Hindi Kahani : अनुराधा सिंह मिंटू ऐसे बनी लेडी डौन

Hindi Kahani : सूरतशक्ल से भले ही बहुत ज्यादा खूबसूरत नहीं है, लेकिन है वह बहुत आकर्षक. कंधे तक झूलते बाल उस के सांवले लंबे चेहरे पर खूब फबते हैं. उस की नाजुक कलाइयों में शायद ही कभी किसी ने चूडि़यां देखी हों. लेकिन एके 47 को वह खिलौने जैसे चलाती थी. अनुराधा सिंह चौधरी जब भी लोगों को नजर आई, पैंट शर्ट या टीशर्ट जींस जैसे वेस्टर्न लुक में नजर आई. साड़ी सरीखा कोई परंपरागत भारतीय परिधान पहने भी उसे किसी ने नहीं देखा.  लंबीदुबली, पतली छरहरी 36 वर्षीय इस महिला के चेहरे से दुनिया भर की मासूमियत टपकती थी लेकिन वह थी कितनी खूंखार इस का अंदाजा उस के गुनाहों की लिस्ट देख कर लगाया जा सकता है.

राजस्थान के सीकर के फतेहपुर के गांव अलफसर के एक मध्यमवर्गीय जाट परिवार में जन्मी अनुराधा का घर का नाम मिंटू रखा गया था. जब वह बहुत छोटी थी, तभी उस की मां चल बसी. पिता रामदेव की कमाई बहुत ज्यादा नहीं थी, इसलिए वे नन्ही मिंटू को ले कर दिल्ली आ गए. यहां पैसा बरसा तो नहीं लेकिन कभी फांके की नौबत भी नहीं आई. मिंटू जैसेजैसे बड़ी और समझदार होती गई, उसे यह एहसास होता गया कि जिंदगी में अगर कुछ बनना है तो पढ़ाईलिखाई बहुत जरूरी है. लिहाजा उस ने दिल लगा कर पढ़ाई की और वक्त रहते बीसीए और फिर एमबीए की भी डिग्री ले ली.

निश्चित रूप से इस के पीछे उस की लगन का बड़ा हाथ था और तीक्ष्ण बुद्धि का भी जिस से अभावों में रहते और पढ़ते हुए उस ने कभी असफलता का मुंह नहीं देखा.  पढ़ाई पूरी करने के बाद जब वह स्थाई रूप से सीकर वापस आई तो वही हुआ जो इस उम्र में लड़कियों के साथ होना आम बात है. अनुराधा को फैलिक्स दीपक मिंज नाम के युवक से प्यार हो गया. दिल्ली में रहते उस ने फर्राटे से अंगरेजी बोलने के साथसाथ यह भी सीख लिया था कि प्यार निहायत ही व्यक्तिगत मामला है और हर किसी को अपनी जिंदगी के फैसले लेने का हक है. लिहाजा उस ने घर और समाज वालों के विरोध और ऐतराज की कोई परवाह नहीं की और दीपक से लवमैरिज कर ली.

यहां तक अनुराधा ने कुछ गलत नहीं किया था. दीपक के साथ वह खुश थी और आने वाली जिंदगी के सपने आम लड़कियों की तरह देखने लगी थी. शेयर बाजार का घाटा पहला मोड़ दीपक भी अनुराधा की तरह महत्त्वाकांक्षी था, जो सीकर में ही शेयर ट्रेडिंग का कारोबार करता था. अब पढ़ीलिखी अनुराधा भी उस के काम में हाथ बंटाने लगी तो उसे राहत मिली. लेकिन यह राहत जल्द ही आफत बन गई, क्योंकि शेयर मार्केट में खुद के लाखों और अपने क्लाइंट्स के करोड़ों रुपए इन दोनों ने तगड़े मुनाफे की उम्मीद में लगवा दिए थे. गलत नहीं कहा जाता कि शेयर मार्केट किसी का सगा नहीं होता, जिस ने इन दोनों के साथ जरूरत से ज्यादा सौतेलापन दिखाया.

मुनाफा तो रत्ती कौड़ी का भी नहीं हुआ, उलटे जब नुकसान होना शुरू हुआ तो पतिपत्नी दोनों घबरा उठे कि अब क्या करें. लेकिन अब करने को कुछ नहीं बचा था. कर्ज में डूबे दीपक और अनुराधा पर उन के कहने पर शेयरों में पैसे लगाने वाले रोजरोज तकाजा करने लगे थे, जिस से इन का खानापीना सोना तक दूभर हो चला था. अब अनुराधा को जिंदगी के असल मायने समझ आए कि पैसा कमाना कोई बच्चों का खेल नहीं और यूं ही शेखचिल्ली की तरह सपने देख कर कोई रातोंरात रईस नहीं बन जाता. उस की जिंदगी का यह ऐसा मोड़ था, जहां न तो पढ़ाईलिखाई काम आ रही थी और न ही प्यार कोई हिम्मत या ताकत दे पा रहा था. फिर किसी और से किसी तरह की उम्मीद लगाना एक फिजूल की बात थी.

लेनदारों के बढ़ते दबाब से निबटने के लिए उस ने जो रास्ता चुना या वह उसे आसानी और इत्तफाक से मिल गया था, जो हालांकि और भी ज्यादा सरदर्दी वाला था. लेकिन इस राह पर पहला कदम रखते ही उसे लगा कि जिंदगी के तमाम मकसद इसी से पूरे हो सकते हैं और यही रास्ता उसे मंजिल तक ले जा पाएगा जो फौरी तौर पर मौजूदा परेशानी से भी छुटकारा दिला रहा है. यह रास्ता जुर्म का था, जिस ने अनुराधा सिंह नाम की इस युवती की जिंदगी बदल डाली. जिंदगी सिर्फ अनुराधा की ही नहीं बल्कि राजस्थान के कुख्यात गैंगस्टर आनंदपाल सिंह की भी बदल गई, जिस से जुर्म का ककहरा अनुराधा ने सीखा था.

जब दीपक और अनुराधा लेनदारों के डर से मुंह छिपाने को मजबूर हो चले थे, तभी अनुराधा की मुलाकात राजस्थान के हिस्ट्रीशीटर बलबीर बानूड़ा से हुई. बलबीर खुद तो अनुराधा के लिए कुछ नहीं कर सका लेकिन जाने क्या सोच कर उस ने अनुराधा की मुलाकात आनद पाल सिंह से करवा दी. दोनों ने एकदूसरे को देखा, परखा और देखते ही देखते अनुराधा की सारी परेशानियां दूर हो गईं. आनंदपाल सिंह की दहशत राजस्थान में किसी सबूत या पहचान की मोहताज कभी नहीं रही, जिस के रसूख से सियासी गलियारे भी कांपते थे. राजपूत समुदाय के लोग उसे रौबिनहुड आज भी मानते हैं.

