Haryana Crime : 2 करोड़ रुपए की प्रौपर्टी के लिए बेटे ने किया पिता का कत्ल

Haryana Crime : सेवानिवृत्त कैप्टन पारसराम के पास किसी चीज की कमी नहीं थी. करोड़ों की संपत्ति के मालिक होने के बावजूद वह इतने कंजूस थे कि बेटों को तो घर से निकाल ही दिया, बेटी का भी इलाज नहीं कराते थे. यहां तक कि उन की पत्नी एक आश्रम में काम कर के खाना लाती थी. इस कंजूसी का नतीजा उन की हत्या के रूप में सामने आया पारसराम पुंज सेना के कैप्टन पद से रिटायर जरूर हो गए थे, लेकिन लोगों पर हुकुम और डिक्टेटरशिप चलाने की उन की

आदत नहीं गई थी. सेवानिवृत्त के बाद यह बात उन की समझ में नहीं आई थी कि सेना और समाज के नियमों में जमीनआसमान का अंतर होता है. अपने घर वालों के साथ मोहल्ले वालों पर भी वह अपनी हिटलरशाही दिखाते रहते थे. घर वालों की बात दूसरी थी, लेकिन मोहल्ले वाले या और दूसरे लोग उन के गुलाम तो थे नहीं जो उन की डिक्टेटरशिप सहते. लिहाजा इसी सब को ले कर मोहल्ले वालों से उन की अकसर कहासुनी होती रहती थी. उन की पत्नी अनीता उन्हें समझाने की कोशिश करती तो वह उलटे उसे ही डांट देते थे. उन के घर में पत्नी के अलावा एक बेटी निष्ठा थी.

22 अक्तूबर, 2013 को करवाचौथ का त्यौहार था. इस त्यौहार के मौके पर महिलाओं के साथसाथ आजकल तमाम लड़कियां भी हाथों पर मेहंदी लगवाने लगी है. करवाचौथ से एक दिन पहले 21 अक्तूबर को निष्ठा भी अपने हाथों पर मेहंदी लगवा कर रात 8 बजे घर लौटी थी. उस समय घर पर पारसराम पुंज भी मौजूद थे. निष्ठा की मां अनीता पंजाबी बाग स्थित एक संत के आश्रम में गई हुई थीं. तभी निष्ठा ने कहा, ‘‘पापा, मम्मी ने बाहर से सरगी (करवाचौथ का सामान) लाने को कहा था, आप ले आइए.’’

मार्केट पारसराम पुंज के घर से कुछ ही दूर था. वह पैदल ही सरगी का सामान लेने बाजार चले गए. जब वह सामान खरीद कर घर लौटे तो उन के दोनों हाथों में सामान भरी पौलिथीन की थैलियां थीं. अभी वह अपने दरवाजे पर पहुंचे ही थे कि किसी ने उन के ऊपर चाकू से हमला कर दिया. दर्द से छटपटा कर उन्होंने जोर से बेटी को आवाज लगाई. उस समय तकरीबन साढ़े 8 बज रहे थे.

निष्ठा ने जब पिता के चीखने की आवाज सुनी थी, तब वह पहली मंजिल पर थी. चीख की आवाज सुन कर उस ने सोचा कि शायद आज फिर पापा का किसी से झगड़ा हो गया है. वह जल्दीजल्दी सीढि़यां उतर कर नीचे आई. घर का मुख्य दरवाजा भिड़ा हुआ था उस ने जैसे ही दरवाजा खोला, उस के पिता सामने गिरे पड़े थे और हाथ में चाकू लिए एक युवक वहां से भाग रहा था. कुछ आगे एक युवक लाल रंग की मोटरसाइकिल पर बैठा था. जिस ने सिर पर हेलमेट लगा रखा था. कुछ लोग गली में मौजूद थे, लेकिन उन्हें पकड़ने की किसी की भी हिम्मत नहीं हुई. युवक मोटरसाइकिल पर बैठ कर भाग गए.

पिता को लहूलुहान देख कर निष्ठा जोरजोर से रोने लगी. उस के रोने की आवाज सुन कर आसपास के लोग वहां आ गए. पीछे वाली गली में निष्ठा का ममेरा भाई नरेंद्र रहता था. वह दौड़ीदौड़ी उस के पास गई और यह बात उसे बताई. जब तक वह आता, तब तक वहां काफी लोग जमा हो गए थे. मामा को लहूलुहान देख कर वह भी घबरा गया. लोगों के सहयोग से वह पारसराम को नजदीक के आचार्यश्री भिक्षु सरकारी अस्पताल ले गया, लेकिन डाक्टरों ने पारसराम पुंज को मृत घोषित कर दिया. इसी दौरान किसी ने पुलिस कंट्रोल रूम को फोन कर के सूचना दे दी कि मोतीनगर के सुदर्शन पार्क स्थित मकान नंबर बी-462 के सामने एक आदमी का मर्डर हो गया है.

पीसीआर ने यह सूचना थाना मोतीनगर को दे दी. हत्या की खबर मिलते ही थानाप्रभारी शैलेंद्र तोमर, इंसपेक्टर (तफ्तीश) रमेश कलसन, हेडकांस्टेबल सत्यप्रकाश और कांस्टेबल कृष्ण राठी आदि के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. उन्होंने देखा कि सुदर्शन पार्क के मकान नंबर बी-462 के सामने काफी मात्रा में खून पड़ा था. पता चला कि किसी ने रिटायर्ड कप्तान पारसराम पुंज को कई चाकू मारे थे, जिन्हें आचार्यश्री भिक्षु अस्पताल ले जाया गया है. थानाप्रभारी अस्पताल पहुंचे तो डाक्टरों से पता चला कि पारसराम की अस्पताल लाने से पहले ही मौत हो गई थी.

पुलिस ने लाश कब्जे में ले कर उसे पोस्टमार्टम के लिए दीनदयाल अस्पताल भेज दिया. थानाप्रभारी ने सेना के पूर्व कैप्टन पारसराम पुंज की हत्या की खबर आला अधिकारियों को भी दे दी. थोड़ी देर में डीसीपी रणजीत सिंह और एसीपी ईश सिंघल भी मौकाएवारदात पर पहुंच गए. मौका मुआयना करने के बाद पुलिस अधिकारियों ने आसपास के लोगों से बात की. मृतक की बेटी निष्ठा और कुछ लोगों ने पुलिस को बताया कि उन्होंने हमलावर को हाथ में चाकू लिए वहां से भागते देखा था.

डीसीपी रणजीत सिंह ने इस केस को सुलझाने के लिए एसीपी ईश सिंघल के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई. टीम में थानाप्रभारी शैलेंद्र तोमर, इंसपेक्टर रमेश कलसन, एसआई गुलशन नागपाल, हेडकांस्टेबल सत्यप्रकाश, कांस्टेबल कृष्ण राठी, अमित कुमार, रणधीर आदि को शामिल किया गया. पुलिस को घटनास्थल से ऐसा कोई सुबूत नहीं मिला, जिस के सहारे हत्यारों तक पहुंचा जा सकता. यह एक तरह से ब्लाइंड मर्डर केस था. इसलिए पुलिस ने सब से पहले पूर्व कैप्टन पारसराम और उस के परिवार के बारे में छानबीन करनी शुरू की.

छानबीन में पता चला कि मृतक पारसराम पुंज तेजतर्रार व्यक्ति थे. उन के मिजाज की वजह से मोहल्ले के लोगों से उन की अकसर कहासुनी होती रहती थी. लेकिन इस मामूली कहासुनी की वजह से कोई उन की हत्या नहीं कर सकता है. पुलिस को ऐसा नहीं लग रहा था. फिर भी पुलिस ने मोहल्ले के उन लोगों से भी पूछताछ की, जिन से कप्तान साहब की नोंकझोंक होती रहती थी. इस के बाद पुलिस ने पारसराम पुंज और बेटी निष्ठा पुंज के मोबाइल फोन नंबरों की काल डिटेल्स निकलवाई. इस से पता चला कि निष्ठा की कुछ नंबरों पर ज्यादा बातें होती थीं. 16 साल की निष्ठा जवान होने के साथ साथ खूबसूरत भी थी. इसी मद्देनजर पुलिस ने यह सोचना शुरू कर दिया कि कहीं निष्ठा का किसी लड़के के साथ कोई चक्कर तो नहीं चल रहा था. हो सकता है कप्तान साहब उस के प्यार में रोड़ा बन रहे हों और इसलिए उस ने अपने प्रेमी की मार्फत अपने पिता को ठिकाने लगवा दिया हो.

जिन नंबरों पर निष्ठा की ज्यादा बात होती थी, पुलिस ने उन का पता लगाया तो वे एक झुग्गी बस्ती में रहने वाले युवकों के नंबर निकले. पूछताछ के लिए पुलिस ने उन युवकों को थाने बुलवा कर पूछताछ करनी शुरू की. उन्होंने बताया कि उन की निष्ठा से केवल दोस्ती थी. उस के पिता के मर्डर से उन का कोई लेनादेना नहीं था. उन लड़कों से सख्ती से की गई पूछताछ के बाद भी कोई नतीजा सामने नहीं आया. इसी बीच पुलिस टीम को मुखबिर से खास जानकारी यह मिली कि हमलावर लाल रंग की जिस पैशन मोटरसाइकिल से आए थे, उस पर (Haryana Crime) हरियाणा का नंबर था. वह नंबर क्या था, यह पता नहीं लग सका. जबकि बिना नंबर के मोटरसाइकिल ढूंढना आसान नहीं था.

जांच टीम ने एक बार फिर घटनास्थल से मेन रोड तक आने वाले रास्तों का मुआयना किया. उन्होंने देखा कि जहां पारसराम पुंज का मर्डर हुआ था, उस के सामने वाले मकान के बाहर सीसीटीवी कैमरा लगा हुआ था. संभावना थी कि कातिलों की और उन की मोटरसाइकिल की फोटो उस कैमरे में जरूर कैद हुई होगी. यही सोच कर पुलिस ने उस मकान के मालिक से बात की. उस ने बताया कि उस के कैमरे की डीवीआर नहीं हो रही है. इस से पुलिस की उम्मीद पर पानी फिर गया.

जिस गली में पारसराम का मकान था, उस के बाहर मोड़ पर सुरेश का चावल का गोदाम था. गोदाम के बाहर भी सीसीटीवी कैमरे लगे हुए थे. पूछताछ के बाद पता चला कि वहां लगे सीसीटीवी कैमरे भी काम नहीं कर रहे थे. पुलिस टीम जांच का जो कदम आगे बढ़ा रही थी, वह आगे नहीं बढ़ पाता था. इस तरह जांच करते हुए पुलिस को 2 सप्ताह बीत गए. टीम ने निष्ठा के फोन की काल डिटेल्स का एक बार फिर अध्ययन किया. उस से पता चला कि घटना वाले दिन एक फोन नंबर पर निष्ठा की 4 बार बात हुई थी. उस नंबर के बारे में निष्ठा से पूछा गया तो उस ने बताया कि यह नंबर उस के भाई यानी कप्तान साहब की पहली पत्नी ऊषा से पैदा हुए बेटे लाल कमल पुंज का है. इस के बाद ही पुलिस को पता लगा कि कप्तान साहब ने 2 शादियां की थीं. निष्ठा उन की दूसरी पत्नी अनीता की बेटी थी.

पुलिस ने निष्ठा से पूछा कि उस की लाल कमल से क्या बात हुई थी तो उस ने जवाब दिया कि उस ने घर का हालचाल जानने के लिए फोन किया था. उस ने यह भी बताया की लाल कमल कभीकभी घर भी आता रहता था. पूछताछ में जानकारी मिली कि लाल कमल अपनी पत्नी के साथ पानीपत में रहता था. पुलिस को यह बात पहले ही पता लग चुकी थी कि हमलावर जिस मोटरसाइकिल से आए थे, वह हरियाणा की थी. लाल कमल भी (Haryana Crime) हरियाणा में ही रह रहा था. इस से पुलिस को शक होने लगा कि कहीं लाल कमल ने ही तो पिता को ठिकाने नहीं लगवा दिया. उस के फोन नंबर की भी काल डिटेल्स निकलवाई गई तो पता चला कि घटना वाले दिन उस के फोन की लोकेशन पानीपत में ही थी.

फिर भी पुलिस टीम लाल कमल पुंज से पूछताछ करने के लिए पानीपत पहुंच गई. पुलिस ने जब उस से उस के पिता की हत्या के बारे में मालूमात की तो उस ने बताया कि उन के मर्डर की सूचना निष्ठा ने दी थी. उस के बाद वह दिल्ली गया था.

‘‘क्या तुम्हारे पास कोई मोटरसाइकिल है?’’ थानाप्रभारी ने पूछा.

‘‘हां सर, मेरे पास हीरो की पैशन बाइक है.’’ लाल कमल ने बताया.

पारसराम पर हमला करने के बाद हमलावर लाल रंग की पैशन बाइक से फरार हुए थे, इसलिए पुलिस को लाल कमल पर शक होने लगा. पुलिस ने उस से कुछ कहने के बजाए उस के दोस्तों से पूछताछ की तो पता चला कि कमल अपने पिता से  नाराज रहता था. उन्होंने उसे अपनी प्रौपर्टी से हिस्सा देने से मना कर दिया था. इस जानकारी के बाद पुलिस का शक विश्वास में बदलने लगा. बिना किसी सुबूत के पुलिस लाल कमल को टच करना ठीक नहीं समझ रही थी. इसलिए वह सुबूत जुटाने में लग गईर्. पुलिस को लाल कमल की बाइक का नंबर भी मिल गया था. अब पुलिस यह जानने की कोशिश करने लगी कि 21 अक्तूबर को कमल की बाइक दिल्ली आई थी या नहीं.

पारसराम पुंज की हत्या 21 अक्तूबर को हुई थी. इसलिए पुलिस ने पानीपत से दिल्ली वाले रोड पर जितने भी पेट्रौल पंप थे, सब के सीसीटीवी कैमरों की घटना से 2 हफ्ते पहले तक की फुटेज देखी कि कहीं कमल ने किसी पेट्रोल पंप पर पैट्रोल तो नहीं भराया था. इस काम में कई दिन लग गए, लेकिन कोई सफलता नहीं मिली. दिल्ली पुलिस ने करनाल हाइवे पर कई सीसीटीवी कैमरे लगा रखे हैं. उन कैमरों की मौनिटरिंग अलीपुर थाने में होती है और वहीं पर उन कैमरों की डिजिटल वीडियो रिकौर्डिंग होती है. थानाप्रभारी शैलेंद्र तोमर, इंसपेक्टर रमेश कलसन और हेडकांस्टेबल सत्यप्रकाश ने थाना अलीपुर जा कर 21 अक्तूबर, 2013 की फुटेज देखी. उस हाईवे पर रोजाना हजारों की संख्या में वाहन गुजरते हैं, इसलिए 2-3 दिनों तक फुटेज देखने की वजह से उन की आंखें भी सूज गई. लेकिन सफलता की उम्मीद में उन्होंने इस की परवाह नहीं की. वह अपने मिशन में लगे रहे.

