सुहागरात के बाद खुल कर नाची मौत – भाग 3

कुछ दिन बाद डौली के वापस आने की जानकारी शिववीर को हुई तो वह उसे लेने आ पहुंचा. लेकिन सुभाष ने डौली को यह कह कर उस के साथ नोएडा नहीं भेजा कि बहू के जाने से घर में रोटीपानी की परेशानी होगी. क्योंकि डौली की सास शारदा की तबियत खराब चल रही थी.

शिववीर अब 15 दिन में घर आता. 2-3 दिन रहता, उस के बाद फिर नौकरी पर नोएडा चला जाता. लेकिन जब भी आता, पापा से पैसों की डिमांड करता. न देने पर लड़ाईझगड़ा करता. मां शारदा से भी उलझ जाता. एक दिन तो हद ही हो गई. शिववीर ने पापा सुभाष पर हाथ छोड़ दिया. पति पर हाथ छोडऩा शारदा को नागवार लगा, इसलिए वह उस से भिड़ गई और कई तमाचे शिववीर के गाल पर जड़ दिए.

घर आतेजाते एक रोज शिववीर को पता चला कि पापा व दोनों भाइयों ने मिल कर सड़क किनारे एक प्लौट तथा 5 बीघा उपजाऊ भूमि खरीदी है. लेकिन प्लौट व जमीन में उस का नाम दर्ज नहीं कराया गया है. वह मन ही मन जलभुन उठा. उस के मन में घर वालों के प्रति नफरत की आग सुलगने लगी.

शिववीर ने इस बाबत पापा से पूछा तो उन्होंने कहा कि सोनूू और भुल्लन ने अपनी कमाई से खेत खरीदे हैं. यह सुन कर शिववीर गुस्से से बोला, ”खेत, प्लौट खरीदने को तुम लोगों के पास पैसा है, लेकिन हमारा कर्ज चुकाने को तुम्हारे पास पैसा नहीं है. यह नाइंसाफी है.’’

शिववीर ने इस नाइंसाफी के बारे में बहनोई सौरभ तथा मामा विनोद से भी बात की, लेकिन उन लोगों ने भी उस की एक न सुनी. शिववीर अब मामा व बहनोई से भी नफरत करने लगा.

सुभाष का मंझला बेटा सोनू राजस्थान की खुशखेरा स्थित जिस फैक्ट्री में काम करता था, उसी में वेदराम यादव भी नौकरी करता था. वेदराम यादव इटावा जिले के गंगापुरा गांव का रहने वाला था. चूंकि सोनू और वेदराम एक ही क्षेत्र के रहने वाले थे, इसलिए परिचय होने के बाद दोनों के बीच घनिष्ठता बढ़ गई थी. जब भी दोनों को फुरसत मिलती तो साथ बैठ कर घरगांव की बातें करते थे. चूंकि दोनों यादव जाति के थे, सो दिन पर दिन उन की दोस्ती बढ़ती गई.

वेदराम यादव के परिवार में पत्नी सुषमा के अलावा 4 बेटियां सोनी (18 वर्ष), अंजलि (16 वर्ष), खुशबू (14 वर्ष), खुशी (13 वर्ष) तथा एक बेटा यश (7 वर्ष) था. वेदराम स्वयं तो नौकरी करता था, लेकिन उस की पत्नी सुषमा घरखेत की जिम्मेदारी संभाले थी. पांचों बच्चों की देखरेख व पालनपोषण की जिम्मेदारी सुषमा की ही थी.

वेदराम की बेटी सोनी भाईबहनों में सब से बड़ी थी. वह खूबसूरत तो बचपन से ही थी, लेकिन 16 बसंत पार कर जब उस ने जवानी की डगर पर कदम रखा तो उस की खूबसूरती में और भी निखार आ गया था. असित इंटर कालेज, गंगापुरा से उस ने हाईस्कूल की परीक्षा पास कर ली थी. वह आगे पढऩा चाहती थी, लेकिन मम्मी ने उस की पढ़ाई बंद करा दी थी और घरेलू काम में लगा दिया था.

वेदराम अपनी जवान बेटी के ब्याह के लिए चिंतित रहता था. वह फैक्ट्री में जब भी सोनू से मिलता तो उसे अपनी बेटी सोनी की याद आ जाती. उसे लगता कि सोनू ही उस की बेटी के योग्य है. वह उसे सदा खुश रखेगा.

रिश्ता हो गया तो दोनों की जोड़ी खूब फबेगी. इशारेइशारे में वेदराम ने कई बार सोनू का मन टटोला तो वह हंस कर टाल गया और बोला, ”शादी विवाह मम्मीपापा की मरजी से होते हैं. पहले उन की हां फिर मेरी हां.’’

वेदराम सोनू का इशारा समझ गया. इस बार मार्च, 2023 में होली त्यौहार की छुट्टी में जब वेदराम घर आया तो वह बेटी का रिश्ता ले कर सोनू के गांव गोकुलपुरा अरसारा पहुंच गया. उस ने बिना कोई भूमिका बांधे सोनू के पापा सुभाष यादव से कहा कि वह अपनी बेटी सोनी का रिश्ता ले कर उन के पास आए हैं. उन का बेटा सोनू उन्हें पसंद है.

Soni (Mratika)

मृतका सोनी

आपस की बातचीत के बाद सोनी का रिश्ता सोनू के साथ तय हो गया. शादी की तारीख 22 जून, 2023 तय हुई. इस के बाद दोनों परिवार शादी की तैयारी में जुट गए.

भाई की शादी पर क्यों चिढ़ा शिववीर

शिववीर को सोनू का ब्याह तय होने की बात पता चली तो वह मन ही मन जल उठा. वह नोएडा से घर आया तो मम्मीपापा से झगडऩे लगा और बोला, ”तुम्हारे पास शादी रचाने को रकम है, लेकिन मेरा कर्ज चुकाने को नहीं. क्या मैं सौतेला बेटा हूं या फिर किसी की नाजायज औलाद. आखिर घर में मेरी अनदेखी क्यों की जा रही है?’’

शिववीर ने शादी की तैयारी के बहाने सुभाष से 20 हजार रुपया मांगा, लेकिन उन्होंने पैसा देने से साफ इंकार कर दिया. इस इंकार से शिववीर की नफरत चरम पर पहुंच गई. वह सोचने लगा कि उसे इस तरह तो कुछ भी हासिल न होगा. उसे सब कुछ छीनना ही पड़ेगा.

उस ने मन ही मन तय कर लिया कि वह पूरे परिवार का सफाया कर देगा. उस के बाद आराम की जिंदगी बिताएगा. जमीनजायदाद, घर, प्लौट का वही मालिक होगा.

अपने खतरनाक मंसूबों को सफल बनाने के लिए वह तैयारी में जुट गया. सब से पहले उस ने चारा काटने वाली मशीन के ब्लेड से तेज धार वाला फरसा तैयार कराया. इस के बाद उस ने एक स्थानीय अपराधी की मदद से तमंचा व कारतूस खरीदा.

फरसे व तमंचे को उस ने अपने कमरे में सुरक्षित रख दिया. यही नहीं, उस ने हर खतरे से निपटने के लिए अन्य तैयारियां भी पूरी कर लीं. मिर्च का स्प्रे व नींद की गोलियों का इंतजाम भी उस ने कर लिया.

शिववीर ने अपने खतरनाक मंसूबों की किसी को भनक तक न लगने दी. वह सामान्य तरीके से रहने लगा. सुभाष यादव व उस के दोनों बेटे शादी की तैयारियों में जुटे थे. निमंत्रण कार्ड आदि बांटे जा चुके थे. गांव में शादी की रस्में एक सप्ताह पहले ही शुरू हो जाती हैं. रिश्तेदारों व महिलाओं का आनाजाना भी शुरू हो गया था. सोनू की बहन प्रियंका, मौसी, मामी भी आ चुकी थीं. 20 जून को मंडप गाड़ा गया. उस के बाद से मंडप के नीचे ढोलक की थाप पर मंगल गीत गाए जाने लगे.

सुभाष यादव ने बड़े बेटे शिववीर को शादी में नहीं बुलाया था, फिर भी वह 3 दिन पहले ही नोएडा से घर आ गया. वह हर काम हंसीखुशी से करने लगा. उस ने भाइयों को तनिक भी आभास नहीं होने दिया कि उस के मन में क्या चल रहा है.

लक्ष्मण रेखा लांघने का परिणाम – भाग 3

बस, मैं खुदगर्ज हो गई. नहा कर मैं ने बढि़या कपड़े और गहने पहने, शृंगार किया. आइने के सामने खड़ी हुई तो यह बदलाव मुझे अच्छा लगा. मैं बच्चों के बारे में सोच रही थी कि मेरी सहेली नीरू आ गई. वह और उस के पति अशोक हमारे अच्छे दोस्तों में थे. नीरू ने कहा, ‘‘भई हम तुम्हें लेने आए हैं. अशोक बाहर गाड़ी में तुम्हारा और बच्चों का इंतजार कर रहे हैं. आज न्यू ईयर्स पर बच्चे घर में ही सेलीब्रेट कर रहे हैं. चलो जल्दी करो.’’

मुझे बढि़या मौका मिल गया. मैं ने बड़ी ही मोहब्बत से कहा, ‘‘नीरू, अभी तुम मेरे बच्चों को ले कर चलो. मुझे कुछ जरूरी काम है, मैं एक घंटे बाद आ जाऊंगी.’’

मेरे अंदर छिपे पाप को नीरू समझ नहीं सकी और जल्दी आने के लिए कह कर मेरे बच्चों को ले कर चली गई.

अब मेरा रास्ता साफ था. बादल घेरे हुए थे. हल्कीहल्की बूंदे पड़ रही थीं. ठंडी हवाएं मेरी जुल्फों को बिखेर रही थीं. अंदर की सारी जलन खत्म हो गई थी. मैं ने टैक्सी की और होटल ताज पैलेस पहुंच गई. असलम बाहर खड़ा मेरा इंतजार कर रहा था. उस ने हौले से मेरा हाथ पकड़ा और मुझे होटल के बैंक्वेट हौल में ले गया. वहां हर ओर मस्ती का आलम था.

असलम ने एक शानदार सोफे की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘‘बैठो.’’

मैं बैठ गई. थोड़ी खामोशी के बाद बातचीत शुरू हुई. धीरेधीरे हम बेतकल्लुफ होते गए. उसे पता चला कि मैं बेहद दुखी हूं. उस ने मेरी दुखती रग पकड़ ली. मेरी कहानी सुनने के बाद उस ने कहा, ‘‘गिरने वालों को संभाल भी कौन सकता है.’’

मैं ने हैरान हो कर पूछा, ‘‘क्या मतलब?’’

‘‘समय आने पर वह भी बता दूंगा,’’ असलम ने अपना एक हाथ मेरे कंधे पर रख कर कहा, ‘‘आप ने अपनी पूरी कहानी सुना दी, लेकिन नाम नहीं बताया.’’

‘‘शबनम.’’ मैं ने हंस कर कहा.

‘‘वाकई तुम शबनम की तरह पाक और खूबसूरत हो. तुम कितनी हसीन हो, शायद यह तुम्हें पता नहीं. यह हम जैसे कद्रदानों को ही पता होगा. जब से मैं ने तुम्हें देखा है, तभी से बेचैन हूं. मैं तुम्हारा दीवाना हूं.’’

उस दिन के बाद हमें जब भी मौका मिलता, हम मिल लेते. हर मुलाकात में वह कुछ ऐसा कह देता कि मेरा सोया जमीर जाग उठता. वह अकसर कहता कि अगर भीख में उजाला मिलता है तो कभी मत लेना. किसी की ज्यादती सहना भी गुनाह है. हालात कितने भी बुरे क्यों ना हों, हर मोड़ पर मंजिल की तलाश करनी चाहिए.

धीरेधीरे मैं उस के रंग में रंगती चली गई. उस ने मुझ से वादा किया कि हम अमेरिका पहुंच कर निकाह करेंगे. मैं उस के साथ ऐशोआराम के सपने देखने लगी. मुझे लगता, अगर इतना प्यार करने वाला पति हो तो पति और बच्चे क्या, मैं पूरी दुनिया को ठोकर मार दूं.

और फिर मेरी जिंदगी में वह काली रात आ गई. शायद उस रात मेरा दिल पत्थर का हो गया था. मैं ने अपने सारे गहने तथा नकदी एक अटैची में रखी और जब सभी लोग सो गए तो रात 12 बजे घर से बाहर आ गई. सुबह 3 बजे हमारी फ्लाइट थी. असलम टैक्सी लिए खड़ा था. मेरे बैठते ही टैक्सी चल दी.

पूरे रास्ते मुझे अपराधबोध सताता रहा और बेसाख्ता आंसू बहते रहे. मुझे अपने बच्चों की याद आ रही थी. क्योंकि अभी उन्हें मेरी जरूरत थी. लेकिन बच्चों की दादी उन्हें जान से भी ज्यादा चाहती थी, इसलिए यह बात जल्दी ही खयालों से निकल गई. वह उन्हें पालपोस लेगी.

सागर भी बच्चों को बहुत चाहता था. बेटी को तो वह पलकों पर रखता था. डांटता और नजरअंदाज करता था तो सिर्फ मुझे. एक कुटिल सी मुसकान मेरे होंठों पर तैर गई. मुझे लगा, मैं ने उसे अच्छा सबक सिखाया है. वहां किसी को मेरी जरूरत नहीं थी.

हम अपने मुकाम पर पहुंच गए. रास्ते भर असलम ने मेरा बहुत खयाल रखा. असलम की कोठी देख कर मैं बहुत खुश हुई. चारों तरफ बगीचे, फूलों से लदे पेड़, पिछवाड़े बहता झरना, जगहजगह लालनीलीपीली बत्तियां, फैंसी परदे, झाड़फानूस. लगा धरती पर अगर कहीं स्वर्ग है तो बस यहीं है. काजी और कुछ लोगों की हाजिरी में हमारा निकाह हो गया. ऐसा उस ने इसलिए किया था कि मैं बहुत घबराई हुई थी. इस के अलावा निकाह के बिना मैं उस की किसी बात पर रजामंद नहीं थी.

बाद में पता चला कि वह कोठी किराए की थी. एक रात असलम काफी देर से 8-10 दोस्तों के साथ आया. वे शक्ल से मालदार, लेकिन गुंडे नजर आ रहे थे. वे एक कमरे में बैठ कर बातें करने लगे. जब मैं ने उन की बातें सुनीं तो लगा मुझे गश आ जाएगा.

वे सब के सब स्मगलर थे. उन के सारे गैरकानूनी धंधों का मुखिया असलम था. जब उसे पता चला कि मुझे उस की असलियत मालूम हो गई है तो वह मेरे सामने पूरी तरह खुल गया. अपने हर काले धंधे में मुझे शामिल करने लगा. इस तरह धीरेधीरे मैं भी गुनाहों के दलदल में धंसती चली गई. खूबसूरत लड़कियों को फंसा कर गुनाहों में शामिल करना असलम का मुख्य धंधा था.

मैं ने निकाह का हवाला दिया तो उस ने कहा, ‘‘निकाह तो एक रस्म अदायगी थी. निकाह तो मैं ने ना जाने कितने किए हैं.’’

अब मैं ऐसे अंधियारे गलियारे से गुजर रही थी, जहां रोशनी की किरणें भी रोशनी की मोहताज थीं. उस दिन मैं उस के काले धंधे में नहीं गई तो उस ने मेरी जम कर पिटाई की. उस ने कहा, ‘‘तू किसी की नहीं हो सकती. मेरे झूठे फोन पर तू सागर को छोड़ कर यहां आ गई. अब किसी और के फोन आएंगे तो तू उस के साथ भाग जाएगी. औरत का नाम ही बेवफा है.’’

‘‘क्या कहा तुम ने, वह फोन तुम करते थे? इस का मतलब मेरा सागर बेवफा नहीं था? मेरी खूबसूरती देख कर तुम ने मुझे बरगलाया? कमीने कहीं के.’’ कह कर मैं असलम पर झपटी तो उस ने मुझे धक्का दे दिया. मैं गिरी तो मेरे सिर से खून का फव्वारा फूट पड़ा. सागर और बच्चों को याद कर के मैं रोने लगी.

मजबूर जिंदगी किसी भी बदलाव का स्वागत नहीं कर सकती. तेज आंधियां मुझे बुझाने का जतन कर रही थीं. अब तो वैसे भी अंधेरे से दोस्ती हो गई थी. इस अंधेरे के खिलाफ जेहाद करना मेरे बस में नहीं रह गया था. विश्वास की माला टूट चुकी थी और मनके बिखर चुके थे.

इतनी चोट खाने के बाद भी मैं किसी तरह उठी. असलम के जाने के पदचाप मुझे राहत दे रहे थे. आज इतने सालों बाद मैं ने अपने घर फोन किया. उधर से सागर ने फोन उठाया. घबराहट और शर्मिंदगी भरे लहजे में मैं ने कहा, ‘‘मैं शबनम…’’

‘‘कौन शबनम…? उसे मरे तो एक अरसा गुजर गया है. आज मेरी बेटी की शादी है, थोड़ा जल्दी में हूं.’’

कह कर सागर ने फोन काट दिया.

मेरी जैसी चरित्रहीन औरतों का शायद यही हश्र होता है. जबजब औरतों ने लक्ष्मण रेखा लांघी है, वह तबाही ही लाई है.

लक्ष्मण रेखा लांघने का परिणाम – भाग 1

‘‘कमबख्त, कमीनी किसे फोन कर रही थी? हिंदुस्तान कर रही थी ना? अगर तुझे उन  पिल्लों से इतनी ही मोहब्बत थी तो यहां मरने क्यों चली आई? अगर तेरी हरकतें ऐसी ही रहीं तो तू एक न एक दिन मुझे जेल भिजवा कर रहेगी.’’ कह कर असलम ने मेरे हाथ से रिसीवर ले कर पटक दिया और मुझे ऐसा धक्का दिया कि मैं सिर के बल गिर पड़ी.

इस के बाद मुझे गंदीगंदी गालियां देते हुए बाहर से ताला लगाया और सीढि़यां उतर गया. असलम जितना चालाक था, उतना ही फुर्तीला और ताकतवर भी था. वह गले तक काले धंधों में डूबा था. अमेरिका की पुलिस सरगर्मी से उस की तलाश कर रही थी. मेरी बदकिस्मती यह थी कि उस के हर जुर्म में मैं बराबर की हिस्सेदार थी. यही एक वजह थी कि चाह कर भी मैं उस के घर से निकल नहीं पा रही थी.

मेरे पास अब आंसू बहाने के अलावा दूसरा कोई उपाय नहीं था? इस के लिए मैं किसी और को दोष भी नहीं दे सकती थी. मैं ने जो किया था, उसर की सजा मुझे मिल रही थी.

असलम जिसे मैं ने जीजान से चाहा था, जिस के लिए मैं ने अपना घर, पति और तीन प्यारेप्यारे मासूम बच्चों को भुला दिया था, आज वही असलम मुझ से इस तरह बदसलूकी करेगा, मैं ने सपने में भी नही सोचा था. जब से मैं अमेरिका आई हूं, तब से मेरा यही हाल है. ताले में बंद रहना और उस के हर नाजायज धंधे में शामिल होना.  मेरी खूबसूरती का इस से अच्छा इस्तेमाल और क्या हो सकता था. हर वह काम, जो असलम वर्षों में नहीं कर सका था, उसे मैं ने चुटकी बजा कर अपनी खूबसूरत अदाओं से कर दिया था.

मैं जब भी भागने की कोशिश करती, वह बेरहमी से मेरी पिटाई करता. उस की गिरफ्त से निकलना मेरे लिए नामुमकिन था. लेकिन मैं हिम्मत हारने वालों में नहीं हूं, मैं एक बार, सिर्फ एक बार अपने उन मासूम बच्चों को सीने से लगा कर प्यार करना चाहती हूं, जिन्हें 10 साल पहले मैं असलम के प्यार में पागल हो कर हिंदुस्तान छोड़ आई थी.

बच्चों की याद त्रिशूल बन कर मुझे सालती रहती थी. मैं जब भी तनहा होती थी, तीनों बच्चों के चेहरे मेरी आंखों के सामने तैरने लगते थे. जब मैं उन्हें छोड़ कर आई थी, सृष्टि 9 साल की थी, बबलू 4 साल का और दीपू 2 साल का. तीनों बच्चे मेरे सीने से चिपट कर सोते थे. कितनी मशगूल जिंदगी थी वह  मेरी. एकएक बातें किताब के पन्नों की तरह खुलने लगी थीं.

सृष्टि और बबलू सुबह 7 बजे ही स्कूल चले जाते थे. उन के लिए टिफिन बनाना, उन्हें तैयार करना, बच्चों को स्कूल भेज कर घर की साफसफाई करना और दोनों समय के खाने में दिन कैसे बीत जाता, पता ही नहीं चलता था.  और आज मैं विदेश में अकेली बैठी हूं. चारों ओर कुहासा और बर्फ से ढकी चोटियां हैं. मैं ऐसे दलदल में फंसी हूं, जहां से चाहूं तो भी नहीं उबर सकती.

शुरू से ही आशावादी व भरपूर जीवन जीने की मैं आदी थी. एक मस्त हिरनी की तरह कुलांचे भरना मेरी फितरत थी. 3 बच्चों की मां होने के बावजूद मुझ में चंचलता पहले जैसी ही थी. घर का काम निपटा कर मैं पूरे मन से अपना शृंगार करती और 5 बजते ही मैं लौन में चहलकदमी करने लगती. आतेजाते मर्द जब मुझ पर चाहतभरी निगाह डालते तो मैं उसे अपनी तारीफ और उपलब्धि समझ कर फूली न समाती. मेरे गालों पर मोगरे के फूल दहकने लगते.

इसी चंचल स्वभाव की वजह से 16 साल की उम्र में ही मैं सागर से प्यार कर बैठी थी. कैंब्रिज स्कूल में हम दोनों साथ पढ़ते थे. रोजरोज मिलने से हमारी दोस्ती जल्दी ही प्यार में बदल गई. मैं उसे बेपनाह मोहब्बत करने लगी. हर पल मेरी जुबान पर उसी का नाम होता. हम जब भी मिलते, अपने आशियाने के सपने संजोते. वह भी शिद्दत से मेरा दीवाना था.

उस की दीवानगी को देखते हुए एक दिन मैं ने अपनी मां को सब कुछ बता कर कहा कि ‘मैं सागर से ही शादी करूंगी और जल्दी ही करूंगी.’ मां ने बहुत समझाया. पापा ने भी कहा कि पहले पढ़ाई पूरी कर लूं, उस के बाद मैं जो कहूंगी, वह वही करेंगे. मैं ने घर से भाग जाने की धमकी दी. मेरे उद्दंड स्वभाव के आगे किसी की न चली और लाख पहरों के बावजूद मैं ने घर से भाग कर सागर से शादी कर ली. शायद आज यही मेरे जीवन की सब से बड़ी भूल साबित हुई.

मैं ने मांबाप की मरजी के खिलाफ जो कदम उठाए, उस से फिर कभी मैं उन की दहलीज पर लौट नहीं सकी. सागर का जुनून और दिलफरेब मोहब्बत नकली हीरे से कम नहीं थी. बीवी और महबूबा में एक बुनियादी फर्क होता है. इसी बुनियादी फर्क के तहत मेरी हदें निश्चित कर दी गईं.

शादी के बाद सागर पूरी तरह से मेरा हो गया था, इसलिए तनमन से मैं उस की सेवा करने लगी. दिनरात मैं उस के प्यार में डूबी रहने लगी. अपनी किस्मत पर मुझे रश्क आने लगा था कि इतनी बड़ी कोठी का एकलौता वारिस मुझ पर सौ जान से फिदा है. ईश्वर ने मुझे रूप भी ऐसा दिया था कि जो भी देखता, ठगा सा देखता रह जाता. दूध में केसर डाल कर जो रंग आता है, उस रंग की काया पर कमर तक झूलते काले स्याह बाल, लंबा कद. लेकिन जल्दी ही हमारी मोहब्बत का सुरूर बुलबुले की तरह खत्म हो गया.

परदा उठते ही जो हालात सामने आए, वे मेरी जिद और नासमझी के अंजाम थे. अपने मांबाप के जिंदगी भर के तजुर्बे को ठुकरा कर मैं ने जो प्रेमविवाह किया था, उस में सीरत वाला पहलू पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया था. शायद प्रेमविवाह में ऐसा ही होता है. सूरत इस में अहम होती है. सागर की शानदार पर्सनैल्टी की मैं दीवानी सी हो गई थी. मेरे मांबाप, भाई जब कभी उस के खिलाफ कुछ कहते, मैं नाराज हो कर घंटों रोती रहती और भूख हड़ताल कर बैठती. प्यार में अंधी हो कर मैं सच सुनना नहीं चाहती थी.

सागर एक 5 स्टार होटल के डिस्कोथैक का मैनेजर था, जहां रातें शराबशबाब में डूबी रहती थीं. उस की ड्यूटी रात की होती थी. वह सुबह घर आता तो बेहद थका और टूटा हुआ होता. आते ही बिस्तर पर ढेर हो जाता. पूरे दिन सोता. शाम को उठता और फ्रैश हो कर होटल चला जाता.

इस तरह महीनों हमारे बीच कोई बातचीत न होती. अगर कभी मैं कुछ कह देती तो उस के मुंह में ऊलजुलूल जो आता, कहने लगता. उस की इन बातों से हम दोनों के बीच एक ऐसी खाईं बनती चली गई, जिसे पाटना नामुमकिन सा हो गया. मैं समझ गई कि यह बड़े बाप की वह बिगड़ी हुई औलाद है. मैं घुटघुट कर जीने लगी.

उसी घुटन में एक दिन मैं सो रही थी कि अचानक मेरे फोन की घंटी बजी. फोन करने वाले ने कहा, ‘‘आप मुझे नहीं जानतीं, लेकिन मैं आप को अच्छी तरह जानता हूं. मैं आप का शुभचिंतक हूं, इसलिए आप को चेता रहा हूं कि आप अपने पति पर नजर रखिए. आजकल वह रेशमा नाम की खूबसूरत लड़की के साथ अकसर नाचतेगाते, खातेपीते नजर आते हैं.’’

मैं सागर से वैसे ही परेशान थी, इस गद्दारी से मैं बिफर उठी. उस दिन हम दोनों के बीच काफी कहासुनी हुई. सागर ने सारे आरोपों को गलत बताया. लेकिन शक का जहर मेरी नसनस में फैल चुका था. वह अजनबी न जाने मेरा हमदर्द था या खैरख्वाह या दुश्मन, जो मेरा अच्छा सोच रहा था. इस के बाद उस ने मुझे न जाने कितने फोन किए. हर फोन में सिर्फ सागर की बुराई होती. सागर सुबह आता तो शराब की बू से कमरा भर जाता. मेरे नाम से उसे चिढ़ सी हो गई थी.

मेरा हर मशवरा उसे नागवार गुजरता. सागर की रात की ड्यूटी से मेरा और बच्चों का जीवन घर की चारदीवारी में कैद हो कर रह गया था. पति, 3 बच्चे और सासससुर की जिम्मेदारी उठातेउठाते मैं चिड़चिड़ी और बेरहम होती गई. जिस तरह बिना पानी के धरती सूखती जाती है, प्यार के बिना कुछ वैसी ही हालत मेरी हो गई थी. मैं प्यार के 2 बोल सुनने के लिए तरसती रहती थी.