दूसरा मोड़ – आनंद की संगत आनंद ने अनुराधा को जुर्म की दुनिया के गुर और उसूल सिखाए तो उस के खुराफाती दिमाग की ट्यूबलाइट जोरों से चमकने लगी. अनुराधा ने देखा और महसूसा कि आनंद अपने रुतबे और दहशत को कैश नहीं करा पाता और थोड़े में ही संतुष्ट हो जाता है. उस का हुलिया और रहनसहन भी आम गुंडेमवालियों जैसा है तो उस ने आनंद को बदलना शुरू कर दिया. देखते ही देखते आनंद का हुलिया, आदतें, रहनसहन सब बदल गया और वह भी अपनी प्रेमिका की तरह फर्राटे से अंगरेजी बोलने लगा. कल तक देसी तरीके से रहने वाला यह जरायमपेशा मुजरिम फिल्मों के उन खलनायकों जैसा नजर आने लगा जो आलीशान इमारतों में रहते हैं. सर पर हैट लगाते टिपटौप दिखते हैं और अपराध करने का उन का अपना एक अलग स्टाइल होता है.

जैसे ही दीपक को पत्नी के एक जरायमपेशा गिरोह में शामिल होने की बात पता चली तो उस ने उस से नाता तोड़ लिया. अनुराधा के लिए भी अपने पहले प्यार के कोई माने नहीं रह गए थे. उस के अंदर की रूमानियत आनंद की संगत में कभी खत्म न होने वाली क्रूरता में बदल चुकी थी. इन दोनों ने फिर एकदूसरे से कभी कोई वास्ता नहीं रखा. हां, इतना जरूर हुआ था कि अब कोई उसे पैसे मांगने तंग नहीं करता था क्योंकि उस की पत्नी राजस्थान के डौन आनंदपाल सिंह की रखैल थी, जिस से पुलिस भी कांपती थी. न कहने की कोई वजह नहीं कि अनुराधा अब न केवल बिनब्याही पत्नी की हैसियत से बल्कि तेजतर्रार आला दिमाग की मालकिन होने की वजह से भी आनंद के गिरोह में नंबर 2 की हैसियत रखने लगी थी. जिस ने जरूरत से कम समय में हथियार चलाना सीख लिए थे.

गैंग और अपराध की दुनिया से जुड़े लोग उसे मैडम मिंज भी कहने लगे थे. यह सरनेम उसे पति से मिला था. अब अनुराधा ही किए जाने वाले अपराधों की प्लानिंग करने लगी थी. आनंद भी उस के ग्लैमर और अभिसार में डूबा अपनी पत्नी राज कंवर और बेटियों योगिता और चरंजीत कंवर चौहान को भूल चुका था. लेकिन तब तक एक बात वह अनुराधा को और अच्छे से सिखा चुका था कि अपराध की दुनिया उस कार सरीखी होती है जिस में रिवर्स गियर नहीं होता. खुद अनुराधा भी अब पीछे मुड़ कर देखने की ख्वाहिशमंद नहीं थी और कभी होती भी तो उस के जुर्मों का बढ़ता ग्राफ और मोटी होती पुलिसिया फाइल उसे ऐसा करने की इजाजत नहीं देते. उसे दौलत चाहिए थी जो उस पर छमाछम बरस रही थी.

बहुत जल्द वह पेशेवर मुजरिम बन गई थी और उस का नाम भी चलने लगा था. वह जहां से गुजरती थी, वहां लोगों के सर अदब से झुकें न झुकें खौफ से जरूर झुक जाते थे. और यही शायद अपनी जिंदगी का मकसद भी उस ने बना लिया था, जिस के अंजाम से भी वह वाकिफ थी लेकिन भयभीत कभी नहीं रही. अब वह धड़ल्ले से वारदातों को अंजाम देने लगी थी, खासतौर से अपहरण कर फिरौती वसूलना उस का पसंदीदा अपराध था जिस की वह विशेषज्ञ हो चली थी. अनुराधा ने पहला अपराध कब किया, यह अब शायद वह भी न बता पाए.

लेकिन बाकायदा वह चर्चा और सुर्खियों में साल 2013 में आई थी, जब उस पर रंगदारी का पहला मामला दर्ज हुआ था. तब पुलिस ने उस पर पहली दफा 10 हजार रुपए का इनाम भी रखा था. इस वक्त तक आनंद के सर कोई 5 लाख रुपए का इनाम घोषित था जो उस की मौत तक बढ़तेबढ़ते 10 लाख रुपया हो गया था. जाहिर है, खुद के नाम से पहला मामला दर्ज होने तक अनुराधा के किए जुर्म आनंद के खाते में दर्ज हो रहे थे. करीब 10 साल इन दोनों ने बिना किसी खास दिक्कत के गुजारे. लेकिन राजस्थान में बबंडर उस वक्त खड़ा हुआ, जब एक चर्चित हत्याकांड के गवाह का अपहरण हो गया.

दरअसल, 27 जून, 2006 को जीवनराम गोदरा नाम के शख्स की हत्या आनंद ने कर दी थी जिस से पूरा राज्य हिल उठा था. वारदात के दिन डीडवाना में जीवनराम जब अपनी दुकान के नीचे कुछ दोस्तों के साथ बैठा था, तभी आनंद और उस के साथियों ने दिनदहाड़े उसे गोलियों से भून दिया था.  तीसरा मोड़ – एक गवाह का अपहरण  दिलचस्प बात यह है कि जीवनराम और आनंद कभी पक्के दोस्त हुआ करते थे. साल 1992 में आनंद की शादी की रस्म बिन्नाइकी या बिंदौरी (एक रस्म जिस में दूल्हा अपने मोहल्ले या गांव में घूमता है)  को कुछ दबंगों ने रोक लिया था, तब जीवनराम ने ही उस की मदद की थी जो उन दिनों छात्र नेता हुआ करता था.

तभी से गुस्साए आनंद ने जुर्म का रास्ता पकड़ लिया था, लेकिन जीवनराम से उस की दुश्मनी की ठोस वजह किसी को नहीं मालूम सिवाय इस के कि बाद में कभी जीवनराम ने उस के लिए अपशब्दों का इस्तेमाल कर दिया था. इस हत्याकांड की गूंज राजस्थान विधानसभा में भी सुनाई दी थी. जीवनराम का भाई इंद्रचंद्र गोदारा इस हत्याकांड का गवाह था, जिस की गवाही आनंद को लंबा नपवा देती. अपने आशिक को बचाने के लिए अनुराधा ने साल 2014 में इंद्रचंद्र को अगवा कर लिया और पुणे ले गई. तब उस के साथ गिरोह के और मेंबर भी थे. इंद्रचंद्र को पुणे के एक फ्लैट में बंधक बना कर रखा गया था, जिस ने एक दिन मौका पा कर एक पर्ची खिड़की से नीचे फेंक दी, जिस पर लिखा था, ‘मैं किडनैप हो गया हू और मुझे मदद की जरूरत है.’

पर्ची जिस ने भी पढ़ी, उस ने औरों को बताया तो फ्लैट के बाहर भीड़ इकट्ठा हो गई और फ्लैट को घेर लिया. तब अनुराधा और उस के गुर्गे बमुश्किल वहां से भागने में कामयाब हो पाए थे. जैसेतैसे बचतेबचाते वह राजस्थान वापस आ गई और आनंद के जेल में होने के चलते खुद उस का गैंग चलाने लगी. इस दौरान उस ने कारोबारियों को अगवा कर फिरौती से खूब पैसा कमाया. लेकिन उसे झटका तब लगा जब पुलिस ने साल 2017 में एनकाउंटर में नाटकीय तरीके से मार गिराया. इस मौत पर खूब बवाल मचा था. राजनीति भी हुई थी और राजपूत समुदाय के लोगों ने सड़कों पर उतर कर प्रदर्शन भी किया था. तब प्रशासानिक हलकों खासतौर से पुलिस महकमे में यह चर्चा गर्म रही थी कि आनंद के मरने से उस की दहशत कम नहीं हुई है. क्योंकि उस की वारिस अनुराधा अब इस गैंग की कमान संभालेगी.

