मनहूस कदम : खाली न गयी मजलूम की आह – भाग 3

लगभग डेढ़ महीने बाद ताहिरा ने आ कर बताया, ‘‘वकील साहब, अजीम ने चोरी से शादी कर ली है. अब वह जल्दी ही अमेरिका जाने वाला है.’’

मुझे इसी बात का इंतजार था. मैं ने पूछा, ‘‘शादी कब हुई?’’

‘‘एक हफ्ते पहले,’’ ताहिरा ने कहा, ‘‘अब वह जल्दी ही अमेरिका चला जाएगा.’’

‘‘तुम इस की चिंता मत करो, मैं अभी पता किए लेता हूं.’’ कह कर मैं ने मकबूल के घर का नंबर मिला कर बड़ी होशियारी से लड़की से ही पता कर लिया कि वह अमेरिका कब जा रही है. उस ने बताया था कि वह तो जल्दी ही चली जाएगी, लेकिन अजीम बुखारी बाद में आएगा, क्योंकि उसे कागजात तैयार कराने होंगे.

अगले दिन मैं ने अदालत में मुकदमा दाखिल कर दिया. अदालत ने सम्मन भिजवा कर सुनवाई के लिए 15 दिन बाद की तारीख दे दी. मैं ने अजीम बुखारी का पता उस के घर के बजाय मकबूल हुसैन के घर का दिया था. मेरा मकसद था कि मकबूल हुसैन और यासमीन, दोनों को अजीम बुखारी की पहली शादी का पता चल जाए.

सम्मन ले जाने वाले चपरासी को मैं ने कुछ रुपए दे कर ताकीद कर दी थी कि वह यासमीन या मकबूल हुसैन के सामने ही सम्मन तामील कराएगा. अगर अजीम घर में न हो तो घर वालों को सम्मन के बारे में बता देगा.

दोपहर बाद चपरासी ने लौट कर बताया कि सम्मन तामील हो गया है. अजीम घर पर ही था. दरवाजा उस की बीवी यासमीन ने खोला था. तब उस ने जोर से पुकार कर कहा था, ‘‘अजीम साहब, आप की पहली बीवी ताहिरा ने आप के खिलाफ मुकदमा दायर किया है. यह उसी का सम्मन है.’’

उस की बात पर यासमीन बुरी तरह से चौंकी. चपरासी के हाथ से कागज ले कर उसे पढ़ा. फिर अजीम को खा जाने वाली नजरों से घूरते हुए बोली, ‘‘अजीम, यह तो तुम्हारे नाम है. तुम्हारे फादर का भी नाम लिखा है. इस का मतलब तुम ने मेरे साथ फ्रौड किया है.’’

‘‘प्लीज, अभी शांत रहो. मैं तुम्हें सारी बात समझा दूंगा.’’ कह कर उस ने रसीद पर दस्तखत किए और चपरासी को थमा दिया.

3 बजे मैं ने मकबूल हुसैन के घर फोन किया तो फोन यासमीन ने उठा कर तेज लहजे में ‘हैलो’ कहा. वह गुस्से में लग रही थी. शायद अजीम से जम कर लड़ाई हुई थी.

मैं ने बड़ी नरमी से कहा, ‘‘मैं ताहिरा का वकील अमजद बेग बोल रहा हूं.’’

‘‘मुझे न आप से कोई मतलब है न अजीम से.’’ उस ने कहा.

‘‘चपरासी ने बताया था कि अजीम आप के ही यहां है. अजीम चाहे तो मैं अपनी मुवक्विल से उस का समझौता करा सकता हूं,’’ मैं ने ताहिरा के बारे में विस्तार से बता कर कहा, ‘‘वह बहुत नेक औरत है. इतना सब होने के बाद भी वह समझौते के लिए तैयार है.’’

मैं ने अजीम बुखारी और यासमीन के निकाहनामे की नकल निकलवा ली. उसी दिन शाम के वक्त एक दुबलीपतली औरत मेरे औफिस में आई. उस की उम्र 30 साल के आसपास थी, बाल कटे हुए थे, गाल अंदर धंसे हुए थे, रंग गोरा था. आते ही उस ने पूछा, ‘‘आप ही मिर्जा अमजद बेग एडवोकेट हैं?’’

‘‘जी हां.’’ मैं ने कहा.

‘‘मैं यासमीन बुखारी, आप से अजीम बुखारी वाले मामले में बातचीत करने आई हूं.’’

मैं ने उसे बैठने का इशारा करते हुए कहा, ‘‘कहिए, आप क्या कहना चाहती हैं?’’

‘‘मुझे अजीम ने उस औरत के बारे में सब बता दिया है. मैं इस मामले को खत्म करना चाहती हूं,’’ उस ने बेरुखी से कहा, ‘‘आप कुछ रकम दिलवा कर उस से मेरे शौहर का पीछा छुड़वा दीजिए.’’

‘‘उस की कुल अदायगी 1 लाख 42 हजार की है, गहने अलग से.’’

‘‘1 लाख 42 हजार,’’ वह चौंकी, ‘‘गरीब लोग इसी तरह फैलते हैं.’’

‘‘गरीबों में यही तो खराबी है.’’ मैं ने कहा, ‘‘मिसेज यासमीन, आप तो कुछ दिनों में चली जाएंगी, फिर यह समझौता कैसे होगा? आप केस खत्म हुए बगैर पैसे देंगी नहीं? मुझे अपनी मुवक्किल से भी बात करनी होगी कि वह राजी है या नहीं?’’

‘‘मैं अभी नहीं जा रही हूं वकील साहब. उम्मीद है कि 40-50 हजार में मामला निपट जाएगा. अगर बात बन जाती है तो मुझे फोन कर दीजिएगा.’’

‘‘कोशिश करूंगा. आप के शौहर ने तो वकील कर ही लिया होगा? आप अपने शौहर से जवाब दाखिल करा दीजिए. इस से हमारी पोजीशन साउंड हो जाएगी.’’ मैं ने सलाह दी.

‘‘उस ने किसी वकील से बात तो की है. मैं आप का यह संदेश उसे दे दूंगी.’’ कह कर वह बाहर निकल गई.

अजीम बुखारी ने अपने वकील से जवाब दाखिल करा दिया था. मेरे सामने पड़ने पर बोला, ‘‘बेग साहब, आप तो बड़े छिपे रुस्तम निकले. लेकिन आप ने जो चाल चली, वह मेरे लिए फायदेमंद रही. शादी की बात एक न एक दिन यासमीन को मालूम होनी ही थी, आप के जरिए मालूम होने से मेरे सिर से बोझ उतर गया.’’

मैं ने हंस कर कहा, ‘‘मैं हमेशा दूसरों का ही भला चाहता हूं.’’

‘‘लेकिन मेरी बेगम से आप ने मामला सुलटाने का जो वायदा किया था, उस का क्या हुआ?’’

‘‘अभी मेरी मुवक्किल से बात नहीं हुई है. लेकिन आप ने रकम काफी कम रखी है. इतने में बात बनना मुश्किल है.’’ मैं ने कहा.

अजीम मुझे एक किनारे ले जा कर बोला, ‘‘वकील साहब, आप बात कर लें. मैं 10-20 हजार रुपए और बढ़ा सकता हूं. लेकिन यह बात मेरी बेगम को मालूम नहीं होनी चाहिए. आप किसी तरह यह मामला जल्दी निपटवा दें. अगर मुझे अमेरिका जाने की जल्दी न होती तो मैं ताहिरा को एक पैसा न देता. केस भले ही बरसों चलता.’’

अजीम के जाने के बाद मैं ने उस के वकील से कहा, ‘‘आप का मुवक्किल मामला जल्द खत्म करवाना चाहता है. इसलिए आप एक हफ्ते की तारीख ले लें.’’

आगे की कहानी जानने के लिए पढ़ें Hindi Emotional Kahani का चौथा भाग…

भाभी की सुपारी का राज – भाग 2

पुलिस टीमों ने मनोज के संभावित जगहों पर होने की परिजनों से जानकारी ली. इस के बाद मनोज को उसी रात जयपुर से धर दबोचा और उसे पुलिस टीम थाने ले आई.

25 जून, 2023 को थाने में उस से सख्ती से पूछताछ की तो सुधा चौधरी हत्याकांड पर से परदा उठ गया. पुलिस ने 24 घंटे में ही मर्डर मिस्ट्री सौल्व कर ली. हत्या का आरोपी कोई और नहीं बल्कि सुधा का देवर मनोज ही निकला. उस ने ही 5 लाख रुपए में अपनी भाभी सुधा चौधरी की हत्या कराई थी. उस से पूछताछ के बाद सुधा चौधरी की हत्या की जो सनसनीखेज कहानी सामने आई, वह इस प्रकार है—

राजस्थान के भरतपुर जिले के अंतर्गत एक गांव बुढ़वारी खुर्द आता है. इसी गांव में पुष्पेंद्र सिंह चौधरी अपने परिवार रहता था. बचपन से ही मेहनती पुष्पेंद्र पढ़ाई के साथ खेलकूद में भी अव्वल था. सुबह जल्दी उठ कर दौड़भाग करने वाला पुष्पेंद्र सीआरपीएफ में भरती हो गया था.

घर परिवार में खुशियां मनाई गईं. पुष्पेंद्र की जब सरकारी नौकरी लगी तो आज से 18 साल पहले उस के योग्य लडक़ी की खोजबीन शुरू हुई. एक रिश्तेदार ने हाथरस (उत्तर प्रदेश) के सालाबाद निवासी बदनसिंह की बेटी सुधा के बारे में बता कर हिम्मत सिंह चौधरी से कहा, “चौधरी साहब, मेरी मानो तो पुष्पेंद्र के लिए सुधा जैसी गोरी और बला की खूबसूरत बीवी ले आओ. सुधा पढ़ीलिखी और सर्वगुण संपन्न है.”

“एक दिन आप साथ चल कर बता दें तो फिर देख कर रिश्ता पक्का करें.” हिम्मत सिंह ने कहा.

“शुभ काम में देरी नहीं करनी चाहिए. कल ही चलते हैं तैयार हो जाओ.”

“चलो ठीक है, कल चलते हैं.”

इस तरह सालाबाद (हाथरस) आ कर सुधा को देखा. गोरे रंग की तीखे नयननक्श वाली सुधा को पहली नजर में ही पुष्पेंद्र के लिए पसंद कर लिया गया. रिश्ता पक्का कर दिया गया. थोड़े दिन बाद शादी का मुहूर्त निकला. आज से 18 वर्ष पूर्व पुष्पेंद्र की सुधा से शादी हो गई.

