था. खेल की शर्तों में था कि खेल में जिस से भी कोई गलती होगी, उसे बाबा की गुफा में बैठ कर उन के नाम का जाप करना होगा.

विश्वास गुप्ता का कहना है कि हनीप्रीत जानबूझ कर गलती करती और नियम के अनुसार बाबा की गुफा में चली जाती, जहां से एक रास्ता बाबा के बैडरूम तक जाता था. इस तरह वह जानबूझ कर गलतियां कर रही थी, जिस की वजह से उसे घंटों गुफा में रहना पड़ता था.

जब हनीप्रीत हो गई बाबा गुरमीत राम रहीम की विश्वास गुप्ता के बताए अनुसार, उसे हनीप्रीत की इन हरकतों से लगा कि कहीं बाबा और उस के बीच कोई खिचड़ी तो नहीं पक रही है. लेकिन उस समय वह किसी से कुछ कहने की स्थिति में नहीं था. क्योंकि उस ने अपनी आंखों से कुछ गलत देखा भी नहीं था, इसलिए कुछ कहना उचित भी नहीं था. उस ने मन ही मन तय कर लिया कि जब तक वह अपनी आंखों से ऐसा कुछ देख नहीं लेता, तब तक वह किसी से कुछ नहीं कहेगा.

विश्वास गुप्ता के अनुसार, डेरे में खेले गए बिग बौस का शो समाप्त होतेहोते हनीप्रीत पूरी तरह बाबा गुरमीत राम रहीम की हो गई थी. कहने को सोती वह उस के साथ थी, लेकिन रात में गुप्त दरवाजे से निकल कर वह बाबा के पास पहुंच जाती थी. पूरी रात बाबा के पास बिता कर वह सुबह उस के पास आ जाती थी.

न चाहते हुए भी विश्वास गुप्ता ने एक दिन इस बारे में हनीप्रीत से पूछ लिया तो उस ने तुनक कर जवाब दिया कि पिताजी की तबीयत ठीक नहीं रहती, इसलिए वह उन की सेवा के लिए जाती है. इस के बाद उस ने उसे धमकी दी कि अगर उस ने उस पर इस तरह बेवजह शक किया तो वह पिताजी से यह बात बता देगी. उस के बाद वह उसे जान से मरवा देंगे.

बाबा गुरमीत राम रहीम सिंह इंसां के कहने पर विश्वास गुप्ता डेरे पर ही रहने लगा था. बाबा हनीप्रीत को बेटी कहता था, इसलिए विश्वास गुप्ता को दामाद कहता था. उसे डेरे में कहीं भी घूमनेफिरने की पूरी आजादी थी. यहां तक कि वह बाबा की गुफा में भी बिना अनुमति के आजा सकता था. इस से उसे बाबा की कई करतूतों की जानकारी हो गई थी. बाबा ने अपने बैडरूम के बगल वाले कमरे को विश्वास गुप्ता का बैडरूम बनवा दिया था.

इन दोनों कमरों के बीच एक गुप्त दरवाजा था, जिस से रात में हनीप्रीत बाबा के बैडरूम में चली जाती थी. विश्वास गुप्ता अपने बैडरूम में करवटें बदलते हुए रात बिताता था. दूसरी ओर उस की ब्याहता बाबा के साथ मौजमस्ती कर रही होती. एक रात विश्वास गुप्ता हिम्मत कर के बाबा के बैडरूम में चला गया तो दोनों को आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया.

बस, उसी दिन के बाद विश्वास गुप्ता के बुरे दिन शुरू हो गए. उस से साफ कह दिया गया कि जैसा चल रहा है, आगे भी वैसा ही चलता रहेगा. आंखें मूंद कर उसे चुपचाप यह सब सहन करना होगा. अगर उस ने इस बारे में किसी से कुछ कहा या विरोध जताने की कोशिश की तो यह उस के लिए ठीक नहीं होगा. उसे गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं.

विश्वास गुप्ता हनीप्रीत का पति था. पत्नी की हरकतें उस के लिए बरदाश्त से बाहर थीं. न चाहते हुए भी हलकाफुलका ही सही, हनीप्रीत और बाबा के संबंधों पर वह अंगुली उठाने लगा. फिर क्या था, उसे परेशानियों ने घेरना शुरू कर दिया. उसे जान का खतरा भी महसूस होने लगा. ऐसे में उसे हनीप्रीत से भी ज्यादा परिवार की चिंता सताने लगी.