लेकिन यह आशंका पूरी तरह सच नहीं निकली, क्योंकि डरीसहमी अनुराधा फरार हो गई. जान बचाने के खौफ और गैंग के टूट जाने से वह इधरउधर भागती रही तो लोग उसे भूलने लगे. क्योंकि आनंद नाम की दहशत से तो राजस्थान आजाद हो ही चुका था. कहते हैं, हर कामयाब मर्द के पीछे किसी औरत का हाथ होता है लेकिन अनुराधा पर यह कहावत उलटी बैठती थी, जिस की कामयाबी के पीछे हर बार मर्द का हाथ रहा. अब तक वह इतनी बदनाम और वांटेड हो चुकी थी कि चाह कर भी जुर्म की दुनिया नहीं छोड़ सकती थी. जिस दिन वह पहचान ली जाती तय है, उसी दिन पुलिस की मेहमानी करती भी नजर आती.

काला से मुलाकात चौथा मोड़ इसी फरारी के दौरान सहारा और संरक्षण ढूंढती अनुराधा लारेंस विश्नोई गैंग में शामिल हो गई. मकसद था जैसे भी हो पुलिस से बचना. हालांकि जुर्म की दुनिया में भी उस के खासे चर्चे और किस्से फैल चुके थे. इस नए गिरोह यानी लारेंस विश्नोई से उस की पटरी ज्यादा नहीं बैठी और जल्द ही वह काला जठेड़ी उर्फ संदीप के संपर्क में आई. आनंद की मौत से आया खालीपन उसे काला जठेड़ी से भरता नजर आया तो इस की वजहें भी थीं. दोनों में डील हुई और अनुराधा बगैर किसी एंट्रेंस एग्जाम के जठेड़ी गैंग में न केवल शामिल हो गई, बल्कि देखते ही देखते इस गैंग में भी उस ने वही जगह और रुतबा हासिल कर लिया, जो उसे आनंद के गैंग में हासिल था.

फर्क इतना भर आया कि दोनों ने इस डील के तहत हरिद्वार के एक मंदिर में विधिविधान से शादी कर ली. यह और बात है कि वे शुरू से ही रह तो पतिपत्नी की तरह ही रहे थे. काला जठेड़ी का असली नाम संदीप काला है, जो हरियाणा के सोनीपत के जठेड़ी गांव का रहने वाला है. गांव का नाम तो उस ने तखल्लुस की तरह जोड़ लिया था. संदीप को कम उम्र से ही जुर्म का चस्का सा लग गया था. 12वीं क्लास में आतेआते वह पेशेवर मुजरिम बन चुका था. पेट पालने के लिए उस ने केबल औपरेटर का काम शुरू किया था, लेकिन साल 2004 में झपटमारी के एक केस में वह पहली बार गिरफ्तार हुआ था.  कुछ साल बाद ही उस का नाम सांपला और गोहाना में हुई कत्ल की वारदातों से जुड़ गया. इस के बाद वह जुर्म की दुनिया का एक अहम और जरूरी नाम बनता गया.

हत्या, अपहरण, लूटपाट, जमीनों पर जायजनाजायज कब्जे और फिरौती वगैरह काला जठेड़ी की जिंदगी के हिस्से और किस्से बनते गए. नई दिल्ली और एनसीआर के अलावा पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और पंजाब व उत्तराखंड में भी उस की तूती बोलने लगी थी. अपने गैंग में उस ने शूटरों की फौज भर रखी थी, जो उस की असली ताकत हुआ करते थे. पुलिस से आंख मिचौली काला के लिए रोजमर्रा की बात हो चली थी. दिनोंदिन उस का आतंक पुलिस के लिए सरदर्द बनता जा रहा था. क्योंकि ठिकाने बदलने में वह माहिर था. अनुराधा की आपराधिक जन्मपत्री से पूरे 36 गुण उस से मिले थे. उस में और आनंद में कई समानताएं अनुराधा को नजर आई थीं.

काला भी उस के व्यक्तित्व से प्रभावित हुआ था और उस के आला खुराफाती दिमाग का कायल हो गया था. काला की दहशत अपने इलाकों में ठीक वैसी ही थी, जैसी राजस्थान में आनंद की थी. उस के सर अगर 10 लाख का इनाम था तो काला पर भी हरियाणा पुलिस ने 7 लाख रुपए का इनाम रखा था. काला पर भी आनंद की तरह दरजनों मामले दर्ज थे. उस ने अनुराधा को अपने गिरोह में इसलिए भी आसानी से शामिल कर लिया था कि वह आनंद के गिरोह में काम कर चुकी थी इसलिए उसे हालात से निबटने का तजुर्बा था. दोनों को एकदूसरे की जरूरत थी, कारोबारी भी, जिस्मानी भी और जज्बाती भी. काला के गिरोह के मेंबर भी अनुराधा के एके 47 चलाने की स्टाइल से इतने इंप्रैस थे कि उन्होंने उसे रिवौल्वर रानी का खिताब दे दिया था. ठीक वैसे ही जैसे आनंद के गिरोह में मैडम मिंज का खिताब उसे मिला था.

पुलिस और खुफिया एजेंसियों से भी काला जठेड़ी और अनुराधा की जुगलबंदी की बात छिपी नहीं रह गई थी. लेकिन इन शातिरों को गिरफ्तार कर लेना कोई आसान काम भी नहीं था, जिन के खिलाफ मारे डर के कोई मुखबिरी करने भी तैयार नहीं होता था. फिर भी पुलिस की निगाह में तो यह नया क्रिमिनल कपल चढ़ चुका ही था. इंतजार था तो एक मुनासिब मौके का. काला को अनुराधा से एक फायदा आनंद की विरासत का भी मिला. राजस्थान में अब तक लेडी डौन के भी नाम से भी मशहूर हो चली अनुराधा ने फिर से अपहरण की वारदातों को अंजाम देना शुरू कर दिया, क्योंकि वह यहां के चप्पेचप्पे से वाकिफ हो गई थी.

कुछ दिन पहले तक यानी आनंद की मौत के बाद अकेले रहते उस की हिम्मत राह चलते आदमी को छेड़ने की नहीं पड़ती थी, पर काला का साथ मिलते ही वह फिर से अपने पुराने फार्म में वापस लौट आई थी. फिर जैसे ही सागर धनखड़ हत्याकांड में नामी पहलवान सुशील कुमार का नाम आया तो दिल्ली फिर गरमा उठी. क्योंकि इस वारदात में एक और गैंगस्टर नीरज बबाना का भी नाम आया और काला जठेड़ी का भी आया, जिस से अपनी जान को खतरा जेल में बंद सुशील पहलवान ने जताया था. (इस हाई प्रोफाइल मामले के बारे में पाठक मनोहर कहानियां के पिछले अंक में पढ़ चुके हैं) अब पुलिस की स्पैशल सेल ने काला की तलाश को मुहिम की शक्ल दे दी तो वह भागता फिरा और देश के कई हिस्सों में उस ने फरारी काटी. इस दौरान अनुराधा उस के साथ ही रही.