एक साल बाद सुधा को बेटा हुआ, उस का नाम अनुराग रखा गया. अनुराग के जन्म के बाद सुधा उसे पालने पोसने में लग गई. पति ज्यादातर ड्यूटी पर रहते थे. बेटे की देखरेख में घर का काम समय पर नहीं होता तो सास उस से लडऩे लगती थी.

सुधा लाख सफाई देती कि वह अनुराग को नहलाधुला रही थी. मगर सास उस की एक भी न सुनती और कहती, “हम ने भी तो बच्चे पैदा किए थे, उन्हें संभालते हुए घर का सारा कामकाज करते थे. खेती का काम भी करती थी और पशु भी पालते थे.”

वगैरह वगैरह तमाम बातें बता कर यह जताती थी कि तुम कामचोर हो.

मां के बहकावे में उजाड़ी गृहस्थी

सासबहू की रोज किचकिच होने लगी. पुष्पेंद्र छुट्टी पर घर आता तो मां उस के कान भरती. पुष्पेंद्र मां का पक्ष लेता तो सुधा उस से लड़ पड़ती. पुष्पेंद्र भी लड़ पड़ता. अनुराग मात्र 2 साल का था तब यानी आज से 15 साल पहले रोजरोज के झगड़ों से आजिज आ कर सुधा अपने मायके जा बैठी.

पुष्पेंद्र को मां इस कदर भडक़ाती कि पुष्पेंद्र को सुधा फूटी आंख नहीं सुहाती थी. एक बार पतिपत्नी का रिश्ता खराब हुआ तो वह वक्त के साथ टूटता ही गया. सुधा काफी समय मायके में रही. फिर वह नदबई आ कर रहने लगी. उस ने भरतपुर में औक्सीजन गैस प्लांट पार्टनरशिप में लगा लिया. इस प्लांट से उसे अच्छी आय होती थी.

सुधा कासगंज रोड नदबई में अपने बेटे अनुराग के साथ रहती थी. वह सुबह भरतपुर गैस प्लांट जाती और शाम तक नदबई वापस लौट आती. सुधा एक तरह से अपने बेटे अनुराग के लिए जी रही थी. सुधा और पुष्पेंद्र ने तलाक नहीं लिया था. मगर वे अलगअलग पिछले 15 सालों से रह रहे थे.

पुष्पेंद्र ने एक तरह से सुधा को शादी के 2 साल बाद ही छोड़ दिया था. दोनों के बीच तलाक नहीं हुआ था. इस के बावजूद पुष्पेंद्र ने 3 साल पहले बेरू का नंगला, मथुरा (उत्तर प्रदेश) निवासी सुशीला के साथ दूसरी शादी कर ली. हालांकि कोर्ट से तलाक हुए बिना यह शादी गैरकानूनी थी.

सुशीला से भी एक बेटा लाव्यांश हो गया था. सुधा को जब पुष्पेंद्र की सुशीला से दूसरी शादी एवं उस के बाद बेटा होने का पता चला तो वह जलभुन गई थी. सुधा चौधरी नदबई नगरपालिका के दिसंबर 2021 में हुए चुनावों में कांग्रेस के टिकट से वार्ड नंबर 21 की प्रत्याशी थी. मगर वह चुनाव हार गई थी.

चुनाव के बाद सुधा चर्चा में आ गई थी. सुधा चौधरी जाट महासभा की यूथ विंग की अध्यक्ष भी थी. वह राजनीतिक पार्टियों में पूरी तरह से एक्टिव रहती थी. उस के और पुष्पेंद्र के बीच कोर्ट में तलाक का मुकदमा चल रहा था, लेकिन तलाक हुआ नहीं था. पति से अलग होने के बाद से सुधा अपने मातापिता को हाथरस से नदबई ले आई थी. वह मातापिता और बेटे अनुराग के साथ नदबई में रहती थी.

पुलिस को जांच में पता चला था कि परिवार में विवाद है. 2 पत्नियों के बीच विवाद के 4 कारण थे. पुष्पेंद्र सिंह सीआरपीएफ में थे. उन की दुर्घटना में 27 जुलाई, 2022 को मृत्यु हो गई थी. इस के बाद फैमिली क्राइम के तानेबाने बुनने शुरू हो गए.

पुष्पेंद्र की मौत के बाद भिड़ गईं दोनों पत्नियां

पुष्पेंद्र सिंह की मौत के बाद अनुकंपा नियुक्ति के नियम के तहत बेटे को नौकरी दी जानी थी. ऐसे में सुधा चौधरी और सुशीला दोनों ही अपनेअपने बेटों को नौकरी दिलाना चाहती थीं. इस के अलावा दूसरा कारण पति की पेंशन भी थी.

पुष्पेंद्र की मौत के बाद सरकार की ओर से लाखों रुपए दिए जाने थे. इन पैसों के लिए भी सुधा और सुशीला के बीच में लड़ाई शुरू हो चुकी थी. साथ ही पुष्पेंद्र के नाम पर गांव में खेती की काफी जमीन है. इस को लेकर भी दोनों में विवाद था.

जांच में पुलिस को पता चला कि सुशीला ने आधार कार्ड से ले कर अपने सारे डाक्यूमेंट्स में नाम चेंज करवा लिया था. उस के खिलाफ नदबई थाने में सुधा चौधरी ने रिपोर्ट भी दर्ज करवा दी थी. सुशीला के बेटे लाब्यांश के पिता के नाम को ले कर भी मथुरा गेट थाने में सुधा ने रिपोर्ट दर्ज करवा दी थी.

मामले में सब से बड़ा सवाल यह था कि जब पुष्पेंद्र की दोनों पत्नियों के बीच विवाद था तो देवर मनोज ने भाई पुष्पेंद्र की पहली पत्नी सुधा की हत्या की सुपारी क्यों दी?

कहानी के अगले अंक में पढ़िए, मनोज ने क्यों अपनी ही भाभी की हत्या करवा दी?

मोहब्बत वाली गली – भाग 2

लगातार कई महीने तक खत आने से लिफाफे पर लिखा रहने वाला साफसुथरा पता मेरी आंखों में बस गया था. मैं मन ही मन सोचता था कि खत लिखने वाला भी अफरोज की तरह ही सुंदर होगा. फिर एक दिन अचानक एक अजीब घटना घटी.

उस दिन सुबह से ही बादल छाए थे. मैं डाक ले कर निकला तो फुहारें पड़ रही थीं. लेकिन ऐसा बिलकुल नहीं लग रहा था कि तेज बारिश होने लगेगी. मैं जल्दी से घर वापस लौटने का इरादा कर के उस्मानाबाद पहुंच गया. तब तक तेज बरसात होने लगी थी. पूरी तरह भीग जाने के बावजूद मैं सीधा उस के दरवाजे पर जा कर रुका.

डाक में उस दिन भी उस के नाम का लिफाफा था. मैं ने सोचा, मुझे भीगता देख कर वह अंदर आने के लिए कहेगी और अगर मौका मिला तो मैं उस के सामने अपना हालेदिल बयां कर दूंगा. मैं उस से कहूंगा कि मेरे जैसा प्यार करने वाला उसे कहीं नहीं मिलेगा. लेकिन जैसे ही मेरी साइकिल की घंटी बजने पर दरवाजे की चिक उठी, मेरे सारे अरमानों पर ओस पड़ गई.

चिक हटाने वाला एक बूढ़ा आदमी था. वह अफरोज का पिता भी हो सकता था, इसलिए मैं गुलाबी रंग का लिफाफा हाथ में दबाए सोच रहा था कि वह उसे दूं या न दूं. तभी उस के पिता के कंधों के ऊपर मुझे उस की काली आंखें दिखाई दीं, जिन्हें देख कर ऐसा लगा जैसे वह लिफाफा न देने की विनती कर रही हो. एक क्षण के लिए मेरी समझ में नहीं आया कि मैं क्या करूं, लेकिन मैं तुरंत ही संभल कर बोला, ‘‘चचा मियां, बारिश का बड़ा जोर है. क्या आप..?’’

‘‘हां..हां आओ, आओ बेटा.’’ बुजुर्ग ने मेरी बात पूरी होने से पहले ही बड़े प्यार से कहा और पीछे हट गया. वह बुजुर्ग अफरोज के पिता ही थे, मलिक साहब.

मैं अंदर चला गया. अंदर छोटा सा कमरा था, जिस में एक ओर चारपाई पर सफेद बिस्तर बिछा था और दूसरी ओर एक मेज के पास 2 कुर्सियां पड़ी थीं. मलिक साहब ने एक कुरसी मेरी ओर खिसका दी और दूसरी पर खुद बैठ गए.

‘‘बेटा अफरोज, अंगीठी जला कर ले आओ.’’ उन्होंने जोर से पुकारा. फिर मेरी ओर प्यार से देख कर बोले, ‘‘इस मौसम का भी कोई भरोसा नहीं, सुबह जब मैं दुकान पर गया था तो मौसम साफ था. फिर हलकीहलकी बूंदाबांदी होने लगी, लेकिन इस तरह अचानक तेज बारिश की उम्मीद नहीं थी.’’

इस के बाद वह इधरउधर की बातें करते रहे. इसी बीच अफरोज अंगीठी ले आई. बातोंबातों में जब उन्होंने कहा कि आजकल अच्छे लड़कों की कमी है तो मैं ने कहना चाहा कि मैं अच्छा लड़का हूं और आप का बोझ हलका करना चाहता हूं. लेकिन चाह कर भी मैं कुछ नहीं कह सका.

मलिक साहब बाप की हैसियत से अफरोज की बात कर रहे थे. उन्होंने बताया कि एक बेटी के अलावा उन की कोई औलाद नहीं है. कुछ समय पहले पत्नी की मौत हो गई थी. जमाना खराब है और बेटी अकेली, इसलिए उसे घर में ही रखते हैं. बाहर आनेजाने पर भी पाबंदी लगा रखी है.

मैं यह सोच कर दिल ही दिल में हंस रहा था कि वह अपनी बेटी के इश्क के बारे में कुछ नहीं जानते. साथ ही मन को तसल्ली भी दे रहा था कि उन की बेटी ने जिस का चुनाव किया होगा, वह मुझ से अच्छा ही होगा. मेरे मन ने चाहा कि मैं उन से कहूं कि चचा मियां, आप चिंता न करें. अफरोज ने आप का बोझ खुद ही हलका कर दिया है.