उस के पिता का अच्छाखासा चलता कारोबार था, जिसे बाबा ने बिकवा कर करोड़ों की सारी रकम अपने डेरे में निवेश करवा दी थी. उस के बाद उस के घर वाले घरबार बेच कर डेरा सच्चा सौदा में ही रहने लगे थे.

डेरे की बदली स्थिति देख कर विश्वास गुप्ता हनीप्रीत को वहीं छोड़ कर किसी तरह अपने मांबाप के साथ डेरे से निकलने में कामयाब हो गया. पंचकूला में किराए का मकान ले कर एक बार फिर व्यवस्थित होने की कोशिश करने लगा. भले ही वह पंचकूला आ गया था, लेकिन हनीप्रीत ने उस का पीछा नहीं छोड़ा.

हनीप्रीत ने विश्वास गुप्ता के खिलाफ ही नहीं, उस के पूरे परिवार के खिलाफ दहेज उत्पीड़न और घरेलू हिंसा के अलावा डेरे की ओर से डीफेमेशन व चैक बाउंस के मुकदमे दर्ज करवा दिए गए.

विश्वास गुप्ता द्वारा बताए अनुसार, इन मुकदमों में जब वह विचाराधीन कैदी के रूप में पटियाला की सैंट्रल जेल में बंद था तो बाबा गुरमीत राम रहीम ने 10 लाख रुपए की सुपारी दे कर उसे जेल में मरवाने की कोशिश की थी. लेकिन पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या के आरोप में जेल में बंद बलवंत सिंह राजोआना ने उसे बचा लिया था.

विश्वास गुप्ता उस से अकसर बातें किया करता था. उसे विश्वास के बारे में सारी जानकारी थी. उसे पता था कि बाबा गुरमीत राम रहीम ने उस की पत्नी को हथिया कर उसे झूठे आरोपों में फंसा कर जेल भिजवा दिया है. जेल में अपराधी गिरोहों को 10 लाख रुपए की सुपारी दे कर उस की हत्या की कोशिश चल रही है. इसलिए यह बात उस ने जेलर को तो बता ही दी थी. यही नहीं, उस ने विश्वास गुप्ता की जान भी बचाई. बाबा के 10 लाख रुपए भी वापस भिजवा दिए गए थे.

हनीप्रीत ने बरबाद कर दिया ससुराल वालों को विश्वास गुप्ता ने जो बताया, उस के अनुसार, इस के बाद भी हनीप्रीत और बाबा गुरमीत राम रहीम ने ऐसेऐसे हथकंडे अपनाए कि वह परिवार के साथ बुरी तरह टूट गया. बाबा उन की करोड़ों की संपत्ति तो डकार ही गया था, झूठे मुकदमे दर्ज करवा कर सभी को खूब प्रताडि़त भी करवाया. विश्वास गुप्ता ने पत्नी हनीप्रीत को कभी कुछ नहीं कहा था, इस के बावजूद उस ने उस के परिवार को तरहतरह की धमकियां दे कर खूब परेशान किया.

डेरे के कोप से बचने के लिए विश्वास गुप्ता के सामने 2 शर्तें रखी गईं. पहली शर्त यह थी कि सत्संग के वक्त वह अपने परिवार को ले कर डेरे में आएगा और वह और उस के पिता डेरे के लाखों श्रद्धालुओं के सामने रोते हुए बाबा गुरमीत राम रहीम से माफी मांगेंगे. दूसरी शर्त यह थी कि वह हनीप्रीत से तलाक ले लेगा. यह सन 2009 की बात है.

विश्वास गुप्ता ने बाबा की ये दोनों ही शर्तें मानते हुए परिवार के साथ डेरे में जा कर बाबा से माफी भी मांगी और हनीप्रीत को तलाक भी दे दिया. इस के बाद उसे और उस के परिवार को डेरे की ओर कभी न देखने की चेतावनी दे कर भगा दिया गया था.