जठेड़ी गैंग की दिलचस्पी दिल्ली-एनसीआर की झगड़े वाली जमीनजायदाद पर ज्यादा रहती थी, क्योंकि इस में मुनाफा ज्यादा होता है और रिस्क कम. जमीनों से कब्जे हटवाना और कब्जे करवाना इस गैंग के बाएं हाथ का खेल होता था. इस काम को अंजाम हथियारों के दम पर दिया जाता था. बड़ेबड़े बिल्डर्स से ले कर छोटेमोटे भूमि स्वामी तक जठेड़ी जैसे गैंगस्टर की सेवाएं लेते हैं क्योंकि मामला अगर अदालत में जाए तो वक्त और पैसा दोनों बरबाद होते हैं और जितना पैसा मुकदमेबाजी में लगता है उतने में ये गैंगस्टर रातोंरात पैसा देने वाले के हक में इंसाफ करा देते हैं. क्लाइमेक्स अनुराधा इस काम में सहायक भर थी, लेकिन जैसे ही काला की तलाश में पुलिस की स्पैशल सेल जुटी तो वह फिर चिंतित हो उठी.

क्योंकि अगर आनंद की तरह काला भी किसी एनकाउन्टर में मारा जाता तो वह फिर बेसहारा हो जाती. दूसरे गिरफ्तारी की तलवार अब उस के सर पर भी लटकने लगी थी.  दिल्ली में डर और खतरा इस बात का भी था कि कहीं गैंगवार न हो जाए क्योंकि जेल में बंद रहते अपना गिरोह चला रहे नीरज बबाना गैंग की पुरानी दुश्मनी काला से थी. लेकिन लारेंस विश्नोई के गैंग का साथ उसे मिला हुआ था. यह वही लारेंस विश्नोई है, जिस ने फिल्म अभिनेता सलमान खान को धमकी दे कर खूब सुर्खियां बटोरी थीं. पहलवान से मुजरिम बन चुके सुशील ने भी काला की सेवाएं और सहायता कुछ मामलों में ली थी. सागर धनखड़ की हत्या के वक्त सुशील और उस के साथियों ने एक और शख्स सोनू महाल की पिटाई की थी, जो काला का राइट हैंड है और रिश्ते में उस का भांजा भी लगता है. इसलिए सुशील उस से डरा हुआ था.

इस के पहले 2 फरवरी, 2020 को काला ने पुलिस कस्टडी से फरार हो कर सब को चौंका दिया था. इस दिन गुड़गांव पुलिस उसे एक पेशी के लिए फरीदाबाद अदालत ले गई थी. वापसी में गुड़गांव रोड पर काला के गुर्गों ने फिल्मी स्टाइल में ताबड़तोड़ फायरिंग कर काला को छुड़ा लिया था, जिस से पुलिस की खासी किरकिरी हुई थी. यह मामला डबुआ थाने में दर्ज हुआ था. फरार हो कर वह कहां गया और छिपा, इस का अंदाजा कोई नहीं लगा पा रहा था. लेकिन यह अंदाजा हर किसी को था कि अनुराधा उस के साथ है. इन दोनों के नेपाल में होने का अंदेशा था, जबकि हकीकत में दोनों भारत भ्रमण करते आंध्र प्रदेश के अलावा पंजाब और मुंबई भी गए थे और बिहार के पूर्णिया में भी रुके थे. मध्य प्रदेश के इंदौर और देवास में भी इन्होंने फरारी काटी थी, हर जगह इन्होंने खुद को पतिपत्नी बताया और लिखाया था.

काला को घिरता देख अनुराधा ने 70 – 80 के दशक के मशहूर जासूसी उपन्यासकार सुरेंद्र मोहन पाठक के एक किरदार विमल का सहारा लिया, जिस ने पुलिस से बचने के लिए सरदार का हुलिया अपना लिया था. अपनी नई पत्नी के कहने पर काला विमल की तर्ज पर सरदार बन गया. उस ने अपना नया नाम पुनीत भल्ला और अनुराधा का नाम पूजा भल्ला रखा. दिल्ली का होने के चलते दोनों सिख समुदाय के रीतिरिवाजों और बोलचाल के लहजे से खूब वाकिफ थे, इसलिए कोई उन पर आसानी से शक नहीं कर सकता था. सोशल मीडिया पर भी दोनों ने नए नामों से आईडी बना ली थी.

इतना ही नहीं, अनुराधा ने जठेड़ी गैंग के गुर्गों को यह हिदायत भी दी थी कि अगर उन में से कोई कभी पुलिस के हत्थे चढ़ जाए तो काला के बारे में यही बताए कि वह इन दिनों नेपाल में है और वहीं से गैंग चला रहा है. इस हिदायत का मकसद पुलिस को भटकाए और उलझाए रखना था, जिस से वह यह सोचते इन की ढूंढाई में ढील दे दे कि जब वे भारत में हैं ही नहीं तो तलाश में यहां वहां सर खपाने से क्या फायदा. आनंद पाल के गिरोह में रहते अनुराधा कई बार नेपाल भी गई थी और वहां के अड्डों से भी वाकिफ थी, इसलिए वह काला को भी 2 बार नेपाल ले गई थी. मकसद था विदेश भागने की संभावनाएं टटोलना और जमा पैसों की ट्रोल को रोकना.

असल में नेपाल से हवाला के जरिए पैसे कनाडा के एक गैंगस्टर गोल्डी बरार को भेजे जाते थे, जिन्हें गोल्डी ई वालेट के जरिए पैसा इन दोनों को वापस भेज देता था और जांच एजेंसियों को हवा भी नहीं लगती थी कि मनी ट्रोलिंग कैसे और कहांकहां से हो रही है. अनुराधा के इसी खुराफाती दिमाग का आनंद भी कायल था और अब काला भी हो गया था, जिसे अनुराधा ने सख्त हिदायत दे रखी थी कि वह भारत में फोन पर किसी से भी बात न करे. क्योंकि आजकल मुजरिम तक पहुंचने का सब से आसान और सहूलियत भरा जरिया और रास्ता यही होता है. अब काला को जिस से भी बात करनी होती थी तो वह विदेश में बैठे अपने किसी गुर्गे को बताता था कि उसे अमुक या फलां से बात करनी है.

विदेश में बैठा वह गुर्गा अपने एक फोन से अमुक या फलां को काल करता था और दूसरे से काला को, दोनों फोन के स्पीकर औन कर दिए जाते थे जिस से काला की बात आराम से यानी बिना किसी डर के अमुक या फलां से हो जाती थी. लेकिन इन दोनों को इल्म भी नहीं था कि पुलिस इन्हें पकड़ने के लिए कमर कस चुकी है जिसे आपरेशन ओपीडी- 4 नाम दिया गया है और उस की टीमें इन की टोह ले रही हैं और वही ट्रिक अपना रही हैं, जो इन्होंने अपना रखी है. काला और अनुराधा तक पहुंचने के लिए पुलिस की स्पेशल टीम ने लारेंस विश्नोई को मोहरा बनाया, जो जेल में बंद था. पुलिस ने अपने मुखबिरों के जरिए विश्नोई तक एक फोन पहुंचाया, जिस से वह अपने गुर्गों से बात करता रहा और पुलिस खामोशी से तमाशा देखती रही. एक बार वही हुआ जो पुलिस चाहती थी कि विश्नोई ने काला से भी बात कर डाली.

