आखिरी गुनाह करने की ख्वाहिश

आखिरी गुनाह करने की ख्वाहिश – भाग 4

2 दिनों तक दोनों आपस में खिंचे खिंचे रहे. तीसरे दिन चुनन शाह ने कहा, ‘‘भावल, मैं मानता हूं कि मैं ने गलती की है. लेकिन वादा करता हूं कि अब आगे कभी इस तरह का घटिया काम नहीं करूंगा.’’

चुनन शाह की इस बात से भावल खान खुश हो गया. सुगरा छिपछिप कर दोनों की बातें सुनती रहती थी. उस ने भावल से कई बार कहा था कि चुनन शाह से पीछा छुड़ा ले. वह कहती थी कि चुनन शाह अच्छा आदमी नही है. तब वह जवाब में कहता, ‘‘सुगरा, मैं भी अच्छा आदमी नहीं हूं.’’

एक दिन अचानक चुनन शाह ने भावल खान से कहा, ‘‘भावल, इस बार तुम्हारी पसंद का काम मिला है. लेकिन काम थोड़ा जटिल है.’’

भावल खान को ऐसे ही काम करने में मजा आता था. वह तैयार हो गया. चुनन शाह ने अपने किसी पुराने साथी के साथ डकैती की योजना बनाई थी. बहुत बड़ी रकम हाथ लगने वाली थी. लेकिन काम सचमुच जटिल था.

उन्हें करेंसी से भरी वैन को लूटना था. उस वैन का ड्राइवर उन की पहचान का था, जो उन की मदद कर रहा था. योजना के अनुसार, वैन से नोटों के बैग उतार कर एक कार से फरार होना था. चुनन शाह ने कार की भी व्यवस्था कर ली थी. भावल खान सुगरा से 2 दिन बाद लौटने की बात कह कर चुनन शाह के साथ चला गया.

अगले दिन सुबह योजना को अंजाम देना था. लेकिन रात को जिस होटल में वे ठहरे थे, वहां पुलिस ने छापा मार कर उन्हें पकड़ लिया. थाने पहुंचने पर पता चला कि उन का तीसरा साथी, जो पहले से ही किसी मामले में वांछित था, उसे दोपहर में ही आते समय पुलिस ने रास्ते से पकड़ लिया था. उसी ने अगले दिन वैन लूटने के बारे में बता कर बाकी लोगों को गिरफ्तार करवा दिया था.

पकड़े जाने के बाद भावल खान को अपने मरहूम बाप की वह बात याद आ गई कि चोर हमेशा अकेला ही कामयाब होता है. लेकिन इस बार भावल खान शहरी लोगों के चक्कर में फंस गया था. उस ने कहा था कि वह इन लोगों को जानता ही नहीं. पुलिस ने जिस आदमी को गिरफ्तार किया था, वह उसे आज ही मिला था.

पुलिस वाले 7 दिनों का रिमांड ले कर भावल खान की धुनाई करते रहे, लेकिन उस से कुछ नहीं उगलवा सके. हार कर उन्होंने उस पर आवारागर्दी का मुकदमा कायम कर जेल भेज दिया. वहां उस की कोई जमानत लेने वाला नहीं था. उसे सुगरा की चिंता थी, लेकिन वह मन को तसल्ली देता कि चुनन शाह तो है ही.

6 महीने बाद भावल खान जेल से बाहर आया. जेल में उस से मिलने न चुनन शाह आया था, न सुगरा. इसलिए उसे चिंता हो रही थी कि कहीं कोई गड़बड़ तो नहीं हो गई. इसलिए जेल से बाहर आते ही वह सीधे उस मकान पर जा पहुंचा, जहां वह रहता था. वहां दोनों नहीं थे. पड़ोसियों से पूछने पर पता चला कि चुनन शाह पंजाब जाने की बात कर रहा था.

भावल खान पंजाब जा पहुंचा. बुआ के घर गया तो पता चला कि सुगरा वहां भी नहीं आई थी. भावल का दिल धक से रह गया. वह समझ गया कि चुनन शाह अपना काम कर गया.

बुआ से पैसे ले कर भावल खान चल पड़ा. शकल सूरत काफी हद तक बदल गई थी, इसलिए वह आसानी से पहचाना नहीं जा सकता था. वह सुगरा और चुनन शाह को गली गली ढूंढ़ता रहा, लेकिन दोनों में से कोई नहीं मिला. इस तरह उसे 5 साल बीत गए.

एक दिन वह शहर के रेडलाइट एरिया से गुजर रहा था तो एक दलाल उस से टकरा गया. उस के लिए यह दुनिया नई नहीं थी. दलाल उसे उस कोठे पर ले गया, जहां उस के जीवन की सब से दर्दनाक स्थिति उस का इंतजार कर रही थी.

भावल खान के सामने बहुत सारी लड़कियां खड़ी थीं, उन में एक सुगरा भी थी. वह हड्डियों का ढांचा बन चुकी थी. उसे देख कर भावल की आंखें फटी की फटी रह गईं. भावल उस की ओर लपका तो वह पागलों की तरह भागी. उस ने लपक कर उस का बाजू पकड़ लिया. उस के मुंह से मुश्किल से निकला, ‘‘सुगरा, तुम यहां?’’

‘‘भावल, खुदा के लिए मेरा नाम मत लो. मुझे छुओ भी मत. सुगरा मर चुकी है.’’

पता नहीं सुगरा क्याक्या बकती रही. भावल उस के साथ एक कमरे में बैठा था. दलाल अपना काम कर के चला गया था. सुगरा ने रोरो कर उसे बताया कि चुनन शाह ने आ कर उस से कहा था कि वह पुलिस मुठभेड़ में मारा गया. अब पुलिस यहां छापा मारने वाली है.

इस के बाद चुनन शाह घर पहुंचाने के बहाने सुगरा को कार से इस अड्डे पर पहुंचा गया था. यहां आने पर उसे पता चला कि वह औरतों का पुराना दलाल था और मुद्दत से औरतों का अपहरण कर के बेचने का धंधा कर रहा था.

सुगरा की कहानी उन बदनसीब लड़कियों से मिलती जुलती थी, जो ऐसे अड्डों तक पहुंचा दी जाती थीं. उस ने भावल को यह भी बताया था कि उस ने 3 बार आत्महत्या करने की कोशिश की थी, लेकिन यहां के लोगों ने उसे मरने भी नहीं दिया था.

भावल ने जब सुगरा से साथ चलने को कहा तो वह बोली, ‘‘भावल, यहां बहादुरी से काम नहीं चल सकता. ये बड़े असरदार लोग हैं. तुम कल दोपहर को गली के अगले वाले चौराहे पर जो डाक्टर है, उस के यहां मिलना. मैं वहां दवा लेने के बहाने जाती हूं. वहां से हम निकल चलेंगे.’’

मजबूर हो कर भावल खान वापस आ गया. रात उस ने करवटों में काटी. योजना के मुताबिक वह डाक्टर के यहां पहुंच गया. लेकिन सुगरा नहीं आई. शाम तक वह उस का इंतजार करता रहा. रात में वह उस के अड्डे पर पहुंचा तो पता चला कि उस ने रात को ही नींद की गोलियां खा कर आत्महत्या कर ली थी. उसे एक लावारिस के रूप में दफना दिया गया था.

इस खबर ने भावल खान को बेचैन कर दिया था. उस की समझ में आ गया था कि उस हालत में सुगरा उस के साथ जाना नहीं चाहती थी. इस के बाद भावल के जीवन का एक ही मकसद रह गया था कि कैसे भी हो, वह उन लोगों को चुनचुन कर मार दे, जिन्होंने उस की सुगरा को और उसे जीतेजी मार डाला था. इस के बाद वह अपने मकसद को पूरा करने के लिए निकल पड़ा.

एक हफ्ते के अंदर भावल ने 10 लोगों को मार दिया था. ये सब वे लोग थे, जिन का सुगरा की बरबादी में किसी न किसी रूप में हाथ था. चुनन शाह न जाने कहां गायब हो गया था. भावल उसे ढूंढ़ता रहा. पुलिस उस के पीछे हाथ धो कर पड़ी थी.

अचानक भावल खान ने रूप बदल कर अपराधों से तौबा कर के दुकान खोल ली. अब वह एक आखिरी गुनाह करने के लिए खुदा से दुआ मांग रहा था कि किसी तरह चुनन शाह मिल जाए और वह उस दुष्ट से इस दुनिया को छुटकारा दिला दे.

भावल ने जो पाप किए थे, उन की माफी मांगने और मन की शांति के लिए कभीकभी वह धर्मगुरुओं के यहां भी चला जाता था. यही उस के लिए फायदेमंद साबित हुआ. एक दिन उसे एक धर्मगुरू के गांव में आने के बारे में पता चला तो वह उन से मिलने पहुंच गया. वहीं भावल को मंजिल मिल गई. उसी पीर के चेलों में चुनन शाह भी था. वह अपना रूप बदले हुए था.

लोग उसे बाबा चुनन शाह के नाम से पुकार रहे थे. भावल समझ गया कि उस ने यह रूप भी अपने धंधे को आगे बढ़ाने के लिए बना रखा है. भावल ने पीछा कर के उस के ठिकाने का पता लगा लिया. फिर एक दिन उस ने उस के साथियों के सामने ही उसे कुत्ते की मौत मार दिया.

भावल ने उस की हत्या कुल्हाड़ी से काट कर की थी. उसे काटते हुए वह चिल्ला चिल्ला कर कह भी रहा था, ‘‘सुगरा का बदला ले रहा हूं. मैं बहराम खान का बेटा भावल खान हूं, जिस ने भी मेरी इज्जत से खेला है, उसे जिंदा रहने का कोई अधिकार नहीं है.’’

भावल खान को रोकने की कोई हिम्मत नहीं कर सका था. वहां से वह सीधे अपने गांव गया. पिता की कब्र पर हाजिरी दी. कानूनी दस्तावेज तैयार करा कर अपनी सारी जमीन बुआ के बेटों को दे दी.

इस के बाद वहां पहुंचा, जहां नियाज अली के रूप में रह रहा था. वहीं से उसे पुलिस ने पकड़ लिया. उस का कहना था कि अगर वह चाहता तो पुलिस उसे कभी न पकड़ पाती. लेकिन अब उस की जिंदगी का कोई मकसद नहीं रह गया था, क्योंकि उस की आखिरी गुनाह करने की जो ख्वाहिश थी, वह पूरी हो गई थी.

आखिरी गुनाह करने की ख्वाहिश – भाग 3

2 हथियारबंद लोगों ने बहराम खान का पीछा किया और वहां से लगभग एक फरलांग की दूरी पर उसे घेर लिया. निहत्था और घायल होने के बावजूद बहराम ने कायर की मौत मरने के बजाय एक पर छलांग लगा दी. उस की गरदन उस के कब्जे में आ गई. बहराम कुछ कर पाता, उस के पहले ही उस के साथी ने बहराम के सिर में एक के बाद एक कर के 6 गोलियां उतार कर अपने साथी को बचा लिया.

इस हमले में भावल खान के पिता तथा उम्मीदवार के साथ 2 अन्य लोग मारे गए. बाकी लोग गंभीर रूप से घायल हुए. विरोधी उम्मीदवार पुलिस की मिलीभगत से पहले ही जेल जा चुका था, इसलिए उस का इस मामले में बाल भी बांका नहीं हो सका.

भावल खान ने अपने पिता को दफनाते समय कसम खाई थी कि वह बाप की मौत का बदला जरूर लेगा. इस के लिए उसे कितनी ही कीमत क्यों न चुकानी पड़े.

बहराम खान ने उसे सिखाया था कि चोर हमेशा अकेला ही कामयाब होता है. लेकिन उस ने बाप का यह नियम चुनन शाह पर विश्वास कर के तोड़ दिया था.

चुनन शाह से भावल खान की दोस्ती हो गई थी. था तो वह भी अपराधी, लेकिन वह दूसरे तरह के अपराध करता था. वह औरतों को बहला फुसला कर ले जाता और कोठों पर बेच देता था. लेकिन उस ने भावल खान को कभी इस की भनक नहीं लगने दी थी. उस ने उस से बताया था कि वह तसकरी करता है.

जिस आदमी ने बहराम खान को मारा था, उसे पता था कि इस इलाके में भावल खान के अलावा कोई दूसरा उस का कुछ नहीं बिगाड़ सकता. शायद इसीलिए उस ने भावल से दोस्ती करने के लिए खूब कोशिश की. लेकिन भावल को तो उस से बदला लेना था. वह दोस्ती कर के उस से बदला नहीं ले सकता था. क्योंकि किसी के साथ धोखेबाजी करना उसे पसंद नहीं था.

चुनन शाह बहुत ही कमीना आदमी था. समय के साथ वह अपने रूप बदलता रहता था. भावल खान के साथ वह इसलिए लगा रहता था, क्योंकि उसे उस के विरोधियों से भावल के अलावा और कोई नहीं बचा सकता था. भावल भी उसे इसलिए साथ रखता था, क्योंकि उस ने उसे नएनए हथियार दिलाए थे. फिर दूसरे इलाकों में भी चुनन शाह की अच्छी जानपहचान थी, इसलिए जरूरत पड़ने पर वह छिपने की व्यवस्था करा सकता था.

आखिर वह मौका आ गया, जिस का भावल खान को बेचैनी से इंतजार था. मध्यावधि चुनाव की घोषणा हो गई. चुनाव प्रचार भी शुरू हो गया. विरोधी उम्मीदवार एक गांव से चुनाव सभा कर के लौट रहा था तो रात हो गई. भावल चुनन शाह के साथ रास्ते में घात लगा कर बैठा था. जैसे ही उस उम्मीदवार की जीप उन के सामने आई, उन्होंने गोलियों की बौछार कर दी, साथ ही हथगोले भी फेंके.

किराए के लोग ऐसे मौकों पर मरना नहीं चाहते. उस विरोधी उम्मीदवार के साथी भी अपनी जान बचाने के लिए गाडि़यों से कूदकूद कर भागे. उम्मीदवार और उस के 2 साथी मारे गए. उन की मौत की पुष्टि हो गई तो भावल चुनन शाह के साथ भाग निकला. भागने की तैयारी उन्होंने पहले से ही कर रखी थी.

अगले दिन भावल चुनन शाह के साथ एक सुरक्षित स्थान पर पहुंच गया. वहां चुनन शाह की जानपहचान काम आई. उस ने वहां रहने के लिए एक कमरा किराए पर ले लिया. चुनन शाह के साथ भावल वहां 3 महीने तक रहा. एक दिन चुनन शाह को बिना बताए ही भावल अपनी बुआ के यहां चला गया. उस के पिता ने बचपन में ही उस की शादी बुआ की बेटी से तय कर दी थी. बुआ उसे देख कर हैरान रह गई.

‘‘बुआजी, आप को घबराने की जरूरत नहीं है.’’ भावल खान ने कहा, ‘‘मैं पिताजी की बात का मान रखने आया हूं, क्योंकि वह चाहते थे कि मेरी शादी सुगरा से हो. मेरे बारे में आप को सब पता ही है. अगर तुम मना भी कर दोगी तो मुझे कोई ऐतराज नहीं होगा. फिर भी मैं चाहता हूं कि पिताजी की आत्मा को दुख न हो.’’

‘‘तू मेरे भाई की निशानी है,’’ बुआ ने भावल के गालों को चूमते हुए कहा, ‘‘तू अच्छा हो या बुरा, बेटियों का भाग्य ईश्वर लिखता है. सुगरा तेरी अमानत है, तू इसे ले जा.’’

तीसरे दिन एक साधारण से समारोह में सुगरा और भावल खान की शादी हो गई. चुनन शाह ने हर काम में एक सगे भाई की तरह बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया. चुनन शाह की सलाह पर भावल सुगरा को ले कर कराची आ गया.

कराची की भीड़भाड़ में भावल खान समा गया. उस ने अपना नाम नियाज अली रख लिया. इसी नाम से उस ने अपना पहचान पत्र भी बनवा लिया और 3 कमरों का बड़ा सा मकान ले लिया था. आगे वाले कमरे में चुनन शाह रहता था, बाकी के पीछे के 2 कमरों में नियाज अली सुगरा के साथ रहता था. यहां उन की जिंदगी आराम से कट रही थी.

समय के साथ बड़ेबड़े खजाने खाली हो जाते हैं. यही भावल खान के साथ भी हुआ. कुछ दिनों में उस की जमापूंजी खत्म हो गई. इस बीच सुगरा उस से कहती रही कि वह पुरानी जिंदगी भूल कर कोई छोटामोटा काम कर ले. लेकिन उसे जो चस्का लग चुका था, वह जल्दी छूटने वाला नहीं था. उस ने कभी भी मामूली चोरी तक नहीं की थी.

चुनन शाह बहुत ही कमीना आदमी था. उस ने देखा कि भावल खान परेशान है तो एक दिन बोला, ‘‘भाईसाहब, इस तरह कब तक काम चलेगा. कहीं न कहीं हाथ मारना ही पड़ेगा.’’

‘‘मैं तैयार हूं. लेकिन शहर वाले काम मैं ने कभी किए नहीं, हम ने तो मर्दों वाले काम किए हैं.’’ भावल खान ने कहा.

‘‘ठीक है, मैं ही बाहर निकलता हूं. शायद कोई पुरानी जानपहचान काम आ जाए.’’ चुनन शाह ने कहा.

‘‘जैसी तुम्हारी इच्छा. मैं तुम्हारे साथ हूं.’’ भावल खान ने कहा.

चुनन शाह चला गया. 3 दिनों बाद वह लौटा तो अकेला नहीं था. उस के साथ एक जवान लड़की थी. भावल खान ने हैरानी से पूछा, ‘‘यह कौन है?’’

चुनन शाह ने आंख से गंदा सा इशारा किया. भावल को गुस्सा आ गया. उस का हाथ उठता, उस के पहले ही चुनन शाह बोल पड़ा, ‘‘भावल यह तुम्हारा गांव नहीं, कराची शहर है. तुम जानते हो, हम दोनों फरार हत्यारे हैं. दिमाग को ठंडा रखो और हां, अगर होशियारी दिखाई तो हम दोनों मारे जाएंगे.’’

भावल खान ने खुद को कभी इतना बेबस और मजबूर नहीं महसूस किया था. शायद सुगरा से शादी कर के वह डरपोक हो गया था. उस ने चुनन शाह की इस बात का कोई जवाब नहीं दिया. अगले दिन चुनन शाह उस लड़की को ले कर गया तो शाम तक वापस आया. भावल ने अंदाजा लगाया कि उस ने उसे ठिकाने लगा दिया है.

आखिरी गुनाह करने की ख्वाहिश – भाग 2

भावल का बाप उसूलों वाला डाकू था. एक दिन उस ने कहा, ‘‘बेटा, इधर के लोग तो हमें पहचानते हैं, इसलिए हम अपना काम सरहद पार करेंगे.’’

बहराम खान जानवरों की चोरी का उस्ताद माना जाता था. उस ने कभी मामूली जानवर पर हाथ नहीं डाला था. उस ने कभी भी सैकड़ों रुपए से कम की घोड़ी नहीं खोली थी. मजे की बात यह थी कि खोजी उस का खुरा तक नहीं उठा पाते थे. इस की वजह यह थी कि वह खुरा छोड़ता ही नहीं था.

भावल बाप के साथ मिल कर सरहद पार चोरियां करता था. जल्दी ही बाप बेटे का नाम दोनों ओर गूंजने लगा. उन दिनों गाय भैसों की चोरी आम बात थी. पुलिस वालों ने कई बार बहराम खान को गिरफ्तार किया था, लेकिन पुलिस कभी कोई चोरी उस से कुबूल नहीं करवा पाई थी.

भावल खान उस समय 15 साल का था, जब पहली बार पुलिस ने उसे गिरफ्तार किया था. पुलिस उसे ले कर जाने लगी तो बहराम ने कहा, ‘‘बेटा, तू पहली बार पुलिस के चक्कर में फंसा है. मर्द बन कर हालात का मुकाबला करना. पुलिस को भी पता चल जाए कि तू बहराम खान का बेटा है.’’

भावल ने कहा था, ‘‘बाबा, तेरा यह बेटा जीतेजी ताना देने लायक कोई काम नहीं करेगा.’’

भावल 15 दिनों तक रिमांड पर रहा. थाने में घुसते ही पुलिस वाले उस पर पिल पड़े थे. लेकिन जल्दी ही उन की समझ में आ गया था कि उन का वास्ता किसी ऐरेगैरे से नहीं, बल्कि बहराम के बेटे भावल से पड़ा है.

15 दिनों तक पुलिस भावल को सूली पर लटकाए रही. कोई भी ऐसा अत्याचार बाकी नहीं रहा, जो पुलिस ने उस के ऊपर नहीं किया. रिमांड खत्म होने वाले दिन थानेदार ने उस की पीठ थपथपा कर कहा था, ‘‘तू ने साबित कर दिया कि तू बहराम का बेटा है.’’

पुलिस वालों ने मजिस्ट्रेट से और रिमांड की मांग की तो मजिस्ट्रेट ने भावल की ओर ध्यान से देखते हुए कहा, ‘‘15 साल के इस बच्चे से तुम लोग 15 दिनों में कुछ नहीं उगलवा सके तो अब 15 साल में भी कुछ नहीं उगलवा सकते.’’

मजिस्ट्रेट ने रिमांड देने से मना कर दिया था और उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया था. जेल में उस का इस तरह स्वागत हुआ, जैसे वह कोई बड़ा नेता हो. उस जेल के तमाम कैदी उस के पिता को अच्छी तरह जानते थे.

अगले दिन भावल को जमानत मिल गई थी, क्योंकि पुलिस उस से कुछ भी बरामद नहीं कर सकी थी. वह जेल से बाहर आया तो बहराम ने उसे गले लगा कर कहा था, ‘‘बेटा, तू ने मेरा सिर गर्व से ऊंचा कर दिया. पूरी बिरादरी को तुझ पर नाज है.’’

बाप के नाम के साथ भावल के नाम की भी चर्चा होने लगी थी. जहां बापबेटे रहते थे, वहां का बच्चाबच्चा उन्हें जान गया था. भावल की मां बचपन में ही मर गई थी. बाप ही उस का सब कुछ था.

बहराम ने गांव में अच्छीखासी जमीन कब्जा रखी थी. लेकिन ढंग से खेती न होने की वजह से खास पैदावार नहीं होती थी. जबकि आमदनी का स्रोत वही मानी जाती थी. गांव में ऐसा कोई नहीं था, जिस की मदद बहराम खान ने न की हो. गांव की हर लड़की की शादी में वह दिल खोल कर मदद करता था.

उम्र ढलने के साथ बहराम खान की सत्ता का सूरज चढ़ने लगा था. भावल अब तक 30-32 साल का गबरू जवान हो गया था. उस इलाके के नेता और सरकारी अधिकारी बापबेटे की मुट्ठी में थे. चुनाव के दौरान उन के घर के सामने लंबीलंबी कारें और जीपें आ कर खड़ी होती थीं. क्योंकि आसपास के लोग उसी को वोट देते थे, जिसे बहराम कहता था. इस की वजह यह थी कि वह सब की मदद करता था.

चुनाव की घोषणा हुई तो इलाके के एक नेता ने बहराम खान से संपर्क कर के कहा कि वह उन के लिए काम करे. चुनाव में दौड़धूप के लिए वह मोटी रकम भी दे गया था. अंधे को क्या चाहिए, 2 आंखें. बापबेटों को यह काम आसान लगा. उन के लिए एक जीप भी भिजवा दी गई थी.

भावल खान जीप पर सवार हो कर हथियारबंद गार्डों के साथ राजाओं की तरह घूमता और अपने उम्मीदवार के लिए प्रचार करता. हर दूसरे तीसरे दिन खर्च के लिए उस के पास नोटों के बंडल पहुंच जाते थे.

चुनन शाह से भावल की मुलाकात इसी चुनाव प्रचार के दौरान हुई थी. वह उम्मीदवार का खास आदमी था. वह अपने इलाके का जानामाना गुंडा था. लेकिन चुनन शाह जो अपराध करता था, उस से भावल घृणा करता था.

भावल का उम्मीदवार काफी पैसे वाला था. लेकिन वह जिस के खिलाफ चुनाव लड़ रहा था, वह पैसे वाला तो था ही, जानामाना गुंडा भी था. इस के अलावा वह पहले से ही असेंबली का मेंबर था. लोग उस से काफी परेशान थे, इसलिए भावल खान का प्रत्याशी जीत गया था.

यह सीट पुराने प्रत्याशी की खानदानी सीट थी. इसलिए उस की हार से लोग हैरान थे. जीत की खुशी में भावल खान के प्रत्याशी ने रैली निकाली और हारे हुए उम्मीदवार के घर के सामने बमपटाखे फोड़े.

उस समय तो हारने वाला प्रत्याशी चुप रहा. लेकिन वह भी कोई साधारण आदमी नहीं था. जिस दिन भावल खान के उम्मीदवार को शपथ लेने जाना था, विरोधियों ने उसी दिन बदला लेने का निर्णय लिया.

विजयी उम्मीदवार बहराम खान तथा दो बौडीगार्ड के साथ एक जीप में था, जबकि बाकी लोग दूसरी जीप में बैठे थे. जैसे ही जीप उस जगह पहुंची, जहां वे घात लगाए बैठे थे, उन्होंने फायरिंग शुरू कर दी.

किसी को संभलने का मौका नहीं मिला. बहराम खान आसानी से मरने वालों में नहीं था. उसे जैसे ही गोली लगी, उस ने जीप से छलांग लगा दी और दूर तक लुढ़कता चला गया. विरोधियों को पता था कि अगर बहराम जिंदा बच गया तो एक एक को चुनचुन कर मारेगा.

आखिरी गुनाह करने की ख्वाहिश – भाग 1

नियाज अली से ज्यादा सीधासादा आदमी मैं ने अपनी जिंदगी में इस से पहले नहीं देखा था. उस की उम्र 50 से ऊपर रही होगी, मगर  स्वास्थ्य ऐसा था कि जवान भी देख कर लजा जाए. उसे इस गांव में आए 5-6 साल ही हुए थे. लेकिन अपने स्वभाव और सेवाभाव की वजह से गांव के सभी लोग उसे बहुत पसंद करते थे.

गुजारे के लिए उस ने अपने घर के एक कोने में किराने की छोटी सी दुकान खोल रखी थी. हफ्ते में एक दिन शहर जा कर वह दुकान के लिए सामान ले आता था, बाकी 6 दिन वह गांव में ही रहता था.

अपनी ईमानदारी और सेवाभाव की वजह से वह गांव में ही नहीं, आसपास के गांवों में भी लोकप्रिय हो गया था. इसी वजह से उस की दुकान भी बढि़या चल रही थी. उस का अपना कोई नहीं था. पूछने पर भी उस ने कभी किसी को अपने घर परिवार के बारे में कुछ नहीं बताया था. बाद में लोगों ने इस बारे में पूछना ही छोड़ दिया था.

एक दिन नियाज अली शहर गया तो पूरे एक हफ्ते बाद लौटा. गांव वालों ने पूछा तो उस ने बताया कि वह एक मेले में चला गया था. जिस दिन वह गांव लौटा था, उस के अगले दिन गांव में एक ट्रक, पुलिस एक जीप के साथ आ पहुंची.

इस से पहले गांव में इस तरह पुलिस कभी नहीं आई थी. अगर कोई जरूरत पड़ती थी तो थानेदार 2 सिपाहियों से नंबरदार को खबर भिजवा कर जिस आदमी की जरूरत होती थी, उसे थाने बुलवा लेता था.

इतनी अधिक पुलिस देख कर गांव वाले डर गए. जीप सीधे नंबरदार के दरवाजे पर आ कर रुकी तो ट्रक से आए सिपाहियों ने फुर्ती से पूरे गांव को घेर लिया. नंबरदार दरवाजे पर ही खड़ा था. उस ने हिम्मत कर के पूछा, ‘‘क्या बात है इंसपेक्टर साहब, यह सब क्या है?’’

‘‘नबी खान, मुझे अफसोस है कि आज इस गांव की रीति टूट गई है. लेकिन मैं मजबूर हूं. हमें एक खतरनाक फरार हत्यारे को गिरफ्तार करना है.’’

‘‘कौन है वह?’’ नंबरदार ने पूछा.

‘‘नियाज अली.’’ इंसेक्टर ने जैसे ही यह नाम लिया, नंबरदार हैरान रह गया. उस ने कहा, ‘‘साहब, आप का दिमाग तो ठीक है?’’

‘‘मैं सच कह रहा हूं. मैं नियाज अली को ही गिरफ्तार करने आया हूं.’’

‘‘आइए मेरे साथ. साहब, आप जरूर किसी भ्रम में हैं.’’ नंबरदार ने कहा.

नंबरदार के साथ इंसपेक्टर को अपने घर की ओर आते देख नियाज अली दुकान से निकल कर बाहर आ गया. करीब आने पर उस ने आगे बढ़ कर कहा, ‘‘इतनी बड़ी फौज ले कर आने की क्या जरूरत थी थानेदार साहब. शाम को तो मैं खुद ही आ कर हाजिर होने वाला था. क्योंकि अब मेरा काम खत्म हो गया है.’’

नियाज अली के सामने इंसपेक्टर इस तरह सिर झुकाए खड़ा था, जैसे वह खुद अपराधी हो. नियाज अली नंबरदार से मुखातिब हुआ, ‘‘नंबरदार साहब, इस गांव में इस तरह पुलिस के आने का मुझे दुख है. इस के लिए मैं माफी मांगता हूं. आप लोगों को पता ही है, मैं यहां किस तरह रहा. मैं आज शाम को इस खेल को खत्म कर देता, लेकिन थानेदार साहब सरकार को दिखाने के लिए सुबह ही चले आए.’’

‘‘नियाज अली, तुम…’’ नंबरदार ने उसे हैरानी से देखते हुए कहा.

नंबरदार की बात बीच में ही काट कर नियाज अली बोला, ‘‘नहीं नंबरदार साहब, यह मेरा आखिरी रूप था. मेरा नाम नियाज अली नहीं, भावल खान है, बाकी आप को यह थानेदार साहब बता देंगे.’’

नियाज अली नंबरदार से अपनी बातें कह रहा था, तभी गांव की मसजिद के मौलवी साहब भी आ गए. नियाज अली उन से मुखातिब हुआ, ‘‘मियांजी, आज से मेरे मकान और दुकान के मालिक आप हैं. अगर जिंदा रहा तो आऊंगा अन्यथा यह सब आप का.’’

‘‘हम तुम्हारे घर की तलाशी लेना चाहते हैं.’’ इंसपेक्टर ने कहा.

‘‘शौक से लीजिए.’’ नियाज अली ने कहा.

मौलवी साहब और नंबरदार हैरानी से नियाज अली का मुंह ताक रहे थे. इंसपेक्टर के इशारे पर नियाज अली को हिरासत में ले लिया गया. मकान और दुकान की तलाशी में कोई भी ऐसी चीज नहीं मिली, जिसे गैरकानूनी कहा जाता.

इंसपेक्टर ने बताया था कि यह नियाज अली नहीं, बल्कि फरार अपराधी भावल खान है. इसे पीर चुनन शाह की हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया जा रहा है. पुलिस नियाज अली को साथ ले कर चली गई थी.

मैं अगले दिन उस गांव पहुंचा तो मुझे नियाज अली की गिरफ्तारी के बारे में पता चला. मैं उस गांव का रहने वाला नहीं था. लेकिन उस गांव में हमारी कुछ जमीन थी, जिस की देखभाल के लिए मैं वहां अकसर जाता रहता था. इसी आनेजाने में नियाज अली से मेरी अच्छी दोस्ती हो गई थी. एक बार वह हमारे शहर वाले घर पर भी आया था. मेरे पिताजी उस से मिल कर बहुत खुश हुए थे.

गांव वालों ने जब बताया कि नियाज अली एक फरार अपराधी था, जिसे पुलिस ने पीर चुनन शाह की हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया था. यह जान कर मुझे धक्का सा लगा. हैरानी की बात यह थी कि वहां कोई भी उसे हत्यारा मानने को तैयार नहीं था. उन लोगों में मैं भी शामिल था.

मैं जब भी गांव आता था, 2-4 दिन रुक कर जाता था. लेकिन इस बार मैं एक रात भी वहां नहीं रुक सका. मैं यह जानना चाहता था कि क्या सचमुच नियाज अली फरार अपराधी था. गांव वालों ने भी मुझ से सच्चाई के बारे में पता करने को कहा था.

यह सब मैं ने पिताजी को बताया तो उन्होंने दिमाग पर जोर दे कर कहा कि भावल खान नाम का एक फरार अपराधी था. उस का नाम उन्होंने किसी थाने में सुना था. लेकिन पुलिस रिकौर्ड में उस का कोई फोटो नहीं था, इसलिए वह उसे पहचानते नहीं थे.

जेलर पिताजी के मित्र थे, इसलिए नियाज अली यानी भावल खान से मिलने में मुझे कोई दिक्कत नहीं हुई. मैं जेल की कोठरी में उस से मिलने पहुंचा तो वहां मुझे देख कर वह हैरान रह गया. उस ने कहा, ‘‘बेटा, तुम यहां कहां? यह जगह तुम जैसे पढ़े लिखे लोगों के लिए नहीं है. तुम्हें यहां नहीं आना चाहिए था.’’

‘‘ऐसा न कहो चचा. तुम जहां भी होते, मैं तुम से मिलने जरूर आता.’’

इधर उधर की बातें करने के बाद मैं ने पूछा, ‘‘क्या, आप सचमुच फरार अपराधी भावल खान हैं, जिस के कारनामों से पुलिस फाइलें भरी पड़ी हैं?’’

‘‘हां बेटा, मैं वही भावल खान हूं. लेकिन पुलिस फाइलों में मेरे बारे में जो लिखा है, वह हकीकत नहीं है.’’ इतना कह कर वह चुप हो गया.

इस के बाद नियाज अली उर्फ भावल खान ने अपने बारे में जो बताया था, वह कुछ इस तरह था.

भावल खान का संबंध एक पिछड़े इलाके से था. उस के पिता बहराम खान अपने जमाने के नामी डाकू थे. बंटवारे से पहले वह भारत के एक सरहदी इलाके में रहते थे. बंटवारे के बाद वह पाकिस्तान आ गए. लेकिन वह सरहदी इलाके मे ही रहते रहे. उन दिनों भावल की उम्र 12-13 थी. होश संभालने तक उस के बाप ने उसे अपनी कला में निपुण कर दिया था.

जानलेवा शर्त ने ली एक बेगुनाह की जान

शहर के आउटस्कर्ट पर लगा यह पुलिस थाना है. यहां पर हलचल शहर के और थानों की अपेक्षा कम ही रहती है. कारण स्पष्ट है कि आसपास ग्रामीण इलाका है, कुछ इलाका घना जंगली भी है. इस शांत जंगली इलाके में अकसर शराबी लोग पार्टियां करने के लिए आया करते हैं.

जनवरी की शुरुआत है और मौसम की ठंडक अपने शबाब पर. थाने के पूरे स्टाफ की नए वर्ष के सेलिब्रेशन की खुमारी अभी तक टूटी नहीं थी. शाम के लगभग 4 बजे थे.

”साहब पास के जंगल में एक लाश पड़ी है,’’ थाने के अंदर घुसता हुआ 20-21 साल का एक युवक बोला.

”तो मैं क्या करूं?’’ स्वागत डेस्क पर बैठा जवान, जो रिपोर्ट लिखने का भी काम करता था, अधखुली आंखों से बोला.

”साहब, आप मेरा यकीन कीजिए. चाहे तो आप उस जगह पर चल कर देख लो,’’ वह युवक बोला.

”तू कौन है? तुझे पता चला कि वह लाश ही है? हो सकता है कोई आदमी दारू पी कर बेसुध पड़ा हो.’’ जवान उसी अवस्था में बोला.

”साहब, मेरा नाम राधेश्याम है और मैं मवेशी चराता हूं. मवेशियों को वापस गांव में लाते समय मुझे वह लाश दिखाई दी थी. वह कोई शराबी या कोई सोया हुआ आदमी नहीं था. उस के शरीर पर कुछ अजीब तरह से जलने के निशान थे,’’ उस युवक ने बताया.

”जा… जा कर जंगल के चौकीदार को यह बात बता. नियमों के अनुसार चौकीदार की रिपोर्ट पर ही पुलिस तस्दीक करने जाएगी.’’ वह पुलिस वाला उस युवक को टरकाने के मकसद से बोला.

”साहब, मुझे मवेशियों को उन के मालिकों को सौंपना है. इसी वजह से मैं ने चौकीदार को नहीं खोजा.’’ युवक ने साफसाफ बता दिया.

”तो जा, जा कर मवेशियों को उन के मालिकों को वापस कर दे. जब चौकीदार की तरफ से सूचना आएगी, तब काररवाई हो जाएगी.’’ पुलिसकर्मी उस युवक को टालते हुए बोला.

”क्या कर रहे हो रामसिंह? एक मर्डर की इन्फर्मेशन को इतने हलके में ले रहे हो.’’ अंदर की तरफ के औफिस से निकलते हुए इंसपेक्टर आलोक कुमार बोले, ”मैं ने अपने औफिस में बैठे हुए पूरी बात सुन ली है.’’

”अरे साहब, इस जंगल में लोग नए साल की पार्टी करने के लिए आते हैं और जब कोई नशे में धुत हो जाता है तो उस के साथी उसे ऐसे ही छोड़ कर निकल जाते हैं. यह भी कोई इसी तरह का आदमी होगा, जो होश में आने पर उठ कर चला जायगा. और अगर लाश होगी तो चौकीदार हमें सूचित करेगा ही.’’ रामसिंह ने जवाब दिया.

”नहीं नहीं साहब, वह लाश ही है.’’ राधेश्याम बीच में ही बोल पड़ा.

”तुझे कैसे पता कि वह लाश ही है.’’ इंसपेक्टर ने पूछा.

”क्योंकि साहब उस के हाथ और पैर बंधे हुए हैं. शरीर पर कपड़े भी नहीं हैं और बदन पर कुछ अजीब तरह के निशान हैं.’’ राधेश्याम ने बताया.

”किस तरह के अजीब निशान हैं?’’ इंसपेक्टर ने पूछा.

”जैसे चमड़ी के जलने के बाद आते हैं, उस तरह के.’’ राधेश्याम ने बताया.

”रामसिंह फोटोग्राफर और बाकी स्टाफ को तैयार करो, मामला गंभीर लग रहा है. हम इस लड़के की बताई हुई जगह पर चलेंगे.’’ इंसपेक्टर ने कहा.

कुछ ही देर में इंसपेक्टर पुलिस टीम और  राधेश्याम को साथ ले कर जंगल में पहुंच गए.

किस की थी जंगल में मिली लाश

वहां 50-55 साल के किसी आदमी की लाश थी. उस के हाथ पैर बंधे हुए थे. कपड़े कुछ दूरी पर पड़े हुए थे. ऐसा लग रहा था कि हाथ पैर बांधने के बाद उस के कपड़े फाड़ कर उतार दिए गए हों.

जिस तरह चीता या जेब्रा के शरीर पर धारियां होती हैं, कुछ उसी तरह की पतली पतली धारियां सी उस के शरीर पर दिखाई दे रही थीं. ऐसा लग रहा था जैसे निशान वाले स्थान पर किसी चीज से जलाया गया हो. पास ही शराब की एक तीन चौथाई खाली बोतल व प्लास्टिक का एक खाली गिलास भी रखा था.

”देखिए साहब, मैं कह रहा था न कि लोग इस जंगल में शराब पार्टी करने के लिए ही आते हैं. यह शराब पार्टी के लिए ही यहां आया था.’’ रामसिंह बोला.

”अगर पार्टी के मकसद से यहां आए होते तो कुछ और गिलास भी होने चाहिए थे, पर यहां सिर्फ एक ही गिलास है. दूसरा इस के पहनावे और चेहरे मोहरे से भी यह उस स्तर का व्यक्ति नहीं लग रहा कि पार्टी कर सके. बल्कि मुझे तो यह खुद एक भिखारी जैसा लग रहा है.’’ इंसपेक्टर ने कहा.

”सर, हो सकता है कि पार्टी करने के लिए ही आए हों और कुछ विवाद हुआ हो और वह सब इस का मर्डर कर के भाग गए हों. हमें फिंगरप्रिंट न मिल पाएं, यही सोच कर खाली गिलास अपने साथ ले गए हों. शरीर पर कपड़े नहीं हैं इस से ऐसा भी लगता है कि कहीं अवैध संबंधों का मामला न हो.’’ एसआई शफीक अहमद ने कहा.

”पार्टी जैसा कोई माहौल तो लग नहीं रहा है. ऊपर से शरीर पर यह धारीनुमा निशान इस बात की तरफ इशारा कर रहे हैं कि इन स्थानों पर इसे जलाया गया है.’’ इंसपेक्टर आलोक ने अपना शक जाहिर किया.

”मगर इतनी बारीकी से कौन जला सकता है. अगर ऐसा हुआ है तो यह एक बड़ी शानदार कलाकारी है.’’ एसआई शफीक ने कहा.

”ऐसे निशान तो सिर्फ करंट के जलने से आते हैं. यहां पर आसपास दूर तक कोई बिजली की लाइन नहीं है. ऐसे में यहां करंट दे कर जलना कुछ तर्कसंगत नहीं लगता,’’ इंसपेक्टर ने बताया.

”यह भी तो हो सकता है कि इसे कहीं और करंट दे कर मारा गया हो और जांच की दिशा भटकाने के लिए यह बोतल और गिलास यहां रख दिए हों.’’ रामसिंह बोला.

”मेरे विचार से ऐसा नहीं हुआ होगा. क्योंकि उस के कपड़े किसी ब्लेड या चाकू की मदद से काट कर अलग किए गए हैं. मतलब करंट उसे कपड़े उतारने के बाद लगाया गया है. वरना कपड़ों पर जले हुए मांस के कुछ अंश कपड़ों पर जरूर चिपकते.’’ इंसपेक्टर आलोक ने अपने विचार जाहिर किए.

”फिर?’’ एसआई ने पूछा.

”फोटोग्राफर को बोल कर सभी एंगल से फोटो ले लो और डेड बौडी को पोस्टमार्टम के लिए भेज दो.’’ इंसपेक्टर ने निर्देश दिए, ‘ï’पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने पर मुझे दिखलाना.’’

”यस सर,’’ कह कर सब अपने कामों में लग गए.

”सर, उस अंधे कत्ल की पोस्टमार्टम रिपोर्ट आ गई है.’’ लगभग 2 दिनों के बाद एसआई ने सूचित किया.

”मौत का कारण लो इंटेंसिटी करंट का बौडी से प्रवाहित होना लिखा गया है.’’ इंसपेक्टर आलोक रिपोर्ट पढ़ते हुए बोले.

”वहां पर बिजली कैसे पहुंची होगी?’’ एसआई शफीक ने पूछा.

”यही तो देखने वाली बात है. ऐसा करो इस आदमी का फोटो ले जा कर सभी भिखारियों को दिखाओ. शायद कोई क्लू मिल जाए.’’ इंसपेक्टर ने कहा.

”जी, अभी टीमें भिजवाता हूं.’’ एसआई शफीक कहते हुए औफिस से निकल गए.

किस ने किया भिखारी मोहन का मर्डर

2 दिन बाद एसआई ने सूचना दी, ”सर, हम लोगों का अनुमान सही निकला. वह लाश एक भिखारी की ही है जो यहां से करीब 7 किलोमीटर दूर शंकर मंदिर के पास बैठ कर भीख मांगा करता था.’’

”और क्या इन्फर्मेशन है उस भिखारी के बारे में?’’ इंसपेक्टर आलोक ने पूछा.

”सर, उस का नाम मोहन है और वह उसी इलाके में मंदिर से कुछ दूर एक ब्रिज के नीचे झोपड़ी बना कर रहता है. उस के परिवार के बारे में कुछ अतापता नहीं है. अकेले ही रहता था. बहुत ही शांत प्रवृत्ति का इंसान था, लेकिन शराब पीने का बहुत शौकीन था. लेकिन पीने के बाद कोई हंगामा नहीं करता था.’’ एसआई ने मृतक मोहन के बारे में बताया.

”उस की झोपड़ी की तलाशी ली क्या?’’ इंसपेक्टर ने पूछा.

”जी सर, झोपड़ी की तलाशी के दौरान करीब एक हजार रुपए नकद मिले. कोई भी ऐसी चीज नहीं मिली, जिसे देख कर कोई संदेह पैदा होता हो.’’ एसआई शफीक ने बताया.

”आसपास के शराबी, अफीमचियों और नशे का धंधा करने वालों पर नजर रखो. शायद उस ने किसी को देख लिया हो और अपने पकड़े जाने के डर से उसे मार डाला गया हो.’’ इंसपेक्टर ने शक जाहिर किया.

”सर, हम ने नजर रखी हुई है और मुखबिर भी अलर्ट कर दिए है, लेकिन अभी तक ऐसा कोई सुराग नहीं मिला.’’ एसआई ने सूचना दी.

”ठीक है, आप लोग उस की झोपड़ी पर फिर से पहुंचो और सभी पास पड़ोसियों को इकट्ठा कर लो. मैं खुद पूछताछ करूंगा.’’ इंसपेक्टर आलोक कुमार ने कहा.

लगभग 2 घंटे बाद इंसपेक्टर आलोक कुमार उस बस्ती में थे, जिस में मोहन रहता था.

”साहब, मोहन एक सीधासादा इंसान था, जो सिर्फ अपने पीने और खाने से मतलब रखता था. वह एक नियम का पक्का था कि चाहे कितना भी बड़ा त्यौहार हो, मंदिर में कितनी भी भीड़ हो, लेकिन शाम को 8 बजे के बाद कभी भीख नहीं मांगता था. उस के बाद उस का पीने का ही काम रहता था. कभी हम लोगों में से किसी के साथ भी उस का कभी कोई विवाद नहीं हुआ.’’ भीड़ में मौजूद एक बुजुर्ग भिखारी ने बताया.

”उस का कोई दोस्त? कोई दुश्मन?’’ इंसपेक्टर आलोक ने पूछा.

”नहीं साहब, वह किसी से ज्यादा बात नहीं करता था. हां, पिछले 15-20 दिनों से वह सामने के चौराहे पर आटो मैकेनिक नदीम की दुकान पर जरूर 5-7 मिनट रुका करता था. शायद वह कुछ बता सके.’’ वहां मौजूद लोगों में से एक ने बताया.

”नदीम? कैसा आदमी है? मेरा मतलब वह शराब, अफीम या कोई और नशा करता है क्या?’’ इंसपेक्टर ने पूछा.

”यह तो पता नहीं. हम तो जाते नहीं उस की दुकान पर क्योंकि हमारे पास तो कोई गाड़ी है नहीं.’’ वह व्यक्ति बोला.

”तो मोहन से क्यों बातें करता था वह.’’ इंसपेक्टर आलोक ने पूछा.

”पता नहीं. शायद मोहन के मंदिर जाने का रास्ता भी वही था इसी कारण दुआ सलाम हो जाती हो.’’ वह व्यक्ति बोला.

”साहब, नदीम को यहां बुलवाऊं क्या?’’ एसआई शफीक ने पूछा.

”नहीं, तुम ऐसा करो नदीम को उठा कर थाने में ही ले आओ. शायद उस से अच्छी तरह से पूछताछ करनी पड़े.’’ इंसपेक्टर आलोक कुमार ने निर्देश दिया.

”ठीक है सर.’’ एसआई ने कहा.

कौन सी शर्त ने ली मोहन की जान

कुछ ही देर में एसआई शफीक अहमद नदीम को उस की दुकान से थाने ले आए. थाने में आते ही इंसपेक्टर ने नदीम से पूछा, ”तुम मोहन को कैसे पहचानते हो नदीम?’’

”सर, उसे बीड़ी पीने का शौक था और मैं उसे बीड़ी दिया करता था. बस इतनी पहचान थी उस से,’’ नदीम ने जवाब दिया.

”तुम ने उसे क्यों मारा?’’ इंसपेक्टर आलोक ने तुरंत मुद्दे पर आते हुए पूछा.

”नहीं साहब, मैं ने उसे नहीं मारा.’’ नदीम सहमते हुए बोला.

”लेकिन मेरा अनुभव कहता है कि तुम ने ही उसे मारा है और मेरे पास इस के गवाह और सबूत मौजूद हैं.’’ इंसपेक्टर आलोक अंधेरे में तीर चलाते हुए बोले.

”साहब, मेरी उस से कोई दुश्मनी नहीं थी तो भला मैं उसे क्यों मारूंगा?’’ नदीम ने इंसपेक्टर से उल्टा प्रश्न किया.

”यही तो मैं जानना चाहता हूं. हमें तुम सीधे सीधे बताते हो या फिर मैं अपनी तरह से उगलवाऊं?’’ इंसपेक्टर ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा.

”नहीं साहब, मुझे कुछ नहीं मालूम. मां कसम.’’ नदीम ने फिर कहा.

”हवलदार, इस की बत्तीसी निकाल कर मेरे हाथों में रख दो और याद रहे एक भी दांत बचा तो तुम्हारी बत्तीसी मैं निकाल लूंगा.’’ इंसपेक्टर आलोक कुमार ने पास खड़े एक सिपाही से कहा.

”साहब, मत मारिए मैं सब कुछ बताता हूं.’’ 2-3 करारे थप्पड़ों के बाद ही नदीम टूट गया.

”हां, तो बताओ क्यों मारा मोहन को? सुन, झूठ बोलने की और पुलिस को बहकाने की गलती कतई मत करना वरना शरीर की 208 हड्डयों का चूरमा बनवा दूंगा.’’ इंसपेक्टर ने धमकाते हुए कहा.

”सर, एक शर्त की वजह से मोहन को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा.’’ नदीम ने बताया

”शर्त? कैसी शर्त?’’ इंसपेक्टर ने हैरान होते हुए पूछा.

नदीम ने कैसे पूरी की शर्त

नदीम ने बताया, ”सर, मैं एक साइंस का स्टूडेंट रहा हूं और मैं ने ट्वेल्थ तक साइंस सब्जेक्ट ही लिया है. फिजिक्स मेरा प्रिय विषय था. मगर मैं ट्वेल्थ पास नहीं हो पाया. इसी कारण मैं ने आटो मैकेनिक की ट्रेनिंग ले कर यह दुकान खोल ली.

”कुछ दिनों पहले अखबार में मैं ने एक खबर पढ़ी कि एक स्कूल की फिजिक्स लैब में एक प्रयोगशाला सहायक 12 वोल्ट की बैटरी पर गिर गया और उस के भीगे हुए होने के कारण इलेक्ट्रिक का सर्किट पूरा हो गया और करंट लगने से उस की मौत हो गई.’’

”यह तो एक खबर हो गई. इस में शर्त कहां से आ गई?’’ इंसपेक्टर आलोक उतावलेपन से बोले.

”मेरा एक दोस्त है जुनैद. वह इलेक्ट्रीशियन है. उसे मैं ने जब यह खबर बताई तो वह मानने को तैयार नहीं हुआ. उस के अनुसार 12 वोल्ट का करंट बहुत कम होता है और उस से कोई बड़ा आदमी नहीं मर सकता. बस इसी बात को ले कर हम दोनों में 5-5 हजार रुपए की शर्त लग गई.

”अब समस्या यह थी कि यह प्रयोग किस पर किया जाए और कैसे किया जाए. हम ने आसपास देखा तो हमें मोहन इस प्रयोग के लिए सही लगा. बिना परिवार का आदमी था, गायब हो जाने पर कोई शिकायत करेगा, इस की संभावनाएं बहुत कम थीं.’’ नदीम ने बताया.

”फिर तुम ने अपनी योजना को अंजाम किस तरह दिया?’’ इंसपेक्टर आलोक ने उत्सुकता से पूछा.

”हमें यह तो पता था कि मोहन शराब का बहुत शौकीन है. बस, उस की यह कमजोरी ही उस की मौत का कारण बनी. रोज दुकान के सामने से गुजरते समय हम ने उस से आगे बढ़ कर दुआसलाम करना चालू कर दिया. धीरे धीरे जाते समय हम ने योजना के अनुसार उसे बीड़ी पिलानी चालू कर दी. इस से उस का विश्वास हम पर और बढ़ गया.

”एक दिन हम ने उसे हमारे साथ शराब पीने का औफर दिया तो उस ने यह कह कर मना कर दिया कि इस बस्ती के सभी लोग उसे पहचानते हैं, इसी कारण वह बाहर शराब न पी कर सिर्फ अपनी झोपड़ी में ही पीता है. और वह भी सिर्फ रात को.

”तब हम ने उसे नए साल की खुशी में पास के जंगल में दारू व मुरगे की पार्टी रखने की बात कही तो वह लालच में आ गया और पार्टी की बात मान गया. मेरे पास 2002 मौडल का एक पुराना स्कूटर था. हम तीनों उसी पर बैठ कर जंगल में गए.’’

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साइंस के प्रयोग से कैसे पहुंचे जेल

इंसपेक्टर ने पूछा, ”लेकिन तुम ने उसे मारा कैसे? करंट का इंतजाम कैसे किया?’’

”वही तो बता रहा हंू साहब. मैं और जुनैद दोनों शराब नहीं पीते. मगर अपने प्रयोग का परिणाम देखने के लिए हम ने मोहन की पसंद की पूरी बोतल ली.’’

”अरे मुरगे का क्या हुआ. पार्टी तो दारू और मुरगे दोनों की थी न?’’ मोहन शराब पीते हुए बोला, ”आज बहुत दिनों के बाद जी भर कर पीऊंगा.’’

”पास ढाबे वाले को बोल दिया है, कुछ ही देर में मुरगा ले कर आता होगा,’’ जुनैद ने जवाब दिया.

”लगभग आधी बोतल पीने के बाद मोहन बेसुध होने लगा. मैं ने उस के कपड़े उतारना चाहा लेकिन यह संभव नहीं था. इसलिए आननफानन में एक ब्लेड से उस के कपड़े काट कर उतार दिए.’’ नदीम बोला.

”मारने के लिए करंट का इंतजाम कहां से किया? क्योंकि मुझे मालूम है स्कूटर के उस मौडल या उस समय के किसी भी स्कूटर के मौडल में बैटरी लगती ही नहीं थी और साथ में तुम ने कोई बैटरी रखी नहीं थी.’’ इंसपेक्टर ने पूछा.

”यहां पर मेरा मैकेनिक और फिजिक्स का स्टूडेंट होना काम आया. स्कूटर के टेक्निकल स्पेसिफिकेशन के अनुसार जब उसे साढ़े 5 हजार आरपीएम पर चलाते हैं तो डायनमो के द्वारा 12 वोल्ट का करंट जेनरेट करता है.

”मोहन के कपड़े उतारने के बाद हम ने उस के पैर और हाथ ऊपर कर के बांध दिए. यह सब करने से यह स्पष्ट हो गया था कि मोहन कोई विरोध नहीं कर सकता.

”अब मैं ने अपनी शौप से लाए 5 क्लच वायर से मोहन के शरीर पर एक कांपैक्ट क्वाइल की रचना बना दी. इस क्वाइल को मैं ने स्पार्क प्लग से जोड़ कर पावर सर्किट को पूरा कर दिया.

”अब स्कूटर को न्यूट्रल गियर में डाल कर फुल एक्सीलेटर दे कर चालू कर दिया. बेसुध मोहन विरोध करने की स्थिति में तो था नहीं. कुछ समय करंट से जूझने के बाद मोहन शांत हो गया. और मैं शर्त जीत गया.’’ नदीम ने बताया.

”तो यह बात है, एक शर्त जीतने के लिए एक गरीब की मुफ्त में जान ले ली. वैसे कुल मिला कर करंट कितनी देर देना पड़ा?’’ इंसपेक्टर आलोक कुमार ने नदीम से पूछा.

”साहब, कुल 20 मिनट के करंट के बाद मोहन शांत हो चुका था. मुझे उम्मीद थी कि इस सूने जंगल में लाश 2-3 दिन तो पड़ी ही रहेगी और उस की खाल जल जाने की वजह से कीड़े मकोड़े और जानवर जल्दी ही मांस नोच लेंगे फिर मोहन को पहचानना मुश्किल हो जायगा.’’ नदीम बोला.

”क्या खूब कहानी रची तुम ने, मगर एक चरवाहे के समय पर पहुंचने के कारण सारा प्लान फेल हो गया.’’ इंसपेक्टर ने बात पूरी की.

”हां सर, हम से यह बड़ी गलती हुई है. हमें ऐसा नहीं करना चाहिए था. यह मुझे अब अहसास हुआ है.’’ नदीम ने हाथ जोड़ते हुए कहा. तभी जुनैद भी इंसपेक्टर आलोक कुमार के सामने हाथ जोड़ कर माफ करने के लिए गिड़गिड़ाने लगा.

”तुम लोगों ने एक बेगुनाह का मर्डर किया है, इसलिए तुम्हें इस की सजा तो मिलनी ही चाहिए. वो तो भला हो उस चरवाहे का, जिस ने लाश की जानकारी पुलिस को दी, वरना लाश डैमेज हो जाने के बाद केस भी आसानी से नहीं खुल पाता.’’ इंसपेक्टर आलोक कुमार ने कहा.

इस के बाद उन्होंने एसआई शफीक अहमद से कहा कि इन दोनों को मोहन की हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर जेल भेजने की काररवाई करें. एक मामूली शर्त की वजह से नदीम और जुनैद को जेल जाना पड़ा.

लौकेट का रहस्य

लौकेट का रहस्य – भाग 5

इस बीच मैं हवालात जा कर जीते से लौकेट उतरवा लाया था. वह लौकेट मैं ने वली खां के सामने रख कर पूछा, ‘‘ध्यान से देख कर बताओ, ये लौकेट किस का है?’’

वली खां ने जब उस लौकेट को गौर से देखा तो उस के चेहरे का रंग बदल गया. वह हकला कर बोला, ‘‘जनाब, यह तो मेरी बीवी रजिया का लौकेट है.’’

‘‘बीवी को इसे तुम ने ही दिया होगा. कहां से आया यह तुम्हारे पास?’’

‘‘जी, मेरी वालिदा ने बनवाया था. इस के अलावा और भी गहने थे?’’

मैं ने कहा, ‘‘तुम्हारी वालिदा ने बनवाया था या तुम ने डाके में छीना था?’’

‘‘डाका…कैसा डाका…यह आप क्या कह रहे हैं जनाब?’’ उस का मुंह हैरत से खुला रह गया.

‘‘वही डाका जो तुम ने 5 साल पहले अमृतसर में मेहता सेठ के घर डाला था और तुम्हारी गोली लगने से मेहता की मौत हो गई थी.’’

थानेदार बख्शी हैरानी से देख रहा था. उस की नजर में वली खां एक शरीफ इंसान था. पर मैं पूरे दावे के साथ कह सकता था कि वह एक नामीगिरामी डाकू था. मैं ने करीब खड़े हवलदार नादिर से कहा, ‘‘वली खां को हथकड़ी लगा कर इस के सही ठिकाने पर पहुंचाओ.’’

वली खां को हवालात में बंद कर दिया गया. पूछताछ के दौरान पता चला कि उस का नाम वली खां नहीं, बल्कि अब्दुल सत्तार था. चोरीडकैती और अपहरण उस का मुख्य धंधा था. जामनगर में वह नाम बदल कर रह रहा था.

मैं और थानेदार बख्शी अभी वली खां से पूछताछ कर ही रहे थे कि एक सिपाही घबराया हुआ आया. उस ने हमें अलग ले जा कर बताया कि हवालाती जीते की जान खतरे में है. वली खां ने सिपाही कीमतीलाल को रिश्वत दे कर एक खत अपने दोस्त शेरू तक पहुंचाने के लिए भेजा है. वली खां ने खत में लिखा है कि वह उस की बीवी का काम तमाम कर दे और फरार हो जाए.

बख्शी ने सिपाही से पूछा, ‘‘शेरू कहां है?’’

सिपाही ने बताया, ‘‘मुझे नहीं पता, लेकिन कीमतीलाल को पता होगा. वह खत ले कर उसी के पास गया है.’’

थानेदार बख्शी ने गुस्से में पूछा, ‘‘तुम्हें यह सब कैसे मालूम हुआ?’’

सिपाही ने डरते हुए कहा, ‘‘पहले वली खां ने यह पेशकश मेरे सामने रखी थी. उस ने अपनी जांघों के बीच कुछ रुपए छिपा कर रखे थे. वह मुझे 2 सौ रुपयों का लालच देता रहा. मैं नहीं माना तो उस ने कीमतीलाल को फंसा लिया.’’

थानेदार बख्शी ने पूछा, ‘‘उस हरामी को हवालात में कागज कलम किस ने दिया?’’

‘‘जी, यह कीमतीलाल का ही काम है.’’

सिपाही का चेहरा बता रहा था कि वह सच बोल रहा था. मैं ने थानेदार से कहा, ‘‘बख्शी, हमें फौरन कुछ करना होगा. तुम थाने में रहो, मैं जा कर देखता हूं.’’

बख्शी के रोकने के बावजूद मैं थाने से निकल गया. 2 सिपाही मेरे साथ थे. उन में से एक के पास बंदूक थी. हम लगभग भागतेभागते नीम वाली गली तक पहुंचे. गली के मोड़ पर मैं ने रुक कर देखा. वली खां का तिमंजिला मकान मेरी नजरों के सामने था.

मकान के आसपास कोई हलचल नहीं थी. सिपाहियों के साथ मैं एक करीबी दुकान में जा घुसा. दुकानदार ने हमारे लिए कुर्सियां लगवा कर चाय मंगवा दी. वहीं बैठ कर हम वली खां के मकान पर नजर रखे हुए थे. लगभग आधेपौने घंटे बाद जब हम मायूस हो कर लौटने की सोच रहे थे, तभी अचानक एक टमटम गली में दाखिल हुई और सीधे वली खां के मकान के सामने जा रुकी. टमटम से शेरू उतरा. उस ने अपने शरीर को काले रंग की एक चादर से ढक रखा था. वह तेजी से दरवाजे की ओर बढ़ा तो मैं ने दौड़ कर उसे पीछे से जा दबोचा.

शेरू को गिरफ्तार कर लिया गया. तलाशी के दौरान उस के पास से एक भरे हुए रिवाल्वर के अलावा वह खत भी बरामद हुआ, जो वली खां ने हवालात से भेजा था.

उस खत में लिखा था, ‘‘शेरे, मैं पकड़ा गया हूं. पुलिस तुझे ढूंढ़ रही है. बेहतर है तू यहां से भाग जा. लेकिन भागने से पहले मेरा एक काम कर देना. मैं नहीं चाहता कि मेरे बाद रजिया जिंदा रहे. उसे खत्म कर देना. वह इस वक्त घर में अकेली है. तख्तपोश के नीचे मेरा रिवाल्वर पड़ा है. वह ले जाना, लेकिन कोशिश करना कि गोली न चलानी पड़े. अगर खुद न जा सको तो जुमे या दीनू को भेज कर ये काम करवा देना. खुदा हाफिज, तुम्हारा सरदार यार.’’

शेरू के अलावा जुमा और दीनू भी गिरफ्तार कर लिए गए. इस के बाद तफ्तीश और अदालती काररवाई का लंबा सिलसिला शुरू हुआ. जीते को मैं ने रिहा कर दिया. उस पर कोई इलजाम नहीं था. वह अपहरण व मारपीट के मामले में मुद्दई था.

रजिया एक ऐसी औरत थी, जो एक ही वक्त में 2 अलगअलग दिशाओं में सफर कर रही थी. उस के मांबाप ने उस का हाथ ऐसे शख्स को सौंप दिया था, जो बाहर से कुछ और, अंदर से कुछ और था. रजिया काफी हद तक अपने शौहर की हकीकत समझ गई थी. वह जान गई थी कि उस का शौहर अपराध की अंधेरी दुनिया से ताल्लुक रखता था. वह भीतर ही भीतर कुढ़ती रहती थी. लेकिन शौहर की हकीकत कभी उस के होंठों तक नहीं आई थी.

जिस तरह पानी अपना रास्ता खुद तलाश लेता है, उसी तरह जज्बात भी अपने इजहार का कोई न कोई तरीका ढूंढ़ लेते हैं. रजिया के भी दबे हुए जज्बात ने अपने इजहार का रास्ता तलाश कर लिया था. लोग उस पर अंगुलियां उठाते थे, मगर वह सब कुछ जानतेसमझते हुए अनजान और ढीठ बनी हुई थी.

वह जीते से बेपनाह मोहब्बत करती थी और उस मोहब्बत को चाह कर भी कोई मुनासिब नाम नहीं दे पाती थी. वह उसे धक्के दे कर घर से भी निकालती थी और फिर उस की एक झलक पाने के लिए बेचैन भी रहती थी. वह एक मजबूर औरत थी.

यह तय था कि वली खां और उस के साथियों को उम्रकैद होगी. रजिया द्वारा अदालत में दी गई दरख्वास्त पर उस के और वली खां के बीच तलाक अमल लाया गया. रजिया और जीते की प्रेमकहानी का यह बड़ा ही सुखद अंजाम था. दोनों ने शादी कर के वह कस्बा हमेशा के लिए छोड़ दिया.

यह बात अपनी जगह सच है कि कई बार छोटी सी घटना से इंसान की जिंदगी का रुख और दिशाएं बदल जाती हैं. इसी तरह कडि़यों से कडि़यां जुड़ कर कभीकभी बड़े खुलासे हो जाते हैं. अगर अखबार बेचने वाला जीता रईसजादी पम्मी के इशारों को नजरअंदाज न करता और उस पर चोरी का इलजाम न लगता तो शायद वली खां जैसे डाकू और उस के साथियों के चेहरे बेनकाब न होते.

लौकेट का रहस्य – भाग 4

जीते को साथ ले कर हम उसी वक्त उस मकान पर गए, जहां उसे कैद रखा गया था. वह मकान वली खां के दोस्त शेरू का था. वहां वाकई एक कमरे की जाली टूटी हुई थी. वहां ऐसे सुबूत भी थे, जिस से साबित होता था कि उसे उसी जगह कैद कर के रखा गया था. वली खां और शेरू दोनों गायब थे.

मेरी हिदायत पर थानेदार बख्शी ने अपने स्टाफ से उन्हें तलाश करने को कहा. लेकिन कुछ किया जाता, इस से पहले ही शाम करीब 7 बजे वे दोनों खुद ही थाने आ गए. उन के साथ एक सरकारी अफसर भी था. उस ने बताया कि इन दोनों का भागने का कोई इरादा नहीं था. वे केवल डर की वजह से थाने नहीं आए थे.

मैं ने वली खां से कहा कि वह अपनी सफाई में कुछ कहना चाहता है तो कह दे. इस पर उस ने जेब से कुछ खत निकाल कर हमारे सामने रख दिए. वे खत क्या थे, गालियों का पुलिंदा था. उन में ऐसी ऐसी गालियां लिखी थीं जो मैं ने कभी नहीं सुनी थीं. खत लिखने वाले ने कोशिश की थी कि वली खां और उस की बीवी को जितना ज्यादा हो सके, जलील किया जाए.

वली खां ने रुआंसे हो कर कहा, ‘‘जनाब, कुछ खत तो बरदाश्त से बाहर थे, इसलिए मैं ने फाड़ कर फेंक दिए थे.’’

उन खतों को पढ़ कर किसी भी शरीफ आदमी का दिमाग घूम सकता था. वली खां ने बताया कि ये गंदगी उस के घर में 3 महीने से फेंकी जा रही है. उस का मानना था कि ये काम जीते के अलावा और कोई नहीं कर सकता.

वली खां ने यह भी बताया कि मजबूर हो कर वह अमृतसर गया और जीते से मिल कर उसे समझाने की कोशिश की. लेकिन वह उल्टे उसे ही डरानेधमकाने लगा. इस पर उस का दिमाग घूम गया. वह उसे टैक्सी में डाल कर यहां ले आया. वली खां ने माना कि उस ने जीते को 4-5 दिन शेरू के घर में रखा था. वह सिर्फ यह चाहता था कि वह उन मियांबीवी की जिंदगी से निकल जाए.

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वली खां के साथ आए सरकारी अफसर ने भी कहा कि वली खां शरीफ आदमी है. अगर जीता उस की इज्जत को न ललकारता तो यह वाकया कभी न होता. मैं ने वली खां और शेरू को गिरफ्तार न कर के उन्हें तफ्तीश के दायरे में रखा. जीते को हवालात में रखना जरूरी था, क्योंकि अगर उसे छोड़ा जाता तो वह फिर से वली खां के घर जा कर हंगामा कर सकता था. हम ने डाक्टर बुला कर उस की मरहमपट्टी करा दी थी.

जीते को हवालात में छोड़ कर मैं उस के घर पहुंचा और उस के पिता सुरजीत से मुलाकात की. मैं काफी देर तक सुरजीत से जीते के बारे में बातें करता रहा. जब मैं उस के पास से उठने लगा तो दरवाजे के पीछे से चूडि़यों की खनक सुनाई दी. एक औरत जल्दी से अंदर आई थी और मुझे देख कर ठिठक गई थी. वह जवान औरत थी. उस के हाथ में एक छोटा सा लिफाफा था. वह असमंजस में थी कि आगे जाए या वापस लौट जाए.

लेकिन लौटने के बजाए वह हिम्मत कर बोली, ‘‘सुरजीत चचा, ये दवा खा लो. बस 2 दिन और खानी है.’’

सुरजीत ने उसे घूर कर देखते हुए कहा, ‘‘रजिया तुझे कितनी बार कहा है, यहां मत आया कर. रही दवा की बात तो मुझे एक बार ही ला कर दे दे. मैं खुद ही खा लिया करूंगा. बिना वजह रिश्तेदारी मत बना हम से. हम पहले ही बहुत दुखी हैं.’’

रजिया ने दवा वाला लिफाफा सुरजीत के सामने रखते हुए कहा, ‘‘आज तो खा लो, कल बाकी दवा भिजवा दूंगी.’’

सुरजीत ने दवा ले कर मजबूरी में कहा, ‘‘जा, पानी ले कर आ.’’

वह मुझे उलझन भरी नजरों से देख कर बाहर चली गई. मैं समझ गया कि यह वही रजिया है, जो इस फसाद की जड़ है. उस के बाहर जाते ही सुरजीत बोला, ‘‘पागल है यह लड़की, हम सब को भी पागल बना रखा है. यह सोच कर बहाने से दवा देने आई है कि शायद जीता घर पर हो. एक तरफ उसे धक्के दे कर घर से निकालती है, दूसरी तरफ उस की दीवानी हुई फिरती है. पता नहीं क्या चाहती है यह नादान लड़की.’’

रजिया पानी ले आई. जब वह सुरजीत को दवा खिला कर जाने लगी तो मैं ने उसे आवाज दे कर रोक लिया. वह ठिठक गई. सुरजीत ने उस से मेरा परिचय करवाते हुए बताया कि इन इंसपेक्टर साहब ने जीते की बहुत मदद की है.

मेरा परिचय सुन कर वह डर गई. फिर संभल कर बोली, ‘‘जी फरमाइए.’’

मैं ने कहा, ‘‘मैं तुम से कुछ जरूरी बातें करना चाहता हूं. तुम्हारा शौहर घर में ही है?’’

‘‘जी नहीं,’’ वह बोली, ‘‘वह शेरू के साथ थाने गए हैं.’’

‘‘चलो ठीक है, यहीं बात कर लेते हैं.’’ मैं ने सुरजीत की ओर देख कर कहा, ‘‘आप हमें चंद मिनट दीजिए.’’

मेरी बात समझ कर वह उठ खड़ा हुआ और जातेजाते बोला, ‘‘इंसपेक्टर साहब, वाहेगुरु के वास्ते इसे समझाएं. इस के दिमाग से यह जुनून निकाल दें. इसे समझाएं कि न अपना घर उजाड़े और न हमें बरबाद करे.’’

सुरजीत बाहर चला गया तो मैं ने रजिया को सामने पड़ी कुरसी पर बैठने को कहा. वह वाकई खूबसूरत औरत थी. मैं ने उस से पूछा, ‘‘बीबी, तुम जानती हो कि तुम्हारी वजह से कितना हंगामा हो रहा है? आखिर तुम चाहती क्या हो?’’

उस ने सिर झुका लिया. उस के होंठ कांपने लगे. वह कुछ कहना चाहती थी, पर कह नहीं पा रही थी. मैं ने कहा, ‘‘तुम्हारा शौहर शरीफ आदमी है. तुम से बेपनाह मोहब्बत भी करता है. फिर तुम यह खेल क्यों खेल रही हो?’’

मेरी बात सुन कर उस की आंखों से आंसू निकल आए. मैं ने बहुत कोशिश की कि वह अपने दिल की बात बताए. लेकिन वह अपने होंठों को सी कर बैठ गई. आखिर मैं ने कहा, ‘‘खामोश रहने से काम नहीं चलेगा. यह मत भूलो कि तुम्हारा व्यवहार तुम्हें अदालत तक भी ले जा सकता है और जेल भी.’’

उस ने रोतेरोते सिर्फ इतना कहा, ‘‘मैं बेबस हूं.’’

वह टस से मस नहीं हुई. बस खामोश बैठी आंसू बहाती रही. निस्संदेह वह कोई अहम बात छिपा रही थी. अपनी आंखें पोंछने के बाद उस ने कानों पर गिरे अपने बालों को पीछे किया तो मेरी निगाह उस के कान के झुमके पर पड़ी. मैं ने उस झुमके को गौर से देखा तो चौंका. इतनी देर में रजिया ने अपने कानों पर ओढ़नी डाल दी थी. मैं ने कहा, ‘‘बीबी, जरा कानों से ओढ़नी हटाओ.’’

वह मेरी बात नहीं समझी. जब मैं ने दूसरी बार गुस्से से कहा तो उस ने ओढ़नी हटाई. मैं ने आगे हो कर उस के झुमके का मुआयना किया. शक की कोई गुंजाइश नहीं थी. यह उस लौकेट के साथ का उसी डिजाइन का झुमका था जो जीते के गले में था. मैं ने पूछा, ‘‘बीबी, यह झुमका तुम्हें कहां से मिला?’’

‘‘मेरी शादी का है.’’ उस ने बताया.

‘‘मांबाप ने दिया था?’’

‘‘नहीं, ससुराल की तरफ से मिला था.’’

‘‘इस के साथ का और कोई जेवर भी है तुम्हारे पास?’’

‘‘जी नहीं, बस झुमके ही हैं.’’

‘‘देखो बीबी, मैं जो भी पूछूं, सचसच बताना वरना तुम सब बहुत बड़ी मुसीबत में फंस जाओगे.’’

रजिया मेरी बातों से पहले ही परेशान नजर आ रही थी. जब मैं ने मुसीबत की बात कही तो वह घबरा गई. कहने लगी, ‘‘पता नहीं, आप क्या पूछना चाहते हैं. बेहतर होगा आप मेरे शौहर से बात कर लें.’’

‘‘घबराने की कोई बात नहीं है. सच बोलोगी तो मैं हर तरह से मदद करूंगा. लेकिन झूठ बोला तो मैं तुम्हें नहीं बचा पाऊंगा.’’

उस के चेहरे का रंग पीला पड़ गया. वह ऐसे सिमट कर बैठ गई जैसे खुद में ही छिपने की कोशिश कर रही हो. मैं ने कहा, ‘‘इस झुमके के साथ का एक लौकेट मैं ने जीते के गले में देखा है. वह कहां से आया?’’

उस ने सिर झुका कर जवाब दिया, ‘‘वह लौकेट उसे मैं ने दिया था.’’

‘‘तुम्हारे शौहर को मालूम है?’’

‘‘जी नहीं.’’

‘‘क्या तुम यह जानती हो कि तुम्हारे शौहर के पास ये जेवर कहां से आए?’’

वह सादगी से बोली, ‘‘ये जेवर शादी से पहले के हैं.’’

मैं ने रजिया से कुछ सवाल और पूछे फिर उसे घर जाने की इजाजत देते हुए कहा कि न तो वह घर से बाहर कहीं जाएगी और न इस बात का जिक्र किसी से करेगी. वहां से फारिग हो कर मैं थाने पहुंचा. मैं ने थानेदार से कहा कि वह एक सिपाही भेज कर शेरू को बुलाए. साथ ही मैं ने एक एएसआई को यह कह कर भेज दिया कि वली खां जहां भी मिले उसे फौरन मेरे पास ले आए. लगभग आधे घंटे बाद एएसआई वली खां को ले आया. वह थोड़ी देर पहले ही थाने से गया था.

लौकेट का रहस्य – भाग 3

जीते के बारे में यह जानकारी मिलने के बाद मैं ने फैसला किया कि मुझे खुद ही जामनगर जा कर हकीकत मालूम करनी चाहिए. थाने का चार्ज मैं ने सबइंसपेक्टर नदीम को सौंपा और अगले दिन जामनगर के लिए रवाना हो गया.

जामनगर एक छोटा सा कस्बा था. मैं सीधा कस्बे के थाने में पहुंचा. वहां का थानेदार बख्शी मेरा पुराना दोस्त था. मैं ने उस से जीते के बाप सुरजीत के बारे में पूछा.

उस ने बताया कि वह सुरजीत को बहुत अच्छी तरह जानता है. वह निहायत ही शरीफ आदमी है और नीम वाली गली में रहता है. उस ने एक आदमी भेज कर नीम वाली गली से शेखू नाम के एक मुखबिर को बुलवा लिया. वह काफी होशियार आदमी था. इलाके के हर आदमी के बारे में उसे पूरी जानकारी थी. वह मुझे सुरजीत व उस के परिवार के बारे में बताने लगा.

उस की बातों से पता चला कि सुरजीत को नशे की लत है. उस ने शराबखोरी में अपनी पूरी जमीनजायदाद गंवा दी थी. इसी वजह से घर में क्लेश रहता था. सुरजीत अपने बेटे जीते से बहुत प्यार करता था. प्यार तो वह अपनी बीवी व छोटे बेटे से भी बहुत करता था, पर उस का जीते के साथ कुछ अधिक ही लगाव था.

लेकिन पिता की शराब की लत की वजह से जीता घर छोड़ कर अमृतसर आ गया था, ताकि पढ़लिख कर किसी काबिल बन जाए तो अपनी मां और छोटे भाई को भी अपने पास बुला ले.

शेखू ने जो कुछ बताया, उस के अनुसार नीम वाली गली में ही वली खां का घर था. वली खां का चौबारा सुरजीत के चौबारे से मिला हुआ था. दोनों परिवारों का एकदूसरे के घर काफी आनाजाना था. जब वली खां की शादी हुई, तब जीते की उम्र बमुश्किल 16 साल थी. उसे वली खां की बीवी रजिया से बहुत लगाव हो गया था. वली खां से भी उस की गहरी छनती थी. वह हर वक्त वली खां के घर में घुसा रहता था.

वक्त धीरेधीरे गुजरता रहा. हालांकि रजिया और वली खां की उम्र में खासा अंतर था. फिर भी कस्बे की बड़ी बूढि़यां उन पर अंगुली उठाने लगीं. उन्हें जीते का इस तरह रजिया से चिपके रहना पसंद नहीं था. सुरजीत ने बेटे को समझाया, पर वह बाज नहीं आया. मजबूरी में उसे उस के मामा के घर भेज दिया गया. साथ ही वली खां को भी समझा दिया गया कि वह अपनी जवान बीवी को इतनी आजादी न दे.

जीते के जाने के बाद यह मामला शांत हो गया. लेकिन थोड़े दिनों बाद जीते की मां बीमार पड़ गई. उस की देखभाल के लिए जीते को घर लौटना पड़ा. कुछ महीने बीमार रहने के बाद उस की मां चल बसी. मां की बीमारी और मौत के कारण जीते की पढ़ाई छूट गई. अब वह फिर से रजिया के घर में घुसा रहने लगा. उन्हीं दिनों वली खां रोजगार के सिलसिले में पेशावर चला गया. उस के जाने के बाद रजिया और भी आजाद हो गई.

फिर एक दिन पता चला कि रजिया ने जीते को धक्के दे कर घर से बाहर निकाल दिया और जीते ने गुस्से में नीला थोथा खा लिया. हकीम ने बड़ी मुश्किल से उस की जान बचाई थी. इस घटना से सभी हैरान थे. बाद में जो हकीकत सामने आई, वह यह थी कि जीते ने रजिया के साथ छेड़छाड़ की थी.

यह बात किसी तरह वली खां को भी पता चल गई थी. वह पहले ही लोगों की बातें सुनसुन कर भरा बैठा था. पेशावर से वापस आ कर वह जीते की जान के पीछे पड़ गया. फिर अचानक एक दिन जीता चुपचाप कहीं चला गया. काफी दिनों तक उस का कोई पता नहीं चला. बाद में किसी ने बताया कि वह अमृतसर में है.

जीते की पूरी कहानी सुनने के बाद मैं ने मुखबिर से पहला सवाल यह किया कि वली खां और उस की बीवी अब कहां है? उस ने बताया, ‘‘यहीं कस्बे में ही रहते हैं. वली खां अभी हफ्ता भर पहले ही पेशावर से आया है.’’

मैं ने पूछा, ‘‘मियांबीवी में इन दिनों कोई ताजा झगड़ा तो नहीं हुआ?’’

वह इनकार में सिर हिलाने लगा. फिर कुछ सोच कर बोला, ‘‘झगड़े से आप का क्या मतलब?’’

मैं ने कहा, ‘‘तुम मेरे मतलब की छोड़ो. जो कुछ तुम्हें पता है वह बताओ.’’

वह गहरी सांस ले कर बोला, ‘‘पिछले दिनों मुझे दीनू डाकिया मिला था. उस ने बताया कि वली खां के नाम कहीं से कुछ खत आते हैं. उन में वली खां और रजिया के नाम बड़ी गंदीगंदी गालियां लिखी होती हैं. वली खां इस बात से बहुत परेशान है.’’

मेरे दिमाग में बिजली सी कौंधी. मैं ने सोचा, खत कोई भी लिखता हो, लेकिन वली खां का ध्यान सब से पहले अपनी बीवी के आशिक जीते की तरफ ही गया होगा. उसे जीते का अमृतसर का पता भी मालूम था. संभव था उसी ने भाड़े के गुंडों से जीते को उठवा लिया हो. अगर वाकई ऐसा था तो जीते की जान को खतरा था.

मैं ने शेखू से पूछा, ‘‘क्या वली खां पेशावर से आने के बाद कस्बे से बाहर गया था?’’

वह कुछ देर सोचता रहा, फिर बोला, ‘‘मैं ठीक से नहीं बता सकता. पर इतना जानता हूं कि वह ज्यादातर अपने घर में ही रहता है. हां, कभीकभी अपने दोस्त शेरू के पास जरूर चला जाता है.’’

हम अभी बातें कर ही रहे थे कि एक सिपाही दौड़ता हुआ थाने आया और उस ने थानेदार को बताया, ‘‘जनाब, उधर नीम वाली गली में बड़ा हंगामा हो रहा है. जीता जख्मी हालत में पड़ा चीखपुकार कर रहा है.’’

मैं ने चौंक कर थानेदार बख्शी की ओर देखा. मेरा आशय समझ कर वह बोला, ‘‘आइए, चल कर देखते हैं.’’

हम थाने से निकल कर नीम वाली गली में पहुंचे. गली में लोगों का हुजूम लगा था. वे लोग किसी को संभालने की कोशिश कर रहे थे. मैं ने गौर से देखा, वह जीता ही था.  उस के होंठ सूजे हुए थे. चेहरे पर कई जगह नील निशान थे और खून रिस रहा था. उस की कमीज भी फटी हुई थी.

पुलिस को देख कर लोग हटने लगे. मुझे देख जीता गुहार लगाने लगा, ‘‘ये देखो थानेदारजी, क्या हाल किया है इन्होंने मेरा. मैं ने क्या बिगाड़ा है किसी का? क्यों लोग मुझे जीने नहीं देते?’’

थानेदार बख्शी ने पूछा, ‘‘तुम्हारी यह हालत किस ने की है?’’

जीते ने रोते हुए बताया, ‘‘मुझे वली खां और उस के गुंडों ने उठा लिया था. 5 दिन भूखाप्यासा बांध कर रखा.’’

उस ने अपना दायां हाथ दिखाया. उस की 3 अंगुलियां टूट गई थीं. पिंडलियों पर डंडों की मार के निशान थे, जहां से खून रिस रहा था.

मैं ने जीते को सांत्वना दे कर चुप करवाया और उसे भीड़ से निकाल कर थाने ले आया. वह बारबार एक ही बात कहे जा रहा था, ‘‘थानेदार साहब, मैं ने किसी को बदनाम नहीं किया. इन लोगों ने खुद ही बदनामी का इंतजाम किया है, मुझे अमृतसर से उठा लाए. 5 दिन बांध कर मेरी हड्डियां तोड़ते रहे. अब मैं भी वही करूंगा जो मेरा मन चाहेगा. मैं रजिया के बिना नहीं रह सकता. मैं उस से शादी करूंगा. अगर वह मुझे न मिली तो मैं उसी के दरवाजे पर खुदकुशी कर लूंगा.’’

थानेदार बख्शी ने उसे गुस्से से डांटा, ‘‘ओए मजनूं की औलाद, होश की दवा कर. अभी सारा भूत उतार दूंगा.’’

मैं ने थानेदार को इशारा कर के मना किया. क्योंकि जितना मैं इस मामले को जानता था, थानेदार बख्शी को पता नहीं था. वैसे भी जीता इस वक्त मुद्दई की हैसियत रखता था. उसे अगवा किया गया था. कैद में रख कर उसे यातनाएं दी गई थीं. मैं ने उस से घटना के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि उसे टैक्सी में डाल कर पहले जालंधर ले जाया गया.

वहां रात भर रखने के बाद उसे जामनगर ला कर एक अंधेरे मकान में बंद कर दिया गया. फिर रस्सियों से बांध कर भूखाप्यासा रखा गया. वली खां और उस के दोस्त शेरू ने उसे बहुत मारा था. शायद वे लोग उसे जान से ही मार डालते, लेकिन आज सुबह वे कमरे की एक खिड़की बंद करना भूल गए. जीते ने किसी तरह लोहे की जाली तोड़ी और वहां से निकल भागा.