पाक प्यार में नापाक इरादे – भाग 3

सर्वेश के घर के आसपास ज्यादा मकान तो थे नहीं, इसलिए नेत्रपाल को उस के यहां आनेजाने में कोई परेशानी नहीं होती थी. साप्ताहिक छुट्टी के दिन तो पाकेश के ड्यूटी पर चले जाने के बाद नेत्रपाल पूरा दिन उसी के यहां पड़ा रहता. इस तरह यह सिलसिला काफी दिनों तक बिना किसी रोकटोक के चलता रहा.

एक दिन शाम को किसी वजह से पाकेश जल्दी घर आ गया. संयोग से नेत्रपाल उस समय उस के घर पर ही मौजूद था. तब सर्वेश ने पाकेश से उस का परिचय कराते हुए कहा, ‘‘यह नेत्रपाल हैं. हमारी कंपनी में सुपरवाइजर हैं. यह भी यहीं आसपास प्लौट खरीदना चाहते हैं. इन्हें मैं ने ही यह बगल वाला प्लौट दिखाने के लिए बुलाया था.’’

सर्वेश ने ऐसी चाल चली थी कि पाकेश को नेत्रपाल पर जरा भी शक नहीं हुआ. पाकेश शराब का आदी था. वह ड्यूटी से छूटने के बाद अकसर रास्ते में पड़ने वाले ठेके से शराब पी कर घर आता था. उस शाम सर्वेश ने नेत्रपाल से उस का परिचय कराया तो वह उस के लिए भी ठेके से शराब ले आया. दोनों ने साथसाथ बैठ कर शराब पी तो उन में दोस्ती हो गई.

पाकेश पहले से ही शराब पिए था, नेत्रपाल के साथ भी पी तो उसे इतना नशा हो गया कि वह बिना खाना खाए ही सो गया. बच्चे पहले ही सो चुके थे. जेठ मंदबुद्धि ही था, वह खाना खा कर बाहर निकल गया तो नेत्रपाल और सर्वेश ने इस मौके का लाभ अच्छी तरह उठाया.

उस रात नेत्रपाल समझ गया कि पाकेश को पत्नी से भी ज्यादा शराब से प्रेम है. इस के बाद उसे जब भी सर्वेश से एकांत में मिलना होता, वह शराब की बोतल ले कर पाकेश के घर पहुंच जाता. पाकेश शराब पी कर लुढ़क जाता तो उसे सर्वेश से एकांत में मिलने का मौका आराम से मिल जाता.

लेकिन एक दिन पाकेश ने नेत्रपाल को सर्वेश की छाती पर हाथ लगाते देख लिया तो नशे में होने की वजह से उसे एकदम से गुस्सा आ गया. वह नेत्रपाल और सर्वेश को भद्दीभद्दी गालियां देने लगा. नेत्रपाल समझ गया कि अब यहां रुकना ठीक नहीं है, इसलिए वह तुरंत चला गया.

इस के बाद नेत्रपाल ने पाकेश के रहते सर्वेश के घर आना बंद कर दिया. लेकिन एक दिन पाकेश ने दोनों को रंगेहाथों पकड़ लिया. तब पाकेश ने शराब पी कर सर्वेश की जम कर पिटाई की और इस के बाद उसे उस की मां के घर भेज दिया.

सर्वेश ने नेत्रपाल के सामने अपना दुखड़ा रोया तो उस ने हर हालत में उस का साथ देने का आश्वासन दिया. इसी के बाद दोनों ने अपने संबंधों के बीच रोड़ा बन रहे पाकेश को हटाने की योजना बना डाली. इस के लिए उन्होंने रक्षाबंधन वाला दिन तय किया. दोनों ने सलाह की कि उस दिन किसी भी कीमत पर पाकेश को ठिकाने लगा देना है.

योजना के अनुसार, सर्वेश ने पाकेश से रक्षाबंधन का त्यौहार मनाने के लिए गांव चलने को कहा. पाकेश जाना तो नहीं चाहता था, लेकिन पत्नी की जिद के आगे उसे जाना ही पड़ा. जेठ को भी वह गांव ले गई. रक्षाबंधन का त्यौहार मना कर वह पाकेश और बेटी को ले कर काशीपुर आ गई. घर वालों से उस ने बहाना बनाया कि रात को घर खाली छोड़ना ठीक नहीं है. जेठ और बेटे को उस ने गांव में ही छोड़ दिया था.

काशीपुर आने के बाद वह खाना बनाने को ले कर पाकेश से उलझ गई. उस ने कहा कि वह बुरी तरह से थकी है, इसलिए खाना नहीं बना सकती. पाकेश से उलझना भी उस की योजना में शामिल था. सर्वेश ने खाना बनाने से मना किया तो पाकेश उसे भद्दीभद्दी गालियां देते हुए घर से निकल गया. उस के जाते ही उस ने नेत्रपाल को फोन कर दिया.

योजना के अनुसार, उस दिन नेत्रपाल काशीपुर में ही रुका था. सर्वेश का संदेश मिलते ही वह उस के घर पहुंच गया. घर से निकल कर पाकेश सीधे ठेके पर गया और घर लौटा तो नशे में धुत था. पाकेश को देख कर नेत्रपाल दूसरे कमरे में छिप गया.

पाकेश के जाने के बाद सर्वेश ने जल्दीजल्दी रोटियां बना ली थीं. वापस आने पर सर्वेश ने उसे रोटियां खाने को दीं तो वह उसे गालियां देते हुए मारपीट करने लगा.

सर्वेश की पिटाई होते देख नेत्रपाल को गुस्सा आ गया. वह निकल कर बाहर आ गया और पाकेश को समझाने लगा. लेकिन नेत्रपाल को देख कर पाकेश का गुस्सा और बढ़ गया. वह सर्वेश को छोड़ कर नेत्रपाल को गालियां देने लगा. वह उसे मारने के लिए कोई औजार ढूंढ रहा था, तभी पहले से छिपा कर रखी लोहे की रौड उठा कर सर्वेश ने नेत्रपाल को थमा दी.