एक पल के लिए मन में खयाल भी आया कि मलिक साहब के सामने खुद को पेश कर दूं. लेकिन मैं ऐसा न कर सका. क्योंकि ऐसा करना एक तरह से जबरदस्ती होती. वह भी एक ऐसी लड़की के साथ, जो किसी से प्यार करती थी.

‘‘बेटा अफरोज, चाय बना ला.’’ मलिक साहब ने कहा तो वह किचन में चली  गई.

कुछ देर बाद वह चाय बना लाई. तभी मलिक साहब को खांसी उठी और वह थूकने के लिए बाहर चले गए. उसी वक्त मैं ने चुपके से गुलाबी लिफाफा उस के हाथ पर रख दिया. लिफाफा ले कर वह मेरी ओर देख कर मुसकराई और अंदर चली गई.

अधिकतर डाकियों की कईकई साल तक एक ही जगह ड्यूटी रहती थी, लेकिन शायद मैं नौकरी में नया था या अफरोज से रोज मिलना मेरे भाग्य में नहीं था. जो भी हो, जल्दी ही मेरी ड्यूटी उस्मानाबाद से बदल कर जौहराबाद में लगा दी गई.

अब साधारण डाक के अलावा मुझे रजिस्ट्री और मनीआर्डर बांटने का काम भी दे दिया गया था. वक्त के साथ सालों बीत गए. इस बीच मेरी शादी हो चुकी थी. जबतब ड्यूटी भी बदलती रहती थी. लेकिन मैं अफरोज को कभी नहीं भूल सका.

मैं अपनी पत्नी और 2 बच्चों के साथ रहते हुए कभीकभी सोचता था कि अगर अफरोज ने मुझ से प्यार किया होता तो हम दोनों कितने खुश होते. अब तो वह न जाने किस घर में बैठी राज कर रही होगी. पता नहीं कौन था वह, जिसे वह चाहती थी. मुझे उस की किस्मत से ईर्ष्या होती थी. क्योंकि वह न होता तो मैं अपने सपनों की उस रानी को जरूर पा लेता जो आज भी मेरे दिल में बसी हुई थी.

19 साल बाद की बात है. एक दिन उस्मानाबाद का पोस्टमैन बीमार हो गया तो अपने इलाके के अलावा मुझे उस्मानाबाद की डाक भी बांटने के लिए दे दी गई. उस्मानाबाद के नाम पर मुझे अफरोज की याद आ गई. मन उस से मिलने, उसे देखने को मचल उठा. इसलिए सब से पहले मैं ने उस्मानाबाद की डाक में गली नंबर 2 के 7वें मकान की डाक ढूंढने की कोशिश की, लेकिन मुझे उस पते का कोई खत नहीं मिला.

मुझे यह सोच कर खुद पर हंसी आ गई कि 19 साल बीत गए, पता नहीं अफरोज कहां होगी. कितने बच्चों की मां होगी और मैं आज भी उसे देखने, उस से मिलने की सोच रहा हूं. बहरहाल, पता नहीं क्याक्या सोचते हुए मैं उस्मानाबाद पहुंच गया.

मनहूस कदम : खाली न गयी मजलूम की आह – भाग 2

मेरी हमदर्दी का नतीजा यह निकला कि उस ने सच्चाई बयां कर दी, ‘‘सच पूछो तो मेरी मां, मेरी दूसरी शादी करना चाहती है. संयोग से ग्रीनकार्डधारी लड़की मुझे मिल भी गई है. वह खूबसूरत तो है ही, 12 सौ डौलर तनख्वाह पाती है. वहां मेरी फोटोग्राफी का धंधा भी खूब चलेगा.’’

‘‘बहुत नसीब वाले हो भाई. उस खूबसूरत लड़की का नाम क्या है?’’ मैं ने पूछा.

वह खुश होते हुए बोला, ‘‘उस का नाम यासमीन है. वह एक कारोबारी परिवार की बेटी है. उस के बाप का बाजार में बहुत बड़ा होटल है.’’

‘‘भई तुम्हें यह शानदार चांस कैसे मिल गया?’’

‘‘दरअसल, उस लड़की का तलाक हो चुका है. दूसरे उम्र की कुछ ज्यादा है, लेकिन ऐसे में यह सब कौन देखता है?’’

मैं ने खुशी जाहिर करते हुए कहा, ‘‘कब तक जाने का प्लान है?’’

‘‘डेढ़-2 महीने तो लग ही जाएंगे. बस लड़की की ओर से जवाब का इंतजार है.’’

मैं ने कहा, ‘‘मेरे नोटिस के बारे में तुम्हारा क्या इरादा है?’’

‘‘नोटिस के बारे में क्या सोचना, उस से घर थोड़े ही आबाद होते हैं.’’

‘‘अगर तुम दूसरी शादी करना चाहते हो तो ताहिरा के वाजिब हक दे कर उसे आजाद कर दो. सिर्फ 32 हजार मेहर के, 1 लाख दहेज वाले, 10 हजार मेंटीनेंस और गहने तो देने ही हैं,’’ मैं ने समझाया.

‘‘वकील साहब, यही तो मुश्किल है. इसी वजह से मैं उस मनहूस से जान नहीं छुड़ा सका. मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं, फिर भी कोशिश कर के जल्दी ही उस के पैसे दे दूंगा.’’

‘‘ऐसा करो, 25 हजार इस हफ्ते दे दो, बाकी पैसे एक महीने बाद दे देना.’’

‘‘जी…’’ उस ने घबरा कर चालाकी से कहा, ‘‘आप अपनी मुवक्किल से कहें कि कुछ इंतजार कर ले. मैं दुकान बेच कर… अरे कुछ भी बेच कर उस का पैसा अदा कर दूंगा.’’

मैं समझ गया कि यह ताहिरा को तलाक दे कर उस के ड्यूज नहीं देना चाहता. यह देश छोड़ कर भाग जाने के लिए मोहलत मांग रहा है. मैं ने कहा, ‘‘ठीक है, मैं तुम्हारी बीवी को 2 महीने टालने की कोशिश करूंगा, पर तुम इस नोटिस का जवाब तो लिख दो.’’

‘‘जवाब किस बात का? मैं आप को सौ रुपए दे रहा हूं. आप इस मामले को संभाल लीजिए.’’

मैं ने एक आंख दबा कर कहा, ‘‘मुझे अपने मुवक्किल को भी तो संतुष्ट करना होगा.’’

हिचकिचाते हुए उस ने कहा, ‘‘बताइए, क्या लिखूं?’’

‘‘हमें फर्ज अदायगी करनी है, इसलिए जो सच्चाई है, वही लिख दो. यह कोई फौजदारी केस तो है नहीं, मियांबीवी राजी तो क्या करेगा काजी?’’

उस ने कुछ अपने दिमाग से, कुछ मेरी सलाह ले कर जवाब लिखा, ‘‘ताहिरा मेरी बीवी जरूर है, मगर घर में रखने लायक नहीं है. शादी के पहले उस के घर वालों ने बताया था कि वह कुंवारी है. जबकि वह अपने पहले शौहर को खा चुकी है. उस की वजह से मेरा भी काफी नुकसान हुआ है. वह मनहूस है. यह मियांबीवी का मामला है, मैं बहुत जल्दी उस के हक अदा कर दूंगा. मैं इस तरह की नोटिसों से बिलकुल नहीं डरता.’’

उसे साथ ले कर मैं ओथ कमिश्नर के पास गया और उस के इस लिखित बयान की वेरीफिकेशन करवा दी. वह इस बात से थोड़ा परेशान हुआ, पर मैं ने कहा कि यह कार्यवाही का एक हिस्सा है, इस से कोई फर्क नहीं पड़ेंगा.

तीसरे दिन ताहिरा आई तो मैं ने उसे अजीम बुखारी के आने की बात बता कर जब उस से पहली शादी के बारे में पूछा तो उस ने कुछ और ही कहानी सुनाई. ताहिरा के बताए अनुसार, शादी से पहले ही उस के शौहर की कार दुर्घटना में मौत हो गई थी. उस ने तो उस का मुंह भी नहीं देखा था.

इस के बाद उस के अब्बा ने यह शादी की थी. उस की यह शादी भी मात्र 11 दिनों ही चल सकी. उस के ससुराल आते ही कुछ घटनाएं घट गईं तो उसे मनहूस करार दे कर घर से निकाल दिया गया. इसलिए वह चाहती थी कि अजीम बुखारी उसे स्वीकार कर ले. अगर उस ने उसे स्वीकार नहीं किया तो लोग उसे सचमुच मनहूस मान लेंगे.

मैं ने ताहिरा पर एक नजर डाल कर कहा, ‘‘बीबी, तुम उस आदमी को पूरी तरह खयाल से निकाल दो. अब वह किसी भी सूरत में तुम्हें अपने घर रखने वाला नहीं है.’’

‘‘बेग साहब, अगर ऐसा हुआ तो लोग मेरा जीना हराम कर देंगे. आप किसी तरह समझौता करा दें. मैं उस का हर जुर्म सह लूंगी.’’

‘‘बीबी, तुम किस दुनिया में हो? अजीम बुखारी ने एक ग्रीनकार्डधारी तलाकशुदा औरत ढूंढ ली है. वह उस के साथ शादी कर के अमेरिका जाने की फिराक में है.’’

मेरी बात सुन कर ताहिरा गुस्से में बोली, ‘‘यह आप को किस ने बताया?’’

‘‘उसी ने बताया है.’’

‘‘लेकिन वकील साहब, मेरी इजाजत के बगैर वह दूसरी शादी कैसे कर सकता है?’’

‘‘हां, कानून तो यही है. शायद उस ने लड़की वालों को अपनी पहली शादी के बारे में नहीं बताया है. वह चुपचाप शादी कर के अमेरिका चला जाना चाहता है. पर मैं ऐसा नहीं होने दूंगा. तुम अपना निकाहनामा और गहनों की रसीद मुझे दे दो. अगर 1 लाख रुपए का भी कोई सुबूत है तो वह भी दे जाओ.’’

‘‘1 लाख का तो कोई सुबूत नहीं है. शादी के तीसरे दिन वह रकम ले कर अजीम ने अपने एकाउंट में जमा कर दी थी.’’