उस का फोन सर्विलांस पर तो था ही, जिस से उस के सहारनपुर के अमानत ढाबे पर होने की लोकेशन मिली. पुलिस तुरंत हरकत में आई और आसानी से काला और अनुराधा को गिरफ्तार कर लिया. दोनों हतप्रभ थे. उन्हें यकीन ही नहीं हो रहा था कि वे चूहेदानी में फंस चुके हैं. बिलाशक पुलिस की स्पैशल सेल ने दिमाग से काम लिया, जिसे उम्मीद थी कि आज नहीं तो कल विश्नोई काला से जरूर बात करेगा और ऐसा ही हुआ भी. अनुराधा खुद को बहुत स्मार्ट और चालाक समझती रही थी, जो यह भूल चुकी थी कि कानून के हाथ वाकई बहुत लंबे होते हैं और यह कहने भर की बात नहीं है.

अब जेल में पड़ेपड़े अपनी गुजरी जिंदगी के बारे में सोचने का उस के पास वक्त ही वक्त है कि कैसे सीकर के छोटे से गांव में जन्मी मिंटू लेडी डौन बन गई और इस से उसे क्या हासिल हुआ.  दीपक से नाता तोड़ने के बाद वह भागती ही रही थी.  आनंद और काला के साथ रहते उसे पैसा तो खूब मिला लेकिन सुकून और औलाद के सुख से वह महरूम रही तो इस की जिम्मेदार भी वही है. जिस ने अपनी मरजी से जुर्म का रास्ता चुना था और दिलचस्प बात यह कि उस के दोनों आशिक भी कहीं के नहीं रहे. पहला एनकाउंटर में मारा गया तो दूसरा उसी की तरह जेल में पड़ा अपने गुनाहों की फेहरिस्त देखता अपने अंजाम का इंतजार कर रहा है. Hindi Kahani

 

अतीक के परिवार के लेडी गैंग

अतीक के परिवार के लेडी गैंग – भाग 3

देवरानी जेठानी में बढ़ गईं दूरियां

अशरफ की शादी कौशांबी की रहने वाली जैनब फातिमा के साथ 2013 में हुई थी. शादी के कुछ महीने पहले ही अशरफ जेल से छूट कर आया था. अतीक ने अशरफ की शादी खूब धूमधाम से की थी.

शादी के कुछ दिनों बाद तक देवरानी जेठानी में अच्छी बनी, पर बाद में दोनों के बीच अनबन रहने लगी. घर पर अतीक की पत्नी शाइस्ता की हुकूमत चलती थी. नौकर चाकर से ले कर रिश्तेदार तक शाइस्ता की ही बात मानते थे. अतीक की पत्नी होने के नाते कोई उस के सामने मुंह खोलने की हिम्मत नहीं करता था. यहां तक कि अशरफ भी भाभी के सामने कुछ नहीं बोलता था.

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रंगदारी यानी अवैध वसूली का जो पैसा आता था, वह सब शाइस्ता के पास ही आता था. जो गिफ्ट आते थे, उसे भी शाइस्ता रखती थी. जबकि जैनब को वही मिलता था, जो शाइस्ता देती थी. जैनब के पति के हाथ में भी कुछ नहीं था. क्योंकि घर का मालिक अतीक था. अशरफ को भी वही सब करना होता था, जो अतीक कहता था. यह बात तब खुली थी, जब किसी बिल्डर ने शाइस्ता को फार्च्यूनर गिफ्ट की थी, तब वह गाड़ी जैनब को इतनी पसंद आई कि उस ने पति से कहा था कि उसे भी यही कार चाहिए. इस के बाद अशरफ ने बिल्डर को फोन कर के एक और फार्च्यूनर मंगाई थी.

कहा जाता है कि इन्हीं बातों को ले कर शाइस्ता और जैनब के बीच विवाद रहने लगा था. क्योंकि अब यह सब जैनब से बरदाश्त नहीं हो रहा था. फिर तो शाइस्ता और जैनब के बीच दूरियां बढ़ती गईं. रोजमर्रा की चीजों को ले कर अनबन शुरू हुई तो इस की जानकारी अतीक और अशरफ को हुई.

दोनों भाइयों ने दोनों को समझाने की बहुत कोशिश की कि शाइस्ता और जैनब एकदूसरे को समझने लगें, लेकिन समझने की कौन कहे, आगे चल कर दोनों के बीच बातचीत भी बंद हो गई. यह दूरी इतनी बढ़ गई कि अशरफ और अतीक अलगअलग घरों में रहने लगे थे. कहा जाता है कि अलग होने के बाद अशरफ अपनी अलग वसूली करने लगा था.

अतीक और अशरफ की मौत के बाद दोनों की लड़ाई अब खुल कर सामने आ गई है. शाइस्ता ने जहां अपना अलग गैंग बना लिया है, वहीं जैनब भी पीछे नहीं है. उस ने भी अपना अलग गैंग बना लिया है, जिस की कमान उस के भाई यानी अशरफ के साले सद्दाम ने संभाल रखी है. क्योंकि जब अशरफ बरेली जेल में था, तब भी उस का सारा काम साला सद्दाम ही देख रहा था. इस के लिए वह वहीं बगल में घर ले कर रह रहा था.

पता चला है कि अब अतीक की बहन आयशा नूरी भी जैनब के गुट में आ गई है. जबकि शाइस्ता ने अपना अलग गुट बना लिया है. यह सब बाहुबली की प्रौपर्टी को ले कर हुआ है. इसलिए संभावना बनती है कि इन दोनों के बीच कभी भी गैंगवार हो सकती है. जैनब अब प्रौपर्टी पर कब्जा चाहती है.

अतीक की बहन आयशा नूरी

उमेश पाल हत्याकांड में अतीक अहमद की बहन आयशा नूरी, उस की दोनों बेटियों मंतशा और उंजिला को भी धूमनगंज पुलिस ने आरोपी बना कर वांछित घोषित किया है. एसआईटी द्वारा की गई जांच में पता चला है कि आयशा को शूटरों की पूरी जानकारी थी. आयशा के पति डा. अखलाक को एसटीएफ पहले ही गिरफ्तार कर चुकी है.

पुलिस ने अतीक के भाई अशरफ की पत्नी जैनब फातिमा के साथ आयशा और उस की दोनों बेटियों को भी गिरफ्तार किया था, जब 6 मार्च को प्रयागराज आ कर उस ने बेटियों और अशरफ की पत्नी जैनब के साथ प्रैस कौन्फ्रैंस की थी, तब आयशा ने अपने दोनों भाइयों अतीक और अशरफ को निर्दोष बताया था. लेकिन तब पुलिस ने पुख्ता सबूत न होने के कारण शांति भंग में चालान कर के छोड़ दिया था.

बाद में जब जांच की गई तो पता चला कि आयशा और उस की दोनों बेटियां भी उमेश पाल की हत्या की साजिश में शामिल थीं. यही नहीं, शूटरों की मदद भी की थी. एक वीडियो वायरल हुआ था, जिस में साफ दिखाई दे रहा है कि अतीक अहमद का खास शूटर 5 लाख का ईनामी गुड्डू बमबाज मेरठ स्थित इन के घर गया था.

सीसीटीवी की इस फुटेज के अनुसार उमेश पाल की हत्या के करीब 10 दिन बाद 5 मार्च को उमेश की हत्या में शामिल शूटर गुड्डू मुसलिम आयशा के घर गया था और 17 घंटे आयशा के घर रहा था, जहां उस की जम कर खातिरदारी की गई थी. यही नहीं, चलते समय उसे लाखों रुपए भी दिए गए थे.

डा. अखलाक के घर से मिले उस सीसीटीवी फुटेज में गुड्डू मुसलिम उस के घर पहुंचा और अखलाक से गले मिला. अतीक के बहनोई डा. अखलाक उत्तर प्रदेश स्वास्थ्य विभाग में डाक्टर थे और मेरठ में तैनात थे. गिरफ्तारी के बाद स्वास्थ्य विभाग ने उन्हें सस्पेंड कर दिया है.

इस के बाद 6 मार्च को डा. अखलाक की कार कौशांबी के थाना संदीपन घाट में मिली थी. जिसे चौकी इंचार्ज (हर्रायपुर) कृष्ण कुमार यादव और एसएचओ (संदीपन घाट) राकेश राय ने थाने ला कर लावारिस घोषित कर के जमा कर दी थी.

जांच में पता चला कि दोनों पुलिस अधिकारियों ने डा. अखलाक को बचाने के लिए ऐसा किया था. इस के बाद एसपी कौशांबी बृजेश श्रीवास्तव ने एसएचओ राकेश राय और चौकी इंचार्ज कृष्ण कुमार यादव को सस्पेंड कर दिया था.

अतीक की भांजियां भी हैं पुलिस के निशाने पर

अतीक की जिन 2 भांजियों मंतशा और उंजिला को आरोपी बनाया है, उन में से मंतशा का निकाह 5 लाख के ईनामी असद के साथ तय हो गया था. पिछले साल दोनों की सगाई भी कर दी गई थी, लेकिन उमेश पाल की हत्या के बाद असद पुलिस एनकाउंटर में मारा जा चुका है.

उमेश पाल हत्याकांड की साजिश में शामिल शूटर गुड्डू मुसलिम की मदद के आरोप में फरार चल रही माफिया अतीक की बहन आयशा नूरी और उस की दोनों बेटियों ने प्रयागराज की सीजेएम की अदालत में आत्मसमर्पण के लिए अरजी लगाई थी, लेकिन अदालत ने सुनवाई के बाद उन की इस अरजी को खारिज कर दिया था. जिस से उन के आत्मसमर्पण की संभावना खत्म हो चुकी है.

अतीक अहमद के परिवार की इन तीनों फरार महिलाओं को ले कर मीडिया रोजरोज नए खुलासे करती है, पर पुलिस इन तक पहुंच नहीं पा रही है. इस की एक सब से बड़ी वजह यह है कि ये सभी बुरके में रहती हैं. इस के अलावा ये मुसलिम इलाके में छिपी होती हैं, जहां न पुलिस पहुंच पाती है और न पुलिस के मुखबिर.

ये जब अड्डे बदलती हैं तो कहा जाता है कि इन के साथ बुरके में कई महिलाएं होती हैं, जिस की वजह से कोई अंदाजा भी नहीं लगा पाता कि ये कौन हैं. अब देखना यह है कि ये कब गिरफ्तार होती हैं.

दरअसल, इन के भागने की सब से बड़ी वजह इस परिवार की प्रौपर्टी को बचाना भी है. क्योंकि अब ऐसा बाहर कोई नहीं बचा, जो प्रौपर्टी और अतीक के गैंग की देखभाल कर सके. लेदे कर शाइस्ता बची है, जिसे पूरी प्रौपर्टी के बारे में भी पता है और गैंग के बारे में भी. क्योंकि पति के जेल जाने के बाद वही गैंग भी चला रही थी और प्रौपर्टी की भी देखभाल कर रही थी.

उसे यह भी पता है कि कितना पैसा कहां लगा है. इसीलिए वह बाहर रह कर सब कुछ इकट्ठा कर रही है, क्योंकि अगर वह जेल चली गई तो सब बिखर जाएगा. वैसे भी प्रौपर्टी पर कब्जे को ले कर देवरानी जेठानी में जंग शुरू हो चुकी है. दोनों के वफादारों में आपस में गोलियां भी चल चुकी हैं.

लेकिन अतीक के वफादार ज्यादा हैं. क्योंकि अतीक जिन लोगों के बुरे समय में काम आया था, वे आज भी शाइस्ता के ही साथ हैं. जबकि अतीक की प्रौपर्टी पर हक तो पूरा परिवार जता रहा है, जिस में अतीक की पत्नी, 4 बेटे, अशरफ की पत्नी जैनब, बहन आयशा और बहनोई डा. अखलाक शामिल हैं. इन सब का क्या होगा, यह भविष्य ही बताएगा.

इधर सोशल मीडिया पर बकरा ईद मनाते हुए आयशा की फोटो वायरल हुई थी. अब पुलिस उस की लोकेशन पता कर रही है. आयशा ने सुप्रीम कोर्ट में अपने वकील से भाइयों की हत्या की न्यायिक जांच कराने की मांग की है.

अतीक के परिवार के लेडी गैंग – भाग 2

पुलिस रिकौर्ड के अनुसार शाइस्ता परवीन पर 5 मुकदमे दर्ज हैं. इन में से धोखाधड़ी और फरजी दस्तावेज तैयार करने की 3 एफआईआर थाना कर्नलगंज में दर्ज हैं. जबकि उमेश पाल और उस के 2 सुरक्षाकर्मियों की हत्या का मुकदमा थाना धूमनगंज में दर्ज है. इस के बाद उस पर गैंगस्टर ऐक्ट भी लगा दिया गया है.

इसी उमेश पाल और उस के 2 सुरक्षाकर्मियों की हत्या वाले मामले में पुलिस उस की और उस के साथी गुड्डू मुसलिम और 5 लाख के ईनामी शूटर साबिर की तलाश कर रही है. पुलिस और एसटीएफ की टीमें लगातार उस की तलाश में छापे मार रही हैं, पर इन में से किसी का पता नहीं चल पा रहा है.

इन सभी पर ईनाम तो घोषित किया ही गया है, शाइस्ता के खिलाफ लुक आउट नोटिस भी जारी किया जा चुका है, जिस से वह देश के बाहर न जा सके.

दरअसल, पति अतीक अहमद के जेल जाने के बाद शाइस्ता ही बेटों और पति के गुर्गों की मदद से पति का आपराधिक साम्राज्य चला रही थी. माना जा रहा है कि 5 लाख का ईनामी साबिर उस के साथ है. संभावना यह भी जताई जा रही है कि लुक आउट नोटिस जारी होने के पहले ही वह विदेश भाग गई है और वहीं से पति के गैंग की कमान संभाल रही है.

