Hindi Crime Stories: रोहित वेमुला – दलित छात्र की बेबस मौत  

Hindi Crime Stories: हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी के दलित छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या की गूंज पूरे देश में सुनाई दी. इस के लिए तथाकथित रूप से जिम्मेदार भाजपा यह सोच कर परेशान है कि क्या एक छात्र की मौत इतनी हंगामाखेज हो सकती है. आखिर कौन जिम्मेदार है रोहित की आत्महत्या का?

निजाम का शहर कहिए या नवाबों का, हैदराबाद दक्षिण भारत का एक महत्त्वपूर्ण शहर है. एक ओर विश्वप्रसिद्ध चारमीनार इस शहर की ऐतिहासिक पहचान है तो दूसरी ओर संभवत: विश्व का यह अकेला ऐसा शहर है, जिस में 9 सरकारी विश्वविद्यालय हैं.  इन्हीं 9 विश्वविद्यालयों में एक है केंद्रीय विश्वविद्यालय, जो इस शहर की गहमागहमी से दूर, शांत इलाके गाची बावली में स्थित है.

17 जनवरी की आधी रात बीत चुकी थी. तभी गाची बावली पुलिस स्टेशन को सूचना मिली कि हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के न्यू रिसर्च हौस्टल में एक छात्र ने आत्महत्या कर ली है. गाची बावली थाने के इंसपेक्टर जे. रमेश कुमार तुरंत अपने सहयोगियों के साथ न्यू रिसर्च हौस्टल पहुंच गए. हौस्टल के कमरा नंबर 207 में उन्हें एक छात्र फंदे से लटका हुआ मिला जिस की पहचान रोहित वेमुला के रूप में हुई. उन्होंने अपनी काररवाई शुरू कर दी. जैसेजैसे छात्रों को कैंपस में पुलिस की मौजूदगी और रोहित वेमुला की आत्महत्या की सूचना मिलती गई, वे हौस्टल में एकत्र होते गए.

पुलिस रोहित की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेजना चाहती थी, मगर छात्रों की मांग थी कि पहले रोहित को आत्महत्या के लिए उकसाने वाले लोगों के विरुद्ध काररवाई की जाए. छात्रों का आक्रोश बढ़ता जा रहा था. उन के आक्रोश की जानकारी पा कर पुलिस के बड़े अफसर भी पहुंच गए. छात्रों के बढ़ते आक्रोश को देखते हुए रैपिड एक्शन फोर्स के 200 जवानों को बुला लिया गया. तब तक सुबह के 7 बज चुके थे. काफी कोशिशों के बाद पुलिस रोहित की लाश को पोस्टमार्टम के लिए उस्मानिया जनरल अस्पताल ले जाने में सफल हो पाई.

जैसेजैसे दिन चढ़ता गया, रोहित की आत्महत्या का समाचार फैलता गया. इस के साथसाथ हैदराबाद से ले कर दिल्ली, चेन्नै और कश्मीर तक राजनीतिक भूचाल आ गया. आखिर रोहित वेमुला को आत्महत्या क्यों करनी पड़ी, यह एक बड़ा सवाल है. गुंटूर के एक कस्बे गुरुतला के रहने वाले मनीकुमार और राधिका की 3 संतानों में से दूसरे नंबर का था रोहित वेमुला. रोहित जाति से दलित था. लेकिन पढ़ाई में बहुत तेज. अपनी स्कूली शिक्षा अच्छे नंबरों से पास करने के बाद उस ने स्नातक की डिग्री भी गुंटूर से ही ली थी. इस के बाद उस ने सन 2012 में हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में एमएससी लाइफ साइंस में प्रवेश लिया. अप्रैल 2014 में उसे सीएसआईआर द्वारा जूनियर रिसर्च फेलोशिप के लिए चुन लिया गया.

रोहित वेमुला पढ़ाई के साथसाथ सामाजिक गतिविधियों में भी भाग लेता था. इस के साथ ही वह दलित व पिछड़ों के हितों और लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए भी संघर्षरत था. वह अंबेडकर छात्र संगठन से भी जुड़ा हुआ था. अंबेडकर छात्र संगठन विश्वविद्यालय में दलित छात्रों के हितों के लिए संघर्ष करने वाली एक संस्था है. इस संगठन का भाजपा के छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के साथ हमेशा टकराव रहता है. अंबेडकर छात्र संगठन जहां एक ओर दलित छात्रों के हितों को प्राथमिकता देता है, वहीं दूसरी ओर एबीवीपी हिंदूवादी छात्रों के हितों के रक्षक के तौर पर काम करता है.

जिस समय रोहित वेमुला को स्कौलरशिप मिली, तब भारतीय राजनीति एक बार फिर करवट ले रही थी. देश में आम चुनाव हो रहे थे. 16 मई, 2014 को घोषित चुनाव परिणाम में भाजपा विजयी हुई थी. सन 2014 के आम चनुव में भाजपा को मिली विजय के बाद भाजपा के समर्थकों और उस से संबंधित संगठनों में एक विचित्र सी उग्रता आ गई है. सोशल मीडिया हो या संचार का कोई और माध्यम, ये लोग विरोध का स्वर सुनना पसंद नहीं करते. मई, 2014 के बाद से देश में कई घटनाएं ऐसी हुईं, जिस में आम जनता को इन की असहिष्णुता का सामना करना पड़ा. यहां तक कि केंद्र में भाजपा सरकार के कुछ मंत्री भी इस का समर्थन करते नजर आए.

जुलाई, 2015 में दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल कालेज में एक डाक्युमेंट्री ‘मुजफ्फरनगर अभी बाकी’ का छात्रों के लिए प्रदर्शन किया जा रहा था. जैसे ही यह सूचना अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के नवनिर्वाचित छात्र यूनियन के अध्यक्ष सनी डेडा को मिली, वह यूनियन कार्यकर्ताओं के साथ वहां पहुंच गए और जबरन डाक्युमेंट्री का प्रदर्शन रुकवा दिया. सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए प्रसिद्ध दिल्ली विश्वविद्यालय में हुई यह दबंगई कोई मामूली घटना नहीं थी. इस से यह उजागर होता था कि आने वाले दिनों में विश्वविद्यालयों, शिक्षा संस्थानों आदि में केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा का समर्थक वर्ग अपने विरोधियों के स्वर दबाने का प्रयास करेगा.

ऐसे लोगों को अपरोक्ष रूप से शह मिल रही थी भाजपा के केंद्रीय नेताओं व मंत्रियों के बयानों से, जो समयसमय पर अपने बयानों से विषवमन कर रहे थे. इन लोगों में प्रमुख थे योगी आदित्यनाथ, साध्वी प्राची, साक्षी महाराज व महेश शर्मा आदि. यह सिलसिला अभी थमा नहीं है, शायद थमेगा भी नहीं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इन लोगों को रोकने का कोई प्रयास नहीं करते. किरोड़ीमल कालेज में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की दबंगई का समाचार जब दूसरे शिक्षण संस्थानों में पहुंचा तो अंबेडकर छात्र संगठन ने इस के विरोध में प्रदर्शन किया. ऐसा ही प्रदर्शन हैदराबाद के केंद्रीय विश्वविद्यालय में 3 अगस्त, 2015 को किया गया था. इस प्रदर्शन को भी एबीवीपी ने रोकने का प्रयास किया था.

रोहित वेमुला इस के पहले से ही केंद्रीय विश्वविद्यालय हैदराबाद प्रशासन के निशाने पर था, क्योंकि वह अंबेडकर स्टूडेंट एसोसिएशन के बैनर तले छात्रों के हितों से संबंधित मसले जोरशोर से उठाता रहता था. जबकि यह भाजपा की विचारधारा के विरुद्ध था. इस के चलते ही विश्वविद्यालय ने जुलाई, 2015 से रोहित की 25 हजार रुपए प्रतिमाह की छात्रवृत्ति कागजी काररवाही पूरी न होने का बहाना बना कर रोक दी थी, जो अभी तक रुकी हुई थी. यह निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि जब से स्मृति ईरानी ने मानव संसाधन विकास मंत्रालय का पदभार संभाला है, शिक्षा संस्थानों में सरकारी दखल बढ़ा है. इस से पहले की ही एक घटना थी, चेन्नै स्थित भारतीय तकनीकी संस्थान की.

मद्रास आईआईटी ने एक शिकायत के आधार पर छात्र संगठन अंबेडकर पेरियार सर्किल की मान्यता समाप्त कर दी थी, जिस में कहा गया था कि यह संगठन केंद्र सरकार की नीतियों के विरुद्ध कार्य करने के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और हिंदुओं के विरुद्ध घृणा फैला रहा है. इस मामले में भी स्मृति ईरानी का नाम आया था और कहा गया था कि मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी की संस्तुति और परोक्ष हस्तक्षेप के कारण ही आईआईटी प्रशासन ने दलित छात्रों के संगठन अंबेडकर पेरियार सर्किल की मान्यता रद्द की थी.

केंद्र सरकार का शिक्षा संस्थानों व शिक्षा नीतियों में दखलंदाजी करने का यह कोई पहला मामला नहीं था. नोबेल पुरस्कार विजेता और महान अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने भी इसीलिए नालंदा विश्वविद्यालय के उपकुलपति का पद त्याग दिया था. यही बात हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के मामले में सामने आई. 3 अगस्त, 2015 को हुए प्रदर्शन के दौरान एबीवीपी और एएसए के बीच हुई झड़प को संज्ञान में लेते हुए एबीवीपी नेता सुशील कुमार के इस बयान के आधार पर कि रोहित और उस के साथियों ने उसे चोट पहुंचाई है, जिस के कारण उसे अस्पताल में भरती होना पड़ा, के आधार पर रोहित और उस के 4 साथियों के विरुद्ध जांच बैठा दी गई.

17 अगस्त, 2015 को केंद्रीय श्रम मंत्री व सिकंदराबाद के सांसद बंडारू दत्तात्रेय, जोकि भाजपा में शामिल होने से पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक रह चुके हैं, ने मानव संसाधन विकास मंत्रालय को एक पत्र लिखा. इस पत्र में कहा गया था कि हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय पिछले कुछ समय से जातिवादी, अतिवादी और राष्ट्रविरोधी तत्वों की पनाहगाह बन गया है, इसलिए यहां पर ऐसा करने वालों के विरुद्ध काररवाई की जाए.