इस के बाद हनीप्रीत और उस का परिवार डेरे में ही रहने लगा था. उस के पिता रामानंद ने बेटे साहिल के साथ मिल कर सीड्स प्लांट का कारोबार शुरू कर दिया. हनीप्रीत की छोटी बहन निशा की शादी फतेहाबाद निवासी संजू बजाज से हुई तो डेरे की ओर से इस शादी में उम्मीद से बढ़ कर मदद की गई.

कहते हैं, धीरेधीरे हनीप्रीत इस तरह बाबा की चहेती बन गई कि डेरा में बाबा के बाद उसी का हुक्म चलता था. बाबा के परिवार में भी अगर किसी को किसी चीज की जरूरत होती थी तो वह बिना हनीप्रीत की अनुमति के नहीं मिलती थी. पैसों तक के लिए उन्हें हनीप्रीत के सामने हाथ फैलाने पड़ते थे.

बाबा गुरमीत राम रहीम जहां अपने घर वालों से भी कम मिलते थे, वहीं हनीप्रीत हमेशा उन के साथ रहती थी. बाबा जब फिल्में बनाने लगे तो हनीप्रीत को उन फिल्मों की नायिका बनाने के साथसाथ उन की सहनिर्देशक और सहनिर्मात्री भी बनाया गया.

कैटरीना कैफ बनने के सपने देख रही थी हनीप्रीत कहा जाता है कि हनीप्रीत खुद को परदे पर अभिनय करते हुए देखने को बेताब थी. वह कैटरीना कैफ बनने के सपने देख रही थी. उस की इसी इच्छा पूरी करने के लिए बाबा ने फिल्में बनाई थीं. कहते हैं, हनीप्रीत ने ही बाबा के मन में यह बात बैठा दी थी कि वह इतना बढि़या अभिनय करते हैं कि बड़ेबड़े फिल्मी सितारे उन के सामने बेकार हैं. इसी के बाद करोड़ों रुपए खर्च कर के बाबा फिल्में बनाने लगे थे.

बाबा अकसर हनीप्रीत को साथ ले कर मुंबई जाते थे,जहां दोनों ने कई फिल्मी सितारों से अच्छे रिश्ते बना लिए थे. उन के हिसाब से सब बहुत बढि़या चल रहा था. धार्मिक डेरे के नाम पर उन्होंने अपना ऐसा साम्राज्य स्थापित कर लिया था, जहां राजाओंमहाराजाओं जैसी सुखसुविधाएं उपलब्ध थीं. उन्हें लगता था कि जल्दी फिल्म इंडस्ट्री में भी उन की तूती बोलने लगेगी.

हनीप्रीत नायिका के रूप में सलमान खान के साथ एक ऐसी फिल्म में आना चाहती थी, जो तमाम भव्यता से बनाई जाए. उसे अपना यह सपना जल्दी पूरा होता भी नजर आ रहा था. क्योंकि इस फिल्म में बाबा गुरमीत राम रहीम को ही पैसा लगाना था, जो अकूत संपत्ति के मालिक तो थे ही, वह फिल्म पर पैसा लगाने को भी तैयार थे.

लेकिन एक बात यह भी सच है कि इंसान जैसे कर्म करता है, उसे वैसे ही फल भी भोगने पड़ते हैं. अपने बारे में ये लोग कुछ भी कहते रहे, पर सच्चाई यह थी कि इन के बुरे दिन शुरू हो गए थे. लोग कहने भी लगे थे कि बाबा गुरमीत राम रहीम ने जिंदगी में जो बुरे कर्म किए हैं, अब उन्हें उन का परिणाम भुगतने के लिए तैयार हो जाना चाहिए.

ऐसा ही हुआ भी. बाबा के खिलाफ चल रहे कई आपराधिक मामलों में डेरे की 2 साध्वियों से दुष्कर्म वाला मामला अंतिम चरण में था. 25 अगस्त, 2017 को 100 से ज्यादा गाडि़यों के काफिले के साथ बाबा पंचकूला पहुंचे तो हनीप्रीत भी उन के साथ थी. बाबा को अदालत द्वारा दोषी करार दिए जाने के बाद पंचकूला में दंगे भड़क उठे. इस बीच बाबा को एक हेलीकौप्टर में बिठा कर रोहतक की सुनारिया जेल ले जाया गया तो हनीप्रीत भी उन के साथ हेलीकौप्टर से गई थी.

