देह की राह के राही – भाग 2

25 वर्षीया सुमन सिंह अपने 3 साल के बेटे तनुष के साथ उत्तर प्रदेश के जिला गाजियाबाद के नंदग्राम में मंजू शर्मा के मकान में किराए पर रहती थी. उस के मकान का किराया 3 हजार रुपए महीना था. उस के पिता नत्थू सिंह अपनी पत्नी विमलेश और 4 बच्चों के साथ गाजियाबाद के इंद्रापुरम के न्यायखंड-3 में रहते थे.

नत्थू सिंह मूलरूप से मुरादनगर के रहने वाले थे. जहां वह चाट का ठेका लगाते थे. यह उन का पुश्तैनी धंधा था. गाजियाबाद आ कर भी उन्होंने अपने इसी काम को तरजीह दी और यहां वह अपना चाट का ठेला अपने एकलौते बेटे की मदद से न्यायखंड की मेन बाजार में लगाने लगे. यहां भी उन का धंधा बढि़या चल रहा था.

बच्चों में सुमन सब से बड़ी थी, इसलिए मांबाप की कुछ ज्यादा ही लाडली थी. लाड़प्यार से वह जिद्दी होने के साथसाथ बेलगाम भी हो गई थी. चाट के ठेले से इतनी कमाई नहीं होती थी कि नत्थू सिंह अपने बच्चों को उच्च शिक्षा दिला पाते. लेकिन ऐसा भी नहीं था कि उस के बच्चे अनपढ़ थे. जरूरत भर की शिक्षा उस ने सभी को दिला रखी थी.

कहा जाता है कि बेटी के सयानी होने की जानकारी मातापिता से पहले पड़ोसियों को हो जाती है. नत्थू सिंह की बेटी सुमन भी सयानी हो गई थी, बेटी वैसे ही जिद्दी और बेलगाम थी. कोई ऊंचनीच हो, नत्थू सिंह और विमलेश उस से पहले ही उस के हाथ पीले कर उसे विदा कर देना चाहते थे.

विमलेश ने जब इस बारे में नत्थू सिंह से बात की तो उस ने कहा, ‘‘मैं तो पूरा दिन घर से बाहर काम में लगा रहता हूं. अगर तुम्हीं कोई ठीकठाक लड़का देख कर शादी तय कर लो तो ज्यादा ठीक रहेगा. मेरे आनेजाने से नुकसान ही होगा.’’

इस तरह नत्थू सिंह ने यह जिम्मेदारी पत्नी पर डाल दी. विमलेश तेजतर्रार थी. इसलिए उस ने कहा, ‘‘ठीक है, मैं ही कुछ करती हूं.’’

विमलेश ने कहा ही नहीं, बल्कि लड़के की तलाश भी शुरू कर दी. उस ने अपने तमाम रिश्तेदारों एवं परिचितों से सुमन के लायक लड़का बताने के लिए कह दिया.

विमलेश की यह कोशिश रंग लाई और जल्दी ही इस का सुखद नतीजा सामने आ गया. किसी से उसे पता चला कि गांव के रिश्ते की एक मौसी का एकलौता बेटा परवीन शादी लायक है. वह दिल्ली नगर निगम के उद्यान विभाग में माली था. उस के पिता सहदेव की मौत हो चुकी थी. यहां वह परिवार के साथ फरीदाबाद के लक्कड़पुर में रहता था.

सरकारी नौकरी वाला लड़का था, वेतन तो ठीकठाक था ही, उस के साथ भविष्य भी सुरक्षित था. यही सोच कर नत्थू सिंह और विमलेश ने परवीन के साथ सुमन की शादी फरवरी, 2008 में अपनी हैसियत के हिसाब से दहेज दे कर कर दी.

विदा हो कर सुमन ससुराल आ गई. तेजतर्रार, सपनों में जीने वाली सुमन ने जैसे पति की कामना की थी, परवीन उस का एकदम उलटा था. साधारण शक्लसूरत वाला परवीन बहुत ही सीधा था. वह न तो किसी से ज्यादा बातचीत करता था और न ही किसी से ज्यादा मेलजोल रखता था. अपने काम से काम रखने वाले परवीन का रवैया पत्नी के प्रति भी ऐसा ही था. शादी के बाद भी उस की इस आदत में कोई बदलाव नहीं आया तो सुमन परेशान रहने लगी.

सुमन तो अपनी ही तरह का खुशमिजाज पति चाहती थी, जो खुद भी हंसताबोलता रहे और दूसरों को भी बोलबोल कर हंसाता रहे. शाम को साथ घूमने जाने को कौन कहे, परवीन घर में भी सुमन से प्यार के 2 शब्द नहीं बोलता था. जब तक घर में रहता, मौनी बाबा की तरह चुप बैठा रहता. बोलता भी तो सिर्फ जरूरत भर की बात करता. पति की इस आदत से सुमन जल्दी ही ऊब गई.

सुमन को परवीन के साथ जिंदगी बोझ लगने लगी और घुटन सी होने लगी तो वह उसे छोड़ कर मायके आ गई. हालांकि अब तक वह परवीन के 2 बच्चों की मां बन चुकी थी. उस की 5 साल की बेटी तनु थी और 3 साल का बेटा तनुष. मात्र 6 साल ही उस का यह वैवाहिक संबंध चला था.

सुमन के घर वालों ने ही नहीं, परवीन के घर वालों ने भी बहुत कोशिश की कि परवीन और सुमन एक बार फिर साथ आ जाएं, लेकिन सुमन इस के लिए कतई तैयार नहीं हुई. दोनों बच्चे भी उसी के साथ थे. नत्थू सिंह का अपना छोटा सा मकान था, जिस में 9 लोग नहीं रह सकते थे. इस के अलावा सुमन को पता था कि मांबाप के घर से विदा होने के बाद अगर किसी वजह से बेटी वापस आ जाती है तो उसे पहले जैसा सम्मान नहीं मिलता.

सुमन के आने से रहने में तो परेशानी हो ही रही थी, मांबाप पर खर्च का बोझ भी बढ़ गया था. इसलिए अपने और बच्चों के गुजरबसर के लिए उस ने जोरशोर से नौकरी की तलाश शुरू कर दी. परिणामस्वरूप जल्दी ही उसे गाजियाबाद की एक गारमेंट फैक्टरी में ‘पैकर’ की नौकरी मिल गई. रोजीरोटी का जुगाड़ हो गया तो समस्या आई रहने की, क्योंकि उस छोटे से घर में उतने लोगों का रहना मुश्किल हो रहा था.

सुमन की मां विमलेश ने गाजियाबाद के ही नंदग्राम इलाके में रहने वाली अपनी एक मुंहबोली बहन बबिता उर्फ पारो से बात की तो उस ने अपनी जिम्मेदारी पर मंजू शर्मा के मकान में पहली मंजिल के हिस्से को 3 हजार रुपए महीने के किराए पर दिला दिया. सुमन उसी मकान में अपने 3 वर्षीय बेटे तनुष के साथ रहने लगी, जबकि बेटी मांबाप के साथ रहती थी.

सुमन की जिंदगी पटरी पर आ रही थी कि एकाएक उस की नौकरी चली गई, जिस से जिंदगी की गाड़ी एक बार फिर पटरी से उतर गई. सुमन के लिए यह बहुत बड़ा झटका था. नौकरी चली जाने से वह आर्थिक परेशानियों में घिर गई. अब उसे मकान का किराया भी देना पड़ रहा था  मातापिता भी कब तक सहारा देते. संकट की इस घड़ी में एक बार फिर सहारा दिया मुंहबोली मौसी बबिता ने. उसी ने सुमन की दोस्ती धूकना गांव के रहने वाले राजीव त्यागी से करा दी, जो उस का पूरा खर्च उठाने लगा.

राजीव त्यागी के पिता सत्येंद्र त्यागी की नंदग्राम में बिजली के सामान की दुकान थी, जिसे बापबेटे मिल कर चलाते थे. दुकान ठीकठाक चलती थी, इसलिए राजीव के पास पैसों की कमी नहीं थी. पैसे वाला होने की वजह से सुमन का खर्च उठाने में उसे कोई दिक्कत नहीं हो रही थी.

राजीव और सुमन का लेनदेन का यह संबंध प्यार में बदला तो सुमन को लगने लगा कि राजीव उस से शादी कर लेगा. वह राजीव से शादी करना भी चाहती थी, क्योंकि राजीव ठीक वैसा था, जैसा पति वह चाहती थी. लेकिन वह राजीव की पत्नी बन पाती, उस के पहले ही 3 जून, 2014 को उस की हत्या हो गई.

रात 9 बजे के आसपास मकान मालकिन मंजू शर्मा किसी काम से पहली मंजिल पर गईं तो उन्होंने देखा, सुमन का कमरा खुला पड़ा है. उन्होंने कमरे में झांका तो दरवाजे के पास ही वह चित पड़ी दिखाई दी. उस की चुन्नी गले में लिपटी थी, इसलिए उन्हें समझते देर नहीं लगी कि उस की हत्या की गई है. उन्होंने इस बात की जानकारी पड़ोसियों को दे कर सुमन की हत्या की सूचना पुलिस कंट्रोल रूम को दिला दी.

पंजाब की डाकू हसीना – भाग 2

इंसपेक्टर अरविंद सिंह ने इस की जानकारी सीपी मनदीप सिंह सिद्धू को दी. थोड़ी देर बाद जिले के तमाम पुलिस अफसर, एफएसएल टीम और मीडिया मौके पर पहुंच गई थी. पुलिस अब इस बात की खोजबीन करने में जुट गई थी कि बदमाश वाहन यहीं क्यों छोड़ कर फरार हुए? किनकिन रास्तों से होती हुई ये वैन यहां तक पहुंची?

पुलिस ने जहांजहां संभावना थी, वहां के सीसीटीवी की फुटेज खंगाली मगर फुटेज में इस की कहीं तसवीर नहीं दिखी थी. इस से पुलिस का शक पुख्ता हो गया कि बदमाशों ने राष्ट्रीय राजमार्ग इस्तेमाल करने के बजाए गांव के रास्तों का इस्तेमाल किया था ताकि पुलिस उन तक किसी कीमत में न पहुंच सके. कुल मिला कर इस घटना ने पुलिस महकमे को हिला कर रख दिया था. पूरे दिन की जांच का कोई खास नतीजा नहीं निकला था. मतलब ये था पुलिस की जांच जहां से चली थी, वहीं आ कर खड़ी थी.

कर्मचारी मनजिंदर पर हुआ शक

अगले दिन यानी 11 जून, 2023 को पुलिस को एक चौंकाने वाली जानकारी मिली. सीएमएस कंपनी में करीब 300 कर्मचारी काम करते थे. पुलिस ने सभी वर्कर्स को सख्त हिदायत दे रखी थी कि जब तक घटना का खुलासा नहीं हो जाता, तब कोई भी वर्कर न तो छुट्टी करेगा और न ही शहर छोड़ कर बाहर जाएगा. ऐसे में कंपनी का एक पुराना कर्मचारी मनजिंदर सिंह उर्फ मनी निवासी अब्बुवाल थाना डेहलो, लुधियाना काम पर नहीं आया था और घटना वाले दिन भी घर पर नहीं था. और तो और उस का फोन भी बंद आ रहा था.

प्रबंधक प्रवीण ने इस की जानकारी एडिशनल पुलिस कमिश्नर शुभम अग्रवाल को दे दी थी. एडिशनल सीपी अग्रवाल ने इंसपेक्टर सिंह को उस पर कड़ी नजर रखने की सख्त हिदायत दी, क्योंकि कंपनी में घटित घटना के बाद से उस का हावभाव कुछ अलग तरीके का ही दिख रहा था. ये बात मैनेजर प्रवीण को पता नहीं क्यों अजीब लग रही थी, इसीलिए उन्होंने इस की जानकारी पुलिस को दे दी थी.

अब तक तक की जांच में पुलिस के शक की सूई बारबार वहीं जा कर टिक जा रही थी, जहां से संदिग्ध हालत में सीएमएस की कैश वैन बरामद की गई थी. पुलिस को अनुमान था कि लूटकांड से जुड़े लुटेरे इसी इलाके के इर्दगिर्द होंगे या छिपे होंगे. उस के बाद पुलिस ने उस इलाके के चारों ओर अपने मुखबिरों का जाल फैला दिया.

इस का सकारात्मक रिजल्ट पुलिस को मिला भी. मुखबिरों द्वारा पुलिस को सूचना मिली की कैश वैन बरामद स्थल से करीब 5 किलोमीटर की रेंज में कुछ लुटेरों की हलचल दिखी है, अगर सतर्कता बरती जाए तो लुटेरे काबू में किए जा सकते हैं. मुखबिर की इस सूचना के बाद पुलिस और ज्यादा सक्रिय हो गई थी और सादे वेश में जगरांव गांव में चारों तरफ फैल गई थी.

मुखबिर की निशानदेही पर गांव के बाहर झुरमुट में 2 युवक छिपे दिखे तो पुलिस ने दोनों युवकों, जिन की उम्र 25 से 30 के करीब थी, को हिरासत में ले ली. उन से मौके पर ही कड़ाई से पूछताछ करनी शुरू की. क्योंकि खबरी ने पुलिस को पक्की जानकारी थी कि लूटकांड के 2 आरोपी उक्त जगह छिपे बैठे हैं और उन के पास बड़ी रकम भी मौजूद है, जिसे काले रंग के पौलीथिन रख कर एक गड्ढे के भीतर छिपा रखे हैं.

दोनों आरोपियों ने खोल दिया डकैती का राज

कड़ाई से की गई पूछताछ में दोनों युवकों ने अपना नाम मंदीप सिंह उर्फ विक्की और हरविंदर सिंह उर्फ लंबू बताया. दोनों युवक कोठे हरिसिंह गांव के थे. पुलिस ने दोनों पर जब थोड़ी लगाम और कसी तो उन्होंने डर के मारे ऐसे राज उगल दिए, जिसे सुन कर पुलिस वाले ऐसे उछले थे जैसे उन्होंने बहुत बड़ी जंग फतह कर ली हो.

पुलिस के सामने विक्की और लंबू दोनों हाथ जोड़े गिड़गिड़ा उठे कि उन्हें मारना मत, वह सब सचसच बता देंगे. उस के बाद दोनों में से एक विक्की ने गड्ढे खोद कर उस में छिपा कर रख काले रंग की 2 पौलीथिन निकाल कर उन की ओर बढ़ा दीं. पुलिस वालों ने जल्दीजल्दी पौलीथिन खोल कर देखी तो उन के होश उड़ गए थे. दोनों पैकेट में 500-500 रुपए की गड्डियां थीं. ये वही रकम थी, जो 2 दिन पहले सीएमएस कंपनी में डकैती के दौरान उन्होंने लूटी थी.

एक पैकेट में 500 रुपए के 10 बंडल तो दूसरे पैकेट में 500 रुपए के 15 बंडल थे. हरेक बंडल में 5 लाख रुपए थे, जो प्लास्टिक की रस्सी से अलगअलग बंधे हुए थे. यह कुल रकम 1 करोड़ 25 लाख रुपए की हो रही थी, जिस में 75 लाख रुपए लंबू के थे और 50 लाख रुपए विक्की के थे.

मतलब मुखबिर ने पुलिस को जो सूचना दी थी शत प्रतिशत पक्की थी. 7 करोड़ रुपए लूट के असल आरोपी पुलिस के हाथ लग चुके थे. यह देख पुलिस की खुशी का ठिकाना नहीं था, पुलिस रुपए से भरे पैकेट और दोनों आरोपियों को अपने कब्जे में ले कर सराभा थाने ले आई.

दोनों आरोपियों से गहन पूछताछ शुरू की तो 7 करोड़ डकैती का पूरा मामला खुल कर सामने आ गया, लेकिन पुलिस ने इस बात को अतिगोपनीय ही रखा, ताकि मामला लीक न हो सके, नहीं तो बाकी के आरोपी फरार हो सकते थे.

खैर, इंसपेक्टर अरविंद सिंह ने लूटकांड के 2 आरोपियों के सवा करोड़ रुपए के साथ गिरफ्तार करने और मामले का खुलासा होने की सूचना कप्तान मनदीप सिंह सिद्धू को दिया तो वे खुशी से उछल उठे. इस के बाद उन्होंने उन्हें कुछ खास हिदायत दी और जौइंट पुलिस कमिश्नर सौम्या मिश्रा, एडिशनल पुलिस कमिश्नर शुभम अग्रवाल को आरोपियों से आगे की पूछताछ के लिए थाने भेज दिया.

अन्य आरोपियों की हुई धड़ाधड़ गिरफ्तारी

अपने कप्तान का आदेश पा कर दोनों अधिकारी थाने पहुंच कर गिरफ्तार किए गए दोनों आरोपियों विक्की और लंबू से कड़ाई से पूछताछ शुरू की तो पूरा मामला परत दर परत खुलता गया. पूछताछ में विक्की और लंबू ने बताया कि लूटकांड की मास्टरमाइंड मनदीप कौर उर्फ मोना उर्फ डाकू हसीना है. उसी के इशारे पर यह डकैती डाली गई थी. मोना का साथ सीएमएस कंपनी में काम करने वाले कर्मचारी मनजिंदर सिंह उर्फ मनी ने दिया था. इस के अलावा 6 और लोग घटना में शामिल थे.

