शक और कुंठा की शिकार बनी कौमुदी

दैविक ट्यूशन पढ़ रहा था तभी शाम 5 बजे उस के मोबाइल पर उस के पापा हेमंत चतुर्वेदी का फोन आया, ‘‘बेटा, तुम्हारी मम्मी नाराज हो कर कहीं चली गई हैं. मैं उन्हें ढूंढने जा रहा हूं. ट्यूशन के बाद तुम घर पर ही रहना. मैं भी कुछ देर में घर आ जाऊंगा.’’

दैविक के मम्मीपापा के बीच रोजाना झगड़ा होना आम बात थी इसलिए पापा की इस बात पर उसे कोई आश्चर्य नहीं हुआ और वह ट्यूशन के काम में बिजी हो गया.

ट्यूशन पढ़ने के बाद 13 साल का दैविक जब घर लौटा तो दरवाजे पर ताला बंद मिला. वह घर का पुराना ताला नहीं था बल्कि हाल ही में खरीदा हुआ एकदम नया दिख रहा था. घर के ताले की एक चाबी उस के पास रहती थी. लेकिन नया ताला लगा होने की वजह से वह उस चाबी से नहीं खुल सकता था.

मम्मीपापा कितनी देर में घर लौटेंगे, यह जानने के लिए दैविक ने सब से पहले मम्मी कौमुदी को फोन लगाया तो उन का फोन बंद मिला. इस के बाद उस ने पापा को फोन किया. उन का फोन लग गया.

दैविक ने जब उन से पूछा कि उन्हें घर लौटने में कितनी देर लगेगी. इस पर हेमंत ने कहा कि उन्हें घर आने में अभी टाइम लग सकता है. हेमंत ने कहा कि इस समय वह सेक्टर-18 रोहिणी में रेडलाइट के पास खड़ा है. फ्लैट की चाबी लेने के लिए उस ने दैविक से रोहिणी सैक्टर-18 पहुंचने को कहा.

दैविक उस समय रोहिणी सेक्टर-23 स्थित अपने फ्लैट के बाहर था. पापा से बात होने के बाद वह सेक्टर-18 पहुंच गया लेकिन निर्धारित जगह पर उसे पापा नहीं मिले तो उस ने फिर से फोन लगाया. तब हेमंत का फोन स्विच्ड औफ मिला. उस ने कई बार फोन मिलाया, हर बार स्विच्ड औफ ही मिला. परेशान हो कर दैविक फ्लैट पर लौट आया और मम्मीपापा के लौटने का इंतजार करने लगा.

काफी देर बाद तक जब उन में से कोई भी नहीं आया तो उस ने फिर दोनों के नंबर मिलाए. उन के फोन स्विच्ड औफ ही मिले. दैविक परेशान हो रहा था कि अब क्या करे? दैविक के मामा विपुल नौटियाल अंगरेजी अखबार हिंदुस्तान टाइम्स में उपसंपादक हैं. उस ने परेशानी की इस हालत में विपुल मामा को फोन किया और उन से जल्द आने को कहा.

विपुल उस समय दिल्ली के कस्तूरबा गांधी रोड पर स्थित अपने औफिस में थे. अपनी बहन बहनोई के बीच रोज रोज होने वाले झगड़े से 48 वर्षीय विपुल वाकिफ थे इसलिए भांजे की बात सुनने के बाद वह औफिस से छुट्टी ले कर उस के पास रोहिणी चले गए. वहां उन्हें दैविक रोता हुआ मिला. विपुल ने उसे चुप कराया और उन्होंने भी अपनी बहन और जीजा को फोन मिलाया. दोनों के फोन अब भी स्विच्ड औफ मिले.

पेशे से पत्रकार विपुल नौटियाल का माथा ठनका. उन्होंने सोचा कि कहीं कोई गड़बड़ तो नहीं है. इसलिए उन्होंने उसी समय पुलिस कंट्रोलरूम के 100 नंबर पर फोन कर दिया. काल करने के कुछ समय बाद थाना बेगमपुर के थानाप्रभारी राजेश कुमार सहरावत एसआई मनदीप सिंह, कांस्टेबल विनोद कुमार आदि को ले कर रोहिणी सेक्टर-23 स्थित सप्तऋषि अपार्टमेंट के फ्लैट नंबर 110 पर पहुंच गए.

पुलिस ने दैविक और विपुल नौटियाल से बात की. उन से बात करने के बाद थानाप्रभारी को भी मामला संदिग्ध लगा. पुलिस ने सब से पहले फ्लैट से छानबीन शुरू करने के लिए दरवाजे पर लगे ताले को तोड़ा.

दरवाजा खोल कर पुलिस फ्लैट में गई तो डबलबेड पर कंबल ओढ़े कोई सोता हुआ दिखा. विपुल ने जैसे ही कंबल हटाया, उन की चीख निकल गई. वहां उन की छोटी बहन कौमुदी की लाश पड़ी थी. कौमुदी का गला कटा हुआ था और सिर भी फटा हुआ था.

बिस्तर भी खून से सना हुआ था. किसी ने कौमुदी का कत्ल करने के बाद उस की लाश को तसल्ली से ढक दिया था. चूंकि कौमुदी का पति हेमंत चतुर्वेदी फरार था और उस का फोन भी बंद आ रहा था, इसलिए विपुल ने अंदेशा जताया कि हेमंत ने ही वारदात को अंजाम दिया होगा.

क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम और जिले के आला अधिकारियों को सूचना देने के बाद थानाप्रभारी ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया. पता चला कि हत्यारे का मकसद केवल कौमुदी की हत्या करना ही था क्योंकि घर के कीमती सामान अपनीअपनी जगह रखे हुए थे.

क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम ने भी मौके पर पहुंच कर कई सुबूत कब्जे में लिए. मौके की जरूरी काररवाई पूरी करने के बाद थानाप्रभारी ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. यह बात 25 फरवरी, 2014 की है.

चूंकि मामला एक वरिष्ठ पत्रकार के परिवार से था इसलिए रिपोर्ट दर्ज होने के बाद मामले की जांच थानाप्रभारी राजेश कुमार सहरावत ने करनी शुरू कर दी. इस के अलावा क्राइम ब्रांच भी संभावित हत्यारे हेमंत चतुर्वेदी की खोज में जुट गई.

क्राइम ब्रांच के अतिरिक्त आयुक्त अशोक चांद ने स्पैशल यूनिट के एसीपी के.पी.एस. मल्होत्रा के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई जिस में इंसपेक्टर पवन कुमार, सबइंसपेक्टर मनदीप सांगवान, हेडकांस्टेबल पृथ्वी सिंह, मुरलीधर, कांस्टेबल रोहित सोलंकी, विनोद कुमार, संजीव, अंकित, प्रदीप, राजेश आदि को शामिल किया गया.

क्राइम ब्रांच और थाना पुलिस की टीम हेमंत चतुर्वेदी को सरगर्मी से तलाशने लगीं. पुलिस अपने स्तर से उसे ढूंढती रही लेकिन उस का पता नहीं चला. इसी तरह दो-ढाई महीने बीत गए, दिल्ली में उस का कहीं सुराग नहीं मिला.

क्राइम ब्रांच के एसआई मनदीप सांगवान के दिमाग में विचार आया कि हेमंत चतुर्वेदी जब दिल्ली में नहीं मिल रहा तो वह कहीं अपने गृह प्रदेश उत्तराखंड में तो नहीं छिप गया है. क्योंकि वह मूलरूप से पौड़ी गढ़वाल का रहने वाला था.

मनदीप सांगवान और कांस्टेबल विनोद कुमार ने उत्तराखंड में मौजूद अपने सूत्रों और उत्तराखंड पुलिस के सहयोग से हेमंत को खोजना शुरू किया. उन की यह कोशिश रंग लाई. पता चला कि वह कोटद्वार में वेश बदल कर रह रहा है.

इस खुफिया खबर के बाद दिल्ली क्राइम ब्रांच ने 24 मई, 2014 को कोटद्वार, उत्तराखंड पहुंच कर हेमंत चतुर्वेदी को गिरफ्तार करने में सफलता हासिल कर ली. पुलिस ने जब उसे गिरफ्तार किया तो उस के बदले हुए रूप को देख कर वह खुद अचंभित रह गई. स्थानीय कोर्ट में पेश करने के बाद पुलिस ट्रांजिट रिमांड पर उसे दिल्ली ले आई.

हेमंत से उस की पत्नी कौमुदी की हत्या की बाबत पूछताछ की गई तो उस ने स्वीकार कर लिया कि पत्नी की हत्या उस ने खुद की थी. उस की हत्या की उस ने जो कहानी बताई, वह दिमाग में पैदा हुए शक से उपजी हुई निकली.

कौमुदी मूलरूप से उत्तराखंड के गढ़वाल के रहने वाले बी.पी. नौटियाल की बेटी थी. बी.पी. नौटियाल बिक्रीकर विभाग में अधिकारी थे. उन की पोस्टिंग दिल्ली में थी. इसलिए दिल्ली के गुलाबी बाग स्थित मंदाकिनी अपार्टमेंट में परिवार के साथ रहते थे. यह सरकारी फ्लैट उन्हें सरकार की ओर से मिला हुआ था. बेटी कौमुदी के अलावा उन का एक बड़ा बेटा था विपुल नौटियाल.

बी.पी. नौटियाल एक अधिकारी थे, इसलिए उन्होंने दोनों बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाई. कौमुदी की इच्छा टीचर बनने की थी. उस ने सन 1997 में ग्रैजुएशन करने के बाद टीचिंग कोर्स किया. कोर्स करने के बाद उसे रोहिणी सैक्टर-25 स्थित रेयान इंटरनेशनल पब्लिक स्कूल में नौकरी मिल गई. एक बड़े स्कूल में टीचर बनने के बाद वह बहुत खुश थी. वहां उसे 35 हजार रुपए प्रति महीना सैलरी मिलती थी.

बेटी सयानी होने के बाद अपने पैरों पर खड़ी हो गई तो पिता उस के लिए उपयुक्त लड़का खोजने लगे. किसी परिचित ने उन्हें हेमंत चतुर्वेदी के बारे में बताया. हेमंत चतुर्वेदी उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल के बगौली गांव के रहने वाले जगदीश चतुर्वेदी का बेटा था जिन की सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो चुकी थी.

हेमंत नोएडा स्थित एक प्राइवेट कंपनी में सेल्समैन था. उसे 15 हजार रुपए प्रति महीना सैलरी मिलती थी. वह अपने भाईबहनों, मां के साथ दिल्ली के पीतमपुरा में मंदाकिनी इन्क्लेव में रहता था.

बी.पी. नौटियाल ने जब हेमंत व उस का परिवार देखा तो उन्हें लड़का पसंद आ गया. हेमंत की सैलरी भले ही कौमुदी की सैलरी से आधी से भी कम थी, इस के बावजूद भी उन्होंने हेमंत को पसंद कर लिया.

कौमुदी को जब इस का पता चला कि जिस लड़के के साथ उस की शादी की बात चल रही है, उस की सैलरी कम है. इस के बावजूद भी उस ने शादी का विरोध नहीं किया. कौमुदी को विश्वास था कि उस के पिता ने जो फैसला लिया है वह किसी न किसी रूप में सही ही होगा.

दोनों तरफ से बात होने के बाद 30 जनवरी, 1998 को कौमुदी का विवाह हेमंत के साथ कर दिया गया. शादी के बाद कौमुदी चतुर्वेदियों के परिवार में रहने लगी. उन के साथ रहने के कुछ दिनों बाद ही उसे महसूस हो गया कि जिस हेमंत से उस की शादी हुई है, वह उस के लायक नहीं है. लेकिन अब हो भी क्या सकता था. उसे जिंदगी उसी के साथ बितानी थी. लिहाजा वह खुद को वहां एडजस्ट करने की कोशिश करने लगी.

हेमंत की एक सब से बड़ी कमी यह थी कि वह रोज शराब पीता और कौमुदी से झगड़ता था. कौमुदी ने उस से शराब पीने को मना किया लेकिन हेमंत ने उस की एक नहीं सुनी. इस का नतीजा यह निकला कि इसी बात पर उन दोनों के बीच रोजरोज कलह होने लगी. हेमंत संयुक्त परिवार में रहता था. घर के और लोगों ने भी हेमंत को समझाने की कोशिश की लेकिन उस पर कोई फर्क नहीं पड़ा.

हेमंत के दोस्त यह बात जानते थे कि उस की पत्नी की सैलरी उस की सैलरी से दोगुने से भी ज्यादा है. वे उसे उलाहना देते कि वह पत्नी का गुलाम बन कर रहता होगा. और तो और रात को बीवी के पैर भी दबाने पड़ते होंगे. दोस्तों की ये बातें हेमंत के दिल में तीर की तरह चुभती चली जाती थीं. तब वह घर जा कर सारा गुस्सा कौमुदी पर उतारता था.

इसी बीच कौमुदी ने एक बेटे को जन्म दिया जिस का नाम दैविक रखा. बेटा पैदा होने के बाद वह उसी के पालनपोषण में व्यस्त रहने लगी. उस ने हेमंत द्वारा दी जाने वाली टेंशन को नजरअंदाज करना शुरू कर दिया. उस की इस सहनशीलता को हेमंत ने गलत समझा. इसी का फायदा उठाते हुए उस ने कौमुदी को और ज्यादा टेंशन देनी शुरू कर दी.

हेमंत का एक चचेरा भाई था उमेश. वह कुछ दिनों तक तो यह सोच कर चुप रहा कि हेमंत अपने आप सुधर जाएगा लेकिन हेमंत ने परिवार में जब ज्यादा ही कलह करनी शुरू कर दी तो बड़ा भाई होने के नाते उस ने एक दिन हेमंत को समझाया और गृहस्थी में शांति बनाए रखने की बात कही. वह जानता था कि उन दोनों के बीच झगड़े की मुख्य वजह शराब है, इसलिए उस से शराब छोड़ने को कहा.