उन की कोशिश रंग लाई. फुटेज में लाल कमल पुंज की पैशन मोटरसाइकिल नंबर एचआर 60 डी 7511 दिखाई दे गई. बाइक चलाने वाले के अलावा उस पर एक युवक और बैठा था. कपड़ों और कदकाठी से लग रहा था कि बाइक लाल कमल चला रहा था. रिकौर्डिंग में उस बाइक के दिल्ली आते समय की और रात को दिल्ली से जाते समय की फुटेज मौजूद थी. यह सुबूत मिलने के बाद पुलिस ने लाल कमल पुंज से फिर पूछताछ की तो उस ने बताया कि 21 अक्तूबर को वह अपने दोस्त दिनेश मणिक के साथ दिल्ली गया था, लेकिन वह सुदर्शन पार्क नहीं गया था.

पुलिस को लगा कि वह झूठ बोल रहा है, इसलिए पुलिस उसे और दिनेश माणिक को पूछताछ के लिए पानीपत से दिल्ली ले आई. पुलिस ने दोनों से अलगअलग पूछताछ करनी शुरू कर दी. वे दोनों सच्चाई को ज्यादा देर तक नहीं छिपा सके. उन्होंने स्वीकार कर लिया कि पूर्व कैप्टन पारसराम पुंज की हत्या उन्होने ही की थी. दोनों से पूछताछ के बाद उन की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी. पश्चिमी दिल्ली के मोतीनगर क्षेत्र स्थित सुदर्शन पार्क के मकान नंबर बी-462 में रहने वाले पारसराम पुंज सेना में कैप्टन थे. उन की शादी ऊषा से हुई थी, जो मूलरूप से उड़ीसा की रहने वाली थी. बाद में ऊषा 2 बेटों लाल कमल उर्फ सोनू और दीपक उर्फ बाबू के अलावा एक बेटी की मां बनी. 3 बच्चों के साथ ऊषा हंसीखुशी से रह रही थी. लेकिन कैप्टन पारसराम का स्वभाव कुछ अलग था. वह आर्मी की तरह अपने घर में भी डिक्टेटरशिप चलाते थे और छोटीछोटी बातों पर पत्नी और बच्चों को गलती की सजा देते थे.

जब तक कप्तान साहब ड्यूटी पर रहते थे, घर के सभी लोग अमनचैन से रहते थे, लेकिन उन के छुट्टियों पर घर आते ही घर में एकदम से खामोशी छा जाती थी. घर के सभी सदस्य भीगी बिल्ली बन कर रह जाते थे. उन के डर की वजह से घर वाले ज्यादा नहीं बोलते थे. वह सोचते थे कि पता नहीं किस बात पर उन्हें सजा मिल जाए. कप्तान पारसराम परिवार के सदस्यों को सेना के जवानों की तरह कड़े अनुशासन में रखना चाहते थे. वह यह बात नहीं समझते थे कि सेना और समाज के नियम कायदों में जमीनआसमान का अंतर होता है.

सेना से रिटायर होने के बाद पारसराम ने चांदनी चौक इलाके में सर्जिकल सामान बेचने की दुकान खोल ली. उन के तीनों बच्चे पढ़ रहे थे. शाम को दुकान से घर लौटने के बाद वह किसी न किसी बात को ले कर पत्नी से झगड़ने लगते थे. कभीकभी वह उस की पिटाई भी कर देते थे.

पारसराम स्वभाव से बेहद कंजूस थे. पत्नी को खर्चे के लिए जो भी पैसे देते थे, एकएक पैसे का हिसाब लेते थे. उन की इजाजत के बिना वह एक भी पैसा खर्च करने से डरती थी. इस तरह पति के रिटायर होने के बाद ऊषा अंदर ही अंदर घुटती रहती थी. फिर एक दिन वह किसी को बिना बताए बेटी को ले कर कहीं चली गई, जिस का आज तक कोई पता नहीं चला. यह करीब 20 साल पहले की बात है.

पारसराम ने पत्नी को संभावित जगहों पर तलाशा, लेकिन वह नहीं मिली. बाद में सन 1995 में पारसराम ने अनीता नाम की महिला से शादी कर ली. करनाल के एक गांव की रहने वाली अनीता की पहली शादी यमुनानगर हरियाणा में हुई थी. लेकिन पति की मौत हो जाने की वजह से उस की जिंदगी में अंधेरा छा गया था. पारसराम से शादी कर के वह मोतीनगर के सुदर्शन पार्क स्थित उन के घर में रहने लगी. 3 मंजिला मकान में उस का परिवार ही रहता था. उस ने मकान का कोई भी फ्लोर किराए पर नहीं उठा था.

पारसराम ने चांदनी चौक में दुकान खरीदने के अलावा रोहिणी सेक्टर-23 में भी 200 वर्ग गज का एक प्लौट खरीद कर डाल दिया था. इसी बीच अनीता एक बेटे और बेटी की मां बन गई, जिन का नाम लाल कमल और निष्ठा रखा गया. पारसराम ने बड़े बेटे लाल कमल को भी अपने साथ सर्जिकल सामान की दुकान पर बैठाना शुरू कर दिया था. उस ने पत्राचार से बीकौम किया था.

लाल कमल पारसराम के साथ दुकान पर बैठता जरूर था, लेकिन उस की मजाल नहीं थी कि वह वहां के पैसों से अपने शौक पूरे कर सके. जवान बच्चों का अपना भी कुछ खर्च होता है, इस बात को पारसराम नहीं समझते थे. वह चाहते तो बच्चों का दाखिला किसी अच्छे स्कूल में करा सकते थे, लेकिन कंजूस होने की वजह से उन्होंने ऐसा नहीं किया. बेटी निष्ठा का दाखिला भी उन्होंने नजदीक के ही एक सरकारी स्कूल में करा दिया था.

पारसराम घमंडी स्वभाव के थे. वह मोहल्ले वालों से भी उसी अंदाज में बात करते थे. तानाशाही रवैये की वजह से मोहल्ले वालों से उन की अकसर नोकझोंक होती रहती थी. कभीकभी तो वह गली में रेहड़ी पर सब्जी बेचने वालों से भी झगड़ बैठते थे. उन की पत्नी और बच्चे उन की इस आदत से परेशान थे.

सन 2006 में पारसराम ने लाल कमल की शादी पानीपत की ज्योति से करा दी. शादी होने के बाद लाल कमल का खर्च बढ़ गया, लेकिन पिता उसे खर्च के लिए पैसे नहीं देते थे. पारसराम अपनी पेंशन और दुकान की कमाई अपने पास ही रखते थे. इस से लाल कमल काफी परेशान रहता था. इस के अलावा अपनी बहू के प्रति भी उन की नीयत खराब हो चुकी थी. ज्योति ससुर की नीयत भांप चुकी थी. उस ने यह बात पति को बताई तो लाल कमल ने अपनी मां अनीता से शिकायत की. अनीता ने पति से डरते हुए यह बात पूछी तो उन्होंने उल्टे पत्नी को ही डांट दिया.

बताया जाता है कि बाद में पारसराम ने अपनी दुकान बेच दी और दिन भर घर पर ही रहने लगे. वह घर में तनाव वाला माहौल रखते थे. इस से घर वाले और ज्यादा परेशान हो गए. पिता की आदतों को देखते हुए लाल कमल पत्नी को ले कर परेशान रहने लगा. घर में रोजाना होने वाली कलह से परेशान हो कर लाल कमल अपने भाई और पत्नी को ले कर पानीपत चला गया और इधरउधर से पैसों का इंतजाम कर के उस ने वहीं पर इनवर्टर, बैटरी बेचने और मोबाइल रिजार्च करने की दुकान खोल ली. अब पारसराम के साथ पत्नी अनीता और बेटी निष्ठा ही रह गई थी.

पारसराम के पास करीब 2 करोड़ रुपए की संपत्ति थी. इस के बावजूद वह बेटों को फूटी कौड़ी देने को तैयार नहीं थे. घर में अकसर तनाव का माहौल रहने की वजह से निष्ठा को भी माइग्रेन का दर्द रहने लगा था. पारसराम ने बेटी का इलाज भी नहीं कराया. जब भी वह दर्द से कराहती तो वह उसे मेडिकल स्टोर से दर्द निवारक दवा ला कर दे देते थे.

दिल्ली के पंजाबी बाग इलाके में एक संत का आश्रम है. अनीता उस आश्रम में जाती थी. वहां उसे मानसिक शांति मिलती थी. आश्रम में ही वह सेवा करती, वहीं चलने वाले भंडारे में खाना खाती और शाम को घर जाते समय पति और बेटी के लिए भी आश्रम से खाना ले आती थी. पूरे दिन आश्रम में रहने के बाद वह शाम को करीब 9 बजे घर लौटती थी. पारसराम ने उस से कह दिया था कि शाम का खाना वह आश्रम से ही लाया करे. इसलिए वह वहां से बेटी और पति के लिए खाना लाती थी.

उधर लाल कमल चाहता था कि पिता उसे कोई अच्छी सी दुकान खुलवा दें, लेकिन उन के जीते जी ऐसा संभव नहीं था. जब वह बेटी का इलाज तक नहीं करा रहे थे तो उनसे बिजनैस के लिए पैसे देने की उम्मीद कैसे की जा सकती थी. लाल कमल की दुकान के पास ही पानीपत की नागपाल कालोनी में दिनेश मणिक उर्फ दीपू की मोबिल औयल और स्पेयर पार्टस की दुकान थी. लाल कमल की उस से दोस्ती थी. वह उस से हमेशा पिता की बुराई करता रहता था.

लाल कमल कभीकभी दिल्ली जा कर निष्ठा और आश्रम में मां से मिलता रहता था. निष्ठा उसे अपनी माइग्रेन बीमारी के बारे में बताया करती थी. निष्ठा का इलाज न कराने पर लाल कमल को पिता पर गुस्सा आता था. लाल कमल को लगता था कि उसे पिता की मौत के बाद ही उन की प्रौपर्टी मिल सकती है, इसलिए उस ने पिता को ठिकाने लगाने की ठान ली. यह काम वह अकेला नहीं कर सकता था, इसलिए उस ने अपने दोस्त दिनेश मणिक उर्फ दीपू से बात की. लाल कमल ने दिनेश से कहा कि अगर वह उस के पिता की हत्या कर देगा तो वह उसे उन की प्रौपर्टी का 25 प्रतिशत दे देगा.

यह बात उस ने पहले ही बता दी थी कि प्रौपर्टी की कीमत करीब 2 करोड़ रुपए है. इसी लालच में दिनेश उस का साथ देने को तैयार हो गया.

इस के बाद दोनों पारसराम को ठिकाने लगाने की योजना बनाने लगे. इस बीच लाल कमल ने निष्ठा से फोन कर के जानकारी ले ली कि मां आश्रम के लिए कितने बजे घर से निकलती है और कितने बजे घर लौटती है. दिनेश ने लाल कमल के साथ जा कर कई बार उस के घर और इलाके की रेकी की. हत्या के लिए उन्होंने पानीपत से एक चाकू भी खरीद लिया था.

पूरी योजना बनाने के बाद लाल कमल  21 अक्तूबर, 2013 को अपनी पैशन मोटरसाइकिल नंबर एचआर 60 डी 7511 से दिनेश को साथ ले कर दिल्ली के लिए रवाना हुआ. वह जानता था कि अगर वह फोन अपने साथ दिल्ली ले जाएगा तो फोन की लोकेशन के आधार पर पुलिस उस तक पहुंच सकती है. इसलिए उस ने अपना ही नहीं, बल्कि दिनेश का फोन भी पानीपत दिल्ली रोड से चांदनी बाग की तरफ जाने वाली सड़क पर एक जगह छिपा दिया. ये दोनों शाम 8 बजे के करीब मोतीनगर के सुदर्शन पार्क की मार्केट में पहुंच गए.

दोनों ने तय कर लिया था कि वारदात को घर में ही अंजाम देंगे. इत्तफाक से लाल कमल ने बाजार में खरीदारी करते हुए अपने पिता को देख लिया. वह उस समय पत्नी के करवा चौथ व्रत का सामान खरीद रहे थे. उन्हें क्या पता था कि पत्नी के व्रत रखने से पहले ही मौत उन्हें आगोश में ले लेगी. लाल कमल एक ओर छिप कर उन पर निगाहें रखने लगा.

सामान ले कर जैसे ही पारसराम घर की तरफ चले, लाल कमल भी बाइक से धीरेधीरे उन के पीछे चल दिया. उस ने हेलमेट लगा रखा था. उस के पीछे दिनेश बैठा था. लाल कमल ने दिनेश को शिकार दिखा दिया था. जैसे ही पारसराम अपने घर के दरवाजे पर पहुंचे, दिनेश ने बाइक से उतर कर पारसराम पर चाकू से कई वार किए.

लाल कमल ने कुछ आगे जा कर बाइक खड़ी कर ली थी. अचानक हमला होने से वह घबरा गए. वह चिल्लाए तो दिनेश तेजी से भाग कर मोटरसाइकिल पर बैठ गया तो दोनों वहां से नौ दो ग्यारह हो गए.

हत्या करने के बाद वे सीधे पानीपत गए. सब से पहले उन्होंने चांदनी बाग रोड पर छिपाए गए अपने मोबाइल फोन उठाए. फिर गोहाना रोड से पहले गऊशाला की प्याऊ पर दिनेश ने खून से सने हाथ धोए. फिर देवी माता रोड पर नाले के पास वह चाकू फेंक दिया, जिस से मर्डर किया था.

पुलिस ने लाल कमल और दिनेश मणिक उर्फ दीपू से पूछताछ करने के बाद उन्हें 9 नवंबर, 2013 को हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर उन्हें उसी दिन तीस हजारी कोर्ट में महानगर दंडाधिकारी सुनील कुमार शर्मा के समक्ष पेश कर के उन का 2 दिनों का पुलिस रिमांड लिया.