सनद रहे, पुलिस का शक पहले से ही मनजिंदर सिंह पर शक था. उस के बाद पुलिस ने दोनों आरोपियों की निशानदेही पर अब्बुवाल से मनजिंदर सिंह उर्फ मनी को गिरफ्तार कर उस से डेढ़ करोड़ रुपए, परमजीत सिंह उर्फ पम्मा को गिरफ्तार कर उस के पास से 25 लाख रुपए, नरिंदर सिंह उर्फ हैप्पी को गिरफ्तार उस से 25 लाख रुपए और हरप्रीत सिंह को गिरफ्तार कर उस के पास से 25 लाख रुपए कैश बरामद किया.

उक्त चारों से पूछताछ के बाद पता चला कि अरुण कुमार कोच नामक एक और आरोपी के घर के पास खड़ी क्रूज गाड़ी में 2 करोड़ 25 लाख रुपए रखे हैं. पुलिस इन की निशानदेही पर क्रूज गाड़ी और उस में से एक करोड़ 55 लाख रुपए ही बरामद कर सकी थी. कार का शीशा तोड़ कर किसी ने 70 लाख रुपए गायब कर दिए थे.

6 आरोपियों से पुलिस ने कुल 5 करोड़ 7 सौ रुपए बरामद किए थे. इन 6 के अलावा 5 और आरोपी मनदीप कौर उर्फ मोना उर्फ डाकू हसीना, उस का पति जसविंदर सिंह, अरुण कुमार कोच, आदित्य कुमार उर्फ नन्नी और गौरव कुमार उर्फ गुलशन अभी भी पुलिस की पकड़ से बहुत दूर थे.

ऐसे पकड़ में आई डाकू हसीना

इन आरोपियों के पास कितनी नकदी है, किसी को पता नहीं था. अलबत्ता पुलिस कमिश्नर सिद्धू ने मास्टरमाइंड मनदीप कौर और उस के पति को गिरफ्तार करने के लिए सीआईए (काउंटर इनवैस्टीगेशन एजेंसी) के प्रभारी बेअंत जुनेजा और इंसपेक्टर कुलवंत सिंह को लगा दिया था.

प्रेमिका बनी ब्लैकमेलर

तुझे राम कहें या राक्षस – भाग 1

‘‘बेटी, कब तक मुझ बूढ़ी की तीमारदारी में अपनी जिंदगी खराब करती रहेगी. मेरी मान तो कोई अच्छा सा लडक़ा देख कर शादी कर ले और अपना घर बसा ले, मेरा क्या है, आज हूं कल नहीं. मैं चैन से तभी मर पाऊंगी, जब तेरा बसा हुआ घर देख लूंगी.’’

प्रोफेसर मृणालिनी (बदला हुआ नाम) जब थकीहारी कालेज से घर लौटती थीं तो उन्हें रोज किसी न किसी रूप में मां के इसी तरह के शब्द सुनने को मिलते थे. धीरेधीरे स्थिति यह हो गई थी कि मां जिस दिन ऐसी कोई बात नहीं कहती थीं, मृणालिनी को उन की तबीयत खराब होने का अंदेशा होने लगता था. 37 वर्षीया मृणालिनी इंदौर के एक नामी कालेज में प्रोफेसर थीं और एरोड्रम इलाके में रहती थीं.

पिता की मौत के बाद मृणालिनी ने मां की सेवा करने की ठान ली थी. ठान ही नहीं ली थी, बल्कि ऐसा कर भी रही थीं. घर में कोई और नहीं था, जो मां की देखभाल कर पाता. ऐसे में मृणालिनी को यह ठीक नहीं लगा कि वह मां को उन के हाल पर अकेला छोड़ कर शादी कर लें और ससुराल चली जाएं. इसलिए वह शादी, प्यार, रोमांस और घरगृहस्थी जैसे लफ्जों को भूल कर बेटे की भूमिका में आ गईं थीं. उन्होंने मां की सेवा और देखभाल को ही अपनी जिंदगी का मकसद बना लिया था.

लेकिन बूढ़ी मां की अपनी अलग परेशानी थी, वह नहीं चाहती थीं कि उन की वजह से अच्छीखासी पढ़ीलिखी और सुंदर बिटिया अविवाहित रह जाए. इसलिए वे तरहतरह से उस पर शादी के लिए दबाव बनाती रहती थीं.

मृणालिनी जैसी मिसाल कायम करने वाली दृढ़विश्वासी बेटियों की समाज में कमी नहीं है, जो अपने सुख से ज्यादा मांबाप की सेवा को प्राथमिकता देती हैं, भले ही उन्हें तन्हा जिंदगी क्यों न गुजारनी पड़े. पिछले कुछ दिनों से जैसेजैसे मां की जिद बढ़ती जा रही थी, उसे देख कर मृणालिनी भी सोचने को मजबूर हो गई थीं.

कभी मृणालिनी शादी के बारे में सोचतीं तो वह भी अन्य युवतियों की तरह अल्हड़ युवती में तब्दील हो जातीं. एक ऐसी युवती जो अपने लिए सुहाने सपने देखती है, पति के साथ घूमतीफिरती है, होटलों और मौल में जाती है. दूरदराज के पर्यटनस्थल पर अपने जीवनसाथी के हाथ में हाथ डाले रूमानी बातें करती हैं.

मृणालिनी चूंकि परिपक्व और जिम्मेदार थीं, इसलिए जल्द ही ऐसे ख्वाबोंखयालों को झटक देती थीं और मां के पास बैठ कर बतियाने लगती थीं. ज्यादा बोरियत होने पर वह सहेलियों से फोन पर बातें कर लेती थीं या फिर टीवी पर अपने पसंदीदा सीरियल देखने बैठ जाती थीं. उन से भी जी भर जाता था तो वह पत्रपत्रिकाओं के पन्ने पलटने लगती थीं.

मृणालिनी की सोच में आ रहा यह बदलाव आखिरकार उन के इरादों पर भारी पड़ा. हालांकि उन की सोच यह थी कि कोई कमाऊ जीवनसाथी मिल जाए तो मां की सेवा और देखभाल की जिम्मेदारी भी पूरी होती रहेगी और गृहस्थी भी बस जाएगी. भले ही वह साथ क्यों न रहें. लेकिन यह महज सोचने भर की बात थी, क्योंकि अभी तक कोई ऐसा प्रस्ताव नहीं आया था. खुद मृणालिनी ने भी अपनी तरफ से इस तरह की कोई पहल नहीं की थी.

जब अरमानों और जज्बातों की लड़ाई में अरमान भारी पडऩे लगे तो बीते साल जून के महीने में मृणालिनी ने यह सोचते हुए एक अखबार में अपनी शादी का विज्ञापन दे दिया कि ढंग का कोई जीवनसाथी मिला तो ठीक, नहीं मिला तो कोई बात नहीं. विज्ञापन देते वक्त एक तरह से उन्होंने उम्मीद के साथ नाउम्मीदी के लिए भी खुद को तैयार कर लिया था.

विज्ञापन का वाजिब असर हुआ. उस के छपते ही मृणालिनी के मोबाइल पर धड़ाधड़ प्रस्ताव आने लगे. लेकिन हर आने वाले फोन के साथ उन का उत्साह ठंडा पडऩे लगा. वजह यह थी कि आने वाले अधिकांश प्रस्ताव उन की चाहत के अनुरूप नहीं थे. कोई तलाकशुदा था तो कोई विधुर, उन में से भी अधिकतर बच्चों वाले थे.

कुछ प्रस्तावों पर तो उन्होंने साफ महसूस किया कि प्रस्ताव भेजने वाले की नजर उन के अच्छेभले वेतन, पद और घर पर थी. कुछ ऐसे फोन भी आए, जिन में उम्मीदवार करता धरता कुछ नहीं था, बस पुरुष भर होना ही उस की योग्यता थी. सलीके के अगर कुछ प्रस्ताव आए भी तो उन्होंने यह जान कर आगे दिलचस्पी नहीं ली कि मृणालिनी के घर उन के अलावा सिर्फ एक बूढ़ी मां हैं.

इस सब से मृणालिनी की समझ में आ गया था कि इस उम्र और हालात में अपनी पसंद के व्यक्ति से शादी करना आसान नहीं है. लिहाजा उन्होंने उम्मीद का दामन छोडऩे की सोच ली. तभी जबलपुर से एक फोन आया. फोन करने वाला राहुल दीक्षित नाम का व्यक्ति था, जिस ने अपना परिचय पूरे आत्मविश्वास और आत्मीयता से दिया था.

राहुल ने खुद को जबलपुर के एक बड़े कारोबारी का एकलौता बेटा बताते हुए मृणालिनी से कहा था कि चूंकि उसे अब तक कोई मनपसंद लडक़ी नहीं मिली, इसलिए शादी नहीं की. दोनों के बीच इधरउधर की कुछ और भी औपचारिक बातें हुईं. फोन पर मृणालिनी की मां ने भी राहुल से बात की.

अब तक आए तमाम प्रस्तावों में से यही एक बेहतर प्रस्ताव था. लिहाजा मांबेटी ने रायमशविरा कर के राहुल को इंदौर आने का न्यौता दे दिया, ताकि आमनेसामने साफसाफ बात हो सकें और वे लडक़े को देख भी लें. इस आमंत्रण पर राहुल ने हां करते हुए कहा कि वह जल्द ही इंदौर आएगा.

चंद दिनों के बाद राहुल मृणालिनी के इंदौर स्थित घर जा पहुंचा. जिंदगी में कई बार ऐसा होता है कि आप पहली बार किसी से मिलते हैं तो यही लगता है कि जिस की तलाश थी, वही यह है. ऐसा ही कुछ मृणालिनी और उन की मां के साथ भी हुआ. राहुल से चंद घंटों की बातचीत के बाद दोनों इतनी प्रभावित हुईं कि उन्होंने रिश्ते के लिए हां कर दी.

पूरी बातचीत में राहुल ने कोई शर्त नहीं रखी थी. न ही मृणालिनी की नौकरी और वेतन पर चर्चा के अलावा लेनदेन की कोई बात की थी. अलबत्ता पढ़ेलिखे आदमी की तरह उस ने सारी जानकारी जरूर ले ली थी. यह कोई काबिलेऐतराज बात नहीं थी, क्योंकि रिश्ते के मामले में ये बातें बेहद आम और जरूरी होती हैं. मां बेटी को राहुल औरों से हट कर लगा.

पहली ही मुलाकात में बात औपचारिक से अनौपचारिक हो गई थी. जातेजाते राहुल इशारा कर गया कि उस की तरफ से तो कोई दिक्कत नहीं है. अब आगे की बात घर वाले करेंगे. इस के बाद जो हुआ, वह आजकल के हिसाब से बहुत सामान्य है. मृणालिनी और राहुल फोन पर लंबीलंबी बातें करने लगे. इन बातों में भविष्य के सपने भी होते थे. मृणालिनी की मां तो राहुल जैसा नेक और शरीफ लडक़ा पाने की कल्पना से ही खुश थीं. मांबेटी दोनों साथ बैठ कर बातें करती थीं तो यह खुशी दोगुनी हो जाती थी.

मृणालिनी राहुल को चाहने लगी थीं. वह इंतजार कर रही थीं कि उस के कहे मुताबिक उस के घर वाले बात आगे बढ़ाएं. इस बीच उस में काफी बदलाव आया था. वह खुश रहने लगी थीं और फिर से सपने देखने लगी थीं. अधेड़ उम्र की बेटी को मुद्दत बाद यूं खुश देख मां भी फूली नहीं समाती थीं. उन्हें खुशी इस बात की थी कि जीतेजी बेटी का घर बसते देख लेंगी.

कुछ दिनों बाद एक दिन अचानक राहुल परेशान और बदहवास सा मृणालिनी के घर आ पहुंचा तो मांबेटी दोनों उस की हालत देख न केवल चौंकीं, बल्कि खुद भी परेशान हो उठीं. बारबार पूछने और कुरेदने पर राहुल ने बड़ी मासूमियत से बताया कि उस के घर वाले इस शादी पर राजी नहीं हैं, इसलिए वह हमेशा के लिए घर छोड़ कर आ गया है. साथ ही उस ने यह भी बताया कि वह बिजनैस के लिए घर से 20 लाख रुपए ले कर चला था, लेकिन इटारसी जंक्शन पर उस के पैसे और सामान चोरी हो गया.

उस ने अपनी बात कुछ इस ढंग से कही थी कि मृणालिनी और उन की मां चाह कर भी उस पर अविश्वास नहीं कर पाईं. राहुल खाली हाथ था, इसलिए उसे घर में रहने की अघोषित अनुमति मिल गई.

स्पेशल 26 की तर्ज पर लाखों की ठगी

इश्क के दरिया में जुर्म की नाव – भाग 1

शशिबाला अपनी छोटी बहन सुषमा के साथ 20 मार्च, 2014 को दोपहर के समय उत्तर पूर्वी दिल्ली के थाना न्यू उस्मानपुर पहुंची. थानाप्रभारी महावीर सिंह से मुलाकात कर उस ने बताया कि उस का पति इंद्रपाल 18 मार्च से गायब है. हम ने सभी जगह देख लिया, लेकिन उन का कहीं भी पता नहीं चला.

‘‘वह कहां से लापता हुए हैं. ’’ थानाप्रभारी ने पूछा.

‘‘मैं उन्हें घर पर ही छोड़ कर गई थी. हम यहीं गौतम विहार की गली नंबर 5 में रहते हैं.’’ शशिबाला बोली.

‘‘जब उन्हें घर पर ही छोड़ कर गई थीं तो वह गायब कैसे हो गए?’’

‘‘साहब, न्यू उस्मानपुर के जयप्रकाशनगर में मेरी यह छोटी बहन सुषमा रहती है. होली के अगले दिन मैं बच्चों को ले कर इस के यहां होली मिलने चली गई थी. उस समय वह घर पर बैठे शराब पी रहे थे. जब मैं वापस आई तो वह नहीं मिले. कमरे पर ताला लगा था. मैं ने उन का फोन मिलाया, जो स्विच औफ मिला. तब मैं ने सोचा कि अपने यारदोस्तों के साथ कहीं खापी रहे होंगे. क्योंकि ऐसा वह अकसर करते रहते थे. लेकिन अब तक उन का कहीं पता नहीं चला तो मैं थाने आई हूं.’’ शशिबाला ने बताया.

शशिबाला से बातचीत करने के बाद थानाप्रभारी ने उस के पति इंद्रपाल की गुमशुदगी थाने में दर्ज करा कर जांच हेडकांस्टेबल श्रीपाल को सौंप दी. हेडकांस्टेबल श्रीपाल ने सब से पहले दिल्ली के समस्त थानों में इंद्रपाल के हुलिया के साथ उस की गुमशुदगी की सूचना वायरलेस से प्रसारित करा दी.

गौतम विहार का इलाका हेडकांस्टेबल श्रीपाल की बीट में ही आता था, इसलिए उन्होंने इलाके के लोगों से उस के बारे में छानबीन शुरू की. इस में उन्हें पता चला कि वह यारदोस्तों के साथ शराब पीने का शौकीन था.

हेडकांस्टेबल श्रीपाल को यह भी जानकारी मिली कि इंद्रपाल ने 2 कमरे किराए पर ले रखे थे, जिन में से एक कमरा उस ने टिंकू नाम के युवक को दे रखा था. इंद्रपाल उस के साथ भी खातापीता था. इंद्रपाल के गायब होने के बाद टिंकू भी लापता था. उस के कमरे पर भी ताला लटका मिला.

हेडकांस्टेबल श्रीपाल ने जो जांच की थी वह सब थानाप्रभारी को बता दी. एक की जगह 2 लोग गायब थे, इसलिए थानाप्रभारी को यह मामला संदिग्ध लगा. उन्होंने यह जानकारी अपने उच्चाधिकारियों को दे दी.

डीसीपी के निर्देश पर एसीपी अमित शर्मा को नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई गई, जिस में थानाप्रभारी महावीर सिंह, इंसपेक्टर जितेंद्र सिंह, एसआई पंकज तोमर, हेडकांस्टेबल श्रीपाल, प्रदीप शर्मा, कांस्टेबल अनिल कुमार, सोनू राठी, सचिन खोखर आदि को शामिल किया गया. पुलिस टीम सब से पहले गौतम विहार में उस कमरे पर गई, जहां इंद्रपाल और टिंकू रहते थे. पड़ोसियों ने बताया कि वे दोनों मंगलवार यानी 18 मार्च से दिखाई नहीं दिए हैं.

इंसपेक्टर जितेंद्र सिंह ने इंद्रपाल की पत्नी शशिबाला से टिंकू के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि टिंकू उसे कई दिनों से नहीं दिखा है. शशिबाला से टिंकू का मोबाइल नंबर ले कर जितेंद्र सिंह ने उसे अपने फोन से मिलाया तो उस का फोन नंबर स्विच औफ मिला. दोनों के ही फोन स्विच औफ मिलने की बात पुलिस के गले नहीं उतर रही थी.

इंद्रपाल के लापता होने की जानकारी मिलने पर उस के चाचा दिनेश कुमार और चेचरा भाई संजय कुमार भी थाना न्यू उस्मानपुर पहुंच चुके थे. उन्होंने भी पुलिस पर इंद्रपाल का जल्द से जल्द पता लगाने का दबाव बनाया. पुलिस ने उन्हें किसी तरह समझाया.

जो 2 लोग गायब थे, पुलिस के पास उन के केवल फोन नंबर थे और वे भी बंद थे, इस के अलावा पुलिस के पास ऐसी कोई चीज नहीं थी, जिस से उन दोनों के बारे में कुछ पता चल सके. पूछताछ के लिए सिर्फ इंद्रपाल की पत्नी शशिबाला ही बची थी. इंसपेक्टर जितेंद्र सिंह ने शशिबाला से मालूमात की तो उस ने वही बातें उन के समने दोहरा दी, जो पहले थानाप्रभारी को बताई थीं.

इंसपेक्टर जितेंद्र सिंह उस से पूछताछ कर रहे थे तो शशिबाला बोली, ‘‘साहब, अब मैं अपने गांव जाना चाहती हूं. मैं ने पति की गुमशुदगी की जो सूचना दर्ज कराई थी, उसे वापस लेना चाहती हूं. मैं पुलिस के किसी लफड़े में नहीं पड़ना चाहती. वह कहीं गए होंगे, अपने आप घर लौट आएंगे.’’ शशिबाला हापुड़ के पटना मुरादपुर गांव की रहने वाली थी.

शशिबाला के मुंह से यह बात सुन कर जितेंद्र सिंह चौंके कि पता नहीं यह कैसी औरत है जो पति के गुम हो जाने के बाद भी इस तरह की बातें कर रही है. उस ने एक बार भी पुलिस से यह नहीं कहा कि उस के पति का जल्द पता लगाया जाए.

पति के गायब होने पर जिस तरह कोई महिला परेशान हो जाती है, ऐसी कोई परेशानी शशिबाला के चेहरे पर नहीं दिख रही थी. वह एमदम सामान्य थी. इस से इंसपेक्टर जितेंद्र सिंह को उस पर शक होने लगा. बहरहाल उन्होंने उस समय तो उस से कुछ नहीं कहा, लेकिन उस की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए हेडकांस्टेबल श्रीपाल को लगा दिया.

23 मार्च को शशिबाला, उस की बहन सुषमा, बहनोई विक्रम फिर थाने आए. इंद्रपाल के रिश्तेदार भी उस समय थाने में ही थे. तभी सुषमा ने इंसपेक्टर जितेंद्र सिंह को बताया, ‘‘सर, कल रात शशिबाला उस के कमरे पर थी. रात करीब 8 बजे टिंकू भी उस के घर आया था. टिंकू ने शशिबाला से अलग में बात की थी. शशिबाला से बात कर के वह चला गया था. उस के चले जाने के बाद मैं ने शशिबाला से पूछा तो उस ने मुझे बताया कि टिंकू ने उस से कहा था कि वह पुलिस के पास चक्कर लगाने के बजाय अपने गांव चली जाए. इंद्रपाल अपने आप लौट आएगा.’’

सुषमा ने आगे कहा, ‘‘सर, मुझे टिंकू पर शक हो रहा है. आखिर वह इस तरह की बातें क्यों कर रहा है? इंद्रपाल जब टिंकू का दोस्त था तो इस परेशानी में उसे हमारा साथ देना चाहिए था, जबकि वह इधरउधर घूमता फिर रहा है.’’

सुषमा ने जैसे ही यह बात पुलिस से कही तो पास में खड़ी शशिबाला उस के कान में फुसफुसाते हुए बोली, ‘‘तुझे यह बात यहां कहने की क्या जरूरत थी?’’

चूंकि जिस दिन से इंद्रपाल गायब था उसी दिन से उस का दोस्त टिंकू भी गायब था. पुलिस को टिंकू की भी तलाश थी. उस के बारे में भी पुलिस को पता नहीं चल रहा था. इंसपेक्टर जितेंद्र सिंह ने सोचा कि कल जब टिंकू शशिबाला से मिला था तो उसे यह बात पुलिस को बता देनी चाहिए थी. लेकिन उस ने ऐसा नहीं किया.

ठगी का बड़ा खिलाड़ी – भाग 1

राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या एक पर स्थित हरियाणा के जिला करनाल की पहचान विभिन्न औद्योगिक इकाइयों के रूप में तो है ही, इस के अलावा यह धान की खेती के रूप में भी प्रसिद्ध है. यहां पैदा होने वाले उच्च गुणवत्ता वाले धान के चावल को विदेशों तक भेजा जाता है. यहां की दुनार राइस मिल का बड़ा नाम है. जाटान रोड स्थित इस मिल के मालिक सुरेंद्र गुप्ता बहुत ही सधे हुए अंदाज में अपनी यह राइस मिल चला रहे हैं.

उन की राइस मिल का चावल देशविदेश भेजा जाता है. सुरेंद्र एक बड़ी शख्सियत हैं, लिहाजा उन के संबंध भी वैसे ही लोगों से हैं. वह अपने कारोबार को और ऊंचाई तक ले जाना चाहते थे, जिस के लिए उन्हें करोड़ों रुपए की बड़ी रकम की जरूरत थी. वैसे तो यह रकम उन्हें बैंकों से कर्ज के रूप में मिल सकती थी, लेकिन एक तो मोटी रकम, दूसरे बैंकों द्वारा लिया जाने वाला मोटा ब्याज, उन्हें परेशान करता था.

इंसान किसी बात की चाहत रखता है तो कई बार उस के रास्ते खुदबखुद खुल जाते हैं. सुरेंद्र गुप्ता के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. उन की मुलाकात एक आदमी और उस के साथियों से हुई तो उन्होंने अपनी समस्या उन से कही, उस आदमी के साथियों में से एक ने कहा, “गुप्ताजी, सोच लीजिए, आप का काम हो गया.”

“मतलब?”

“आप को मोटा और सस्ती ब्याज दर पर एक आदमी लोन दिला सकता है, क्योंकि उस के लिए यह बाएं हाथ का खेल है.”

“कौन है वह?”

“आप ने अजय पंडित का नाम तो सुना ही होगा. वह ऐसे आदमी हैं कि उन के पास पहुंचते ही हर समस्या का हल निकल आता है.”

इस के बाद उस आदमी और उस के साथियों ने अजय पंडित के बारे में जो कुछ बताया, उसे सुन कर सुरेंद्र गुप्ता हैरान रह गए. अजय पंडित वह नाम था, जिस के बड़ेबड़े राजनेताओं से सीधे संबंध थे. बड़ेबड़े लोग अपने काम कराने उस के यहां लाइन लगाए खड़े रहते थे. यह बात अलग थी कि अजय सिर्फ करोड़पतियों या अरबपतियों के ही काम कराता था.

अजय मूलरूप से रहने वाला तो हरियाणा के सिरसा जिले का था, लेकिन वह दिल्ली के छतरपुर स्थित एक फार्महाउस में रहता था. सुरेंद्र गुप्ता से मिलने वाला वह आदमी और उस के साथियों ने जो बताया था, उस के अनुसार अजय पंडित सोनिया गांधी एसोसिएशन का राष्ट्रीय अध्यक्ष था. इस के अलावा वह अखिल भारतीय ब्राह्मण महासभा का भी अध्यक्ष था.

राजनीतिज्ञों से चूंकि उस के गहरे रिश्ते थे, इसलिए वह लोगों के काम आसानी से करा देता था. वे लोग अजय को जानते ही नहीं थे, बल्कि उस से उन के अच्छे रिश्ते भी थे. इन लोगों से मिलने के बाद सुरेंद्र को लगा कि उन की इच्छा पूरी हो जाएगी. अजय पंडित के बारे में कुछ थोड़ा उन्होंने भी सुन रखा था. वह काफी ऊंची पहुंच वाला आदमी था.

उन लोगों ने सपने दिखाए तो सुरेंद्र अजय से मिलने के लिए ललायित हो उठे. उन्होंने कहा, “इस से अच्छी बात और क्या हो सकती है. आप लोग उन से मेरी मुलाकात करा दीजिए.”

“ठीक है, हम कोशिश करते हैं. समय ले कर आप को फोन पर बता देंगे.” रितेश और उस के साथियों ने कहा.

इस के बाद वे चले गए, लेकिन उन का संपर्क सुरेंद्र से बना रहा. एक दिन उन्होंने बताया कि सोमवार की दोपहर वह छतरपुर आ जाएं. इस के बाद तय दिन पर सुरेंद्र गुप्ता बताए गए पते पर पहुंच गए.

दिल्ली के छतरपुर इलाके में बड़ी हैसियत वाले नामीगिरामी लोगों के फार्महाउस हैं. उन्हीं में से राधामोहन लेन स्थित एक फार्महाउस पर वह पहुंचे तो वहां की कड़ी सुरक्षा के तामझाम देख कर एकबारगी वह ठिठक गए. मुख्य दरवाजा बंद था और वहां हथियारों से लैस प्राइवेट सुरक्षाकर्मी और पुलिसकर्मी खड़े थे. उन की गाड़ी रुकी तो एक सुरक्षाकर्मी ने उन के नजदीक आ कर पूछा, “किस से मिलना है?”

“अजयजी से. अपाइंटमेंट है मेरा.”

“एक मिनट ठहरिए.” कह कर सुरक्षाकर्मी पलटा और मुख्यद्वार पर बनी केबिन में जा कर वहां रखे टेलीफोन से बात की.

उस ने फोन रख कर दरवाजा खुलवाने के साथ ही उन्हें अंदर जाने का इशारा कर दिया. फार्महाउस के अंदर का नजारा बड़ा ही आकर्षक था. वहां हर तरफ हरियाली थी. पार्किंग में पहले से ही कई महंगी और लग्जरी कारें खड़ी थीं. उन्होंने भी अपनी कार वहां खड़ी कर दी और उतर कर कोठी की तरफ बढ़े. कोठी के बरामदे में बने औफिसनुमा कमरे में कई लोग बैठे थे. वहां मौजूद लोगों ने उन से आने का कारण पूछा तो उन्होंने बता दिया.

“ठीक है, आप को थोड़ा इंतजार करना होगा, साहब बाहर हैं. कुछ देर में आते ही होंगे.” कह कर एक आदमी उन्हें अंदर ड्राइंगरूम में ले गया. वहां पड़े बेशकीमती सोफों पर पहले से ही तमाम लोग बैठे थे. वह भी एक सोफे पर बैठ गए. वहां की भव्यता देख कर उन की आंखें खुली की खुली रह गईं. चमकदार मार्बल, कालीन, फर्नीचर, दीवारें, उन पर लगी पेंटिंग्स और छत में लटकते झूमर, सभी कुछ भव्यता प्रदॢशत कर रहे थे.

इस के अलावा दीवारों पर नामचीन राजनेताओं के साथ मुसकराते हुए एक ही शख्स के तमाम फोटो टंगे थे. वह समझ गए कि यही अजय पंडित हैं. ड्राइंगरूम की शान भी अलग ही थी. क्लोजसर्किट कैमरे भी वहां लगे थे. इस से भी ज्यादा खास बात यह थी कि वहां बैठे लोग चाय, कौफी, स्नैक्स, फ्रूट्स आदि इस अंदाज में खापी रहे थे, जैसे वहां कोई पार्टी चल रही हो. 3-4

वेटर खातिरदारी में लगे थे. एक वेटर उन्हें भी पानी दे गया. उस के बाद उन से और्डर लिया, “आप के लिए क्या लाएं सर?”

“कौफी ले आओ.” सुरेंद्र ने कहा तो कुछ देर बाद एक वेटर गोल्डन कप में उन्हें कौफी दे गया. वह जिस ड्राइंगरूम में बैठे थे, वहां से बाहर का भी नजारा दिखाई दे रहा था. वहां अनगिनत देशीविदेशी पेड़पौधों ने वातावरण को सुंदर बनाया हुआ था. कुछ ही वक्त बीता था कि वह आदमी और उस के साथी भी आ गए. उन्होंने गर्मजोशी से सुरेंद्र गुप्ता का स्वागत किया. वे भी बातचीत में मशगूल हो गए.

कुछ और वक्त बीता होगा कि सायरन बजाती एक जिप्सी फार्महाउस में दाखिल हुई. उस के ठीक पीछे काले रंग की चमचमाती मॢसडीज कार थी और उस के पीछे एक और जिप्सी. दोनों जिप्सियों पर बीसियों कमांडों और सुरक्षाकर्मी सवार थे. सभी के पास हथियार और वौकीटौकी थे.

एक सुरक्षाकर्मी ने चमचमाती कार का पिछला दरवाजा खोला तो उस में से जो शख्स उतरा, वह निहायत ही आकर्षक था. उस ने नीले रंग का सूट पहना हुआ था. उस ने अपने नजदीक आए स्टाफ से कुछ गुफ्तगू की और ड्राइंगरूम की तरफ बढऩे लगा. उस की चालढाल में भी रुआब झलक रहा था. उस के चारों ओर सुरक्षाकर्मी इस तरह घेरा सा बनाए चल रहे थे कि कोई परिंदा भी नजदीक नहीं आ सकता था. अंदर पहुंच कर उस ने मुसकरा कर सभी से मुलाकात की.

सुरेंद्र के परिचित ने उन का परिचय कराया, “सर, आप ही हैं सुरेंद्र गुप्ताजी, जिन के बारे में आप से बात हुई थी.”

“ओके…ओके… आप के बारे में इन लोगों ने मुझे सब बता दिया है. आप अभी बैठिए, मैं बाकी लोगों से मिल कर आप से बात करता हूं.”

सभी अपनीअपनी जगह पर बैठ गए. सारा तामझाम देख कर सुरेंद्र समझ गए कि अजय पंडित बहुत पहुंची हुई हस्ती है.

देह की राह के राही – भाग 1

फोन की घंटी बजी तो सुमन ने स्क्रीन पर नंबर देखा. नंबर मुंहबोली मौसी बबिता का  था, जो उस के घर से कुछ दूरी पर रहती थीं. उस ने जल्दी से फोन रिसीव किया, ‘‘हैलो, मौसी नमस्ते, आप कैसी हैं, फोन कैसे किया?’’

‘‘नमस्ते बेटा, मैं तो ठीक हूं. तू बता कैसी है?’’ बबिता ने अपने बारे में बता कर सुमन का हालचाल पूछा तो वह बोली, ‘‘मैं भी ठीक हूं मौसी. बताइए, फोन क्यों किया?’’

‘‘मैं ने फोन इसलिए किया है कि तू ने जिस काम के लिए मुझ से कहा था, वह हो गया है. तू जब भी उस से मिलना चाहे, मिल सकती है.’’

‘‘अगर मैं आज ही उस से मिलना चाहूं तो..?’’ सुमन ने चहक कर पूछा.

‘‘हां…हां, आज ही मिल ले. लेकिन रुक, मैं उसे एक बार और फोन कर के पूछ लेती हूं. उस के बाद तुझे फोन करती हूं.’’ कह कर बबिता ने फोन काट दिया.

कुछ देर बाद बबिता ने फोन कर के कहा, ‘‘ठीक है, आज शाम को राजनगर के प्रियदर्शिनी पार्क में तू उस से मिल सकती है. उस का नाम राजीव है. मैं तुझे उस का मोबाइल नंबर दिए देती हूं. जाने से पहले तू उसे एक बार फोन कर लेना.’’

इस के बाद बबिता ने राजीव का मोबाइल नंबर सुमन को लिखा दिया. दरअसल सुमन ने अपनी मुंहबोली मौसी बबिता से कहा था कि नौकरी छूट जाने की वजह से वह काफी तंगी में आ गई है. इसलिए वह उस की दोस्ती किसी ऐसे आदमी से करा दे, जो उस की हर तरह मदद कर सके और वक्त जरूरत काम आ सके. उसी के लिए बबिता ने उसे फोन किया था. उस ने कहा था कि राजीव अच्छा लड़का है और उसे भी उसी की तरह एक बढि़या दोस्त की तलाश है.

बबिता से नंबर ले कर सुमन ने राजीव को फोन किया तो उस ने सुमन को शाम को राजनगर के प्रियदर्शिनी पार्क में मिलने के लिए बुला लिया. राजीव को प्रभावित करने, एक तरह से उसे अपने जाल में फंसाने के लिए सुमन खूब सजसंवर कर तय समय पर पार्क पहुंची तो राजीव उसे इंतजार करता मिला.

24 वर्षीय राजीव चढ़ती उम्र का खूबसूरत नौजवान था. पहली ही नजर में वह सुमन को भा गया. मौसी ने बताया था कि वह काफी पैसे वाला भी है. इस तरह सुमन ने जिस तरह के दोस्त की कल्पना की थी, राजीव एकदम वैसा ही था.

25 वर्षीया सुमन भी कम सुंदर नहीं थी. यही वजह थी कि उस पर राजीव की नजर पड़ी तो वह हटा नहीं सका. उसे सुमन बेहद खूबसूरत लगी. दोनों ही एकदूसरे को भा गए, इसलिए इसी पहली मुलाकात में उन दोनों की दोस्ती पक्की हो गई. वैसे भी आजकल के नौवजवान ऐसे पलों में एकदूसरे के प्रति कुछ अधिक ही जोशीले अंदाज में पेश आते हैं.

इस के बाद राजीव और सुमन घर के बाहर तो मिलने ही लगे, राजीव सुमन के घर भी आनेजाने लगा. राजीव को पता ही था कि सुमन ने उस से दोस्ती क्यों की है, इसीलिए वक्त जरूरत वह उस की मदद भी करने लगा. राजीव यह मदद ऐसे ही नहीं कर रहा था. वह सुमन की देह से अपनी पाई पाई वसूल रहा था.

राजीव स्मार्ट तो था ही, बातचीत में भी तेजतर्रार था. इसलिए सुमन को लगा कि अगर वह उस से शादी कर ले तो उस की सूनी जिंदगी में एक बार फिर बहार तो आ ही जाएगी, यह जिंदगी आराम से कट भी जाएगी. यही सोच कर एकांत के क्षणों में एक दिन उस ने राजीव कहा, ‘‘राजीव, आज मैं तुम से कुछ कहना चाहती हूं.’’

राजीव और सुमन में प्यार जैसा कुछ भी नहीं था. उन का लेनदेन का संबंध था, इसलिए उसे लगा कि सुमन कोई बड़ी मांग करेगी. थोड़ा गंभीर हो कर उस ने कहा, ‘‘बताओ, क्या चाहिए?’’

‘‘मैं जो चाहती हूं, पता नहीं तुम दे भी पाओगे या नहीं?’’

‘‘आज तक तुम ने जो भी मांगा है, मैं ने कभी मना किया है,’’ राजीव ने कहा, ‘‘जो भी चाहिए, साफसाफ कहो. पहेलियां मत बुझाओ.’’

‘‘मैं कोई चीज नहीं मांग रही हूं.’’ सुमन ने करीब आ कर राजीव का हाथ अपने हाथों में ले कर कहा, ‘‘मुझे तुम्हारा प्यार चाहिए.’’

सुमन के मुंह से ये शब्द सुन कर राजीव जैसे झूम उठा. उस ने अपने हाथ से सुमन का हाथ दबा कर कहा, ‘‘मैं तुम्हें प्यार ही तो दे रहा हूं. अगर तुम से प्यार न होता तो मैं तुम्हारे पास आता ही क्यों.’’

‘‘यह प्यार थोड़े ही है. हमारा तुम्हारा संबंध तो लेनदेन का है. तुम मेरी जरूरत पूरी करते हो और मैं तुम्हें खुश करती हूं. लेकिन तुम्हें खुश करते करते ही अब मुझे तुम से प्यार हो गया है.’’

‘‘हमारा तुम्हारा जो भी संबंध है, बिना प्यार के हो ही नहीं सकता. तुम जिस तरह के संबंध की बात कर रही हो, वैसा बाजार में होता है. वहां आदमी ने पैसे फेंके, मौज लिया और चल दिया. लेकिन यहां ऐसा नहीं है. जरूरतें तो आदमी पत्नी की भी पूरी करता है. तो क्या वहां भी इसी तरह लेनदेन का संबंध होता है. सुमन सही बात तो यह है कि मैं भी तुम से प्यार करता हूं. बस, परेशानी यह है कि तुम मुझ से बड़ी हो.’’ राजीव ने कहा.

‘‘सिर्फ एक ही साल तो बड़ी हूं. पुरुष तो 20-20 साल बड़े होते हैं. तब तो कोई फर्क नहीं पड़ता,’’ सुमन ने कहा.

‘‘मैं ने तो ऐसे ही कह दिया था. कहां तुम्हें छोड़ कर जा रहा हूं.’’ राजीव ने सुमन के गले में बाहें डाल कर कहा तो वह उस के सीने से लग कर बोली, ‘‘अच्छा राजीव, इस प्यार को कब तक निभाओगे?’’

सुमन की आंखों में आंखें डाल कर राजीव ने कहा, ‘‘आखिरी सांस तक, जब तक जिंदा रहूंगा. तुम यह कभी मत सोचना कि मैं सिर्फ तुम्हारा शरीर पाने के लिए तुम्हारे पास आता हूं. मुझे तो तुम से पहले ही दिन प्यार हो गया था. अब वह इतना बढ़ गया है कि अब मैं तुम से अलग हो कर रह ही नहीं सकता. अगर जरूरत पड़ी तो दिखा भी दूंगा.’’

‘‘एक बार फिर सोच लो राजीव. तुम सहानुभूति की वजह से तो ऐसा नहीं कर रहे हो? क्योंकि मैं पति से अलग रहने वाली 2 बच्चों की मां हूं.’’ सुमन ने भावुक हो कर राजीव के सामने अपनी हकीकत बयां कर दी.

सुमन की हकीकत जान कर राजीव एक पल को चौंका. लेकिन उसे सुमन की देह का चस्का लग चुका था, इसलिए तुंरत संभल कर हंसते हुए उस ने उस का गाल थपथपा कर कहा, ‘‘ऐसा कभी नहीं होगा. प्यार में जब जाति और उम्र नहीं देखी जाती तो मैं इसे ही क्यों देखूंगा.’’

राजीव का इतना कहना था कि सुमन उस की बांहों में समा गई. इस के बाद जहां राजीव सुमन पर पति की तरह अधिकार जताने लगा था, वहीं सुमन भी राजीव से पत्नी की तरह हर जरूरत पूरी करवाने लगी थी. राजीव अब कभीकभी सुमन के कमरे पर रात को भी रुकने लगा था. बात यहां तक पहुंच गई तो सुमन और राजीव के संबंधों की जानकारी सुमन के मकान मालकिन मंजू शर्मा को ही नहीं, उस के घर वालों को भी हो गई.

पहले तो मकान मालकिन मंजू शर्मा ने उसे टोका. लेकिन सुमन ने उस की टोकाटाकी पर ध्यान नहीं दिया, तब उस ने उस से मकान खाली करने के लिए कह दिया. मांबाप ने सुमन से राजीव के बारे में पूछा तो उस ने सबकुछ सचसच बता दिया. उस ने बताया कि राजीव उस से शादी करने को तैयार है तो मांबाप ने कोई आपत्ति नहीं की.

मकान मालकिन जब सुमन को ज्यादा परेशान करने लगी तो एक दिन सुमन ने उस से भी कह दिया कि वह राजीव से शादी करने वाली है. इस के बाद उन्होंने भी टोकाटाकी बंद कर दी.

पंजाब की डाकू हसीना – भाग 1

पंजाब राज्य के लुधियाना जिले का पारा तब और बढ़ गया था, जब सीएमएस इंफो सिस्टम लिमिटेड में हुई 11 करोड़ रुपए की डकैती की खबर फिजा में फैली थी. उस समय सुबह के 7 बज रहे थे, जब सीएमएस के प्रबंधक प्रवीण कुमार ने पुलिस कंट्रोल रूम को सूचना दी थी.

सूचना सुन कर कंट्रोल रूम में ड्यूटी पर तैनात एसआई सुशील के तो जैसे हाथपांव ही फूल गए थे. सूचना थी ही ऐसी, जिसे सुन कर हर कोई हैरान हो सकता था और सुशील भी ऐसे उछले थे. फौरन उन्होंने वायरलैस सेट के जरिए जिले के सभी थानों को सूचित कर दिया. वह इलाका थाना सराभा नगर के न्यू राजगुरु नगर में पड़ता था.

न्यू राजगुरु नगर स्थित सीएमएम दफ्तर में हुई 11 करोड़ रुपए की डकैती की सूचना मिलते ही पुलिस कमिश्नर मनदीप सिंह के भी जैसे होश उड़ गए. उन्होंने सब से पहले जिले की सभी सीमाओं को सील करने का आदेश दिया, ताकि बदमाश जिला छोड़ कर बाहर भाग न सकें. क्योंकि 11 करोड़ रुपए कोई छोटीमोटी रकम नहीं होती है, फिर बड़े पुलिस अफसरों के सवालों के जबाव देने में उन्हें मुश्किल हो सकती थी.

जंगल में आग की तरह यह खबर जिले में फैल चुकी थी सीएमएस इंफो सिस्टम लिमिटेड, जो एटीएम मशीनों में रुपए रखने का काम करती है, के यहां रात 9/10 जून, 2023 की रात को इस डकैती की वारदात को अंजाम दिया. डकैत कैश बाक्स से 11 करोड़ रुपए लूट कर सीएमएस कंपनी की कैश वैन में रख कर फरार हो गए.

हडक़ंप मचा देने वाली यह खबर जिले से होते हुए पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान सिंह और डीजीपी गौरव यादव तक पहुंच चुकी थी. मुख्यमंत्री भगवंत मान सिंह ने डीजीपी गौरव यादव को आड़े हाथों लेते हुए अपनी नाराजगी जताई थी कि किसी भी कीमत पर घटना का जल्द से जल्द परदाफाश होना चाहिए और अपराधियों के मनोबल को धूल में देना होगा. मुझे जल्द से जल्द इस का सकारात्मक रिजल्ट चाहिए.

मुख्यमंत्री भगवंत मान के आदेशों का पालन करते हुए डीजीपी गौरव यादव ने लुधियाना के पुलिस कमिश्नर मनदीप सिंह सिद्धू को आदेश दिया कि लुधियाना की पूरी पुलिस फोर्स लगा दो, हर कीमत पर आरोपी पकड़े जाने चाहिए और रकम की भी रिकवरी होनी चाहिए. ये पुलिस की साख का प्रश्न है.

हाई कमान से आदेश मिलने के बाद पुलिस कमिश्नर मनदीप सिंह सिद्धू ने आरोपियों को पकडऩे के लिए अपनी अनोखी कार्यशैली के लिए मशहूर तेजतर्रार जौइंट पुलिस कमिश्नर सौम्या मिश्रा और एडीशनल पुलिस कमिश्नर शुभम अग्रवाल के हाथों में कमान सौंप दी.

इस से पहले जब घटना की सूचना पुलिस कंट्रोल रूम के जरिए थाना सराभा नगर को मिली थी, इंसपेक्टर अरविंद सिंह ने मय पुलिस फोर्स मौके पर पहुंच कर छानबीन शुरू कर दी थी. उस के आधे घंटे के अंतराल में पुलिस कमिश्नर मनदीप सिंह सिद्धू, जौइंट सीपी सौम्या मिश्रा, एडीसीपी शुभम अग्रवाल, सीआईए (तृतीय) इंसपेक्टर बेअंत जुनेजा, सीआईए (चतुर्थ) इंसपेक्टर कुलवंत सिंह सहित तमाम पुलिस अधिकारी मौके पर पहुंच चुके थे. उस समय सीएमएस औफिस जैसे पुलिस छावनी बन चुका था.

हालात देख कर घबरा गए मैनेजर

इधर घटना की सूचना पा कर सुबह साढ़े 6 बजे के करीब जब सीएमएस के मैनेजर प्रवीण कुमार दफ्तर पहुंचे थे तो उन्होंने मेन वाल्ट के बाहर वाले कमरे में कर्मचारी हिम्मत सिंह और हरमिंदर के दोनों हाथ और पैर बंधे तथा मुंह पर टेप चिपके हालत में मिले थे. जल्दी जल्दी उन्होंने दोनों कर्मचारियों को बंधन मुक्त करते हुए मुंह के ऊपर से टेप हटाया.  घबराहट के मारे उन की सांसें तेज चल रही थीं. उन के मुंह से आवाज नहीं निकल पा रही थी.

मैनेजर प्रवीण कुमार हालत देख कर समझ गए थे कि मामला गंभीर है. उन्होंने हिम्मत सिंह और कुलवंत सिंह को ठंडा पानी पिलाया और उन्हें ढांढस बढ़ाया. थोड़ी देर बाद जब दोनों सामान्य स्थिति में आ गए, तब दोनों ने उन्हें बताया कि रात के करीब 2 बज रहे थे, जब दोनों कैश रूम में रुपए गिन रहे रहे थे. कमरे के बाहर सिक्योरिटी गार्ड बलवंत सिंह, परमदीन खान और अमर सिंह राइफल लिए अपनी ड्यूटी पर तैनात थे.

अचानक से 8-10 नकाबपोश, जिन के हाथों में असलहे थे, दफ्तर के भीतर घुस आए और तीनों गार्डों को अपने असलहे के बल पर बंधक बना उन के असलहे छीन लिए. तीनों के हाथपैर बांध कर उन की आंखों में लाल मिर्च पाउडर झोंक दिया ताकि वह उन का विरोध न कर सकें.

इस के बाद उन्होंने उन्हीं असलहे के बल पर हमें बंधक बना हमारे हाथपैर रस्सियों से बांध कर हमें यहां फेंक दिया और बड़े सूटकेस में रुपए भर कर ले भागे. उन लुटेरों के बीच से किसी महिला की आवाज आ रही थी, जो उन्हें खूनखराबा से मना करती हुई जल्दीजल्दी काम निबटाने का हुक्म दे रही थी.

कर्मचारी हिम्मत सिंह और हरमिंदर सिंह से जानकारी जुटाने के बाद मैनेजर ने सीएमएस के सीनियर अधिकारी गोयल शेखावत को जानकारी दे कर उन्हें दफ्तर पहुंचने का आग्रह किया था. इस के बाद मैनेजर प्रवीण कुमार ने थाना सराभानगर पुलिस को फोन कर इस लूट कांड की जानकारी दे दी. मैनेजर की तहरीर पर इंसपेक्टर अरविंद सिंह ने आईपीसी के विविध धाराओं 395, 342, 323, 506, 427, 120बी और आम्र्स एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज कर आगे की आवश्यक काररवाई शुरू कर दी थी.

चूंकि मामला 11 करोड़ रुपए की डकैती से जुड़ा हुआ था, इसलिए पुलिस फूंकफूंक कर कदम रख रही थी ताकि उन की नजरों में कोई सबूत अथवा साक्ष्य छूट न जाए, जिस से अपराधियों को लाभ मिल सके.

खैर, पुलिस सीएमएस दफ्तर के चप्पेचप्पे को खंगालने में जुटी हुई थी. पड़ताल के दौरान पता चला था कि बदमाश अपने साथ सीसीटीवी की डीवीआर ले गए थे. दफ्तर में घुसते ही बदमाशों ने सब से पहले साइरन वाले सेंसर तार को काट दिया था, ताकि वह बज न सके. अगर साइरन बजता तो बदमाश अपने मकसद में कामयाब नहीं हो सकते थे, इसलिए उन्होंने घुसते ही साइरन के तार को काट दिए थे.

पुलिस को एक बात बहुत देर से परेशान कर रही थी कि बदमाशों को कैसे पता चला था कि कंपनी में सेंसर तार कहां लगा है. उसे ही पहले क्यों काटे? इस का मतलब शीशे के समान साफ है कि कंपनी का कोई कर्मचारी बदमाशों से मिला हुआ है. उसी की मुखबिरी से इतनी बड़ी घटना घटी. वह गद्दार वह आस्तीन का सांप कौन है? ये जांच का विषय था.

लावारिस हालत में मिली कैश वैन

पुलिस ने पीडि़त कर्मचरियों हिम्मत सिंह और कुलवंत सिंह से पूछताछ की. इस पूछताछ के दौरान एक बेहद चौंकाने वाला मामला सामने आया, जो 11 करोड़ रुपए लूट की बात कही जा रही थी, लूट वाली रकम इतनी थी ही नहीं.

दरअसल, कंपनी के कैश चेस्ट में कुल 11 करोड़ संग्रह हुए थे, 7 करोड़ एक जगह और दूसरी जगह 4 करोड़ रखे थे, कर्मचारियों के बयानों के मुताबिक कुल रुपए 2 अलगअलग जगहों पर रखे गए थे. बदमाशों ने 11 करोड़ रुपए नहीं लूटे, बल्कि वे अपने साथ बड़े बैग में 7 करोड़ रुपए भर कर भागे थे. पुलिस पड़ताल के दौरान 4 करोड़ रुपए मौके से बरामद कर लिए गए, जो खुले हुए कैश बौक्स में रखे गए थे.

इतनी बड़ी रकम जिस बेपरवाह तरीके से रखी गई थी, घटनास्थल चीखचीख कर गहरी साजिश की ओर इशारा कर रही थी यानी कंपनी के ही किसी नमकहराम ने बदमाशों से मिल कर इस घटना को अंजाम दिया अथवा दिलवाया था. वह गद्दार कौन हो सकता है?

पुलिस जांचपड़ताल कर रही थी. वहीं पुलिस ने शक के आधार पर तीनों सिक्योरिटी गार्डों अमर सिंह, बलवंत सिंह और परमदीन खान को हिरासत में ले लिया कि जब इन के पास हथियार थे तो फायरिंग क्यों नहीं की. यह जांचपड़ताल करते दोपहर के 12 बज गए थे. तभी पुलिस को सूचना मिली कि लुधियाना के मोगा रोड पर मुल्लापुर दाखा गांव पंडोरी में एक कैश वैन लावारिस हालत में खड़ी पड़ी है. उस का पीछे का दरवाजा टूटा हुआ है और उस में 2 असलहे भी पड़े हैं जिन पर सीएमएस लिखा है, जिस का नंबर है- पीबी10जेए-7109.

सूचना मिलने के बाद इंसपेक्टर अरविंद सिंह मय फोर्स के साथ मौके पर पहुंच गए. पुलिस ने लावारिस हालत में मिली वैन की गहन छानबीन की. उस का पिछला दरवाजा टूटा पड़ा था और उस के अंदर 2 असलहे पड़े थे और कैश पूरी तरह से नदारद था.

लिवइन पार्टनर का खूनी खेल