रात में वह सफेद रंग की कार नंबर एचआर 26बीएस 5426 पर कुछ लोगों के साथ सवार हो कर सिरसा के लिए चल पड़ी थी. यहां तक अधिकांश लोगों को उस के बारे में यही जानकारी थी कि वह बाबा गुरमीत राम रहीम की मुंहबोली बेटी थी और अदालत से अनुमति ले कर अपने कथित पिताजी के साथ उन्हें जेल तक छोड़ने गई थी.

लेकिन इस के बाद हनीप्रीत का नाम रोज ही चर्चा में आने लगा. इस की वजह यह थी कि सिरसा स्थित डेरे पर पहुंचने के बाद वह गायब हो गई थी. दरअसल, बाबा की गिरफ्तारी के बाद पंचकूला में भड़के दंगों के आरोप में मुकदमे दर्ज कर के पुलिस ने गिरफ्तार किए गए लोगों से पूछताछ की तो पता चला कि इन दंगों के पीछे डेरे के कुछ प्रमुख लोगों के अलावा मुख्यरूप से हनीप्रीत का हाथ था.

लिहाजा पुलिस की वांछित सूची में हनीप्रीत का नाम सब से ऊपर था. इस मामले की तह में जाने के लिए पुलिस की एसआईटी का गठन किया गया. 21 सितंबर को इस टीम के कुछ सदस्यों ने सिरसा जा कर डेरे पर छापा मार कर हनीप्रीत के बारे में जानकारियां जुटाने का प्रयास किया तो पता चला कि वह वहां रुकी तो थी, लेकिन पुलिस के आने से पहले ही निकल गई थी.

पकड़े गए आरोपियों से पूछताछ में पता चला था कि इस दंगे की प्लानिंग पहले ही हो चुकी थी. डेरा ने 8 दिनों पहले ही पंचकूला का सर्वे करा लिया था. इसे ले कर कुल 10 मीटिंग हुई थीं.

23 सितंबर तक पंचकूला में हुई हिंसा को ले कर साढ़े 11 सौ लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी थी. लेकिन हनीप्रीत के बारे में कहीं से कोई पुख्ता जानकारी नहीं मिल रही थी. उसी दिन बौलीवुड अदाकारा राखी सावंत के भाई राकेश सावंत ने सार्वजनिक रूप से खुलासा किया कि हनीप्रीत अब जिंदा नहीं है. चूंकि वह बाबा गुरमीत राम रहीम के कई राज जानती थी, इसलिए बाबा ने उसे मरवा दिया है.

दिल्ली हाईकोर्ट ने रद्द की हनीप्रीत की जमानत याचिका हरियाणा के डीजीपी बी.एस. संधू को पूरी उम्मीद थी कि हनीप्रीत जल्दी ही पकड़ी जाएगी. उन्होंने संकेत भी दिया था कि अगर वह पकड़ी न गई तो पुलिस उसे भगोड़ा घोषित कर देगी.

25 सितंबर को बाबा की ओर से उस के वकीलों ने सीबीआई द्वारा सुनाई 20 साल कैद की सजा को पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में चुनौती दी. उसी दिन बाबा गुरमीत राम रहीम के बेटे जसमीत की पत्नी खुशप्रीत के ममेरे भाई भूपेंद्र सिंह गोरा ने हनीप्रीत की सूचना देने वाले को 5 लाख रुपए रकद ईनाम देने की घोषणा कर दी.

उसी दिन दिल्ली के हाईकोर्ट में हनीप्रीत की ओर से 3 हफ्ते का ट्रांजिट बेल हासिल करने की याचिका दायर कर दी गई, जिस पर  26 सितंबर को सुनवाई हुई. जस्टिस संगीता ढींगरा सहगल ने दोनों पक्षों की बहस सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया.