उमेश के समझाने के 2-4 दिन बाद तक तो हेमंत ठीक रहा, बाद में वह अपने पुराने ढर्रे पर आ गया. उमेश ने उसे फिर से समझाया. हेमंत भी बड़ा ढीठ निकला. उस ने उस की बातों को हवा में उड़ाना शुरू कर दिया बल्कि वह कौमुदी को और ज्यादा मानसिक व शारीरिक रूप से प्रताडि़त करने लगा. यह बात उमेश से देखी नहीं जाती थी इसलिए वह हेमंत को डांट देता.

हेमंत शक्की किस्म का था. उमेश के ज्यादा दखल देने पर उसे शक हो गया कि कौमुदी का उमेश के साथ कोई चक्कर है तभी तो वह उस का ज्यादा पक्ष ले रहा है. अब हेमंत ने उमेश की बात माननी तो दूर उस का लिहाज करना भी बंद कर दिया. इस बात को ले कर हेमंत पत्नी को ताने भी देता.

उमेश ने कभी भी कौमुदी को गलत नजरों से नहीं देखा. कौमुदी भी उमेश को बड़ा भाई मानती थी इसलिए हेमंत के तानों ने दोनों के दिलों को ठेस पहुंचाई. इस आरोप ने उमेश को इतना आहत कर दिया कि वह अपने संयुक्त परिवार को छोड़ कर रोहिणी के ही सेक्टर-16 में किराए पर रहने लगा.

ससुराल में कौमुदी का पक्ष लेने वाला एक ही व्यक्ति था, वह भी वहां से चला गया तो कौमुदी की आंखों में आंसू भर आए. तब हमदर्दी का फाहा रखने के बजाय हेमंत ने शब्दों की छुरी से उस का जिगर छील दिया. जब बात बरदाश्त से बाहर होने लगी तो कौमुदी ने सारी बातें मायके वालों से कहीं.

पिता बी.पी. नौटियाल बहुत शरीफ थे. उन्होंने सोचा कि घरगृहस्थी में छोटीमोटी बातें चलती ही रहती हैं, वह कुछ दिनों में सामान्य हो जाएंगी. बेटी की गृहस्थी में उन्होंने दखल देना उचित नहीं समझा.

पहले तो हेमंत ही पत्नी पर चरित्रहीनता का आरोप लगाता था, बाद में उस के परिवार वाले भी उस पर कलंक लगाने की मुहिम में शामिल हो गए. घर वालों का साथ मिलने पर हेमंत के हौसले बुलंद हो गए. कौमुदी के पिता ने शादी में 6 लाख रुपए से अधिक खर्च किए थे. वैसे तो उन्होंने जरूरत का सभी सामान दिया था, लेकिन कार नहीं दी थी.

हेमंत और उस के घर वाले अब कौमुदी से कार की डिमांड करने लगे. कौमुदी ने यह बात पिता से कही. बी.पी. नौटियाल चाहते थे कि किसी भी तरह उन की बेटी खुश रहे. उन के पास इतने पैसे नहीं थे कि वह दामाद को नई कार खरीद कर दे सकें. पुरानी कार खरीदने के लिए उन्होंने 50 हजार रुपए जैसेतैसे इकट्ठे कर के हेमंत को दे दिए.

हेमंत ने उन पैसों से कार नहीं खरीदी बल्कि उन से वह अपने दूसरे शौक पूरे करने लगा. इस के बाद भी हेमंत का पत्नी के प्रति व्यवहार नहीं बदला. वह पहले की तरह उसे ताने देता रहा. इतना ही नहीं, उस ने सन 2003 में कौमुदी को मारपीट कर घर से निकाल दिया और कहा कि यदि उसे यहां रहना है तो मायके से 5 लाख रुपए नकद लाए.

कौमुदी बेटे को ले कर मायके चली गई. इस के बाद कौमुदी ने ठान लिया था कि जिस घर में उस के लिए इज्जत नहीं, वहां रहने से क्या फायदा. वह अब ससुराल नहीं जाएगी लेकिन अत्याचार करने वालों को वह सबक सिखा कर रहेगी.

मायके वालों से मशविरा करने के बाद वह 16 दिसंबर, 2003 को उत्तरी दिल्ली के थाना सराय रोहिल्ला पहुंच गई और हेमंत व उस के घर वालों के खिलाफ दहेज प्रताड़ना का मामला दर्ज करा दिया. उस की प्राथमिकी पर पुलिस ने काररवाई नहीं की बल्कि नामजद आरोपियों ने कोर्ट से अग्रिम जमानत ले ली.

पुलिस से कौमुदी को जो उम्मीद थी, वह पूरी नहीं हो सकी थी. उस पर जुल्म करने वाले अब खुलेआम सीना चौड़ा कर के घूम रहे थे. उस ने ससुराल पक्ष के नामजद लोगों के खिलाफ कोर्ट में दहेज उत्पीड़न का वाद प्रस्तुत कर दिया.

कोर्ट ने आरोपियों के खिलाफ एक्शन लेते हुए सम्मन जारी कर दिए और मुकदमे की काररवाई शुरू हो गई. इसी दौरान इस पूरे मामले में एक नया मोड़ आ गया. हेमंत ने भी कोर्ट में एक मामला दायर कर दिया. उस ने बताया कि नोएडा की जिस कंपनी में वह नौकरी करता था, वहां से उस की नौकरी छूट गई है. अब वह बेरोजगार है. आजीविका चलाने के लिए उस के पास कोई साधन नहीं है. उस ने कोर्ट से दरख्वास्त की कि पत्नी से उसे गुजारा भत्ता दिलाया जाए.

कई साल तक मुकदमा चलने के बाद जीत हेमंत की ही हुई. कोर्ट ने हेमंत चतुर्वेदी को बेरोजगार मानते हुए 30 अक्तूबर, 2012 को फैसला सुनाया कि कौमुदी पति को 15 हजार रुपए प्रतिमाह देगी. कोर्ट के आदेश पर कौमुदी कर भी क्या सकती थी. उसे अपनी लगभग आधी सैलरी निकम्मे पति को देनी पड़ती. वह परेशान थी कि क्या करे. 15 हजार रुपए बचाने के लिए कौमुदी ने हेमंत से समझौता करना मुनासिब समझा.

उसे पति से समझौता करने के लिए मजबूर होना पड़ा. इस के बाद हेमंत पत्नी और बेटे के साथ रोहिणी सेक्टर-23 में सप्तऋषि अपार्टमेंट में रहने लगा. उधर कौमुदी के बड़े भाई विपुल नौटियाल दिल्ली से प्रकाशित होने वाले अंगरेजी अखबार हिंदुस्तान टाइम्स में उपसंपादक हो गए थे. पिता बी.पी. नौटियाल भी रिटायर हो चुके थे जिस से उन्हें अपना सरकारी आवास छोड़ना पड़ा. विपुल ने वसुंधरा इनक्लेव में फ्लैट ले लिया था. वह बेटे के साथ ही रहने लगे.

हेमंत कुछ दिनों तो ठीक रहा. इस के बाद उस ने पुराना रवैया अख्तियार कर लिया. उस ने कौमुदी और उमेश के संबंधों को ले कर फिर से अंगुली उठानी शुरू कर दी. यानी उन के बीच फिर से कलह शुरू हो गई. 25 फरवरी, 2014 को भी इसी मुद्दे पर दोनों के बीच बहस छिड़ गई. हेमंत गुस्से में आगबबूला हो गया और उस ने पास में पड़ा हथौड़ा उठा कर कौमुदी के सिर पर दे मारा.

एक ही वार में कौमुदी का सिर फट गया. वह बेड पर गिर गई और सिर से तेजी से खून निकलने लगा. यह देख कर हेमंत घबरा गया. उसे लगा यदि पत्नी को इस हाल में छोड़ देगा तो जीवित बचने पर वह उसे जेल भिजवा देगी. खुद को बचाने के लिए वह किचन में गया और वहां से तेज धार वाला चाकू ले आया.

कौमुदी बेड पर बेहोश सी पड़ी थी. तभी हेमंत ने उस का गला काट दिया. इस के बाद उस की मौत हो गई. हेमंत का इरादा लाश को ठिकाने लगाना था. लिहाजा वह अंधेरा होने का इंतजार करने लगा. तब तक फ्लैट में कोई न आए, इसलिए वह बाजार से नया ताला खरीद लाया और दरवाजे पर लगा कर वहां से चला गया.

घर का पुराना ताला उस ने इसलिए नहीं लगाया क्योंकि पुराने ताले की एक चाबी बेटे दैविक के पास थी. उस ने बेटे को कौमुदी के कहीं चले जाने का इसलिए फोन किया था कि वह फ्लैट पर देर से आए. लेकिन वह ट्यूशन पढ़ कर शाम 6 बजे के करीब ही फ्लैट पर पहुंच गया था और बाद में भेद खुल गया.

हेमंत चतुर्वेदी से पूछताछ करने के बाद क्राइम ब्रांच ने उसे थाना बेगमपुर पुलिस के हवाले कर दिया क्योंकि मामला उसी थाने का था. थाना पुलिस ने भी हेमंत चतुर्वेदी से विस्तार से पूछताछ की और उसे कोर्ट में पेश करने के बाद जेल भेज दिया. कथा लिखे जाने तक हेमंत चतुर्वेदी जेल में बंद था.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

बाल्टी में लाश : हादसा या हत्या?

बाल्टी में बच्चा पड़ा था. अगले पल जब बाल्टी पर नजर गई तब उगमराज की चीख निकल गई. असल में 7 महीने का गुन्नू (Gunnu) बाल्टी के पानी में ही (Balti Me Mili Lash) औंधे मुंह उलटा पड़ा था.

उसे तुरंत बाहर निकाला गया. उगमराज चीखते हुए बोले, ”किस ने किया ऐसा. गुन्नू बाल्टी के पानी में कैसे आ गया?…और बाल्टी यहां कहां से आई? कौन लाया इसे यहां..?’’

एक तरफ शोभा अपने बेटे की मौत के गम को नहीं झेल पा रही थी, दूसरी तरफ घर के सभी लोग इस बात को ले कर परेशान थे कि वह कौन निर्दयी कौन हो सकता है, जिस ने मासूम बच्चे को इतनी बेरहमी से मारा होगा? पुलिस भी इस का कोई कारण नहीं तलाश पाई थी.

राजस्थान (Rajasthan) के पाली (Pali) जिले का एक कस्बा है बर. यहां की न्यू कालोनी में रहने वाले चंपालाल चौहान के घर सुबह से ही गहमागहमी थी. उन के यहां एक घरेलू आयोजन चल रहा था. वहां आसपास के लोगों के साथ पड़ोसी भीकमचंद चौहान भी आमंत्रित थे. भीकमचंद के खुशहाल परिवार में 2 बेटे थे उत्तम चंद और उगमराज.

उत्तम चंद के परिवार में 2 बेटे और एक बेटी थी, जबकि उगमराज के घर 10 साल की बेटी के बाद 7 माह पहले ही एक बेटा पैदा हुआ था. उसे पूरा परिवार प्यार से गुन्नू बुलाता था. गुन्नू अपनी मां शोभा की तो आंखों का तारा था. वह उसे पलभर के लिए भी अपनी आंखों से ओझल नहीं होने देती थी. दरअसल, बेटी के जन्म के बाद बड़ी मुश्किल से गुन्नू का जन्म हुआ था. इस से पहले वह 4 बार गर्भपात की पीड़ा भी झेल चुकी थी.

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दोनों भाइयों की खुशहाल जिंदगी संयुक्त परिवार में बीत रही थी. आपसी मेलजोल बना हुआ था. उन के परिवार के लोग चंपालाल परिवार के बुलावे पर दिन में करीब 3 बजे उन के घर गए थे. संयोग से उस वक्त गुन्नू सो रहा था. उस की मां शोभा ने अपने कमरे में लगे झूले में सुला कर दरवाजे की कुंडी बाहर से लगा दी थी. उस वक्त भीकमचंद के मकान में मरम्मत का काम भी चल रहा था. वहां 6 मजदूर काम पर लगे हुए थे.

शोभा को गुन्नू के सोने के समय का पता था. इस कारण वह उसे सोता छोड़ कर पड़ोस में चली गई थी. 2 जुलाई, 2023 की शाम के करीब पौने 5 बजे शोभा का पति उगमराज मजदूरों के काम को देखने के लिए अपने घर गया. मजदूरों से मिल कर वह अपने कमरे में भी गया. वहां झूले पर गुन्नू को नहीं पाया तो उसे थोड़ी चिंता हुई. कारण, शोभा ने उसे बताया था कि वह गुन्नू को झूले पर सुला कर आई है.

उगमराज को न जाने क्या सूझी तुरंत चंपालाल के घर चला गया. वहां शोभा की गोद में गुन्नू को नहीं पा कर पूछ बैठा, ”गुन्नू कहां है?’’

शोभा गुन्नू के बारे में अचानक पूछे जाने पर हैरान हो गई. वह बोली, ”गुन्नू कहां है! झूले पर सो रहा होगा.’’

”…लेकिन वह तो झूले में नहीं है.’’

”नहीं है… क्या मतलब है तुम्हारा? उसे तो मैं अपने कमरे में झूले पर सुला आई थी. मैं ने बताया तो था तुम्हें.’’ शोभा आश्चर्य से बोली.

”वो वहां नहीं है.’’

”तो फिर उसे झूले से कौन ले गया? कहीं उस झूले से जमीन पर तो नहीं गिर गया?’’ बोलती हुई शोभा तुरंत अपने घर गई. उन की बातें उगमराज की भाभी गुड़िया  ने भी सुनी. वह भी शोभा और उगमराज के साथ अपने देवर के कमरे में आ गई. सभी ने देखा झूला खाली था. नीचे जमीन पर या आसपास भी गुन्नू नहीं दिख रहा था.

घर में सभी गुन्नू के नहीं मिलने पर चिंतित हो गए. वे इधर उधर ढूंढने लगे. उसे तलाशते हुए उगमराज घर के स्टोर रूम में चला गया. वहां रखी बाल्टी से उस के पैर टकरा गए. उस में रखा पानी छलक कर उस के पैर पर जा गिरा.