रिमांड अवधि में लाल कमल और दिनेश की निशानदेही पर पुलिस ने नाले के पास से चाकू, खून सने कपड़े, मोटरसाइकिल, हेलमेट आदि बरामद कर लिए. रिमांड अवधि समाप्त होने के बाद पुलिस ने 11 नवंबर, 2013 को लाल कमल पुंज उर्फ सोनू और दिनेश मणिक उर्फ दीपू को पुन: न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया. कथा लिखे जाने तक दोनों अभियुक्त जेल में बंद थे.

कथा पुलिस सूत्रों और जनचर्चा पर आधारित कथा में निष्ठा परिवर्तित नाम है.

 

Crime stories : तीन दोस्तों ने मिलकर लंगोटिया यार को फावड़े से काटा

Crime stories : औरत जब भाइयों में दरार डाल देती है तो दोस्त क्या चीज हैं. रामू के दोस्तों ने जब उस से अपनी माशूका के पास ले चलने को कहा तो उस की देह में आग लग गई और फिर जो हुआ, वह अप्रत्याशित था. मैनपुरी के मोहल्ला हिंदपुरम की रहने वाली कुसुमा पूरे मोहल्ले की भाभी थी. ज्यादातर लड़के उस की गदराई जवानी के दीवाने थे. वे उस के घर के चक्कर लगाते रहते थे. कुसुमा घर पर 2 बच्चों के साथ रहती थी, जबकि उस का पति मुकेश दिल्ली में रहता था. वह 2-3 महीने में 1-2 दिनों के लिए ही घर आता था. पति से दूर रहना कुसुमा को अच्छा नहीं लगता था. वह पति के साथ दिल्ली में रहना चाहती थी.

लेकिन मुकेश की इतनी तनख्वाह नहीं थी कि वह बीवीबच्चों को साथ रख सकता. वह 2-3 महीने में 1-2 दिनों के लिए पत्नी और बच्चों से मिलने घर आ जाता था. कुसुमा जवान थी. उस की भी कुछ हसरतें थीं. लेकिन मुकेश उस तरफ ध्यान नहीं देता था. नतीजतन कुसुमा का झुकाव मोहल्ले के लड़कों की ओर होने लगा. उन्हीं लड़कों में एक रामू था, जो कुसुमा के घर से तीसरे नंबर के मकान में रहता था. रामू के पिता फूल सिंह की मौत हो चुकी थी. उस के 4 भाई और 2 बहनें थीं. पिता की मौत के बाद मां शांति ने जैसेतैसे घरपरिवार संभाला था. 19 साल का रामू कुसुमा का ऐसा दीवाना हुआ था कि जब देखो, तब उस के घर के चक्कर लगाता रहता था. शांति को जब इस बात का पता चला तो उस ने रामू को समझाया, ‘‘बेटा, कुसुमा अच्छी औरत नहीं है, इसलिए उस के यहां ज्यादा आनाजाना ठीक नहीं है.’’

मगर रामू कुसुमा के आकर्षण में इस कदर बंधा था कि उसे उस के अलावा कुछ अच्छा ही नहीं लगता था. इसीलिए उस ने मां की बात एक कान से सुनी और दूसरे से निकाल दी. कुसुमा चालू किस्म की औरत थी. रामू उम्र के उस पड़ाव पर था, जहां से फिसलने में देर नहीं लगती. कुसुमा और रामू की जरूरत एक ही थी, इसलिए उन के बीच नजदीकियां और अपनापन बढ़ने लगा. एक शाम कुसुमा के दरवाजे पर दस्तक हुई तो उस ने दरवाजा खोला. सामने रामू खड़ा था. उसे देखते ही वह चौंक कर बोली, ‘‘रामू…तुम. आओ, अंदर आ जाओ.’’

रामू अंदर आ गया. उस के हाथ में एक पैकेट था. कुसुमा रसोई में जा कर चाय बना लाई. रामू चाय पीने लगा तो कुसुमा ने कहा, ‘‘पैकेट में क्या है?’’

‘‘खुद ही देख लो.’’ रामू ने शरमाते हुए कहा. कुसुमा ने पैकेट खोला तो उस में साड़ी दिखी. वह बोली, ‘‘रामू, साड़ी बहुत अच्छी है. अपनी मां के लिए लाए हो क्या?’’

‘‘तुम भी भाभी, कैसी बातें करती हो? क्या मैं तुम्हारे लिए एक साड़ी भी नहीं ला सकता? मुझे दुकान पर पसंद आ गई तो मैं ने तुहारे लिए खरीद ली. तुम पहनोगी न?’’

‘‘हां…हां, क्यों नहीं. जब तुम इतने प्यार से लाए हो तो जरूर पहनूंगी. लो अभी पहन कर दिखाती हूं.’’ कह कर कुसुमा साड़ी ले कर अंदर चली गई. रामू इस बात से खुश हो रहा था कि कुसुमा ने उस के द्वारा दी गई पहली चीज स्वीकार कर ली. कुछ ही देर में कुसुमा वह साड़ी पहन कर आई तो रामू उसे देखते हुए बोला, ‘‘भाभी इस साड़ी में तुम बहुत ही खूबसूरत लग रही हो. इसे तुम मेरे प्यार का पहला तोहफा समझो.’’

‘‘प्यार का तोहफा? यह तुम क्या कह रहे हो?’’ कुसुमा बोली.

‘‘हां भाभी, सचमुच रातदिन तुम मेरे जेहन में बसी रहती हो. जब मैं काम पर होता हूं, तब भी तुम्हारे ही बारे में सोचता रहता हूं.’’

चाहती उसे कुसुमा भी थी, लेकिन वह इजहार के लिए रामू की तरह बेचैन नहीं थी. इसलिए रामू की बातें सुन कर कुछ पल के लिए वह चुपचाप उसे देखती रही. रामू का मन कर रहा था कि वह कुसुमा को बांहों में भर कर अपनी मोहब्बत का इजहार कर दे, लेकिन ऐसा करने की उस की हिम्मत नहीं हो रही थी. तभी कुसुमा ने रामू के पास आ कर रामू की बातों को टटोलते हुए कहा, ‘‘क्या तुम सचमुच मुझ से प्यार करते हो?’’

‘‘हां, करता हूं. चाहो तो मेरे दिल की आवाज खुद सुन लो.’’ रामू चहक कर बोला.

‘‘मुझे छोड़ कर भाग तो नहीं जाओगे?’’

‘‘कभी नहीं. अपनी जान दे सकता हूं, लेकिन तुम्हें छोड़ नहीं सकता. यह मेरा वादा है.’’

‘‘तो ठीक है, आज रात को आ जाना. फुरसत में बातें करेंगे. मैं तुम्हारा इंतजार करूंगी.’’ कुसुमा ने कहा.

कुसुमा के इस प्रस्ताव से रामू का दिल खुशी से उछल पड़ा. वह रात को आने का वादा कर के चला गया. कुसुमा के घर से जाने के बाद रामू का मन किसी काम में नहीं लग रहा था. वह बस यही सोच रहा था कि जल्द से जल्द दिन ढल कर अंधेरा हो जाए, जिस से वह कुसुमा के साथ मौजमस्ती करे. कहते हैं, इंतजार के पल लंबे हो जाते हैं. यही हाल राजू का भी हो रहा था. वह अंधेरा होने का बड़ी बेसब्री से इंतजार कर रहा था. खैर, रोजाना की तरह उस दिन भी शाम हुई, लेकिन वह दिन रामू के लिए बहुत बड़ा हो गया था.

शाम का खाना खाने के बाद रामू कुछ देर तक इधरउधर घूमता रहा. उस के बाद मौका देख कर कुसुमा के घर में घुस गया. कुसुमा ने खाना खिला कर बच्चों को पहले ही सुला दिया था. जैसे ही रामू ने उस के दरवाजे पर दस्तक दी, कुसुमा ने दरवाजा खोल दिया. रामू को देख कर मुसकराते हुए बोली, ‘‘टाइम के बड़े पाबंद हो. अंदर आ जाओ.’’

‘‘भाभी हम वादा कर के मुकरने वालों में में नहीं हैं.’’ रामू ने अंदर आते हुए कहा.

कुसुमा ने कुंडी बंद कर दी. रामू उस के बेड पर जा कर बैठ गया. कुसुमा उस के पास बैठ गई और उस का हाथ दोनों हाथों में ले कर बोली, ‘‘रामू, अब तुम मुझे भाभी नहीं कहोगे. आज से तुम मेरा नाम ले पुकारोगे.’’

किसी महिला ने रामू का हाथ पहली बार थामा था. इसलिए उस का शरीर सिहर उठा. दोनों के बीच अब किसी तरह की रोकटोक नहीं थी, इसलिए रामू ने कुसुमा के गालों पर होंठ रखते हुए कहा, ‘‘ठीक है, आज से तुम्हें जो अच्छा लगेगा, वही कहूंगा.’’

इस के बाद दोनों एकदूसरे के बदन से खेलने लगे. रामू ने पहली बार इस सुख का अनुभव किया था, इसलिए उसे बहुत अच्छा लगा. लेकिन घर पहुंच कर रामू को लगा कि कुसुमा के साथ संबंध बना कर उस ने अच्छा नहीं किया. अपराधबोध की वजह से उस ने कुसुमा के घर की ओर जाना ही बंद कर दिया. शायद रामू यह नहीं जानता था कि जिस दलदल में उस ने कदम रख दिया है, वहां से निकलना आसान नहीं है.

3-4 दिनों बाद कुसुमा ने ही रामू को फोन किया, ‘‘रामू, कई दिन हो गए तुम दिखाई नहीं दिए, क्या कहीं बाहर चले गए हो क्या?’’

‘‘नहीं, मैं तो घर में ही हूं.’’

‘‘तुम्हारी तबीयत तो ठीक है?’’

‘‘हां.’’

‘‘बातें तो तुम बड़ी लंबीचौड़ी कर रहे थे. कहां गई तुम्हारी वह मर्दानगी? तुम इसी समय आ जाओ, तुम से एक जरूरी बात करनी है. न चाहते हुए भी रामू कुसुमा के घर पहुंच गया. और फिर वही सब हुआ, जो कुसुमा चाहती थी. इस के बाद कुसुमा का जब भी मन होता, रामू को फोन कर के बुला लेती और अपने मन की करती. इस तरह रामू उस के हाथ की कठपुतली बन कर रह गया. रामू दिन में तो घर से गायब रहता ही था, कुसुमा के पास आनेजाने की वजह से रात में भी गायब रहने लगा. शांति ने जब बेटे के घर से गायब रहने की वजह का पता किया तो उन्हें पता चलते देर नहीं लगी कि उस का बेटा कुसुमा के जाल में फंस गया है.

रामू की इस करतूत से पूरा परिवार हैरान रह गया था. यह कोई अच्छी बात नहीं थी, इसलिए मां ने ही नहीं, भाइयों ने भी रामू को रोका. मारपीट भी की, लेकिन रामू नहीं माना तो नहीं माना. कुसुमा से उसे जो सुख मिलता था, उस की चाहत में वह उस के पास पहुंच ही जाता था. परेशान हो कर एक दिन शांति कुसुमा के घर जा पहुंची और उसे बुराभला कहने लगी. तब कुसुमा ने कहा, ‘‘काकी, मैं तुम्हारे बेटे को बुलाने नहीं जाती, वह खुद ही मेरे पास आता है. तुम उसी को क्यों नहीं रोक लेती. अब तुम्हारे ही घर कोई आएगा, तो क्या तुम उसे भगा दोगी? तुम उसे तो रोकती नहीं, मुझे बेकार में बदनाम करने चली आई.’’

शांति चुपचाप घर लौट आई. उसी बीच मुकेश गांव आया तो किसी ने उस से रामू और कुसुमा के संबंधों के बारे में बताया. उस ने इस बारे में कुसुमा से पूछा तो रोते हुए उस ने कहा, ‘‘मैं कब से कह रही हूं कि तुम मुझे अपने साथ ले चलो. बीवी को इस तरह गांव में अकेली छोड़ोगे तो दिलजले लोग ऐसी ही बातें करेंगे.’’

मुकेश को लगा कि कुसुमा सच कह रही है, इसलिए उस की बात पर विश्वास कर के वह निश्चिंत हो कर दिल्ली चला गया. लेकिन अब मुकेश जब भी घर आता, गांव का कोई न कोई आदमी कुसुमा और रामू को ले कर उसे जरूर टोकता. इन बातों से उसे लगने लगा कि कुछ न कुछ जरूर गड़बड़ है. इस के बाद उस ने कुसुमा को मारपीट कर धमकाया कि अब अगर उस ने उस के बारे में कुछ सुना तो वह उसे उस के मायके पहुंचा देगा. यही नहीं, उस ने शांति के घर जा कर उस से भी कहा कि वह रामू को रोके अन्यथा ठीक नहीं होगा.

इस पर जलीभुनी शांति ने कहा, ‘‘मैं खुद ही तुम्हारी पत्नी से परेशान हूं. इस के लिए मैं पंचायत बुलाने वाली हूं.’’

शांति की इस धमकी से मुकेश परेशान हो गया. अगर शांति ने पंचायत बुलाई तो गांव में उस की इज्जत का जनाजा निकल जाएगा. नाराज और दुखी मुकेश ने सारा गुस्सा और क्षोभ घर आ कर कुसुमा की पिटाई कर के निकाला. अगले दिन शांति ने पंचायत बुलाई, जिस में मुकेश और कुसुमा को भी बुलाया गया. पंचायत में कुसुमा ने साफ कहा कि रामू से उस का कोई संबंध नहीं है. इस बात को ले कर उसे बेकार ही गांव में बदनाम किया जा रहा है. पंचों ने जब मुकेश से कुछ कहना चाहा तो उस ने कहा, ‘‘मैं इस मामले में कुछ नहीं कर सकता, क्योंकि कुसुमा अब मेरे वश में नहीं है.’’

पंचायत बिना किसी फैसले के ही खत्म हो गई. मुकेश दूसरे दिन शाम को दिल्ली चला गया. इस पंचायत के बाद मोहल्ले का हर आदमी कुसुमा को अपना दुश्मन नजर आने लगा. इसलिए वह मोहल्ले के हर आदमी से पंगा ले कर उस की ऐसीतैसी करने लगी. उस की इस हरकत से हर कोई उस से घबराने लगा. अब किसी की हिम्मत उस से कुछ कहने की नहीं पड़ती थी. इस के बाद उस की और रामू की मोहब्बत की गाड़ी आराम से चलने लगी. डर के मारे मोहल्ले वालों ने उन की ओर से आंखें मूंद लीं.