रात में पौने 8 बजे सुनाए अपने फैसले में सक्षम न्यायाधीश ने हनीप्रीत को अंतरिम ट्रांजिट बेल देने की याचिका रद्द कर दी. उस की ओर से दी जाने वाली एक भी दलील को अदालत ने नहीं माना. उन्होंने कहा कि अगर हनीप्रीत खुद को कानून की इज्जत करने वाला मानती है तो आगे आ कर जांच में मदद करे.  पर हनीप्रीत तो शायद दूसरी मिट्टी की बनी थी. वह छिपतीछिपाती दिल्ली के लाजपतनगर स्थित वकील प्रदीप कुमार आर्य के औफिस पहुंच गई और वहां 2 घंटे तक रुकी पर आत्मसमर्पण नहीं किया. वह अच्छी तरह जानती थी कि पुलिस ने कुछ लोगों के साथ उस का भी गिरफ्तारी वारंट हासिल कर लिया है. किसी बात की चिंता किए बगैर हनीप्रीत ट्रांजिट बेल की अर्जी रद्द होने के बाद एक बार फिर अंडरग्राउंड हो गई.

3 अक्तूबर की सुबह अचानक ‘आजतक’ टीवी चैनल पर उस का एक्सक्लूसिव इंटरव्यू शुरू हुआ, जो दिन भर बारबार दिखाया जाता रहा.

यह भी बताया गया कि पिछली रात साढ़े 11 बजे हनीप्रीत का इंटरव्यू करने के लिए आजतक के औफिस में इस निर्देश के साथ फोन आया कि इंटरव्यू की खातिर सिर्फ एक रिपोर्टर व एक फोटोग्राफर ही बताई गई जगह पर पहुंचेंगे.

रिपोर्टर सतिंदर चौहान अपने कैमरामैन के साथ तय जगह पर पहुंच गए, जहां उन के चेहरों पर काले मास्क चढ़ा कर उन्हें दूसरी गाड़ी में बैठा कर ले जाया गया. जहां इन के चेहरों से मास्क हटाया गया तो वहां हनीप्रीत मौजूद थी.

बिना मेकअप के हनीप्रीत पहचान में नहीं आ रही थी. साक्षात्कार में ज्यादातर रोते हुए वह खुद को निर्दोष साबित करने की कोशिश कर रही थी. इंटरव्यू के अंत में रिपोर्टर ने उसे सलाह दी कि 38 दिनों से वह जो लुकाछिपी का खेल खेल रही है, उस के लिए बेहतर यही है कि वह आत्मसमर्पण कर दे.

जब हनीप्रीत चढ़ी पुलिस के हत्थे पर हनीप्रीत ने ऐसा नहीं किया. अब तक वह नेपाल सहित 7 राज्यों की पुलिस को गच्चा दे चुकी थी. उसका सोचना था कि पुलिस उस तक पहुंच नहीं पाएगी. लिहाजा शिमला रोड पर पंचकूला को पार कर के पटियाला जाने के लिए वह जीरकपुर क्रौस कर गई. 3 अक्तूबर की दोपहर को वह जीरकपुर से थोड़ा आगे गई थी कि पंचकूला पुलिस के हत्थे चढ़ गई. उस समय उस के साथ एक अन्य महिला थी. वह बठिंडा की सुखप्रीत कौर थी, जिस का पति हनीप्रीत का ड्राइवर था.

शुरुआती पूछताछ में हनीप्रीत बस एक ही बात कहती रही कि उसे कुछ याद नहीं है और वह तथा बाबा गुरमीत राम रहीम निर्दोष हैं. अगले दिन उसे सीजेएम की अदालत पर पेश कर के 6 दिनों के कस्टडी रिमांड पर लिया गया. लेकिन पुलिस उस से कुछ भी उगलवा नहीं सकी. 3 दिनों का रिमांड और बढ़ाया गया. आखिर हनीप्रीत टूट गई और उस ने माना कि बाबा गुरमीत राम रहीम को छुड़ा कर भगाने की खातिर ही पंचकूला में दंगा करवाने की योजना बनाई गई थी, जिस में वह भी शामिल थी.

दरअसल, पहले तो उन्हें लगता ही नहीं था कि दुष्कर्म के आरोप में बाबा को सजा होगी. उस ने अपने इंटरव्यू में कहा था कि वे तो यह सोच कर चले थे कि खुशीखुशी पंचकूला जाएंगे और खुशीखुशी लौट आएंगे. लेकिन उन्हें इस बात की भी आशंका थी कि अगर अदालत ने बाबा को दोषी ठहराते हुए जेल भेज दिया तो बड़ी बदनामी होगी.

