पुलिस के सामने काम न आईं शिखा की अदाएं – भाग 1

मुंबई के बारे में कहावत है कि यह शहर कभी नहीं सोता. दिन हो या रात, लोग अपने कामों मे लगे रहते हैं. लोग भी लाखों और काम भी लाखों. लेकिन एक सच यह भी है कि मुंबई दिन के बजाय रात की बांहों में ज्यादा हसीन हो जाती है. इस की वजह यह है कि ज्यादातर फिल्मों, सीरियल्स की शूटिंग तो रात में होती ही है, यहां के होटल, रेस्तरां और पब भी रात को खुले रहते हैं.

इस के अलावा  फिल्मी और टीवी के सितारों तथा बडे़ लोगों की पार्टियां भी रात को ही होती हैं. बड़ीबड़ी पार्टियां हों या शूटिंग, उन में ग्लैमर न हो, ऐसा नहीं हो सकता. मध्यमवर्गीय लोगों के लिए पब हैं, जहां नाचगाने और शराब के साथ ग्लैमर भी होता है. यही वजह है कि मुंबई के लाखोंलाख लोग सुबह नहीं, बल्कि शाम का इंतजार करते हैं.

मुंबई की हर शाम समुद्र की लहरों को चूम कर धीरेधीरे रात की बांहों में सिमटने लगती है और समुद्र ढलती शाम का मृदुरस पी कर जवान होती रात में मादकता भर देता है. 14 मई, 2017 की रात का भी कुछ ऐसा ही हाल था. उस रात मुंबई के एक मशहूर होटल के पब में एक पार्टी चल रही थी. गीतसंगीत ऐसी पार्टियों की जान होता है. ऐसी पार्टियों में फोनोग्राम रिकौर्ड्स पर म्यूजिक प्ले करने वालों को डिस्को जौकी यानी डीजे कहा जाता है. ये लोग संगीत की धड़कन होते हैं.

विभिन्न संगीत उपकरणों माइक्रोफोन, सिंथेसाइजर्स, इक्वलाइजर्स, सिक्वेंसर, कंट्रोलर व इलेक्ट्रौनिक म्यूजिक की-बोर्ड्स व डीजे म्यूजिक सौफ्टवेयर की मदद से ऐसी पार्टियों में गीतसंगीत का ऐसा समां बंध जाता है कि डांस फ्लोर पर युवाओं के हाथपैर ही नहीं, पूरा शरीर थिरकने लगता है. डांस फ्लोर पर हिपहौप, रागे, सनरौक, यूनिक फ्यूजन की आवाजें आती रहती हैं. मुंबई में डीजे अनुबंध के आधार पर अपना प्रोग्राम करते हैं.

मुंबई के होटलरेस्त्रां ने अपने पब में गीतसंगीत की हसीन शाम सजाने के लिए विभिन्न डीजे से अनुबंध किए हैं. मायानगरी में ऐसे डीजे की तादाद सैकड़ों में होगी, लेकिन इन में 20-30 डीजे ही ऐसे हैं, जिन की वजह से होटलरेस्त्रां के पब म्यूजिकल ईवनिंग के नाम पर हसीन और जवान होते हैं. डीजे के इस पेशे में अधिकांश महिलाएं हैं.

डिस्को जौकी की भीड़ में डीजे अदा ने कुछ ही महीनों में अपनी धाक जमा ली थी. वह मुंबई के युवा वर्ग में संगीत की धड़कन के रूप में उभर कर सामने आई थी. अदा अनुबंध के आधार पर अलगअलग होटलों और रेस्त्राओं के पब में प्रोग्राम करती थी. उस के लाइव कंसर्ट में डांस फ्लोर पर युवा झूम उठते थे. पुराने फिल्मी गीतों से ले कर क्लासिकल, रीमिक्स व वेस्टर्न संगीत में डीजे अदा ने महारथ हासिल कर ली थी. उस ने अपनी अदाओं से हजारों फैंस बना लिए थे, जो संगीत से ज्यादा उस के दीवाने थे.

डीजे अदा के कार्यक्रम में अभी कुछ देर बाकी थे, लेकिन डांस फ्लोर पर संगीत व डांस प्रेमी जुटना शुरू हो गए थे. संगीत प्रेमियों की इस भीड़ में जयपुर से आए कुछ युवाओं की टोली भी शामिल थी. जयपुर की इस टोली के युवा डांस फ्लोर पर अलगअलग हिस्सों पर खड़े हो कर आनेजाने वाले पर नजर रखे हुए थे.

इस टोली की महिला सदस्य डांस फ्लोर पर आगे की ओर उस जगह खड़ी थीं, जहां म्यूजिक उपकरण लगे हुए थे. यह टोली भी दूसरे संगीत प्रेमियों की तरह डीजे अदा का इंतजार कर रही थी. हालांकि इस टोली के सदस्यों ने डीजे अदा को ना तो पहले कभी किसी प्रोग्राम में देखा था ना ही कहीं और. इस टोली के सदस्यों के पास डीजे अदा की फोटो मोबाइलों में सेव थी. इसी फोटो के आधार पर वे अदा को पहचान सकते थे.

खैर, इंतजार खत्म हुआ. पब में डीजे के साथी कलाकारों ने अपने उपकरण बजा कर लाइव कंसर्ट की तैयारी शुरू की. इस का मतलब था कि डीजे अदा अब परफौरमेंस देने के लिए फ्लोर पर आने वाली थी. म्यूजिकल ड्रम की तेज आवाजों के बीच हैडफोन लगाए हुए डीजे अदा फ्लोर पर आई और अपना दायां हाथ मिला कर दर्शकों से हैलो कहा. इसी के साथ तेज म्यूजिक बजने लगा और डीजे अदा अपनी अदाओं पर संगीत प्रेमियों के साथ थिरकने लगी. अदा को देख कर जहां कुछ युवा उस की खूबसूरती पर आहें भरने लगे, वहीं संगीत प्रेमी अपनी फरमाइशें करने लगे.

dj ada

जयपुर की टोली ने अपने मोबाइल में सेव डीजे अदा का फोटो देख कर यह निश्चित कर लिया कि वे सही ठिकाने पर आए हैं. अदा का प्रोग्राम जैसेजैसे आगे बढ़ता गया, वैसेवैसे डांस फ्लोर पर जयपुर की टोली का शिकंजा कसता चला गया. करीब डेढ़, दो घंटे बाद जब अदा का प्रोग्राम खत्म हुआ तो उस ने होंठों पर अपनी हथेली ले जा कर हवा में प्यार बिखेरते हुए श्रोताओं को गुडनाइट कहा. जब वह डांस फ्लोर से जाने लगी, तभी जयपुर की टोली ने उसे चारों ओर से घेर लिया. उस टोली में महिलाएं भी थीं.

एकाएक इस तरह कुछ लोगों के घेरे जाने से अदा ने समझा कि वे लोग संभवत: संगीत के रसिया होंगे, जो उस के प्रोग्राम को देख कर खुश हुए होंगे और उसे धन्यवाद कहने आए होंगे या किसी पार्टी में डीजे के लिए बात करने आए होंगे. अदा की उम्मीद के विपरीत उस टोली में  से एक जवान ने आगे बढ़ कर कहा, ‘‘शिखा…शिखा तिवाड़ी, तुम्हारा खेल खत्म हो गया है.’’

इस के साथ ही उस जवान के साथ खड़ी महिला ने डीजे अदा के कंधे पर हाथ रख कर कहा, ‘‘शिखा हम लोग जयपुर के एसओजी (स्पेशल औपरेशन ग्रुप) के लोग हैं. तुम यहां कोई तमाशा खड़ा मत करना, वरना तुम्हारी पोल खुल जाएगी और जो लोग अब तक तुम्हारी अदाओं पर थिरक रहे थे, वे तुम पर थूकेंगे.’’

अदा उर्फ शिखा तिवाड़ी समझ गई कि जिस एसओजी से बचने के लिए वह जयपुर से भाग कर मुंबई आई थी, वह अब उसे छोड़ने वाली नहीं है. उस ने कोई विरोध नहीं किया. वह चुपचाप जयपुर से आई एसओजी टीम के अफसरों के साथ चल दी. जयपुर की एसओजी टीम ने मुंबई के संबंधित पुलिस अधिकारियों को मामले की जानकारी दी और शिखा को पकड़ कर ले जाने की बात बताई. यह बात इसी साल 14 मई की रात की है.

दूदानी का काला कारनामा जिसने सबको हिला दिया – भाग 3

नशीले कारोबार के लिए नेपाल और सिक्किम से मजदूर बुलाने की राय भी उसे लियोन ने ही दी. यहां तक कि उदयपुर में फैक्ट्री लगाने की सलाह भी उस ने यह कह कर दी थी कि यह शांत और सुरक्षित जगह है. साथ ही तुम्हारी जन्मभूमि भी. लोगों में तुम्हारा सम्मान है, कोई तुम पर शक नहीं करेगा.

ड्रग्स तस्करी की दुनिया के सब से बड़े मामले को ले कर कानूनी पेच में फंसे सुभाष दूदानी का हौसला चौंकता है. अदालत में पेश किए जाने के बाद कोर्ट के बाहर उस ने अपनी पत्नी से कहा कि मैं ही जल्दी बाहर आऊंगा. कोई कुछ भी साबित नहीं कर पाएगा. उस का यह भी कहना था कि मुझे किसी वकील की जरूरत नहीं है. अपना केस मैं खुद हैंडल करूंगा.

यह बात दो तरह से चौंकाती है. पहली यह कि अपराध की गंभीरता को ले कर उस में जो बेफिक्रापन नजर आता था, वह. और दूसरा यह कि जिस स्त्री से उस का तलाक हो चुका था, वह अदालत में क्यों मौजूद थी? मौजूद थी भी तो सुभाष दूदानी का उसे तसल्लीबख्श बात कहने का क्या मतलब?

बावजूद इस के मुंबई से उस की पैरवी करने आए एनडीपीएस मामलों के विशेषज्ञ वकील चंद्रभूषण मिश्रा का कथन भी कुछ ऐसा ही है. उन्होंने कहा, ‘अदालत में प्रस्तुत दस्तावेजों से कुछ भी साबित नहीं हो पाएगा. दूदानी को छलपूर्वक फंसाया गया है.’

बहरहाल, सूत्रों के मुताबिक अंडरवर्ल्ड की इन सरगोशियों को भी खारिज नहीं किया जा सकता कि जिस के पीछे डौन दाऊद इब्राहीम हो, उसे कौन फंसा सकता है.

तलाकशुदा जिंदगी

विज्ञान से स्नातक डिग्रीधारी सुभाष दूदानी की काबिलियत समझें तो उस ने एक किताब भी लिखी है. जानकार सूत्रों का कहना है कि उस की शादी ज्यादा दिन नहीं चली. हालांकि उस की पत्नी एक बैंक अधिकारी है और उस की 2 बच्चे भी हैं. लेकिन बाद में दोनों का तलाक हो गया. दरकता दांपत्य जीवन ही उसे गलत धंधों की राह पर ले गया. बाद में उस ने उदयपुर में ही टाटा कंपनी में कार्यरत अपने भतीजे रवि दूदानी को भी अपने धंधे में उतार दिया.