शांति रामू को कुसुमा से किसी भी तरह अलग नहीं कर पाई तो उस ने सोचा कि रामू की शादी कर दे. नईनवेली दुलहन पा कर वह खुद ही कुसुमा का पीछा छोड़ देगा. उस ने रामू के लिए लड़कियां देखनी शुरू कर दीं. जल्दी ही उस ने जिला मैनपुरी के थाना एलांद के गांव सुशनगढ़ी के रहने वाले मान सिंह की बेटी सुमन से उस की शादी तय कर दी. कुसुमा को जब पता चला कि रामू की शादी तय हो गई है तो वह सुलग उठी. वह किसी भी कीमत पर यह शादी नहीं होने देना चाहती थी. भला वह कैसे चाहती कि उस का प्रेमी किसी से शादी कर के उसे सुलगने के लिए छोड़ दे. इसलिए उस ने रामू से साफसाफ कह दिया कि अगर उस ने यह शादी की तो वह जान दे देगी.

‘‘शादी के बाद भी मैं तुम्हारा ही रहूंगा भाभी. मां बहुत परेशान हैं. मैं अब उसे और दुखी नहीं कर सकता.’’ रामू ने कुसुमा को समझाना चाहा.

‘‘वाह, क्या बात कही है? तुम्हारी वजह से मैं कितनी बदनामी झेल रही हूं, तुम्हें पता है. लोग मुझे चरित्रहीन कहते हैं. अब बीच मंझधार में तुम मुझे छोड़ कर किसी और का होना चाहते हो. कान खोल कर सुन लो, जीते जी मैं ऐसा कभी नहीं होने दूंगी.’’ कुसुमा ने चेतावनी दी.

रामू घर वालों के बारे में सोच रहा था कि वह घर वालों को क्या जवाब दे. तभी कुसुमा ने उस का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘चलो, हम कहीं दूर भाग चलते हैं. अगर तुम ने ऐसा नहीं किया तो मेरा मरा मुंह देखोगे.’’

कुसुमा के तेवर देख कर रामू को यकीन हो गया कि अगर उस ने शादी कर ली तो कुसुमा सचमुच आत्महत्या कर लेगी. तब वह फंस सकता है. काफी सोचसमझ कर उस ने गहरी सांस ले कर कहा, ‘‘ठीक है, तुम तैयारी करो. मैं तुम्हें साथ ले कर भागने को तैयार हूं.’’

1 जून, 2013 को रामू की शादी होनी थी. दोनों ओर जोरशोर से शादी की तैयारियां चल रही थीं. शादी की तारीख से 2 दिन पहले रामू घर से गायब हो गया. रामू का गायब होना घर वालों के लिए सदमे की तरह था. उन के लिए परेशानी यह थी कि वे लड़की वालों को क्या जवाब देंगे. रिश्तेदारों को कौन सा मुंह दिखाएंगे. क्योंकि अब तक कार्ड भी बंट गए थे. कुसुमा भी घर से गायब थी, इसलिए सब को पूरा यकीन था कि जहां भी हैं, दोनों एक साथ हैं. सब से बड़ी परेशानी यह थी कि लड़की वालों को कैसे समझाया जाए. शांति बेटे मनोज को ले कर सुशनगढ़ी पहुंची. जब उस ने मान सिंह को सारी बात बताई तो उस ने अपना सिर पीट लिया. उस की बेटी का क्या होगा, कौन करेगा उस से शादी? लोग पूछेंगे कि शादी क्यों टूटी तो वह क्या जवाब देगा?

मान सिंह को इस तरह परेशान देख कर शांति ने कहा, ‘‘हम बहुत शर्मिंदा हैं समधीजी. अब इज्जत बचाने का एक ही रास्ता है. अगर आप मान जाएं तो सब ठीक हो जाएगा.’’

‘‘कौन सा रास्ता?’’ मान सिंह ने पूछा.

‘‘मेरे बेटे शिवशंकर को तो आप ने देखा ही है. वह बहुत ही नेक है. कमाताधमाता भी ठीकठाक है. वह आप की बेटी को खुश रखेगा. अगर आप तैयार हों तो…?’’

मान सिंह के पास उन की बात मानने के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं था. उस ने उदास मन से कहा, ‘‘ठीक है, इज्जत बचाने के लिए शिवशंकर से ही सुमन की शादी कर देता हूं.’’

इस के बाद शिवशंकर ने चुपचाप मां की बात मान ली तो 1 जून, 2013 को सुमन से उस की शादी हो गई. इस तरह उस ने 2 परिवारों की इज्जत बचा ली.

11 जून, 2013 को रामू और कुसुमा लौट आए. पत्नी की इस हरकत की जानकारी दिल्ली में रह रहे मुकेश को भी हो गई थी. लेकिन वह हालात के सामने हारा हुआ था. इसलिए चुप्पी साधे दिल्ली में ही पड़ा रहा. सप्ताह भर बाद रामू घर लौटा तो सभी ने उसे खूब खरीखोटी सुनाई. इस पर उस ने कहा, ‘‘मैं सुमन को धोखा नहीं देना चाहता था, इसलिए मैं कुसुमा के साथ चला गया था.’’

शांति ने सोचा, जो होता है, वह अच्छा ही होता है. रामू की मुलायम सिंह, राहुल और तेजा से खूब पटती थी. इन में से मुलायम सिंह और तेजा पास के ही गांव के रहने वाले थे, जबकि राहुल मैनपुरी के कुरावली कस्बे का रहने वाला था. एक दिन सभी एक साथ एक ढाबे में बैठे खापी रहे थे, तभी राहुल न कहा, ‘‘यार रामू, कभी हम लोगों को भी कुसुमा भाभी से मिलवा.’’

‘‘तुम लोग उस से मिल कर क्या करोगे?’’ रामू ने पूछा. तेजा ने हंसते हुए कहा, ‘‘जो तू करता है, वही हम लोग भी करेंगे.’’

‘‘खबरदार, कुसुमा के बारे में अब एक भी शब्द बोला तो…?’’ रामू गुर्राया.

‘‘इस में तुझे मिर्चें क्यों लग रही है? कौन सी वह तेरी बीवी है?’’ मुलायम सिंह ने रामू के कंधे पर हाथ रख कर कहा.

‘‘यह अच्छी बात नहीं है, इसलिए मैं चाहता हूं कि तुम लोग उस की बात बिलकुल मत करो.’’ कह कर रामू उठ खड़ा हुआ.

राहुल ने रामू का हाथ पकड़ कर बैठाने की कोशिश करते हुए कहा, ‘‘भई, हम सब दोस्त हैं, इसलिए जो भी मिले, हम सब को मिलबांट कर खाना चाहिए.’’

राहुल की यह बात रामू को इतनी बुरी लगी कि उस ने गुस्से में उसे 2-4 तमाचे जड़ दिए. मुलायम ने रामू को धकेल कर अलग करते हुए कहा, ‘‘यह तुम ने अच्छा नहीं किया रामू.’’

‘‘कान खोल कर सुन लो, तुम में से किसी ने भी मेरी जिंदगी में दखल देने की कोशिश की तो मैं उस के साथ भी यही करूंगा.’’ कह कर रामू चला गया.

बाकी तीनों दोस्त रामू के इस रवैये से सन्न थे. किसी से कुछ कहते नहीं बन रहा था. आखिर चुप्पी मुलायम सिंह ने तोड़ी. ‘‘हम इतने भी गएगुजरे नहीं हैं कि इस की मारपीट चुपचाप सह लेंगे.’’

रामू के ये सभी दोस्त उस से जल रहे थे. वे कुसुमा को पाना चाहते थे, लेकिन रामू ने उन की इच्छाओं पर पानी फेर दिया था. इसलिए वे रामू को सबक सिखाने के बारे में सोचने लगे. 2 दिनों तक तीनों रामू द्वारा किए अपमान का बदला लेने की साजिश रचते रहे. अंतत: उन्होंने तय किया कि रामू को ऐसी सजा दी जाए कि कोई दोस्त फिर कभी अपने किसी दोस्त का इस तरह अपमान न कर सके. इस के बाद उन्होंने योजना भी बना डाली. उसी योजना के तहत तीनों ने रामू से माफी मांगी. रामू ने सोचा कि जब इन्हें अपनी गलती का अहसास हो गया है तो उसे भी अपनी गलती के लिए माफी मांग लेनी चाहिए. उस ने भी दोस्तों से अपनी गलती के लिए माफी मांग ली. इस के बाद मुलायम ने कहा, ‘‘इस खुशी में आज रात मैं सभी को पार्टी दे रहा हूं.’’

‘‘क्या खिलाएगा पार्टी में?’’ रामू ने पूछा.

‘‘भई पार्टी है तो कुछ अच्छा ही होगा. शाम को हम तुझे तेरे घर लेने आएंगे, तू तैयार रहना.’’ तेजा ने कहा.

शाम को रामू घर में ही था. उस के दोस्त उसे बुलाने आए तो मां को बता कर वह उन के साथ चला गया. एक ढाबे से गोश्त और रोटियां पैक कराई गईं. इस के बाद शराब की दुकान से एक बोतल शराब खरीदी गई. सारी व्यवस्था कर के तय किया गया कि भूरा की दुकान की छत पर बैठ कर खानापीना होगा. भूरा की दुकान हिंदपुरम कालोनी के सामने ही थी. कालोनी अभी नईनई बस रही है, इसलिए यहां अभी इक्कादुक्का मकान ही बने हैं. दूसरी ओर खेत हैं, इसलिए लोगों का आनाजाना इधर कम ही होता है. यही वजह थी कि अंधेरा होते ही इधर सन्नाटा पसर जाता था. यह मैनपुरी का काफी संवेदनशील इलाका माना जाता है.

तीनों दोस्त रामू को साथ ले कर भूरा की दुकान की छत पर आ गए. इस के बाद बातचीत के बीच खानापीना होने लगा. रामू काफी अच्छे मूड में था, इसलिए उस ने शराब थोड़ी ज्यादा पी ली. दोस्तों ने उसे पिलाई भी कुछ ज्यादा. काफी देर हो गई तो रामू ने कहा, ‘‘भई, अब घर चलना चाहिए.’’

‘‘कौन से घर, मां के या माशूका के?’’ मुलायम सिंह ने छेड़ा. रामू लड़ाईझगड़े के मूड़ में नहीं था, इसलिए उठ कर खड़ा हो गया. वह चलता, उस के पहले ही मुलायम सिंह ने उसे छेड़ते हुए कहा, ‘‘चल, हम भी तेरे साथ तेरी माशूका के यहां मौजमस्ती करने चलते हैं.’’

दरअसल, मुलायम सिंह उसे उकसाना चाहता था. मुलायम की इस बात पर रामू को गुस्सा आ गया तो वह उस की ओर झपटा. फिर क्या था, तीनों दोस्तों ने उसे दबोच कर गिरा दिया. इस के बाद वहां रखे फावड़े से उस की गर्दन काट दी. अब उन्हें लाश को ठिकाने लगाना था. काफी सोचविचार कर वे लाश को घसीट कर नीचे ले आए और सड़क के उस पार बहने वाले नाले में फेंक कर भाग खड़े हुए. काफी रात बीत गई और रामू नहीं लौटा तो शांति परेशान होने लगी. उस ने सोचा कि वह कुसुमा के यहां होगा. इसलिए उस ने सवेरा होते ही मनोज को कुसुमा के घर भेजा. तब पता चला कि रात में वह कुसुमा के घर भी नहीं था. इस के बाद उस की खोज शुरू हुई.

रामू अपने दोस्तों के साथ गया था. उस के दोस्तों से उस के बारे में पूछा जाता, उस के पहले ही किसी लड़के ने आ कर बताया कि रामू की लाश सड़क के किनारे बहने वाले नाले में पड़ी है. कोतवाली पुलिस को सूचना दी गई. सूचना मिलते ही इंस्पेक्टर शंकर सिंह और क्षेत्राधिकारी वी.पी. सिंह पुलिस बल के साथ घटनास्थल पर आ पहुंचे. निरीक्षण में उन्होंने देखा कि खून नाले से सामने की दुकान तक फैला है. छत पर जाने वाली सीढि़यों पर भी खून फैला था. पुलिस छत पर पहुंची तो वहां भी खून फैला दिखाई दिया. वहीं खून से सना फावड़ा भी पड़ा था. इस का मतलब यह था कि उसी फावड़े से छत पर मृतक की हत्या की गई थी.

पूछताछ में पता चल गया कि मृतक के मोहल्ले की ही एक महिला से अवैध संबंध थे. घरवालों ने भी बता दिया था कि कल शाम को रामू को उस के 3 दोस्त बुला कर ले गए थे. इस के बाद रामू के छोटे भाई शिवशंकर ने मैनपुरी कोतवाली में भाई की हत्या की रिपोर्ट दर्ज करने के लिए जो तहरीर दी, उस के आधार पर उसे पुलिस ने अपराध संख्या 641/13 पर भादंवि की धारा 302, 201, 120बी के तहत मुलायम सिंह पुत्र सूरज, निवासी नगला पंजाबा, राहुल पुत्र किशनलाल, निवासी कुरावली तथा तेजा पुत्र बाबूराम, निवासी हिंदपुरम कालोनी और कुसुमा पत्नी मुकेश, निवासी हिंदपुरम कालोनी के खिलाफ दर्ज कर लिया. मुलायम सिंह, तेजा और राहुल तो पहले से ही फरार थे, कुसुमा को भी जब पता चला कि रिर्पोट में उस का भी नाम है तो वह भी फरार हो गई.

लेकिन पुलिस ने जाल बिछा कर मुलायम सिंह, तेजा और राहुल को उसी दिन यानी 16 जुलाई, 2013 की देर शाम गिरफ्तार कर लिया. तीनों को थाने ला कर पूछताछ की गई तो उन्होंने अपना जुर्म स्वीकार कर के रामू की हत्या की पूरी कहानी सुना दी. अगले दिन पुलिस ने तीनों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. पूछताछ में उन्होंने साफसाफ कहा था कि रामू की हत्या में कुसुमा शामिल नहीं थी. लेकिन रिपोर्ट में उस का नाम शामिल था, इसलिए 26 जुलाई, 2013 को उस ने अदालत में आत्मसमर्पण कर दिया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

इस तरह कुसुमा की वासना की आग ने अपना घर तो जलाया ही, शांति के घर को भी नहीं बख्शा. शांति का कहना है कि रामू ने तो नादानी की ही, कुसुमा भी कम गुनहगार नहीं है. उसी ने उस के मासूम बेटे को गुमराह किया था. कथा लिखे जाने तक चारों आरोपी जेल में थे.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारि

जीजासाली का खूनी इश्क : प्रेम ने तोड़ी सीमा

UP News : 9 साल पहले जब अजय साहू उर्फ मोहित ने सरिता से विवाह किया था, तब सरिता से छोटी साली कविता 15 साल की थी. इस के 3 साल बाद 18 साल की उम्र में वह भरीपूरी युवती लगने लगी थी. ससुराल में अजय के सासससुर के अलावा उस की 2 सालियां कविता और सविता थीं, कोई साला नहीं था. सविता काफी छोटी थी, इसलिए अजय को खिलानेपिलाने व उस की सुखसुविधा का खयाल रखने की जिम्मेदारी बड़ी साली कविता की थी. कविता भी अपने जीजा का हुक्म मानने के लिए एक पैर पर खड़ी रहती थी.

