Gurugram crime : छुट्टी न मिलने पर जज की पत्नी और बेटे को मारी गोली

Gurugram crime : एडिशनल सेशन जज कृष्णकांत के सुरक्षाकर्मी महिपाल ने उन की पत्नी और युवा बेटे की सरेआम हत्या कर दी. महिपाल को जेल भी भेज दिया गया, लेकिन यह बात पूरी तरह साफ नहीं हो सकी कि महिपाल ने गोरीबारी क्यों…  

सी 13 अक्तूबर की बात है. साइबर सिटी गुड़गांव के सेक्टर-29 साउथ सिटी-2 स्थित आर्केडिया मार्केट में रोजाना की तरह सब कुछ सामान्य तरीके से चल रहा था. लेकिन दोपहर करीब साढे़ 3 बजे पूरा मार्केट गोलियों की आवाज से गूंज उठा. भारी भीड़भाड़ वाले इस बाजार में हरियाणा पुलिस के एक कांस्टेबल ने एक महिला और एक युवक पर ताबड़तोड़ फायरिंग कर दी थी. फायरिंग करते हुए कांस्टेबल बड़बड़ाते हुए गालियां दे रहा था. गोलियां लगने से दोनों ही सड़क पर गिर पड़े. उन के शरीर से बड़ी तेजी से खून बह रहा था. फायरिंग के बाद कांस्टेबल सफेद रंग की होंडा सिटी कार में बैठ कर पहले कुछ कदम आगे गया, फिर कार को पीछे लाया और सड़क पर लहूलुहान पड़े युवक को घसीट कर कार की पिछली सीट पर डालने की कोशिश करने लगा

लेकिन इस प्रयास में वह सफल नहीं हुआ तो दोनों को वहीं पड़ा छोड़ कर कार ले कर भाग गया. फिल्मी अंदाज में हुई इस घटना से पूरे मार्केट में सनसनी फैल गई. फायरिंग के दौरान वहां मौजूद लोग तमाशबीन की तरह खड़े रहे, कई लोग तो अपने मोबाइल से वीडियो बना रहे थे. किसी ने भी उस कांस्टेबल को रोकने या पकड़ने की हिम्मत नहीं दिखाई.  हमलावर के जाने के बाद लोग घायलों के नजदीक आए तो उन में से किसी ने उन्हें पहचान लिया. दोनों घायल गुड़गांव के एडिशनल सेशन जज कृष्णकांत की पत्नी रितु और बेटा ध्रुव थे. आननफानन में यह खबर पूरे बाजार में फैल गई कि जज साहब की बीवी और बेटे को दिनदहाड़े गोलियों से भून दिया गया. लोगों ने हिम्मत कर के घायल मांबेटे को औटो से नजदीक के पार्क अस्पताल पहुंचाया और पुलिस को सूचना दे दी. कुछ ही देर में पुलिस मौके पर पहुंच गई.

पुलिस ने जांचपड़ताल की तो पता चला, एडीजे की पत्नी और बेटे को गोली मारने वाला कांस्टेबल जज का गनर महिपाल यादव था. महिपाल करीब डेढ़ साल से एडीजे के गनमैन के रूप में तैनात था. वह जज साहब की सुरक्षा करने के साथ उन की निजी कार भी चलाता था. उस दिन जज साहब की पत्नी रितु और बेटा ध्रुव अपनी निजी कार से शौपिंग करने आर्केडिया मार्केट आए थे. उन्हें कार से गनमैन महिपाल ही लाया था. मार्केट से शौपिंग कर रितु और ध्रुव जब अपनी कार के पास लौटे, तो उस ने अपनी सर्विस रिवौल्वर से रितु और ध्रुव पर गोलियां चलाईं.

पुलिस की एक टीम मौके पर जांचपड़ताल में जुट गई, जबकि दूसरी टीम पार्क अस्पताल पहुंची. इस बीच, एडीजे कृष्णकांत को भी घटना की सूचना मिल गई थी. वह भी अस्पताल पहुंच गए थे. कई पुलिस टीमें आरोपी सिपाही की तलाश में निकल गईं. प्राथमिक उपचार के बाद अस्पताल के डाक्टरों ने रितु और ध्रुव की गंभीर हालत देखते हुए उन्हें मेदांता अस्पताल रेफर कर दिया. मेदांता अस्पताल में डाक्टरों ने जांच की तो पता चला रितु के सीने में 2 गोलियां लगी थीं और ध्रुव की गरदन में 2 तथा सिर में एक गोली लगी थी. सूचना मिलने पर एडीजे कृष्णकांत के मिलने वालों का तांता लग गया. कई जज और वकीलों के अलावा आला पुलिस अधिकारी भी अस्पताल पहुंच गए.

सिपाही महिपाल को पकड़ने के लिए क्राइम ब्रांच सेक्टर-39 और 40 की टीमें लगी हुई थीं. साइबर टीम की सूचना के आधार पर दोनों टीमें इसलामपुर, सोहना रोड, गोल्फ कोर्स एक्सटेंशन रोड, फरीदाबाद रोड पर उस का पीछा कर रही थीं. उसी दौरान ग्वाल पहाड़ी के नजदीक रेडलाइट पर जाम होने से महिपाल की होंडा सिटी कार वहां फंस गई, जिस से वह पुलिस की पकड़ में गया. पुलिस ने वारदात के डेढ़दो घंटे अंदर ही उसे हिरासत में ले लिया. पुलिस थाने ला कर महिपाल से पूछताछ की गईपुलिस को बताया कि रितु और ध्रुव को गोलियां मार कर मौके से भागने के बाद उस ने एडीजे कृष्णकांत को मोबाइल पर फोन कर के यह बात बता दी थी कि मैं ने आप की पत्नी और बेटे को गोली मार दी है, उन्हें संभाल लेना. इस के बाद उस ने अपनी मां और एकदो अन्य रिश्तेदारों को भी फोन किए थे.

इधर पुलिस महिपाल से पूछताछ में जुटी थी, उधर 13 अक्तूबर की देर रात में एडीजे की 37 वर्षीय पत्नी रितु ने मृत्यु से संघर्ष करते हुए दम तोड़ दिया. अगले दिन रितु के शव का पोस्टमार्टम हुआ. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि रितु को करीब 2 फीट की दूरी से गोली मारी गई थीउन के सीने में 2 गोलियां लगी थीं. हालांकि डाक्टरों ने रितु के सीने से गोलियां निकाल दी थीं और जरूरी औपरेशन भी कर दिए थे, इस के बावजूद भी रितु को बचाया नहीं जा सका. रितु के सीने, कंधे और बाएं बाजू पर घूंसों की चोट के निशान भी मिले. मेदांता अस्पताल में गंभीर हालत में भरती एडीजे के बेटे ध्रुव को डाक्टरों ने ब्रेन डैड घोषित कर दिया. ध्रुव के सिर और दिमाग से गोली पार हो गई थी. अस्पताल में ध्रुव को लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर रखा गया था.

इस बीच, एडीजे कृष्णकांत की तरफ से गनमैन महिपाल के खिलाफ गुड़गांव के सेटर-50 थाने में रिपोर्ट दर्ज करा दी गई. मामला हाईप्रोफाइल था, इसलिए पुलिस अधिकारियों ने 14 अक्तूबर को इस की जांच एसआईटी को सौंप दीड्यूटी से परेशान था महिपाल डीसीपी (ईस्ट) सुनीता गजराज के नेतृत्व में 3 एसीपी और 4 इंसपेक्टरों को जांच टीम में शामिल किया गया. उसी दिन डीजी (क्राइम) पी.के. अग्रवाल और सीबीसीआईडी चीफ अनिल राव ने भी आरोपी गनमैन से पूछताछ की, लेकिन ऐसी कोई बात सामने नहीं आई, जिस से वारदात की ठोस वजह का पता चलता.