‘‘तुम्हें वह एकाउंट नंबर मालूम है?’’

‘‘एकाउंट नंबर तो नहीं मालूम, पर बैंक की एक स्लिप मेरे पास है, जिसे अजीम ने दी थी.’’

ताहिरा ने एक मुड़ीमुड़ी बैंक स्लिप पर्स से निकाल कर दी तो मैं ने उसे फाइल में रख कर कहा, ‘‘ताहिरा बीवी, तुम किसी भी तरह अपने शौहर की सरगर्मियों पर नजर रखो.’’

‘‘ठीक है, मौसी से कह दूंगी, वह कोई न कोई इंतजाम कर लेंगी.’’

मैं ने उसे रुखसत करते हुए कहा, ‘‘इस से हमें उस की शादी के बारे में फौरन मालूम हो जाएगा.’’

2 दिनों बाद मैं ने अजीम बुखारी की मंगेतर के बाप के होटल में फोन किया. फोन लड़की के बाप मकबूल हुसैन ने ही उठाया. मैं ने बड़े अदब से कहा, ‘‘मकबूल साहब, मैं आजमी ज्वैलर्स से इब्राहीम बोल रहा हूं. मेरे पास एक साहब अजीम बुखारी आए हैं. उन्होंने हमारी दुकान से कुछ गहने खरीदे हैं. कैश कुछ कम पड़ गया है तो वह चैक दे रहे हैं. मैं ने चैक लेने से मना किया तो वह आप का रेफरेंस दे कर कह रहे हैं कि वह आप के होने वाले दामाद हैं. मैं आप को जानता हूं, इसलिए पूछ रहा हूं कि चैक लेने में कोई खतरा तो नहीं है?’’

‘‘खतरा तो कोई नहीं है, लेकिन उसे इतनी जल्दी क्यों पड़ी है? अभी तो शादी की तारीख भी तय नहीं हुई है.’’ उस ने नागवारी से कहा.

‘‘अरे मकबूल भाई, तारीख तय होने में कहां देर लगती है? गहने तो खरीदने ही पड़ेंगे. आप भी आइए.’’ मैं ने कहा.

‘‘इब्राहीम भाई, यह सारा काम मैं ने अपनी बेटी पर छोड़ रखा है. सब उसी की पसंद से होगा. 2 हफ्ते बाद वह अमेरिका से आएगी और शादी के फौरन बाद लौट जाएगी.’’ मकबूल हुसैन ने कहा.

मैं ने शुक्रिया कह कर फोन रख दिया. इस बातचीत से साफ हो गया कि अजीम बुखारी सच कह रहा था. लड़की सिर्फ शादी के लिए आ रही थी. मैं ने मेंटीनेंस और मेहर का केस तैयार कर लिया, मगर दाखिल नहीं किया.

आगे की कहानी जानने के लिए पढ़ें Hindi Emotional Story का तीसरा भाग…

भाभी की सुपारी का राज – भाग 1

24 जून, 2023 का दिन था. शाम के पौने 5 बजे का समय था. 36 वर्षीया सुधा चौधरी अपने 17 साल के बेटे अनुराग के साथ स्कूटी द्वारा नदबई बस स्टैंड से कासगंज रोड पर स्थित अपने घर की ओर आ रही थी. तभी रास्ते में बाइक सवार 2 बदमाश उस का पीछा करने लगे. उन दोनों ने ही मुंह पर कपड़ा बांध रखा था. उस समय स्कूटी उस का बेटा अनुराग चला रहा था.

उस की स्कूटी जब सरस्वती मैरिज होम के पास स्थित मंदिर के नजदीक पहुंची ही थी कि बाइक पर पीछा कर रहे युवकों में से पीछे बैठे युवक ने स्कूटी के बराबर पहुंचते ही सुधा चौधरी पर 2 गोलियां चलाईं. गोली लगते ही सुधा की चीख निकल गई. उस के शरीर से खून का फव्वारा फूट पड़ा. जब तक लोग माजरा समझते, बाइक सवार हमलावर फरार हो गए थे. दिनदहाड़े हुई इस वारदात के बाद इलाके में सनसनी फैल गई थी. सुधा चौधरी का बेटा अनुराग बालबाल बच गया था.

यह घटना राजस्थान के जिला भरतपुर के नदबई कस्बे में घटी थी. सुधा चौधरी के एक गोली कंधे से होती हुई हार्ट तक पहुंच गई थी, यही गोली मौत का कारण बनी थी. दूसरी गोली उन की कमर से नीचे लगी थी. गोलियां लगते ही सुधा चौधरी स्कूटी से गिर पड़ी थी.

स्कूटी रोक कर अनुराग लोगों की मदद से अपनी मम्मी को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र नदबई ले गया. डाक्टर ने सुधा चौधरी को मृत घोषित कर दिया था. अस्पताल द्वारा थाना नदबई को फोन पर घटना की इत्तिला दे दी गई.

दिनदहाड़े एक महिला को सरेराह गोलियों से भूनने की खबर मिलते ही नदबई थाना के एसएचओ श्रवण पाठक पुलिस टीम के साथ अस्पताल पहुंच गए थे. इस के बाद उन्होंने घटनास्थल पर पहुंच कर शुरुआती जांच शुरू कर दी. आसपास के दुकानदारों से भी उन्होंने वारदात के बारे में पूछताछ की.

पुलिस ने सुधा चौधरी के शव को कब्जे में ले कर मोर्चरी में रखवा दिया. मृतका का बेटा अनुराग सिसकसिसक कर रो रहा था. उसे श्रवण पाठक ने दिलासा दे कर चुप कराया और घटना के बारे में पूछताछ की. एसएचओ श्रवण पाठक ने शव मोर्चरी में रखवाने के बाद उच्चाधिकारियों को घटना की खबर दे दी.

अनुराग ने पुलिस को दी घटना की जानकारी

घटना की खबर पा कर मृतका के मायके से एवं नदबई में रहने वाले आसपड़ोस के लोग भी अस्पताल व घटनास्थल पर पहुंच गए थे. हर कोई हैरत में था कि सुधा चौधरी जैसी दयालु, समझदार एवं हर किसी के दुखसुख में शामिल रहने वाली महिला की हत्या किस व्यक्ति ने और क्यों कर डाली.

सवाल अपनी जगह थे, मगर सच यही था कि 15 वर्ष से सुधा अपने पति पुष्पेंद्र चौधरी से अलग रह रही थी. पुष्पेंद्र सिंह सीआरपीएफ में नौकरी करता था. पुष्पेंद्र ने करीब 3 साल पहले सुशीला चौधरी नामक युवती से दूसरी शादी कर ली थी. पुष्पेंद्र 27 जुलाई, 2022 को दुर्घटना में चल बसा था.

सुधा और पुष्पेंद्र का तलाक नहीं हुआ था. बगैर तलाक लिए पुष्पेंद्र ने सुशीला से शादी कर ली थी. वह शादी कानून के हिसाब से मान्य नहीं थी. पुलिस को जैसेजैसे जानकारी मिल रही थी, मामला पेचीदा लगने लगा था.

मृतका सुधा के बेटे अनुराग चौधरी (17 साल) ने पुलिस को अपने बयान में बताया, “मैं और मेरी मम्मी सुधा चौधरी (36 वर्ष) पिछले 15 सालों से कासगंज रोड नदबई में अपने पिता पुष्पेंद्र सिंह चौधरी से अलग रह रहे थे. मम्मी का पार्टनरशिप में भरतपुर में औक्सीजन गैस प्लांट है. मम्मी हमेशा की तरह 24 जून, 2023 की सुबह नदबई से भरतपुर गैस प्लांट पर गई थीं. दोपहर साढ़े 3 बजे भरतपुर से बस में बैठ कर वह नदबई आईं.

“उन्होंने बस में बैठने के बाद मुझे फोन कर के स्कूटी लाने को कहा था. वह स्कूटी ले कर नदबई बस स्टैंड पर पहुंच गया था. भरतपुर वाली बस से उतरीं और मेरे पीछे स्कूटी पर बैठ गईं. बाजार से मम्मी ने कुछ खरीदारी की और फिर दोनों स्कूटी से घर की तरफ रवाना हो गए.

“जब स्कूटी कासगंज रोड पर देवी मां के मंदिर के पास पहुंची, तभी बाइक सवार 2 बदमाश स्कूटी के समीप पहुंचे और पीछे बैठे व्यक्ति ने दोनों हाथों में लिए कट्टों से मम्मी पर 2 फायर झोंके और फरार हो गए.”

घटना की खबर मिलते ही सीओ (नदबई) नीतिराज सिंह भी घटनास्थल पर पहुंचे और घटना की जानकारी ली. घटनास्थल का मौका मुआयना किया. उन के निर्देश पर पुलिस ने आसपास के सीसीटीवी फुटेज खंगाले तो काले रंग की बाइक पर 2 व्यक्ति नजर आए. एसएचओ श्रवण पाठक ने सीसीटीवी फुटेज खंगालने के बाद संभावित स्थानों पर दबिश दी.

अनुराग ने अपने नाना बदन सिंह निवासी सालाबाद, हाथरस (उत्तर प्रदेश) के साथ 24 जून, 2023 को थाने पहुंच कर अपनी मम्मी की हत्या की रिपोर्ट दर्ज कराई.

चाचा के खिलाफ लगाई रिपोर्ट

अनुराग ने पुलिस को बताया था कि उस के चाचा मनोज चौधरी व सुशीला ने हत्या कराई है, क्योंकि पहले भी माधव के चचेरे भाई शिशुपाल के साथ मिल कर चाचा मनोज ने उन्हें मारने की धमकी दी थी. अनुराग ने आरोप लगाया कि मम्मी की हत्या में दादी रामदेई व बाबा के भाई गुटयारी उर्फ फत्ते का भी हाथ है.

अनुराग की तहरीर पर पुलिस ने हत्या का मामला दर्ज कर लिया. अनुराग व उस के नाना बदन सिंह द्वारा दी गई जानकारी के बाद पुलिस आरोपियों की खोजबीन करने लगी.

उधर 24 जून, 2023 की शाम को मैडिकल बोर्ड गठित कर सुधा चौधरी के शव का पोस्टमार्टम करा कर पुलिस ने शव परिजनों को सौंप दिया.