यहां यह बात ध्यान देने योग्य है कि एबीवीपी का नेता होने के कारण सुशील कुमार के श्रम मंत्री से अच्छे संबंध हैं. बंडारू दत्तात्रेय के पत्र के बाद मानव संसाधन विकास मंत्रालय जिस की प्रमुख स्मृति ईरानी हैं, ने 3 सितंबर को विश्वविद्यालय को पत्र लिख कर एएसए के खिलाफ काररवाई करने को कहा. इस पत्र के मिलते ही विश्वविद्यालय ने रोहित वेमुला सहित 5 छात्रों को जांच पूरी होने तक के लिए निलंबित कर दिया. मगर मानव संसाधन मंत्रालय की दखलंदाजी यहीं नहीं रुकी और 14 सितंबर, 6 अक्तूबर, 20 अक्तूबर और 19 नवंबर को विश्वविद्यालय प्रशासन को एक के बाद एक 5 रिमाइंडर भेज कर दोषियों के विरुद्ध शीघ्र काररवाई की बात दोहराई गई.

अंतत: विश्वविद्यालय की ओर से 7 जनवरी को मंत्रालय के पत्र पर काररवाई करते हुए पांचों छात्रों को विश्वविद्यालय से निष्काषित कर के तुरंत हौस्टल छोड़ने का फरमान जारी कर दिया गया. इस फरमान के जरिए इन पांचों छात्रों को निष्काषित करने के साथ ही प्रशासनिक बिल्डिंग, लाइब्रेरी, मैस, विश्वविद्यालय कैंपस और वहां के सार्वजनिक क्षेत्रों में प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया गया. विश्वविद्यालय प्रशासन के इस फरमान के विरोध में छात्रों ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया. इन प्रदर्शनों को धार देने के लिए छात्रों ने जौइंट कमेटी फौर सोशल एक्शन बना ली.

7 जनवरी को जिस दिन रोहित का निष्कासन हुआ था, उस दिन से ही वह अपने चारों अन्य साथियों के साथ धरना देते हुए कैंपस में खुले में रात गुजार रहा था. 17 जनवरी को रविवार का दिन था. सभी छात्र बैठे बातें कर रहे थे. रोहित भी वहां मौजूद था. बातोंबातों में जिक्र निकला कि 30 जनवरी को रोहित का जन्मदिन है, वह 27 साल का हो जाएगा. इस पर रोहित ने कहा कि उस की छात्रवृत्ति गत जुलाई से रुकी हुई है और उस पर काफी कर्ज हो गया है. उस के पास इतने पैसे नहीं हैं कि वह अपने जन्मदिन की पार्टी  कर सके.

उस के लहजे से मायूसी झलक रही थी. प्रशासन व एबीवीपी के समर्थकों द्वारा किया गया अपमान उसे दुखी कर रहा था. शाम साढ़े 7 बजे वह सब की नजरें बचा कर न्यू रिसर्च हौस्टल के कमरा नंबर 207 में गया, जहां उस ने एक पत्र लिखा—

‘मैं हमेशा से एक लेखक बनना चाहता था. विज्ञान का लेखक, कार्ल सगन की तरह.

मैं विज्ञान से, तारों से, प्रकृति से प्रेम करता हूं, लेकिन इस के बाद भी मैं लोगों से प्यार करता हूं. यह जाने बिना भी कि मेरे लोगों को दूसरे से अलगथलग कर दिया गया है. हमारी भावनाओं को महत्त्व नहीं दिया जाता. हमारा प्रेम बनावटी है. हमारे विश्वास अंधे हैं. हमारी पहचान झूठी प्रथाओं द्वारा बनाई जाती है. वास्तव में यह बहुत कठिन हो गया है कि बिना दुख का सामना किए प्रेम किया जाए. मानव की योग्यता उस की तात्कालिक पहचान और निकट संभावनाओं तक सीमित कर दी गई है. वोट के तौर पर, गिनती के तौर पर, वस्तु के तौर पर. मनुष्य को एक विचार के तौर पर कतई नहीं लिया जाता. हर क्षेत्र में, शिक्षा में, सड़कों पर, राजनीति में और मरने व जीने में हमें अलग कर दिया गया है.

मैं इस प्रकार का पत्र पहली बार लिख रहा हूं. यह पहल भी है और अंत भी, मेरे अंतिम पत्र का. अगर आप के अनुकूल बात मैं नहीं लिख सका तो मुझे क्षमा करना. मेरा जन्म एक खतरनाक दुर्घटना थी. मैं जीवन भर अपने बचपन की तनहाई से निकल नहीं पाया. मैं एक ऐसा बच्चा था, जिसे बचपन से ही दुत्कारा गया. हो सकता है मैं गलत होऊं. मैं सारी जिंदगी संसार को नहीं समझ पाया हूं. नहीं समझ सका हूं प्यार, दर्द, जीवन और मृत्यु को. इस की कोई जल्दी भी नहीं थी. मगर इस पूरे समय में मैं ने पाया कि कुछ लोगों के लिए जीवन अभिशाप है. मुझे इस समय की चोट नहीं पहुंची, न मैं दुखी हूं. बस मेरे पास कुछ नहीं है, अपने बारे में कोई चिंता नहीं है, यह दयनीय है. यही कारण है जो मैं ऐसा कर रहा हूं.

लोग मुझे स्वार्थी, मूर्ख समझ सकते हैं, परंतु मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मेरे बारे में लोग क्या सोचते हैं. मैं मौत के बाद की कहानियों में या भूतप्रेत में विश्वास नहीं करता. अगर इस संसार में कुछ है, जिस पर मेरा विश्वास है, वह यह कि मैं तारों की यात्रा कर सकता हूं और दूसरी दुनिया को जान सकता हूं. अगर कोई मेरे लिए कुछ कर सकता है तो वह जान ले कि पिछले 7 माह से मुझे छात्रवृत्ति नहीं मिली, जोकि 1 लाख 75 हजार रुपए बनती है. अगर हो सके तो यह मेरे परिवार को दिलवा देना. मेरे ऊपर 40 हजार रुपए रामजी के उधार हैं. उस ने कभी भी मुझ से रुपए नहीं मांगे. मेरा अंतिम संस्कार शांति से और सादे तरीके से करना, ठीक उसी तरह से जिस तरह मैं इस दुनिया में आया और इस दुनिया से जा रहा हूं. मेरे लिए कोई आंसू नहीं बहाना. जान लें कि जिंदा रहने के मुकाबले मर कर मैं खुश हूं.

भाई उमा, मैं यह सब तुम्हारे कमरे में कर रहा हूं इस के लिए मुझे माफ करना. एएसए परिवार से भी उन्हें मायूस करने के लिए माफी चाहता हूं. आप सब मुझ से बहुत प्यार करते हैं, यह मैं जानता हूं. मैं कामना करता हूं कि आप सब का भविष्य सुनहरा हो. अंतिम बार जय भीम.

हां, मैं औपचारिकताएं लिखना भूल गया. मेरी आत्महत्या के लिए कोई भी जिम्मेदार नहीं है. किसी ने भी मुझे ऐसा करने के लिए नहीं उकसाया, न अपने कृत्यों से, न शब्दों से. यह मेरा निर्णय है. इस के लिए मैं ही जिम्मेदार हूं. मेरे दोस्तों और दुश्मनों को परेशान मत करना, मेरे जाने के बाद.’ इस के बाद रोहित वेमुला ने एएसए के नीले झंडे को अपने शरीर पर लपेट कर छत में लगे कुंडे से लटक कर अपना जीवन समाप्त कर लिया. आधी रात के बाद जब उमा, प्रशांत के साथ कमरा नंबर 207 में आया तो उसे रोहित द्वारा आत्महत्या कर लिए जाने का पता चला, जिस की सूचना पुलिस को दे दी गई.

रोहित के साथी प्रशांत ने थाना गाची बावली में उस की आत्महत्या के लिए 3 लोगों को जिम्मेदार ठहराते हुए एफआईआर दर्ज कराई. इन के नाम हैं—केंद्रीय श्रम मंत्री बंडारू दत्तात्रेय, उपकुलपति अप्पा राव और एबीवीपी नेता सुशील कुमार. 18 जनवरी को जैसे ही यह समाचार देश में फैला, इस मामले की परतें उधड़ने लगीं. एक कमजोर शिक्षा मंत्री की काररवाई के नतीजे के तौर पर इसे आत्महत्या न मान कर हत्या माना गया. क्योंकि शिक्षा से संबंधित शिकायतों पर जो मंत्रालय काररवाई नहीं करता, उसी ने एक दूसरे मंत्री के पत्र पर ताबड़तोड़ पत्र लिख कर काररवाई करने की मांग की.

यह पहला अवसर नहीं है जब बंडारू दत्तात्रेय जैसे केंद्रीय मंत्री व भाजपा नेता ने विरोधी विचारधारा के लोगों व छात्रों को राष्ट्रदोही व अवांछित तत्व करार दिया हो. 14 मई, 2014 के बाद से भाजपा नेता कई विश्वविद्यालयों के बारे में कह चुके हैं कि ये राष्ट्रद्रोही तत्वों की पनाहगाह हैं. मजे की बात यह कि ये सारे विश्वविद्यालय वे हैं, जिन की शिक्षा के क्षेत्र में विश्व में अपनी विशिष्ट पहचान है. आईआईटी मद्रास हो, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय हो या अब हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय, भाजपाइयों को इस प्रकार के सारे संस्थान राष्ट्रद्रोहियों के गढ़ नजर आते हैं.

रोहित की आत्महत्या केवल एक छात्र की मौत नहीं है. यह मौत दर्शाती है दलित छात्रों के साथ होने वाले भेदभाव को. भाजपा के शासनकाल में यह भेदभाव अपने चरम की ओर अग्रसर है. कहने को तो मोदीजी अंबेडकर को महान नेता बताते हुए उन का गुणगान करते हैं, मगर उन के अधीनस्थ मंत्री व नेता अंबेडकरवादियों को राष्ट्रविरोधी कहते नहीं थक रहे हैं.

क्या यह असहिष्णुता नहीं है कि कालेज में हुए विरोध प्रदर्शन के कारण एक समुदाय को राष्ट्रविरोधी करार दे दिया जाए, उन का भविष्य चौपट कर दिया जाए? और अब जब इस मामले में सीधे तौर पर बंडारू दत्तात्रेय और मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी की भूमिकाएं शक के दायरे में हों तो भाजपा कह रही है कि इस मामले को तूल नहीं दिया जाए, यह तो छात्र के मन में उपजी निराशा का परिणाम था. इस का दलित या गैरदलित राजनीति से कोई संबंध नहीं है.

अपनी बात को सही साबित करने के लिए 20 जनवरी को स्मृति ईरानी ने प्रेस कौन्फ्रैंस की, जिस में कहा गया कि रोहित के निष्कासन का निर्णय जिस उपसमिति ने किया था, उस का मुखिया एक दलित ही था और यह एक दलित द्वारा दलित के विरुद्ध की गई काररवाई थी. स्मृति ईरानी के इस बयान को दिए 24 घंटे भी नहीं हुए थे कि हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के दलित प्रोफेसरों ने ईरानी के बयान का खंडन करते हुए कहा कि जिस उपसमिति ने रोहित और उस के 4 साथियों के निष्कासन का निर्णय लिया था, उस में कोई भी दलित नहीं था, सारे के सारे सदस्य गैरदलित थे.

यहां तक कि स्मृति ईरानी के बयान को भ्रामक बताते हुए विश्वविद्यालय के 15 प्रोफेसरों ने अपने प्रशासनिक पदों से त्यागपत्र दे दिया. उन्होंने कहा कि मानव संसाधन विकास मंत्री का यह कहना कि उपरोक्त निर्णय में दलित फैकल्टी की सहमति शामिल थी, एकदम निराधार और झूठ है. यह बड़े दुर्भाग्य की बात है कि विश्वविद्यालय की एग्जीक्यूटिव काउंसिल में किसी भी दलित को प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया है. मंत्री महोदया देश को गुमराह कर रही हैं. मुद्दों को भटका कर अपनी जिम्मेदारी से भाग रही हैं.

बात को बढ़ती देख दलित छात्रों के समर्थन में राजनीतिक दल भी कूद गए. कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी, कम्युनिस्ट ए. राजा और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी छात्रों के समर्थन में हैदराबाद विश्वविद्यालय पहुंचे. साथ ही रोहित वेमुला की आत्महत्या के मामले को ले कर देश भर में विरोध प्रदर्शन किए गए. विश्व भर के 150 से ज्यादा विख्यात शिक्षाविदों ने हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय द्वारा की गई काररवाही की कड़े शब्दों में निंदा की.

जहां एक ओर प्रधानमंत्री अपने भाषण में भारत को विश्वगुरु बनाने की जोरशोर से घोषणा करते हैं, वहीं दूसरी ओर देश में इस तरह की घटनाएं हो रही हैं, जो एक सभ्य समाज के लिए कलंक है. गाहेबगाहे ऐसी घटनाओं के पीछे अधिकतर प्रधानमंत्री के सिपहसालारों की कारगुजारियां नजर आती हैं. पुलिस ने केंद्रीय श्रम मंत्री बंडारू दत्तात्रेय और 2 अन्य के खिलाफ भादंवि की धारा 306 के तहत केस दर्ज कर लिया है. अब देखना यह है कि कानून आगे का अपना काम करता है या नहीं? मोदीजी अपने उतावले मंत्रियों के विरुद्ध काररवाई करने का मन बनाते हैं या नहीं? वैसे इस की उम्मीद कम ही है कि प्रधानमंत्री इस बार भी कोई कदम उठाएंगे.

लगता है, जिस प्रकार रोहित ने अपने सुसाइड नोट में लिखा था कि मेरे ऊपर इस का कोई फर्क नहीं पड़ता कि कोई मेरे बारे में क्या सोचता है, ठीक उसी प्रकार मोदीजी भी सोचते हैं कि कोई कुछ भी कहता रहे, उन पर इस का कोई प्रभाव नहीं पड़ता. वैसे बताते चलें कि 22 जनवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लखनऊ की अंबेडकर यूनिवर्सिटी में भाषण देते हुए भावुक हो कर रोहित वेमुला का नाम ले कर कहा है कि भारत मां ने एक लाल खोया है. लेकिन उन वे आंसू राजनीति से प्रेरित थे. उस राजनीति से प्रेरित जिस का कोई चालचरित्र और चेहरा नहीं होता, जो गिरगिट की तरह रंग बदलता है.

हालांकि सरकार ने इस मामले की जांच के लिए एक आयोग भी बैठा दिया है और रोहित वेमुला के परिवार को 8 लाख रुपए सहायता राशि देने की भी घोषणा की है. जबकि धरना और विरोध प्रदर्शन कर रहे छात्रों ने रोहित वेमुला के परिवार को 50 लाख रुपए और परिवार के एक सदस्य को नौकरी देने की मांग की है. बौक्स 3 अगस्त को जब इस घटनाक्रम की शुरुआत हुई तो उस समय केंद्रीय विश्वविद्यालय के उपकुलपति आर.पी. शर्मा थे. कहा जाता है कि उस समय विश्वविद्यालय प्रशासन ने जो जांच कमेटी बनाई थी, उस ने पांचों दलित छात्रों को क्लीन चिट दे दी थी. क्योंकि एबीवीपी से जुड़ा छात्र सुशील कुमार जिस अस्पताल में दाखिल हुआ था, उस के रिकौर्ड के अनुसार वह वहां पर अपेंडीसाइटिस के औपरेशन के लिए दाखिल हुआ था, उस के शरीर पर कोई चोट का निशान नहीं था.

23 सितंबर, 2015 को नए उपकुलपति अप्पा राव ने इस विश्वविद्यालय का कार्यभार संभाल लिया है. उसी समय मानव संसाधन विकास मंत्रालय बहुत गतिशील हो गया. 24 सितंबर को ही रिमाइंडर भेज दिया कि जवाब दें कि दलित छात्र रोहित वेमुला और उस के साथियों के विरुद्ध क्या काररवाई हुई. इस के बाद एक के बाद एक पांच रिमाइंडर भेजे गए. आखिरकार 7 जनवरी को इन पांचों छात्रों रोहित वेमुला, डी प्रशांत, पी. विजय कुमार, शैषैया चेमुदुगुंटा और सुकन्ना को निलंबित कर दिया गया था, जिस के परिणामस्वरूप रोहित ने आत्महत्या की थी.

महिला ने लगाया आरोप काली गाड़ी में हुआ गैंगरेप

Gang Rape Case  : नगेश शर्मा, रविंद्र सैनी और कामेश सक्सेना पर झूठा आरोप लगा कर उन्हें ब्लैकमेल करना चाहता था. इस के लिए उस ने शालू को मोहरा बनाया, शालू ने दोनों पर बलात्कार का आरोप भी लगाया पर…

19 फरवरी 2014 की बात है. करीब 8 बजे गाजियाबाद, हापुड़ रोड पर सड़क किनारे बने एक स्थानीय बस स्टैंड के पास 25-26 साल की एक लड़की के रोने की आवाज सुन कर लोगों का ध्यान उस की ओर चला गया. लग रहा था कि लड़की किसी हादसे का शिकार हुई है. उस के कपड़े अस्तव्यस्त थे और वह नशे की वजह से ठीक से नहीं बोल पा रही थी. उस की हालत देख कर किसी व्यक्ति ने इस की सूचना 100 नंबर पर पुलिस कंट्रोल रूम को दे दी. कुछ ही देर में इलाकाई गश्ती पुलिस की जीप वहां पहुंच गई. पुलिस को आया देख वहां मौजूद तमाशबीन इधरउधर हट गए. पुलिस ने लड़की से पूछताछ की तो उस ने अपना नाम शालू शर्मा बताया. वह मेरठ की रहने वाली थी.

शालू ने बताया कि वह आज सुबह ही काम की तलाश में गाजियाबाद आई थी. यहां कुछ लोगों ने उस का अपहरण कर के उस के साथ बलात्कार किया और उसे एक काली गाड़ी से यहां फेंक कर भाग गए. सामूहिक दुष्कर्म की बात सुन कर पुलिस टीम ने इस घटना की सूचना उच्चाधिकारियों को दे दी और पीडि़ता को जीप में बिठा कर महिला थाना ले आई. अभी पुलिस शालू से पूछताछ कर ही रही थी कि एक अन्य महिला पीडि़ता को ढूंढते हुए थाने पहुंच गई. उस औरत ने अपना नाम बृजेश कौशिक बताते हुए कहा कि वह मेरठ की रहने वाली है और शालू की चाची है.

बृजेश के अनुसार वह शालू को ढूंढ रही थी. तभी उसे बस स्टैंड के पास अस्तव्यस्त हालत में मिली एक लड़की के बारे में पता चला तो वह थाने आ गई. इस मामले की सूचना पा कर थाना कविनगर के थानाप्रभारी अरुण कुमार सिंह, सीओ (द्वितीय) अतुल कुमार यादव, एसपी (सिटी) शिवहरि मीणा व एसएसपी धर्मेंद्र कुमार यादव भी महिला थाना आ गए. पीडि़ता ने पूछताछ में बताया कि उस का नाम सुनीता शर्मा उर्फ शालू शर्मा है और वह पति से अनबन की वजह से अलग किराए के मकान में रहती है. आज सुबह ही वह काम की तलाश में मेरठ से गाजियाबाद आई थी.

बेहोश करके किया सामूहिक दुष्कर्म

गाजियाबाद में कलेक्ट्रेट के पास उस की मुलाकात कामेश सक्सेना नाम के व्यक्ति से हुई, जिस ने उसे काम दिलाने का भरोसा दिया. बातचीत के बाद वह उसे अपनी मोटरसाइकिल पर बिठा कर लोनी स्थित विधि विभाग के औफिस ले गया. इस के बाद वह उसे कुछ उच्च अधिकारियों से मिलवाने का बहाने बैंक कालोनी गाजियाबाद स्थित मित्रगण सहकारी आवास समिति के औफिस ले गया. वहां शाम 6 बजे कामेश ने उसे रविंद्र कुमार सैनी व कुछ अन्य लोगों से यह कह कर मिलवाया कि ये सब गाजियाबाद के बड़े लोग हैं. ये काम भी दिलवाएंगे और पैसा भी देंगे. वहीं पर उसे एक कप चाय पिलाई गई, जिसे पी कर वह बेहोश हो गई. बेहोशी की ही हालत में उन सभी ने उस के साथ सामूहिक Gang Rape Case दुष्कर्म किया. बाद में वे उसे एक काली कार मे डाल कर हापुड़ रोड पर गोविंदपुरम के पास फेंक कर भाग गए.

शालू जिस तरह बात कर रही थी, उस से पुलिस को कतई नहीं लग रहा था कि उस के साथ सामूहिक दुष्कर्म हुआ है. दूसरे बिना किसी सूचना के उस की चाची का थाने आना भी पुलिस को अजीब लग रहा था. इसलिए पुलिस ने आगे बढ़ने से पहले दोनों से ठीक से पूछताछ कर लेना उचित समझा. पूछताछ में शालू ने बताया था कि पति से अलग रहने की वजह से उस का और उस के बेटे का खर्चा नहीं चल पा रहा था. उसे नौकरी की तलाश थी. उस ने नौकरी के लिए अपने पड़ोस में रहने वाली अपनी चाची बृजेश कौशिक से कह रखा था. वह चूंकि समाजसेविका थी और उस के संपर्क भी अच्छे लोगों से थे इसलिए वह उसे नौकरी दिला सकती थी.

काम दिलाने के नाम पर ले गया

19 फरवरी की सुबह उस की चाची का फोन आया कि वह गाजियाबाद आ जाए. वह उसे नौकरी दिला देगी. उस ने यह भी कहा कि वह उसे गाजियाबाद कलेक्ट्रेट के पास मिलेगी. चाची के कहने पर ही वह गाजियाबाद कलेक्ट्रेट पहुंची थी. वहां चाची तो नहीं मिली, कामेश सक्सेना मिल गया. वह काम दिलाने के नाम पर उसे अपने साथ ले गया था. उधर बृजेश ने बताया था कि जब वह कलेक्ट्रेट पहुंची तो शालू उसे वहां नहीं मिली. उस के बाद वह दिन भर उसे ढूंढती रही. उसे शालू की बहुत चिंता हो रही थी. फिर रात गए जब उसे पता चला कि हापुड़ रोड के एक बसस्टैंड के पास एक लड़की पड़ी मिली है और उसे महिला थाने ले जाया गया है तो वह यहां आ गई. यहां पता चला कि वह लड़की शालू ही थी और उस के साथ सामूहिक दुष्कर्म हुआ था.

शालू और बृजेश के बयानों में काफी विरोधाभास था. पुलिस को शक हुआ तो उस ने शालू और बृजेश से पूछा कि जब दोनों के पास मोबाइल फोन थे तो उन्होंने एकदूसरे से फोन पर बात क्यों नहीं की. इस पर दोनों नेटवर्क का रोना रोने लगीं. यह बात पुलिस के गले नहीं उतरी, जिस से उसे शालू और बृजेश की बातों पर कुछ शक हुआ. बहरहाल, पुलिस ने शालू शर्मा के बयान के आधार पर नामजद अभियुक्तों के खिलाफ रात साढ़े 8 बजे धारा 342, 506 व 376 के तहत केस दर्ज कर लिया. इस के साथ ही उसे मैडिकल जांच के लिए जिला अस्पताल भेज दिया गया. मैडिकल जांच में इस बात की पुष्टि हो गई कि शालू के साथ दुष्कर्म हुआ था. चूंकि शालू गैंगरेप की बात कर रही थी, इसलिए मामले की गंभीरता को समझते हुए पुलिस उच्चाधिकारियों ने मीटिंग की और इस की जांच का जिम्मा सीओ (द्वितीय) अतुल यादव को सौंप दिया. उन्हें निर्देश दिया गया कि आरोपियों को गिरफ्तार कर के जल्द से जल्द मामले का खुलासा करें.

पुलिस को हुआ शालू की बातों पर शक

सीओ अतुल कुमार यादव, थानाप्रभारी कविनगर अरुण कुमार सिंह, महिला थानाप्रभारी अंजू सिंह तेवतिया व सबइंस्पेक्टर अमन सिंह ने इस मामले पर आपस में विचारविमर्श किया तो उन्हें शालू और बृजेश के बयानों में विरोधाभास नजर आया. रविंद्र सैनी और कामेश सक्सेना के फोन नंबर शालू से ही मिल गए. पुलिस ने उन से संपर्क किया तो बात भी हो गई. दोनों ही सम्मानित व्यक्ति थे. रविंद्र सैनी प्रौपर्टी का काम करते थे, जबकि कामेश सक्सेना बिजली विभाग में जूनियर इंजीनियर थे. चूंकि Gang Rape Case दुष्कर्म का मामला दर्ज हो चुका था, इसलिए पुलिस ने रात में ही रविंद्र सैनी और कामेश सक्सेना को थाने बुला लिया. दोनों का ही कहना था कि उन पर यह झूठा आरोप लगाया जा रहा है, पुलिस चाहे तो उन की काल डिटेल्स रिकलवा कर उन की लोकेशन पता कर सकती है. चूंकि पुलिस को शालू की बातों पर शक था, इसलिए पुलिस ने रविंद्र सैनी और कामेश सक्सेना का उस से आमनासामना नहीं कराया.

इस की जगह उन्होंने एक बार फिर पीडि़ता शालू से गहन पूछताछ का मन बनाया, ताकि सच्चाई सामने आ सके. लेकिन इस से पहले पुलिस टीम में पीडि़ता और दोनों नामजद आरोपियों के मोबाइल की काल डिटेल्स निकलवा कर चैक कर लिया. तीनों की काल डिटेल्स की पड़ताल से पता चला कि पूरे दिन शालू और कामेश सक्सेना के फोन लोकेशन कलेक्ट्रेट या लोनी के आसपास नहीं थी. जबकि शालू अपने बयान में दावा कर रही थी कि वह कामेश से कलक्ट्रेट पर मिली थी. काल डिटेल्स से यह भी पता चला कि रविंद्र सैनी का कामेश सक्सेना या पीडि़ता से एक बार भी मोबाइल फोन से संपर्क नहीं हुआ था. इस से पुलिस को लगा कि शालू संभवत: कामेश सक्सेना और रविंद्र सैनी को जानती ही नहीं है.

पुलिस ने काल डिटेल्स निकलवाई तो किसका नंबर निकला

ऐसी स्थिति में इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता था कि हो न हो शालू किसी लालच के तहत या किसी के कहने पर रविंद्र सैनी और कामेश सक्सेना पर आरोप लगा रही हो. इस सच्चाई का पता लगाने के लिए पुलिस ने रविंद्र सैनी और कामेश सक्सेना सहित 8 लोगों को शालू के सामने खड़ा कर के पूछा कि वह दुष्कर्मियों को पहचाने. लेकिन वह रविंद्र सैनी और कामेश सक्सेना में से किसी को नहीं पहचान सकी. इस का मतलब वह झूठ बोल रही थी. पुलिस की इस काररवाई ने जांच की दिशा ही बदल दी. अब शालू खुद ही जांच के दायरे में आ गई. दोनों आरोपियों की काल डिटेल्स से यह साबित हो गया था कि वे दोनों भी एकदूसरे के संपर्क में नहीं थे. जबकि पीडि़ता ने अपने बयान में कहा था कि कामेश ने ही उसे रविंद्र से सोसाइटी के औफिस में मिलवाया था. अगर ऐसा होता तो दोनों के बीच बातचीत जरूर हुई होती.

इसी बात को ध्यान में रख कर जब शालू की काल डिटेल्स को फिर से जांचा गया तो उस में एक खास नंबर पर पुलिस की निगाह पड़ी. शालू ने मेरठ से गाजियाबाद आने के बाद उस नंबर पर दिन में कई बार बात की थी. काल डिटेल्स से यह बात भी सामने आ गई थी कि शालू और उस नंबर से फोन करने वाले की ज्यादातर लोकेशन नवयुग मार्केट, गाजियाबाद के आसपास थी. शालू की तथाकथित चाची बृजेश के मोबाइल नंबर की भी काल डिटेल्स निकलवाई गई थी. जांच में पता चला कि दिनभर वह भी उस नंबर के संपर्क में रही थी. उस नंबर से उस के मोबाइल पर कई बार फोन आए थे. जब उस संदिग्ध फोन नंबर की आईडी निकलवाई गई तो पता चला कि वह नंबर नगेशचंद्र शर्मा, निवासी गांव रामपुर, जिला हापुड़ का है.

पुलिस ने उस नंबर पर फोन किया तो वह बंद मिला. इस से पुलिस को पक्का यकीन हो गया कि इस मामले में कोई न कोई झोल जरूर है. अगले दौर की पूछताछ के लिए शालू उर्फ सुनीता शर्मा को एक बार फिर से तलब किया गया. इस बार शालू से जब उस के फोन की काल डिटेल्स को आधार बना कर पूछताछ की गई तो वह अधिक देर तक पुलिस के सवालों का सामना नहीं कर सकी. उस ने इस फरजी दुष्कर्म कांड का सारा राज खोल दिया. मेरठ रोड, नई बस्ती निवासी तेजपाल शर्मा की बेटी सुनीता शर्मा उर्फ शालू भले ही अभावों में पलीबढ़ी थी, लेकिन थी महत्त्वाकांक्षी, जब वह 16 साल की थी, तभी उस की शादी मेरठ के ही प्रवीण शर्मा से हो गई. मायके में तो गरीबी थी ही, शालू की ससुराल की आर्थिक स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं थी. शादी के 2 साल बाद ही शालू प्रवीण के बेटे की मां बन गई.

शालू और प्रवीण में वैचारिक मतभेद रहते थे, जो धीरेधीरे बढ़ते गए. जब दोनों में झगड़ा रहने लगा तो शालू ससुराल छोड़ कर अपने बेटे के साथ मायके में रहने आ गई. अपने और बेटे के पालनपोषण के लिए चूंकि नौकरी करना जरूरी था, इसलिए वह नौकरी की तलाश में लग गई. नौकरी तो उसे नहीं मिली, पर राजकुमार गुर्जर उर्फ राजू भैया जरूर मिल गया, जो बसपा के टिकिट पर जिला पंचायत का चुनाव लड़ रहा था. राजनीति की नैया पर सवार हो कर आगे बढ़ने की चाह में शालू ने राजकुमार गुर्जर से नजदीकियां बना लीं और उस के साथ लिव इन रिलेशनशिप में रहने लगी. लेकिन कुछ दिनों बाद शालू को लगने लगा कि उसे अपने और अपने बेटे के लिए नौकरी तो करनी ही पड़ेगी. नौकरी की जरूरत महसूस हुई तो शालू ने पड़ोस में रहने वाली अपनी रिश्ते की चाची बृजेश कौशिक से मदद मांगी. उस के कहने पर ही वह गाजियाबाद आई थी.

पुलिस को दिए अपने इकबालिया बयान में शालू शर्मा ने बताया था कि वह अपनी चाची बृजेश कौशिक के माध्यम से नगेशचंद्र शर्मा को जानती थी और उसी के बुलाने पर 19 फरवरी को मेरठ से गाजियाबाद आई थी. नगेशचंद्र का औफिस नवयुग मार्केट में था. उस के नवयुग मार्केट स्थित औफिस पहुंचने के कुछ देर बाद उस की चाची बृजेश कौशिक भी वहां आ गई थी. नगेशचंद्र शर्मा ने शालू को एक परचा लिख कर दिया, जिस पर 2 आदमियों के नाम व फोन नंबर लिखे थे. इन में एक नाम रविंद्र सैनी का और दूसरा कामेश सक्सेना का था. नगेश ने उन दोनों के फोटो शालू को दिखा कर कहा कि उसे उन के खिलाफ दुष्कर्म का मुकदमा दर्ज कराना है. जब वह एफआईआर दर्ज करा देगी तो उसे 20 हजार रुपए दिए जाएंगे. उस कागज को पढ़ कर शालू ने चाची की ओर देखा तो उस ने कहा कि अगर पैसों की ज्यादा जरूरत है तो यह काम कर दे. इस काम में वह भी उस की मदद करेगी.

अर्द्धबेहोशी की हालत में किया दुष्कर्म

इस के बाद नगेश ने फोन कर के लोनी के एक लड़के शहजाद को बुलाया. उस के आने के बाद नगेश ने उसे कप में डाल कर चाय पिलाई, जिसे पी कर शालू अर्द्धबेहोशी की हालत में आ गई. इस बीच नगेश शहजाद को वहीं छोड़ कर चाची के साथ बाहर चला गया. अर्द्धबेहोशी की हालत में शहजाद ने उस के साथ दुष्कर्म किया. शालू ने आगे बताया कि उस ने अपनी पहली एफआईआर में रविंद्र सैनी और कामेश सक्सेना का नाम नगेशचंद्र शर्मा के कहने पर लिखवाया है, जिन्हें वह जानती तक नहीं थी. शालू शर्मा के इस इकबालिया बयान को अगले दिन धारा 164 के तहत मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज कराया गया. शालू के इस बयान के बाद इस मामले की सभी बिखरी कडि़यां जुड़ गई थीं.

पुलिस ने मुखबिरों की निशानदेही और फोन लोकेशन के आधार पर जाल बिछा कर 20 फरवरी, 2014 की सुबह साढ़े 9 बजे बसअड्डे के सामने संतोष अस्पताल के गेट के पास से नगेशचंद्र शर्मा, शहजाद निवासी बंगाली पीर, कस्बा लोनी और बृजेश कौशिक निवासी शिवपुरम, मेरठ को गिरफ्तार कर लिया. उस समय ये तीनों काली वैगनआर कार से कहीं भागने की फिराक में थे. तीनों को थाने ला कर पूछताछ की गई तो नगेश चंद्र शर्मा ने बताया कि वह रविंद्र सैनी व कामेश सक्सेना को पहले से ही जानता था. दोनों ही करोड़पति हैं. उन्हें वह दुष्कर्म के झूठे केस में फंसा कर मोटी रकम वसूलना चाहता था. नगेशचंद्र शर्मा खुद को एटूजेड न्यूज चैनल का पत्रकार बताता था. इसी नाम से उस ने नवयुग मार्केट में औफिस भी खोल रखा था. जबकि शहजाद फोटोग्राफर था और नगेशचंद्र शर्मा के साथ ही रहता था. वैसे एटूजेड चैनल का कहना है कि उस ने नगेशचंद्र शर्मा को काफी पहले निकाल दिया था.

बहरहाल, आरोपी शहजाद ने बताया कि उस ने जो भी किया, नगेशचंद्र शर्मा के कहने पर किया था, वह भी रविंद्र और कामेश को नहीं जानता था. बृजेश कौशिक का भी यही कहना था कि उस ने भी जो किया वह नगेशचंद्र शर्मा के कहने पर किया था. वह भी रविंद्र सैनी या कामेश सक्सेना को नहीं जानती थी. 66 वर्षीय रविंद्र सैनी अपने परिवार के साथ सैक्टर 9, राजनगर गाजियाबाद में रहते थे. उन के दोनों बेटे उच्च शिक्षा प्राप्त थे और अपनेअपने परिवार के साथ अमेरिका और बंगलूरु में रहते थे. रविंद्र सैनी स्टेट बैंक औफ इंडिया की महाराजपुर, गाजियाबाद शाखा से 1998 में रिटायर हुए थे. डिप्टी मैनेजर के पद पर कार्य करते हुए उन्होंने रिटायर होने से पहले एक आवासीय समिति बनाई थी. यह उस समय की बात है, जब दिल्ली और एनसीआर में जमीनों के दाम बहुत कम थे. तब जमीनें आसानी से उपलब्ध थीं.

उसी जमाने में रविंद्र सैनी ने किसानों से 14 एकड़ जमीन खरीद कर एक सोसायटी बनाई, जिस का नाम रखा गया राष्ट्रीय बैंककर्मी एवं मित्रगण आवास समिति. यह आवासीय समिति सदरपुर गाजियाबाद के पास है. इस आवास समिति के पहले चुनाव में प्रमोद कुमार त्यागी को अध्यक्ष व रविंद्र सैनी को सचिव पद के लिए चुना गया था. इस समिति के 203 सदस्य हैं. इस समिति ने जो आवासीय कालोनी बनाई उस का नाम संयोगनगर रखा गया. यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि समिति के पहले चुनाव में ही रविंद्र सैनी को सर्वसम्मति से आजीवन सचिव बनाया गया था. इस पद पर कार्य करते हुए अध्यक्ष प्रमोद त्यागी को जब कई तरह की वित्तीय अनियमितताओं में लिप्त पाया गया तो 2005 के चुनाव में उन्हें पद से हटा दिया गया. उन की जगह वीरेंद्र त्यागी को अध्यक्ष चुना गया. प्रमोद त्यागी ने पद से हटाए जाने का कारण रविंद्र सैनी को माना और उन से रंजिश रखने लगे.

करीब 2 साल तक चुप रहने के बाद प्रमोद त्यागी ने अधिगृहीत जमीन के किसानों के साथ मिल कर कई तरह की अनियमितताओं की शिकायतें जीडीए व अन्य सरकारी विभागों में कीं. लेकिन जब कोई सफलता नहीं मिली तो उन्होंने अपने एक दोस्त विजय पाल त्यागी द्वारा सितंबर, 2010 में रविंद्र सैनी के खिलाफ गाजियाबाद की सिविल कोर्ट में एक मुकदमा दर्ज कराया. इस में कहा गया था कि रविंद्र सैनी ने गाजियाबाद के डूंडाहेड़ा इलाके में उन्हें एक भूखंड दिलाने की एवज में 3 किश्तों में 16 लाख 10 हजार रुपए लिए थे, जिन्हें हड़प लिया है और जमीन की रजिस्ट्री भी नहीं कराई है. यह मुकदमा आज भी अदालत में विचाराधीन है. 18 अक्टूबर 2013 को दोपहर करीब 1 बजे रविंद्र सैनी को जैन नाम के किसी व्यक्ति ने फोन कर के कहा कि वह उन का मकान किराए पर लेना चाहता है.

लेकिन रविंद्र सैनी जब वहां पहुंचे तो बंदूक और रिवाल्वर की नोक पर उन्हें बंधक बना कर उन के बैंक कालोनी स्थित मकान की तीनों मंजिलों की रजिस्ट्री उन के नाम करने, 15 लाख रुपए नकद देने तथा समिति के सचिव पद से हट जाने को कहा गया. ऐसा न करने पर उन्हें गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी गई. इस घटना की तहरीर उसी दिन देर शाम रविंद्र सैनी ने थाना कविनगर में दर्ज कराने की कोशिश की. लेकिन पुलिस ने रिपोर्ट लिखने से इनकार कर दिया. इस पर रविंद्र सैनी ने अदालत की शरण ली. अदालत के आदेश पर नामजद अभियुक्तों प्रमोद कुमार त्यागी और विजय पाल त्यागी के खिलाफ 18 अक्तूबर, 2013 को भादंवि की धारा 384, 323, 386, 452, 504 व 506 के तहत मुकदमा दर्ज तो कर लिया गया, लेकिन कोई भी काररवाई नहीं की गई.

कोई काररवाई न होती देख रवींद्र सैनी ने अपनी व्यथा एसएसपी गाजियाबाद, डीआईजी मेरठ जोन, मंडलायुक्त मेरठ, डीजीपी लखनऊ, मानव अधिकार आयोग व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव तक भी पहुंचाई. लेकिन सिवाय आश्वासनों के उन्हें कुछ नहीं मिला. अभी तक यह लड़ाई और रंजिश व्यक्तिगत थी, लेकिन अब उन्हें एक और झूठे दुष्कर्म केस में फंसाने की कोशिश की गई. इस मामले में नाम आने पर रवींद्र सैनी और उन के परिवार की काफी बदनामी होती, लेकिन पुलिस की तत्परता से वह बालबाल बच गए. इस कथित दुष्कर्म कांड में नामजद दूसरे आरोपी कामेश सक्सेना, गाजियाबाद के बिजली विभाग में कार्यरत हैं और परिवारसहित विजयनगर में रहते हैं.

20 फरवरी, 2014 को रवींद्र सैनी द्वारा दी गई तहरीर के आधार पर भादंवि धारा 384/511 व 120बी के तहत एक एफआईआर दर्ज की गई, जिस में नगेशचंद्र शर्मा, शहजाद व बृजेश कौशिक को आरोपी बनाया गया. इसी मामले में एक अन्य एफआईआर कथित पीडि़ता सुनीता शर्मा उर्फ शालू द्वारा भी दर्ज कराई गई, जिस में नगेशचंद्र शर्मा, शहजाद और बृजेश कौशिक को आरोपी बनाया गया. इन के खिलाफ धारा 376, 342, 506 व 120बी के तहत मामला दर्ज कर काररवाई की गई. गिरफ्तार किए गए तीनों आरोपियों को उसी दिन गाजियाबाद कोर्ट में पेश किया गया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों व जनचर्चा पर आधारित है

Social Crime Stories : 20 लाख के लिए साले ने किया जीजा के भाई का कत्ल

Social Crime Stories : आगरा के संजय पैलेस स्थित आईसीआईसीआई बैंक के कैशियर के सामने जैसे ही एक करोड़ रुपए का चैक आया, उस ने नजरें उठा कर चैक रखने वाले को देखा तो एकदम से उस के मुंह से निकल गया, ‘‘नमस्कार इमरान भाई, कहो कैसे हो?’’

‘‘ठीक हूं भाईजान, आप कैसे हैं?’’ जवाब में इमरान ने कहा.

‘‘मैं भी ठीक हूं्.’’ कैशियर ने कहा.

‘‘भाईजान थोड़ा जल्दी कर देंगे, बड़े भाईजान का फोन आ चुका है. वह मेरा ही इंतजार कर रहे हैं.’’ इमरान ने कहा.

कैशियर अपनी सीट से उठा और मैनेजर के कक्ष में गया. थोड़ी देर बाद लौट कर उस ने कहा, ‘‘इमरानभाई, आज तो बैंक में इतनी रकम नहीं है. जो है वह ले लीजिए, बाकी का भुगतान कल कर दूं तो..?’’

‘‘कोई बात नहीं. आज कितना कर सकते हैं?’’ इमरान ने पूछा.

‘‘20-25 लाख होंगे. ऐसा है, आप को आज 20 लाख दे देता हूं. बाकी कल ले लीजिएगा.’’ कैशियर ने कहा तो इमरान ने एक करोड़ वाला चैक वापस ले कर 20 लाख का दूसरा चैक दे दिया. कैशियर ने उसे 20 लाख रुपए दिए तो उन्हें बैग में डाल कर वह बाहर खड़ी अपनी मारुति 800 से शहर से 15 किलोमीटर दूर कुबेरनगर स्थित अपने ताऊ के बेटे पूर्व विधायक जुल्फिकार अहमद भुट्टो के स्लाटर हाउस (कट्टीखाने) की ओर चल पड़ा.

यह शाम के सवा 4 बजे की बात थी. साढे़ 4 बजे के आसपास इमरान पैसे ले कर वाटर वर्क्स चौराहे पर पहुंचा था कि उस के बड़े भाई इरफान का फोन आ गया. फोन रिसीव कर के उस ने कहा, ‘‘भाईजान, बैंक से 20 लाख रुपए ही मिल सके हैं. मैं उन्हें ले कर 10-15 मिनट में पहुंच रहा हूं.’’

इमरान ने 10-15 मिनट में पहुंचने को कहा था. लेकिन एक घंटे से भी ज्यादा समय हो गया और वह स्लाटर हाउस नहीं पहुंचा तो उस के बड़े भाई इरफान को चिंता हुई. उस ने इमरान को फोन किया तो पता चला कि उस के दोनों फोन बंद हैं. इरफान परेशान हो उठा.  वह बारबार नंबर मिला कर इमरान से संपर्क करने की कोशिश करता रहा, लेकिन फोन बंद होने की वजह से संपर्क नहीं हो पाया. अब तक शाम के 7 बज गए थे. इरफान को हैरानी के साथसाथ चिंता भी होने लगी.

इमरान और इरफान आगरा छावनी से बसपा के विधायक रह चुके जुल्फिकार अहमद भुट्टो के चचेरे भाई थे. दोनों भाई आगरा शहर से यही कोई 15 किलोमीटर दूर कुबेरपुर स्थित जुल्फिकार अहमद भुट्टो के स्लाटर हाउस (कट्टीखाने) का कामकाज देखते थे. इरफान फैक्ट्री का एकाउंट संभालता था तो उस से छोटा इमरान फील्ड का काम देखता था. बैंक में रुपए जमा कराने, निकाल कर लाने आदि का काम वही करता था.

चूंकि उन के चचेरे भाई बसपा के विधायक रह चुके थे, इसलिए यह काम इमरान अकेला ही करता था. अपने साथ वह कोई हथियार भी नहीं रखता था. इस की वजह यह थी कि वह खुद तो साहसी था ही, फिर सिर पर बड़े भाई का हाथ भी था. लेकिन जब से उस के बड़े भाई इरफान का साला भोलू स्लाटर हाउस से जुड़ा था, वह इमरान के साथ रहने लगा था. बड़े भाई का साला होने की वजह से भोलू भरोसे का आदमी था. इसीलिए बैंक आनेजाने में इमरान उसे साथ रखने लगा था.

लेकिन 3 दिसंबर को भोलू ने फोन कर के कहा था कि वह जानवरों की खरीदारी के लिए शमसाबाद जा रहा है, इसलिए आज नहीं आ पाएगा. भोलू ने यह बात इमरान और इरफान दोनों भाइयों को बता दी थी, जिस से वे उस का इंतजार न करें. भोलू नहीं आया तो इमरान अकेला ही बैंक चला गया था. वह चला तो गया था, लेकिन लौट कर नहीं आया था.

7 बजे के आसपास पैसे ले कर इमरान के वापस न आने की बात इरफान ने बड़े भाई जुल्फिकार अहमद भुट्टो को बताई तो वह भी परेशान हो उठे. उन्हें पैसों की उतनी चिंता नहीं थी, जितनी भाई की थी. वह इमरान को बहुत पसंद करते थे. इसीलिए उन्होंने उसे अपने यहां रखा था. उन के यहां काम करते उसे लगभग ढाई साल हो गए थे. इस बीच उस ने एक पैसे की भी हेराफेरी नहीं की थी.

जुल्फिकार अहमद भुट्टो ने भी इमरान के दोनों नंबरों पर फोन किया. जब दोनों नंबर बंद मिले तो वह इरफान के अलावा फैक्ट्री के 20-25 लोगों को 6-7 गाडि़यों से ले कर वाटर वर्क्स चौराहे पर जा पहुंचे, क्योंकि इमरान ने वहीं से बड़े भाई इरफान को आखिरी फोन किया था. इधरउधर तलाश करने के बाद वहां के दुकानदारों से ही नहीं, बीट पर मौजूद सिपाहियों से भी पूछा गया कि यहां कोई हादसा तो नहीं हुआ था.

वाटर वर्क्स चौराहे पर इमरान के बारे में कुछ पता नहीं चला तो वाटर वर्क्स चौराहे से फैक्ट्री तक ही नहीं, पूरे शहर में उस की तलाश की गई. लेकिन उस के बारे में कहीं कुछ पता नहीं चला. सब हैरानपरेशान थे. लोगों की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर इमरान कहां चला गया. ऐसे में जब कुछ लोगों ने आशंका व्यक्त की कि कहीं पैसे ले कर इमरान भाग तो नहीं गया, तब पूर्व विधायक जुल्फिकार अहमद ने चीख कर कहा था, ‘भूल कर भी ऐसी बात मत करना. वह मेरा भाई है, ऐसा हरगिज नहीं कर सकता.’

सुबह होते ही फिर इमरान की खोज शुरू हो गई थी. उस के इस तरह गायब होने से उस के घर में कोहराम मचा हुआ था. घर के किसी भी सदस्य के आंसू थम नहीं रहे थे. सब को इस बात की आशंका सता रही थी कि कहीं इमरान के साथ कोई अनहोनी तो नहीं घट गई. बैंक जा कर भी इमरान के बारे में पूछा गया. बैंक में लगे सीसीटीवी कैमरे की फुटेज भी देखी गई. पता चला, वह बैंक में अकेला ही आया था और अकेला ही गया था.

अब इमरान के घर वालों के पास इमरान की गुमशुदगी दर्ज कराने के अलावा दूसरा कोई चारा नहीं बचा था. जुल्फिकार अहमद भुट्टो पुलिस अधीक्षक (नगर) पवन कुमार से मिले और उन्हें सारी बात बताई. उन्होंने तुरंत थाना हरिपर्वत के थानाप्रभारी सुरेंद्र कुमार और क्षेत्राधिकारी समीर सौरभ को इस मामले को प्राथमिकता से देखने का आदेश दिया. थाना हरि पर्वत पुलिस ने इमरान की गुमशुदगी दर्ज कर इमरान के दोनों नंबर सर्विलांस सेल को दे कर उन की काल डिटेल्स और आखिरी लोकेशन बताने का आग्रह किया.

पुलिस अधीक्षक (नगर) पवन कुमार ने इस मामले की जानकारी वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक शलभ माथुर को भी दे दी थी. पुलिस इस मामले में तत्परता से लग गई. इमरान के मोबाइल जब बंद हुए थे, तब वे वाटर वर्क्स और रामबाग चौराहे के टावरों की सीमा में थे. काल डिटेल्स में ऐसा कोई भी नंबर नहीं था, जिस पर संदेह किया जाता. जो भी फोन आए थे या किए गए थे, वे अपनों को ही किए गए थे या आए थे. जैसे कि इरफान, पूर्व विधायक के घर के नंबरों व भोलू के नंबरों के थे. एक दिन पहले भी इरफान या भोलू के फोन आए थे या इन्हें ही किए गए थे. चूंकि पुलिस को इन फोनों में कुछ नया या संदेहास्पद नजर नहीं आया, इसलिए पुलिस अन्य बातों पर विचार करने लगी.

इस काल डिटेल्स और लोकेशन की एकएक कौपी वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक शलभ माथुर, पुलिस अधीक्षक पवन कुमार और क्षेत्राधिकारी समीर सौरभ को भी दी गई थी. इन अधिकारियों ने जब काल डिटेल्स और लोकेशन का अध्ययन किया तो उन्हें एक नंबर पर संदेह हुआ. पुलिस ने उस नंबर की लोकेशन निकलवाई तो यह संदेह और बढ़ गया. यह आदमी कोई और नहीं, इरफान का साला भोलू था, जो इमरान के साथ बैंक आता जाता था.

पुलिस ने भोलू को थाने बुलाया तो उस के साथ पूरा परिवार ही चला आया. सभी पुलिस से उस पर शक की वजह पूछने लगे तो क्षेत्राधिकारी समीर सौरभ ने कहा, ‘‘पुलिस शक के आधार पर ही अभियुक्तों तक पहुंचती है. हम किसी पर भी शक कर सकते हैं. वह सगा हो या पराया. आप लोग निश्चिंत रहें, हम किसी निर्दोष व्यक्ति को कतई नहीं फंसाएंगे.’’

क्षेत्राधिकारी के इस आश्वासन पर सभी को विश्वास हो गया कि भोलू को सिर्फ पूछताछ के लिए बुलाया गया है. क्योंकि वही उस के साथ बैंक आताजाता था. पुलिस भोलू से पूछताछ करती रही, जबकि वह स्वयं को निर्दोष बताते हुए पुलिस की इस काररवाई को अपने साथ अन्याय कहता रहा था. इस तरह 4 दिसंबर का दिन भी बीत गया. कोई जानकारी न मिलने से इमरान के घर वालों की चिंता बढ़ती ही जा रही थी. 5 दिसंबर की सुबह आगरा से यही कोई 20 किलोमीटर दूर यमुना एक्सप्रेसवे से सटे गांव चौगान के पंचमुखी महादेव मंदिर के पुजारी ने एक्सप्रेसवे से सटे एक गड्ढे में एक Social Crime Stories युवक की लाश देखी. चूंकि लाश खून से लथपथ थी, इसलिए उसे समझते देर नहीं लगी कि किसी ने इस अभागे को मार कर यहां फेंक दिया है.

पुजारी ने इस घटना की सूचना ग्रामप्रधान को दी तो उस ने इस बात की जानकारी थाना एत्मादपुर पुलिस को दे दी. थाना एत्मादपुर पुलिस तुरंत घटनास्थल पर पहुंची और लाश की शिनाख्त कराने की कोशिश की. लाश की शिनाख्त नहीं हो सकी तो उन्होंने इस बात की सूचना जिले के वरिष्ठ अधिकारियों को दे दी. साथ ही उन्होंने मृतक का हुलिया भी बता दिया था. थाना एत्मादपुर पुलिस ने मृतक का जो हुलिया बताया था, वह 3 दिसंबर की शाम से लापता इमरान से हुबहू मिल रहा था. इसलिए वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक शलभ माथुर पुलिस अधीक्षक (ग्रामीण-पश्चिम) बबीता साहू, क्षेत्राधिकारी अवनीश कुमार, समीर सौरभ के अलावा कई थानों का पुलिस बल एवं इमरान के घर वालों को साथ ले कर गांव चौगान पहुंच गए.

शव इमरान का ही था. हत्यारों ने उसे बड़ी बेरहमी से मारा था. उसे गोली तो मारी ही थी, उस का गला भी काट दिया था. पुलिस ने जहां लाश पड़ी थी, वहीं से थोड़ी दूरी पर पड़े चाकू और पिस्टल को भी बरामद कर लिया था. साफ था, इन्हीं से इमरान की हत्या की गई थी. हत्या करने वाले दोनों चीजें वहीं फेंक गए थे. घटनास्थल की काररवाई निपटा कर पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए आगरा मैडिकल कालेज भिजवा दिया. लाश बरामद होने से साफ हो गया कि इमरान की हत्या हो चुकी है. लाश के पास उस की कार और पैसे नहीं मिले थे, इस का मतलब यह हत्या उन्हीं पैसों के लिए की गई थी, जो वह बैंक से ले कर चला था. लाश बरामद होने के बाद पुलिस ने भोलू से सख्ती से पूछताछ शुरू की. इस की वजह यह थी कि पुलिस के पास उस के खिलाफ अब तक पुख्ता सुबूत मिल चुके थे.

पुलिस ने उस के मोबाइल फोन की 3 दिसंबर की लोकेशन निकलवाई तो चौगान की मिली थी. पुलिस ने इसी लोकेशन को आधार बना कर भोलू के साथ सख्ती की तो उसे इमरान की हत्या की बात स्वीकार करनी ही पड़ी. इस के बाद उस ने अपने उस साथी का भी नाम बता दिया, जिस के साथ मिल कर उस ने इस घटना को अंजाम दिया था. इमरान की हत्या का राज खुला तो इमरान के घर वाले ही नहीं, रिश्तेदार और दोस्त यार भी हैरान रह गए. हैरान होने वाली बात ही थी. इमरान की हत्या करने वाला भोलू इमरान के बड़े भाई का साला तो था ही, इमरान का पक्का दोस्त भी था. इस के बावजूद उस ने हत्या कर दी थी. आइए, अब यह जानते हैं कि आखिर भोलू ने ऐसा क्यों किया था?

हाजी सलीमुद्दीन और हाजी मोहम्मद आशिक, दोनों सगे भाई आगरा के ताजगंज के कटरा उमर खां में रहते हैं. हाजी मोहम्मद आशिक के बड़े बेटे मोहम्मद जुल्फिकार अहमद भुट्टो उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी के विधायक भी रह चुके हैं. मायावती प्रदेश की मुख्यमंत्री थीं तो भुट्टो की प्रदेश में खासी इज्जत थी. इस की वजह यह थी कि वह मायावती के खासमखास नसीमुद्दीन सिद्दीकी के खासमखास थे. भुट्टो के विधायक रहते हुए आगरा के कुबेरपुर स्थित उन के स्लाटर हाउस ने खासी तरक्की की. इस की खपत एकाएक बढ़ गई. काम बढ़ा तो वर्कर भी बढ़ गए. तभी उन्होंने अपने चाचा सलीमुद्दीन के बड़े बेटे इरफान को अपने स्लाटर हाउस का हिसाबकिताब देखने के लिए रख लिया. इरफान को यह काम पसंद आ गया तो 2 साल पहले उस ने अपने छोटे भाई इमरान को भी अपनी मदद के लिए स्लाटर हाउस में रख लिया.

20 वर्षीय इमरान मेहनती युवक था. स्लाटर हाउस में नौकरी करने से पहले वह ताजमहल में गाइड का काम करता था. वहां वह ठीकठाक कमाई कर रहा था, लेकिन जब भुट्टो ने उस से इरफान की मदद के लिए स्लाटर हाउस में काम करने को कहा तो उस ने गाइड का काम छोड़ दिया और भाई के स्लाटर हाउस का काम देखने लगा. 5 भाइयों में सब से छोटे Social Crime Stories इमरान ने स्लाटर हाउस में आते ही रुपयों के लेनदेन से ले कर बाहर के सारे काम संभाल लिए. इस तरह इमरान ने आते ही इरफान का बोझ आधा कर दिया.

इरफान की शादी हो चुकी थी. उस का विवाह आगरा शहर के ही वजीरपुरा के रहने वाले अहसान की बेटी सीमा के साथ हुआ था. उस के ससुर दरी के अच्छे कारीगर थे, इसलिए उन का दरियों का कारोबार था. उन के इंतकाल के बाद इस पुश्तैनी काम में ज्यादा मुनाफा नहीं दिखाई दिया तो उन के सब से छोटे बेटे भोलू ने जूतों के डिब्बे बनाने का काम शुरू कर दिया. जबकि उस के 3 अन्य भाई और चाचा दरी का पुश्तैनी कारोबार ही करते रहे. भोलू का जूतों के डिब्बे बनाने का काम बढि़या चल निकला. उसी की कमाई से जल्दी ही उस ने मारुति स्विफ्ट कार खरीद ली. भोलू अपनी बहन सीमा के यहां आताजाता ही रहता था. इसी आनेजाने में उस ने महसूस किया कि स्लाटर हाउस में जो लोग जानवर सप्लाई करते हैं, उन की अच्छीखासी कमाई होती है. उस के पास पैसे तो थे ही, उस ने अपने बहनोई इरफान से इस संबंध में बात की तो उस ने भुट्टो से बात कर के भोलू को जानवर खरीद कर लाने के लिए कह दिया.

इस के बाद भोलू आगरा के जानवरों के बाजारों, किरावली, शमसाबाद, बटेश्वर आदि से सस्ते दामों में जानवर खरीद कर बहनोई की मार्फत स्लाटर हाउस में बेचने लगा. इस काम में उसे अच्छीखासी कमाई होने लगी. जूतों के डिब्बों का उस का काम चल ही रहा था. इस तरह महीने में वह एक लाख रुपए से अधिक की कमाई करने लगा. किरावली बाजार में जानवरों की खरीदारी के दौरान भोलू की मुलाकात सलमान से हुई तो उसे यह आदमी भा गया. सलमान भी जानवरों की खरीदफरोख्त करता था. इस की वजह यह थी कि एक तो भोलू को कई काम देखने पड़ते थे, दूसरे सलमान इस काम में काफी तेज था. इसीलिए पहली मुलाकात में ही भोलू ने सलमान को बिजनैस पार्टनर बना लिया था. इस के बाद दोनों मिल कर जानवर खरीदने और बेचने लगे.

भोलू ने सलमान को बिजनैस पार्टनर तो बना लिया, लेकिन उस के बारे में उसे ज्यादा कुछ पता नहीं था. उस के बारे में उसे सिर्फ इतना पता था कि वह किरावली का रहने वाला है और उस का मोबाइल नंबर यह है. भोलू के साथ रहने में सलमान को फायदा दिखाई दिया, इसलिए वह उस के साथ रहने लगा. बड़े भाई का साला होने की वजह से इमरान की भोलू से खूब पटती थी. जिस दिन भोलू पशु मेले या बाजार नहीं गया होता था, सारा दिन इमरान उसे अपने साथ रखता था. उसी के सामने वह बैंक से पैसे भी निकालता था और जमा भी कराता था. 50 लाख से ले कर करोड़ रुपए निकालना उस के लिए आम बात थी.

भोलू ने कभी कोई ऐसी वैसी हरकत नहीं की थी, इसलिए इमरान उस पर पूरा विश्वास करने लगा था. भोलू का काम दोनों ओर से ठीकठाक चल रहा था. उस की कमाई महीने में लाख रुपए से ऊपर थी. लेकिन कमाई बढ़ी तो उस की पैसों की भूख भी बढ़ गई थी. अब वह करोड़पति बनने के सपने देखने लगा.

एक दिन शाम को वह सलमान के साथ बैठा था तो उस के मुंह से निकला, ‘‘यार सलमान, मेरे पास एक ऐसी योजना है, जिस के तहत हमें एक करोड़ रुपए आसानी से मिल सकते हैं.’’

‘‘कैसे?’’ सलमान ने पूछा.

इस के बाद भोलू ने उसे जो योजना बताई, सुन कर सलमान की रूह कांप उठी. लेकिन जब भोलू ने उसे पूरी योजना समझा कर मिलने वाली रकम का लालच दिया तो वह उस की योजना में शामिल हो गया.  3 दिसंबर को उन्होंने अपनी इस योजना को अंजाम देने की तैयारी भी कर ली. 2 दिसंबर यानी सोमवार को भोलू इमरान के साथ ही रहा. उस दिन बैंक का कोई काम नहीं था, इसलिए बैंक जाना नहीं हुआ. लेकिन उस दिन भोलू को पता चल गया कि अगले दिन इमरान को बैंक जाना है और लगभग एक करोड़े रुपए निकाल कर लाना है. शाम को घर जाते समय इमरान ने भोलू को वाटर वर्क्स चौराहे पर छोड़ दिया तो वहां से वह वजीरपुरा स्थित अपने घर चला गया.

इमरान की गाड़ी से उतरते ही भोलू ने सलमान को फोन कर के अगले दिन चाकू और पिस्तौल ले कर तैयार रहने के लिए कह दिया था. अगले दिन यानी 3 दिसंबर, 2013 दिन मंगलवार को योजनानुसार 10 बजे के आसपास भोलू ने अपने बहनोई इरफान को फोन कर के बताया कि आज वह सलमान के साथ जानवरों की खरीदारी करने शमसाबाद जा रहा है. इसलिए वह देर शाम तक ही स्लाटर हाउस आ पाएगा. तब इरफान ने उस से कहा था, ‘‘आज इमरान को बैंक से बड़ी रकम निकाल कर लाना है, हो सके तो तुम यह काम करा कर जाओ.’’

इस पर भोलू ने कहा, ‘‘दरअसल वहां कुछ व्यापारी सस्ते जानवर ले कर आने वाले हैं, अगर उन से सौदा पट गया तो काफी मोटा मुनाफा हो सकता है. इसलिए वहां जाना जरूरी है.’’

इस के बाद भोलू ने इमरान को भी फोन कर के कहा था, ‘‘इमरानभाई, मैं सलमान के साथ शमसाबाद जानवर खरीदने जा रहा हूं. इसलिए तुम अकेले ही बैंक चले जाना. क्योंकि मैं देर शाम तक ही वापस आ पाऊंगा.’’

योजनानुसार न तो भोलू शमसाबाद गया न सलमान. दोनों साए की तरह इमरान के पीछे इस तह लगे रहे कि वह उन्हें देख न पाए. इस बीच इमरान को फोन कर के वह पूछता रहा कि वह क्या कर रहा है? लेकिन उस ने यह नहीं पूछा था कि आज वह कितने रुपए निकाल रहा है?

इमरान जैसे ही रुपए ले कर बैंक से निकला, भोलू और सलमान टूसीटर से उस से पहले वाटर वर्क्स चौराहे पर पहुंच गए और वहीं खड़े हो कर इमरान पर नजर रखने लगे. जब उन्हें लगा कि इमरान वाटर वर्क्स चौराहे पर पहुंच गया होगा तो भोलू ने उसे फोन किया, ‘‘इमरानभाई, मैं शमसाबाद से लौट आया हूं और वाटर वर्क्स चौराहे पर खड़ा हूं. इस समय तुम कहां हो?’’

‘‘मैं यहीं वाटर वर्क्स चौराहे पर जाम में फंसा हूं. जहां से जवाहर पुल शुरू होता है, तुम वहीं पहुंचो. मैं वहीं से तुम्हें ले लूंगा.’’

भोलू सलमान के साथ जवाहर पुल के पास जा कर खड़ा हो गया. 5-7 मिनट बाद इमरान वहां पहुंचा तो भोलू इमरान की बगल वाली सीट पर बैठ गया तो सलमान पीछे वाली सीट पर. गाड़ी आगे बढ़ गई. इमरान को बातों में उलझा कर भोलू ने डैशबोर्ड पर रखे उस के दोनों मोबाइल फोन के स्विच औफ कर दिए. कार जैसे ही कुबेरपुर के पास पहुंची, भोलू ने कहा, ‘‘इमरानभाई, मेरे 2 दोस्त चौगान गांव के पास एक्सप्रेसवे के नीचे मेरा इंतजार कर रहे हैं. अगर तुम मुझे वहां तक छोड़ देते तो अच्छा रहता.’’

इमरान ने नानुकुर की, लेकिन चौगान गांव वहां से कोई बहुत ज्यादा दूर नहीं था. फिर भोलू पर उसे पूरा विश्वास था, इसलिए साथ में इतने रुपए होने के बावजूद इमरान ने कार चौगान गांव की ओर मोड़ दी. चौगान से कोई आधा किलोमीटर पहले ही सुनसान जंगली रास्ते पर लघुशंका के बहाने भोलू ने इमरान से कार रुकवा ली. भोलू नीचे उतरा और इधरउधर देख कर अंदर बैठे सलमान को इशारा किया. जैसे ही सलमान नीचे उतरा, भोलू ने तमंचा निकाल कर ड्राइविंग सीट पर बैठे इमरान के सीने पर गोली मार दी. उस ने दूसरी गोली मारनी चाही, लेकिन तमंचा धोखा दे गया. गोली लगते ही इमरान के मुंह से हलकी सी चीख निकली और वह छटपटाने लगा. भोलू ने सलमान से छुरा ले कर इमरान पर कई वार करने के साथ गला भी काट दिया कि कहीं यह बच न जाए. चाकू चलाने के दौरान भोलू के दोनों हाथ जख्मी हो गए, जिस में उस ने रूमाल बांध ली.

इस के बाद इमरान की लाश घसीट कर दोनों ने हाईवे से सटे एक गड्ढे में फेंक दी. वहीं पास ही उन्होंने चाकू और तमंचा भी फेंक दिया. इस के बाद कार ले कर भाग निकले. रास्ते में एक हैंडपंप पर कार रोक कर थोड़ीबहुत धुलाई की. वहां से थोड़ा आगे आ कर एक्सप्रेसवे पर उन्होंने रकम गिनी तो पता चला कि ये तो सिर्फ 20 लाख रुपए ही हैं. जबकि उन्हें एक करोड़ रुपए होने की उम्मीद थी. दोनों ने ही अपना अपना सिर पीट लिया. बहरहाल अब तो जो होना था, वह हो गया था. दोनों ने आधीआधी रकम ले ली. भोलू ने  सलमान को कार ठिकाने लगाने के लिए दे कर एक जगह रकम छिपाई और खुद स्लाटर हाउस पहुंच गया.

स्लाटर हाउस में इमरान के न आने की वजह से इरफान परेशान था. बहनोई से हालचाल पूछ कर वह इमरान की तलाश करने के बहाने बाहर आ गया. इरफान ने उस के हाथों पर रूमाल बंधी देखी तो उस के बारे में पूछा था. तब उस ने बहाना बना दिया था. स्लाटर हाउस से निकल कर भोलू ने छिपा कर रखे रुपए अपने एक परिचित के पास रखे और वापस जा कर इरफान के साथ इमरान की तलाश करने लगा.

दूसरी ओर इमरान की कार ले कर गया सलमान वहां से 5 किलोमीटर दूर एक ढाबे पर पहुंचा और एक दुर्घटनाग्रस्त ट्रेलर के पीछे कार खड़ी कर के ढाबे के एक कर्मचारी को 5 सौ रुपए का नोट दे कर कहा कि वह दिल्ली जा रहा है, इसलिए एक दिन के लिए अपनी इस कार को यहीं खड़ी कर रहा है. ढाबे के उस कर्मचारी को क्या ऐतराज होता, उस ने कह दिया कि खड़ी कर दो. सलमान ने वहीं अपने फोन का स्विच औफ किया और रुपए ले कर फरार हो गया.

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पुलिस ने मोबाइल फोन की लोकेशन के आधार पर इमरान की हत्या में भोलू को गिरफ्तार किया था. इस की वजह यह थी कि उस ने सब से कहा था कि वह शमसाबाद जा रहा है, जबकि उस के मोबाइल फोन की लोकेशन आईसीआईसीआई बैंक से ले कर जहां से इमरान की लाश बरामद हुई थी, वहां तक मिली थी. मामले का खुलासा होने के बाद पुलिस ने इमरान की कार तो उस ढाबे से बरामद कर ली थी, लेकिन सलमान का मोबाइल बंद होने की वजह से उसे नहीं पकड़ पाई. पूछताछ के बाद पुलिस ने भोलू को अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया था.

सलमान की तलाश में आगरा के कई थानों की पुलिस तो लगी ही है, मृतक इमरान के घर वाले भी उस की खोज में लगे हैं. उन्हें 10 लाख रुपयों से ज्यादा इमरान के हत्यारे को जेल की सलाखों के पीछे पहुंचाने की चिंता है.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित