प्राणों की प्यारी अब प्राणों की प्यासी हो चली हैं. शादी के बाद बहुत सी लड़कियां घरेलू हिंसा डीवी ऐक्ट 2005 के ब्रह्मास्त्र से लैस हो कर अपनी ससुराल पहुंचने लगी हैं. 498 की धारा का गुणगान आज तकरीबन हर लड़की वाला करता है और लड़के वाले चुप रहते हैं, उदास भी.
जहां वर पक्ष सीधासरल होता है, लड़के वाले शरीफ होते हैं, वहां लड़के के सीधेपन को तेज लड़की कई तरह से अस्त्र बना कर हालात को अपने हक में मोड़ लेती है.
कुछ लड़कियां जिन के मायके में अफेयर होते हैं, वे ससुराल में एक पल भी नहीं रहना चाहती हैं और बिना वजह ससुराल वालों को घरेलू हिंसा व दहेज को ले कर सताने का इलजाम लगा कर अपने मायके की राह पकड़ लेती हैं.
कुछ लड़कियों को मां के बिना रहना नहीं भाता. मां के संग सोने वाली लड़कियां हर चौथे दिन मायके चली जाती हैं. वे हनीमून मना कर मायके लौटे जाती हैं. उन का शादी के प्रति इतना ही शौक होता है जो 1-2 बार ससुराल आ कर पूरा हो जाता है.
बहुत सी लड़कियां अपने मायके के पड़ोस से इतनी रमी होती हैं कि ससुराल का माहौल उन्हें अकेलापन ही देता है. वे किसी भी हालात में मायके की ओर दौड़ लगाती हैं. उन्हें ससुराल या पति से कभी कोई मोह नहीं होता.
कुसुम शादी ही नहीं करना चाहती थी. वजह, उसे अपने भाई के बेटे रिंकू से लगाव था. शादी में देरी हो चुकी थी और कुसुम पूरी तरह से भतीजे की मां बन गई थी.
भाई ने कुसुम के इसी सम्मोहन का फायदा उठा कर उसे उस के पति के खिलाफ कर के हमेशा के लिए उस की गृहस्थी तोड़ दी.
महज 7 महीने के छोटे से वैवाहिक जीवन में कुसुम ने 14-15 बार मायके की ओर दौड़ लगाई थी. जब वह ससुराल में होती थी तो उस की मां रातदिन अपने नाती रिंकू के रोने की बात फोन पर बता कर उस को ससुराल में नहीं रहने देती थी. कुसुम को उस की मां हमेशा अपनी तबीयत का दुखड़ा बता कर बुलाती थी. कुसुम की गोद में रिंकू को डाल कर वह उस का भावनात्मक शोषण करती थी.
इस तरह से मां ने एक पल भी कुसुम को ससुराल में चैन से अपने पति विनीत के साथ नहीं रहने दिया. इस से विनीत डिप्रैशन में चले गया तो मां ने नई चाल चली. वह कुसुम को सिखाने लगी कि तेरा आदमी नामर्द है, उसे छोड़ दे.
इसी बीच विनीत की मां ने कुसुम की मां को उस का घर मरम्मत कराने के लिए कुछ पैसा दे दिया. रिश्तों के बीच पैसा आते ही नए रिश्ते में खटास आ गई.
कुसुम का भाई विमल जुआ खेलता था. वह हर महीने विनीत के सीधेपन का फायदा उठा कर उस की मां से पैसे की मांग करता था. वैसे तो लड़के वाले मांग करते हैं, पर यहां विनीत की मां से कुसुम का भाई पैसे की डिमांड करने लगा था.
आखिर में हार कर विनीत की मां ने पैसे की डिमांड बाबत विमल के खिलाफ शिकायत कर दी तो विमल ने कुसुम को मायके बुला लिया और विनीत व उस के मांबाप पर फर्जी डीवी ऐक्ट लगा कर उन का जीना दूभर कर दिया.
खुद ही पैसा दे कर अपने ऊपर लगाए गए इस झूठे इलजाम का तोड़ विनीत की मां इसलिए नहीं ढूंढ़ पा रही थीं कि बिना लिखापढ़ी किए उन्होंने बहू के मायके वालों को रुपए दे दिए थे. अब वे घरेलू हिंसा के फर्जी मामले में फंसी हैं. कोर्ट हमेशा लड़की की बात सुनती है. लड़के वालों को कुसूरवार समझा जाता है. इन्हीं बातों व कानून का फायदा उठा कर कुसुम का जुआरी भाई अब ठहाके लगा रहा है.
इस तरह की बातों से आज कितने ही परिवार बस नहीं पा रहे हैं. लड़की के लालची भाइयों की नजर अब बहन की ससुराल की जायदाद पर टिकी होती है. जो सीधेसादे ससुराल वाले होते हैं उन को लड़की के भाई ब्लैकमेल कर लेते हैं.
इसी तरह ग्वालियर का एक परिवार भी तब सांसत में आ गया था जब बहू ने अपने पति से कहा कि वह सासससुर से अलग रहेगी. बेचारा मनीष मांबाप पर ही निर्भर था और उन का लाड़ला भी था.
नई बीवी ने मनीष पर जब ज्यादा दबाव बनाया तो वह कुछ भी नहीं कर सका. बीवी मायके जा कर रहने लगी और पति व सासससुर पर दहेज के नाम पर सताने का मामला दायर कर दिया.
बेचारे मांबाप की जान सांसत में देख कर मनीष ने एक सुसाइड नोट लिखा और अपनी जान दे दी. वह खुदकुशी कर के अपनी छोटी सी वैवाहिक जिंदगी का अंत कर गया. उसे लगा कि उस की पत्नी को उस में या उस के मातापिता में कोई दिलचस्पी नहीं है. वे लोग कब तक उस की पत्नी को मनाएंगे.
एक तरफ तो मातापिता का प्यार, दूसरी तरफ नई बीवी का हठ, तीसरी तरफ 498 की हिटलरशाही धारा, जिस से निकलने की राह सीधेसादे मनीष को नहीं सूझी और उस ने अपनी जिंदगी खत्म कर के ऐसी शादी व कानूनी आतंक को विराम दे दिया जिस में फंसने के बाद बाहर निकलने की राह उस मासूम लड़के के पास नहीं थी.
दिन पूरे होने पर सरकारी अस्पताल में किरण की मुफ्त में डिलीवरी हो गई. पर वहां भी वह कितने दिन रहती. वहां से उसे छुट्टी दे दी गई. तब उस ने कहा, ‘‘मेरा इस दुनिया में कोई नहीं है. मुझे यहां रहने दो, बदले में आप लोग जो कहेंगे, मैं वह काम करूंगी.’’
पर उन्होंने मना कर दिया. एक छोटे से जीव को ले कर एक अन्य जिम्मेदारी के साथ किरण एक बार फिर सड़क पर आ गई. उस का हृदय संवेदना से भर गया था कि इतनी बड़ी दुनिया में क्या उस का कोई नहीं है. इधरउधर भटकते हुए दिन बीत रहे थे. अब किरण को अपने साथ उस नन्हे जीव का भी पेट भरना था.
इधर 3 दिनों से किरण को काफी कमजोरी महसूस हो रही थी. हलकाहलका बुखार भी लग रहा था. पर बिना सड़क पर खड़े हुए काम नहीं चलने वाला था. बैठेबैठे तो कुछ मिलने वाला नहीं था. यह सोच कर उस दिन वह सिग्नल पर पहुंची, जहां उस की मुलाकात कविता से हो गई.
अपनी दुख भरी कहानी सुनाते हुए उस की आंखें नम हो चुकी थीं तो आवाज भर्रा गई थी.
दुपट्टे से नम आंखों को पोंछते हुए किरण ने आगे कहा, ‘‘दीदीजी, मेरे साथ यह बुरा काम कर के वह तो भाग निकला, पर मैं इसे कहां फेंकूं? कुछ भी हो, 9 महीने मैं ने इसे अपनी कोख में रखा है. मुझे जो मिला, उस में से अपना पेट काट कर इसे खिलायापिलाया है. क्या सड़क पर मारीमारी फिर रही औरत की इज्जत इज्जत नहीं होती? लोग उसे क्यों बुरी नजरों से देखते हैं? कभीकभी तो मुझे लगता है, मेरे बाप ने मुझे जहां बेचा था, मैं वहीं रही होती तो ठीक रहता. कम से कम शरीर बेचने का पैसा तो मिलता. मुझे इस तरह दरदर की ठोकर तो न खानी पड़ती. दीदी, मैं कुछ गलत तो नहीं कह रही?’’
