Haryana Crime: पुलिस के शिकंजे में शातिर जालसाज

Haryana Crime: एक बार किसी के हस्ताक्षर देख कर हूबहू वैसे ही हस्ताक्षर कर लेना धनीराम मित्तल के बाएं हाथ का खेल था. उस के द्वारा किए गए फरजी हस्ताक्षरों को हैंडराइटिंग एक्सपर्ट भी नहीं पकड़ सकते थे. फरजी हस्ताक्षरों के सहारे वह अफसर ही नहीं बना, झज्जर की कोर्ट में सवा महीने तक जज बन कर उस ने तमाम मुलजिमों को जेल से रिहा भी करा दिया था.

अब तक एक हजार से अधिक आपराधिक वारदातों को अंजाम दे चुके धनीराम मित्तल का जन्म 29 जून, 1939 को हरियाणा के भिवानी शहर के रहने वाले अमीलाल मित्तल के घर हुआ था. अमीलाल एक साधनसंपन्न व्यक्ति थे. उन के परिवार में पत्नी किन्नी देवी के अलावा 4 बेटियां और 5 बेटे थे. उन की एक आटा मिल थी, जिस से आमदनी अच्छी हो रही थी, सो उन्हें 9 बच्चों का पालनपोषण करने में कोई दिक्कत नहीं आई. अमीलाल ने उस जमाने में अपने सभी बच्चों को उच्च शिक्षा दिलवाई थी. धनीराम ने रोहतक के हिंदू कालेज से बीएससी की थी.

धनीराम तेजतर्रार होने के साथ पढ़ाई में भी होशियार था. बीएससी करने के बाद उस ने राजस्थान के श्रीगंगानगर के खालसा कालेज से एलएलबी की. इस के बाद उस ने करनाल स्थित ‘मौडर्न सेल’ नाम के इंस्टीट्यूट से हस्तलिपि विशेषज्ञ का एक साल का डिप्लोमा किया. इसी क्षेत्र में विशेषज्ञता हासिल करने के लिए उस ने कोलकाता में रह कर हैंडराइटिंग एक्सपर्ट का 3 साल का डिप्लोमा किया. पढ़ाई के साथसाथ वह सरकारी नौकरी पाने की भी तैयारी कर रहा था. उस की मेहनत रंग लाई. रेलवे में क्लर्क की परीक्षा पास करने के बाद सन 1942 में वह दिल्ली जंक्शन पर बुकिंग क्लर्क बन गया. सरकारी नौकरी मिलने से घर वाले भले ही खुश थे, लेकिन धनीराम इस नौकरी से खुश नहीं था.

बुकिंग क्लर्क की नौकरी से वह ऊब गया तो दूसरी नौकरी की कोशिश करने लगा. आज की तरह उन दिनों नौकरी के लिए इतनी मारामारी नहीं थी. फिर धनीराम एक काबिल इंसान था, इसलिए थोड़ी कोशिश के बाद उसे हरियाणा राज्य परिवहन निगम में सुपरवाइजर के पद पर नौकरी मिल गई. उस की पोस्टिंग अंबाला में हुई. उसी दौरान उस की लक्ष्मी से शादी हो गई, जिस से बाद में उसे 3 बच्चे हुए. यह नौकरी भी उस की इच्छा के अनुरूप नहीं थी. नौकरी से उसे जो पगार मिलती थी, उस से वह संतुष्ट नहीं था. वह तो कोई ऐसा काम करना चाहता था, जिस से वह कम समय में ज्यादा पैसे कमा सके और उस की काबिलियत का भी इस्तेमाल हो.

काम में मन नहीं लगा तो उस ने यह नौकरी भी छोड़ दी. धनीराम ने हस्तलिपि विशेषज्ञ का जो कोर्स किया था, उस से वह दूसरों के हस्ताक्षरों को हूबहू करना जान गया था. अपनी योग्यता को जांचने के लिए वह ब्लौक, तहसील स्तर के अधिकारियों के हस्ताक्षर कर के लोगों के छोटेमोटे काम कराने लगा. उस के द्वारा किए गए फरजी हस्ताक्षर विभाग में किसी की पकड़ में नहीं आ सके तो धनीराम की हिम्मत बढ़ती गई. यह प्रयोग सफल हो गया तो उस के दिमाग में तरहतरह की योजनाएं घूमने लगीं. इस के बाद उस ने रोहतक के आरटीओ विभाग से अपना जालसाजी का धंधा शुरू किया.

वह जानता था कि इस विभाग में भ्रष्टाचार खुलेआम होता है. वह विभाग के कुछ अधिकारियों के हस्ताक्षर करना जान गया था. फिर क्या था, उन के जाली हस्ताक्षर से वह लोगों को ड्राइविंग लाइसेंस व अन्य दस्तावेज तैयार कर के देने लगा. इस के बदले वह लोगों से मोटी रकम वसूलता था. अधिकारियों के फरजी हस्ताक्षर से दस्तावेज बनाने का उस का यह धंधा चल निकला. लेकिन उस का यह धंधा ज्यादा दिनों तक चल नहीं सका. लिहाजा वह पुलिस की गिरफ्त में आ गया. सन 1964 में उस के खिलाफ रोहतक के सिटी थाने में पहली रिपोर्ट दर्ज हुई. भादंवि की धारा 380/379/420/468/471 के तहत उसे गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया.

करीब 52 साल पहले धनीराम मित्तल जब जेल गया था, उस समय उस की उम्र करीब 25 साल थी. अगर वह चाहता तो अपनी गलती पर पश्चाताप कर के अपराध का रास्ता छोड़ सकता था, लेकिन उस ने ऐसा नहीं किया, बल्कि वह नएनए तरीके से जालसाजी करने के बारे में सोचने लगा. जमानत पर जेल से बाहर आने के बाद वह फिर से जालसाजी के काम करने लगा. धनीराम के पास एलएलबी की डिग्री थी. वह न्यायालय से संबंधित सभी कामों को जानना चाहता था. इसलिए वह दिल्ली के पटियाला हाउस कोर्ट के एडवोकेट श्यामसुंदर शर्मा के यहां मुंशी का काम करने लगा. बाद में वह दिल्ली और हरियाणा की अदालतों में वकालत करने लगा. वह अपने मुकदमे भी खुद ही लड़ रहा था.

एक बार तो उस ने ऐसा काम किया, जिस से रेलवे के बड़े अधिकारी भी सकते में आ गए. बीकानेर रेलवे स्टेशन अधीक्षक ओमप्रकाश शर्मा को एक दिन टेलीग्राम मिला. टेलीग्राम में लिखा था ‘तत्काल प्रभाव से आप का तबादला किया जाता है. 2 दिनों बाद दिल्ली मुख्यालय आ कर रिपोर्ट करें.’

टेलीग्राम को पढ़ कर ओमप्रकाश शर्मा हैरान रह गए, क्योंकि उन का ट्रांसफर ड्यू नहीं था. वह समझ नहीं पा रहे थे कि अचानक उन का ट्रांसफर क्यों कर दिया गया. उन्होंने सोचा कि ड्यूटी खत्म होने के बाद अपने जानने वाले अधिकारियों से इस बारे में बात करेंगे. उन की ड्यूटी खत्म भी नहीं हुई थी कि टेलीग्राम मिलने के 2 घंटे बाद सूटेडबूटेड धनीराम मित्तल हाथ में ब्रीफकेस लिए उन के पास पहुंच गया.

उस ने ओमप्रकाश शर्मा को बताया कि उसे दिल्ली से ट्रांसफर कर के यहां का चार्ज लेने के लिए कहा गया है. उस ने अपनी नियुक्ति की प्रति भी शर्मा को सौंप दी. शर्मा ने उस का नियुक्ति पत्र पढ़ा और उस की तरफ देखने लगे. तभी धनीराम बोला, ‘‘शर्माजी, बधाई हो, आप का प्रमोशन हुआ है और मुख्यालय में आप के कार्यों और ईमानदारी की बड़ी चर्चा हो रही है. आप को मुख्यालय में पोस्टिंग दी गई है.’’

अपनी प्रशंसा से ओमप्रकाश शर्मा काफी खुश हुए. उन्होंने उस दिन धनीराम को अपने साथ रख कर उस की खूब खातिरदारी की. वह जल्द से जल्द दिल्ली पहुंच जाना चाहते थे, इसलिए उन्होंने फटाफट टिकिट बिक्री और पार्सल का सारा कैश धनीराम को सौंप दिया और दिल्ली रवाना हो गए. ओमप्रकाश शर्मा अपने प्रमोशन की बात सोचसोच कर रास्ते भर खुश होते रहे. उन्होंने सोच रखा था कि दिल्ली में चार्ज संभालने के बाद वह अपने प्रमोशन की खुशखबरी टेलीग्राम द्वारा गांव में रह रहे अपनी बीवीबच्चों को देंगे. उन्होंने प्लान भी कर लिया था कि अब वह बीवीबच्चों को गांव से बुला कर दिल्ली में रखेंगे.

खुशीखुशी वह मुख्यालय पहुंचे. संबंधित अधिकारी के पास वह अपना ट्रांसफर लेटर ले कर पहुंचे तो वह अधिकारी भी आश्चर्यचकित रह गया, क्योंकि वह लेटर मुख्यालय से भेजा ही नहीं गया था और ना ही उन का कोई प्रमोशन हुआ था. यह सुन कर शर्माजी के होश उड़ गए. प्रमोशन की खुशी से उन्होंने जो प्लान बनाए थे, वे काफूर हो गए. वह समझ नहीं पा रहे थे कि जिस आदमी को उन्होंने चार्ज सौंपा है, आखिर वह है कौन और उन के पास टेलीग्राम से जो ट्रांसफर लेटर आया था उस पर बाकायदा संबंधित अधिकारी के हस्ताक्षर और मुहर भी थी. यह खेल किस ने और क्यों खेला है?

वह बीकानेर पहुंचे तो पता चला कि धनीराम कलेक्शन की सारी रकम ले कर फरार हो चुका था. नौकरी बचाने के लिए ओमप्रकाश शर्मा ने सारी रकम अपनी जेब से भरी. धनीराम ने इस के 8 महीने बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गढ़मुक्तेश्वर स्टेशन को अपना निशाना बनाया. कार्तिक पूर्णिमा के मौके पर गंगा स्नान के लिए यहां हजारों लोग आते हैं, जिस से यहां टिकिटों की बिक्री खूब होती है. धनीराम इस बात को जानता था. लंबा हाथ मारने के लिए धनीराम ने कार्तिक पूर्णिमा का ही दिन चुना.

गढ़मुक्तेश्वर के स्टेशन मास्टर को भी उस ने फरजी ट्रांसफर लेटर दे कर खुद वहां का चार्ज ले लिया और वहां से सारा कैश ले कर रफूचक्कर हो गया. फरजी जौइनिंग लेटर के जरिए उस ने दिल्ली जंक्शन, हरिद्वार, श्रीगंगानगर रेलवे स्टेशनों पर भी स्टेशन मास्टर बन कर कैश पर हाथ साफ किया. अब तक रेल विभाग में धनीराम मित्तल चर्चित हो गया था. हालत यह हो गई कि अब विभाग में किसी का ट्रांसफर होता तो वह कर्मचारी संबंधित अधिकारी से पहले अपने ट्रांसफर की पुष्टि करता, उस के बाद ही दूसरे कर्मचारी को चार्ज सौंपता. इस दौरान धनीराम जालसाजी के मामलों में अलगअलग जगहों पर गिरफ्तार भी होता रहा, पर जमानत पर छूटने के बाद वह फिर से यही काम करने लगता.

सन 1970 में देश में चीनी और मिट्टी के तेल की किल्लत हुई. सरकार राशन कार्ड पर ही इन चीजों को सस्ते दाम पर उपलब्ध करा रही थी. उसी दौरान धनीराम ने रोहतक जिले में 5 हजार फरजी राशन कार्ड बना कर वहां के हलवाइयों और अन्य लोगों को दे दिए थे. ऐसा नहीं था कि उस ने वे राशन कार्ड फ्री में दिए थे, उस ने उन लोगों से पैसे लिए थे. 2 महीने तक उन राशन कार्डों से लोगों ने सरकारी सस्ते गल्ले की दुकान से चीनी और मिट्टी का तेल लिया था. बाद में भेद खुलने पर खाद्य एवं आपूर्ति विभाग ने वे राशन कार्ड निरस्त कर दिए थे और धनीराम के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई थी.

सन 1970 में ही शातिरदिमाग धनीराम ने ऐसा काम किया कि लोग हैरान रह गए. दरअसल हुआ यह कि हरियाणा के झज्जर जिले के जज साहब लंबी छुट्टी पर गए हुए थे. इसी का फायदा उठाते हुए उस ने पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट के फरजी कागजात बनाए और उन्हीं के बूते पर उस ने उस जज की कुरसी संभाल ली. वह अदालती काम से वाकिफ था ही, साथ ही उसे कानून की भी जानकारी थी.

इस के अलावा उस में एक खास बात यह थी कि वह निडर हो कर काम करता था. इसी वजह से किसी को भी उस पर शक नहीं होता था. अदालती काररवाई की उसे अच्छी जानकारी थी, इसलिए वह 28 दिनों तक जज की कुरसी पर बैठ कर केसों की सुनवाई करता रहा. इस बीच उस ने कई केसों के फैसले भी सुनाए. इतना ही नहीं, मोटे पैसे ले कर उस ने हत्या और संगीन मामलों के 30 मुलजिमों को जेल से रिहा भी करा दिया. ताज्जुब की बात यह रही कि 28 दिनों में उस ने वहां रह कर अच्छी कमाई की, पर वहां काम कर रहे किसी भी कर्मचारी को उस पर शक नहीं हुआ. लेकिन जब यह मामला खुला तो उसे एक बार फिर जेल जाना पड़ा. धनीराम फरजी जमानती वारंट बनाने में भी एक्सपर्ट था.

कोर्ट में वकालत करने के दौरान वह मोटी रकम ले कर फरजी जमानती वारंट तैयार कर देता था और उन्हीं की बदौलत उस ने तमाम मुजरिमों को जेल से बाहर निकलवाया. इतना ही नहीं, फरजी जज वाले मामले में भी उस ने जेल में रहते हुए किसी तरह अपना भी फरजी जमानती वारंट तैयार कर लिया और जेल से बाहर आ गया. एक बार सन 1976 में पुलिस किसी मामले में उसे पेश करने के लिए रोहतक जेल से बीकानेर की अदालत में ले गई. वहां मजिस्ट्रेट ने उसे जमानत पर छोड़ने से इनकार कर दिया. धनीराम ने वापस आ कर रोहतक जेल के अधीक्षक को जज के फरजी हस्ताक्षर वाला जमानती वारंट दिखाया तो जेल अधीक्षक ने उसे रिहा कर दिया. बाद में पता चला कि वह वारंट फरजी था.

धनीराम जालसाजी के ये काम केवल पैसे कमाने के लिए ही नहीं करता था, बल्कि निजी खुन्नस निकालने के लिए भी उस ने रोहतक के तत्कालीन चीफ ज्यूडीशियल मजिस्ट्रेट एन.एल. पारुथी को ऐसा सबक सिखाया था कि शायद वह उसे कभी भूल पाएं. इस की वजह यह थी कि उन की अदालत में धनीराम का एक केस चल रहा था. धनीराम खुद ही अपना केस लड़ रहा था. वह कोर्ट में ऐसा व्यवहार कर रहा था, जो अदालत के हिसाब से ठीक नहीं था. चीफ ज्यूडीशियल मजिस्टे्रट एन.एल. पारुथी ने धनीराम को लताड़ते हुए अदालत में अपना आचरण ठीक करने को कहा.

भरी अदालत में लताड़े जाने से धनीराम की बेइज्जती हुई थी. यह बात उसे बहुत खली. उस ने उसी समय जज पारुथी को इस बेइज्जती का खामियाजा भुगतने की धमकी दे दी. जज पारुथी को क्या सबक सिखाना है, इस की रूपरेखा धनीराम ने तुरंत तैयार कर ली. एक दिन जज पारुथी को रजिस्टर्ड डाक से पंजाब व हरियाणा हाइकोर्ट के न्यायाधीश का पत्र मिला. पत्र में लिखा था, ‘तत्काल प्रभाव से आप का इस्तीफा मंजूर कर लिया गया है. अत: आप तुरंत अपना पद और कार्यभार छोड़ दें.’

पत्र पढ़ते ही पारुथी का हलक सूख गया. वह परेशान हो उठे कि उन्होंने जब इस्तीफा दिया ही नहीं है तो वह मंजूर कैसे हो गया. यही बात सोचसोच कर रात भर उन्हें नींद नहीं आई. अगले दिन वह उस पत्र को ले कर चंडीगढ़ के लिए रवाना हो गए. वहां मुख्य न्यायाधीश से मिल कर उन्होंने कहा, ‘‘सर, कल मुझे यह लैटर मिला है. जबकि मैं ने अपने इस्तीफे के बारे में कोई पत्र दिया ही नहीं है.’’

मुख्य न्यायाधीश ने उन्हें वह फाइल दिखाई, जिस में उन के इस्तीफे की दरख्वास्त लगी थी. पारुथी ने उस दरख्वास्त को पढ़ा तो उस पर जो दस्तखत थे, वे उन के ही थे. उन का माथा चकराया कि जब उन्होंने दरख्वास्त लिखी ही नहीं है तो यह दस्तखत कैसे हो गए? उन्होंने कहा, ‘‘सर, यह दरख्वास्त मैं ने नहीं लिखी. जरूर यह किसी की साजिश है.’’

‘‘भले ही साजिश हो, पर यहां तो तुम्हारी सेवानिवृत्ति की विभागीय औपचारिकताएं लगभग पूरी हो चुकी हैं.’’ मुख्य न्यायाधीश ने कहा.

‘‘प्लीज सर, रुकवा दीजिए, वरना मेरी सालों की मेहनत बेकार जाएगी. मैं तबाह हो जाऊंगा,’’ पारुथी ने गिड़गिड़ाते हुए कहा, ‘‘मुझे लगता है, यह सब धनीराम का किया है. इस तरह के काम वही करता है.’’

मुख्य न्यायाधीश के हस्तक्षेप पर पारुथी के इस्तीफे की प्रक्रिया रोकी गई. इस के बाद पारुथी ने रोहतक पहुंच कर सिटी थाने में धनीराम के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा दी. देशी चार्ल्स शोभराज के रूप में मशहूर धनीराम जालसाजी से कागज तैयार करने में ही माहिर नहीं था, बल्कि एक बार वह दिनदहाड़े पुलिस हिरासत से बहुत आराम से फरार भी हो गया था. किसी मामले में रोहतक पुलिस ने बड़ी मशक्कत के बाद धनीराम को गिरफ्तार किया था. 4 नवंबर, 1995 को रोहतक जेल से उसे फरीदाबाद की कोर्ट में पेश करने के लिए ले जाया गया. लेकिन फरीदाबाद कोर्ट परिसर में भीड़ का फायदा उठा कर वह वहां से नौ दो ग्यारह हो गया. लाख ढूंढने के बाद भी पुलिस उसे ढूंढ नहीं सकी.

हरियाणा की भिवानी जेल में कुख्यात अपराधी जिले सिंह बंद था. विभिन्न धाराओं में उसे 25 साल की सजा हुई थी. उसे किसी तरह पता चला कि धनीराम फरजी जमानती वारंट से सैकड़ों लोगों को जेल से रिहा करा चुका है. अपनी रिहाई के लिए उस ने अपने एक संबंधी को धनीराम के पास भेजा. मोटी रकम ले कर धनीराम उस का यह काम कराने को तैयार हो गया. चूंकि जिले सिंह सजायाफ्ता कैदी था, इसलिए उस की रिहाई के लिए उसे काफी मशक्कत करनी पड़ी थी.

जेल के अधिकारियों की मिलीभगत के बिना यह काम करना आसान नहीं था. उस समय आर.के. गुप्ता जेल अधीक्षक थे. धनीराम ने आर.के. गुप्ता के बेटे पंकज गुप्ता के माध्यम से बात आगे बढ़ाई. पैसों के लालच में आर.के. गुप्ता अपनी जिम्मेदारियों को भूल गए. धनीराम ने फरजी तरीके से जिले सिंह की रिहाई के जाली पेपर तैयार कर दिए और उस की 25 साल की सजा पूरी होने से पहले ही उसे जेल से रिहा करा दिया. बाद में जब यह मामला प्रकाश में आया तो पुलिस ने धनीराम, पंकज गुप्ता, जेल के 2 कनिष्ठ कर्मचारियों नरेश व अंजू सहित 5 लोगों को गिरफ्तार किया.

धनीराम फरजी वकील बन कर कोर्ट में अपने केसों की ही पैरवी नहीं करता, बल्कि अन्य केसों की भी पैरवी करता था था. फरवरी, 2005 में वह अपने एक मुवक्किल विजय के चैक बाउंस के केस के सिलसिले में पटियाला हाउस कोर्ट में आया, तभी वकीलों ने उसे घेर लिया. पूछने पर वह अपना रजिस्ट्रेशन नंबर तक नहीं बता पाया. सूचना मिलने पर पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया. पुलिस जांच में पता चला कि उस के पास केवल एलएलबी की डिग्री है. कोर्ट में प्रैक्टिस करने का कोई भी वैध दस्तावेज वह नहीं दिखा सका, पुलिस ने उस के पास से विभिन्न केसों की 7 फाइलें भी बरामद की थीं. इस मामले में पुलिस ने उसे जेल भेज दिया था.

जेल से जमानत पर बाहर आने के बाद वह फिर से वकालत करने लगा. 6 दिसंबर, 2005 को उसे दिल्ली के तीसहजारी न्यायालय में महानगर दंडाधिकारी राजेश कुमार की अदालत में फिर से फरजी वकील के रूप में गिरफ्तार किया गया. उस दिन वह अपने मुवक्किल के आर्म्स एक्ट के मामले की पैरवी करने आया था. धनीराम ठगी और जालसाजी के अलावा छोटीमोटी चोरियां भी कर लेता था. कार से स्टीरियो, स्टेपनी, ब्रीफकेस या अटैची उड़ाना वह हाथ की सफाई समझता था. 3 दिसंबर, 1996 को उसे दिल्ली स्थित डब्लूएचओ औफिस में कार्यरत दीप्ति नाग की मारुति कार से स्टीरियो चुराते रंगेहाथों पकड़ा गया था.

तिहाड़ जेल में ही धनीराम की मुलाकात अशोक कुमार से हुई. अशोक कुमार एक कार चोर था. जबकि धनीराम चोरी के अलावा जाली कागज बनाने में माहिर था. दोनों ने मिल कर कार चुराने और फरजी कागज बना कर उन्हें ठिकाने लगाने की योजना बनाई. अलगअलग समय पर दोनों जेल से जमानत पर बाहर आए. दोनों ही हरियाणा, पंजाब, दिल्ली आदि जगहों से कार चुरा कर फरजी कागजात तैयार कर के बेचने लगे. इस दौरान धनीराम अपने रहने के ठिकाने बदलता रहा.

26 अप्रैल, 2004 को दोनों कार चुराने के लिए चंडीगढ़ पहुंचे. हाइकोर्ट परिसर में उन्होंने सफेद रंग की चमचमाती मारुति कार नंबर एचआर01 पी 4177 देखी. वह कार जानेमाने एडवोकेट अशोक कुमार खुंगर की थी. मौका मिलते ही उन्होंने मास्टर चाबी से वह कार चुरा ली. एडवोकेट खुंगर अपनी गाड़ी लेने पहुंचे तो कार न देख कर वह परेशान हो उठे. उन्होंने तुरंत पुलिस कंट्रोल रूम को सूचना दे दी. पुलिस ने बैरिकेड्स लगा कर जांच की तो जीरकपुर रोड पर पुलिस ने चुराई गई कार के साथ धनीराम को गिरफ्तार कर लिया. जबकि उस का साथी अशोक बस द्वारा दिल्ली के लिए पहले ही रवाना हो गया था. धनीराम को गिरफ्तार कर बुड़ैल जेल भेज दिया गया.