इसी आशंका के तहत जो योजना बनाई गई, उस का संचालन हनीप्रीत और कुछ अन्य लोगों को करना था. इस संबंध में डेरे के अंदर कई बैठकें हुईं. 17 अगस्त, 2017 को जो अंतिम निर्णय लिया गया, उस के लिए 5 करोड़ रुपए मुहैया कराए गए.

योजना के अनुसार, 25 अगस्त को पंचकूला की सीबीआई कोर्ट के पास लाखों लोगों को इकट्ठा करना था. उन लोगों को यही कहना था कि वे अपने गुरुजी के दर्शन को आए हैं. चूंकि सभी लोग खाली हाथ रहेंगे, इसलिए धार्मिक भावना के चलते उन से ज्यादा टोकाटाकी नहीं होगी. आने वालों को प्रति व्यक्ति एक हजार रुपए अदा करना था.

अगर बाबा बरी हो जाते तो वे बाबा की जयकार करते हुए उन्हें ट्राइसिटी में घुमाते. लेकिन अगर कहीं अदालत बाबा को दोषी करार देते हुए गिरफ्तार करने का आदेश देती तो वे हंगामा शुरू कर देते.

पुलिस इन्हें संभालने लगती तो उसी बीच हथियारों से लैस गुंडे आ कर बाबा को छुड़ा ले जाते. उन गुंडों को मोटी रकम दी गई थी. पूछताछ में हनीप्रीत ने माना कि दंगा करवाने के लिए उस ने उन्हें सवा करोड़ रुपए एडवांस दिए थे. असलियत सामने लाने के लिए पुलिस हनीप्रीत का ब्रेन मैपिंग करवाना चाहती है.

कस्टडी रिमांड के दौरान 8 अक्तूबर को हनीप्रीत ने करवाचौथ का व्रत रखा. यह व्रत किस के लिए रखा, इस बारे में उस ने किसी को कुछ नहीं बताया. बाद में पता चला कि दोपहर में ही उस ने व्रत तोड़ कर खाना खा लिया था.

हनीप्रीत ने बनाई थी दंगे की योजना पुलिस पूछताछ में हनीप्रीत ने 10 अक्तूबर को बताया कि बाबा को दोषी करार दिए जाने से पहले ही समर्थक पंचकूला पहुंचने लगे थे. वहां से वीडियो बना कर हनीप्रीत को भेजी जाती रही. हनीप्रीत देखती रही कि कहां समर्थक ज्यादा हैं और कहां लोगों को व्यवस्थित करना है. इस के बाद वह दोबारा वीडियो बना कर उसे वायरल करती.

इस तरह दिन में 10-12 वीडियो बनवाए जाते थे. हनीप्रीत ने माना कि दुनिया से हिंदुस्तान का नक्शा मिटाने का वीडियो बना कर उसी ने वायरल किया था. उस की निशानदेही पर पुलिस ने कई दस्तावेज बरामद किए. सिरसा डेरे से उस का निजी मोबाइल और लैपटौप भी बरामद किया गया. एक बार डेरे की चेयरपरसन विपासना इंसां को भी हनीप्रीत के सामने बैठा कर साढ़े 4 घंटे तक पूछताछ की गई.

सुनारिया जेल, रोहतक से निकल कर पहले वह सिरसा स्थित डेरे पर आई और वहां तमाम दस्तावेज नष्ट कर के वह कुछ दस्तावेजों और धनदौलत के साथ राजस्थान से ले कर नेपाल तक कई स्थानों पर छिपती रही. उस ने ज्यादातर समय बठिंडा में अपने ड्राइवर की पत्नी सुखदीप कौर के यहां बिताया, जो आखिर तक उस के साथ रही और दोषी को पनाह देने के आरोप में गिरफ्तार की गई. अन्य आरोपों के अलावा हनीप्रीत पर देशद्रोह का केस भी दर्ज है.