इस केस को सुलझाने के लिए भरतपुर के एसपी मृदुल कच्छावा के निर्देश पर विशेष पुलिस टीम का गठन किया गया. इस टीम में मनीषा लाडो (आरपीएस प्रोबेशनर), लखनपुर एसएचओ श्रवण पाठक एएसआई ओम प्रकाश, कांस्टेबल अमित, जयदेव, सुकेश मीना, थाना लखनपुर के एसएचओ, एसएचओ (कुम्हेर) गौरव कुमार, डीएसटी टीम के एएसआई बलदेव सिंह व बाबूलाल, हैडकांस्टेबल वीरेंद्र, सत्यवीर गिरधारी, जगदीश, अमर सिंह, कांस्टेबल लक्ष्मण सिंह आदि शामिल थे.

पुलिस टीम ने सर्वप्रथम सुधा चौधरी की ससुराल बुढ़वारी खुर्द जा कर ससुराल वालों से पूछताछ की. पता चला कि मनोज चौधरी गांव से फरार हो गया है. यह साफ संकेत था कि जरूर सुधा चौधरी हत्याकांड में मनोज का हाथ है. अगर वह निर्दोष था तो फरार क्यों हुआ था.

क्या सच में मनोज ने ही अपने भाभी की हत्या करवाई थी? या इस हत्या के पीछे कोई और था? जानने के लिए पढ़ें कहानी का अगला भाग.

मोहब्बत वाली गली – भाग 1

उन दिनों मेरी ड्यूटी मोहल्ला उस्मानाबाद में थी. छोटीछोटी तंग गलियों और गंदे जरजर मकानों से घिरा यह मोहल्ला उन शरीफ लोगों का था, जो अपनी इज्जत का भरम रखने के लिए दरवाजों पर टाट या कपड़े के परदे टांग दिया करते थे. इस से पहले मेरी ड्यूटी कई अच्छे इलाकों में रही थी, इसलिए इस इलाके में मेरी कोई खास रुचि नहीं थी. सच कहूं तो मेरा सारा दिन बोरियत भरा गुजरता था.

डाक विभाग में आए मुझे अधिक समय नहीं हुआ था. उम्र भी 19-20 साल से अधिक नहीं थी. चूंकि खुदा ने शक्लसूरत भी अच्छी दी थी, इसलिए कई लड़कियां मेरी ओर आकर्षित हो जाती थीं. उम्र के उस नाजुक दौर में कभीकभी मेरा झुकाव भी लड़कियों की ओर हो जाया करता था.

अब्बा डाक विभाग में क्लर्क थे. मैं ने मैट्रिक कर लिया तो उन्होंने मुझे अपने विभाग में क्लर्क बनवाने की कोशिश की, लेकिन वहां कोई जगह खाली नहीं थी, इसलिए उन्होंने मुझे पोस्टमैन बनवा दिया था. मैं ने कभी किसी ऊंची नौकरी का सपना नहीं देखा था. न ही पढ़नेलिखने के मामले में तेज था.

मैं जानता था कि अब्बा जैसी ही कोई नौकरी करनी पड़ेगी, इसलिए मैं डाकिए की नौकरी पा कर संतुष्ट था. शुरू शुरू में तो मुझे अपना काम बहुत अच्छा लगा. विभाग की ओर से मुझे साइकिल नहीं मिली थी, इसलिए मैं पैदल ही डाक बांटता था. डाक देते वक्त मेरा दरवाजे पर दस्तक देने का एक खास अंदाज था. साथ ही मुझे आवाज भी लगानी पड़ती थी, ‘पोस्टमैन’.

फिर मुझे साइकिल मिल गई, जिस की खास घंटी मेरे आने की सूचना होती थी. कभी मैं किसी के लिए खुशी का समाचार लाता और कभी दुख का. कुछ लोग मेरा इंतजार बड़ी बेचैनी से करते और कुछ लोग डाक लेते हुए भी कसमसाते.

पौश इलाकों में आमतौर से गेट के बाहर लेटरबौक्स लगा होता था, लेकिन मध्यमवर्गीय इलाकों के लोग दरवाजे पर आ कर डाक लेते थे. दोपहर के समय अकसर घर पर लड़कियां होती थीं, जो मुझे देख कर आपस में कानाफूसी करती थीं. कुछ तो मुझे देख कर फिकरे भी कसतीं. पहले तो मैं चुप रहा, लेकिन बाद में मैं एकाध को जवाब देने लगा था.

बाद में जब मेरी ड्यूटी मोहल्ला उस्मानाबाद में लगी तो मुझे बोरियत सी हुई. मेरी आदत थी कि साइकिल की घंटी बजाने के बाद दरवाजा खुलने का इंतजार किए बिना मैं खत को दरवाजे की झिर्री से अंदर फेंक देता था. इस की वजह यह थी कि कभी कोई दरवाजे पर आता भी तो वह गंदा सा बच्चा होता था या मैली कुचैली सी कोई औरत.

एक दिन मैं गली नंबर 2 से गुजर रहा था कि 7वें मकान के सामने एकदम ठिठक गया. साइकिल की चाल कम हो गई और मैं भूल गया कि मैं कोई आम युवक नहीं, बल्कि डाक विभाग का एक जिम्मेदार पोस्टमैन हूं. वह घर जिस के दरवाजे पर चिक पड़ी हुई थी, दूसरे घरों के मुकाबले में कुछ अच्छी हालत में थी. उस चिक से एक चांद जैसे चेहरे वाली लड़की झांक रही थी. मुझे आते देख कर उस का सुंदर गुलाबी चेहरा फूल की तरह खिल उठा.

मेरे होंठों पर भी हलकी सी मुसकराहट आ गई. मगर अगले ही क्षण यह सोच कर कि वह मेरा इंतजार क्यों करने लगी, मैं उदास हो गया. मेरा इंतजार भला कौन करता है, सब को अपनेअपने खतों का इंतजार रहता है. मैं ने सिर झुकाया और उस के दरवाजे के सामने से गुजर गया. वह भी अंदर चली गई. शायद दुखी हो कर, क्योंकि उस की डाक नहीं थी.

जाने क्यों वह लड़की मुझे अच्छी लगी. काले रेशमी बाल और गुलाबी चेहरे वाली वह लड़की जैसे मेरे सपने में दुलहन बन के उतर आई. शायद इसलिए कि अम्मी जब भी मेरी होने वाली पत्नी की बात करती थी तो मैं ऐसी ही लड़की की कल्पना करता था.

अब मैं रोजाना गली नंबर 2 से गुजरते हुए उस चिक वाले दरवाजे को जरूर देखता, मेरी साइकिल की घंटी सुन कर वह भी गली में झांकती. पलभर के लिए हम एकदूसरे को देखते और फिर मैं सिर झुकाए दरवाजे के सामने से गुजर जाता. वह भी अंदर चली जाती. उस के दरवाजे पर लगी सफेद नेमप्लेट पर मैं ने मलिक फजल लिखा देखा था.

मैं सोचता था कि कभी मलिक साहब का खत आए तो उस चिक वाली के ठीक से दर्शन हो जाएं, लेकिन ऐसा लगता था जैसे उन्हें कोई खत लिखता ही नहीं था. धीरेधीरे मुझे लगने लगा कि मेरे सपनों में बसने वाली वह लड़की वास्तव में मेरा इंतजार करती है. यह सोच कर मैं हवाओं में उड़ने लगता.

फिर अचानक एक दिन मुझे झटका सा लगा. दरअसल मैं डाकखाने से खत ले कर निकलते समय बिना वजह ही गली नंबर 2 के सातवें मकान का खत ढूंढा करता था. उस दिन मैं ने उस्मानाबाद की डाक देखी तो चौंका.

उस दिन की डाक में मकान नंबर 7 का एक खत था, लेकिन वह खत मलिक फजल के लिए नहीं अफरोज के नाम था. मैं समझ गया कि उस लड़की का नाम अफरोज है.

गुलाबी रंग का वह लिफाफा अफरोज के उस प्रेमी का रहा होगा, जिस के खत का वह इंतजार करती है. मैं ने सोचा, मैं भी कितना पागल हूं, वह इंतजार किसी और का करती थी और मैं समझ रहा था कि वह मेरा इंतजार करती है.

मैं ने लिफाफा उलटपलट कर देखा. उस पर कराची की ही मोहर थी. इस का मतलब था कि वह इसी शहर में कहीं रहता था. खत के कोने पर भेजने वाले का नाम वीए लिखा था. अगले दिन मैं डाक ले कर उस्मानाबाद गया तो वह दरवाजे पर खड़ी मेरा इंतजार कर रही थी. चिक से झांकती हुई उस की काली आंखों में इंतजार के जलते दीप साफ नजर आ रहे थे.

आज मेरी हार्दिक इच्छा पूरी होने जा रही थी, लेकिन दिल उदास था. जिसे मैं चाहता था, वह किसी और को चाहती थी. मैं ने उस के दरवाजे के सामने साइकिल रोकी और डाक के थैले से वह खत निकाल कर उस की ओर बढ़ा दिया. उसे खत देते हुए मेरी अंगुलियां कांप रही थीं और नजर उस के चेहरे पर थी. उस ने खत ले कर मुझे ऐसी निगाह से देखा, जैसे मैं ने जीवन का सब से बड़ा उपहार उसे दे दिया हो.

अगले दिन फिर वैसा ही खत अफरोज के नाम आया. उस ने उसी बेचैनी के साथ खत ले कर मुझे धन्यवाद दिया और मैं ने साइकिल आगे बढ़ा दी. अब हर दिन ऐसा होने लगा. मैं ने सोचा हो सकता है कि अफरोज और उस के प्रेमी ने आपसी सहमति से तय किया हो कि वे रोजाना एकदूसरे को खत लिखेंगे. जरूर वह भी रोज उसे इसी तरह एक खत भेजती होगी.

यह जानने के बाद भी कि वह किसी और को चाहती है, मेरे दिल में बनी उस की सूरत मिट नहीं सकी. अम्मा जब भी मेरी शादी की बात करती तो अफरोज की छवि मेरी आंखों में उतर आती. कभीकभी मेरा दिल चाहता कि मैं उस का खत खोल कर पढ़ लूं, लेकिन मैं चाह कर भी ऐसा नहीं कर सका, क्योंकि यह अपराध था. आने वाली डाक पहुंचाना मेरी सरकारी ड्यूटी थी. बिना इजाजत किसी का खत पढ़ने का मुझे कोई हक नहीं था.