चंडीगढ़ के वकील की कार चुराने का मामला अभी भी न्यायालय में विचाराधीन है. लंबे समय तक जब वह चंडीगढ़ कोर्ट की तारीखों पर नहीं पहुंचा तो चंडीगढ़ न्यायालय के जज श्री बलविंदर कुमार ने 6 मार्च, 2008 को उसे भगोड़ा घोषित कर दिया. दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश के विभिन्न राज्यों में धनीराम एक हजार से ज्यादा आपराधिक वारदातों को अंजाम दे चुका है. विभिन्न राज्यों के थानों में उस के खिलाफ 127 केस दर्ज हो चुके हैं. उस की खास बात यह है कि उस ने कभी भी अपना नाम और हुलिया नहीं बदला और न ही जालसाजी जैसे आपराधिक कामों से उस ने संन्यास लिया. 77 साल की उम्र में भी वह इस काम में जुटा है.

दिल्ली के रानीबाग इलाके में 5 नवंबर, 2015 को एक शख्स की सैंट्रो कार चोरी हो गई. पुलिस ने जब वहां के सीसीटीवी कैमरे की फुटेज देखी तो पता चला कि कार चुराने वाला और कोई नहीं, धनीराम मित्तल है. दिल्ली पुलिस के पास धनीराम के फोटो तो थे, पर उस का ठिकाना नहीं था. पश्चिम जिले के वाहन चोर निरोधक दस्ते के इंसपेक्टर राजपाल डबास के पास धनीराम का पूरा इतिहास मौजूद था. वह अपने स्तर से उसे तलाशने लगे.

उन की मेहनत रंग लाई. उन्हें धनीराम मित्तल के बारे में सुराग मिला कि वह उत्तरी दिल्ली के नत्थूपुरा इलाके में रहता है. डीसीपी पुष्पेंद्र कुमार को उन्होंने इस सूचना से अवगत करा दिया. डीसीपी ने एसीपी दिनेश शर्मा की अध्यक्षता में एक टीम बनाई, जिस में एसआई सुमेर सिंह, एएसआई सतीश कौशिक, हैडकांस्टेबल नवीन कुमार, कांस्टेबल हरिप्रकाश को शामिल किया गया. टीम का नेतृत्व एडीशनल डीसीपी मोनिका भारद्वाज कर रही थीं. टीम ने मुखबिरों को भी लगा दिया.

31 मार्च, 2016 को इंसपेक्टर राजपाल डबास को सूचना मिली कि धनीराम रोहिणी कोर्ट से पश्चिम विहार की तरफ आने वाला है. यह सूचना मिलते ही पुलिस टीम ने पश्चिम विहार डिस्ट्रिक्ट पार्क के नजदीक बाहरी रिंग रोड पर बैरिकेड्स लगा कर वाहनों की जांच शुरू कर दी. तभी डीएल4सीएपी1880 नंबर की एक सैंट्रो कार रोहिणी की तरफ से आई. वह कार बैरिकेड्स के पास पहुंच कर धीमी हुई तो ड्राइविंग सीट पर बैठे धनीराम को पुलिस ने पहचान लिया. हिरासत में ले कर उसे इंसपेक्टर राजपाल डबास अपने औफिस ले आए.

उन्होंने धनीराम से पूछताछ की तो उस ने आसानी से बता दिया कि इस सैंट्रो कार का असली नंबर डीएल4सीएपी0882 था, जिसे उस ने बदल कर फरजी नंबर लगा लिया था. उस ने बताया कि यह कार उस ने दिल्ली के रानीबाग इलाके से चुराई थी. इसे वह किसी को बेचने जा रहा था. धनीराम ने बताया कि जालसाजी और कार चोरी करना उस का एक शौक है और शौक आसानी से नहीं छूटता.

उस ने बताया कि फरजी जमानती वारंट के जरिए वह अब तक ढाई हजार से ज्यादा मुलजिमों को विभिन्न जेलों से निकलवा चुका है. इंसपेक्टर राजपाल डबास को केवल कार चोरी के मामले में उस की तलाश थी. उन्हें यह भी पता चला कि वह चंडीगढ़ कोर्ट द्वारा भगोड़ा घोषित किया जा चुका है, इसलिए उन्होंने चंडीगढ़ पुलिस को भी उस की गिरफ्तारी की सूचना दे दी. दिल्ली पुलिस की सूचना पर अगले दिन चंडीगढ़ पुलिस दिल्ली पहुंच गई. पुलिस ने जब धनीराम को रोहिणी कोर्ट में पेश किया तो वहीं से चंडीगढ़ पुलिस उसे ट्रांजिट रिमांड पर अपने साथ ले गई.

धनीराम मित्तल बहुत ही होशियार शख्स है. लेकिन उस ने अपनी शिक्षा और काबिलियत को गैरकानूनी कामों में प्रयोग किया. अपनी काबिलियत के बूते पर वह किसी सरकारी विभाग में बड़ा अधिकारी बन सकता था, पर उस ने शुरुआत में ही ऐसे रास्ते पर कदम बढ़ा दिए, जिन का अंजाम हमेशा गलत ही होता है. पता चला है कि उस के रास्ते पर उस का बेटा संजय कुमार मित्तल भी चल निकला है. बहरहाल अब देखना यह है कि जेल से छूटने के बाद वह क्या करता है. Haryana Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आध

Love Crime Story: प्यार में अंधी सोनम की करतूत

Love Crime Story: सोनम जिस नवीन से प्रेम करती थी, वह उसी के गोत्र का था. इसलिए मांबाप उस की शादी नवीन से करने को तैयार नहीं थे. जबकि सोनम अपनी जिद पर अड़ी थी. जब उस के पिता ने कहा कि उन के जीतेजी यह विवाह नहीं हो सकता तो सोनम ने तय कर लिया कि…

हरियाणा के जिला रोहतक के गांव कबूलपुर निवासी फौजी भूपेंद्र सिंह की आंखों के सामने बारबार वह हृदयविदारक घटना घूम जाती थी, जब उन की मां भूरी देवी, बड़े भाई सुरेंद्र सिंह, भाभी प्रमिला, बड़े भाई के बेटे अरविंद, उन की खुद की बेटियों सोनिका, मोनिका और बेटे विशाल की गला घोंट कर बेरहमी से हत्या कर दी गई थी. दिल दहला देने वाले इस हत्याकांड को किसी और ने नहीं, उन के बड़े भाई सुरेंद्र सिंह की लाडली बेटी सोनम ने अपने प्रेमी के साथ मिल कर अंजाम दिया था. वह हवस में इस कदर अंधी हो गई थी कि जिन मांबाप ने उसे पैदा किया था, जिस दादी की गोद में पलीबढ़ी थी और जिन भाईबहनों के साथ खेलकूद कर जवान हुई थी, प्रेमी के साथ मिल कर उन्हीं लोगों को मार दिया था.

इस अपराध को अंजाम देने में सोनम, उस का प्रेमी नवीन और नवीन का दोस्त जसबीर शामिल था. इस मामले में 6 मार्च को अदालत में उन के किए की सजा सुनाई गई. उस दिन फौजी भूपेंद्र सिंह ने सुबह नहाधो कर मन ही मन यही प्रार्थना की थी कि जिन लोगों ने उन के घर वालों की बेरहमी से हत्या की है, उन्हें कठोर से कठोर सजा मिले, जिस से उन्हें भी पता चले कि जिंदगी की कीमत क्या होती है.

इस के बाद वह अपने बच्चों की फोटो निकाल कर उन के मासूम चेहरों को काफी देर तक एकटक ताकते रहे. फोटो देखतेदेखते उन की आंखों से आंसू की धारा बह निकली. तभी उन के पिता तकदीर सिंह ने कमरे में आ कर कहा, ‘‘देख लेना बेटा, कानून उन्हें उन के किए की ऐसी सजा देगा कि फिर जल्दी कोई ऐसा करने की सोचेगा भी नहीं.’’

पिता की बात पर भूपेंद्र सिंह ने भर्राई आवाज में कहा, ‘‘अगर ऐसा हुआ तो बाबूजी मां, भाइयाभाभी और बच्चों की आत्मा को जरूर शांति मिल जाएगी.’’

इस के बाद बापबेटे बोझिल मन से कमरे से बाहर निकले और नाश्ता कर के रोहतक के लिए रवाना हो गए. आम दिनों की अपेक्षा 6 मार्च को रोहतक के सेशन जज श्री सुशील कुमार गुप्ता की अदालत के बाहर कुछ ज्यादा ही भीड़भाड़ दिखाई दे रही थी. जिन लोगों के मुकदमों की तारीखें थीं, वे तो आए ही थे, इस के अलावा वहां तमाम पत्रकार भी जमा थे. उस दिन न्यायालय की सुरक्षा में तैनात पुलिसकर्मियों की संख्या को देख कर ही इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता था कि उस दिन श्री सुशील कुमार गुप्ता की अदालत में किसी खास मुकदमे का फैसला आने वाला है.

भूपेंद्र सिंह भी अपने पिता के साथ अदालत पहुंच गए और बाहर पड़ी बैंच पर बैठ कर पुकार का इंतजार करने लगे. थोड़ी देर बाद जज श्री सुशील कुमार गुप्ता अदालत में आ कर अपनी कुर्सी पर बैठे तो वहां सन्नाटा पसर गया. उन के इशारे पर पेशकार ने पुकार कराई तो भूपेंद्र सिंह के मुकदमे की अभियुक्ता सोनम, उस के प्रेमी नवीन और उस के साथी जसबीर को ला कर कटघरे में खड़ा कर दिय गया. लंबी सुनवाई के बाद उस दिन उन के मुकदमे का फैसला आने वाला था. बचाव पक्ष और अभियोजन पक्ष के वकीलों के बीच सजा को ले कर अंतिम बहस शुरू हुई. इस मामले में क्या फैसला आया, जानने से पहले आइए हम यह जान लेते हैं कि यह सोनम कौन है, उस ने अपने प्रेमी नवीन के साथ मिल कर अपने ही घर के 7 लोगों की बेरहमी से हत्या क्यों की थी?

हरियाणा के जिला रोहतक के गांव कबूलपुर में तकदीर सिंह डागर अपने परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में पत्नी भूरी देवी के अलावा 2 बेटे थे, बड़ा सुरेंद्र सिंह और उस से छोटा भूपेंद्र सिंह. तकदीर सिंह ने बेटों की परवरिश और शिक्षादीक्षा पर विशेष ध्यान दिया था. इसी का नतीजा था कि पढ़ाई पूरी होते ही सुरेंद्र सिंह को वन विभाग में नौकरी मिल गई थी तो भूपेंद्र सिंह को सेना में. दोनों बेटे अपने पैरों पर खड़े हो गए तो उन के रिश्ते आने लगे.

तकदीर सिंह ने बड़े बेटे सुरेंद्र सिंह की शादी साल्हावास से विधायक रह चुके जिले सिंह की बेटी प्रमिला से की थी. प्रमिला सुंदर, सुशील और संस्कारी युवती थी. इसलिए उसे पत्नी के रूप में पा कर सुरेंद्र सिंह खुद को धन्य समझ रहे थे. प्रमिला भी कमाऊ और जान से बढ़ कर प्यार करने वाला पति पा कर खुद को भाग्यशाली मान रही थी.

परिवार में किसी को किसी से कोई शिकायत नहीं थी. समय हंसीखुशी से गुजर रहा था. इसी गुजरते समय में प्रमिला और सुरेंद्र सिंह बेटे अरविंद और बेटी सोनम के मांबाप बन गए. पतिपत्नी बच्चों का लालनपालन लगन से करने लगे. भूपेंद्र सिंह की भी सेना में नौकरी लग गई थी तो तकदीर सिंह ने उस की भी शादी कर दी थी. भूपेंद्र सिंह के 3 बच्चे हुए, 2 बेटियां सोनिका, मोनिका और एक बेटा विशाल. लेकिन शायद कुदरत को भूपेंद्र की यह खुशी अच्छी नहीं लगी, इसलिए घटना के डेढ़ साल पहले उन की पत्नी की अचानक मौत हो गई थी.

बच्चे छोटे थे और भूपेंद्र सिंह नौकरी की वजह से बाहर रहते थे, इसलिए सुरेंद्र सिंह ने भूपेंद्र सिंह के बच्चों को अपने साथ रख लिया था. सुरेंद्र सिंह की बेटी सोनम सयानी हुई तो जीवन के रंगीन सपने देखने लगी. उन्हीं में भावी राजकुमार का सपना भी था. उसी बीच एक दिन वह अपने घर के बाहर खड़ी थी, तभी उस की नजर सामने साइकिल से उतर रहे एक युवक पर पड़ी.

वह युवक एकटक उसे ही ताक रहा था. युवक की हरकत उसे अच्छी तो नहीं लगी, पर उस की नजरों में ऐसा आकर्षण था कि वह चाह कर भी उसे कुछ नहीं कह सकी. वह युवक उसे उसी तरह ताकता रह गया तो सोनम को उस की हिम्मत पर हैरानी हुई. कुछ देर तक वह उसे उसी तरह एकटक ताकता रहा, उस के बाद मुसकराते हुए सोनम के घर से कुछ दूरी पर स्थित एक घर में घुस गया. युवक तो चला गया, लेकिन उस ने नजरों का जादू चला कर सोनम के दिल में हलचल मचा दी थी. उस का चेहरा अब उस की नजरों के सामने नाचने लगा था. उसे जब भी उस की मुसकराहट याद आती, वह बेचैन हो उठती.

युवक कौन था, कहां का रहने वाला था, यह जानने के लिए सोनम की बेचैनी बढ़ती जा रही थी. धीरेधीरे उस की स्थिति अजीब होती जा रही थी. वह उस युवक के बारे में जितना सोचती थी, उस के आकर्षण का जादू उतनी ही तेजी से उस के रोमरोम में समाता जा रहा था. आखिर जब उस की बेचैनी हद पार करने लगी तो उस ने युवक के बारे में अपनी एक सहेली से पता किया. सहेली के बताए अनुसार, युवक का नाम नवीन था और वह कंप्यूटर साइंस में डिप्लोमा कर रहा था. वह उस की खूबसूरती और गदराए जिस्म का दीवाना हो चुका था. उस की एक झलक पाने के लिए वह हमेशा लालायित रहता था.

आग दोनों तरफ बराबर लग चुकी थी, इसलिए नवीन को शीशे में उतारने के लिए सोनम ने पहल की तो जल्दी ही उसे कामयाबी मिल गई. इसे टीवी का प्रभाव कहें या किशोर उम्र की फिसलन, सोनम को पढ़ाई के दौरान ही यह प्रेमरोग लग गया था. जल्दी ही दोनों मिलनेजुलने ही नहीं लगे, बल्कि घंटोंघंटों फोन पर प्यार में डूबी बातें भी करने लगे थे. सोनम का जब भी नवीन से मिलने का मन होता या समय मिलता, वह फोन कर के समय और जगह बता देती. नवीन वहां समय से पहले पहुंच जाता. इस तरह दोनों एकांत में भी मिलने लगे थे. समय के साथ दोनों का प्रेम परवान चढ़ा तो मन के साथ तन मिलने में भी देर नहीं लगी.

बुराई कोई भी हो, ज्यादा दिनों तक छिपी नहीं रहती. यहां भी यही हुआ. सोनम और नवीन के प्यार की खुशबू फैली तो घर वालों की नाक तक पहुंच गई. जब सुरेंद्र सिंह और प्रमिला तक सोनम के प्यार की महक पहुंची तो पतिपत्नी सन्न रह गए. इस की एक वजह यह थी कि एक तो सोनम ने अपने मन से प्यार कर के उन्हें आघात पहुंचाया था, दूसरे इस से भी बड़ा आघात यह था कि नवीन उन्हीं के गोत्र का था.

हरियाणा में तो प्यार करना ही गुनाह है, ऊपर से अगर प्यार सगोत्री है तो प्यार करने वालों को मौत तक का फरमान सुना दिया जाता है. भला ऐसे में सुरेंद्र सिंह और उन का परिवार कैसे बरदाश्त करता कि उन की बेटी एक सगोत्री लड़के से प्यार करे. लिहाजा सोनम के घर वाले बंदिशें लगा कर उस पर नजर रखने लगे. घर वालों ने उस का मोबाइल भी छीन लिया. मिलना तो मुश्किल हो ही गया था, बातचीत में भी बाधा पड़ी तो नवीन ने एक मोबाइल फोन और सिम ला कर सोनम को दे दिया. इस के बाद दोनों एकदूसरे से अपनी पीड़ा बयां करने लगे. सोनम ने बारहवीं पास कर के बीए में दाखिला लिया तो एक बार फिर नवीन से मिलने का उस का रास्ता खुल गया.

जब सोनम के घर वालों को पता चला कि वह नवीन से घर के बाहर मिलती है तो घर वालों ने घरपरिवार की इज्जत की दुहाई दे कर उसे नवीन से संबंध खत्म कर लेने के लिए खूब समझाया. लेकिन नवीन के प्यार में पागल सोनम को घर वालों की बातें अच्छी लगने के बजाय बुरी लगीं. इस के बाद भी वह नवीन से चोरीछिपे मिलती रही. सुरेंद्र सिंह बेटी की हरकतों से तंग आ गए तो उन्होंने उसे हौस्टल में डाल दिया. सोनम के घर वालों का सोचना था कि नवीन से दूर रह कर शायद सोनम उसे भूल जाएगी, लेकिन उन की यह सोच उलटी पड़ गई.

सोनम के हौस्टल में भेजे जाने की जानकारी नवीन को हुई तो वह भी शहर में किराए पर कमरा ले कर रहने लगा. वहां कोई रोकनेटोकने वाला तो था नहीं, इसलिए दोनों खुल कर मिलनेजुलने लगे. परिणामस्वरूप उन का प्यार इतना गहरा हो गया कि वे जुदाई की बात से ही सहम उठते थे. शायद यही वजह थी कि दोनों ने घर वालों की चोरी महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय के पार्क में शादी कर ली थी.

जब इस बात की जानकारी घर वालों को हुई तो उन्होंने सोनम की पढ़ाई छुड़वा कर घर में कैद कर दिया. लेकिन सोनम की मोबाइल फोन से नवीन से बातें होती रहती थीं. घर वालों की सख्ती से सोनम परेशान थी और उन की बातों से वह जान गई थी कि घर वाले किसी भी कीमत पर उस का ब्याह नवीन से नहीं करेंगे. जबकि उसे लगता था कि नवीन के बिना वह रह नहीं पाएगी. नवीन भी बारबार उस से यही कहता था कि वह भी उस के बिरा नहीं रह सकता. किसी दिन बातचीत में जब सुरेंद्र सिंह ने कहा कि उन के जीतेजी यह शादी नहीं हो सकती तो सोनम के मन में आया कि उन के मरने के बाद तो हो सकती है. बस उस ने तय कर लिया कि वह ब्याह करेगी तो नवीन से ही, भले ही घर वालों को मारना ही क्यों न पड़े.

इस के बाद सोनम ने इस विषय पर नवीन से बात की तो वह भी राजी हो गया. दोनों ने इस विषय पर गहराई से सोचाविचारा. इस तरह नवीन के प्यार में अंधी सोनम ने अपने घर वालों को खत्म करने की योजना बना डाली. इसी योजना के अनुसार, नवीन ने अपने दोस्त जसबीर से नशे की गोलियां मंगवाई. जसबीर का दोस्त ओमवीर कैमिस्ट था. जसवीर उस से नशे की 100 गोलियां ले आया और नवीन को दे दीं. नवीन ने वे सारी गोलियां सोनम को दे दीं. उस दिन रात का खाना सोनम ने ही बनाया. उस ने नवीन द्वारा दी गई नशे की गोलियां आटे और सब्जी में मिला दीं. नशे की गोलियां पड़ी होने की वजह से रात का खाना खाने के बाद घर के सभी लोग गहरी नींद सो गए. इस के बाद सोनम ने फोन कर के नवीन को बुला लिया.

जिस समय नवीन सोनम के घर आया, उस समय रात के 10 बज रहे थे. सोनम ने सब से पहले अपने मातापिता सुरेंद्र सिंह और प्रमिला के गले में रस्सी डाल कर गला घोंटा. इस के बाद सामने वाले मकान में सो रही दादी भूरी देवी, भाई अरविंद और फिर चाचा की बेटियों सोनिका, मोनिका तथा बेटे विशाल की कपड़े से गला घोंट कर हत्या कर दी. अपने ही घरपरिवार के 7 लोगों की हत्या करने के बाद सोनम को खुद को बचाने की चिंता हुई. इस के लिए उस ने सोचाविचारा तो उसे लगा कि कुछ ऐसा किया जाए कि लोगों को लगे कि ये हत्याएं लूट के लिए की गई हैं. इस के लिए उस ने नवीन के साथ मिल कर घर का सामान इधरउधर फैला दिया. इतना सब कर के दोनों ने लाशों के बीच अपने जिस्म की प्यास भी बुझाई.

इस के बाद नवीन अपने घर चला गया तो सोनम ने बेहोशी का नाटक करते हुए खुद को बाथरूम में बंद कर लिया. इस के अगले दिन नवीन छारा गांव के रहने वाले अपने मामा के घर चला गया. तकदीर सिंह रात को सोने के लिए गांव के बाहर वाले मकान पर चले जाते थे. सुबह की चाय उन के लिए वहीं पहुंचाई जाती थी. उस दिन वह फ्रैश हो कर रोज की तरह चाय का इंतजार करने लगे. काफी देर तक जब उन के लिए कोई चाय ले कर नहीं आया तो उन्हें चिंता हुई कि आखिर कोई चाय ले कर क्यों नहीं आया.

जब काफी देर हो गई तो तकदीर सिंह घर की ओर चल पड़े. घर पहुंच कर उन्होंने दरवाजा खटखटाने के लिए हाथ बढ़ाया तो वह खुल गया. घर का दरवाजा खुला देख कर उन्हें हैरानी हुई. उन्होंने आवाज लगाई. आवाज लगाने पर जब कोई जवाब नहीं आया तो उन का दिल धड़क उठा. धड़कते दिल से वह अंदर दाखिल हुए तो उन का दिल जिस आशंका से धड़का था, वह गलत नहीं थी. अंदर कमरे में बेटा सुरेंद्र और उस की पत्नी प्रमिला बैड पर बेसुध पड़ी थी.  नजदीक पहुंच कर जब उन्होंने उन के गले पर पड़े निशान देखे तो उन के मुंह से चीख निकल गई.

चीख इतनी तेज थी कि आसपड़ोस वाले जैसे थे, उसी हालत में उन के पास पहुंच गए. देखते ही देखते काफी संख्या में लोग जमा हो गए. तकदीर सिंह सामने वाले घर में पहुंचे तो वहां पत्नी और पोतेपोतियों की लाशें देख कर सिर थाम कर जमीन पर बैठ गए. सुरेंद्र की बड़ी बेटी सोनम कहीं दिखाई नहीं दे रही थी. उस की तलाश शुरू हुई तो वह बाथरूम में बेहोश मिली. उसे तत्काल इलाज के लिए पीजीआई भेज दिया गया.

मकान के चौबारे में 2 इलैक्ट्रीशियन सोए थे. दोनों सुरेंद्र के मकान में बिजली फिटिंग करने आए थे. रात को वे वहीं रुक गए थे. दोनों को सुबह गांव वालों ने जगाया तो उन्हें घटना का पता चला. पूछताछ में उन्होंने बताया कि रात का खाना खाने के बाद पता नहीं क्या हुआ कि वे इतनी गहरी नींद सो गए कि उन की आंख उन लोगों के जगाने पर खुली है. एक ही परिवार के एक साथ 7 लोगों की हत्या से पूरे गांव में मातम फैल गया था. किसी ने इस घटना की जानकारी पुलिस को दे दी थी. घटना अति गंभीर थी, इसलिए सूचना मिलते ही थाना पुलिस ही नहीं, जिले के सभी पुलिस अधिकारी भी गांव कबूलपुर पहुंच गए थे.