13 अक्तूबर को कस्टडी रिमांड की समाप्ति पर हनीप्रीत और सुखदीप कौर को अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में अंबाला की सैंट्रल जेल भेज दिया गया. हनीप्रीत अदालत से रोरो कर एक ही गुहार लगाती रही कि उसे कहीं और न भेज कर बाबा गुरमीत राम रहीम वाली जेल में भेजा जाए.

उसी बीच खबर आई कि 16 अक्तूबर को बाबा गुरमीत राम रहीम के परिवार के लोग उस से मिलने सुनारिया जेल पहुंचे तो बाबा अपनी पत्नी हरजीत कौर से मिल कर फूटफूट कर रोया. उस के बाद परिवार के अन्य सदस्यों से मिला. उस की दाढ़ी और सिर के बाल सफेद हो चुके थे. चेहरे पर झुर्रियां भी झलकने लगी थीं.

18 अक्तूबर को डीजीपी (जेल) के.पी. सिंह से अनुमति ले कर हनीप्रीत के पिता रामानंद तनेजा, मां आशा तनेजा, भाई साहिल तनेजा, भाभी सोनाली और कजिन सिद्धार्थ सिंगला उस से मिलने अंबाला की जेल पहुंचे. यहां हनीप्रीत को जेल की .32 चक्की की 11 नंबर सैल में कड़ी सुरक्षा में रखा गया था. मिठाई और मोमबत्ती ले कर वहां पहुंचे घर वालों से उस की मुलाकात कांच के मोटे शीशे के पीछे से और बातचीत इंटरकौम पर करवाई गई.

हनीप्रीत से की गई पूछताछ के आधार पर गिरफ्तार हो रहे हैं लोग हनीप्रीत द्वारा की गई पूछताछ के आधार पर लगभग रोज ही किसी न किसी को गिरफ्तार किया जा रहा है. 19 अक्तूबर को गिरफ्तार किए गए डेरे से जुड़े 2 लोगों सी.पी. अरोड़ा और लालचंद ने पूछताछ में बताया कि बिगड़ते हालात को देख कर जब सरकार ने इंटरनेट बंद करने के आदेश दिए तो उन लोगों ने 100 वायरलैस सैट मंगवा लिए थे, जिन की फ्रीक्वेंसी कई किलोमीटर की एरिया में काम करती थी.

पंचकूला के सैक्टर-3 में एक कंट्रोल रूम बनाया गया था, ताकि संदेश आराम से फ्लैश हो सके. इन सेटों के इस्तेमाल के लिए एक खास टीम लगाई गई थी, जो उन लोगों से संपर्क करती थी, जिन्हें 17 अगस्त को डेरा में हुई विशेष मीटिंग के दौरान हनीप्रीत और डेरा के डा. आदित्य इंसां ने जिम्मेदारियां सौंपी थीं. ऐसे ही एक सेट से सी.पी. अरोड़ा ने सैक्टर 2 और 4 की डिवाइडिंग रोड पर दंगा भड़काने का संदेश प्रसारित करवाया था.

उसी के बाद ढकौली की ओर जाने वाले हाईवे पर इकट्ठा हुए लोगों को पता चला था कि बाबा को दोषी करार दे दिया गया है. इस के बाद बाबा के समर्थकों की भीड़ भड़क उठी थी, जिस में आ मिले असामाजिक तत्वों ने भयंकर गुंडागर्दी शुरू कर दी थी.

पकड़े गए लोगों के अनुसार, हनीप्रीत के निर्देश पर सारा काम प्लानिंग के अनुसार किया गया था. अगर उन की यह योजना सफल हो जाती तो आज बाबा गुरमीत राम रहीम जेल में न होता. हनीप्रीत भी खुला घूम रही होती.

हनीप्रीत के घर के कुछ लोगों को आज इस बात का भारी अफसोस है कि उन की सीधीसादी और भोलीभाली प्रियंका तनेजा ने हनीप्रीत बन कर खुद को परेशानियों के दलदल में झोंक दिया है. शादी के बाद उस ने घर संभाल रखा होता तो आज वह जवान हो रहे बच्चों की मां होती. चमकदमक के चक्कर में फंसी हनीप्रीत ने हमदर्दी वाला कोई काम नहीं किया.  ?

सौजन्य- सत्यकथा, नवंबर 2017