पुलिस द्वारा की गई पूछताछ में महिपाल ने आरोप लगाया कि पर्सनल सिक्यूरिटी गार्ड होने के बावजूद उस से घर के काम कराए जाते थे, जिस से वह नाराज था. इस के अलावा घटना से एक सप्ताह पहले छोटी बेटी के बीमार होने पर उस ने  छुट्टी मांगी थी, लेकिन उन्होंने उसे छुट्टी नहीं दी. इस से भी वह काफी गुस्से में थापूछताछ में यह बात भी सामने आई कि घटना वाले दिन सुबह एडीजे साहब के बेटे ध्रुव से महिपाल की किसी बात पर बहस हो गई थी. बहस के दौरान ध्रुव ने उसे कुछ बुराभला कह दिया था, जिस से महिपाल तिलमिला उठा था.

प्रारंभिक पूछताछ के बाद पुलिस ने गिरफ्तार गनमैन महिपाल यादव को गुड़गांव की ड्यूटी मजिस्ट्रैट प्रियंका जैन के समक्ष पेश किया. मजिस्ट्रैट ने आरोपी गनमैन को 4 दिन के पुलिस रिमांड पर भेज दिया. हरियाणा सरकार ने आरोपी गनमैन कांस्टेबल महिपाल यादव को घटना के दूसरे ही दिन नौकरी से बर्खास्त कर दिया. पुलिस ने गनमैन महिपाल के रहनसहन और चालचलन के बारे में जांचपड़ताल की. पता चला वह हरियाणा के महेंद्रगढ़ जिले में नांगल चौधरी इलाके के गांव भुनगारका का रहने वाला है. गुड़गांव में वह पुलिस लाइन के टावर डी में मकान नंबर 601 में रह रहा था. इस मकान में महिपाल के साथ उस की मां, पत्नी और 2 बच्चे भी रहते थे.

पुलिस ने महिपाल का मोबाइल जब्त कर उस की काल डिटेल्स निकलवाई, जिस से उस की गतिविधियों के बारे में पता चल सके. महिपाल के फेसबुक अकाउंट की भी जांच की गई. उस ने पिछले साल अक्तूबर में फेसबुक अकाउंट बनाया था. फेसबुक प्रोफाइल के अनुसार महिपाल सन 2007 में हरियाणा पुलिस में भरती हुआ थावारदात से कुछ समय पहले महिपाल ने फेसबुक पर एक मैसेज पोस्ट किया था, जिस में उस ने लिखा था कि शरीर को चंगा रखो, दिमाग को ठंडा रखो, जेब को गरम रखो, आंखों में शर्म रखो, जुबान को नरम रखो और दिल में रहम रखो. इसी में आगे लिखा था कि क्रोध पर लगाम रखो, व्यवहार को साफ रखो, होंठों पर मुसकराहट रखो, फिर स्वर्ग में जाने की क्या जरूरत है, यहीं स्वर्ग है.

पड़ोसियों से पूछताछ में पुलिस को पता चला कि महिपाल पहले शांत स्वभाव का था, लेकिन कुछ महीनों से उस के व्यवहार में काफी बदलाव दिखाई दे रहा था. इन दिनों वह काफी चिड़चिड़ा हो गया था और अजीब व्यवहार करने लगा था. इस वजह से आए दिन उस का अपनी पत्नी से भी झगड़ा होता था. महिपाल की पत्नी हरियाणवी गीत लिखती है, पिछले दिनों उस की एक अलबम भी रिलीज हुई थी. एडीजे कृष्णकांत भी मूलरूप से हरियाणा के हिसार के रहने वाले हैं. उन की पत्नी रितु का शव 15 अक्तूबर को हिसार के प्रीति नगर स्थित उन के आवास पर पहुंचा तो माहौल गमगीन हो गया. रितु लुधियाना की रहने वाली थीं. उन के मायके वाले भी गए थे. उसी दिन हिसार के श्मशान घाट पर रितु का अंतिम संस्कार कर दिया गया.

अंतिम संस्कार के समय हिसार से सांसद दुष्यंत चौटाला, विधायक डा. कमल गुप्ता, जिला एवं सत्र न्यायाधीश प्रमोद गोयल, हिसार एवं गुड़गांव सहित हाईकोर्ट के कई न्यायिक अधिकारी और वकीलों के अलावा पुलिस एवं प्रशासन के अधिकारी और गणमान्य लोग मौजूद थे. इस मौके पर हिसार जिला बार एसोसिएशन ने आपात बैठक कर इस केस का ट्रायल फास्ट ट्रेक कोर्ट में करने और 6 माह में सुनवाई पूरी कर हत्यारोपी गनमैन को फांसी की सजा देने की मांग की. साथ ही एसोसिएशन ने न्यायाधीशों और अधिकारियों की सुरक्षा में तैनात जवानों की काउंसिलिंग के साथ नियमित हेल्थ और मेंटली चेकअप कराए जाने की भी मांग की.

इस वारदात के बाद चंडीगढ़ में हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस कृष्ण मुरारी ने पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ के पुलिस एवं प्रशासनिक अधिकारियों की उच्चस्तरीय  बैठक कर गुड़गांव की घटना से पैदा हुए हालात की समीक्षा की. उन्होंने जजों की सुरक्षा में तैनात सुरक्षाकर्मियों की सघन स्क्रीनिंग करने को कहा. साथ ही ऐसे पुलिसकर्मियों से संवेदनशीलता से दोस्ताना व्यवहार करने के निर्देश दिए, जो किसी कारण से डिप्रेशन में रहते हैं. खबरों का बाजार भी रहा गर्म इधर, गुड़गांव पुलिस ने वारदात के कारणों का पता लगाने के लिए गनमैन महिपाल की मां और ममेरे भाई से भी पूछताछ की. क्योंकि महिपाल ने वारदात के बाद अपनी मां और ममेरे भाई को फोन किया था. इन दोनों से पूछताछ के बाद ऐसी कोई बात पता नहीं चली, जिस से इस वारदात की वजह सामने आती.

महिपाल यादव जब पुलिस रिमांड पर था, तब सोशल मीडिया पर तरहतरह की खबरें फैलनी शुरू हो गईं. इन में दावा किया गया कि गनमैन का बेटा बीमार था, जिस की वजह से वह उन से लगातार छुट्टी मांग रहा था. लेकिन उसे छुट्टी नहीं मिल रही थी. इसी गुस्से परेशानी में उस ने जज की पत्नी और बेटे को गोली मारी. पुलिस अधिकारियों ने सोशल मीडिया पर फैल रही इन खबरों को अफवाह बताया. साइबर सेल ने भी इस तरह की अफवाह फैलाने वालों पर नजर रखनी शुरू कर दी.