नेत्रपाल को लोहे की रौड थमा कर सर्वेश ने पाकेश को बांहों में दबोच लिया. नेत्रपाल ने इस मौके का लाभ उठाते हुए उस के सिर पर लोहे की रौड का जोरदार वार कर दिया. एक ही वार में वह जमीन पर गिर पड़ा. उस ने दूसरा वार किया तो पाकेश के गिरने की वजह से वह सर्वेश के सिर में लग गया. उस के सिर से भी खून रिसने लगा. लेकिन उस ने अपनी चोट पर ध्यान न दे कर बेहोश पड़े पाकेश को दबोच लिया तो नेत्रपाल ने उस का गला दबा दिया.

थोड़ी देर छटपटा कर पाकेश हमेशाहमेशा के लिए शांत हो गया. इस के बाद बचाव का तरीका समझा कर नेत्रपाल चला गया. सर्वेश सवेरा होने का इंतजार करने लगी.

वह पूरी रात यही सोचती रही कि यह बात वह घर वालों को कैसे बताएगी? सुबह उस ने फोन कर के जेठानी को किसी तरह सूचना भी दे दी और बचाव के लिए गढ़ी गई कहानी भी सुना दी, लेकिन वह खुद को पुलिस की नजरों से बचा नहीं सकी.

सर्वेश के बयान के बाद पुलिस ने नेत्रपाल को भी उस के मोबाइल फोन की लोकेशन के आधार पर गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ में उस ने भी अपना अपराध स्वीकार करने के बाद वही पूरी कहानी दोहरा दी, जो सर्वेश सुना चुकी थी. नेत्रपाल और सर्वेश के अनुसार पाकेश को खत्म कर के दोनों शादी करना चाहते थे. लेकिन उन का यह सपना पूरा नहीं हो सका.

पूछताछ के बाद कोतवाली पुलिस ने नेत्रपाल और सर्वेश को अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया था. मजे की बात यह थी कि इतना बड़ा अपराध कर के भी सर्वेश को जरा भी पछतावा नहीं था. जेल जाते समय उस ने मां से भी बात नहीं की थी. अब उस के दोनों बच्चे सलेमपुर में ब्याही उस की बहन मुन्नी के पास हैं. द्य

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

भाभी की सुपारी का राज

पाक प्यार में नापाक इरादे – भाग 1

सुबह के यही कोई 6 बजे बबीता का मोबाइल फोन बजा तो उस ने पहले नंबर देखा कि इतनी सुबहसुबह किसने फोन कर दिया. जब उस ने देखा कि नंबर देवरानी सर्वेश का है तो उस ने झट फोन रिसीव किया. फोन कान से लगा कर उस ने जैसे ही ‘हैलो’ कहा,

दूसरी ओर से सर्वेश ने रोते हुए कहा, ‘‘दीदी, मैं तो बरबाद हो गई. मेरा बसाबसाया घर उजड़ गया. पाकेश इस दुनिया में नहीं रहे. किसी ने उन्हें मार डाला.’’

बबीता सर्वेश की जेठानी थी, जो गांव में  रहती थी. सासससुर थे नहीं, इसलिए उस ने जेठानी को फोन किया था. सर्वेश ने जो भी कहा था, रोते हुए कहा था, इसलिए बबीता की समझ में पूरी बात नहीं आई थी. लेकिन इतना तो वह समझ ही गई थी कि पाकेश को किसी ने मार डाला है. वह कुछ पूछती, उस के पहले ही सर्वेश ने फोन काट दिया था, इसलिए उस ने पलट कर फोन किया.

पलट कर फोन करने पर सर्वेश ने बताया कि रात में पाकेश ने शराब पी कर उस के साथ मारपीट की थी. उस मारपीट में उस ने लोहे की रौड उस के सिर में मार दिया था, जिस से वह बेहोश हो गई थी. सुबह जब उसे होश आया तो पाकेश मरा पड़ा था. उस के बेहोशी के दौरान ही उस की किसी ने हत्या कर दी थी. इसलिए उसे पता नहीं चला कि उसे कौन मार गया.

बबीता ने तुरंत इस बात की जानकारी अपने पति तिरमल सिंह को दी. तिरमल सिंह सरकारी स्कूल में अध्यापक थे और उस समय स्कूल में थे. भाई की हत्या की सूचना मिलते ही वह छुट्टी ले कर घर आ गए और घर से अन्य लोगों को साथ ले कर काशीपुर के लिए रवाना हो गए.

तिरमल सिंह घर वालों के साथ पाकेश के घर पहुंचे तो सर्वेश घर का मुख्य दरवाजा बंद किए अंदर ही बैठी थी. उस समय तक आसपास रहने वालों को पता नहीं था कि पाकेश की हत्या हो चुकी है. जब घर वालों ने रोनाधोना शुरू किया, तब कहीं जा कर आसपड़ोस वालों को पाकेश की हत्या की जानकारी हुई. इस के बाद उस के घर के सामने भीड़ लग गई. यह 11 अगस्त की सुबह की बात है.

तिरमल सिंह ने पाकेश की हत्या की सूचना काशीपुर कोतवाली पुलिस को दी. सूचना मिलते ही आईटीआई चौकीप्रभारी रमेश तनबार, सीनियर सबइंसपेक्टर धीरेंद्र कुमार, एएसपी देवेंद्र पिंचा घटनास्थल पर पहुंच गए.

लाश के निरीक्षण के दौरान पुलिस ने लाश के पास से एक प्लास्टिक का फीता और कमरे के बाहर बरामदे से लोहे की एक रौड बरामद की, जिस के एक सिरे पर पेपर लपेट कर उस के ऊपर कपड़ा लपेटा हुआ था. लाश के सिर पर चोट के कई निशान थे. इस के अलावा उस के गले पर भी नीला निशान नजर आ रहा था. इस से साफ लग रहा था कि सिर पर चोट पहुंचाने के बाद उस का गला भी दबाया गया था.

घटनास्थल और लाश के निरीक्षण के बाद पुलिस ने मृतक पाकेश की पत्नी सर्वेश से पूछताछ की तो उस ने बताया कि 10 अगस्त, 2014 दिन रविवार को वह पति और बच्चों के साथ रक्षाबंधन का त्यौहार मनाने अपने गांव मोहद्दीपुर गई थी. त्योहार मना कर वह पति और बेटी के साथ वापस आ गई थी, जबकि जेठ धर्मवीर और बेटा वहीं गांव में रुक गए थे.