शाइस्ता को ले कर रोजरोज नईनई अटकलें लगाई जाती हैं. जब अतीक के बेटे असद का एनकाउंटर हुआ तो हर कोई यही सोच रहा था कि अपने बेटे को आखिरी बार देखने शाइस्ता जरूर आएगी, लेकिन वह बेटे को भी देखने नहीं आई.

इस के बाद 15 अप्रैल, 2023 को अतीक और उस के भाई अशरफ की हत्या हुई और 16 अप्रैल को जनाजा निकला तो सभी को पूरा विश्वास था कि पति के जनाजे में शामिल होने शाइस्ता जरूर आएगी. पर उस ने सरेंडर करने के बजाय आजादी को चुना और सालों तक पति के साथ रहने वाली शाइस्ता पति के अंतिम दर्शन तक के लिए नहीं आई.

इसलाम में किसी की मौत के बाद चालीसवां दिन बहुत खास माना जाता है. मुसलिम मानते हैं कि इस दिन मरे हुए इंसान की आत्मा अपने परिवार से मिलने आती है. चालीसवें दिन चेहल्लुम का फातिहा दिया जाता है, गरीबों को खाना खिलाया जाता है. इस दिन मरने वाले की शांति के लिए प्रार्थना की जाती है. परिवार वाले ये सारी रस्में पूरा करते हैं.

इसलिए सभी को उम्मीद थी कि पति से जुड़ी अंतिम रस्म के लिए शाइस्ता सरेंडर कर सकती है. पर न तो शाइस्ता आई और न ही अतीक के भाई अशरफ की पत्नी जैनब ही. देवरानी जेठानी दोनों फरार हैं. तब चालीसवें की रस्म अतीक के बहनोई ने पूरी की थी. क्योंकि अतीक की बहन आयशा नूरी भी फरार है.

पुलिस की कोशिशें हुईं नाकाम

अब सवाल यह उठता है कि आखिर शाइस्ता कहां है? पुलिस उस की तलाश में रातदिन एक किए हुए है. आखिर कौन लोग हैं, जो शाइस्ता को बचा रहे हैं, उसे खर्च दे रहे हैं, उस के खानेपीने और रहने की व्यवस्था कर रहे हैं? पुलिस ने शाइस्ता को दिल्ली के अलावा कौशांबी की कछार में ढूंढा, सैयद सरावां, उजहिनी और मेहगांवा गांव में ही नहीं, मदरसे में भी छापा मारा. कौशांबी के गांवगांव में तलाशा गया, पर पुलिस शाइस्ता का पता नहीं लगा सकी.

दरअसल, शाइस्ता तक पुलिस के न पहुंच पाने की 2 वजहें हैं. पहली वजह है उस की पहचान. एक तो वह बुरके में रहती है. फिर अतीक के समय भी वह बहुत कम मौकों पर सार्वजनिक तौर पर बाहर आई थी. उस के फोटो भी पुलिस के पास कम ही हैं. आखिरी बार वह बसपा जौइन करते समय मीडिया के सामने आई थी. पर उस समय वह बुरके में थी. उस के जो भी फोटो बिना बुरके के हैं, वे काफी पुराने हैं.

शाइस्ता का कोई नया फोटो पुलिस के पास नहीं है, इसलिए पुलिस को उस तक पहुंचने में परेशानी हो रही है. यह भी कहा जा रहा है कि अतीक के कुछ पुराने वफादार हैं, जो शाइस्ता की मदद कर रहे हैं. पुलिस ने तो अब उसे माफिया नाम भी दे दिया है.

पुलिस का कहना है कि शाइस्ता लगातार ठिकाने और फोन नंबर बदल रही है. लेकिन है वह प्रयागराज में ही. उस ने प्रयागराज में किसी मुसलिम बाहुल्य इलाके को अपना ठिकाना बना रखा है, जहां पुलिस का पहुंचना मुश्किल है.

अशरफ की पत्नी जैनब फातिमा

उमेश पाल हत्याकांड में पुलिस ने जांच के बाद शाइस्ता परवीन की देवरानी यानी अतीक अहमद के भाई अशरफ अहमद की पत्नी जैनब फातिमा को भी आरोपी बनाया है. पुलिस उस से भी पूछताछ करना चाहती है, क्योंकि पुलिस का मानना है कि अतीक और अशरफ के कई राज वह उगल सकती है.

शुरुआती जांच में पुलिस को उस के खिलाफ कई सबूत मिले हैं. पुलिस ने इसे पहले पकड़ा भी था और पूछताछ भी की थी. तब पुलिस को जैनब के खिलाफ पुख्ता सबूत नहीं मिले थे, इसलिए शांति भंग के आरोप में चालान कर के उसे छोड़ दिया गया था.

तब इस ने प्रैस कौन्फ्रैंस कर के पुलिस पर परेशान करने समेत कई अन्य आरोप लगाए थे. जैनब के साथ ही पुलिस ने अतीक की बहन आयशा नूरी और 2 भांजियों को भी पकड़ा था. पूछताछ के बाद पुलिस ने इन्हें भी शांति भंग में चालान कर के छोड़ दिया था.

जैनब का नाम बहुत कम लोगों ने सुना होगा, लेकिन अगर आज प्रयागराज के लोगों से पूछिए तो उस की पूरी क्राइम कुंडली बता देंगे. अपनी जेठानी शाइस्ता परवीन की तरह पुलिस द्वारा पकड़े जाने के डर से जैनब भी शौहर की मौत पर कब्रिस्तान नहीं पहुंची. उस ने भी जेठानी की तरह फरार होना उचित समझा.

आज उत्तर प्रदेश पुलिस के लिए जितनी चुनौती शाइस्ता है, उतनी ही चुनौती जैनब भी है. अतीक के बेटे असद के एनकाउंटर तक वह प्रयागराज वाले घर पर ही थी. उस ने मीडिया के सामने बरेली तथा प्रयागराज के थानों में जा कर पति और जेठ की सुरक्षा की मांग भी की थी.

अशरफ से शादी के पहले जैनब का कोई आपराधिक रिकौर्ड नहीं रहा, लेकिन माफिया के घर शादी होते ही क्रिमिनल लिस्ट में उस का नाम आ गया. पुलिस का मानना है कि जैनब से पूछताछ में उमेश पाल हत्याकांड के अहम सबूत सामने आ सकते हैं. इसीलिए पुलिस को जैनब की तलाश है. पर वह भी जेठानी और ननद की तरह फरार है.

अतीक के परिवार के लेडी गैंग – भाग 1

आज शाइस्ता परवीन को कौन नहीं जानता. उमेश पाल हत्याकांड में फरार चल रही उत्तर प्रदेश पुलिस  की मोस्टवांटेड सूची में शामिल 50 हजार की ईनामी शाइस्ता परवीन के पीछे पूरे उत्तर प्रदेश की पुलिस पड़ी है. उसे इलाहाबाद के कोनेकोने में तो तलाशा ही जा रहा है, देश का ऐसा कोई राज्य नहीं है, जहां उस की तलाश न हो रही हो.

इलाहाबाद शहर ही नहीं, गांवगांव और नदी के कछार तक में पुलिस छापे मार रही है. पर डौन अतीक अहमद की पत्नी शाइस्ता तक पुलिस पहुंच नहीं पा रही है. पुलिस को शाइस्ता की इतनी बेसब्री से तलाश क्यों है, यह जानने से पहले आइए थोड़ा उस के जीवन के बारे में जान लेते हैं.