उगमराज खीझता हुआ बोला, ”स्टोररूम में बाल्टी, वह भी पानी से भरी हुई? यह मजदूरों का ही काम होगा. शोभा की नजर बाल्टी पर गई तो उस में उस का बेटा गुन्नू पड़ा था.

”पानी की बाल्टी में यह कैसे आ गया?’’ कहते हुए शोभा ने झट से गुन्नू को अपने सीने लगा लिया. लेकिन यह क्या, उस ने पाया कि उस की सांसें और दिल की धड़कनें सभी बंद हैं. वह रोने लगी. चीखने लगी. बिफरने लगी. बोली, ”चलो, जल्द ले चलो इसे डाक्टर के पास!’’

उगमराज और दूसरे लोगों ने बच्चे की नाक के पास हाथ ले जा कर चैक किया, उस की सांसें जरा भी नहीं चल रही थी. उस की मौत हो चुकी थी.

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इस की सूचना पुलिस को भी दे दी गई. बर थाने के एसएचओ सुखदेव सिंह उगमराज के घर आ गए. उन्होंने बच्चे के मातापिता और घर के अन्य सदस्यों से किसी पर शक होने की जानकारी लेनी चाही. किसी ने इस बारे में कुछ नहीं बताया. कुछ लोगों ने वहां काम करने वाले मजदूरों पर संदेह जताया, लेकिन उन से पूछताछ पर कोई ठोस जानकारी नहीं मिल पाई.

थोड़ी देर के लिए बच्चे की हत्या का आरोप घर में काम करने वाले मजदूरों पर भी लगा, लेकिन उन से पूछताछ के बाद कोई नतीजा नहीं निकला.

घटना के अगले दिन 3 जुलाई, 2023 को बच्चे के मातापिता और दूसरे परिजनों ने सरपंच महेंद्र चौहान के साथ अस्पताल में काफी हंगामा किया और हत्यारे की गिरफ्तारी की मांग करने लगे.

इस हंगामे की सूचना पा कर जेतारण की सीओ सीमा चोपड़ा अस्पताल पहुंच गईं. उन्होंने किसी तरह धरना प्रदर्शन को शांत करवाया और गुन्नू की हत्या का मामला बर थाने में दर्ज करवा दिया. रिपोर्ट में संदेह के आधार पर 2 लोगों पर हत्या का आरोप लगाया गया.

इस वारदात की जांच के सिलसिले में सीओ सीमा ने घटनास्थल की जांच की. उन्होंने पाया कि भीकमचंद के मकान की पहली मंजिल पर निर्माण का कार्य चल रहा था. वहां मजदूरों के अलावा राजमिस्त्री भी थे. मरम्मती का काम भीकमचंद और उन की पत्नी की देखरेख में ही चल रहा था. जांच के दौरान परिजनों का पूरा विवरण जुटाया गया.

पुलिस की पूछताछ 2 दिनों तक लगातार हुई. परिवार, रिश्तेदार, मजदूर और पासपड़ोस के दोस्त आदि से भी गहन पूछताछ हुई. उन से निकाले गए निष्कर्ष के आधार पर शक की सुई परिवार के ही एक सदस्य पर जा टिकी. वह और कोई नहीं मृतक की चाची गुड़िया  थी.

पुलिस ने पाया कि गुन्नू की मौत से सब से ज्यादा दुखी गुड़िया   थी. उस का रोरो कर बुरा हाल था. रोने से उस की भी तबीयत खराब हो गई थी, जिस से उसे अस्पताल में भरती करवाना पड़ा था.

पानी भरी उस बाल्टी की भी जांच की गई, उस में सुनहरे रंग के सितारे नजर आ रहे थे. उसे देखते ही जांच अधिकारी का माथा ठनका, क्योंकि उसी तरह के कुछ सितारे गुड़िया  के चेहरे पर भी चिपके हुए थे और उस ने जो चुन्नी ओढ़ रखी थी, उस पर भी वैसे ही गोल्डन रंग के सितारे लगे हुए थे. जांच की इस जानकारी के बाद पुलिस का गुड़िया  पर शक होना स्वाभाविक था. अब जरूरत इस की पुष्टि होने की थी.

हालांकि इस बारे में जांच टीम आश्वस्त थी कि गुन्नू की हत्या में गुड़िया  का हाथ हो सकता है. उस की स्थिति में सुधार होने पर सुखेदव सिंह ने पूछताछ के लिए उसे थाने बुलवाया. पूछताछ के लिए जांच टीम ने काफी समझदारी से काम लिया. उस से मनोवैज्ञानिक तरीके सवाल पूछे गए.

पहले तो गुड़िया  ने खुद को निर्दोष बताया, लेकिन जल्द ही वह सीओ सीमा चोपड़ा के उलझे हुए सवालों में फंस गई. उसे बाल्टी में मिले गोल्डन सितारों के बारे में बताया गया और उसे झूठ बोलने वाली मशीन से पूछताछ करवाने की बात कही.

सीमा ने उस से पूछा, ”सचसच बताना, तुम 2 जुलाई को उस वक्त मजदूरों के लिए चाय बनाने के लिए घर आई थी न, जिस समय गुन्नू की मां चंपालाल के यहां खाना खा रही थी?’’

”हां, आई थी.’’ गुड़िया  बोली.

”तुम ने चाय बनाई थी?’’

”नहीं, मैं ने चाय नहीं बनाई थी.’’ गुड़िया  तुरंत बोली.

”तब तुम ने चंपालाल के घर पर महिलाओं से क्यों बोला कि मजदूरों को चाय पिला कर आ रही है?’’

इस क्रौस सवाल पर गुड़िया  उलझ गई. जवाब देने के बजाए ‘हां’ ‘न’ करने लगी. उस की सकपकाहट को देख कर सीमा चौधरी ने एक जबरदस्त डांट लगाई और झापड़ मारने के लिए हाथ उठाया ही था कि गुड़िया  घबराहट के साथ बोल पड़ी, ”जी…जी मैडम! में बताती हूं…सब कुछ बताती हूं…’’ बोलते बोलते गुड़िया  रोने लगी.

कुछ सेकेंड बाद दुपट्टे से आंसू पोंछती हुई बोलने लगी, ”मुझ से बहुत बड़ा अपराध हो गया, मैं ने गुन्नू की हत्या का अपराध किया है. मुझे जो सजा देनी है, दे दीजिए, लेकिन उस से गुन्नू वापस तो नहीं आ जाएगा न!’’

”तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई एक दुधमुंहे बच्चे को मारने की? उसे तुम ने बेरहमी से पानी में डुबो कर मार डाला… तुम तो बड़ी निर्दयी हो.’’ सीओ डपटती हुई बोली.

”मैडमजी, यही तो मुझे समझ में नहीं आया… मैं ने यह सब संपत्ति के लालच में किया. मैं चाहती थी कि हमारी पुश्तैनी संपत्ति मेरे बेटों को ही मिले… मैं लालच में अंधी हो गई थी.’’

गुड़िया  द्वारा फैमिली क्राइम (Family Crime) करने की बात स्वीकार लिए जाने के बाद उसे न्यायिक हिरासत में ले लिया गया. उस के बाद जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी—

थाना बर के अंतर्गत न्यू कालोनी में रहने वाले भीकमचंद ने दोनों बेटों उत्तमचंद और उगमराज को अलगअलग कपड़े की दुकान खुलवा दी थी. उत्तमचंद की दुकान बालुंदा गांव में थी, जबकि उगमराज की दुकान बर में ही थी.

दोनों सुबह होते ही अपनीअपनी दुकानों के लिए निकल पड़ते थे. दिन भर दुकान संभालने के बाद शाम को घर वापस लौट आते थे. दोनों संयुक्त परिवार में ही रह रहे थे. परिवार में सब कुछ ठीक चल रहा था, सिर्फ गुड़िया  के मन में ही खलबली मची रहती थी.

उसे बेटे की कमी खलती थी. जब भी वह शोभा के छोटे बेटे गुन्नू को देखती थी, उस के दिल में एक टीस उभरती थी, किंतु मन मसोस कर रह जाती थी. गुन्नू के जन्म के बाद से ही उस के व्यवहार में बदलाव आ गया था. इस के जन्म से पहले गुड़िया  चाहती थी कि देवर उगमराज उस के 2 बेटों में से एक को गोद ले ले.

इस के पीछे उस की मानसिकता संपत्ति का बंटवारा होने से रोकने की थी. उसे पता था कि संपत्ति का आधा भाग गोद दिए बेटे को मिल जाएगा. किंतु गुन्नू के पैदा होने पर उस की सोच पर पानी फिर गया. उस के बाद उस के दिमाग को संपत्ति के एक और हकदार की बात कचोटने लगी.

गुड़िया  को संपत्ति के बंटवारे का डर सताने लगा. वह देवरानी शोभा से जलने लगी. क्योंकि उस की हरसत पर पानी फिर गया था. उस के बाद ही उस ने गुन्नू की हत्या की योजना बना ली थी. उसे सिर्फ मौके की तलाश थी, जो उसे चंपालाल के यहां घरेलू आयोजन के मौके पर 2 जुलाई को मिल गया था.

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उस रोज गुड़िया  भी चंपालाल के यहां कार्यक्रम में शामिल थी. कार्यक्रम के दौरान जब भोजन की तैयार होने लगी, तब गुड़िया  मजदूरों को चाय देने के बहाने से अपने घर आ गई. वहां उस ने गुन्नू को झूले में सोया देखा. उस की आंखों में तब तक चमक आ चुकी थी. वह स्टोर में रखी बाल्टी बाहर ले आई. उस में मटके का पानी भर दिया. पानी भरी बाल्टी दोबारा स्टोर में रख आई.

गुड़िया  ने गहरी नींद में सो रहे गुन्नू को उल्टा कर के पानी भरी बाल्टी में डाल दिया. वह पानी में छटपटाने लगा. कुछ देर तक उस की छटपटाहट वह देखती रही. जब उस की सांस रुकने के बाद पानी के बुलबुले आने बंद हो गए, तब गुड़िया  चुपके से चंपालाल के यहां कार्यक्रम में चली आई.

गुन्नू के पानी में छटपटाने के दरम्यान गुड़िया  की सितारों लगी चुन्नी पानी में गिर कर गुन्नू की देह पर लिपट गई थी. जिस से उस के कुछ सितारे बाल्टी के तले और गुन्नू के शरीर पर भी चिपक गए थे.

गुड़िया  द्वारा अपना जुर्म स्वीकारे जाने के बाद उस के बयान को कलमबद्ध कर लिया गया था. पूरे मामले की जांच के बाद गुड़िया  5 जुलाई, 2023 को कोर्ट में पेश कर दी गई थी. वहां से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया था.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

देवर को बचाने के लिए ननद की हत्या

उत्तर प्रदेश के बरेली जिले के गैनी गांव में छोटेलाल कश्यप अपने परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में उन की पत्नी रामवती के अलावा 2 बेटे नरेश व तालेवर, 2 बेटियां सुनीता व विनीता थीं. छोटेलाल खेती किसानी का काम करते थे. इसी की आमदनी से उन्होंने बच्चों की परवरिश की. बच्चे शादी लायक हो गए तो उन्होंने बड़े बेटे नरेश का विवाह नन्ही देवी नाम की युवती से करा दिया.

कालांतर में नन्ही ने एक बेटे शिवम व एक बेटी सीमा को जन्म दिया. बाद में उन्होंने बड़ी बेटी सुनीता का भी विवाह कर दिया. अब 2 बच्चे शादी के लिए रह गए थे. छोटेलाल उन दोनों की शादी की भी तैयारी कर रहे थे.

इसी बीच दूसरे बेटे तालेवर ने ऐसा काम कर दिया, जिस से उन की गांव में बहुत बदनामी हुई. तालेवर ने सन 2014 में अपने ही पड़ोस में रहने वाली एक महिला के साथ रेप कर दिया था. जिस के आरोप में उस को जेल जाना पड़ा था.

उधर छोटेलाल की छोटी बेटी विनीता भी 20 साल की हो चुकी थी. यौवन की चमक से उस का रूपरंग दमकने लगा था. वह ज्यादा पढ़ीलिखी नहीं थी, पर उसे फिल्म देखना, फैशन के अनुसार कपड़े पहनना अच्छा लगता था. उस की सहेलियां भी उस के जैसे ही विचारों की थीं, इसलिए उन में जब भी बात होती तो फिल्मों की और उन में दिखाए जाने वाले रोमांस की ही होती थी. यह उम्र का तकाजा भी था.

विनीता के खयालों में भी एक अपने दीवाने की तसवीर थी, लेकिन यह तसवीर कुछ धुंधली सी थी. खयालों की तसवीर के दीवाने को उस की आंखें हरदम तलाशती थीं. वैसे उस के आगेपीछे चक्कर लगाने वाले युवक कम नहीं थे, लेकिन उन में से एक भी ऐसा न था, जो उस के खयालों की तसवीर में फिट बैठता हो.

बात करीब 2 साल पहले की है. विनीता अपने पिता के साथ एक रिश्तेदारी में बरेली के कस्बा आंवला गई, जो उस के यहां से करीब 13 किलोमीटर दूर था. वहां से वापसी में वह आंवला बसअड्डे पर खड़ी बस का इंतजार कर रही थी तभी एक नवयुवक जोकि वेंडर था, पानी की बोतल बेचते हुए उस के पास से गुजरा.

उस युवक को देख कर विनीता का दिल एकाएक तेजी से धड़कने लगा. निगाहें तो जैसे उस पर ही टिक कर रह गई थीं. उस के दिल से यही आवाज आई कि विनीता यही है तेरा दीवाना, जिसे तू तलाश रही थी. उस युवक को देखते ही उस के खयालों में बनी धुंधली तसवीर बिलकुल साफ हो गई.

वह उसे एकटक निहारती रही. उसे इस तरह निहारता देख कर वह युवक भी बारबार उसी पर नजर टिका देता. जब उन की निगाहें आपस में मिल जातीं तो दोनों के होंठों पर मुसकराहट तैरने लगती.