सर्वेश के बताए अनुसार रात में पाकेश ने खूब शराब पी. नशे में वह उस के साथ मारपीट करने लगा. तभी उस ने गुस्से में वहीं पड़ी लोहे की रौड उठा कर उस के सिर पर मार दी, जिस से वह बेहोश हो गई. सुबह 5 बजे के करीब उसे होश आया तो पाकेश मरा पड़ा था. इसलिए उसे पता नहीं कि वह कैसे मरा.

पुलिस ने सर्वेश से पाकेश के मिलनेजुलने वालों के बारे में पूछा तो उस ने कहा कि इस बारे में उसे कुछ पता नहीं है. सर्वेश की इस बात पर घर वाले चौंके, क्योंकि पिछले ही दिन वह घर वालों से कह कर आई थी कि शराब के चक्कर में पाकेश ने कई लोगों से दुश्मनी मोल ले ली है. अगर कल को इसे कुछ हो गया तो उसे कोई दोष नहीं देगा.

जब यह बात घर वालों ने पुलिस को बताई तो सारी परिस्थितियों पर गौर करने के बाद पुलिस को सर्वेश पर ही संदेह हो गया. लेकिन उस समय पुलिस के पास कोई सुबूत नहीं था, इसलिए पुलिस ने उसे हिरासत में लेना उचित नहीं समझा.

यह भी निश्चित था कि यह काम सर्वेश ने अकेले नहीं किया था, क्योंकि पाकेश अच्छी कदकाठी का नौजवान था. सर्वेश उसे अकेली काबू में नहीं कर सकती थी. उस ने पति को किसी की मदद से ही मारा था. पुलिस को उस के बारे में भी पता करना था.

पुलिस ने सर्वेश के साथी के बारे में पता करने के लिए उस का मोबाइल फोन कब्जे में ले लिया. इस के बाद घटनास्थल की सारी काररवाई निबटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. पोस्टमार्टम के बाद लाश घर वालों के हवाले कर दी गई तो उन्होंने उसे गांव ले जा कर उस का अंतिम संस्कार कर दिया.

मृतक पाकेश के भाई तिरमल सिंह ने पुलिस को जो तहरीर दी थी, उस में भाई की हत्या का संदेह उस की पत्नी सर्वेश पर व्यक्त किया था. पुलिस ने उसी हिसाब से जांच शुरू की. पुलिस ने सब से पहले उस के फोन नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई.

काल डिटेल्स के अनुसार, जिस रात पाकेश की हत्या हुई थी, उस रात सर्वेश ने एक नंबर पर कई बार फोन कर के बात की थी. पुलिस ने उस नंबर के बारे में पता किया तो वह नंबर नेत्रपाल का था. वह महुआखेड़ागंज की किसी फैक्ट्री में सुपरवाइजर था. पुलिस उस के घर पहुंची तो घर वालों ने बताया कि वह रक्षाबंधन की रात से घर नहीं आया था. पुलिस के पास उस का नंबर था ही, उसे सर्विलांस पर लगवा दिया.

पाकेश का अंतिम संस्कार हो जाने के बाद पुलिस सर्वेश को पूछताछ के लिए कोतवाली ले आई. इस बार की पूछताछ में भी उस ने वही पुरानी कहानी सुना दी, जो उस ने पहले सुनाई थी. लेकिन पुलिस ने इस बार उस की कहानी पर विश्वास नहीं किया और उस से नेत्रपाल के बारे में पूछा.

सर्वेश ने बताया कि वह जिस फैक्ट्री में काम करती थी, नेत्रपाल उसी में सुपरवाइजर था. साथसाथ काम करने की वजह से दोनों में जानपहचान हो गई थी. उसी की वजह से पाकेश से भी उस की दोस्ती हो गई थी. जिस रात पाकेश की हत्या हुई थी, उस रात पाकेश और नेत्रपाल की कई बार बातचीत हुई थी. उन के बीच क्या बात हुई थी, यह उसे पता नहीं था. क्योंकि उस समय वह खाना बना रही थी.

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मनहूस कदम : खाली न गयी मजलूम की आह – भाग 5

उसी समय कमरे का दरवाजा खुला और ताहिरा अंदर आई. उस की नजर अजीम पर पड़ी तो वह वहीं ठिठक गई. कमरे में पल भर के लिए सन्नाटा पसर गया. अजीम ने खड़े हो कर कहा, ‘‘यासमीन, मैं नीचे तुम्हारा इंतजार कर रहा हूं.’’

उस के जाने के बाद ताहिरा ने कहा, ‘‘मैं वेटिंग रूम में बैठती हूं. आप फ्री हो जाइए तो बात करती हूं.’’

‘‘मैं फ्री हूं. बताओ क्या बात है?’’ मैं ने फौरन कहा.

ताहिरा यासमीन की बगल वाली कुरसी पर बैठ गई. वह अपना चेहरा दोनों हाथों से ढांप कर रोने लगी तो मैं ने कहा, ‘‘अरे यह क्या बात है? इतने प्यारे चेहरे पर ये आंसू अच्छे नहीं लगते.’’

‘‘वकील साहब, यह कौन है?’’ यासमीन ने हमदर्दी से पूछा.

‘‘ताहिरा, अजीम बुखारी की पहली बीवी.’’

यासमीन हैरानी से उसे देखती रह गई. फिर एकदम से उठी और बिना कुछ कहे बाहर निकल गई. उस के जाने के बाद ताहिरा भी उठी और आंसू पोछते हुए बोली, ‘‘वकील साहब, फिर आऊंगी. अभी मेरी तबीयत ठीक नहीं है.’’

‘‘फिक्र करने की कोई बात नहीं है, सब ठीक ही होगा.’’ मैं ने उसे तसल्ली दी.

अगली पेशी पर अजीम बुखारी अदालत में आया तो काफी परेशान लग रहा था. मैं ने जिरह शुरू की, ‘‘बुखारी साहब, पर्सनल ला के हिसाब से कोई भी आदमी पहली बीवी की मौजूदगी में उस की इजाजत के बगैर दूसरी शादी नहीं कर सकता यानी दूसरी शादी के लिए पहली बीवी की रजामंदी जरूरी है. क्या आप ने दूसरी शादी अपनी पहली बीवी की रजामंदी से की है?’’

‘‘मुझे इस बारे में पता नहीं था.’’