मनहूस कदम : खाली न गयी मजलूम की आह – भाग 1

सुबहसुबह ही एक तीखे नैननक्श की खूबसूरत लड़की अपनी मौसी के साथ मेरे औफिस में आई. बैठने के साथ ही लड़की ने कहा, ‘‘वकील साहब, क्या कोई आदमी भी  मनहूस हो सकता है?’’

‘‘हां, क्यों नहीं हो सकता है.’’ जवाब में मैं ने कहा.

‘‘क्या उस की वजह से आसपास के लोग परेशानी में पड़ जाते हैं?’’

‘‘बीबी, तुम्हारा सवाल बड़ा पेचीदा है. एक बात बताओ, क्या अच्छाई आसपास रहने वालों के लिए खुशनसीबी ला सकती है?’’ मैं ने पूछा.

‘‘क्यों नहीं, अच्छाई तो सब के लिए अच्छी होती है.’’ लड़की ने जवाब दिया.

मैं ने उस के जवाब की सराहना की तो उस ने आगे कहा, ‘‘वकील साहब, मेरे शौहर ने अपनी मां के कहने पर मुझे घर से निकाल दिया है और अब तलाक देना चाहते हैं. मेरी सास का कहना है कि मैं मनहूस हूं. उन्होंने मेरे सारे गहने और नकद रकम भी रख ली है.’’

‘‘बीबी, पहले आप अपने बारे में तो बताइए.’’ मैं ने कहा.

‘‘मेरा नाम ताहिरा है,’’ फिर बगल में बैठी औरत की ओर इशारा कर के कहा, ‘‘और यह मेरी मौसी फिरदौसी हैं. यही मेरी सब कुछ हैं. अगर यह न होतीं तो शायद मैं किसी कब्रिस्तान में होती.’’

‘‘क्या तुम्हारे मातापिता और भाईबहन नहीं हैं?’’ मैं ने पूछा.

‘‘ऐसी बात नहीं है. मैं 4 भाइयों और पांच बहनों की एकलौती बहन हूं.’’ उस ने कहा.

‘‘यह कैसी पहेली है?’’ मैं ने हैरानी से पूछा.

‘‘यह मेरे लिए भी एक पहेली ही है वकील साहब. बात यह है कि मेरे अब्बा ने भी 2 शादियां कीं और अम्मी ने भी 2 शादियां कीं. दरअसल मेरे अब्बा एक हादसे की वजह से अपनी पहली बीवी से बिछुड़ गए थे. मिलने की उम्मीद नहीं दिखाई दी तो रिश्तेदारों के कहने पर उन्होंने दूसरी शादी कर ली.

‘‘उस शादी से मैं पैदा हो गई. इस के बाद अम्मीअब्बा में मनमुटाव हो गया और उसी बीच अब्बा को अपनी पहली बीवी का सुराग लग गया. उन्होंने मेरी अम्मी को तलाक दे कर पहली बीवी के साथ अपना घर आबाद कर लिया.

‘‘कुछ अरसे के बाद मेरी अम्मी ने भी दूसरी शादी कर ली. अब मेरे अब्बा को पहली बीवी से 2 बेटे और 3 बेटियां हैं. दूसरी ओर मेरी अम्मी को दूसरी शादी से 2 बेटे और 2 बेटियां हैं. इस तरह 2 हंसतेबसते घरों की मैं एक फालतू चीज हो गई.’’ ताहिरा ने आह भरते हुए कहा.

‘‘यह तो वाकई परेशानी वाली बात है. तुम्हारे शौहर ने तुम्हें तलाक की धमकी दी है या तलाक दे दिया है?’’ मैं ने नरमी से पूछा.

‘‘अभी तलाक इसलिए नहीं दिया है, क्योंकि तलाक के बाद हके मेहर देना होगा. वह मेहर की रकम देना नहीं चाहता.’’ ताहिरा की मौसी ने कहा.

मेरे पूछने पर ताहिरा ने बताया कि मेहर की रकम 32 हजार रुपए है. उस समय यह एक अच्छीखासी रकम थी.

‘‘शौहर का नाम क्या है?’’

‘‘अजीम बुखारी.’’ ताहिरा ने बताया.

‘‘तुम कह रही थी कि तुम्हारे कुछ गहने और पैसे भी उस के पास हैं?’’

‘‘मुझे नकद और गहने नहीं चाहिए. मैं अपने शौहर के साथ रहना चाहती हूं.’’

‘‘मैं कोशिश यही करूंगा. लेकिन मैं चाहता हूं कि तुम्हारी देनदारी सामने आ जाए. कुछ लोग पैसे के दबाव में सुलहसफाई कर लेते हैं.’’

‘‘मेरे गहनों की कीमत 1 लाख रुपए के आसपास होगी. इतनी ही रकम अब्बा ने उसे दहेज का सामान खरीदने के लिए दी थी. लेकिन उस ने कुछ खरीदा नहीं था.’’

‘‘शादी के कितने दिनों बाद तुम्हें मनहूस कहा गया?’’

‘‘11 दिनों बाद. फिर 21 दिनों बाद मां के कहने पर मेरे शौहर ने मुझे घर से निकाल दिया. अब इस बात को 7 महीने हो रहे हैं.’’

‘‘ऐसी क्या बात थी, जिस से सास तुम्हारे खिलाफ हो गई?’’

कुछ देर सोच कर ताहिरा ने कहा, ‘‘शादी के तीसरे दिन 80-82 साल की बीमार और कमजोर मेरे शौहर की नानी गुजर गई थीं. सातवें दिन मेरे देवर की मोटरसाइकिल खो गई. फिर 11वें दिन मेरी सास ने कहा कि यह सब मेरी वजह से हो रहा है. इस मनहूस को घर से बाहर निकालो.’’

पूरी कहानी सुन कर मैं ने अजीम बुखारी के नाम एक नोटिस भिजवा दी. नोटिस भेजने के सातवें दिन एक दुबलापतला नौजवान मेरे औफिस में आया. उस ने एक सफेद लिफाफा मेरी ओर बढ़ाया तो मैं ने उसे बिठा कर पूछा, ‘‘मसला क्या है?’’

‘‘वकील साहब,’’ उस ने कहा, ‘‘मैं इस तरह की धमकियों में आ कर उस चुड़ैल को दोबारा अपने घर में नहीं रख लूंगा. उस मनहूस की वजह से मैं अपना घर नहीं बरबाद कर सकता.’’

‘‘मैं भी उस मनहूस की वजह से तुम्हारा घर बरबाद नहीं कराना चाहता’ लेकिन शौहर होने के नाते तुम्हें उस के कानूनी हकूक तो पूरे करने ही पड़ेंगे,’’ मैं ने कहा.

‘‘उस मनहूस की वजह से मेरी नानी मर गईं, भाई की मोटरसाइकिल गायब हो गई. मां मरतेमरते बचीं.’’

वह कुछ और कहता, मैं ने बात बदलते हुए कहा, ‘‘तुम कहां तक पढ़े हो?’’

‘‘मैं ने साइंस से इंटर किया है. अब एक फिल्म लैब में नौकरी करता हूं. रात को अपनी दुकान पर बैठता हूं, दिन में भाई बैठता है.’’

‘‘आदमी तो तुम पढ़ेलिखे हो, फिर यह अंधविश्वास तुम्हारे अंदर कहां से आ गया?’’

‘‘यह अंधविश्वास नहीं है सर, हकीकत है. वह जहां कदम रखती है, मुसीबत आ जाती है. आप को पता है, वह 13 साल में ही बेवा हो गई थी.’’

‘‘इस में अजीब क्या है, न जाने कितनी औरतें बेवा हो जाती हैं.’’

‘‘अरे साहब, मनहूस औरत अपने शौहर को खा गई थी.’’

मैं ने हंस कर पूछा, ‘‘कच्चा या पक्का?’’

वह चिढ़ कर बोला, ‘‘मेरी बात को आप मजाक समझ रहे हैं. अरे इस के पैदा होने से पहले ही इस के बाप ने इस की मां को छोड़ दिया, क्योंकि उसे उस की पहली गुम हुई बीवी मिल गई. उस ने खुदा का शुक्र अदा किया और इस की मां को तलाक दे दिया.

‘‘कुछ अरसे बाद मां ने दूसरी शादी कर ली और यह लड़की दोनों घरों के लिए फालतू की चीज बन गई. इस की मां को लगा कि यह मनहूस है, इसलिए उस ने जल्दी से एक अच्छे घर में इस की शादी कर दी. इस ने वहां कदम रखा ही था कि दूल्हे की फूफू के बीमार होने की खबर आई.

‘‘दूल्हा कार से फूफू को देखने जा रहा था तो रास्ते में कार ऐक्सीडेंट में दूल्हे के साथ ड्राइवर भी मारा गया. फूफू ने भी अस्पताल में दम तोड़ दिया. अब आप ही बताइए, ऐसी खतरनाक औरत को मैं घर में कैसे रख सकता हूं?’’

मुझे यकीन हो गया कि यह ताहिरा को अपने घर में नहीं रखेगा, इसलिए मैं ने हमदर्दी दिखाते हुए कहा, ‘‘शुक्र करो तुम बच गए. अब आगे क्या इरादा है?’’

आगे की कहानी जानने के लिए पढ़ें Emotional Kahani in Hindi का अगला भाग…

साइको डैड : शक के फितूर में की बेटी की हत्या – भाग 3

यशपाल को कोई उपाय नहीं सूझा तो उस ने परमिंदर से छुटकारा पाने के लिए अदालत में तलाक का मुकदमा दायर कर दिया. तलाक के लिए उस ने पत्नी पर चरित्रहीनता का आरोप लगाया था, इसलिए उस ने अदालत में बच्चों का डीएनए टेस्ट कराने का भी मुकदमा दायर कर दिया था.

इन दोनों ही मामलों में तारीखों पर तारीखें पड़ रही थीं. इस से यशपाल को लगा कि पुलिस ही नहीं, जज भी उस की चरित्रहीन पत्नी की सहायता कर रहे हैं.

जबकि अदालत तलाक के मुकदमे को इसलिए लटकाए रहती है कि शायद पतिपत्नी में समझौता हो जाए. बहरहाल सन 2012 में अदालत ने परमिंदर कौर के पक्ष में फैसला सुना दिया. इस के बाद यशपाल ने पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में अपील दायर की, जहां से उस की अपील खारिज कर दी गई.