उसी समय बस आ गई और विनीता अपने पिता के साथ बस में बैठ गई. वह पिता के साथ बस में बैठ जरूर गई थी, पर पूरे रास्ते उस की आंखों के सामने उस युवक का चेहरा ही घूमता रहा. विनीता उस युवक के बारे में पता कर के उस से संपर्क करने का मन बना चुकी थी.

अगले ही दिन सहेली के यहां जाने का बहाना बना कर विनीता आंवला के लिए निकल गई. बसअड्डे पर खड़े हो कर उस की आंखें उसे तलाशने लगीं. कुछ ही देर में वह युवक विनीता को दिख गया. पर उस युवक ने विनीता को नहीं देखा था.

विनीता उस पर नजर रख कर उस का पीछा कर के उस के बारे में जानने की कोशिश में लग गई. कुछ देर में ही उस ने उस युवक के बारे में किसी से जानकारी हासिल कर उस का नाम व मोबाइल नंबर पता कर लिया. उस युवक का नाम हरि था और वह अपने परिवार के साथ आंवला में ही रहता था.

एक दिन हरि सुबह के समय अपनी छत पर बैठा था, तभी उस का मोबाइल बज उठा. हरि ने स्क्रीन पर बिना नंबर देखे ही काल रिसीव करते हुए हैलो बोला.

‘‘जी, आप कौन बोल रहे हैं?’’ दूसरी ओर से किसी युवती की मधुर आवाज सुनाई दी तो हरि चौंक पड़ा.

वह बोला, ‘‘आप कौन बोल रही हैं और आप को किस से बात करनी है?’’

‘‘मैं विनीता बोल रही हूं. मुझे अपनी दोस्त से बात करनी थी, लेकिन लगता है नंबर गलत डायल हो गया.’’

‘‘कोई बात नहीं, आप को अपनी दोस्त का नंबर सेव कर के रखना चाहिए. ऐसा होगा तो दोबारा गलती नहीं होगी.’’

‘‘आप पुलिस में हैं क्या?’’

‘‘जी नहीं, आम आदमी हूं.’’

‘‘किसी के लिए तो खास होंगे?’’

‘‘आप बहुत बातें करती हैं.’’

‘‘अच्छी या बुरी?’’

‘‘अच्छी.’’

‘‘क्या अच्छा है, मेरी बातों में?’’

अब हंसने की बारी थी हरि की. वह जोर से हंसा, फिर बोला, ‘‘माफ करना, मैं आप से नहीं जीत सकता.’’

‘‘और मैं माफ न करूं तो?’’

‘‘तो आप ही बताइए, मैं क्या करूं?’’ हरि ने हथियार डाल दिए.

‘‘अच्छा जाओ, माफ किया.’’

दरअसल विनीता को हरि का मोबाइल नंबर तो मिल गया था. लेकिन विनीता के पास खुद का मोबाइल नहीं था, इसलिए उस ने अपनी सहेली का मोबाइल फोन ले कर बात की थी. पहली ही बातचीत में दोनों काफी घुलमिल गए थे. दोनों के बीच कुछ ऐसी बातें हुईं कि दोनों एकदूसरे के प्रति अपनापन महसूस करने लगे.

फिर उन के बीच बराबर बातें होने लगीं.  विनीता ने हरि को बता दिया था कि उस दिन अनजाने में उस के पास काल नहीं लगी थी बल्कि उस ने खुद उस का नंबर हासिल कर के उसे काल की थी और उन की मुलाकात भी हो चुकी है.

जब हरि ने मुलाकात के बारे में पूछा तो विनीता ने आंवला बसअड्डे पर हुई मुलाकात का जिक्र कर दिया. हरि यह जान कर बहुत खुश हुआ क्योंकि उस दिन विनीता का खूबसूरत चेहरा आंखों के जरिए उस के दिल में उतर गया था.

इस के बाद दोनों एकदूसरे से रूबरू मिलने लगे. इसी बीच एक मुलाकात में दोनों ने अपने प्यार का इजहार भी कर दिया. दिनप्रतिदिन उन का प्यार प्रगाढ़ होता जा रहा था. विनीता तो दीवानगी की हद तक दिल की गहराइयों से हरि को चाहने लगी थी.

धीरेधीरे उन का प्यार परवान चढ़ने लगा. प्रेम दीवानों के प्यार की खुशबू जब जमाने को लगती है तो वह उन दीवानों पर तरहतरह की बंदिशें लगाने लगता है. यही विनीता के परिजनों ने किया. विनीता के घर वालों को पता चल गया कि वह जिस लड़के से मिलती है, वह बदमाश टाइप का है.

इसलिए उन्होंने विनीता पर प्रतिबंध लगाने शुरू कर दिए. लेकिन तमाम बंदिशों के बाद भी विनीता हरि से मिलने का मौका निकाल ही लेती थी.

धीरेधीरे दोनों के इश्क के चर्चे गांव में होने लगे. गांव के लोगों ने कई बार विनीता को हरि के साथ देखा. इस पर वह तरहतरह की बातें बनाने लगे. गांव वालों के बीच विनीता के इश्क के चर्चे होने लगे. इस से छोटेलाल की गांव में बदनामी हो रही थी.

घरपरिवार के सभी लोगों ने विनीता को खूब समझाया लेकिन प्यार में आकंठ डूबी विनीता पर इस का कोई असर नहीं हुआ. पूरा परिवार गांव में हो रही बदनामी से परेशान था. रोज घर में कलह होती लेकिन हो कुछ नहीं पाता था.

29 सितंबर की सुबह करीब 8 बजे विनीता अपनी भाभी नन्ही देवी के साथ दिशामैदान के लिए खेतों की तरफ गई थी. कुछ समय बाद नन्ही देवी घर लौटी तो विनीता उस के साथ नहीं थी. घर वालों ने उस से विनीता के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि जब वह दिशामैदान के बाद बाजरे के खेत से बाहर निकली तो उसे विनीता नहीं दिखी.

उस ने सोचा कि विनीता शायद अकेली घर चली गई होगी. लेकिन यहां आ कर पता चला कि वह यहां पहुंची ही नहीं है. नन्ही ने कहा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि विनीता अपनी किसी सहेली के यहां चली गई हो.

कुछ ही देर में गांव के एक किसान चंद्रपाल ने विनीता के घर पहुंच कर बताया कि रामानंद शर्मा के बाजरे के खेत में विनीता की लाश पड़ी है. उस समय छोटेलाल पत्नी के साथ डाक्टर के पास दवा लेने गए थे. छोटेलाल के धान के खेत के बराबर में ही रामानंद का बाजरे का खेत था.

यह खबर सुन कर सभी घर वाले लगभग दौड़ते हुए घटनास्थल पर पहुंचे. विनीता की लाश देख कर सब बिलखबिलख कर रोने लगे. इसी बीच वहां गांव के काफी लोग पहुंच गए थे. ग्रामप्रधान भी मौके पर थे. उन्होंने घटना की सूचना स्थानीय थाना अलीगंज को दे दी.

सूचना मिलते ही थानाप्रभारी विशाल प्रताप सिंह पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. विनीता के पेट में गोली लगने के निशान थे. निशान देख कर ऐसा लग रहा था कि किसी ने काफी नजदीक से गोली मारी है. इस का मतलब था कि हत्यारे को विनीता काफी अच्छी तरह से जानती थी. इसी बीच रोतेबिलखते छोटेलाल और उन की पत्नी भी वहां पहुंच गए.

थानाप्रभारी विशाल प्रताप सिंह ने नन्ही और बाकी घर वालों से आवश्यक पूछताछ की. फिर विनीता की लाश पोस्टमार्टम के लिए मोर्चरी भेज दी.

थाने वापस आ कर उन्होंने छोटेलाल कश्यप की लिखित तहरीर पर गांव के ही इंद्रपाल, हरपाल, उमाशंकर और धनपाल के खिलाफ भादंवि की धारा 302 के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया. तहरीर में हत्या का कारण इन लोगों से रंजिश बताया गया था.

थानाप्रभारी सिंह ने केस की जांच शुरू की तो पता चला कि विनीता का भाई तालेवर अपने मकान के पीछे रहने वाली युवती से दुष्कर्म के मामले में 2014 से जेल में बंद है. पुलिस को पता चला कि जिस युवती ने रेप का आरोप लगाया था, छोटेलाल ने उस युवती के पिता को भी विनीता की हत्या में आरोपी बनाया गया था.

साथ ही विनीता के किसी हरि नाम के युवक से प्रेम संबंध की बात पता चली. बेटी की इस हरकत से घर वाले काफी परेशान थे. इस से पुलिस का शक विनीता के परिवार पर केंद्रित हो गया.

थानाप्रभारी ने सोचा कि कहीं एक तीर से दो शिकार करने की कोशिश तो नहीं की गई. विनीता से छुटकारा तो मिलता ही साथ ही तालेवर को जेल भेजने वाले को भी जेल की चारदीवारी में कैद कराने में सफल हो जाते.

पूरी घटना की जांच में यही निष्कर्ष निकला कि परिवार का ही कोई सदस्य इस घटना में शामिल है. लेकिन मांबाप तो थे नहीं, उन का बेटा नरेश गांव में नहीं था. बची बेटे की पत्नी नन्ही जो विनीता के साथ ही गई थी और अकेली वापस लौटी थी. नन्ही पर ही हत्या का शक गहराया. थानाप्रभारी ने गांव के लोगों से पूछताछ की तो ऐसे में एक व्यक्ति ऐसा मिल गया, जिस ने ऐसा कुछ बताया कि थानप्रभारी की आंखों में चमक आ गई.

इस के बाद 2 अक्तूबर को उन्होंने नन्ही देवी को घर से पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया. जब महिला आरक्षी की उपस्थिति में नन्ही से सख्ती से पूछताछ की गई तो वह टूट गई. उस ने विनीता की हत्या अपने नाबालिग बेटे शिवम के साथ मिल कर किए जाने की बात स्वीकार कर ली और पूरी कहानी बयान कर दी.

विनीता के हरि नाम के युवक से प्रेम संबंध की बात से घर का हर कोई नाराज था. समझाने के बावजूद भी विनीता नहीं मान रही थी. गांव में हो रही बदनामी से घर वालों का जीना मुहाल हो गया था.

नन्ही अपनी ननद विनीता की कारगुजारियों से कुछ ज्यादा ही खफा थी. वह अपने परिवार को बदनामी से बचाना चाहती थी. इसलिए उस ने विनीता की हत्या अपने नाबालिग बेटे शिवम से कराने का फैसला कर लिया.

इस हत्या में उस इंसान को भी फंसा कर  जेल भेजने की योजना बना ली, जिस की बेटी से दुष्कर्म के मामले में उस का देवर तालेवर जेल में बंद था. उस इंसान के जेल जाने पर उस से समझौते का दबाव बना कर वह देवर तालेवर को जेल से छुड़ा सकती थी. घर में एक .315 बोर का तमंचा पहले से ही रखा हुआ था. नन्ही ने शिवम के साथ मिल कर विनीता की हत्या की पूरी योजना बना ली.

29 सितंबर की सुबह 8 बजे नन्ही ने बेटे शिवम को तमंचा ले कर घर से पहले ही भेज दिया. फिर विनीता को साथ ले कर दिशामैदान के लिए खुद घर से निकल पड़ी. विनीता को ले कर नन्ही अपने धान के खेत के बराबर में बाजरे के खेत में पहुंची. शिवम वहां पहले से मौजूद था.

विनीता के वहां पहुंचने पर शिवम ने तमंचे से विनीता पर फायर कर दिया. गोली सीधे विनीता के पेट में जा कर लगी. विनीता जमीन पर गिर कर कुछ देर तड़पी, फिर शांत हो गई.

विनीता की लीला समाप्त करने के बाद शिवम ने अपने धान के खेत में तमंचा छिपाया और वहां से छिपते हुए निकल गया. नन्ही भी वहां से घर लौट गई. लेकिन पुलिस के शिकंजे से वह न अपने आप को बचा सकी और न ही अपने बेटे को.

थानाप्रभारी विशाल प्रताप सिंह ने नन्ही को मुकदमे में 120बी का अभियुक्त बना दिया. शिवम की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त तमंचा भी पुलिस ने बरामद कर लिया.

आवश्यक लिखापढ़ी के बाद नन्ही को न्यायालय में पेश करने के बाद जेल भेज दिया गया, और शिवम को बाल सुधार गृह.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. कथा में शिवम नाम परिवर्तित है.

शक्की शौहर की भयानक करतूत : पत्नी और मासूम बच्चों की बेरहमी से हत्या

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शक्की शौहर की भयानक करतूत : पत्नी और मासूम बच्चों की बेरहमी से हत्या – भाग 3

एक दिन जब इलियास अचानक घर आया तो नसीमा किसी से मोबाइल पर बात कर रही थी. इलियास को आया देख कर उस ने फोन काट दिया.

इस बात पर दोनों के बीच तीखी तकरार हो गई. एक बार तकरार का यह सिलसिला शुरू हुआ तो फिर यह आए दिन की बात हो गई. कुछ दिनों बाद नसीमा की तबीयत खराब रहने लगी. इलाज के लिए वह दिल्ली के गुरु तेग बहादुर सरकारी अस्पताल जाने लगी.

यह बात भी इलियास को परेशान करने लगी. उस के मन में यह बात घर कर गई कि नसीमा बहाने से किसी से मिलने जाती है. एक दिन जब इलियास दिल्ली में था तो नसीमा ने उसे फोन कर के बताया कि उस के पेट में तकलीफ है और उसे इलाज के लिए गुरु तेगबहादुर अस्पताल शाहदरा जाना है.’’

‘‘मुझे पहले ही पता था कि तुम वहीं जाने की बात करोगी. यार तो वहीं मिलते होंगे. तुम बागपत में भी तो दिखा सकती हो.’’ इलियास ने छूटते ही कहा.

‘‘खुदा के वास्ते सोचसमझ कर मुंह खोला करो इलियास. वहां अच्छी डाक्टर हैं, इसलिए जाती हूं.’’ नसीमा ने उसे समझाने की कोशिश की, लेकिन वह कुछ समझने को तैयार ही नहीं था. उस ने दो टूक अपना फैसला सुना दिया, ‘‘तुम्हें दवा लेने के लिए वहां जाने की जरूरत नहीं है.’’

इस बात को ले कर दोनों के बीच खूब बहस हुई. नसीमा पति की आदत से बहुत परेशान थी. उस ने उस की बात एक कान से सुन कर दूसरे से निकाल दी. इलियास के मना करने के बावजूद वह शाहदरा गई. यह बात इलियास को पता चली तो अगले ही दिन वह गांव आ गया और उस ने नसीमा के साथ जमकर मारपीट की.

इलियास की मारपीट से क्षुब्ध हो कर नसीमा ने अगले दिन पुलिस चौकी टटीरी में शिकायत दर्ज करा दी. पुलिस ने इलियास को बुला कर डांटाफटकारा. उस ने अपनी गलती मान ली तो पुलिस ने दोनों का समझौता करा दिया.

जरूरत से ज्यादा बंदिशें बगावत को जन्म देती हैं. नसीमा के साथ भी यही हुआ. इस के बाद उस ने इलियास से पूछना ही बंद कर दिया. उस का जब मन करता, शाहदरा चली जाती. इस का भेद तब खुला, जब एक दिन इलियास दिन के वक्त घर आ गया. बच्चे घर पर थे.

बच्चों से जब यह पता चला कि नसीमा शाहदरा गई है तो इलियास का पारा सांतवें आसमान पर पहुंच गया. उस ने नसीमा का मोबाइल मिलाया. उस का गुस्सा तब और भी ज्यादा भड़क उठा, जब उस का मोबाइल बंद मिला.

शाम को नसीमा घर आई. उस के पास दवाइयां भी थीं. लेकिन इलियास कुछ सुनने को तैयार नहीं था. उस ने फिर उस के साथ मारपीट की. मोबाइल की बाबत पूछने पर नसीमा ने बताया कि उस की बैटरी खत्म हो गई थी, जिस की वजह से वह बंद हो गया था. वह सच बोल रही थी, पर इलियास को यकीन नहीं हुआ. वह कुछ भी सुनना या समझना नहीं चाहता था.

उस दिन के बाद इलियास बीवी पर शक को ले कर परेशान रहने लगा. शक उस के दिलोदिमाग पर इस कदर हावी हो चुका था कि उस की रातों की नींद उड़ गई. सोतेजागते, उठतेबैठते उस के दिमाग में एक ही बात चलती रहती थी कि नसीमा के किसी के साथ नाजायज ताल्लुकात हैं.

वह जबजब दिल्ली जाती थी, इलियास का दिमाग घूम जाता था. उसे यही लगता था कि वह किसी से मिलने जाती है. हालांकि इन बातों का उस के पास कोई सुबूत नहीं था, लेकिन यह सच है कि शक करने वाला सुबूत पर नहीं सिर्फ अपने शक पर यकीन करता है. इलियास के साथ भी ऐसा ही था.

आखिर अपने शक की वजह से उस ने मन ही मन नसीमा को रास्ते से हटाने का एक खतरनाक निर्णय ले लिया. एक दिन उस ने ममेरे भाई साजिद, दोस्त परवेज व भांजे सलीम को अपने पास बुलवाया. ये सभी बागपत में ही रहते थे. इलियास ने अपनी परेशानी और शक के बारे में उन्हें बता कर कहा कि वह नसीमा को रास्ते से हटाना चाहता है. पहले तो ये लोग डरे, लेकिन इलियास के समझाने पर मान गए.

उस दिन चारों ने नसीमा की हत्या की योजना बना ली. योजना को अंजाम तक पहुंचाने के लिए इलियास ने सब से पहले नसीमा से नाराजगी दूर कर के उस के साथ मधुर रिश्ते बनाने शुरू कर दिए. जब वह इस में कामयाब हो गया तो उचित मौके की तलाश में रहने लगा.

जल्द ही उसे यह मौका मिला गया. 6 फरवरी, 2014 को नसीमा ने इलियास को फोन कर के बताया कि उसे अल्ट्रासाउंड के लिए शाहदरा जाना है.

‘‘ठीक है कल आ जाना, मैं साथ चलूंगा.’’ इलियास ने खुश हो कर कहा. उस के लिए यह अच्छा मौका था. उस ने इस बाबत अपने साथियों को भी फोन कर के बता दिया. इस बीच इलियास ने एक चाकू का इंतजाम कर के अपने पास रख लिया.

हालांकि उसी शाम इलियास खुद भी घर आ गया था, लेकिन 7 फरवरी की सुबह 7 बजे वह नसीमा से यह कह कर निकल गया कि दिल्ली आ कर वह उसे फोन कर ले. अगले दिन दोपहर के वक्त नसीमा बच्चों को ले कर इलियास के पास पहुंच गई. इलियास बच्चों को उस के साथ देख कर चौंका. उस ने नसीमा से पूछा, ‘‘इन्हें साथ लाने की क्या जरूरत थी?’’

‘‘मैं ने सोचा इन्हें कपड़े दिला देंगे. इसलिए साथ ले आई.’’

इलियास को लगा था कि वह अकेली ही आएगी. उस ने उस का भविष्य भी तय कर दिया था. साजिद, परवेज व सलीम को वह कह चुका था कि वे लोग तैयार रहें, जब वह फोन करे तो आ जाएं.

इलियास ने पहले नसीमा को अस्पताल में दिखाया. फिर शाम को बच्चों को बाजार घुमाया, लेकिन यह कह कर कपड़े नहीं दिलाए कि फिर कभी दिला देगा. शाम ढले इलियास के तीनों साथी भी आ गए.

रात में टे्रन में सवार हो कर वह सवा 9 बजे अहेड़ा रेलवे स्टेशन पहुंचे. वहां इक्कादुक्का लोग ही थे. जब यात्री चले गए तो इलियास नसीमा के साथ पैदल ही गांव की तरफ चल दिया. साजिद, परवेज व सलीम उस के पीछे थे. रास्ता सुनसान था. इलियास ने पीछे घूम कर इशारा किया तो सलीम आगे आया और उस ने तमंचा निकाल कर फायर कर दिया. लेकिन उस का निशाना चूक गया.

सकते में आई नसीमा को अपने सामने मौत नाचती नजर आई. वह समझ गई कि वे लोग उसे खत्म कर देना चाहते हैं. दहशत के मारे वह जमीन पर गिर गई. वह गिड़गिड़ाई, ‘‘खुदा के वास्ते मुझे मत मारो इलियास.’’

‘‘तू रहम के काबिल नहीं है नसीमा.’’ गुस्से में दांत पीसते हुए इलियास ने चाकू निकाला और नसीमा को खींच कर किनारे ले गया और चाकू से उस की गरदन पर वार कर दिया. उस का वार चूकने की वजह से चाकू माथे पर लगा. इलियास ने दोबारा वार किया. इस बार नसीमा की गरदन से खून की धार फूट पड़ी. वह बचाव के लिए छटपटाई तो सलीम व साजिद ने उस के पैर जकड़ लिए.

मां को लहूलुहान देख कर बच्चों की चीख निकल गई. वह बुरी तरह सहम गए. नसीमा तड़प रही थी. तीनों बच्चे इलियास से लिपट कर रोने लगे. लेकिन शैतान बने इलियास ने उन्हें खूंखार नजरों से घूरते हुए अपने से दूर झटक दिया.

जरा सी देर में नसीमा ने दम तोड़ दिया. यह देख उस का 7 वर्षीय बेटा नाजिम बहन का हाथ पकड़ कर चिल्लाया, ‘‘नाजिया. भाग, अब्बू ने अम्मी को मार दिया है. यह हमें भी मार डालेंगे. अकरम का भी हाथ पकड़ ले.’’ दहशतजदा तीनों बच्चे गेंहू के खेत की तरफ भागने लगे.

लेकिन उन लोगों ने दौड़ कर तीनों बच्चों को पकड़ लिया. इलियास के सिर पर खून सवार था. वह हैवान बन चुका था. बच्चे मौत के डर से कांप रहे थे. लेकिन इलियास को जरा भी दया नहीं आई. उस ने सब से पहले 4 साल के अकरम की गरदन काट दी. यह देख नाजिम व नाजिया रोते रहे, ‘‘अब्बू हमें मत मारो, अब्बू…’’

इलियास को रहम नहीं आया और उस ने नाजिया व नाजिम का भी गला काट दिया. बच्चों ने छटपटा कर दम तोड़ दिया. इस के बाद इन लोगों ने नसीमा का मोबाइल स्विच औफ कर के वहीं डाल दिया. इलियास ने चाकू परवेज के हवाले कर दिया और चुपचाप घर आ गया.

रात में उस ने नसीमा के जो चंद फोटो घर में थे, सब जला दिए. इस के पीछे उस की सोच थी कि उस के फोटो दिखा कर पुलिस ट्रेन या अस्पताल में पूछताछ न कर सके. क्योंकि नसीमा के साथ वह भी था. इस के बाद वह सो गया. उस के तीनों साथी अपनेअपने घर चले गए.

अगली सुबह दिन निकलते ही इलियास ने नाटक शुरू कर दिया. लियाकत को यह जताने की कोशिश की कि नसीमा नहीं आई है, इसलिए वह परेशान है. उस का मकसद लियाकत को गवाह बनाना था. बाद में हत्या की बात सामने आने पर खूब ड्रामा किया. यही वजह थी कि एकाएक पुलिस को उस पर शक नहीं हुआ था.

इलियास को उम्मीद नहीं थी कि पुलिस उसे पकड़ लेगी. उस ने सोचा था कि कोई यकीन भी नहीं करेगा कि कोई इस तरह अपने बच्चों और पत्नी को मार सकता है. पुलिस गिरफ्त में इलियास को देख कर कोई विश्वास नहीं कर पा रहा था कि वह ऐसा भी कर सकता है.

पुलिस ने तीनों अभियुक्तों को अदालत में पेश किया. वहां इलियास को देखने के लिए लोगों की भीड़ लग गई. अदालत ने सभी को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया. बाद में पुलिस ने सलीम को भी मुखबिर की सूचना के आधार पर गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया.

अपराध चूंकि सनसनीखेज था, इसलिए पुलिस ने बाद में सभी आरोपियों के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) के तहत भी काररवाई की. कथा लिखे जाने तक किसी भी आरोपी की जमानत नहीं हो सकी थी.

अगर इलियास ने शक को तवज्जो न दे कर खतरनाक निर्णय न लिया होता तो न सिर्फ नसीमा और उस के बच्चे जिंदा होते, बल्कि उस का घर भी उजड़ने से बच जाता.

— कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

शक्की शौहर की भयानक करतूत : पत्नी और मासूम बच्चों की बेरहमी से हत्या – भाग 2

पूछताछ के दौरान इलियास ने पुलिस को बताया कि नसीमा के सिर व पेट में दर्द रहता था. उस का दिल्ली के सरकारी अस्पताल से इलाज चल रहा था. 7 फरवरी को उस का अल्ट्रासाउंड होना था. उस ने फोन पर यह बात इलियास को बता कर अस्पताल जाने के लिए कहा था. इलियास ने उसे जाने को कह दिया और उस शाम खुद गांव आ गया.

उसे हैरानी तब हुई, जब नसीमा देर रात तक घर नहीं आई. इलियास के अनुसार उस ने नसीमा से संपर्क करने की बहुत कोशिशें की. लेकिन नसीमा का मोबाइल बंद था. अगली सुबह जब उसे नसीमा की हत्या की खबर मिली तो वह हतप्रभ रह गया.

‘‘तुम्हारी किसी से कोई दुश्मनी तो नहीं थी?’’ एन.पी. सिंह ने पूछा तो वह बोला, ‘‘नहीं साहब, मैं तो सीधासादा आदमी हूं. मेरा तो कभी किसी से झगड़ा तक नहीं हुआ. कमाना और खाना, बस इसी में जिंदगी बीत रही है. पता नहीं मेरे परिवार को किस मनहूस की नजर लग गई.’’

पुलिस के सामने सब से बड़ा सवाल यह था कि जब इलियास और नसीमा की किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी तो फिर नसीमा को कोई क्यों मारेगा? साथ ही यह भी कि उस के बच्चों ने किसी का क्या बिगाड़ा था? यह बात साफ थी कि हत्यारे नसीमा या उस के बच्चों को जिंदा नहीं छोड़ना चाहते थे.

ऐसे में नसीमा का मोबाइल इस मामले के खुलासे में महत्त्वपूर्ण कड़ी साबित हो सकता था. इस बीच मृतकों की पोस्टमार्टम रिपोर्ट पुलिस को मिल गई थी. नसीमा की गरदन व माथे पर तो 3 घाव थे, जबकि बच्चों के भी गले काटे गए थे. सभी की मृत्यु की एकमात्र वजह सांस की नली का कटना और अधिक रक्तस्राव होना थी.

अगले दिन पुलिस ने गांव के कुछ लोगों से भी पूछताछ की. पुलिस को इलियास की पहली बीवी के बेटे आबिद पर भी शक हुआ. दरअसल कई बार युवा लड़के प्रौपर्टी और मनमुटाव के चलते सौतेली मां के हत्यारे बन जाते हैं. लेकिन जांचपड़ताल में पता चला कि नसीमा का आबिद से कोई मनमुटाव नहीं था. कभी किसी ने उन्हें लड़तेझगड़ते भी नहीं देखा था.

नसीमा व उस के बच्चों की हत्याएं साफ इशारा कर रही थीं कि यह वारदात लूटपाट के लिए नहीं, बल्कि किसी अपने ने की थी. नसीमा की मौत से चूंकि आबिद को ही कोई फायदा हो सकता था, इसलिए शक की सूई उसी पर ठहर गई. सौतेली मां की मौत की खबर पा कर वह भी गांव आ गया था.

सीओ एन.पी. सिंह और इंसपेक्टर अनिल कपरवाल ने आबिद से घुमाफिरा कर पूछताछ की. उस ने बताया कि घटना वाली रात वह दिल्ली में था. पुलिस ने उस के बयानों की न सिर्फ तसदीक कराई, बल्कि उस के मोबाइल की लोकेशन की भी पड़ताल कराई.

शाम तक इस बात की पुष्टि हो गई कि आबिद सच बोल रहा है. वह इस तरह का युवक नहीं था कि हत्या या कोई षड्यंत्र कर सके. पुलिस ने उस के छोटे भाई शाहिद से भी पूछताछ की. लेकिन पुलिस को कोई दिशा नहीं मिल सकी.

पुलिस असमंजस में थी. जो शक के दायरे में आया था वह कातिल नहीं निकला और जो कातिल थे उन का कोई सुराग नहीं मिल पा रहा था. यह निश्चित था कि नसीमा की हत्या रात के वक्त की गई थी.

अनुमान था कि वह 1 बजे पैसेंजर ट्रेन से अहेड़ा स्टेशन पर उतर कर गांव की तरफ चली होगी. ऐसा भी कोई शख्स नहीं मिला जो बता सके कि उस ने नसीमा या उस के बच्चों को स्टेशन पर उतरते देखा था. घटना को 2 दिन बीत चुके थे, लेकिन पुलिस किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पा रही थी.

कोई और रास्ता न देख पुलिस ने नसीमा की काल डिटेल्स और फोन की लोकेशन निकलवाई. नसीमा की घटना वाले दिन इलियास से बात हुई थी. उस की लोकेशन शाहदरा के गुरु तेगबहादुर अस्पताल के अलावा, लोनी व अहेड़ा रेलवे स्टेशन पर पाई गई थी.

इस का मतलब उस का मोबाइल हत्या के बाद बंद किया गया था. लेकिन इस से किसी नतीजे पर पहुंचना मुश्किल था. इस बीच पुलिस को पता चला कि 2 महीने पहले नसीमा ने इलियास के खिलाफ टटीरी पुलिस चौकी पर मारपीट करने की शिकायत दर्ज कराई थी. हालांकि इस विवाद को पुलिस ने सुलझा दिया था.

इलियास के कमजोर शरीर को देख कर ऐसा नहीं लगता था कि वह इतना बड़ा कांड कर सकता है. लेकिन जब इस मामले पर दूसरे नजरिए से सोचा गया तो यह बात निकल कर सामने आई कि अपराध की पृष्ठभूमि में शरीर से नहीं दिमाग से काम लिया जाता है.

जो लोग ज्यादा शातिर होते हैं वे जाहिर तक नहीं होने देते कि उन के मन में क्या चल रहा है. पुलिस को लगा कि हो न हो इलियास के मामले में भी ऐसा ही हो. पुलिस ने उसे शक के दायरे में ले कर उस के मोबाइल की काल डिटेल्स और लोकेशन निकलवाई.

पता चला दोपहर से ले कर रात तक उस के और नसीमा के मोबाइल की लोकेशन एक ही थी. इस का मतलब वे दोनों साथसाथ थे. जबकि उस ने पुलिस को बताया था कि वह शाम को घर आ गया था. जाहिर है वह झूठ बोल रहा था. लेकिन पुलिस इस संवेदनशील मामले में कोई रिस्क नहीं लेना चाहती थी, क्योंकि इलियास कोई ड्रामा भी खड़ा कर सकता था.

अपने पक्ष को और पुख्ता बनाने के लिए पुलिस ने उस की आउटगोइंग काल्स की जांच की. घटना वाले दिन उस की नसीमा के अलावा 3 और नंबरों पर बातें हुई थीं. पुलिस ने उन नंबरों का पता किया तो वे तीनों नंबर साजिद, परवेज व सलीम के नाम थे.

पुलिस को पता चला कि साजिद इलियास का ममेरा भाई, परवेज दोस्त व सलीम भांजा था. इस के बाद शक की सुई पूरी तरह इलियास पर ठहर गई. चौंकाने वाली बात यह थी कि उन तीनों के मोबाइल की लोकेशन भी घटना वाली रात अहेड़ा स्टेशन के आसपास थी.

पुलिस ने सब से पहले उन्हीं तीनों पर शिकंजा कसने का फैसला किया. 12 फरवरी की शाम पुलिस ने एक सूचना के आधार पर परवेज व साजिद को गौरीपुर मोड़ से गिरफ्तार कर लिया. दोनों को थाने ला कर पूछताछ की गई तो जल्दी ही दोनों ने ऐसी बात बताई, जिसे सुन कर पुलिसकर्मी हैरान रह गए.

पता चला कि इस हत्याकांड का षड्यंत्र इलियास ने ही रचा था. उसी ने इन लोगों के साथ मिल कर वारदात को अंजाम दिया था. यह पता चलते ही पुलिस ने बिना समय गंवाए इलियास को हिरासत में ले लिया.

पूछताछ में पहले तो उस ने पुलिस को बरगलाने का प्रयास किया, लेकिन जब साजिद व परवेज को उस के सामने खड़ा किया गया तो वह टूट गया. उस से विस्तृत पूछताछ में चौंकाने वाली कहानी निकल कर सामने आई. बात कोई खास नहीं थी, बस इलियास के शक्की स्वभाव ने उसे कातिल बना दिया था.

इलियास शक्की स्वभाव का था. नसीमा से विवाह के बाद उस की जिंदगी आराम से बीत रही थी. नसीमा हंसमुख स्वभाव की थी. किसी से भी हंसबोल लेना उस का स्वभाव था. इलियास चूंकि दिल्ली में काम करता था, इसलिए कभी दिलशाद गार्डन में रुक जाता था तो कभी गांव आ जाता था.

करीब एक साल पहले उस ने नसीमा को मोबाइल ले कर दे दिया, ताकि वक्त जरूरत पर वह उसे फोन कर सके. इस से यह सुविधा हो गई थी कि इलियास घर फोन कर के न सिर्फ खैर खबर ले लिया करता था, बल्कि नसीमा अपने मायके भी बात कर लेती थी.

इसी के चलते कई बार ऐसा हुआ कि जब इलियास ने घर वाला नंबर मिलाया तो वह व्यस्त मिला. पूछने पर नसीमा ने बताया भी कि वह बिहार बात कर रही थी. इस के बावजूद इलियास ने उसे कई बार डांटा. वह शक्की तो था ही, उसे लगता था कि नसीमा किसी पुरुष से बात करती है.

मजबूत डोर के कमजोर रिश्ते : भाई क्यों बना कसाई? – भाग 3

कुछ दिनों तक तो सब ठीक चलता रहा. घर वालों का रागिनी से धीरेधीरे ध्यान हटने लगा था. फिर मौका देख कर रागिनी अपने प्रेमी राकेश से मिलने लगी. उस ने राकेश से कह दिया कि वह उस के बिना जी नहीं सकती. वह उसे यहां से कहीं दूर ले चले, जहां हमारे सिवाय कोई और न हो. राकेश ने उसे भरोसा दिया कि वह परेशान न हो, जल्द ही वह कोई बीच का रास्ता निकाल लेगा.

रागिनी इस बात से पूरी तरह मुतमईन थी कि अब तो घर वाले भी उस की ओर से बेपरवाह हो चुके हैं. लिहाजा वह पहले की तरह ही चोरीछिपे प्रेमी राकेश से मिलने लगी. यह रागिनी की सब से बड़ी भूल थी. उसे यह पता नहीं था कि घर वाले केवल दिखावे के तौर पर उस की तरफ से बेपरवाह हुए थे. लेकिन उन की नजरें हर घड़ी उसी पर जमी रहती थीं.

सिकंदर को पता चल गया था रागिनी फिर से राकेश से मिलने लगी है. इस बार सिकंदर ने रागिनी को राकेश के साथ बतियाते हुए रंगेहाथ पकड़ लिया था. फिर क्या था, वह उसे वहीं से पकड़ कर घर ले आया और उस की खूब पिटाई की. इस बार पारसनाथ ने बेटे को पिटाई करने से नहीं रोका, बल्कि उस ने बेटी को सुधारने के लिए बेटे को पूरी आजादी दे दी थी.

पानी अब सिर से ऊपर गुजरने लगा था. डांट या मार का रागिनी पर अब कोई असर नहीं होता. रागिनी की करतूतों से घर वालों की इज्जत तारतार हो रही थी. बहन के चलते परिवार की हो रही बदनामी को देख सिकंदर भी ऊब गया, इसलिए उस ने रागिनी की हत्या करने की ठान ली. इस बाबत उस के मांबाप में से किसी को कुछ भी नहीं बताया.

सिकंदर का एक जिगरी दोस्त था कामदेव सिंह. वह शाहपुर थानाक्षेत्र के व्यासनगर जंगल में रहता था. उस पर कई आपराधिक केस भी चल रहे थे. सिकंदर जानता था यह काम कामदेव आसानी से कर सकता है. दोस्त होने के नाते वह उस की बात कभी नहीं टालेगा. वैसे सिकंदर खुद भी इस काम को अकेला कर सकता था लेकिन वह खून के मजबूत रिश्तों की डोर से बंधा हुआ था. ऐसा करते हुए उस के हाथ कांप सकते थे.

सिकंदर ने कामदेव को रागिनी की करतूतें बता कर उसे रास्ते से हटाने की बात कही तो वह उस का साथ देने के लिए तैयार हो गया. दोनों ने दीपावली के दिन रागिनी की हत्या करने की योजना बना ली ताकि पटाखों के शोर में रागिनी की मौत की आवाज दब कर रह जाए.

लेकिन दोनों को दीपावली के दिन किसी वजह से यह मौका नहीं मिला. तब कामदेव ने सिकंदर को भरोसा दिया कि वह अकेला ही इस काम को अंजाम दे देगा. 20 नवंबर, 2018 की शाम रागिनी घर से साइकिल से कहीं जा रही थी. घर से थोड़ी दूर पर रास्ते में उसे कामदेव मिल गया.

कामदेव ने रागिनी को अपनी बातों में उलझा लिया और उसे प्रेमी राकेश से मिलाने की बात कह कर अपनी मोटरसाइकिल पर बैठा लिया. घंटों तक वह उसे इधरउधर घुमाता रहा. रागिनी के कुछ भी पूछने पर वह गोलमोल उत्तर दे कर उसे बहलाता रहा. रात करीब 10 बजे वह उसे चिलुआताल थाने से कुछ दूर उमरपुर गांव के बाग की ओर ले गया. तब तक चारों ओर गहरा सन्नाटा पसर गया था.

उस ने मोटरसाइकिल बाग में रोक दी और वे दोनों बाइक से नीचे उतर गए. रागिनी ने उस से फिर पूछा कि राकेश कहां है? तो कामदेव ने कहा, ‘‘बस कुछ देर और ठहर जाओ. वह आता ही होगा.’’ इतना कहते ही कामदेव ने कमर में खोंसा हुआ पिस्टल निकाला. पिस्टल देख कर रागिनी के होश उड़ गए.

अब वह समझ गई कि कामदेव ने उस के साथ बड़ा धोखा किया है. वह कुछ कह पाती, उस से पहले ही कामदेव ने उस के शरीर में पिस्टल से 5 गोलियां उतार दीं. गोलियां लगते ही रागिनी ने मौके पर दम तोड़ दिया. कहीं वह जीवित न रह जाए, इसलिए कामदेव ने साथ लाए पेचकस से उस के शरीर को गोद डाला.

उसे ठिकाने लगा कर वह वहां से इत्मीनान से घर चला गया. फिर सिकंदर को फोन कर के काम हो जाने की जानकारी दे दी. जिस पिस्टल से उस ने रागिनी की हत्या की थी, वह उस ने अपने कमरे की अलमारी में छिपा दी.

अगले दिन सिकंदर ने अफवाह फैला दी कि रागिनी फिर से अपने प्रेमी के साथ घर से भाग गई. 2 दिनों बाद पारसनाथ को सच्चाई का पता चल गया था. सच जान कर उस ने चुप्पी साध ली थी लेकिन उस की दोनों बेटियों ने राज से परदा उठा कर उन्हें बेनकाब कर दिया. नहीं तो सिकंदर और कामदेव ने मिल कर जो खतरनाक योजना बनाई थी, शायद पुलिस उन तक नहीं पहुंच पाती.

मामले का खुलासा हो जाने के बाद थानाप्रभारी ने पारसनाथ और उस की पत्नी को बेकसूर मानते हुए घर भेज दिया. पुलिस ने अभियुक्त सिकंदर और उस के दोस्त कामदेव को गिरफ्तार कर लिया. 7 दिसंबर, 2018 को एसपी (नार्थ) अरविंद कुमार पांडेय और सीओ रोहन प्रमोद बोत्रे ने पुलिस लाइन में प्रैस कौन्फ्रैंस कर पत्रकारों को केस के खुलासे की जानकारी दी. दोनों हत्याभियुक्तों को पुलिस ने कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

शक्की शौहर की भयानक करतूत : पत्नी और मासूम बच्चों की बेरहमी से हत्या – भाग 1

सुबह के करीब 7 बजे का वक्त था. परेशान सा इलियास घर के बरामदे में टहल रहा था. कभी वह दरवाजे पर जा कर बाहर झांकता, तो कभी गली में चक्कर लगा कर घर में लौट जाता. पड़ोस में रहने वाले लियाकत ने इलियास को परेशान देख कर पूछ लिया, ‘‘खैरियत तो हैं इलियास मियां, कुछ परेशान दिख रहे हो?’’

इलियास ने पहले उसे गहरी नजरों से देखा, फिर जवाब दिया, ‘‘हां, परेशानी की ही बात है.’’

‘‘क्या हुआ मियां, जरा हमें भी तो बताओ?’’

‘‘तुम्हारी भाभी का कुछ अतापता नहीं है.’’

‘‘मतलब?’’

‘‘कल वह दवा लेने दिल्ली गई थी, लेकिन अभी तक आई नहीं है. परेशानी यह है कि उस के साथ तीनों बच्चे भी हैं.’’

‘‘मोबाइल तो होगा उन के पास?’’ लियाकत ने जिज्ञासावश पूछा तो इलियास चिंता जाहिर करते हुए बोला, ‘‘हां है, लेकिन नंबर मिलामिला कर थक गया हूं. बराबर बंद आ रहा है. खुदा खैर करे, किसी परेशानी में न फंस गई हो वह.’’

‘‘ऐसा क्यों सोचते हो इलियास भाई, आ जाएंगी.’’ लेकिन लियाकत के समझाने पर भी इलियास की परेशानी रत्ती भर कम नहीं हुई. इलियास की जगह कोई और भी होता तो ऐसे हालातों में वह भी इसी तरह परेशान होता.

इलियास उत्तर प्रदेश के जाट बाहुल्य बागपत जिले के कोतवाली क्षेत्र में आने वाले गांव चौहल्दा का रहने वाला था. वह दिल्ली के दिलशाद गार्डन इलाके की रेडीमेड गारमेंट्स फैक्ट्री में इस्तरी करने का काम करता था. उस के परिवार में पत्नी नसीमा, 7 साल का बेटा नाजिम, 5 साल की बेटी नाजिया और 4 साल के बेटे अकरम को मिला कर 5 सदस्य थे. नसीमा 7 महीने की गर्भवती थी.

इलियास दिल्ली में अकेला रहता था. बीचबीच में वह गांव आता रहता था. जबकि नसीमा बच्चों के साथ गांव में ही रहती थी. दुबलपतला इलियास किसी तरह मेहनत कर के अपने परिवार को पाल रहा था.

7 फरवरी, 2014 को नसीमा बच्चों के साथ दिल्ली गई थी, लेकिन अगले दिन तक भी वापस नहीं आई थी. इलियास इसी बात को ले कर किसी अनहोनी की आशंका से परेशान था.

इलियास व लियाकत इस मसले पर बात कर ही रहे थे कि तभी एक शख्स तेजी से साइकिल चलाते हुए उन के पास आया. उस के चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं. उस ने हांफते हुए बताया, ‘‘इलियास भाई गजब हो गया.’’

इलियास ने फटीफटी आंखों से उस की तरफ देख कर पूछा, ‘‘क्या हुआ?’’

‘‘किसी ने नसीमा भाभी का कत्ल कर दिया है.’’

‘‘या अल्लाह,’’ इलियास अपने कानों पर हाथ रख कर चिल्लाया.

‘‘भाभी की लाश गांव के रास्ते पर पड़ी है.’’ उस ने बताया तो इलियास के होश उड़ गए. वह रोने बिलखने लगा तो जरा सी देर में लोग एकत्र हो गए. सभी दौड़ेदौड़े गांव के बाहर पहुंचे.

नसीमा की लाश अहेड़ा रेलवे स्टेशन से चौहल्दा गांव तक आने वाले रास्ते पर सड़क के किनारे खेत में पड़ी थी. वहां पहले से ही लोग जमा हो चुके थे. किसी ने बड़ी बेरहमी से नसीमा की गरदन और चेहरे पर वार किए थे. लाश के पास ही उस का मोबाइल पड़ा था. लाश को सुबह काम पर जा रहे ग्रामीणों ने देखा था. लाश देख कर उन्होंने नसीमा को पहचान लिया था. उन्हीं में से एक व्यक्ति ने गांव जा कर इलियास को इस बात की जानकारी दी थी.

नसीमा के बच्चों का कहीं पता नहीं था. ग्रामीणों ने आसपास तलाश शुरू की तो गेहूं के खेत में जो दृश्य देखने को मिला, उसे देख कर सभी के रोंगटे खड़े हो गए. तीनों बच्चों की भी लाशें वहां पड़ी थीं. उन की हत्या बेरहमी के साथ धारदार हथियार से गला काट कर की गई थी.

इस चौहरे हत्याकांड से गांव में कोहराम मच गया. दिल दहला देने वाले इस दृश्य को देख कर लोगों की आंखें नम हो गईं. सभी के मन में एक ही सवाल था कि आखिर इन मासूमों ने किसी का क्या बिगाड़ा था? इलियास का रोरो कर बुरा हाल था. लोग गमजदा इलियास को संभालने की कोशिश कर रहे थे.

लोगों ने इस घटना की सूचना पुलिस को दे दी. सनसनीखेज हत्याकांड की खबर मिलते ही थानाप्रभारी अनिल कपरवाल, सीओ एन.पी. सिंह और पुलिस अधीक्षक जितेंद्र कुमार शाही घटनास्थल पर आ गए. ग्रामीणों में भारी आक्रोश था.

निस्संदेह मामला गंभीर था. पुलिस ने शवों का निरीक्षण किया. सभी की गरदनों पर वार किए गए थे. घटनास्थल पर बिखरे खून से साफ पता चल रहा था कि हत्याएं उसी स्थान पर की गई थीं. हत्यारों ने नसीमा के मोबाइल के अलावा कोई सुबूत शवों के इर्दगिर्द नहीं छोड़ा था.

गमगीन माहौल में ही पुलिस ने पूछताछ की तो पता चला कि नसीमा की तबीयत खराब थी. वह दिल्ली के शाहदरा स्थित गुरु तेग बहादुर अस्पताल दवा लेने गई थी. शाम को संभवत: जब वह टे्रन से उतर कर गांव की तरफ जा रही थी, तभी उस की हत्या कर दी गई थी.

मामला चौहरे हत्याकांड का था, लिहाजा एसपी जे.के. शाही ने इस की सूचना मेरठ रेंज के आईजी आलोक शर्मा व डीआईजी के. सत्यनारायण को भी दे दी. पुलिस ने मौकामुआयना कर के शवों का पंचनामा किया और उन्हें पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. माहौल इस कदर गमगीन व गरमाया हुआ था कि इलियास से ज्यादा पूछताछ नहीं की जा सकती थी.

बड़ी घटना के मद्देनजर आईजी व डीआईजी बागपत आ गए. हत्याकांड की प्राथमिक जानकारी ले कर उन्होंने अधिकारियों को इस मामले का जल्द से जल्द खुलासा किए जाने के निर्देश दिए. इसी बीच सैकड़ों की तादाद में ग्रामीण पोस्टमार्टम हाउस पर जमा हो गए.

उन्होंने रोष प्रकट कर के पुलिस के खिलाफ नारेबाजी शुरू कर दी. इतना ही नहीं शवों को उठा कर उन्हें दिल्लीयमनोत्री हाईवे पर रख कर जाम लगा दिया. पुलिस ने विरोध किया तो लोग हाथापई पर उतारू हो गए. इलियास पुलिसकर्मियों से उलझ गया. अधिकारियों ने इसे उस की बदहवासी समझा.

पुलिस अधिकारियों ने ग्रामीणों को समझाया और जल्दी ही हत्यारों को पकड़ने का आश्वासन दिया. जब ग्रामीण नहीं माने तो पुलिस ने बल प्रयोग किया और जबरन शव अपने कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम कराया. पोस्टमार्टम के बाद शवों को ग्रामीणों के हवाले कर दिया गया. इस बीच इलियास की तरफ से थाने में अज्ञात हत्यारों के विरुद्ध भादंवि की धारा 302 के अंतर्गत मुकदमा दर्ज कर लिया गया.

सामूहिक हत्या के इस जघन्य मामले को खोलने के लिए पुलिस पर दबाव बना हुआ था. पुलिस अपनी जांच में लगी थी. इसी जांच में चौंकाने वाली बात यह पता चली कि मृतका इलियास की दूसरी बीवी थी. उस की पहली बीवी वरीसा बागपत के ही निनाना गांव की रहने वाली थी. उस के आबिद, आबिदा, शाहिदा, शाहिद और राशिद 5 बच्चे थे. 12 साल पहले बीमारी के चलते वरीसा का इंतकाल हो गया था.

इलियास के रिश्तेदारों ने बच्चों के छोटे होने का वास्ता दे कर उसे दूसरे निकाह का मशविरा दिया. यह लोगों के मशविरे का असर था या इलियास की ख्वाहिश कि उस ने 3 साल बाद नसीमा से निकाह कर लिया.

नसीमा मूलत: बिहार के बेगूसराय जिले की रहने वाली थी. गुजरते वक्त के साथ नसीमा भी 3 बच्चों नाजिम, नाजिया व अकरम की मां बन गई. इस बीच इलियास की पहली बीवी का बड़ा बेटा आबिद 18 साल का हो चुका था. वह दिल्ली में अपने एक रिश्तेदार के यहां रह कर मेहनत मजदूरी करता था. जबकि बेटियां और अन्य 2 बेटे इलियास के पास ही रहते थे.

जब कहीं से कोई लीड नहीं मिली तो इस मामले की जांच की जिम्मेदारी सीओ एन.पी. सिंह के सुपुर्द कर दी गई. घटना की बारीकियों और हत्यारों तक पहुंचने के लिए ठोस तथ्यों की जरूरत थी. इस के लिए एन.पी. सिंह ने इलियास से पूछताछ की.

क्यों एक मां ने की कैंसर ग्रस्त बेटी की हत्या?

  23 अक्तूबर, 2018 की सुबह 5 बजे का समय था. गांव के लोग नींद से जाग कर दैनिककार्यों में लग गए थे. इसी बीच किसी के रोने चिल्लाने की आवाजें सुनाई देने लगीं. आवाजें संतोषी के घर से आ रही थीं. संतोषी अपने घर के बाहर बैठी थी, जमीन पर उस की 13 साल की बेटी अर्चना की लाश पड़ी थी.

गांव वालों ने पास जा कर देखा तो अर्चना की अचानक मौत से हतप्रभ हुए. लोगों ने संतोषी से पूछा तो उस ने बताया कि अर्चना के गले का कैंसर फट गया है. जब गांव के लोग एकत्र हुए तो उन के बीच तरहतरह की चर्चाएं होने लगीं. वजह यह थी कि अर्चना के गले पर तेज धारदार हथियार के निशान नजर आ रहे थे. यह घटना हरदोई जिले के सांडी थाना क्षेत्र के गांव नेकपुर में घटी थी.

इसी बीच किसी गांव वाले ने इस की सूचना सांडी थाने को दे दी. सूचना पा कर थानाप्रभारी अरुणेश गुप्ता पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. उन्होंने लाश का बारीकी से निरीक्षण किया तो गले में पतले फल वाले किसी धारदार हथियार से गला रेते जाने के निशान मिले.

जब इंसपेक्टर ने गला रेत कर हत्या किए जाने की बात बताई तो संतोषी बोली, ‘‘साहब, पिछले कुछ दिनों से अर्चना को गले का कैंसर था. मैं समझ रही थी कि वही कैंसर फट गया है. मैं और मेरे तीनों बेटे घर के बाहर बनी दोनों दुकानों में सो रहे थे. अर्चना अंदर कमरे में सो रही थी. सुबह जब मैं अंदर गई तो यह मरी पड़ी थी, गले से खून बह रहा था. मैं समझी इस का कैंसर फट गया है. मैं इसे उठा कर बाहर ले आई.’’

घर के अंदर जाने का एक ही रास्ता था, वह भी सामने से और दुकान के बराबर से हो कर जाता था, जो बंद था. घर के बाहर मेनगेट के बराबर में बनी 2 दुकानों में संतोषी और उस के तीनों बेटे सो रहे थे. ऐसे में हत्यारे ने कहां से आ कर घटना को अंजाम दे दिया,यह समझ के बाहर था.

घर का सभी सामान अपनी जगह पर था, कोई चीज गायब नहीं थी. अलावा अर्चना के मोबाइल के. अर्चना स्मार्टफोन इस्तेमाल करती थी. इसे ले कर थानाप्रभारी अरुणेश गुप्ता के दिमाग में कई सवाल घूम रहे थे.

सूचना पा कर एसपी आलोक प्रियदर्शी और एएसपी ज्ञानंजय सिंह भी मौके पर पहुंच गए. पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का बड़ी बारीकी से निरीक्षण किया. जब उन्होंने संतोषी से कई बिंदुओं पर पूछताछ की तो उन की समझ में आ गया कि हत्या किसी करीबी ने की है.

अफसर समझ गए कि वह करीबी संतोषी ही है. लेकिन उस समय संतोषी को हिरासत में लेना ठीक नहीं था. पुलिस ने फैसला किया कि पूरी तरह आश्वस्त होने के बाद ही उस पर हाथ डाला जाएगा. इसलिए अर्चना के शव को पोस्टमार्टम के लिए जिला चिकित्सालय स्थित मोर्चरी भेज दिया गया.

थाने लौट कर थानाप्रभारी अरुणेश गुप्ता ने संतोषी के बड़े बेटे मोनू की लिखित तहरीर पर अज्ञात के खिलाफ भादंवि की धारा 302 के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया.

अरुणेश गुप्ता ने अपने स्तर से ग्रामीणों से पूछताछ की तो संतोषी के चरित्र पर कई लोगों ने अंगुलियां उठाईं. मुख्य संदिग्ध होने की वजह से पुलिस ने संतोषी को 29 अक्तूबर को हिरासत में लिया. उस से महिला आरक्षी की मौजूदगी में कड़ाई से पूछताछ की गई तो वह टूट गई.

उस ने नशे में की गई अर्चना की हत्या का जुर्म स्वीकार करते हुए पूरी कहानी बयान कर दी. पूछताछ के बाद अरुणेश गुप्ता ने संतोषी के 15 वर्षीय बेटे मोनू और गांव के ही संतोषी के प्रेमी अभिमन्यु उर्फ अपन्नू उर्फ छोटे भैया को भी उसी दिन गिरफ्तार कर लिया.

संतोष उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले के सांडी थाना क्षेत्र के गांव नेकपुर में अपनी पत्नी संतोषी के साथ रहता था. संतोषी से उस का विवाह 16 साल पहले हुआ था. कालांतर में वे 3 बेटों और एक बेटी के मांबाप बने. उन का बड़ा बेटा मोनू 15 साल का था और बेटी अर्चना 13 साल की. इस के अलावा उन के 9 और 8 साल के 2 बेटे और थे. संतोष टेलरिंग का काम करता था.

अर्चना पढ़ाई में काफी तेज थी. फिलहाल वह सांडी के नरपति सिंह इंटर कालेज में 8वीं कक्षा में पढ़ रही थी. अर्चना के बेहतर भविष्य के लिए संतोष ने 10 बीघा जमीन खरीद कर उस के नाम कर दी थी. उस से बड़े मोनू ने 7वीं तक पढ़ाई करने के बाद स्कूल से नाता तोड़ लिया था.

4 बच्चों की मां बनने के बाद भी संतोषी की फरमाइशें खत्म होने का नाम नहीं ले रही थीं. संतोषी काफी सुंदर महिला थी. जैसे जैसे संतानें होती गईं, वैसे वैसे उस के सौंदर्य में और भी निखार आता गया.

संतोष चाहता था कि संतोषी बच्चों की परवरिश पर ध्यान दे, लेकिन संतोषी थी कि उसे सजने संवरने से ही फुरसत नहीं थी. कोई उस की खूबसूरती की तारीफ कर देता तो वह फूली नहीं समाती थी. वह परिवार की बंदिशों में बंध कर घुटन महसूस करती थी. लेकिन सामाजिक रीतिरिवाज को मानना उस की मजबूरी थी.

संतोषी के विवाह को जितने साल गुजर गए थे, उतने साल में पत्नियां अपने पतियों पर हावी हो जाती हैं. संतोषी भी अपवाद नहीं थी. संतोष कभी कुछ कहता तो संतोषी उसे चुप करा देती थी. वह मन मसोस कर रह जाता था.

खुले स्वभाव के कारण संतोष किसी से बात करने में भी गुरेज नहीं करती थी. इसी वजह से वह कई पुरुषों के संपर्क में आ गई थी. उन में से एक सर्वेश भी था. सर्वेश उसी गांव में रहता था और लकड़ी की ठेकेदारी करता था.

5 साल पहले की बात है. सर्वेश और संतोष में दोस्ती हो गई. दोनों ही शराब के शौकीन थे. दोनों जबतब शराब की महफिल जमाते रहते थे. खानेपीने पर खर्चा सर्वेश ही किया करता था. एक दिन सर्वेश ने मीट खाने की इच्छा जताई, साथ में यह भी कहा कि कहीं अच्छा मीट खाने को नहीं मिलता.

सर्वेश के इतना कहते ही संतोष बोला, ‘‘यह बात पहले बता देता तो अब तक कई बार अच्छा बना मीट खा चुका होता.’’

सर्वेश ने उसे प्रश्नवाचक निगाहों से देखा तो संतोष ने बताया कि उस की पत्नी संतोषी बहुत लजीज मीट बनाती है. वह जब कहे, बनवा देगा. यह सुन कर सर्वेश के मुंह में पानी आ गया. वह बोला आज शाम को ही मीट बनवाओ. संतोष ने सहमति दे दी.

शाम को संतोष सर्वेश को साथ ले कर घर पहुंचा और साथ लाई मीट की पौलीथिन संतोषी को देते हुए कहा, ‘‘संतोषी, आज ऐसा लजीज मीट पका कि सर्वेश अंगुलियां चाटता रह जाए.’’ इस के बाद संतोष और सर्वेश शराब की बोतल खोल कर बैठ गए.

सर्वेश बातें करते हुए शराब तो संतोष के साथ पी रहा था, लेकिन उस का मन संतोषी में उलझा हुआ था. निगाहें लगातार उस का पीछा कर रही थीं. सर्वेश को उस की खूबसूरती भा गई थी. जैसेजैसे नशा चढ़ता गया, वैसेवैसे उस की निगाहों में संतोषी का शबाब नशीला होता गया.

शराब का दौर खत्म हुआ तो संतोषी खाना परोस कर ले आई. खाना खा कर सर्वेश ने उस की दिल खोल कर तारीफ की. संतोषी भी उस की बातों में खूब रस ले रही थी. खाना खाने के बाद सर्वेश अपने घर लौट गया.

इस के बाद तो संतोष के घर करीबकरीब रोज ही महफिल सजने लगी. सर्वेश ने संतोषी से चुहलबाजी करनी शुरू कर दी. संतोषी भी उस की चुहलबाजियों का बराबर जवाब देती. संतोषी की आंखों में सर्वेश को अपने लिए चाहत नजर आने लगी थी. उस के अंदाज भी कुछ ऐसे थे, जैसे वह खुद उस के करीब आना चाहती हो.

दरअसल, संतोषी को सर्वेश में वे सब खूबियां नजर आई थीं जो वह चाहती थी. सर्वेश मजबूत कदकाठी और रोबीले चेहरे वाला आकर्षक मर्द था. वह पैसा भी अच्छा कमाता था, खर्च भी दिल खोल कर करता था. ऐसे में अब तक मन मार कर संतोष के साथ रह रही संतोषी के सपनों को नए पंख लग गए थे. अपनी तरफ सर्वेश का झुकाव देख कर वह बहुत खुश थी.

रोजरोज की मुलाकात के बाद दोनों एकदूसरे से घुलमिल गए. सर्वेश हंसीमजाक करते हुए संतोषी से शारीरिक छेड़छाड़ भी कर देता था, संतोषी विरोध करने के बजाए मुसकरा कर रह जाती थी. यह सब देख सर्वेश संतोषी को जल्द से जल्द पा लेने की सोचने लगा. इसी के मद्देनजर उस ने मन ही मन योजना बनाई.

एक दिन जब वह संतोष के साथ उस के घर में बैठा शराब पी रहा था तो उस ने खुद कम पी, लेकिन संतोष को जम कर शराब पिलाई. देर रात शराब की महफिल खत्म हुई तो दोनों ने खाना खाया. सर्वेश ने भर पेट खाना खाया, जबकि संतोष मुश्किल से कुछ निवाले खा कर एक तरफ लुढ़क गया.

सर्वेश की मदद से संतोषी ने संतोष को चारपाई पर लेटा दिया. इस के बाद हाथ झाड़ते हुए बोली, ‘‘अब इन के सिर पर कोई ढोल भी बजाता रहे तो भी सुबह से पहले जागने वाले नहीं.’’ फिर उस ने सर्वेश की आंखों में झांकते हुए पूछा, ‘‘तुम घर जाने लायक हो या इन के पास ही तुम्हारी चारपाई भी बिछा दूं?’’

सर्वेश के दिल में उमंगों का सैलाब उमड़ पड़ा. उसे लगा कि शायद संतोषी भी यही चाहती है कि वह यहीं रुके और उस के साथ प्यार का खेल खेले. इसलिए बिना देर किए उस ने कहा, ‘‘हां, नशा कुछ ज्यादा हो गया है, मेरा भी बिस्तर लगा दो.’’

संतोषी ने सर्वेश के लिए भी चारपाई बिछा कर बिस्तर लगा दिया. फिर वह दूसरे कमरे में सोने चली गई.

सर्वेश की आंखों में नींद नहीं थी. उस की आंखों के सामने बारबार संतोषी की खूबसूरत काया घूम रही थी. कई बार मिले उस के शारीरिक स्पर्श से वह काफी रोमांचित था. वह उस स्पर्श की दोबारा अनुभूति के लिए बेकरार था.

संतोष की ओर से वह निश्चिंत था. इसलिए वह दबे पांव चारपाई से उठा और संतोष के पास जा कर उसे हिला कर देखा. उस पर किसी तरह की प्रतिक्रिया नहीं हुई तो वह धड़कते दिल से उस कमरे की ओर बढ़ गया, जिस में संतोषी सो रही थी.

कमरे में संतोषी जमीन पर बिस्तर लगा कर लेटी थी. कमरे में जल रही लाइट को बंद कर के सर्वेश उस के पास बिस्तर पर लेट गया. जैसे ही उस ने संतोषी को बांहों में भरा तो वह दबी जुबान से बोली, ‘‘अब यहां क्यों आए हो, जाओ यहां से.’’

‘‘तुम्हें प्यार का असली मजा देने आया हूं.’’ कह कर उस ने संतोषी को अपने अंदाज में प्यार करना शुरू कर दिया. इस के बाद तो मानो 2 जिस्मों के अरमानों की होड़ सी लग गई. कपड़े बदन से उतरते गए और हसरतें बेलिबास होती गईं. फिर दोनों के बीच वह संबंध बन गए जो सिर्फ पतिपत्नी के बीच में होने चाहिए. एक ने अपने पति के साथ बेवफाई की तो दूसरे ने दोस्त के साथ दगाबाजी.

उस रात के बाद संतोषी और सर्वेश एकदूसरे को समर्पित हो गए. संतोषी के संग रास रचाने के लिए सर्वेश हर दूसरे तीसरे दिन संतोष के घर महफिल जमाने लगा. संतोष को वह नशे में धुत कर के सुला देता, उस के बाद वह संतोषी के बिस्तर पर पहुंच जाता. बाद में वह दिन में भी संतोषी के पास पहुंचने लगा. उस के आने से पहले ही संतोषी बच्चों को खेलने भेज देती थी. फिर दोनों निश्चिंत हो कर रंगरलियां मनाते थे.

3 वर्ष पूर्व संतोष की संदिग्ध परिस्थितियों में सड़क दुर्घटना में मौत हो गई. कुछ दिन का शोक मना कर संतोषी फिर से रंगरलियां मनाने में लग गई. अब उसे कोई रोकनेटोकने वाला नहीं था. फलस्वरूप वह बेलगाम होती गई. यहां तक कि वह शराब भी पीने लगी.

सर्वेश का भाई अभिमन्यु उर्फ अपन्नू विवाहित था, उस के 2 बच्चे भी थे. वह सर्वेश के साथ ही लकड़ी की ठेकेदारी काम देखता था. संतोषी के रंगढंग से वह न केवल अच्छी तरह वाकिफ था, बल्कि उस की देह को भोगने की लालसा भी रखता था. इसलिए वह संतोषी के घर के चक्कर लगाने लगा.

संतोषी की जरूरतों को पूरी कर के वह उसे शीशे में उतारने की कोशिश करने लगा. संतोषी से उस की चाहत छिपी न रह सकी. वह खुश थी कि एक और उस की देह का पुजारी उस की जरूरतों का खयाल रखने के लिए खुदबखुद खिंचा चला आया था.

एक दिन संतोषी अपन्नू के साथ शराब पीने बैठी तो नशा चढ़ते ही बोली, ‘‘अपन्नू, तुम्हारी आंखों में मुझे अपने लिए चाहत दिख रही है. तुम मुझे पाने के लिए लालायित हो, यह जान कर भी कि मैं तुम्हारे भाई की माशूका हूं.’’

‘‘क्या करूं तुम हो ही इतनी मादक कि किसी का भी दिल पाने को मचल उठे. रही बात मेरे भाई की तो तुम उसे ब्याही तो हो नहीं कि कुछ करने से अनर्थ हो जाएगा. तुम्हारे प्यार के सागर में मैं भी डुबकी लगा लूंगा तो क्या फर्क पड़ेगा?’’ वह बोला.

‘‘बात तो सही कह रहे हो. मैं तुम्हें अपना तन तो सौंप दूंगी लेकिन बदले में तुम्हें मेरी सारी जरूरतों का खयाल रखना पड़ेगा. मंजूर हो तो बोलो…’’

अपन्नू ने लपक कर उस का हाथ पकड़ते हुए कहा, ‘‘मंजूर है.’’

उस का उतावलापन देख कर संतोषी मंदमंद मुसकराई, फिर उस की बांहों में कैद हो गई. दोनों के बीच वासना का खेल खेला जाने लगा. इस के बाद संतोषी दोनों भाइयों के साथ मौजमस्ती करने लगी.

संतोषी ने अपने बेटों को किसी तरह बहलाफुसला कर अपने पक्ष में कर लिया था, इसलिए वे विरोध नहीं करते थे. लेकिन संतोषी की एकलौती बेटी अर्चना इतनी बड़ी हो चुकी थी कि अपनी मां की गलत हरकतों को समझा सके. पढ़ने की वजह से भी उस में काफी समझदारी आ गई थी. अपन्नू ने कई बार नशे में अर्चना के साथ छेड़छाड़ की थी, जिस का अर्चना ने खुल कर विरोध किया था. इस की शिकायत अर्चना ने अपनी मां संतोषी से भी की, लेकिन संतोषी ने कुछ नहीं किया.

अर्चना उन दोनों के नाजायज संबंधों को सार्वजनिक करने की धमकी देती थी, जिस से संतोषी और अपन्नू घबरा गए थे. संतोषी ने हर तरीके से अर्चना को समझाने की कोशिश की, लेकिन वह नहीं मानी.

22 अक्तूबर की रात अपन्नू और संतोषी ने जम कर शराब पी और फिर एकदूसरे की बांहों में समाने ही वाले थे कि अर्चना आ गई. उस ने दोनों को देखा तो सब को बताने की धमकी देने लगी. इस पर संतोषी और अपन्नू ने उसे दबोच लिया. उस समय संतोषी का बड़ा बेटा मोनू भी वहां आ गया था.

संतोषी और मोनू ने अर्चना को पकड़ लिया. संतोषी ने अर्चना का मुंह दबाया तो मोनू ने उस के हाथपैर पकड़े. अपन्नू ने सब्जी काटने वाले छोटे चाकू से उस का गला रेत दिया, जिस से अर्चना की मृत्यु हो गई. इस के बाद अपन्नू वहां से चला गया.

सुबह होने पर संतोषी अर्चना की लाश को उठा कर घर के बाहर ले आई और कैंसर फटने से अर्चना की मौत होने का नाटक करने लगी. लेकिन उस का नाटक सफल नहीं हुआ और पकड़ी गई.

एसओ अरुणेश गुप्ता ने संतोषी की निशानदेही पर उस के घर के कमरे में रखे संदूक के नीचे से हत्या में इस्तेमाल किया गया सब्जी काटने वाला चाकू और संतोषी का खून सना सफेद रंग का ब्लाउज बरामद कर लिया. इस के बाद कानूनी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद पुलिस ने तीनों आरोपियों को न्यायालय में पेश कर के जेल भेज दिया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. कथा में मोनू नाम परिवर्तित है.