पुलिस ने वारदात के संबंध में चश्मदीदों से पूछताछ की और सीसीटीवी फुटेज देखे. सीसीटीवी फुटेज के मुताबिक रितु और ध्रुव को ले कर गनमैन महिपाल उस दिन दोपहर 3 बज कर 2 मिनट पर आर्केडिया मार्केट पहुंचा. कार से उतर कर रितु ध्रुव शौपिंग करने चले गए. महिपाल कार खड़ी कर के आसपास टहलने लगा. करीब 18 मिनट बाद खरीदारी कर जब मांबेटे वापस लौट कर आए तो गनमैन महिपाल ने रितु के लिए कार का पीछे का दरवाजा खोला. रितु ने पहले कार में सीनरी रखी. इस के बाद वह खुद बैठीं. बेटा ध्रुव आगे की सीट पर बैठ गया. उस वक्त तक महिपाल ध्रुव की सीट की तरफ ही था. इस के बाद महिपाल ने रिवौल्वर निकाली और ध्रुव को कार से बाहर खींच कर गोलियां मार दीं

अचानक हुए इस हमले से घबरा कर रितु कार से बाहर निकलीं तो महिपाल ने उन्हें भी गोलियां मार दीं. इस के बाद महिपाल कार में बैठा और उसे 5-7 फुट आगे ले गया. फिर कार को पीछे लाया और सड़क पर लहूलुहान पड़े ध्रुव को उठा कर कार की पिछली सीट पर डालने की कोशिश करने लगा, इस में नाकाम रहने पर वह कार ले कर चला गया. घटना के चौथे दिन 16 अक्तूबर को भी वारदात की वजह साफ नहीं हो सकी. पुलिस के खामोश रहने से लोग तरहतरह के कयास लगाते रहे. इस बीच, आरोपी गनमैन महिपाल के मामा धनसिंह ने महिपाल के शोषण का आरोप लगाते हुए मामले की निश्पक्ष जांच की मांग की.

दूसरी ओर, अस्पताल में भरती ध्रुव की हालत स्थिर बनी हुई थी. डाक्टरों ने एडीजे साहब को बताया कि ध्रुव ब्रेन डैड है, लेकिन उस के शरीर में हलचल है. अगर ब्रेन में कुछ सुधार हो जाए तो ध्रुव के बचने की उम्मीद की जा सकती है. 17 अक्तूबर को एसआईटी प्रमुख आईपीएस अधिकारी सुलोचना गजराज और डीसीपी (क्राइम) सुमित कुमार ने प्रैस कौन्फ्रैंस कर दावा किया कि जज के बेटे से बहस होने पर गनमैन महिपाल ने गोली चलाई थीउन्होंने कहा कि 13 अक्तूबर को रितु और ध्रुव जब मार्केट से शौपिंग कर कार के पास लौटे तो उन्हें गनमैन महिपाल वहां नहीं मिला. कुछ देर ढूंढने के बाद महिपाल जब वहां आया तो ध्रुव से उस की कहासुनी हो गई. इस पर ध्रुव ने महिपाल से कार की चाबी मांगी.

महिपाल को ध्रुव की यह बात अच्छी नहीं लगी और तैश में कर उस ने ध्रुव पर सरकारी रिवौल्वर तान दी. बेटे पर रिवौल्वर तनी हुई देख कर रितु जब बीचबचाव करने के लिए आईं तो महिपाल ने दोनों को गोली मार दी. बाद में पुलिस ने महिपाल को ग्वाल पहाड़ी के पास पकड़ लियाउस से वह सरकारी रिवौल्वर भी बरामद कर ली गई, जिस से उस ने जज की पत्नी बेटे पर गोलियां चलाई थीं. पकड़े जाने पर महिपाल ने खुद को मानसिक रूप से परेशान बताने की बात कह कर पुलिस को वारदात की वजह के संबंध में तरहतरह की कहानियां बताईं.

अधिकारियों ने दावा किया कि महिपाल पुलिस की नौकरी करने के साथ दूसरे काम भी करता था. उस के परिचित की कुछ कैब ओला कंपनी में चलती हैं. कई बार महिपाल शिफ्ट पूरी करने के बाद बतौर ड्राइवर कैब चलाने जाता था. साथ ही वह किसी मल्टीलेवल कंपनी के साथ भी जुड़ा था. काम के दबाव की वजह से वह चिड़चिड़ा हो गया था और बहुत गुस्सा करता था. महिपाल ने सबूत मिटाने के लिए घटना के बाद ध्रुव को कार में डाल कर ले जाने की कोशिश भी की थी. पुलिस को बरगलाने की कोशिश महिपाल द्वारा रितु के लिए शैतान की मां और ध्रुव के लिए शैतान शब्द का प्रयोग करने के सवाल का पुलिस अधिकारियों ने कोई जवाब नहीं दिया था. घटना के पांचवें दिन मीडिया के सामने आए पुलिस अधिकारी पत्रकारों के सवालों के ठोस जवाब नहीं दे सके. वे केवल यही बात कहते रहे कि महिपाल ने क्षणिक आवेश में ऐसा कदम उठाया.

जबकि महिपाल के परिचितों ने जज की पत्नी बेटे पर उसे परेशान करने तथा बुरा बर्ताव करने के आरोप लगाए थे. सीसीटीवी फुटेज ओर घटना के बाद मीडिया में सामने आए चश्मदीदों के बयान भी पुलिस की बताई कहानी पर संदेह पैदा करने वाले रहे. रिमांड अवधि पूरी होने पर पुलिस ने आरोपी महिपाल यादव को 18 अक्तूबर को अदालत में पेश किया. ड्यूटी मजिस्ट्रैट प्रियंका जैन ने उसे भोंडसी जेल भेज दिया. इधर, मेदांता अस्पताल में भरती ध्रुव की हालत में सुधार नहीं हुआ. उसे वेंटिलेटर पर रखा हुआ था. ध्रुव की सांसें तो चल रही थीं लेकिन शरीर में कोई हलचल नहीं हो रही थी.

अंगदान से बचीं 3 जिंदगियां 10 दिन तक जिंदगी और मौत से संघर्ष करने के बाद 23 अक्तूबर को तड़के करीब 4 बजे ध्रुव की सांसें भी थम गईं. पत्नी के बाद बेटे की भी मौत हो जाने से एडीजे कृष्णकांत पर वज्रपात सा हुआ. संकट की इस घड़ी में उन्होंने बेटे के अंगदान करने का निर्णय लिया. उन की सहमति के बाद ध्रुव की 2 किडनियां और लिवर सर्जरी कर निकाल लिए गए. ध्रुव का ब्रेन डैड होने के बावजूद उस का लीवर किडनियां सहीसलामत थीं. ध्रुव के ये अंग 3 अलगअलग मरीजों को ट्रांसप्लांट किए गए. उन तीनों लोगों को नया जीवनदान मिला. ध्रुव भले ही दुनिया से चला गया, लेकिन वह 3 लोगों में जीवित रहेगा.