मैं ने उस के निकाहनामे की नकल निकाल कर कहा, ‘‘मि. बुखारी, इस पर साफ लिखा है कि दूसरी शादी के लिए काउंसिल और पहली बीवी की तहरीरी इजाजत जरूरी है. क्या आप ने पहली बीवी से इजाजत ली थी?’’

‘‘मुझे उस से इजाजत की उम्मीद नहीं थी.’’

मैं ने जज से कहा, ‘‘सर, मुसलिम ला के अनुसार मेहर की रकम मौजूदा बीवी को देना जरूरी है. न देने पर 5 हजार रुपए जुरमाना और कैद की सजा भी दी जा सकती है. इसलिए मैं गुजारिश करूंगा कि मेरी मुवक्किल को जुरमाने के साथ मेहर की रकम दिलवाई जाए.’’

जज ने निकाहनामे की नकल देख कर कहा, ‘‘क्या इस निकाहनामे पर आप के ही दस्तखत हैं?’’

‘‘जी हां.’’ अजीम ने कहा.

जज ने गुस्से से अजीम को देखते हुए कहा, ‘‘आप एक हफ्ते के अंदर अपनी बीवी का मेहर अदा कर दें. और बेग साहब, आप मेहर की रकम की अदायगी तक जिरह रोके रखें.’’

इतना कह कर जज ने अगले हफ्ते की तारीख दे दी.

मैं बाहर निकला तो अजीम बुखारी ने मेरे पास आ कर कहा, ‘‘बेग साहब, अब तो आप को यकीन हो गया होगा कि ताहिरा मनहूस है. उस दिन आप की औफिस में देख कर ही मैं समझ गया था कि मेरे ऊपर कोई आफत आने वाली है. उस ने यासमीन को न जाने क्या सिखा दिया कि वह मेरी कोई बात ही मान नहीं रही है.’’

‘‘लेकिन उन दोनों की तो कोई बात ही नहीं हुई थी.’’

‘‘दोनों आप के औफिस के बाहर मिली थीं. यासमीन उसे अपने साथ ले कर कहीं गई थी. उस ने मेरी जिंदगी को नरक बना दिया है. कहती है कि जब तक मैं ताहिरा की एकएक पाई अदा नहीं कर दूंगा, वह मुझ से बात नहीं करेगी और न ही घर में दाखिल होने देगी.’’

‘‘मेरे खयाल से वह ठीक ही कह रही है.’’

‘‘इस औरत ने मेरे अमेरिका जाने की योजना को भी खतरे में डाल दिया है.’’ अजीम ने कहा, ‘‘आप मेरे साथ थोड़ी मेहरबानी करें. इस के गहने और मेहर की रकम मैं कल अदा किए देता हूं. मगर 1 लाख के लिए आप को कुछ दिन इंतजार करना पड़ेगा.’’

मैं ने सोचा, जो मिल रहा है, उसे क्यों छोड़ा जाए. इसलिए कहा, ‘‘ठीक है, तुम ये दोनों चीजें कल दे जाना. मै ताहिरा को बुलवा कर तुम्हें रसीद दिला दूंगा.’’

‘‘रसीद तो आप दे ही देंगे. मगर मुझे एक क्लीयरेंस सर्टिफिकेट की भी जरूरत पड़ेगी, जिस से मैं यासमीन को यकीन दिला सकूं कि मैं ने ताहिरा के सारे हक अदा कर दिए हैं.’’

मुझे लगा, यह मुझे धोखा देने की कोशिश कर रहा है. मैं ने कहा, ‘‘क्लीयरेंस सर्टिफिकेट तो पूरी अदायगी के बाद ही मिलेगा.’’

‘‘तब तक तो बड़ी गड़बड़ हो जाएगी. मैं नौकरी से इस्तीफा दे चुका हूं. दुकान बेचने का भी इश्तिहार दे चुका हूं. अगर यासमीन को संतुष्ट नहीं किया तो वह अकेली ही अमेरिका चली जाएगी. मेरा बहुत घाटा हो जाएगा. जब मैं इतना देने को तैयार हूं तो बाकी भी दे दूंगा.’’

‘‘अजीम तुम जो भी दे रहे हो, वह यासमीन की ही वजह से दे रहे हो. खैर, तुम जो देने को कह रहे हो, कब ले आओ. अगर ताहिरा मान गई तो मैं सर्टिफिकेट दे दूंगा.’’

अगले दिन अजीम 32 हजार के बजाय 40 हजार रुपए और गहने ले कर आया. उस समय ताहिरा मेरे पास बैठी थी, इसलिए वह वेटिंग रूम में बैठ गया. उस ने कहा कि वह ताहिरा का सामना नहीं करना चाहता. ताहिरा ने सर्टिफिकेट देने की इजाजत दे दी. वह पैसे और गहने बैग में रख कर कागजात तैयार होने का इंतजार करने लगी.

थोड़ी देर खामोश रहने के बाद उस ने कहा, ‘‘बेग साहब, मैं ने इस मामले पर गौर किया तो इस नतीजे पर पहुंची कि जब मेरा घर आबाद नहीं हो सकता तो अजीम जो दे रहा है, उसी में सब्र कर के उसे क्लीयरेंस सर्टिफिकेट दे देना चाहिए, क्योंकि मैं उस की जिंदगी में रोड़ा अटकाना नहीं चाहती. अब आप मुकदमे की काररवाई खत्म कर दें.’’

ताहिरा अपनी बात कह ही रही थी कि अचानक यासमीन औफिस में आई. आते ही उस ने कहा, ‘‘उम्मीद है, फैसला हो गया होगा?’’

‘‘जी हां,’’ ताहिरा ने नजरें झुकाए आहिस्ता से कहा, ‘‘अजीम ने सारे हक अदा कर दिए हैं.’’

‘‘बेग साहब, क्या मैं रसीद देख सकती हूं,’’ यासमीन ने कहा.

मैं ने रसीद उसे दी तो उसे देख कर उस ने कहा, ‘‘यह तो गहनों और 40 हजार की ही रसीद है. बाकी के ड्यूज?’’

‘‘मुझे और कुछ नहीं चाहिए. मैं क्लीयरेंस सर्टिफिकेट पर दस्तखत कर रही हूं.’’ ताहिरा ने कहा.

यासमीन ने बीच वाले दरवाजे में खड़ी हो कर कहा, ‘‘अजीम, तुम ने पूरी रकम देने की बात कही थी, फिर तुम ने ताहिरा को यह 40 हजार रुपए ही क्यों दिए?’’