सुभाष का सामाजिक रुतबा भी कम नहीं था. अनेक धार्मिक संस्थानों का ट्रस्टी होने के अलावा उस ने अपने समुदाय के लिए भी अच्छीखासी आर्थिक मदद की थी. इस मामले का खुलासा होने से कुछ दिन पहले उस ने एक शिव मंदिर के निर्माण के लिए 8 लाख रुपए की राशि दान की थी.

रवि दूदानी कलड़वास के औद्योगिक क्षेत्र में बनी फैक्ट्री का काम संभालता था. रात को जब वह फैक्ट्री की तरफ जाता था तो सिक्किमी और नेपाली मजदूर भी उस के साथ होते थे. डीआरडीआई टीम के अधिकारियों ने इस बात पर गहरा आश्चर्य जताया है कि आखिर पुलिस ने इस भेद को क्यों नहीं टटोला कि उदयपुर की फैक्ट्री में स्थानीय श्रमिकों के बजाए बाहरी मजदूर क्यों थे.

डीआरडीआई टीम के अधिकारियों ने इस गोरखधंधे में स्थानीय रसूखदारों का हाथ होने की पूरी आशंका जताई है. उन का कहना था कि इस काम में 10 करोड़ जैसा भारीभरकम निवेश किया गया था. दुबई से करोड़ों की मशीनें आई थीं. स्थानीय मैकेनिक बायलर सरीखे उपकरण भी तैयार कर रहे थे. यहां तक कि दुबई से एंथ्रालिक सरीखा संदिग्ध एसिड भी आ चुका था. इस के बावजूद किसी को जरा भी संदेह क्यों नहीं हुआ.

एंथ्रालिक एसिड मंगवाने के लिए सुभाष दूदानी ने गुजरात के नडियाड में माल रखने के लिए एक शेड किराए पर लिया था, जहां से उसे टाइल एडिसिव की आड़ में नशीली दवाओं का जखीरा निर्यात करना था. जानकार सूत्रों के मुताबिक दूदानी कुल 8 हिस्सों में तैयारशुदा माल को बाहर भेजना चाहता था. इस लिहाज से प्रति खेप ढाई टन माल बाहर भेजा जाना था. इस के लिए नए जहाज का बंदोबस्त भी कर लिया गया था. माल किसे भेजना है, इस के लिए रेडिमिक्स एडीसन टेक्नोलौजी नाम की फरजी फर्म भी बना ली गई थी.

उधड़ रही हैं परतें

नशीली गोलियों के इस नेटवर्क से अंतरराष्ट्रीय तस्करों के साथ मुंबई के नामचीन व्यापारी भी जुड़े रहे हैं. उदयपुर में बड़ी खेप पकड़े जाने के बाद से जांच में जुटी डीआरडीआई ने सुभाष दूदानी से संपर्क रखने वाले परमेश्वर व्यास और अतुल म्हात्रे को मुंबई से गिरफ्तार कर लिया है. परमेश्वर व्यास दूदानी का वित्तीय सलाहकार भी था और उसे कच्चा माल भी सप्लाई करता था. फिलहाल डीआरडीआई टीम म्हात्रे की पूरी जन्मकुंडली खंगाल रही है कि इस काम में उस ने किसकिस से मदद ली.

इस मामले में ताजा गिरफ्तारी मलकानी की है. जयपुर स्थित प्रतापनगर से गिरफ्तार किए गए मलकानी की सुभाष दूदानी के कारोबार में 5 प्रतिशत की हिस्सेदारी थी. कारोबार के मुख्य शेयरधारक के रूप में दुबई निवासी धनकानी के नाम का भी खुलासा हुआ है. मलकानी सुभाष दूदानी का दोस्त भी है. मलकानी दूदानी के बंद हुए सीडी प्रोजेक्ट से भी जुड़ा रहा था.

इस काले कारोबार का खुलासा होने के बाद से सब से ज्यादा सवाल इस बात को ले कर उठ रहे हैं कि यह गोरखधंधा उदयपुर में पिछले 7 सालों से चल रहा था, लेकिन इंडस्ट्री के लिए जिम्मेदार रीको, जिला उद्योग केंद्र, सेल्स टैक्स, ड्रग कंट्रोलर, फैक्ट्री ऐंड बायलर तथा प्रदूषण नियंत्रण महकमे को भनक क्यों नहीं लगी?

हालांकि रीको के प्रभारी अफसर एम.के. शर्मा यह कह कर अपना पल्ला झाड़ रहे हैं कि किसी उद्योग पर नजर रखना या काररवाई करने का अधिकार हमें नहीं है. ड्रग कंट्रोलर का कहना है कि जब इस फैक्ट्री ने कोई लाइसेंस ही नहीं लिया तो जांच किस बात की करते.

अलबत्ता भारी मात्रा में मेंड्रेक्स और मेथाक्यूलिन का जखीरा हाथ लगने के बाद विश्व पटल पर बदनाम हुए उदयपुर के औषधि नियंत्रण विभाग की हकीकत समझें तो विभागीय नुमाइंदे ऐसे पदार्थ की प्रकृति और बिक्री से पूरी तरह अनभिज्ञ हैं. इस पूरे मामले में गुजरात के 4 शीर्ष अधिकारियों के नामों का भी खुलासा हुआ है.

ड्रग्स बनाने का काम काफी जटिल और उबाऊ था. लेकिन सूत्र कहते हैं कि सुभाष दूदानी ने इस में भी कसर नहीं छोड़ी. मेथाक्यूलिन से मेंड्रेक्स बनाने के लिए उसे धोने और सुखाने तक का काम उस ने खुद किया. इस के लिए उस ने फ्लूइड बेड ड्रायर काम में लिया. दूदानी इस सूखे मेथाक्यूलिन पाउडर को स्टार्च और मैग्नीशियम स्टीरेट व डाईकैल्शियम फास्फेट मिला कर मशीनों से प्रैस कर के इसे गोलियों की शक्ल देता था. फिर उन पर मुसकराहट का चिह्न भी लगाता था.

दूदानी का काला कारनामा जिसने सबको हिला दिया – भाग 2

पुलिस के निशाने पर आने के बाद अभिनेत्री ममता कुलकर्णी अपनी सफाई में बहुत कुछ कह चुकी है, मसलन मुझे आश्चर्य है कि मेरा नाम ड्रग तस्करी से जोड़ा जा रहा है, लेकिन दूदानी के साथ उजागर हुए नए रिश्तों ने एक बार फिर ममता और विक्की को कटघरे में खड़ा कर दिया है. अब जबकि सुभाष दूदानी अपने भतीजे रवि दूदानी के साथ गिरफ्त में आ गया है तो पुलिस को ममता और विक्की की भी बेसब्री से तलाश है.

जानकार सूत्रों की मानें तो सुभाष दूदानी की गिरफ्तारी के बाद इस बात का भी खुलासा हुआ है कि राजस्थान के पुष्कर में अकसर होने वाली रेव पार्टियों में मेंड्रेक्स की सप्लाई भी दूदानी द्वारा ही की जा रही थी. इस में कोई शक नहीं कि पुलिस ने रेव पार्टियों में नशेबाज पर्यटकों की धरपकड़ तो की, लेकिन नशे की सप्लाई के स्रोत को खंगालने में पूरी कोताही बरती.

दूदानी से पूछताछ में नशीली दवाओं के कारोबार की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जितनी लंबीचौड़ी चेन का खुलासा हुआ है, वह स्तब्ध करने वाला है. दिलचस्प बात यह है कि इन का नेटवर्क यूके, यूएस और दक्षिणी अफ्रीका समेत कई देशों में फैला हुआ है. यानी उदयपुर जैसे शांत शहर से नशे की इतनी बड़ी खेप भारत के विभिन्न इलाकों के अलावा नाइजीरिया और मंगोलिया आदि देशों तक जा रही थी.

नशे के जहरीले कारोबार की बखिया उधेड़ने में जुटी डीआरडीआई की टीम ने सुभाष दूदानी से संपर्क रखने वाले मुंबई निवासी परमेश्वर व्यास और अतुल म्हात्रे को भी दबोच लिया है. जानकार सूत्रों के मुताबिक परमेश्वर व्यास पिछले 20 सालों से सुभाष दूदानी का मित्र होने के अलावा उस का वित्तीय और रासायनिक सलाहकार बना हुआ था. म्हात्रे से की गई पूछताछ में उस ने स्वीकार किया है कि वो कैमिकल इंजीनियर होने के नाते ड्रग्स के निर्माण के लिए तकनीकी सलाह देता था.

इस खुलासे के रहस्यों का पिटारा तो बहुत बड़ा है, लेकिन फिलहाल डीआरडीआई ने उदयपुर के इर्दगिर्द वह ‘स्वर्ण गलियारा’ खोज लिया है, जिसे सुभाष दूदानी ने अभिनेत्री ममता कुलकर्णी और उस के कथित पति विक्की गोस्वामी की मदद से मेंड्रेक्स सरीखी नशीली ड्रग की तस्करी का ट्रांजिट पौइंट बना दिया था. सुभाष दूदानी द्वारा केक और टैबलेट्स की शक्ल में तैयार की गई ड्रग्स को निर्विघ्न रूप से विदेशों में अपने कारोबारी संपर्कों तक भेजा जाना था.

इस के खुलासे से जो बातें पता चली हैं, उस से जाहिर होता है कि उस का इरादा खुफिया एजेंसियों की चौकसी को अंडरएस्टीमेट कर के अधिकारियों की आंखों में धूल झोंकने का था. इसी मुगालते में दूदानी द्वारा ड्रग्स की तस्करी को पुलिस की निगाहों से बचाने के लिए मौकड्रिल की जा रही थी.

पूछताछ में दूदानी ने बताया कि ड्रग्स बनाने की मशीनरी को समुद्री रास्ते से आयात किए जाने के दौरान ही उसे यह उपाय सूझा था. यानी एक तरफ ड्रग्स तैयार की जा रही थी तो दूसरी तरफ समुद्री रास्ते से सीमेंट और लाइम स्टोन पाउडर केक की शक्ल में बाहर भेजा जा रहा था.

यह मौकड्रिल खुफिया एजेंसियों के अफसरों को भ्रम में डालने के लिए थी ताकि जब भी वह ड्रग्स को केक की शक्ल में भेजे तो यह भ्रम ड्रग्स कारोबार को परदेदारी का अचूक हथियार बना रहे. इस योजना के तहत ही सुभाष दूदानी अडानी पोर्ट से 2 बार दिखावटी केक भेजने के बाद एक बार 5 मीट्रिक टन नशीली गोलियां भेजने में सफल भी रहा था. इस निर्विघ्न मौकड्रिल ने उस के हौसले बुलंद कर दिए थे.

इसी के चलते इस बार वह 24 टन की तैयारशुदा नशीली खेप भेजने की तैयारी में था. पूछताछ में सुभाष दूदानी ने बताया कि यह आखिरी खेप थी. इस के बाद उदयपुर की फैक्ट्री को बंद कर दिया जाता. उधर राजस्व अधिकारियों का कहना है कि ड्रग्स की यह बड़ी खेप अगर विदेशों में पहुंच जाती तो सुभाष दूदानी को लागत का चार गुना मुनाफा मिल जाता. इस के बाद संभवत: उसे कुछ करने की जरूरत नहीं रह जाती.