कह कर किरण फफकफफक कर रोने लगी.
कविता ने उठ कर किरण को सीने से लगा कर कहा, ‘‘जिंदगी में जितना सहन करना लिखा था, उतना सहन कर लिया. अब वह सब भूल जाओ और इस बच्चे को खूब प्रेम से पालोपोसो. आज से मैं तुम्हारे साथ हूं. मेरी कोई छोटी बहन नहीं है, इसलिए आज से तुम मेरी छोटी बहन हो. तुम्हारे जीवन की सारी मुश्किलें अब मेरी हैं. जिन संबंधों में तुम ने दगा और धोखा देखा है, उन संबंधों में मैं तुम्हें प्रेम और न्याय दिलाऊंगी. यह मेरा वचन है.
‘‘तुम्हारे जीवन की वह सिग्नल पौइंट की लालबत्ती ने मेरे मन में एक लालबत्ती के रूप में जन्म लिया है. आखिर, महिलाओं के साथ ही ऐसा व्यवहार क्यों होता है? क्या मैं इतना असहाय हूं कि तुम्हारे लिए कुछ नहीं कर सकती? यह तो अच्छा है कि मेरे पास पदप्रतिष्ठा और पैसा सब कुछ है. अगर न भी होता तो भी मैं अपनी एक रोटी से तुम्हें आधी रोटी देती. तुम्हें अपनी इस दीदी पर भरोसा है न?’’
किरण एक बार फिर दीदी कह कर कविता के सीने से लग गई. कविता के सीने लग कर किरण अपने सारे दुखदर्द भूल गई थी.
आज इस बात को 5 साल हो चुके हैं. किरण की बेटी कुमुद अब स्कूल जाने लगी है. कविता का घर 3 बच्चों की किलकारियों से गूंजता रहता है. अब तो अनिकेत को भी किसी तरह की कोई शिकायत नहीं है. किरण की ईमानदारी और सादगी ने उसे भी एक पवित्र बंधन में बांध दिया है. द्य
किरण की बेटी को पा कर कविता के दोनों बच्चों को तो जैसे छोटा सा खिलौना मिल गया था. इसलिए वे बाकी सब कुछ भूल कर उसी में व्यस्त थे. वह यही सोच रही थी कि आखिर अंत में किरण क्या कहने वाली है?
किरण कविता को लालबत्ती सिग्नल पौइंट से मिली थी. आखिर वह लालबत्ती क्या होगी? कविता ने उसे उस दिन डिस्टर्ब करना मुलतवी रखा. जब किरण पूरी तरह आराम कर के थोड़ा स्वस्थ हो जाए तो उस के बाद ही बात करने के लिए सोच कर कविता अन्य काम में लग गई.
अनिकेत बच्चों को ले कर प्रदर्शनी दिखाने चला गया तो कविता को अच्छाखासा समय मिल गया. उसने
खाना बनाया और आउटहाउस की ओर चल पड़ी.
तब तक किरण भी जाग गई थी. नहाधो कर नए कपड़े पहन कर वह तैयार हो कर बैठी थी. उस का तो पूरा रूप ही बदल गया था. वह कितनी सुंदर है कविता को अब खयाल आया था. साफसफाई और पहनावा कितना काम करता है, उसे अब पता चला था. कविता को देखते ही उस ने कहा, ‘‘दीदी, आप ने क्यों कष्ट किया. मुझे बुला लिया होता.’’
‘‘कोई बात नहीं, अभी तुम बहुत कमजोर हो. इसलिए मैं ने सोचा कि मैं ही मिल आती हूं. तुम्हें कोई तकलीफ तो नहीं है? तुम्हें यहां अच्छा लगेगा न?’’
‘‘यह क्या कह रही हैं दीदी. आप तो मुझे स्वर्ग में ले आई हैं और अब पूछ रही हैं कि अच्छा लगेगा या नहीं? मैं तो सड़क पर रहने वाली हूं.’’ किरण ने भर्राए स्वर में कहा.
कविता को सचमुच उस पर दया आ गई. अनुकंपा से उस का शरीर कुछ पलों के लिए कांप उठा. एक जवान और सुंदर औरत ने किस तरह सड़क पर खुले में दिन बिताए होंगे?
कविता ने कहा, ‘‘उस समय तो तुम ने मेरी बात टाल दी थी. अब बताओ, इस बच्चे के बाप ने तुम्हें छोड़ दिया है या अब वह इस दुनिया में नहीं है?’’
कविता के इस सवाल पर थोड़ी देर चुप रहने के बाद किरण ने अपनी जो आपबीती सुनाई, वह कुछ इस प्रकार थी.
किरण के बाप ने उसे वेश्याओं के एक अड्डे पर बेच दिया था, लेकिन संयोग से उसे वहां से भागने का मौका मिल गया तो वह वहां से भाग निकली. घर के नाम पर जो एक झोपड़ी थी, अब वह भी उस के नसीब में नहीं रह गई थी. वह जहां भी काम मांगने जाती, वहां सब से पहले लोगों की नजर उस की आकर्षक युवा देह और सुंदरता पर पड़ती. नजर भांप कर वह वहां से खिसक लेती.
उसी बीच उस की मुलाकात अशोक नाम के एक आदमी से हुई. वह किसी गैंग के लिए काम करता था. उस ने किरण से कहा, ‘‘तुम मेरे साथ रहो. मैं गारंटी लेता हूं कि तुम्हारी इज्जत सहीसलामत रहेगी, पर तुम्हें भीख मांगनी होगी.’’
अशोक ने किरण से कहा कि वह उसे एक बच्चा देगा, जिसे ले कर वह भीख मांगेगी. इस बीच उसे कोई छेड़ेगा तक नहीं. इस की जिम्मेदारी उस ने ले ली. इस तरह किरण ने भीख मांगने का धंधा शुरू कर दिया. रेलवे प्लेटफार्म, शौपिग मौल, अस्पताल, ट्रैफिक सिग्नल आदि अलगअलग जगहों पर अशोक उसे पहुंचा देता, जहां किरण भीख मांगती.
भीख मांगने में उसे जो कुछ भी मिलता था, वह सब उस का होता था. इस के एवज में उसे अशोक का एक काम करना पड़ता था. वह किरण को पौलीथिन का एक बैग देता था, जिसे किरण को अशोक द्वारा बताई गाड़ी में रखना होता था. शुरू में किरण को पता नहीं था कि उस पौलीथिन के बैग में अशोक उसे क्या देता था. बाद में उसे पता चला कि उस पौलीथिन के बैग में ड्रग्स होता था. इस का मतलब अशोक ड्रग्स का धंधा करता था.
एक हिसाब से देखा जाए तो किरण भी उस के इस ड्रग्स के धंधे में शामिल थी. इनकार करने का सवाल ही नहीं उठता था. वे लोग किरण के साथ कुछ भी कर सकते थे. किरण चुपचाप वहां से भाग निकली.
अब किरण के सामने फिर वही सवाल उठ खड़ा हुआ था कि इस सुंदर काया को ले कर वह कहां जाए. पर अब तक उसे भीख मांगना आ गया था. यह धंधा बुरा नहीं था.
मैलेकुचैले कपड़े पहन कर, सुंदर काया को गंदीसंदी बना लिया जाए तो किसी को पता ही नहीं चलेगा कि वह कितनी सुंदर है. किसी की अनुकंपा हो गई तो वह 10 के बदले 20 दे देगा. इसलिए किरण ने भीख मांगने वाला अपना काम चालू रखा. दिन भर किरण भीख मांगती. अकसर उसी के साथ कुछ न कुछ खाने को भी मिल जाता था. दिन भर भीख मांगती और रात को रेलवे प्लेटफार्म की किसी बेंच पर सो जाती.
पर शायद नियति को उस का इस तरह जीना भी मंजूर नहीं था. एक रात किरण बेंच पर सो रही थी, तभी 4-5 लड़के शराब पी कर लड़खड़ाते हुए आए. उन्हें देख कर किरण डर गई. कहीं वे उस के साथ कुछ कर न बैठें, यह सोच कर वह वहां से उठी और जहां कुछ लोग सो रहे थे, उन के बीच जा कर लेट गई.
उस दिन तो कुछ नहीं हुआ. पर एक दिन उसे थोड़ा बुखार जैसा लग रहा था. उस दिन भीख में भी कुछ नहीं मिला था, इसलिए सुबह से ही उस का पेट खाली था. भूख और हरारत की वजह से उस की आंखें नहीं खुल रही थीं. उस रात वह उन लड़कों की हवस का शिकार बन गई.
दुनिया भी गजब की है. इज्जत लुटने के बाद किरण को लगा कि अब वह कहीं की नहीं रही. यह सोच कर वह आत्महत्या करने रेलवे ट्रैक पर पहुंची. लेकिन वहां भी उसे एक संभ्रांत महिला ने बचा लिया. वह किरण को अपने घर ले गई. पर कुछ दिनों बाद उस के पेट में पल रहा पाप उजागर हो गया. उस महिला को समाज का डर लगा. उस के घर के मर्दों पर समाज अंगुली उठाएगा, यह सोच कर उस ने किरण को अपने घर से भगा दिया.
एक बार फिर वह सड़क पर आ गई. धीरेधीरे दिन पूरे होने लगे. किसी दिन कुछ खाने को मिल जाता तो किसी दिन कुछ भी न मिलता. किसी दिन कुछ पैसे मिल जाते तो किसी दिन केवल अपमान ही मिलता. इसी तरह दिन बीत रहे थे.
बिजनैस की वजह से अनिकेत अकसर शहर से बाहर ही रहता था. इधर एक सप्ताह का समयमिला तो कविता उस के इस समय का सदुपयोग कर लेना चाहती थी. उस ने उसी बीच शौपिंग की तैयारी कर ली. क्योंकि नवरात्र के त्यौहार नजदीक आ रहे थे. ्र
दोनों बच्चों के लिए कपड़े, चप्पल और जूते तो खरीदने ही थे, अपने और अनिकेत के लिए भी कुछ खरीदारी करनी थी. घर के लिए भी थोड़ाबहुत सामान खरीदना था. कविता जानती थी कि अगर आज उस ने यह काम न निपटाया तो बाद में अनिकेत से यही सुनने को मिलेगा, ‘‘प्लीज कविता, तुम बच्चों के साथ जा कर सारी खरीदारी कर लो न. यार देख तो रही हो कि मेरे पास समय कहां है.’’
जल्दीजल्दी तैयार हो कर सभी घर से बाहर निकले. दोनों बच्चे ऋतु और राज बहुत खुश थे. क्योंकि उस दिन उन्हें पूरे दिन पापा के साथ रहने को मिलने वाला था. सभी लोग गाड़ी में बैठ गए. ऋतु और राज पीछे बैठे थे तो कविता अनिकेत के बगल आगे वाली सीट पर बैठी थी.
अनिकेत ने कविता की ओर ताकते हुए कहा, ‘‘अरे वाह जानेमन, आज किस का कत्ल करने का इरादा है? यलो और ग्रीन कलर की इस ड्रेस में तो तुम बहुत सुंदर लग रही हो.’’
कविता ने भी मजाक में कहा, ‘‘अब अकेले नहीं जिया जा रहा इसलिए…’’
कविता की इस बात पर अनिकेत हंसने लगा तो उसी के साथ कविता भी हंस पड़ी. बच्चों की कुछ समझ में नहीं आया, पर मम्मीपापा को हंसते देख वे भी हंसने लगे.
अनिकेत की कार अपनी रफ्तार से आगे बढ़ी जा रही थी. शहर के एक जानेमाने मौल में उन्हें शौपिंग करनी थी. वे जिस रास्ते से जा रहे थे, उस रास्ते पर 2 ट्रैफिक सिग्नल पड़ते थे. पहला सिग्नल दिखाई दिया तो हरी बत्ती थी. अनिकेत ने कार की रफ्तार बढ़ा दी कि लालबत्ती होने से पहले ही सिग्नल पार कर जाए. पर ऐसा हुआ नहीं. सिग्नल तक पहुंचतेपहुंचते लालबत्ती हो गई. सिग्नल पर अनिकेत को कार रोकनी पड़ी.
अनिकेत के कार रोकते ही 2-3 महिलाएं छोटेछोटे बच्चे ले कर आईं और पैसे मांगने के लिए उन्होंने कार को घेर लिया. कांच को खटखटा कर वे पैसे मांग रही थीं. अनिकेत को इस सब से सख्त नफरत थी. उस का कहना था कि ये कोई भी मौका नहीं छोड़तीं. निकम्मे बने बैठे रहते हैं. जब बिना मेहनत के ही सब कुछ मिल रहा हो तो इन्हें मेहनत करने की जरूरत ही क्या है.
लेकिन कविता का स्वभाव थोड़ा अलग था. उस के अंदर सहज ही संवेदना और सहानुभूति भरी थी. वह किसी की आंखों में जरा भी आंसू देखती तो उसे दया आ जाती. आखिर वह थी तो महिला न. खिड़की खटाखटा कर हाथ फैलाए खड़ी महिला सचमुच बीमार लग रही थी. लग रहा था, अभी जल्दी ही उसे बच्चा पैदा हुआ है. उस ने गोद में जो बच्चा ले रखा था, वह डेढ़दो महीने का लग रहा था.
कविता ने महसूस किया कि अभी इसे पैसों की सख्त जरूरत है, वरना इस हालत में यह बाहर न निकलती. उस की हालत देख कर यही लग रहा था कि कहीं यह चक्कर खा कर गिर न पड़े. कविता ने कहा, ‘‘अनिकेत, लगता है हमें इस की मदद करनी चाहिए.’’
अनिकेत को यह सब बिलकुल पसंद नहीं था. इसलिए वह उस की ओर से मुंह घुमा कर कार स्टार्ट करने लगा. कविता ने कहा, ‘‘एक सौ का नोट दो न. इस के लिए आज के खाने की व्यवस्था तो हो जाएगी.‘‘
‘‘नहीं,’’ अनिकेत ने कहा, ‘‘इस तरह पैसे दे कर इसे और निकम्मा नहीं बनाना. इसे मुफ्त में पैसे मिलते रहेंगे तो यह कभी काम करने के बारे में नहीं सोचेगी.’’
कविता से नहीं रहा गया. उस ने कहा, ‘‘चलो, इसे अपने घर ले चलते हैं, घर का काम कराने के लिए. यह भी तो हो सकता है कि इसे कोई काम न दे रहा हो. घर में कोई खयाल रखने वाला नहीं है, वरना इस हालत में यह घर से बाहर न निकलती. मुझे अभी भी याद है ऋतु के जन्म के समय तुम बाहर थे. अपनी स्थिति भी इतनी अच्छी नहीं थी. उस समय मुझे कितना संघर्ष करना पड़ा था. पति साथ न हो तो किस तरह लगता है, यह मुझे अच्छी तरह पता है.’’
अनिकेत सिर झटकता रहा. कविता ने उसे किसी तरह मनाया तो अनिकेत ने गाड़ी किनारे खड़ी कर दी. उस के बाद कविता गाड़ी से उतर कर उस महिला के पास गई और पूछा, ‘‘क्या नाम है तुम्हारा?’’
‘‘किरण,’’ उस ने कहा.
‘‘तुम्हारे परिवार में और कौनकौन है? इस बच्चे का बाप कहां है? मर गया है या तुम्हें छोड़ कर चला गया है?’’ कविता ने पूछा.
कविता के इस सवाल पर किरण ने जो जवाब दिया, उसे सुन कर उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई. किरण ने कहा, ‘‘दीदी, क्या आप सचमुच मेरी मदद करना चाहती हैं? अगर कोई मदद नहीं कर सकतीं तो आज के लिए मेरे खाने की व्यवस्था ही कर दीजिए. क्योंकि मैं ने समाज की वास्तविकता और अपनी इस हालत को स्वीकार कर लिया है.’’
‘‘अगर तुम मेरे साथ मेरे घर चलना चाहो तो मैं तुम्हें ले जाने के लिए तैयार हूं. तुम मेरे घर का कामकाज करना और आराम से रहना.’’
कविता की इस बात से किरण खुश हो गई. उस ने कहा, ‘‘दीदीजी, आप ठीक से सोचविचार लीजिए.’’
‘‘मैं ने तो सोचविचार लिया है. अब तुम बताओ. तुम राजी हो न? मैं तो राजी हूं.’’ कविता ने कहा.
किरण तैयार हो गई तो कविता ने उसे गाड़ी में बैठाया और खरीदारी का प्रोग्राम पोस्टपोन कर के किरण को ले कर सीधे अस्पताल पहुंची. उस का पूरा हैल्थ चैकअप करा कर दवा लिखवाई. उस के बाद किरण के लिए 2-3 जोड़ी कपड़े खरीद कर रास्ते में एक रेस्टोरेंट से खाना पैक कराया और घर आ गई.
किरण के रहने की व्यवस्था आउटहाउस में कर के उसे खाना खिलाया और आराम करने के लिए कह कर कविता और अनिकेत अपने कमरे में आ गए.
अनिकेत अभी भी कविता के इस काम से सहमत नहीं था. इस तरह किसी अंजान को अपने घर ले आना और उस पर इस तरह विश्वास करना उस के स्वभाव में नहीं था. जबकि इस के उलट कविता को किसी पर क्षण भर में ही विश्वास हो जाता था. भले ही वह कितनी बार धोखा खा चुकी थी, पर उस का यह स्वभाव बदल नहीं रहा था.
अनजान शहर और उस पर घिरती शाम. रीना का मन घबराने लगा था. वह सोच रही थी, ‘आज के जमाने में पति के साथ होना भी कौन सी सिक्योरिटी की गारंटी है. अभी हाल ही में हनीमून पर आई एक नईनवेली दुलहन को उस के पति के सामने ही खींच कर…’ ‘‘मुकेश, तुम्हें मैं ने बोला था न कि या तो जल्दी लौटने की कोशिश करेंगे या पहले से कोई रुकने की जगह तय कर लेंगे… तुम ने दोनों में से एक भी काम नहीं किया…’’ रीना ने अपने पति मुकेश से शिकायती लहजे में कहा.
‘‘अरे डार्लिंग, चिंता मत करो…’’ मुकेश अपनी दुकान के लिए खरीदे गए माल का हिसाब मिलातेमिलाते बोला, ‘‘यहां ज्यादा देर हुई तो राजन के यहां रुक जाएंगे. पिछली बार याद है कितना गुस्सा कर रहा था वह कि मेरा घर होते हुए भी होटल में क्यों रुके?’’ राजन मुकेश का दोस्त था. अकसर उन के घर आताजाता रहता था, लेकिन चूंकि रीना अपने घरपरिवार में ही खुश रहने वाली औरत थी, सो उसे जल्दी किसी से घुलनामिलना पसंद नहीं था.
‘‘अरे, तुम पागल हो क्या…’’ रीना झल्ला गई, ‘‘राजन कौन है तुम्हारा? चाचा, मामा, नाना… मैं ने पहले भी कहा है कि किसी के भी घर यों ही नहीं रुकना चाहिए…’’ ‘‘फिर होटल का खर्च लगेगा. माल लेने आते हैं यहां, घूमने थोड़े ही,’’ मुकेश ने उसे समझाने की गरज से कहा.
रीना चिढ़ कर यह कहते हुए चुप हो गई, ‘‘जो मन में आए, करो.’’ आखिर वही हुआ जो रीना नहीं चाहती थी. सारा सामान लेतेलेते शाम के 7 बज गए. वापस लौटना भी खतरे से खाली नहीं था. हाईवे का सुनसान रास्ता और इतने सारे सामान के साथ रीना जैसी खूबसूरत जवान बीवी.
मुकेश ने डरतेडरते पूछा, ‘‘चलो न, बस रातभर की तो बात हैं.’’ रीना ने चुपचाप कुछ सामान उठा लिया मानो अनिच्छा से सहमति दे रही हो. मुकेश उस के साथ राजन के घर पहुंचा जो वहां से तकरीबन एक किलोमीटर की दूरी पर ही था.
राजन उन दोनों को देखते ही खिल उठा, ‘‘अरेअरे भाभीजी, आइएआइए… इस बार तू ने समझदारी की है मुकेश.’’ रीना को यों किसी के घर जाना बिलकुल पसंद नहीं था. वह सकुचाते हुए सोफे पर बैठ गई और घर पर ननद को फोन लगाया. अपने 5 साल के नटखट बेटे की चिंता सताना स्वाभाविक था.
‘‘टिंकू ज्यादा तंग तो नहीं कर रहा है न पायल?’’ रीना ने पूछा. ‘नहीं भाभी, टीवी देख रहा है…’ रीना की ननद पायल ने फोन पर बताया.
‘‘अच्छा सुनो… फ्रिज में दाल है, गरम कर लेना…’’ वह उसे जरूरी निर्देश देने लगी. तब तक मुकेश बाथरूम से फ्रैश हो कर आ चुका था. रीना ने फोन काट दिया. ‘‘फ्रैश हो लो तुम भी…’’ मुकेश धीरे से बोला, ‘‘इंतजाम सही है. साफसुथरा है सब…’’
रीना हिचकते हुए उठी. देखा कि राजन किचन में जुटा था. उस की अच्छीखासी सरकारी नौकरी थी लेकिन उस ने शादी नहीं की थी, सो सब काम वह खुद ही करता था. खाना खाने के बाद उस ने उन्हें उन का कमरा दिखाया. ‘‘चलिए भाभी, गुड नाइट…’’ कहता हुआ राजन बाहर जातेजाते अचानक मुड़ा और बोला, ‘‘मैं यह पूछना तो भूल ही गया कि मेरी कुकिंग कैसी लगी?’’
‘‘जी अच्छी थी. खाना अच्छा बना लेते हैं आप,’’ रीना ने मुसकरा कर जवाब दिया. राजन चला गया. उस के जाते ही मुकेश ने दरवाजा बंद किया और बिस्तर पर बैठ कर रीना से लिपटने लगा.
‘‘अरेअरे, क्या कर रहे हो… वह भी दूसरे के घर में,’’ रीना उस की इस हरकत पर असहज हो गई. ‘‘2 मिनट में कर लूंगा, तुम लेटो तो…’’ मुकेश ने अपने होंठ उस के चेहरे पर रगड़ने शुरू कर दिए.
‘‘बाबा, यह हमारा बैडरूम नहीं है…’’ रीना उस के हाथ अपने सीने से हटाने की नाकाम कोशिश करते हुए बोली, लेकिन न जाने आज मुकेश पर क्या धुन सवार थी. उस ने उसे बिस्तर पर दबा ही दिया. रीना इंतजार कर रही थी कि जल्दी यह सब खत्म हो लेकिन आज मुकेश में गजब का बल आया हुआ था. सामने लगी घड़ी में रीना बीतते मिनटों को हैरत से गिन रही थी.
‘‘क्या हो गया है जी तुम को…’’ अनियमित सांसों के बीच वह किसी तरह बोल पाई लेकिन मुकेश सुने तब न. हार कर रीना भी सहयोग करने पर मजबूर हो गई. काफी देर बाद दोनों अगलबगल निढाल पड़े सुस्ता रहे थे. ‘‘कपड़े तुम्हारे… जल्दी पहनो…’’ अपने अंदरूनी कपड़ों को खोजती पसीने से तरबतर रीना ने मुकेश के ऊपर उस की टीशर्ट रखते हुए कहा. आज उसे भी भरपूर संतुष्टि मिली थी लेकिन चादर के हाल पर बहुत शर्म भी आने लगी कि सुबह राजन देख कर क्या सोचेगा. लेकिन मुकेश इन सब बातों से बेपरवाह खर्राटे लेने में मगन था.
भोर के तकरीबन 4 बजे रीना की आंख लगी, जिस से उठने में देर हो गई. 7 बजे राजन दरवाजा खटखटाने लगा. रीना ने मुकेश को चिकोटी काट कर जगाया.
‘‘राजन दरवाजे पर है…’’ मुकेश के उठते ही वह फुसफुसा कर बोली. मुकेश ने दरवाजा खोला.
‘‘चल, हाथमुंह धो कर फ्रैश हो ले. मैं नाश्ता बनाने जा रहा हूं,’’ राजन ने मुकेश से कहा और साथ लाया अखबार रीना को दे कर चला गया. नाश्ता करते ही रीना ने तुरंत सामान बांध लिया. बिसकुट और साबुन के कुछ पैकेट जबरदस्ती राजन को थमा कर वे दोनों वहां से चल पड़े.
कुछ हफ्तों बाद एक दिन जब रीना नहा रही थी, उसी समय डोरबैल बज उठी. मुकेश दुकान गया हुआ था और पायल अपने होस्टल जा चुकी थी. घर में बस रीना और टिंकू ही थे. रीना ने जल्दीजल्दी साड़ी बांधी और दरवाजा खोला तो देखा कि सामने राजन खड़ा था.
‘‘ओह राजन भैया…’’ रीना ने उस का औपचारिक स्वागत करते हुए उसे अंदर बुलाया. ‘‘मुकेश तो दुकान के लिए निकल चुका होगा?’’ राजन ने इधरउधर देख कर पूछा.
‘‘हां, इस समय तो वे दुकान पर ही होते हैं…’’ रीना बोली, ‘‘बैठिए, मैं चाय बनाती हूं,’’ कह कर रीना जल्दी से किचन में चली गई. टिंकू अपने कमरे में खेल रहा था. चाय पीतेपीते रीना को कुछ ठीक महसूस नहीं हो रहा था. उसे लग रहा था कि राजन की नजर उस की कमर पर… लेकिन वह इन खयालों को झटक दे रही थी. हां, उस ने पल्लू को करीने से कर लिया था.
‘‘रुकिए, मैं मुकेश को फोन करती हूं…’’ ऐसा बोल कर वह उठने को हुई कि राजन ने हाथ पकड़ कर जरबदस्ती रीना को बिठा लिया. ‘‘अरे बैठिए न भाभी… वह तो आ ही जाएगा.’’
रीना को उस का हाथ पकड़ना बिलकुल अच्छा नहीं लगा. जल्दी से हाथ खींच कर छुड़ाया और बेटे को बुलाने लगी जिस से एकांत मिटे, ‘‘टिंकूटिंकू… देखो अंकल आए हैं,’’ मगर उस के आने से पहले ही राजन बोल उठा, ‘‘भाभी, मुझे आप को कुछ दिखाना है.’’ ‘‘क्या दिखाना है?’’ रीना को कुछ समझ नहीं आया. राजन ने अपने मोबाइल फोन पर कोई वीडियो प्ले कर उसे थमा दिया. मोबाइल पर चलती पोर्न फिल्म देख कर रीना गुस्से और बेइज्जती से भर उठी.
‘‘यह क्या बेहूदगी है…’’ रीना ने चिल्ला कर मोबाइल राजन पर फेंकते हुए कहा, ‘‘निकलो अभी के अभी यहां से, उस दिन बहुत शरीफ होने का ढोंग कर रहा था राक्षस…’’ लेकिन राजन एकदम शांत बैठा रहा. उस ने मोबाइल फोन दोबारा उस की ओर घुमाया, ‘‘जरा, इस फिल्म की हीरोइन को तो देख लो भाभीजान…’’
उस वीडियो की लड़की का चेहरा देखते ही रीना को तो जैसे चक्कर आने लगे. वीडियो में वह और मुकेश थे. वह समझ गई कि राजन ने उसी रात यह वीडियो बनाया था जब वे लोग उस के यहां रुके थे. ‘‘मैं ने ही मुकेश के खाने में वह मर्दानगी की दवा मिलाई थी जिस से वह आप को खुश कर दे और मैं वीडियो बना सकूं…’’ राजन बेशर्मी से हंसता हुआ बोला, ‘‘हाहाहा, वह बेचारा अनजाने में ही हीरो बन गया.’’
रीना बेइज्जती के मारे वहीं फूटफूट कर रो पड़ी. चिडि़या जाल में फंसी समझ कर राजन ने उस के कंधे पर हाथ रखा और कहा, ‘‘भाभी, आप की आंखें प्यार में डूबी अच्छी लगती हैं, रोती नहीं. चलिए बिस्तर पर, एक फिल्म मेरे साथ भी बना ही लीजिए, मुकेश से भी ज्यादा मस्त कर दूंगा आप को… ‘‘मेरी कमाई भी उस से तिगुनी है और मुकेश को हमारे बारे में कुछ पता भी नहीं चलेगा,’’ राजन ने बेशर्मी से कहा.
रीना को अपने कानों पर यकीन नहीं हो रहा था कि उस दिन का उतना सभ्य राजन आज इतने गंदे तरीके से उस से बातें कर रहा है. वह शेरनी की तरह उठी और उसे धक्का दे कर दूर धकेल दिया. वह सोफे के पास जा गिरा लेकिन खुद पर काबू रखता हुआ गुर्राया, ‘‘रीना, मैं तुझे मसल कर रहूंगा और ज्यादा नानुकर की न तो तेरी यह फिल्म जाएगी वैबसाइट पर… जब से तुझे देखा है, तुझ को ही सोचसोच कर सपने देखता हूं, मुझे आज मना मत कर.’’ राजन फिर से उठा और रीना को अपनी बांहों में भर लिया. रीना ने अपने सिर का जोरदार प्रहार राजन की नाक पर किया. वह दर्द से बिलबिलाता हुआ नीचे बैठ गया. नाक से खून आने लगा था.
रीना ने उस पर लातमुक्कों की बरसात कर दी. वह खुद को बचाने के लिए इधर से उधर हो रहा था. शोर सुन कर टिंकू भी वहां आ चुका था और वैसा सीन देख कर घबरा कर रो रहा था. आंसुओं को पोंछते हुए रीना दहाड़ी, ‘‘पति को धोखा देने के लिए सिखा रहा है मुझे. वैबसाइट पर डालेगा मेरा वीडियो? हैवान, जा कर डाल दे, कौन क्या कर लेगा मेरा? इस में मैं अपने पति के साथ हूं कोई गलत काम नहीं कर रही. अखबार वाले मेरा नाम छिपा लेंगे, टैलीविजन वाले तेरा चेहरा वायरल कर देंगे और पुलिस चुटकी में इस वीडियो को डिलीट करवा देगी… जेल में तू सड़ेगा, मेरा कुछ नहीं बिगड़ने वाला.’’
राजन किसी तरह से संभलता हुआ वहां से भागने की कोशिश करने लगा, पर रीना के हाथ में पास रखा पेपरवेट आ चुका था. उस ने मारमार कर राजन की खोपड़ी से भी खून निकाल दिया. वह बेहोश हो कर लुढ़क गया. रीना ने मुकेश को फोन कर दिया. वह पुलिस को साथ लिए ही घर आया. राजन के इस रूप पर मुकेश को भी भरोसा नहीं हो रहा था.
पुलिस की जीप में बैठते राजन के कानों में रीना की गुर्राहट पिघले सीसे की तरह घुस रही थी, ‘‘इस सबला का जवाब याद रखना दरिंदे…’’
‘‘आज का अखबार कहां है?’’ किशोरीलाल ने पत्नी रमा से पूछा.
‘‘अभी देती हूं.’’
‘‘अरे, आज तो इतवार है न, वो साहित्य वाला पेज कहां है?’’
‘‘ये रहा,’’ रमा ने सोफे के नीचे से मुड़ातुड़ा सा अखबार निकाल कर किशोरीलाल की तरफ बढ़ाया.
‘‘इसे तुम ने छिपा कर क्यों रखा था?’’
‘‘अरे, इस में आज एक कहानी आई है, बड़ी अजीब सी. कहीं हमारे बच्चे न पढ़ लें, इसलिए छिपा लिया था. लगता है आजकल के लेखक जरा ज्यादा ही आगे की सोचने लगे हैं.’’
‘‘अच्छा, ऐसा क्या लिख दिया है लेखक ने जो इतना कोस रही हो नए लेखकों को?’’ किशोरीलाल की उत्सुकता बढ़ती जा रही थी.
‘‘लिखा है कि अगर मांबाप सैरसपाटे में बाधा बनें तो उन्हें अस्पताल में भरती करवा देना चाहिए चैकअप के बहाने.’’
‘‘अच्छा, जरा देखूं तो,’’ कहते हुए वे अखबार के संडे स्पैशल पेज में प्रकाशित युवा लेखिका की कहानी ‘स्थायी समाधान’ पढ़ने लगे.
कहानी के अनुसार नायक अपने बुजुर्ग पिता को ले कर परेशान था कि उनकी सप्ताहभर की ऐसी व्यवस्था कहां की जाए जहां उन्हें खानेपीने की कोई दिक्कत न हो और उन के स्वास्थ्य का भी पूरा खयाल रखा जा सके क्योंकि उसे अपने परिवार सहित अपनी ससुराल में होने वाली शादी में जाना है. तब उस का दोस्त उसे समाधान बताता है कि वह अपने पिता को शहर में नए खुले होटल जैसे अस्पताल में चैकअप के बहाने भरती करवा दे क्योंकि वहां भरती होने वालों की सारी जिम्मेदारी डाक्टरों और वहां के स्टाफ की होती है, खानेपीने से ले कर जांच और रिपोर्ट्स तक की. नायक को दोस्त का यह सुझाव बहुत पसंद आता है.
एक ही बार में किशोरीलाल पूरी कहानी पढ़ गए. रमा इस दौरान उन के चेहरे पर आतेजाते भावों को पढ़ रही थीं. चेहरे पर प्रशंसा के भावों के साथ जब उन्होंने अखबार समेटा तो रमा को आश्चर्य हुआ.
‘‘बिलकुल सही और व्यावहारिक समाधान सुझाया है लेखिका ने,’’ किशोरीलाल ने कहानी पर अपनी प्रतिक्रिया दी.
‘‘क्या खाक सही सुझाया है? अरे, ऐसे भी कोई करता है अपने वृद्ध पिता के साथ?’’
‘‘तो तुम ही बताओ, ऐसे में उसे क्या करना चाहिए था?’’ रमा को तुरंत कोई जवाब नहीं सूझा तो वे ही बोले, ‘‘अच्छा, तुम जाओ एक कप चाय और पिला दो, आज इतवार है.’’
रिटायर्ड किशोरीलाल अपने परिवार के साथ एक सुखी जीवन जी रहे हैं. परिवार में पत्नी के अलावा बेटा आलोक और बहू रश्मि तथा किशोर पोती आयुषी है. बेटाबहू दोनों ही नौकरीपेशा हैं और पोती अभीअभी कालेज में गई है.
नौकरीपेशा होने के बावजूद बहू उन का बहुत खयाल रखती है और अपने सासससुर को पूरा मानसम्मान देती है. उन्हें भी बहू से कोई शिकायत नहीं है. पत्नी रमा रसोई में बहू की हर संभव सहायता करती हैं. दिन में उन्हें और पोती को गरमागरम खाना परोसती हैं और शाम को बहू के घर लौटने से पहले रात के खाने की काफीकुछ तैयारी कर के रखती हैं. वे खुद भी बाहर के छोटेमोटे काम जैसे फलसब्जीदूध लाना, पानीबिजली के बिल भरवाना आदि कर देते हैं. कुल मिला कर संतुष्ट हैं अपने पारिवारिक जीवन से.
किशोरीलाल को साहित्य से बड़ा प्रेम है. रोज 2 घंटे नियम से अच्छी साहित्यिक पुस्तकें पढ़ना उन की दिनचर्या में शामिल है. रविवार को कालेज, औफिस में छुट्टी होने के कारण घर में सब देर तक सोते हैं, इसलिए किशोरीलाल और रमा आराम से बाहर बालकनी में बैठ कर सुबह की ताजा हवा का आनंद लेते हुए देर तक अखबार पढ़ते हैं, समाचारों पर चर्चा करते हैं और चाय की चुस्कियां लेते हैं. कभीकभी किसी न्यूज को ले कर दोनों के विचार नहीं मिलते तो यह चर्चा बहस में तबदील हो जाती है. तब किशोरीलाल को ही हथियार डालने पड़ते हैं पत्नी के आगे.
रमा चाय बनाने जा रही थीं कि बेटे ने आवाज लगाई, ‘‘मां, चाय हमारे लिए भी बना लेना.’’
बहू भी उठ कर आ गई, सब गपशप करते हुए चाय पी रहे थे. मगर रमा अपने बेटेबहू का चेहरा पढ़ने की कोशिश कर रही थीं. वे पढ़ना चाह रही थीं उस चेहरे को, जो इस चेहरे के पीछे छिपा था. मगर सफल नहीं हो सकीं क्योंकि उन्हें वहां छलकपट जैसा कुछ भी दिखाई नहीं दिया.
‘‘दादी, पता है, इस साल हम शिमला घूमने जाएंगे,’’ आयुषी ने दादी की गोद में सिर रखते हुए बताया.
‘‘अच्छा, लेकिन हमें तो किसी ने बताया ही नहीं.’’
‘‘अरे, अभी फाइनल कहां हुआ है? वो मम्मी की सहेली हैं न संगीता आंटी, वो जा रही हैं अपने परिवार के साथ. उन्होंने ही मम्मी को भी साथ चलने के लिए कहा है.’’
‘‘फिर, क्या कहा तेरी मम्मी ने?’’ रमा के दिमाग में फिर से सुबह वाली कहानी घूम गई.
‘‘कुछ नहीं, सोच कर बताएंगी, ऐसा कहा. दादी, प्लीज, हम जाएं क्या?’’ आयुषी ने उन के गले में बांहें डालते हुए कहा.
‘‘मैं ने कब मना किया?’’
‘‘वो मम्मी ने तो हां कर दी थी मगर पापा कह रहे थे कि आप लोगों का ध्यान कौन रखेगा. आप को अकेले छोड़ कर कैसे जा सकते हैं.’’
त?भी फोन की घंटी बजी और आयुषी बात अधूरी ही छोड़ कर फोन अटैंड करनी चली गई. रमा को बेटे पर प्यार उमड़ आया, सोच कर अच्छा लगा कि उन का बेटा कहानी वाले बेटे की तरह नहीं है. कई दिन हो गए मगर घर में फिर ऐसी कोई चर्चा न सुन कर उन्हें लगा कि शायद बात ठंडे बस्ते में चली गई है. मगर एक रात सोने से पहले किशोरीलाल ने फिर जैसे सांप को पिटारे से बाहर निकाल दिया.
‘‘बच्चे शिमला घूमने जाना चाहते हैं,’’ उन्होंने पत्नी से कहा.
‘‘तो, परेशानी क्या है?’’
‘‘वो हमें ले कर चिंतित हैं कि हमारा खयाल कौन रखेगा?’’
‘‘हमें क्या हुआ है? अच्छेभले
तो हैं. हम अपना खयाल खुद रख सकते हैं.’’
‘‘सो तो है मगर कई बार तुम्हें अचानक अस्थमा का दौरा पड़ जाता है, उसी की फिक्र है उन्हें. ऐसे में मैं अकेले कैसे संभाल पाऊंगा.’’
‘‘इतनी ही फिक्र है तो न जाएं, कोईर् जरूरी है क्या शिमला घूमना.’’
‘‘कैसी बातें करती हो? यह कोई हल नहीं है समस्या का. भूल गईं, हम दोनों भी कितना घूमते थे. आलोक को कहां ले जाते थे हर जगह, मांबाबूजी के पास ही छोड़ जाते थे अकसर. अब इन का भी तो मन करता होगा अकेले कहीं कुछ दिन साथ बिताने का.’’
‘‘सुनो, एक काम करते हैं. कुछ दिनों के लिए तुम्हारी बहन के यहां चलते हैं. कईर् बार बुला चुकी हैं वो. इस बहाने हमारा भी कुछ चेंज हो जाएगा,’’ किशोरीलाल ने समस्या के समाधान की दिशा में सोचते हुए सुझाव दिया.
‘‘नहीं, इस उम्र में मुझे किसी के भी घर जाना पसंद नहीं.’’
‘‘वो तुम्हारी अपनी बहन है.’’
‘‘फिर भी, हर घर के अपने नियमकायदे होते हैं और वहां रहने वालों को उन का पालन करना ही होता है. सबकुछ उन्हीं के हिसाब से करो, बंध जाते हैं कहीं भी जा कर. अपना घर अपना ही होता है. जहां चाहो छींको, जहां मरजी खांसो. जब चाहो सोओ, जब मन करे उठो,’’ रमा ने पति का प्रस्ताव सिरे से नकार दिया.
किशोरीलाल अपनी जवानी के दिन याद करने लगे. हर साल गरमी में उन के 3-4 दोस्त परिवार सहित हिल स्टेशन पर घूमने जाने का प्रोग्राम बना लेते थे. आलोक तब छोटा था. वे उसे कभी उस के दादादादी और कभी नानानानी के पास छोड़ कर जाते थे क्योंकि छोटे बच्चे पहाड़ों पर पैदल नहीं चल सकते और उन्हें गोद में ले कर वे खुद नहीं चल सकते. ऐसे में मातापिता और बच्चे दोनों ही मौजमस्ती नहीं कर पाते. साथ ही, बच्चों के बीमार होने का भी डर रहता था. अपनी समस्या का उन्हें यही सटीक समाधान सूझता था कि आलोक को दादी या नानी के पास छोड़ दिया जाए. रमा भी शायद यही सबकुछ सोच रही थीं.
‘‘आलोक, तुम लोगों का क्या प्रोग्राम है शिमला का?’’ रमा ने पूछा तो आलोक और रश्मि चौंक कर एकदूसरे की
तरफ देखने लगे. किशोरीलाल अखबार पढ़तेपढ़ते मन ही मन मुसकरा दिए.
‘‘वो शायद कैंसिल करना पड़ेगा,’’ आलोक ने रश्मि की तरफ देखते हुए कहा.
‘‘क्यों?’’
‘‘आप दोनों अकेले रह जाएंगे और आयुषी के कालेज की तरफ से भी इस बार समरकैंप में बच्चों को शिमला ही ले जा रहे हैं ट्रैकिंग के लिए, तो वह भी हमारे साथ नहीं जाएगी. फिर हम दोनों अकेले जा कर क्या करेंगे.’’
‘‘अरे, यह तो और भी अच्छा हुआ, कहते हैं न कि किसी काम को करने की दिशा में अगर सोचने लगो तो रास्ता अपनेआप नजर आने लगता है.’’
‘‘मतलब?’’
‘‘मतलब यह कि अगर आयुषी तुम्हारे साथ नहीं जा रही तो हम तीनों यहां आराम से रहेंगे. घर मैं संभाल लूंगी और बाहर तुम्हारे पापा, और अगर हमारे बूते से बाहर का कुछ हुआ, तो ये हमारी पोती है न, नई पौध, जरूरत पड़ने पर यह पीढ़ी सब संभाल लेती है-घर भी और बाहर भी. और जब आयुषी समरकैंप में जाएगी तब तक तुम दोनों आ ही जाओगे.’’
‘‘अरे हां, एक रास्ता यह भी तो है. हमारे दिमाग के घोड़े तो यहां तक दौड़े ही नहीं,’’ आलोक ने खुश होते हुए कहा.
‘‘इसीलिए तो कहते हैं ओल्ड इज गोल्ड,’’ रमा ने कनखियों से अपने पति की तरफ देखते हुए कहा तो घर में एक सम्मिलित हंसी गूंज उठी.
शाम हो चुकी थी. धीरेधीरे करते हुए इशहाक को पार्क में आए काफी देर हो चुकी थी. न जाने क्या बात थी, जो उसे कसक रही थी. खामोश सा कुछ वह सोचता हुआ चला जा रहा था, ‘आखिर मैं कैसे बताऊं शबाना को कि मैं उस के लायक नहीं हूं. मैं अभी तक बेकार हूं और वह मल्टीनैशनल कंपनी में नौकरी कर रही है.
‘मेरा परिवार गरीब और उस के पिता नामीगिरामी वकील. कहीं भी तो बराबरी नहीं…’ सोचतेसोचते उस का मन किया कि वह शहर से बाहर चला जाए, फिर वह आगे सोचने लगा, ‘अगर मैं बिना बताए बाहर निकल भी जाऊं तो अम्मी का क्या होगा… वे तो सदमे से मर जाएंगी. अब्बा चल भी नहीं पाते, उन्हें कौन सहारा देगा… रुखसार की शादी कैसे होगी… बाहर चले जाने पर भी नौकरी मिलने की कोई गारंटी नहीं है…’
तभी एक आवाज ने इशहाक को चौंका दिया, ‘‘अरे इशहाक साहब, जरा मेरी तरफ भी थोड़ा देख लीजिए, कब से मैं आप के पास खड़ी हूं,’’ यह शबाना थी, जो औफिस से लौट कर इशहाक से मिलने आई थी.
इशहाक मुसकराया और बोला, ‘‘आओ शब्बो, बैठो. तुम्हारे औफिस में आज कुछ देर से छुट्टी हुई… क्या आज काम ज्यादा था?’’
‘‘नहीं, काम तो रोज के हिसाब से था, लेकिन औफिशियल मीटिंग में देर हुई…’’ शबाना ने बैंच पर बैठते हुए कहा, ‘‘तुम्हें मेरे लिए काफी देर तक बैठना पड़ा… सौरी.’’
‘‘नहीं, ऐसी कोई बात नहीं,’’ इशहाक बोला.
शबाना गौर से इशहाक के चेहरे की तरफ देखते हुए बोली, ‘‘कुछ ऐसा क्यों नहीं करते कि हमारा इंतजार हमेशा के लिए खत्म हो जाता…’’
इशहाक ने शबाना के चेहरे की तरफ एकबारगी देखा और खामोश ही रहा.
शबाना ने दोहराते हुए पूछा, ‘‘कोई बात है क्या? इतने चुप क्यों हो?’’
‘‘नहीं, कोई बात नहीं. और सुनाओ, आज का दिन औफिस में कैसा गुजरा?’’ इशहाक ने बात टालते हुए कहा.
‘‘ईशु मियां, बात टालते हुए अरसा गुजर रहा है. अब हमें अपनी जिंदगी को जवाब देना है. आखिर कब तक हम जिंदगी के सब से अहम सवाल को यों ही टालते रहेंगे?
‘‘तुम अच्छी तरह से जानते हो कि मैं तुम्हारे बगैर नहीं रह सकती. अब वक्त बहुत बीत गया है, इसलिए निकाह बहुत जरूरी है. तुम मेरे अब्बू से क्यों नहीं मिलते?’’ शबाना ने इशहाक को झकझोरते हुए कहा.
‘‘शब्बो, यह इतना आसान नहीं है. तुम समझने की कोशिश तो करो, मैं कैसे अब्बू से मिलूं. हजार सवाल पूछे जाएंगे. सब से बड़ा सवाल होगा कि मैं क्या करता हूं? तुम्हीं ही बताओ कि इस सवाल का मैं क्या जवाब दूं?
‘‘कैसे बताऊं कि मैं एमबीए करने के बाद भी बेकार हूं और मेरे पास रहने के लिए अपना घर तक नहीं है. तुम्हारे अब्बू किसी ऐसे आदमी से तुम्हारे निकाह के लिए कैसे हां कर सकते हैं?
‘‘मेरी बात मानो, तो मुझे भूलने की कोशिश करो. मैं तुम्हें कैसे खुश रख सकता हूं, जिस के पास न तो कोई नौकरी है और न ही रहने के लिए घर.
‘‘तुम एक बड़े घर में रहने वाली और बड़ी कंपनी में काम करने वाली खूबसूरत लड़की हो. और मैं…’’ इशहाक की आवाज कांप रही थी. उसे लग रहा था कि वह रो देगा. वह किसी तरह खुद को संभाल पा रहा था.
‘‘ईशू, यह आज क्या हो गया है तुम्हें? कैसी बातें कर रहे हो… तुम बेहद काबिल हो. आज नहीं तो कल नौकरी मिल ही जाएगी. इस तरह निराश मत हो और मुझ से ऐसी बातें मत करो.
‘‘तुम अच्छी तरह जानते हो कि मैं तुम्हारे बिना मर जाऊंगी. रही बात अब्बू की, तो वे वकील हैं और उन की जिंदगी की शुरुआत बहुत ही खराब थी. उन्होंने काफी जद्दोजेहद की है और बहुत दर्द सहने के बाद आज इस मुकाम पर पहुंच सके हैं.
‘‘उन्हें धनदौलत और शोहरत वाला लड़का नहीं चाहिए, बल्कि ऐसा कोई हो, जो मुझे प्यार करे और मेरे जज्बात को तवज्जुह दे.
‘‘वे अकसर कहते हैं कि शबाना की शादी मैं ऐसे लड़के से करूंगा, जो भले ही गरीब हो, लेकिन काबिल हो सब से अहम बात कि वह शबाना से बेहद प्यार करता हो.
‘‘ईशु, तुम एक बार मिल कर बात तो करो. कल इतवार है और सब लोग घर पर ही रहेंगे. तुम कल मेरे घर आ जाओ. तुम बिलकुल मत घबराओ. मैं वहीं रहूंगी और हमेशा तुम्हारे साथ हूं,’’ शबाना ने इशहाक का हाथ अपने हाथ में ले कर कहा.
‘‘लेकिन शब्बो, कुछ अनहोनी न हो जाए,’’ इशहाक ने घबराहट में कहा.
‘‘जोकुछ भी होगा, हमारे साथ होगा… मैं साथ रहूंगी,’’ शबाना ने बहुत आत्मविश्वास से कहा और थोड़ी देर के बाद वह चली गई.
दूसरे दिन इशहाक बड़ी हिम्मत कर के शबाना के घर पहुंचा. उस समय शबाना के अब्बू बैठक में ही बैठे थे.
‘‘अब्बू, ये इशहाक हैं और मेरे साथ पढ़े हैं. मैं इन्हें अच्छी तरह से जानती
हूं. ये आप से मिलने आए हैं,’’ शबाना
ने कहा.
‘‘यह तो बहुत अच्छी बात है कि तुम इन्हें जानती हो. बैठो बेटा. मैं तुम्हारे लिए क्या कर सकता हूं?’’ अब्बू ने पूछा.
‘‘मैं ने एमबीए फर्स्ट क्लास में पास किया है, पर कितनी कोशिश के बाद भी मुझे नौकरी नहीं मिली,’’ इशहाक बोला.
‘‘इस में परेशान होने की बात नहीं है बेटा, आज नहीं तो कल कहीं न कहीं नौकरी मिल ही जाएगी, बस कोशिश करते रहना चाहिए.’’
‘‘अब्बू, मैं भी इन से यही कहती हूं कि कोशिश करने वाले कभी हारते नहीं,’’ शबाना ने बीच में दखल देते हुए कहा.
‘‘हां, जिंदगी में उतारचढ़ाव तो आते रहते हैं, लेकिन हिम्मत नहीं हारनी चाहिए. वैसे, मेरे एक दोस्त हैं… उन का कुछ असरदार लोगों से परिचय है. मैं उन से बात करूंगा. हो सकता है कि तुम्हारा काम हो जाए. तुम कल शाम को मुझ से मिलो,’’ कहते हुए शबाना के अब्बू उठ कर बाहर चले गए.
बैठक में शबाना और इशहाक रह गए. ‘‘ईशु मियां, ऐसे तो तुम कभी अपनी बात नहीं कह पाओगे,’’ शबाना ने रूठते हुए कहा. खैर, अगले दिन शाम को फिर इशहाक शबाना के घर पहुंचा.
‘‘आओ बेटा, शबाना तुम्हारे बारे में ही बात कर रही थी,’’ शबाना के अब्बू ने कहा.
इशहाक के चेहरे पर कई तरह के भाव आए. कुछ घबराहट सी हुई कि कहीं शबाना ने सारी बात तो नहीं बता दी. वह चुपचाप बैठ गया.
‘‘मैं ने तुम्हारे बारे में बात की है. हो सकता है कि तुम्हारा काम हो जाए, लेकिन तुम्हें मैं जहां भेज रहा हूं, वहां जा कर मेरे दोस्त से मिलना होगा. और जो वे कहें, वह मानना पड़ेगा,’’ शबाना के अब्बू ने इशहाक से कहा.
‘‘जी, मैं तैयार हूं,’’ इशहाक बोला.
‘‘तो ठीक है. मेरा खत ले कर जाओ और उन से मिलो,’’ वकील साहब ने इशहाक को खत देते हुए कहा.
इशहाक खत ले कर वकील साहब के दोस्त के यहां पहुंचा. खत पढ़ कर उन्होंने कहा, ‘‘ठीक है. मैं आप का काम करा दूंगा, लेकिन मेरी एक शर्त है.’’
‘‘कैसी शर्त?’’ इशहाक ने पूछा.
‘‘शर्त यह है कि नौकरी मिलने के बाद आप को मेरी बेटी से शादी करनी होगी.’’
‘‘लेकिन, मैं यह शादी नहीं कर सकता. मैं किसी और से प्यार करता हूं और मैं ने उस से शादी का वादा किया है,’’ इशहाक ने जोर दे कर कहा.
‘‘देखो, मेरी बेटी से शादी करने के बाद ही मैं तुम्हारे लिए कुछ सोच सकता हूं, इसलिए तुम्हें एक दिन का मौका है… सोचसमझ लो और चाहो तो मेरी बेटी से मिल भी सकते हो,’’ वकील साहब के दोस्त ने कड़े लहजे में कहा.
इशहाक की समझ में कुछ नहीं आ रहा था. वह शबाना को किसी भी हालत में छोड़ने की सोच भी नहीं सकता था और नौकरी उस के लिए बहुत जरूरी थी. प्यार के नाम पर वह कोई समझौता नहीं कर सकता था.
‘‘ठीक है अंकल, मैं कल सोच कर जवाब दूंगा,’’ कहते हुए इशहाक चला आया. घर पहुंच कर वह सोचने लगा, ‘क्या शबाना के अब्बू ने जानबूझ कर मुझे ऐसे आदमी के पास भेजा था या
मेरी मजबूरी का फायदा उठाते हुए मुझे जानबूझ कर शबाना से अलग करने की चाल है? क्या शबाना को यह सब पता है? नहीं, ऐसा नहीं हो सकता,’ यह सोचते हुए उसे नींद आ गई.
अगले दिन इशहाक मन में कुछ सोच कर शबाना के अब्बू से मिलने उस के घर गया. शबाना घर पर ही मिल गई. उस ने शबाना को सारी बात बताई.
पहले तो शबाना को यकीन ही नहीं हुआ, फिर वह इशहाक का हाथ पकड़ कर बैठक में गई. वहां उस के अब्बू अपने किसी मुवक्किल से बात कर रहे थे. अचानक ऐसे शबाना के अंदर आने से वे चौंक गए.
‘‘अब्बू, यह आप ने क्या किया है… जब आप को मालूम था कि अंकल ऐसे हैं, तो आप ने इशहाक को उन के पास क्यों भेजा?’’ शबाना ने गुस्से में भर कर कहा.
शबाना के अब्बू को अंदाजा हो गया था कि शबाना और इशहाक एकदूसरे के बहुत करीब हैं, लेकिन मौजूदा हालात की उन्हें कोई जानकारी नहीं थी.
‘‘बेटा, पहले कमरे में चलो. वहां बात करते हैं,’’ कहते हुए वे उन दोनों को भी कमरे में ले आए.
‘‘हां, अब बताओ कि क्या बात है. और इशहाक, तुम्हारे साथ कल क्या हुआ?’’
इशहाक ने सारी बात बताई.
‘‘अब्बू बताइए कि आप ने ऐसे आदमी के पास इशहाक को क्यों भेजा?’’ शबाना ने पूछा.
‘‘बेटा, यह बात मुझे पहले से मालूम थी कि उन की लड़की ज्यादा पढ़ीलिखी नहीं है और मानसिक रूप विकलांग है. लेकिन यह सच नहीं है कि मैं ने इशहाक को उन के पास इसलिए भेजा कि वह नौकरी के लिए उन की लड़की से शादी कर ले. मुझे इस का अंदाजा भी नहीं था कि वे ऐसा करेंगे,’’ वकील साहब ने अपनी बात समझाने की कोशिश की.
‘‘पर अब्बू, इशहाक और मैं शादी करना चाहते हैं और आप हमें इजाजत दीजिए,’’ शबाना ने एकदम से कह दिया.
इशहाक चुपचाप खड़ा रहा. थोड़ी देर तक वहां सन्नाटा पसर गया और वकील साहब भी अवाक खड़े रह गए. फिर वे सामने कुरसी पर बैठ गए और उन दोनों को भी बैठने को कहा.
बैठने से पहले शबाना गिलास में पानी ले कर आई और अब्बू को दिया, फिर वह बोली, ‘‘अब्बू, आप ने ही सिखाया था कि मांबाप से दिल की बात साफसाफ कह देनी चाहिए. इशहाक गरीब जरूर है, लेकिन इस में आत्मसम्मान बहुत ज्यादा है. सब से खास बात तो यह है कि यह काबिल है. हम एकदूसरे से बहुत प्यार करते हैं और हर हाल में खुश रहेंगे,’’ शबाना ने अपने अब्बू से सबकुछ कह डाला.
‘‘अब्बू, मैं वादा करता हूं कि शबाना को हमेशा खुश रखूंगा और चाहे कैसे भी हालात हों, हम मिल कर उन का सामना करेंगे और हमेशा खुश रहेंगे,’’ इशहाक ने भी कहा.
‘‘अच्छा ठीक है. लेकिन, मैं लड़की वाला हूं, तो मुझे तो रिश्ता मांगने इशहाक के मांबाप से मिलने जाना होगा. जब तक शादी की तारीख तय न हो जाए, तब तक के लिए मुझे वक्त चाहिए.
‘‘इशहाक, तुम मेरे साथ 2 दिन बाद चलोगे, जहां तुम्हारी नौकरी की बात शबाना के मामू की कंपनी में करनी है. शादी की तारीख तक मुझे तुम्हारी नौकरी पक्की करानी है. अब तो मेरा काम बढ़ गया है. जल्दी से जल्दी शादी की तारीख निकलवाने की कोशिश करूंगा.’’
इतना कह कर वकील साहब ने शबाना और इशहाक को अपने गले से लगा लिया. शबाना की आंखों में खुशी के आंसू आ गए.