जीजा की जरूरतों का खयाल रखना साली का कर्त्तव्य होता है, इस में कोई नई बात नहीं है. अजय भी इन बातों को सामान्य रूप से लेता था. लेकिन एक दिन अचानक ही वह कविता के अद्भुत सौंदर्य की तेज रोशनी में चौंधिया गया. एक दिन जब अजय ससुराल पहुंचा तो कविता किसी परिचित के यहां मांगलिक समारोह में जाने के लिए तैयार हो रही थी. कविता ने सुर्ख लाल जोड़ा पहन रखा था और अपने बाल खुले छोड़ रखे थे. कलाई में चूडि़यां और चेहरे पर सादगी भरा शृंगार. आंखों में काजल की रेखा और होंठों पर हलकी सी लिपस्टिक. उसे देख कर अजय की नजरें ऐसी चिपकीं कि हटने को ही तैयार नहीं हुईं.

कविता ने अजय को मीठा और पानी ला कर दिया, फिर चाय बना कर पिलाई. कुछ देर उस के पास बैठ कर अपनी बहन की खैरियत पूछी. फिर उस के पास से उठते हुए बोली, ‘‘जीजाजी, आप आराम करो, मैं जल्दी ही लौट आऊंगी.’’

कविता चली गई और वह देखता रह गया. अजय बैड पर लेट गया और कविता के बारे में सोचने लगा कि इतनी सुंदर तो सरिता तब भी नहीं लगी थी, जब दुलहन बन कर उस के घर आई थी. अजय ने अपने मन से कविता का खयाल निकालने की बहुत कोशिश की, पर कामयाब नहीं हो सका. कविता के सौंदर्य की तेज रोशनी से उस ने जितना दूर जाना चाहा, उतना ही मस्तिष्क से अंधा होता गया. अजय सोचने लगा कि मेरी शादी भले ही सरिता से हो गई पर कविता भी तो उस की साली ही है. साली यानी आधी घरवाली.

अजय के मन में पाप समाया तो वह कविता को पाने की जुगत में लग गया. उत्तर प्रदेश के कौशांबी जिले के गांव पूरब थोक में राजेश चंद्र अपने परिवार के साथ रहते थे. वह खेतीबाड़ी का काम करते थे. परिवार में पत्नी उषा और 3 बेटियां सरिता, कविता और सविता थीं. बेटा न होने का राजेश को कतई गम नहीं था. उन्होंने तीनों बेटियों की बेटों से बढ़ कर परवरिश की थी. सरिता ने इंटर की पढ़ाई पूरी कर ली थी. कौशांबी के ही कुम्हियवा गांव में रामहित साहू रहते थे. वह भी खेतीकिसानी करते थे. उन के 3 बेटे थे, जिस में अजय उर्फ मोहित सब से बड़ा था. अजय ने इंटरमीडिएट तक पढ़ाई करने के बाद अपना खुद का काम करने का निर्णय लिया.

काफी सोचविचार के बाद उस ने डीजे संचालन का काम शुरू किया. उस का यह काम अच्छा चल गया. अपने इसी काम के दौरान एक वैवाहिक समारोह में उस की मुलाकात सरिता से हुई. सरिता उस समारोह में काफी सजधज कर आई थी. इस वजह से वह काफी खूबसूरत दिख रही थी. डीजे पर डांस करने के दौरान सरिता ने ‘डीजे वाले बाबू मेरा गाना बजा दो’ गाना चलाने की मांग की. अजय औपरेटर के पास ही खड़ा था. उस की पीठ सरिता की तरफ थी. मधुर आवाज सुनते ही अजय पलटा तो पलटते ही सरिता को देखा तो देखता ही रह गया. अजय काफी स्मार्ट था. उसे अपनी तरफ देखते पा कर सरिता भी लजा गई और बोली, ‘‘सौरी, मैं आप को डीजे वाला समझ बैठी. इसलिए अपनी पसंद का गाना चलाने के लिए कह दिया.’’

अजय उस के भोलेपन पर मुसकराते हुए बोला, ‘‘आप से कोई गलती नहीं हुई, मैं डीजे वाला बाबू ही हूं यानी इस डीजे का मालिक.’’

‘‘ओह…तो यह बात है, तो मेरा पसंदीदा गाना लगवा दें, जिस से मैं डांस कर सकूं.’’ सरिता ने तिरछी नजरों से अजय को निहारते हुए कहा.

अजय ने औपरेटर को बोल कर ‘डीजे वाले बाबू…’ गाना लगवा दिया. गाना भारीभरकम स्पीकरों पर गूंजने लगा तो सरिता अपनी सहेलियों के साथ डांस करने लगी. वह डांस कर जरूर रही थी, लेकिन उस का सारा ध्यान अजय पर ही था. अजय भी उसे देखते हुए मुसकरा रहा था. वह इशारे से बारबार सरिता की तारीफ भी कर रहा था. उस की तारीफ पा कर सरिता लजा कर दूसरी ओर देखने लगती थी. डांस खत्म होने के बाद भी दोनों वहां से हटने को तैयार नहीं थे. उन की निगाहें मिलने के बाद अब उन के दिल मिलने को तड़प रहे थे. वह तड़प उन की निगाहों में बखूबी नजर आ रही थी.

आखिर अजय ने उसे इशारे से अपने पीछेपीछे आने को कहा तो सरिता उस का इशारा समझ कर दिल के हाथों मजबूर हो कर उस के पीछेपीछे चली गई.

अजय एकांत में सुनसान जगह पर खड़ा हुआ तो शरमातेसकुचाते सरिता भी वहां पहुंच गई और पूछने लगी, ‘‘आप ने मुझे इशारे से अपने पीछे आने को क्यों कहा?’’

‘‘क्यों…क्या तुम्हें वास्तव में नहीं पता?’’ अजय उस की आंखों में देखते हुए बोला, ‘‘जरा अपने दिल पर हाथ रख कर अपनी धड़कनों को सुनो, जवाब मिल जाएगा.’’

‘‘सब दिल का ही तो मामला है, ये ऐसा मजबूर कर देता है कि इंसान अपनी सुधबुध खो बैठता है. और इंसान वही करने लगता है जो यह चाहता है. मैं भी दिल के हाथों मजबूर हो कर यहां आ गई हूं.’’ सरिता अपने दिल की व्यथा उजागर करती हुई बोली.

‘‘ये दिल ही तो है जब इस के अपने मन का मीत मिल जाता है तो प्यार की घंटी बजा कर आगाह कर देता है. देखो न, जब तुम्हारे दिल को मेरे दिल ने पुकारा तो तुम्हारा दिल मेरे पीछेपीछे खिंचा चला आया. कहने को हम अजनबी हैं, लेकिन हमारे दिलों ने हमारे बीच प्यार के रिश्ते की नींव रख दी है, जिस पर हमें मिल कर प्यार की इमारत खड़ी करनी है. अगर मेरा प्यार मेरा साथ मंजूर हो तो मेरे पास आ कर गले लग जाओ.’’ कहते हुए अजय ने बड़ी चाहत भरी नजरों से देखा तो सरिता उस की ओर खिंची चली गई और उस के गले लग गई.

यह ऐसा प्यार था, जिस ने बिना एकदूसरे के बारे में जाने उन के दिलों को मिला दिया था. उस के बाद उन दोनों ने एकदूसरे के बारे में जाना, खूब ढेर सारी बातें कीं. मोबाइल नंबर एकदूसरे को दिए. फिर मिलने का वादा कर के जुदा हो गए. उस दिन के बाद उन में बराबर बातें और मुलाकातें होने लगीं. करीब 9 साल पहले दोनों ने प्रेम विवाह कर लिया. सरिता के घर वालों को कोई ऐतराज नहीं था लेकिन अजय के घर वाले इस प्रेम विवाह के खिलाफ थे. अजय विवाह करने के बाद कौशांबी के सिराथू कस्बे में सैनी रोड पर किराए का कमरा ले कर सरिता के साथ रहने लगा. अजय अपनी जिंदगी से काफी खुश था.

सरिता की छोटी बहन कविता की खूबसूरती अजय का मन लुभाती तो थी, पर उस की नजरें बेईमान नहीं थीं. लेकिन उस दिन कविता को सुर्ख लाल जोड़े में सजासंवरा देखा तो वह उसे दुलहन सी हसीन लगी. बस, जीजा के मन में साली के लिए फितूर समा गया. कविता के बारे में सोचते हुए अजय सो गया और सपने में भी कविता उस का चैन हरती रही. सुखद सपनों में खोया अजय न जाने कब तक सोया रहता कि उस की सास उषा ने आ कर जगा दिया, ‘‘अजय बेटा उठो, शाम हो गई है.’’

अजय हड़बड़ा कर उठ बैठा, ‘‘मैं दोपहर को सोया था और अब शाम ढल रही है. मम्मी, आप ने मुझे जगाया क्यों नहीं.’’

‘‘तुम्हारे आराम में विघ्न न पड़े, इसलिए मैं ने नहीं जगाया.’’ उषा बोली, ‘‘तुम उठ कर हाथमुंह धो लो, तब तक कविता चाय बना कर ले आएगी.’’

अजय ने बाथरूम में जा कर हाथमुंह धोया और तौलिए से पोंछने के बाद कुरसी पर आ कर बैठ गया. सामने किचन में कविता खड़ी चाय बना रही थी.

अब उस के शरीर पर लाल जोड़े की जगह सफेद सलवारसूट था. कलाई में चूडि़यां भी नहीं थीं. उस ने चेहरा पानी से जरूर धो लिया था, पर मेकअप की मौजूदगी अब भी नुमायां हो रही थी.

आंखें मिलते ही कविता मुसकराई, ‘‘जीजाजी, खूब मजे से सोए.’’

अजय ने मन ही मन में जवाब दिया, ‘सपने में बिजली गिरा कर मासूम बन रही हो.’ लेकिन जुबान से बोला, ‘‘मजा ले कर सो रहा था या कजा से गुजर रहा था, बाद में बताऊंगा. पहले तुम बताओ, कब आईं?’’

‘‘थोड़ी ही देर में आ गई थी. घर आ कर देखा तो आप सो गए थे. इसलिए मैं भी घर के कामों मे लग गई थी.’’ कविता ने मुसकरा कर कहा और उस के सामने टेबल पर चाय का कप रख दिया. फिर उसी के पास बैठ गई.

अजय को उस समय वहां अपनी सास की मौजूदगी खल रही थी. कविता अकेली होती तो वह उसे रिझाने का प्रयास करता. अजय की मजबूरी यह थी कि वह न सास को वहां से जाने को कह सकता था और न कविता का हाथ पकड़ कर अकेले में बात करने के लिए ले जा सकता था. रात को खाना खाने के बाद अजय को कविता के कमरे में सोने के लिए पहुंचा दिया गया. और कविता सविता के कमरे में उस के साथ सो गई. अगले दिन सुबह होने पर अजय के सासससुर खेतों पर चले गए. सविता स्कूल चली गई. इस से अजय को कविता से बात करने का मौका मिल गया. उस समय कविता नहाने जा रही थी. अजय ने उस से पूछा, ‘‘कविता, नहाने के बाद तुम कौन से कपड़े पहनोगी?’’

कविता ने सहजता से उत्तर दिया, ‘‘मुझे कहीं जाना तो है नहीं, इसलिए घर में जो पहनती हूं, वही पहन लूंगी.’’

‘‘घर में पहनने वाले नहीं,’’ अजय ने मन की परतें उस के सामने खोलनी शुरू कर दीं, ‘‘तुम वही लाल जोड़ा पहनो, जो तुम ने कल पहना था.’’

‘‘वह रोज पहनने के लिए थोड़े ही है,’’ कविता मुसकरा कर बोली,‘‘ वह लाल जोड़ा विशेष अवसरों पर पहनने के लिए बनवाया है. कहीं विशेष प्रोग्राम होता है, तभी पहनती हूं.’’

अजय कविता के सामने आ कर खड़ा हो गया और उस की आंखों में आंखें डाल कर बोला, ‘‘तुम मुझे चाहती हो न?’’

कविता जीजा के मन का मैल नहीं समझ सकी. उस ने सहजता से जवाब दिया, ‘‘हां, चाहती हूं.’’

‘‘अगर तुम मुझे चाहती होगी तो वही लाल जोड़ा पहनोगी.’’

‘‘जीजाजी, मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि तुम लाल जोड़े को पहनने की जिद क्यों कर रहे हो?’’ वह बोली.

‘‘इसलिए कि उसे पहन कर तुम दुलहन जैसी लगती हो.’’

‘‘इस का मतलब यह हुआ कि आप लोग मेरा विवाह कर के मुझे इस घर से निकालने पर तुले हैं.’’ कविता हंसी, ‘‘अब तो मैं उसे हरगिज नहीं पहनने वाली.’’ कह कर कविता तेजी से बाथरूम की ओर बढ़ गई.

लड़की ‘न’ कहे तो उस की ‘हां’ समझना चाहिए, सोच कर अजय के होंठों पर मुसकान फैल गई. अजय पहले ही तैयार हो चुका था. इसलिए वह बैठ कर अखबार पढ़ने लगा. कुछ देर बाद जब कविता नहा कर तैयार हुई तो मन ही मन खयाली पुलाव पका रहे अजय ने देखा तो जैसे उस के अरमान बिखर कर रह गए. कविता ने लाल जोड़ा नहीं पहना था. उस ने मेहंदी कलर का सलवारसूट पहन रखा था. उस सलवार सूट में भी उस का सौंदर्य कयामत ढा रहा था. भीगे बालों से टपकती बूंदें उस के चेहरे पर आ कर ठहर गई थी, जिस से भीगाभीगा उस का सौंदर्य दिल को लुभाने वाला था. अजय बेकाबू हो उठा और उस ने कविता को बांहों में भर लिया और उस के गालों को चूम लिया.