डीआरआई टीम ने जब फैक्ट्री पर छापा मारा, तब तक सारी मशीनें उखाड़ी जा चुकी थीं. कलपुर्जे अलगअलग कर के कबाड़ के भाव बेचे जा चुके थे. इस तोड़फोड़ का किसी को पता तक नहीं चला था. जेसीबी मशीन चला कर मशीनरी की बुनियाद तक को बराबर कर दिया गया था. सब कुछ नेस्तनाबूद करने का काम सिर्फ घोईदा फैक्ट्री में ही हो पाया था. गुडली और कलड़वास का माल भेजने के बाद वहां भी फैक्ट्रियों का भी नामोनिशान मिटा दिया जाता था, लेकिन उस से पहले ही दूदानी के काले कारनामों का परदाफाश हो गया.

दिलचस्प बात यह है कि इन फैक्ट्रियों की बुनियाद सन औप्टिकल और सीडी बनाने के नाम पर डाली गई थी. लेकिन सौ करोड़ की लागत की फैक्ट्रियों में कुछ दिन ही उत्पादन हो पाया. धंधे में आई मंदी के कारण इस काम को बंद करना पड़ा.

इस काम के लिए सुभाष दूदानी इंडियन ओवरसीज बैंक से 21 करोड़ का कर्ज ले चुका था, लेकिन भुगतान का सिलसिला कुछ समय तक ही चला. बाद में नुकसान बता कर दूदानी ने रकम चुकाने से इनकार कर दिया था. नतीजतन बैंक फैक्ट्री को सीज कर के नीलामी की तैयारी कर रहा था. लेकिन बैंक अधिकारी उस समय हैरान रह गए जब उन्हें सीज फैक्ट्री में काला कारोबार चलने की खबर मिली.

बहरहाल, सुभाष दूदानी शिकंजे में आया भी तो इसी वजह से. सीबीआई इंडियन ओवरसीज बैंक के कर्ज अदायगी के मामले में पहले ही सुभाष दूदानी के मुंबई स्थित ठिकाने पर छापा मार चुकी थी. उस ने यह काररवाई बैंक की शिकायत पर की थी.

शिकायत में कहा गया था कि दूदानी ने कर्ज में ली गई रकम निश्चित उद्देश्य पर खर्च करने के बजाय इधरउधर कर दी है. जिन कार्यों में रकम का निवेश बताया गया है, उस के कोई दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए गए हैं. बैंक अधिकारियों ने माल निर्यात के बिलों और बिल्टियों को भी संदिग्ध बताया था. यह भी एक वजह रही कि सीबीआई के संदेह के घेरे में आ जाने के कारण सुभाष दूदानी बचा हुआ तैयारशुदा माल निर्यात करने में विफल रहा.

सुभाष दूदानी को विदेशों में ड्रग्स भेजने के तरीके और ठौरठिकानों का मशविरा भी दुबई का तस्कर लियोन देता था. पकड़ा गया माल मोजांबिक और मालवाई भिजवाना था. सूत्रों की मानें तो वर्ष 2004-05 के दरमियान दूदानी ने दुनिया में प्लेनेट औप्टिकल डिस्क बनाने का प्लांट लगाया था. इस प्लांट से उस ने काफी पैसा कमाया. नतीजतन उत्कर्ष के उस दौर में उसे प्रमुख उद्योगपति का सम्मान भी मिला. किंतु वर्ष 2010 में उस का धंधा चौपट हो गया.

तबाही के इस दौर में ही उस की मुलाकात लियोन से हुई थी. दूदानी को नशे के काले कारोबार में धकेलने का काम भी उसी ने किया. लियोन का उसे दिया गया व्यावसायिक मंत्र था ‘कौडि़यों के खर्च में करोड़ों का मुनाफा कमाओ’. उसी ने दूदानी का ज्ञानार्जन किया कि मेथाक्यूलिन से ड्रग्स कैसे बनाई जाती है.

दूदानी का काला कारनामा जिसने सबको हिला दिया – भाग 1

2016 के अप्रैल माह में जब महाराष्ट्र की ठाणे पुलिस ने सोलापुर में एक फार्मा कंपनी ‘एवान लाइफ साइंसेज लिमिटेड’ पर छापा मार कर तकरीबन 2 हजार करोड़ की नशीली ड्रग एफिड्रिन की 20 करोड़ की खेप बरामद की थी तो आरोपियों में गुजरे जमाने की अभिनेत्री ममता कुलकर्णी और उस के तथाकथित पति अंतरराष्ट्रीय ड्रग तस्कर विक्की गोस्वामी का नाम सामने आया था.

इस मामले में जांच के बाद जून 2016 में इस रैकेट के सरगना मनोज जैन समेत 5 लोगों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई थी. तब पुलिस ने कल्पना तक नहीं की थी कि इस रैकेट के तार राजस्थान के शहर उदयपुर से भी जुड़े हो सकते हैं. ज्ञातव्य हो कि एफिड्रिन का इस्तेमाल एक्सटेसी जैसी उच्चकोटि की नशीली टैबलेट बनाने में किया जाता है. कनाडा और अमेरिका के छात्रों और खिलाडि़यों के बीच इस की मांग ज्यादा है.

केंद्रीय उत्पाद एवं सीमा शुल्क बोर्ड के खुफिया निदेशालय डीआरडीआई ने जब मध्य अक्तूबर में उदयपुर जिले के कलड़वास औद्योगिक क्षेत्र की एक फैक्ट्री के गोदाम पर छापा मार कर लगभग 7 हजार करोड़ रुपए मूल्य की तकरीबन 24 टन नशीली ड्रग्स मेंड्रेक्स और मेथाक्यूलिन की गोलियां बरामद कीं तो राज्य की वसुंधरा सरकार के होश फाख्ता हो गए. इसे अब तक की दुनिया की सब से बड़ी बरामदगी बताया गया है. राज्य सरकार में गृहमंत्री गुलाबचंद कटारिया इसी शहर के रहने वाले हैं. अपने शहर में इतने बड़े रैकेट के खुलासे से वह स्तब्ध हैं.

घटना से जुड़े 2 बड़े खुलासों ने मुंबई अंडरवर्ल्ड को भी हैरानी में डाल दिया है. पहला यह कि समाजसेवी का मुखौटा ओढ़ कर सुभाष दूदानी और उस के भतीजे रवि दूदानी ने न केवल नशे का इतना बड़ा नेटवर्क खड़ा कर लिया बल्कि अंडरवर्ल्ड डौन दाऊद इब्राहीम सरपरस्ती भी हासिल कर ली. और दूसरा यह कि इस रैकेट के दूसरे सिरे की डोर 90 के दशक की खूबसूरत, बोल्ड और सैक्स सिंबल कही जाने वाली अभिनेत्री ममता कुलकर्णी और उस के कथित प्रेमी विक्की गोस्वामी ने थाम रखी थी. डीआरडीआई के दावे को सही मानें तो ममता कुलकर्णी इंटरनेशनल ड्रग्स सिंडिकेट में भी शामिल है.

ममता कुलकर्णी और विक्की गोस्वामी के साथ सुभाष दूदानी की कारोबारी डोर जुड़ने की कहानी को समझने के लिए हमें नब्बे के दशक की शुरुआत में जाना होगा. उन दिनों विक्की गोस्वामी जब शराब तस्करी के धंधे में उलझा हुआ था, तभी उस की मुलाकात विपिन पांचाल नाम के शख्स से हुई. उस ने विक्की को ड्रग कारोबार की अहमियत समझाते हुए उस का परिचय मेंड्रेक्स और मेथाक्यूलिन से करवाया. इस के बाद वह विपिन पांचाल के साथ मिल कर ड्रग्स का धंधा करने लगा.

1993 में जब पांचाल पकड़ा गया तो कारोबार की पूरी बागडोर विक्की के हाथों में आ गई. विक्की ने मुंबई में पैर जमा कर इस कारोबार को पंख लगा दिए. ड्रग्स के कारोबार के चलते उस ने पहले तो अंडरवर्ल्ड में अपनी पैठ बनाई, फिर अपने बूते पर डौन दाऊद इब्राहीम तथा छोटा राजन से करीबी रिश्ते कायम कर लिए.

हाईप्रोफाइल पार्टियों की जान समझी जाने वाली मेंड्रेक्स की सप्लाई के दम पर उस ने कई फिल्मी हस्तियों से अपने नजदीकी ताल्लुकात बना लिए. इसी दौरान विक्की की जानपहचान ममता कुलकर्णी से हुई. दोनों के बीच कुछ ऐसी पटरी बैठी कि जल्दी ही दोनों रिलेशनशिप में साथसाथ रहने लगे. यहां द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट का हवाला देना जरूरी होगा, जिस में कहा गया था कि नब्बे के दशक की शुरुआत के साथ ही हाईप्रोफाइल तबके में ड्रग पार्टियां सब से चर्चित सेनेरियो बन चुकी थीं.

दिलचस्प बात यह है कि यह वह दौर था, जब ममता और विक्की गोस्वामी मुंबई की हाईप्रोफाइल पार्टियों में दूदानी द्वारा निर्मित ड्रग्स टैबलेट सप्लाई करते थे. कहा जाता है कि इस खेल को निर्विघ्न बनाए रखने में गुजरात के 4 वरिष्ठ अधिकारियों की भी पूरी शह थी.

सुभाष दूदानी ड्रग कारोबार में कैसे आया, इस की शुरुआत भी नब्बे के दशक में हुई थी. दूदानी ने अपनी कारोबारी शुरुआत फिल्म ‘विकल्प’ के निर्माण से की, लेकिन फिल्म फ्लौप हो गई. अलबत्ता फिल्म निर्माण से उस के परिचय के दायरे में नामचीन फिल्मी हस्तियां जरूर आ गईं. उन में ममता कुलकर्णी भी शामिल थी. कहते हैं, ममता कुलकर्णी ने ही उस की मुलाकात विक्की गोस्वामी से कराई. तब तक विक्की गोस्वामी जांबिया शिफ्ट हो चुका था और कुछ रसूखदार लोगों की मदद से मेंड्रेक्स बनाने की फैक्ट्री लगाने की फिराक में था. लेकिन बात नहीं बनी.

इस बीच वह पुलिस की निगाहों में चढ़ चुका था. इसी वजह से उस ने फैक्ट्री लगाने का इरादा छोड़ दिया और साथ ही जांबिया भी. जांबिया से भाग कर उस ने दुबई में पनाह ले ली. इस बीच वह सिर्फ इतना ही कर सका कि उस ने मेंड्रेक्स बनाने की पूरी योजना सुभाष दूदानी के हवाले कर दी.

कहा तो यहां तक जाता है कि दूदानी को मेंड्रेक्स की सप्लाई चेन उपलब्ध कराना भी विक्की गोस्वामी का ही काम था. फिलहाल भले ही ममता कुलकर्णी और विक्की गोस्वामी का ठिकाना केन्या में बताया जाता है, लेकिन सूत्रों का कहना है कि अगर दूदानी के कारोबार में लगातार बरकत हुई है तो उस की वजह विक्की और ममता कुलकर्णी के साथ उस का गठजोड़ है.