पुलिस जांच शुरू होते ही पुलिस को पता चल गया कि पुलिस का ध्यान बंटाने के लिए घर का सामान फैलाया गया है, जबकि असल में ऐसा कुछ भी नहीं था. पुलिस ने फोरैंसिक एक्सपर्ट, डौग स्क्वौयड आदि को भी बुला लिया था. लेकिन इस सब से पुलिस को तत्काल कोई सफलता नहीं मिली थी. तकदीर सिंह का कहना था कि उन की किसी से ऐसी दुश्मनी नहीं थी कि इस तरह उन के परिवार को मार देता. पुलिस ने घटनास्थल की सारी औपचारिकताएं पूरी कर के सभी लाशों को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. इस के बाद सुरेंद्र सिंह के मामा की शिकायत पर कर्मवीर, उस की पत्नी और एक अन्य रिश्तेदार के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर के जांच शुरू कर दी गई.

चूंकि मामला एक पूर्व विधायक की बेटीदामाद और सैनिक के बच्चों की हत्या का मामला था, इसलिए पुलिस इस मामले के खुलासे के लिए जीजान से जुट गई थी. लेकिन कहीं से कोई सुराग नहीं मिल रहा था. लेकिन जब डीएसपी हैडक्वार्टर दलवीर यादव ने सोनम के मोबाइल की काल डिटेल्स निकलवाई तो पता चला कि उस की एक नंबर पर लगातार और लंबीलंबी बातें होती थीं. जब उस नंबर के बारे में पता किया गया तो वह नवीन का नंबर निकला.

इस बीच पुलिस को पता चल गया था कि सोनम और नवीन के बीच प्रेमसंबंध चल रहा था, जिस को ले कर सोनम के घर में कलह चल रही थी. 2 दिनों बाद पीजीआई से डिस्चार्ज होने के बाद पुलिस ने पूछताछ के लिए सोनम को थाने बुला लिया. पूछताछ शुरू हुई तो सोनम ने इधरउधर की बातें कर के पुलिस को बरगलाने की काफी कोशिश की. लेकिन जब पुलिस ने थोड़ी सख्ती की तो हवस में अंधी एक ऐसी लड़की की कहानी उस ने सुनाई, जिस ने जिस मांबाप ने पैदा किया था, जिस दादी की गोद में वह पलीबढ़ी थी और जिन भाईबहनों के साथ खेलकूद कर जवान हुई थी, उन सभी को प्रेमी के साथ मिल कर मार दिया था.

सोनम के अपराध स्वीकार करने के बाद पुलिस ने नवीन को उस के मामा के गांव छारा से गिरफ्तार कर लिया था. इस के बाद पुलिस ने उस के दोस्त जसबीर और उस के कैमिस्ट दोस्त ओमवीर को भी गिरफ्तार कर लिया. सभी को अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया गया. इस के बाद पुलिस ने समय से अदालत में चार्जशीलट पेश कर दी, जिस के बाद अदालती काररवाहियों का सिलसिला शुरू हुआ. सुनवाई के दौरान इस बहुचर्चित हत्याकांड में सोनम और नवीन के लिए फोरैंसिक टीम की रिपोर्ट और नवीन द्वारा सोनम को दिया गया फर्जी पते पर सिम गले की फांस बन गया. फोरैंसिक टीम ने जांच में घर के अंदर खड़ी मोटरसाइकिल के शीशे पर नवीन के फिंगरप्रिंट पाए थे. इस के अलावा मृतकों के विसरा में मिला नशीला पदार्थ और सब्जी तथा आटे में मिला पदार्थ एक ही पाया गया था.

पूछताछ में इलैक्ट्रीशियन ने बताया था कि उस रात सोनम ने ही खाना बना कर सभी को खिलाया था. उन्हें भी वही खाना दिया गया था, जो परिवार के अन्य सदस्यों को दिया गया था. उन की भी गवाही मुकदमे में अहम साबित हुई थी. नवीन की निशानदेही पर पुलिस ने दवा के रैपर एक खंडहर से बरामद किए थे. यह मुकदमा करीब साढ़े 4 साल तक चला. अंत में सेशन जज श्री सुनील कुमार गुप्ता की अदालत ने सोनम, उस के प्रेमी नवीन और जसवीर को दोषी करार दिया, जबकि इस हत्याकांड में ड्रग्स एक्ट के तहत नामजद ओमवीर को कोर्ट ने साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया.

सजा के लिए हुई बहस में पीडि़त पक्ष के वकीन ने फांसी की मांग की. इस के लिए रेलूराम पुनिया हत्याकांड और उत्तराखंड के सुंदर मामले का उदाहरण दिया गया. इन दोनों मामलों में परिवार के लोगों की सामूहिक हत्या की गई थी और इन में फांसी की सजा सुनाई गई थी. जबकि बचाव पक्ष ने जीने का अधिकार की बात करते हुए फांसी न दिए जाने की मांग की.

दोनों पक्षों की बहस के बाद जज श्री सुशील कुमार गुप्ता लंच के बाद 2 बज कर 5 मिनट पर कुर्सी पर बिना बैठे ही एक मिनट में फैसला सुना कर अपने केबिन में चले गए थे. अपने प्रेमी के साथ मिल कर परिवार के 7 लोगों को गला घोंट कर मौत के घाट उतारने वाली सोनम और उस के प्रेमी नवीन को उन्होंने फांसी की सजा सुनाई थी, जबकि साजिश में शामिल नवीन के साथ गांव छारा निवासी जसबीर को आजीवन कारावास की सजा दी थी. शाम करीब साढ़े 4 बजे तीनों दोषियों को फैसले की कापी दे कर सुनारिया जेल भेज दिया गया था. Love Crime Story

 

Illegal Relationship: हिस्ट्रीशीटर की बहन से आशनाई

Illegal Relationship: प्रदीप उपाध्याय जिस राह पर चल रहा था, वह जहरीले कांटों से भरी हुई थी. प्रेमिका का भाई हिस्ट्रीशीटर है, यह जानने के बाद उसे राधिका से संबंध तोड़ लेने चाहिए थे, लेकिन उस ने जानबूझ कर जो किया उसे तो घातक साबित होना ही था.

उत्तर प्रदेश के जिला बस्ती के थाना पुरानी बस्ती के थानाप्रभारी रणधीर मिश्र अपने औफिस में बैठे थे, तभी संधौली गांव के चौकीदार बाबूलाल ने उन्हें फोन कर के बताया कि गोरखपुरलखनऊ राष्ट्रीय राजमार्ग 28 पर डुमरियागंज जाने वाली सड़क के पास एक युवक की लाश पड़ी है. उस की हत्या शायद कहीं और कर के लाश यहां ला कर फेंक दी गई है. जवाब में रणधीर मिश्र ने कहा, ‘‘बाबूलाल, जब तक मैं वहां नहीं पहुंच जाता, तुम लाश के पास रुको. और हां, एक बात का खास खयाल रखना, लाश के पास किसी को जाने मत देना.’’

रणधीर मिश्र ने इस मामले की सूचना पुलिस अधिकारियों को दी और खुद सहयोगियों को साथ ले कर घटनास्थल के लिए रवाना हो गए. घटनास्थल पर पहुंच कर पहले उन्होंने वहां मौजूद भीड़ को हटाया, उस के बाद लाश का निरीक्षण करने लगे. मृतक 23-24 साल का नौजवान था. उस के शरीर पर नीले रंग की टीशर्ट, जींस और पैरों में जूते थे. शिनाख्त के लिए लाश की तलाशी ली गई तो उस के पास ऐसी कोई चीज नहीं मिली, जिस से उस की शिनाख्त हो पाती.

युवक की हत्या गला दबा कर की गई थी. उस के गले पर रस्सी के निशान स्पष्ट नजर आ रहे थे. स्थितियां यही बता रही थीं कि युवक की हत्या कहीं और कर के लाश यहां ला कर फेंकी गई थी. चूंकि मृतक नौजवान था, इसलिए पुलिस को मामला अवैध संबंधों में हत्या का लगा. घटनास्थल की सारी जरूरी काररवाई पूरी कर के रणधीर मिश्र ने लाश पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दी. इस के बाद थाने आ कर उन्होंने चौकीदार बाबूलाल की ओर से हत्या के इस मामले को भादंवि की धारा 302, 201 के तहत अज्ञात के खिलाफ दर्ज करा दिया.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद स्पष्ट हो गया कि हत्या रस्सी से गला घोंट कर की गई थी. परेशानी यह थी कि 2 दिन बीत जाने के बाद भी मृतक की शिनाख्त नहीं हुई थी. दूसरी ओर घटना का खुलासा करने के लिए एसपी जटाशंकर सिंह ने सीओ पंकज सिंह की देखरेख में थानाप्रभारी रणधीर मिश्र, सबइंसपेक्टर मोहम्मद शहाबुद्दीन, प्रशिक्षण के लिए आए एसआई दिनेश सरोज, अरविंद कुमार राय, सिपाही योगेंद्र, रामपाल, इंद्रेश यादव, गिरजेश यादव और राहुल सिंह की एक टीम गठित कर दी थी. इस पुलिस टीम ने युवक की शिनाख्त के लिए जिले के अन्य थानों की पुलिस को मृतक की फोटो भेज कर शिनाख्त की कोशिश की, लेकिन कहीं से भी मृतक के बारे में कोई सूचना नहीं मिली.

इस के बाद रणधीर मिश्र ने मृतक की शिनाख्त के लिए बड़ेबड़े पोस्टर छपवा कर जगहजगह चिपकवाए और उस की कौपी व्हाट्सएप, फेसबुक इलेक्ट्रौनिक और प्रिंट मीडिया के माध्यम से बस्ती समेत कई जनपदों में प्रसारित कराए. यही नहीं, कुछ पोस्टर उन्होंने बसों व ट्रेनों में भी चिपकवाए. 25 मार्च, 2016 को जिला अंबेडकरनगर के गांव नूनशिला के रहने वाले चंद्रमणि उर्फ ननकू किसी काम से बस्ती आए थे. उन्होंने बस स्टेशन पर लगे पोस्टर को देखा तो उन्हें लगा कि यह उन के रिश्तेदार प्रदीप उपाध्याय की फोटो है. इस की वजह यह थी कि उन के रिश्तेदार कृष्णदेव उपाध्याय का बेटा प्रदीप उपाध्याय करीब 20 दिनों से गायब था.

उन्होंने गोरखपुर के थाना में इस बात की रिपोर्ट भी दर्ज करा रखी थी. गोरखपुर में रिपोर्ट दर्ज कराने की वजह यह थी कि प्रदीप गोरखपुर में रह कर आईटीआई कर रहा था. चंद्रमणि ने तुरंत कृष्णदेव उपाध्याय को फोन कर के बताया कि बस्ती जिले के बस स्टेशन पर शिनाख्त के लिए एक युवक का फोटोयुक्त पोस्टर चिपकाया गया है, जिस में छपा फोटो उन्हें उन के बेटे प्रदीप का लग रहा है. संयोग से यह घटना उन के बेटे के गायब होने के एक दिन बाद की है. कृष्णदेव उपाध्याय को उस पोस्टर के बारे में पता चला तो वह अपने परिवार के कुछ लोगों और रिश्तेदारों के साथ बस्ती के बस स्टेशन पर जा पहुंचे.

पोस्टर देखते ही उन लोगों ने उस में छपी फोटो की शिनाख्त प्रदीप कुमार उपाध्याय के रूप में कर दी. इस के बाद सभी लोग रोतेबिलखते थाना पुरानी बस्ती पहुंचे, जहां उन्होंने थानाप्रभारी रणधीर मिश्र को बताया कि जो पोस्टर बस्ती के बस स्टेशन पर चिपकाए गए हैं, उस में छपा फोटो उन के बेटे प्रदीप उपाध्याय का है. रणधीर मिश्र ने उन लोगों को मृतक के कपड़े और जूते दिखाए तो उन्हें देख कर यह बात साफ हो गई कि मृतक मूलरूप से फैजाबाद का रहने वाला था और उस ने गोरखपुर में एल्युमिनियम फैक्ट्री के पास किराए का कमरा ले रखा था. वहीं रहते हुए वह आईटीआई कर रहा था. 8 मार्च को बस्ती में चैनपुरवा ओवरब्रिज के नीचे से जो लाश मिली थी, वह प्रदीप कुमार उपाध्याय की ही थी.

मृतक की शिनाख्त तो हो गई, लेकिन पुलिस के लिए अब भी इस हत्याकांड का पर्दाफाश करना किसी चुनौती से कम नहीं था, क्योंकि हत्यारों ने कोई ऐसा सबूत नहीं छोड़ा था, जिस के आधार पर पुलिस हत्या के कारणों का पता लगा कर हत्यारों तक पहुंच पाती. लाश की शिनाख्त के बाद पुलिस टीम गोरखपुर की एल्युमिनियम फैक्ट्री के पास स्थित मृतक प्रदीप के किराए के कमरे पर पहुंची और आसपास के लोगों से पूछताछ की.

इस पूछताछ में पता चला कि मृतक की नान्हू पांडेय से गहरी मित्रता थी. लेकिन किसी बात को ले कर उस का नान्हू से झगड़ा हुआ था. पुलिस को लगा कि हो सकता है यही झगड़ा प्रदीप की हत्या का कारण बना हो. इस के बाद पुलिस ने मृतक प्रदीप के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई. पता चला कि उस की जिला गोंडा के थाना मनकापुर के रहने वाले नान्हू से अक्सर बातें होती रहती थीं. इस के अलावा उस की काल डिटेल्स में एक नंबर और मिला, जिस पर सब से ज्यादा बातें हुई थीं. पुलिस ने उस नंबर के बारे में पता किया तो वह नंबर एक लड़की का निकला.

इस से पुलिस के सामने हत्या का कारण लगभग स्पष्ट हो गया. यह हत्या आशनाई की वजह से हुई थी, क्योंकि काल डिटेल्स के अनुसार वह लड़की कोई और नहीं, नान्हू पांडेय की बहन थी. इस के बाद पुलिस ने अखिलेश पांडेय उर्फ नान्हू पांडेय के जिला गोंडा थाना मनकापुर के गांव हरसिंहपुरवा स्थित घर छापा मारा. लेकिन वह घर पर नहीं मिला. इस पर पुलिस ने मुखबिरों का जाल बिछा कर नान्हू की गिरफ्तारी के प्रयास तेज कर दिए. इस का नतीजा यह निकला कि पुलिस को नान्हू के छिपे होने के स्थान की जानकारी मिल गई. पुलिस ने मुखबिर की सूचना पर विश्वास कर के जिला बस्ती के थाना पैकोलिया स्थित नान्हू पांडेय की ससुराल में छापा मारा.

पुलिस को आया देख कर उस ने अपने साले नीरज पांडेय और मित्र सुनील सिंह के साथ भागने की कोशिश की, लेकिन पुलिस ने तीनों को धर दबोचा. गिरफ्तारी के बाद तीनों को पूछताछ के लिए थाना पुरानी बस्ती लाया गया.

पुलिस ने जब नान्हू से प्रदीप की हत्या के बारे में पूछा तो पहले उस ने बहानेबाजी की, लेकिन जब पुलिस ने सबूतों के आधार पर उसे घेरा तो उस ने प्रदीप की हत्या की बात स्वीकार कर ली. उस ने बताया कि प्रदीप की हत्या उस ने अपने साले नीरज पांडेय, दोस्त सुनील सिंह और बृजकिशोर सिंह के साथ मिल कर 7 मार्च की रात को की थी. हत्या करने के बाद उस ने लाश बस्ती में हाईवे पर फेंक दी थी. हत्या की वजह उस ने अपनी बहन से प्रदीप के अवैध संबंध बताए. उस ने प्रदीप की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी.

फैजाबाद जिले का रहने वाला प्रदीप कुमार उपाध्याय गोरखपुर स्थित एल्युमिनियम फैक्ट्री के पास किराए का मकान ले कर आईटीआई कर रहा था. उस के पिता कृष्णदेव उपाध्याय रेलवे में थे. इस समय वह वाराणसी में हैं. प्रदीप का ज्यादातर समय गोरखपुर में बीतता था. हां, छुट्टियों में वह जरूर घर चला जाता था. गोरखपुर में ही उस की दोस्ती गोंडा जिले के रहने वाले हिस्ट्रीशीटर अखिलेश कुमार पांडेय उर्फ नान्हू पांडेय से हो गई. दोस्ती की वजह से प्रदीप उस के घर भी आनेजाने लगा.

नान्हू के घर जाने पर प्रदीप ने उस की बहन राधिका (काल्पनिक नाम) को देखा तो पहली ही नजर में वह उस के दिल में उतर गई. उसे पाने की तमन्ना लिए वह गोरखपुर वापस तो आ गया, लेकिन उस के लिए बेचैन रहने लगा. इस के बाद वह राधिका के लिए किसी न किसी बहाने अक्सर नान्हू के घर आनेजाने लगा. परिणामस्वरूप दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ने लगीं. एक समय ऐसा भी आया, जब दोनों दुनिया से बेखबर हो कर प्रेम के समंदर में गोते लगाने लगे. प्रेम गहराया तो राधिका ने कहा, ‘‘प्रदीप, मैं अब तुम्हारे बिना नहीं रह सकती. अब तुम शादी कर के मुझे अपनी दुलहन बना कर अपने घर ले चलो.’’

प्रदीप ने कहा, ‘‘कुछ दिन सब्र रखो, समय आने पर मैं अपने पिताजी से शादी की बात करूंगा.’’

प्रदीप ने राधिका से शारीरिक संबंध तो बना ही लिए थे, मोबाइल से उस के कुछ अश्लील फोटो भी खींच लिए थे. कहते हैं कि इश्क मुश्क छिपाए नहीं छिपते. इस मामले में भी यही हुआ. आखिर राधिका और प्रदीप के संबंधों की भनक नान्हू को लग गई. वह दोनों पर नजर तो रखने ही लगा, साथ ही उस ने प्रदीप से अपनी बहन से दूर रहने को भी कहा. लेकिन जब उसे पता चला कि प्रदीप और राधिका के संबंध हद से आगे बढ़ गए हैं तो उस ने प्रदीप से कहा कि वह राधिका से शादी कर ले.

प्रदीप ने शादी से तो मना कर ही दिया, साथ ही राधिका के अश्लील चित्रों के आधार पर उसे धमकी भी दी कि अगर उस ने उसे राधिका से मिलने से रोका तो वह उस की बहन के फोटो सार्वजनिक कर देगा. इतना सब होने के बाद भी प्रदीप नान्हू के घर राधिका से मिलने जाता रहा. यह नान्हू की सरासर बेइज्जती थी. उस ने गोरखपुर जा कर प्रदीप से काफी झगड़ा किया और उसे जान से मारने की धमकी दी.

7 मार्च, 2016 को नान्हू ने अपने साले नीरज तथा दोस्त सुनील के साथ मिल कर प्रदीप को ठिकाने लगाने की योजना बनाई और फोन कर के प्रदीप को मिलने के लिए बुलाया. प्रदीप गोरखपुर से बाघ एक्सप्रेस द्वारा मनकापुर आया, जहां पहले से मौजूद नान्हू और उस के साले से प्रदीप की कहासुनी हो गई. इस के बाद नान्हू और नीरज ने प्रदीप को पीटपीट कर अधमरा कर दिया. फिर अपने बदमाश मित्रों सुनील सिंह और बृजकिशोर सिंह को फोन कर के बुलाया और प्रदीप को होंडा सिटी कार में डाल कर बस्ती की ओर चल पड़े. रास्ते में उन्होंने प्रदीप के गले में रस्सी डाल कर कस दी, जिस से उस की मौत हो गई. इस के बाद वे लाश को चैनपुरवा हाईवे ओवरब्रिज के नीचे डाल कर लौट आए. होंडा सिटी कार नान्हू पांडेय की थी.

हत्याभियुक्त अखिलेश पांडेय उर्फ नान्हू पांडेय के ऊपर पहले से ही 12 मुकदमे दर्ज हैं, जिन में लूट, हत्या का प्रयास, छिनैती, गुंडा एक्ट, मारपीट और आर्म्स एक्ट जैसे संगीन अपराध शामिल हैं. उस के साले नीरज पर भी लूट, हत्या का प्रयास, विस्फोटक अधिनियम, धोखाधड़ी सहित दर्जन भर मुकदमे बस्ती जिले के विभिन्न थानों में दर्ज हैं. तीसरे हत्याभियुक्त सुनील सिंह पर भी गोंडा जिले के विभिन्न थानों में हत्या, लूट, गुंडा एक्ट, आर्म्स एक्ट सहित कई मुकदमें दर्ज हैं. चौथा अभियुक्त बृजकिशोर सिंह कथा लिखे जाने तक पुलिस की गिरफ्त से बाहर था.

जबकि पकड़े गए हत्याभियुक्तों को कोर्ट में पेश कर के जेल भेज दिया गया था. घटना का परदाफाश करने वाली पुलिस टीम को एसपी ने 5 हजार रुपए का इनाम देने की घोषणा की है. Illegal Relationship

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित है.

Bhopal Crime News: अपने अपने दांव

Bhopal Crime News: दरोगा मोहन सक्सेना ने अंकित से पीछा छुड़ाने का दांव तो बहुत बढि़या चला था, लेकिन थाना बैरसिया पुलिस ने भी ऐसा दांव खेला कि उन का दांव फेल हो गया और वह साथियों के साथ पुलिस की पकड़ में आ ही गए…

17  जनवरी की बात है. जिला मुख्यालय भोपाल से कोई 40 किलोमीटर दूर बसे बैरसिया से हो कर विदिशा जाने वाले मार्ग पर पड़ने वाले गांव भोजापुरा के जंगल में कुछ लोगों ने एक युवक की सिर कुचली निर्वस्त्र पड़ी लाश देखी. उन्हीं में से किसी ने इस मामले की जानकारी थाना बैरसिया के थानाप्रभारी एच.सी. लाडिया को दे दी. मामला चूंकि हत्या का लग रहा था, इसलिए घटनास्थल के लिए रवाना होने से पहले थानाप्रभारी ने इस घटना की सूचना एसडीओपी बीना सिंह और एसपी भोपाल अरविंद सक्सेना को भी दे दी.

एच.सी. लाडिया पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंचे तो देखा कि मृतक 24-25 साल का था. उस के सिर पर चोट के निशान थे. कोई उसे पहचान न सके, इस के लिए भारी पत्थर से उस का सिर कुचल दिया गया था. खून सना पत्थर लाश के पास ही पड़ा था.

मृतक के कपड़े और अन्य सभी चीजें गायब थीं. इस से थानाप्रभारी ने यही अनुमान लगाया कि हत्यारे ने ऐसा इसलिए किया होगा, जिस से पुलिस को कोई सुराग न मिल सके. मृतक की पहचान भी नहीं हो सकी. पुलिस ने आसपास खोजबीन की तो कुछ ही दूरी पर एक बिना नंबर की नई कार आई-20 लावारिस खड़ी मिल गई. काफी पूछताछ के बाद भी जब आसपास कार का मालिक नहीं मिला तो मौके पर पहुंची एसडीओपी बीना सिंह ने कार का संबंध जंगल में मिली लाश से जुड़ा मान कर कार की तलाशी ली.

कार में मिले दस्तावेजों से पता चला कि वह कार शाजापुर निवासी निर्मला गौर की थी. पुलिस ने जब निर्मला से संपर्क किया तो उन्होंने बताया कि कार उन की ही है. उन का ड्राइवर अंकित यह कह कर कार ले गया था कि उसे अपने दोस्तों के साथ उज्जैन जाना है. निर्मला ने अंकित का जो हुलिया बताया था वह जंगल में मिली लाश से काफी मिल रहा था. निर्मला से अंकित का पता मिल गया था. पुलिस ने शाजापुर की इंदिरा कालोनी में रहने वाले उस के घर वालों को बुला कर लाश दिखाई तो उन्होंने उस की पहचान अंकित के रूप में कर दी.

लाश की पहचान हो जाने से पुलिस का सिरदर्द थोड़ा कम हो गया क्योंकि जांच की राह आसान हो गई थी. लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेजने और घटनास्थल की प्राथमिक काररवाई निपटाने के बाद पुलिस ने जांच शुरू की. जांच अधिकारी बनाया गया सबइंसपेक्टर भारत सिंह को. इस मामले के तार शाजापुर से जुड़े हो सकते थे, इसलिए एसडीओपी बीना सिंह के निर्देश पर टीआई एच.सी. लाडिया ने भारत सिंह के नेतृत्व में एक टीम शाजापुर भेजी. इस टीम में आरक्षक बृजमोहन व्यास और राजेश सोलंकी को विशेष रूप से शामिल किया गया.

स्थानीय पुलिस की मदद से भारत सिंह को अंकित के बारे में जो जानकारी मिली, उस में सब से खास बात यह थी कि निर्मला के यहां नौकरी करने से पहले अंकित पुलिस लाइन में तैनात एएसआई मोहन सक्सेना के घर पर ड्राइवर की नौकरी करता था. मोहन सक्सेना ने कुछ समय पहले ही उसे नौकरी से निकाल दिया था. वजह यह थी कि अंकित और मोहन सक्सेना के बेटे नितिन की पत्नी अनीता (बदला हुआ नाम) के साथ उस के न केवल अवैध रिश्ते बन गए थे, बल्कि दोनों के इश्क की चर्चा शाजापुर की गलियों में आम हो गई थी. मोहन सक्सेना ने एकदो बार अंकित को सार्वजनिक रूप से पुलिसिया रौब भी दिखाया था.

मोहन सक्सेना के यहां से निकाले जाने के बाद अंकित निर्मला के यहां नौकरी करने लगा था. लाश मिलने से एक दिन पहले वह दोस्तों के साथ उज्जैन जाने की बात कह कर निर्मला की कार ले कर निकला था. अब सवाल यह था कि अंकित भोजापुर कैसे पहुंच गया? भारत सिंह ने जब इस बारे में खोजबीन की तो पता चला कि 16 जनवरी की शाम को अंकित के साथ कार में तांत्रिक संजय व्यास को बैठे देखा गया था. उम्र का आधा शतक पूरा करने के करीब पहुंच चुका संजय शाजापुर का ही रहने वाला था.

कुछ साल पहले तक संजय सहकारी कोऔपरेटिव बैंक में चपरासी की नौकरी करता था. लेकिन वह किले स्थित बड़ वाले जिंद बाबा की भक्ति में ऐसा डूबा कि उस ने नौकरी तक छोड़ दी. वह हरे रंग के कपड़े पहनने के साथ गले में मूंगामोती और बड़ेबड़े हकीक पत्थरों की माला पहन कर तांत्रिक बन गया. संजय खुद को तांत्रिक और जिंद बाबा का शार्गिद बताता था. धीरेधीरे उस के पास लोगों की भीड़ लगने लगी थी.

हर बृहस्पतिवार को वह किले में बड़ वाले जिंद बाबा की मजार पर बैठता था. उस दिन बड़ी संख्या में स्त्रीपुरुष उस के पास अपनी समस्याएं ले कर आते थे. भोजापुर के जंगल में जहां अंकित की नग्न लाश मिली थी, वहां कुछ पूजा सामग्री भी पड़ी मिली थी. उस वक्त पुलिस ने इस ओर ज्यादा ध्यान नहीं दिया था, लेकिन तांत्रिक का नाम सामने आते ही भारत सिंह समझ गए कि अंकित का हत्यारा कौन हो सकता है? पुलिस ने तांत्रिक संजय व्यास को थाने बुला कर उस से पूछताछ शुरू की तो वह खुद को निर्दोष बताता रहा.

उस का कहना था कि घटना वाले दिन वह शाजापुर में ही था, लेकिन जब पुलिस ने उसे बताया कि उस दिन उस के मोबाइल की लोकेशन भोजापुर बैरसिया में थी तो उस से कुछ जवाब देते नहीं बना. पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया. उस से मिली जानकारी के आधार पर थाना बैरसिया पुलिस शाजापुर जा कर पुलिस लाइन में तैनात एएसआई मोहन सक्सेना और उस के बेटे नितिन को भी गिरफ्तार कर के ले आई. तीनों से पूछताछ में अंकित के कत्ल की कहानी सामने आ गई. शाजापुर पुलिस लाइन में तैनात एएसआई मोहन सक्सेना रिटायरमेंट के करीब थे. उन के बाकी बच्चे तो अपनेअपने काम में लग गए थे, लेकिन बेटा नितिन मानसिक रूप से कमजोर होने के कारण बेरोजगार था.

रोजगार से लगाने के लिए मोहन सक्सेना ने उसे एक इंडिका कार दिलवा दी थी, जिसे वह टैक्सी के रूप में चलवाने लगा था. इस के लिए इंदिरा कालोनी के रहने वाले 24 वर्षीय अंकित को उन्होंने ड्राइवर के तौर पर रखा हुआ था. नितिन की शादी पास के गांव की रहने वाली अनीता से हुई थी. अपनी मानसिक दशा की वजह से नितिन को पत्नी से कोई भावनात्मक लगाव नहीं था. उस के लिए पत्नी केवल रात बिताने का साधन मात्र थी. पति के व्यवहार से दुखी अनीता पतिपत्नी के संबंधों में उस का साथ तो देती रही, लेकिन उसे कभी भी वह दिल से प्यार नहीं कर सकी.

नितिन के प्रति अनीता के मन में भरी नफरत उस के हावभाव से ही झलकती थी, जिसे अंकित समझ चुका था. अंकित अनीता की खूबसूरती और चंचलता का दीवाना तो था ही, उसे लगा कि अगर वह थोड़ी सी हिम्मत करे तो अनीता से उस की दोस्ती हो सकती है. हकीकत यह थी कि अनीता पहले से ही मन ही मन अंकित को पसंद करती थी. यह अलग बात थी कि घर की बहू होने के नाते उस में इतनी हिम्मत नहीं थी कि अपनी ओर से पहल कर सके. उधर अंकित के मन में जब यह खयाल आया तो उस ने अनीता की तरफ कदम बढ़ाने शुरू कर दिए. उस के बढ़ते कदमों का मतलब समझ कर अनीता ने भी उसे सकारात्मक संकेत देने शुरू कर दिए.

अनीता की ओर से इशारा मिलने पर अंकित ने तेजी से कदम बढ़ाए. संयोग से उसी बीच अनीता के ससुर मोहन सक्सेना को लकवा मार गया. फलस्वरूप वह ज्यादातर घर में ही रहने लगे. इस से अनीता और अंकित को बातचीत का मौका कम ही मिल पाता था. चूंकि मोहन सक्सेना चलनेफिरने से लाचार हो गए थे, इसलिए उन्हें हर जगह कार से लाना ले जाना पड़ता था. इसी चक्कर में अंकित का घर में आनाजाना कुछ ज्यादा ही बढ़ गया था. लकवा मारने पर मोहन सक्सेना डाक्टर की दवाइयों के साथसाथ तांत्रिक संजय व्यास से भी झाड़फूंक करवा रहे थे.

इसे दवाओं का असर कहें या संजय व्यास की झाड़फूंक, मोहन सक्सेना को लाभ हुआ और वह खुद चलनेफिरने लगे. दूसरी ओर घर आनेजाने में अंकित लगातार अनीता के करीब होता गया. लगभग साल भर पहले एक दिन मौका पा कर उस ने अनीता से अपने मन की बात कह दी. अनीता ने भी आगे बढ़ कर उसे गले लगा लिया. जल्द ही न केवल दोनों का चोरीछिपे मिलनाजुलना शुरू हो गया, उन के बीच अनैतिक संबंध भी बन गए.

सच यह है कि भरेपूरे परिवार में इस तरह के संबंध ज्यादा दिनों तक छिपे नहीं रहते. अंकित और अनीता के साथ भी यही हुआ. एक दिन मोहन सक्सेना ने अंकित को अपनी बहू अनीता के साथ आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया. अंकित की यह हरकत उन के मुंह पर तमाचे जैसी थी, वह तिलमिला उठे. उन्होंने न केवल दोनों की खूब खबर ली, बल्कि अंकित को नौकरी से निकाल कर उसे अनीता से दूर रहने की हिदायत भी दी.

मोहन सक्सेना को उम्मीद थी कि उन के पुलिस में होने की वजह से अंकित अब कभी उन की बहू की तरफ नजर उठा कर देखने की हिम्मत नहीं करेगा. लेकिन उन की धमकी से न अंकित डरा और न अनीता. ससुर द्वारा पकडे़ जाने के बाद भी न अनीता अपनी हरकतों से बाज आई थी न अंकित. मोहन सक्सेना को जब कभी अंकित अपने घर के आसपास चक्कर लगाते दिख जाता तो उन का खून खौल उठता.

इसी बीच उन्हें पता चला कि अंकित के पास अनीता के कुछ अश्लील फोटो हैं, जिन्हें वह अपने कई दोस्तों को दिखा चुका है. इस से सक्सेना परिवार की बदनामी हो रही थी. परेशान हो कर मोहन सक्सेना ने अंकित का पत्ता साफ करने का फैसला कर लिया. लकवा ठीक होने के बाद मोहन सक्सेना को तांत्रिक संजय व्यास की शक्तियों पर पूरा विश्वास हो गया था. इसलिए वह जबतब उस के दर्शन करने जाया करते थे. इस से पहले अंकित उन्हें इलाज के लिए कार में बैठा कर संजय के पास ले जाया करता था.

इसी आनेजाने की वजह से संजय व्यास से अंकित का भी अच्छा परिचय हो गया था. मोहन सक्सेना की तरह वह भी मानने लगा था कि संजय व्यास के तंत्रमंत्र में काफी ताकत है. अनीता से अंकित का मिलनाजुलना तो जारी था, लेकिन ससुर द्वारा पकड़े जाने के बाद से वह काफी डर गई थी. अंकित अब अनीता को भगा ले जाना चाहता था. उस का कहना था कि दोनों कहीं दूर जा कर शादी कर लेंगे. लेकिन अनीता इतना बड़ा कदम उठाने को तैयार नहीं थी.

अंकित ने सुन रखा था कि तंत्रमंत्र की ताकत से किसी भी लड़की को वश में किया जा सकता है. इसलिए जब अनीता उस के साथ भागने को राजी नहीं हुई तो वह तांत्रिक संजय व्यास की शरण में पहुंच गया. वह संजय से कोई ऐसी तांत्रिक पूजा करवाना चाहता था, जिस से अनीता उस के वश में हो कर भागने को राजी हो जाए. संजय का तो काम ही ऐसे कामों से पैसा कमाना था, सो वह इस के लिए राजी हो गया. फलस्वरूप अंकित का संजय के पास आनाजाना बढ़ गया. मोहन सक्सेना भी संजय के भक्त थे. उन्होंने अंकित को कई बार संजय के पास जाते देखा तो एक दिन उस से पूछ लिया कि वह उन के पास क्यों आता है?

पहले तो संजय ने बात बना कर उन्हें टालना चाहा, लेकिन जब मोहन सक्सेना उस के पीछे पड़ गए तो उस ने उन्हें बता दिया कि अंकित उन की बहू अनीता पर वशीकरण करवाना चाहता है, ताकि उसे अपने साथ भगा ले जाए. अंकित की मंशा जान कर मोहन सक्सेना आगबबूला हो उठे. इस के बाद उन्होंने सोचना शुरू किया तो उन के दिमाग में एक ऐसी योजना आई, जिस से आसानी से अंकित का पत्ता साफ किया जा सकता था.

सक्सेना ने विदिशा आतेजाते भोजापुरा का जंगल देखा था. वह जंगल शाजापुर से इतनी दूर था कि अगर शाजापुर के आदमी की लाश वहां मिल भी जाती है तो उस की पहचान करना संभव नहीं था. सोचविचार कर उन्होंने तांत्रिक संजय व्यास को लालच दिया कि अगर वह पूजा के बहाने अंकित को भोजापुर के जंगल तक ले जाता है तो वह उसे 15 हजार रुपया देंगे. पैसों के लालच में आ कर तांत्रिक संजय व्यास राजी हो गया. योजना के अनुसार, 16 जनवरी की रात संजय व्यास अंकित को ले कर भोजापुरा के जंगल में पहुंच गया. अंकित बहाना बना कर निर्मला गौर की कार ले कर आया था. संजय के कहने पर उस ने कार जंगल के बाहर खड़ी कर दी.

इस के बाद जंगल के अंदर जा कर संजय व्यास ने पूजा के नाम पर अंकित को निर्वस्त्र हो कर आंखें बंद कर के बैठने को कहा. पूजा शुरू हो गई. इसी बीच पीछे से आ कर मोहन सक्सेना और उन के बेटे नितिन ने सिर में लोहे की रौड मार कर अंकित की हत्या कर दी. लाश का चेहरा पहचान में न आए, इस के लिए तीनों ने एक भारी पत्थर से उस का चेहरा कुचल दिया. मोहन सक्सेना ने सोचा था कि न तो लाश की पहचान होगी और न वे लोग कभी पकड़े जाएंगे.

लेकिन बैरसिया पुलिस ने 4 दिनों में ही वर्दी वाले कातिल, उस के बेटे और तांत्रिक को सलाखों के पीछे पहुंचा दिया. अपराधियों के खिलाफ 17 जनवरी को भादंवि की धारा 302ए, 201, 120बी और 34 आईपीसी के अंर्तगत मुकदमा दर्ज कर के जेल भेज दिया गया. Bhopal Crime News

लेखक – अरुण कुमार हरदैनिया

— पुलिस सूत्रो

Social Crime Story: तंत्रमंत्र का शूल

Social Crime Story: बेटे की चाह रखने वाले अनिल रस्तोगी ने अपने दोस्त कल्लू तांत्रिक की बातों में आ कर अपनी बेटी को उस के हवाले कर दिया था ताकि वह उस की बलि चढ़ा दे. उस ने सोचा भी नहीं था कि उस का दोस्त उस की बेटी को मारने से पहले उस के साथ दुष्कर्म भी करेगा.

सलोनी का अचानक गायब होना किसी को भी आश्चर्य में डाल सकता था. उस के मातापिता क्या पूरा गांव हैरत में था कि चंद कदम दूर सहेली के घर ट्यूशन पढ़ने गई सलोनी आखिर गई तो कहां गई? उस की सहेली का कहना था कि सलोनी उस के घर आई ही नहीं थी. घरपरिवार वाले, गांव वाले उसे ढूंढढूंढ कर थक गए थे. थाने में उस की गुमशुदगी की रिपोर्ट भी लिखा दी गई थी, लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला था.

सलोनी 15 दिसंबर, 2015 की शाम को अपनी मां सारिका से यह कह कर घर से निकली थी कि वह अपनी सहेली के घर ट्यूशन पढ़ने जा रही है. उस समय उस का पिता अनिल कुमार रस्तोगी अपनी ड्यूटी पर गया था. अनिल बिलारी स्थित अजुध्या शुगर मिल्स में गन्ने की पर्ची काटने का काम करता था. सलोनी ट्यूशन पढ़ कर एक घंटे में लौट आती थी. उस दिन जब वह डेढ़ घंटे तक भी नहीं लौटी तो सारिका उस की सहेली के घर गई. सहेली ने जब यह बताया कि सलोनी वहां आई ही नहीं थी तो सारिका सन्न रह गई. वापस लौट कर उस ने पति के मोबाइल पर संपर्क करने की कोशिश की तो पता चला कि उस का फोन बंद है. हैरानपरेशान सारिका को कुछ भी नहीं सूझ रहा था.

रात को करीब 8 बजे जब अनिल रस्तोगी घर लौटा तो नशे में धुत था. सारिका ने उसे सलोनी के गायब होने की बात बताई तो वह बोला, ‘‘मैं तो ड्यूटी से आ रहा हूं, मुझे क्या पता? गई होगी अपनी किसी सहेली के पास, आ जाएगी.’’

नशे की वजह से अनिल रस्तोगी इस स्थिति में नहीं था कि बेटी को खोज सके. लेकिन सारिका ने उस पर दबाव डाला तो वह बेटी को खोजने निकल पड़ा. उस स्थिति में वह न तो किसी के घर जा सकता था और न ही किसी का सहयोग ले सकता था. इसलिए थोड़ी देर इधरउधर भटक कर लौट आया. सारिका ने खाना बना रखा था, वह बेताबी से बेटी का इंतजार कर रही थी. देखने से ही लगता था कि वह बेटी को ले कर बहुत परेशान है. लेकिन अनिल रस्तोगी को न तो बेटी की चिंता थी और न पत्नी की. वह खाना खा कर सो गया.

अनिल रस्तोगी के परिवार में पत्नी के अलावा एक बेटी थी सलोनी और एक बेटा, जो अभी काफी छोटा था. अनिल परिवार सहित अजुध्या शुगर मिल्स की वर्कर्स कालोनी में रहता था. 11 वर्षीया सलोनी स्थानीय सरकारी स्कूल में 7वीं में पढ़ रही थी. घरपरिवार में सब कुछ ठीक चल रहा था कि तभी 15 दिसंबर, 2015 की शाम को सलोनी गायब हो गई थी. सारिका ने वह पूरी रात जागतेजागते गुजारी. रातभर उस के दिमाग में बुरेबुरे खयाल आते रहे. जैसेतैसे सुबह हुई तो उस ने खुद घर से बाहर जा कर कालोनी के लोगों से बात की. कुछ लोगों को साथ ले कर उस ने सलोनी को ढूंढने की कोशिश भी की. यह देख कर अनिल रस्तोगी भी घर से निकल आया था.

जब सलोनी का कोई पता नहीं चला तो लोगों ने सारिका और अनिल को सलाह दी कि हाथ पर हाथ रख कर बैठने से कुछ नहीं होगा, पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराओ. बात जब थाने जाने की आई तो अनिल रस्तोगी ने फोन कर के अपने जिगरी दोस्त कल्लू को भी बुला लिया. अनिल रस्तोगी अपने दोस्त कल्लू और कालोनी के कुछ लोगों के साथ स्थानीय थाना बिलारी पहुंचा. थानाप्रभारी तेजेंद्र सिंह यादव उस समय थाने में ही थे.

उन लोगों की बात सुन कर श्री यादव ने सलोनी की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करवा दी, साथ ही अनिल रस्तोगी से कहा भी, ‘‘हो सकता है, लड़की नाराज हो कर कहीं चली गई हो. इसलिए उसे नातेरिश्तेदारों के यहां ढूंढो. हां, अगर आप की किसी से दुश्मनी हो या फिर किसी पर शक हो तो हमें बताओ, ताकि हम अपने हिसाब से काररवाई कर सकें.’’

अनिल रस्तोगी ने दुश्मनी या किसी पर शक होने की बात से इनकार कर दिया. गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करा कर अनिल और उस के साथी लौट आए और सलोनी को ढूंढने लगे. लेकिन तमाम कोशिशों के बाद भी उस का कोई पता नहीं चला. सलोनी की मां सारिका का मायका पीलीभीत के न्यूरिया कस्बे में था. सलोनी के गायब होने की खबर पा कर उस के मायके वाले भी आ गए थे. आसपास की अन्य रिश्तेदारियों में भी पता कर लिया गया था. सलोनी का कहीं कोई पता नहीं चल पा रहा था. इस बीच उसे गायब हुए 2 दिन बीत चुके थे.

अनिल रस्तोगी का दोस्त कल्लू बिलारी के निकटवर्ती गांव खंडऊआ का रहने वाला था. उस की पत्नी सालों पहले उसे छोड़ कर किसी और के साथ भाग गई थी. इस के बाद कल्लू ने न तो शादी की थी और न पत्नी को ढूंढने की कोशिश. इस के बजाय वह तंत्रमंत्र और झाड़फूंक करने लगा था. दोस्त होने के नाते वह अनिल रस्तोगी के घर आता रहता था. जिस दिन से सलोनी गायब हुई थी, कल्लू अनिल के साथ ही था. 17 दिसंबर की सुबह अनिल रस्तोगी ने कल्लू से कहा, ‘‘सलोनी को ढूंढढूंढ कर परेशान हो गए हैं, उस का कहीं पता नहीं चल रहा. क्यों न तंत्रमंत्र से उस का पता लगाने की कोशिश की जाए?’’

‘‘हां, तंत्र क्रियाओं से उस का पता तो लग सकता है लेकिन बिना वजह खर्चा हो जाएगा.’’ कल्लू ने अनिल रस्तोगी को समझाने के लिए कहा तो वह छूटते ही बोला, ‘‘मेरी बेटी गायब है और तुम कह रहे हो बिना वजह खर्च हो जाएगा? तुम खर्चे की चिंता मत करो, बस किसी भी तरह मेरी बेटी का पता लगाओ.’’

‘‘ठीक है, तुम जरूरत का सामान मंगा दो, मैं चौकी लगाऊंगा. इस से हमें अवश्य ही सलोनी का पता चल जाएगा.’’

अनिल रस्तोगी ने वह सारा सामान मंगवा लिया, जो कल्लू ने बताया. सामान आ गया तो कल्लू ने पूरे विधिविधान से चौकी लगाई. इस काम में अनिल रस्तोगी ने भी उस की मदद की. कल्लू का लाइव तमाशा देखने के लिए कालोनी के तमाम लोग एकत्र हो गए थे. दिन भर तांत्रिक क्रियाएं करने के बाद शाम को कल्लू ने बताया कि ईष्टदेव को प्रसन्न करने में परेशानी आ रही है, लेकिन वह जल्दी ही प्रसन्न हो जाएंगे. क्रिया पूरी होने के बाद 20 दिसंबर को सलोनी का पता चल पाएगा.

18 और 19 दिसंबर को कल्लू की तांत्रिक क्रियाएं चलती रहीं. हकीकत जानने के लिए 20 दिसंबर को सुबह से ही लोग अनिल रस्तोगी के घर जुटने लगे थे. अंतत: सुबह करीब 9 बजे अपनी तंत्र क्रियाओं में लीन कल्लू ने आंखें बंद कर के विचित्र सी आवाज में बताया, ‘‘सलोनी मर चुकी है. उस की लाश यहां से 3 किलोमीटर दूर बिचौला गांव के किसान जयपाल सिंह के गन्ने के खेत में पड़ी है.’’

उस की बात सुन कर वहां मौजूद सभी लोग चौंके. पलभर के लिए निस्तब्धता छा गई. चंद पलों की उस शांति को भंग किया सारिका के रुदन ने. अविश्वास वाली कोई बात नहीं थी. फिर भी तांत्रिक कल्लू की बातकी सच्चाई जानने के लिए लोगों का एक जत्था सलोनी की लाश की तलाश में निकल पड़ा. अनिल और कल्लू भी साथ थे. कल्लू की बात सही निकली. सलोनी की लाश जयपाल सिंह के गन्ने के खेत में ही पड़ी मिली. लोगों ने तत्काल थाना बिलारी को सूचना दी. खबर मिलते ही थानाप्रभारी तेजेंद्र सिंह यादव पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर जा पहुंचे.

लाश सड़ने लगी थी. मृतका के कपड़े देख कर अनिल रस्तोगी ने बताया कि लाश उस की बेटी सलोनी की ही है. लाश की शिनाख्त हो गई तो तेजेंद्र सिंह यादव ने मुरादाबाद के एसपी देहात प्रमोद कुमार सिंह और एसएसपी नितिन तिवारी को इस मामले की पूरी जानकारी दे दी. 11 वर्षीया बच्ची की हत्या की सूचना मिलते ही एसपी देहात प्रमोद कुमार सिंह घटनास्थल पर जा पहुंचे. उन्होंने भी अपने नजरिए से लाश का मुआयना किया. मृतका की नाक से खून निकला था, जो सूख चुका था. उस के गले पर ऐसे निशान दिख रहे थे, जैसे उस का गला घोंटा गया हो.

एसपी देहात ने मृतका सलोनी के पिता अनिल रस्तोगी से पूछताछ की तो उस ने बताया कि गायब होने से पहले सलोनी कानों में सोने की बाली, नाक में सोने की लौंग और पैरों में चांदी की पायल पहने हुए थी. जबकि इन में से कोई भी चीज उस के शरीर पर नहीं थी. प्राथमिक काररवाई के बाद पुलिस ने सलोनी की लाश पोस्टमार्टम के लिए मुरादाबाद भिजवा दी. आशंका थी कि सलोनी को मौत के घाट उतारने से पहले उस के साथ दुष्कर्म किया गया था. इस के साथ ही थाना बिलारी में अज्ञात के खिलाफ हत्या का केस दर्ज कर लिया गया.

जिलाधिकारी के आदेश पर 20 दिसंबर, 2015 की रात को ही डा. निर्मल ओझा, डा. सुजाता गौतम और डा. पवन कुमार के पैनल ने सलोनी की लाश का पोस्टमार्टम किया. पोस्टमार्टम से यह बात साफ हो गई कि सलोनी की हत्या गला घोंट कर की गई थी और यह काम उस के गायब होने वाली रात में कर दिया गया था. पोस्टमार्टम में यह भी साफ हो गया था कि मारने से पहले मृतका के साथ दुष्कर्म किया गया था. पोस्टमार्टम रिपोर्ट पढ़ने के बाद एसपी (देहात) प्रमोद कुमार सिंह ने थानाप्रभारी बिलारी तेजेंद्र सिंह यादव से कहा कि वह मृतका के परिवार वालों को थाने बुला लें.

इस के बाद प्रमोद कुमार सिंह थाना बिलारी पहुंच गए. तब तक सलोनी के घर वाले आ चुके थे. प्रमोद कुमार सिंह ने मृतका की मां और पिता से विस्तृत पूछताछ की, लेकिन उन की बातों से कुछ भी पता नहीं चल पा रहा था. तब प्रमोद कुमार सिंह ने थानाप्रभारी तेजेंद्र सिंह यादव से पूछा कि सलोनी की लाश खेत में पड़ी होने की सूचना किस ने दी थी? उन्होंने बताया कि सूचना मृतका के पिता अनिल रस्तोगी ने दी थी. प्रमोद कुमार सिंह ने अनिल रस्तोगी को अलग बैठा कर उस से पूछा कि उसे कैसे पता चला कि सलोनी की लाश 3 किलोमीटर दूर गन्ने के खेत में पड़ी है.

अनिल रस्तोगी ने उन्हें बताया कि जब कई दिन बीत गए तो उस ने लोगों के साथ खेतों में ढूंढना शुरू किया. इसी दौरान जब गन्ने के एक खेत से बदबू आई तो हम लोगों ने अंदर घुस कर देखा. खेत के अंदर सलोनी की लाश पड़ी थी. प्रमोद कुमार सिंह को लग रहा था कि अनिल रस्तोगी कुछ छिपाने की कोशिश कर रहा है. हकीकत जानने के लिए उन्होंने यही बात अकेले में अनिल की पत्नी सारिका से पूछी. सारिका ने जो कुछ बताया, उसे सुन कर प्रमोद कुमार सिंह चौंके.

सारिका ने बताया कि उस का पति और उस का दोस्त कल्लू दोनों ही तांत्रिक हैं. उन दोनों ने 3 दिन तक साधना कर के अपने ईष्टदेव को प्रसन्न किया था. उसी ने 20 दिसंबर की सुबह को कल्लू को बताया कि सलोनी की लाश बिचौला गांव के जयपाल सिंह के गन्ने के खेत में पड़ी है. सोचने वाली बात यह थी कि अनिल रस्तोगी ने झूठ क्यों बोला? दूसरे यह कि अभी तक कल्लू का नाम कहीं नहीं आया था. जबकि लाश के बारे में उसी ने बताया था. अनिल रस्तोगी थाने में था ही. प्रमोद कुमार सिंह ने थानाप्रभारी तेजेंद्र सिंह यादव से कहा कि वह अपनी टीम के साथ जाएं और कल्लू को तुरंत थाने ले आएं.

कल्लू गांव खंडऊआ का रहने वाला था. पुलिस उस की तलाश में उस के गांव पहुंची तो वह शराब पी रहा था. पुलिस उसे उठा कर थाने ले आई. प्रमोद कुमार सिंह ने अनिल और कल्लू को छोड़ कर सभी को कमरे से बाहर निकाल दिया. इस के बाद उन्होंने दोनों से पूछताछ की. इस पर उन्होंने बताया कि वे दोनों सिद्ध तांत्रिक हैं और उन्होंने अपनी तंत्रविद्या से लाश का पता लगाया था. जाहिर है, यह बात किसी के गले उतरने वाली नहीं थी. प्रमोद कुमार सिंह ने दोनों से मनोवैज्ञानिक ढंग से पूछताछ की. थोड़ी सख्ती भी की गई. इस के बावजूद दोनों खुद को निर्दोष बताते रहे. लेकिन पुलिस के सामने दोनों कब तक जुबान बंद रख सकते थे. उन्होंने प्रमोद कुमार सिंह को जो कुछ बताया, उसे सुन कर वह भी हैरत में रह गए.

हैरान अनिल रस्तोगी भी था, क्योंकि उसे यह तो पता था कि सलोनी की हत्या कर दी गई है, पर यह मालूम नहीं था कि हत्या से पहले उस के साथ दुष्कर्म भी किया गया था. बहरहाल, उन से पूछताछ के बाद जो हकीकत सामने आई, वह कुछ इस प्रकार थी. 17-18 साल पहले अनिल रस्तोगी की शादी पीलीभीत के कस्बा न्यूरिया की रहने वाली सारिका से हुई थी. शादी के 7 साल बाद तक सारिका मां नहीं बन सकी तो अनिल रस्तोगी ने कई तरह के नुस्खे आजमाए. डाक्टर से इलाज भी कराया. आखिरकार सारिका बेटी की मां बन गई. बेटी का नाम रखा गया सलोनी.

3 साल पहले सलोनी जब 8 साल की थी तो सारिका ने दूसरी बेटी को जन्म दिया. लेकिन जन्म के 14 दिनों बाद ही संदिग्ध परिस्थितियों में उस की मौत हो गई. दरअसल, हुआ यह था कि सारिका बच्ची को दूध पिलाने के बाद सुला कर नहाने चली गई थी. बच्ची को ठंड न लगे, यह सोच कर उस ने उसे ठीक से सारिका ने नहाने के बाद बच्ची को देखा तो वह मरी पड़ी थी. नवजात बेटी की मौत के एक साल बाद सारिका फिर मां बनी. इस बार उस ने बेटे को जन्म दिया. बेटे के जन्म से अनिल रस्तोगी और सारिका दोनों ही खुश थे.

पिछले 38 सालों से अनिल रस्तोगी की दोस्ती खंडऊआ गांव के रहने वाले कल्लू से थी. दोनों साथ उठतेबैठते, खातेपीते तो थे ही, एकदूसरे के घर भी आतेजाते थे. कल्लू शादीशुदा था. शादी के कुछ दिनों बाद कल्लू को हरियाणा के जिला झज्जर स्थित एक ईंट भट्ठे पर काम मिल गया था. कुछ दिन काम कर के जब उस का मन रम गया तो वह अपनी पत्नी को भी झज्जर ले आया. वहीं रहते उस की पत्नी एक अन्य मजदूर के प्रेमजाल में फंस गई. बाद में वह कल्लू का दामन छोड़ कर उसी मजदूर के साथ भाग गई.

पत्नी के चले जाने के बाद कल्लू अपने गांव लौट आया और तंत्रमंत्र और झाडफूंक से लोगों का इलाज करने लगा. वह खुद को सिद्धहस्त (डिग्रीधारी) तांत्रिक बताता था. उसे यह काम कुछ ऐसा रास आया कि उसे इस के अलावा कुछ करने की जरूरत ही नहीं पड़ी. अनिल रस्तोगी अपने 38 साल पुराने इस दोस्त की तंत्रविद्या से कुछ ज्यादा ही प्रभावित था. इसलिए वह उसे अकसर अपने घर लाता रहता था.

3 साल पहले जब सारिका दूसरी बेटी की मां बनी थी तो अनिल रस्तोगी ने बेटे की चाहत की बात उसे बताई थी. कल्लू ने कुछ तांत्रिक क्रियाएं करने के बाद उसे बताया था कि वह अपनी छोटी बेटी की बलि चढ़ा दे तो अगली बार बेटा होगा. उस के कहने पर अनिल रस्तोगी ने अपनी 14 दिन की बच्ची का गला दबा कर उसे उस समय मौत के घाट उतार दिया था, जब उस की पत्नी बेटी को सुला कर नहाने गई हुई थी. सारिका को पति पर शक भी हुआ था, लेकिन चाह कर भी यह बात मुंह से नहीं निकाल सकी थी. इसे इत्तफाक ही कहेंगे कि अगली बार जब सारिका मां बनी तो उसे बेटा हुआ.

अनिल रस्तोगी ने इस का सारा श्रेय कल्लू की तांत्रिक क्रियाओं को दिया. उस ने यह बात सारिका को भी बताई कि कल्लू ने उसे 8 महीने पहले ही बता दिया था कि बेटा होगा. अनिल रस्तोगी की बेटी सलोनी 11 साल की हो चुकी थी. वह 7वीं कक्षा में पढ़ रही थी. किशोरावस्था से गुजर रही सलोनी के शरीर में स्त्रियोचित लक्षण नजर आने लगे थे. कल्लू उसे बुरी नजर से देखता था. कई बार उस ने बहाने से उस के शरीर का स्पर्श करने की भी कोशिश की थी. यह बात सारिका से छिपी नहीं थी.

कहते हैं, स्त्रियों में पुरुष की कामुक नजरों को पहचानने की क्षमता होती है. सारिका को जब लगा कि कल्लू की नजर सलोनी पर है तो उस ने अपने पति अनिल से कहा कि वह कल्लू का घर में आनाजाना बंद करा दे. लेकिन उस ने इसे सारिका का वहम बता कर बात खत्म कर दी. अलबत्ता कल्लू को इस बात का पता जरूर चल गया था कि सारिका को उस का घर में आनाजाना पसंद नहीं है.

इधर सारिका फिर से गर्भवती हो गई थी. अनिल रस्तोगी ने यह बात कल्लू को बता कर कहा कि वह इस बार भी बेटा चाहता है. दोस्त के मुंह से यह बात सुन कर कल्लू बोला, ‘‘बेटा तो मिल जाएगा, लेकिन इस के लिए तुम्हें अपनी बेटी सलोनी को मौत के घाट उतारना होगा. वैसे भी तुम्हारी बेटी तुम्हारे लिए ठीक नहीं है. वह गलत नक्षत्र में पैदा हुई थी, इसलिए तुम पर भारी है. उस की वजह से तुम्हारी मौत भी हो सकती है.’’

अनिल रस्तोगी कल्लू पर आंखें बंद कर के विश्वास करता था. वह सलोनी को मौत के घाट उतारने को तैयार हो गया. इस के बाद दोनों ने मिल कर सलोनी को मौत के घाट उतारने का तानाबाना बुन लिया. इस के लिए तारीख तय हुई 15 दिसंबर, 2015. सलोनी हर रोज शाम के समय अपनी सहेली के घर ट्यूशन पढ़ने जाती थी. 15 दिसंबर को जब वह ट्यूशन पढ़ने जाने के लिए घर से निकली तो गली में उसे उस का पिता अनिल मिल गया. उस दिन साप्ताहिक बाजार का दिन था. अनिल रस्तोगी ने सलोनी से कहा, ‘‘बेटी, ट्यूशन थोड़ी देर से या कल पढ़ लेना. घर का कुछ सामान खरीदना है, मेरे साथ बाजार चल. तुझे भी कुछ लेना हो तो खरीद दूंगा.’’

सलोनी पिता की बातों में आ कर साथ चल दी. थोड़ी दूर आगे कल्लू मिल गया तो अनिल ने उसे भी साथ ले लिया. सलोनी उन दोनों की दोस्ती को जानती थी, इसलिए उसे कोई संदेह नहीं हुआ. जब अनिल और कल्लू सलोनी को बाजार की ओर न ले जा कर दूसरे रास्ते पर ले जाने लगे तो उस ने पूछा, ‘‘इधर तो बाजार नहीं है, आप कहां ले जा रहे हैं मुझे?’’

इस पर अनिल ने पहले सोचासमझा, फिर जवाब दिया, ‘‘मुझे बिचौला गांव के एक आदमी से पैसे लेने हैं. उस से पैसे ले कर फिर बाजार चलेंगे.’’

सलोनी ने पिता की बात पर विश्वास कर लिया. उस समय तक शाम ढल चुकी थी. लोगों का आवागमन भी बंद हो चुका था. 2-ढाई किलोमीटर चलने के बाद अनिल रस्तोगी ने सलोनी और कल्लू से कहा, ‘‘तुम दोनों यहीं ठहरो, मैं पैसे ले कर आता हूं. मेरी फोन पर बात हो गई है, जिस से पैसे लेने हैं, वह गांव के बाहर मेरा इंतजार कर रहा है.’ अनिल रस्तोगी बेटी सलोनी और कल्लू को बीच रास्ते में छोड़ कर चला गया. सलोनी बच्ची थी, उसे दुनियादारी की समझ नहीं थी. कल्लू की गलत नजर की भी उसे कोई जानकारी नहीं थी. वैसे भी वह उसे ताऊ कहती थी.

आधा घंटा बीत गया. अंधेरा घिरने में ज्यादा देर नहीं थी. जबकि अनिल अभी तक नहीं लौटा था. सही मौका और वक्त देख कल्लू ने सलोनी से कहा, ‘‘तेरा बाप तो अब तक आया नहीं. चल, चल कर गन्ना खाते हैं. इंतजार तो करना ही पड़ेगा.’’

अच्छा गन्ना लाने के बहाने कल्लू सलोनी को गन्ने के खेत में ले गया. अंदर जा कर जब उस ने सलोनी को दबोचा तो वह चिल्लाई, ‘‘ताऊ, यह क्या कर रहे हो…मुझे छोड़ दो.’’

सलोनी रोईगिड़गिड़ाई, गुहार लगाई, लेकिन कल्लू उस वक्त दरिंदा बना हुआ था. उस ने पहले सलोनी के साथ दुष्कर्म किया और फिर गला दबा कर उस की हत्या कर दी. जब वह मर गई तो कल्लू ने उस के कानों की सोने की बालियां, नाक की लौंग और पैरों की पायल निकाल कर अपनी जेब में डाल लीं. सलोनी को ठिकाने लगा कर वह बिलारी के गांधी मूर्ति चौक पर पहुंचा. वहां अनिल रस्तोगी पहले से ही उस का इंतजार कर रहा था. कल्लू ने सलोनी को ठिकाने लगाने की बात उसे बता दी. उस के साथ दुष्कर्म की बात को वह दबा गया.

इस के बाद दोनों दोस्तों ने गांधी चौराहे के पास वाले ठेके पर जा कर शराब पी. पीनेपिलाने के बाद दोनों अपनेअपने घर चले गए. घर पर सारिका ने जब सलोनी के लापता होने की बात अनिल को बताई तो उस ने उसे ढूंढने का थोड़ा सा नाटक किया. जबकि वह हकीकत जानता था. अनिल रस्तोगी और कल्लू के मुंह से हकीकत जानने के बाद पुलिस ने इस केस में भादंवि की धारा 302 के साथसाथ 364 और 201 और जोड़ दी. दोनों अभियुक्तों को विधिवत गिरफ्तार कर के पुलिस ने उन्हें अदालत पर पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

अंधविश्वास की वजह से सलोनी की तो जान गई ही, अनिल को भी जेल जाना पड़ा. अब उस की पत्नी छोटे से बेटे के साथ अकेली रह गई है. Social Crime Story

—कथा में सलोनी नाम परिवर्तित है

 

Love Crime Story: बीवी का तोहफा

Love Crime Story: शाहिद से प्यार करने वाली तरन्नुम की शादी भले ही अलाउद्दीन से हो गई थी, लेकिन उस ने उसे मन से शौहर नहीं माना था. तभी तो जब प्रेमी ने उस से पूछा कि वह वैलेंटाइन डे पर क्या तोहफा लेगी तो उस ने शौहर का सिर मांग लिया…

17 जनवरी, 2016 को रविवार था. हनीफ खां के लिए यह दिन बहुत ही महत्त्वपूर्ण था. क्योंकि उस दिन उन की जिंदगी की ख्वाहिश पूरी होने जा रही थी. उन का एक ही सपना था कि उन के जीवित रहते उन के बेटे अलाउद्दीन की शादी हो जाए. अलाउद्दीन से बड़े उन के तीनों बेटों शफरुद्दीन, जाकिर व भूरे खां की शादियां हो चुकी थीं और वे बालबच्चेदार भी थे. जिला अलीगढ़, थाना कोतवाली क्षेत्र के मोहल्ला भुजपुरा के नए बसे इब्राहिमनगर में हनीफ खां का पूरा परिवार संयुक्त रूप से एक ही मकान में रहता था.

अलाउद्दीन 20 साल का हो चुका था. हनीफ खां ने उस का रिश्ता अलीगढ़ के ही थाना सिविललाइंस के मोहल्ला हमदर्दनगर, जमालपुर निवासी अलाउद्दीन उर्फ पप्पू की बेटी तरन्नुम से तय कर दिया था. शादी की तारीख भी निश्चित हो गई थी 17 जनवरी 2016. अंतत: हनीफ खां का सपना पूरा हो गया था. 17 जनवरी, 2016 को उन का बेटा तरन्नुम से निकाह कर के उसे घर ले आया था. अलाउद्दीन खूबसूरत पत्नी पा कर खुश था.

तरन्नुम 3 दिनों तक ससुराल में रही. चौथे दिन उसे मायके वाले विदा करा कर ले गए. 10 दिनों बाद अलाउद्दीन ससुराल जा कर अपनी पत्नी को ले आया. लेलिन इस के चौथे दिन ही तरन्नुम की जिद पर अलाउद्दीन को उसे उस के मायके छोड़ कर आना पड़ा. अलाउद्दीन कोई बच्चा तो था नहीं, पति के पास रहने के बजाय तरन्नुम के इस तरह मांबाप के घर जाने की जिद ने उस के मन में शक का बीज बो दिया था. जब शक की सुई घूमी तो उस की आंखों के सामने पहली रात से ले कर अब तक का सारा घटनाक्रम घूम गया.

तरन्नुम ने उसे अपने बदन को छूने तक नहीं दिया था. कभी सिर दर्द का बहना तो कभी कुछ और. उसे अपनी भाभी की बात भी याद आई. भाभी ने उसे बताया था कि तरन्नुम उस की गैरमौजूदगी में मोबाइल पर किसी से लंबीलंबी बातें करती है. जब दिमाग में इधरउधर की बातें आईं तो अलाउद्दीन मोटरसाइकिल से ससुराल जा पहुंचा और अम्मी की तबीयत खराब होने का बहाना बना कर बीवी को घर ले आया. ससुराल आने के दूसरे दिन जब तरन्नुम नहाने के लिए बाथरूम जाने लगी तो अलाउद्दीन ने उस से कहा कि वह एक जरूरी काम से बाहर जा रहा है. तरन्नुम जब बाथरूम में घुसी तो अलाउद्दीन धीरे से पलंग के नीचे घुस गया.

तरन्नुम नहा कर बाहर आई तो कमरा खाली था. मौका अच्छा था, वह बालों को तौलिए में लपेट कर बैठ गई और मोबाइल पर बातें करने लगी. अलाउद्दीन सारी बातें सुन रहा था. जब बात बरदाश्त के बाहर हो गई तो वह पलंग के नीचे से बाहर निकला और मोबाइल छीन कर बोला, ‘‘किस से बातें कर रही थी? क्या नाम है तेरे आशिक का?’’

‘‘जब सब कुछ सुन ही लिया है तो फिर पूछ क्यों रहे हो? यह पूछो कि मेरा उस से संबंध क्या है?’’ तरन्नुम ने बेशर्मी से कहा.

‘‘अगर तुम्हारे किसी और से संबंध थे तो उसी से शादी कर लेती. मेरी जिंदगी को नरक बनाने की क्या जरूरत थी?’’ अलाउद्दीन ने गुस्से में कहा.

तरन्नुम ने पलटवार करते हुए कहा, ‘‘चलो अच्छा ही हुआ, आप ने हमारी बातें सुन लीं. अगर थोड़ी देर और नीचे लेटे रहते तो आप को यह भी पता चल जाता कि मैं ने उसे यह कहने के लिए फोन किया था कि अब वह मुझे भूल जाए, क्योंकि मैं किसी और की बीवी बन चुकी हूं.’’

‘‘बीवी बनने की बात तो कहने वाली थीं, लेकिन आज तक तुम ने बीवी का कौन सा संबंध निभाया है?’’ अलाउद्दीन ने तीखे स्वर में पूछा.

‘‘जब तबीयत ही ठीक नहीं थी तो कैसे संबंध निभाती.’’ कहते हुए तरन्नुम ने अलाउद्दीन को पकड़ कर पलंग पर लिटा दिया और उस के सीने पर सिर रख कर बोली, ‘‘मुझ से अनजाने में जो भी गलती हुई, वह मेरी भूल थी. लेकिन अब मैं नादान नहीं हूं. मैं जानती हूं कि मैं आप की बीवी हूं. आप के खानदान की इज्जत हूं, माफ कर दो मुझे.’’

एक तो नईनई शादी थी, दूसरे पत्नी का पहला सान्निध्य. फलस्वरूप अलाउद्दीन तरन्नुम के त्रियाचरित्र को समझ नहीं पाया. इसे पत्नी की नादानी समझ कर उसे माफ कर दिया और सीने से लगा लिया. 2 दिनों तक तरन्नुम रातदिन अलाउद्दीन से बेल की तरह लिपटीचिपटी रही. उस ने अलाउद्दीन को वह सब भूलने को मजबूर कर दिया, जो वह उस के बारे में सोचता था. तरन्नुम उसे पूरी तरह समर्पित हो गई. तीसरे दिन तरन्नुम की मां का फोन आया तो अलाउद्दीन ने ही बातें कीं. बात करने के बाद उस ने तरन्नुम से कहा, ‘‘तैयार हो जाओ, तुम्हारी अम्मी ने हमें दावत पर बुलाया है.’’

‘‘मेरा मन नहीं है, अब वहां जाने का. तुम साथ हो तो मेरे लिए दावत कोई अहमियत नहीं रखती.’’ तरन्नुम उस के गले में बाहें डाल कर बोली.

‘‘मैं ने अम्मी से कह दिया है, जाओ जल्दी तैयार हो जाओ.’’

तरन्नुम ने दिखाने के लिए भले ही कुछ भी कहा हो, पर वह मन ही मन खुश थी. अलाउद्दीन के कहने पर वह तैयार हो गई. थोड़ी देर बाद दोनों बाइक से जमालपुर के लिए रवाना हो गए. मायके जा कर तरन्नुम ने अपनी मां से कह दिया कि उसे 2-4 दिन के लिए रोक ले. उस की तबीयत ठीक नहीं है. दावत खाने के बाद जब अलाउद्दीन चलने को हुआ तो सास ने उस से मनुहार कर के कहा कि तरन्नुम को 4-5 दिनों के लिए वहीं छोड़ दे. फलस्वरूप अलाउद्दीन को बात माननी पड़ी. वह अकेला ही घर लौट आया.

दूसरे दिन सुबह जब तरन्नुम चाय बना रही थी तो उस के मोबाइल की घंटी बजी. मां ने किचन में आ कर बताया तो तरन्नुम किचन से बाहर जाते हुए बोली, ‘‘मां चाय देखना, पता नहीं कौन बद्तमीज है, चाय भी नहीं पीने देता.’’

‘‘कौन क्या, तेरा शौहर होगा. शौहर को क्या ऐसे बोलते हैं. कुछ सलीका सीख ले.’’