‘‘बाकी रुपए मैं 2 दिनों में दे दूंगा.’’ अजीम ने झेंपते हुए कहा.

‘‘तुम ने 90 हजार में दुकान और 80 हजार में प्लौट बेचा है. तुम्हारे पास पैसे की कमी कैसे हो सकती है. तुम धोखेबाज हो, तुम ने कहा था कि प्लौट के पूरे पैसे ताहिरा को दोगे. आज तुम इस लड़की के साथ धोखा दे रहे हो, कल मेरे साथ भी ऐसा कर सकते हो. तुम्हें मुझ से भी ज्यादा मालदार, खूबसूरत और जवान औरत मिल जाएगी तो तुम मुझे छोड़ दोगे. मैं जा रही हूं. और हां, अब तुम मेरे पीछे मत आना.’’ कह कर यासमीन बाहर निकल गई.

ताहिरा रसीद पर दस्तखत कर के चली गई. अजीम उसे जाते देखता रहा. उस की आंखों में एक खालीपन झलक रहा था. वह उस से कुछ कहना चाहता था, पर कह नहीं सका. अगली पेशी पर अदालत के गेट पर ही अजीम बुखारी के वकील से भेंट हो गई. उस ने व्यंग्य से कहा, ‘‘बेग साहब, केस खारिज हो गया, फाइल बंद कर दें. दो दिनों पहले एक्सीडेंट में अजीम बुखारी मर गया. कुछ लोगों को उन का अंधविश्वास ही उन्हें ले डूबता है. उस का खयाल था कि उस की पहली बीवी मनहूस है. पर उस का एक्सीडेंट दूसरी शादी के बाद हुआ. अब किस पर इल्जाम लगाए. बहरहाल इल्जाम लगाने वाला ही नहीं रहा.’’

सच है, मजलूम की आह कभी खाली नहीं जाती. जुल्म करने वाला अपने किए की सजा जरूर पाता है. बाद में मुझे पता चला कि अजीम की मां को भी लकवा मार गया था. बिस्तर पर पड़ी वह भी अपने किए की सजा भोग रही थी. ताहिरा की जिंदगी में खुशियों ने दस्तक दी. एक पढ़ालिखा, समझदार शख्स उस का हमसफर बन गया. इस में कुछ मेरी कोशिश थी तो कुछ संयोग.

मनहूस कदम : खाली न गयी मजलूम की आह – भाग 4

वकील ने अजीम से पूछ कर तारीख ले ली. 3 तारीखें यूं ही निकल गईं. चौथी तारीख पर मैं ने उसे जिरह के लिए तलब कर लिया. उस की पूरी तैयारी नहीं थी. उस ने जवाब में लिखा था कि ताहिरा उस की बीवी जरूर थी, लेकिन वह शादी के कुछ दिनों बाद ही सारे गहने ले कर अपने किसी यार के साथ भाग गई थी. बदनामी के डर से उस ने रिपोर्ट नहीं लिखाई. वह खुद घर छोड़ कर गई थी. इसलिए उस ने मेंटीनेंस एलाउंस लेने से मना कर दिया था.

सच बोलने का हलफ लेने के बाद मैं ने पूछा, ‘‘बुखारी साहब, बेगम ताहिरा का दावा है कि वह आप की कानूनी और शरई बीवी है. इस पर आप क्या कहना है?’’

‘‘जो बीवी महीनों से घर से गायब हो, उस का होना भी न होने के बराबर है.’’ अजीम ने जवाब में कहा तो जज ने टोका, ‘‘जज्बाती बयानबाजी की जरूरत नहीं है. हां या ना में जवाब दो.’’

उस ने जल्दी से कहा, ‘‘जी हां, वह शरई और कानूनी लिहाज से मेरी बीवी है, लेकिन प्रैक्टिकली कुछ भी नहीं है.’’

‘‘आप ने जवाब में लिखा है कि शादी के कुछ दिनों बाद वह अपने किसी यार के साथ भाग गई थी. क्या आप उस ‘यार’ का नाम बताएंगे?’’ मैं ने पूछा.

‘‘मैं नाम कैसे बता सकता हूं. ऐसे काम कोई बता कर थोड़े ही करता है.’’ अजीम झुंझलाया.

‘‘यानी आप को ‘यार’ का नाम नहीं मालूम,’’ मैं ने कहा, ‘‘यह तो बता ही सकते हो कि वह रहने वाला कहां का था?’’

‘‘मुझे उस के बारे में कुछ नहीं पता.’’

‘‘आप को उस के बारे में कुछ नहीं पता?’’

इस बार जवाब उस के बजाय वकील ने दिया, ‘‘मेरे मुवक्किल ने अपने बयान में अंदेशा जाहिर किया है कि वह अपने किसी दोस्त के साथ भाग गई थी.’’

‘‘शुक्रिया वकील साहब,’’ मैं ने कहा, ‘‘इस का मतलब भागने का अंदेशा है यानी इस का कोई सुबूत आप के पास नहीं है.’’

मैं ने अगला सवाल किया, ‘‘आप का कहना है कि आप ने बदनामी की वजह से रिपोर्ट नहीं की. इस का मतलब आप ने सोच रखा था कि वह आएगी तो आप उसे रख लेंगे?’’

‘‘जी नहीं, यह तो कोई बेशरम आदमी ही सोच सकता है.’’

‘‘यानी आप उसे तलाक देना चाहते हैं?’’

‘‘जाहिर है, ऐसे में आदमी तलाक ही देगा.’’

‘‘बुखारी साहब, इस हादसे को 9 महीने हो चुके हैं, फिर आप ने अभी तक तलाक नहीं दिया?’’

‘‘मैं ने उस का खयाल ही दिल से निकाल दिया था.’’

‘‘ताहिरा की ओर से आप को एक नोटिस भेजी गई थी, जिस का आप ने जवाब भी दिया था?’’

‘‘जी हां.’’

मैं ने उस की नोटिस जज के सामने रखते हुए कहा, ‘‘बुखारी साहब, आप ने अपने जवाब में लिखा है कि ताहिरा घर बसाने लायक नहीं है, क्योंकि उस ने पहली शादी की बात छिपाई थी. वह मनहूस भी थी, जिस की वजह से आप का काफी नुकसान हुआ.’’

‘‘वकील साहब, मैं इस मामले को तूल नहीं देना चाहता, पर यह सच है कि वह मनहूस है.’’

‘‘बुखारी साहब, आप की दादीदादा और नाना कब मरे थे?’’

‘‘9-10 साल तो हो ही गए होंगे.’’

‘‘क्या आप अदालत को बताएंगे कि आप के दादादादी और नाना की मौत किस मनहूस की वजह से हुई थी?’’

‘‘वे तो अपनी मौत मरे थे.’’

‘‘फिर तो 82 साल की बूढ़ी आप की नानी भी अपनी मौत ही मरी होंगी? इस में ताहिरा को क्यों जोड़ दिया?’’

‘‘वकील साहब, ये बातें आप नहीं समझेंगे.’’

अब मैं जज से मुखातिब हुआ, ‘‘सर, इन की बातों से यह बात सामने आती है कि अजीम बुखारी अंधविश्वासी और कान का कच्चा आदमी है. इस ने इसी बात को ढाल बना कर अच्छी और समझदार बीवी को घर से निकाल दिया है.’’

जज से इतना कह कर मैं बुखारी की ओर मुड़ा, ‘‘बुखारी साहब, आप ने अभी कहा था कि ताहिरा मनहूस थी, इसलिए उसे घर से निकाल दिया है. जबकि जवाब में आप ने लिखा है कि वह अपने यार के साथ भाग गई थी. अब इस में कौन सी बात सही है?’’

‘‘वह घर से भाग गई थी.’’

‘‘यानी आप स्वीकार कर रहे हैं कि आप ने झूठ बोला था. जो आदमी एक बार झूठ बोल सकता है, वह बारबार झूठ बोल सकता है.’’

‘‘आप जो भी समझें. मुझे जो कहना था मैं ने कह दिया.’’

‘‘बुखारी साहब, आप नौकरी के साथसाथ कारोबार भी करते हैं. आप को तनख्वाह तो मिलती ही है, कारोबार से भी ठीकठाक कमा लेते हैं. शादी के बाद आप ने अपने कारोबार में 1 लाख रुपए लगाए थे, जो आप के पास आप की बीवी के अमानत थे.’’

‘‘यह इल्जाम है. मैं किसी 1 लाख के बारे में नहीं जानता.’’

मैं ने बैंक स्लिप की फोटो कौपी दिखाते हुए कहा, ‘‘यह रकम मेरी मुवक्किल ने आप को दी थी, जिसे शादी के चौथे दिन आप ने अपने खाते में जमा कराया था.’’

‘‘वह मेरी अपनी रकम थी.’’

‘‘इतनी बड़ी रकम आप के हाथ कहां से लगी थी?’’ मैं ने पूछा.

बुखारी के वकील ने आगे बढ़ कर कहा, ‘‘सर, यह मेरे मुवक्किल का निजी मामला है. उसे रकम के बारे में बताने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता.’’

अदालत ने इस तरह के सवाल पूछने से मना कर दिया. इसी के साथ अदालत का वक्त खत्म हो गया. बुखारी का वकील काफी लंबी तारीख लेना चाहता था, लेकिन मैं ने कहा कि जिरह अभी मुकम्मल नहीं हुई है, इसलिए अगले दिन की तारीख दे दी जाए. अदालत ने अगले दिन की तारीख दे दी.

शाम को अजीम बुखारी अपनी नई बेगम यासमीन के साथ मेरे औफिस आया. यासमीन ने कहा, ‘‘वकील साहब, आप ने तो समझौता कराने का वादा किया था?’’

‘‘वादा तो किया था, लेकिन मेरी मुवक्किल समझौता के लिए राजी नहीं है.’’

‘‘आखिर वह चाहती क्या है?’’ अजीम बुखारी ने नफरत से पूछा.

‘‘उस की पहली ख्वाहिश है कि किसी तरह समझौता हो जाए. अगर समझौता नहीं होता तो वह अपना हक ले कर ही मामला खत्म करेगी. जिस के बारे में मैं आप को पहले ही बता चुका हूं.’’

‘‘वकील साहब, आप सीरियस हैं?’’ यासमीन ने कहा, ‘‘आप तो ऐसे कह रहे हैं, जैसे सभी चीजें अजीम के पास है.’’

‘‘जी हां, मैं सीरियस हूं. मैडम, आप अपने शौहर से पूछ सकती हैं. ताहिरा के गहने और रकम इन के पास है?’’

‘‘अजीम, तुम तो कह रहे थे कि यह सब झूठ है.’’

अजीम बुखारी नजरें चुराते हुए बोला, ‘‘मैं ने भी उस पर काफी पैसे खर्च किए हैं.’’

‘‘मि. बुखारी, जहां तक मुझे पता है, ताहिरा सिर्फ 21 दिन तुम्हारे घर में रही थी. इतने दिनों में तुम ने उस पर कौन सा कारू का खजाना लुटा दिया?’’

अजीम चुप रहा. यासमीन गुस्से से बोली, ‘‘बोलते क्यों नहीं, वकील साहब की बात का जवाब दो.’’

‘‘डियर, तुम भी किस बहस में उलझ गई. हम यहां लड़ने थोड़े ही आए हैं.’’ अजीम ने बात पलट दी.

क्या ताहिरा सच में मनहूस थी? जानने के लिए पढ़ें हिंदी इमोशनल कहानी का अंतिम भाग…

भाभी की सुपारी का राज – भाग 3

इस बारे में जांच की तो पता चला कि पुष्पेंद्र की मौत के बाद उस के घर वालों ने तय कर लिया था कि सुशीला की शादी पुष्पेंद्र के छोटे भाई मनोज से करा देंगे, मनोज गांव में रह कर खेती संभालता था.

मनोज को लगा कि इस से भाई की मौत पर मिलने वाले पैसे भी उस को मिल जाएंगे. अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति भी सुशीला को मिल जाएगी, लेकिन इधर जब सुधा चौधरी को पुष्पेंद्र की मौत पर रुपयों की एक किस्त मिल भी गई थी तो मनोज को लगा कि इस तरह उस के सारे मंसूबों पर पानी फिर जाएगा.

ऐसे में मनोज ने डेढ़ महीने पहले से सुधा के मर्डर की प्लानिंग शुरू कर दी थी. उस ने सोचा कि सुधा की हत्या के बाद रुपए सुशीला को मिल जाएंगे और प्रौपर्टी में भी बंटवारा नहीं हो सकेगा.

5 लाख रुपए में दी सुधा की हत्या की सुपारी

ऐसे विचार मन में आए तो मनोज अपनी भाभी सुधा का मर्डर करवाने के लिए शूटर की तलाश करने लगा. मगर उसे कोई शूटर नहीं मिला. मनोज तब अपनी दूसरी भाभी सुशीला के भाई माधव व सुशीला के चचेरे भाई शिशुपाल निवासी बैरू का नगला, जिला मथुरा, उत्तर प्रदेश से मिला.

मनोज ने सुशीला के दोनों भाइयों माधव और शिशुपाल से कहा, “सुधा का मर्डर करवा दो. हमारी संपत्ति को ले कर मामला चल रहा है. हम लोग बरबाद हो रहे हैं. सुधा की मौत के बाद सारी संपत्ति सुशीला और मेरी हो जाएगी.”

“मनोज, मर्डर तो हो जाएगा लेकिन पैसे खर्च करने पड़ेंगे. पैसों के लिए शूटर की लाइन लगा दूंगा.” माधव ने कहा.

“कितने रुपए लगेंगे सुधा के मर्डर के?” मनोज ने पूछा.

“5 लाख खर्च करने पड़ेंगे. मैं काम करवा दूंगा.” शिशुपाल बोला.

सुधा की मौत के लिए 5 लाख में सौदा तय हो गया. माधव जाट ने एक नाबालिग से संपर्क किया, जो उस की जानपहचान का था एवं भरतपुर का रहने वाला था. माधव ने उस से सुधा का मर्डर करवाने के लिए 5 लाख में सौदा तय कर लिया.

मनोज ने 4 हजार रुपए एडवांस में दे दिए. बाकी रकम काम हो जाने के बाद देने का वादा किया. सुधा के मर्डर से 2 दिन पहले माधव ने 22 जून, 2023 को नाबालिग को 2 कट्टे ला कर दे दिए. नाबालिग और माधव ने सुधा की पहचान कर ली. उन्हें पता था कि सुधा सुबह भरतपुर में स्थित अपने गैस प्लांट जाती है और शाम के समय में नदबई वापस लौटती है.

24 जून, 2023 को बाइक पर आगे माधव व पीछे नाबालिग नदबई बस स्टैंड पर निगाह जमाए दोपहर बाद से खड़े थे. शाम करीब 4 बजे जब सुधा बस से उतर कर बेटे अनुराग के साथ स्कूटी पर घर के लिए निकली तो ये दोनों उस का पीछा करने लगे. रास्ते में सुधा ने खरीदारी की.

इस के बाद जब स्कूटी पर मांबेटा रवाना हुए तो माधव ने बाइक स्कूटी के पीछे भगा दी. कासगंज रोड पर मौका मिलते ही माधव ने बाइक जब स्कूटी के बराबर की तो नाबालिग ने दोनों कट्टों को दोनों हाथों में लिया और सुधा पर गोलियां दाग दीं और फरार हो गए.

अनुराग ने माधव जाट को पहचान लिया था. हत्या वाले दिन 24 जून, 2023 को भी मनोज दोनों शूटरों के संपर्क में था. जब उसे खबर मिल गई कि सुधा की हत्या कर दी गई है तो मनोज भी जयपुर भाग गया था.

पुलिस के हत्थे चढ़े आरोपी

मनोज के द्वारा शूटर के बारे में दी जानकारी के बाद पुलिस टीमें उत्तर प्रदेश रवाना हो गईं. 26 जून, 2023 को नदबई थाने की पुलिस ने आरोपी मनोज को कोर्ट में पेश कर न्यायिक हिरासत में भेज दिया था. पुलिस ने आरोपी माधव, शिशुपाल व एक नाबालिग के फरार होने के बाद उन तीनों पर 25-25 हजार रुपए का इनाम घोषित कर दिया था.

एसएचओ श्रवण पाठक को 27 जून, 2023 को आरोपियों माधव जाट और शिशुपाल जाट की मोबाइल लोकेशन मथुरा की मिली थी. पुलिस टीम राजस्थान से उत्तर प्रदेश पहुंच कर तलाश कर रही थी.

पुलिस टीम को सूचना मिली थी कि माधव और शिशुपाल एक नाबालिग के साथ धनवाड़ा पूंठ की खदानों में छिपे हुए हैं. वे तीनों रात को कहीं बाहर जाने की फिराक में हैं. फिर क्या था, पुलिस टीम अंधेरा घिरते ही धनवाड़ा पूंठ की खदानों में आरोपियों की तलाश में जुट गए.

पुलिस टीम जब सर्च करते हुए एक बंद पड़ी खदान में पहुंची तो तीनों आरोपी वहां से भागने लगे, पुलिस टीम ने पीछा किया. हड़बड़ाहट में तीनों आरोपी खदान में दौड़ते समय गिर कर घायल हो गए. पुलिस टीम ने उन तीनों को हिरासत में लिया और तीनों को कुम्हेर अस्पताल ले गए. जहां से तीनों आरोपियों का प्राथमिक उपचार करा कर भरतपुर के सरकारी अस्पताल आरबीएम ले आई.

माधव, शिशुपाल और नाबालिग से पुलिस ने पूछताछ की तो उन्होंने अपना जुर्म कुबूल कर लिया. सुधा चौधरी की हत्या का जुर्म कुबूल करने के बाद नाबालिग को बाल न्यायालय में पेश कर बाल सुधार गृह भेज दिया गया. वहीं आरोपियों माधव जाट और शिशुपाल जाट का आरबीएम सरकारी अस्पताल, भरतपुर में 28 जून, 2023 को इलाज कराया. उन के पैरों में चोट लगी थी, इस कारण प्लास्टर किया गया था.

चारों आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद सुधा चौधरी हत्याकांड का पूरी तरह खुलासा हो चुका था. एसपी मृदुल कच्छावा ने 28 जून, 2023 को प्रैसवार्ता कर सुधा चौधरी हत्याकांड का खुलासा कर दिया.

पुलिस ने सुशीला एवं अन्य से पूछताछ की. मगर उन की संलिप्तता सुधा मर्डर में कहीं नजर नहीं आई. कथा संकलन तक आरोपियों माधव और शिशुपाल जाट का अस्पताल में इलाज चल रहा था.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

मोहब्बत वाली गली – भाग 3

सालों बाद जानीपहचानी गलियों से गुजरते हुए मुझे खुशी भी हो रही थी और अफरोज की याद भी आ रही थी. मैं सोच रहा था कि वह अपने अब्बू की एकलौती बेटी थी, इसलिए मलिक साहब का पुश्तैनी मकान उसी को मिला होगा. अगर उस ने और उस के पति ने मकान बेचा नहीं होगा तो संभवत: वह उसी मकान में रह रही होगी.

अगर ऐसा हुआ तो उस के दर्शन हो सकते थे. मैं उसे एक नजर देखना चाहता था, उस के पति को भी और शायद बच्चों को भी. लेकिन मेरे पास कोई बहाना नहीं था, उस मकान का दरवाजा खटखटाने का.

मैं सोच में डूबा आगे बढ़ रहा था. मोड़ से घूम कर जब मैं ने मकान नंबर 7 के सामने जा कर साइकिल की घंटी बजाई तो अंदर से अधेड़ उम्र की औरत ने चिक हटा कर बाहर झांका, तब तक मैं आगे बढ़ गया था. उस ने पीछे से आवाज दी, ‘‘ओ भैया डाकिए, कोई चिट्ठी है क्या मेरी?’’

मैं ने पीछे मुड़ कर देखा, खिचड़ी बालों और ढलती उम्र के बावजूद उसे पहचानने में मुझे जरा भी देर नहीं लगी. वह अफरोज ही थी, जो अपनी उम्र से 10-15 साल ज्यादा की लग रही थी. मैं लौट कर उस के पास आ गया. मेरे अंदर आंधियां सी चल रही थीं, दिल बैठा जा रहा था. मुझे जैसे अपनी आंखों पर यकीन ही नहीं हो रहा था. मैं ने आह सी भरते हुए पूछा, ‘‘तुम अफरोज ही हो न?’’

‘‘हां, और तुम वही जो मेरे गुलाबी खत लाया करते थे?’’ उस ने आश्चर्य से पूछा, जैसे यकीन न हो रहा हो.

‘‘हां, वही हूं.’’ मैं ने डूबे से स्वर में कहा.

‘‘इतने दिन बाद मिले हो, चाय तो पीते जाओ. मुझे अच्छा लगेगा.’’ उस ने आग्रहपूर्वक कहा तो मैं साइकिल खड़ी कर के अंदर चला गया. मेरे मन में उस गुलाबी खत वाले को देखने की इच्छा थी, जो अफरोज का शौहर बना होगा और जिस की वजह से उस की यह हालत हुई होगी.

अंदर घर का हाल 19 साल पहले जैसा ही था. कहीं कोई बदलाव नहीं, अफरोज ने मुझे बैठने के लिए कुरसी दी. मैं ने इधरउधर देखा. घर में न कोई बच्चा था, न कोई और. वह चाय बनाने जाने लगी तो मैं ने पूछ लिया, ‘‘वह गुलाबी खत वाले साहब नजर नहीं आ रहे अफरोज?’’

अफरोज ने एक ठंडी सांस ली, फिर बोली, ‘‘वह खत तो मैं खुद ही लिखती थी, अपने खत अपने लिए.’’

‘‘लेकिन क्यों?’’

‘‘ताकि तुम खत पहुंचाने आओ और मैं एक नजर तुम्हें देख सकूं. मुझे प्यार हो गया था तुम से, मुझे पता नहीं था कि प्यार इतना खतरनाक होता है.’’

मुझे काटो तो खून नहीं, मैं बुत बना बैठा रहा. अपने शब्दों से मेरी चुप्पी का ताला उस ने ही खोला, ‘‘चाह कर भी कभी कह नहीं सकी, शायद अब्बा की वजह से. सोचती थी, किसी न किसी दिन कहूंगी जरूर. लेकिन तुम ने आना ही बंद कर दिया.’’

मुझ में कुछ कहने की हिम्मत नहीं थी, पर उस की बात सुनने के बाद सदमे से निकलने के लिए कुछ कहना तो था ही, सो बोला, ‘‘तुम्हारे अब्बा तुम्हें ले कर चिंतित रहते थे. मुझ से तुम्हारी शादी के बारे में जिक्र भी किया था उन्होंने. मेरे मन में उम्मीद भी जगी थी और मैं उन से बात भी करना चाहता था, लेकिन यह सोच कर चुप रह गया था कि तुम तो गुलाबी खत वाले से प्यार करती हो, रोजाना खत लिखता है वह तुम्हें.’’

‘‘नहीं, कोई नहीं था मेरी जिंदगी में तुम्हारे अलावा.’’ उस ने नजरें झुका कर दुखी स्वर में कहा तो मैं ने पूछा, ‘‘तुम ने शादी की या नहीं?’’

‘‘नहीं, यह सोच कर बरसों तक तुम्हारा इंतजार करती रही कि शायद तुम फिर लौट कर आओगे, पर तुम नहीं आए. फिर अब्बा नहीं रहे तो अकेली रह गई. धीरेधीरे यह सोच कर इंतजार करना भी छोड़ दिया कि तुम ने अपनी गृहस्थी बसा ली होगी. गुजरबसर तो करनी ही थी, सो बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने लगी. अब तो अपने आप को ही भूल गई हूं.’’

मेरी आंखों से आंसुओं का झरना फूटने को तैयार था और वह दरिया की तरह शांत थी. अचानक उस ने पूछा, ‘‘तुम्हारा नाम क्या है? देखा, प्यार तो कर लिया पर नाम कभी नहीं पूछा. मौका ही कहां मिला था.’’

‘‘अशरफ.’’

हिम्मत नहीं थी, जरूरत भी नहीं. फिर भी मैं ने सवाल किया, ‘‘अब भी प्यार करती हो मुझ से?’’

‘‘नहीं, न तुम से न अपने आप से. अब मैं सिर्फ उन बच्चों से प्यार करती हूं, जो मेरे पास पढ़ने आते हैं. किसी के प्यार की निशानी हैं.’’

मैं बुझे दिल से उठा और साइकिल उठा कर निकल आया मोहब्बत वाली उस गली से.