जिस समय दूदानी डीआरडीआई की गिरफ्त में आया, उस दौरान वह सप्लाई को सुलभ बनाने के लिए एक नया प्रयोग कर रहा था. उस ने सोचा था कि ड्रग्स को अगर केक की शक्ल में बना कर भेजा जाए तो संदेह की गुंजाइश कम हो सकती है. लेकिन वह अपनी योजना पर अमल कर पाता, इस से पहले ही वह डीआरडीआई की गिरफ्त में आ गया. सूत्रों के मुताबिक, जब्त किया गया 24 टन माल केक के रूप में बाहर भेजने की तैयारी थी. इसे मोजांबिक और मालवाई भेजा जाना था.

ड्रग तस्करी के कारोबार के लिए दूदानी के 3 ठिकाने थे मुंबई, दुबई और उदयपुर. उदयपुर उस का स्थाई निवास होने के कारण मेंड्रेक्स के निर्माण और तस्करी के लिहाज से सर्वाधिक सुरक्षित था. सुभाष दूदानी को मेंड्रेक्स बनाने का मशविरा दुबई के तस्कर लियोन ने भी दिया था. लियोन ने इस काम में तकनीकी मदद के लिए उसे सीरिया निवासी एक डाक्टर से भी मिलवाया था.

वह डाक्टर सुभाष दूदानी के मकसद में काफी मददगार साबित हुआ. लियोन ने दूदानी को मेंड्रेक्स बनाने का रासायनिक फार्मूला तो दिया ही, साथ ही 10 करोड़ की मशीनें लगाने के लिए फाइनेंसर से भी मिलवा दिया. लियोन का मशविरा दूदानी को इसलिए भी पसंद आया था, क्योंकि उस के कहे मुताबिक मेंड्रेक्स और मेथाक्यूलिन ड्रग्स खाड़ी देशों और यूके में सब से ज्यादा प्रचलित ड्रग हैं. लियोन का कहना था कि भले ही इस का उत्पादन खर्चीला है, लेकिन इस में मुनाफा भारीभरकम मिलता है.

2 लड़कियों की आशिकी

18 मार्च, 2017 को पुलिस कंट्रोल रूम को सूचना मिली कि गांव अनोड़ा में कुछ लोगों ने 2 लड़कियों को घेर रखा है, उन की जान को खतरा है. कंट्रोल रूम ने यह सूचना थाना राया पुलिस को दे दी, क्योंकि गांव अनोड़ा उसी के अंतर्गत आता था. सूचना मिलते ही थाना राया के थानाप्रभारी इंसपेक्टर अनिल कुमार पुलिस बल के साथ गांव अनोड़ा पहुंच गए. गांव पहुंच कर उन्हें पता चला कि वह फोन रामखिलाड़ी के घर से किया गया था.

पूछताछ में अनिल कुमार के सामने जो घटना आई, वह हैरान करने वाली थी. फोन जिन 2 लड़कियों ने किया था, वे आपस में शादी करना चाहती थीं, जो लोगों को स्वीकार नहीं था. लोग दोनों को अलग करना चाहते थे, जबकि लड़कियां एकदूसरे से अलग नहीं होना चाहती थीं. जब लोग जबरदस्ती करने लगे तो उन्होंने कंट्रोल रूम के 100 नंबर पर फोन कर दिया था.

मामला कोई बहुत गंभीर नहीं था, फिर भी कुछ लोगों को उत्तेजित देख कर अनिल कुमार दोनों लड़कियों को साथ ले कर थाने आ गए. उन के पीछेपीछे दोनों लड़कियों के घर वाले ही नहीं, कुछ रिश्तेदार और गांव के भी तमाम लोग आ गए थे.

पुलिस जिन दोनों लड़कियों को थाने ले आई थी, उन में से एक का नाम सोनिया था. उस की उम्र 23 साल थी. वह मथुरा जिले के थाना राया के गांव अनोड़ा के रहने वाले रामखिलाड़ी की बेटी थी. उस के साथ आई लड़की का नाम रीना था, जो 21 साल की थी. वह गांव रूमगेला के रहने वाले लक्ष्मण की बेटी थी.

थाने में की गई पूछताछ में सोनिया और रीना के प्रेम से ले कर बात विवाह तक पहुंचने की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी—

उत्तर प्रदेश के जिला मथुरा के थाना राया का एक गांव है अनोड़ा. रामखिलाड़ी इसी गांव के रहने वाले थे. उन के परिवार में पत्नी भारती के अलावा 4 बेटियां और एक बेटा था.

रामखिलाड़ी कपड़ों पर प्रैस कर के गुजरबसर करते थे. सोनिया उन की सब से छोटी बेटी थी. उन्होंने 3 बेटियों की शादी कर दी थी. अब वह सोनिया की शादी के बारे में सोचने लगे थे.

लेकिन सोनिया कुछ अलग तरह की लड़की थी, जिसे ले कर रामखिलाड़ी ही नहीं, उन की पत्नी भारती भी चिंतित रहती थी. इस की वजह यह थी कि सोनिया बचपन से ही लड़कियों की तरह नहीं, लड़कों की तरह रहती आई थी. वह कपड़े तो लड़कों जैसे पहनती ही थी, उस की सोच, बातचीत का लहजा भी लड़कों जैसा था. वह रहती भी लड़कों के साथ ही थी.

सोनिया की चालढाल, रहनसहन और उस की बातें सुन कर रामखिलाड़ी और भारती चिंतित रहते थे. जब तक वह बच्ची थी, बात बचपने में टाल दी जाती रही, लेकिन जब वह सयानी हुई तो मांबाप उसे समझाने ही नहीं लगे, बल्कि हिदायतें भी देने लगे. लेकिन सोनिया पर उन के समझाने या हिदायतों का कोई असर नहीं पड़ा.

सोनिया ने 12वीं तक पढ़ाई की और अपने पैरों पर खड़ी होने के लिए सिलाई सीख कर लोगों के कपड़े तो सीने ही लगी, साथ ही सिलाई सिखाने का इंस्टीट्यूट भी खोल लिया. उस के यहां सिलाई सीखने गांव की ही नहीं, अगलबगल के गांवों की भी लड़कियां आती थीं.

सोनिया जहां अपने में मस्त रहती थी, वहीं मांबाप को उस के ब्याह की चिंता थी. क्योंकि उन्हें शायद पता नहीं था कि वह जिस बेटी के ब्याह के लिए परेशान हैं, उस में लड़कियों वाले गुण हैं ही नहीं. उन्होंने सोनिया के मन में क्या है, इस बात की परवाह किए बगैर अलीगढ़ की तहसील अतरौली के गांव जमनपुर के रहने वाले रमेश से उस की शादी तय कर दी.

जब इस बात की जानकारी सोनिया को हुई तो वह विरोध पर उतर आई. लेकिन उस के विरोध के बावजूद रामखिलाड़ी ने उस की शादी धूमधाम से रमेश के साथ कर दी. यह सन 2009 की बात है. मांबाप के इस फैसले से नाराज सोनिया ससुराल चली तो गई, पर बागी बन गई. ससुराल वालों ने उसे हाथोंहाथ लिया, पर उस के मन में जो था, उस में जरा भी बदलाव नहीं आया.

सोनिया ने पति को छूने देने की कौन कहे, चारपाई के भी नजदीक नहीं आने दिया. सवेरा होते ही उस ने साड़ी उतार कर फेंक दी और जींसटौप पहन लिया. बहू की इस हरकत से ससुराल वाले हैरान रह गए. उन्हें यह जरा भी पसंद नहीं आया. उन्होंने उसे नादान समझ कर समझाना चाहा, पर वह कुछ भी समझने को तैयार नहीं थी. उन्होंने फोन कर के सारी बात रामखिलाड़ी को बताई तो वह परेशान हो उठे.

बड़ी मुश्किल से तो उस ने बेटी की शादी की थी. ससुराल जा कर वह इस तरह का नाटक कर रही थी. 5 दिनों बाद वह मायके आई तो उस ने साफ कह दिया कि अब वह ससुराल नहीं जाएगी. इस के बाद लाख प्रयास के बावजूद भी वह ससुराल नहीं गई. मजबूर हो कर मांबाप ने बेटी के तलाक का मुकदमा अदालत में दायर कर दिया, जो अभी भी विचाराधीन है.

सोनिया तनमन से अपने सिलाई सैंटर में लग गई. उसे लड़कियों को सिलाई सिखाना पसंद था. न जाने क्यों उसे लड़कियों को छूना अच्छा लगता था. इसलिए वह उन्हीं के बीच लगी रहती थी. एक दिन पड़ोस के रूमगेला गांव की रहने वाली रीना उस के सिलाई सैंटर पर सिलाई सीखने आई तो उस ने उस में न जाने क्या देखा कि उसे लगा, इसी लड़की की उसे तलाश थी. रीना अभी पढ़ रही थी. वह सिलाई सीख कर अपनी पढ़ाई का खर्च खुद निकालना चाहती थी. उस के पिता लक्ष्मण खेती करते थे. उन के परिवार में पत्नी शांति के अलावा 4 बेटियां थीं. 3 बेटियों की वह शादी कर चुके थे. सब से छोटी रीना अभी पढ़ रही थी.

रूमगेला गांव अनोड़ा से 6 किलोमीटर दूर था. इस के बावजूद रीना रोज साइकिल से सोनिया के यहां सिलाई सीखने आती थी. रीना में ऐसा न जाने कौन सा आकर्षण था कि सोनिया उस की ओर खिंचती जा रही थी. जब तक वह सिलाई सैंटर में रहती, सोनिया को अजीब सा सुख महसूस होता. वह उसी के इर्दगिर्द मंडराती रहती थी. उसे छू कर उस के मन को असीम शांति ही नहीं मिलती थी, बल्ति अद्भुत सुख का भी अहसास होता था.

सोनिया की नजरें हमेशा रीना पर ही जमी रहती थीं, क्योंकि वह उसे अन्य लड़कियों से अलग नजर आती थी. रीना को भी जब उस के मन की बात का अहसास हुआ तो वह भी उस के करीब आने लगी. जल्दी ही वह उस की खास छात्रा बन गई.

एक दिन सोनिया ने बहाने से उसे अपने घर क्या रोका, उस दिन के बाद से वह उसी की हो कर रह गई. इस के बाद सोनिया ने रीना के पिता लक्ष्मण को फोन कर के कहा कि रीना रोजरोज 6 किलोमीटर आनेजाने में थक जाती है. अच्छा होगा कि उसे उस के पास ही रहनें दें. इस से रीना सिलाई भी जल्दी सीख जाएगी और रोजरोज की थकान से भी बच जाएगी.

लक्ष्मण को क्या पता था कि सोनिया के मन में क्या है. उन्होंने सहज भाव से इजाजत दे दी. अब रीना सोनिया के साथ ही रहने लगी. सप्ताह में एकाध दिन वह घर भी चली जाती थी. एक साथ रहने से सोनिया और रीना एकदूसरे के इतने करीब आ गईं कि वे अलग होने के नाम से घबराने लग%8

आवारगी में गंवाई जान – भाग 3

रेखा ने रिंकी को पहली बार तेजप्रताप गिरि के यहां देखा था, तभी से वह भांप गई थी कि यह औरत उस के काम की साबित हो सकती है. उस ने तेजप्रताप से रिंकी का मोबाइल नंबर ले कर उस से बातचीत शुरू कर दी थी. बातचीत के दौरान उसे पता चल गया कि रिंकी पैसों के लिए कुछ भी कर सकती है, इसलिए वह उसे पैसे कमाने का रास्ता बताने लगी. फिर जल्दी ही रिंकी उस के जाल में फंस भी गई.

रिंकी जब भी गोरखपुर आती, रेखा से मिलने उस के घर जरूर जाती थी. इसी आनेजाने में अपनी उम्र से छोटे बबलू, संदीप और मनोज से उस के संबंध बन गए. इन लड़कों से संबंध बनाने में उसे बहुत मजा आता था.

रेखा का एक पुराना ग्राहक था सरदार रकम सिंह, जो सहारनपुर का रहने वाला था. उस ने रेखा से एक कमसिन, खूबसूरत और कुंवारी लड़की की व्यवस्था के लिए कहा था, जिस से वह शादी कर सके. रेखा को तुरंत रिंकी की याद आ गई. रिंकी भले ही शादीशुदा और 2 बच्चों की मां थी, लेकिन देखने में वह कमसिन लगती थी. कैसे और क्या करना है, उस ने तुरंत योजना बना डाली.

अब तक रिंकी की बातचीत से रेखा को पता चल गया था कि वह अपने सीधेसादे पति से खुश नहीं है. उसे भौतिक सुखों की चाहत थी, जो उस के पास नहीं था. इस के लिए वह कुछ भी करने को तैयार थी.

1 दिसंबर, 2013 को रिंकी छोटे बेटे सुंदरम को साथ ले कर गोरखपुर आई. संयोग से उसी दिन किरन किसी बात पर पति से लड़झगड़ कर बड़ी बहन पुष्पा के यहां कुबेरस्थान (कुशीनगर) चली गई. रिंकी ने वह रात तेजप्रताप के साथ आराम से बिताई.

अगले दिन सुबह तेजप्रताप ने रिंकी को उस की ससुराल वापस पटहेरवा भेज दिया. इस के 2 दिनों बाद रेखा ने रिंकी को फोन किया. हालचाल पूछने के बाद उस ने कहा, ‘‘रिंकी मैं ने तुम्हारे लिए एक बहुत ही खानदानी घरवर ढूंढा है. अगर तुम अपने पति को छोड़ कर उस के साथ शादी करना चाहो तो बताओ.’’

रिंकी ने हामी भरते हुए कहा, ‘‘मैं तैयार हूं.’’

‘‘ठीक है, कब और कहां आना है, मैं तुम्हें फिर फोन कर के बताऊंगी.’’ कह कर रेखा ने फोन काट दिया.

8 दिसंबर, 2013 को फोन कर के रेखा ने रिंकी से 11 दिसंबर को गोरखपुर आने को कहा. तय तारीख पर रिंकी अजय से बड़ी ननद पुष्पा के यहां जाने की बात कह कर घर से निकली. शाम होतेहोते वह रेखा के यहां पहुंच गई. उस ने इस की जानकारी तेजप्रताप को नहीं होने दी. रात रिंकी ने रेखा के यहां बिताई. 12 दिसंबर को रेखा ने भतीजे बबलू और भांजे मनोज के साथ उसे सहारनपुर सरदार रकम सिंह के पास भेज दिया और उस के बेटे को अपने पास रख लिया.

रिंकी को सिर्फ इतना पता था कि उस की दूसरी शादी हो रही है, जबकि रेखा ने उसे सरदार रकम सिंह के हाथों 45 हजार रुपए में बेच दिया था. रिंकी को वहां भेज कर उस ने उस के बेटे को बेलीपार की रहने वाली भाजपा नेता इशरावती के हाथों 30 हजार रुपए में बेच दिया था. बच्चा लेते समय इशरावती ने उसे 21 हजार दिए थे, बाकी 9 हजार रुपए बाद में देने को कहा था.

दूसरी ओर 2 दिनों तक रिंकी का फोन नहीं आया तो अजय को चिंता हुई. उस ने खुद फोन किया तो फोन बंद मिला. इस से वह परेशान हो उठा. उस ने पुष्पा को फोन किया तो उस ने बताया कि रिंकी तो उस के यहां आई ही नहीं थी. अब उस की परेशानी और बढ़ गई. वह अपने अन्य रिश्तेदारों को फोन कर के पत्नी के बारे में पूछने लगा. जब उस के बारे में कहीं से कुछ पता नहीं चला तो वह उस की तलाश में निकल पड़ा.

रिंकी का रकम सिंह के हाथों सौदा कर के रेखा निश्चिंत हो गई थी. लेकिन सप्ताह भर बाद उसे बच्चों की याद आने लगी तो वह रकम सिंह से गोरखपुर जाने की जिद करने लगी. तभी सरदार रकम सिंह को रिंकी के ब्याहता होने की जानकारी हो गई. चूंकि रिंकी खुद भी जाने की जिद कर रही थी, इसलिए उस ने रेखा को फोन कर के पैसे वापस कर के रिंकी को ले जाने को कहा.

अब रेखा और मनोज की परेशानी बढ़ गई, क्योंकि रिंकी आते ही अपने बेटे को मांगती. जबकि वे उस के बेटे को पैसे ले कर किसी और को सौंप चुके थे. उन की समझ में नहीं आ रहा था कि वे क्या करें. रिंकी के वापस आने से उन का भेद भी खुल सकता था. इसलिए पैसा और अपनी इज्जत बचाने के लिए उन्होंने उसे खत्म करने की योजना बना डाली.

21 दिसंबर, 2013 को बबलू और मनोज सहारनपुर पहुंचे. रकम सिंह के पैसे लौटा कर वे रिंकी को साथ ले कर ट्रेन से गोरखपुर के लिए चल पड़े. रात 7 बजे वे गोरखपुर पहुंचे. स्टेशन से उन्होंने रेखा को फोन कर के एक मोटरसाइकिल मंगाई. संदीप उन्हें मोटरसाइकिल दे कर अपने गांव चौरीचौरा गौनर चला गया.

आगे रिंकी के साथ क्या करना है, यह रेखा ने मनोज को पहले ही समझा दिया था. मनोज, बबलू रिंकी को ले कर कुसुम्ही जंगल पहुंचे. मनोज ने उस से कहा था कि वह कुसुम्ही के बुढि़या माई मंदिर में उस से शादी कर लेगा. मंदिर से पहले ही मोड़ पर उस ने मोटरसाइकिल रोक दी. तीनों नीचे उतरे तो मनोज ने बबलू को मोटरसाइकिल के पास रुकने को कहा और खुद रिंकी को ले कर आगे बढ़ा.

शायद रिंकी मनोज के इरादे को समझ गई थी, इसलिए उस ने भागना चाहा. लेकिन वह भाग पाती, उस के पहले ही मनोज ने उसे पकड़ कर कमर में खोंसा 315 बोर का कट्टा निकाल कर बट से उस के सिर के पीछे वाले हिस्से पर इतने जोर से वार किया कि उसी एक वार में वह गिर पड़ी.

घायल हो कर रिंकी खडंजे पर गिर कर छटपटाने लगी. उसे छटपटाते देख मनोज ने अपना पैर उस के सीने पर रख कर दबा दिया. जब वह मर गई तो उस की लाश को ठीक कर के दोनों मोटरसाइकिल से घर आ गए. बाद में इस बात की जानकारी तेजप्रताप को हो गई थी, लेकिन उस ने यह बात अपने साले अजय को नहीं बताई थी.

कथा लिखे जाने तक रिंकी हत्याकांड का मुख्य अभियुक्त मनोज कुमार पुलिस के हाथ नहीं लगा था. सरदार रकम सिंह की भी गिरफ्तारी नहीं हो पाई थी. वह भी फरार था. बाकी सभी अभियुक्तों को पुलिस ने जेल भेज दिया था.

इस हत्याकांड का खुलासा करने वाली टीम को वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक प्रदीप कुमार ने 5 हजार रुपए पुरस्कार देने की घोषणा की है.

—कथा पारिवारिक और पुलिस सूत्रों पर आधारित.

क्राइम पेट्रोल देखकर किया घिनौना अपराध

बुधवार 2 मई की रात के लगभग 9 बजे कोटा के पुलिस अधिकारियों की बैठक चल रही थी. मुख्य मुद्दा था मार्बल व्यवसाई परिवार के बेटे विशाल मेवाड़ा के अपहरण और फिरौती का. कोटा में नित नए अपराधों से सकपकाई पुलिस के लिए यह गंभीर चुनौती थी.

दरअसल, वाकया कुछ ऐसा था जो ढाई साल पहले घटित रुद्राक्ष हांडा कांड के अंदेशों को बल दे रहा था, जिस में फिरौती के लिए किए गए अपहरण में बच्चे की हत्या भी कर दी गई थी. पुलिस अधीक्षक अंशुमान भोमिया ने एक पल अपने अधीनस्थ अफसरों पर सरसरी नजर दौड़ाने के बाद कहना शुरू किया, ‘‘आप के सामने फिर एक नया इम्तिहान है. हमें एकएक कदम बहुत सोचसमझ कर उठाना होगा.’’

बुधवार 2 मई की शाम करीब 7 बजे बोरखेड़ा के थानाप्रभारी महावीर सिंह जिस समय अपने थाने में बैठे थे, तभी लगभग 45-46 साल की रुआंसी औरत कमरे में दाखिल हुई. कुलीन और संपन्न परिवार की लगने वाली उस महिला के चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं. महावीर सिंह ने उसे सांत्वना देते हुए पूछा, ‘‘क्या बात है, आप कौन हैं और इस तरह परेशान और घबराई हुई क्यों हैं?’’

‘‘परेशानी की तो बात यह है थानेदार साहब, मेरा बेटा गायब है, उस का अपहरण कर लिया गया है.’’ महिला ने अपनी बात सिलसिलेवार बतानी शुरू की, ‘‘साहब, मेरा नाम भूलीबाई है. मैं मार्बल कारोबारी बनवारी लाल मेवाड़ा की पत्नी हूं. मेरा 19 साल का बेटा विशाल मेवाड़ा कोटा के योगीराज पौलीटेक्निक कालेज में पढ़ रहा था. वह वहां से गायब हो गया.’’

महावीर सिंह ने उन्हें पानी का गिलास थमाते हुए कहा, ‘‘आप निश्चिंत हो कर पूरी बात बताइए.’’

एक ही बार में पानी का गिलास खाली कर के महिला ने कहना शुरू किया, ‘‘हम खैराबाद कस्बे में रहते हैं. मेरा बेटा विशाल कोटा में रह कर पौलीटेक्निक कालेज में पढ़ रहा था. पति बनवारीलाल कारोबार के सिलसिले में सूरत गए हुए हैं. अपहर्त्ताओं ने मंगलवार पहली मई को मेरे पति को मोबाइल पर फोन कर के 15 लाख की फिरौती मांगी है.’’