कविता स्तब्ध रह गई. जीजा ने यह क्या गजब कर डाला. किसी तरह उस ने स्वयं को अजय के चंगुल से आजाद किया और कमरे से निकल भागी. तभी सास भी घर लौट आई. जबकि उन्होंने दीदी से प्रेम विवाह किया है. दोपहर को अजय को भोजन कराने के बाद उषा किसी काम से बाजार चली गई. अजय कविता के कमरे में गया और उस के पास बैठते हुए बोला, ‘‘कविता जब से तुम को लाल जोड़े में देखा है, दिल वश में नहीं है. कुछ करो कविता, वरना मैं तुम्हारे वियोग में तड़पतड़प कर मर जाऊंगा.’’

‘‘अब मैं क्या कर सकती हूं, आप की शादी तो सरिता दीदी से हो गई और वह भी आप ने लव मैरिज की है.’’

‘‘तुम पहले मिल जाती तो सरिता से बिलकुल शादी नहीं करता. लेकिन अब भी देर नहीं हुई है शादी टूटने में कितनी देर लगती है. तुम हां बोलो तो मैं सरिता को तलाक दे कर तुम से विवाह करने का जतन करूं.’’ अजय बेबाकी से बोला.

‘‘धत्त,’’ कविता हंसते हुए बैड से उठ खड़ी हुई, ‘‘जीजा, तुम पागल हो गए हो.’’

उस के बाद उस ने हाथ छुड़ाया और कमरे से जाने लगी तो अजय बेसब्र हो उठा और उस का हाथ पकड़ कर खींच कर बैड पर गिरा लिया. इस के बाद वह उसे पागलों की तरह चूमने लगा.

कविता के कुंवारे बदन को परपुरुष का कामुक स्पर्श मिला तो वह भी बहक गई. उस के बाद उन के बीच अनैतिक रिश्ता कायम हो गया. कविता को अपने जीजा के प्यार में गजब का न भूलने वाला आनंद मिला. इस के बाद जब तक अजय रहा, वह कविता के साथ मजे लेता रहा. संबंधों का यह सिलसिला चलता रहा. दूसरी ओर सरिता ने एक बेटी को जन्म दिया, जिस का नाम तनु रखा गया. लेकिन अजय तो कविता के प्यार में पागल था. अब वह ससुराल के अधिक चक्कर लगाने लगा. ससुराल वालों का माथा ठनका. जब नजर रखी तो उन्होंने कविता के साथ अजय की खिचड़ी पकती देखी. इस से पहले कि कोई अनर्थ हो जाए राजेश चंद्र ने बेटी कविता का विवाह कौशांबी के चरवा गांव निवासी नीरज से कर दिया. यह 5 साल पहले की बात है.

विवाह का एक साल बीततेबीतते कविता भी एक बेटी की मां बन गई. अब वह कभीकभार ही मायके आ पाती थी. उस के आने पर अजय ससुराल पहुंच जाता था. दोनों की चाहत तन मिलने से कुछ समय के लिए पूरी हो जाती, लेकिन फिर वही पहले जैसा हाल हो जाता. दोनों को अपने बीच की दूरी बहुत अखर रही थी. कविता पूरी तरह से अजय के प्यार में रंगी थी. इसलिए उस का ससुराल में मन नहीं लगता था. एक साल पहले वह ससुराल से मायके आई तो वापस लौट कर ससुराल नहीं गई. अजय की खुशी का ठिकाना न रहा. वह पहले की भांति उस से मिलने जाने लगा. अजय की ससुराल वाले सब जान कर भी कुछ न कर पाते. वह चुपचाप तमाशा देखते रहे.

सरिता को भी अपने पति के अपनी बहन कविता से संबंध की जानकारी हो गई. इस के बाद अजय और सरिता में विवाद होने लगा. अजय एक बहन का पति था तो दूसरे का प्रेमी. वह दोनों के जीवन से खेल रहा था. 13 अक्तूबर को अजय इलैक्ट्रौनिक्स का सामान खरीदने के लिए सुबह प्रयागराज चला गया. शाम 6 बजे जब वह घर लौटा तो दरवाजा अंदर से बंद नहीं था, धक्का देते ही खुल गया. जैसे ही वह अंदर पहुंचा तो कमरे में उस की पत्नी सरिता और 7 वर्षीय बेटी तनु की लाशें पड़ी थीं. यह देख कर वह चीखनेचिल्लाने लगा. शोर सुन कर आसपास के लोग वहां आ गए. घटना की खबर मिलने पर क्षेत्र के विधायक शीतला प्रसाद पटेल भी वहां पहुंच गए. अजय के कमरे में उस की पत्नी व बेटी की लाशें देखने के बाद उन्होंने सैनी कोतवाली के इंसपेक्टर प्रदीप सिंह को घटना की सूचना दे दी.

इंसपेक्टर प्रदीप सिंह ने अपने उच्चाधिकारियों को दोहरे हत्याकांड की सूचना दे दी. फिर घटनास्थल की ओर रवाना हो गए. घटनास्थल पर पहुंच कर उन्होंने लाशों का निरीक्षण किया. सरिता की लाश कमरे में मेज के पास जमीन पर पड़ी थी. उस के गले को चाकू से रेता गया था. शरीर पर भी 4-5 घाव के निशान थे. लाश के पास काफी खून पड़ा था, जो सूख चुका था. लाश अकड़ी हुई थी. दरवाजे के पास सरिता की बेटी तनु की लाश पड़ी थी. उस के गले पर दबाए जाने के निशान मौजूद थे. तनु की लाश में काफी चींटियां लग गई थीं. निरीक्षण करने के बाद अनुमान लगाया गया कि दिन में किसी वक्त दोनों को मारा गया है. घर में किसी व्यक्ति द्वारा जबरन घुसने का कोई सबूत नहीं मिला. न ही आसपास पड़ोस में किसी ने घटना को अंजाम देने के समय किसी प्रकार का शोरशराबा सुना था. इस का मतलब यह कि हत्यारा कोई परिचित व्यक्ति है.

इसी बीच एसपी अभिनंदन, एएसपी समर बहादुर सिंह और सीओ (सिराथू) श्यामकांत भी डौग स्क्वायड और फोरैंसिक टीम के साथ पहुंच गए. फोरैंसिक टीम साक्ष्य जुटाने में लग गई. उच्चाधिकारियों ने लाश व घटनास्थल का निरीक्षण किया. तत्पश्चात अजय साहू से पूछताछ की तो उस ने सुबह प्रयागराज जाने और शाम 6 बजे घर आने पर घटना का पता होने की बात बताई. सीसीटीवी फुटेज देखी गई. लेकिन कोई संदेहास्पद व्यक्ति नहीं दिखा. इंसपेक्टर प्रदीप सिंह को अजय पर ही शक था. उन्होंने अपना शक एसपी अभिनंदन को बताया. एसपी अभिनंदन की सोच भी वही थी. अजय ने बताया था कि वह दोपहर 12 बजे के करीब प्रयागराज गया था. उस के बाद ही लगभग 2-3 बजे घटना हुई होगी. लेकिन 3-4 घंटे में लाश अकड़ नहीं सकती.

ऐसा तभी होता है, जब घटना हुए 10-12 घंटे का समय हो जाए. यानी सुबह के समय तब अजय घर पर ही था. अजय ने ही हत्या कर के सारी कहानी गढ़ी है, इस का विश्वास हुआ तो अजय से और सख्ती से पूछताछ के लिए उसे थाने ले जाया गया. लेकिन इस से पहले दोनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए मोर्चरी भेज दिया गया. उन्होंने अज्ञात के खिलाफ हत्या की रिपोर्ट दर्ज करा दी. पूछताछ करने पर वह चुप ही रहे लेकिन सविता फट पड़ी. उस ने बताया कि कविता दीदी और जीजा का आपस में काफी लगाव था. इंसपेक्टर प्रदीप सिंह का शक सही साबित हुआ. इस के बाद अजय से थाने में सख्ती से उन्होंने पूछताछ की तो उस ने अपना जुर्म स्वीकार कर लिया और इस जुर्म में उस ने साली कविता के भी शामिल होने की बात स्वीकारी. दोनों ने ही मिल कर सरिता की हत्या की साजिश रची थी. इस के बाद कविता को भी हिरासत में ले कर पूछताछ की गई.

पूछताछ में पता चला कि अजय और कविता एकदूसरे से विवाह कर के साथ रहना चाहते थे. सरिता उन के संबंधों का विरोध कर रही थी, वह उन के रास्ते में आ रही थी. इसलिए कविता और अजय ने मिल कर सरिता की हत्या की योजना बनाई. अजय ने कविता से बात करने के लिए दूसरा नंबर ले रखा था, उसी से बराबर कविता से बात करता था. उसी नंबर से बात कर के उन्होंने हत्या का षडयंत्र रचा. 13 अक्तूबर की सुबह 6 बजे अजय ने घर में रखे सब्जी काटने वाले चाकू से नींद में सोई सरिता का गला काट दिया. सरिता चीख भी न सकी, जमीन पर गिर कर तड़पने लगी. अजय ने फिर उस के शरीर पर कई वार किए, जिस से सरिता की मौत हो गई. अपने पिता के हाथों मां को मरता देख कर मासूम तनु जाग गई और डर की वजह से रोते हुए बाहर की तरफ भागने लगी. अजय ने दरवाजे तक पहुंचने से पहले ही उसे पकड़ लिया और उस का सिर दीवार पर पटक दिया.

सिर में लगी चोट से तनु बेहोश हो गई. अजय ने फिर उस का गला घोंट कर उस की भी हत्या कर दी. अजय तनु को मारना नहीं चाहता था लेकिन भेद खुलने के डर से उसे बेटी की हत्या करनी पड़ी. उस ने हत्या के बाद कविता से मोबाइल पर बात की और दोनों की हत्या करने की बात बता दी. इस के बाद वह बाजार गया और कई जगह जानबूझ कर गया, जिस से वह सीसीटीवी कैमरों में कैद में आ जाए. एक जगह उस ने समोसा खरीद कर भी खाया. इस के बाद वह प्रयागराज चला गया. वहां वह शाहगंज इलाके में कई उन इलैक्ट्रौनिक सामानों की दुकानों पर गया, जहां सीसीटीवी कैमरे लगे थे. अपने प्रयागराज में होने के सबूत छोड़ कर शाम को वह कौशांबी लौट आया. यहां लौटने के बाद भी कुछ जगहों पर गया.

शाम 6 बजे वह कमरे पर पहुंचा और लाश देख कर शोर मचाने लगा. लेकिन काफी होशियारी के बाद भी वह कविता के साथ कानून के शिकंजे में फंस गया. इंसपेक्टर प्रदीप सिंह ने दोनों आरोपियों को न्यायालय में पेश किया, वहां से दोनों को जेल भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Punjab crime : रात में लड़की बनकर घूमता था सीरियल किलर, 18 महीने में किए 11 कत्ल

Punjab crime : एक खतरनाक सीरियल किलर (Serial Killer) की दास्तां, जिसने 11निर्दोष लोगों की हत्या कर दी. इस खौफनाक सीरियल किलर के वारदातों को सुनकर आप की रूह कांप उठेगी.

अक्सर ऐसे सीरियल किलर के बारे में पढ़ते रहे हैं जो आसानी से पकड़े नहीं जाते हैं, लेकिन यहां आपको एक अजीबोगरीब (Serial Killer) के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसने धोखेबाजों को मारना अपना मिशन बना लिया था. वह कत्ल करने के बाद उनके पैर छूकर माफी मांगता और मारने के बाद उनकी पीठ पर ‘धोखेबाज’ लिख देता था.

दिन में पुरुष और रात में महिला दिखता

इस सीरियल  किलर का नाम रामस्वरूप है. जिसे पंजाब पुलिस ने पकड़ा है, यह सीरियल किलर एक अनोखी पहचान रखता है. रामस्‍वरूप दिन में दिन में पुरुष जैसी और रात में महिला जैसी रूप बनाता था. पंजाब पुलिस ने इस किलर की पहचान के लिए स्केच भी जारी किया था.

भूलने वाला सीरियल किलर

यह सीरियल किलर 11 कत्ल कर चुका था और कैमरे के सामने उसने अपना जुर्म कबूल कर लिया. हैरानी की बात यह है कि कबूल करने के बाद यह सीरियल किलर खुद कहता है कि मेरी याददाश्त कमजोर है और मुझे अभी तक याद नहीं है कि मैंने कितने कत्ल किए हैं. किलर अपने आप को एक भुलक्कड़ मानता है.

अजीबोगरीब हरकतें करनेवाला रामस्‍वरूप

रामस्‍वरूप कत्ल करने के बाद लोगों की पीठ पर धोखेबाज लिख देता था. इतना ही नहीं, वह मृतक के हाथ पैर पकड़कर उससे माफी भी मांगता था. इसकी इस अजीब हरकत ने उसे इसे एक रहस्यमय और डरावना शख्स बना दिया था.

इस सीरियल किलर ने 18 अगस्त को कीरतपुर साहिब गढ़ मोड़ा टोल प्लाजा के करीब चाय पानी की दुकान वाले 37 वर्षीय शख्स की हत्या कर दी और उसका मोबाइल अपने साथ ले गया. इसी मोबाइल के जरिए पुलिस मोबाइल बेचने वाले के पास पहुंचती है जहां उसे पता चलता है कि मोबाइल बेचने के लिए एक महिला आई थी लेक‍िन देखने में वह पुरुष जैसा लग रहा था. पंजाब पुलिस ने इस शख्स के जरिए सीरियल किलर का स्केच तैयार किया और उसकी तलाश शुरू की. मोबाइल और स्केच के आधार पर ही रामस्वरूप की पहचान और गिरफ्तारी संभव हो सकी. इसके बाद पंजाब पुलिस स्केच के आधार पर उस रामस्वरूप के पास तक पहुंचती है और उसे अरेस्ट कर लेती है.

जब पुलिस उसे पकड़ती है तो लगता है कि उसने सिर्फ एक कत्ल किया होगा लेकिन जब वह अपना मुंह खोलता है तो पुलिस शौक्‍ड रह जाती है उसने ऐसे खुलासे किए कि पुलिस कुछ ही देर में समझ गई कि वह एक खतरनाक सीरियल किलर के सामने खड़ी है.