शाइस्ता परवीन का जन्म 1972 में उत्तर प्रदेश के जिला इलाहाबाद (जो प्रयागराज के नाम से जाना जाता है) के मोहल्ला धूमनगंज के रहने वाले मोहम्मद हारुन के घर हुआ था.

मोहम्मद हारुन उत्तर प्रदेश पुलिस में कांस्टेबल थे और पड़ोसी जिले प्रतापगढ़ में तैनात थे, इसलिए शाइस्ता का ज्यादातर समय वहीं बीता. उस के परिवार में मातापिता के अलावा उस की 4 बहनें और 2 भाई हैं. उस के दोनों भाई मदरसे में प्रिंसिपल हैं.

शाइस्ता की स्कूली शिक्षा किदवई, प्रयागराज के मेमोरियल गर्ल्स इंटर कालेज में हुई. इस के बाद उस ने प्रयागराज से ग्रैजुएशन किया. शाइस्ता के घर वाले और अतीक के घर वाले एकदूसरे को जानतेपहचानते थे. दोनों के घर वालों का एकदूसरे के घर आनाजाना भी था. इसलिए शाइस्ता के घर वाले जब शाइस्ता का रिश्ता अतीक के लिए ले कर उस के घर गए तो उन्होंने हां कर दी. इस के बाद अगस्त, 1996 में शाइस्ता का निकाह अतीक के साथ हो गया.

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तब तक अतीक जुर्म की दुनिया में कदम रख चुका था. शाइस्ता पढ़ीलिखी तो थी ही, वह पहले से ही बोलने चालने में तेजतर्रार थी. भाईबहनों में सब से बड़ी होने की वजह से उसे घर संभालना भी आता था. इसलिए अतीक के घर आते ही उस ने उस का घर संभाल लिया था.

इतना ही नहीं, अतीक के हर जुर्म में वह उस का साथ भी देने लगी थी. वह पिता के साथ थाने आती जाती थी और पुलिस के काम करने का तरीका नजदीक से देखती थी. इस के अलावा पिता भी घर में अकसर पुलिस के तौर तरीकों और किस अपराध में कैसे बचा जा सकता है, इस की चर्चा करते रहते थे.

इसलिए शाइस्ता कभी पुलिस से नहीं डरी और समय समय पर राजनेता और बाहुबली पति अतीक अहमद की मदद करती रही. अतीक जब जेल में था, तब शाइस्ता ही उस के अपराध के साम्राज्य को संभालती रही.

पुलिस बचाव के लिए ओढ़ा राजनीतिक चोला

शाइस्ता का माफिया पति अतीक पहले अपराधी बना, उस के बाद पुलिस से बचने के लिए राजनेता बन गया था. क्योंकि जब उस के एनकाउंटर का आदेश हुआ था, तब प्रयागराज के एक बड़े कांग्रेसी नेता ने तत्कालीन प्रधानमंत्री से कह उस की जान तो बचाई ही थी, साथ ही सलाह भी दी थी कि अगर उसे पुलिस से बचना है तो वह राजनीति में आ जाए.

तब अतीक ने पहले तो निर्दलीय चुनाव लड़ा. उस के बाद जीत गया तो समाजवादी पार्टी में शामिल हो गया था. समाजवादी पार्टी ने उसे सांसद भी बना दिया था. उसी तरह पति के जेल जाने के बाद पति का आपराधिक साम्राज्य चलाने वाली शाइस्ता भी राजनीतिक संरक्षण पाने के लिए सितंबर, 2021 में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम में शामिल हो गई थी.

पर उत्तर प्रदेश में जब भाजपा की सरकार आई और मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी की सरकार ने माफियाओं पर शिकंजा कसना शुरू किया तो उस में सब से ज्यादा आफत अतीक अहमद पर ही आई. उस की कई सौ करोड़ की संपत्ति पर प्रशासन ने बुलडोजर चलवा कर जब्त कर ली.

अचानक आए इस संकट से घबरा कर शाइस्ता ने इसी साल यानी 2023 में मायावती का हाथ थाम लिया था यानी उस ने बहुजन समाज पार्टी जौइन कर ली थी. बसपा उसे प्रयागराज से मेयर का टिकट भी देने को तैयार थी.

पर इसी बीच विधायक राजू पाल के भाई और राजू पाल हत्या के चश्मदीद गवाह उमेश पाल की हत्या में माफिया अतीक अहमद की पत्नी शाइस्ता परवीन का नाम साजिशकर्ता के रूप में आ गया तो बसपा ने उसे प्रयागराज से मेयर का टिकट देने से मना तो कर ही दिया, पार्टी से भी निकाल दिया.

उमेश पाल की जब हत्या हुई थी, उस समय अतीक अहमद गुजरात के अहमदाबाद की साबरमती जेल में बंद था. अतीक का भाई अशरफ भी बरेली जेल में बंद था. जबकि शाइस्ता प्रयागराज में ही अपने घर में रह रही थी.

कहते हैं कि उमेश पाल की हत्या की बात शाइस्ता ने ही शुरू कराई थी. उमेश पाल की हत्या से पहले वह अतीक से मिलने साबरमती जेल गई थी. तभी वहां अतीक और शाइस्ता के बीच उमेश पाल की हत्या कराने की चर्चा हुई थी.

इस के लिए अतीक ने शाइस्ता से जेल में मोबाइल फोन पहुंचाने को कहा था. जेल में फोन पहुंचाने के लिए उस ने एक पुलिस वाले का नाम भी बताया था. शाइस्ता ने उसी पुलिस वाले के जरिए अतीक तक फोन पहुंचवा दिया था. इस के बाद अतीक ने शूटर्स से बात की तो वह अशरफ से बरेली जेल में जा कर मिला और फिर उमेश पाल की हत्या की फाइनल योजना बन गई और 24 फरवरी, 2023 को उमेश पाल की हत्या हो गई.

इस तरह उमेश पाल की हत्या की योजना में शाइस्ता शामिल थी. यही नहीं, उस के घर शूटरों की मीटिंग भी हुई थी. शाइस्ता ने तय किया था कि हत्या के बाद किसे कहां जाना है. उसी ने सभी को खर्च के लिए पैसे भी दिए थे.

अंडरग्राउंड हो चुकी है गैंगस्टर शाइस्ता

इसीलिए पुलिस उमेश पाल की हत्या की साजिश में शामिल शाइस्ता को गिरफ्तार करना चाहती है, क्योंकि वह सभी शूटरों को पहचानती थी. कहा तो यह भी जाता है कि उमेश की हत्या के बाद जब शाइस्ता की अतीक से फोन पर बात हुई थी तो उस ने पति से कहा था कि इस मामले में असद को नहीं शामिल करना था. तब अतीक ने कहा था कि वह शेर का बच्चा है.

उमेश पाल की हत्या के बाद से ही उत्तर प्रदेश पुलिस उसे पूछताछ के लिए तलाश रही है. अब तो लोग उसे लेडी डौन और गौडमदर भी कहने लगे हैं. पुलिस ने उस पर 50 हजार रुपए का ईनाम भी रखा है. पुलिस हाथ धो कर उस के पीछे पड़ी है, पर उस का पता नहीं लगा पा रही है.