17 साल का ध्रुव गुड़गांव के सेक्टर-14 स्थित डीएवी स्कूल में 12वीं कक्षा में पढ़ता था. ध्रुव का छोटा भाई 10 साल का राघव भी इसी स्कूल में 5वीं कक्षा में पढ़ता था. 28 अक्तूबर को राघव का जन्मदिन था. यह विडंबना रही कि उस के जन्मदिन पर उसे बधाई देने के लिए तो मम्मी रहीं और ही भैया. मां और भाई की मौत के बाद राघव उदास और चुप रहता है. कृष्णकांत के परिवार में अब केवल छोटा बेटा राघव ही बचा है. ध्रुव का अंतिम संस्कार 24 अक्तूबर को हिसार में ऋषि नगर श्मशान घाट पर किया गया. ध्रुव की चिता को मुखाग्नि एडीजे के बड़े भाई सीए संजय आर्य ने दी

ध्रुव को श्रद्धांजलि देने के लिए हाईकोर्ट के न्यायाधीश महेश ग्रोवर, गुड़गांव के जिला एवं सत्र न्यायाधीश आर. के. सौंधी, हिसार के सेशन जज प्रमोद गोयल सहित कई जगहों के न्यायाधीश और बार एसोसिएशन के पदाधिकारी सदस्य वकील, नेता, पुलिस एवं प्रशासनिक अधिकारी और गणमान्य लोग पहुंचे थे. गुड़गांव की इस कहानी ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं. पुलिस की कहानी के अनुससार, महिपाल ने क्षणिक आवेश में कर जज की पत्नी और बेटे को गोली मारी थीबड़ा सवाल यह है कि क्या क्षणिक आवेश में कोई व्यक्ति ऐसा कर सकता है? यह माना जाए कि महिपाल के पास रिवौल्वर थी और गुस्सा निकालने के लिए वह हवाई फायर भी कर सकता था. क्षणिक आवेश में कोई आदमी किसी को नुकसान पहुंचा सकता है, लेकिन लक्ष्य बना कर हत्या करने जैसी बात गले नहीं उतरती. पुलिस की कहानी भी गले उतरने वाली नहीं है

पुलिस की कहानी और चश्मदीद सीसीटीवी फुटेज से पता चलता है कि जब रितु और ध्रुव शौपिंग कर के आए तब गनमैन महिपाल कार के पास ही मौजूद था. उस की ध्रुव से कहासुनी जरूर हुई थी. कहासुनी के पीछे जज के परिवार का महिपाल के प्रति व्यवहार भी हो सकता है. ऐसा पहले भी कई बार सामने आया है कि पुलिस और प्रशासन के अलावा न्यायिक सेवा के अधिकारियों और नेताओं की सुरक्षा में तैनात जवानों से उन की ड्यूटी के अलावा कई दूसरे काम भी लिए जाते हैं. कई बार उन्हें मांगने पर भी छुट्टी नहीं मिलती. इस से सुरक्षाकर्मी मानसिक रूप से परेशान हो जाते हैं.

महिपाल के मामले में भी ऐसा हो सकता है. क्योंकि उस के रिमांड पर रहने के दौरान सोशल मीडिया पर कई ऐसी बातें सामने आईं थीं. हालांकि एडीजे के परिजन ऐसे सभी आरोपों से इनकार करते हुए कह रहे हैं कि महिपाल से अगर उन का व्यवहार ठीक नहीं था, तो वह अपनी ड्यूटी हटवा सकता था. महिपाल ने रितु और ध्रुव को गोलियां क्यों मारीं, यह बात महिपाल ही जानता है लेकिन पुलिस इन कारणों की तह में नहीं जा सकती. जज की पत्नी और बेटे के खून से अपने हाथ रंगने वाले महिपाल की नौकरी चली गई. उस के परिवार के सामने भी अब कई तरह के संकट रहेंगे. महिपाल ने अपराध किया है तो कानून उसे सजा देगा, लेकिन जज साहब को किस बात की सजा मिली, यह सवाल ज्यों का त्यों बना रहेगा.

UP Crime : बहनोई के बड़े भाई ने ही छोटे भाई के साले की हत्या कराई

UP Crime : सीधीसादी खूबसूरत रश्मि का विवाह एक ऐसे आदमी से हो गया, जिसे इंसान से कम, शराब से ज्यादा प्यार था. उत्तर प्रदेश (UP Crime) के जिला गोरखपुर के थाना कैंट का सब से व्यवस्ततम है इलाका अग्रसेन चौराहा. फर्नीचर व्यवसायियों की सब से बड़ी मार्केट होने की वजह से यहां पूरे दिन भीड़ लगी रहती है. इस मार्केट की दुकानगीता फर्नीचरकाफी बड़ी और प्रतिष्ठित मानी जाती है. फर्नीचर व्यवसायी अभिषेक रंजन अग्रवाल की यह दुकान उन की पत्नी गीता के नाम पर है. दुकान के पीछे ही उन का मकान भी है.

18 जून, 2013 की रात साढ़े 8 बजे अभिषेक अग्रवाल ने दुकान के कर्मचारियों सनी प्रजापति और राजेंद्र साहनी से दुकान बढ़ाने को कह कर खुद दुकान से बाहर कर अपने परिचित रवि अग्रवाल के साथ खड़े हो कर बातें करने लगे. इसी बीच बैंक रोड की ओर से एक मोटरसाइकिल उन के करीब कर रुक गईउस पर 2 युवक सवार थे. वे कौन हैं, यह देखने के लिए जैसे ही अभिषेक पलटे, पीछे बैठे युवक ने रिवाल्वर निकाल कर उन पर 2 गोलियां दाग दीं. दोनों ही गोलियां उन के सिर में लगीं. गोलियां लगते ही अभिषेक जहां जमीन पर गिर गए, वहीं मोटरसाइकिल युवक भाग निकले. उन के हाथों में रिवाल्वर थे, इसलिए कोई भी उन्हें रोकने की हिम्मत नहीं कर सका.

अप्रत्याशित घटी इस घटना से जहां सभी हैरान थे, वहीं पूरी बाजार में हड़कंप सा मच गया था. दोनों नौकर पहले तो भाग कर घायल हो कर गिरे अभिषेक के पास आए. उन्हें तड़पता देख कर सनी जहां रवि अग्रवाल की मदद से उन्हें संभालने लगा, वहीं रवींद्र घर के अंदर की ओर घटना की सूचना देने के लिए भागा. घर के सदस्य सूचना पा कर बाहर आते, उस के पहले ही पड़ोस के दुकानदारों ने अभिषेक को एक रिक्शे पर बैठाया और पास के विंध्यवासिनीनगर स्थित स्टार नर्सिंगहोम के लिए रवाना हो गए. पीछेपीछे अभिषेक के घर वाले भी अस्पताल की ओर भागे. लेकिन अभिषेक को अस्पताल ले जाने का कोई फायदा नहीं हुआ. क्योंकि अस्पताल पहुंचने के पहले ही उस की मौत हो चुकी थी. डाक्टरों ने देखते ही उसे मृत घोषित कर दिया था. मौत की जानकारी होते ही घरवाले बिलखबिलख कर रोने लगे.

सूचना पा कर अभिषेक के तमाम परिचित भी अस्पताल पहुंच चुके थे. किसी ने घटना की सूचना फोन द्वारा पुलिस कंट्रोलरूम को दे दी थी, जहां से सूचना पा कर थाना कैंट के इंस्पेक्टर टी.पी. श्रीवास्तव सिपाहियों को साथ ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए थे. वहीं से उन्होंने इस घटना की सूचना अधिकारियों को दे कर खुद अस्पताल जा पहुंचे. इस के बाद वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक शलभ माथुर, पुलिस अधीक्षक (नगर) परेश पांडेय, क्षेत्राधिकारी (कैंट) वी.के. पांडेय, कोतवाली के इंसपेक्टर बृजेंद्र कुमार सिंह भी वहां पहुंच गए.

पुलिस ने लाश कब्जे में ले कर औपचारिक काररवाई निपटाने के बाद पोस्टमार्टम के लिए मेडिकल कालेज भिजवा दी. पुलिस ने घटनास्थल से 9 एमएम के 2 खोखे बरामद किए थे. सारी काररवाई निपटाने के बाद थाने लौट कर पुलिस ने मृतक अभिषेक के पिता अर्जुन कुमार अग्रवाल द्वारा दी गई तहरीर के आधार पर अभिषेक के बहनोई विवेक कुमार लाट, उस के मंझले भाई विनय कुमार लाट तथा 2 अज्ञात बदमाशों के खिलाफ अपराध संख्या 513/2013 पर भादंवि की धारा 302/120 बी/34 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया.

मुकदमा दर्ज होने के बाद थाना कैंट पुलिस ने उसी दिन विनय कुमार लाट को उस के घर से गिरफ्तार कर लिया. थाने ला कर उस से पूछताछ की गई. पहले तो वह पुलिस को बरगलाता रहा, लेकिन वह कोई पेशेवर अपराधी तो था नहीं, इसलिए पुलिस ने जब उस के साथ थोड़ी सख्ती की तो उसे टूटते देर नहीं लगी. उस ने स्वीकार कर लिया कि उसी ने सुपारी दे कर किराए के हत्यारों से अभिषेक की हत्या कराई थी. विनय द्वारा अपराध स्वीकार कर लेने और हत्यारों के नाम बता देने के बाद पुलिस ने उसे अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

इस मामले में नामजद दूसरा अभियुक्त विनय का भाई विवेक पहले से ही जेल में बंद था. पुलिस अन्य अभियुक्तों की तलाश में जुट गई. इस मामले में सोचने वाली बात यह थी कि आखिर बहनोई के बड़े भाई ने ही छोटे भाई के साले की हत्या क्यों कराई? अभिषेक का बहनोई जेल में क्यों बंद था? यह सब जानने के लिए हमें थोड़ा पीछे चलना होगा. गोरखपुर के थाना कैंट के रहने वाले 72 वर्षीय अर्जुन कुमार अग्रवाल ढुनमुनदास बालमुकुंददास इंटर कालेज से 30 जून, 2003 को रिटायर होने के बाद अपने एकलौते बेटे अभिषेक रंजन के साथ उस के व्यवसाय में हाथ बंटाने लगे थे. उन के परिवार में पत्नी के अलावा 4 बच्चों में 3 बेटियां रश्मि, शालिनी, दिवीता और एकलौता बेटा अभिषेक रंजन था. उन का यह बेटा तीसरे नंबर पर था.

अध्यापक होने की वजह से अर्जुन कुमार खुद तो संस्कारी थे ही, उन के चारों बच्चे भी उन्हीं की तरह संस्कारी थे. अर्जुन की बड़ी बेटी रश्मि सीधीसादी, बेहद सुशील थी. उस ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर (UP Crime) विश्वविद्यालय से संस्कृत से एमए करने के बाद नेट परीक्षा भी पास कर ली थी. अर्जुन कुमार अग्रवाल के सभी बच्चे इसी तरह पढ़ेलिखे थे. बायोलौजी से प्रथम श्रेणी में बीएससी करने के बाद अभिषेक रंजन अग्रवाल ने पढ़ाई छोड़ कर व्यवसाय की ओर कदम बढ़ाया था. अपने घर के आगे पड़ी जमीन में दुकान बनवा कर उस ने फर्नीचर और हार्डवेयर का काम शुरू कर दिया था. जल्दी ही उस का यह व्यवसाय चल निकला.

घर में हर तरह से खुशहाली थी. रश्मि शादी लायक हुई तो अर्जुन कुमार उस के लिए लड़का ढूंढ़ने लगे. एक दिन अर्जुन कुमार अग्रवाल की नजर स्थानीय अखबार के शहनाई कालम मेंवधु चाहिएमें छपे एक विज्ञापन पर पड़ी तो उन्हें लगा कि यहां बात बन सकती है. यह विज्ञापन रामस्वरूप लाट ने अपने बेटे के विवाह के लिए छपवाया था. उस  में फोन नंबर भी दिया था, इसलिए अर्जुन कुमार अग्रवाल ने तुरंत फोन कर के बात कर लीआखिर वहां बात बन गई. जल्दी गोदभराई कर के कुल 15 दिनों में अर्जुन कुमार ने अपनी बड़ी बेटी रश्मि का विवाह रामस्वरूप लाट के बेटे विवेक कुमार से कर दिया था. पहली और बड़ी बेटी का विवाह था, इसलिए अर्जुन कुमार ने अपनी हैसियत से कहीं ज्यादा इस शादी में खर्च किया था.

रामस्वरूप लाट ने यह विवाह इतनी जल्दी में कराया था कि अर्जुन कुमार को मौका ही नहीं मिला था कि वह लड़के या उस के घर वालों के बारे में ठीक से पता कर पाते. बाद में जो पता चला, उस के अनुसार गोरखपुर की कोतवाली के आर्यनगर के दक्षिणी हुमायूंपुर मोहल्ले के राज नर्सिंग होम के पास रहने वाले रामस्वरूप लाट ठेकेदारी करते थे. उन के परिवार में पत्नी के अलावा 4 बेटे, कमलेश कुमार लाट, विनय कुमार लाट, विवेक कुमार लाट, विकास कुमार लाट तथा 3 बेटियां, कमला, वंदना और एप्पुल थीं

कमलेश प्रौपर्टी डीलिंग का काम करता था. उस से छोटे विनय, विवेक और विकास विजय चौक स्थित फोटो विजन स्टूडियो को संभालते थे. रामस्वरूप लाट सुखी और संपन्न थे, इसलिए उन की समाज में एक हैसियत थी. रामस्वरूप की बड़ी बेटी कमला की शादी कोलकाता में हुई थी. बेटों में भी कमलेश और विनय की शादी हो चुकी थी. अब उन्हें 2 बेटों और 2 बेटियों की शादी करनी थी. उसी बीच उन का बड़ा बेटा कमलेश अपने परिवार के साथ कैंट स्थित हरिओमनगर कालोनी में रहने चला गया. बाद में उस ने अपने लिए लखनऊ में मकान बनवा लिया तो अपना वह मकान सब से छोटे भाई विकास को दे कर परिवार के साथ लखनऊ चला गया.

विकास उस में रहने लगा तो विनय ने कोतवाली के विष्णु मंदिर स्थित बशारतपुर मोहल्ले में अपने लिए मकान बनवा लिया. विवेक उस की दोनों, बहनें वंदना और एप्पुल तथा मांबाप आर्यनगर स्थित पुश्तैनी मकान में एक साथ रहते थे. रहते भले ही सभी भाई अलगअलग थे, लेकिन एकदूसरे से दिल से जुड़े थे. अभिषेक को जब भी मौका मिलता, बहन का हालचाल लेने उस के घर जाता रहता था. इस के अलावा विवेक का स्टूडियो अभिषेक के घर के नजदीक ही था, इसलिए सालेबहनोई की मुलाकात अकसर होती रहती थी. रश्मि जब भी मायके आती, खुश नजर आती. इसलिए मायके वालों को यही लगता था कि वह ससुराल में खुश है.

लेकिन रश्मि की यह खुशी ऊपरी तौर पर थी, जबकि अंदर से वह बहुत दुखी थी. इस की वजह थी पति का शराबी होना. इस में दुख देने वाली बात यह थी कि शराब का घूंट हलक के नीचे उतरते ही विवेक किसी को भी नहीं पहचानता था, वह उस की पत्नी की क्यों हो. उस स्थिति में अगर रश्मि कुछ कह देती तो विवेक उसे भद्दीभद्दी गालियां तो देता ही था, पिटाई करने में भी पीछे नहीं रहता थाइस की एक वजह यह भी थी कि विवेक की कल्पना के अनुरूप रश्मि खूबसूरत नहीं थी, इसलिए वह उसे पत्नी नहीं मानता था.पति के इस उपेक्षित व्यवहार को रश्मि ने अपना भाग्य मान लिया था और ससुराल में उस के साथ क्या होता है, मायके वालों से नहीं बताया

बात उन दिनों की है कि जब रश्मि को 7 माह का गर्भ था. नवरात्र चल रहे थे. विवेक स्टूडियो बंद कर के घर पहुंचा ही था कि उस की मां का फोन गया. मां उन दिनों लखनऊ में थी. विवेक ने फोन रिसीव किया तो मां ने बिना हालचाल पूछे ही कहा, ‘‘कैसे कहूं, समझ में नहीं रहा है. कहूंगी तो कहोगे कि मेरे पत्नी के पीछे हाथ धो कर पड़ी हूं.’’

‘‘कहो तो बात क्या है?’’ विवेक ने कहा.

‘‘तेरी पत्नी कह रही थी कि बहुओं को पीटना इस घर का रिवाज है. अब तुम्हीं बताओ, मैं ने कब किस के साथ मारपीट की है, जो मुझ पर इस तरह के आरोप लग रहे हैं. जब से सुना है, कलेजे में आग लगी है. पूछ तो अपनी लुगाई से, आखिर वह चाहती क्या है? मांबेटे के बीच दरार क्यों डाल रही है?’’

मां ने ये बातें जिस तरह कही थीं, सुनते ही विवेक की देह में आग लग गई. उस ने आव देखा ताव, रश्मि पर पिल पड़ा. उस के हाथ में जो भी आया वह उसी से उसे मारता रहा. उस समय उस ने यह भी नहीं सोचा कि रश्मि गर्भवती है. कहीं उल्टासीधा चोट लग गई तो क्या होगा. आखिर इस पिटाई से रश्मि की हालत बिगड़ गई. वह चलनेफिरने लायक नहीं रही. तब विवेक उसे रिक्शे पर बैठा कर ससुराल छोड़ आया. मांबाप और अभिषेक उस की हालत देख कर दंग रह गए. यह सब कैसे हुआ, सभी पूछते रह गए. लेकिन रश्मि ने बताया नहीं. उस ने झूठ बोल दिया कि पीरियड नजदीक होने की वजह से उसे कुछ तकलीफ हो गई है

जिस की वजह से इतनी रात को यहां गई. मांबाप ने उस की बातों पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया. इस की वजह यह थी कि उस के साथ यह सब जो हुआ था, उस के बारे में उन्होंने कभी सोचा ही नहीं था. उन्होंने उसे आराम करने के लिए कह दिया. विवेक उसे छोड़ कर उसी समय अपने घर लौट गया. पति ने इतना मारापीटा था, इस के बावजूद रश्मि ने इस बात को दिल से नहीं लिया. शायद यही वजह थी कि उस ने मायके वालों से सच्चाई छिपा ली थी. उसे यह भी पता था कि अगर भाई को सच्चाई का पता चल गया तो हंगामा हो जाएगा. इसलिए चुप रहने में ही सब की भलाई है.

यही सोच कर रश्मि ने इस बात को भुला दिया. 3 दिनों बाद विवेक ने फोन किया. माफी मांगते हुए उस ने कहा कि उसे अपने किए पर काफी पछतावा है. इतने में ही रश्मि का दिल पसीज गया और उस ने विवेक को माफ कर दिया. यही नहीं, उस के साथ वह ससुराल भी गई.

रश्मि के ससुराल आने के बाद 2-4 दिनों तक घर का माहौल ठीक रहा. उस के बाद फिर पहले जैसे ही हालात हो गए. छोटीछोटी बातों को ले कर तूफान खड़ा होने लगा. विवेक पहले की तरह फिर रश्मि के साथ बदसलूकी और मारपीट करने लगा. जबकि उसे मना कर लाते समय उस ने वादा किया था कि अब वह उस के साथ बदसलूकी करेगा मारपीट. लेकिन घर आते ही वह अपना वादा भूल गया. धीरेधीरे रोज की यही नियति बन गई. समय पर रश्मि ने बेटी को जन्म दिया, जिस का नाम श्रद्धा रखा गया. विवेक बेटी को पा कर निहाल था. उस की एप्पुल बुआ उस पर जान छिड़कती थी. वैसे तो सब कुछ ठीक रहता था, लेकिन विवेक की मां के आते ही घर का माहौल खराब हो जाता.

वह उलटासीधा पढ़ाती तो मां के प्रेम में अंधा विवेक वही करता, जो मां उसे करने को कहती. जब तक वह घर में नहीं रहती, घर में सुखचैन रहता. वैसे वह ज्यादातर बड़े बेटेबहू के साथ लखनऊ में रहती थी. श्रद्धा 2-3 महीने की थी, तभी एक दिन विवेक की बहन वंदना ने विवेक और रश्मि को अपने घर खाने पर बुलाया. बेटी को साथ ले कर रश्मि पति के साथ ननद के यहां पहुंची. हंसीठिठोली के बीच विवेक बातबात में रश्मि को जलील करने लगा. रश्मि वहां तो कुछ नहीं बोली, लेकिन घर कर वह विवेक से जलील करने की वजह पूछने लगी. विवेक ने ठीक से जवाब नहीं दिया तो इसी बात पर दोनों में नोकझोंक हो गई. विवेक दूसरे कमरे में जा कर सो गया और रश्मि अपने कमरे में सुबह रश्मि ने विवेक से कुछ कहा तो रात की खुन्नस निकालने के लिए वह उस की पिटाई करने लगा.

पति की इस हरकत से क्षुब्ध हो कर उसी समय रश्मि बेटी को ले कर मायके गई. रश्मि के अकेली आने पर मांबाप को समझते देर नहीं लगी कि बेटीदामाद में ऐसा कुछ जरूर हुआ है, जिस की वजह से रश्मि को घर छोड़ कर अकेली आना पड़ा. जब उन्होंने ध्यान से देखा तो उस के जिस्म पर उभरे नीले निशान दामाद की दरिंदगी की कहानी कह रहे थे. पहली बार उन्हें अहसास हुआ कि उन्होंने बेटी को गलत हाथों में सौंप दिया है. आगे से ऐसा हो, इस के लिए अर्जुन कुमार ने बेटी का मेडिकल करवाया और उसे ले कर महिला थाने पहुंच गए. महिला थाने की थानाप्रभारी से रश्मि के साथ हुए अत्याचार के बारे में बता कर कानूनी काररवाई करने को कहा, ताकि भविष्य में बेटी के साथ कोई अनहोनी हो तो इस के लिए उस के दामाद विवेक को जिम्मेदार माना जाए.