किस तरह से करता था कत्ल

रामस्‍वरूप एक “गे सेक्स वर्कर” था. यह रात को महिलाओं की तरह सजता था और घूंघट में चेहरा ढक कर ग्राहकों की तलाश में जुड़ जाता. जब इसे कोई ग्राहक मिल जाता है तो वह उस ग्राहक से पैसे के लिए लड़ता और उस ग्राहक का गला घोंट कर हत्या कर देता.

पंजाब पुलिस के मुताबिक इस सीरियल किलर ने डेढ़ साल में 11 कत्ल किए है. अभी पुलिस इससे जुड़े और सबूत तलाश रही है.

Family dispute : भाई बना बहन और उसके दो बच्चों का कातिल

Family dispute : राजविंदर ने बिना वजह 3 खून किए थे, जिन में 2 मासूम बच्चे थे. इस हत्याकांड से उसे पश्चाताप होना चाहिए था लेकिन उसे पश्चाताप नहीं, बल्कि इस बात का मलाल था कि वह घर के मालिक दविंदर को क्यों नहीं मार सका. एक खूनी का कारनामा…

दविंदर सिंह ने पैजामा पहनने के बाद अपनी 55 वर्षीय पत्नी गुरविंदर कौर को आवाज दे कर पूछा,

‘‘भाग्यवान, मेरी कमीज कहां है, मिल नहीं रही. ढूंढ कर जल्दी दे दो. मुझे देर हो रही है.’’

पति की आवाज सुन कर गुरविंदर कौर कमरे में आ गई. उन्होंने अलमारी से पति की कमीज निकाल कर उन की ओर बढ़ा दी. कमीज पहनने के बाद दविंदर सिंह ने पगड़ी बांधी और यह कह कर घर से निकल गए कि मैं दोपहर तक लौट आऊंगा. यह 3 अगस्त, 2018 की बात है. लुधियाना के किशोर नगर के रहने वाले दविंदर सिंह गुरुद्वारे में ग्रंथी थे. उस दिन उन्हें किदवई नगर स्थित गुरुद्वारा साहब में पाठ करने जाना था. गुरुद्वारा साहब में श्री गुरुग्रंथ साहिब का अखंड पाठ चल रहा था. गुरुद्वारा साहब में पाठ करने वाले ग्रंथी की हर 3-3 घंटे के अंतराल पर ड्यूटी बदलती थी. अपनी ड्यूटी खत्म कर के वह घर के लिए रवाना हुए और करीब ढाई बजे अपने घर पहुंचे. जब वह घर पहुंचे तब उन के घर के मुख्य दरवाजे पर ताला लगा हुआ था.

उन्होंने सोचा कि शायद उन की पत्नी गुरविंदर घर का कोई सामान लेने या अपने दोहता-दोहती को कुछ दिलवाने दुकान पर गई होगी. यह सोच कर वह घर के बाहर बैठ कर इंतजार करने लगे. काफी देर तक इंतजार करने के बाद भी पत्नी नहीं आई तो वह सोच में पड़ गए कि इतनी देर हो गई, गुरविंदर और बच्चे कहां चले गए. इस बीच वह बारबार पत्नी के मोबाइल पर फोन भी मिलाते रहे. पर हर बार फोन स्विच्ड औफ ही मिला. गरमियों की तपती दोपहर में गली में बैठ कर इंतजार करते हुए उन्हें एक घंटे से ज्यादा बीत गया तो उन्होंने अपनी जगह से उठ कर पड़ोसियों से गुरविंदर और बच्चों के बारे में पूछा.

गुरविंदर को अचानक जरूरी काम से कहीं जाना होता था तो वह घर की चाबी किसी पड़ोसी को दे जाती थी. पर आज उस ने ऐसा नहीं किया था. किसी भी पड़ोसी को गुरविंदर के बारे में कोई जानकारी नहीं थी. दविंदर सिंह के मन में बारबार यह प्रश्न उठ रहा था कि आखिर गुरविंदर गई तो गई कहां. उन्हें वहां इंतजार करते हुए डेढ़ घंटा हो गया था. अंत में हार कर उन्होंने अपने बेटे मनप्रीत को फोन कर के जानकारी दी. मनप्रीत घर के पास ही किसी फैक्ट्री में काम करता था. अपने पिता का फोन सुनते ही वह दौड़ा चला आया था. उस ने आ कर 33 फुटा रोड पर रहने वाली अपनी बहन सोनम को फोन कर के पूछा कि क्या मां उन के घर पर हैं. सोनम ने बताया कि मां और बच्चे यहां नहीं हैं.

अब और कोई चारा नहीं बचा था सो मनप्रीत ने किसी से हथौड़ा ले कर घर के दरवाजे पर लगा ताला तोड़ा और बापबेटे घर के अंदर घुसे. बापबेटे दोनों ऊपरी मंजिल पर चले गए. मनप्रीत ने पिता को खाना परोस दिया. खाना खाते समय भी दोनों के दिमाग में एक ही बात चल रही थी कि गुरविंदर और बच्चे कहां चले गए. इस बीच उन्हें मकान की छत से अपने कुत्ते के भौंकने की आवाजें सुनाई दीं. मनप्रीत ने ऊपर जा कर देखा तो कुत्ता छत पर बंधा हुआ था. उस की समझ में नहीं आया कि कुत्ते को छत पर किस ने बांधा.

बहरहाल, कुत्ते को खोल कर वह नीचे ले आया. इस बीच उस की दोनों बहनें सोनम और नीरू भी वहां पहुंच गई थीं. वे भी मां के इस तरह बिना बताए कहीं चले जाने पर हैरान थीं. उसी दौरान सोनम नीचे वाले कमरे में आई. दरअसल नीचे वाले पोर्शन में अंधेरा रहता था. उसे उन्होंने गोदाम बना रखा था. इसलिए सारा परिवार ऊपर ही रहता था. दविंदर सिंह पाठ करने के साथ शादीब्याह में गद्दे सप्लाई का काम भी करते थे. नीचे वाले पोर्शन को उन्होंने गद्दों का गोदाम बना रखा था. सोनम जब नीचे आई तो उस ने Family dispute गद्दे वाले कमरे में खून फैला देखा. घबरा कर उस ने अपनी बहन नीरू को आवाज दी और खून साफ करने के लिए पोंछा उठा लाई.

नीरू के साथ मनप्रीत सिंह भी नीचे आ गया था. गद्दे वाले कमरे में जब उन्होंने लाइट जला कर देखा तो सामने का दृश्य देख कर उन के होश उड़ गए. सोनम तो उस भयावह दृश्य को देख कर गश खा कर गिर गई थी. कमरे में फर्श पर खून से लथपथ तीन लाशें पड़ी थीं. एक लाश गुरविंदर कौर की थी और 2 लाशें सोनम व नीरू के बच्चों 7 वर्षीय मनदीप कौर और 6 वर्षीय ऋतिक की थी. 3 लाशें मिलने पर कोहराम मच गया. पासपड़ोस की तो छोड़ो, वहां पूरी कालोनी के लोग जमा हो गए. रोने और चीखने की आवाजों से पूरी कालोनी कांप उठी थी. इस बीच किसी ने पुलिस कंट्रोल रूम को भी इस घटना की सूचना दे दी थी.

शहर के भीड़भाड़ वाले व्यस्त इलाके में दिनदहाड़े घर में घुस कर एक ही परिवार के 3-3 लोगों की हत्या करने की बात सुन कर पुलिस महकमे में भी हड़कंप मच गया था. लुधियाना पुलिस कमिश्नर डा. सुखचैन सिंह गिल, एडीसीपी-4 राजवीर सिंह बोपराय, एडीसीपी (क्राइम) रत्न सिंह, सीआईए इंचार्ज राजेश शर्मा, थाना डिवीजन नंबर 7 के प्रभारी व अन्य कई थानों के थानाप्रभारी क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम के साथ जल्दी ही मौकाएवारदात पर पहुंच गए. पुलिस ने वहां पहुंचते ही उस पूरे क्षेत्र को अपने कब्जे में ले लिया. लाशों को देख कर ऐसा लगा, जैसे हत्याएं किसी भारी चीज से वार कर के की गई थीं. तलाश करने पर एक कमरे से खून सना हथौड़ा बरामद हुआ.

प्रारंभिक छानबीन में वारदात का मकसद लूटपाट दिखाई दे रहा था, क्योंकि घर के एक कमरे में अलमारी खुली हुई थी. दविंदर सिंह ने बताया कि इस में रखे करीब 40 हजार रुपए और सोने के जेवरात गायब हैं. डौग स्क्वायड की मदद ली गई, लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ. जांच टीम को हथौड़े के अलावा वहां से कुछ फिंगरप्रिंट भी मिले. बहरहाल, पुलिस ने मौके की काररवाई कर के तीनों लाशें पोस्टमार्टम के लिए सिविल अस्पताल भेज दीं और अज्ञात लोगों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया. तफ्तीश के पहले चरण में पुलिस ने मृतकों के परिजनों और गलीमोहल्ले वालों से पूछताछ की. इस पूछताछ से पता चला कि दविंदर सिंह के परिवार में पत्नी गुरविंदर कौर के अलावा 3 बेटियां और एक अविवाहित बेटा मनप्रीत सिंह है. तीनों बेटियों की शादी कर चुके थे.

उन की एक बेटी सोनम 33 फुटा रोड पर किराए के मकान में अपनी 7 वर्षीय बेटी मनदीप कौर के साथ रहती थी. उस का अपने पति से तलाक का मुकदमा चल रहा था. उस की दूसरी बेटी नीरू की शादी पटियाला के तरुण नामक युवक से हुई थी. पिछले कुछ महीनों से तरुण का काम बंद हो गया था, इसलिए पिछले ढाई महीनों से वह अपने पति और 6 वर्षीय बेटे ऋतिक के साथ मायके में रह रही थी. ससुराल में रहते हुए तरुण ने लौटरी बेचने का काम शुरू कर दिया था. तीसरी शादीशुदा बेटी अंबाला में अपने पति के साथ रहती थी. सोनम की बेटी मनदीप और नीरू का बेटा ऋतिक चंडीगढ़ पब्लिक स्कूल में पढ़ते थे. ऋतिक का दाखिला इस घटना से मात्र 10 दिन पहले ही करवाया गया था. स्कूल की छुट्टी के बाद रिक्शे वाला दोनों बच्चों को दोपहर करीब डेढ़ बजे गुरविंदर कौर के घर छोड़ जाता था.

दोनों बच्चे दिन भर नानी के पास रहते थे. शाम को सोनम मां के घर आ कर अपनी बेटी मनदीप को साथ ले जाती थी. पुलिस को यह भी पता चला कि सब से पहले सुबह 8 बजे दोनों बच्चे स्कूल जाते थे. उन के बाद 10 बजे तक गुरविंदर का बेटा मनप्रीत और दामाद तरुण अपनेअपने काम पर चले जाते थे. उन के बाद दविंदर सिंह गुरुद्वारे जाते थे. चूंकि सोनम पास में ही रहती थी, इसलिए घर का काम निपटा कर नीरू अपनी बहन सोनम के घर चली जाया करती थी. गुरविंदर कौर दिन भर घर में अकेली ही रहा करती थी. पूछताछ में यह बात भी पता चली कि गुरविंदर के मामा का लड़का राजविंदर पिछले 2 सालों से उन के घर पर रह रहा था. राजविंदर किसी से भी कोई वास्ता नहीं रखता था. वह गुरविंदर कौर और उस के पारिवारिक सदस्यों के संपर्क में ही था.

राजविंदर सिंह पिछले 9 महीनों से किराए के मकान में रहने लगा था. उसे घर की हर चीज के बारे में पूरी खबर थी कि कौन सी चीज कहां रखी है. उस ने कमरा किराए पर जरूर ले लिया था लेकिन दिन भर वह गुरविंदर के घर पर ही रहता था. दविंदर के बेटेबेटियों ने उस के वहां रहने पर ऐतराज भी जताया था पर गुरविंदर कौर ने सब को यह कह कर चुप करा दिया था कि वह उस का Family dispute भाई है और गरीब भी है. अगर वह यहां दो वक्त की रोटी खा लेता है तो कोई हर्ज नहीं. इस हत्याकांड के बाद से राजविंदर फरार था. पुलिस ने उस के भाई से पूछताछ की तो उस ने बताया कि उसे राजविंदर से मिले हुए करीब 15 साल हो चुके हैं. उस का अपने भाई से कोई वास्ता नहीं है. इतना ही नहीं, राजविंदर अपने किसी रिश्तेदार के संपर्क में भी नहीं था.

करीब 17 साल से वह अपने भाई और घर वालों से भी नहीं मिला था. राजविंदर के बारे में उस के भाई ने बताया कि वह शुरू से ही काफी कम बोलता था. जिस की वजह से यह पता नहीं चलता था कि उस के दिमाग में क्या चल रहा है. गुरविंदर कौर या उस के पारिवारिक सदस्यों को भी राजविंदर के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी. पुलिस ने गली में लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज निकलवा कर चैक की तो राजविंदर सिंह अपने किराए के कमरे से निकल कर सवा 2 बजे बाहर रोड की तरफ जाता दिखाई दिया. स्कूल के रिक्शे वाले ने बताया कि उस ने दोनों बच्चों को सवा एक बजे घर के बाहर छोड़ा था और बाकी बच्चों को उन के घर छोड़ने के बाद लगभग 2 बजे जब वह दोबारा उस गली से गुजरा तब गुरविंदर कौर के घर के दरवाजे पर ताला लगा था.

इस का मतलब यह था कि बच्चों के स्कूल से लौटने के तुरंत बाद इस वारदात को अंजाम दिया था. कुछ और लोगों के बयान लेने के बाद यह स्पष्ट हो गया कि इस वारदात को राजविंदर ने ही अंजाम दिया था. पर क्यों? यह बात पुलिस की समझ में नहीं आ रही थी. अगर उसे घर में रखे रुपए ही लूटने होते तो इस के लिए उस के पास तमाम मौके थे, केवल लूट के लिए अपनी बहन और 2 मासूम बच्चों की हत्या करने की बात पुलिस की समझ से बाहर थी. इस हत्याकांड की कोई दूसरी तसवीर भी थी, जो पुलिस को ठीक से दिखाई नहीं दे रही थी. बहरहाल, पुलिस ने राजविंदर के कमरे का ताला तोड़ कर वहां की तलाशी ली. पुलिस को किराए के कमरे से राजविंदर के खून से लथपथ कपडे़ मिले. इस का मतलब था कि हत्याएं करने के बाद वह अपने कमरे पर आया था.

