Uttarakhand Crime : अपहरण में कैसे हुई इतनी बड़ी भूल

Uttarakhand Crime : संजय बालियान ने हर्षित के अपहरण और फिरौती की जो योजना बनाई थी, उस में वह कामयाब भी रहा. लेकिन इस पूरे मामले में भूल कहां हुई कि अपराध की सफलता का जश्न मनाने के पहले ही वह साथियों समेत पकड़ा गया. भारत संचार निगम लिमिटेड (बीएसएनएल) में सहायक निदेशक के पद पर तैनात गिरीश तायल का परिवार उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के पौश इलाके इंजीनियर्स एनक्लेव स्थित आलीशान कोठी में रहता था. उन के परिवार में पत्नी लक्ष्मी तायल के अलावा 2 बड़ी बेटियां और एक बेटा हर्षित था. गिरीश तायल की तैनाती उत्तर प्रदेश के जिला मुजफ्फरनगर में थी, इसलिए वह कभीकभी ही घर आ पाते थे.

आर्थिक रूप से समृद्ध तायल का बेटा हर्षित शहर के ही एक प्रतिष्ठित स्कूल में कक्षा 12 में पढ़ता था. व्यक्ति कितना भी अमीर व गरीब क्यों न हो, समय उस के साथ अपने हिसाब से ही चाल चलता है. 29 नवंबर की ठंडक भरी शाम के करीबन सवा 7 बजे का वक्त था. 18 वर्षीय हर्षित तायल स्कूटी से अपने मोबाइल को रिचार्ज कराने के लिए जीएमएस रोड की तरफ घर से निकला. गिरीश तायल उस दिन घर पर ही थे. हर्षित को घर से निकले लगभग एक घंटा हो गया. इतनी देर तक वह वापस नहीं आया तो गिरीश को उस की चिंता हुई. उन के दिमाग में यह भी  खयाल आया कि कहीं वह अपने दोस्तों के साथ बातचीत में तो नहीं लग गया.

कुछ समय और बीता तो फिक्र की डगर पर चलना उन की मजबूरी हो गई. उन्होंने उस का मोबाइल मिलाया, लेकिन पूरी घंटी जाने के बाद भी उस ने फोन नहीं उठाया. उन्होंने दोबारा फोन किया तो उस का फोन बंद मिला. इस के बाद उन्होंने जितनी बार फोन किया, हर बार उस का फोन स्विच औफ ही बताया. गिरीश तायल परेशान हो गए कि हर्षित का फोन स्विच औफ क्यों हो गया है? लड़का हो या लड़की, जब तक बाहर जाने के बाद घर न आ जाए, तब तक मातापिता को चिंता सताती है. अगले आधे घंटे तक भी हर्षित घर नहीं आया तो गिरीश ने अपने परीचितों को यह बात बताई. परिचित उन के घर आ गए और हर्षित की खोज में निकल पड़े.

घर से निकलते समय हर्षित ने जीएमएस रोड की तरफ जाने की बात कही थी, इसलिए सभी जीएमएस रोड पर स्थित बाजार पहुंचे. परंतु वह वहां कहीं दिखाई नहीं दिया. बीचबीच में सभी उस के मोबाइल पर फोन भी कर रहे थे. जब वे वापस आने लगे तो एनक्लेव के सामने सड़क किनारे खड़ी हर्षित की स्कूटी देख कर चौंके. आश्चर्य की बात यह थी कि स्कूटी का लौक खुला था. गिरीश तायल ने इधरउधर देखा. हर्षित का कुछ पता नहीं था. चौंकाने वाली एक और बात यह थी कि हर्षित की चप्पलें भी वहीं पड़ी थीं. यह देख कर गिरीश व उन के परिचितों का दिल अनहोनी की आशंका से धड़कने लगा.

गिरीश हताशपरेशान थे. करीब आधा घंटे बाद उन्होंने फिर से बेटे का मोबाइल नंबर मिलाया. घंटी गई तो गिरीश की परेशानी थोड़ा कम हुई. उन्हें लगा कि अब बेटे से बात हो कर वास्तविक स्थिति पता चल जाएगी. लेकिन इस बार भी घंटी बजने के बावजूद फोन रिसीव नहीं किया गया. बुरे खयालों का तूफान गिरीश को परेशान करने लगा. घर में विचारविमर्श के बाद गिरीश थाना बसंत विहार पहुंचे और थानाप्रभारी प्रदीप चौहान से बेटे के लापता होने की बात बताई. उन की शिकायत पर पुलिस ने गुमशुदगी का मामला दर्ज कर लिया. मामला एक अधिकारी के बेटे के लापता होने का था. थानाप्रभारी ने एसएसपी अजय रौतेला व एसपी (सिटी) अजय सिंह को भी बच्चे के गायब होने की बात बता दी.

एसएसपी ने थानाप्रभारी को जरूरी काररवाई के निर्देश दे कर उन के साथ स्पेशल औपरेशन गु्रप (एसओजी) की टीम को भी लगा दिया. एसओजी प्रभारी रवि कुमार व सबइंस्पेक्टर मुकेश त्यागी मामले की जांच में जुट गए. गिरीश तायल थाने से घर लौटे ही थे कि उन के मोबाइल की घंटी बजी. फोन हर्षित का था. उन्होंने जल्दी से रिसीव किया, ‘‘हैलो बेटा हर्षित, तुम कहां हो, क्या हुआ?’’

दूसरे ही पल तायल को झटका लगा. उधर से आवाज हर्षित की नहीं, बल्कि किसी और की थी, उस ने भारीभरकम आवाज में कहा, ‘‘आप का प्यारा बेटा नहीं, हम बोल रहे हैं.’’

‘‘कौन हो तुम और मेरा बेटा कहां है? वह ठीक तो है न?’’ गिरीश ने घबरा कर पूछा.

‘‘इतने सवालों का जवाब तो हम एकसाथ नहीं दे सकते.’’ कुछ पल रुक कर फोनकर्ता बोला, ‘‘आप इतना समझ लो कि अभी तक आप का बेटा बिलकुल सेफ है. उसे आगे भी सेफ रखना है या नहीं, यह आप मुझे बता देना. हम क्या चाहते हैं, यह बाद में फोन कर के बता देंगे. फिलहाल तुम इतना जान लो कि पुलिस के चक्कर में ज्यादा मत पड़ना, वरना…’’ इस के बाद उस ने फोन काट दिया. अब गिरीश व उन के घर वालों को यह समझते देर नहीं लगी कि उन के बेटे का अपहरण हो चुका है. घर वाले इस बात को ले कर परेशान हो रहे थे कि पता नहीं हर्षित किस हाल में होगा.

हर्षित रहस्यमय परिस्थितियों में लापता हुआ था. मामले की जांच के लिए पुलिस टीम भी उन के यहां पहुंच गई थी. गिरीश की अपहर्ता से जो बात हुई थी, पुलिस को नहीं बताई. इसी बीच हर्षित के मोबाइल से दोबारा फोन आया. गिरीश फोन ले कर पुलिस से हट कर दूसरे कमरे में चला गया. उस ने पूछा, ‘‘कैसा है मेरा बेटा?’’

‘‘वह बिलकुल ठीक है. अगर उसे ठीक देखना है तो हमें 5 करोड़ रुपए दे दो.’’

‘‘क…क…क्या..?’’ तायल के पैरों तले से जमीन खिसक गई. वह बोले, ‘‘मेरे पास इतने रुपए पूरे जन्म में भी नहीं होंगे.’’

‘‘कैसी बात करते हो इंजीनियर साहब, माल तो बहुत कमाया है तुम ने.’’

‘‘तुम्हें कोई गलतफहमी हुई है. मैं कोई इंजीनियर नहीं हूं. मैं तो बीएसएनएल में हूं.’’

‘‘क्या मतलब?’’ फोनकर्ता चौंका.

‘‘हां, मैं बिलकुल सच कह रहा हूं. इतनी रकम मैं भला कहां से लाऊंगा.’’

‘‘ठीक है, तुम्हें दोबारा फोन करता हूं.’’ फोन कट गया. गिरीश को लग रहा था कि गलतफहमी के चलते उन के बेटे का अपहरण हुआ है. उन की आशंका सही साबित हुई. जब फोन दोबारा आया तो उस ने कहा, ‘‘हम ने पता किया है कि आप इंजीनियर नहीं हैं, लेकिन इस से कोई फर्क नहीं पड़ता. इतना जान लो कि रकम मोटी चाहिए. पुलिस के चक्कर में मत पड़ना, वरना उस की जान हमारे हाथ में है. पैसा कब और कहां पहुंचाना है, बाद में वाट्सऐप पर बता देंगे.’’

इतना कह कर अपहर्त्ता ने फिर फोन काट दिया. इस दौरान एसएसपी अजय रौतेला व एसपी भी तायल के घर पहुंच गए थे. तब तायल ने दबी जुबान से पुलिस को बता दिया कि हर्षित का अपहरण कर लिया गया है और करोड़ों रुपए की फिरौती मांगी जा रही है. पुलिस के लिए मामला बेहद गंभीर था. एसएसपी ने आला अधिकारियों को सनसनीखेज घटना की जानकारी दे दी. सूचना मिलते ही अपर पुलिस महानिदेशक (एडीजी) राम सिंह मीणा व डीआईजी संजय गुंज्याल ने एसएसपी से मंत्रणा की. अधिकारियों ने हर्षित के घर वालों से भी बात की, लेकिन उन के रवैये ने पुलिस को निराश कर दिया. वह पुलिस को सहयोग करने को तैयार नहीं थे.

इस के बावजूद भी पुलिस ने अपने हिसाब से काररवाई करने का फैसला किया. पुलिस ने गुमशुदगी के मामले को अपहरण में बदल दिया. हर्षित के अपहरण की बात धीरेधीरे दबी जबान से खुली तो अगले दिन अखबारों की सुर्खियां बन गई. उत्तराखंड में फिरौती के लिए बड़ी वारदात थी. कानूनव्यवस्था को ले कर भी सवाल उठ रहे थे. प्रदेश की राजधानी से मामला जुड़ा होने के चलते मुख्यमंत्री हरीश रावत के संज्ञान में भी मामला आ गया. उन्होंने पुलिस महानिदेशक बी.एस. सिद्धू को अविलंब कार्रवाई करने के साथ ही हर्षित की सकुशल रिहाई के निर्देश दिए.

एडीजी राम सिंह मीणा के निर्देश पर हर्षित की बरामदगी के लिए पुलिस दलों का गठन का निर्णय लिया गया. पुलिस, एसटीएफ व एसओजी की टीमें जांच में जुट गईं. एसटीएफ टीम की कमान उस के एसएसपी डा. सदाकांत दाते ने संभाली. पुलिस टीम में सीओ (सिटी) मनोज कत्याल व कई थानाप्रभारियों के अलावा दरजन भर से भी ज्यादा पुलिसकर्मियों को शामिल किया गया. पुलिस अपने काम में लग चुकी थी. पुलिस ने गिरीश को भी किसी तरह सहयोग करने के लिए तैयार कर लिया. पुलिस ने हर्षित के मोबाइल की लोकेशन हासिल की तो वह हरिद्वार की निकली. उस का मोबाइल स्विच्ड औफ था. इस से साफ था कि अपहर्त्ता उसे हरिद्वार ले गए हैं.

एक पुलिस टीम हरिद्वार के लिए रवाना कर दी गई. इस बीच अपहर्ता अलगअलग नंबरों से गिरीश तायल से बात करते रहे. अपहर्ताओं ने हर्षित का एक विडियो भी तायल को भेजा. वीडियो में वह बेहद डरा हुआ था और खुद को बचाने की गुहार कर रहा था. पुलिस को अपहर्त्ताओं की लोकेशन कभी देहरादून, कभी हरिद्वार, कभी सहारनपुर तो कभी मुजफ्फरनगर जिले की मिल रही थी. सभी जगह पुलिस टीमें भेज दी गई थीं. पुलिस के सामने परेशानी यह थी कि अपहर्त्ता बेहद चालाक थे और वह हर काल के बाद सिम कार्ड बदल देते थे. मोबाइल नंबरों के जो पते मिल रहे थे, वे सब फरजी निकल रहे थे.

फिरौती को ले कर अपहर्त्ता गिरीश तायल से सौदेबाजी करने लगे. तायल के गिड़गिड़ाने के बाद किसी तरह बात 34 लाख रुपए पर तय हो गई. डील पक्की हो जाने के बाद अपहर्त्ता ने कहा, ‘‘सारी रकम हजार के नोटों में होनी चाहिए और उसे लाल रंग के सूटकेस में लाना. पैसे कहां पहुंचाने हैं, हम बाद में बता देंगे.’’

इस के बाद तायल ने इधरउधर से उधार ले कर व आभूषण बेच कर फिरौती की रकम का इंतजाम कर लिया और वे पैसे लाल रंग के एक सूटकेस में रख लिए. शाम के समय फिर अपहर्त्ताओं का फोन आया, ‘‘इंतजाम हुआ?’’

‘‘हो गया.’’

‘‘ठीक है, तुम रात को रेलवे स्टेशन से लाहौरी एक्सप्रैस से हरिद्वार की तरफ चलना. रास्ते में हम तुम्हें बता देंगे कि सूटकेस कहां फेंकना है. तुम अकेले ही आओगे. तुम्हारे साथ कोई दूसरा नहीं होना चाहिए.’’

‘‘मैं ऐसा ही करूंगा.’’

अपहर्त्ता बेहद चालाकी बरत रहे थे और कई फोन का इस्तेमाल अलगअलग इलाकों से कर रहे थे. इस से पुलिस अधिकारी सकते में आ गए थे. पुलिस की योजना थी कि फिरौती लेते समय अपहर्ताओं को दबोच लेंगे, लेकिन वह फिरौती लेने का अलग ही तरीका अपना रहे थे. पुलिस महानिदेशक राम सिंह मीणा भी पुलिस औपरेशन पर बराबर नजर रख रहे थे. डीआईजी संजय गुंज्याल की नजर सर्विलांस पर थी, जबकि एसएसपी अजय रौतेला व एसटीएफ के एसएसपी डा. सदाकांत के निर्देशन में पुलिस टीमें काम कर रही थीं.

पुलिस किसी भी तरह हर्षित की सकुशल बरामदगी के साथ अपहर्त्ताओं तक पहुंचना चाहती थी. पुलिस टीमों ने वाट्सऐप पर अपना एक ग्रुप बना लिया, ताकि एकदूसरे को सूचना आदि शेयर की जा सके. सादी वरदी में पुलिसकर्मियों को रेलवे स्टेशन के अलावा लाहौरी एक्सपे्रस के कोच में तैनात करने का निर्णय लिया गया. ऐसा भी हो सकता था कि अपहर्त्ता स्टेशन पर ही फिरौती वसूल कर लेते. शाम के समय तायल स्टेशन पहुंच गए. रात्रि 1 बजे वह लाहौरी एक्सप्रैस में सवार हो गए. उसी डिब्बे में तायल से दूरी बना कर सादी वरदी में पुलिस टीम सीओ मनोज कात्याल के नेतृत्व में सवार हो गई. रेल ने रफ्तार पकड़ी तो अपहर्त्ता ने तायल को फोन किया,

‘‘मोतीचूर रेलवे स्टेशन के पास एक रेलवे पुल आएगा. वहां हम टौर्च की रोशनी दिखाएंगे. तुम्हें सूटकेस बाईं तरफ नीचे फेंकना है.’’

‘‘ठीक है, मैं ऐसा ही करूंगा, लेकिन मेरा बेटा…’’

‘‘वह कल सुबह सकुशल तुम्हें मिल जाएगा. कोई भी चालाकी नहीं, समझे.’’ अपहर्त्ता ने गुर्रा कर कहा.

‘‘कुछ देर में रेलवे पुल आया. गिरीश तायल ने डिब्बे के गेट पर जा कर बाहर की तरफ देखा. उन्हें हाथ से हिलती हुई टौर्च की रौशनी का संकेत नजर आया तो उन्होंने सूटकेस नीचे फेंक दिया. यह इलाका सुनसान था. अंधेरा इतना था कि कोई दिखाई नहीं दिया. सूटकेस फेंकने के बाद सूटकेस फेंकने की बात उन्होंने अपहर्त्ता को बता दी.

उधर टे्रन में बैठे सीओ ने यह बात एसएसपी को बताई. चूंकि पुलिस टीम वाट्सऐप पर एकदूसरे से संपर्क में थी, इसलिए पुलिस अधिकारियों के निर्देश पर आननफानन में पुलिसकर्मी वहां पहुंचे, लेकिन तब तक सूटकेस कोई ले जा चुका था. तायल हरिद्वार जा कर रेल से उतर गए और वापस घर आ गए. पुलिस की सर्विलांस टीम अपहर्त्ताओं के फोन नंबरों के सहारे उन के पास तक पहुंचने की कोशिश में लगी थी.

अगली सुबह यानी पहली दिसंबर को तड़के तायल के पास एक अंजान नंबर से फोन आया. उन्होंने रिसीव किया तो दूसरी तरफ से हर्षित की आवाज आई. उस की आवाज सुनते ही तायल खुश हो गए. तायल ने उस से बात की तो उस ने बताया कि उसे अपहर्त्ताओं ने 5 बजे हरिद्वार सब्जी मंडी के पास छोड़ दिया था. वहां से पैदल चल कर वह एक चाय वाले के पास पहुंचा और उस से मोबाइल मांग कर उस ने उन्हें फोन किया. बेटे से बात करने के बाद वह पुलिस व घर वालों के साथ उस के पास पहुंच गए. बेटे को सकुशल पा कर तायल खुश थे. हर्षित की रिहाई सकुशल हो गई थी. अब पुलिस को अपहर्त्ताओं तक पहुंचना था. अपहर्त्ताओं ने जितने भी नंबरों का इस्तेमाल किया था, वे सभी नंबर सर्विलांस पर थे.

सभी नंबर बंद हो गए, लेकिन उन्होंने उन मोबाइलों में जो नए सिम डाले, वे पकड़ में आ गए. पुलिस को उन की लोकेशन हरिद्वार के जगजीतपुर की मिल रही थी. एसएसपी अजय रौतेला ने हरिद्वार की एसएसपी स्वीटी अग्रवाल से संपर्क कर सहयोग मांगा तो स्वीटी अग्रवाल ने जिला पुलिस की एक टीम को देहरादून पुलिस के साथ लगा दिया. लोकेशन के सहारे पुलिस टीमें एक घर तक पहुंच गईं. पुलिस के दस्तक देने पर एक व्यक्ति ने दरवाजा खोला. पुलिस को अपने सामने देख कर उस व्यक्ति के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं.

‘‘रकम का बंटवारा हो गया या अभी बाकी है.’’ उस व्यक्ति को घूरते हुए पुलिस ने पूछा और अंदर दाखिल हो गई. घर के अंदर अन्य लोग भी थे. अपने सामने पुलिस को देख कर सभी की हालत हारे हुए जुआरी जैसी हो गई थी. उन से पूछताछ की गई तो उन्होंने अपना अपराध स्वीकार कर लिया. पुलिस ने सभी 5 अपहर्त्ताओं को गिरफ्तार कर लिया. उन में एक युवती भी थी. अपहर्त्ताओं में हरिद्वार के जगजीतपुर निवासी संजय बालियान, उस का बेटा आशीष, बेटी मीनाक्षी, गुरदासपुर, पंजाब का आशी डेनियल व अमृतसर निवासी सरनजीत सिंह शामिल थे.

आशीष देहरादून में ही एक अस्पताल में फार्मासिस्ट था, जबकि सरनजीत सिंह देहरादून में ठेकेदरी के काम में मुंशी था. प्राथमिक पूछताछ के बाद अपहर्त्ताओं के पास से पुलिस ने वारदात में इस्तेमाल की गईं 2 कारें, 6 मोबाइल फोन व फिरौती की रकम भी बरामद कर ली. एक और चौंकाने वाली बात यह भी थी कि संजय बालियान ने वारदात में अपनी बेटी मीनाक्षी व बेटे आशीष को भी शामिल किया था. पुलिस सभी को गिरफ्तार कर के देहरादून ले आई. देहरादून पुलिस के लिए निस्संदेह यह बड़ी सफलता थी. अधिकारियों ने अपहर्त्ताओं से विस्तृत पूछताछ की तो हर्षित के अपहरण की बड़ी ही दिलचस्प कहानी सामने आई.

दरअसल, मुख्य आरोपी संजय बालियान सरकारी विभागों में ठेकेदारी करता था. वह मूलरूप से जनपद मुजफ्फरनगर के गांव किचौरी शाहपुर का रहने वाला था, लेकिन कई सालों से हरिद्वार में रहने लगा था. उस ने देहरादून व हरिद्वार के कई विभागों में सड़क, शौचालय व छोटेमोटे कामों की ठेकेदारी करने के साथ ही प्रौपर्टी का काम भी शुरू कर दिया. इन कामों में उस ने काफी पैसा कमाया. पैसा आने पर उस की लाइफस्टाइल बदल गई. वह शानोशौकत की जिंदगी जीने लगा. अपने बच्चों को भी उस ने ऐसी ही आदत डाल दी. जिस से उस के खर्चे बढ़ गए. इसी दौरान उसे ठेकेदारी में घाटा हो गया.

धंधा सही चल रहा था तो उस ने करोड़पति बनने का जो सपना देखा था, वह उसे धूमिल होता नजर आ रहा था. वक्त ने उसे ऐसे आर्थिक झटके दे दिए कि वह उन से उबर नहीं पाया. वह दिनरात इसी उधेड़बुन में लगा रहता था कि आखिर मोटी रकम कैसे कमाई जाए. उस का व्यवहार अपने बच्चों से दोस्ताना था. उस ने उन्हें अपने तरीके से जीने की पूरी आजादी दे रखी थी. इस का नतीजा यह निकला था कि बेटा आशीष अपने अंदाज में जिंदगी जीता था और बेटी मीनाक्षी अपने अंदाज में. आशीष के कदम बहक चुके थे. उस के अपने आवारा दोस्तों की मंडली थी. संजय के दिमाग में हर वक्त कोई लंबा हाथ मार कर रातोंरात करोड़पति बनने की ख्वाहिश हिलोरें लेती रहती थीं.

एक बार उस के दिमाग में विचार आया कि क्यों न किसी अमीर बाप के बेटे का अपहरण कर लिया जाए. इस काम में उस ने अपने बेटाबेटी को भी लालच दे कर शामिल कर लिया.

‘‘वह सब तो ठीक है, लेकिन हम अपहरण करेंगे किस का?’’ आशीष बोला.

‘‘मैं एक ऐसे आदमी को जानता हूं, जिस ने मोटा माल कमा रखा है. उसी के बेटे का हम अपहरण कर लेंगे.’’ संजय बालियान ने मुसकरा कर कहा.

‘‘कौन है वह?’’

‘‘देहरादून में एक इंजीनियर आर.के. राजा का बेटा. हमें उस से करोड़ों रुपए मिल सकते हैं.’’

‘‘लेकिन पापा क्या वह इस लायक होगा कि करोड़ों दे सके, क्योंकि लाखों के लिए तो काम करना बेकार है.’’‘‘वह मजबूत हैसियत वाला है. मैं ने भी उस का रसूख देखा है. देहरादून के इंजीनियर एनक्लेव में आलीशान कोठी है उस की.’’

‘‘तो क्या हम वहां से..?’’ आशीष ने जिज्ञासु बन कर पूछा तो संजय ने बताया, ‘‘हां हम यह काम देहरादून से ही करेंगे.’’

अपहरण की पृष्ठभूमि तैयार करने के बाद उन्होंने तय किया कि इस में देहरादून के भी किसी व्यक्ति को शामिल किया जाए. संजय पहले से ही अस्पताल में नौकरी करने वाले डेनियल व मुंशी सरनजीत को जानता था. डेनियल से संजय की मुलाकात अस्पताल आनेजाने के दौरान हुई थी. बाद में वह मीनाक्षी का भी दोस्त बन गया था. सरनजीत को संजय इसलिए जानता था, क्योंकि ठेकेदारी के दौरान वह मुंशी था. संजय ने बेटा, डेनियल व सरनजीत को करोड़पति बनने का सपना दिखा कर अपने साथ शामिल कर लिया. वे खुशीखुशी तैयार हो गए.

फिर सभी ने अपहरण की फूलप्रूफ योजना बना ली. योजना को सफलता के अंजाम तक पहुंचाने के लिए कई बार बौलीवुड की फिल्में किडनैप और अपहरण देखीं. बीएससी कर रही मीनाक्षी को कंप्यूटर की अच्छी जानकारी थी. उस ने हाईटैक ढंग से पुलिस को चकराने की सोची और पुलिस के सर्विलांस सिस्टम को अच्छे से समझा. फिरौती की रकम मांगने के लिए उन्होंने कई कंपनियों के सिमकार्ड भी खरीद लिए. सभी सिम फरजी आईडी पू्रफों पर अलगअलग जिलों से लिए गए थे. पुलिस को चकमा देने के लिए हरिद्वार के अलावा देहरादून, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर व छुटमलपुर जा कर फोन करने का प्लान बनाया.

इंजीनियर आर.के. राजा के बारे में संजय को ठेकेदारी करने के दौरान देहरादून में पता चल गया था कि वह बहुत अमीर है और उस का एक ही बेटा है. उस ने यह भी सुना था कि वह इंजीनियर्स एनक्लेव की किसी आलीशान कोठी में रहता है. अपहरण के लिए मीनाक्षी खुद मोहरा बनने को तैयार थी. वह कई बार देहरादून गई, लेकिन उन्होंने इंजीनियर राजा की कोठी समझ कर जिस कोठी को टारगेट किया, वह कोठी गिरीश तायल की थी. सभी रास्तों का नक्शा भी उस ने दिमाग में बैठा लिया. राजा के बेटे के रूप में उन्होंने हर्षित तायल की पहचान कर ली.

योजना को अंजाम देने के लिए सभी अकसर हरिद्वार से देहरादून जा कर सुबह दोपहर व शाम को एनक्लेव के बाहर ऐसी जगह खड़े हो जाते थे, जहां से तायल की कोठी दिखाई दे. उन की नजर में वह कोठी इंजीनियर राजा की थी. उन्होंने देखा कि हर्षित शाम को अकसर घर से बाहर निकलता है. ऐसे ही मौके पर उन्होंने उस का अपहरण करने की ठान ली. इस के लिए उन्होंने 21 नवंबर, 2014 की तारीख तय कर दी. अपहरण के लिए कार का इंतजाम जरूरी था. उन्होंने 2 कारों का इंतजाम करने की सोची. यह इसलिए सोचा कि अगर किसी एक पर शक हो जाए तो दूसरी का इस्तेमाल किया जाए.

21 नवंबर को संजय ने अपने एक परिचित से उस की सैंट्रो कार विवाह में जाने के बहाने मांग ली और देहरादून आ गया. मीनाक्षी का देहरादून में एक फेसबुक दोस्त था एहतेशाम. एहतेशाम ने दिल्ली के जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय से पढ़ाई कर के देहरादून में अपना फाइनेंस व प्रौपर्टी का काम शुरू कर दिया था. उस के पास हुंडई वरना कार थी. मीनाक्षी अपने भाई के साथ उस से मिली और एक दिन के लिए उस से कार देने को कहा. एहतेशाम ने उसे इनकार नहीं किया और अपनी कार उसे खुशीखुशी दे दी. सभी लोग कारों में सवार हो कर इंजीनियर्स एनक्लेव के बाहर पहुंच गए.

शाम के वक्त हर्षित स्कूटी ले कर निकला. मीनाक्षी बाहर निकल कर खड़ी हो गई, बाकी लोग उस के वापस आने का इंतजार करने लगे. लगभग आधे घंटे बाद हर्षित फोन रिचार्ज करा कर वापस आ रहा था. जैसे ही वह एनक्लेव के बाहर पहुंचा, वहां पहले से खड़ी मीनाक्षी ने उसे हाथ दे कर रोका. हर्षित ने स्कूटी रोकी. मीनाक्षी ने दिलकश अंदाज में अपनी बात कह कर एक कागज का टुकड़ा आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘‘क्या आप मुझे यह पता बता देंगे?’’

हर्षित ने पता पढ़ कर कहा, ‘‘यह थोड़ा आगे पड़ेगा.’’

‘‘प्लीज, आप मुझे वहां तक छोड़ दीजिए, नहीं तो मैं अकेली भटक जाऊंगी.’’

मीनाक्षी के अंदाज पर हर्षित इंकार नहीं कर सका. उस की मूक सहमति पा कर मीनाक्षी उस की स्कूटी पर बैठ गई. हर्षित उस के बताए पते पर उसे छोड़ने के लिए चल दिया. तब बाकी लोगों ने कारों से उस का पीछा करना शुरू कर दिया. थोड़ा आगे जाने पर मीनाक्षी ने मोबाइल पर बात करने का नाटक किया. उस ने इस तरह बातें कीं, जैसे सिग्नल न आने की वजह से बात करने में दिक्कत पेश आ रही हो. सुनसान जगह मिलते ही उस ने हर्षित से कहा, ‘‘प्लीज, 2 मिनट के लिए स्कूटी रोकिए, सिग्नल नहीं आ रहे. मुझे जरूरी बात करनी है.’’

हर्षित को जरा भी अंदाजा नहीं था कि वह जाल में उलझ चुका है. उस ने स्कूटी रोक दी. तभी एक कार में सवार अन्य लोग वहां आ कर रुके और उन्होंने बिना समय गंवाए हर्षित को खींच कर कार में डाल लिया. इस दौरान हर्षित की चप्पलें भी पैरों से निकल गईं. कार में आते ही डेनियल ने उस की पीठ में बेहोशी का इंजेक्शन लगा दिया. अस्पताल में नौकरी करने के चलते उसे बेहोशी के इंजेक्शन की जानकारी थी. इस बीच हर्षित के मोबाइल पर कई बार उस के पापा का फोन आया. फोन में नंबर पापा के नाम से फीड था. लगातार फोन आने पर अपहर्त्ताओं ने उस का मोबाइल बंद कर दिया. वह उसे ले कर हरिद्वार में जगजीतपुर स्थित संजय के घर पहुंच गए. सभी को विश्वास था कि उठाया गया शिकार राजकीय निर्माण निगम के इंजीनियर आर.के. राजा का बेटा है.

लेकिन जब उन्होंने 5 करोड़ की फिरौती मांगी तो पता चला कि उन्होंने आर.के. राजा के बेटे के धोखे में गिरीश तायल के बेटे हर्षित तायल का अपहरण कर लिया है. तब उन्होंने तायल से 5 के बजाए 2 करोड़ रुपए मांगे. बाद में डील 34 लाख रुपए में तय हो गई. योजना के अनुसार संजय मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, छुटमलपुर, देहरादून आदि जगहों से हर्षित के पिता को फोन किए. फिरौती की रकम मिलने पर अगले दिन अल सुबह वह हर्षित की आंखों पर पट्टी बांध कर कार से ले कर निकले. उसे किराए के लिए 200 रुपए दिए और सब्जी मंडी के पास छोड़ कर वापस आ गए.

अपना काम पूरा हो जाने के बाद उन्होंने अपहरण की बातचीत में इस्तेमाल किए गए मोबाइल सिमकार्ड तोड़ दिए. वाट्सऐप से हुई बातचीत का डाटा भी डिलीट कर दिया. अपनी सफलता से वे खुश थे, लेकिन अपराध की सफलता का जश्न बनाने से पहले ही पुलिस के शिकंजे में आ गए. पूछताछ के बाद सभी अभियुक्तों को अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. उत्तराखंड पुलिस की यह बड़ी सफलता थी. मुख्यमंत्री हरीश रावत ने खुलासा करने वाली टीम को एक लाख रुपए का इनाम देने की घोषणा की.

कथा लिखे जाने तक किसी भी आरोपी की जमानत नहीं हो सकी थी. चार दिनों बाद पुलिस ने 2 अभियुक्तों संजय व डेनियल को 12 घंटे की पुलिस रिमांड पर लिया. उन की निशानदेही पर हर्षित का हेलमेट व अन्य साक्ष्य एकत्र किए. बाद में संजय व डेनियल को न्यायालय में पेश कर के जेल भेज दिया. पुलिस मामले की तफ्तीश कर रही है. Uttarakhand Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आ

Police : जब रक्षक बन जाएं भक्षक

Police : कहने को तो पुलिस जनता की सुरक्षा और कानून का पालन कराने के लिए होती है, लेकिन वास्तविकता यह है कि एक सिपाही से ले कर अधिकारी तक को पद और वरदी का इतना घमंड होता है कि वे मौका मिलने पर इस का प्रदर्शन आम इंसान पर करते रहते हैं. बेकुसूर कारोबारी मनीष गुप्ता की हत्या कर थानाप्रभारी जगत नारायण ने भी यही जताने की कोशिश की कि…

26 सितंबर, 2021 को सुबह के करीब 8 बज रहे थे. बर्रा, कानपुर के रहने वाले 35 वर्षीय मनीष गुप्ता गहरी नींद से अभी सो कर उठे ही थे कि उन के फोन की घंटी बजी. उन के फोन पर गुड़गांव के रहने वाले उन के दोस्त और बिजनैस पार्टनर प्रदीप सिंह की काल आई थी. उन्होंने बिस्तर में लेटे हुए ही नींद से भरी आंखें खोलते हुए फोन रिसीव किया और खंखारते हुए बोले, ‘‘हैलो.’’

दूसरी तरफ से प्रदीप बोले, ‘‘हां भाईसाहब, अभी तक सो कर उठे नहीं क्या?’’

यह सुन कर मनीष की आधी खुली आंखें पूरी खुल गईं और उन्होंने अपने कानों से फोन हटा कर मोबाइल की स्क्रीन पर नजर डाली, यह देखने के लिए कि फोन किस ने किया है. उन्होंने स्क्रीन पर नाम देखा व तुरंत दोबारा कानों पर फोन लगा कर बोले, ‘‘अरे प्रदीप तू है. कहां तक पहुंचे तुम लोग? कानपुर पहुंचने में टाइम लगेगा क्या?’’

प्रदीप ने मनीष के सवाल का जवाब देते हुए कहा, ‘‘अरे हम लोग पहुंचने वाले हैं. 2 घंटे और लग जाएंगे. तू हमें कहां मिलेगा ये बता?’’ मनीष ने जवाब दिया.