अदालतों की इस कार्यवाही से यशपाल इस तरह बौखला गया कि वह लोअर कोर्ट से ले कर हाईकोर्ट तक के जजों को धमकी भरे पत्र लिख कर भेजने लगा. इसी के साथ उस ने उन लोगों की एक सूची भी तैयार कर ली, जिन की वह हत्या करना चाहता था. उस की उस सूची में डीएसपी, एसपी, आईजी, डीआईजी, डीजीपी, लोअर कोर्ट के जज से ले कर हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के अलावा पत्नी, बच्चे, साला और कई बैंकों के मैनेजर भी थे. इस सूची में करीब 50 लोग थे.

यशपाल लगातार सभी को धमकी भरे पत्र भेजने लगा तो पटियाला के पुलिस अधीक्षक को हाईकोर्ट की ओर से आदेश मिला कि धमकी भरे पत्र भेजने वाले इस आदमी को हिरासत में ले कर पूछताछ की जाए कि वह ऐसा क्यों कर रहा है? उस की मैडिकल जांच भी कराई जाए.

हाईकोर्ट के आदेश पर पुलिस अधीक्षक ने कोतवाली प्रभारी जसविंदर सिंह टिवाणा को यशपाल को हिरासत में ले कर पूछताछ करने और उस का मैडिकल कराने का आदेश दिया. पुलिस पूछताछ में वह पत्नी की बेवफाई की बातें करता रहा.

इस के बाद उस का चैकअप कराया गया तो डा. बी.एस. सिद्धू के अनुसार वह डेल्यूजनल डिसौर्डर  का शिकार पाया गया. इस बीमारी का रोगी अपने दिमाग में कोई भ्रम पाल लेता है. फिर वह जैसा सोचता है, उसे वैसा ही दिखाई देता है.

पुलिस को इन बातों से क्या लेनादेना था. उस ने रिपोर्ट तैयार कर के मैडिकल रिपोर्ट सहित हाईकोर्ट भेज दी. पुलिस के चंगुल से छूटने के बाद यशपाल सिंह ने एक बार फिर पटियाला की सिविल कोर्ट में मैडम पवलीन कौर की अदालत में मुकदमा दायर कर दिया. इस मुकदमे में भी डीएनए टेस्ट की मांग की गई थी.

दूसरी ओर परमिंदर कौर ने भी सरदार हरपाल सिंह की अदालत में डोमेस्टिक वायलेंस का मुकदमा दायर कर दिया था. मुकदमेबाजी करते हुए यशपाल सिंह सब की हत्याओं की योजनाएं भी बना रहा था. वह लैपटौप पर हौलीवुड की फिल्में देखता और हत्याएं करने की तकनीकें खोजता रहता. बेटी हरमीत की हत्या के लिए उस ने इंटरनेट के माध्यम से एक दवा ढूंढ़ निकाली थी, जो धतूरे के बीजों से तैयार की जाती थी.

लेकिन तमाम कोशिश के बाद भी उसे वह दवा नहीं मिली. चाय की पत्ती से निकोटिन जैसा जहर बनाने का आइडिया भी उस ने इंटरनेट से ढूंढ़ निकाला. लेकिन इस में भी उसे सफलता नहीं मिली. 10 अक्तूबर, 2013 को मैडम पवलीन कौर के सुझाव पर यशपाल सिंह की बेटी हरमीत कौर उस के साथ रहने आ गई तो उस ने उस की हत्या की कोशिश और तेज कर दी. लेकिन वह उस की हत्या कुछ इस तरह से करना चाहता था कि उस पर किसी तरह की आंच न आए. इस के लिए वह इसी तरह की फिल्में देखने लगा.

22 फरवरी, 2014 की सुबह बैंक जाने के पहले रात भर पढ़ाई करने के बाद हरमीत कौर गहरी नींद सो रही थी, तभी मुर्गा काटने वाला छुरा ले कर यशपाल उस के कमरे में जा पहुंचा. हौलीवुड की फिल्म से लिए आइडिया के अनुसार उस ने हरमीत की गरदन की मुख्य नस एक ही झटके से काट दी. उसी बीच दर्द से तड़प कर हरमीत ने उसे पकड़ना चाहा तो उस के कुछ बाल उस की मुट्ठी में आ गए थे. दूसरी नस भी उस ने उसी तरह फुरती से काट दी थी. इस के बाद उस छुरे को गरदन में फंसा छोड़ कर वह कमरे में ताला बंद कर के बैंक चला गया.

दोपहर बाद बैंक से लौट कर कोतवाली गया, जहां कोतवाली प्रभारी जसविंदर सिंह टिवाणा को मनगढं़त कहानी सुना दी. लेकिन पुलिस ने घटनास्थल के निरीक्षण में ही ताड़ लिया था कि यह हत्या यशपाल के अलावा किसी और ने नहीं की है.

कोतवाली पुलिस ने यशपाल को सक्षम अदालत में पेश कर के सुबूत जुटाने के लिए 2 दिनों के पुलिस रिमांड पर लिया. रिमांड के दौरान यशपाल सिंह इंसपेक्टर जसविंदर सिंह टिवाणा से कहता रहा कि वह जितना चाहें पैसे ले लें, लेकिन उसे 2 दिनों के लिए छोड़ दें, ताकि वह अपने अन्य दुश्मनों को भी सबक सिखा सके. क्योंकि एक हत्या में भी उतनी ही सजा होगी, जितनी 5 हत्याओं में.

हरमीत कौर की हत्या की एक वजह यह भी थी कि वह 1 मार्च, 2014 को 18 वर्ष की हो रही थी. यशपाल उस पर यह दबाव डाल रहा था कि वह उस की बहन के पास कनाडा चली जाए. उस का सोचना था कि बालिग होने पर वह अपनी मरजी की मालिक हो जाएगी तो उसे छोड़ कर अपनी मां के पास जाएगी.

मां के साथ रहते हुए वह भी उसी की तरह चरित्रहीन हो जाएगी. जबकि हरमीत कौर चाहती थी कि किसी तरह मम्मीपापा में सुलह हो जाए तो पूरा परिवार एक साथ रह सके. उस की अच्छी सोच ने उसे मौत की नींद सुला दिया तो बाप की गंदी सोच ने उसे जेल पहुंचा दिया.

रिमांड अवधि समाप्त होने पर कोतवाली पुलिस ने यशपाल को एक बार फिर अदालत में पेश किया, जहां अदालत के आदेश पर उसे जिला जेल भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

पवित्र प्रेम : गींदोली और कुंवर जगमाल की प्रेम कहानी – भाग 3

इधर गींदोली के मन में प्रेम का झरना फूट रहा था, उधर जगमाल उस के ख्वाबों से अनजान थे. वह तो तीजनियों को महेवा लाने की तैयारी कर रहे थे. उन्होंने कहा, ‘‘प्रधानजी, कहीं हाथी खान हमारे साथ धोखा न कर जाए. हम शहजादी को तभी छोड़ेंगे, जब हमारी तीजनियां महेवा की धरती पर कदम रख देंगी.’’

अपने वादे के अनुसार हाथी खान तीजनियों को ले आया तो उसी मैदान में भौपजी शहजादी को ले गए. महमूद बेग ने तीजनियों को पहले छोड़ने का हुकुम दिया. तभी शहजादी जा कर अब्बा के कलेजे से लिपट गई. भौपजी सावधान था. तीजनियों को सुरक्षित घेरे में खेड़ रवाना किया ही था कि हाथी खान जगमाल के दल पर टूट पड़ा.

उस ने जासूस से जगमाल की ताकत का पता कर लिया था. पर यह उस की भूल थी. जगमाल के 3 तालियां बजाते ही तमाम ऐसे जवान वहां आ गए, जो कदकाठी और वेशभूषा में जगमाल की तरह थे. उन के वहां आते ही हाथी खान की सेना को पहचानना मुश्किल हो गया कि उन में जगमाल कौन है.

तभी हाथी खान की सेना में यह अफवाह फैल गई कि जगमाल को भूत सिद्धी हासिल है. तभी तो वहां पर उस के तमाम हमशक्ल आ गए हैं. डर की वजह से महमूद बेग और हाथी खान वहां से भाग खड़े हुए. अफरा तफरी में शहजादी गींदोली को भी वे अपने साथ नहीं ले जा सके.

उधर तीजनियों के सकुशल घर लौटने पर महेवा के घरों में दीपक जल उठे. इस के बाद ही जगमाल ने उजले कपड़े पहने. सिर पर केसरिया कसूंबल पाग बांधी. दाढ़ी बनाने के बाद अपने सांवले मुखड़े पर नोकदार मूंछें संवारते हुए वह अपने डेरे से निकले ही थे कि दासी ने आ कर जुहार की, ‘‘खम्मा घणी हुकुम, शहजादी गींदोली तो अपने डेरे में ही बैठी हैं?’’

‘‘क्या शहजादी अपने डेरे में है, ऐसा कैसे हो सकता है?’’ जगमाल चौंके.

‘‘हुजूर, आप खुद ही चल कर देख लीजिए.’’ दासी ने कहा.

जगमाल उसी समय गींदोली के डेरे पर  पहुंचे. सामने खड़ी शहजादी गींदोली मुसकरा रही थीं. वह जगमाल को एकटक देखती रहीं. जगमाल जड़वत हो गए. उन की नजरें धरती पर गड़ी थीं, वह खुद को संभाल कर बोले, ‘‘शहजादी गींदोली आप यहां?’’

‘‘हां कुंवर सा.’’ गींदोली पहली बार जगमाल से बिना परदे के बात कर रही थी, ‘‘मुझे महेवा छोड़ना अच्छा नहीं लगा कुंवरजी.’’

‘‘पर आप यहां कहां रहेंगी, कैसे रहेंगी, आप के अब्बा हुजूर परेशान होंगे? हम आप को अहमदाबाद पहुंचाने का प्रबंध करते हैं.’’

जगमाल एक ही सांस में इतना कुछ कह गया. पर गींदोली ने अहमदाबाद जाने से इंकार कर दिया. इस के बाद उस ने अपने मन की बात जगमाल को बता कर कहा कि अब वह उन के साथ ही रहेगी.

शहजादी की बात सुन कर जगमाल हतप्रभ रह गए कि यह क्या हो गया? उस ने ऐसा तो कभी नहीं सोचा था. उस के सामने एक तरह का धर्म संकट पैदा हो गया. उस ने गींदोली से अनुरोध किया, ‘‘शहजादी साहिबा, हमारी इज्जत उछाली जा रही है. आप मान जाएं और महेवा छोड़ दें.’’

मगर शहजादी अपने फैसले पर अटल थी. कुछ ही देर में पूरे महेवा में यह बात फैल गई कि शहजादी गींदोली जगमाल से प्यार करने लगी है और वह उन से शादी करना चाहती है, लेकिन कुंवर जगमाल जातिपांत के डर से उस से विवाह करने को तैयार नहीं हो रहे हैं. यह बात तीजनियों के कानों तक पहुंचीं. गींदोली ने उन की संकट के समय में देखभाल की थी, इसलिए उन्होंने गींदोली की सहायता करने का फैसला कर लिया.

उन्होंने जगमाल से अनुरोध किया कि वह शहजादी गींदोली के प्रस्ताव को स्वीकार कर लें. उन्होंने उन की भी बात नहीं मानी. तब तीजनियों ने तय कर लिया कि जब तक कुंवर गींदोली के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं करेंगे, वे घरों में चूल्हे नहीं जलाएंगी.

इस तरह तीजनियों ने अन्नपानी त्याग दिया. ऐसा करते हुए 3 दिन बीत गए.

तब महेवा के तमाम लोग कुंवर जगमाल के पिता रावल मल्लीनाथ के पास गए. उन्होंने उन से कुंवर जगमाल को समझाने का अनुरोध किया. रावल मल्लीनाथ ने जगमाल को समझाया. जगमाल को अपने पिता की बात मानने के लिए मजबूर होना पड़ा. आखिरकार गींदोली के प्रेम के आगे जगमाल की जातिपांत वाली सोच पराजित हो गई.

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पिता के कहने पर जगमाल गींदोली के डेरे पर पहुंचे. उन्होंने अपने कारिंदों को आदेश दिया कि शहजादी गींदोली की सवारी महल में पहुंचाई जाए. आदेश का पालन हुआ. महल में बड़ी धूमधाम से दोनों की शादी हुई. तीजनियों ने खूब गीत गाए.

आज भी राजस्थान में जगमाल और गींदोली के गीत गाए जाते हैं. गणगौर विसर्जित करने के दिन सारा राजस्थान गींदोली को याद करता है. तीजनियां आज भी गींदोली को याद करती हैं. गींदोली और जगमाल का प्रेम आज भी पाबासर के हंस प्रेमी हृदय में तैर रहा है.

साइको डैड : शक के फितूर में की बेटी की हत्या – भाग 2

जांच में यह साफ हो गया था कि वहां कोई बाहरी आदमी नहीं आ सकता था, क्योंकि सभी दरवाजे ज्यों के त्यों बंद पाए गए थे. यशपाल सिंह ने भी बताया था कि वह घर आया तो हरमीत का दरवाजा अंदर से बंद था. उसी ने दरवाजा खोला था.

बहरहाल, पुलिस को यशपाल पर ही संदेह हो गया था. लेकिन पुलिस ने उसे गिरफ्तार नहीं किया. उस के बारे में पता करते हुए उस पर नजर रखी जाने लगी.

पुलिस का संदेह तब और बढ़ गया, जब यशपाल सिंह ने बेटी का अंतिम संस्कार करने से मना कर दिया. जबकि उस के पास किसी चीज की कमी नहीं थी और हरमीत उसी के साथ रहते हुए मारी गई थी. पोस्टमार्टम के बाद हरमीत का अंतिम संस्कार उस की मां ने भाई परमजीत सिंह सिद्धू की मदद से किया था.

पूछताछ के दौरान पुलिस ने गौर किया था कि यशपाल से जब भी कोई सवाल पूछा जाता था, वह ठीक से जवाब देने के बजाय नजरें झुका कर बहस करने लगता था. ऐसी ही बातों से पुलिस को लगा कि हरमीत की हत्या किसी और ने नहीं, यशपाल सिंह ने ही की है तो उसे मनोवैज्ञानिक तरीके से घेरा गया.

फिर पुलिस द्वारा पूछे गए सवालों से वह इस तरह भावुक हुआ कि उस ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया. इस के बाद उस ने अपनी बेटी हरमीत कौर की हत्या की जो कहानी सुनाई, सुनने वाले दंग रह गए. सनक में एक बाप इस तरह भी दरिंदा हो सकता है, ऐसा उन्होंने पहली बार देखा था.

यशपाल सिंह शुरू से ही ऐसा नहीं था. कभी वह भी अपनी बीवीबच्चों से बहुत प्यार करता था. बीवी बैंक में मैनेजर थी तो वह खुद भी बैंक में ही असिस्टेंट मैनेजर था. सुंदर से 2 बच्चे थे, जो अच्छी शिक्षा ग्रहण कर रहे थे. रुपएपैसे, मानप्रतिष्ठा की भी कमी नहीं थी.

लगभग 7 साल पहले यशपाल ने एक फिल्म देखी, जो अवैध संबंधों पर बनी थी. पतिपत्नी अलगअलग कंपनियों में नौकरी करते थे. एक साथ काम करने पर न चाहते हुए भी महिलाओं को सहकर्मियों से शिष्टाचारवश घुलमिल कर रहना पड़ता है. ऐसे में फिल्म के हीरो को संदेह हो गया था कि उस की पत्नी का अपने सहकर्मी पुरुषों से अवैध संबंध है.

उस फिल्म ने यशपाल के दिलोदिमाग पर ऐसा असर छोड़ा कि उसे भी पत्नी पर संदेह होने लगा. वह खुद को फिल्म का हीरो और पत्नी को हीरोइन मान बैठा. फिर क्या था, हंसताखेलता, पत्नीबच्चों से प्यार करने वाला यशपाल उसी फिल्म के बारे में सोचसोच कर धीरेधीरे मानसिक रोगी हो गया. रातदिन वह परमिंदर कौर के बारे में ही सोचता रहता.

इस के बाद घर का माहौल बिगड़ने लगा. जहां खुशियां छाई रहती थीं, वहां रात दिन क्लेश रहने लगा. यशपाल को परमिंदर कौर चरित्रहीन लगने लगी तो बात मारपीट तक पहुंच गई. यशपाल को लगने लगा था कि दोनों बच्चे उस के नही, परमिंदर के किसी प्रेमी के हैं.

यशपाल सिंह के मन का वहम बढ़ता गया और एक दिन इसी बात को मुद्दा बना कर उस ने परमिंदर कौर को घर से निकाल दिया. पति ने घर से निकाल दिया तो वह अपने भाई परमजीत सिंह सिद्धू के घर रहने चली गई.  दोनों बच्चे भी उसी के साथ चले गए. परमजीत सिंह ग्रामीण बैंक मानसा ब्रांच के मैनेजर थे. यह 7 साल पहले की बात है.

पटियाला के रहने वाले सरदार कावर सिंह सिद्धू की 2 संतानें थीं, बेटा परमजीत सिंह सिद्धू और बेटी परमिंदर कौर. वह प्रशासनिक अधिकारी थे. 9 अप्रैल, 1993 को उन्होंने अपनी बेटी परमिंदर कौर का विवाह पटियाला के ही रहने वाले स्व. अमर सिंह के बेटे यशपाल सिंह के साथ किया था.

अमर सिंह की 4 संतानें थीं. 2 बेटे और 2 बेटियां. शादी के बाद दोनों बेटियों में से एक कनाडा चली गई थी तो दूसरी आस्ट्रेलिया. बड़े बेटे की मौत हो गई थी. यहां सिर्फ यशपाल रह गया था. जबकि उस के ज्यादातर रिश्तेदार विदेशों में रहते थे.

यशपाल और परमिंदर कौर सुखपूर्वक रह रहे थे. परमिंदर कौर बहुत ही साधारण, धार्मिक और संकोची स्वभाव की थीं. दोनों 2 बच्चों के मातापिता बन गए थे. बेटी हरमीत कौर इस समय आईआईटी की तैयारी कर रही थी, जबकि बेटा रिपुदमन सिंह मैट्रिक में पढ़ रहा था.

यशपाल सिंह ने परमिंदर को घर से निकाला तो वह अपने भाई परमजीत सिंह सिद्धू के घर रहने चली गई थी. इस से यशपाल का संदेह और बढ़ गया था. उसे लगा कि परमिंदर का चक्कर जरूर किसी से है, तभी वह अपने भाई के घर रहने चली गई है. दरअसल परमिंदर को घर से निकालने के बाद वह सनक में भूल गया था कि उसी ने उसे घर से निकाला था. चिढ़ कर उस ने अपने साले के खिलाफ थाने में तो शिकायत दर्ज कराई ही, अदालत में भी मुकदमा दायर कर दिया था.

जब उस की इन शिकायतों पर कोई काररवाई नहीं हुई तो नाराज हो कर उस ने पुलिस अधिकारियों, लोअर कोर्ट, सेशन कोर्ट के जजों को ही नहीं, पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को भी अंजाम भुगतने के धमकी भरे पत्र लिखने शुरू कर दिए थे.

उसी बीच गुस्सा शांत होने पर परमिंदर कौर पति को समझाने की गरज से घर लौट आई थी. लेकिन यशपाल पत्नी, साले, पुलिस प्रशासन और न्यायालय से भड़का हुआ था, इसलिए वह इन सब को सबक सिखाना चाहता था. पत्नी वापस आ गई तो उस ने सोचा, पहले इसे ही खत्म कर देते हैं. इस के लिए कहीं से वह बम टाइमर ले आया और 4 गैस सिलेंडरों के साथ जोड़ कर टाइम सैट कर दिया. इस के बाद खुद बाजार चला गया. उस ने सोचा था कि विस्फोट होने पर मकान के साथ बीवीबच्चे भी उड़ जाएंगे. लेकिन संयोग से ऐसा कुछ नहीं हुआ.

विस्फोट क्यों नहीं हुआ, लौट कर यशपाल चैक करने लगा तो छेड़छाड़ में सिलेंडर में आग लग गई, जिस में वह झुलस गया. पड़ोसियों ने आ कर किसी तरह आग पर काबू पाया और उसे ले जा कर अस्पताल में भरती कराया. इस तरह पत्नी को ऊपर पहुंचाने के चक्कर में वह स्वयं अस्पताल पहुंच गया. अस्पताल से लौटने के बाद उस ने फिर से परमिंदर को ठिकाने लगाने की कोशिश शुरू कर दी. परमिंदर को जब पता चला कि यशपाल उसे मारने की कोशिश कर रहा है तो वह फिर से उसे छोड़ कर चली गई.