मां को किचन में छोड़ कर तरन्नुम मोबाइल ले कर छत पर चली गई. ऊपर जा कर वह बनावटी गुस्से में बोली, ‘‘क्या बात है शाहिद, हम ने तो रात में ही फोन पर कह दिया था कि हम तुम्हारी खातिर घर रुक गई है. फिर सुबहसुबह क्या जरूरत आन पड़ी, जो घंटी बजा दी?’’

‘‘तुम्हें याद दिलाने के लिए फोन किया है. 3 बजे फूफी के घर आ जाना.’’ दूसरी ओर से यह कहने वाला उस का आशिक शाहिद था.

‘‘आ जाएंगे, हम वादा खिलाफी नहीं करते.’’ कह कर तरन्नुम नीचे आ गई. तब तक चाय बन गई थी. मां ने उसे चाय का प्याला देते हुए पूछा, ‘‘क्या कह रहे थे अलाउद्दीन?’’

‘‘3 बजे अमींनिशा बाजार बुलाया है.’’

‘‘तो चली जाना. शौहर ही तो है, कोई गैर तो नहीं.’’ मां ने कह दिया. उसे क्या पता था कि फोन पर दूसरी ओर अलाउद्दीन नहीं शाहिद था.

शाहिद 3 बजे से पहले ही फूफी के घर पहुंच कर तरन्नुम का इंतजार करने लगा. यह वह घर था, जहां दोनों की मोहब्बत जवान हुई थी. इसी घर की एकांत जगहों पर दोनों के बीच की दूरियां मिटी थीं. फूफी उन दोनों के संबंधों की राजदार थी. शाहिद बैठक में अकेला बैठा था. फूफी ने चाय का प्याला मेज पर रखते हुए उसे सलाह दी, ‘‘अब तुझे भी कोई लड़की ढूंढ़ कर निकाह कर लेना चाहिए. तरन्नुम अब किसी और की बीवी बन चुकी है. अगर भूल से भी कभी उस के शौहर को तुम दोनों की कहानी पता चल गई तो तरन्नुम की जिंदगी में तूफान आ जाएगा.’’

जब फूफी और शाहिद बात कर रहे थे, तभी तरन्नुम आ गई. बड़े अदब से फूफी को सलाम कर के वह सोफे पर बैठ गई. फूफी चुपचाप बाहर निकल गई.

‘‘क्या बात है शाहिद, तुम्हें इतनी बेसब्री क्यों हो जाती है?’’ तरन्नुम ने सोफे से उठ कर शाहिद की गोद में बैठते हुए पूछा.

‘‘मैं ने तो तुम्हें याद दिलाने के लिए फोन किया था.’’ शाहिद ने तरन्नुम के बालों से खेलते हुए कहा.

‘‘मैं ने तो यहां आते ही बता दिया था कि मैं तुम्हारे लिए आ गई हूं, फिर टाइम को कैसे भूल जाती? पर तुम्हें चैन कहां, जब मन आता है, मिला दिया फोन.’’

‘‘मैं तुम्हारे बिना एक पल भी नहीं जी सकता. वैसे भी परसों ‘वैलेंटाइन डे’ है, बोलो इस बार क्या तोहफा लोगी?’’ शाहिद ने पूछा.

‘‘मैं जो मागूंगी, तुम दे नहीं पाओगे शाहिद.’’ तरन्नुम ने शाहिद की बांहों में मचलते हुए कहा.

‘‘तुम मांगो तो. हम न दें तो लानत है हम पर.’’

‘‘और अगर मुकर गए तो…?’’ तरन्नुम ने शाहिद की बांहों से फिसल कर सामने खड़े होते हुए पूछा.

‘‘मैं भी पहलवान की औलाद नहीं, जो मुंह मांगा तोहफा न दूं. बताओ क्या चाहिए?’’ शाहिद ने उत्तेजना में कहा.

तरन्नुम यही चाहती थी. उस ने तुरंत कह दिया, ‘‘अलाउद्दीन का सिर.’’

‘‘शौहर का सिर?’’ ठगे से रह गए शाहिद ने आश्चर्य से पूछा.

‘‘जी हां, शौहर का सिर.’’ कहते हुए तरन्नुम ने शाहिद को सारी बातें बता कर कहा कि उसे सब कुछ पता लग चुका है.

तरन्नुम पूरी चालाकी से ख्ेल ख्ेल रही थी. शाहिद कुछ सोचता, इस से पहले ही वह बोली, ‘‘मैं तुम्हारी अमानत को पहली रात से ही बचाती आ रही थी, लेकिन मजबूरी में उसे भी लुटाना पड़ा.’’

14 फरवरी, 2016 को वैलेंटाइन डे के दिन दोपहर को तरन्नुम को मोबाइल पर उस के शौहर अलाउद्दीन का फोन आया कि ‘आज हमारा पहला ‘वैलेंटाइन डे’ है, मैं शाम को तुम्हें लेने आ रहा हूं, तैयार रहना.’ तरन्नुम ने फोन कर के यह बात शाहिद को बता दी. अलाउद्दीन ससुराल आया और खापी कर तरन्नुम के साथ बाइक से घर के लिए निकला. उस वक्त पौने 8 बजे थे. शाहिद अपने एक दोस्त के साथ बाइक से उस का पीछा कर रहा था. रात साढ़े 8 बजे अलाउद्दीन की बाइक टावर वाले रास्ते से भुजपुरा में घुसी तो पीछे आ रहे शाहिद ने सुनसान जगह टक्कर मार कर अलाउद्दीन को गिरा दिया.

तरन्नुम भी गिर पड़ी. जब तक अलाउद्दीन संभल पाता, तब तक शाहिद ने बाइक से उतर कर उस के सिर में गोली मार दी. एक चीख के साथ ही अलाउद्दीन जमीन पर पड़ा रह गया. शाहिद तरन्नुम को उठाते हुए बोला, ‘‘जो तोहफा मांगा था, वही दिए जा रहा हूं.’’

‘‘भाग जाओ शाहिद, कोई पहचान लेगा. जल्दी भागो यहां से.’’ तरन्नुम ने कहा और सड़क पर पड़े तड़पते शौहर को देख कर रोनेचीखने लगी.

इत्तफाक से यह सारा नजारा वहां से गुजर रहे एक आदमी ने देख लिया था. हमलावरों के भागते ही वहां लोगों की भीड़ एकत्र हो गई. किसी ने खबर दी तो अलाउद्दीन के घर वाले भी दौड़े चले आए. तब तक घटना की सूचना पुलिस को भी मिल चुकी थी. पुलिस के पहुंचने से पहले ही चश्मदीद ने पूरी हकीकत अलाउद्दीन के घर वालों को बता दी थी. दूसरी ओर सूचना मिलते ही थाना कोतवाली के इंसपेक्टर हैदर रजा जैदी बिना देर किए पुलिस टीम के साथ मौके पर पहुंच गए थे.

खून से लथपथ अलाउद्दीन को तत्काल अस्पताल ले जाया गया, जहां से उसे जे.एन मेडिकल भेजा गया. उसे बचाने के लिए डाक्टरों की टीम जुट गई. उसी रात अलाउद्दीन के भाई भूरे खां की तहरीर पर तरन्नुम, शाहिद उर्फ लड्डन व एक अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ भादंवि की धारा 307 व 120बी के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया गया. हकीकत सुननेसमझने के बाद इंसपेक्टर जैदी ने अलाउद्दीन के घर वालों को सचेत करते हुए कहा कि अलाउद्दीन के होश में आने तक तरन्नुम को घर से बाहर न जाने दें, साथ ही उस की हर गतिविधि पर नजर रखने के अलावा यह भी ध्यान रखें कि वह कुछ खा न ले.

2 दिनों तक अलाउद्दीन जिंदगी और मौत के बीच झूलता रहा. उस की स्थिति कोमा जैसी थी. 16 फरवरी की रात उस ने दम तोड़ दिया. अलाउद्दीन की मौत की सूचना मिलते ही हैदर रजा जैदी ने तरन्नुम को उस की ससुराल पहुंच कर गिरफ्तार कर लिया और उसे कोतवाली ले आए. उस से पूछताछ की गई तो उस ने सब कुछ सचसच बता दिया. इसी के साथ इस मामले में दर्ज मुकदमा धारा 302 में तरमीम कर दिया गया. शाहिद की गिरफ्तारी के लिए कई जगह दबिश दी गई. पुलिस की काररवाई से परेशान हो कर शाहिद ने 19 फरवरी को अदालत में आत्मसमर्पण कर दिया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

कोतवाली इंसपेक्टर हैदर रजा जैदी ने अदालत में प्रार्थनापत्र दे कर शाहिद को 3 मार्च, 2016 को पूछताछ के लिए रिमांड पर ले लिया. कोतवाली ला कर उस से पूछताछ की गई तो उस ने अपने साथी का नाम मुस्तकीम निवासी हमदर्दनगर, जमालपुर बताया. साथ ही उस ने वह तमंचा भी बरामद करा दिया, जिस से अलाउद्दीन की हत्या की गई थी. शाहिद को जेल भेजने के बाद पुलिस ने मुस्तकीम की गिरफ्तारी के प्रयास शुरू कर दिए. 8 मार्च, 2016 को इंसपेक्टर जैदी को सूचना मिली कि मुस्तकीम जमालपुर गंदा नाले के पास खड़ा है. पुलिस ने वहां जा कर उसे भी गिरफ्तार कर लिया. वह कहीं बाहर जाने के लिए अपने घर से आया था.

कोतवाली में मुस्तकीम ने बताया कि वह सिर्फ दोस्ती के नाते यह काम करने के लिए तैयार हो गया था. घटना के वक्त वह बाइक चला रहा था, जबकि शाहिद पीछे बैठा था. पूछताछ के बाद मुस्तकीम को भी अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक तीनों जेल में थे. तरन्नुम को वैलेंटाइन का तोहफा तो मिल गया, लेकिन बाकी की उस की जिंदगी जेल में जो बीतेगी, वह भी उस के लिए तोहफे जैसी ही होगी. Love Crime Story

Delhi Crime Story: प्रियंका के आखिरी खत की दर्दनाक कहानी

Delhi Crime Story: इवेंट मैनेजर प्रियंका कपूर चावला अपनी जिंदगी को जिंदादिली के साथ जीना चाहती थीं. वह जिंदगी की ऊंची उड़ान भर कर शोहरत पाना चाहती थीं, लेकिन बिजनेसमैन नितिन चावला की मोहब्बत में फंस कर उस से शादी करना उन की जिंदगी की एक बड़ी भूल साबित हुई.

प्रियंका से शादी करने के बाद नितिन चावला ने दक्षिणी दिल्ली के पौश इलाके डिफेंस कालोनी में रहने लगा था. वह एक बिजनेसमैन था, जबकि प्रियंका इवेंट मैनेजर थी. उन की शादी करीब सवा महीने पहले हुई थी. 25 मार्च को प्रियंका ने अपनी मां रूमा को दोपहर बाद फोन कर के कहा, ‘‘मम्मी आज शाम को मैं घर आऊंगी. आप मेरे पसंद का खाना राजमा चावल बना कर रखना.’’

बेटी के घर आने की बात सुन कर रूमा खुश हो गईं. उन्होंने अपने यहां खाना बनाने वाली नौकरानी को बेटी की पसंद का खाना बनाने के लिए कह दिया. प्रियंका कितने बजे आएगी, यह जानने के लिए उन्होंने शाम 5 बजे फोन किया. घंटी जाती रही, पर उस ने फोन रिसीव नहीं किया. उन्होंने सोचा कि वह किसी काम में व्यस्त होगी, इसलिए दोबारा फोन नहीं किया. आधे घंटे बाद उन्होंने फिर से फोन किया. इस बार भी फोन की घंटी बजती रही, लेकिन उस ने फोन नहीं उठाया. इसी तरह रात 11 बजे तक उन्होंने प्रियंका को कई बार फोन किए, पर उस ने एक बार भी फोन रिसीव नहीं किया.

रूमा को चिंता हुई कि प्रियंका फोन क्यों नहीं उठा रही. उन्होंने प्रियंका के यहां काम करने वाले नेपाली नौकर को फोन किया तो उस ने बताया कि सुबह 9 बजे से मेमसाब अपने कमरे में हैं.

‘‘उस ने सुबह से कुछ खायापीया भी है या नहीं?’’ रूमा ने पूछा.

‘‘मेमसाब जब से कमरे में गई हैं, तब से मुझ से कोई चीज नहीं मंगाई है.’’ नौकर ने कहा.

नौकर से बात करने के बाद रूमा परेशान हो गईं, क्योंकि प्रियंका पिछले 14 घंटों से भूखी अपने कमरे में थी. उसे तो उन के यहां आना था, आखिर वह बंद कमरे में क्या कर रही है? उन्होंने उसी समय नितिन को फोन किया, ‘‘नितिन बेटा, मैं ने प्रियंका को कई बार फोन किया, वह फोन नहीं उठा रही.’’

‘‘आप फ्लैट पर जा कर देख लें.’’ नितिन ने कहा.

‘‘बेटा, तुम्हारे नौकर ने बताया है कि वह सुबह 9 बजे से अपने कमरे में है. तब से उस ने कुछ खायापीया नहीं है.’’ रूमा ने कहा.

‘‘उस ने खाना नहीं खाया तो आप को तकलीफ हो रही है. ऐसी तकलीफ मुझे उस वक्त हुई थी, जब मैं अपने 11 साल के बेटे को घर लाया था और प्रियंका ने उसे भूखा रखा था.’’ नितिन ने ताना देते हुए कहा.

नितिन की पहली पत्नी से एक बेटी और एक बेटा है. पहली पत्नी को वह तलाक दे चुका है. उस के बाद ही उस ने प्रियंका से शादी की थी. कुछ दिनों पहले वह अपने बेटे को फ्लैट पर लाया था. नितिन का आरोप है कि उस वक्त प्रियंका ने उसे खाना नहीं खिलाया था. रूमा को नितिन की पुरानी बातें याद आ गईं. उस ने उन से प्रियंका की शिकायत की थी. रूमा ने इस बारे में जब प्रियंका से पूछा था तो उस ने कहा था कि उस ने उस के बच्चे को बारबार खानेपीने की तमाम चीजें दी थीं, लेकिन उस ने कोई भी चीज नहीं खाई थी.

रूमा समझ गईं कि नितिन के मन में अब भी पुरानी बातें बैठी हुई हैं. उन्होंने कहा, ‘‘बेटा, तुम्हारी जो शिकायत है, उस पर हम बाद में बात कर लेंगे, लेकिन तुम इसी समय घर आ जाओ. आखिर देखो तो प्रियंका सुबह से कमरे में क्यों बंद है?’’

‘‘मम्मी, मैं अभी नहीं जा सकता. अभी मुझे द्वारका में समय लगेगा. ऐसा करें, आप ही फ्लैट पर चली जाइए.’’ नितिन ने कहा.

‘‘इतनी रात को मैं अकेली कैसे जा सकती हूं?’’ रूमा ने कहा.

‘‘ऐसा करता हूं, मैं ड्राइवर को गाड़ी ले कर आप के पास भेज देता हूं. उस के साथ आप चली जाइए.’’ नितिन ने कहा.

कुछ देर बाद नितिन का ड्राइवर उन के यहां आया तो वह अपनी ननद की बेटी नेहा को साथ ले कर प्रियंका के यहां पहुंच गईं. फ्लैट पर उन्हें बेटी का नौकर मिला. उन्होंने बेटी के कमरे का दरवाजा खटखटाया. अंदर से जब कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई तो उन्होंने आवाज दी. उन की आवाज सुन कर आसपास रहने वाले निकल आए, लेकिन प्रियंका के कमरे का दरवाजा नहीं खुला. रूमा को बेटी को ले कर चिंता हुई. उन्होंने दिल्ली पुलिस के कंट्रोल रूम को फोन कर के सारी जानकारी दे दी. चूंकि पुलिस को दरवाजा अंदर से बंद होने की जानकारी मिली थी, इसलिए थाना डिफेंस कालोनी की पुलिस और दिल्ली फायर ब्रिगेड के जवान फ्लैट पर पहुंच गए.

पुलिस ने पहले दरवाजा खटखटाया. जब दरवाजा नहीं खुला तो कुछ आशंका नजर आई. दरवाजे पर इंटरलौक लगा था. पुलिस ने नौकर से चाबी के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि इस की चाबी साब और मेमसाब के पास ही रहती है. दरवाजा नहीं खुला तो फायर ब्रिगेड के जवानों ने अपने साथ लाए औजारों से दरवाजे को उखाड़ दिया. दरवाजा खुलने पर प्रियंका घुटनों के बल पलंग पर बैठी दिखी, गले में दुपट्टा बंधा हुआ था, जिस का दूसरा सिरा पंखे से बंधा था और गरदन एक ओर झुकी थी. बैड पर एक ट्रे रखी थी, जिस में कांच का बड़ा सा कटोरा पानी से भरा रखा था. ट्रे में ही एक रेजर और एक छोटा सा चाकू रखा था.

बेटी के शरीर में जब कोई हरकत नहीं हुई तो रूमा रोते हुए पुलिस वालों से हेल्प करने को कहने लगीं. इस पर एक पुलिस वाले ने ट्रे में रखे चाकू से दुपट्टा काट कर प्रियंका के गले का फंदा खोला. इसी बीच नितिन भी वहां आ गया. पुलिस वालों के कहने पर रूमा ने बेटी को बिस्तर पर लिटा कर उस के सीने पर हाथों से दबाना शुरू किया, ताकि उस के फेफड़े काम करना शुरू कर दें. इस के बाद नितिन ने भी यही प्रक्रिया दोहराई, पर कोई लाभ नहीं हुआ. पुलिस उसे अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान ले गई, जहां डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया. डाक्टरों ने जांच की तो उस के शरीर पर कई स्थानों पर चोट के निशान मिले. उस के बाएं हाथ की कलाई पर कटे के निशान थे.

बेटी की मौत की खबर पा कर रूमा फूटफूट कर रोने लगीं. उन्होंने यह खबर गुड़गांव में नौकरी कर रहे अपने पति अशोक कपूर, घर पर मौजूद छोटी बेटी डिंपी कपूर और अपने नातेरिश्तेदारों को दी. थोड़ी ही देर सभी एम्स अस्पताल पहुंच गए.

थानाप्रभारी सतीशचंद्र शर्मा ने घटनास्थल की जांच के लिए क्राइम इन्वैस्टीगेशन टीम को बुला लिया था. टीम ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया. छानबीन में पुलिस को कमरे से 2 पेज का एक सुसाइड नोट मिला, जिस में लिखा था, ‘मेरे पास जानीपहचानी तकलीफ है, खुशी है, दुख है और इमोशंस है. लेकिन पति ने पहली बार बेबस कर दिया. नितिन पर मुंबई में रेप का केस दर्ज है. मालूम नहीं था कि वह मेरे साथ इतना बुरा करेगा. वही एकमात्र ऐसा इंसान है, जिस से मैं डरती हूं.

‘शादी के एक महीने बाद ही उस ने मुझे राक्षस की तरह मारा. मैं ने अपनी फैमिली को बुलाने को कहा तो उस ने और बुरी तरह मारा. मैं ने नितिन से सिर्फ इसलिए शादी की थी, क्योंकि उस ने कहा था कि वह मुझ से बहुत प्यार करता है और हमेशा करता रहेगा. लेकिन अब वही इंसान मुझे घर छोड़ने को कहता है. इस आदमी के साथ रहने के लिए मैं ने अपनी मां से संबंध खत्म कर लिए थे. वह सब से ज्यादा स्वार्थी है.

‘मुझे लगा कि यहां मुझे मोहब्बत मिलेगी, लेकिन दर्द मिला. नितिन की मां के मुताबिक नितिन ने कुछ गलत नहीं किया. पिछली 3 रातों से नितिन घर पर नहीं है. उस ने मुझे वाट्सऐप पर मैसेज किया कि मैं घर खाली कर दूं, अब मेरे पास कोई रास्ता नहीं है.’

पुलिस ने सुसाइड नोट सहित अन्य जरूरी सबूत अपने कब्जे में ले लिए. थानाप्रभारी ने प्रियंका के घर वालों से बात की तो उस की मां रूमा ने बताया कि शादी के बाद नितिन के घर वालों ने प्रियंका की सारी गोल्ड और डायमंड ज्वैलरी अपने पास रख ली थी. यही नहीं, उस ने मायके से उस की महंगी घडि़यां भी मंगा ली थीं. इस के बावजूद वह उस पर दबाव बना रहा था कि वह अपने मायके वालों से कार खरीदवा कर दे. इस के लिए नितिन ने उन पर भी दबाव डाला था. रूमा और उन की बेटी डिंपी कपूर ने आरोप लगाया कि प्रियंका की मौत में उस के पति नितिन चावला, सास हर्ष चावला और देवर जतिन चावला का हाथ है.

चूंकि मामला दहेज एक्ट के तहत दर्ज हुआ था, इसलिए इस में मजिस्ट्रैट के सामने पीडि़त पक्ष के बयान होने जरूरी थे. इसलिए एसआई शिवदेव सिंह डिंपी और उस की मां रूमा को तहसील कालकाजी के तहसीलदार अजीत कुमार चौधरी के पास ले गए. तहसीलदार ने रूमा और डिंपी के बयान दर्ज किए. उन्होंने कमरे से मिले सुसाइड नोट को भी पढ़ा. उन के बयानों के आधार पर ही पुलिस ने नितिन चावला, उस के भाई जतिन चावला और मां हर्ष चावला के खिलाफ भादंवि की धारा 498ए/304बी/34 के तहत रिपोर्ट दर्ज कर ली.

अस्पताल में जरूरी काररवाई करने के बाद पुलिस ने प्रियंका की लाश पोस्टमार्टम के लिए एम्स की मोर्चरी में भेज दी थी. इस के बाद नितिन को हिरासत में ले लिया गया. जब उस से पूछताछ की गई तो उस ने बताया कि वह प्रियंका का बहुत ध्यान रखता था, इस के बावजूद उस ने सुसाइड क्यों कर लिया, इस के बारे में उसे कुछ नहीं पता. प्रियंका मूलरूप से हरियाणा के रोहतक जिले के रहने वाले अशोक कपूर की बड़ी बेटी थी. इस के अलावा अशोक कपूर की एक बेटी और थी डिंपी. अशोक कपूर भारतीय वायु सेना में औफिसर थे.

अशोक कपूर की पोस्टिंग लंबे समय तक चंडीगढ़ में रही. वहीं पर दोनों बच्चों की स्कूली पढ़ाई हुई. उन का दिल्ली ट्रांसफर हुआ तो वह परिवार के साथ दिल्ली आ गए और लाजपत नगर में रहने लगे. वह नौकरी के बजाय अपना कोई बिजनैस करना चाहते थे. इसलिए उन्होंने वीआरएस (ऐच्छिक सेवानिवृत्ति) ले कर गुड़गांव में टेलीकौम का बिजनैस शुरू किया. लेकिन घाटा होने से उन्हें बिजनैस बंद करना पड़ा. इस के बाद उन्होंने गुड़गांव की एक निजी कंपनी में नौकरी कर ली. दिल्ली विश्वविद्यालय से ग्रैजुएशन करने के बाद प्रियंका ने एक जर्मन कंपनी में नौकरी की. उसे डांसिंग का शौक था. नौकरी से छुट्टी होने के बाद वह डांस सीखने चली जाती थी.

वह चाहती थी कि उस की मधुर आवाज को दुनिया भर में नई पहचान मिले, इसलिए उस ने रेडियो जौकी का कोर्स किया. रेडियो जौकी का कोर्स करने के बाद उसे आस्ट्रेलियन रेडियो में रेडियो जौकी की नौकरी मिल गई. प्रियंका बेहद खूबसूरत थी. अपनी काया को स्वस्थ बनाए रखने के लिए उस ने योगा में भी डिप्लोमा ले रखा था. इस के अलावा वह मैडिटेशन, हीलिंग और विपश्यना में एक्सपर्ट थी.

प्रियंका एक संपन्न परिवार से थी. नौकरी को वह किसी मजबूरी की वजह से नहीं, बल्कि शौक के तौर पर कर रही थी. कुछ दिनों बाद उस ने रेडियो जौकी की नौकरी छोड़ दी और एक गैरसरकारी सामाजिक संस्था से जुड़ कर काम करने लगी. इस के बाद वह एक कंपनी में अपनी दोस्त तेहरीमा जाकी के साथ इवेंट मैनेजर के रूप में काम करने लगी. प्रियंका की नितिन चावला से पहली मुलाकात ग्रैटर कैलाश पार्ट-2 में उस के ही सिनेमा लाउंज पब में हुई थी. नितिन चावला एक बड़ा बिजनेसमैन था. ग्रेटर कैलाश के आलवा पंजाबी बाग और चंडीगढ़ में उस के सिनेमा लाउंज नाम से 5 पब हैं. इस के अलावा दिल्ली एनसीआर में उस का स्टील का कारोबार है. वह दिल्ली के पंजाबी बाग में अपने परिवार के साथ रहता था.

पहली ही मुलाकात में नितिन चावला प्रियंका का दीवाना हो गया. उस ने प्रियंका की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया तो खुले विचारों की प्रियंका ने उस से दोस्ती करने में कोई गुरेज नहीं समझा. उन की फोन पर बातचीत होने लगी. इस से उन की दोस्ती और गहरी हो गई. प्रियंका से फोन पर बात कर के वह कार ले कर निश्चित जगह पहुंच जाता, जहां दोनों कार से घूमते और महंगे रेस्टोरेंट में खाना खाते. प्रियंका को प्रभावित करने के लिए वह उसे उस की पसंद के गिफ्ट भी देता. एक दिन उस ने प्रियंका से अपने प्यार का इजहार भी कर दिया. इस पर प्रियंका चौंकी, ‘‘नितिन, अभी मुझे अपना कैरियर बनाने दो. इस के बाद ही मैं प्यारव्यार के बारे में सोचूंगी.’’

‘‘प्रियंकाजी, प्यार के बारे में सोचा नहीं जाता, बल्कि खुदबखुद हो जाता है. जैसे कि मुझे हो गया.’’ नितिन बोला, ‘‘क्या मुझ में कोई कमी है, जिस की वजह से तुम मुझे पसंद नहीं करतीं.’’

‘‘ऐसी बात नहीं है. अगर तुम पसंद नहीं होते तो मैं दोस्ती ही क्यों करती, लेकिन यह संबंध अभी मैं केवल दोस्ती तक ही सीमित रखना चाहती हूं.’’

‘‘चलो मैं उस वक्त का इंतजार करूंगा, जब तुम्हारे दिल में मेरे प्रति चाहत पैदा होगी. प्रियंका मैं केवल इतना जानता हूं कि मैं तुम्हें दिलोजान से चाहता हूं.’’ नितिन ने कहा.

प्रियंका मुसकराई, ‘‘हां…हां, यह बात मैं भी महसूस कर रही हूं कि तुम मजनूं हुए जा रहे हो, पर अपना ध्यान रखो.’’

इस के बाद वह कई महीनों तक दोस्त की तरह ही मिलते रहे. वह प्रियंका के घर भी जाने लगा. उस का जब मन करता, वह प्रियंका को फोन कर देता. बारबार फोन करने पर वह भी परेशान हो जाती थी. तब वह उस की काल रिसीव नहीं करती. इस तरह लगातार मिलते रहने का नतीजा यह निकला कि प्रियंका नितिन को प्यार करने लगी.  इतना ही नहीं, नितिन ने उस के सामने शादी का प्रस्ताव रखा तो वह तैयार हो गई.

प्रियंका ने नितिन से शादी करने का प्रस्ताव घर वालों के सामने रखा तो मां रूमा ने नितिन से शादी करने को मना कर दिया. इस की वजह यह थी कि नितिन प्रियंका से 15 साल बड़ा था. पर प्रियंका शादी के लिए अड़ गई. न चाहते हुए भी घर वालों को प्रियंका की बात माननी पड़ी. 6 जनवरी, 2016 को नितिन चावला और प्रियंका की शादी सामाजिक रीतिरिवाज से हो गई. नितिन ने डिफेंस कालोनी में जो फ्लैट किराए पर लिया था, शादी का कार्यक्रम उसी फ्लैट की छत पर आयोजित किया गया. इस शादी में दोनों परिवारों की तरफ से चुनिंदा लोग ही शामिल हुए थे.

शादी के बाद प्रियंका खुश थी, क्योंकि नितिन उसे बहुत प्यार करता था. इस के अलावा दूसरी बात यह थी कि जिस फ्लैट में वह रह रही थी, वहां पर उन दोनों के अलावा घर का कोई और सदस्य नहीं रहता था. केवल एक नौकर ही था. प्रियंका की शादी को अभी कुछ ही दिन हुए थे कि उसे ऐसी खबर मिली, जिस ने उसे झकझोर कर रख दिया. उसे पता चला कि जिस नितिन से उस ने शादी की है, वह पहले से शादीशुदा ही नहीं, बल्कि 2 बच्चों का बाप है. यह उस के साथ एक बड़ा धोखा था. इस बारे में उस ने नितिन से बात की तो उस ने बताया कि उस ने अपनी पत्नी को तलाक दे दिया है और बच्चे भी उसी के साथ हैं. उस से उस का अब कोई मतलब नहीं है.

नितिन ने अपनी बातों से प्रियंका को भले ही समझाने की कोशिश की थी, लेकिन प्रियंका को इस बात का दुख था कि उस ने खुद के शादीशुदा होने वाली बात उसे बताई क्यों नहीं? बात छिपा कर उस ने उस के साथ बहुत बड़ा धोखा किया है. उस ने नितिन से अपनी नाराजगी भी प्रकट की, लेकिन नितिन ने अपनी चिकनीचुपड़ी बातों से उसे मना लिया. प्रियंका ने भी होहल्ला मचाना उचित नहीं समझा, लिहाजा वह चुप हो गई. जो हो चुका, उस पर तनाव में रहने के बजाय वह अपनी लाइफ को खुशमिजाजी के साथ जीने की कोशिश में लग गई.

मूलचंद फ्लाईओवर के पास प्रियंका के एक दोस्त का रेस्टोरेंट है. शादी के बाद वह दोस्त प्रियंका और उस के पति नितिन चावला को अपने रेस्टोरेंट में पार्टी के लिए बुलाना चाहता था. उस ने जनवरी के आखिरी हफ्ते में नितिन और प्रियंका को कई बार फोन कर के बुलाया, पर नितिन को टाइम नहीं मिल रहा था. नितिन से बात करने के बाद प्रियंका ने दोस्त से कह दिया कि वह 29 जनवरी को पति के साथ रेस्टोरेंट पर पहुंच जाएगी. शाम को प्रियंका पार्टी में जाने की तैयारी करने लगी. नितिन उस समय घर पर नहीं था. उस ने उसे फोन किया तो उस ने कहा कि उसे घर आने में देर हो जाएगी. वह उस का इंतजार न करे और अकेली पार्टी में चली जाए.

उसी समय प्रियंका का दोस्त उस के यहां आ गया. वह उस के साथ जैसे ही उस की कार में बैठने को हुई, तभी नितिन आ गया. प्रियंका नितिन को देख कर खुश हो गई. उस ने नितिन से चलने को कहा तो उस ने पार्टी में जाने से साफ मना कर दिया. तब प्रियंका अकेली ही चली गई और एकडेढ़ घंटे में वहां से लौट आई. प्रियंका घर लौटी तो नितिन वहीं था. वह एकदम सामान्य था. बातचीत कर के दोनों सो गए. उसी रात को अचानक नितिन के दिमाग में न जाने क्या फितूर पैदा हुआ कि रात 3 बजे उठ कर उस ने प्रियंका की पिटाई शुरू कर दी. लातघूसों से उस ने उसे बुरी तरह पीटा.

पिटाई से प्रियंका का चेहरा सूज गया, होंठ फट गए. इस के अलावा उस के शरीर पर भी चोटें आईं. खून से उस की टीशर्ट भी भीग गई. प्रियंका समझ नहीं पाई की आखिर उस से ऐसी क्या गलती हो गई, जो नितिन ने उसे सजा दी. इस पिटाई से वह बुरी तरह डर गई. सुबह 4 बजे के करीब प्रियंका ने अपने सूजे हुए चेहरे की सेल्फी ले कर वाट्सऐप से मां रूमा के पास भेज दी. उस ने उन्हें अपने पिटाई करने की बात भी बता दी.

बेटी की पिटाई की बात सुन कर रूमा का खून खौल उठा. उन्होंने बेटी पर कभी हाथ तक नहीं उठाया था. आखिर उस ने उस की बेटी को इतनी बेदर्दी से क्यों मारा. उन का मन कर रहा था कि वह उसी समय उस के पास जाएं, पर उस समय एक तो अंधेरा था और दूसरे उन के पति घर पर नहीं थे.

बेटी डिंपी भी दोस्त की शादी में पूर्वी दिल्ली गई हुई थी. रूमा ने तुरंत डिंपी को फोन कर के प्रियंका के घर पहुंचने को कहा. उजाला होने पर रूमा बेटी प्रियंका के घर पहुंच गईं. डिंपी भी अपने दोस्तों के साथ वहां पहुंच चुकी थी. प्रियंका की चोटें देख कर सभी हैरान थे कि आखिर इस से ऐसी क्या गलती हो गई, जो नितिन इतना बेदर्द हो गया. रूमा ने नितिन से बात की तो उस ने बताया कि यह बातबात पर बहसबाजी करती है. उसी बहसबाजी में बात इतनी बढ़ गई कि वह अपना आपा खो बैठा.

रूमा ने उस समय उस से ज्यादा बात करनी जरूरी नहीं समझी. वह प्रियंका को अपने घर ले आईं. जाने से पहले नितिन ने खून से सनी उस की टीशर्ट उतरवा कर दूसरी पहना दी थी. उन्होंने उसे एक क्लिनिक में भरती करा दिया. प्रियंका का अंगअंग दुख रहा था. इतनी पिटाई होने के बाद भी प्रियंका ने पुलिस काररवाई करने से मना कर दिया था. रूमा ने नितिन के पिता दलजीत चावला को फोन कर के जानकारी दी तो उन्होंने कहा कि वह अभी अपने किसी रिश्तेदार के अंतिम संस्कार में आए हुए हैं. नितिन के भाई जतिन को फोन किया तो उस ने भी कोई बहाना बना दिया.

उस के घर वालों ने जब उन की बात को गंभीरता से नहीं लिया तो उन्हें गुस्सा आ गया. उन्होंने जतिन को धमकी दी कि अगर वह नहीं आए तो उस के भाई के खिलाफ थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई जाएगी. इस से जतिन डर गया और प्रियंका के घर पहुंच गया. जतिन ने नितिन को भी वहीं बुला लिया. प्रियंका की चोटें देख कर जतिन भी हैरान था. उस ने नितिन को समझाया. तब नितिन ने अपनी गलती मानी और वादा किया कि भविष्य में वह ऐसा नहीं करेगा.

इस के बाद नितिन प्रियंका को लिवाने ससुराल गया, लेकिन रूमा ने कह दिया कि जिस घर में उन की बेटी के साथ जानवरों जैसा सलूक किया जाए, वहां वह उसे हरगिज नहीं भेजेंगी. नितिन ने अपनी इस गलती की कई बार माफी मांगी. इस पर प्रियंका के दिल में रहम आ गया और वह उस के साथ जाने के लिए तैयार हो गई. नितिन उसे अपने फ्लैट पर ले आया. नितिन शक्की स्वभाव का था. 2 हफ्ते बाद ही नितिन ने प्रियंका के साथ फिर से सख्ती बरतनी शुरू कर दी. जब प्रियंका पूरी तरह स्वस्थ हो गई तो वह अपने खाली समय में सोशल साइट्स पर दोस्तों आदि से बातें करती रहती थी. नितिन को शक था कि वह अपने किसी बौयफ्रैंड से बात करती है. इसलिए उस ने प्रियंका के फोन से वाट्सऐप और फेसबुक अनस्टाल करा दी.

इस के अलावा नितिन ने प्रियंका के अकेली घर से बाहर निकलने पर भी पाबंदी लगा दी. खुले आसमान में उड़ने वाली प्रियंका अब पिंजड़े में बंद एक चिडि़या बन कर रह गई थी. यही नहीं नितिन के तुगलकी फरमान की वजह से घर का खाना उसे खुद बनाना पड़ता था. जबकि खाना बनाने के लिए रखा नौकर दिन भर खाली रहता था. अब प्रियंका को नितिन  के साथ शादी करने का पछतावा हो रहा था. प्रियंका कभी किसी बात पर बहस करती तो नितिन उस की पिटाई कर देता. इस से उस के अंदर इतना खौफ बैठ गया कि वह उस के सामने अपना मुंह नहीं खोल पाती थी. वह उसी के आदेशानुसार काम करती थी.

एक दिन नितिन अपनी पहली पत्नी से पैदा हुए बेटे को फ्लैट पर लाया. उसे उसी समय बिजनैस के सिलसिले में कहीं जाना था तो वह 8 वर्षीय बेटे को प्रियंका के पास छोड़ कर चला गया. उस के जाने के बाद उस लड़के ने प्रियंका के हाथों खाना तो दूर, कोई दूसरी चीज भी नहीं खाई. ऐसा लग रहा था, जैसे उसे किसी ने सिखा कर भेजा हो कि कोई चीज नहीं खानी है. शाम को जब नितिन को पता चला कि उस का बेटा दिन भर भूखा रहा है तो उसे पत्नी पर बहुत गुस्सा आया. उस ने उसे जम कर डांटा.

प्रियंका मां को फोन कर के अपना दुखड़ा रोती, तब मां को लगता कि उन की आपस की बातों में ज्यादा टांग अड़ाना ठीक नहीं है. छोटेमोटे झगड़े तो होते ही रहते हैं. बेटी की ससुराल के मामलों में ज्यादा दखलंदाजी करने पर कभीकभी रिश्ते बिगड़ जाते हैं. उन्होंने सोचा कुछ दिनों में रिश्ते सामान्य हो जाएंगे तो सब ठीक हो जाएगा. रूमा ने 24 मार्च, 2016 को भी प्रियंका से बात की थी, तब प्रियंका ने कहा था कि वह कल शाम को नितिन के साथ घर आएगी और खाना खाने के बाद लौट आएगी. 25 मार्च को उन्होंने फिर से प्रियंका से बात की. इस के बाद उन की उस से बात नहीं हो सकी.

पूछताछ में नितिन चावला बारबार खुद को बेगुनाह बता रहा था. वह पत्नी की मौत को आत्महत्या ही कह रहा था. नितिन से पूछताछ करने पर पुलिस को कोई खास जानकारी नहीं मिली तो पुलिस ने उसे 27 मार्च, 2016 को न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया. प्रियंका की पोस्टमार्टम रिपोर्ट से स्पष्ट नहीं हो सका कि प्रियंका ने आत्महत्या की थी या उस की हत्या कर आत्महत्या का रूप दिया गया था. इसलिए डाक्टरों ने उस का विसरा सुरक्षित कर जांच के लिए भेज दिया.

प्रियंका के मातापिता का आरोप है कि उन की बेटी इतनी कमजोर नहीं थी कि वह सुसाइड करती. वह हीलिंग, मैडिटेशन और विपश्यना की एक्सपर्ट थी. मार्च के पहले हफ्ते में भी वह 15 दिनों के लिए विपश्यना के लिए पुष्कर गई थी. उन्होंने बताया कि जिस समय फ्लैट का दरवाजा तोड़ा गया था, वह बिस्तर पर घुटनों के बल बैठी थी. उस स्थिति में फांसी लगा कर किसी की भी मौत नहीं हो सकती. पुलिस को उस स्थिति का फोटो खिंचवाना चाहिए था, लेकिन पुलिस ने ऐसा नहीं किया.

फ्लैट पर जो नेपाली नौकर था, उस से भी पुलिस ने पूछताछ नहीं की. सुसाइड नोट में प्रियंका ने लिखा था कि नितिन 3 दिनों से घर नहीं आ रहा. जबकि नौकर ने रूमा को बताया था कि साहब कल भी घर पर थे. इस से तो यही लग रहा है कि वह सुसाइड नोट 25 मार्च से पहले का लिखा है. शायद पहले कभी प्रियंका ने सुसाइड करने की कोशिश की होगी. अगर पुलिस नितिन के मोबाइल फोन की डिटेल्स निकलवाती तो कई महत्त्वपूर्ण जानकारियां मिल सकती थीं.

प्रियंका को डेली डायरी लिखने का शौक था. रूमा का कहना था कि अगर उस ने सुसाइड किया है तो इस बात को उस ने अपनी डायरी में जरूर लिखा होगा, लेकिन पुलिस डायरी के बारे में कुछ भी नहीं बता रही. जिस कमरे में उन की बेटी मरी मिली, उस कमरे का लौक सिस्टम ऐसा है, जो अंदर और बाहर दोनों तरफ से बंद किया जा सकता है. इसलिए उन का कहना यही है कि प्रियंका की हत्या करने के बाद नितिन कमरे का ताला लगा कर चला गया था.

पिता अशोक कपूर का कहना है कि सन 2014 में नितिन के खिलाफ मुंबई की किसी मौडल ने वर्सोवा थाने में रेप का केस दर्ज कराया था. इस की जानकारी प्रियंका को भी हो गई थी. वह नितिन के जुल्मोसितम से तंग आ कर घर लौटना चाहती थी. यह जानकारी नितिन को लग गई थी, इसलिए उस ने उन की बेटी की हत्या कर दी.

उन्होंने इस केस की निष्पक्ष जांच करा कर दोषियों के खिलाफ सख्त काररवाई करने की मांग की है. बहरहाल मामला चाहे जो भी हो, यह तो जांच के बाद ही स्पष्ट हो पाएगा. मामले की जांच एसआई शिवदेव सिंह कर रहे हैं. कथा लिखे जाने तक नितिन की मां हर्ष चावला और भाई जतिन चावला पुलिस की गिरफ्त में नहीं आ सके थे. Delhi Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों और मृतका के घर वालों से की गई बातचीत पर आधारित

 

Social Crime Story: सहेली ही निकली ब्लैकमेलर

Social Crime Story: मनजीत कौर ने प्रवीण कुमारी को सहेली समझ कर उस के कहने पर अपनी वीडियो क्लिप बनवा ली थी, तब उसे क्या पता था कि यही वीडियो क्लिप उस की जान का जंजाल बन जाएगी.

तनवीर सिंह ने अपनी बहन मनजीत कौर को एटीएम कार्ड देते हुए कहा, ‘‘पापा ने मुझे पैसे निकालने के लिए दिया था, लेकिन मेरा कालेज जाना जरूरी है. इसलिए तुम ऐसा करना कि थोड़ी देर में जा कर पहले एटीएम से रुपए निकाल लेना, उस के बाद बाजार जा कर दरजी से अपने कपड़े ले लेना और लौटते हुए दहीहांडी रेस्टोरेंट वाले शमीजी को 20 हजार रुपए दे देना.’’

‘‘ठीक है, तुम्हारा कालेज जाना जरूरी है तो तुम जाओ. मैं घर के काम करा कर चली जाऊंगी.’’ मनजीत ने कहा.

‘‘और हां, प्रेस वाले से भी पूछ लेना कि उस ने कार्ड छाप दिए या नहीं? अगर नहीं छापे हों तो उन से कह देना कार्ड जल्दी छाप दें. शादी में कुछ ही दिन बाकी रह गए हैं, कार्ड बांटने में भी बड़ा समय लगता है. यह काम जितनी जल्दी निपट जाए, उतना ठीक रहेगा.’’ तनवीर ने कपड़े पहनते हुए कहा.

मनजीत कौर ने भाई से एटीएम कार्ड ले कर अपने पर्स में रख लिया. इस के बाद वह मां के साथ घर के कामों में लग गई. घर के काम कराने के बाद खाना वगैरह खा कर मनजीत दोपहर को बाजार के लिए निकली. पहले उस ने एटीएम से रुपए निकाले.

उस के बाद औटो से गुमार मंडी बाजार गई, जहां दरजी के यहां से उस ने अपने कपड़े लिए. वहां से घंटाघर जा कर लहंगे वाले के यहां से होते हुए वह सिविल लाइन स्थित दहीहांडी रेस्टोरैंट पहुंची. रेस्टोरैंट के मालिक शमीजी को उस ने 20 हजार रुपए दिए, क्योंकि शादी में चायनाश्ते का इंतजाम शमीजी को ही करना था.

सारे काम निपटा कर मनजीत कौर औटो से घर पहुंची. औटो का किराया दे कर जैसे ही वह गेट में घुसी, उस के फोन की घंटी बजी. उस ने फोन रिसीव किया तो दूसरी ओर से एक लड़की की आवाज आई. उस ने अपनी मोटी आवाज में लापरवाही से पूछा, ‘‘मनजीत बोल रही हैं?’’

‘‘जी हां, आप कौन?’’ मनजीत ने पूछा.

‘‘मनजीत है न तो ध्यान से सुन,’’ फोन करने वाली लड़की रौब से धमकी भरे लहजे में बोली. इस के बाद उस ने मनजीत से जो कहा, उसे सुन कर उस का चेहरा सफेद पड़ गया. हाथपैर कांपने लगे. उसे लगा, जैसे फोन हाथ से छूट कर गिर जाएगा. फोन ही नहीं, वह खुद भी गिर जाएगी.

उस लड़की की बातों से मनजीत इतना घबरा गई कि उस से एक कदम भी नहीं चला गया. फोन कटने के तुरंत बाद मनजीत के फोन पर एक वीडियो का एमएमएस आ गया. कांपते हाथों से उस ने इनबौक्स खोल कर वीडियो देखी तो उस के होश उड़ गए. उस का दिलदिमाग और शरीर से नियंत्रण खो गया, जिस से वह चकरा कर गेट के पास ही गिर गई.

संयोग से उसी समय उधर से उस की पड़ोसन गुजर रही थी. उस ने मनजीत को गिरते देखा तो शोर मचाते हुए वह उस के पास पहुंच गई. घर वालों के बाहर आतेआते शोर सुन कर अन्य पड़ोसी भी आ गए थे. पड़ोसियों की मदद से मनजीत के पिता जरनैल सिंह उसे उठा कर अंदर ले गए. डाक्टर को बुलाया गया. उस ने इंजैक्शन लगाया. पूछने पर बताया कि शायद इसे एकदम से किसी बात का गहरा सदमा लगा है.

कुछ दिनों बाद ही मनजीत की शादी होने वाली थी. ऐसे में इस तरह कुछ हो जाना चिंता की बात थी. घर वालों को कुछ पता नहीं था. मनजीत को जो सदमा लगा था, वह फोन पर बात होने और वीडियो देखने के बाद लगा था. आखिर किस ने उसे फोन किया था, फोन करने वाले ने ऐसा क्या कह दिया था और उस वीडियो में ऐसा क्या था, जिसे सुन कर उसे इस तरह का सदमा लगा कि वह बेहोश हो गई थी.

यह सब जानने से पहले आइए थोड़ा मनजीत और उस के घर वालों के बारे में जान लेते हैं. मनजीत के पिता सरदार जरनैल सिंह सरकारी नौकरी से रिटायर हो चुके थे. रिटायर होने के बाद उन्होंने लुधियाना के जस्सियां रोड स्थित नवीननगर में शानदार कोठीनुमा मकान बनवाया था. उन के परिवार में पत्नी के अलावा बेटा तनवीर सिंह और बेटी मनजीत कौर थी.

जरनैल सिंह का छोटा परिवार था. वह हर तरह से सुखी और संपन्न थे. दोनों बच्चों को उन्होंने अच्छी शिक्षा दिलाई थी. मनजीत कौर ने पटना साहिब हिमाचल से बीडीएस (दंत चिकित्सक) की पढ़ाई की थी, जबकि बेटा तनवीर सिंह लुधियाना के आर्य कालेज से बीबीए की पढ़ाई कर रहा था. मनजीत अभी और पढ़ना चाहती थी, लेकिन उस की उम्र शादी लायक हो गई थी, इसलिए मातापिता ने उस का विवाह करना उचित समझा. लड़का देख कर उन्होंने उस की शादी ही नहीं तय कर दी थी, बल्कि जल्दी ही उस की शादी होने वाली थी.

मनजीत सहित पूरा परिवार इस शादी से खुश था. घर में शादी की तैयारियां बड़े जोरोंशोरों से चल रही थीं. इसी बीच मनजीत कौर के साथ यह हादसा हो गया था. किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि अचानक हंसतीखेलती मनजीत को यह क्या हो गया? मनजीत बिस्तर पर पड़ गई. उसे बिस्तर पर पड़े धीरेधीरे एक सप्ताह हो गया. वह न कुछ खातीपीती थी और न किसी से बात करती थी. अकेली पड़ीपड़ी आंसू बहाती रहती थी. कुछ पूछने पर ठीक से जवाब भी नहीं देती थी. हर समय खोईखोई सी रहती थी. घर का हंसीखुशी का माहौल एक अबूझ से सन्नाटे में तब्दील हो गया था.

शादी के दिन नजदीक आते जा रहे थे. कार्ड बांटे जा चुके थे, करीबी रिश्तेदार आने भी लगे थे. पहले की कुछ रस्में निभाई भी जाने लगी थीं, लेकिन उन रस्मों में भाग लेते समय मनजीत के चेहरे पर उदासी सी छाई रहती थी. पूरा परिवार परेशान था. सब लोग पूछपूछ कर थक गए थे, लेकिन मनजीत ने कुछ नहीं बताया. उस ने जैसे अपने होठों पर ताला जड़ लिया था. यही खामोशी उसे भीतरभीतर खाए जा रही थी.

आखिर इस तरह कब तक चलता. हर चीज का एक अंत होता है. एक दिन भाई तनवीर ने गुरुग्रंथ साहब के पावन स्वरूप श्री जपुजी साहब का गुटखा ले कर मनजीत के सिर पर रखते हुए कहा, ‘‘आप को गुरुग्रंथ साहबजी की कसम, सचसच बताओ क्या बात है, जो तुम अपनी यह हालत किए हो?’’

मनजीत काफी धार्मिक विचारों वाली थी. वह रोजाना सुबह ज्वालानगर स्थित गुरु निवारण साहब गुरुद्वारा जाती थी, शाम की अरदास में भी वह शामिल होती थी. इस के अलावा दिन में जब भी उसे समय मिलता था, वह नामसिमरन करती थी. लेकिन जब से उस की यह हालत हुई थी, उस ने गुरुद्वारा जाना बंद कर दिया था. उस दिन भाई तनवीर ने जब जपुजी साहब का गुटखा उस के सिर पर रखा तो गुटखा हाथ में ले कर वह जोरजोर से गुरु का नाम ले कर रोने लगी. तनवीर ने उसे चुप नहीं कराया. वह चुपचाप खड़ा उसे रोते देखता रहा. शायद वह चाहता था कि उस के मन में जो गुबार भरा है, वह निकाल दे, तभी ठीक रहेगा.

काफी देर तक रोने के बाद जब मनजीत का मन हलका हुआ तो उस ने तनवीर को जो बताया, उसे सुन कर तनवीर को भी चक्कर आने लगा. उस ने भाई को जो बताया था, वह कुछ इस तरह था. मनजीत रोजाना सुबह गुरुद्वारा साहब जाती थी. वहीं उस की मुलाकात प्रवीण कुमारी से हुई. वह भी लगभग रोज ही गुरुद्वारा आती थी. दोनों में परिचय हुआ तो बातचीत में उस ने खुद को मनजीत के सामने बहुत ही धार्मिक प्रवृत्ति की बताया. इस की वजह यह थी कि मनजीत की गुरुघर में बड़ी श्रद्धा थी. इस तरह दोनों जल्दी ही गहरी दोस्त बन गईं. कुछ दिनों की मुलाकात में मनजीत उसे बहन मानने लगी थी.

गुरुद्वारा साहब में अरदास के बाद मनजीत प्रवीण कुमारी के साथ बैठ कर काफी देर तक बातें करती. इसी बातचीत में प्रवीण कुमारी ने मनजीत कौर के घरपरिवार, आर्थिक स्थिति और उस की शादी के बारे में जान लिया था. यही नहीं, उसे यह भी पता चल गया था कि उस के हाथों में काफी रुपए हैं.

इस के बाद एक दिन याद रखने के बहाने प्रवीण कुमारी ने गुरुद्वारा प्रांगण में मनजीत की एक छोटी सी वीडियो क्लिप बना ली. प्रवीण कुमारी यह वीडियो यादगार के लिए बना रही थी, इसलिए मनजीत कौर ने खुशीखुशी बनवा ली थी. तब उसे क्या पता था कि यही वीडियो उस की जान के लिए आफत बन जाएगी. उसे यह वीडियो बनवाने का पछतावा तो उस दिन हुआ, जिस दिन प्रवीण कुमारी ने उसे ब्लैकमेल करने के लिए फोन पर उस वीडियो  की क्लिप भेजी.

दरअसल, प्रवीण कुमारी ने उस समय तो यादगार के तौर पर मनजीत कौर की वह सीधीसादी वीडियो क्लिप बनाई थी, लेकिन बाद में उस ने उस वीडियो के साथ छेड़छाड़ कर के उसे अश्लील बना दिया था. दरअसल, वह वीडियो मिक्सिंग की एक्सपर्ट थी. अपना यह ज्ञान अच्छे काम में लगाने के बजाय वह गलत काम में लगाने लगी, जो एक तरह से अपराध था. अश्लील वीडियो बना कर उस ने अपने मोबाइल फोन से वीडियो मनजीत कौर के मोबाइल पर भेज कर उस से ढाई लाख रुपए मांगे. इसी के साथ उसे धमकी भी दी कि अगर उस ने उसे रुपए नहीं दिए तो वह उस वीडियो को उस की ससुराल वालों के पास भेजने के साथसाथ इंटरनैट पर भी डाल देगी.

प्रवीण कुमारी की धमकी सुन कर और अपना वीडियो देख कर मनजीत कौर की हालत खराब हो गई थी. क्योंकि ढाई लाख रुपए देना उस के वश की बात नहीं थी. अगर वह वीडियो उस की ससुराल पहुंच जाती तो उस का रिश्ता तो टूटता ही, बदनामी ऊपर से होती. मांबाप की छोड़ो, वह किसी को भी मुंह दिखाने लायक नहीं रहती. इसी बात को मन में लिए मनजीत कौर घुटघुट कर जी रही थी. कई बार तो उस के मन में आत्महत्या करने तक की बात आ चुकी थी.

प्रवीण कुमारी ने तो ढाई लाख रुपए की मांग करते हुए मनजीत कौर को धमकाया ही था, उस के 2 दिनों बाद किसी आदमी ने भी फोन कर के रुपए मांगे थे. उस ने भी रुपए न देने पर अंजाम भुगतने की धमकी दी थी. इस के बाद तो लगातार उस के फोन आने लगे थे. वह उस से रुपए तो मांगता ही था, अश्लील बातें भी करता था, जिस से मनजीत और ज्यादा डर गई थी. मनजीत कौर की पूरी बात सुनने के बाद इस विषय पर तनवीर काफी देर तक सोचता रहा. मामला गंभीर ही नहीं, बहुत नाजुक भी था. छोटी सी गलती उस की बहन की जिंदगी तबाह कर सकती थी. आखिर काफी सोचविचार कर उस ने जो कदम उठाया, वह एकदम सही था.

तनवीर सिंह मनजीत को साथ ले कर जगतपुरी पुलिस चौकी पहुंचा और चौकीइंचार्ज एएसआई जगतार सिंह को पूरी बात बता दी. उस ने जगतार सिंह से इस मामले को गुपचुप तरीके से निपटा कर दोषियों को गिरफ्तार करने की प्रार्थना की. मामले की गंभीरता को देखते हुए जगतार सिंह ने तुरंत इस बात की जानकारी थानाप्रभारी अवतार सिंह को देने के साथ, तनवीर की शिकायत डीडी नंबर 24 पर दर्ज कर के तुरंत काररवाई शुरू कर दी.

थानाप्रभारी अवतार सिंह ने इस मामले को सुलझाने के लिए हैडकांस्टेबल हरविंदर सिंह, जसवीर सिंह और कांस्टेबल जतिंदर सिंह की एक टीम बनाई, जिसे उन्होंने ज्वालानगर स्थित दुख निवारण गुरुद्वारा के पास लगा दिया. क्योंकि उन्हें लग रहा था कि प्रवीण कुमारी गुरुद्वारे जरूर आएगी, जहां से उसे पकड़ लिया जाएगा. लेकिन पुलिस की यह चाल बेकार गई, क्योंकि प्रवीण कुमार वहां आई ही नहीं. फिर भी वहां से यह जरूर पता चल गया कि वह अपने पति महेंद्र के साथ कहां रहती है.

इस का मतलब यह था कि मनजीत कौर को फोन पर प्रवीण के अलावा जिस आदमी ने धमकी दी थी, वह उस का पति महेंद्र रहा होगा. घर का पता मिलने के बाद चौकीइंचार्ज जगतार सिंह ने प्रवीण कुमारी के घर छापा मारा तो पतिपत्नी घर पर नहीं मिले. इस के बाद मुखबिरों को उन के पीछे लगा दिया गया, साथ ही उन के घर पर एक सिपाही भी तैनात कर दिया गया. सिपाही प्रवीण कुमारी के घर इस तरह नजर रख रहा था कि किसी को पता नहीं चल रहा था कि घर पर नजर रखी जा रही है.

30 दिसंबर को जगतार सिंह जैसे ही चौकी पर पहुंचे, मुखबिर ने उन्हें बताया कि प्रवीण कुमारी अपने पति महेंद्र के साथ बसअड्डे पर मौजूद है. उन्होंने देर करना उचित नहीं समझा और सहयोगियों को साथ ले कर तुरंत बसअड्डे पर पहुंच गए. लेकिन प्रवीण कुमारी उन्हें वहां नहीं मिली. तब वह जस्सिया रोड पर संगम पैलेस की ओर बढ़े. थोड़ी दूर जाने पर प्रवीण कुमारी उन्हें 2 लोगों के साथ जाते दिखाई दे गई. पुलिस ने उन्हें घेर कर पकड़ लिया. पूछने पर पता चला प्रवीण कुमारी के साथियों के नाम महेंद्र और सुखचरण थे. महेंद्र तो प्रवीण कुमारी का पति था, जबकि सुखचरण उन का साथी था. पुलिस तीनों को पकड़ कर जगतपुरी पुलिस चौकी ले आई.

चौकी में की गई पूछताछ में पता चला यह सारी योजना प्रवीण कुमारी और महेंद्र के साथ पकड़े गए सुखचरण सिंह ने बनाई थी. वह उसी गुरुद्वारे में ग्रंथी था, जहां मनजीत कौर रोज माथा टेकने आती थी. उसे मनजीत कौर के परिवार की आर्थिक स्थिति का पता था, इसलिए उस ने प्रवीण कुमारी और महेंद्र के साथ मिल कर उसे ब्लैकमेल करने की योजना बनाई थी.

गुंथी सुखचरण सिंह शादीशुदा था और काफी दिनों से उसी गुरुद्वारा में ग्रंथी था, जबकि महेंद्र उन दिनों बेकार था. महेंद्र का पहले अच्छाखासा काम चल रहा था. लेकिन वह और प्रवीण कुमारी अय्याश प्रवृति के थे, इसलिए अय्याशी के चक्कर में उन का कामधंधा बंद हो गया था. इस के बावजूद उन के शाही खर्चों में कोई कमी नहीं आई थी.

खर्चों की वजह से प्रवीण कुमारी और महेंद्र पर काफी कर्ज हो गया. कर्ज देने वाले परेशान करने लगे तो उन्होंने ग्रंथी सुखचरण सिंह के कहने पर मनजीत को ब्लैकमेल करने की योजना बना ली. सीधीसादी मनजीत उन के जाल में फंस भी गई. अच्छा तो यह हुआ कि उस का भाई समझदार था. वह पुलिस के पास चला गया, जिस से एक लड़की की जिंदगी बरबाद होने से बच गई. पूछताछ के बाद जगतार सिंह ने उसी दिन यानी 30 दिसंबर, 2015 को अपराध संख्या 221/15 पर भादंवि की धारा 389/120बी के तहत प्रवीण कुमारी, उस के पति महेंद्र और ग्रंथी सुखचरण सिंह के खिलाफ केस दर्ज कर तीनों को सक्षम अदालत में पेश कर एक दिन के पुलिस रिमांड पर ले लिया.

रिमांड के दौरान जगतार सिंह ने तीनों अभियुक्तों के मोबाइल फोन कब्जे में ले कर उन्हें जांच के लिए भेज दिए. रिमांड अवधि समाप्त होने पर सभी को एक बार फिर अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. Social Crime Story

(कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित, बदनामी की वजह से कुछ पात्रों के नाम बदले हुए हैं)

Superstition: अंधविश्वास ने ली पिता पुत्र की जान

Superstition: अंधविश्वास हमारे समाज में अमरवेल की तरह फल फूल रहा है.और इसको खाद पानी देने का काम धर्म के ठेकेदार पंडो , पुजारियों के द्वारा बखूबी किया जा रहा है. समाज में फैले तरह-तरह के अंधविश्वास लोगों की जेब से  रुपए पैसे तो ऐंठते  ही हैं, साथ ही जरा सी असावधानी की वजह से जान माल का नुक़सान भी कर रहे हैं.अंधविश्वास के शिकार दलित, पिछड़ों के साथ पढ़े लिखे  नौकरी पेशा लोग भी हो रहे हैं.

एक ऐसा ही ताजा मामला मध्यप्रदेश के बैतूल जिले में देखने को मिला है. लोगों को न्याय देने जज की कुर्सी पर बैठने वाले एक अंधविश्वासी शख्स की नासमझी ने अपने साथ अपने पुत्र की जान भी गंवा दी. बताया जा रहा है कि  जज के एक महिला मित्र से संबंधों की बजह से परिवार में कलह चल रही थी, जिससे छुटकारा पाने जज साहब तंत्र मंत्र के चक्कर में पड़ गये.

बैतूल  जिला न्यायालय में पदस्थ अतिरिक्त जिला सत्र न्यायाधीश  महेन्द्र कुमार त्रिपाठी  और इसके दो बेटे अभियान राज त्रिपाठी, और  छोटा बेटा आशीष राज त्रिपाठी ने  20 जुलाई 2020 को रात्रि 10.30 बजे के लगभग एक साथ बैठकर डायनिंग टेबल पर  खाना खाया. कुछ समय बाद अचानक वे तीनों उल्टीयां करने लगे . जिस भोजन में परोसी ग‌ई रोटियों की बजह  से तीनों की तबीयत खराब हुई ,वह  जज साहब की पत्नी श्रीमती भाग्य त्रिपाठी ने तैयार की थी.

जज साहब की पत्नी ने दोपहर की बची  रोटियां खाई थी, इस कारण उन्हें कुछ नहीं हुआ.  21  एवं 22 जुलाई  तक जज साहब और इनके बेटो का इलाज न्यायाधीश आवास परिसर बैतूल में ही  चलता रहा. 23 जुलाई को जिला चिकित्सालय के चिकित्सक डॉ. आनद मालवीय की सलाह पर  जज साहब व इनके दोनो बेटों को पाढर अस्पताल में आईसीयू में भर्ती कराया गया.

छोटे बेटे आशीष राज त्रिपाठी की तबीयत में सुधार होने के कारण वह घर पर ही रहे .25 जुलाई को शाम के समय जज साहब एवं इनके बड़े बेटे अभियान राज त्रिपाठी की तबीयत अचानक ज्यादा खराब होने से  इन्हे नागपुर के प्रतिष्ठित एलेक्सिसी अस्पताल ले जाया गया . जहां अस्पताल के चिकित्सको ने अभियान राज त्रिपाठी को मृत घोषित किया. और जज श्री महेन्द्र त्रिपाठी जी का ईलाज चलता रह . 26 जुलाई को प्रातः 04.30 बजे के लगभग जज महेन्द्र त्रिपाठी  की भी मौत हो गई.

दोनो पिता पुत्र की मृत्यु के बाद नागपुर के  मानकापुर पुलिस थाने में एफआईआर  जज के छोटे बेटे आशीष राज त्रिपाठी ने दर्ज कराते हुए पुलिस को बताया कि नागपुर आते समय उसके पिता महेन्द्र त्रिपाठी ने रास्ते में उसे बताया था कि उनकी किसी परिचित महिला संध्या सिह ने उन्हें  किसी पंडित से पूजा पाठ करवा कर  गेहूं का आटा दिया था और कहा था कि आटा घर के आटे में मिलाकर खाना बनाना . उसी आटे से तैयार रोटी खाने के बाद फुड पाईजनिग से उसके पापा और भाई की मौत हो गई.

न्यायिक क्षेत्र का मामला होने से पुलिस अधीक्षक द्वारा सम्पूर्ण जांच पड़ताल हेतु विशेष कार्य दल का गठन किया गया . इसी संदर्भ में जज महेन्द्र कुमार त्रिपाठी के घर से 20 जुलाई को प्रयुक्त शेष आटे के पैकेट को जप्त कर जांज के लिए लैब भेजा गया. लैब से आई रिपोर्ट में आटे में जहर मिले होने की पुष्टि हुई. पुलिस की जांच में जो कहानी सामने आई वह चौकाने वाली थी.

मूलतः रीवा निवासी श्रीमति संध्या सिंह विगत कई वर्षों से छिन्दवाडा में रहकर एन.जी.ओ चलाती है . महिलाओं को कानूनी सलाह देने जैसे कार्यक्रम आयोजित करने की वजह से जज महेन्द्र त्रिपाठी से नजदीकियां हो गई थी . चूंकि जज बैतूल में अकेले रहते थे, तो अक्सर दोनों की मेल मुलाकात होती रहती थी संध्या जज साहब से रूपए पैसों की मांग भी करने लगी थी.

लाक डाउन की बजह से जज साहब की पत्नी व वेटों के बैतूल आ जाने के कारण से संध्या विगत चार माह से जज  से नहीं मिल पा रही थी. परेशान होकर  उसने छिन्दवाड़ा में अपने ड्रायवर संजू , संजू के फूफा देवीलाल  चन्द्रवशी  और बाबा रामदयाल के साथ मिलकर एक योजना बनाई.   योजना के अनुसार श्रीमति संध्या सिंह ने बैतूल आकर  जज साहब से उनके घर से आटा मंगवाया और वही आटा पन्नी में भरकर बाबा उर्फ रामदयाल को दिया गया .

दो दिन  बाद बाबा उर्फ रामदयाल ने आटे में जहर मिला कर संध्या को दे दिया. 20 जुलाई को  सर्किट हाउस बैतूल में संध्या और जज ने एकांत में मुलाकात की.  संध्या सिंह ने बाबा की पूजा वाला जहरीला आटा जज साहब को देते हुए कहा-

“बाबा ने इस‌ आटे को तंत्र मंत्र से सिद्ध किया है, इसकी रोटी खाने से सारी परेशानियां दूर हो जायेगी और हमारा मिलना जुलना आसान हो जाएगा.”

घर आकर  इसी तंत्र मंत्र वाले आटे को जज साहब ने घर में रखे आटे के डिब्बे में मिला दिया.  इसी आटे की रोटी खाने के बाद जज साहब और इनके दोनो बेटो की तबीयत खराब हुई और अंत में जज  महेन्द्र कुमार त्रिपाठी और इनके बड़े बेटे श्री अभियान राज त्रिपाठी की मौत हो गई .

एक पढ़ें लिखे उच्च पद पर काम करने वाले जज की यह कहानी बताती है कि हम किस तरह आंख मूंदकर तंत्र मंत्र और चमत्कारों पर विश्वास करने लगते हैं. अपनी गर्लफ्रेंड के प्यार में अंधे कानूनी पढाई वाले जज ने कैसे विश्वास कर लिया कि बाबा द्वारा दिए गए इस आटे के टोटके से  घर की परेशानियां दूर हो जायेगी.

आज भी विज्ञान के युग में भले ही हम आधुनिक तकनीक का उपयोग कर अपने आपको माडर्न समझने लगे हैं, परन्तु हमारे समाज में वैज्ञानिक सोच विकसित नहीं हुई है. जब हमारे देश के वैज्ञानिक चंद्रयान की सफलता के लिए पूजा पाठ और हवन करते हो, देश के रक्षा मंत्री राफेल विमान की नारियल और नींबू से पूजा करते हों,तो फिर समाज के दूसरे वर्ग से क्या उम्मीद की जा सकती हैं.

अंधविश्वास का आलम ये है रोज सोशल मीडिया पर देवी देवताओं की पोस्ट वाले मेसैज 5 ग्रुप में फारवर्ड करने की अपील पर हम बिना सोचे समझे भेड़ चाल चलने लगते हैं. ज्ञान विज्ञान और समाज को जागरूक करने  वाली पत्रिकाओं को पढ़ने की रूचि लोगों की खत्म होती जा रही है.

ऐसे में दिल्ली प्रेस की पत्रिकाएं सरिता, सरस सलिल, मुक्ता, गृहशोभा समाज में फैले पाखंड और अंधविश्वास के प्रति समाज को जागरूक करने का काम कर रही हैं. इसी तरह सत्यकथा और मनोहर कहानियां जैसी पत्रिकाओं में प्रकाशित अपराध कथाओं में यह सीख प्रमुखता से दी जाती है कि अपराध का अंजाम सुखद नहीं होता. नशा, अंधविश्वास, धार्मिक आडंबर और अपराध पैसे से तंगहाली लाकर हमें  बर्बाद की ओर ले जाते हैं. Superstition

UP Crime: महिला का सिर कटा शव मिल ने पर हड़कंप

UP Crime: एक ऐसा सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिसे सुनकर आप के रौंगटे खड़े हो जाएंगे. उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर के नरसेना थाना क्षेत्र में एक महिला की हत्या कर उस के शव को टुकड़ों में काटकर अलगअलग फेंक दिया गया. इस घटना ने पूरे इलाके को दहला दिया और पुलिस को भी चौंका दिया. सवाल ये उठता है कि यह महिला कौन थी और किस ने उस के साथ इतनी क्रूरता की. पढ़ते हैं पूरी स्टोरी को

यह दर्दनाक घटना यूपी के बुलंदशहर के नरसेना थाना क्षेत्र में घुंघरावली बांगर के रजवाहे गांव से सामने आई. वहां महिला की सिर कटी लाश मिलने से इलाके में सनसनी फैल गई. पुलिस की प्रारंभिक जांच में मामला हत्या कर शव को टुकड़ों में अलगअलग फेंकने का प्रतीत हो रहा है. महिला की बाजू पर ‘बबली’ गुदा हुआ मिला, जिस से पुलिस को शक है कि मृतक किसी अन्य राज्य की हो सकती है. घटना के बाद इलाके में अफरातफरी मच गई.

एसपी (सिटी) शंकर प्रसाद ने बताया कि शव के धड़ और सिर अलगअलग फेंके गए हैं और मामले का खुलासा करने के लिए 6 टीमों को लगाया गया है. पुलिस ने घटनास्थल से लगभग 500 मीटर दूर सरसों के खेत से महिला का सिर बरामद किया. इस कार्य के लिए 4 टीमों ने विशेष तलाशी अभियान चलाया, जिस के बाद सिर बरामद हो पाया.

एसपी सिटी ने बताया कि महिला की पहचान की कोशिशें जारी हैं. घटना की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने पूरे इलाके में खोजबीन तेज कर दी है. 7 घंटे की लगातार तलाश के बाद यह बरामदगी हुई और पुलिस ने आश्वासन दिया कि जल्द ही पूरे मामले का परदाफाश किया जाएगा. UP Crime