‘‘मैं रेलवे स्टेशन पर आ जाऊंगा तुम्हें पिक करने के लिए,’’ कहते हुए मनीष ने फोन काटा और बिस्तर से उठ कर अपने दैनिक क्रियाकलाप में लग गए. समय होने पर मनीष ने बिना देरी किए उन के आने के ठीक आधे घंटे पहले रेलवे स्टेशन जाने के लिए अपने घर से निकल गए.  मनीष गुप्ता कानपुर में अपने इलाके में प्रौपर्टी डीलिंग का काम किया करते थे. हालांकि वह शुरू से प्रौपर्टी डीलर नहीं थे. पिछले साल जब देश भर में कोरोना की वजह से लौकडाउन लगाया गया, उस दौरान मनीष अपने परिवार के साथ नोएडा में रहते थे और वहां पर एक प्राइवेट बैंक के कर्मचारी थे.

लौकडाउन में जब छूट मिली तो वह अपने परिवार, जिस में उन की पत्नी मीनाक्षी गुप्ता और उन का 5 साल का बेटा था, के साथ अपने होमटाउन कानपुर में शिफ्ट हो गए थे और यहां उन्होंने प्रौपर्टी डीलिंग का काम शुरू किया. प्रौपर्टी डीलिंग का काम करते हुए उन की जानपहचान सैकड़ों लोगों से हुई, लेकिन उन में से मनीष के कुछ खास दोस्त भी बने, जिस में से एक प्रदीप भी थे. प्रदीप भी मनीष की तरह ही गुड़गांव में प्रौपर्टी डीलिंग का काम करते थे और मनीष के जोर देने पर वह अपने एक और दोस्त हरवीर सिंह के साथ उन से मिलने और घूमनेफिरने के लिए कानपुर आ रहे थे. प्रदीप और मनीष का प्लान सिर्फ कानपुर में घूमनेफिरने का नहीं था, बल्कि वे तीनों गोरखपुर भी जाने वाले थे.

गोरखपुर में मनीष और प्रदीप का एक और दोस्त चंदन पांडेय था. चंदन पिछले कई दिनों से प्रदीप को गोरखपुर आने का न्यौता दे रहा था. चंदन मनीष को पिछले 4-5 सालों से जानता था और प्रदीप से उस की मुलाकात मनीष ने ही करवाई थी, जिस के बाद वे काफी अच्छे दोस्त बन गए थे. चंदन ने गोरखपुर की काफी तारीफ की थी और कहा था कि योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद यहां बहुत विकास हुआ है. मनीष, प्रदीप, हरवीर का इरादा गोरखपुर में 2-3 दिन रहने, चंदन से मिलने और घूमनेफिरने का था. 26 सितंबर के दिन प्रदीप और हरवीर के कानपुर आने के बाद मनीष ने उन्हें कानपुर का टूर करवाया. मनीष दिन भर अपने दोनों दोस्तों के साथ कानपुर की मशहूर जगहों पर घूमे. उन्होंने साथ में अच्छे रेस्टोरेंट में खाना खाया, घूमेफिरे और खूब मस्ती की.

रात होने पर मनीष ने कानपुर में एक अच्छे पारिवारिक होटल में प्रदीप और हरवीर के लिए कमरा बुक किया, उन्हें होटल के कमरे तक ले गया, कुछ देर बातचीत की और अगले दिन आने का वादा कर के मनीष वहां से अपने घर जाने के लिए निकल गए. अगले दिन वे सुबह ही गोरखपुर के लिए निकलने वाले थे. इसलिए मनीष अगले दिन सुबह के 9 बजे ही होटल में पहुंच गए. प्रदीप और हरवीर दोनों ने रात को अच्छीखासी नींद ली, उन्होंने रेस्ट कर के दिन भर की अपनी थकान मिटाई और नहाधो कर तैयार हो लिए.  सुबह करीब 10 बजे वे गोरखपुर जाने के लिए होटल से निकल गए. कानपुर से गोरखपुर का रास्ता करीब 8 घंटों का था.

27 सितंबर की शाम 6 बजे तक तीनों गोरखपुर पहुंच गए. उन्होंने चंदन को इस बात की सूचना पहले ही दे दी थी. तीनों दोस्त थकेहारे गोरखपुर पहुंचे थे तो चंदन ने उन्हें और परेशान नहीं किया. चंदन ने अपने इलाके में गोरखपुर के तारामंडल में स्थित होटल कृष्णा पैलेस में तीनों के रुकने का इंतजाम करा दिया. तीनों एक ही साथ होटल के एक ही कमरे में ठहरे. गोरखपुर में तारामंडल का यह इलाका आसपास के इलाकों में सब से पौश इलाकों में एक माना जाता है. चारों ने मिल कर होटल में ठहरने से पहले बाहर खाना खाया. रात को साढ़े 11 बजे चंदन उन्हें होटल में ड्रौप कर सुबह जल्दी आने का वादा कर के अपने घर के लिए निकल गया.

चंदन अभी अपने घर के रास्ते में ही था कि उसे स्थानीय पुलिस रामगढ़ताल से फोन आया. उस ने अपनी बाइक रोड के किनारे रोकी और फोन उठा कर बोला, ‘‘हैलो.’’

दूसरी तरफ से आवाज आई, ‘‘हां भई, तेरे साथ के 3 दोस्त अभी कहां हैं?’’ यह सुन कर चंदन डर गया, उस ने फोन करने वाले इंसान की पहचान पूछी तो उसे पता चला कि ये थाने से फोन था. होटल में की मनीष गुप्ता की जम कर पिटाई दूसरी तरफ बात करने वाली पुलिस ने चंदन को हड़काते हुए, तीनों जिस होटल में जिस कमरे में रुके थे, उस की जानकारी ले ली. यह सब जानने के बाद चंदन ने अभी फोन डिसकनेक्ट किया भी नहीं था कि दूसरी तरफ से उसे गालियां देने की आवाज आई. यह सुन कर चंदन डरते हुए अपने घर की ओर चल पड़ा. लेकिन घर पहुंच कर उसे दाल में कुछ काला होने की भनक लगी. चंदन ने अपने मन का डर खत्म करते हुए बाइक घुमाई और सीधा होटल की ओर चल पड़ा, जहां पर उस के तीनों दोस्त ठहरे हुए थे.

उधर रात के करीब 12 बजे होटल कृष्णा पैलेस का रूम नंबर 512 खटखटाया गया. मनीष, प्रदीप और हरवीर तीनों नहाधो कर सो चुके थे. मनीष तो बेहद गहरी नींद में थे. लेकिन खटखटाहट की आवाज सुन कर हरवीर और प्रदीप जाग गए. प्रदीप ने लेटे हुए ही हरवीर से कहा, ‘‘अरे यार, इतनी रात को भला कौन परेशान करने आ गया. देख जरा हरवीर कौन है?’’

दरवाजे की खटखटाहट अब तेज होने लगी थी. हरवीर अपना थकान भरा शरीर ले कर उठा और उस ने गेट खोला. हरवीर ने देखा कि गेट पर कुछ पुलिस वाले आए हुए थे. इस से पहले कि हरवीर उन से कुछ कहता, थानाप्रभारी जगत नारायण सिंह और उस के साथ कुछ और पुलिसकर्मी हरवीर को अंदर की ओर धकेलते हुए खुद कमरे के अंदर आ घुसे और कमरे की लाइट जलाई. कमरे में उजाला फैला तो जगे हुए प्रदीप ने कमरे में पुलिस वालों को देखा और उठ कर पलंग पर बैठ गया. लेकिन मनीष गहरी नींद में ही था. थानाप्रभारी जगत नारायण सिंह ने उन्हें हड़काने वाले अंदाज में कहा, ‘‘ये एक रुटीन चैकिंग है. जल्दी से अपनी आईडी निकालो.’’

कमरे में मौजूद बाकी पुलिसकर्मी पूरे कमरे में फैल कर रखे सामान को अस्तव्यस्त करते हुए चैक करने लगे. प्रदीप और हरवीर ने पुलिसवालों से उलझना ठीक नहीं समझा. उन्होंने चुपचाप अपनेअपने बैग से अपनी आईडी निकाली और थानाप्रभारी के हाथों में सौंप दी. दोनों की आईडी देख लेने के बाद थानाप्रभारी ने पलंग पर एक ओर सो रहे मनीष पर नजर डाली और काफी देर तक गुस्से से घूरते रहे. घूरते हुए जगत नारायण सोते हुए मनीष के पास पहुंचे और उसे उठाने के लिए हाथ मारा. 2-3 हाथ मारने के बाद मनीष उठा और उस ने देखा की पुलिसकर्मी उस के सामने हैं. मनीष ने बेखौफ जगत नारायण के सामने कहा, ‘‘ये कोई समय नहीं है किसी को जगाने का. किस काम के लिए आए हैं आप लोग?’’

मनीष की बात पर थानाप्रभारी भड़क उठा, लेकिन उस ने फिर भी मनीष को जवाब दिया, ‘‘ये रुटीन चैकिंग है. अपनी आईडी निकाल जल्दी से.’’

मनीष ने थानाप्रभारी की बात सुन कर कहा, ‘‘हमारे दस्तावेज होटल रिसैप्शन पर जमा हैं, आप वहां से भी देख सकते थे. और वैसे भी हम कोई आतंकवादी तो हैं नहीं जो इस तरह से हमारी चैकिंग की जा रही है.’’

मनीष की इस बात से जगत नारायण सिंह का खून उबल पड़ा. उस ने अपने दांत पीसते हुए मनीष के बाल पकड़ते हुए कहा, ‘‘तू पुलिस को उस का काम सिखाएगा?’’

यह कहते हुए थानाप्रभारी ने मनीष के गाल पर जोर का एक चांटा मारा. उस चांटे से मनीष उबर पाता कि उस पर बाकी पुलिस वालों ने एकएक कर घूंसा जमाने शुरू कर दिए. दूसरी ओर दरवाजे के पास खड़े एक पुलिसकर्मी ने अंदर से गेट बंद कर दिया. अंदर सभी पुलिस वाले एकएक कर के मनीष को पीटते ही चले जा रहे थे. दोनों दोस्त डर की वजह से कुछ भी न कह सके. करीब 20-25 मिनट तक उन की जी भर के पिटाई करने के बाद जब जगत नारायण ने देखा कि मनीष के शरीर में कोई हलचल नहीं हो रही तो उस ने अपना होश संभाला.

उस ने मनीष का हाथ उठा कर उस की नब्ज चैक किया कि वह जिंदा है या नहीं. उस की नब्ज धीमी पड़ने लगी थी. एसएचओ ने अपने साथी पुलिस वालों को इशारा कर के मनीष को अस्पताल ले जाने के लिए कहा. मनीष गुप्ता को कर दिया मृत घोषित इधर पुलिसकर्मी अस्पताल पहुंचे और उधर चंदन भी होटल पहुंचा. उस ने कमरे में पहुंच कर बाकियों से बात की और उसे पता चला कि मनीष को बीआरडी अस्पताल ले जाया गया है. सुबह जब तक उस के परिवार वालों तक यह बात पहुंचती, उस से काफी पहले ही मनीष इस दुनिया को छोड़ कर जा चुके थे.

मनीष की मौत की जानकारी परिवार वालों को लगी तो मनीष की पत्नी मीनाक्षी गोरखपुर गई. पुलिस वालों के खिलाफ हत्या की एफआईआर लिखवाई. काररवाई के लिए थाने के बाहर धरना दिया. लेकिन पुलिस के बड़े अधिकारियों ने काररवाई करने के बजाय मामले में लीपापोती की कोशिश की. एक वीडियो भी सामने आया, जिस में एसएसपी और डीएम परिवार को केस दर्ज नहीं कराने के लिए मना रहे थे. डीएम विजय किरण आनंद कह रहे थे कि वो बड़े भाई के नाते समझा रहे हैं कि सुलह कर ली जाए.  गोरखपुर के एसएसपी ने शुरुआती जांच में इसे बिस्तर से गिर कर हुई मौत का मामला बताया था. जब मनीष गुप्ता की पत्नी काररवाई पर अड़ी रहीं और इस मामले को ले कर विवाद गहराया, तब कहीं जा कर 6 पुलिसकर्मियों के खिलाफ धारा 302 के तहत एफआईआर दर्ज की गई.

एफआईआर में 3 लोग नामजद और 3 अज्ञात थे. रामगढ़ताल थानाप्रभारी जगत नारायण सिंह, एसआई अक्षय मिश्रा और एसआई विजय यादव का नाम लिखा गया है. बाकी 3 आरोपी, एसआई राहुल दुबे, हैडकांस्टेबल कमलेश यादव और कांस्टेबल प्रशांत कुमार हैं. ये सभी 6 आरोपी पुलिस वाले सस्पेंड कर दिए गए. पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद भी पुलिस की तरफ से गिरने से चोट लगने वाली थ्योरी दी जा रही थी. एडीजी प्रशांत कुमार ने कहा कि भगदड़ में गिरने से चोट लगने की जानकारी मिली है. उधर मनीष की पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई तो उस में मनीष के शरीर पर 4 गंभीर चोटों की जानकारी मिली. उन के सिर में 5 सेंटीमीटर×4 सेंटीमीटर का घाव मिला. इस के अलावा दाहिने हाथ पर डंडा मारने के निशान, बाईं आंख और कई जगह पर हलके चोट के निशान मिले थे.

विपक्षी दलों ने किया प्रदर्शन विपक्षी पार्टियों की तरफ से इस मुद्दे को ले कर सरकार पर सवाल उठाए गए. 30 सितंबर को पूर्व मुख्यमंत्री और सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने परिवार से मुलाकात की थी और न्यायिक जांच की मांग की. सीएम योगी आदित्यनाथ ने भी मृतक के परिवार से मुलाकात की और उन से इस मामले को सीबीआई से जांच की सिफारिश की. साथ ही आरोपी पुलिसकर्मियों की गिरफ्तारी पर ईनाम भी घोषित कर दिया. इस मामले में मुख्य आरोपी थानाप्रभारी जगत नारायण सिंह और अक्षय मिश्रा को 10 अक्टूबर को रामगढ़ताल एरिया से पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया है. अक्षय मिश्रा की गिरफ्तारी के बाद एक बड़ा खुलासा हुआ है.

वारदात की रात जब मनीष की सांसें थम गई थीं और पुलिसकर्मियों को एहसास हो गया था कि उन की मौत हो गई है, तब आरोपी शव ठिकाने लगाने के प्रयास में जुटे थे. आखिर में जब उन्हें कोई रास्ता नहीं सूझा, तब वे बीआरडी मैडिकल कालेज पहुंचे थे. इसलिए उन को निजी अस्पताल से मैडिकल कालेज पहुंचने में करीब 2 घंटे का समय लगा. एसआईटी ने इस तथ्य को अपनी जांच में भी शामिल किया है. एसआईटी की जांच में यह तथ्य पाया गया कि बेजान मनीष को सब से पहले आरोपी पुलिस वाले जीप से ले कर पास के मानसी अस्पताल ले कर पहुंचे थे. वहां डाक्टर ने बताया कि मनीष की नब्ज नहीं मिल रही है, तत्काल इन को ले कर बीआरडी मैडिकल ले जाओ. अस्पताल प्रशासन ने मनीष को वहां से रेफर कर दिया था.

एसआईटी की जांच में सामने आया कि जब यहां से पुलिसकर्मी मनीष को ले कर रवाना हुए तो उन को यकीन हो गया था कि मनीष की मौत हो चुकी है. वे तकरीबन 2 घंटे बाद बीआरडी मैडिकल कालेज पहुंचे थे. जहां डाक्टरों ने मनीष को मृत घोषित कर दिया. लाश ठिकाने लगाना चाहते थे पुलिस वाले एसआईटी ने जब यह पता करना शुरू किया कि जिस दूरी को 10 मिनट में कवर करना था, उस में पुलिसकर्मियों को 2 घंटे क्यों लगे. तब सीसीटीवी फुटेज व अन्य तथ्यों से स्पष्ट हुआ कि आरोपी पुलिसकर्मी पहले थाने गए थे और उन्होंने गाड़ी भी बदली थी. इस पूरे समय में वे घूमते रहे थे. कुछ जगहों पर वे रुके भी थे.

इस दौरान मनीष के शव को ठिकाने लगाने के प्रयास में जुटे थे. उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि अब क्या करें. अंत तक जब समझ नहीं सके कि शव का क्या जाए तो वे सीधे मैडिकल कालेज पहुंचे. सूत्रों के मुताबिक एसआईटी की जांच में सामने आया कि जब गाड़ी में बेजान मनीष को ले कर पुलिसकर्मी घूम रहे थे तो एक पुलिसकर्मी ने इंसपेक्टर जगत नारायण सिंह से कहा कि शव को कहीं ऐसे ही फेंक देते हैं. बाद में लावारिस में बरामद होगा. आगे की जांच होती रहेगी. इस पर जगत नारायण ने कहा कि ऐसा करने से और फंस जाओगे. होटल से जब मनीष को ले कर चले थे तब उस के दोस्त व होटल प्रशासन मौजूद था. मानसी अस्पताल प्रशासन भी इस का गवाह है.

बाकी तमाम फुटेज में भी हम लोग कैद हुए हैं. लिहाजा मैडिकल कालेज चलने के अलावा दूसरा कोई रास्ता नहीं है. मामले के मुख्य आरोपी जगत नारायण सिंह और अक्षय मिश्रा की गिरफ्तारी के ठीक 2 दिनों बाद 12 अक्तूबर के दिन 2 अन्य आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया है. एसआई राहुल दुबे और सिपाही प्रशांत कुमार को मंगलवार की दोपहर गोरखपुर पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था. दोनों कोर्ट में हाजिर होने की फिराक में गोरखपुर आए थे. पुलिस ने आजाद चौक इलाके से दोनों को गिरफ्तार कर एसआईटी कानपुर के सुपुर्द कर दिया था. दोनों पर कानपुर पुलिस की ओर से एकएक लाख रुपए का ईनाम घोषित कर दिया गया था.

जानकारी के मुताबिक कारोबारी मनीष गुप्ता की हत्या में नामजद आरोपी राहुल दुबे और सिपाही प्रशांत कोर्ट में हाजिर होने के लिए गोरखपुर आए थे. इस की भनक गोरखपुर पुलिस को लग गई थी. लिहाजा एसएसपी डा. विपिन ताडा ने घेराबंदी कराई और अलगअलग टीमें लगा दीं. इसी बीच कैंट इंसपेक्टर सुधीर कुमार सिंह को मुखबिर से सूचना मिली कि आरोपी एसआई और सिपाही आजाद चौक चौकी के पास मौजूद हैं. दोनों वाहन पकड़ कर कचहरी जाने की फिराक में थे. सूचना मिलने के साथ ही कैंट इंसपेक्टर सुधीर सिंह, रामगढ़ताल इंसपेक्टर सुशील कुमार शुक्ला व फलमंडी चौकी इंचार्ज शेष कुमार शुक्ला पहुंच गए और दोनों आरोपियों को पकड़ लिया.

गिरफ्तार राहुल दुबे मिर्जापुर के कोतवाली देहात के मिश्र पचेर गांव का रहने वाला है, जबकि प्रशांत कुमार गाजीपुर के सैदपुर थानाक्षेत्र के भटौला गांव का रहने वाला है. इस कांड के 4 आरोपियों की गिरफ्तारी हो चुकी थी, जबकि 2 अभी भी फरार चल रहे थे. उधर उत्तर प्रदेश सरकार ने मृतक की पत्नी मीनाक्षी गुप्ता को 10 लाख रुपए की आर्थिक सहायता और कानपुर विकास प्राधिकरण में ओएसडी की नौकरी दे कर उन के दुखों पर मरहम लगाने की कोशिश की है. इस के अलावा सपा नेता अखिलेश यादव ने भी उन्हें 20 लाख रुपए की आर्थिक सहायता दी.

बहरहार, मीनाक्षी गुप्ता ने 11 अक्तूबर को कानपुर विकास प्राधिकरण में ओएसडी पद पर नौकरी जौइन कर ली. उन का कहना है कि आरोपी पुलिसकर्मियों को फांसी दिलाने तक वह अपना संघर्ष जारी रखेंगी. Police

 

UP Crime News : पति को टुकड़े कर सीमेंट से ड्रम में जमाया

UP Crime News : सौरभ राजपूत मर्डर केस के बाद प्लास्टिक का नीला ड्रम चर्चा में गया है. 27 वर्षीय मुसकान रस्तोगी ने प्रेमी साहिल शुक्ला के साथ सिर्फ विदेश में नौकरी करने वाले पति सौरभ राजपूत की क्रूरतम तरीके से हत्या की, बल्कि उस की लाश के टुकड़े कर ड्रम में डाल कर ऊपर से सीमेंट कंक्रीट का घोल भर दिया. जिस सौरभ के साथ उस ने घर से भाग कर शादी की थी, आखिर उसी के प्रति इतनी क्रूर कैसे हो गई मुसकानï? पढ़ें, लव क्राइम की यह चौंकाने वाली कहानी.

”साहिल, तुम्हें तो पता ही है कि हमारे प्यार की जानकारी पति सौरभ को हो चुकी है.

वह लगातार निगरानी कर रहा है. उस ने एक बार पहले तो किसी तरह तलाक का केस वापस ले लिया था, लेकिन इस बार वह लंदन से लौटने के बाद क्या गुल खिलाएगा, कुछ पता नहीं. मुझे तो लग रहा है कि उस के रहते हमारी प्रेम कहानी अधूरी रह जाएगी या फिर यह कोई ऐसा मोड़ न ले ले, जिस से हमारी जिंदगी नरक बन जाए. इस से बेहतर तो यही है कि सौरभ को ही ठिकाने लगा दिया जाए क्योंकि इस के अलावा अब हमारे सामने कोई रास्ता नहीं है.’’ मुसकान ने प्रेमी से कहा.

”किस तरह ठिकाने लगाया जाए?’’ साहिल ने सवाल दाग दिया.

”अरे, किसी सुपारी किलर से बात करो.’’

”मेरठ में इस तरह का कोई गैंग मेरी जानकारी में नहीं है और भाड़े के हत्यारे रकम भी बहुत मांगते हैं.’’ साहिल बोला, ”इतने हाईप्रोफाइल मर्डर के पता नहीं 10 लाख की डिमांड करें या 20 लाख की.’’

”जानू, फिर तुम्हीं कोई रास्ता बताओ. यह काम क्या तुम नहीं कर सकते?’’

साहिल शुक्ला ने इस पर चुप्पी साध ली.

”बोलते क्यों नहीं? बुजदिल हो क्या? मैं तुम्हारे लिए सब कुछ छोडऩे को तैयार हूं और तुम डर रहे हो. सौरभ लंदन से घर आने वाला है, इसलिए यह काम जल्द करना होगा.’’

यह बात नवंबर 2024 की है. मुसकान रस्तोगी इसी तरह प्रेमी साहिल शुक्ला के साथ पति सौरभ की हत्या की प्लानिंग कर रही थी कि उस की हत्या भी हो जाए और कोई उन पर शक भी न करे. उसी दौरान सौरभ राजपूत का नवंबर 2024 में लंदन से भारत आने का कार्यक्रम स्थगित हो गया. सौरभ ने सोचा कि फरवरी 2025 में ही अपने घर जाएगा, क्योंकि इसी महीने उस की पत्नी मुसकान और बेटी का जन्मदिन था. सौरभ का घर लौटने का कार्यक्रम स्थगित हो जाने पर दोनों प्रेमी युगल बहुत उदास हुए. जैसेतैसे दोनों मौजमस्ती करते रहे. साथ जीने की कसमें दोहराते रहे.

इस तरह साल 2024 गुजर गया. फिर अचानक फोन पर सौरभ राजपूत ने पत्नी मुसकान रस्तोगी को बताया, ”जानू, मैं फरवरी, 2025 में निश्चित रूप से मेरठ आ रहा है. तुम्हारा जन्मदिन भी सेलिब्रेट होगा और हम दोनों के प्यार की निशानी बेटी के जन्मदिन पर भी पार्टी करेंगे.’’

यह खबर मिलने पर फिर से मुसकान और साहिल सौरभ कुमार की हत्या करने की साजिश बुनने में सक्रिय हो गए. इस के बाद उन्होंने तय कर लिया कि वह सौरभ की हत्या किसी किलर से नहीं कराएंगे, क्योंकि किसी बाहरी व्यक्ति से हत्या कराने का राज कुछ दिनों में खुल ही जाता है. इसलिए उन्होंने खुद ही उस की हत्या करने का प्लान बनाया, जिस से उस की हत्या राज ही बन कर रह जाए. मुसकान और साहिल ने ये प्लान बनाया कि हत्या के बाद या तो लाश के टुकड़े कर के अलगअलग जगहों पर फेंक देंगे या फिर लाश को कहीं सुनसान जगह पर दबा देंगे. ऐसी सुनसान जगह भी वह खोजने लगे.

साहिल शुक्ला ऐसी जगह तलाशने लगा, जहां हिंदू मृतक बच्चों या मृत पशुओं को दफनाते हों. दोनों ने शव को दफनाने के लिए एक जगह की तलाश की. वे एक गांव पहुंचे, जहां मृत जानवरों को दफनाया जाता था. सौरभ के शव को ठिकाने लगाने के लिए उन्हें यही जगह सही नजर आई.

मुसकान ने कैसे बनाया हत्या का प्लान

अपनी योजना के अनुसार 22 फरवरी, 2025 को मुसकान मेरठ के शारदा रोड पर एक डाक्टर के पास गई. यहां उस ने डाक्टर को बताया कि वह डिप्रेशन का शिकार है. रात को उसे नींद नहीं आती, सिर मैं दर्द रहता है. डाक्टर ने परची पर दवाइयां लिख दीं. डाक्टर की लिखी हुई दवाइयों से वह संतुष्ट नहीं हुई. इस के बाद उस ने गूगल का सहारा लिया. उस ने नींद की दवा और नशीली दवाओं के बारे में जानकारी हासिल की. इस के बाद उस ने डाक्टर की लिखी हुई परची पर ही उसी की राइटिंग से मेल खाती राइटिंग में अतिरिक्त दवाओं के नाम भी जोड़ दिए.

इस के बाद वह और साहिल खैरनगर गए. योजनानुसार वहां उन्होंने नींद की गोलियों के अलावा कुछ और भी दवाइयां खरीदीं. दोनों ने इस के बाद 800 रुपए की कीमत वाले 2 ऐसे चाकू खरीदे, जो चाकू पशु वध करने वाले कसाई प्रयोग करते हैं. दुकानदार ने पूछा किस काम के लिए छुरा चाहिए तब मुसकान ने बताया कि कभीकभी मुरगा काटने के लिए काम में लेना है. ब्लीचिंग पाउडर, परफ्यूम और पौलीथिन कट्टा खरीदा. 2 मजबूत किस्म के टूरिस्ट बैग भी खरीदे गए. साहिल ने कहा कि सौरभ को शराब पीने का शौक है. उसे शराब में नशे की गोलियां मिला कर दे देना. फिर मुझे फोन करना, मैं आ जाऊंगा. दोनों मिल कर सौरभ की गरदन काट कर हत्या कर देंगे. लाश के टुकड़े कर के इन बैगों में भर लेंगे और उन्हें इस गांव में गड्ïढा खोद कर दबा देंगे.

25 फरवरी, 2025 की रात को मुसकान का जन्मदिन था. इसलिए 24 फरवरी, 2025 को सौरभ लंदन से मेरठ अपने घर आ गया. 25 फरवरी को पतिपत्नी और बेटी ने मिल कर मुसकान के जन्मदिन को सादा तरीके से ही सेलिब्रेट किया, क्योंकि 28 फरवरी को बेटी का छठा जन्मदिन था. उस के जन्मदिन को बड़े उत्साह और जोशोखरोश के साथ मनाए जाने की लालसा के साथ सौरभ राजपूत मेरठ स्थित अपने घर आया था. दूसरे यह कि उस के पासपोर्ट की डेट भी एक्सपायर होने जा रही थी, उस का रिन्यूअल भी कराना था. बेटी का जन्मदिन उन्होंने बड़े उत्साह के साथ मनाया. पतिपत्नी और बेटी ने जम कर डांस भी किया, यह वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रही हैं. अच्छे होटल से मनपसंद खाने का और्डर किया गया.

सब कुछ टेबल पर सजा दिया गया था. केक काटने के बाद सब से पहले बेटी को केक खिला कर जन्मदिन सेलिब्रेट किया गया. तीनों खाने की टेबल पर पहुंचे, तभी मुसकान ने अंगरेजी शराब का क्र्वाटर ला कर टेबल पर रख दिया. यह उच्च क्वालिटी की शराब  सौरभ लंदन से ही शौकिया इस्तेमाल करने के लिए लाया था. गिलास में नशीली गोलियां पीस कर डाल रखी थीं, जिस में शराब डाल कर सौरभ को दी जानी थी. लेकिन शराब का क्वार्टर देख कर ही सौरभ ने शराब पीने से इनकार कर दिया. उस ने कहा कि तबीयत ठीक नहीं है.

यह सुन कर मुसकान को गहरा धक्का लगा. इस से मुसकान रस्तोगी को लगा कि शायद सौरभ को उस पर कोई शक हो गया है. उस ने जल्दी से किचन में जा कर गिलास को धोया. 3 गिलास पानी ला कर टेबल पर रख दिए. उधर साहिल शुक्ला मुसकान का फोन न आने से बेचैन था. रात भर वह प्रेमिका मुसकान रस्तोगी के फोन का इंतजार करता रहा. नींद आंखों से कोसों दूर थी. अपनी तरफ से वह फोन कर नहीं सकता था, न ही कोई मैसेज भेज सकता था. वह जानता था, यदि सौरभ कुमार बेहोश नहीं हुआ होगा और उस ने फोन कर दिया तो सारी प्लानिंग फेल हो जाएगी. इधर मुसकान रस्तोगी की रात भी करवट बदलबदल कर ही कटी. फरवरी का महीना 28 दिन का था.

पहली मार्च को पतिपत्नी और बेटी ने शौपिंग की. घर पर मौजमस्ती की. रात को खाना होटल से ही मंगाया और खाना खा कर सो गए. 2 मार्च, 2025 को दोनों में तनातनी की बातें होने लगीं, लेकिन मुसकान ने उसे बहुत खूबसूरत अंदाज में टाल दिया. कहने लगी कि जानू, पुरानी बातों को भूल जाओ. मेरा इस संसार में तुम्हारे अलावा कोई नहीं है. मैं जिंदगी भर सिर्फ तुम्हारी ही बन कर रहूंगी. हम दोनों के बीच कभी कोई तीसरा नहीं आएगा. ऐसी प्यार भरी बातें सुन कर सौरभ राजपूत का दिल पिघल गया. उस ने आगे कोई मनमुटाव वाली बात नहीं की. मुसकान के दिमाग में तो अपनी योजना को पूरी करने का खाका घूम रहा था.

2 मार्च, 2025 का दिन मुसकान ने अपने पति से प्यार का नाटक कर के गुजार दिया. 3 मार्च को मुसकान ने कहा कि मैं मायके जा रही हूं. बेटी को भी मम्मी के पास छोड़ आऊंगी. फिर हम दोनों ही जवानी के इन खूबसूरत पलों का आनंद लेंगे. सौरभ इनकार नहीं कर सका. बात में कोई झोल भी नहीं थी. कोई साजिश भी नजर नहीं आ रही थी. यह बात 3 मार्च को दोपहर के खाना खाने के बाद की है.

सीने पर बैठ कर गोदा पति को

कुछ देर घर रुकने के बाद सौरभ राजपूत ने भी सोचा कि वह भी अपनी मम्मी के घर घूम आए. यहां उस की मम्मी बेचैनी से उस का इंतजार कर रही थी. क्योंकि करीब 2 साल बाद उन का बेटा लंदन से वापस मेरठ आया था. सौरभ को देखते ही मम्मी की आंखें भर आईं. मम्मी ने उस की पसंदीदा सब्जी लौकी के कोफ्ते बनाए. काफी शाम हो चुकी थी. उस की मम्मी बोली, ”खाना खा ले बेटा!’’

सौरभ कहने लगा, ”मम्मी, आप ऐसा करो कि लौकी के कोफ्ते की सब्जी मुसकान को भी बहुत पसंद है. आप पैक कर दो. हम दोनों साथ ही खा लेंगे.’’

उधर मुसकान ने प्रेमी से कह दिया कि हमारी योजना आज अंजाम तक पहुंच जाएगी. तुम तैयार रहना, मैं ने बेटी को भी अपनी मम्मी के घर छोड़ दिया है. कोशिश करूंगी कि आज रात को खाने में उस को नींद की गोलियां मिला कर दे दूं. सौरभ राजपूत अपनी मां के घर से लौकी के कोफ्ते पैक करा कर लाया था, मुसकान ने उस की सब्जी में नींद की गोलियां मिला कर उसे खिला दीं. इस तरह मुसकान ने अपने पति को बेहोश कर दिया. रात लगभग 11 बजे सौरभ गहरी नींद में सो गया. लगभग 12 बजे मुसकान ने प्रेमी साहिल शुक्ला को मुसकान ने फोन किया. साहिल करीब साढ़े 12 बजे मुसकान के घर पहुंच गया. साहिल शुक्ला ने भी चैक कर के देखा कि सौरभ राजपूत बेहोश है या नहीं.

पूरा यकीन हो जाने पर साहिल शुक्ला ने मुसकान को इशारा किया. इशारा पाते ही मुसकान सौरभ के सीने पर आ कर बैठ गई. तभी बाजार से लाया गया छुरा पति के सीने में घुसेड़ दिया. सौरभ की तेज चीख निकली, लेकिन नींद में होने की वजह से वह कोई विरोध नहीं कर सका. दूसरे साहिल ने उस के पैर दबोच रखे थे. इस के बाद जिस ने पैर पकड़े हुए थे, उस ने उस छुरे को पकड़ लिया और जिस ने छुरा पकड़ा हुआ था, उस ने पैरों को पकड़ लिया. फिर साहिल ने एक के बाद एक छुरे से सीने पर वार किए. सौरभ रो रहा था. गिड़गिड़ा रहा था. कह रहा था कि जैसा तुम कहोगे, मैं वैसा करूंगा. मुझे माफ कर दो, मुझे छोड़ दो. मैं तुम्हें तलाक दे दूंगा. मैं तुम से बहुत दूर चला जाऊंगा. तुम्हारी जिंदगी में कभी लौट कर नहीं आऊंगा. वह इस तरह से गिड़गिड़ाता चला गया, लेकिन दोनों पर इन बातों का कोई असर नहीं पड़ रहा था.

यह आवाज, दवाओं के नशे में दबी उस की चीखपुकार दोनों कातिलों के कानों तक पहुंच तो रही थी. मगर उस की चीख और उस की इल्तेजा का दोनों पर कोई असर नहीं पड़ रहा था. वह अपना काम बड़े इत्मीनान से बहुत आराम से कर रहे थे. आखिरकार लगभग 25 से 30 मिनट तक वह व्यक्ति ऐसे ही दर्द से तड़पता रहा और फिर दम तोड़ दिया. उस की नब्ज को टटोल कर देखने के बाद सौरभ राजपूत की लाश को दोनों खींच कर बाथरूम में ले गए. उस के हाथों को काट दिया गया. गरदन धड़ से अलग कर दी गई. ब्लीचिंग पाउडर से सब धो कर साफ किया गया.

उस के बाद साहिल शुक्ला जो बैग खरीद कर लाया था, उस में गरदन और हाथों को रख कर ठिकाने लगाने के लिए अपने साथ अपने घर ले गया. मुसकान कटे हुए शरीर के शेष भाग को डबल बैड में डाल कर उसी बैड पर लेटी रही. साहिल शुक्ला बैग ले कर वापस मुसकान के पास आया 4 मार्च की बात है. उस ने कहा कि कहीं दूर ले जा कर फेंकने का मौका नहीं लगा, इसलिए इसे ठिकाने लगाने का कोई और तरीका सोचते हैं. नई योजना के तहत दोनों ने घंटाघर से प्लास्टिक का एक बड़ा नीला ड्रम और स्थानीय बाजार से सीमेंट खरीदा.

हत्या के बाद शादी कर मनाया हनीमून

मुसकान के घर लौट कर उन्होंने धड़ को ड्रम में डाल दिया. उस के बाद साहिल ने सिर और हाथ निकाल कर सीमेंट और कंक्रीट का घोल ड्रम में डाल दिया. सीमेंट और कंक्रीट के घोल से उन्होंने ड्रम को सील कर दिया. इस तरह सौरभ के क्षतविक्षत शरीर को कंक्रीट की कब्र में दफना दिया गया. हत्या के बाद हिल स्टेशन घूमने का प्रोग्राम बनाया. साहिल ने एक ट्रैवल एजेंसी से हिमाचल के 15 दिनों के टूर के लिए 54 हजार रुपए में एक टैक्सी बुक की. ट्रैवल एजेंसी को सािहल ने अपना नाम विकास बताया था. मुसकान ने पड़ोसियों को बताया था कि वह कई दिन के टूर पर हिमाचल घूमने जा रही है.

4 मार्च, 2025 को टैक्सी ड्राइवर अजब सिंह की स्वीट डिजायर कार से मुसकान और टूर पर निकल गए. वह सब से पहले शिमला पहुंचे. वहां पर दोनों ने एक मंदिर में शादी की. उस के बाद हनीमून मनाने के लिए मनाली चले गए. शिमला के एक होटल में साहिल का जन्मदिन मनाने की मुसकान ने प्लानिंग की. मुसकान ने ड्राइवर अजब सिंह से एक केक मंगाया. उस से कहा गया कि इस बात को गुप्त रखना, क्योंकि वह साहिल को सरप्राइस देना चाहती थी. साहिल का जन्मदिन मनाया गया. इस दौरान उन्होंने केक काटा और डांस किया. केक काटते और किस करते दोनों का एक वीडियो भी वायरल हुआ है.

दोनों ने कसोल में होटल पूर्णिमा में 10 मार्च को चैकइन करने के बाद 16 मार्च तक वहां रहे. 6 दिनों तक ठहरने के दौरान उन्होंने ज्यादातर समय कमरे में ही बिताया. ड्राइवर को जितना भी पेमेंट किया, मुसकान ने ही अपने यूपीआई से किया था. साहिल ने पेमेंट कभी नहीं किया. कुल मिला कर टोटल जितने दिन वे टूर पर रहे, सभी पेमेंट मुसकान के मोबाइल से औनलाइन ही किया गया. सौरभ का मोबाइल भी मुसकान के पास ही था. वह लगातार उसी के मोबाइल से अपनी बेटी और अपने मम्मीपापा से भी कांटेक्ट कर रही थी और सौरभ के घर वालों से भी कांटेक्ट में थी. दोनों परिवारों को उस ने फोन से गुमराह किया.

शिमला की हसीन वादियों की तसवीर और वीडियो देख कर ये लोग समझते रहे कि सौरभ अपनी पत्नी मुसकान के साथ शिमला की वादियों में मौजमस्ती कर रहा है. 17 मार्च को रात के 10 -11 बजे के करीब शिमला से लौटे, तब मुसकान और साहिल एक साथ ही मुसकान के कमरे पर रुके. उन्हें अब तो किसी तरह का खौफ नहीं था. मुसकान का पति सौरभ अब ड्रम में कैद था. वह भी इस तरह से जो बाहर न निकल सके.

पेरेंट्स ने किया बेटी को पुलिस के हवाले

दोनों ने ड्रम का मुआयना किया. ड्रम इतना भारी था कि उन से खिसक नहीं रहा था. इस में से हलकीहलकी बदबू भी आ रही थी. सुबह उठ कर साहिल ने 3-4 मजदूरों की व्यवस्था की, जिस से ड्रम को कहीं ठिकाने लगाया जा सके. मजदूर इस मकान के दूसरे गेट से बुलाए गए, जोकि कभी प्रयोग में नहीं आता था. यह रास्ता एक पतली गली में खुलता है. मजदूरों ने ड्रम को निकालने की कोशिश की, लेकिन बहुत भारी होने तथा बदबू आने के कारण वे ड्रम को घर से बाहर नहीं निकाल सके. सो वे वापस चले गए. इस से मुसकान और साहिल दोनों घबरा गए. दोनों ने काफी  चिंतन किया कि अब क्या किया जाए. तो मुसकान ने कहा कि मैं अब अपने मम्मीपापा से सलाह करती हूं. उस के बाद सोचेंगे कि क्या करना है.

यह कह कर मुसकान ने अपनी मम्मी को फोन किया. फिर उस के बाद मायके पहुंची. मुसकान ने मम्मीपापा को पति सौरभ की हत्या करने की बात बताई. प्रमोद रस्तोगी और उन की पत्नी कविता रस्तोगी 18 मार्च, 2025 को मुसकान रस्तोगी उर्फ शोभी (27 साल) को साथ ले कर मेरठ के थाना ब्रह्मïपुरी पहुंच गए. वहां मौजूद एसएचओ रमाकांत पचेरी को उन्होंने बताया कि इस लड़की ने मेरे दामाद सौरभ राजपूत को बहुत बुरी तरह से मार दिया है. इस को गिरफ्तार कर के जेल भेज दो. उस के बाद इसे फांसी चढ़ा दो. हम अपनी इस बेटी को कभी देखना नहीं चाहते.

एसएचओ ने जैसे ही ये बात सुनी, उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ. वह सोचने पर मजबूर हो गए कि शायद ये भारत के पहले ऐसे मांबाप होंगे जो अपनी ही बेटी को फांसी चढ़ते हुए देखना चाहते हैं और ये पहले ही ऐसे मांबाप होंगे, जो अपनी बेटी का हाथ पकड़ कर थाने लाए हैं. एसएचओ रमाकांत पचेरी ने शुरुआती पूछताछ के बाद मामले की जानकारी उच्च अधिकारियों को दी. एसएचओ पुलिस फोर्स ले कर उस स्थान पर पहुंचे, जहां पर मुसकान रस्तोगी ने अपने प्रेमी साहिल शुक्ला के ठहरे होने का पता बताया था.

साहिल शुक्ला उस स्थान पर आराम से बेखौफ बैठा था. किसी तरह की घबराहट व शिकन उस के चेहरे पर नहीं थी. 2 सिपाहियों ने आगे बढ़ कर उसे हिरासत में ले लिया. आराम से बिना किसी झंझट के पुलिस साहिल शुक्ला को पकड़ कर थाने ले आई. साहिल शुक्ला ने भागने की भी कोई कोशिश नहीं की. उच्च अधिकारी भी सक्रिय हो गए. फिर दोनों से पूछताछ शुरू की गई. मैराथन पूछताछ के बाद एक नए तरह की हत्या का मामला सामने आया. किसी की हत्या कर के तंदूर, फ्रिज, सूटकेस, ईंट भट्ठा, डबल बैड, सेफ्टी टैंक आदि में लाश छिपाने के अनेक मामले देश में चर्चित हो चुके हैं. अब यह मामला सीमेंट ड्रम किलर के नाम से जाना जाएगा. दोनों ने पहले तो पुलिस को गुमराह करने की कोशिश की, लेकिन अलगअलग पूछताछ हुई तो उन्होंने पूरा सच उगल दिया.

हत्या के इस खुलासे ने मेरठ ही नहीं, पूरे प्रदेश और देश के लोगों की दिमाग की चूलें हिला दीं. पुलिस का अनुमान है कि यह तरीका शायद फिल्म देख कर दोनों को आया होगा. इतनी जानकारी मिलने पर पुलिस ने छापा मार कर ड्रम बरामद किया. उस में से  शव निकालने की कोशिश की. लेकिन कामयाबी नहीं मिली. पंचनामा भर कर उसे ऐसे ही पोस्टमार्टम हाउस भेज दिया गया. ड्रम मेरठ के एक सरकारी अस्पताल के मुर्दाघर पहुंचा. ड्रम जरूरत से ज्यादा भारी था, न यह ड्रम खुल पा रहा था, न ही इसे तोड़ा जा सका था. लिहाजा पुलिस ने तय किया कि इस ड्रम को मशीन से काटा जाए. कुछ देर में ही मशीन और मैकेनिक मुर्दाघर में बुला लिए गए. अब बारी ड्रम को काटने की थी.

बड़ी मशक्कत के बाद आखिरकार ड्रम को काटने में कामयाबी मिली. दरअसल, इस ड्रम के अंदर सीमेंट कंक्रीट का घोल भर दिया गया था, जिस की वजह से वह जम कर पत्थर की तरह सख्त हो चुका था. अब ड्रम काटने के बाद उस के अंदर जमे हुए सीमेंट के टुकड़ों को भी मशीन से काटने का काम शुरू हो गया. थोड़ी देर बाद सारे टुकड़े अलग हो गए. फिर उन्हीं टुकड़ों में से 4 टुकड़ों में बिखरी सौरभ राजपूत की लाश निकली. ड्रम में टुकड़ों में बंद होने के पूरे 14 दिन बाद काली पौलीथिन में सौरभ की लाश के 4 टुकड़े निकले. डाक्टरों की एक टीम द्वारा पोस्टमार्टम किया गया.

सीएमओ अशोक कटारिया ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट में कहा कि शव की हालत काफी खराब थी. बौडी को गलाने के लिए सीमेंट से प्लास्टर किया गया था. दांत हिल रहे थे. स्किन ढीली पड़ गई थी. गरदन के चारों तरफ घाव थे. दाएं कान से 7 सेंटीमीटर नीचे घाव मिला. जबड़े के दाईं ओर 4 सेंटीमीटर का घाव मिला. ठोड़ी से 6 सेंटीमीटर नीचे जख्म था. बाएं कान से 8 सेंटीमीटर नीचे और जबड़े के बाएं कोने से 4 सेंटीमीटर नीचे जख्म मिले. 3 जख्म बाईं छाती पर मिले. एक जख्म 6 सेंटीमीटर गहरा था. छुरी दिल को चीरते हुए निकल गई थी. सौरभ के पैर धड़ की तरफ मुड़े थे, जिन्हें सीधा करना मुश्किल हो गया था.

इस तरह दोनों शातिर कातिलों की गिरफ्तारी होने के बाद सौरभ हत्याकांड का खुलासा हुआ. इस सनसनीखेज मामले ने मेरठ को ही नहीं, बल्कि देश भर के लोगों को सन्न कर दिया. यह कहानी प्यार, धोखे और अपराध की एक दुखद मिसाल है, जहां एक प्रेम प्रसंग ने एक निर्दोष की जान ले ली. मुसकान उत्तर प्रदेश के महानगर मेरठ की मास्टर कालोनी, ब्रह्मपुरी क्षेत्र की रहने वाली थी. उस के परिवार में पेरेंट्स के अलावा एक छोटा भाई है. मुसकान के पापा प्रमोद रस्तोगी मेरठ में किराने की दुकान चलाते थे. मम्मी कविता रस्तोगी एक गृहिणी थीं, जो परिवार की देखभाल करती थीं. परिवार की आर्थिक स्थिति औसत है, न ज्यादा अमीर न ही गरीब.

मुसकान ने सौरभ से भाग कर की थी शादी

मुसकान अपने परिवार में सब से बड़ी संतान थी और शुरू में उसे घर में काफी लाड़प्यार मिला. पड़ोसियों के अनुसार, वह बचपन में शांत और आज्ञाकारी थी, लेकिन किशोरावस्था में आते ही उस का व्यवहार बदलने लगा. उस की पढ़ाई मेरठ के विवेकानंद स्कूल से शुरू हुई. मुसकान के नाना ज्योतिषी थे और सौरभ के परिवार के लोग मुसकान के घर जाते थे. इस दौरान दोनों में प्रेम प्रसंग हुआ. 2015 में जब मुसकान की सौरभ से दोस्ती हुई. दोनों के दिलों में प्यार का अंकुर फूटा और देखते ही देखते विशाल वृक्ष के रूप में फैल गया.

मुसकान की सुंदरता, बौडी लैंग्वेज व फिगर किसी फिल्मी हीरोइन से कम नहीं थी. सौरभ के शरीर से भी उस का यौवन छलक रहा था. इन के प्रेम प्रसंग की बात दोनों के परिवारों को पता लगी. अब दोनों ही ने अपनेअपने बच्चों को इस संबंध को खत्म करने की सलाह दी, लेकिन इन दोनों पर तो प्यार का भूत सवार हो चुका था. इन्होंने अपने घर वालों की कोई बात नहीं मानी और विवाह के लिए दबाव बनाने लगे. सौरभ एक राजपूत परिवार से था, जबकि मुसकान रस्तोगी थी. इस अंतरजातीय विवाह को ले कर दोनों परिवारों में असहमति थी. प्यार की खातिर मुसकान और सौरभ ने अपनेअपने परिजनों से बगावत कर दी और दोनों घर छोड़ कर फरार हो गए.

दोनों ही अपने घर वालों के लिए बहुत ही दुलारे और प्यारे थे. इसलिए दोनों को तलाश कर के घर बुला लिया गया. सौरभ राजपूत और मुसकान रस्तोगी के बीच प्रेम प्रसंग चलता रहा. सौरभ के घर वाले किसी भी कीमत पर मुसकान से विवाह करने के लिए राजी नहीं थे. अंजाम यह हुआ कि दोनों ने खुद निर्णय लेते हुए सन 2016 में प्रेम विवाह कर लिया. हालांकि मुसकान की जिद के आगे उस के पेरेंट्स को झुकना पड़ा. लेकिन सौरभ के परिवार ने इस शादी को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया था.

शादी के बाद मुसकान सौरभ के साथ इंदिरानगर फेज वन में किराए के मकान में रहने लगी. शादी के समय सौरभ मर्चेंट नेवी में दुबई में नौकरी कर रहा था. हालांकि शादी के एक साल बाद ही नौकरी छोड़ कर सौरभ राजपूत मेरठ वापस आ गया और यहीं दिल्ली रोड पर एक प्लाईवुड कंपनी में नौकरी करने लगा. अब उस की माली हालत पहले जैसी नहीं रही. दुबई में नेवी की नौकरी में खूब पैसा मिलता था. दुबई के रुपए की वैल्यू भी अथिक थी, जिस से भारतीय रुपए काफी मिल जाते थे. आर्थिक तंगी से जूझ रहे सौरभ ने अपने पेरेंट्स से संबंध नौरमल किए. समय के साथ स्थिति सामान्य हो गई. सौरभ के फेमिली वाले भी धीरेधीरे सामान्य हो गए, क्योंकि सौरभ अपनी मां से मिलने अकसर जाता रहता था. इस तरह मुसकान को ले कर अपने घर वापस आ गया.

2019 में उन की एक बेटी हुई. शुरुआती सालों में उन की गृहस्थी ठीक चली, लेकिन बाद में रिश्तों में दरारें आने लगीं. बेटी की पैदाइश के बाद मुसकान ने घर में कोहराम मचाना शुरू कर दिया. आए दिन सासससुर से झगड़ा होने लगा. सौरभ की स्थिति गले में हड्ïडी अटकने जैसी हो गई, जिसे न उगल सकता था न निगल सकता था. मुसकान को समझाने के सभी प्रयास विफल हो गए. तंग आ कर उस के मम्मीपापा ने दोनों को घर से निकालने की चेतावनी दे दी. मुसकान यही चाहती थी. इसी बात को ले कर झगड़ा और कोहराम मचाया करती थी.

सौरभ राजपूत के पिता का नाम मुन्नालाल राजपूत है. सौरभ का एक भाई राहुल उर्फ बबलू है. मां रेणु देवी हैं. परिवार मेरठ के ही ब्रह्मपुरी में रहता है. सौरभ के घर वालों ने मुसकान रस्तोगी के पेरेंट्स पर भी सौरभ हत्याकांड में शामिल होने का आरोप लगाया है. इन का कहना है कि जब उस की शादी हुई, हमारे घर में आ कर वो 2 साल तक बहुत अच्छे से रही. घर में हर चीज उसे हम ने उपलब्ध कराई. उस की दुबई में जौब थी. मुसकान का जैसे ही अपने मायके आनाजाना शुरू हुआ तो उस के तेवर बदलने लगे.

सौरभ दुबई चला गया था. उस के बाद मुसकान ने घर में बातबात पर लड़ाईझगड़ा शुरू कर दिया. कहने लगी कि तुम्हारे घर में भूत हैं, बलाएं हैं. हम उसे हमेशा टाल देते थे. मम्मी को बहुत परेशान करती थी. कभी भी रात में उठ जाती थी, सारे बरतन फेंकने लग जाती थी. 6 महीने की बेटी को भी जमीन पर रख कर धमकी देती थी कि मैं इसे फेंक दूंगी. उस की एक ही रट थी, मैं घर छोड़ कर जाऊंगी. मुझे जाने दो. तभी उस ने ये लाइन बोली थी कि मैं तुम्हें तुम्हारे लड़के का मुंह नहीं देखने दूंगी.

सौरभ अपनी पत्नी मुसकान के साथ मेरठ के इंदिरा नगर में किराए पर रहने लगा. मुसकान के महंगे शौक थे, जिस के चलते उस ने परिवार से दूरी बना ली. एक बार की बात है. करीब एक साल की उस की बच्ची लगातार रो रही थी. रोतेरोते काफी देर हो गई. उस के रोने की आवाजें मकान मालिक तक पहुंचीं. मकान मालिक जब उस बच्ची के पास पहुंचा तो उस ने उस की मम्मी को ढूंढना शुरू किया. उसे मुसकान एक पुरुष के साथ आपत्तिजनक स्थिति में मिली. मकान मालिक को उसे बहुत बुरा लगा. हालांकि मुसकान को भी यह बात पता चल गई थी कि मकान मालिक ने उसे इस हालत में देख लिया है.

बाद में उस ने मकान मालिक को शांत करने की कोशिश की. उस के हाथपैर जोड़े, लेकिन मकान मालिक शांत नहीं हुआ. बल्कि उस ने सीधे सौरभ को फोन मिलाया और कहा कि तुम्हारी पत्नी को मैं ने किसी दूसरे मर्द के साथ आपत्तिजनक हालत में देखा है. तुम अपना घर बिगडऩे से बचा सकते हो तो बचा लो. सौरभ ने अपनी पत्नी को डांटाफटकारा. मुसकान ने भी कसम खाई कि ऐसी गलती कभी दोबारा नहीं करेगी. यह बात आईगई हो गई.

पेरेंट्स के प्यार से अछूता रहा साहिल

साहिल शुक्ला मेरठ के ब्रह्मपुरी इलाके का रहने वाला था. उस की पारिवारिक स्थिति काफी अस्थिर रही. साहिल की नानी सरोजनी शुक्ला के बयान के अनुसार, उस की मम्मी ज्योति का निधन 18 साल पहले हो चुका था, जब वह काफी छोटा था. उस के पापा नोएडा में काम करते थे. उन्होंने दूसरी शादी कर ली थी. इस तरह साहिल का बचपन मम्मी की गैरमौजूदगी और पिता की कम मौजूदगी के बीच बीता, जिस ने शायद उस के व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव डाला. वह अपने नानानानी के साथ रहता था. साहिल की नानी सरोजिनी शुक्ला ने बताया कि साहिल ऊपर के कमरे में रहता था. लैपटाप पर कुछ काम करता रहता था. उन्हें उस के बारे में कोई जानकारी नहीं है. उस की पढ़ाई का खर्चा उस के पापा कभीकभी भेज दिया करते थे.

साहिल और मुसकान की दोस्ती स्कूल के दिनों से शुरू हुई थी. दोनों मेरठ के विवेकानंद स्कूल में आठवीं कक्षा तक साथ पढ़े थे. इस के बाद दोनों के रास्ते अलग हो गए. लेकिन सालों बाद विवेकानंद स्कूल में आठवीं तक साथ पढऩे वाले स्टूडेंट्स ने एक वाट्सऐप ग्रुप बनाया. साहिल और मुसकान भी उस ग्रुप में मेंबर बने थे. यहां से दोनों की फिर से बातचीत शुरू हुई. मुसकान की शिक्षा ज्यादा आगे नहीं बढ़ी. वह आठवीं के बाद पढ़ाई छोड़ चुकी थी. वहीं साहिल ने अपनी पढ़ाई जारी रखी.

साहिल के कमरे में पुलिस को शराब की बोतलें, बिखरे कपड़े और दीवारों पर तंत्रमंत्र से जुड़ी अजीबोगरीब तसवीरें मिलीं. कमरे में भगवान शिव की तसवीरों के साथसाथ साधना और तंत्र से जुड़े चित्र मिले, जो उस ने खुद बनाए थे. मुसकान ने इस कमजोरी का फायदा उठाया और स्नैपचैट पर फरजी आईडी बना कर साहिल को यह विश्वास दिलाया कि उस की मृत मम्मी की आत्मा उस से बात कर रही है और सौरभ की हत्या का आदेश दे रही है.

साहिल इस बहकावे में आ गया, जो उस की आसानी से प्रभावित होने वाली मानसिकता को दिखाता है. पुलिस का मानना है कि वह इस बहाने खुद को कानूनी सजा से बचाने की कोशिश भी कर रहा है. पुलिस ने साहिल शुक्ला और मुसकान उर्फ शोभी से पूछताछ करने के बाद उन्हें कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. सीमेंट ड्रम किलर की पूरी कमान एसपी (सिटी) मेरठ आयुष विक्रम सिंह संभाले हुए हैं. पूरे मामले की हर पहलू से जांच कराई जा रही है. मुसकान रस्तोगी और साहिल शुक्ला जेल में बंद हैं. अभी तक कोई भी दोनों के परिवार में से जेल में उन से मुलाकात करने नहीं गया.

बेटी इस समय अपनी नानी के घर है. क्योंकि सौरभ राजपूत के अपने घर वालों से संबंध ज्यादा अच्छे नहीं थे. पापा ने तो अपनी चलअचल संपत्ति से भी सौरभ राजपूत को बेदखल कर दिया था. घटना की खबर भाई को भी लाश मिलने के बाद हुई थी. भाई राहुल की तहरीर पर ही मुकदमा दर्ज किया गया था. UP Crime News