रश्मि नहीं चाहती थी कि उस के पिता कोई ऐसा काम करें, जिस से ससुराल जाने पर उसे परेशानी हो. इसलिए थानाप्रभारी से उस ने कोई भी काररवाई करने से मना कर दिया. इस के बावजूद रश्मि के लिए परेशानी खड़ी हो गई. विवेक को पता चल ही गया था कि रश्मि पिता के साथ महिला थाने गई थी. इस बात से रश्मि के प्रति उस का व्यवहार और बदल गया. अब वह पहले से ज्यादा शराब पी कर आने लगा और रश्मि को परेशान करने लगा. इसी तरह 3 साल बीत गए. इन 3 सालों में रश्मि ने ससुराल में एक दिन भी सुख का अनुभव नहीं किया. कोई भी ऐसा दिन नहीं बीता, जिस दिन पतिपत्नी के बीच लड़ाईझगड़ा या मारपीट हुई हो. शारीरिक उत्पीड़न और प्रताड़ना उस की जिंदगी का हिस्सा बन गई थी. एक तरह से उस की जिंदगी नरक बन कर रह गई थी.

शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न सहतेसहते रश्मि पूरी तरह से टूट गई थी. जब उस की सहनशक्ति खत्म हो गई तो ससुराल में उस के साथ क्याक्या हुआ, उस ने एकएक बात मांबाप को बता दी. बेटी की दुखद कहानी सुन कर मांबाप के पैरों तले से जमीन खिसक गई. वे हैरानी से बेटी का मुंह ताकते रह गए कि इतना सब कुछ हो जाने के बाद भी उस ने उफ तक नहीं की. उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था कि नाजों से पलीबढ़ी बेटी ससुराल में दुख के अंगारों पर झुलस रही है. वह ऐसे गुनाह की सजा वह काट रही है, जिसे उस ने कभी किया ही नहीं है. बिना वजह रश्मि को परेशान किए जाने की बात से अर्जुन कुमार और अभिषेक बहुत दुखी हुए. अब उन के पास कानून का सहारा लेने के अलावा कोई दूसरा उपाय नहीं था. इसलिए उन्होंने बेटी से दामाद द्वारा मारपीट करने की तहरीर महिला थाने में दिलवा दी.

रश्मि द्वारा दी गई तहरीर ने आग में घी का काम किया. महिला थाने की थानाप्रभारी ने विवेक को थाने बुलवा कर सब के सामने उसे इस तरह जलील किया कि वह भीगी बिल्ली बन कर रह गया. उस ने सब के सामने माफी मांगी और वादा किया कि भविष्य में वह फिर कभी किसी तरह की शिकायत का मौका नहीं देगा. विवेक के घडि़याली आंसू पर रश्मि तो पिघल गई, लेकिन उस के इस नाटक पर तो अर्जुन और अभिषेक को यकीन हुआ, ही थानाप्रभारी को. रश्मि के कहने पर उस के घर वाले और पुलिस उसे इस शर्त पर विवेक के साथ भेजने को राजी हुई कि भविष्य में अगर रश्मि के साथ किसी भी तरह की कोई अनहोनी होती है तो इस के लिए वही जिम्मेदार होगा. विवेक ने यह शर्त मान ली तो रश्मि को उस के साथ भेज दिया गया.

रश्मि पति के साथ ससुराल तो गई, लेकिन इस के बाद उसे मायके वालों का मुंह देखना नसीब नहीं हुआ. विवेक का सख्त आदेश था कि वह तो मायके जाएगी और ही वहां फोन करेगी. यही नहीं, मायके वालों का फोन आता है, तब भी वह बात नहीं करेगी. इस तरह विवेक ने ससुराल वालों से संबंध लगभग तोड़ लिए. उसे नाराजगी इस बात की थी कि ससुर और साले ने दूसरी बार पत्नी से उस की शिकायत करा दी थी, जिस की वजह से उसे थाने में सब के साने जलील किया गया था. यह अपमान वह भूल नहीं पा रहा था.

रश्मि ने सब कुछ भाग्य के भरोसे छोड़ दिया था. अब बेटी ही उस के लिए एकमात्र जीने का सहारा रह गई थी. उसे ही देख कर वह जी रही थी. सासससुर, ननददेवर सभी ने मुंह मोड़ लिया था. शायद उस ने भी ठान लिया था कि वह वही करेगी, जो भारतीय नारियां करती आई हैं. जिस इज्जत के साथ वह ब्याह कर ससुराल आई है, उसी इज्जत के साथ उस की अर्थी ससुराल से ही उठेगी. इसी तरह 5 साल बीत गए. सन 2008 में रश्मि की छोटी बहन दिवीता की शादी तय हुई. बेटी की शादी तय होने की बात अर्जुन कुमार ने बेटी रश्मि और दामाद विवेक को भी बताई. बहन की शादी तय होने की बात सुन कर रश्मि बहुत खुश हुई. जाने क्या सोच कर विवेक ने रश्मि को शादी में जाने की अनुमति दे दी. यही नहीं, वह खुद भी उस शादी में शामिल हुआ.

बेटीदामाद के आने से सभी को खुशी हुई. अर्जुन कुमार और उन की पत्नी को लगा, शायद अब सब ठीक हो जाएगा. इस के बाद विवेक खुद भी ससुराल आनेजाने लगा और रश्मि को भी साथ ले जाने लगा. 2 बार वह रश्मि को ले कर सिंगापुर भी घूमने गया. विवेक भले ही ससुराल आनेजाने लगा था और रश्मि को देश के बाहर घुमाने भी ले गया था, लेकिन रश्मि के साथ वह जो व्यवहार करता आया था, उस में कोई बदलाव नहीं आया थावह अभी भी रश्मि को जलील करने से चूकता था, उस के साथ मारपीट करने में पीछे रहता था. उस में सब से बड़ी कमी यह थी कि वह यह भी नहीं देखता था कि पत्नी से कहां और कैसा व्यवहार किया जाए. बाप के इस व्यवहार से श्रद्धा भी दुखी रहती थी. कहने का मतलब यह था कि विवेक ने शराफत का जो चोला ओढ़ रखा था, वह मात्र दिखावा था, जबकि उस की आदत में कोई सुधार नहीं आया था.

विवेक का जब मन होता, वह गंदीगंदी गालियां देते हुए रश्मि की पिटाई करने लगता. जबकि रश्मि को गालियों से बहुत चिढ़ थी. ऐसे में रश्मि विरोध करती तो घर का माहौल बिगड़ जाता. मजबूरन समझदारी का परिचय देते हुए रश्मि को ही चुप होना पड़ता. मार्च महीने की बात है. रश्मि मायके आई हुई थी. उसी बीच एक दिन उस ने देवर विकास और उस की पत्नी को खाने पर अपने घर बुलाया. रात में विवेक भी गया. खाना खा कर विकास तो पत्नी के साथ चला गया, लेकिन विवेक ससुराल में ही रुक गया. सब के जाने के बाद विवेक सोने के लिए लेटा तो पत्नी से लाइट बंद करने को कहा. काम में व्यस्त होने की वजह से रश्मि सुन नहीं पाई. इसलिए लाइट औफ नहीं की. विवेक गुस्से में उठा तो शराब की खाली पड़ी बोतल उस के पैर से टकरा गई.

फिर तो विवेक का गुस्सा इस कदर बढ़ा कि उस ने चप्पल निकाली और रश्मि के घर में ही उस की पिटाई करने लगा, साथ ही गंदीगंदी गालियां भी दे रहा था. हद तो तब हो गई, जब गिलास में रखी शराब उस ने उस के मुंह पर उड़ेल दी. इस पर रश्मि को भी गुस्सा गया. उस ने आवाज दे कर मांबाप को बुला लिया. इस के बाद उस रात विवेक से खूब झगड़ा हुआ. विवेक अकेला था, जबकि रश्मि का पूरा परिवार था. अंत में रश्मि ने ही बीचबचाव कर के मामला शांत कराया. इस के बाद एक बार फिर विवेक के संबंध ससुराल वालों से खराब हो गए. इतना सब होने के बावजूद रश्मि बेटी को ले कर पति के साथ ससुराल गई.

3 अप्रैल, 2013 की शाम 4 बजे के आसपास रश्मि ने अभिषेक को फोन कर के बताया कि विवेक ने उसे और श्रद्धा को खाने की चीज में जहर मिला कर खिला दिया है. इस के आगे वह कुछ नहीं कह पाई, क्योंकि दूसरी ओर से फोन कट गया था. शायद किसी ने फोन छीन कर काट दिया था. अभिषेक के पास सोचने का भी समय नहीं था. उस ने जल्दी से गाड़ी निकाली और पिता को साथ ले कर रश्मि की ससुराल जा पहुंचाविवेक घर में ही था. लेकिन उस से कोई बात किए बगैर बापबेटे सीधे रश्मि के कमरे में पहुंचे. श्रद्धा और रश्मि बिस्तर पर पड़ी तड़प रही थीं. बापबेटे ने मिल कर दोनों को गाड़ी में लिटाया और विंध्यवासिनीनगर स्थित स्टार नर्सिंग होम ले गए. दोनों का इलाज शुरू हुआ. इस बीच ससुराल का कोई भी सदस्य उन्हें देखने नहीं आया. रात करीब 11 बजे रश्मि की ननद वंदना जरूर आई. थोड़ी देर रुक कर वह भी चली गई.

श्रद्धा की हालत तो स्थिर रही, लेकिन रश्मि की हालत बिगड़ती गई. तब अर्जुन कुमार और अभिषेक, दोनों को वहां से डिस्चार्ज करा कर डा. मल्ल नर्सिंगहोम ले गए. श्रद्धा तो जैसेतैसे बच गई, लेकिन 2 दिनों तक जिंदगी और मौत से संघर्ष करते हुए 5 अप्रैल की शाम 6 बजे रश्मि मौत से हार गई और यह दुनिया छोड़ कर चली गई. रश्मि की मौत की सूचना पा कर कोतवाली पुलिस अस्पताल पहुंची और लाश को कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम के लिए मेडिकल कालेज भिजवा दिया. इस के बाद श्रद्धा के बताए अनुसार अभिषेक ने कोतवाली पुलिस को जो तहरीर दी, उस के आधार पर कोतवाली पुलिस ने अपराध संख्या 139/2013 पर भादंवि की धारा 302, 307, 498 के तहत विवेक कुमार लाट के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया. इस मामले की जांच कोतवाल प्रभारी इंसपेक्टर बृजेंद्र सिंह ने स्वयं संभाली.

6 अप्रैल, 2013 की सुबह बृजेंद्र सिंह ने विवेक कुमार को आर्यनगर स्थित उस के घर से गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ के बाद उसी दिन उसे अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. जांच के दौरान इंस्पेक्टर बृजेंद्र सिंह को अभिषेक ने रश्मि के हाथों के लिखी 13 बिंदुओं में 7 पृष्ठों की मर्मस्पर्शी एक चिट्ठी सौंपी. उस चिट्ठी में रश्मि ने पति के हर जुर्म को विस्तार से लिखा था. जांच के दौरान कोतवाली प्रभारी ने उस में लिखा एकएक शब्द सच पाया. इस मामले में पुलिस ने 29 जून, 2013 को विवेक कुमार लाट के खिलाफ आरोप पत्र भी दाखिल कर दिया.

श्रद्धा ने अपने बयान में पुलिस को बताया था कि उस के पापा ने ही उसे और उस की मां को खाने के चीज में जहर मिला कर जबरदस्ती खिलाया था. जिसे खाने के कुछ देर बाद दोनों की हालत बिगड़ने लगी थी. अभिषेक ने पुलिस को बताया था कि उस की बहन बहुत ज्यादा सुंदर नहीं थी. वह निहायत सीधीसादी और परंपराओं में जीने वाली नारी थी. उस की यही बातें विवेक की पसंद नहीं थीं. वह अय्याश था. उस के कई औरतों से नाजायज संबंध थे. रश्मि ने इस का विरोध किया तो वह उस के साथ मारपीट करने लगा. 15 सालों तक वह तिलतिल मरती रही.

अभिषेक बहन की मौत का बदला लेना चाहता था. इसी वजह से वह बहन की हत्या के मामले की पैरवी ठीक से कर रहा था. विवेक के घर वालों ने जब उस की जमानत के लिए अदालत में याचिका दायर की तो अभिषेक की पैरवी की वजह से उस की जमानत याचिका खारिज हो गई. विवेक का मंझला भाई विनय कुमार लाट अभिषेक पर दबाव बना रहा था कि इस मामले से धारा 302 हटवा दे. अभिषेक इस के लिए तैयार नहीं था. अभिषेक और अर्जुन कुमार रश्मि की ससुराल वालों की धमकियों की परवाह किए बगैर मामले की पैरवी करते रहे. आखिरकार वही हुआ, जिस की उन्होंने परवाह नहीं थी. 18 जून, 2013 को भाड़े के शूटरों से विनय कुमार लाट ने अभिषेक रंजन अग्रवाल की हत्या करवा दी. मृतक अभिषेक के पिता अर्जुन कुमार अग्रवाल ने बेटे की हत्या की नामजद रिपोर्ट विवेक, उस के मंझले भाई विनय कुमार और 2 अज्ञात शूटरों के खिलाफ थाना कैंट में दर्ज कराई थी.

मुकदमा दर्ज होने के बाद थाना कैंट के इंस्पेक्टर टी.पी. श्रीवास्तव ने जांच के दौरान पाया कि यह हत्या पूर्व में हुए झगड़े की वजह से जेल में बंद एक बाहुबली सफेदपोश अपराधी को सुपारी दे कर कराई गई थी. विनय ने पुलिस के सामने अपना अपराध स्वीकार भी किया था. लेकिन हत्यारे कौन थे, कहां से आए थे? पुलिस इस का पता नहीं लगा सकी. जबकि इस मामले में नामजद अभियुक्त विनय और विवेक के बड़े भाई और प्रौपर्टी डीलर कमलेश कुमार लाट का कहना था कि रश्मि ने पारिवारिक कारणों से आजिज कर खुद ही जहर खा लिया था और श्रद्धा को भी खिलाया था. अस्पताल में उस ने सब के सामने यही कहा भी था. लेकिन अर्जुन कुमार और अभिषेक ने जबरदस्ती उस के निर्दोष भाई को जेल भिजवा दिया. उस की जमानत तक नहीं होने दी. अभिषेक की हत्या में भी उन का कोई हाथ नहीं है.

इस लड़ाई में एकमात्र गवाह 14 वर्षीया श्रद्धा लाट की जान खतरे में है. शूटरों के पकड़े जाने से अर्जुन कुमार का परिवार दहशत में है. उन की सुरक्षा के लिए पुलिस तैनात है. पुलिस ने विवेक कुमार और विनय कुमार पर 8 नवंबर, 2013 को गैंगस्टर एक्ट भी लगा दिया है. कथा लिखे जाने तक दोनों अभियुक्तों विवेक और विनय की जमानत नहीं हुई थी.

   —कथा परिजनों और पुलिस सूत्रों पर आधारित