पलभर रुकने के बाद भूलीबाई ने कहना शुरू किया, ‘‘पति को मोबाइल पर पहला फोन दोपहर बाद 4 बजे आया, जिस में एक आदमी ने विशाल के अपहरण करने की इत्तिला देते हुए 15 लाख की रकम का इंतजाम करने को कहा और इस के साथ ही फोन काट दिया. करीब 15 मिनट बाद फिर उसी आवाज में धमकी भरा फोन आया कि पुलिस को खबर की तो विशाल को जान से मार दिया जाएगा. इस के साथ ही फोन बंद हो गया.’’

‘‘फिर उस के बाद कोई फोन आया?’’ थानाप्रभारी महावीर सिंह के स्वर में हैरानी का भाव स्पष्ट था.

‘‘रात 11 सवा 11 बजे मेरे पति का फोन आया. उन्होंने बताया कि 11 बज कर 1 मिनट पर उन के पास आए फोन काल में कहा गया था कि रकम कहां ले कर आना है, इस बाबत अगले दिन शाम 4 बजे बताएंगे और इस के साथ ही फोन बंद कर दिया.’’

‘‘आप के पति ने उन्हें क्या जवाब दिया?’’

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‘‘क्या कहते,’’ भूलीबाई ने सुबकते हुए कहा, ‘‘मेरे पति ने तो बड़ी आजिजी के साथ कहा कि तुम को जो रकम चाहिए, हम देंगे. बस हमारे बेटे को कुछ नहीं होना चाहिए.’’

लेकिन अगले ही पल भूलीबाई ने जो कहा, वह चौंकाने वाला था. उन्होंने बताया, ‘‘मेरे पति इस बात को ले कर हैरान थे कि फोन करने वाला जो कोई भी था, हमारे बेटे के मोबाइल से ही फोन कर रहा था.’’ इस के साथ ही भूलीबाई फूटफूट कर रोने लगी.

गहरी सांस लेते हुए महावीर सिंह ने कहा, ‘‘कोई और बात जो आप कहना चाहें.’’

‘‘हां साहब,’’ भूलीबाई ने जैसे याद करते हुए कहा, ‘‘साहब, मुझे फोन करने से पहले मेरे पति ने विशाल के मामा को फोन कर के विशाल के अपहरण की खबर देने के साथ उस के कमरे पर जा कर उसे तलाश करने को कहा था. उस का मामा दिनेश कोटा में ही रहता है. दिनेश ने विशाल के कमरे पर जा कर देखा तो वह वहां नहीं मिला. दिनेश ने मेरे पति को तो यह बात बताई ही, मुझे भी फोन कर के कोटा आने को कहा.’’

बोरखेड़ा थानाप्रभारी ने रिपोर्ट दर्ज करने के साथ ही फौरन इस घटना और घटनाक्रम के बारे में पुलिस अधीक्षक अंशुमान भोमिया को जानकारी दी. इस के बाद तत्काल पुलिस सक्रिय हो गई. आननफानन में पुलिस अधिकारियों की बुलाई गई बैठक की वजह यही थी.

भोमिया साहब को मालूम था कि इतने संपन्न परिवार के बेटे के अपहरण की बाबत जब लोगों को पता चलेगा तो लोग पुलिस को आड़े हाथों लेने से पीछे नहीं हटेंगे.

अपहरण के इस मामले में किसी बड़े गिरोह का हाथ हो सकता है, यह सोच कर पुलिस अधीक्षक अंशुमान भोमिया ने क्षेत्राधिकारी नरसीलाल मीणा और राजेश मेश्राम के अलावा सर्किल इंसपेक्टर श्रीचंद सिंह, महावीर सिंह, आनंद यादव, मुनींद्र सिंह, लोकेंद्र पालीवाल, विजय शंकर शर्मा और एसआई महेश कुमार, एएसआई दिनेश त्यागी, कमल सिंह और प्रताप सिंह के नेतृत्व में 7 टीमों का गठन किया और विशाल के अपहर्त्ताओं का पता लगाने की जिम्मेदारी अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक समीर कुमार को सौंप दी.

अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक समीर कुमार के निर्देश पर स्पैशल स्टाफ ने बड़ी संख्या में लोगों से गहनता से पूछताछ की. करीब 100 से अधिक टीवी फुटेज निकाले, लेकिन कोई काम की बात मालूम नहीं हो सकी.

पुलिस को तब हैरानी हुई, जब विशाल के कुछ दोस्तों ने बताया कि उन के पास विशाल का फोन आया था. उस ने हम से 2-3 सौ रुपए की जरूरत बताते हुए पैसों की मांग की थी. लेकिन इस से पहले कि उस से इतनी छोटी रकम मांगने की वजह पूछते, उस का फोन संपर्क टूट गया.

पुलिस ने अंडरवर्ल्ड को भी खंगाला लेकिन लाख सिर पटकने के बावजूद पुलिस ऐसे किसी शातिर गिरोह का पता नहीं लगा सकी, जिस से इस मामले में कोई जानकारी मिल पाती. इस मामले में पुलिस ने फिरौती के लिए कुख्यात गिरोहों का पुलिस रिकौर्ड भी टटोला.

तमाम पुलिस रिकौर्ड जांचने के बाद अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक समीर कुमार इस नतीजे पर पहुंचे कि विशाल के अपहरण में कम से कम किसी नामी गिरोह का हाथ नहीं है.

पौलीटेक्निक की पढ़ाई करते हुए विशाल बोरखेड़ा के इलाके की आकाश नगर कालोनी में उसी कालेज में पढ़ने वाले मनोज मीणा के साथ किराए के कमरे में रहता था. पुलिस ने मनोज की गतिविधियों को पूरी तरह टटोला, लेकिन कहीं कोई संदिग्ध बात नजर नहीं आई.

जिस समय पुलिस विशाल के रूम पार्टनर मनोज मीणा समेत अन्य दोस्तों से गहनता से पूछताछ कर रही थी, तभी इस बात का पता चला कि विशाल के दोस्ताना रिश्ते विक्रांत उर्फ हिमांशु, प्रदीप और विजेंद्र भाटी उर्फ लकी से कुछ ज्यादा ही गहरे थे.

विशाल के मकान मालिक के मुताबिक इन तीनों लड़कों का विशाल के पास वक्तबेवक्त कुछ ज्यादा ही आनाजाना था. यह सूचना मिलते ही पुलिस ने उन्हें पूछताछ के घेरे में ले लिया, लेकिन हर सवाल पर तीनों पुलिस को छकाते रहे. पुलिस को लगा भी कि कहीं यह उस का भ्रम तो नहीं, फिर भी पुलिस ने अपनी जांच की दिशा नहीं बदली.

अब तक विशाल के पिता बनवारी लाल मेवाड़ा सूरत से कोटा लौट आए थे. उन्होंने पुलिस की जानकारी में इजाफा करते हुए बताया कि उन्हें मंगलवार को दोपहर बाद 4 बजे, फिर सवा 4 बजे तथा बाद में रात को 11 बज कर एक मिनट पर फोन आए थे.

रात को आने वाले फोन काल में अपहर्त्ताओं का कहना था कि फिरौती की रकम ले कर उन्हें दरा के निकट रेलवे क्रौसिंग पर पहुंचना होगा. कब, यह बाद में बताएंगे. अपहर्त्ता का यह भी कहना था कि रकम मिलने के एक घंटे बाद ही विशाल को छोड़ दिया जाएगा.

बनवारी लाल ने यह सब बताते हुए पुलिस से यह शंका भी जाहिर की कि फोन काल जब विशाल के मोबाइल से की जा रही थीं तो क्या उसे सुरक्षित मान लिया जाना चाहिए.

गुरुवार 3 मई की सुबह जब पुलिस इसी मुद्दे पर मंथन कर रही थी, तभी एक ग्रामीण की सूचना ने अधिकारियों को स्तब्ध कर दिया. सूचना बोरखेड़ा से करीब 20 किलोमीटर दूर नोताड़ा और मानस गांव के वन क्षेत्र के बीच बहने वाली नदी की कराइयों में एक लाश पड़ी होने की थी.

हजार अंदेशों में घिरी पुलिस के लिए यह सूचना चौंकाने वाली थी. पुलिस टीम तुरंत वहां के लिए रवाना हो गई. पुलिस के साथ विशाल के पिता बनवारीलाल भी थे. चंद्रलोई नदी का यह तटीय क्षेत्र हालांकि कुदरती रूप से मनोहारी था, जहां शहरी कोलाहल से ऊबे लोगों या फिर सैलानियों का आनाजाना था.

क्षेत्राधिकारी राजेश मेश्राम चंद्रलोई नदी की कराइयों के पास जीप रुकवा कर अपनी टीम के साथ नीचे उतर गए. तभी उन की नजर 3-4 फुट ऊंची झाडि़यों की कतार की तरफ चली गई. वहां पर एक युवक औंधा पड़ा नजर आया.

पुलिस के जवानों ने शव को सीधा किया तो बनवारीलाल वहीं पछाड़ खा कर गिर गए. शव विशाल का ही था. उस का चेहरा कुचल दिया गया था. लाश नमक की परत में लिपटी हुई थी. राजेश मेश्राम लाश पड़ी होने की स्थिति देख कर एक पल में ही भांप गए कि हत्या कहीं और की गई थी, लेकिन पुलिस को भटकाने के लिए लाश को यहां ला कर फेंका गया होगा.

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विशाल की हत्या बहुत ही निर्ममतापूर्वक की गई थी. उस की गरदन किसी तेजधार हथियार से रेती गई थी. संघर्ष का कोई चिह्न नहीं था. घटनास्थल की सारी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद राजेश मेश्राम ने शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. उसी दिन पोस्टमार्टम के बाद लाश मृतक के पिता को सौंप दी गई.

यह अजीब इत्तफाक था कि अभी शव के पंचनामे की काररवाई हो ही रही थी कि राजेश मेश्राम को एएसपी से सूचना मिली कि पूछताछ में अपराधी टूट गए हैं और उन्होंने अपना जुर्म कबूल कर लिया है.

अपराध का यह तानाबाना 3 सनकी और खुराफाती लड़कों ने बुना था. आईटीआई डिप्लोमा कर चुका विक्रांत उर्फ हिमांशु बोरखेड़ा का ही रहने वाला था. आईटीआई में डिप्लोमा कर चुका विक्रांत इस हद तक सनकी था कि सनक में वह अपनी कलाइयों में ब्लेड मार कर खुद ही कई जगह अपने हाथों को जख्मी कर चुका था.

बृजेंद्र सिंह भाटी उर्फ लकी कोटा के नजदीकी कस्बे कैथून का रहने वाला था. वह औटोमोबाइल से जुड़ी एक कंपनी में काम करता था और बोरखेड़ा में ही किराए पर कमरा ले कर रह रहा था.

तीसरा साथी प्रदीप उर्फ बिन्नी रोजीरोजगार के लिए गोलगप्पों का ठेला लगाता था. बिन्नी भिंड का बाशिंदा था और कोटा की मन्ना कालोनी में रह रहा था. सनक में तीनों एक से बढ़ कर एक थे. तीनों लगभग 18 से 20 साल की उम्र के थे.

पूछताछ में पता चला कि तीनों की हसरतों के पखेरू आसमानी उड़ान भरते रहे, नतीजतन मौजमस्ती और अय्याशी के शौक के लिए जितना भी कमाते थे, पूरा नहीं पड़ता था. तीनों की इस मंडली में विशाल शामिल हुआ तो बोरखेड़ा में ही रहने वाले विक्रांत उर्फ हिमांशु की बदौलत.

दारूबाजी के महंगे शौक में संपन्न बाप का बेटा विशाल उन के लिए काफी काम का था. विक्रांत, बृजेंद्र और प्रदीप की साझा ख्वाहिश थी तो एक ही कि कोई ऐसा शख्स हाथ चढ़ जाए, जिस से इतना पैसा मिल सके कि मौजममस्ती के लिए तरसना न पड़े.

नशे के सुरूर में एक दिन विशाल का काल ही उस की जुबान पर बैठ गया और वह कह बैठा, ‘‘आज की पार्टी मेरी तरफ से.’’

‘‘किस खुशी में?’’ पूछने पर विशाल ने कह दिया, ‘‘आज ही मेरे पिता को एक बड़े सौदे में भारीभरकम रकम मिली है. इसलिए जश्न होना चाहिए.’’

फिर क्या था, तीनों की आंखों में लालच चमक उठा. पार्टी खत्म होने के बाद तीनों सनकी सिर जोड़ कर बैठे तो बदनीयती जुबान पर आ गई. तीनों की जुबान पर एक ही बात थी, ‘अगर यह बड़ी रकम हमारे हाथ आ जाए तो मजे ही मजे हैं.’ लेकिन सवाल था कि कैसे?

कैसे का आइडिया भी अनायास ही मिल गया. उन के लिए संयोग था और विशाल के लिए दुर्भाग्य कि इत्तफाक से तीनों आपराधिक घटना पर आधारित क्राइम पैट्रोल सीरियल देखते थे. एक कहानी ऐसी ही एक घटना पर आधारित थी, जिस में पैसों की खातिर 3 सिरफिरे अपने दोस्त से ही दगा करते हैं और उस की हत्या कर देते हैं.

फिरौती की घटना पर बुनी गई इस कहानी ने इन तीन तिलंगों को भी दगाबाजी की राह दिखा दी. योजना बनाई गई कि शराब की पार्टी में विशाल को इतनी पिला दी जाए कि वह होश खो बैठे. फिर उसे काबू में कर के उस के पिता से 15 लाख की फिरौती मांगी जाए.

तीनों का मानना था कि एकलौती औलाद के लिए एक दौलतमंद बाप 15 लाख क्या 15 करोड़ भी दे सकता है.

सवाल था कि विशाल बुलाने पर तयशुदा ठिकाने पर आ भी जाए और अपना मोबाइल भी इस्तेमाल न करना पड़े. यह योजना मंगलवार को कामयाब भी हो गई.  इन लोगों ने सुबह 10 बजे बोरखेड़ा पहुंच कर एक सब्जी वाले के मोबाइल से फोन कर के विशाल को बुलाया और वहां से उसे बृजेंद्र के रामराजपुरा स्थित खेत पर ले गए.

सब्जी वाले को यह कह कर विश्वास में लिया कि भैया, हमारे मोबाइल की बैटरी खत्म हो गई है, इसलिए एक जरूरी फोन कर लेने दो. सब्जी वाला झांसे में आ गया. दोपहर 12 बजे रामराजपुरा पहुंच कर दारू का दौर चला तो विशाल को जम कर दारू पिलाई गई, ताकि वह होश खो बैठे. ऐसा ही हुआ भी.

नशे में बेसुध विशाल के मोबाइल से बृजेंद्र ने पहले विशाल को अपने कब्जे में होने की बात की, फिर 15 लाख की मांग करते हुए धमकी दी कि पुलिस को इत्तला दी तो बेटा जिंदा नहीं बचेगा. असहाय पिता बनवारीलाल ने सहमति जता दी तो उसे पैसे पहुंचाने का निर्धारित स्थान भी बता दिया गया.

एसपी भोमिया साहब ने पूछा, ‘‘जब बाप ने फिरौती की रकम देने का भरोसा दे दिया था तो बेटे को क्यों मारा?’’

एसपी ने आंखें तरेरते हुए हड़काया तो विक्रांत ने उगल दिया, ‘‘हमें डर था कि रकम देने के बाद विशाल हमारा भेद खोलने से नहीं चूकेगा. इसलिए उसे मारना पड़ा.’’

‘‘कैसे और कब?’’ एसपी ने पूछा, ‘‘दरिंदे बन गए तुम लोग? कैसे मारा?’’

‘‘हत्या तो हम ने चाकुओं से कर दी थी. बाद में पहचान मिटाने के लिए उस पर नमक भी लपेट दिया. लेकिन…’’ उस ने बिन्नी और लक्की की तरफ देखते हुए कहा, ‘‘ये दोनों संतुष्ट नहीं थे, इसलिए लोहे की रौड से उस के चेहरे पर इतने वार किए कि लाश पहचान में न आ सके. साहब, विशाल की हत्या तो हम ने 2 बजे ही कर दी थी.’’

‘‘फिर?’’

‘‘फिर…’’ अटकते हुए विक्रांत ने बताया, ‘‘इस के बाद लाश को बोरे में भरा और बाइक पर लाद कर नार्दर्न बाईपास के पास चंद्रलोई नदी की कराइयों में डाल आए और घर आ कर सो गए.’’

‘‘नींद आ गई तुम्हें?’’ एसपी भोमिया उन्हें नफरत भरी नजर से देखते हुए बुरी तरह बरस पड़े, ‘‘तुम ने तो शैतान को भी मात दे दी. लानत है तुम पर.’’

एसपी भोमिया ने मामले का रहस्योद्घाटन करते हुए मीडिया से कहा, ‘‘कैसी विचित्र बात है, ऐसे सीरियल से लोग जागरूक कम होते हैं लेकिन अपराधियों को अपराध के नए तरीके सीखने का मौका मिल जाता है.’’

कथा लिखे जाने तक तीनों आरोपी न्यायिक अभिरक्षा में थे.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

आवारगी में गंवाई जान – भाग 2

उसी दिन पुलिस ने उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया. इन की गिरफ्तारी के बाद अजय गिरि का 3 वर्षीय बेटा सुंदरम भी सहीसलामत मिल गया. गिरफ्तार पांचों अभियुक्तों से की गई पूछताछ के बाद रिंकी की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी…

पुलिस ने लाश बरामद होने पर हत्या का जो मुकदमा अज्ञात हत्यारों के खिलाफ दर्ज किया था, खुलासा होने पर अजय से तहरीर ले कर अज्ञात हत्यारों की जगह मनोज पाल, बबलू, संदीप पाल, तेजप्रताप गिरि, रंभा उर्फ रेखा पाल, इशरावती और सरदार रकम सिंह के नाम डाल कर नामजद कर दिया.

25 वर्षीया रिंकी उर्फ रिंकू, उत्तर प्रदेश के जिला कुशीनगर के थाना तरयासुजान के गांव लक्ष्मीपुर राजा की रहने वाली थी. उस के पिता नगीना गिरि गांव में ही रह कर खेती करते थे. इस खेती से ही उन का गुजरबसर हो रहा था. उन के परिवार में रिंकी के अलावा 3 बच्चे, जियुत, रंजीत और नंदिनी थे. नगीना के बच्चों में रिंकी सब से बड़ी थी. रिंकी खूबसूरत तो थी ही, स्वभाव से भी थोड़ा चंचल थी, इसलिए हर कोई उसे पसंद करता था.

नगीना की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि वह बच्चों को पढ़ाते, इसलिए उन्होंने रिंकी की पढ़ाई छुड़ा दी थी. रिंकी जैसे ही सयानी हुई, गांव के लड़के उस के इर्दगिर्द मंडराने लगे. चंचल स्वभाव की रिंकी शहजादियों की तरह जीने के सपने देखती थी. लेकिन उस के लिए यह सिर्फ सपना ही था. यही वजह थी कि पैसों के लालच में वह दलदल में फंसती चली गई.

गांव के कई लड़कों से उस के संबंध बन गए थे. वे लड़के उसे सपनों के उड़नखटोले पर सैर करा रहे थे. जब इस बात का पता उस के पिता नगीना को चला तो उन्होंने इज्जत बचाने के लिए बेटी की शादी कर देना ही उचित समझा. उन्होंने प्रयास कर के कुशीनगर के ही थाना परहरवा के गांव पगरा बसंतपुर के रहने वाले पारस गिरि के बेटे अजय गिरि से उस की शादी कर दी.

पारस गिरि भी खेती से ही 7 सदस्यों के अपने परिवार कोे पाल रहे थे. शादी के बाद बड़ा बेटा नौकरी के लिए बाहर चला गया तो उस से छोटा अजय पिता की मदद करने लगा. साथ ही वह एक बिल्डिंग मैटेरियल की दुकान, जहां वेल्डर का भी काम होता था, पर नौकरी करता था. इस नौकरी से उसे इतना मिल जाता था कि उस का खर्च आराम से चल जाता था. पारस ने बेटियों की शादी अजय की मदद से कर दी थी.

पारस ने छोटी बेटी किरण की शादी जिला देवरिया के थाना तरकुलवा के गांव बालपुर के रहने वाले लालबाबू गिरि के सब से छोटे बेटे तेजप्रताप गिरि से की थी. शादी के बाद तेजप्रताप किरण को ले कर गोरखपुर आ गया था, जहां शाहपुर की द्वारिकापुरी कालोनी में किराए का कमरा ले कर रहने लगा था.

रिंकी ने शहजादियों जैसे जीने के जो सपने देखे थे, शादी के बाद भी वे पूरे नहीं हुए. वह खूबसूरत और स्मार्ट पति चाहती थी, जो उसे बाइक पर बिठा कर शहर में घुमाता, होटल और रेस्तरां में खाना खिलाता. जबकि रिंकी का शहजादा अजय बेहद सीधासादा, ईमानदार और समाज के बंधनों को मानने वाला मेहनती युवक था. दुनिया की नजरों में वह भले ही रिंकी का पति था, लेकिन रिंकी ने दिल से कभी उसे पति नहीं माना . वह अभी भी किसी शहजादे की बांहों में झूलने के सपने देखती थी.

रिंकी सपने भले ही किसी शहजादे के देख रही थी, लेकिन रहती अजय के साथ ही थी. वह उस के 2 बेटों, सत्यम और सुंदरम की मां भी बन गई थी. इसी के बाद अजय ने छोटी बहन किरन की शादी तेजप्रताप से की तो पहली ही नजर में तेजप्रताप रिंकी को सपने का शहजादा जैसा लगा. फिर आनेजाने में कसरती बदन और मजाकिया स्वभाव के तेजप्रताप पर रिंकी कुछ इस तरह फिदा हुई कि उस से नजदीकी बनाने के लिए बेचैन रहने लगी.

तेजप्रताप को रिंकी के मन की बात जानने में देर नहीं लगी. सलहज के नजदीक पहुंचने के लिए वह जल्दीजल्दी ससुराल आने लगा. इस आनेजाने का उसे लाभ भी मिला. इस तरह दोनों जो चाहते थे, वह पूरा हो गया. रिंकी और तेजप्रताप के शारीरिक संबंध बन गए. दोनों बड़ी ही सावधानी से अपनअपनी चाहत पूरी कर रहे थे, इसलिए उन के इस संबंध की जानकारी किसी को नहीं हो सकी थी.

तेजप्रताप पादरी बाजार पुलिस चौकी के पास छोलेभटूरे का ठेला लगाता था. उस की दुकान पर बबलू और संदीप पाल अकसर छोले भटूरे खाने आते थे. बबलू और संदीप में अच्छी दोस्ती थी. उन की उम्र 15-16 साल के करीब थी. तेजप्रताप के वे नियमित ग्राहक तो थे, इसलिए उन में दोस्ती भी हो गई थी. बाद में पता चला कि वे रहते भी उसी के पड़ोस में थे. इस से घनिष्ठता और बढ़ गई. उन का परिवार सहित तेजप्रताप के घर आनाजाना हो गया.

एक बार रिंकी अजय के साथ ननद के घर गोरखपुर ननदननदोई से मिलने आई तो संयोग से उसी समय संदीप पाल की मां रंभा उर्फ रेखा पाल भी किसी काम से तेजप्रताप से मिलने आ गई. रेखा ने रिंकी को गौर से देखा तो महिलाओं की पारखी रेखा को वह अपने काम की लगी.

रिंकी ने तेजप्रताप के घर का रास्ता देख लिया तो उस का जब मन होता, वह किसी न किसी बहाने तेजप्रताप से मिलने गोरखपुर आने लगी. रिंकी गोरखपुर अकसर आने लगी तो रंभा उर्फ रेखा से भी जानपहचान हो गई. रेखा के 20 वर्षीय भांजे मनोज पाल की नजर मौसी के घर आनेजाने में रिंकी पर पड़ी तो खूबसूरत रिंकी का वह दीवाना हो उठा.

मनोज गोरखपुर में टैंपो चलाता था. वह रहने वाला गोरखपुर के थाना गोला के गांव हरपुर का था. वह मौसी रेखा के यहां इसलिए बहुत ज्यादा आताजाता था, क्योंकि वह उस का खास शागिर्द था. रेखा देखने में जितनी भोलीभाली लगती थी, भीतर से वह उतनी ही खुराफाती थी. उस औरत से पूरा मोहल्ला परेशान था. इस की वजह यह थी कि वह कालगर्ल रैकट चलाती थी. उस के इस काम में उस का भतीजा बबलू, बेटा संदीप और भांजा मनोज उस की मदद करते थे. रेखा के अच्छेबुरे सभी तरह के लोगों से अच्छे संबंध थे, इसलिए मोहल्ले वाले सब कुछ जानते हुए भी उस का कुछ नहीं कर पाते थे.

आगे क्या हुआ? जानने के लिए पढ़ें कहानी का अगला भाग…

आवारगी में गंवाई जान – भाग 1

रात साढ़े 9 बजे के आसपास कुसुम्ही जंगल के वन दरोगा राकेश कुमार गश्त करते हुए बुढि़या माई दुर्गा मंदिर रोड पर मंदिर से थोड़ा आगे बढ़े थे कि वहां लगे खड़ंजे पर उन्हें एक लाश पड़ी दिखाई दी. उन्होंने टार्च की रोशनी में देखा, लाश महिला की थी. वह हरा सूट पहने थी. उस के दोनों पैरों में चांदी की पाजेब थी. लाश के पास ही एक पीले रंग की शौल पड़ी थी. सिर पर पीछे की ओर किसी धारदार हथियार से वार किया गया था. वहां बने घाव से अभी भी खून बह रहा था. इस से उन्हें लगा कि यह हत्या अभी जल्दी ही की गई है.

राकेश कुमार ने फोन द्वारा थाना खोराबार के थानाप्रभारी श्रीप्रकाश यादव को लाश पड़ी होने की सूचना दी. वह गायघाट मर्डर केस को ले कर वैसे ही परेशान थे, इस लाश ने उन की परेशानी और बढ़ा दी. बहरहाल उन्होंने यह सूचना वरिष्ठ अधिकारियों को दी और खुद पुलिस बल के साथ घटनास्थल के लिए रवाना हो गए. उन के पहुंचने के थोड़ी देर बाद ही क्षेत्राधिकारी नम्रता श्रीवास्तव, एसपी (सिटी) परेश पांडेय और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक प्रदीप कुमार भी घटनास्थल पर पहुंच गए.

मृतका के सिर से बह रहे खून से पुलिस अधिकारियों ने अनुमान लगाया कि हत्या एकाध घंटे के अंदर हुई है. मृतका की उम्र 24-25 साल थी. घटनास्थल पर संघर्ष के निशान थे. खड़ंजे से कुछ दूरी पर जूते और  दुपहिया वाहन के टायरों के निशान साफ दिखाई दे रहे थे. इस का मतलब हत्यारे मोटरसाइकिल से आए थे. मृतका की छाती पर भी जूते के निशान मिले थे. इस से अंदाजा लगाया गया कि हत्यारे मृतका से नफरत करते रहे होंगे.

लाश के निरीक्षण के दौरान मृतका की दाहिनी हथेली पर पुलिस को एक मोबाइल नंबर लिखा दिखाई दिया. पुलिस ने वह मोबाइल नंबर नोट कर के लाश को पोस्टमार्टम के लिए बाबा राघवदास मैडिकल कालेज भिजवा दिया.

थानाप्रभारी श्रीप्रकाश यादव ने मृतका के पास से मिला सामान कब्जे में ले लिया था, ताकि उस की शिनाख्त कराने में मदद मिल सके. यह 21 दिसंबर की रात की बात थी. 22 दिसंबर की सुबह उन्होंने मृतका की हथेली से मिले मोबाइल नंबर पर फोन किया तो दूसरी ओर से फोन उठाने वाले ने ‘हैलो’ कहने के साथ ही उन के बारे में भी पूछ लिया.

‘‘मैं गोरखपुर के थाना खोराबार का थानाप्रभारी श्रीप्रकाश यादव बोल रहा हूं.’’ उन्होंने अपना परिचय देते हुए पूछा, ‘‘यह नंबर आप का ही है. आप कहां से और कौन बोल रहे हैं?’’

‘‘साहब मैं अजय गिरि बोल रहा हूं. यह नंबर आप को कहां से मिला?’’

‘‘यह नंबर एक महिला की हथेली पर लिखा था, जिस की हत्या हो चुकी है.’’

‘‘उस का हुलिया कैसा था?’’ अजय गिरि ने पूछा.

थानाप्रभारी ने हुलिया बताया तो अजय ने छूटते ही कहा, ‘‘साहब, यह हुलिया तो मेरी पत्नी रिंकी का है. क्या उस की हत्या हो चुकी है? दिसंबर, 2013 को छोटे बेटे सुंदरम को ले कर घर से निकली थी. तब से उस का कुछ पता नहीं चला. उसी की तलाश में मैं बड़े भाई की ससुराल मधुबनी आया था.’’

‘‘ऐसा करो, तुम थाना खोराबार आ जाओ. मरने वाली तुम्हारी पत्नी है या कोई और यह तो यहीं आ कर पता चलेगा.’’ थानाप्रभारी ने कहा, ‘‘लेकिन मृतका के पास से हमें कोई बच्चा नहीं मिला है. भगवान तुम्हारे साथ अच्छा ही करे.’’

अजय ने पत्नी के साथ बच्चे के होने की बात की थी, जबकि महिला की लाश के पास से कोई बच्चा नहीं मिला था. इस से थानाप्रभारी थोड़ा पसोपेश में पड़ गए कि उस का बच्चा कहां गया? बच्चे की उम्र भी कोई ज्यादा नहीं थी. उन्हें लगा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि हत्यारों ने बच्चे को कहीं दूसरी जगह ले जा कर ठिकाने लगा दिया हो. गुत्थी सुलझने के बजाय और उलझ गई थी. अब यह अजय के आने पर ही सुलझ सकती थी.

उसी दिन शाम होतेहोते अजय थाना खोराबार आ पहुंचा. थानाप्रभारी श्रीप्रकाश यादव ने मेज की दराज से कुछ फोटो और लाश से बरामद सामान निकाल कर उस के सामने रखा तो सामान और फोटो देख कर वह रो पड़ा. थानाप्रभारी समझ गए कि मृतका इस की पत्नी रिंकी थी. इस के बाद मैडिकल कालेज ले जा कर उसे शव भी दिखाया गया. अजय ने उस शव की भी शिनाख्त अपनी पत्नी रिंकी के रूप में कर दी. अब सवाल यह था कि उस के साथ जो बच्चा था, वह कहां गया?

थानाप्रभारी श्रीप्रकाश यादव द्वारा की गई पूछताछ में अजय ने बताया, ‘‘रिंकी अपने 3 वर्षीय छोटे बेटे सुंदरम को साथ ले कर ननद पुष्पा की ससुराल कुबेरस्थान जाने की बात कह कर घर से निकली थी. वहां जाने के लिए मैं ने ही उसे जीप में बैठाया था. उस ने 2 दिन बाद लौट कर आने को कहा था.

2 दिनों बाद जब वह घर नहीं लौटी तो मैं ने उस के मोबाइल पर फोन किया. उस के मोबाइल का स्विच औफ था. बाद में पता चला कि वह कुबेरस्थान न जा कर सीधे गोरखपुर में रहने वाले मेरे बहनोई तेजप्रताप गिरि के यहां चली गई थी. इस के बाद मैं ने उन से रिंकी के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि वह उन के यहां आई तो थी, लेकिन दूसरे ही दिन चली गई थी. उस के बाद उस का कुछ पता नहीं चला.’’

अजय के अनुसार उस का बहनोई तेजप्रताप गिरि शाहपुर की द्वारिकापुरी कालोनी में किराए पर परिवार के साथ रहता था. पुलिस ने उसी रात उस के घर से उसे पकड़ लिया. थाने ला कर उस से पूछताछ शुरू हुई. तेजप्रताप गिरि कुछ भी बताने को तैयार नहीं था. वह काफी देर तक पुलिस को इधरउधर घुमाता रहा. जब पुलिस को लगा कि यह झूठ बोल रहा है, तब पुलिस ने अपने ढंग से उस से सच्चाई उगलवाई.

तेजप्रताप ने पुलिस को जो बताया था, उसी के आधार पर पुलिस ने बबलू और संदीप पाल को गिरफ्तार कर लिया. जबकि मनोज फरार होने में कामयाब हो गया. बबलू और संदीप से पूछताछ की गई तो पता चला कि रिंकी की हत्या के मामले में 2 महिलाएं रंभा उर्फ रेखा पाल और इशरावती भी शामिल थीं.

आगे क्या हुआ? जानने के लिए पढ़ें कहानी का अगला भाग…