पुलिस ने मकान मालिक की बहू से इस बारे में पूछा, क्योंकि उस समय वही घर पर थी. उस ने पुलिस को बताया कि राजविंदर कह रहा था कि वह किसी काम के लिए लुधियाना से बाहर जा रहा है. पुलिस को उस के कमरे से कुछ अजीबोगरीब चीजें भी मिलीं. मसलन काफी मात्रा में पिसी हुई लाल मिर्च, नींबू, तंत्रमंत्र में इस्तेमाल होने वाले सामान वगैरह. पुलिस कमिश्नर के आदेश पर पुलिस युद्धस्तर पर हत्यारे राजविंदर की तलाश में जुट गई. पुलिस की अलगअलग टीमों ने अपने स्तर पर उस की तलाश में छापेमारी शुरू कर दी. पुलिस को राजविंदर का जो मोबाइल नंबर मिला था, वह पिछले एक हफ्ते से बंद था. उस की लास्ट काल समराला चौक के पास थी. इस ये पहले उस के फोन पर उस के बहनोई दविंदर सिंह का फोन आया था.

इस बारे में पुलिस ने दविंदर से पूछा तो उन्होंने बताया कि उसे फोन कर के घर की चाबी के बारे में जानना चाहा था. पहले तो राजविंदर ने फोन उठाया ही नहीं, बाद में उस ने फोन उठाया तो कुछ न बोल कर 13 सैकेंड तक काल होल्ड पर रखी और फिर काट दी. बाद में राजविंदर ने अपना फोन बंद कर दिया. पुलिस की टीमें लगातार राजविंदर का पता लगाने के लिए पंजाब के शहरों और पड़ोसी राज्यों व महाराष्ट्र भी भेजी गईं. अगले दिन 4 अगस्त को 3 डाक्टरों के पैनल ने शवों का पोस्टमार्टम किया. पैनल में डा. बिंदू नलवा, डा. हरीश केयरपाल और डा. कुलवंत शामिल थे.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट में बताया गया कि हत्यारे ने केवल हथौड़े का ही नहीं, बल्कि तेजधार वाले हथियार का भी प्रयोग किया था. गुरविंदर कौर के शरीर पर 15, ऋतिक के शरीर पर 14 और मनदीप के शरीर पर 4 जगह चोटों के निशान पाए गए. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार पहले गुरविंदर कौर के गले में चुन्नी डाल कर गला दबाया गया था, जबकि उस के दोनों हाथों पर रस्सी बांधने के निशान थे. गरदन पर तेजधार हथियार से दाईं तरफ वार किए गए थे. दाईं आंख हथौड़ा मार कर फोड़ दी थी. नाक की हड्डी और जबड़े पर भी मारा गया था और सिर पर कई वार किए गए थे.

दोनों टांगों पर भी चोटों के निशान थे. इस के अलावा फेफड़े और लीवर पर भी हथौड़े से वार किए थे. जिस से लीवर और फेफड़े फट गए थे. शरीर पर और भी कई जगह चोटों के निशान थे. 6 वर्षीय ऋतिक की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि हत्यारे ने उस की गरदन पर दाईं ओर 2 और छाती पर तेजधार हथियार से एक वार किए थे. इस के अलावा सिर पर हथौड़े से 4 से 5 वार किए. उस के शरीर पर कई जगह चोटें भी आई थीं. वहीं मनदीप कौर के सिर पर 2 से 3 बार हथौड़ा मारा गया था, जिस से उस के दिमाग का कुछ हिस्सा भी बाहर आ गया था.

डीजीपी डा. सुरेश अरोड़ा ने इस मामले को जल्द सुलझाने के लिए लुधियाना पुलिस कमिश्नर डा. सुखचैन सिंह गिल से बात की. पुलिस ने राजविंदर के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स निकलवाई तो उस में ऐसे कई नंबर सामने आए, जो अमृतसर के रहने वाले लोगों के थे. उन में एक रिक्शे वाले का नंबर भी था. पुलिस ने उन सब से पूछताछ की थी, पर कोई खास सुराग हाथ नहीं लगा. काल डिटेल्स से यह बात भी पता चली कि हत्यारे ने वारदात के दिन सुबह फोन पर अपने भांजे मनप्रीत सिंह से भी बात की थी और उस से काम ढूंढने को कहा था. हत्यारों की तलाश में पुलिस की कई टीमें अमृतसर भेजी गईं, जहां से पता चला है कि राजविंदर समयसमय पर किराए का कमरा बदलता रहता था.

जांच में यह बात भी पता चली थी कि हत्यारे पर दहेज प्रताड़ना का एक मामला भी दर्ज है. इस मामले में वह वांटेड था और पुलिस उसे तलाश रही थी. पुलिस की तरफ से उस की पत्नी और ससुर को भी पूछताछ के लिए बुलाया गया, लेकिन उन से कुछ ज्यादा पता नहीं चल सका. फिर एक दिन दविंदर सिंह के पास राजविंदर का फोन आया. उस ने कहा कि उस ने थाने में जो 40 हजार रुपए गायब होने की रिपोर्ट लिखाई है, वह गलत है. अलमारी में केवल 10 हजार रुपए मिले थे. उस ने यह भी बताया कि उस के चक्कर में गुरविंदर और बच्चों की हत्या हो गई लेकिन वह उन्हें छोड़ेगा नहीं. दविंदर सिंह ने यह सारी जानकारी थानाप्रभारी को बता दी.

राजविंदर के फोन की लोकेशन और अन्य जानकारी मिलने के बाद 19 अगस्त, 2018 को सीआईए-2 इंचार्ज राजेश कुमार शर्मा ने राजविंदर सिंह को संगरूर से गिरफ्तार कर लिया. वह एक धर्मशाला में छिपा बैठा था. उसे गिरफ्तार करने के बाद लुधियाना लाया गया और पुलिस कमिश्नर व अन्य आला अधिकारियों के सामने उस से पूछताछ की गई. पूछताछ के दौरान राजविंदर ने बड़ी आसानी से अपना गुनाह कबूल करते हुए दिल दहला देने वाले इस तिहरे हत्याकांड की जो कहानी बताई, वह एक विवेकहीन आदमी की खराब मानसिकता का परिणाम थी.

दरअसल राजविंदर अपनी बहन गुरविंदर की हत्या नहीं करना चाहता था और न ही दोनों मासूमों से उस की कोई दुश्मनी थी. वह केवल अपने जीजा दविंदर सिंह की हत्या करना चाहता था. पर हालात ऐसे बन गए कि उसे इस तिहरे हत्याकांड को अंजाम देना पड़ा. राजविंदर का असली नाम रविंदर बख्शी था लेकिन बाद में उस ने अपना नाम बदल कर राजविंदर कर लिया था. इस के पीछे कारण यह था कि उसे दहेज प्रताड़ना के एक केस में भगोड़ा घोषित किया गया था. वह पिछले 2 सालों से अपने जीजा दविंदर सिंह का कत्ल करने की योजना बना रहा था. दरअसल राजविंदर सिंह को शक था कि उस की दोनों शादियां टूटने और उस का घर बरबाद होने के पीछे उस की बुआ की लड़की गुरविंदर कौर के पति दविंदर सिंह का हाथ है. असल में राजविंदर के पिता जसविंदर भी गुरुद्वारे में ग्रंथी थे और उन के हरचरण नगर व गुरु अर्जुनदेव नगर में अपने मकान थे, जो बिक चुके थे.

राजविंदर के पिता की मौत हो चुकी थी. उस के मन में यह बात बैठ गई थी कि उन के मकान बिकवाने के पीछे दविंदर की कोई साजिश थी. इन्हीं कारणों से उस के पिता की भी मौत हुई थी. राजविंदर की पहली शादी सन 1997 में हुई थी. पत्नी के साथ विवाद के कारण उस की पत्नी ने सन 2000 में उस के खिलाफ दहेज उत्पीड़न का केस दर्ज करवाया था और उसे छोड़ कर चली गई थी. Family dispute दहेज उत्पीड़न मामले में राजविंदर भगोड़ा घोषित था. पुलिस से बचने के लिए वह अमृतसर चला गया था. उन दिनों उस के पिता दविंदर सिंह के साथ मिल कर काम करते थे.

पहली पत्नी से तलाक होने के बाद दविंदर ने अमृतसर की एक महिला से राजविंदर की दूसरी शादी करवा दी थी. दहेज उत्पीड़न केस में भगोड़ा होने के कारण राजविंदर ने अपनी पहचान छिपा कर फरजी दस्तावेजों के आधार पर अपना नाम बदल कर राजविंदर सिंह और पिता का नाम अजीत सिंह कर लिया था. इस के बाद राजविंदर दूसरी पत्नी को ले कर दिल्ली और मुंबई में रहा. दूसरे शहरों में किराए पर रहते हुए वह कढ़ाई, लोन एजेंट, सेल्समैन आदि की अलगअलग नौकरियां करता रहा. वह फिल्म भी बनाना चाहता था, लेकिन जब उस की दूसरी पत्नी को उस की पहली शादी के बारे में पता चला तो वह उसे छोड़ कर चली गई. इस दौरान उसे सूचना मिली कि काम में नुकसान होने की वजह से उस के पिता ने अपने दोनों घर बेच दिए हैं.

अपने मन से हारे हुए राजविंदर को शक हुआ कि उस की दूसरी पत्नी को पहली शादी वाली बात दविंदर सिंह ने बताई है. जिस की वजह से उस के मन में दविंदर सिंह के प्रति रंजिश पैदा हो गई थी. वह उन का कत्ल करने की योजना बनाने लगा. इस के लिए वह लुधियाना में दविंदर सिंह के घर पर भी रहा लेकिन बाद में पास ही किराए के मकान में रहने लगा. वह पिछले 2 सालों से दविंदर सिंह का कत्ल करने की योजना बना रहा था. इस के लिए उस ने हथौड़ा, कटर, करंट वाली तारें व अन्य प्रकार के सामान जुटा रखे थे. पिछले कुछ महीनों में वह कई बार दविंदर सिंह को मारने के लिए अपने हथियार छिपा कर भी ले गया था लेकिन उसे मौका नहीं मिल सका. इस दौरान राजविंदर को उस के मकान मालिक ने घर खाली करने के लिए चेतावनी दे दी थी क्योंकि उस ने कई महीनों से उस का किराया नहीं दिया था.

जिस के बाद रविंदर ने अब और देर करना उचित नहीं समझा. उस ने वारदात को जल्दी अंजाम देने का पक्का मन बना लिया था. वारदात वाले दिन उसे पता चला कि दविंदर सिंह घर पर ही मौजूद है. अपने साथ हथौड़ा ले कर वह उन के घर चला गया. लेकिन दविंदर सिंह उस के आने से पहले ही किदवई नगर गुरुद्वारे चले गए थे. दविंदर सिंह को घर में न पा कर रविंदर का खून खौल उठा. वह ऊपरी मंजिल पर चला गया और वहां मौजूद गुरविंदर कौर के सिर पर पीछे से हथौड़े का एक भरपूर वार कर दिया. हथौड़े का वार इतना शक्तिशाली था कि एक ही वार से गुरविंदर कौर चारों खाने चित्त हो कर वहीं गिर गईं. गुरविंदर की हत्या करने के बाद वह वहीं बैठ कर दविंदर सिंह के आने का इंतजार करने लगा.

वह मन ही मन तय कर के आया था कि आज अपनी बरबादी के कारण दविंदर सिंह की हत्या कर के ही वहां से जाएगा. इस बीच गुरविंदर कौर को दोबारा खड़े होने का प्रयास करता देख कर वह उन्हें घसीट कर नीचे ले आया और फिर से उन पर हथौड़े से वार किए. गुरविंदर कौर का काम तमाम करने के बाद उस ने ऊपरी मंजिल से सारा खून साफ कर दिया. इस के बाद वह नीचे आ कर बैठ गया. इसी बीच बच्चों में पहले ऋतिक और बाद में मंदीप कौर स्कूल से घर आए, जिन्होंने वहां पर खून देख कर पूछा, ‘‘नानाजी, यह किस का खून है और नानी कहां हैं?’’

इतना पूछने के बाद दोनों बच्चे नानी को देखने के लिए ऊपर जाने लगे तो रविंदर उर्फ राजविंदर ने पहले ऋतिक और फिर मंदीप की हथौड़े और कटर से निर्मम हत्या कर दी. फिर उस ने अलमारी में रखे 10 हजार रुपए निकाल लिए. तीनों हत्याएं किए हुए जब कुछ देर बीत गई और दविंदर फिर भी नहीं लौटे तो पकड़े जाने के डर से वह घर के बाहर ताला लगा कर वहां से फरार हो गया. गुरविंदर के घर से निकलने के बाद वह अपने कमरे पर गया और हाथमुंह धो कर खून आदि साफ करने के बाद कपड़े बदल लिए. फिर वह वहां से चला गया. राजविंदर पहले माछीवाड़ा गया. उस के बाद अमृतसर चला गया. अमृतसर में 2 दिन तक धर्मशाला में रहने के बाद वह राजस्थान स्थित हनुमानगढ़ चला गया.

हनुमानगढ़ से वह संगरूर आ गया और एक धर्मशाला में रहने लगा. उस ने समाचारपत्रों में अपनी फोटो भी देख ली थी. चूंकि उस का टारगेट दविंदर सिंह थे और उस के मन में यह बात बैठी हुई थी कि दविंदर सिंह बच गए हैं, इसलिए उस ने किसी अन्य आदमी के फोन से दविंदर सिंह को फोन कर जान से मारने की धमकी दी और यह भी बताया कि उन के घर से मात्र 10 हजार रुपए मिले थे, 40 हजार की बात झूठी है. दविंदर सिंह ने इस फोन के बारे में पुलिस को बता कर राजविंदर के खिलाफ धमकी देने की एक रिपोर्ट भी दर्ज करवाई थी.

इसी फोन की लोकेशन को ट्रेस करते हुए सीआईए की टीम ने आरोपी को संगरूर की एक धर्मशाला में जा कर धर दबोचा. राजविंदर ने मौके से कुछ नकदी भी उठाई थी, जिस के बारे में वेरीफाई करने के अलावा वारदात में प्रयुक्त हथौड़ा बरामद कर लिया. बाकी के हथियार बरामद करने के लिए पुलिस ने उसे अदालत में पेश कर 2 दिनों के पुलिस रिमांड पर ले लिया. रिमांड के दौरान राजविंदर उर्फ रविंदर की निशानदेही पर हत्या में इस्तेमाल हुए कटर और छुरी भी बरामद कर ली.

रिमांड अवधि समाप्त होने के बाद 21 अगस्त, 2018 को राजविंदर को पुन: अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित