Crime Story Hindi: सोनबाई का सनकी शौहर

Crime Story Hindi: बुढ़ापे में कदम रख चुके रामचंद्र को लगता था कि उस की पत्नी सोनबाई के अपने ही दामाद से अवैध संबंध हैं, जबकि ऐसा कुछ भी नहीं था. तो क्या इस मामले में भी वैसा हुआ, जैसा ऐसे मामलों में होता है?

के कांत्रज गांव की सड़क पर चल रहे उस बूढ़े को जिस ने भी देखा, डर से उस का शरीर सिहर उठा. इस की वजह यह थी कि उस के एक हाथ में खून में डूबी कुल्हाड़ी थी तो दूसरे हाथ में एक महिला का सिर, जिस से उस समय भी खून टपक रहा था. वह तेजी से थाना भारती विद्यापीठ की ओर चला जा रहा था. बूढ़े को उस हालत में जाते देख कुछ लोग मोबाइल से उस की वीडियो बना रहे थे तो कुछ लोगों ने इस बात की सूचना पुलिस कंट्रौल रूम को दे दी थी.

वह थाना भारती विद्यापीठ के पास स्थित चौराहे पर पहुंचा तो चौराहे पर तैनात ट्रैफिक पुलिस ने उसे रोक लिया. लेकिन उन की हिम्मत उस बूढ़े के करीब जाने की नहीं हुई. इस की वजह यह थी उस समय वह बूढ़ा जिस हालत में था, उस की मानसिक स्थिति का पता लगाना मुश्किल था. ट्रैफिक पुलिस उसे समझाबुझा कर खून से सनी कुल्हाड़ी अपने कब्जे में लेने के बारे में सोच रही थी कि थाना भारती विद्यापीठ के असिस्टैंट इंसपेक्टर संजय चव्हाण, हैडकांस्टेबल राहुल कदम, कांस्टेबल मुकुंद पवार वहां पहुंच गए. संजय चव्हाण ने उस के करीब जा कर विनम्रता से उसे समझाते हुए कुल्हाड़ी और सिर को जमीन पर रखने को कहा तो उस ने कुल्हाड़ी तो जमीन पर रख दी, लेकिन सिर नहीं रखा. वह सिर को ले जा कर तालाब में फेंकना चाहता था.

काफी कोशिश के बाद भी जब बूढ़ा नहीं माना तो पुलिस ने कुल्हाड़ी कब्जे में ले कर उसे दबोच लिया और थाने ले आई. थाने ला कर जब उस से पूछताछ की गई तो उस ने अपना नाम रामचंद्र उर्फ रामू चव्हाण बताया. उस ने जो सिर ले रखा था, वह उस की पत्नी सोनबाई का था. पत्नी की हत्या कर के वह उस का सिर काट कर तालाब में फेंकने जा रहा था. थाना भारती विद्यापीठ के थानाप्रभारी सीनियर इंसपेक्टर मछिंद्र चव्हाण को भी सूचना दे दी गई थी. वह तुरंत थाने आ गए और रामचंद्र से सरसरी तौर पर पूछताछ कर उस के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज करा दिया.

इस के बाद वह संजय चव्हाण, इंसपेक्टर (क्राइम) श्रीकांत शिंदे, पुलिस नाइक राहुल कदम, कांस्टेबल मुकुंद पवार और असिस्टैंट इंसपेक्टर राहुल गौड के अलावा पत्नी की सिर काट कर हत्या करने वाले रामचंद्र को साथ ले कर उस के घर जा पहुंचे. रामचंद्र कांत्रज गांव में सुखसागर एशियन सोसायटी के सामने ओसवाल बिल्डर के एक खाली पड़े प्लौट के कोने में बने छोटे से मकान में रहता था. पुलिस के पहुंचने तक वहां काफी लोग जमा हो गए थे. पुलिस उन्हें हटा कर मकान के पास पहुंची तो 3 कमरों के उस मकान का मुख्य दरवाजा खुला था.

मकान के अंदर का दृश्य दिल दहला देने वाला था. आगे वाले कमरे में सोनबाई की सिर कटी लाश 4 टुकड़ों में बंटी पड़ी थी. उस के आसपास खून ही खून फैला था. वहां का दृश्य बड़ा डरावना लग रहा था. उस के सामने जो कमरा था, उस की कुंडी बाहर से बंद थी. पुलिस ने उसे खोला तो पता चला कि रामचंद्र ने बहू और उस के बच्चों को हत्या से पहले उन्हें कमरे में बंद कर दिया था. मछिंद्र चव्हाण अभियुक्त रामचंद्र की बहू से घटना के बारे में पूछताछ कर ही रहे थे कि एडीशनल पुलिस कमिश्नर डा. सुधाकर पढारे और असिस्टैंट पुलिस कमिश्नर आत्माचरण शिंदे भी आ पहुंचे.

इन के साथ प्रैस फोटोग्राफर और फिंगरप्रिंट ब्यूरो की टीम भी थी. इन लोगों का काम निपट गया तो पुलिस ने औपचारिक काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए पूना ससून डाक अस्पताल भिजवा दिया. इस के बाद थाने लौट कर रामचंद्र से विस्तार से की गई पूछताछ में सोनबाई की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह कुछ इस प्रकार थी. 63 वर्षीय रामचंद्र मूलरूप से कर्नाटक के जिला गुलबर्गा का रहने वाला था. उस के पिता शिव चव्हाण गांव के सीधेसादे गरीब किसान थे. गरीबी की ही वजह से रामचंद्र पढ़ नहीं पाया. बचपन से ले कर जवान होने तक उस ने पिता के साथ काम किया.

लगभग 40 साल पहले उस की शादी हुई तो पत्नी सोनबाई को ले कर वह रोजीरोटी की तलाश में पूना आ गया. पूना शहर में कुछ दिनों तक वह इधरउधर छोटामोटा काम करता रहा, लेकिन जब उसे ओसवाल बिल्डर के यहां वाचमैनी की नौकरी मिल गई तो उस के जीवन में ठहरवा आ गया. बिल्डर की ओर से रहने के लिए उसे एक छोटा सा मकान भी मिल गया था. उसी मकान में वह पत्नी के साथ रहने लगा. वहीं उस के 4 बच्चे, 2 बेटियां और 2 बेटे हुए. उस ने बच्चों को पढ़ायालिखाया और जैसेजैसे वे शादी लायक होते गए, वह उन की शादियां करता गया. अब तक उस की दोनों बेटियों और एक बेटे की शादी हो चुकी है.

बड़ी बेटी गुलबर्गा में ब्याही है तो छोटी मुंबई में. बड़े बेटे राजेश की भी शादी हो चुकी है. उस के 2 बच्चे भी हो चुके हैं. राजेश पत्नी सुनीता और बच्चों के साथ पिता के साथ ही रहता था. उस से छोटे उमेश की अभी शादी नहीं हुई थी. दोनों भाइयों की बढि़या नौकरी थी. समय पंख लगा कर अपनी गति से बीतता रहा. रामचंद्र और सोनबाई उम्र के ढलान पर पहुंच चुके थे. सोनबाई वैसे तो अपने सभी बच्चों से बहुत प्यार करती थी, लेकिन छोटी बेटी और दामाद से उसे कुछ ज्यादा ही लगाव था. न जाने क्यों वह छोटे दामाद को कुछ ज्यादा ही मानती थी. वह जब भी उस के यहां आता, वह उस की सेवा में लग जाती, उस का ध्यान सब बच्चों से ज्यादा रखती. उस के साथ अधिक से अधिक समय बिताना चाहती. उस से बातें भी खूब करती.

जबकि रामचंद्र को यह सब जरा भी पसंद नहीं था. उस ने इस के लिए सोनबाई को न जाने कितनी बार समझाया और मना किया, लेकिन बेटी और दामाद की ममता में वह कुछ इस तरह खोई थी कि मानी ही नहीं. वह बेटी और दामाद से फोन पर भी लंबीलंबी बातें करती थी. कई बार समझाने और मना करने पर भी जब सोनबाई नहीं मानी तो रामचंद्र के मन में दामाद और पत्नी को ले कर शक होने लगा. उस के मन में तरहतरह के गलत विचार आने लगे. उसे पत्नी पर से भरोसा उठने लगा.

दिमाग में संदेह का जहर भरा तो उसे पत्नी से नफरत होने लगी. उसे लगता था कि उस की पत्नी सोनबाई और दामाद के बीच गलत संबंध हैं. जबकि सोनबाई और उस के दामाद के बीच वैसा कुछ भी नहीं था. दोनों का चरित्र साफ था. लेकिन अगर किसी को संदेह हो जाए तो उस का इलाज ही क्या है, इसी संदेह की वजह से सोनबाई और रामचंद्र में पतिपत्नी जैसा मधुर संबंध नहीं रह गया. इस के बाद पतिपत्नी में लड़ाईझगड़ा और मारपीट आम बात हो गई. रामचंद्र के बच्चे और बहू उसे समझासमझा कर थक गए, लेकिन न उस का संदेह दूर हुआ और न लड़ाईझगड़ा बंद हुआ. उसे पत्नी से ऐसी नफरत हो गई कि वह पत्नी से लड़ने और उसे मारनेपीटने के बहाने खोजने लगा.

रामचंद्र की जब भी पत्नी से लड़ाई होती, उसे पीटते हुए उस का गला पकड़ कर कहता, ‘‘तू सचसच बता, तेरा दामाद के साथ क्या चल रहा है? तुझे बेटे की उम्र के दामाद से संबंध बनाते शरम नहीं आती.’’

पति के इस झूठे आरोप से सोनबाई का खून खौल उठता. जवाब में वह कहती, ‘‘बुढ़ापे में तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है. मुझे और मेरे बच्चों को देखो, मैं बूढ़ी हो गई हूं और वे जवान हो गए हैं. उन के बच्चे हो गए हैं. उन्हें मैं गोद में ले कर खिलाती हूं. मेरी यह उम्र इश्क करने की है. अगर इश्क ही करना होगा तो दामाद से ही करूंगी? अपनी ही बेटी के सुखी संसार में आग लगाऊंगी? तुम्हें तो लाजशरम रह नहीं गई है, मुझे भी इन बच्चों के सामने बेशरम बना दिया है. इस हालत में तो मेरी मौत हो जाए, यही मेरे लिए अच्छा है.’’

पत्नी की इन बातों का रामचंद्र पर कोई असर नहीं पड़ा. उस के दिमाग में संदेह का जो कीड़ा पैदा हो गया था, अब वह शांति से बैठ नहीं रहा था. आखिर एक दिन वह भी आ गया, जब उस के संदेह के उस कीड़े ने जहरीला नाग बन कर सोनबाई को इस तरह डसा कि वह हमेशाहमेशा के लिए इस नश्वर संसार से विदा हो गई. यह 9 अक्तूबर, 2015 की बात थी. वह दिन भी रोज की ही तरह शुरू हुआ था. राजेश और उमेश खापी कर अपनीअपनी नौकरी पर चले गए थे. घर में सिर्फ राजेश की पत्नी सुनीता और दोनों बच्चे ही रह गए थे. घर आते ही रामचंद्र किसी बात को ले कर सोनबाई से उलझ पड़ा.

बहू सुनीता ने झगड़ा शांत कराने की कोशिश की, लेकिन रामचंद्र चुप नहीं हुआ. धीरेधीरे यह झगड़ा इतना बढ़ गया कि सोनबाई ने एक बार फिर कहा कि अगर मौत आ जाती तो इस झंझट से छुटकारा मिल जाता. इतना कह कर झगड़ा खत्म करने की गरज से वह बाहर जा कर बरतन साफ करने लगी. तभी रामचंद्र ने कहा, ‘‘तू मरना चाहती है न तो मैं तुझे मार ही देता हूं.’’

यह कह कर रामचंद्र घर के अंदर गया और कोने में लकड़ी काटने वाली कुल्हाड़ी ले कर बाहर आ गया. बच्चों को स्कूल के लिए तैयार कर रही सुनीता ने जब रामचंद्र के हाथों में कुल्हाड़ी देखी तो बुरी तरह डर गई. किसी अनहोनी की आशंका से वह अपने पति राजेश को फोन करने लगी. वह पति को ससुर के तेवर के बारे में बता रही थी कि रामचंद्र ने उस के पास आ कर कहा, ‘‘तू बच्चों को ले कर अंदर कमरे में जा.’’

ससुर के गुस्से को सुनीता जानती थी, इसलिए उस की बातों का विरोध किए बगैर वह बच्चों को ले कर चुपचाप अपने कमरे में चली गई. उस के कमरे में जाते ही रामचंद्र ने बाहर से कुंडी लगा दी. इस के बाद वह सीधे पत्नी के पास पहुंचा. सोनबाई बरतन साफ कर रही थी. रामचंद्र ने उस के पास आ कर कहा, ‘‘जब देखो, तब तुम मरने की बात करती रहती हो न, चलो आज तुम्हारी यह तमन्ना मैं पूरी ही कर देता हूं.’’

सोनबाई कुछ कह पाती, उस के पहले ही रामचंद्र ने कुल्हाड़ी से सोनबाई के सिर पर पूरी ताकत से वार कर दिया. सोनबाई जोर से चीखी और सिर पकड़ कर जमीन पर लोट गई. इस के बाद रामचंद्र उसे घसीट कर कमरे में ले आया और मानवता की सारी हदें पार कर के बेरहमी से उस के शरीर के 4 टुकड़े कर दिए. इस के बाद सोनबाई का कटा सिर और कुल्हाड़ी ले कर वह तालाब में फेंकने जा रहा था, तभी लोग उस के पीछे लग गए. आगे चौराहे पर ट्रैफिक पुलिस मिल गई तो उस ने उसे रोक लिया. तब तक सूचना पा कर थाना पुलिस भी वहां पहुंच गई और उसे पकड़ लिया.

पूरी कहानी सामने आ गई तो मछिंद्र चव्हाण ने रामचंद्र के खिलाफ अपराध संख्या 350/2015 पर भादंवि की धारा 302, 201, 342 और मुंबई पुलिस एक्ट 37-स-135 के तहत मामला दर्ज कर के आगे की जांच असिस्टैंट इंसपेक्टर एस. शिंदे को सौंप दी. एस. शिंदे ने रामचंद्र की दिमागी जांच मनोचिकित्सक से कराई कि उस का कहीं मानसिक संतुलन तो नहीं बिगड़ गया है. डाक्टर ने उसे स्वस्थ बताया तो उसे मैट्रोपौलिटन मजिस्ट्रेट श्री टी.एन. चव्हाण की अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में पूना की यरवदा जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक वह जेल में बंद था. Crime Story Hindi

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Suspense Story: परफेक्ट मर्डर

Suspense Story: संविधा कोई साधारण नहीं, बल्कि खूबसूरती की ऐसी मूरत थी कि जो भी उसे देखता तो देखता ही रह जाता था. इस के विपरीत उस ने शादी कुरूप युवक हेमंत जोशी से की थी. दोनों की गृहस्थी हंसीखुशी से चल रही थी कि इसी बीच उन्हीं की सोसायटी में रहने वाले शरद दीवान नाम के व्यक्ति ने संविधा का परफेक्ट तरीके से मर्डर कर दिया. कौन था शरद दीवान और उस ने खूबसूरत अप्सरा संविधा का मर्डर क्यों किया?

अहमदाबाद के थाना नरोडा में तब सन्नाटा सा पसर गया, जब हेमंत जोशी ने एसआई हर्षद जाडेजा के सामने चीखते हुए कहा, ”मैं कल दोपहर से इस थाने के चक्कर काट रहा हूं, एक आप हैं कि मेरी बात पर ध्यान ही नहीं दे रहे. कल सुबह से लापता हुई मेरी पत्नी आज तक नहीं लौटी. प्लीज साहब, कम से कम आप मेरी बात सुन तो लीजिए.’’

थाने में हेमंत की बात कोई सुनने के बजाय पुलिसकर्मी उस का मजाक उड़ा रहे थे. हेमंत ने एक बार फिर विनती करते हुए कहा, ”प्लीज सर, मैं आप से हाथ जोड़ कर रिक्वेस्ट कर रहा हूं. संविधा का पता लगा दीजिए. कहीं वह किसी मुसीबत में न हो?’’

”देखो भाई, पहली बात तो यह है कि अभी तुम्हारी पत्नी को घर से गए 24 घंटे भी नहीं हुए हैं. 24 घंटे पूरे होने के बाद ही हम तुम्हारी रिपोर्ट दर्ज कर के उस की तलाश शुरू करेंगे. कहीं ऐसा तो नहीं कि तुम्हारी पत्नी तुम से परेशान हो कर किसी के साथ भाग गई हो.’’ एसआई हर्षद जाडेजा ने हैडकांस्टेबल जिग्नेश पटेल की ओर देखते हुए कहा.

”सर, मैं एक बार आप से फिर कह रहा हूं, संविधा मेरे साथ बहुत खुश थी. हम दोनों में आज तक कभी कोई झगड़ा तक नहीं हुआ. ऐसे में वह मुझ से परेशान हो कर किसी के साथ क्यों भागेगी.’’ हेमंत हाथ जोड़ कर थोड़ी ऊंची आवाज में बोला.

”इतनी ऊंची आवाज में क्यों बोल रहा है भाई?’’ थोड़ी दूर पर बैठे एक सिपाही ने कहा.

”सौरी सर, आप लोग वह काम कीजिए, जिस काम के लिए मैं आया हूं. आप लोग हमारे व्यक्तिगत जीवन को बीच में क्यों ला रहे हैं?’’ हेमंत ने कहा.

”ऐसे मामलों में ऐसा ही होता है, जब दोनों में से कोई एक घर छोड़ कर चला जाता है. तुम खुद को देखो और अपनी पत्नी को देखो. ऐसे में वह भागेगी नहीं तो और क्या करेगी.’’ एसआई जाडेजा ने हंसते हुए कहा.

”अगर ऐसी कोई बात होती तो पहली बात तो वह मुझ से शादी ही न करती. फिर किसी कारणवश कर भी लेती तो पहले ही छोड़ कर चली गई होती. अब तो 2 बच्चे भी हो गए हैं.’’ हेमंत जोशी ने कहा.

”थोड़ी देर से अक्ल आई होगी. सर, मेरी तो समझ में यही नहीं आ रहा है कि इतनी खूबसूरत औरत ने 10 साल इस तरह की शक्लसूरत वाले आदमी के साथ कैसे बिता दिए.’’  कह कर हैडकांस्टेबल जोर से हंसा.

”तब न सही, अब मिल गया होगा बेचारी को उसे वह सुख देने लायक होगा, जो पति नहीं दे सका. इसलिए भाग गई.’’ एसआई जाडेजा ने कहा तो हेमंत को इन पुलिस वालों पर गुस्सा तो बहुत आया, पर वह मजबूर था. घर पर उस के 2 छोटेछोटे बच्चे इंतजार कर रहे थे.

वह तेजी से पलटा और दरवाजे की ओर बढ़ा. तभी एसएचओ मनोहर सिंह झाला ने थाने में प्रवेश किया. हेमंत के चेहरे को ही देख कर उन्होंने भांप लिया था कि इस आदमी के साथ कुछ गड़बड़ है. हेमंत को पीछे आने का इशारा कर वह अपने चैंबर की ओर बढ़े. एसएचओ को देख कर पूरे स्टाफ ने उन्हें सैल्यूट किया. अंदर अपनी कुरसी पर बैठ कर एसएचओ मनोहर सिंह ने हेमंत को सामने पड़ी कुरसी पर बैठने का इशारा करते हुए पूछा, ”कहिए, क्या बात है? आप काफी परेशान लग रहे हैं?’’

”जी सर, मेरी वाइफ कल दोपहर को घर से निकली है तो अभी तक लौट कर नहीं आई है. थाने में गुमशुदगी तो दर्ज कर ली गई है, पर कोई काररवाई नहीं हो रही है. सभी कह रहे हैं कि जो कुछ भी होगा 24 घंटे बाद ही होगा. सर, उसे तलाशने के बजाय यहां पर सभी मेरा और मेरी पत्नी का मजाक ऊपर से उड़ा रहे हैं.’’ बड़ी विनम्रता से हेमंत ने कहा.

”आप का नाम?’’ एसएचओ ने पूछा.

”हेमंत जोशी.’’

”रहते कहां हो?’’

”सर, हरियाली सोसायटी में.’’

”करते क्या हो?’’

”जी, एक मशीन बनाने वाली कंपनी में सुपरवाइजर हूं.’’

”रिपोर्ट तो दर्ज हो ही चुकी है. ऐसा करो, अपनी पत्नी की एक फोटो दे दो. मैं देखता हूं, क्या हो सकता है.’’ थानाप्रभारी ने कहा.

”सर, एक फोटो मैं दरोगाजी को दे चुका हूं,’’ उस ने शर्ट की जेब से पत्नी की एक फोटो निकाल कर एसएचओ को भी दी.

पलभर वह उस फोटो को देखते ही रह गए. फिर उन्होंने पूछा, ”यह तुम्हारी पत्नी की ही फोटो है?’’

”सर, कहीं आप भी तो वही नहीं सोच रहे हैं, जो बाकी लोग सोच रहे हैं कि इस लंगूर के हाथ यह हूर की परी कैसे लग गई.’’ हेमंत ने कहा.

”बात तो तुम ने सही कही, पर मैं ने अभी तक तो यह नहीं सोचा. फिर भी वाकई तुम्हारी पत्नी बहुत सुंदर है. इस के साथ कुछ भी हो सकता है. बहरहाल, मुझ से जो भी हो सकेगा, मैं वह करूंगा. पूरी कोशिश करूंगा कि तुम्हारी पत्नी तुम्हें मिल जाए.’’ कह कर एसएचओ ने हेमंत की पत्नी की फोटो अपने मोबाइल से खींच ली.

हेमंत उठने लगा तो उन्होंने कहा, ”अपना और अपनी पत्नी का मोबाइल नंबर तो लिखवा दो. तुम्हारी पत्नी तो अपना मोबाइल ले कर गई होगी.’’

”जी नहीं, वह अपना मोबाइल फोन घर पर ही छोड़ गई है.’’ कह कर हेमंत ने अपना और संविधा का मोबाइल नंबर एसएचओ को लिखवा दिया. उस के बाद वह उन से अनुमति ले कर बाइक से घर की ओर चल पड़ा.

रास्ते में आते हुए उस के दिमाग में पुरानी बातें घूमने लगीं. पौलीटेक्निक करने के बाद हेमंत जोशी को एक मशीन बनाने वाली कंपनी में नौकरी मिल गई तो उस के लिए रिश्ते आने लगे थे. वैसे तो उस के पास सब कुछ था, पर उस की शक्लसूरत ऐसी थी कि जल्दी कोई उसे पसंद ही नहीं करता था. पर संयोग से हेमंत को ऐसी खूबसूरत पत्नी मिली कि देखने वाले दांतों तले अंगुली दबा लेते थे. उसे शादी वाला दिन याद आ गया था. जब संविधा को देख कर उस के दोस्त हैरान रह गए थे. उस के दोस्तों ने उसे ताना मारते हुए कहा भी था कि उस की तो लौटरी लग गई. कहां कोई लड़की उसे पसंद ही नहीं कर रही थी और अब लंगूर के हाथ हूर की परी लग गई.

तभी संजय ने कहा, ”कुछ तो गड़बड़ है, तभी तो इतनी सुंदर भाभीजी ने इस लंगूर को गले लगाया है.’’

यह सुन कर हेमंत का खून खौल उठा था, क्योंकि उस ने सीधे उस की पत्नी पर लांछन लगाया था. हेमंत उठ कर संजय का कौलर पकडऩा चाहता था. पर संविधा ने उस का हाथ पकड़ कर कहा, ”छोडि़ए न, जिसे जो कहना है, कहने दीजिए. आप शांति से बैठिए.’’

संविधा के यह कहने पर हेमंत शांति से बैठ गया था. सुहागरात को जब हेमंत कमरे में आया तो उस के दिमाग में दोस्तों द्वारा कही बातें गूंज रही थीं. कमरे में आ कर वह संविधा के पास पलंग पर बैठने के बजाय खिड़की के पास जा कर खड़ा हो गया. उस के इस व्यवहार से संविधा घबरा गई. पलंग से उठ कर वह उस के पास जा कर बोली, ”क्या बात है, आप ठीक तो हैं न? मुझ से कोई गलती हो गई क्या?’’

पलट कर हेमंत ने संविधा की आंखों में आंखें डाल कर कहा, ”संविधा, अगर तुम बुरा न मानो तो एक बात पूछूं?’’

संविधा ने मुसकराते हुए कहा, ”भला आप की बात का क्यों बुरा मानूंगी. आप को जो पूछना हो, पूछिए.’’

”आप इतनी खूबसूरत हैं. आप को तो कोई भी हैंडसम लड़का मिल सकता था. फिर आप ने मुझ से क्यों शादी की?’’

”आप हैंडसम नहीं हैं क्या?’’ हेमंत के करीब आ कर संविधा ने कहा.

”संविधा, मैं ने जो पूछा है, यह उस का जवाब नहीं है.’’

”खूबसूरती की परिभाषा सभी की अलगअलग होती है. कुछ लोगों को शरीर की खूबसूरती पसंद होती है तो कुछ लोग मन की खूबसूरती देखते हैं. मन की खूबसूरती ही, असली खूबसूरती है. शरीर की खूबसूरती तो सिर्फ देखने के लिए होती है. आप का मन खूबसूरत है, इसलिए मैं ने आप को चुना.

”पिछले साल आप ने अपनी बुआ की बेटी की शादी में जिस तरह मदद की थी, उस के बारे में जान कर लगा कि आप मन से बहुत दयालु हैं. इसलिए जब आप की बुआ ने आप के रिश्ते की बात की तो मैं मना नहीं कर सकी. क्योंकि आप जैसा सुलझा और समझदार पति जिसे मिल जाए, वह भाग्यशाली ही होगा.’’ संविधा बोली.

हेमंत ने गौर से संविधा को देखते हुए पूछा, ”आप पर किसी तरह का दबाव या मजबूरी तो नहीं थी न?’’

”दबाव था तो नहीं, पर अब है कि जिस का मन इतना खूबसूरत है, उस का प्यार करने का अंदाज कितना खूबसूरत है.’’ संविधा ने प्यार से मुसकराते हुए कहा.

हेमंत ने मुसकराते हुए संविधा को सीने से लगा लिया और फिर दोनों एकदूसरे में समा गए.

संविधा ने जैसे हेमंत की जिंदगी ही बदल दी थी. उस के प्यार ने हेमंत को जैसे एक नई दिशा दी थी. हेमंत जो अपनी शक्लसूरत की वजह से लोगों के बीच जाने से बचता था, अब वह बेझिझक लोगों के बीच आताजाता था. हालांकि उस की हंसी उड़ाने वाले अभी मौका नहीं छोड़ते थे. इस की सब से बड़ी वजह थी संविधा की खूबसूरती, जो उस के जाननेपहचानने वालों को अभी भी नहीं पच रही थी. पर अब इस बात को ले कर उस पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा था.

समय के साथ उस के घर 2 बच्चे पैदा हुए, बड़ी बेटी निकिता और छोटा बेटा नीतेश. दोनों ही बच्चे अपनी मम्मी पर गए थे, इसलिए वही नहीं, पूरा परिवार खुश था कि अच्छा हुआ कोई बच्चा हेमंत को नहीं पड़ा. दुनिया कुछ भी कहती रही हो, पर संविधा की समझदारी की वजह से सब बढिय़ा चल रहा था. आज भी लोग हेमंत को उस की पत्नी की खूबसूरती को ले कर ताने मारते थे और मजाक उड़ाते थे, पर अब वह खुश रहता था. किसी की बात को दिल पर नहीं लेता था.

पर उस की इस खुशी को न जाने किस की नजर लग गई. एक दिन संविधा घर से तैयार हो कर निकली तो लौट कर नहीं आई. दोपहर से ही हेमंत ने उस की तलाश शुरू कर दी, पर कहीं कोई पता नहीं चला. हेमंत ने तुरंत थाने जा कर उस की गुमशुदगी भी दर्ज करा दी थी कि पुलिस भी उस की तलाश में लग जाएगी तो जल्दी उस का पता चल जाएगा. उसे चिंता थी कि संविधा किसी मुसीबत में तो नहीं फंस गई है, क्योंकि समय बहुत खराब चल रहा है.

अब तक हेमंत घर पहुंच गया था. दोनों बच्चे उसी का इंतजार कर रहे थे. पत्नी के गायब होने के बाद उस ने पेरेंट्स को भी फोन कर के बुला लिया था. दूसरी ओर इंसपेक्टर मनोहर सिंह झाला ने संविधा की गुमशुदगी को गंभीरता से लिया था. उन्होंने अपने स्टाफ के उन लोगों को खूब खरीखोटी सुनाई थी, जिन्होंने हेमंत की हंसी उड़ाई थी. औफिस का काम निपटा कर वह महिला सिपाही जयंती मेहता को साथ ले कर संविधा की गुमशुदगी वाले मामले की जांच के लिए निकल पड़े थे.

जब वह कृष्णानगर स्थित हरियाली सोसायटी के गेट पर पहुंचे तो गेट के बगल में स्थित किराने की दुकान के सामने गाड़ी रोक दी. गाड़ी से उतर कर वह जयंती के साथ किराने की दुकान पर पहुंचे तो पुलिस वालों को देख कर दुकानदार थोड़ा घबरा गया. इंसपेक्टर झाला ने मोबाइल में संविधा का फोटो दिखाते हुए पूछा, ”इन्हें पहचानते हो?’’

”जी सर, यह इसी सोसायटी में रहने वाली संविधा मैडम हैं. हेमंत जोशी की पत्नी.’’

”इन्हें आखिरी बार कब देखा था?’’ इंसपेक्टर झाला ने पूछा.

दुकानदार पहले ही घबराया था. इस सवाल पर वह डर गया. माथे पर आए पसीने को पोंछते हुए उस ने कहा, ”परसों सुबह, मैडम दुकान पर सामान लेने आई थीं.’’

”कितने बजे आई थी?’’ इंसपेक्टर ने अगला सवाल किया.

”यही कोई 10 बजे के आसपास. कुछ सामान खरीदना था, जिसे बंधवा कर रख गई थीं. थोड़ी देर बाद ले जाने के लिए कहा था.’’

”इस का मतलब वह कहीं बाहर जा रही थीं. वह अकसर इसी तरह सामान बंधवा कर रख जाती थीं?’’ इंसपेक्टर ने पूछा.

”सर, ऐसा लगभग सभी करते हैं. सामान बंधवा कर हम से पहुंचाने के लिए कह देते हैं. जब समय मिलता है, हम सामान पहुंचा देते हैं.’’ दुकानदार ने कहा.

दुकानदार के यह कहने पर जयंती ने मुसकराते हुए पूछा, ”क्या आप सभी के घर सामान पहुंचाने जाते हैं?’’

इंसपेक्टर झाला और दुकानदार जयंती की ओर देखने लगे. जयंती की इस बात पर जहां इंसपेक्टर झाला को हंसी आ गई थी, वहीं दुकानदार झेंप गया था. इस की वजह यह थी कि दुकानदार काफी मोटा था. जयंती ने विनम्रता से कहा, ”आप मेरी बात का बुरा मत मानना. मेरे कहने का मतलब यह है कि आप ने सामान पहुंचाने के लिए कोई लड़का रखा है?’’

”जी, एक लड़का है मगन. वह अभी किसी का सामान पहुंचाने गया है, पर देखो तो अभी लौट कर नहीं आया है. इस की बड़ी खराब आदत है, जहां जाता है, वहीं का हो कर रह जाता है. उस की बातें ही नहीं खत्म होतीं.’’ दुकानदार ने घड़ी की ओर देखते हुए कहा.

”उस की उम्र कितनी होगी?’’ जयंती ने पूछा.

”यही कोई 25 साल.’’ दुकानदार ने कहा.

”अच्छा, यह बताओ कि जब संविधा मैडम सामान लेने नहीं आईं तो तुम्हें अजीब नहीं लगा? फिर तुम ने क्या किया?’’ इंसपेक्टर झाला ने पूछा.

”सर, अजीब तो लगा था. क्योंकि वह जितनी देर में आने को कह कर जाती थीं, उस से पहले ही आ जाती थीं. पर जब कल वह नहीं आईं तो मैं ने सामान उन के पति हेमंतभाई को पकड़ा दिया था.’’

”इस का मतलब सामान हेमंत ले गए. क्या वह रोज दोपहर को घर आते हैं?’’ इंसपेक्टर झाला ने पूछा.

”नहीं सर, कल संविधा मैडम नहीं आई, इसलिए हेमंत सर घर आए होंगे.’’ दुकानदार ने बताया.

”मैडम नहीं आईं तो तुम ने उन्हें बताया था?’’

”नहीं सर, शायद मोनिका मैडम ने बता कर बुलाया होगा.’’ दुकानदार ने कहा.

”यह मोनिका कौन हैं?’’ इंसपेक्टर ने पूछा.

”सर, उन्हीं की लाइन में 2 घर छोड़ कर रहती हैं. दोनों परिवारों में खूब पटती है.’’

”ठीक है, और कुछ पूछना होगा तो फिर तुम्हारे पास आऊंगा.’’ कह कर इंसपेक्टर झाला सोसायटी के गेट की ओर बढ़ गए. 5 मिनट बाद वह हेमंत के घर के सामने खड़े थे.

घंटी बजाई तो दरवाजा हेमंत ने ही खोला. हेमंत का घर काफी सुंदर और सजा हुआ था. हर चीज बहुत व्यवस्थित ढंग से रखी थी. जयंती ने तारीफ करते हुए कहा, ”संविधा ने घर को बड़ी खूबसूरती से सजाया है.’’

”संविधा को इन चीजों का बहुत शौक था,’’ हेमंत ने कहा.

”हेमंतजी, आप को किस ने बताया कि संविधा घर लौट कर नहीं आई है, जिस की वजह से तुम्हें दोपहर को घर आना पड़ा?’’ इंसपेक्टर झाला ने पूछा.

”पड़ोस में रहने वाले मोनिका और शरद से हमारे बहुत अच्छे संबंध हैं. हमारे और उन के बच्चे एक ही स्कूल में पढ़ते हैं, इसलिए मोनिका और संविधा साथ ही बच्चों को लेने स्कूल जाती हैं. उस दिन घर पर ताला लगा देख कर मोनिकाजी अकेली ही चली गईं. स्कूल की छुट्टी हुए घंटों बीत गए और संविधा नहीं आई तो मोनिकाजी ने मुझे फोन किया.’’ हेमंत ने उस दिन जो हुआ था, जानकारी दी.

”हेमंत क्या हम मोनिका और शरद से मिल सकते हैं?’’ इंसपेक्टर झाला ने कहा तो हेमंत ने तुरंत मोनिका और शरद को बुलाने के लिए बेटी को भेज दिया.

घर में तमाम फोटो लगे थे. जयंती वे फोटो देख रही थी. संविधा सचमुच बहुत खूबसूरत थी. हर फोटो में उस का चेहरा कुछ अलग ही चमक रहा था. फोटो से ही लग रहा था कि वह एक जिंदादिल महिला थी. जयंती ने थोड़ीबहुत पूछताछ हेमंत के बच्चों से की. उन से पूछताछ करने की वजह यह थी कि हेमंत पत्नी पर शक तो नहीं करता था और इस बात को ले कर दोनों में झगड़ा होता रहा हो. पर बच्चों ने उस के सवालों के जो जवाब दिए, उस से उसे लगा कि ऐसा कुछ भी नहीं था.

शरद और मोनिका आ गए थे. उन के साथ उन के बच्चे भी थे. मोनिका सामान्य कदकाठी वाली महिला थी. सांवला रंग, तीखे नैननक्श, लंबे बाल और वजन भी शरीर के हिसाब से ठीक ही लग रहा था. न वह मोटी थी और न ही छरहरी. उस का पति शरद दीवान लंबातगड़ा, सुगठित शरीर और साफ रंग का काफी हैंडसम था. उसे देख कर लग रहा था कि वह कहीं जाने की तैयारी में था. मोनिका और शरद के आते ही हेमंत ने कहा, ”सर, यह हमारे पड़ोसी शरद दीवान और यह उन की पत्नी मोनिकाजी हैं.’’

मोनिका और शरद ने हाथ जोड़ कर इंसपेक्टर मनोहर सिंह झाला और जयंती चौधरी को नमस्ते किया. इंसपेक्टर झाला ने दोनों को गौर से देखते हुए कहा, ”मैं आप लोगों का थोड़ा समय लूंगा. संविधा के गायब होने के सिलसिले में.’’

”सर, पहले से पता होता तो मैं आज मीटिंग का कार्यक्रम ही न बनाता. पर अब तो जाना ही पड़ेगा. फिर भी आप जो पूछना चाहते हैं, पूछ लीजिए.’’ शरद ने अपनी समस्या बताते हुए कहा.

”जिस दिन संविधा गायब हुई थी, आप कितने बजे घर आए थे?’’ इंसपेक्टर झाला ने पूछा.

”सर, इन लोगों ने मुझे शाम 5 बजे फोन किया था. उस के तुरंत बाद मैं औफिस से निकल गया था और पौने 6 बजे घर आ गया था.’’ शरद ने कहा.

”घर आ कर आप ने क्या किया?’’

”घर आते ही मैं हेमंत के साथ संविधा की तलाश में लग गया था. इन्होंने अपने सारे रिश्तेदारों और संविधा के परिचितों तथा सहेलियों को फोन कर ही लिया था. इसलिए हम दोनों पहले थाने गए. वहां संविधा के गायब होने की सूचना दे कर उस की तलाश में लग गए. पूरी रात हम दोनों इधरउधर दौड़ते रहे.’’ शरद ने कह कर हेमंत की ओर देखा तो उस ने हां में सिर हिलाते हुए कहा, ”जी सर, शरद और मोनिका ने मेरी मदद ही नहीं की, बल्कि मुझे और बच्चों को संभाला भी.’’

”ठीक है शरदजी, अब आप जा सकते हैं,’’ इंसपेक्टर झाला ने कहा.

”मोनिकाजी, पता चला है कि आप संविधा की बहुत अच्छी सहेली थीं?’’ इस बार सवाल कांस्टेबल जयंती मेहता ने किया था.

”जी, हम दोनों का रिश्ता बहन जैसा था. इसीलिए हम दोनों एकदूसरे के पति को जीजू कहते थे. हम दोनों हर त्योहार एक साथ मनाते थे. कहीं बाहर जाना होता था तो साथ ही जाते थे,’’ मोनिका ने कहा.

”तब तो शौपिंग भी साथसाथ करती रही होंगीं?’’

”जी हां, हम शौपिंग भी साथ ही करते थे,’’ मोनिका ने कहा.

”यह बात मैं ने इसलिए पूछी थी कि आप के कानों में जो झुमके हैं, वे संविधा की फोटो वाले झुमके से हूबहू मिलते हैं.’’ जयंती ने कहा तो मोनिका थोड़ा झेंप गई.

मोनिका के झुमकों को देख कर जयंती की नजरें ठिठक गईं. उस ने सहज स्वर में कहा, ”आप कह रही थीं कि ये झुमके आप ने बाजार से खरीदे हैं?’’

मोनिका ने मुसकराते हुए कहा, ”जी हां, बस यूं ही पसंद आ गए थे.’’

”कब खरीदे?’’

”यही… 2-3 दिन पहले.’’

इंसपेक्टर मनोहर सिंह झाला ने हलकी मुसकान के साथ जयंती की ओर देखा. दोनों को अब यह समझ में आ गया था कि कुछ न कुछ तो छिपाया जा रहा है.

”ठीक है,’’ इंसपेक्टर बोले, ”अगर कुछ और याद आए तो बताइएगा. वैसे आप दोनों को चिंता करने की जरूरत नहीं है, संविधा जरूर मिल जाएगी.’’

जयंती ने शरद और मोनिका के बच्चों से भी बातचीत करतेकरते थोड़ीबहुत जानकारी ले ली थी. मोनिका के बच्चों ने बताया था कि संविधा आंटी और उन के पापा में खूब पटती थी. संविधा जब भी उन के घर आती थीं, पापा उन के पास ही बैठे रहते थे. उन से खूस हंसहंस कर बातें करते थे. मोनिका ने राहत की सांस ली. पर उस की आंखों में एक पल के लिए जो डर झलका था, उसे जयंती ने साफ भांप लिया था.

अगले दिन सुबहसुबह थाना नरोडा पुलिस को फोन द्वारा सूचना मिली थी कि शहर के बाहर बहने वाले नाले के किनारे की झाडिय़ों में किसी महिला का शव पड़ा है. वह इलाका थाना नरोडा के अंतर्गत ही आता था.  इंसपेक्टर झाला महिला सिपाही जयंती एवं कुछ अन्य सिपाहियों को साथ ले कर फौरन मौके पर जा पहुंचे थे. शव की हालत देख कर ही लग रहा था कि इस की मौत लगभग 3 दिन पहले हुई थी. चेहरा सूजा हुआ था, पर पहचान में आ रहा था. वह संविधा की लाश थी.

हेमंत को जब यह खबर दी गई तो वह बेहोश हो कर जमीन पर गिर पड़ा. दोनों बच्चे फूटफूट कर रोने लगे थे. पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा कर हेमंत और उस के बच्चों को सांत्वना दे कर घर भेजा. फोरैंसिक टीम ने भी घटनास्थल की जांच कर के जरूरी सबूत जुटा लिए थे. फोरैंसिक टीम को घटनास्थल पर जूतों के निशान के अलावा कार के पहियों के भी निशान मिले थे. इंसपेक्टर झाला को अब यह मामला मिसिंग का नहीं, बल्कि हत्या का लग रहा था. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में आया था कि संविधा की मौत गला दबाने से हुई थी. जब उसे मारा गया था, समय दोपहर के 2 से 3 बजे के बीच का था. मजे की बात यह थी कि उस के शरीर पर किसी भी तरह के संघर्ष का कोई निशान नहीं था.

इस का मतलब था कि संविधा उस व्यक्ति को जानती थी, जिस ने उसे गला दबा कर मारा था. पुलिस की जांच शुरू हुई. संविधा का मोबाइल घर पर ही मिला था. इस के अलावा हेमंत के घर एक बटन वाला मोबाइल भी मिला था. इंसपेक्टर झाला ने संविधा के दोनों मोबाइल नंबरों की काल डिटेल्स निकलवाई तो पता चला कि संविधा के उस छोटे वाले मोबाइल से सिर्फ एक ही नंबर पर बात होती थी. इंसपेक्टर झाला ने जब उस नंबर के बारे में पता किया तो जानकारी मिली कि वह नंबर शरद का था. इस के बाद उन्हें संविधा की हत्या का रहस्य खुलता नजर आया.

उन्होंने शरद के मोबाइल की काल डिटेल्स और लोकेशन निकलवाई. जांच में पता चला कि वह नंबर शरद के नाम पर नहीं, बल्कि उस की पत्नी मोनिका के भाई विक्रम के नाम पर था, लेकिन उस का उपयोग शरद ही कर रहा था.

अब शक की सुई सीधे मोनिका और शरद की ओर घूम गई. इंसपेक्टर झाला ने दोनों को थाने बुलाया. उन्होंने शरद से पूछा, ”शरदजी, आप के दोस्त की पत्नी की हत्या हो गई है. आप ने बताया था कि आप उस की तलाश में रात भर हेमंत के साथ थे?’’

”जी हां सर, मैं उन के साथ ही था.’’

”तो फिर आप यह बताइए कि आप की लोकेशन उस दिन दोपहर सवा 2 बजे शहर के बाहर बहने वाले नाले के पास की क्यों थी?’’

शरद के चेहरे का रंग उड़ गया था. उस ने हकलाते हुए कहा, ”वह तो बस ऐसे ही. मैं उधर से गुजर रहा था तो मैं वहां पान खाने के लिए रुक गया था.’’

”पान खाने के लिए नहीं रुके थे शरद, आप के जूतों के निशान भी लाश के पास मिले हैं. यही नहीं, आप की कार के टायरों के निशान भी वहां मिले हैं.’’

शरद के पसीने छूट गए. जयंती ने हाथ में थामी फाइल बंद करते हुए कहा, ”आप का झूठ बोलना बेकार है. जो भी है, सचसच बता दो.’’

फिर पूछताछ शुरू हुई. शुरू में शरद ने कुछ नहीं कहा. लेकिन जब पुलिस ने मोनिका के झुमके, विक्रम का मोबाइल नंबर और गली के एक बच्चे का बयान (जिस ने देखा था कि मनीष की गाड़ी उसी दिशा में गई थी). इस के अलावा एक सबूत और था.

दरअसल, जयंती जब संविधा के फोटो देख रही थी, तभी उस ने उस के कानों में जो झुमके देखे थे, उन में सामने की एक लटकन टूटी थी. मोनिका से बात करते समय वही झुमका उस ने उस के कान में देखा था. जबकि मोनिका उस समय वे झुमके नहीं पहने थी. ये सारे सबूत इंसपेक्टर झाला ने शरद दीवान के सामने रखे तो वह टूट गया. उस ने कहा, ”हां, मैं ने ही संविधा की हत्या की थी.’’

”क्यों?’’ इंसपेक्टर झाला ने पूछा.

”क्योंकि वह मुझे छोडऩा चाहती थी. कालेज के समय से हमारा रिश्ता था. हम दोनों विवाह करना चाहते थे, पर हम दोनों के ही घर वाले नहीं माने. हम दोनों ने अलगअलग विवाह तो कर लिया, पर एकदूसरे को भुला नहीं सके. संविधा ने हेमंत से इसलिए विवाह किया था, ताकि उसे पति से कभी प्यार न हो.

”उसे हेमंत से कभी प्यार नहीं रहा, पर वह प्यार करने का ऐसा दिखावा करती रही कि हेमंत को कभी उस पर शक नहीं हुआ. हेमंत यही समझता रहा कि उस के कुरूप होने के बावजूद वह उस से बहुत प्यार करती है.

”हम दोनों को मिलने में परेशानी न हो, इसलिए मैं ने हेमंत के घर के पास ही हरियाली सोसायटी में अपने लिए घर खरीदा था. हमें मिलने में परेशानी न हो, इसलिए मैं ने मोनिका से संविधा की दोस्ती करा दी थी.

”लेकिन इधर वह मिलने से कतराने लगी थी. जबकि मैं उस के बगैर अब रह नहीं सकता था. मैं उस से कहने लगा था कि वह हेमंत को छोड़ दे. जबकि उस का कहना था कि बच्चों के लिए वह हेमंत को नहीं छोड़ सकती.

”उस दिन सोसायटी से निकलने के बाद मैं संविधा को अपने नए फ्लैट पर ले गया. हम दोनों वहीं मिलते थे. वहां जब मैं ने उस से साथ आने के लिए कहा तो उस ने मना करते हुए कहा, ‘शरद, अब बहुत हो गया. तुम अपनी पत्नी के पास लौट जाओ.’

”उस की इस बात पर मुझे गुस्सा आ गया. मैं ने उसे बांहों में भर लिया. वह खुद को छुड़ाने लगी. जबकि उस समय मेरी इच्छा उस के साथ सैक्स करने की थी. जिस के लिए वह राजी नहीं थी.

”मैं ने उस के साथ जबरदस्ती करने की कोशिश की. इसी कोशिश में उस का गला दब गया और उस की मौत हो गई. उस के बाद उस की लाश को ले जा कर वहां फेंक दिया, क्योंकि वह जगह सुनसान थी.

”हत्या जैसा अपराध मैं ने कभी किया नहीं, इसलिए मुझे बहुत डर लग रहा था. मैं जल्दी से जल्दी लाश से छुटकारा पाना चाहता था, इसलिए उस के शरीर के सारे गहने उतार कर शहर के बाहर बहने वाले नाले की किनारे की झाडिय़ों में फेंक दिए थे. उस समय वहां बनी झोपडिय़ों में रहने वाले मजदूर काम पर होते हैं. झोपडिय़ों में केवल बच्चे ही रहते हैं.’’

मोनिका, जो अब तक चुप बैठी थी, यह सब सुन कर फूट पड़ी, ”मैं सब जानती थी. पर मैं अपने बच्चों की खातिर चुप रही. संविधा ने मेरा घर तोड़ा, मेरा पति छीना… कुदरत का न्याय देखो, वही मारी गई.’’

इंसपेक्टर झाला ने दोनों को हिरासत में ले लिया. क्योंकि मोनिका ने संविधा की हत्या वाली बात छिपाई थी. थाने से लौटते समय झाला ने कहा, ”हेमंत जोशी को सबूत चाहिए था कि उस की पत्नी उसे छोड़ कर नहीं गई, बल्कि मारी गई. पर शायद यह सच्चाई उस के लिए और ज्यादा दर्दनाक होगी.’’

जयंती ने धीरे से कहा, ”सर, परफेक्ट मर्डर कोई नहीं होता. झूठ चाहे कितना भी सुंदर हो, सच की एक किरण उसे चीर ही देती है.’’

2 हफ्ते बाद हेमंत अपने बच्चों के साथ घर के बाहर खड़ा था. संविधा की तसवीर के आगे दीया जल रहा था. उस की आंखों में आंसू थे, पर चेहरे पर सुकून था. अब उसे किसी जवाब की तलाश नहीं थी, क्योंकि वह जान चुका था कि सच चाहे जितना भयानक हो, सत्य ही सब से बड़ा न्याय है. Suspense Story

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Pathankot Attack: भारत की अस्मिता पर – आतंकी हमला

Pathankot Attack: पाक आतंकियों द्वारा भारत में घुसपैठ कर के आतंकी हमले करना कोई नई बात नहीं है. पठानकोट एयरबेस का हमला भी पाक आतंकियों की सोचीसमझी रणनीति थी. इस हमले में भारत के 7 जवान शहीद हुए, लेकिन राहत की बात यह है कि पहली बार पाकिस्तान अपने यहां बैठे आतंकियों के आकाओं के विरुद्ध काररवाई करने की बात कर रहा है. पर क्या ऐसा होगा?

किसी निहायत सनसनीखेज कांड को अंजाम देने की भूमिका तभी सामने आ गई थी, जब दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने 29 दिसंबर, 2015 को एयरफोर्स के बर्खास्त नान कमीशंड औफिसर रंजीत के.के. को पंजाब के बठिंडा से गिरफ्तार किया था. उस पर पाक की खुफिया एजेंसी आईएसआई को गोपनीय दस्तावेज उपलब्ध कराने का आरोप था.

दरअसल, बठिंडा में तैनात रंजीत को एक अज्ञात महिला ने सोशल साइट फेसबुक पर जाल में फांस कर एयरफोर्स की गोपनीय जानकारी हासिल कर ली थी. दिल्ली पुलिस की इस काररवाई से पंजाब पुलिस पूरी तरह अनजान थी. जांच से जुड़े दिल्ली पुलिस के एक अधिकारी के बताए अनुसार, जासूसी रैकेट में अब तक सेना और बीएसएफ के एकएक जवान और एक पूर्वसैनिक सहित 5 लोग गिरफ्तार किए जा चुके थे. दिल्ली पुलिस इस मामले में पूरी गंभीरता से जांच कर रही थी, ताकि षडयंत्रकारियों की जड़ तक पहुंच सके.

24 वर्षीय रंजीत केरल के मलप्पुरम जिले का रहने वाला था. उस ने सन 2010 में इंडियन एयरफोर्स जौइन की थी. सन 2013 में उसे अपने फेसबुक एकाउंट पर दामिनी मैकनोट के नाम से एक महिला की फ्रैंडशिप रिक्वेस्ट मिली थी, जिसे उस ने खुशी से स्वीकार कर लिया था. दामिनी ने अपने प्रोफाइल में बताया था कि वह देशदुनिया की खबरों पर आधारित यूके की एक पत्रिका में फीचर राइटर है. रंजीत के मैसेज बौक्स में उस ने अपना निजी मोबाइल नंबर छोड़ कर उस से बात करने की गुजारिश की थी. रंजीत ने उस नंबर पर बात की तो दोनों की अच्छीभली दोस्ती हो गई.

कुछ दिन प्यार भरी मीठीमीठी बातें करते रहने के बाद एक दिन उस ने रंजीत से यह कहते हुए भारतीय वायु सेना से संबंधित कुछ जानकारियां मांगी कि वह इस विषय पर अपनी पत्रिका के लिए एक फीचर तैयार करना चाहती है. रंजीत पहले ही उस के हनीट्रैप में फंस चुका था. उस ने जो भी जानकारी चाही, रंजीत ने बेझिझक दे दी. रंजीत को किसी मामले में नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया था. इस के बाद ही वह दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच के हत्थे चढ़ गया. पुलिस ने 4 दिनों के कस्टडी रिमांड पर ले कर उस से गहन पूछताछ की. उम्मीद थी कि उस से कई बड़े खुलासे होंगे.

दिल्ली में अभी यह सब चल ही रहा था कि पंजाब में इस बीच एक बड़ी अनहोनी हो गई. पहली जनवरी, 2016 की भोर में पठानकोट के थाना नरोट जैमलसिंह के अधीन पड़ने वाली रावी नदी पर बनी कंबलौर पुलिया के पास एक लावारिस लाश मिली. उस से थोड़े फासले पर एक गाड़ी खड़ी थी. अनुमान लगाया गया कि मरने वाला उसी गाड़ी का ड्राइवर रहा होगा. अभी यह गुत्थी सुलझ भी नहीं पाई थी कि एक अन्य सनसनीखेज समाचार चर्चा का विषय बन गया. पता चला कि विगत रात पठानकोट के एसपी (हैडक्वार्टर) रहे सलविंदर सिंह को आतंकियों ने अपहृत कर के उन से बुरी तरह मारपीट की और उन्हें एक सुनसान जगह पर छोड़ दिया और अपने साथ उन की नीली बत्ती लगी गाड़ी ले गए.

जिस ड्राइवर की लाश बरामद की गई थी, पुलिस छानबीन में उस के बारे में यह जानकारी सामने आई कि वह थाना नरोट जैमलसिंह के तहत आने वाले गांव भगवाल का रहने वाला 35 वर्षीय इकागर सिंह था. वह अपनी इनोवा गाड़ी टैक्सी के रूप में चलाया करता था. पिछली रात करीब 9 बजे कुछ लोगों ने फोन कर के उस की गाड़ी किराए पर ली थी और उसे कहीं अज्ञात जगह पर बुलाया था. तब से वह अपनी गाड़ी समेत घर से गायब था. भोर में अड्डा कोहलियां के नजदीक से जब उस की गाड़ी बरामद की गई तो गाड़ी के चारों पहियों की हवा निकली हुई थी. गाड़ी को और भी काफी नुकसान पहुंचाने का प्रयास किया गया था.

उस जगह से थोड़ी दूरी पर स्थित कंबलौर पुलिया के पास से ड्राइवर इकागर सिंह की लाश मिली थी. लाश पर चाकुओं के अनगिनत जख्म थे. यह सीधे कत्ल का मामला था. एसपी सलविंदर सिंह का 2 दिन पहले पठानकोट से तबादला हुआ था, मगर अभी तक उन्होंने अपना चार्ज नहीं छोड़ा था. पहली जनवरी की भोर में गुलपुर सिंबली गांव पहुंच कर उन्होंने किसी के फोन से पुलिस हैडक्वार्टर को सूचित किया था कि वह अपने एक रसोइए व करीबी दोस्त राजेश वर्मा के साथ इलाके के एक धार्मिक स्थल पर मत्था टेकने गए थे. जब वह अपनी महिंद्रा एक्सयूवी गाड़ी नंबर पीबी02ए बी0313 से वापस घर लौट रहे थे तो रास्ते में फौजी वर्दी पहने 2 व्यक्तियों ने सड़क पर सामने आ कर उन्हें रुकने का इशारा किया.

गाड़ी रुकने पर 3 अन्य व्यक्ति भी वहां आ गए. इस के बाद उन लोगों ने खतरनाक हथियारों के बल पर उन का अपहरण कर लिया. गाड़ी में सलविंदर सिंह को उन के रसोइया से मारपीट कर के गुलपुर सिंबली के पास उन्हें गाड़ी से उतार दिया गया, जबकि उन के साथी राजेश वर्मा को आतंकवादी अपने साथ ले गए. उन के सेलफोन भी आतंकियों ने पहले ही हथिया लिए थे. यह गंभीर मामला पुलिस की जानकारी में आया तो पठानकोट व गुरदासपुर में रेडअलर्ट जारी कर के चारों तरफ सख्त नाकाबंदी कर दी गई.

कुछ देर बाद राजेश वर्मा भी पुलिस से संपर्क साधने में सफल हो गया. उस की बुरी तरह पिटाई करने के साथ ऐसा लग रहा था, जैसे उस की गर्दन काटने का भी प्रयास किया गया था. उस की गर्दन पर तेजधार हथियार का गहरा घाव था. जिस पर उस ने अपनी कमीज बांध रखी थी. कमीज खून से पूरी तरह लाल हो गई थी. राजेश को तुरंत सिविल अस्पताल में दाखिल करा दिया गया. चेकिंग के दौरान पुलिस को पठानकोट के गांव अकालगढ़ के नजदीक एक वीरान जगह से एसपी सलविंदर सिंह की गाड़ी खड़ी मिल गई.

इनोवा चालक इकागर सिंह के कत्ल के संबंध में थाना नरोट जैमलसिंह में केस दर्ज करने और एसपी व उन के साथियों के अपहरण के मामले में गुरदासपुर के सदर थाना में आपराधिक प्रकरण दर्ज होने के बाद पठानकोट के एसएसपी रवींद्र कुमार बख्शी व गुरदासपुर के एसएसपी गुरप्रीत सिंह तूर अपनी विशेष पुलिस टीमों के साथ मामले की तह में जाने और वांछित आतंकियों की धरपकड़ के लिए जुट गए. मगर देर रात तक न तो पुलिस के हाथ कोई आतंकी लगा और न ही उन के बारे में कहीं से अन्य कोई सुराग मिल पाया.

इस बीच स्थिति का जायजा लेने के लिए पहली जनवरी की सुबह ही एडीजीपी (ला एंड और्डर) हरदीप सिंह ढिल्लो, बौर्डर रेंज के आईजी लोकनाथ आंगरा व डीआईजी कुंवर विजय प्रताप सिंह, चंडीगढ़ और अमृतसर से पठानकोट आ पहुंचे. उन के आते ही पुलिस और सेना का जौइंट सर्च औपरेशन शुरू करवा दिया गया.

पुलिस के ये तीनों उच्चाधिकारी दिन भर एसपी सलविंदर सिंह से पूछताछ करते रहे. उन्हें अपना यह कनिष्ठ औफिसर संदेह के दायरे में आता दिख रहा था. यों भी इस एसपी का पिछला आचरण सही नहीं माना जा रहा था. एक साथ 5 महिला सिपाहियों ने उस के खिलाफ गलत आचरण की शिकायत की थी, जिस आधार पर उस का पठानकोट से ट्रांसफर किया गया था. मगर वह तुरंत रिलीव हो कर नई जगह पर जौइन करने के बजाय पठानकोट में ही जमा हुआ था.

अभी 5 महीने पहले ही गुरदासपुर के कस्बा दीनानगर में बड़ी आतंकवादी वारदात हुई थी. आतंकियों ने यहां के पुलिस स्टेशन को अपने कब्जे में ले लिया था. मौजूदा स्थिति को देखते हुए सेना ने आशंका जताई कि इस बार भी आतंकवादियों की ओर से वैसा ही कोई हमला हो सकता है. इसलिए इन बातों को नजरअंदाज न कर के पूरी सुरक्षा व्यवस्था कर ली गई थी. मगर सुरक्षा एजेंसियों और पुलिस की मुस्तैदी के दावों के बावजूद 2 जनवरी, 2016 की अलसुबह ठीक सवा 3 बजे आतंकवादी पठानकोट के एयरफोर्स स्टेशन में हथियारों समेत दाखिल होने में कामयाब हो गए. उन लोगों ने एयरफोर्स स्टेशन में दाखिल होते ही अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी.

इस में डिफेंस सिक्योरिटी कोर के औफिसर औनरेरी कैप्टन फतेह सिंह व हवलदार कुलवंत सिंह शहीद हो गए, साथ ही अन्य कई जवान भी जख्मी हुए. हालांकि मरने से पूर्व बुरी तरह जख्मी हो जाने पर भी फतेह सिंह व कुलवंत सिंह ने 20 मिनट तक आतंकवादियों को आगे बढ़ने से रोके रखा था. इस बीच हमले की जानकारी मिलते ही एयरफोर्स के अनेक अधिकारी तो घटनास्थल के पास पहुंचे ही, पठानकोट की विशेष पुलिस फोर्स ने भी वहां पहुंच कर एयरफोर्स स्टेशन की समूची हद को चारों तरफ से पूरी तरह से सील कर दिया. भीतर छिपे आतंकियों से निपटने के लिए समूची कमान एयरफोर्स के साथ एनएसजी कमांडोज व भारतीय सेना के जवानों ने भी मोर्चा संभाल लिया. यह औपरेशन लगातार 17 घंटे से भी अधिक समय तक चला.

इस दौरान कई बार अतिरिक्त फौज भी बुलाई गई. बख्तरबंद गाडि़यों की भी मांग की जाती रही. आतंकवादियों की ओर से इन गाडि़यों के बुलेटप्रूफ कांच पर अंधाधुंध फायरिंग कर के इन के भीतर बैठे जवानों को नुकसान पहुंचाने के प्रयास लगातार किए जाते रहे, मगर इन गाडि़यों पर एके 47 असाल्ट राइफल की फायरिंग का भी कोई असर नहीं हुआ. देर शाम एयरफोर्स स्टेशन में एक टैंक भेजा गया. स्थिति का जायजा लेने के लिए इस्तेमाल में लाए गए एमआई 35 हेलीकौप्टरों से रुकरुक कर फायरिंग की गई. इन हेलीकौप्टरों में जीपीएस सिस्टम के साथ ऐसे कैमरे भी फिट हैं, जो दूरदराज के कोनों तक के भी साफ फोटो ले सकते हैं, जिन्हें देख कर अचूक निशाना साधा जा सकता है.

इस तरह की आधुनिक तकनीक व मारक हथियारों की मदद से सुरक्षाबलों ने एकएक कर के एयरफोर्स स्टेशन में घुसे 5 आतंकवादियों को मार गिराया. भीतर घुस आए आतंकवादियों ने औनरेरी कैप्टन फतेह सिंह व हवलदार कुलवंत सिंह का 20 मिनट तक मुकाबला कर के उन्हें शहीद करने के बाद कैंटीन का रुख कर लिया था. यहां धुआंधार फायरिंग कर के उन्होंने जिन जवानों को जख्मी किया, वे थे—सूबेदार मेजर दलबीर सिंह, नायक वेदव्यास, लांस नायक किशोरीलाल, सिपाही बिशनदास, सिपाही करतार सिंह, नायक गौरव, नायक बी.एस. जोर, हवलदार जसपाल, रोहित शर्मा व भूप सिंह, एनएसजी कमांडोज व डिफेंस सिक्योरिटी कोर के भी कई जवान घायलों में शामिल थे.

एयरफोर्स स्टेशन में हवाई फौज के मिग-21 लड़ाकू जहाज व एमआई-24 हेलीकौप्टरों समेत अन्य सैन्य साजोसामान मौजूद था, जिन्हें आतंकवादी नुकसान पहुंचा सकते थे. मगर यहां पर तैनात फोर्स की मुस्तैदी की वजह से आतंकवादी इन तक पहुंचने में सफल नहीं हो सके. जिस बर्खास्त एयरफोर्स अधिकारी रंजीत को दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने काबू किया था, उस से जब इस मुद्दे पर पूछताछ की गई तो उस ने माना कि इस हमले की उसे पहले से ही जानकारी थी, साथ ही उस ने बताया कि पठानकोट के अलावा बठिंडा व जैसलमेर भी आतंकवादियों के निशाने पर हैं.

इस से पहले 30 अगस्त, 2015 को पठानकोट पुलिस ने एयरमैन सुनील कुमार को गिरफ्तार किया था. वह फेसबुक के जरिए हनीट्रैप में फंस कर एक लड़की के माध्यम से पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी को एयरफोर्स की गुप्त सूचनाएं लीक कर रहा था. मगर पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर के लंबी पूछताछ के बाद छोड़ दिया था. जाहिर है, अब ये गलतियां नहीं दोहराई जा सकती थीं. दिल्ली पुलिस ने बठिंडा से पकडे़ गए रंजीत के कस्टडी रिमांड की अवधि बढ़ा कर उस से महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर पूछताछ शुरू कर दी. इस बीच बठिंडा कैंट की जबरदस्त सुरक्षा बढ़ा कर पंजाब सहित पूरे देश में हाई अलर्ट जारी कर दिया गया.

चर्चा यह थी कि पठानकोट एयरबेस में घुसे आतंकी अगर अपने मंसूबे में कामयाब हो जाते तो वहां भारी नुकसान पहुंचा सकते थे. इस के बावजूद यह कहना गलत न होगा कि माल का नुकसान भले ही ज्यादा न सही, बेशकीमती जानों का नुकसान तो उन लोगों ने कर ही दिया था. गांव झंडा गुज्जरां के शहीद कैप्टन फतेह सिंह राजपूत सेना की 16 डोगरा रेजीमेंट से बतौर कैप्टन रिटायर हो कर अपने परिवार के साथ मध्य प्रदेश में रह रहे थे. कुछ वर्ष पहले वह फिर सेना में बतौर अफसर डीएससी कोर में शामिल हो गए थे. फतेह सिह सेना में अंतरराष्ट्रीय स्तर के निशानेबाज थे. वह एशिया और अन्य कई अंतरराष्ट्रीय स्तर के खेलों में निशानेबाजी में अनेक पदक जीत चुके थे. उन का एक बेटा गुरदीप सिंह दीपू भी सेना में तैनात है.

दूसरे शहीद हवलदार कुलवंत सिंह सन 1985 में आर्टिलरी सेना के केंद्र हैदराबाद में बतौर सिपाही भरती हुए थे. सन 2004 में रिटायरमेंट के बाद वह घर आ गए. सन 2006 में वह फिर सेना की डीएससी (डीसैंस सिक्योरिटी कौप) सेवा में भरती हो गए. 2 माह पहले ही वह ओडिशा से ट्रांसफर हो कर पठानकोट की एयरबेस में ड्यूटी पर आए थे. शहीद होने से एक दिन पहले ही वह अपने घर वालों से मिल कर वापस ड्यूटी पर पहुंचे थे.

पठानकोट पर यह आतंकी हमला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पाकिस्तान यात्रा के एक सप्ताह बाद हुआ था. ऐसे में सवाल यह उठ खड़ा हुआ है कि दोनों देशों के सुधरते रिश्तों पर इस का क्या असर होगा? वैसे पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने इस हमले की कड़े शब्दों में आलोचना कर के सकारात्मक संदेश देने के प्रयास किए हैं. पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि पाकिस्तान भी आतंकवाद को जड़ से उखाड़ फेंकने की मुहिम में भारत के साथ है. इस परिप्रेक्ष्य में भारत के गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने अपना बयान इस तरह से जारी किया, ‘हम न केवल पाकिस्तान, बल्कि अपने सभी पड़ोसियों के साथ अच्छे रिश्ते चाहते हैं. लेकिन भारत पर अगर कोई आतंकी हमला होता है तो हम उस का करारा जवाब देंगे.’

वैसे अब तक की छानबीन में यह बात सामने आई है कि पठानकोट हमले में जैशएमोहम्मद का हाथ है. इस हमले में सन 1999 में इंडियन एयरलाइंस के विमान अपहरण व दिसंबर, 2001 में संसद पर हुए हमले से जुड़े आतंकवादियों का ही हाथ है. संदर्भवश बता दें कि आतंकवादी अफजल गुरु के बाद आतंकियों ने अपने संगठन को दूसरे तरीके से तैयार किया है और फिदायीन हमलावरों की टोली बनाई है. इन्हें ट्रेनिंग देने का काम युद्धस्तर पर शुरू किया गया. कश्मीर में आतंकवादियों के एनकाउंटर से जुड़े सुरक्षा अधिकारियों ने सीधेसीधे आशंका जताई है कि पठानकोट हमले में सन 2001 में संसद पर हुए हमले के दोषी अफजल गुरु से जुड़े लोगों का हाथ है.

इन लोगों ने सन 2014 में स्क्वैड औफ जैश नामक संगठन बनाया था. गुरु उत्तरी कश्मीर के सोपोर क्षेत्र का रहने वाला था, जिसे फरवरी, 2013 में तिहाड़ जेल में फांसी दे दी गई थी. इस से पहले जैश नामक आतंकी संगठन को मौलाना मसूद अजहर ने बनाया था. अजहर वही आतंकी है, जिसे सन 1999 में हाइजैक हुए इंडियन एयरलाइंस के विमान को अफगानिस्तान के कंधार ले जा कर रिहा करवा लिया गया था.  यह घटनाक्रम कुछ इस तरह से था कि 24 दिसंबर, 1999 को 5 हथियारबंद आतंकवादियों ने 178 यात्रियों के साथ इंडियन एयरलाइंस के आईसी-814 विमान को काठमांडू से हाइजैक कर लिया था. वे उसे अफगानिस्तान के कंधार एयरपोर्ट पर ले गए. वहां 25 साल के भारतीय नागरिक रूपेन कत्याल की हत्या कर के उस के शव को प्लेन से बाहर फेंक दिया गया था.

आतंकियों ने भारत के सामने 178 यात्रियों की हिफाजत के बदले 3 आतंकियों की रिहाई का सौदा किया. उस वक्त की वाजपेयी सरकार ने पैसेंजरों की जान बचाने के लिए तीनों आतंकियों को छोड़ने का फैसला किया. तब भारत की जेलों में बंद आतंकवादी मौलाना मसूद अजहर, मुश्ताक अहमद जरगर व अहमद उमर सईद शेख को कंधार ले जा कर रिहा किया गया था.

बहरहाल, ताजा पठानकोट आतंकी हमले की छानबीन में यह बात सामने आई है कि हमला करने वाले आतंकवादी अपने पाकिस्तानी आकाओं से निरंतर संपर्क में थे. उन आकाओं ने इन आतंकवादियों के लिए पाकिस्तानी फोन नंबर का इस्तेमाल कर एक टोयोटा इनोवा टैक्सी की व्यवस्था की थी. रास्ते में टैक्सी का रिम खराब होने के कारण आतंकवादी उस से उतर गए थे. उस के बाद उन्होंने एसपी सलविंदर सिंह से उन की गाड़ी छीन ली. उन का मोबाइल फोन भी छीन लिया गया, जिस से एक आतंकवादी ने पाकिस्तान बात की थी.

खैर, पठानकोट एयरबेस पर हुए हमले से एक बार तो लगा कि अंदर घुसे सभी आतंकवादियों का सफाया कर दिया गया है, मगर 3 जनवरी को गोलियां चलने का क्रम फिर से शुरू हो गया. अचानक बनी इस स्थिति से यह अनुमान लगाना मुश्किल हो रहा था कि एयरबेस में अभी कितने और आतंकी छिपे हैं और उन के पास किस तरह के हथियार हैं, कैसी विस्फोटक सामग्री है? अभी तक तो यही समझा जा रहा था कि कुल 5 आतंकवादी थे और वे मारे जा चुके हैं.

उस दिन एक अति दुखद घटना यह घटी कि एक आतंकी की लाश को हटाते वक्त भयानक विस्फोट हुआ, जिस में एनएसजी के लेफ्टिनेंट कर्नल निरंजन ई. कुमार शहीद हो गए. साथ ही 6 कमांडो भी गंभीर रूप से घायल हो गए. रविवार सुबह करीब साढ़े 8 बजे लेफ्टिनेंट कर्नल निरंजन एनएसजी के कमांडो के साथ एक आतंकी का शव उठवाने गए थे. तभी आतंकी के शव पर लगे आईईडी में विस्फोट हो गया था. अब तक 5  आतंकियों के मारे जाने का अनुमान था, जिन में से 4 के शव बरामद कर लिए गए थे. जबकि वायु सेना के शहीद हुए जवानों की संख्या 7 तक पहुंच गई थी.

लेफ्टिनेंट कर्नल निरंजन पर एनएसजी (नैशनल सिक्योरिटी गार्ड) को ही नहीं, पूरी आर्म्ड फोर्स को नाज था. उन का जन्म बंगलुरू में बीईएमएल के अधिकारी ई.के. शिवरंजन के यहां हुआ था. उनके 2 भाई व 1 बहन हैं. मां का निधन बचपन में ही हो गया था. निरंजन अपने पीछे विधवा डा. के.जी. राधिका व 2 साल की बेटी विस्मय को छोड़ गए हैं. निरंजन एनएसजी के बम निरोधक दस्ते के सदस्य थे. पठानकोट एयरबेस में वह एनएसजी की टीम को लीड कर रहे थे. एयरबेस में सुरक्षाबलों व आतंकवादियों के बीच मुठभेड़ अभी भी जारी थी. इस बीच शहीद हुए शूरवीरों की शौर्यगाथाएं भी बाहर आने लगी थीं.

गरनाला, अंबाला सिटी के रहने वाले 28 वर्षीय गुरसेवक सिंह अपने फौजी पिता व बड़े भाई की तरह करीब 6 साल पहले भारतीय वायु सेना में भरती हुए थे. बचपन से ही दिलेर रहे गुरसेवक को एयरफोर्स की गरुड़ कमांडो विंग का हिस्सा बनते देर नहीं लगी. अपनी इस नौकरी से वह बहुत खुश थे. उन की शादी 18 नवंबर, 2015 को कुराली की रहने वाली जसप्रीत कौर से हुई थी. लंबी छुट्टी काटने के बाद उन्होंने 20 दिसंबर को फिर से अपनी ड्यूटी जौइन की थी. पहली जनवरी, शुक्रवार की आधी रात में ही उन्हें पठानकोट एयरबेस पहुंचने का आदेश मिला और वह अपनी टीम के साथ तत्काल वहां के लिए कूच कर गए.

अगले दिन बहादुरी दिखाते हुए उन्होंने अपनी जान देश पर न्यौछावर कर दी. त्रासदी यह कि उन की विधवा जसप्रीत कौर के हाथों की मेहंदी भी अभी नहीं छूट पाई थी. ऐसे ही डीएससी कोर के सिपाही संजीव कुमार राणा, जगदीशचंद व करतार सिंह भी अपनी जांबाजी के सबूत दे कर वतन के लिए जान दे कर अपनी शौर्यगाथाएं छोड़ गए. 4 आतंकियों की पहली टुकड़ी ने जब एयरबेस की मैस में घुस कर फायरिंग शुरू की थी, तब जगदीशचंद खाना बना रहे थे.

उन की आंखों के सामने आतंकियों ने 3 जवानों को मौत के घाट उतार दिया तो जगदीश निहत्थे ही आतंकियों के पीछे दौड़ पड़े. एक आतंकी की राइफल छीन कर उस पर गोलियों की बौछार करते हुए उसे मौत के घाट उतारने के बाद वह दूसरे आतंकी की ओर बढ़े. मगर तब तक बाकी बचे तीनों आतंकियों ने उन्हें घेर लिया था. तीनों ने एक साथ उन पर इतनी गोलियां चलाईं कि उन का पूरा जिस्म गोलियों से छलनी हो गया. इस आतंकवादी घटना ने पूरी दुनिया का ध्यान आकर्षित किया है.

पाकिस्तानी मीडिया का कहना है कि भारतीय वायु सेना के प्रमुख अड्डे पर हुआ यह आतंकी हमला दोनों देशों के बीच होने वाली वार्ता की राह में रोड़ा साबित होगा. भारतीय मीडिया की भी यही राय है. यह हमला चूंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की औचक लाहौर यात्रा के एक हफ्ता बाद हुआ था, इसलिए इसे पुरानी घटनाओं से जोड़ते हुए पाकिस्तान की नीयत पर सवाल उठ रहे हैं. बहरहाल, पठानकोट एयरबेस में तीसरे दिन भी मुठभेड़ जारी रही. सुरक्षाबलों ने उस इमारत को टैंक से उड़ा दिया, जिस में आतंकवादियों के छिपे होने की आशंका थी. इस प्रयास में एक आतंकवादी का शव मिला, जबकि वहां और भी आतंकवादियों के छिपे होने का अनुमान था.

आतंकवादी हमले के पीछे की पूरी साजिश की जांच के लिए एनआईए ने 4 जनवरी को 3 मामले दर्ज कर के पुलिस अधीक्षक रैंक की अगुवाई में एक विशेष टीम का गठन किया. 5 जनवरी को देश के रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर ने पठानकोट पहुंच कर संवाददाता सम्मेलन का आयोजन किया और इस बात की घोषणा की कि एयरबेस में घुसे सभी 6 आतंकियों को मार गिराया गया है. अब कौंबिंग औपरेशन को अंजाम दिया जा रहा है.

6 जनवरी को चंडीमंदिर स्थित वैस्टर्न कमांड के मुख्यालय में पत्रकारों से बातचीत करते हुए लेफ्टिनेंट जनरल के.जी. सिंह ने बताया कि इस औपरेशन को इसलिए सफलतम कहा जा सकता है, क्योंकि इसे अंजाम देते वक्त करीब 11 हजार आम नागरिकों व 23 विदेशी नागरिकों की जिंदगी बचाने में भी सफलता मिली है. उल्लेखनीय है कि इस एयरबेस में लगभग 3 हजार परिवार रहते हैं और 4 मित्र देशों के 23 सैनिक प्रशिक्षण के लिए यहां आए हुए थे.

जांच एजेंसियां इस हमले की गहराई में जाने को पूरी तरह प्रयासरत हैं. जांच एजेंसियों का मानना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने गुरदासपुर के पुलिस अधीक्षक द्वारा उपलब्ध कराई गई सूचनाओं पर विचार करने के लिए 1 जनवरी, 2016 को शाम साढ़े 7 बजे बैठक बुलाई थी, जबकि आतंकी तब तक वायु सेना परिसर के निकट पहुंच चुके थे.

जांचकर्ताओं के अनुसार, यह तो तय है कि आतंकी पाकिस्तान से ही आए थे. वायु सेना हवाईअड्डे पर थर्मल इमेजिज उपकरण में लगे कैमरे में जो तसवीरें कैद हुई हैं, उन्होंने भी जांच एजेंसियों की काफी मदद की है. राष्ट्रीय जांच एजेंसी के कुछ अधिकारियों का मानना है कि पहली जनवरी को आतंकियों के पास तीनों मोबाइल फोन एक्टिव रहे. इन में एक फोन ज्वैलर राजेश वर्मा का था, जिस से पाकिस्तान में काल की गई थी. दूसरा फोन एसपी सलविंदर सिंह व तीसरा उन के रसोइए मदनगोपाल का था. एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि क्या 10 घंटे तक पठानकोट हवाईअड्डे के निकट आतंकियों को स्थानीय मदद मिली थी. एनआईए का मानना है कि मृत आतंकियों की वस्तुओं को देखने से पता चलता है कि वे बहावलपुर से संबंध रखते हैं, जोकि जैशएमोहम्मद का मुख्यालय है.

जांचकर्ताओं के लिए यह जांच का मुख्य मुद्दा है कि 1 जनवरी की सुबह पठानकोट पहुंचे आतंकी मध्यरात्रि तक वायु सेना परिसर में दाखिल होने का इंतजार करते रहे. इन 10 घंटों केदौरान वे कहां रुके, इस का पता लगाया जाना निहायत जरूरी है. इसी से यह बात सामने आ सकती है कि क्या इन आतंकियों को वहां रुकने में किसी ने मदद की थी.

आईबी (इंटेलीजेंस ब्यूरो) ने बीएसएफ व पंजाब पुलिस को 3 महीनों में 3 अलगअलग अलर्ट भेजे थे, जिन में आतंकियों की संभावित घुसपैठ का उल्लेख किया गया था. इन संदेशों में यह भी बताया गया था कि कितने आतंकी घुसपैठ करने को तैयार बैठे हैं. सब से ताजा अलर्ट में कहा गया था कि औटोमैटिक हथियारों व हैंडग्रेनेड के साथ 6 आतंकी पाकिस्तानी पंजाब के मसरूर बड़ा भाई गांव में बैठे हुए हैं तथा भारत में दाखिल हो कर तबाही मचाने की सोच रहे हैं. हालांकि इस अलर्ट में यह नहीं बताया गया था कि ये आतंकी किस दिन, किस वक्त व भारत के किस क्षेत्र में दाखिल होंगे. इतना जरूर कहा गया था कि ये आतंकी घुसपैठ के लिए उचित समय का इंतजार कर रहे हैं तथा उत्तरी पंजाब के हिस्से बमियाल से घुसपैठ कर सकते हैं.

इस से पहले अक्तूबर व नवंबर महीने में भी अलर्ट भेजे गए थे. इंटेलीजेंस अधिकारियों का कहना है कि आतंकियों की घुसपैठ के सही दिन के बारे में बताना कठिन होता है. वे उचित समय की प्रतीक्षा में रहते हैं और अंतिम समय में ही एकदम से घुसपैठ करते हैं. मसरूर बड़ा भाई गांव बमियाल से करीब 10 किलोमीटर की दूरी पर है. यहां आतंकवादी यदाकदा जमा होते रहते हैं. एजेंसियों का यह भी मानना है कि गुरदासपुर के दीनानगर पर हमला करने वाले पाक आतंकी भी भारत में दाखिल होने से पहले मसरूर बड़ा भाई गांव में रुके थे. वे बमियाल क्षेत्र के साथ लगते नाले की आड़ में भारत में घुसे थे.

इस संबंध में सीमा सुरक्षा बल का कहना है कि सीमावर्ती क्षेत्रों में उन के जवान 24 घंटे अलर्ट रहते हैं. दूसरी ओर इंटेलीजेंस की तरफ से अलर्ट अकसर मिलते रहते हैं. यों मारे गए 6 आतंकियों के बाद अब एनआईए टीम ने विधिवत जांच शुरू कर दी है. जांच एवं सुरक्षा एजेंसियों के लिए सब से बड़ा प्रश्न उस रूट का पता लगाना था, जिसे आतंकियों ने पठानकोट पहुंचने के लिए इस्तेमाल किया था. फिलहाल इन एजेंसियों की निगाह बमियाल में पड़ने वाली उज्ज नदी पर जमी है. इस नदी के साथ ही खूनी नाला पड़ता है, जो सीधा पाकिस्तान की सीमा से मिलता है.

इस खूनी नाले के किनारे पर जसपाल सिंह की जमीन है, जिस ने जांच एजेंसियों को अपने खेतों में जूतों के अजीब तरह के निशान दिखाए थे. इन निशानों पर अंगरेजी के कुछ शब्द अंकित थे. जांच एजेंसी ने इन निशानों को आतंकवादियों से जोड़ कर देखा. यह रूट आतंकियों द्वारा अपनाया गया हो सकता था, क्योंकि ये निशान खूनी नाले के बीच में तथा भारतपाक सीमा से करीब डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर पाए गए थे. यहां पर यह बताना तर्कसंगत रहेगा कि मृतक ड्राइवर इकागर सिंह के मामा के घर की ओर भी यही रास्ता जाता था. इकागर के घर वालों ने भी बताया था कि वह घटना की रात साढ़े 9 बजे अपने मामा के घर की ओर गया था.

बहरहाल, जांच पूरी होने के बाद ही किसी नतीजे पर पहुंचा जा सकता है. इस आतंकवादी घटना से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लाहौर यात्रा आलोचना के घेरे में आ गई है. इसी के मद्देनजर 7 जनवरी, 2016 को भारत की ओर से पाकिस्तान पर दबाव बनाते हुए स्पष्ट कर दिया गया कि पठानकोट हमले के उपलब्ध कराए गए साक्ष्यों पर त्वरित और निर्णायक काररवाई के बाद ही द्विपक्षीय बातचीत का सिलसिला आगे बढ़ सकता है. इस के साथ ही हमले में शामिल आतंकियों के आकाओं के रूप में इन नामों की सूची पाकिस्तान को सौंप दी गई थी—जैशएमोहम्मद प्रमुख मौलाना मसूद अजहर, उस का भाई अब्दुल रऊफ असगर, अशफाक एवं कासिम. यह भी बताया गया है कि हमले की साजिश लाहौर के पास रची गई थी.

इस सिलसिले में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने उसी दिन इस सिलसिले में एक उच्चस्तरीय मीटिंग बुला कर पठानकोट आतंकी हमले पर वार्ता की. उन्होंने अपने अधिकारियों की ओर से इस बात की पुष्टि चाही कि वे भारत द्वारा सौंपे गए सबूतों पर त्वरित काररवाई करते हुए जरूरी एक्शन लेंगे. इस आतंकी हमले में आतंकवादियों की ड्रग तस्करों से गठजोड़ की भी जांच हो रही है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 10 जनवरी को पठानकोट पहुंच कर स्थिति का जायजा लेने के साथ यहां के जवानों की पीठ भी ठोंकी. आतंकियों को मुंहतोड़ जवाब देने के लिए सुरक्षा बल की हौसलाअफजाई की. उसी दिन अमेरिका ने पाकिस्तान को चेताया कि वह पठानकोट एयरबेस पर हमला करने वाले आतंकियों के खिलाफ त्वरित काररवाई करे.

छहों मृत आतंकियों के शवों को पोस्टमार्टम करने के बाद उन के डीएनए टेस्ट के लिए भेज कर शवों को कड़ी सुरक्षा के बीच शवगृह में रखवा दिया गया. पुलिस प्रशासन द्वारा पठानकोट में आर्मी की वर्दी की खुले में बिक्री पर सख्त रोक लगा दी गई. भारत ने इस हमले के जो सबूत पाकिस्तान को सौंपे थे, वे यूके, यूएसए, जापान, फ्रांस व दक्षिण कोरिया को भी भेजे गए हैं. इन देशों ने भी भारत को भरोसा दिलाया है कि वे पाकिस्तान पर जांच में तेजी लाने के लिए दबाव बनाएंगे. भारत की कोशिशों का असर दिखा भी.

अमेरिकी विदेश मंत्री जौन कैरी ने पाक प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से फोन पर बात की. इस बातचीत में शरीफ ने भरोसा दिलाया कि पाकिस्तान जल्द ही पठानकोट हमले का सच सामने लाएगा. लेकिन 11 जनवरी को पाकिस्तान ने भारत की ओर से हासिल सबूतों को नकार दिया. उल्लेखनीय है कि भारत सरकार ने पाकिस्तान को 2 फोन नंबर सौंपे थे +92-1017775253 और +92-3000597212. भारत का दावा था कि ये नंबर पाकिस्तान में बैठे हैंडलरों के थे, जिन पर पठानकोट हमले से जुड़े आतंकियों ने बात की थी. मगर पाकिस्तान की ओर से साफ कह दिया गया कि ये नंबर पाकिस्तान में रजिस्टर्ड नहीं हैं.

अंतत: पाकिस्तान पर अमेरिका और भारत का दबाव काम आया. पाक पीएम नवाज शरीफ ने पठानकोट के एयरबेस पर हुए हमले की जांच के लिए संयुक्त टीम बनाने के आदेश दे दिए. इस टीम में पाकिस्तान आईबी, आईएसआई, मिलिट्री इंटेलीजेंस और पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए. नवाज शरीफ ने दावा किया कि वह पठानकोट हमले को ले कर काफी गंभीर हैं. उन्होंने सख्त रवैया अख्तियार कर लिया है. वह इस हमले की तह तक जा कर यह जानना चाहते हैं कि आखिर इस हमले का मुख्य साजिशकर्ता कौन है, इस संबंध में उन्होंने अपने आर्मी चीफ जनरल राहील शरीफ से भी बात की.

पाकिस्तानी खबरिया चैनल एआरवाई न्यूज ने इस बारे में अपनी एक खबर के माध्यम से कहा कि इस सिलसिले में कुछ गिरफ्तारियां हुई हैँ, लेकिन पुलिस ने इस बात की पुष्टि नहीं की कि  ये गिरफ्तारियां पठानकोट हमले के सिलसिले में हुई हैं. चैनल ने समाचार प्रसारित करते हुए यह भी कहा कि इन संदिग्धों को गिरफ्तार कर के पूछताछ के लिए अज्ञात स्थान पर ले जाया गया है.

11 जनवरी को दिल्ली में संपन्न 68वें आर्मी डे पर आयोजित समारोह में भारत के रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर ने पठानकोट एयरबेस मुद्दे पर सार्वजनिक रूप से बोलते हुए कहा कि अगर कोई इस देश को नुकसान पहुंचा रहा है तो उस शख्स और संगठन को भी वैसा ही दर्द झेलना होगा. पठानकोट हमले को अमेरिका ने बेहद गंभीरता से लिया है. 12 जनवरी को उस ने पाकिस्तान को झटका देते हुए 8 एफ-16 लड़ाकू विमानों की बिक्री रोक दी. इसी दिन गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने अपना बयान जारी करते हुए कहा कि पाक पर अविश्वास नहीं, मगर इन हालात के बीच विदेश सचिव स्तरीय बातचीत फिलहाल टाल देना ही ठीक है. 14 जनवरी, 2016 को पाकिस्तान से धमाकेदार खबर आई कि पठानकोट हमले के मास्टरमाइंड और जैश के सरगना मसूद अजहर को बहावलपुर से 10 अन्य कथित आतंकियों सहित गिरफ्तार कर लिया गया है.

खबर में यह भी बताया गया कि पठानकोट हमले के संबंध में वांछित आरोपियों को पकड़ने के लिए न केवल ताबड़तोड़ छापेमारी की जा रही है, बल्कि पाकिस्तान का विशेष जांच दल भी पठानकोट जाएगा. इस के अगले ही दिन पाक विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने इस से इनकार करते हुए कहा कि उसे मसूद की गिरफ्तारी की कोई जानकारी नहीं है. भारतपाक विदेश सचिवों की वार्ता भी फिलहाल टल गई है. 15 जनवरी को पाकिस्तानी पंजाब प्रांत के कानून मंत्री राणा सनाउल्लाह ने साफ किया कि मसूद को गिरफ्तार नहीं किया गया है, बल्कि उसे ऐहतियातन हिरासत (प्रोटेक्टिव कस्टडी) में रखा गया है.

इस पर 16 जनवरी को जयपुर में आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन में रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर ने एक सवाल के जवाब में कहा, ‘‘बहुत हुआ, सहने की जो क्षमता इस देश की थी, वह खत्म हो गई है. रक्षामंत्री के तौर पर मेरी भी यह क्षमता खत्म हो गई है. अब तो अगले एक साल में दुनिया इस के नतीजे देखेगी.’  फिलहाल, जांच एजेंसियों की छानबीन तो इस ओर इशारा कर रही है कि आतंकियों की मदद करने वाले पंजाब में ही बैठे वे घर के भेदी हैं, जो पैसों के लालच में अपना ईमान तक बेचने से नहीं हिचकते. आतंकियों के मारे जाने के बाद एयरबेस से जो असलहा एवं गोलाबारूद बरामद हुआ है, उस का वजन एक क्विंटल से ज्यादा है.

एयरबेस तक आतंकियों को पहुंचाने वाले एक गाइड का सुराग भी जांच एजेंसियों को मिला है. हनीट्रैप में फंस कर अपने ही देश से गद्दारी पर उतारू सुनील व रंजीत वगैरह पहले ही संदेह के घेरे में आ चुके हैं. इन्हें फिर से कस्टडी में ले कर व्यापक पूछताछ की तैयारी चल रही है. एसपी सलविंदर सिंह व उन के साथी भी संदेह के घेरे में हैं. नैशनल इन्वैस्टीगेशन एजेंसी इन से कई बार पूछताछ कर चुकी है. इन का लाई डिटेक्टर टेस्ट भी करवाया गया है. एनआईए को इस काररवाई से महत्त्वपूर्ण सूचनाएं मिली एनआईए का दावा है कि बिना भीतर की मदद के बाहर से आए आतंकवादी इतने खतरनाक हमले की योजनाएं नहीं बना सकते.

मारे गए आतंकियों के शवों के पोस्टमार्टम कर इन के पार्ट्स डीएनए के लिए भेजे गए हैं. शवों को कड़ी सुरक्षा में रखा गया है. इन आतंकियों की उम्र 20 से 30 वर्ष के बीच थी. इन के फिंगरप्रिंट भी संरक्षित कर लिए गए हैं. इन लाशों का क्या किया जाना है, यह गृह मंत्रालय तय करेगा. फिलहाल पठानकोट के सिविल अस्पताल के मोर्चरी विभाग में शवों को सुरक्षित रख कर ताला लगा दिया गया है और वहां कड़ी सुरक्षा की व्यवस्था कर दी गई है.

एसपी सलविंदर सिंह के बारे में बताया गया है कि एनआईए की पूछताछ में उन्होंने स्वीकार किया है कि वह ड्रग माफिया की खेप पार करवाने के लिए उन से हीरे लिया करता था, जिन की जांच उस का ज्वैलर दोस्त राजेश वर्मा किया करता था. उस रात भी एसपी निकला तो इसी काम के लिए था, मगर उन का सामना हो गया आतंकवादियों से. गृह मंत्रालय के प्रवक्ता के बताए अनुसार, 40 से अधिक संवेदनशीन जगहों पर लेजर दीवारें खड़ी कर के किसी भी तरह की घुसपैठ से निजात हासिल कर ली जाएगी. Pathankot Attack

 

Chhattisgarh News: अरबपति अभिषेक मिश्रा हत्याकांड – तन मांगे मोर

Chhattisgarh News: एजूकेशन कारोबारी अभिषेक मिश्रा के अपने ही इंस्टीट्यूट की युवा प्रोफेसर किम्सी जैन से प्रेमिल रिश्ते हो गए थे. विवाह के बाद वह अभिषेक से किनारा करने लगी तो अभिषेक को यह नागवार गुजरा. तब अभिषेक से छुटकारा पाने के लिए किम्सी ने अपने रोबोट इंजीनियर पति और चचिया ससुर के साथ  मिल कर जो किया, उसे  उचित कतई नहीं कहा जा सकता.

पुलिस हैडक्वार्टर के उस मीटिंग हौल में छत्तीसगढ़ पुलिस के तमाम अधिकारी मौजूद थे. उन में फोरैंसिक, साइबर और क्राइम एक्सपर्ट ही नहीं, वे लोग भी थे, जिन्हें बड़े से बड़े अनसुलझे मामले सुलझाने में महारथ हासिल थी. यह बात अलग थी कि जिस मामले को ले कर यह मीटिंग बुलाई गई थी, उसे ले कर सभी के चेहरे पर चिंता की लकीरें थीं.

मीटिंग में मामले से जुड़े छोटेबड़े सभी बिंदुओं को ले कर चर्चा हो रही थी. लेकिन अफसोस की बात यह थी कि कुछ भी नतीजा सामने नहीं आ रहा था. प्रोजैक्टर के दोनों ओर बिछी कुरसियों पर बैठे अधिकारियों के बीच बैठे डीजीपी ए.एस. उपाध्याय ने सभी को संबोधित करते हुए कहा, ‘‘यह कितने अफसोस की बात है कि इस मामले में हम अपराधियों तक नहीं पहुंच पा रहे हैं.’’

‘‘सर, हम कोशिश तो कर रहे हैं, लेकिन…’’ सामने बैठे एक पुलिस अधिकारी ने कहा, ‘‘ऐसा कोई सुराग ही नहीं मिल रहा है कि…’’

‘‘जरूरी नहीं कि हर कोशिश का नतीजा निकल ही आए. इस के अलावा जब तक कुछ नतीजा सामने न आ जाए, तब तक यह भी तो पता नहीं चलता कि कोशिश की जा रही है.’’

‘‘सर, इस मामले में अपराध करने वाले बहुत चालाक हैं. उन्होंने किसी जासूसी फिल्म की तरह हमारे सामने चुनौती पेश की है. उन्होंने ऐसा कोई सुराग ही नहीं छोड़ा. और जो सुराग मिले भी हैं, वे उलझाने वाले हैं. ऐसे में हमारे लिए यह तय करना मुश्किल हो गया है कि यह मामला किडनैपिंग का है या कुछ और.’’

‘‘हमारा काम सुरागों को ढूंढना और उसी के सहारे मामले की तह तक पहुंचना है. यह तो जानते ही हो कि कोई भी अपराधी पुलिस से ज्यादा चालाक नहीं होता. उस सुराग को खोजिए, जिस तक अभी तक आप पहुंच नहीं पाए हैं. उस के मिलते ही केस खुल जाएगा और अपराध करने वाले आप की हिरासत में होंगे.’’

‘‘सर, इस मामले में हम ने पुलिस की 35 टीमें लगा रखी हैं. जल्द ही कोई न कोई परिणाम सामने आएगा.’’

‘‘ठीक है, जांच में छोटी से छोटी बात का खयाल रखा जाए. आप लोग निर्देश के लिए मुझ से सीधे या अपने आईजी तथा एसपी से कौंटैक्ट कर सकते हैं. कुछ भी कीजिए, इस मामले में अब हम और फजीहत नहीं चाहते.’’ डीजीपी ए.एन. उपाध्याय ने कहा.

इसी के साथ मीटिंग खत्म हो गई. कोई भी अपराध होने के बाद जांच में उस मामले से पुलिस का रिश्ता उतना ही गहरा होता है, जितना दिल से धड़कनों का. लेकिन कुछ ऐसे भी सनसनीखेज मामले सामने आ जाते हैं, जिन में पुलिस के अच्छे से अच्छे एक्सपर्ट भी गच्चा खा जाते हैं. पुलिस जांच के अपने एक मायने होते हैं, लेकिन जब कोई सबूत हाथ न लगे और जो मिलें भी, वे दगा दे जाएं तो पुलिस अधिकारियों के पसीने छूट जाते हैं. अरबपति अभिषेक मिश्रा के हत्या के मामले में भी कुछ ऐसा ही हो रहा था. इस मामले में पूरे राज्य की पुलिस के जांबाज पुलिस वाले भी चकरा कर रहे गए थे. इस की वजह भी हैरान करने वाली थी.

पुलिस की 35 टीमें एक महीने में लगभग डेढ़ हजार लोगों से पूछताछ कर चुकी थीं. वे 7 राज्यों, 20 से ज्यादा शहरों की खाक छान चुकी थीं, करीब एक करोड़ फोन काल चेक करने के अलावा सैकड़ों हिस्ट्रीशीटर और तमाम रजिस्टर्ड अपराधियों से गहरी पूछताछ कर चुकी थीं, इन में तमाम हाई प्रोफाइल खूबसूरत लड़कियां भी शामिल थीं. पूछताछ, धरपकड़ और काल ट्रैसिंग का भी सिलसिला जारी था. इस के बावजूद इस अपराध की पृष्ठभूमि और जांच में सुराग तो मिलते थे, लेकिन वे तह तक पहुंचाने में सफल नहीं होते थे. एक तरह से देखा जाए तो यह राज्य का सब से बड़ा मामला बन गया था. शायद इसीलिए मामले का किसी भी तरह खुलासा हो जाए, डीजीपी ए.एन. उपाध्याय ने तमाम पुलिस अधिकारियों के साथ बैठक की थी.

समझ में नहीं आ रहा था कि अभिषेक अचानक कहां गायब हो गए थे. गायब होने के बाद फिरौती के लिए फोन भी आया था. फोन करने वाले ने नक्सली आंदोलन का प्रतीक ‘लाल सलाम’ कह कर संदेह की सुई नक्सलियों की ओर घुमा दी थी. इस तरह साजिश रचने वाले आजाद थे. मामला बेहद हैरतअंगेज और सनसनीखेज बन गया था. राज्य के लोगों की निगाह इस मामले पर टिकी थीं. मीडिया में हर रोज खबरें आ रही थीं. मामला इसलिए बड़ा हो गया था, क्योंकि अभिषेक मिश्रा कोई मामूली आदमी नहीं थे.

भारत का 26वां राज्य छत्तीसगढ़ ऊंचीनीची पर्वत श्रेणियों से घिरा है. राजधानी रायपुर से लगभग 30 किलोमीटर दूर राज्य का तीसरा बड़ा शहर है दुर्गभिलाई. मुंबई- नागपुर-कोलकाता राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित यह शहर इस्पात संयत्र के लिए प्रसिद्ध है. इसी शहर के पौश इलाके नेहरूनगर (पश्चिम) की कोठी संख्या- 45ए/13 में रहते हैं आई.पी. मिश्रा. मृदुभाषी और व्यवहारकुशल आई.पी. मिश्रा कोई छोटेमोटे आदमी नहीं हैं. उन के हाथों में शंकराचार्य गु्रप के कई बड़े शैक्षणिक संस्थानों, यूनिवर्सिटी और स्टील कंपनी की कमान है. उन के संस्थानों का शुमार राज्य के बड़े से बड़े संस्थानों में होता है. पूरी प्रौपर्टी और कारोबार अरबों में है. अब ऐसे आदमी की राजनैतिक और सामाजिक पहुंच तो होगी ही. नाम, शोहरत और दौलत भी उन के कदम चूम रही है.

करीब 2 सौ करोड़ के एंपायर के मालिक आई.पी. मिश्रा के बेटे थे अभिषेक मिश्रा. हंसमुख स्वभाव के अभिषेक खुद भी शंकराचार्य ग्रुप औफ इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर थे. उन के परिवार में पत्नी जया मिश्रा के अलावा 2 बच्चे थे. पिता के साथ अभिषेक भी शिक्षा जगत में बड़ा नाम थे. उन की ख्याति में तब और भी इजाफा हो गया था, जब उन्होंने सन 2013 में माओवाद विषय पर आधारित एक क्षेत्रीय फिल्म ‘अलाप’ का निर्माण किया था. यही नहीं, करोड़ों रुपए में रायपुर रेंजर्स के नाम से वह टैनिस लीग की टीम की स्पौंसरशिप भी कर चुके थे.

कौन, कब, किस मुसीबत में फंस जाए, कोई नहीं जानता. मिश्रा परिवार के साथ भी ऐसा ही हुआ था. 9 नवंबर, 2015 की शाम अभिषेक अपनी लाल रंग की स्कोडा कार नंबर सीजी 07 एमए 0007 से किसी को बिना कुछ बताए निकले तो रहस्यमय तरीके से लापता हो गए थे. काफी रात होने पर भी जब वह वापस नहीं आए तो आई.पी. मिश्रा और अभिषेक की पत्नी जया ने उन के मोबाइल कर फोन किया. मोबाइल पर लगातार घंटी जाती रही, लेकिन फोन नहीं उठा. उन्होंने बात तो नहीं की, लेकिन एमएमएस के जरिए बता दिया कि वह थोड़ी देर में आ जाएंगे.

थोड़ी और रात बीती तो उन का मोबाइल भी बंद हो गया. इस से घर वालों को चिंता हुई. आई.पी. मिश्रा ने जानपहचान वालों से अभिषेक के बारे में पता किया, लेकिन उन का कुछ पता नहीं चला. फिर तो वह रात चिंता में बीती. किसी अनहोनी की आशंका से परेशान घर वालों ने सवेरा होते ही इस बात की सूचना पुलिस को दे दी. मामला प्रतिष्ठित परिवार का था, इसलिए एसपी मयंक श्रीवास्तव ने स्थानीय थाना पुलगांव के थानाप्रभारी पी.के. साहू को इस मामले की जांच के आदेश दे दिए. पुलिस ने सक्रिय हो कर अभिषेक की खोजबीन शुरू कर दी. अभिषेक को ले कर हर कोई परेशान था. वह कहां गए हैं, यह उन्होंने घर वालों को भी नहीं बताया था.

अगले दिन उन के लापता होने का मामला शहर भर में चर्चा का विषय बन गया. पुलिस को अभिषेक के अपहरण की आशंका अधिक थी. यह तब सच भी साबित हुआ, जब उन के पिता आई.पी. मिश्रा के मोबाइल पर अभिषेक के मोबाइल से फिरौती का फोन आया. उन के मोबाइल से किसी अज्ञात ने फोन कर के कहा, ‘‘लाल सलाम.’’

‘‘कौन बोल रहे हैं?’’ आई.पी. मिश्रा ने पूछा.

‘‘लाल सलाम, सुना नहीं… मिश्राजी, आप बेटे को ले कर परेशान न हों. वह हमारे कब्जे में है. हम उसे छोड़ देंगे, लेकिन बदले में मोटी फिरौती चाहिए. रकम कहां पहुंचानी है, यह हम तुम्हें बाद में बता देंगे.’’ फोन करने वाले ने पल भर रुक कर कहा, ‘‘और हां, ज्यादा चालाक बनने की कोशिश मत करना, वरना तुम्हें बेटे की लाश ही मिलेगी.’’

आई.पी. मिश्रा कुछ कहते, उस के पहले ही फोन काट दिया गया. इस के तुरंत बाद मोबाइल फोन बंद कर दिया गया. उन्होंने यह बात पुलिस को बताई तो पुलिस विभाग में हड़कंप मच गया. मामला एक अरबपति और रसूख वाले के अपहरण का था, इसलिए शक सीधे नक्सलियों पर गया, क्योंकि जिस तरह उन्होंने ‘लाल सलाम’ कहा था, वह नक्सलियों का प्रचलित शब्द था. प्रदेश के डीजीपी ए.एन. उपाध्याय सहित आला अधिकारियों ने तुरंत काररवाई के आदेश दिए. थाना पुलगांव में अपराध संख्या 643/2015 पर अभिषेक मिश्रा के अपहरण का मुकदमा दर्ज कर लिया गया.

आननफानन पुलिस की एक दर्जन टीमें गठित कर दी गईं. एसपी मयंक श्रीवास्तव, डीएसपी (क्राइम) कविलाश टंडन, एएसपी राजेश अग्रवाल के दिशानिर्देशन में ये टीमें जांच में जुट गईं. आईजी प्रदीप गुप्ता मामले की मौनीटरिंग कर रहे थे. इस कोशिश में पुलिस को रायपुरधमतरी के वीआईपी रोड से अभिषेक मिश्रा की कार लावारिस हालत में खड़ी मिल गई. पुलिस ने कार की तलाशी ली, लेकिन उस से कोई ऐसा सुराग नहीं मिला, जिस से पुलिस को जांच के लिए कोई दिशा मिल पाती.

भिलाई से रायपुर के बीच एक टौल नाका पुलिस चैकिंग पौइंट पड़ता है, वहां सीसीटीवी कैमरे लगे हैं. पुलिस ने उन की वीडियो फुटेज को खंगाली. 9 नवंबर की रात अभिषेक की स्कोडा कार कैमरे में कैद तो हुई थी, लेकिन तसवीर धुंधली थी, इसलिए यह पता लगाना मुश्किल था कि उस में कौन सवार था. फिरौती की काल धमतरी इलाके से की गई थी. धीरेधीरे एक सप्ताह बीत गया, लेकिन पुलिस किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकी. क्राइम ब्रांच के प्रभारी विशाल सून भी इस मामले की जांच में लगे थे. पुलिस ने अभिषेक के मोबाइल नंबर की लोकेशन और काल डिटेल्स निकलवाई.

मोबाइल की लोकेशन के अनुसार, अभिषेक शाम 5 बजे से रात 9 बज कर 40 मिनट तक भिलाई के विभिन्न इलाके में घूमते हुए रायपुर गए थे. वहां जा कर उन का मोबाइल बंद हो गया था. रास्ते से ही उन्होंने घर वालों को एसएमएस किए थे. अगले दिन उन का मोबाइल धमतरी इलाके में ही बंद हुआ था. वहीं से फोन कर के फिरौती मांगी गई थी. इस के बाद फोन फिर बंद हो गया था. इस के बाद अपहर्ताओं ने अभिषेक के घर वालों से कोई संपर्क नहीं किया था.

इस से अपहरण में नक्सलियों का हाथ होने की आशंका कम हो गई थी. इस की वजह भी थी. अमूमन नक्सली किसी को अपहृत कर के अपनी मांगों को पूरा करने के लिए उसे खूब प्रचारित करते हैं. लेकिन इस मामले में ऐसा कतई नहीं हुआ था. पुलिस ने मुखबिरों की भी मदद ली. उन से मिली जानकारी से साफ हो गया कि इस मामले में नक्सलियों का हाथ नहीं है. पुलिस जांच को भटकाने के लिए लाल सलाम कह कर मामले को नक्सलियों से जोड़ने की कोशिश की गई थी. अपहरण के बारे में जांच के लिए पुलिस ने अलगअलग राज्यों के अपहरण करने वाले कई गिरोहों से पूछताछ की. ऐसे अपराधियों से भी पूछताछ की गई, जो जेल में बंद थे. क्योंकि जेल में बंद कोई बड़ा अपराधी भी ऐसा करा सकता था.

पुलिस की कई टीमें दिनरात काम कर रही थीं. शहर में तरहतरह की चर्चाएं हो रहीं थीं. यह भी चर्चा चली थी कि अभिषेक के घर वालों ने अपहर्ताओं को 10 करोड़ की फिरौती की रकम दे दी है. लेकिन जब अभिषेक लौट कर नहीं आए, तो इस चर्चा पर खुद ही विराम लग गया. एक चर्चा यह भी चली थी कि अभिषेक को फिल्म निर्माण व टैनिस टीम के प्रायोजक बनने पर बड़ा घाटा हुआ था, इसलिए वह खुद ही भूमिगत हो गए हैं. पुलिस ने इन पर भी जांच की, लेकिन कोई सफलता नहीं मिली. संदेह के आधार पर पुलिस ने शंकराचार्य ग्रुप से जुड़े लोगों और उन के घर वालों से भी पूछताछ की, लेकिन इस का भी कोई नतीजा नहीं निकला. उन लोगों से भी पूछताछ की गई, जिन से 9 नवंबर को अभिषेक से बातें हुई थीं.

इन में एक किम्सी जैन भी थी. 9 नवंबर की शाम उस की भी अभिषेक से बात हुई थी. किम्सी भिलाई में ही चौहान टाउन के ब्लाक-जी स्थित अपौर्टमैंट के फ्लैट नंबर-18 में अपने पति विशाल जैन के साथ रहती थी. विशाल पेशे से इंजीनियर था और रोबोट्स के पार्ट्स बनाता था. किम्सी का विवाह एक साल पहले ही विशाल से हुआ था. उन का 2 महीने का एक बेटा था. यह रूटीन पूछताछ थी. इन में कोई भी संदिग्ध नहीं था.

किम्सी ने बताया था कि हौकी टीम की स्पौंसरशिप के सिलसिले में उस ने अभिषेक से बात की थी. वह और उस के पति दोनों ही अभिषेक को जानते थे. वह अभिषेक के इंस्टीट्यूट में बतौर प्रोफेसर नौकरी कर चुकी थी, जबकि विशाल भी शंकराचार्य गु्रप के इंजीनियरिंग कालेज में कंप्यूटर लगाने का काम कर चुका था. 18 नवंबर को बालौदा बाजार में एक युवक का शव मिला. इस से पुलिस की चिंता बढ़ गई. अपहर्ता चूंकि कोई संपर्क नहीं कर रहे थे और अभिषेक का कोई सुराग भी नहीं मिल रहा था, इसलिए आशंका हत्या की भी थी. पुलिस मौके पर पहुंची. उस ने अभिषेक के घर वालों को भी बुलाया, लेकिन राहत की बात यह रही कि यह लाश अभिषेक की नहीं थी.

अभिषेक के घर वालों को भी अनहोनी की आशंका थी, लेकिन उन की उम्मीदों में अभिषेक जिंदा थे. इस दौरान भिलाई समेत आसपास के जिलों में जो भी लाशें मिलीं, उन सभी की जांच की गई. अब तक 25 दिन हो गए थे, परंतु अभिषेक का कुछ पता नहीं चल सका था. पुलिस ने प्रेमप्रसंग के एंगल पर काम करते हुए कई लड़कियों और महिलाओं से पूछताछ की थी. इन में स्टाफ के लोग भी शामिल थे. यहां भी नतीजा शून्य ही रहा. मामले की गूंज सत्ता के गलियारों में भी थी. प्रदेश के मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ने पुलिस के बड़े अधिकारियों को अभिषेक की जल्द बरामदगी के निर्देश दिए थे. इस के बाद पुलिस की 35 टीमों का गठन कर के जांच में लगा दिया गया था.

लेकिन इस मामले की गुत्थी सुलझाने में पुलिस के पसीने छूट रहे थे. पुलिस की टीमें बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश, ओडिशा, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और आंध्र प्रदेश तक घूम आई थीं. वहां कईकई दिनों तक डेरा डाले रहीं, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला था. पुलिस जहां जीजान से लगी थी, वहीं मीडिया हर रोज पुलिस की नाकामी के किस्से छाप रही थी. जब पुलिस हर तरह से फेल होने लगी तो डीजीपी ने मीटिंग कर के इन्वैस्टीगेशन की समीक्षा की और नए सिरे से जांच के आदेश दिए.

अब तक अभिषेक को गायब हुए एक महीने से ज्यादा का वक्त बीत चुका था. इस के बाद पुलिस ने बड़ा साइबर औपरेशन चलाया. इस काम में प्रदेश के साइबर एक्सपर्ट के साथ बंगलुरु के विशेषज्ञों को भी लगाया गया. इस औपरेशन में पुलिस ने अभिषेक के मोबाइल की लोकेशन के साथ करीब एक करोड़ नंबर निकाले. इन सभी नंबरों की ट्रैकिंग की गई. यह बहुत ही मुश्किल काम था, लेकिन पुलिस ने उस में से करीब 15 सौ नंबरों को सर्विलांस पर लगाया.

पुलिस ने अभिषेक का पुराना काल डिटेल्स खंगाला तो उस में किम्सी का नंबर मिला. पता चला कि दोनों में अकसर बातें होती रहती थीं. इस से पुलिस को उस पर शक हुआ. पुलिस को याद आया कि उस से तो पहले भी पूछताछ हो चुकी है, क्योंकि 9 नवंबर को उस ने अभिषेक के फोन पर बात की थी. पुलिस ने एक बार फिर उस से पूछताछ की. इस बार भी उस ने वही सब बताया जो पहले बता चुकी थी. उस का कहना था कि वह उस के यहां नौकरी करती थी, इसलिए काम के सिलसिले में उस से बातें होती रहती थीं.

पुलिस ने उस के इंजीनियर पति विकास से भी पूछताछ की. इस पूछताछ में कोई ऐसी वजह सामने नहीं आई कि उन्हें हिरासत में लिया जाता. लेकिन पुलिस को उन के चेहरे पर आने वाले भावों से लग रहा था कि वे झूठ बोल रहे हैं. बिना सबूत के सच उगलवाने का पुलिस के पास कोई उपाय नहीं था. मामला इतना सुर्खियों में था कि छोटी सी भी गलती पर पुलिस खुद कठघरे में खड़ी हो सकती थी. वैसे भी पुलिस किसी से तब ही सच उगलवा पाती है, जब संदिग्ध के खिलाफ उस के पास कुछ पुख्ता सबूत हों. अब पुलिस की नजरें किम्सी और विकास पर जम गई थीं. शायद इसी वजह से पहले क्राइम ब्रांच में तैनात रहे तेजतर्रार एएसआई एस.एन. सिंह को विशेष तौर पर जांच में लगाया गया.

चोरीछिपे विकास की निगरानी शुरू की गई तो पाया गया कि ये लोग किसी से ज्यादा मतलब नहीं रखते. अभिषेक के मामले में क्या हो रहा है, इस पर लोगों से चर्चा जरूर करते रहते थे. पुलिस को किम्सी और विकास का मोबाइल नंबर मिल गया था. सर्विलांस से पता चला कि दोनों मोबाइल के जरिए एक खास नंबर के संपर्क में रहते थे. उस नंबर के बारे में पता किया गया तो वह नंबर विकास के चाचा अजीत का था. जांच से पता चला कि अजीत स्मृतिनगर स्थित एक पुराने बंगलेनुमा घर में बतौर किराएदार रहता है. विकास और किम्सी अकसर उस के यहां आतेजाते रहते थे. पुलिस को विकास के यहां अखबार डालने वाले हौकर से पता चला था कि इधर एक महीने से विकास कई अखबार ले रहा था.

इस से पुलिस को शक हुआ कि शायद वे अभिषेक के मामले में ज्यादा से ज्यादा जानकारी लेने के लिए ऐसा कर रहे हैं. पुलिस का संदेह और मजबूत हुआ. निगरानी बढ़ गई. जबकि विकास और किम्सी को पता ही नहीं था कि उन की निगरानी हो रही है. इसी बीच एक स्पैशल इन्वैस्टीगेशन टीम (एसआईटी) गठित कर दी गई, जिस में एसपी मयंक श्रीवास्तव, एएसपी (क्राइम) अजात बहादुर, जांजगीर चांपा के एएसपी विजय अग्रवाल, सीएसपी राजीव वर्मा, टीआई संजय सिंह, कलीम खान, थानाप्रभारी पी.के. साहू आदि को शामिल किया गया.

पुलिस ने विकास के मोबाइल की पूरी डिटेल्स हासिल कर ली. सर्विलांस टीम ने जब गहराई से उस का विश्लेषण किया तो हैरान रह गई, क्योंकि 9 नवंबर की शाम 5 बजे से रात साढ़े 9 बजे तक अभिषेक के मोबाइल की लोकेशन और उस के मोबाइल की लोकेशन एक साथ मूव कर रही थी.  इस तरह शक यकीन में बदल गया तो 22 दिसंबर की रात पुलिस ने विकास और उस के चाचा अजीत को पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया. पुलिस ने दोनों से पूछताछ शुरू की तो विकास ने कहा कि वह 9 नवंबर को अपने काम से कई स्थानों पर घूमने गया था.

‘‘ऐसा भी क्या काम था, जो तुम रायपुर तक घूमने गए थे?’’ एक पुलिस अधिकारी ने पूछा तो उस ने कहा, ‘‘मुझे वहां काम था.’’

पुलिस को लगा कि यह चालाक और शातिर है. तब पुलिस ने उसे फंसाने के लिए सवालों का जाल बुन कर उस पर सख्ती की तो वह गुमसुम हो गया. तब पुलिस ने कहा, ‘‘कुछ बताओगे या हमें कुछ और भी करना होगा?’’

‘‘अभिषेक को हम ने मार दिया है.’’ विकास ने एकदम से सच उगल दिया.

‘‘क्या?’’

‘‘जी सर, हमारे पास उस से पीछा छुड़ाने का और दूसरा कोई रास्ता नहीं था. वह मेरी पत्नी को परेशान कर रहा था.’’

सच जान कर पुलिस हैरान रह गई. पुलिस अब अभिषेक का शव बरामद करना चाहती थी. शुरुआती पूछताछ में उन्होंने बताया था कि अभिषेक की लाश स्मृतिनगर स्थित अजीत के घर के बगीचे में दबा कर ऊपर से सब्जियां लगा दी गई हैं. अगली सुबह अभिषेक की हत्या की खबर जंगल में लगी आग की तरह फैल गई. मिश्रा परिवार में तो कोहराम मच गया. विकास और अजीत को भारी पुलिस की मौजूदगी में स्मृतिनगर ले जाया गया, जहां उन के बताए स्थान पर खुदाई कराई गई. फोरैंसिक टीम को भी मौके पर बुलवा लिया गया था.

पुलिस की गाडि़यां देख कर अजीत के घर के सामने सैकड़ों लोगों की भीड़ लग गई थी. करीब 6 फुट गहरा गड्ढा खोदने पर जहां बहुत सारा नमक बिखरा मिला, वहीं एक बोरे और प्लास्टिक की पौलीथिन में अभिषेक का शव बरामद हुआ. शव बुरी तरह से सड़ चुका था. घटना की जानकारी होने पर पूरे शहर में सनसनी फैल गई. घर वालों ने शव की शिनाख्त कर दी. इस के बाद पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. पुलिस पूछताछ में विकास ने बताया था कि हत्या में किम्सी भी शामिल थी. उस समय वह नौकरी की तलाश में दिल्ली गई हुई थी, इसलिए उस की गिरफ्तारी के लिए हवाई मार्ग से तुरंत एक टीम दिल्ली के लिए रवाना कर दी गई. दिल्ली पुलिस की मदद से छत्तीसगढ़ पुलिस किम्सी को गिरफ्तार कर के भिलाई ले आई.

इस के बाद पुलिस के आला अधिकारियों ने तीनों से पूछताछ की तो अभिषेक हत्याकांड मामले में सनसनीखेज खुलासे और फूलप्रूफ योजना से हर कोई हैरत में पड़ गया. किसी ने नहीं सोचा था कि एक बड़े रसूख वाले आदमी के कत्ल का खुलासा ऐसा होगा कि हर कोई हैरान रह जाएगा. पूछताछ में जो कहानी सामने आई, वह वाकई चौंकाने वाली थी. मासूम सी दिखने वाली किम्सी अभिषेक के कत्ल की वजह बनी थी. आईजी प्रदीप गुप्ता ने प्रेस कौन्फ्रैंस कर के हत्याकांड का खुलासा किया.

दरअसल, विवाह के बाद से ही विकास महसूस करने लगा था कि किम्सी गुमसुम और परेशान रहती है. बेटे के जन्म के बाद उस की इस आदत में और भी इजाफा हुआ. विकास इंजीनियर और तेजतर्रार आदमी था. आखिर एक दिन उस ने उस से पूछ ही लिया, ‘‘किम्सी, मैं देख रहा हूं कि जब से तुम्हारी शादी हुई है, तभी से तुम कुछ परेशान सी रहती हो, आखिर बात क्या है?’’

‘‘कुछ नहीं.’’

‘‘कुछ है, तभी तो मैं पूछ रहा हूं. बताओ न क्या बात है?’’ विकास ने किम्सी का चेहरा दोनों हथेलियों के बीच ले कर प्यार से पूछा तो उस की आंखें भर आईं.

विवेक ने किम्सी को आश्वस्त करते हुए कहा, ‘‘बताओ क्या बात है?’’

कुछ पल की खामोशी के बाद किम्सी ने कहा, ‘‘मुझे ब्लैकमेल किया जा रहा है विकास.’’

‘‘क…क…क्या…?’’

‘‘हां विवेक, मैं अपनी जिंदगी से परेशान हो चुकी हूं.’’

‘‘कौन ब्लैकमेल कर रहा है तुम्हें?’’

‘‘बताती हूं, लेकिन पहले तुम्हें एक वादा करना होगा.’’

‘‘क्या?’’

‘‘तुम मुझ से नाराज नहीं होओगे. मुझ से जो हुआ, वह मेरी मजबूरी थी विकास. मैं तुम से बहुत प्यार करती हूं और तुम्हें खोना नहीं चाहती.’’

विकास ने विश्वास दिलाया तो किम्सी ने उसे जो कुछ बताया, उसे सुन कर विकास के रौंगटे खड़े हो गए. किम्सी ने जो बताया था, उस के अनुसार वह इंस्टीट्यूट में नौकरी के दौरान अभिषेक के संपर्क में आई. अभिषेक चूंकि डायरेक्टर थे, इसलिए वह उसे काम के बहाने अपने पास बुला लिया करते थे. उस के प्रति उन का व्यवहार मधुर होता गया. बातचीत के दौरान हंसीमजाक भी कर लिया करते. शुरू में तो किम्सी को लगा कि उन की आदत ही ऐसी होगी, लेकिन धीरेधीरे उस की समझ में आ गया कि अभिषेक उस की तरफ आकर्षित हैं.

एक दिन उन्होंने एक फाइल ले कर किम्सी को अपने औफिस में बुलाया. जरूरी बातें समझाने के बाद उन्होंने चाय का औफर किया तो वह मना नहीं कर सकी. चाय पीते हुए अभिषेक ने किम्सी के चेहरे को पढ़ते हुए कहा, ‘‘मुझे तुम से एक जरूरी बात कहनी थी किम्सी.’’

‘‘क्या सर?’’

‘‘किम्सी मैं तुम्हें बहुत लाइक करता हूं.’’

‘‘व्हाट सर, लेकिन…’’ वह सकपका गई.

‘‘किम्सी, दुनिया की इस भीड़ में ऐसे बहुत कम लोग होते हैं, जिन्हें हम दिल से पसंद करते हैं. डौंटमाइंड किम्सी, मैं विश्वास का रिश्ता चाहता हूं.’’

किम्सी को झटका तो लगा, लेकिन एक तरफ उसे यह खुशी भी हुई कि कोई इतनी बड़ी हस्ती उसे पसंद करता है. नौकरी, कमजोरी और उम्र के नाजुक बहाव में अभिषेक को नाखुश करना उसे अपने बूते से बाहर लगा, इसलिए जवाब में उस ने मुसकरा दिया. उस दिन के बाद उन के बीच का रिश्ता बदल गया. यह सन 2014 की बात थी. एक दौर ऐसा भी आया, जब रिश्ता मर्यादाओं को लांघ गया. समय अपनी गति से चलता रहा. उन के रिश्ते कई महीने इसी तरह अनवरत चलते रहे. उसी बीच किम्सी का रिश्ता विकास के साथ तय हो गया. बाद में विकास के साथ विवाह हो गया तो किम्सी ने इंस्टीट्यूट की नौकरी को अलविदा कह दिया.  विवाह के बाद किम्सी ने अभिषेक के साथ के अपने रिश्ते को वक्ती गलती मान कर खुद को

बदल लिया. उस ने अभिषेक को नजरअंदाज करना शुरू कर दिया. उस का यह रुख अभिषेक को नागवार गुजरा. एक दिन दोनों की मुलाकात हुई तो किम्सी ने कहा, ‘‘हमारे बीच जो हुआ, वह वक्ती था सर. अब मैं शादीशुदा हूं, इसलिए मैं अपने हसबैंड को धोखा नहीं देना चाहती.’’

‘‘तो ठीक है, मेरे पास तुम्हारे बहुत से राज हैं, मैं उन्हें दफन कर दूंगा, लेकिन बाद में, अभी नहीं. मेरी भी मजबूरी है. किम्सी, मैं तुम्हें इतनी जल्दी आजाद नहीं कर सकता.’’

यह सुन कर किम्सी के होश उड़ गए. अभिषेक के रसूख के सामने वह कुछ भी नहीं थी. किम्सी दबाव में आ गई. इस के बाद वह अभिषेक की मरजी का शिकार होती रही. किम्सी एक बच्चे की मां भी बन गई, लेकिन अभिषेक पीछा छोड़ने को तैयार नहीं था. किम्सी ने कई बार मना किया, लेकिन अभिषेक पर कोई असर नहीं हो रहा था. किम्सी कोई अच्छी नौकरी कर के कैरियर बनाना चाहती थी. परिवार और कैरियर के बीच अभिषेक से रिश्तों का तालमेल बनाए रखना उस के लिए मुश्किल हो रहा था.

वह घुटघुट कर जीने लगी. उस की परेशानियां उस के चेहरे पर साफ दिखाई देती थीं, जिस की वजह से विकास ने पकड़ लिया. किम्सी के मुंह से अभिषेक की करतूत सुन कर एकबारगी विकास को अपने कानों पर भरोसा नहीं हुआ. वह गुस्से में बोला, ‘‘तुम ने यह बात मुझ से पहले क्यों नहीं बताई?’’

‘‘मुझे डर लगता था विकास.’’

उस रात विकास को नींद नहीं आई. लेकिन उस ने तय कर लिया कि किसी भी तरह वह किम्सी को इस मुसीबत से छुटकारा दिला कर रहेगा. अगले दिन विकास किम्सी को ले कर अपने चाचा अजीत के पास गया. विकास और किम्सी ने उन्हें सारी बातें बताईं तो उन्हें भी गुस्सा आ गया. उन्होंने किम्सी से पूछा, ‘‘तुम ने उसे समझाया नहीं?’’

‘‘मैं उस से बहुत मिन्नतें कर चुकी हूं चाचा, लेकिन वह मेरा पीछा छोड़ने को तैयार नहीं है. कहता है कि अगर मैं ने उस की बात नहीं मानी तो वह मुझे बरबाद कर देगा,’’ किम्सी ने रोते हुए कहा, ‘‘मन तो करता है कि मैं मर जाऊं, जिस से हमेशा के लिए उस से पीछा छूट जाए.’’

किम्सी की बातों से विकास और अजीत तिलमिला कर रह गए. विकास गुस्से में बोला, ‘‘तुम्हें मरने की क्या जरूरत है, मरने का काम तो उस ने किया है.’’

उन्होंने इस मामले पर काफी विचार किया. वे जानते थे कि अभिषेक रसूख वाला आदमी है. उस से सीधे टकराना कतई ठीक नहीं है. ऐसा करने पर वह किसी रूप में उन्हीं को नुकसान पहुंचा सकता है. लेकिन वे उस से छुटकारा भी पाना चाहते थे, इसलिए सब कुछ योजना बना कर ढंग से करना चाहते थे. विकास, अजीत और किम्सी ने तय किया कि अभिषेक की हत्या कर के वे इस राज को हमेशा के लिए दफन कर देंगे. इस के लिए बड़ी योजना की जरूरत थी. उस दिन के बाद तीनों ने इस मुद्दे पर विचार करना शुरू कर दिया. बदले की आग में झुलस रहे विकास को अजय देवगन की फिल्म ‘दृश्यम’ याद आई. इस फिल्म की कहानी उसे खुद से जुड़ी लग रही थी.

तेजतर्रार विकास ने भी कुछ वैसा ही करने की सोची. इस के लिए तीनों ने कई बार दृश्यम फिल्म देख कर उस की बारीकियों को समझा और तय कर लिया कि वे इसी कहानी को दोहरा कर पुलिस को गुमराह कर देंगे. उन्होंने योजना बना डाली कि कैसे और क्या करना है. फूलप्रूफ योजना तैयार कर के सब से पहले विकास ने मजदूरों को ला कर चाचा अजीत के यहां बगीचे में करीब छह फुट गहरा गड्ढा खुदवा डाला. मजदूरों ने गड्ढा खुदवाने की वजह पूछी तो विकास ने कहा कि वह भूकंप को ले कर कोई प्रयोग करना चाहता है. इस के बाद नमक के दर्जनों पैकेट ला कर अजीत के घर में रख दिए गए.

योजना के अनुसार, 9 नवंबर की शाम किम्सी ने अभिषेक को फोन कर के कहा कि उस के पास हौकी टीम की स्पौंसरशिप के लिए एक बड़ी पार्टी है, उस पर वह उस से चर्चा करना चाहती है. उसी के साथ उस ने यह भी कह दिया कि वह अपने फ्लैट में अकेली है तो अभिषेक बिना कुछ सोचेसमझे खुशीखुशी उस के यहां आने को तैयार हो गए.

विकास और अजीत भी वहीं मौजूद थे. तीनों उन के आने का इंतजार करने लगे. कुछ ही देर में वह किम्सी के बताए फ्लैट में पहुंच गए. किम्सी ने मुसकराते हुए उन का स्वागत किया. अभिषेक खुश थे कि किम्सी अभी भी उन के करीब रहना चाहती है. किम्सी ने उन्हें बातों में लगा लिया तो विकास ने पीछे से उन के सिर पर रौड से वार कर दिया. चोट लगते ही अभिषेक गिर गए. इस के बाद भी कई वार किए गए.

जब उन्हें भरोसा हो गया कि अभिषेक की मौत हो चुकी है तो विकास ने तुरंत अभिषेक के मोबाइल का स्विच औफ कर दिया. पहले से जो तय था, उसी के अनुसार तीनों ने मिल कर अभिषेक के हाथपैर बांध कर लाश को एक बड़ी पौलीथिन में रख कर उसे टेप से बंद कर एक बोरी में भर दिया. किम्सी फ्लैट पर ही रही, जबकि विकास ने अभिषेक का मोबाइल औन किया और उन की कार भिलाई के कई क्षेत्रों में घुमा कर रायपुर के वीआईपी रोड पर ले जा कर छोड़ दिया. अपनी गंध मिटाने के लिए उस ने कार में शराब छिड़क दी. रास्ते में टौल नाका था, वहां सीसीटीवी कैमरा लगा था. यह बात उसे पता थी. उस ने अन्य कारों के साथ कार को इस एंगल से निकाला था कि उस की तसवीर ठीक से कैमरे में कैद नहीं हो सकी थी.

इस बीच विकास ने अभिषेक के मोबाइल को चालू रखा और उस से आई.पी. मिश्रा और जया को मैसेज करता रहा, ताकि उन्हें संदेह न हो और पुलिस भी उलझ कर रह जाए. कार को वीआईपी रोड पर छोड़ कर विकास अजीत के साथ मोटरसाइकिल से लगभग रात 10 बजे वापस आ गया. अजीत मोटरसाइकिल से उस के साथ गया था. रात में विकास ने अपनी क्वांटों कार निकाली और लाश की बोरी को उसी में रख कर करीब डेढ़ किलोमीटर दूर स्मृतिनगर पहुंच गया. बोरी गड्ढे में डाल कर लाश को गलाने के लिए उस पर नमक डाल दिया. इस के बाद गड्ढे को बंद कर दिया. जिस रौड से हत्या की थी, उसे छिपा दिया. इस के बाद राहत की सांस लेते हुए विकास ने कहा, ‘‘जो हुआ है, उसे सब लोग भूल जाओ.’’

‘‘लेकिन भूलना इतना आसान नहीं है.’’ किम्सी ने चिंतित हो कर कहा तो विकास ने उसे समझाया, ‘‘पागल मत बनो. मेरा वादा है कि पुलिस कभी हम तक नहीं पहुंच पाएगी और अगर आती भी है तो हमें ऐसे रिएक्ट करना है, जैसे कुछ हुआ ही नहीं है.’’

‘‘ठीक है.’’

किम्सी और विकास अपने फ्लैट पर आ गए. इस के बाद वे ऐसे रहने लगे, जैसे कुछ हुआ ही नहीं था. योजना के अनुसार विकास ने धमतरी जा कर फिरौती के लिए फोन कर के जांच नक्सलियों की ओर भटका दी. इस के बाद वापसी में उस ने अभिषेक के मोबाइल को एक नदी में फेंक दिया. अभिषेक की हत्या के मामले की जांच पुलिस किस दिशा में कर रही है, इस पर उन्होंने पूरी नजर बनाए रखी.

पुलिस ने पहली बार किम्सी से पूछताछ की तो उस ने बेहद मासूमियत से साफसाफ जवाब दे कर पुलिस को उलझा दिया. पुलिस जांच की ज्यादा से ज्यादा जानकारी के लिए उन्होंने कई अखबार लगा लिए. अभिषेक के अपहरण को ले कर पुलिस भटक रही थी. यह खबर पढ़ कर तीनों खुश थे. इस बीच उन्होंने जिस गड्ढे में अभिषेक को दफनाया था, उस के ऊपर फूलगोभी के पौधे लगा दिए. बाद में संदेह के आधार पर किम्सी और विकास से पूछताछ की गई तो इस बार भी वे पुलिस को चकमा देने में कामयाब रहे. इस बीच नौकरी की तलाश में किम्सी दिल्ली चली गई. अलबत्ता वह विकास से हालात की जानकारी लेती रहती थी. लेकिन आगे की जांच में जो स्थितियां बनीं, उस से तीनों पुलिस के शिकंजे में आ गए.

पूछताछ के बाद उन की निशानदेही पर पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त रौड, अभिषेक की घड़ी और कपड़े आदि बरामद कर लिए. विस्तृत पूछताछ के बाद पुलिस ने सभी आरोपियों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक उन की जमानतें नहीं हो सकी थीं. पुलिस आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट तैयार कर रही थी. दूसरी ओर शव पुराना होने की वजह से पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत की सही वजह स्पष्ट नहीं हो सकी.मौत की सही वजह का पता लगाने के लिए पु च के लिए प्रयोगशाला भेज दिया है.Chhattisgarh News

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Suspense Story: बेवफाई का दर्द

Suspense Story: धनदौलत, सुखसुविधाओं के अलावा औरत की और भी जरूरतें होती हैं. मर्चेंट नेवी में इंजीनियर धु्रवकांत ठाकुर अपनी  विवाहिता सुष्मिता की उन्हीं जरूरतों को पूरी नहीं  कर पा रहा था. इस का अंजाम इतना भयानक निकला कि…

9 दिसंबर, 2015 की सुबह के 6 बजे महाराष्ट्र के जिला रायगढ़ की तहसील पनवेल, नवी मुंबई के थाना मानसरोवर कामोठे के सीनियर इंसपेक्टर श्रीराम मल्लेमवार को किसी ने फोन द्वारा सूचना दी कि सेक्टर-19 की वेदांत दृष्टि सोसायटी की दूसरी मंजिल पर फ्लैट नंबर 201 में एक हादसा हो गया है, जिस में 3 लोग मारे गए हैं. तीनों लाशें फ्लैट में पड़ी हैं. सूचना गंभीर थी. श्रीराम मल्लेमवार तत्काल अपने साथ सहायक पुलिस इंसपेक्टर चंद्रशेखर भोइर, सबइंसपेक्टर जनार्दन पार्टे, हैडकांस्टेबल मोहन मुलीक, सुनील होलार, दिलीप मिनमिणे और रवि गर्जे को ले कर घटनास्थल पर जा पहुंचे.

सुबहसुबह सोसायटी में पुलिस देख कर सुरक्षागार्डों से ले कर वहां रहने वाले तक इस आशंका से घिर गए कि यहां ऐसा क्या हो गया कि पुलिस को आना पड़ा. देखते ही देखते पूरी सोसायटी के लोग इकट्ठा हो गए. पुलिस ने फ्लैट नंबर 201 के अंदर जाने से पहले उस में रहने वालों के बारे में पूछा तो पता चला कि उस में मर्चेंट नेवी में काम करने वाले इंजीनियर धु्रवकांत ठाकुर अपनी पत्नी सुष्मिता ठाकुर के साथ रहते थे. इसे उन्होंने एक साल पहले ही 10 हजार रुपए महीने के किराए पर लिया था.

धु्रवकांत नौकरी की वजह से अधिकतर बाहर ही रहते थे, इसलिए उन की पत्नी सुष्मिता ठाकुर यहां अकेली ही रहती थीं. साल भर में धु्रवकांत को एकदो बार ही देखा गया है. जबकि उन के एक दोस्त अजय सिंह को अकसर उन के यहां देखा गया है. करीब एक सप्ताह से वह सुष्मिता के साथ ही रह रहा था. कल रात ही धु्रवकांत अपने फ्लैट पर आए थे. सोसायटी के सुरक्षागार्डों से पूछताछ कर के श्रीराम मल्लेमवार ने यह जानकारी अपने वरिष्ठ अधिकारियों को दी और सहयोगियों के साथ फ्लैट नंबर 201 के सामने जा पहुंचे. फ्लैट का दरवाजा अंदर से बंद था. दरवाजा तोड़ कर वह अंदर दाखिल हुए तो उन्हें जो सूचना दी गई थी, वह सच साबित हुई.

सामने के हाल में फर्श पर एक युवक की खून से लथपथ लाश पड़ी थी. उस के शरीर से निकला खून फर्श पर फैला हुआ था. उस के शरीर और गले पर किसी तेजधार वाले चाकू के कई गहरे घाव थे. हाल के सामने वाले बैडरूम में एक युवा और खूबसूरत महिला की लाश पड़ी थी. उस के शरीर पर किसी तरह का कोई घाव नहीं था. उस के नाकमुंह पर एक तकिया पड़ा था, इस का मतलब उस की हत्या उसी तकिए से मुंहनाक दबा कर की गई थी. उसी कमरे में एक कोने में एक युवक बेहोश पड़ा था, जिस के गले में एक टूटी हुई टाई बंधी थी, पास ही एक छोटा सा टेबल गिरा पड़ा था, टाई का आधा हिस्सा छत में लगे पंखे से बंधा था. इस से श्रीराम मल्लेमवार ने अंदाजा लगाया कि इस ने आत्महत्या की कोशिश की होगी. लेकिन टाई के टूट जाने की वजह से वह उस में सफल नहीं हुआ.

श्रीराम मल्लेमवार ने तुरंत उसे अस्पताल भिजवाया. गार्डों और पड़ोसियों ने उस की शिनाख्त धु्रवकांत ठाकुर के रूप में की. मृतका सुष्मिता ठाकुर थी और मृतक उस का दोस्त अजय सिंह था. श्रीराम मल्लेमवार घटनास्थल और लाशों का निरीक्षण कर रहे थे कि नवी मुंबई के पुलिस कमिश्नर प्रभात रंजन, एडीशनल पुलिस कमिश्नर विश्वास पाढरे, असिस्टैंट पुलिस कमिश्नर शेषराव सूर्यवंशी भी आ गए थे. अधिकारियों के साथ ही प्रैस फोटोग्राफर, डौग स्क्वायड और फिंगरप्रिंट ब्यूरो की टीम भी आई थी. इन लोगों का काम खत्म हो गया तो वरिष्ठ अधिकारियों ने भी घटनास्थल का निरीक्षण किया. इस के बाद वे इस मामले की जांच की जिम्मेदारी श्रीराम मल्लेमवार को सौंप कर चले गए.

श्रीराम मल्लेमवार ने सहायकों की मदद से घटनास्थल की औपचारिकताएं निभा कर दोनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए ग्रामीण अस्पताल भिजवा दिया. घटनास्थल की स्थिति, 2 लोगों की हत्या और एक के आत्महत्या करने की कोशिश से ही पुलिस समझ गई थी कि यह अवैध संबंधों का मामला है. लेकिन पूरी सच्चाई तो तभी सामने आ सकती थी, जब बेहोश पड़े धु्रवकांत को होश आ जाता. लेकिन जब पुलिस ने उन के फ्लैट की तलाशी ली तो वहां पुलिस को एक सुसाइड नोट मिला, जिसे धु्रवकांत ने अपनी बहन रंजना झा के नाम लिखा था.

उस सुसाइड नोट को पढ़ने के बाद हत्याओं और आत्महत्या का कुछ रहस्य तो उजागर हो गया, जो रहस्य बाकी बचा था, वह धु्रवकांत के होश में आने के बाद दिए गए उन के बयान से उजागर हो गया. यह सचमुच अवैध संबंधों में की गई हत्याओं का मामला था. यह पूरी कहानी कुछ इस तरह थी. 29 वर्षीय धु्रवकांत ठाकुर बिहार के जिला मुजफ्फरपुर के थाना कस्बा मडि़यारपुर के रहने वाले विमलकांत ठाकुर के दूसरे नंबर के बेटे थे. विमलकांत के पास खेती की ठीकठाक जमीन थी, इसलिए उन के यहां किसी चीज की कमी नहीं थी. उन के परिवार में पत्नी के अलावा 2 बेटे तथा एक बेटी रंजना थी.

बड़ा बेटा पढ़लिख कर बाप के साथ खेती करने लगा तो उन्होंने उस की शादी कर दी. उस के बाद रंजना की भी शादी कर दी. वह नवी मुंबई के एटौली में पति के साथ रहती थी. धु्रवकांत सब से छोटा था. उस ने विज्ञान विषय से पढ़ाई की थी, इसलिए एयरफोर्स या नेवी की नौकरी करना चाहता था. गांव में रह कर वह अपने मकसद में कामयाब नहीं हो सकता था, इसलिए बहन के पास मुंबई आ गया और सपनों की तलाश में जुट गया.

आखिर धु्रवकांत का सपना साकार हुआ. उस ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और मर्चेंट नेवी में भरती हो गया. उसे चैंबूर गोवड़ी की जीएसएम साईं कमर्शियल कंपनी में नौकरी मिल गई थी. उसे अच्छी तनख्वाह तो मिलती ही थी, विदेश घूमने का भी मौका मिल रहा था. अब उस का ज्यादा समय विदशों में ही बीतता था. नौकरी लगने के बाद वह स्थाई रूप से मुंबई में ही बसने के बारे में सोचने लगा था. नौकरी लगते ही घर वालों को उस की शादी की चिंता सताने लगी थी. विमलकांत बेटे के विवाह के लिए जैसे ही तैयार हुए, उन के यहां रिश्तों की लाइन लग गई. उन रिश्तों में उन्होंने अपने ही जिले की तहसील महुआ के रहने वाले चंद्रमोहन ठाकुर की सुंदरसुशिक्षित बेटी सुष्मिता को पसंद कर लिया.

धु्रवकांत ने भी सुष्मिता को देखा. उन्हें भी सुष्मिता पसंद आ गई तो मई, 2010 में धु्रवकांत और सुष्मिता की शादी धूमधाम के साथ हो गई. शादी के बाद धु्रवकांत सुष्मिता को मांबाप के पास छोड़ना चाहता था, लेकिन सुष्मिता इस के लिए तैयार नहीं हुई. मजबूरन उसे पत्नी को मुंबई लाना पड़ा.

मुंबई आने के बाद धु्रवकांत मात्र एक सप्ताह पत्नी के साथ रहा. उस के बाद पत्नी को बहन के पास छोड़ कर अपनी नौकरी पर चला गया. नईनवेली दुलहन सुष्मिता का दिन तो किसी तरह बीत जाता था, लेकिन रातें उस के लिए पहाड़ सी बन जाती थीं. लगभग 6 महीने बाद धु्रवकांत विदेश से वापस आया तो सुष्मिता शिकायतों का पिटारा ले कर उस के सामने बैठ गई. सुष्मिता की शिकायतें वाजिब थीं, क्योंकि एक औरत को शादी के बाद जो चाहिए, वह उन्हें पूरी नहीं कर सका था. लेकिन उस की भी मजबूरी थी. लिहाजा पत्नी को समझाबुझा कर और आश्वासन दे कर चुप करा दिया.

कुछ दिनों पत्नी के साथ रह कर धु्रवकांत फिर नौकरी पर चला गया. लेकिन इस बार वह लौटा तो घर का माहौल काफी बदला हुआ था. इस बार सुष्मिता ने उस की बहन रंजना के साथ रहने से साफ मना कर दिया. इस की वजह यह थी कि उन दोनों के बीच काफी मनमुटाव हो गया था. पत्नी की बात मानना धु्रवकांत की मजबूरी थी, इसलिए सुष्मिता के कहने पर उस ने बहन से अलग रहने का फैसला कर लिया और सुष्मिता के रहने की व्यवस्था जुईनगर के एक वूमंस हौस्टल में कर दी. सुष्मिता को किसी तरह की कोई तकलीफ न हो और उस का मन बहलता रहे, इस के लिए उस ने घर में कंप्यूटरइंटरनेट की भी व्यवस्था कर दी.

यही नहीं, सुष्मिता का समय व्यतीत करने के लिए उस ने उस का दाखिला एमजीएम अस्पताल में औपरेशन थिएटर में तकनीकी सहायक के कोर्स में करा दिया. लेकिन सुष्मिता जिस उम्र में थी, वह उम्र नदी में आई बाढ़ की तरह होती है. अगर बांध मजबूत न हुआ तो वह उसे तोड़ कर बह निकलने में देर नहीं लगाती. सुष्मिता ने भी कुछ ऐसा ही किया. भले ही मन बहलाने की सारी सुविधाएं मौजूद थीं, लेकिन पति से अलग रह कर वह खुश नहीं थी.

धीरेधीरे उस की शादी को 3 साल हो गए थे. अब तक न तो उस के तन की प्यास बुझी थी और न ही उसे मातृत्व सुख मिला था, जिस की चाहत हर औरत को होती है.

यह सब सोच कर जब कभी वह बेचैन होती तो सोशल मीडिया का सहारा लेती. धु्रवकांत से वह घंटों चैटिंग करती. फेसबुक पर भी उस के दोस्तों की लंबी सूची थी. उन्हीं दोस्तों में एक था अजय सिंह, जिस के सामने उस की नजरों में धु्रवकांत की तसवीर फीकी पड़ गई थी. सुष्मिता ने अजय की प्रोफाइल खोल कर देखी तो मजबूत कदकाठी का स्मार्ट दिखने वाला अजय उसी के जिले का रहने वाला निकला. वह दुबई की एक बैंक में नौकरी करता था. उस का फोटो और प्रोफाइल देख कर सुष्मिता उस की ओर आकर्षित हो गई. उस ने उस की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाया तो उस ने दोस्ती स्वीकार कर ली.

दिसंबर, 2014 में अजय भारत आया तो मुंबई के मैकडोनाल्ड में दोनों की मुलाकात हुई. इस मुलाकात में अजय के बातव्यवहार से वह उस पर मर मिटी. अजय अविवाहित था. उसे भी सुष्मिता इतनी भायी कि उस ने इस बात पर ध्यान ही नहीं दिया कि वह विवाहित है. दोनों का मिलनाजुलना शुरू हुआ तो मर्यादा की दीवार टूटते देर नहीं लगी. इस पर सुष्मिता को कोई पछतावा भी नहीं हुआ. इस की वजह शायद यह थी कि अजय की बांहों में उसे जो सुख और सुकून मिला था, धु्रवकांत की बांहों में उसे कभी नहीं मिला था.

इस के बाद धु्रवकांत छुट्टी पर मुंबई आया तो किसी वजह से हौस्टल बंद हो गया. इस के बाद उस ने कामोठे की वेदांत दृष्टि सोसायटी में किराए का फ्लैट ले कर सुष्मिता को उस में शिफ्ट कर दिया. यहीं पर सुष्मिता ने अजय सिंह को अपने पति धु्रवकांत से मिलवाया. धु्रवकांत भी अजय की बातों और स्वभाव से काफी प्रभावित हुआ, इसलिए उस ने भी उस से दोस्ती कर ली.

लेकिन इस बार धु्रवकांत ने सुष्मिता के व्यवहार में काफी बदलाव महसूस किया. यह बदलाव उस ने जाने के बाद भी महसूस किया. पहले सुष्मिता उस से इंटरनेट पर घंटों चैटिंग करती रहती थी, फोन पर प्यार से बातें करती थी, अब वह उसे फोन ही नहीं करती थी. वह जब भी उसे फोन करता, उस का फोन बिजी रहता. फोन उठाती भी तो सीधे मुंह बात नहीं करती थी. नेट पर चैटिंग तो एकदम से बंद कर दी थी. इस से उसे काफी तकलीफ होती थी.

जब कभी धु्रवकांत शिकायत करता तो वह टाल देती. आखिर उसे चिंता ही किस बात की थी. उस की जिंदगी में तो कोई और धु्रव आ गया था. धु्रवकांत 6-7 महीने में आता था, जबकि सुष्मिता अजय सिंह को जब भी याद करती थी, वह 2 घंटे में उस के पास पहुंच जाता था. हौस्टल में सुष्मिता किसी पुरुष को साथ नहीं रख सकती थी, जबकि फ्लैट में तो कोई रोकनेटोकने वाला नहीं था. अजय सिंह का जब मन होता, वह उस के यहां रुक भी जाता था.

सुष्मिता क्यों बदल गई है, जब इस बात की जानकारी धु्रवकांत को हुई तो वह सन्न रह गया. वह सुष्मिता को बहुत प्यार करता था. वह तुरंत मुंबई आया और सुष्मिता को समझाने की कोशिश की. लेकिन अब सुष्मिता कहां समझने वाली थी. उस ने प्रेमी के लिए पति से झगड़ा ही नहीं कर लिया, बल्कि उसे छोड़ने को भी तैयार हो गई. धु्रवकांत ने सारी बातें सासससुर को बता कर सुष्मिता को समझाने को कहा तो उन लोगों ने उस की बात पर जरा भी ध्यान नहीं दिया. शायद सुष्मिता ने अपने मातापिता को सारी बात बता कर पहले ही अपने पक्ष में कर लिया था. इसी वजह से वे भी बेटी की बेवफाई पर चुप थे.

धु्रवकांत सुष्मिता को समझाबुझा कर अपनी ड्यूटी पर चला गया. लेकिन सुष्मिता मर्यादा में आने के बजाय और बाहर चली गई. उस ने अजय से शादी करने का फैसला कर लिया. इस से मुंबई से ले कर गांव तक धु्रवकांत की बदनामी हो रही थी. बदनामी उस से सहन नहीं हो पा रही थी. लेकिन वह कुछ कर पाने की स्थिति में भी नहीं था. वह एक मर्द था, अपनी पत्नी को दूसरे मर्द की बांहों में कैसे देख सकता था. उस के यारदोस्त भी उस की हंसी उड़ाते थे कि वह अपनी पत्नी को संभाल नहीं पाया. इस से वह और परेशान रहता था कि सुष्मिता को वह अजय के चंगुल से कैसे मुक्त कराए. वह इसी सोच में डूबा था कि सुष्मिता ने उस से जो कहा, उस से वह बेचैन हो उठा.

उस समय धु्रवकांत का जहाज फ्रांस के बंदरगाह पर था. सुष्मिता ने उसे फोन कर के कहा कि वह 2 दिनों में मुंबई पहुंचे और उसे तलाक दे. अब वह उस के साथ नहीं रहना चाहती. वह अजय से शादी कर के उस के साथ गृहस्थी बसाना चाहती है. धु्रवकांत ने उसे समझाना चाहा तो वह गुस्से में बोली, ‘‘तुम्हीं बताओ, मैं ऐसा क्यों न करूं? आज तक तुम ने मुझे दिया ही क्या है? हर औरत मां बनना चाहती है. तुम आज तक मुझे मां नहीं बना सके. आखिर मैं तुम से क्या उम्मीद करूं? औरत को धनदौलत की उतनी चाह नहीं होती, जितनी पति और बच्चों की होती है. जब उसे ये चीजें पति से नहीं मिलतीं, तभी वह भटक जाती है. शादी के बाद तुम ने मेरे साथ कितने दिन और रातें गुजारी हैं, इसे अंगुलियों पर गिन कर बताया जा सकता है.’’

‘‘सुष्मिता, मैं तुम्हारे दर्द को अच्छी तरह समझता हूं. लेकिन क्या करूं, मेरी भी मजबूरी है. मेरी नौकरी ही ऐसी है कि मैं चाह कर भी तुम्हारे साथ ज्यादा दिन नहीं रह सकता. जल्दी ही सब ठीक हो जाएगा.’’ धु्रवकांत ने सुष्मिता को समझाते हुए कहा. इस के बाद वह फ्लाइट पकड़ कर सीधे मुंबई आ गया. 8 दिसंबर, 2015 की रात 12 बजे जब वह अपने फ्लैट पर पहुंचा तो दरवाजे पर ताला लगा था. सुष्मिता घर पर नहीं थी. गार्डों से पूछने पर पता चला कि वह 8 दिन पहले फ्लैट पर आए अजय सिंह के साथ कहीं बाहर गई है.

इस जानकारी के बाद धु्रवकांत अपना गुस्सा पी कर फ्लैट पर पहुंचा और अपनी चाबी से फ्लैट का दरवाजा खोल कर अंदर आया और हाल में बैठ कर सुष्मिता का इंतजार करने लगा. रात एक बजे जिस हालत में सुष्मिता अजय सिंह के साथ आई, वह सब देख कर धु्रवकांत का खून खौल उठा. सुष्मिता काफी कम कपड़ों में अजय की कमर में बांहें डाले अंदर आई थी. पत्नी को किसी गैर की बांहों में इस तरह देखना बरदाश्त के बाहर की बात थी. फ्लैट के अंदर रोशनी में बैठे धु्रवकांत को देख कर एक पल के लिए तो उन के चेहरे का रंग उड़ गया था, लेकिन अगले ही पल दोनों संभल गए. सुष्मिता ने बेरुखी से पूछा, ‘‘अरे, तुम कब आए?’’

पत्नी की बेरुखी से धुंवकांत का चेहरा लाल हो उठा. उस ने भी उसी की भाषा में कहा, ‘‘मैं कब आया, यह छोड़ो. पहले तुम यह बताओ कि इतनी रात गए तुम पराए मर्द के साथ कहां से आ रही हो?’’ इस के बाद अजय की ओर इशारा कर के बोला, ‘‘इसे तुरंत यहां से बाहर करो.’’

‘‘यह तो कहीं नहीं जाएंगे, अगर जाना ही है तो तुम चले जाओ.’’ सुष्मिता ने अजय का पक्ष लेते हुए कहा, ‘‘हम दोनों कल मंदिर में शादी करने वाले हैं. इस के लिए मैं ने सारा इंतजाम कर लिया है.’’ इतना कह कर सुष्मिता अजय सिंह का हाथ पकड़ कर बैडरूम में चली गई.

सुष्मिता की इन बातों और हरकत से धु्रवकांत का कलेजा छलनी हो गया. उस की आंखों में खून के आंसू आ गए. उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि जिसे वह अपनी जान से भी ज्यादा प्यार करता था, एक दिन वह उस के साथ इस तरह का व्यवहार करेगी. सुष्मिता और अजय सिंह तो सो गए, जबकि धु्रवकांत को नींद नहीं आ रही थी. सुबह 5 बजे तक वह हाल के सोफे पर ही बैठा रहा. उस की आंखों के सामने सुष्मिता के साथ शादी से ले कर अब तक के बिताए पल चलचित्र की तरह घूम रहे थे. सुष्मिता ने जो किया था, कोई भी होता उसे नफरत हो जाती. अजय ने भी उस के साथ विश्वासघात किया था.

विश्वास, नफरत और हिकारत की आंधी ने धु्रवकांत की बुद्धि को भ्रष्ट कर दिया. उस ने तुरंत एक भयानक फैसला कर लिया और किचन में जा कर सब्जी काटने वाला चाकू उठा लाया. चाकू ले कर वह बैडरूम पहुंचा और बातें करने के बहाने सुष्मिता के साथ गहरी नींद में सोए अजय सिंह को जगा कर हाल में ले आया. हाल में आते ही नींद में डूबे अजय का मुंह पकड़ कर उस ने उस पर हमला कर दिया. उस ने उसे तभी छोड़ा, जब तक वह मर नहीं गया. इस के बाद वह सुष्मिता के पास पहुंचा और उस से संबंध बनाने की इच्छा जताई. लेकिन उसे खून में नहाया देख कर सुष्मिता के होश उड़ गए. वह बैड से उठ कर भागी, लेकिन धु्रवकांत उसे दबोच कर उस के सीने पर सवार हो गया.

सुष्मिता ने विरोध तो बहुत किया, लेकिन धु्रवकांत ने तकिया उस के चेहरे पर रख कर दबा दिया. वह तकिए को तब तक दबाए रहा, जब तक वह मर नहीं गई. दोनों की हत्या कर धु्रवकांत ने अपना लैटरपैड उठाया और अपनी बहन रंजना के नाम एक पत्र लिखा, जिस में उस ने अपनी पत्नी सुष्मिता की बेवफाई और अजय सिंह के विश्वासघात का जिक्र करते हुए अपनी आत्महत्या के बारे में बताया कि वह सुष्मिता से बहुत प्यार करता था. वह उस का खून नहीं देख सकता था, इसलिए उस ने उस पर चाकू से वार नहीं किया. उस ने उस की हत्या तकिए से की. सुष्मिता और उस का प्रेमी अजय सिंह अब इस दुनिया में नहीं हैं. अब वह भी जीना नहीं चाहता, इसलिए वह भी आत्महत्या कर रहा है.

सुसाइड नोट लिखने के बाद धु्रवकांत ने थाना पुलिस को फोन कर के घटना की सूचना दी. उस का सोचना था कि जब तक पुलिस उस के फ्लैट पर पहुंचेगी, तब तक वह भी मर चुका होगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. संयोग से वह बच गया. उस ने जिस टाई से आत्महत्या करने की कोशिश की थी, वह काफी कमजोर थी. इसलिए उस के लटकते ही वह टूट गई. लेकिन टाई गले में कस गई थी, जिस से वह फर्श पर गिर कर बेहोश हो गया.

श्रीराम मल्लेमवार के दिशानिर्देश में असिस्टैंट इंसपेक्टर चंद्रशेखर भोइर ने जांच पूरी कर के इस मामले को अपराध संख्या 234/2015 पर भादंवि की धारा 302, 164 के तहत दर्ज कर 1 जनवरी, 2016 को धु्रवकांत ठाकुर को अदालत में पेश किया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक वह जेल में था. Suspense Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Hindi Stories: अधूरी औरत

Hindi Stories: मेरी तो जान ही निकल गई. हथेलियों में पसीना आने लगा. यह वही औरत थी, जिसे मैं ने पहली रात हवेली के पिछली तरफ शीशम के पेड़ के नीचे बैठी देखा था…

स्वा स्थ्य विभाग ने मेरी बदली नसीरपुर कर दी. मुझे पता चला कि 3 घंटे का सफर बस से, और आगे एक घंटा तांगे से जाना होगा. मैं ने अपने आने की खबर भिजवा दी और कोई 2 बजे के करीब बस में सवार हो गया. मेरा खयाल था कि शाम तक गांव पहुंच जाऊंगा, मगर यह सब गलत हो गया. जिस बस में मैं सवार था, वह इतनी भरी हुई थी कि बाद में चढ़ने वाले लोगों को खड़े होने की भी मुश्किल से जगह मिली थी.

बरसात का मौसम था. मैं ने किताब निकाली और पढ़ने लगा. किताब में मैं इस कदर खोया था कि मुझे पता ही नहीं चला कि बस कहांकहां रुकी. जब बस एक जगह अचानक झटके खाने के बाद रुक गई तो मुसाफिरों में खलबली सी मची और शोर होने लगा. तब मैं ने चौंक कर पूछा कि क्या मामला है? मालूम हुआ कि बस में खराबी आ गई है. क्लीनर खराब हुए पुर्जे को ठीक कराने के लिए वापस 6 मील ले जाएगा. मुसाफिरों में काफी बेदिली फैली, मगर अब इंतजार के सिवा कोई चारा नहीं था. मुसाफिर बस से उतर कर इधरउधर टहलने लगे. मैं भी वक्त गुजारने के लिए इधरउधर घूमता रहा.

क्लीनर साहब की वापसी रात 9 बजे के करीब हुई और 10 बजे के करीब बस ने दोबारा सफर शुरू किया. जब बस बसअड्डे पर पहुंची तो वहां कोई तांगा मौजूद नहीं था. अब मेरे पास कस्बे तक पैदल मार्च करने के अलावा और कोई चारा नहीं था. मैं ने सामान कंधे पर डाला और पैदल ही चल पड़ा. अब तक देर इतनी हो गई थी कि बारबार यह खयाल आ रहा था कि कहीं चौकीदार क्लीनिक में इंतजार कर के चला न गया हो. उस वक्त मौसम अचानक खुशगवार हो गया था. ठंडी हवा चलने लगी, कभीकभी बिजली भी चमक उठती. बारिश किसी भी वक्त शुरू हो सकती थी.

मैं तेजतेज कदम उठाने लगा. जैसे ही कस्बा नजर आया, बूंदाबांदी शुरू हो गई. क्लीनिक कस्बे से बाहर पक्की इमारत में था. मैं तकरीबन दौड़ता हुआ क्लीनिक पहुंचा, मगर वही हुआ, जिस का डर था. चौकीदार इंतजार कर के जा चुका था. शायद उसे अब मेरे आने की उम्मीद नहीं रही होगी. मैं बरामदे में खड़ा हो कर सोचने लगा. थोड़े फासले पर एक हवेली नजर आई. बाकी मकान ज्यादातर कच्चे थे. अब तक बारिश काफी तेज हो गई थी. इस तरह बरामदे में खड़े हो कर रात गुजारना मुश्किल था. मैं ने सोचा, क्यों न हवेली में रात बिताई जाए.

मैं बारिश में भीगता हुआ हवेली पर जा पहुंचा और जोरजोर से गेट खटखटाने लगा. काफी देर तक किसी ने गेट नहीं खोला. दरअसल गेट से काफी आगे जा कर कमरे थे. इसलिए शायद आवाज उन तक नहीं पहुंच रही थी. मैं बारिश में भीग गया था. मैं हवेली के पीछे चला गया. वहां जानवर बंधे थे. मैं उन के बीच से गुजरता हुआ आगे बढ़ने लगा. अचानक मेरी नजर एक औरत पर पड़ी. वह अर्धनग्न अवस्था में शीशम के पेड़ के नीचे बैठी थी. आंखें उस ने बंद कर रखी थीं और होंठों ही होंठों में कुछ बुदबुदा रही थी. औरत जवान और खूबसूरत थी. मैं ने फौरन अपनी निगाहें फेर लीं और वापस हो लिया.

मैं सख्त हैरान था कि आधी रात के वक्त वह दरख्त के नीचे क्या कर रही थी. भूतप्रेत पर मुझे यकीन नहीं था. उस वक्त मैं ने मुनासिब नहीं समझा कि आगे बढ़ कर उस औरत से कुछ पूछूं. मैं वापस क्लीनिक पर आ गया. वह रात मैं ने बरामदे में बैठ कर बिता दी. इस बीच मेरे दिमाग पर उस औरत के बारे में जानने का भूत सवार हो गया. गांव नसीरपुर की जिंदगी किसी ऐसे गरम मकान में रहने की तरह थी, जिस की दीवारें नजर नहीं आतीं. ऐसा महसूस होता था, जैसे वह हुकूमत की भूलीबिसरी बस्ती हो. गांव बुनियादी सुविधाओं से वंचित था. मच्छर इस कदर थे कि चाहे कितनी भी मात्रा में कुनैन का इस्तेमाल क्यों न कर लो, बुखार जरूर हो जाता था. बुखार भी ऐसा, जो आदमी की सारी ताकत खत्म कर देता था.

शुरू में इक्कादुक्का मरीज बुखार की शिकायत ले कर आते रहे. क्योंकि ज्यादातर लोग डाक्टरी इलाज को मानते ही नहीं थे. इसी दौरान गांव की मसजिद के मौलवी साहब बहुत सख्त बीमार हो गए. उन की टांग पर एक पुराना जख्म था, जिस की वजह से उन्हें बुखार रहने लगा. सब लोग जहरबाद समझते रहे. मैं ने मौलवी साहब का इलाज किया. पहले एक छोटा सा औपरेशन किया, फिर इंजेक्शन लगाने शुरू कर दिए. मौलवी साहब की सेहत बहाल होने लगी. गांव से हो कर मेरी चर्चा आसपास के गांवों तक जा फैली तो दूरदूर से लोग आने लगे. इस से पहले गांव वालों का इलाज काका करता था.

काका गांव का नाई था. वह जर्राह भी था. यह सब कुछ उस ने अपने बाप से सीखा था. जर्राह से ज्यादा वह मुझे मालिशिया लगता था, क्योंकि वह ज्यादातर लोगों का इलाज मालिश से किया करता था. सिरदर्द में सिर की मालिश, पेट के दर्द में भी वह मरीज को लिटा कर तेल से पेट की मालिश करता था. चोट की हालत में भी मालिश करता. गांव वालों के इसरार पर उस ने दांत भी उखाड़ने शुरू कर दिए थे. जब 2-3 आदमियों के दांत उस ने गलत उखाड़ दिए तो मैं ने उस को जा कर समझाया कि अब बस कर दे.

एक वक्त में इतने ज्यादा काम तो शहर के डाक्टर भी नहीं करते. वहां भी अब हर बीमारी का स्पैशलिस्ट होता है. यही बड़े डाक्टर की पहचान है. उस ने दांत का डाक्टर बनने का खयाल छोड़ दिया और सिर्फ हड्डियों और जर्राही का स्पैशलिस्ट बनने पर संतोष कर लिया. उस गांव के चौधरी मलिक अल्लाहबख्श थे. गांव वालों का कहना था कि वह बहुत नेक इंसान थे. उस गांव के लोग ही नहीं, आसपास के गांव वाले भी उन की बड़ी इज्जत करते थे. उन की उम्र कोई 70 बरस के करीब थी. अब वह अक्सर बीमार रहते थे. 1-2 बार इलाज के सिलसिले में मुझे उन की खिदमत में हाजिर होना पड़ा था. वह मेरी बड़ी इज्जत करते थे. कभीकभी वैसे भी गपशप के लिए हवेली में बुला लेते थे.

हवेली में उन के बेटे से भी मुलाकात हुई. उस का नाम था मलिक असद. वह 30-35 बरस का मजबूत कदकाठी का आदमी था. उस के बाल घुंघराले और आंखें स्याह थीं. रंग सांवला था. चेहरा सख्त था. वह तबीयत का भी बड़ा जालिम था. मैं ने खुद उसे 1-2 बार हवेली में मजदूरों की पिटाई करते देखा था. गांव के लोग उस से डरते थे और उसे बुरा कहते थे. एक दिन बड़े चौधरी साहब ने बुला भेजा. नौकर ने मुझे एक बड़े से कमरे में ले जा कर बिठाया. उस कमरे में बहुत सी कुर्सियां और मोढ़े रखे थे. जब भी गांव का कोई मसला खड़ा होता, चौधरी वहीं सब को इकट्ठा करते थे. चौधरी साहब आए और बेंत से बनी आरामकुर्सी पर बैठ गए.

थोड़ी देर वह कुछ सोचते रहे, फिर बड़ी राजदारी से बोले, ‘‘डाक्टर पुत्तर, मेरी बहू बीमार है. अजीब सी बीमारी है. उसे कुछ पता नहीं चलता. कभी तो वह बिलकुल ठीक होती है, कभी वह पूरापूरा दिन कमरे में सोई पड़ी रहती है. जब जागती है तो सब से झगड़ने लगती है. मैं उस की वजह से बहुत परेशान हूं. मेरा दिल कहता है, तुम उस का इलाज कर सकते हो.’’

‘‘चौधरी साहब, आप अल्लाह पर भरोसा रखें. मैं अपनी ओर से पूरी कोशिश करूंगा. आप मुझे मरीज दिखाएं.’’

मैं वाकई दिल से बड़े चौधरी की इज्जत करता था. चौधरी साहब मुझे पहली बार हवेली के अंदर ले गए. वह एक बैडरूम था. कमरे में एक दीवान और 2-3 कुर्सियां पड़ी थीं. एक बैड था, जिस पर एक औरत लेटी थी. जैसे ही चौधरी साहब ने उसे सीधी किया, मेरी तो जान ही निकल गई. हथेलियों में पसीना आने लगा. यह वही औरत थी, जिसे मैं ने पहली रात हवेली के पिछवाड़े पेड़ के नीचे देखा था. मैं ने अपने आप पर काबू पाया और सोचने लगा कि यह औरत चौधरी की बहू है यानी मलिक असद की बीवी है. यह उस रात क्या कर रही थी? मेरी दिलचस्पी, जाहिर है, अपनी चिंता को पहुंच गई थी.

औरत बेसुध पड़ी थी. मैं ने और चौधरी साहब ने उसे जगाने की पूरी कोशिश की, मगर वह नहीं जागी. जाहिर तौर पर उसे कोई बीमारी नजर नहीं आ रही थी. बुखार भी नहीं था. मैं ने सुई चुभो कर देखी तो वह तकलीफ महसूस कर रही थी. ब्लडप्रेशर कुछ कम था, मगर उस की सूजी हुई आंखें मुझे शक में डाल रही थीं. मैं ने उस के खून का नमूना ले कर चौधरी साहब से कहा, ‘‘आप फिक्र न करें. मैं खून टेस्ट करने के बाद ही आप को बता सकूंगा कि इन्हें क्या तकलीफ है. आप इस दौरान इन्हें कोई दवा न दें. खास ध्यान रखें कि यह कोई भी चीज न खाएं. सुबह इन को क्लीनिक भेज दें, तब तक ब्लड टेस्ट की रिपोर्ट मेरे सामने होगी.’’

चौधरी साहब की हवेली से निकलने के बाद मेरे जेहन में यही बात बारबार आ रही थी कि यह औरत नशा जरूर करती है. मैं ने क्लीनिक आते ही खून टेस्ट करना शुरू कर दिया, क्योंकि मैं खुद उस गुत्थी को सुलझाना चाहता था. खून की रिपोर्ट से जाहिर हो गया कि चौधरी की बहू को नशे की लत पड़ चुकी थी. यह जान कर मुझे खुद भी अफसोस होने लगा. बहरहाल मैं खुद को कल के लिए तैयार कर चुका था. अगले दिन मैं शाम तक इंतजार करता रहा, मगर चौधरी की बहू क्लीनिक पर नहीं आई. इस का मतलब साफ था कि वह खुद आना नहीं चाहती थी और उसे अपनी इस आदत के जाहिर होने का अंदेशा था. लेकिन उस नशे से वह मौत के मुंह में जा सकती थी.

शाम को मैं चौधरी साहब से मिलने गया. उन्हें बताया कि मरीजा क्लीनिक पर नहीं आई तो वह बहुत हैरान हुए. उन्होंने नौकरानी को बुला कर बुराभला कहा और फिर खुद जा कर बहू को लिवा लाए. उस वक्त वह बहुत अच्छे कपड़े पहने हुए थी. उस के रखरखाव में एक खास शान थी. उस की बड़ीबड़ी आंखें मेरे चेहरे पर जमी हुई थीं, जिन में एक खास किस्म की वहशत और गुस्सा था. उस के खुश्क होंठ एकदूसरे से जुडे़ थे. वह अपने चेहरे पर आई जुल्फों की लट सिर के झटके से बारबार पीछे की तरफ लौटाती रही. वह खामोश बैठी रही, जैसे किसी से बात करना ही न चाहती हो.

मैं ने जरा हौसले के साथ उस खामोशी को तोड़ते हुए कहा, ‘‘अब आप की तबीयत कैसी है?’’

उस ने अपनी पलकें उठाईं और मेरी तरफ देखा. मैं आज तक उन आंखों को नहीं भूल सका. उस की आंखों में एक अजीब सी मस्ती थी, जैसे इंद्रधनुष आंखों में उतर आया हो. उस ने बड़ी अदा से कहा, ‘‘मेरी तबीयत पहले से बेहतर हो रही है. मुझे किसी दवा की जरूरत नहीं.’’

यह कह कर वह उठी और तेजी के साथ दरवाजे से बाहर निकल गई. मैं ने हैरत से चौधरी साहब की तरफ देखा. वह भी मेरी तरफ देख रहे थे. उन के चेहरे पर गुस्से और शर्मिंदगी के आसार साफ नजर आ रहे थे. मैं चूंकि सूरतेहाल को समझने लगा था, इसलिए मैं ने चौधरी साहब से कहा, ‘‘आप की बहू को कोई घरेलू परेशानी है. है तो यह आप के घर का मसला, लेकिन डाक्टर के लिए यह सब जानना बहुत जरूरी होता है. आप जब तक मुझे सब कुछ बताएंगे नहीं, मेरे लिए उन का इलाज करना मुश्किल हो जाएगा.’’

पहले तो चौधरी साहब परेशान नजर आने लगे. जोरजोर से हुक्का गुड़गुड़ाते रहे, जैसे किसी फैसले पर पहुंच रहे हों. फिर उन्होंने आहिस्ताआहिस्ता कहना शुरू किया, ‘‘मेरी बहू दरअसल बांझ है. 5 साल शादी को हो गए हैं, मगर औलाद नहीं हुई. बेचारी बड़ी परेशान रहती है. जब से मलिक असद की दूसरी शादी की तैयारी की बात सुनी है, बहुत चिड़चिड़ी हो गई है. बातबात पर लड़तीझगड़ती है. कमरा बंद कर के दिन भर पड़ी रहती है.’’

‘‘चौधरी साहब, आप की बहू कोई दवा इस्तेमाल कर रही है, जो अगर जल्दी बंद न की गई तो बहुत देर हो जाएगी. इस से उस की जिंदगी को भी खतरा हो सकता है. आप पता कराएं कि वह क्या चीज खा रही है. घर के किसी न किसी शख्स को तो पता ही होगा. आखिर वह दवा या कोई और चीज कहीं से तो खरीदी जाती है.’’

मेरी बात सुन कर चौधरी साहब ने जोरजोर से ‘रज्जो…रज्जो…’ पुकारना शुरू कर दिया. एक लड़की भागीभागी दरवाजे से दाखिल हुई. रज्जो चौधरी साहब की नौकरानी का नाम था. वह घबराई हुई चौधरी साहब को देखने लगी. मैं ने उसे संभलने का मौका दिए बगैर जोर से कहा, ‘‘रज्जो, जो दवा तुम बीबीजी को ला कर देती हो, वह शीशी ले कर आओ.’’

वह बौखला कर बोली, ‘‘जी…नहीं, मैं नहीं ला कर देती. वह खुद मेरे साथ जा कर मलंग बाबा से लाती हैं. कसम कुरान की, मलंग बाबा पुडि़या पर दम कर के बीबी जी को देते हैं.’’

मेरा चलाया हुआ तीर निशाने पर सीधा जा लगा था. मैं ने नरम पड़ते हुए कहा, ‘‘जाओ, एक पुडि़या ला कर मुझे दिखाओ. खबरदार, बीबीजी को पता न लगे.’’

रज्जो ने चौधरी साहब की तरफ देखा. चौधरी साहब ने इशारा किया तो वह चली गई. कोई एक घंटे बाद रज्जो ने हमें वह पुडि़या लाकर दी. मैं उस पुडि़या को ले कर क्लीनिक आ गया. वह अफीम की पुडि़या थी. उस से साफ जाहिर था कि मलंग बाबा कोई धोखेबाज था और चौधरी की बहू को नशे की आदी बना रहा था. मैं उसी वक्त हवेली वापस आया, क्योंकि मलंग बाबा का अड्डा बंद कराना न सिर्फ नेकी का काम था, बल्कि लोगों को मौत के मुंह से निकालना भी था.

चौधरी साहब को जैसे ही सूरतेहाल मालूम हुई, उन्होंने तांगे का बंदोबस्त किया और हम पुलिस चौकी चल दिए. पुलिस चौकी कस्बे से 3 मील के फासले पर थी. चौकी का इंचार्ज चौधरी से परिचित था. उसे हालात बताए गए तो उस ने फौरन एक छापामार पार्टी के साथ रात को मलंग बाबा के अड्डे पर धावा बोल दिया.  मलंग बाबा और उस के 2 नौजवान साथी गिरफ्तार हुए. उन के अड्डे से अफीम बरामद हुई. अगले दिन पुलिस से पता चला कि मलंग बाबा जेल से भागा हुआ फरार कैदी था. एक साल से वह भेष बदल कर यह धंधा कर रहा था. गांव के लोगों को ताबीज के बहाने अफीम दे कर बेवकूफ बना रहा था. चौधरी की बहू से तो वह खूब रकम हथिया रहा था.

जैसे ही चौधरी की बहू की अफीम की खुराक बंद हुई, उस का सारा बदन टूटने लगा. बुखार में जिस्म तपने लगा. उस की आंखों में खौफ छा गया. वह मेरे पांव पड़ती कि मैं उस को अफीम दे दूं या मौत का टीका लगा दूं. उस के शरीर की दुर्दशा देख कर और बुखार की तपिश को कम करने के लिए मैं कभीकभी उसे नींद का इंजेक्शन लगा देता, मगर जब वह जागती तो फिर वैसे ही तड़पने लगती. मैं ने और बड़े चौधरी साहब ने कई रातें उस के बिस्तर के पास बैठ कर गुजार दीं. इस बीच मैं ने देखा कि चौधरी का बेटा मलिक असद न तो उस की परवाह करता था और न ही उस के पास ठहरता था. यह मेरे लिए बड़ी हैरत की बात थी.

मेरे दिल में उस के लिए नफरत के जज्बात उभरने लगे. उन दिनों चौधरी साहब तख्तपोश पर बैठे रहते और मैं मरीजा के सिरहाने बेबस हो कर बैठा रहता. मेरे हाथ चौधरी साहब ने वैसे ही बांध रखे थे. मैं उसे अस्पताल नहीं ले जा सकता था, जहां उसे बचाने की कोशिश की जाती. मैं बाहर से किसी मदद का इंतजाम भी नहीं कर सकता था, क्योंकि यह चौधरी की इज्जत का मामला था. मैं सिर्फ अपनी जानकारी के मुताबिक इलाज करता रहा, मगर शायद अल्लाह ने चौधरी साहब की दुआएं सुन ली थीं. 10 दिनों के बाद उन की बहू की हालत में तब्दीली आनी शुरू हो गई. वह संभलने लगी. अब वह न तो जिद करती और न ही उठउठ कर भागती और न शोर मचाती. उसे सुकून आना शुरू हो गया.

अब उस ने मेरी तरफ बड़ी एहसानमंद निगाहों से देखना शुरू कर दिया. उस की हालत को पूरी तरह संभलने में 3 महीने लग गए. इस दौरान मैं हर रात चौधरी साहब की हवेली में जाता रहा. मैं ने महसूस किया कि छोटा चौधरी कईकई दिनों और रातों को घर से गायब रहता था. एक दिन मैं अपने क्लीनिक में मरीजों से फारिग हुआ ही था कि चौधरी साहब की बहू अपनी नौकरानी के साथ क्लीनिक में तशरीफ ले आई. पहले तो वह कुछ देर खामोश बैठी रही, फिर कहने लगी, ‘‘डाक्टर साहब, आपने मुझे दोबारा जिंदगी दी है, लेकिन आप ने ऐसा क्यों किया? मैं तो खुद अपनी जिंदगी खत्म करना चाहती थी. आप ने मुझे बचा कर मेरे दुख के सफर को और लंबा कर दिया. मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि आप को अपना मसीहा कहूं या दुश्मन?’’

मिसेज मलिक असद की बातें सुन कर पहले तो मैं एक लम्हे के लिए चुप रह गया. लेकिन मैं ने बाद में हौसला बढ़ाते हुए कहा, ‘‘मिसेज मलिक, मेरा कोई कमाल नहीं. कुदरत को यही मंजूर था. अल्लाह ने आप को दोबारा जिंदगी दी है. वही इस के भेद जानता है. वैसे आप इतनी मायूस क्यों हैं?’’

मिसेज मलिक ने मेरी तरफ देख कर कहा, ‘‘डाक्टर साहब, आप ने मुझे मौत के मुंह से निकाला है तो मैं आप को बताना चाहती हूं कि कई बार आदमी उन हालात से दोचार हो जाता है, जहां आगे कोई रास्ता नहीं होता. वह जीना नहीं चाहता. मैं किस के लिए जीऊं? आप को पता है कि औरत मां बन कर ही पूरी औरत बनती है.’’

मैं चाहता था कि वह अपने दिल का दर्द खुल कर कह दे. एक तो उस के अंदर का गुबार निकल जाएगा, दूसरे शयद इस मामले में मैं कोई मदद कर सकूं. मैं ने बात बढ़ाते हुए कहा, ‘‘आप बताएं आप को क्या दुख है? अल्लाह ने आप को सेहत बख्शी है तो आप की दूसरी तकलीफें भी रफा कर देगा.’’

मेरी बातों का यह असर हुआ कि उस ने बिलखबिलख कर रोना शुरू कर दिया. फिर कहने लगी, ‘‘डाक्टर साहब, आज से 5 साल पहले बडे़ चौधरी साहब ने बड़े अरमानों से मुझे अपनी बहू बनाया था. मगर आज सोचती हूं कि काश, मेरी शादी न हुई होती. एक साल तो हंसीखुशी से गुजर गया, लेकिन उस के बाद मुझे अपने आप से नफरत होने लगी. चौधरी के तमाम रिश्तेदार और गांव के तमाम लोगों की नजरें मुझे तीर की तरह चुभने लगीं.

‘‘जो लोग मेरे आगेपीछे फिरते थे, वही मुझे ताना देने लगे कि मैं बांझ हूं. पहले छोटा चौधरी, फिर घर वाले और जब बड़े चौधरी ने भी आंखें फेर लीं तो मुझे अपने आप से नफरत होने लगी. मैं ने कोई पीरफकीर न छोड़ा. दूरदूर तक तावीज करवाए, मगर मेरे यहां बच्चा न हुआ.

‘‘फिर उस मलंग बाबा ने मुझे अफीम पर लगा दिया. मुझे भी नशे में रहना अच्छा लगने लगा. अब आप ने मुझ से वह भी छीन लिया. खुदा के लिए मुझे जहर ही दे दें. अगले माह छोटे चौधरी की दूसरी शादी होने वाली है. मैं इस से पहले अपने आप को खत्म करना चाहती हूं. अब आप खुद बताएं, मैं आप को हमदर्द कहूं या दुश्मन?’’

चौधरी की बहू की बातें सुन कर मेरे दिल में भी उस के बारे में हमदर्दी के जज्बात उभरने लगे. अगर खुदा ने उस को औलाद की दौलत नहीं दी तो इस में उस बेचारी का क्या कसूर? इस के बावजूद मैं ने उस का हौसला बढ़ाते हुए कहा, ‘‘आप मायूस क्यों होती हैं? अल्लाह बड़ा कारसाज है. आप ने इस सिलसिले में कोई इलाज करवाया है? अब तो जमाना बहुत तरक्की कर गया है. आप शहर जा कर इलाज करवाएं. सब ठीक हो जाएगा इंशाअल्लाह.’’

मेरी बातें सुन कर मिसेज मलिक ने बड़ी उदासी से कहा, ‘‘डाक्टर साहब, अब क्या फायदा? अब तो उस के दिन भी तय होने वाले हैं.’’

‘‘आप ऐसा करें कि शहर में एक तजुर्बेकार लेडी डाक्टर मेरी परिचित हैं. आप उन से जांच करवाएं और रिपोर्ट मुझे ला कर दें. आप इस काम के लिए फौरन, बल्कि कल ही शहर चली जाएं.’’

पहले तो मिसेज मलिक टालमटोल से काम लेती रहीं, मगर मेरे मजबूर करने पर उन्होंने वादा कर लिया.

तीसरे दिन मिसेज मलिक बड़ी खुशखुश मेरे क्लीनिक में आईं और लिफाफा मेरे हाथ में दे कर कहा, ‘‘डाक्टर साहब, अब बताएं कि मैं क्या करूं?’’

मैं ने लिफाफा खोला और रिपोर्ट पढ़ने लगा. साथसाथ मेरी हैरत में इजाफा होता चला गया, क्योंकि रिपोर्ट में डाक्टर ने लिखा था कि मिसेज मलिक में किसी किस्म का कोई नुक्स नहीं है. अगर औलाद नहीं हो रही है तो उन के शौहर की जांच करवाई जाए. इस रिपोर्ट को पढ़ने के बाद हम दोनों एकदूसरे की तरफ हैरत से देख रहे थे. मिसेज मलिक की आंखों में आंसू थे और मैं सोचने लगा था कि यह औरत नासमझी में अपने आप को कितनी बड़ी सजा दे रही थी, बल्कि अपनी जान तक देने पर तैयार थी. मैं ने मिसेज मलिक को तसल्ली दी.

अगले दिन मैं हवेली गया. मैं छोटे चौधरी से तनहाई में बात करना चाहता था, मगर पता चला कि वह हवेली में मौजूद नहीं था. मैं पैगाम दे कर लौट आया कि जब छोटे चौधरी आएं तो मुझे खबर भेज दें.

रात को छोटे चौधरी से मुलाकात हुई. मैं ने बड़ी नरमी से बातचीत करते हुए कहा, ‘‘चौधरी साहब, आप के यहां औलाद नहीं हुई. आप को इस बारे में पता है कि इस की क्या वजह है?’’

यह सुनते ही चौधरी के तेवर बदलने लगे. उस के चेहरे की लकीरें गहरी होने लगीं और वह बड़े गुस्से से बोला, ‘‘डाक्टर, मुझे पता है, मेरी बीवी बांझ है. तुम्हें फिक्र करने की जरूरत नहीं. यह हमारा निजी मामला है.’’

‘‘नहीं चौधरी साहब, आप को यही तो गलतफहमी है. आप की बीवी बिलकुल ठीक है. वह बच्चा पैदा करने की पूरी खूबी रखती है. आप को अपना इलाज करवाना होगा.’’

मेरे यह कहने की देर थी कि चौधरी आगबबूला हो गया, ‘‘डाक्टर, यह बात अब दोबारा नहीं कहना, नहीं तो तुम्हारी लाश किसी को नहीं मिलेगी. और दित्तू, डाक्टर को हवेली से बाहर निकाल दे.’’

इस से पहले कि मैं कुछ कहता, 2 आदमियों ने मुझे बांहों से घसीट कर हवेली से बाहर कर दिया. मैं चौधरी की बेवकूफी पर अफसोस करता हुआ क्लीनिक वापस आ गया. सारी रात मुझे नींद नहीं आई. मैं सोचता रहा कि ये लोग कितने बेवकूफ हैं. इन के भले की बात भी इन को बुरी लगती है. अगले दिन मैं ने मिसेज असद मलिक से उन लोगों का पता पूछा, जहां चौधरी असद मलिक की शादी हो रही थी. वह कस्बा नसीरपुर गांव से 15 मील दूर था. लड़की का वालिद नंबरदार था. उम्र 60 साल थी. बीवी की मौत हो गई थी. 1 बेटी और 2 बेटों की शादी हो गई थी. सिर्फ 1 ही बेटी रह गई थी. मैं ने नंबरदार यूसुफ को अपना परिचय दिया तो वह बड़ी भलमनसाहत से पेश आया.

मैं ने नंबरदार से अर्ज की, ‘‘आप की बेटी की शादी मलिक असद से तय हो गई है और जल्दी ही शादी भी होने वाली है. आप की जानकारी में यह बात भी जरूर होगी कि चूंकि मलिक असद की पहली बीवी से औलाद नहीं है, इसीलिए वह दूसरी शादी कर रहे हैं. मगर मैं डाक्टर होने के नाते अपना फर्ज समझता हूं कि आप को सच्चाई से आगाह कर दूं. मलिक असद की बीवी बांझ नहीं है. वह पूरी तरह सेहतमंद है और औलाद पैदा करने के काबिल है. मेरे पास इस का सबूत मौजूद है. अगर आप इस बात को बुनियाद बना कर शादी कर रहे हैं तो अपनी बेटी की जिंदगी में कांटे बो रहे हैं. आप मेरी बात समझ गए होंगे. मैं ने अपना फर्ज अदा कर दिया है. अब आप जैसा मुनासिब समझें, फैसला करें.’’

मेरी बातें सुन कर नंबरदार परेशान हो गया. काफी देर चुपाचाप हुक्का पीता रहा. फिर बोला, ‘‘डाक्टर साहब, आप के कहने का मतलब है कि मलिक असद ही औलाद पैदा करने के काबिल नहीं है?’’

‘‘मेरा मतलब है कि मलिक असद को इलाज की जरूरत है. अगर वह इलाज करवा ले तो उस की पहली बीवी से औलाद हो सकती है. अगर दूसरी शादी सिर्फ औलाद की खातिर हो रही है तो आप पहले छानबीन कर लें.’’

नंबरदार सिर झुका कर सोचता रहा. फिर कहने लगा, ‘‘ठीक है डाक्टर साहब, मैं ने आप की बात सुन ली है. आप की मेहरबानी कि आप ने ये बातें बता दीं. मैं सोच कर जवाब दूंगा.’’

मैं नंबरदार को सलाम कर के खुशखुश वापस आ गया. दूसरे दिन जब मैं ने मिसेज मलिक को सारी बातें बताईं तो वह भी बहुत खुश हुई और उस की आंखों में मेरे लिए शुक्रगुजारी के आंसू आ गए. मैं ने उसे समझाया कि बात अभी खत्म नहीं हुई. उसे बड़ी समझदारी और खिदमत से अपने शौहर का दिल जीतना होगा. उस के दिल में अपने लिए जगह बनानी होगी और उसे इलाज पर राजी करना होगा.

2 ही दिन गुजरे थे. मैं शाम के वक्त खेतों में सैर कर रहा था. शाम के वक्त मैं रोज गांव से बाहर निकल जाता था. हलकीहलकी ताजी हवा और पत्तों की सरसराहट से मुझे अजीब सा सुकून मिलता था. मैं अपनी धुन में चला जा रहा था कि एकदम मेरे सामने मलिक असद आ खड़ा हुआ. उस के साथ 2 आदमी और थे. दोनों आदमियों के हाथों में लाठियां थीं. मलिक असद की आंखों में गुस्सा भरा था—‘‘डाक्टर, मैं ने तुम्हें समझाया था कि यह बात दोबारा न करना, वरना तुम्हारी लाश नहीं मिलेगी. अब तैयार हो जाओ. तुम्हें मैं दूसरी दुनिया में पहुंचा दूंगा. तुम्हें मलिक असद का पता नहीं है.’’

उस ने अपने आदमियों को इशारा किया. बस मुझे इतना याद है कि एक लाठी मेरे सिर पर लगी. उस के बाद मुझे होश नहीं रहा. जब होश आया तो मैं अस्पताल के कमरे में एक बैड पर लेटा था. मेरे पास कमरे में बड़े चौधरी और उन की बहू थी. मुझे होश में आते देख कर बड़े चौधरी ने मेरे पांव पकड़ लिए और मिसेज मलिक असद सजदे में गिर गईं. चौधरी साहब कहने लगे, ‘‘पुत्तर डाक्टर, मुझे माफ कर दो. मैं बहुत शर्मिंदा हूं. तुम चाहो तो मेरे बेटे को पुलिस के हवाले कर दो. मगर यकीन करो, अगर मुझे इस का पता होता तो मैं अपने बेटे की जान ले लेता और तुम्हें नुकसान न पहुंचने देता.’’

इस दौरान मिसेज असद भी सजदे से उठ गई थीं. मेरी एक टांग पर पलस्तर चढ़ा था. मैं ने फाइल पढ़ी तो पता चला कि सिर के जख्म पर 10 टांके लगे थे और बाईं टांग टूट गई थी. इस के बावजूद मैं मुसकरा रहा था, ‘‘चौधरी साहब, आप का इस में कोई कसूर नहीं. मैं इस वाकये की कोई रिपोर्ट नहीं करना चाहता. मैं सिर्फ छोटे चौधरी से मिलना चाहता हूं.’’

मेरी बात सुन कर बड़े चौधरी की आंखों में आंसू आ गए. वह अपने आंसू पोंछते हुए कमरे से बाहर चले गए. मिसेज मलिक ने मुझे बताया, ‘‘आप से लड़ाई की इस घटना से पहले नंबरदार और उस के भाई हवेली में आए थे और मलिक असद के सामने बड़े चौधरी से कहने लगे थे, ‘आप के बेटे में नुक्स है. वह औलाद पैदा करने के काबिल नहीं है. आप ने हम से गलतबयानी की है, बल्कि हमें धोखा दिया है. हम यह रिश्ता तोड़ने आए हैं.’

‘‘यह सुन कर मलिक असद उन से झगड़ पड़ा. अगर बड़े चौधरी न होते तो वे लोग भी जख्मी हो जाते. बडे़े चौधरी ने हालात को संभाला और उन से कहने लगे कि आप लोगों से मैं ने कोई झूठ नहीं बोला है, आप लोगों को यह बात किस ने बताई है?

‘‘जब नंबरदार ने आप का नाम बताया तो बड़े चौधरी चुप रह गए. इसी दौरान मलिक असद गुस्से में बाहर निकल गया. मुझे शक हुआ. मैं ने अपनी नौकरानी से कहा कि वह मलिक असद का पीछा करे. उस ने मुझे आ कर बताया कि उन लोगों ने आप को जख्मी कर दिया है.

‘‘मैं ने फौरन बड़े चौधरी को बताया और हम अपने आदमियों के साथ वहां पहुंचे तो आप की हालत काफी खराब थी. फौरन तांगा मंगवाया और सड़क पर आ कर गाड़ी का बंदोबस्त किया. यहां अस्पताल में आ कर भी हम बहुत परेशान रहे. आप को पूरे 6 दिनों बाद होश आया है. इस दौरान पुलिस भी हमें परेशान करती रही.’’

मैं मिसेज मलिक की बातें सुन कर मुसकराता रहा. मुझे पूरे 15 दिन अस्पताल में रहना पड़ा. इस दौरान मलिक असद को बड़े चौधरी लिवा लाए. वह भी अपने किए पर शर्मिंदा था. मैं उस से बहुत प्यार से मिला. मैं ने जाहिर नहीं होने दिया कि उस ने मुझ पर बहुत ज्यादती की है. इस का यह असर हुआ कि वह दिनरात मेरे पास रहने लगा. मैं ने इस दौरान डाक्टर राशिद से उस की मुलाकात कराई और उन से सिफारिश की कि वह उस का इलाज करें. मैं ठीक हो कर गांव आ गया और अपने काम में खो गया. इस वाकए का यह असर हुआ कि मुझे चौधरी की हवेली में ही रहने के लिए जाना पड़ा. खानापीना भी वहीं होने लगा.

मलिक असद और उस की बीवी बड़ी खुशगवार जिंदगी बिताते रहे. मैं जब तक उस गांव में तैनात रहा, मिसेज मलिक ने मुझे सगी बहन का प्यार दिया. 2 सालों बाद मुझे पता चला कि मलिक असद के घर एक फूल सी बच्ची पैदा हुई है तो उस वक्त की मेरी खुशी का अंदाजा आप लगा सकते हैं. Hindi Stories

लेखक – डा. फरहान  

Crime Stories: बेईमान हुए इमानदार रिश्ते

Crime Stories: ताऊ और ताई तो शालू को पढ़ालिखा कर उस की जिंदगी रौशन करना चाहते थे जबकि वह कशिश के प्यार में पड़ कर अपने शुभचिंतक ताऊ और ताई को धोखा दे रही थी. इस के बाद उस ने क्या किया…

बच्चे पढ़लिख कर कामयाबी के शिखर पर पहुंच जाएं हर मातापिता के लिए यह बेहद खुशी की बात होती है. उन्हें लगता है कि उन की जिंदगी भर की मेहनत कामयाब हो गई. उत्तर प्रदेश सरकार के लोक निर्माण विभाग में सहायक अभियंता शनसवीर सिंह और उन की पत्नी निर्मला खुश थीं कि उन का युवा बेटा पुलकित सिंह भारतीय सैन्य अकादमी (आईएमए) में सलैक्शन के बाद लेफ्टिनेंट बन गया था.

11 जून, 2015 को देहरादून आयोजित पासिंग आउट परेड में जब उन्होंने अपनी आंखों से बेटे के कंधों पर स्टार लगते देखे तो दोनों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. शिक्षा के बल पर उन्होंने बेटे को इस मुकाम तक पहुंचा दिया था. मृदुभाषी शनसवीर खुद तो उच्च शिक्षित थे ही, उन की पत्नी निर्मला भी उच्च शिक्षित थीं. उन्होंने एमएससी (फिजिक्स) व बीएड की डिग्रियां ली थीं और शिक्षिका रही थीं, लेकिन सन 2000 में उन्होंने पारिवारिक कारणों से नौकरी को अलविदा कह दिया था.

शनसवीर जनपद मेरठ की मवाना रोड स्थित पौश कालोनी डिफैंस कालोनी की कोठी नंबर सी-53 में रहते थे. उन के 2 ही बच्चे थे, बड़ी बेटी प्रिंसी और उस से छोटा पुलकित. प्रिंसी ने एमबीबीएस, एमडी किया था, जिस का उन्होंने विवाह कर दिया था. प्रिंसी के पति भी डाक्टर थे. प्रिंसी दिल्ली के राममनोहर लोहिया अस्पताल में बतौर सीनियर रेजीडेंट डाक्टर नियुक्त थीं. शनसवीर सिंह मूलरूप से मुजफ्फरनगर जिले की जानसठ तहसील के गांव जंघेड़ी के रहने वाले थे. उन के पिता वेद सिंह किसान थे. शनसवीर 5 भाइयों में चौथे नंबर पर थे. उन के अन्य भाई गांव में ही रहते थे. इन में सुभाष की तबीयत खराब रहती थी, उन का नियमित उपचार चल रहा था.

शारीरिक कमजोरी की वजह से वह ठीक से चलफिर नहीं पाते थे. कुछ महीने पहले शनसवीर ने मेरठ में ही उन का औपरेशन कराया था. कुछ दिन मेरठ रह कर वह गांव चले गए थे. जबकि उन की पत्नी सविता शनसवीर के साथ ही रह रही थीं. उन के सब से छोटे भाई सुखपाल की युवा बेटी शालू सिंह उन्हीं के पास रह कर पढ़ रही थी. वह एक इंजीनियरिंग कालेज से बीबीए कर रही थी. शनसवीर की पोस्टिंग वर्तमान में जिला संभल में थी. वह वहीं रहते भी थे. हफ्ते-10 दिन में घर आ जाया करते थे.

शनसवीर परिवार के अपने नजदीकी लोगों को साथ ले कर चलने वाले व्यक्ति थे. यही वजह थी कि वह एक भाई का इलाज करा रहे थे तो दूसरे भाई की बेटी को अपने पास रख कर पढ़ा रहे थे. दरअसल निर्मला चाहती थीं कि उन के बच्चों की तरह शालू भी पढ़ाई कर के कुछ बन जाए. वह शालू को बहुत प्यार करती थीं. प्रिंसी और पुलकित के बाद शालू ही उन के प्यार की एकलौती हकदार थी. निर्मला उस की सभी जरूरतें बिना किसी भेदभाव के पूरा करती थीं.

सिंह दंपति बेटे की पासिंग आउट परेड देखने के लिए देहरादून गए थे. 14 जून को वापस आए तो पुलकित भी उन के साथ था. अगले दिन शनसवीर अपनी ड्यूटी पर चले गए, जबकि पुलकित एक विवाह समारोह में शामिल होने के लिए दिल्ली और वहां से चंडीगढ़ चला गया. शनसवीर के ड्यूटी पर चले जाने के बाद कोठी में 3 लोग ही रह गए थे. एक उन की पत्नी निर्मला, दूसरी निर्मला की देवरानी सविता और तीसरी उन की भतीजी 20 वर्षीया शालू.

शनसवीर आदतन प्रतिदिन संभल से पत्नी को फोन करते रहते थे. 17 जून को भी उन्होंने दिन में 2 बार उन से बात की. इस के बाद रात 10 बजे उन्होंने पत्नी का मोबाइल मिलाया तो वह स्विच औफ आया. इस पर उन्होंने घर का लैंडलाइन फोन मिलाया तो फोन भतीजी शालू ने उठाया. आवाज पहचान कर वह बोले, ‘‘अपनी ताई से बात कराओ.’’

‘‘नमस्ते ताऊजी, वह तो घर पर नहीं हैं.’’ शालू ने कहा तो शनसवीर चौंके. क्योंकि उस वक्त निर्मला को घर पर ही होना चाहिए था.

‘‘कहां हैं वह?’’

‘‘पता नहीं, मुझे तो बहुत फिक्र हो रही है.’’ शालू के जवाब से उन की चिंता बढ़ी तो उन्होंने पूछा, ‘‘क्यों क्या हुआ?’’

‘‘वह मिठाई ले आने की बात कह कर करीब 7 बजे गई थीं, लेकिन अभी तक आई नहीं हैं.’’

‘‘और तुम मुझे अब बता रही हो?’’ उन्होंने नाराजगी प्रकट करते हुए कहा और शालू से निर्मला को आसपड़ोस में देखने को कहा.

उन्होंने सोचा कि हो सकता है, कहीं उन्हें बातों में वक्त लग गया हो. यह बात सच थी कि निर्मला को मिठाई लेने दुकान पर जाना था, क्योंकि उन्होंने फोन पर यह बात दिन में उन्हें बताई थी कि मोहल्ले के कुछ लोगों को बेटे के अफसर बनने की खुशी में मिठाई दे कर आनी है. इस तरह बिना बताए इतनी देर तक निर्मला कहां हैं, इस बात ने शनसवीर को चिंता में डाल दिया था. कुछ देर बाद उन्होंने शालू को पुन: फोन किया. उस ने बताया कि वह पड़ोस में सब के यहां पूछ आई है, वह किसी के यहां नहीं हैं.

शनसवीर ने फोन पर शालू से ही बात की, क्योंकि जेठ होने की वजह से सविता उन से टेलीफोन पर भी बात नहीं करती थी. उन्होंने शालू से पुन: फोन कर के कहा, ‘‘मनोरमा के यहां देख आओ, शायद वहां हों?’’

‘‘नहीं ताऊजी, वह तो खुद ही उन्हें पूछने आई थीं. वह इंतजार कर के चली गईं.’’

शालू के इस जवाब से वह और भी चिंतित हो गए. दरअसल मनोरमा पड़ोस में ही साकेत में ही रहती थीं और निर्मला की सहेली थीं. परेशान हाल शनसवीर ने प्रिंसी को इस उम्मीद में फोन किया कि शायद मां ने बेटी को ही कुछ बताया हो. डा. प्रिंसी ने बताया कि उस की मां से दिन में बात हुई थी शाम को नहीं हुई. शनसवीर ने मनोरमा को फोन किया तो उन्होंने बताया कि वह निर्मला से मिलने गई थीं, लेकिन वह घर पर नहीं मिली थीं.

परेशान शनसवीर आधी रात के बाद संभल से चल कर मुंहअंधेरे मेरठ पहुंच गए. इस बीच न तो निर्मला घर आई थीं और न ही उन का मोबाइल औन हुआ था. निर्मला के इस तरह गायब होने से घर में शालू व सविता भी परेशान थीं. शनसवीर के आने पर उन दोनों ने उन्हें बता दिया कि उन्हें निर्मला के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली है. निर्मला के बैडरूम में ताला लगा हुआ था. शालू ने बताया कि चाबी वह साथ ले गई हैं. बैडरूम में ताला लगाने का औचित्य शनसवीर की समझ में नहीं आया. उन्होंने किसी तरह दरवाजा खोला. बैडरूम बिलकुल सामान्य था. पत्नी कहीं किसी दुर्घटना की शिकार न हो गई हों, यह सोच कर उन्होंने शहर के अस्पतालों में भी पता किया. लेकिन उन का कोई पता नहीं चल सका. इस बात का पता चलने पर उन के कई परिचित भी आ गए थे.

शनसवीर ने पुलिस कंट्रोल रूम को पत्नी के लापता होने की सूचना दे दी थी. पुलिस उन के घर आई और थाने चल कर गुमशुदगी दर्ज कराने को कहा. वह अपने परिचित महेश बालियान के साथ थाना लालकुर्ती पहुंचे और पत्नी की गुमशुदगी दर्ज करा दी. उन्होंने पत्नी का एक फोटो भी पुलिस को दे दिया. निर्मला रहस्यमयी ढंग से कहां लापता हो गई थीं, कोई नहीं जानता था. उन के अपहरण की आशंका जरूर थी, लेकिन शनसवीर के पास कोई भी संदिग्ध फोन नहीं आया था. अगले दिन शनसवीर की बेटी डा. प्रिंसी व दामाद भी घर आ गए. इस बीच पुलिस अधिकारियों को यह बात पता चली तो डीआईजी रमित शर्मा व एसएसपी डी.सी. दुबे ने अधीनस्थों को इस मामले में जल्द काररवाई करने के निर्देश दिए.

एसपी (सिटी) ओ.पी. सिंह व एसपी संकल्प शर्मा के निर्देशन में थाना लालकुर्ती के थानाप्रभारी विजय कुमार पुलिस टीम के साथ शनसवीर के घर पहुंचे. निर्मला के लापता होने के वक्त चूंकि उन की देवरानी सविता व भतीजी शालू ही घर पर थे, इसलिए पुलिस ने दोनों से पूछताछ कर के उन के लापता होने का पूरा घटनाक्रम पता लगाया. पुलिस ने जांच को आगे बढ़ाने के लिए निर्मला और परिवार के अन्य सदस्यों के मोबाइल नंबर हासिल कर लिए. उन सभी नंबरों की जांच के लिए क्राइम ब्रांच के प्रभारी श्यामवीर सिंह व उन की टीम को लगा दिया गया.

जांच में अगले दिन पता चला कि निर्मला के फोन की अंतिम लोकेशन कालोनी की ही थी. इस के बाद उन का मोबाइल बंद हो गया था. एक और खास बात यह थी कि शालू का भी मोबाइल निर्मला के लापता होने के बाद से लगातार बंद था. पुलिस को निर्मला के लापता होने की कोई खास वजह समझ में नहीं आ रही थी. इसलिए उस ने अपनी जांच परिवार के इर्दगिर्द ही समेट दी. सीओ स्वर्णजीत कौर व महिला थाना की थानाप्रभारी रश्मि चौधरी ने एकएक कर के परिवार के सभी सदस्यों से पूछताछ की. सविता घर में ही रहती थी, बाहरी दुनिया से उसे ज्यादा मतलब नहीं था. निर्मला को ले कर वह अपने बयान पर कायम थी कि उसे नहीं पता कि वह कहां चली गईं.

पुलिस ने शालू से उस का मोबाइल बंद होने की वजह पूछी तो वह कोई खास जवाब नहीं दे सकी. जबकि इस के पहले प्रतिदिन उस के मोबाइल का जम कर इस्तेमाल होता था. पुलिस ने उसे शक के दायरे में ले लिया. शालू तेजतर्रार युवती थी. शालू निर्मला की सगी भतीजी थी. उन के गायब होने में उस का कोई हाथ हो सकता है, यह सोचा भी नहीं जा सकता था. लेकिन मोबाइल उस की चुगली कर रहा था. अपने इस शक को पुलिस ने शनसवीर को भी बता दिया.

शनसवीर के पास भतीजी पर शक करने की कोई वजह तो नहीं थी, लेकिन उस की एक बात में उन्हें भी झोल नजर आ रहा था. दरअसल उस ने बताया था कि निर्मला की सहेली मनोरमा जब घर आई थीं तो बैठ कर इंतजार कर के चली गई थीं. जबकि मनोरमा का कहना था कि वह निर्मला को पूछने के लिए आईं तो शालू ने बिना दरवाजा खोले ही कह दिया था कि पता नहीं वह कब आएंगी, आप कब तक बैठ कर इंतजार करेंगी. दोनों की बातों में भिन्नता थी. सविता से इस बारे में पूछा गया तो उस ने बताया कि वह घर के अंदर थी. मनोरमा कब आई थीं, उसे पता नहीं. मामला परिवार का था, इसलिए सभी ने शालू से पूछताछ की, लेकिन उस ने निर्मला के बारे में कोई जानकारी होने से साफ इनकार कर दिया.

इस बीच पुलिस ने शालू के मोबाइल की काल डिटेल्स में मिले एक ऐसे नंबर को जांच में शामिल कर लिया, जिस पर वह सब से ज्यादा बातें करती थी. वह नंबर कशिश पुत्र चंद्रपाल निवासी गांव सलारपुर का था. यह गांव मेरठ के ही थाना इंचौली के अंतर्गत आता था. इस में चौंकाने वाली बात यह थी कि घटना वाली शाम इस नंबर की लोकेशन कालोनी की ही पाई गई थी. इस से पहले भी कई बार इस की लोकेशन कालोनी की पाई गई थी. इस का मतलब वह शालू के पास आता रहता था. अब शालू पूरी तरह शक के दायरे में आ गई थी. निस्संदेह कुछ ऐसा जरूर था, जो वह सभी से छिपा रही थी.

पुलिस एक बार फिर 20 जून को शनसवीर के घर पूछताछ करने पहुंच गई. सीओ स्वर्णजीत कौर व महिला थानाप्रभारी रश्मि चौधरी ने शालू से पूछताछ की, ‘‘तुम कशिश को जानती हो?’’

इस पर वह चौंकी जरूर, लेकिन बहुत जल्दी उस ने बड़े आत्मविश्वास से जवाब दिया, ‘‘जी हां, वह मेरे साथ पढ़ता है.’’

‘‘17 तारीख को क्या वह यहां आया था?’’

‘‘नहीं, वह यहां नहीं आया था.’’

पुलिस जानती थी कि उस का यह जवाब बिलकुल झूठ है.

‘‘सोच कर बताओ?’’

‘‘नहीं, वह यहां नहीं आया था.’’

सविता ने भी घर में किसी के आने से इनकार कर दिया था. अलबत्ता चिंतामग्न जरूर थी. पुलिस ने अपना सारा ध्यान शालू पर जमा दिया. पुलिस समझ गई थी कि शालू जरूरत से ज्यादा चालाक लड़की है. पुलिस सख्ती नहीं दिखाना चाहती थी. ऐसी स्थिति में उसे पूछताछ के लिए हिरासत में लेना जरूरी था. पुलिस ने शनसवीर को असलियत बता कर उसे हिरासत में ले लिया. पुलिस अब उस के जरिए ही कशिश तक पहुंचना चाहती थी. उस शाम एक और नंबर की लोकेशन भी कालोनी में थी. उस नंबर पर भी कशिश की बातें होती थीं. वह नंबर गौरव उर्फ राजू पुत्र चंद्रसेन का था. वह भी गांव सलारपुर का रहने वाला था.

पुलिस समझ गई कि इस तिगड़ी के बीच ही निर्मला के लापता होने का राज छिपा है. सविता गांव की भोली सूरत वाली औरत थी. पुलिस को उस पर ज्यादा शक नहीं था. पुलिस शालू को ले कर कशिश की तलाश में कालेज पहुंची. कशिश उस दिन कालेज नहीं आया था. पुलिस ने शालू से कशिश को फोन कर के कालेज बुलाने को कहा. उस की बात तो हुई, लेकिन कशिश ने बताया कि वह मोदीनगर में है. इसलिए अभी नहीं आ सकता. पुलिस ने कशिश की लोकेशन पता लगाई तो पता चला कि वह गांव में ही है. पुलिस उस के गांव पहुंची और कशिश के साथसाथ गौरव को भी हिरासत में ले लिया.

तीनों को थाने ला कर अलगअलग बैठा कर पूछताछ की गई तो उन के बयानों में भिन्नता नजर आई. इस के बाद पुलिस ने सख्ती से पूछताछ की तो उन्होंने ऐसे चौंकाने वाले राज से पर्दा उठाया, जिसे सुन कर पुलिस भी सन्न रह गई. ये लोग निर्मला की हत्या कर के उन की लाश को ठिकाने लगा चुके थे. इस हत्या में उन का साथ भोली दिखने वाली निर्मला की देवरानी सविता ने भी दिया था. वह पूरे राज को छिपाए हुए थी. पुलिस ने उसे भी हिरासत में ले लिया.

निर्मला की हत्या का पता चला तो परिवार में कोहराम मच गया. पुलिस ने कशिश की निशानदेही पर डिफैंस कालोनी से करीब 20 किलोमीटर दूर मोदीपुरम-ललसाना मार्ग पर एक स्थान से निर्मला का शव बरामद कर लिया. उन के गले में अभी भी दुपट्टा कसा हुआ था और हाथ बंधे हुए थे. पुलिस ने शव का पंचनामा कर के उसे पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. पुलिस ने पकड़े गए लोगों के खिलाफ शनसवीर की तहरीर पर भादंवि की धारा 302 व 201 के तहत मुकदमा दर्ज कर सभी को विधिवत गिरफ्तार कर लिया. इस के बाद सभी से विस्तृत पूछताछ की गई. निर्मला शालू को बहुत प्यार करती थीं. ऐसी स्थिति में आखिर सगी भतीजी ही उन की कातिल क्यों बनी, इस के पीछे एक चौंकाने वाली कहानी थी.

लोक निर्माण विभाग में नौकरी लगने के साथ ही शनसवीर परिवार को साथ रखने लगे थे. बाद में उन की तैनाती मेरठ में हुई तो उन्होंने डिफैंस कालोनी में अपनी कोठी बना ली. शनसवीर और उन की पत्नी उस सोच के व्यक्ति थे, जो परिवार को साथ ले कर चलते हैं और सभी की कामयाबी का ख्वाब देखते हैं. कई साल पहले वह छोटे भाई सुभाष की बेटी शालू को अपने साथ मेरठ ले आए कि शहर में अच्छी पढ़ाई कर के वह कुछ बन जाएगी. शालू बचपन से तेजतर्रार थी, यह बात सिर्फ उस की आदतों में लागू होती थी न कि पढ़ाई के मामले में. शनसवीर के परिवार में रह कर उस ने 8वीं तक की पढ़ाई की. बाद में वह गांव वापस चली गई. वहां रह कर उस ने मुजफ्फरनगर से इंटर किया. आगे की पढ़ाई वह अच्छे से कर सके, इसलिए निर्मला जून, 2013 में उसे अपने पास मेरठ ले आईं.

इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए मेरठ के एक इंस्टीट्यूट में उस का दाखिला करा दिया गया. इस बीच निर्मला की बेटी प्रिंसी ने सीपीएमटी का एग्जाम पास कर लिया. इस के बाद उस ने एमबीबीएस और एमडी किया. बाद में उस का विवाह हो गया और वह राममनोहर लोहिया अस्पताल में बतौर चिकित्सक अपनी सेवाएं देने लगी. साल 2014 में शनसवीर का बेटा पुलकित भी आईएमए में प्रशिक्षण के लिए चला गया.

इस बीच शनसवीर का स्थानांतरण संभल हो गया था. वहां से वह घर आते रहते थे. निर्मला भी कभीकभी उन के पास चली जाया करती थीं. रिश्तों में कोई दूरी महसूस न हो, इसलिए निर्मला शालू का हर तरह से खयाल रखती थीं. शालू उन लड़कियों में से थी, जो आजादी का नाजायज फायदा उठाती हैं. उस ने भी ऐसा ही किया. उस की दोस्ती अपने ही कालेज में पढ़ने वाले कशिश से हो गई. उन के बीच मोबाइल से ले कर घरेलू फोन तक पर बातों का लंबा सिलसिला चलने लगा.

निर्मला जब पति के पास संभल चली जातीं तो शालू की आजादी और बढ़ जाती. कुछ महीने पहले शनसवीर अपने भाई सुभाष का औपरेशन कराने के लिए मेरठ ले आए. उन के साथ उन की पत्नी सविता भी आई. औपरेशन के बाद सुभाष कुछ दिनों कोठी में रहे, उस के बाद गांव चले गए, जबकि सविता वहीं रहती रही. उधर शालू की कशिश से दोस्ती प्यार में बदल गई. दोस्ती और प्यार तक तो ठीक था, लेकिन दोनों के कदम मर्यादा की दीवारों को लांघ चुके थे. हालात बिगड़ने तब शुरू हुए, जब कशिश उस से मिलने कोठी पर भी आने लगा. अभी तक उस के और शालू के संबंध निर्मला से पूरी तरह छिपे थे. सविता यह बात किसी को न बताए. शालू ने निर्मला की बुराइयां कर के उसे अपने पक्ष में कर लिया था.

निर्मला व सविता की आर्थिक स्थिति में जमीनआसमान का अंतर था. यह बात सविता को अंदर ही अंदर कचोटती थी. जलन की यही भावना थी, जो उस ने शालू की हरकतों को निर्मला से पूरी तरह छिपा लिया था और उसे बिगड़ने की पूरी छूट दे दी थी. वह नहीं जानती थी कि बाद में इस का अंजाम भयानक भी हो सकता है. निर्मला सभी का भला करने की सोच रही थीं. उन के मन में अविश्वास जैसी कोई बात नहीं थी. लेकिन वह नहीं जानती थीं कि उन के लिए दोनों के दिलों में जहर भरा  है. निर्मला बहुत सुलझी हुई महिला थीं, पर रिश्तों के विश्वास के मामले में वह अपने ही घर में धोखा खा रही थीं.

शालू इंस्टीट्यूट जाने के बहाने न सिर्फ कशिश के साथ घूमतीफिरती थी, बल्कि निर्मला के पति के पास संभल चले जाने या बाजार आदि जाने के बाद उसे घर में ही बुला कर उस के साथ वक्त बिताती थी. निर्मला कभी सविता से शालू के बारे में कुछ पूछतीं तो वह उस की कोई शिकायत नहीं करती थी. ऐसी बातें छिपी नहीं रहतीं. एक दिन निर्मला को यह बातें किसी तरह पता चलीं तो उन्होंने शालू को जम कर लताड़ा और उसे जमाने की ऊंचनीच समझाई. शालू ने उन्हें यह समझाने की कोशिश की कि कशिश केवल उस का सहपाठी है, इसलिए कभीकभी कालेज की कापीकिताब देनेलेने के लिए आ जाता है.

देवर की बेटी को वह उस के अच्छे भविष्य के लिए अपने साथ रख कर पढ़ा रही थीं. सामाजिक व नैतिक रूप से उसे सही रास्ते पर रखने की जिम्मेदारी उन्हीं की थी. उन्होंने ऐसा ही किया भी. शालू ने कशिश से अपने रिश्ते खत्म करने की बात कह कर झूठी कसमें भी खा लीं. कसमें खाने व झूठ बोलने से शालू का गहरा नाता था. पकड़ में आई शालू की पहली गलती थी, इसलिए उन्होंने यह बातें पति व अन्य से छिपा लीं. शालू ने वादा तो किया, लेकिन वह उस पर लंबे समय तक कायम नहीं रह सकी.

कशिश ने फिर से घर आना शुरू किया तो निर्मला ने परिवार के लोेगों को यह बात बता दी. सभी ने शालू को समझाया. गैर युवक घर में आता है, सविता ही इस बारे में कुछ बता सकती थी. लेकिन उस का कहना था कि शालू उस के सो जाने के बाद उसे बुलाती होगी. इसलिए उसे पता नहीं चलता. जबकि यह कोरा झूठ था. सविता जानती थी कि कशिश कब आताजाता था. शालू की हरकतें पता चलने पर शनसवीर उसे मेरठ में रखने के पक्ष में नहीं थे. उन्होंने अपना इरादा बताया तो निर्मला शालू के पक्ष में आ गईं. उन्होंने कहा कि उसे एक आखिरी मौका देना चाहिए. दरअसल वह नहीं चाहती थीं कि शालू की पढ़ाई बीच में छूटे और उस का भविष्य खराब हो.

कुछ दिन तो सब ठीक रहा, लेकिन शालू ने फिर से पुराना ढर्रा अख्तियार कर लिया. वह फोन पर अकसर लंबीलंबी बातें करती, जिस के लिए निर्मला उसे डांट देती थीं. उसी बीच शनसवीर मेरठ आए और निर्मला को ले कर बेटे की परेड में शामिल होने देहरादून चले गए. वहां से वापस आ कर वह संभल चले गए. एक दिन निर्मला शालू की अलमारी में किताबें देखने लगीं तो उन्हें अलमारी में छिपा कर रखे गए कुछ ऐसे कागज मिले, जिन्हें देख कर उन के पैरों तले से जमीन खिसक गई. वे महिला चिकित्सकों की रिपोर्टें थीं. उन पर शालू का नाम भी लिखा था. दरअसल शालू प्यार में नैतिकता की सारी हदें लांघ गई थी. शालू इस हद तक गिर जाएगी, निर्मला को कतई उम्मीद नहीं थी.

उन्होंने उसे बुला कर न सिर्फ थप्पड़ जड़ दिया, बल्कि इस बारे में पूछा तो रिपोर्ट देख कर उस के होश उड़ गए. उस के मुंह से शब्द नहीं निकले. निर्मला गुस्से में थीं. उस दिन उन्होंने अपना फैसला सुनाते हुए कहा, ‘‘अब मैं तुम्हें बरदाश्त नहीं कर सकती. सब को तुम्हारी असलियत बता कर गांव भेज दूंगी. तूने अब मेरा भरोसा तोड़ दिया है.’’

शालू की हालत हारे हुए जुआरी जैसी हो गई. वह चालाक तो थी ही, उस ने रोने का नाटक किया और निर्मला के पैर पकड़ कर माफी मांग ली. इस के साथ ही उस ने अब सही रास्ते पर चलने की कसमों की झड़ी लगा दी. यह 16 जून, 2015 की बात थी. शालू अपनी हरकत पकड़े जाने से बहुत डर गई. सविता से भी यह बातें छिपी नहीं थीं. उस ने शालू से कहा कि अब उसे कोई नहीं बचा सकता. शालू अपनी आजादी को किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहती थी.

इसलिए मन ही मन उस ने एक खतरनाक निर्णय ले लिया और वह फैसला कशिश को फोन पर बता कर कहा, ‘‘कशिश मैं तुम्हें खोना नहीं चाहती. ताई ने अगर ये बातें सब को बता दीं तो मुझे हमेशा के लिए गांव जाना पड़ जाएगा. तुम किसी भी तरह उन्हें रास्ते से हटा दो. उन के मरने के बाद कोठी में तुम आजादी से आ सकोगे. वैसे भी उन के बाद यहां सब मेरा है.’’

कशिश के सिर पर भी शालू के प्यार का जुनून सवार था. दोनों ने निर्मला को रास्ते से हटाने की योजना बना ली. अपनी इस योजना में कशिश ने गांव के ही अपने दोस्त गौरव को भी शामिल कर लिया. उधर शालू ने सविता को भी अपनी साजिश में शामिल कर लिया. सविता ने भी सोचा कि निर्मला के दुनिया से चले जाने के बाद घर पर उस का एकक्षत्र राज हो जाएगा. इस बीच शालू निर्मला पर उस वक्त नजर रखती थी, जब वह फोन पर पति व बेटी से बातें करती थीं. उन्होंने शालू की हरकत किसी को नहीं बताई थी. जब वह बात करती थीं तो शालू हाथ जोड़ कर उन के सामने खड़ी हो जाती थी. यह शालू की योजना का हिस्सा था.

योजना के अनुसार 17 जून को कशिश कालोनी में आया. शालू बहाने से बाहर आ कर उस से मिली तो वह नींद की गोलियां उसे देते हुए बोला, ‘‘जब अपना काम कर लेना तो फोन कर देना.’’

‘‘ठीक है, मैं तुम्हें फोन कर दूंगी.’’

दोपहर बाद निर्मला अपने बैडरूम में थीं, तभी शालू उन के लिए शरबत बना कर ले आई. उस में उस ने नींद की कई गोलियां मिला दी थीं. निर्मला को चूंकि मालूम नहीं था, इसलिए उन्होंने शरबत पी लिया. शरबत ने अपना असर दिखाया और वह जल्दी ही सो गईं. नींद की गोलियां ज्यादा डाली गई थीं. इसलिए कुछ देर में उन की नाक से खून और मुंह से झाग आने लगा. यह देख कर शालू खुश थी. उस ने कशिश को फोन किया और उस के आने का इंतजार करने लगी. कशिश व गौरव वैगनआर कार से घर आ गए. सविता ने गला दबाने के लिए उन दोनों को दुपट्टा ला कर दे दिया. कशिश व गौरव ने दुपट्टे से निर्मला का गला दबा दिया.

इस दौरान शालू व सविता ने निर्मला के पैरों को जकड़ लिया था. निर्मला गोलियों की हैवी डोज के चलते विरोध के काबिल नहीं बची थीं. हत्या के बाद चारों ने मिल कर निर्मला के शव को कार में रख दिया. कार कोठी के अंदर आ गई थी. सविता घर पर ही रही, जबकि कशिश, गौरव व शालू एक सुनसान स्थान पर शव को छिपा कर लौट गए. कशिश व गौरव अपने घर चले गए. जबकि शालू ने वापस आ कर निर्मला के बैडरूम को साफ कर के बाहर से ताला लगा दिया. उस ने उन के मोबाइल का स्विच्ड औफ कर के उसे छिपा दिया. उस ने अपना भी मोबाइल बंद कर दिया. उस ने कशिश को समझा दिया था कि यहां वह सब संभाल लेगी और अपने हिसाब से उस से बात करेगी.

शाम को निर्मला की सहेली मनोरमा उन्हें पूछने के लिए आई तो बिना दरवाजा खोले ही शालू ने उन के घर में न होने की बात कह कर उन्हें लौटा दिया. शालू व सविता ने राज छिपाए रहने की पूरी योजना बना ली थी. शालू ने सविता को समझा दिया था कि वह अपनेआप ही सब संभाल लेगी. 10 बजे शनसवीर का फोन आया तो शालू ने उन से निर्मला के लापता होने की बात बता दी. शालू व सविता ने हत्या के राज को पूरी तरह छिपाए रखा. वह अपने इस झूठ के नाटक में कामयाब रही थी, लेकिन मोबाइल ने उस की पोल खोल दी. पुलिस ने वैगनआर कार भी बरामद कर ली. सभी आरोपियों को पुलिस ने अगले दिन यानी 21 जून को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.

रिश्तों की इस हत्या से हर कोई हैरान था. खून के रिश्तों में मदद का ऐसा अंजाम होगा, यह शनसवीर ने कभी नहीं सोचा था. वैसे भी रिश्तों में हुई घटनाएं बहुत दर्द देती हैं. यह दर्द तब और भी बढ़ जाता है, जब उसे देने वाले अपने होते हैं. शालू ने अपनी आजादी का नाजायज फायदा न उठा कर केवल पढ़ाई पर ध्यान लगाया होता तो ऐसी नौबत कभी नहीं आती. Crime Stories

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Crime Stories: प्यार में ऐसा तो नहीं होता

Crime Stories: बेडि़या समाज का दंगल सिंह अपनी प्रेमिका शिल्पा को भगा कर उस से शादी करना चाहता था, जबकि शिल्पा का कहना था कि वह समाज के रिवाज के अनुसार ही शादी करेगी. आखिर दोनों की इस लड़ाई का नतीजा क्या निकला महानगर मुंबई से सटे जनपद थाणे के कोपरी गांव और नवी मुंबई के बोनकोड गांव के बीच बहने वाले गहरे नाले पर बने पुल पर अचानक काफी लोग एकत्र हो गए थे. इस की वजह उस गहरे नाले में पड़ी किसी आदमी के बैडशीट में बंधी एक गठरी थी, जिस में से पैर की अंगुलियां दिखाई दे रही थीं.

साफ था उस गठरी में लाश थी, इसलिए वहां एकत्र लोगों में से किसी ने इस बात की सूचना पुलिस कंट्रोल रूम को दे दी. पुलिस कंट्रोल रूम ने यह सूचना वायरलैस द्वारा प्रसारित कर दी, इसलिए इस बात की जानकारी सभी पुलिस थानों और पुलिस अधिकारियों को हो गई.

चूंकि घटनास्थल नवी मुंबई के वाशी एपीएमसी थाने के अंतर्गत आता था, इसलिए पुलिस कंट्रोल रूम द्वारा मिली सूचना के आधार पर थाना एपीएमसी की सीनियर इंसपेक्टर माया मोरे ने चार्जरूम में तैनात असिस्टैंट पुलिस इंसपेक्टर डी.डी. चासकर को बुला कर मामले की शिकायत दर्ज कर के शीघ्र घटनास्थल पर पहुंचने का आदेश दिया. डी.डी. चासकर ने तुरंत शिकायत दर्ज की और सहयोगियों को साथ ले कर घटनास्थल के लिए रवाना हो गए. घटनास्थल थाने से 3-4 किलोमीटर दूर था, इसलिए थोड़ी ही देर में यह पुलिस टीम घटनास्थल पर पहुंच गई.

घटनास्थल पर पहुंच कर पुलिस टीम ने नाले में पड़ी गठरी को निकलवा कर खोला तो उस में महिला की लाश थी. मृतका 25 साल से ज्यादा की नहीं लगती थी. उस के गले में काले रंग का धागा बंधा था, जिस में एक लौकेट भी पड़ा था. कपड़ों में उस के शरीर पर गुलाबी रंग का सलवारसूट था. हाथों में नए जमाने की अंगूठियां और स्टील की चूडि़यां थीं. शक्लसूरत और पहनावे से वह मध्यमवर्गीय परिवार की कामकाजी महिला लग रही थी. लाश अकड़ चुकी थी. बारीकी से देखा गया तो उस के गले पर हलके रंग का नीला निशान दिखाई दिया. इस तरह नाले में लाश मिलने और गले पर नीला निशान होने से पुलिस को मामला हत्या का लगा.

डी.डी. चासकर घटनास्थल और लाश का निरीक्षण कर के शिनाख्त कराने की कोशिश कर रहे थे, तभी नवी मुंबई के पुलिस कमिश्नर के.एस. प्रसाद, अपर पुलिस कमिश्नर फत्ते सिंह पाटिल, एडिशनल पुलिस कमिश्नर के.एल. शहाजी उपाय, असिस्टैंट पुलिस कमिश्नर अरुण वालतुरे, सीनियर इंसपेक्टर माया मोरे, इंसपेक्टर बालकृष्ण सावंत, प्रमोद रोमण, असिस्टैंट इंसपेक्टर प्रणव कदम, सबइंसपेक्टर उल्हास कदम, प्रैस फोटोग्राफर तथा फिंगरप्रिंट ब्यूरो के सदस्य पहुंच गए.

प्रैस फोटोग्राफर और फिंगरप्रिंट ब्यूरो ने अपना काम निपटा लिया तो अधिकारियों ने भी घटनास्थल और लाश का निरीक्षण किया. इस के बाद डी.डी. चासकर से अब तक की प्रगति के बारे में पूछा. सारी जानकारी लेने के बाद इंसपेक्टर माया मोरे को आवश्यक दिशानिर्देश दे कर सभी अधिकारी चले गए. वरिष्ठ अधिकारियों के जाने के बाद माया मोरे ने एक बार फिर लाश की शिनाख्त कराने की कोशिश की. लेकिन उस भीड़ में से कोई भी मृतका की पहचान नहीं कर सका. इस से यह बात साफ हो गई कि मृतका वहां आसपास की रहने वाली नहीं थी.

हत्या कहीं और कर के लाश यहां ला कर फेंकी गई थी. जब लाश की शिनाख्त नहीं हो सकी तो पुलिस ने घटनास्थल की काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए वाशी महानगर पालिका के सरकारी अस्पताल भिजवा दिया. यह घटना 11 फरवरी, 2015 की सुबह की थी. थाने लौट कर थानाप्रभारी माया मोरे ने हत्याकांड के खुलासे के लिए वरिष्ठ अधिकारियों से सलाह कर के इंसपेक्टर बालकृष्ण सावंत के नेतृत्व में एक टीम गठित की, जिस में इंसपेक्टर प्रमोद रोमण, उल्हास कदम, असिस्टैंट इंसपेक्टर प्रताप राव कदम, डी.डी. चासकर, सिपाही लहू भोसले, परदेशी, नितिन सोनवणे, सुधीर चव्हाण, देव सूर्यवंशी, पंकज पवार, रामफेतले फुड़े और चिकणे को शामिल किया गया.

इस मामले की जांच को आगे बढ़ाने के लिए सब से जरूरी था मृतका की शिनाख्त, जो इस जांच टीम के लिए एक चुनौती थी. जैसा कि ऐसे मामलों में होता है, उसी तरह इस टीम ने भी सभी थानों से पता किया कि कहीं उस हुलिए कि किसी महिला की गुमशुदगी तो नहीं दर्ज है. टीम की यह कोशिश बेकार गई, क्योंकि इस तरह की महिला की कहीं किसी थाने में कोई गुमशुदगी दर्ज नहीं थी. इस कोशिश में असफल होने के बाद पुलिस लाश का फोटो ले कर थाणे के साथसाथ मानपाड़ा, चेंबूर, उल्हासनगर और नवी मुंबई के सभी बीयर बारों और गेस्टहाऊसों में गई कि शायद कहीं कोई उस की पहचान कर दे. इस बार पुलिस टीम को सफलता तो मिल गई, लेकिन पूरी तरह नहीं.

पुलिस को जो जानकारी मिली, उस के अनुसार मृतका बारमेड थी और उस का नाम शिल्पा उर्फ किस्मत था. लेकिन पुलिस को यह पता नहीं चला कि वह रहने वाली कहां की थी? यह पता करने के लिए पुलिस टीम ने अधिकारियों की सलाह पर मृतका शिल्पा उर्फ किस्मत की लाश के फोटो सभी प्रमुख अखबारों में छपवाने के साथसाथ स्थानीय चैनलों पर भी प्रसारित कराए. इस का फायदा यह हुआ कि पुलिस को मृतका के बारे में सारी जानकारी मिल गई, जिस के बाद मामले का खुलासा कर के पुलिस ने हत्यारे को पकड़ लिया.

15 फरवरी, 2015 को राजस्थान के शकरपुरा के रहने वाले शाबीर गुदड़ावत अपनी पत्नी के साथ थाना वाशी एपीएमसी पहुंचे और इंसपेक्टर बालकृष्ण सावंत को बताया कि टीवी चैनलों एवं अखबारों में जिस लाश की फोटो दिखाई गई हैं, वह उन की बेटी शिल्पा उर्फ किस्मत से काफी मिलतीजुलती हैं. उस से उन की कई दिनों से बात भी नहीं हो सकी है. बालकृष्ण सावंत शाबीर गुदड़ावत और उन की पत्नी को वाशी महानगर पालिका के अस्पताल ले गए, जहां शिल्पा उर्फ किस्मत का शव रखा था. जब उन्हें लाश और उस के कपड़े दिखाए गए तो शाबीर जहां सिसक उठे, वहीं उन की पत्नी छाती पीटपीट कर रोने लगीं. बालकृष्ण सावंत ने उन्हें धीरज बंधाया और जरूरी काररवाई पूरी कर के लाश कब्जे में ले ली.

लाश की शिनाख्त हो जाने के बाद अब पुलिस को हत्यारे की खोज करनी थी. शाबीर गुदड़ावत के अनुसार, शिल्पा की हत्या की सूचना उस की सहेली रिया ने दी थी. वह यहां उस के साथ करीब 4 सालों से रह रही थी. शाबीर गुदड़ावत से मिली जानकारी के आधार पर पुलिस ने शिल्पा की सहेली रिया को थाने बुलाया. वह थाणे पश्चिम के लोकमान्य तिलक नगर की चाल नंबर 4 में रहती थी. वह बार में डांस करती थी. शिल्पा से उस की मुलाकात थाणे के रेडबुल बीयर बार में हुई थी. वहां शिल्पा बारमेड का काम करती थी. पहले दोनों  का परिचय हुआ, उस के बाद दोस्ती हुई. दोस्ती गहरी हुई तो दोनों साथसाथ रहने लगीं.

पूछताछ में रिया ने जो बताया, उस के अनुसार, 10 फरवरी, 2015 की रात 8 बजे के करीब शिल्पा यह कह कर घर से निकली थी कि उस के किसी ग्राहक का फोन आया है. वह उस से मिल कर थोड़ी देर में आ जाएगी. लेकिन वह गई तो लौट कर नहीं आई. उस ने उसे फोन किया तो उस का मोबाइल बंद बता रहा था. उस के न आने और मोबाइल बंद होने से वह परेशान हो उठी. वह उस की तलाश करने लगी, लेकिन जब कई दिनों तक उस के बारे में कुछ पता नहीं चला तो वह थाने जा कर उस की गुमशुदगी दर्ज कराने के बारे में सोचने लगी. वह थाने जाती, उस के पहले ही उसे अखबारों और टीवी चैनलों से उस की हत्या की सूचना मिल गई. इस के बाद उस ने इस बात की जानकारी उस के पिता शाबीर गुदड़ावत को दे दी.

जिस तेजी से जांच आगे बढ़ी थी, उसी तेजी से रुक भी गई. क्योंकि पुलिस को जो उम्मीद थी, रिया से वे जानकारियां नहीं मिल सकीं. पुलिस को उम्मीद थी कि रिया से कोई न कोई ऐसी जानकारी मिल जाएगी, जिस के सहारे वह शिल्पा के हत्यारे तक पहुंच जाएगी. मगर ऐसा नहीं हो सका. हत्यारे तक पहुंचने के लिए पुलिस को अभी और पापड़ बेलने की जरूरत थी. जांच आगे बढ़ाने के लिए पुलिस टीम ने एक बार फिर शिल्पा के पिता शाबीर को थाने बुला कर शिल्पा के बारे में एकएक बात बताने को कहा. क्योंकि पुलिस को लग रहा था कि उन से मिली जानकारी में जरूर कोई ऐसा आदमी मिल सकता है, जिस पर संदेह किया जा सके.

और हुआ भी वही. शाबीर गुदड़ावत ने जो बताया, उस के अनुसार शिल्पा का पूर्व पे्रमी और मंगेतर दंगल सिंह संदेह के घेरे में आ गया. दंगल सिंह और शिल्पा के प्यार की एक लंबी कहानी थी, जो घर वालों ने उन के बचपन में ही लिख दी थी. दंगल सिंह की 2 बहनें थीं, जो थाणे में रहती थीं और बारों में डांस करती थीं. वह जब कभी मुबंई आता था, अपनी दोनों बहनों के पास ही रहता था. इसलिए पुलिस को लगा कि उस की बहनों से दंगल सिंह के बारे में जानकारी मिल सकती है. लेकिन जब पुलिस टीम उन के घर पहुंची तो वहां ताला बंद था.

पड़ोसियों से पूछने पर पता चला कि उन के आने के कुछ घंटे पहले ही वे ताला बंद कर के गांव चली गई हैं. उन के इस तरह चले जाने से पुलिस टीम को लगा कि जरूर दाल में कुछ काला है. इस के बाद बालकृष्ण सावंत ने अपनी जांच तेज कर दी. उन्होंने शिल्पा के पिता शाबीर गुदड़ावत से दंगल सिंह के बारे में पूरी जानकारी ले कर असिस्टैंट इंसपेक्टर प्रतापराव कदम, सबइंसपेक्टर उल्हास कदम, सिपाही नितिन सोनवणे, देव सूर्यवंशी, खेतले और लहु भोसले की टीम बना कर दंगल सिंह को गिरफ्तार करने के लिए उस के गांव भेज दिया.

मुंबई पुलिस की यह टीम दंगल सिंह के घर उस की बहनों के पहुंचने से पहले ही पहुंच जाना चाहती थी, क्योंकि पुलिस को जो जानकारी मिली थी, उस के अनुसार दंगल सिंह जिस गांव में रहता था, वह गांव काफी खतरनाक था. वह ऐसा गांव था, जहां स्थानीय पुलिस जाने से घबराती थी. अगर दंगल सिंह को पता चल जाता कि मुंबई पुलिस उसे गिरफ्तार करने गांव आ रही है तो वह बचने के लिए कुछ भी कर सकता था. मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ. स्थानीय पुलिस का सहयोग न मिलने के बावजूद मुंबई पुलिस ने अपनी सूझबूझ से दंगल सिंह को उस के घर से गिरफ्तार कर लिया. इस के बाद पुलिस ने दंगल सिंह से मिली जानकारी के आधार पर उस की दोनों बहनों को झांसी के बसअड्डे से गिरफ्तार किया और सभी को ले कर नवी मुंबई आ गई.

पूछताछ में दंगल सिंह ने तो शिल्पा की हत्या का जुर्म स्वीकार कर ही लिया. उस की दोनों बहनों ने भी स्वीकार कर लिया कि उन्हें शिल्पा की हत्या की जानकारी हो गई थी. डर की वजह से वे इस बात की सूचना पुलिस को देने के बजाय घर में ताला बंद कर के गांव के लिए रवाना हो गई थीं. क्योंकि उन्हें आशंका हो गई थी कि पुलिस उन के यहां कभी भी पहुंच सकती थी. इस पूछताछ में शिल्पा उर्फ किस्मत की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी—

बेडि़या समाज का 29 वर्षीय दंगल सिंह मध्य प्रदेश और राजस्थान की सीमा पर स्थित जिला शिवपुरी के गांव डबरापुर का रहने वाला था. उस के पिता का नाम भूप सिंह कर्मावत था, जो परिवार के साथ गांव में ही रहते थे. उन के परिवार में पत्नी, 3 बेटियां और एक बेटा दंगल सिंह था. भूप सिंह की 2 बेटियां महाराष्ट्र के जनपद थाणे में रहती थीं और मुंबई के बीयर बारों में डांस करती थीं. छोटी बेटी और बेटा दंगल सिंह गांव में ही रहता था. भूप सिंह की 2 बेटियां मुंबई में कमा रही थीं, इसलिए उसे किसी चीज की कमी नहीं थी. दंगल सिंह उन का एकलौता वारिस था, इसलिए घर के सभी लोग उसे बड़ा प्यार करते थे.

गांव में भूप सिंह के पास ठीकठाक खेती की जमीन थी. फिर भी उस ने अपना नाचगाने का पेशा नहीं छोड़ा था. पहले इन की लड़कियां मुजरा करती थीं. अब मुजरे का चलन रहा नहीं, इसलिए इन की लड़कियां मुंबई जा कर बीयर बारों में डांस करने लगीं. भूप सिंह और शाबीर गुदड़ावत की पुरानी रिश्तेदारी थी. इसी वजह से भूप सिंह के घर बेटा और शाबीर गुदड़ावत के घर बेटी पैदा हुई तो दोनों ने बचपन में ही उन की शादी तय कर दी. शिल्पा शाबीर की सब से छोटी बेटी थी. अपने पेशे के हिसाब से वह भी नाचगाने में निपुण थी.

परिवार में छोटी होने की वजह से शिल्पा पर काम की कोई जिम्मेदारी नहीं थी. सुंदर वह थी ही, स्वभाव से भी चंचल थी. सयानी होने पर जब उसे पता चला कि दंगल सिंह से उस की शादी तय हो चुकी है तो वह उस से प्यार करने लगी. उन्हें मिलने में भी कोई परेशानी नहीं होती थी. क्योंकि दोनों ही परिवारों का एकदूसरे के यहां खूब आनाजाना था. उन के मिलने में भी किसी को कोई ऐतराज नहीं था.

इस का नतीजा यह सामने आया कि शादी के पहले ही शिल्पा गर्भवती हो गई. बच्चा दंगल सिंह का है, यह जानते हुए भी उस के घर वालों ने शादी से मना कर दिया. शिल्पा और दंगल सिंह की शादी तो टूटी ही, दोनों परिवारों के संबंध भी टूट गए. दंगल सिंह ने घर वालों को बहुत समझाया, पर घर वाले किसी भी कीमत पर शादी के लिए राजी नहीं हुए. उन्होंने उसे शिल्पा से मिलने पर पाबंदी भी लगा दी. यह सन 2013 की बात है.

शिल्पा ने समय पर बेटी को जन्म दिया. बेडि़या समाज में बेटी का जन्म बहुत शुभ माना जाता है. इस की वजह यह है कि बेटी को ये लोग कमाई का जरिया मानते हैं. इस के बावजूद दंगल सिंह के घर वाले शिल्पा को अपनाने को तैयार नहीं हुए. शिल्पा की बेटी जब थोड़ी बड़ी हुई तो उसे उस के भविष्य को ले कर चिंता हुई. इसलिए वह बेटी को मातापिता के पास छोड़ कर मुंबई आ गई. मुंबई में उस के गांव की कई लड़कियां रहती थीं, जो मुंबई और नवी मुंबई में बीयर बारों में डांसर या बारमेड का काम कर के अच्छा पैसा कमा रही थीं. उन्हीं की मदद से शिल्पा को भी बीयर बार में बारमेड का काम मिल गया.

उस ने थाणे के रेडबुल बीयर बार में नौकरी शुरू की थी, तभी उस की मुलाकात रिया से हुई थी. रिया बार डांसर थी. दोनों में दोस्ती हुई तो वे थाणे के लोकमान्य तिलक नगर में किराए का मकान ले कर एक साथ रहने लगीं. शिल्पा के प्यार में पागल दंगल सिंह को जब पता चला कि शिल्पा मुंबई चली गई है तो वह उस से मिलने मुंबई आनेजाने लगा. उस की बहनें वहां रहती ही थीं, इसलिए उसे न वहां रहने में परेशानी हुई थी और न शिल्पा से मिलने में.

समय अपनी गति से चलता रहा. दंगल सिंह जब भी मुंबई आता, शिल्पा से मिलता और उस के साथ घूमताफिरता. उस के अब भी शिल्पा के साथ पहले जैसे ही संबंध थे. इस बार दंगल सिंह मुंबई आया तो उस ने अपनी बहनों से कहा कि वह शिल्पा से शादी कर के उसे अपने साथ ले जाएगा. तब उस की बहनों ने कहा कि शिल्पा बहुत ही स्वाभिमानी लड़की है. वह अपने मातापिता और समाज के खिलाफ कोई भी काम नहीं करेगी. इस के अलावा उस के मातापिता ने उस से विवाह के लिए जो रकम तय की थी, उसे वह कहां से देगा.

दंगल सिंह ने बहनों की बातों पर ध्यान नहीं दिया और अपने प्यार पर विश्वास कर के रात 8 बजे शिल्पा को फोन कर के मिलने के लिए बुलाया. शिल्पा दंगल सिंह से मिलने आई तो वह उसे नवी मुंबई के कोपर खैरणे स्थित अपनी बहनों के घर ले आया. यह घर उस समय खाली पड़ा था. दंगल सिंह ने यहां आ कर पहले शिल्पा के साथ शारीरिक संबंध बनाए, उस के बाद वह शिल्पा पर शादी के लिए दबाव बनाने लगा. शिल्पा इस के लिए राजी नहीं थी. उस का कहना था कि वह समाज और घर वालों के खिलाफ जा कर उस से शादी नहीं कर सकती. अगर वह उस से शादी करना चाहता है तो अपने घर वालों को राजी कर के समाज के हिसाब से शादी करे.

बेडि़यों में शादी के लिए लड़कों की ओर से लड़की वालों को काफी दानदहेज दिया जाता है. दंगल सिंह के घर वाले राजी नहीं थे, जबकि उस के पास देने के लिए कुछ नहीं था. उस ने शिल्पा को समझाया कि वह समाज के हिसाब से शादी नहीं कर सकता, क्योंकि उस के पास देने को कुछ नहीं है. वह उसे प्यार करता था और अभी भी करता है. वह उस के बिना नहीं रह सकता. वह उस से शादी कर के समाज और घर वालों से दूर जा कर उस के साथ रहेगा. वह उस से बीयर बार की नौकरी छोड़ कर अपने साथ चलने को कहने लगा, पर शिल्पा इस के लिए राजी नहीं हुई.

काफी कहनेसुनने और समझाने पर भी जब शिल्पा नहीं मानी तो दंगल सिंह को गुस्सा आ गया. पहले तो उस ने उस की काफी पिटाई की. इस पर भी वह नहीं मानी तो उस ने उस का गला दबा दिया. सांस रुक जाने से शिल्पा मर गई. गुस्से में दंगल सिंह ने शिल्पा को मार तो दिया, लेकिन जब गुस्सा शांत हुआ तो उसे जेल जाने का डर सताने लगा. पुलिस और कानून से बचने के लिए दंगल सिंह शिल्पा की लाश को ठिकाने लगाने के बारे में सोचने लगा. काफी सोचविचार कर उस ने लाश को बैडशीट में लपेट कर बांधा और औटोरिक्शा से ले जा कर कोपर गांव और नवी मुंबई के बोनकोड गांव के बीच बहने वाले नाले में फेंक आया.

लाश को ठिकाने लगा कर दंगल सिंह अपनी बहनों के पास गया और गांव जाने की तैयारी करने लगा. जब उस की बहनों ने शिल्पा से शादी के बारे में पूछा तो उस ने रात घटी सारी घटना बता दी. हत्या की बात सुन कर बहनें डर गईं. दंगल सिंह तो उसी सुबह कुर्ला रेलवे स्टेशन से तुलसी एक्सप्रैस पकड़ कर गांव चला गया, जबकि बहनें 10 फरवरी को निकलीं. पूछताछ के बाद पुलिस ने दंगल सिंह की बहनों को निर्दोष मान कर छोड़ दिया, जबकि उस के खिलाफ शिल्पा उर्फ किस्मत की हत्या का मुकदमा दर्ज कर के नवी मुंबई के मैट्रोपौलिटन मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक वह जेल में था. इंसपेक्टर बालकृष्ण अपने सहयोगियों की मदद से आरोप पत्र तैयार कर रहे थे. Crime Stories

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Suspense Story: नहीं था वह कोई करिश्मा

Suspense Story: बच्चे को पूंछ निकली देख कर लोगों ने उसे हनुमानजी का अवतार मान लिया और उस के दर्शन के लिए आने ही नहीं लगे, बल्कि उस पर चढावा भी चढ़ाने लगे. लेकिन जब उस पूंछ की वजह से बच्चे को परेशानी हुई तो उस की असलियत सब के सामने आ गई और सभी ने मान लिया कि वह कोई करिश्मा नहीं था.

सरहिंद से पश्चिम की ओर कुछ किलोमीटर की दूरी पर एक गांव पड़ता है संगतपुर सोढियां. इसी  गांव में रहते थे पंजाब के जानेमाने संगीतकार मास्टर जाने खान. उन की संतानों में 5 बेटियां और 2 बेटे थे, जिन में चौथे नंबर पर था इकबाल कुरैशी. इकबाल बचपन से ही गानेबजाने का शौकीन था. वह गीतगजल लिखता और खुद ही गाता. उस के कुछ गीत काफी लोकप्रिय हुए, जिस से उसे लोग गीतकार और गायक के रूप में जाननेपहचानने लगे. अपनी इस शोहरत से वह कुछ इस तरह उत्साहित हुआ कि गीतसंगीत को ही उस ने अपनी आजीविका का साधन बना लिया.

शादी लायक हुआ तो सन 1970 में सुरैया बेगम से उस का निकाह हो गया. सुरैया से उसे 5 बच्चे हुए. बेटियों में उषा,सलमा, शहनाज और बेटों में साहिब अली तथा अमानत अली. पहले इकबाल कुरैशी दूसरी जगह रहते थे, सन 1978 में वह सपरिवार जिला फतेहगढ़ साहिब के गांव नबीपुर में आ कर रहने लगे थे. बच्चे बड़े हुए तो उषा की शादी मलेरकोटला के एक गांव में कर दी. सन 1997 में सलमा का निकाह साहनेवाल के रहने वाले राज मोहम्मद से कर दिया. राज मोहम्मद एक हलवाई के यहां नौकरी करता था. सलमा को बीवी के रूप में पा कर वह बहुत खुश था.

लेकिन राज मोहम्मद की खुशी तब काफूर हो गई, जब उसे किसी ढोंगी तांत्रिक ने बताया कि उस की शरीकेहयात बच्चा जनते ही अल्लाह को प्यारी हो जाएगी. उस तांत्रिक पर राज मोहम्मद को गहरी आस्था थी, इसलिए उस की बात को उस ने पूरी तरह सच मान लिया. यह बात उस ने घर वालों को बताई तो सभी को जैसे सांप सूंघ गया. तांत्रिक की बात को गंभीरता से ले कर सब आपस में सलाहमशविरा करने लगे. परिवार के एक बुजुर्ग ने कहा, ‘‘आजकल बड़ा बुरा समय चल रहा है. बहू अगर ससुराल में मर जाती है तो ससुराल वालों को काफी परेशानी उठानी पड़ती है.’’

‘‘तुम्हारी यह बात एकदम सही है. औरत भले ही अपनी मौत मरी हो, लेकिन पुलिस आ कर सब को पकड़ ले जाती है. तब लड़की के घर वाले भी कहने लगते हैं कि उन की बेटी को दहेज के लालच में ससुराल वालों ने मार दिया है.’’ किसी दूसरे बुजुर्ग ने उस की हां में हां मिलाते हुए कहा.

इस मुद्दे पर काफी विचारविमर्श करने के बाद नतीजा यह निकाला गया कि जब ऐसी स्थिति आएगी तो सलमा को उस के मायके पहुंचा दिया जाएगा. प्रसव के समय अगर वह मायके में मर भी जाती है तो उन पर कोई जिम्मेदारी नहीं आएगी. इस के बाद वही किया गया. सलमा गर्भवती थी ही, प्रसव का समय नजदीक आया तो राज मोहम्मद ने उसे उस के मायके नबीपुर पहुंचा दिया. समय पर सलमा को बेटा पैदा हुआ. बेटा एकदम स्वस्थ था तो सलमा को भी न प्रसव से पहले कोई परेशानी हुई थी न प्रसव के दौरान और न ही प्रसव के बाद. बच्चे को जन्म देते समय उस के मर जाने की बात तो दूर, उसे कोई ज्यादा तकलीफ भी नहीं हुई थी. कुछ दिनों बाद सलमा पहले की तरह घरबाहर के सभी काम भी करने लगी थी.

सलमा को बेटा हुआ है, इस बात की सूचना देने के बावजूद भी उस की ससुराल से न कोई आया और न किसी तरह की खुशी मनाई. तांत्रिक की बातों पर विश्वास करते हुए ससुराल वाले सलमा की मौत का इंतजार करते रहे. समय अपनी रफ्तार से बढ़ता रहा. सलमा सहीसलामत अपने बच्चे की परवरिश करती रही. उसे तांत्रिक की भविष्यवाणी की जानकारी नहीं थी. हां, यह सोच कर वह जरूर परेशान हो रही थी कि उस की ससुराल वाले उसे और बच्चे को देखने क्यों नहीं आए. उसे क्या पता कि ससुराल वाले उस के मरने का इंतजार कर रहे हैं. उसे तो इस बात की कल्पना तक नहीं थी.

इसी तरह कुछ दिन और बीते. जब सलमा को कुछ नहीं हुआ तो उस की ससुराल वाले बारीबारी से आ कर बच्चे को देख गए. जब उन्हें विश्वास हो गया कि सलमा को कुछ नहीं होने वाला तो एक दिन राज मोहम्मद आ कर सलमा को लिवा ले गया. दरअसल, इस बीच राज मोहम्मद ने तांत्रिक से मिल कर इस बारे में बात कर ली थी. तब उस ढोंगी तांत्रिक ने उस से अच्छेखासे पैसे ले कर कहा था कि इस बार का खतरा उस ने अपनी शक्ति से टाल दिया है. लेकिन दूसरा बच्चा निश्चित ही उस के लिए परेशानी खड़ी करेगा. सलमा का दूसरा बच्चा पैदा होगा तो वह कहीं की न रहेगी. दूसरे बच्चे के जन्म के समय वह मर जाएगी. अगर मरी नहीं तो निश्चित पागल हो जाएगी.

खैर, सलमा ससुराल पहुंच गई. बेटे के साथ वह दिन भर मस्त और व्यस्त रहती. हमेशा खुशी का आलम बना रहता था. पहले उसे इस बात की शिकायत थी कि बेटा पैदा होने पर ससुराल से तुरंत कोई क्यों नहीं आया था, लेकिन धीरेधीरे उस ने इसे भी भुला दिया. किसी दिन सलमा ने घर वालों के बीच हो रही बातचीत सुन ली तो उसे तांत्रिक वाली बात मालूम हो गई. सच्चाई जान कर उसे बहुत दुख हुआ. उस का मन चाहा कि वह इस बारे में सब से चीखचीख कर पूछे, लेकिन उस ने समझदारी से काम लिया. किसी भी तरह का बखेड़ा खड़ा किए बगैर वह शांत रही. यही नहीं, इस बात को मन से निकालने का भी प्रयास किया. आखिर कुछ दिनों बाद इसे भूल भी गई.

वक्त पंख लगा कर उड़ता रहा. सलमा का बेटा साल भर का हो गया. सलमा ने अपनी हैसियत के मुताबिक बच्चे का जन्मदिन खूब धूमधाम से मनाया. उन्होंने उस बच्चे का नाम रखा था मनी मोहम्मद. मनी मोहम्मद अभी कुल सवा साल का हुआ था कि सलमा के पैर फिर से भारी हो गए. समय के साथ वह फिर उस स्थिति में आ गई कि किसी भी समय बच्चा पैदा हो सकता है तो बहाना बना कर राज मोहम्मद उसे एक बार फिर उस के मांबाप के पास नबीपुर छोड़ आया. इस बार सलमा को तांत्रिक की बताई हर बात मालूम थी. उस ने यह बात पिता को ही नहीं, अन्य लोगों को भी बता दी थी. लेकिन किसी ने उस की इस बात पर ध्यान नहीं दिया. तब सब ने यही कहा कि हो सकता है पिछली बार की तरह इस बार भी मायके में प्रसव होने से अनहोनी टल जाए.

सलमा का मन इस तरह की बातों से काफी खिन्न था. लेकिन वह कर भी क्या सकती थी. उस ने अब्बू से बात की तो उन्होंने भी उसे समझाते हुए कहा, ‘‘जैसा लोग सोचते हैं, उन्हें सोचने दो. तुम अपने दिमाग पर किसी तरह का बोझ मत डालो. पिछली बार तुम्हें कोई परेशानी नहीं हुई थी न, देखना इस बार भी कोई परेशानी नहीं होगी.’’

पिता कुछ भी कहते, कितना भी समझाते, लेकिन सलमा के मनमस्तिष्क पर इन बातों का गहरा असर पड़ चुका था. ससुराल वालों का व्यवहार भुला पाना उस के लिए मुश्किल हो रहा था. लिहाजा वह उदास रहने लगी थी. जैसेतैसे दिन गुजरते गए. नबीपुर से एक किलोमीटर की दूरी पर बसे गांव जलवेड़ा की दाई शिब्बो को पहले ही सहेज दिया गया था. शिब्बो दाई 100 साल की उम्र पार कर चुकी थी. अपने फन में माहिर शिब्बो ने यही काम कर के एक तरह से इतिहास रचा था. अपनी पूरी तैयारी कर के उस ने वक्त पर पहुंचने का आश्वासन दिया था. 15 फरवरी, 2001 की शाम को शिब्बो का बुलावा आया तो पहले से ही तैयार बैठी शिब्बो नबीपुर पहुंच गई.

पहले बच्चे की तरह सलमा ने इस बार भी स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया. इस बार भी उस का प्रसव शिब्बो ने करवाया था. शिब्बो बच्चे की सफाई करने लगी तो उस का स्वरूप देख कर चौंकी. अब तक के जीवन में हजारों बच्चों को जन्म दिलवाया था, लेकिन इस तरह का बच्चा उस ने पहले कभी नहीं देखा था. इस बच्चे का स्वरूप उसे चमत्कारिक लगा. शक्लसूरत से बच्चा भले ही इंसानी लग रहा था, लेकिन उस के शरीर में विलक्षण चीजों की कमी नहीं थी.

शिब्बो ने नाल काटने के बाद बच्चे को नहला कर लिटा दिया और उसे एकटक देखने लगी. पल भर बाद अचानक वह जोर से चिल्ला कर बोली, ‘‘अरे कहां है बच्चे का बाप, बुलाओ उसे? हजारों बच्चे पैदा किए हैं, लेकिन ऐसा बच्चा पहले कभी नहीं देखा. कोई कुछ भी कहे, लेकिन मैं कहती हूं कि यह बच्चा बजरंग बली का अवतार है. इस की पूंछ देखो, बाजू और हाथपैर देखो, इस के जिस्म का एकएक अंग कह रहा है कि यह पवनपुत्र का अवतार है.’’

बच्चा देखने में खूबसूरत था और पूरी तरह स्वस्थ भी. इस के बावजूद उस के समूचे जिस्म में अनेक विलक्षणताएं थीं. सब से बड़ी विलक्षणता तो यह थी कि उसे डेढ़दो इंच लंबी पूंछ थी. इस के अलावा बच्चे के शरीर में कुछ अन्य निशान भी अन्य बच्चों से अलग थे. उस समय कमरे में सलमा और नवजात शिशु के अलावा शिब्बो दाई ही थी. अपने काम के लिए शिब्बो को आज तक किसी की मदद की जरूरत नहीं पड़ी थी. उस की अलाप सुन कर घर की महिलाएं दौड़ कर कमरे में आ गईं. उन्होंने भी बच्चे को देखा तो दांतों तले अंगुली दबा ली. कुछ ही देर में पासपड़ोस के लोग भी पहुंच गए. उन में गांव के एक जानेमाने पुजारी भी थे.

उन्होंने बच्चे के जिस्म की विलक्षणताओं को परखने का प्रयास किया. बच्चा पलक नहीं झपका रहा था. उस के बाएं बाजू पर गोल निशान था. पुजारीजी ने इस की तुलना सीता माता की मोहर से की. बाएं पांव पर तीर का निशान था. पुजारीजी ने इस की तुलना राजा भरत के तीर मारने की घटना का उल्लेख करते हुए कहा कि यह उसी तीर का निशान है. उसी पांव पर टखने के पास कुंडल का निशान था. पुजारीजी ने कहा कि हनुमानजी जो कुंडल पहनते थे, यह उसी का निशान है. दाएं पैर के नीचे क्रौस का निशान था. इसे पुजारीजी ने पद्म का निशान बताया. उन का कहना था यह निशान उन्हीं लोगों को होता है, जो ईश्वर को बहुत प्यारे होते हैं.

इस के अलावा बच्चे के बाएं कंधे पर रौकेट जैसे तीर का निशान था. कमर में धागा बांधने का भी निशान था. इस के बाद पुजारीजी ने सलमा और बच्चे का पैर छू कर अपने दोनों हाथों को ऊपर उठा कहा, ‘‘यह बच्चा बजरंगबली का अवतार है. सभी लोग सिर झुका कर इस अवतार को प्रणाम करें. इसी के साथ मैं सलमा बेटी से एक बात कहना चाहूंगा. जब तक यह बच्चा सवा साल का न हो जाए, वह पति को अपने पास बिलकुल न आने दें. वह खुद भी पति का मुंह न देखें. साथ ही यह भी कोशिश करें कि उस का पति भी बच्चे का मुंह भी न देखे.’’

इस के बाद तो वहां का माहौल ही बदल गया. बच्चे का नाम रख दिया गया बालाजी. ‘जय बालाजी’ और ‘जय बजरंग बली’ के जयकारे लगने लगे. धीरेधीरे यह समाचार आसपास फैला तो उस के दर्शन के लिए लोग आने लगे. बात मीडिया तक पहुंची तो अगले दिन यह समाचार क्षेत्रीय अखबारों में छप गया. इस के बाद सैंकड़ों लोग बच्चे के दर्शन के लिए पहुंचने लगे. शाम को दर्शनार्थियों की भीड़ कम हुई तो इकबाल कुरैशी ने चढ़ाया गया चढ़ावा समेटा.

इकबाल कुरैशी ने दरजनों गीत लिखे थे. सरदूल सिकंदर और अमर नूरी द्वारा गाए उन के गीत तो इस कदर लोकप्रिय हुए थे कि इकबाल कुरैशी नाम पंजाब के हर शहर, हर मोहल्ले में गूंज गया था. लेकिन इतनी प्रसिद्धि हासिल कर लेने के बाद भी लक्ष्मी कभी उन पर मेहरबान नहीं हुई थी. चूंकि गाने लिखने और गाने के अलावा अन्य कोई धंधा उन के पास नहीं था, इसलिए वह हमेशा ही मुफलिसी से घिरे रहते थे. लेकिन आज उन के यहां जैसे नोटों की बरसात हुई थी. यह सिलसिला केवल एक दिन का नहीं था. जितने लोग पहले दिन आए थे, उस से कहीं ज्यादा लोग अगले दिन आए थे. फिर तो यह संख्या बढ़ती ही गई. आने वाले बढ़ते गए तो चढ़ावे की राशि भी बढ़ती गई.

लोग नन्हे बालाजी के सामने हाथ जोड़ कर मनौती भी मांगने लगे. काम हो जाने के बाद गाजेबाजे के साथ चढ़ावा ले कर आने लगे. कुछ ही दिनों में नबीपुर की अलग ही महिमा हो गई. श्रद्धालुओं ने पैसा इकट्ठा कर के नबीपुर में एक बहुत बड़ा भूखंड खरीद लिया. उस पर धार्मिक स्थल का निर्माण भी शुरू करवा दिया. इधर सलमा के मायके में यह सब चल रहा था, उधर ससुराल में इस मुद्दे पर कई दिनों तक विचारविमर्श किया गया. इस के बाद एक दिन वे सलमा और उस के बच्चों को ले जाने के लिए नबीपुर आ पहुंचे. लेकिन इकबाल कुरैशी ने उन्हें सलमा से मिलने नहीं दिया. इस के बाद बात पंचायत तक पहुंची. पंचायत को जब पुजारी की बात बताई गई तो पंचायत ने फैसला दिया कि जब तक बच्चा सवा साल का नहीं हो जाता, राज मोहम्मद उस का और पत्नी का मुंह नहीं देखेगा.

बच्चे के सवा साल होने के बाद वह इन्हें ले जा सकता है. इस बीच राज मोहम्मद को प्रत्येक सप्ताह चढ़ावे की राशि से 2 हजार रुपए मिलेंगे. इस तरह बच्चे की वजह से उस की महीने में 8 हजार रुपए की कमाई होने लगी. पंचायत का यह फैसला सभी को जंच गया और सलमा की ससुराल वाले खुशीखुशी वापस लौट गए. यह सिलसिला चलते एक साल से अधिक बीत गया. इस बीच बच्चे के जिस्म के निशान जहां मिटने लगे थे, वहीं उस की पूंछ बढ़ कर 6 इंच हो गई थी. धीरेधीरे मामला पंजाब में चर्चा का विषय बन गया. कोई इसे अद्भुत चमत्कार कहता था तो कोई कुदरत का अनूठा करिश्मा कहता था. तमाम लोगों की धार्मिक भावनाएं बच्चे के साथ जुड़ गईं तो कुछ लोगों ने इसे अंधविश्वास कहा.

डाक्टरों ने इसे न चमत्कार माना, न कोई करिश्मा. उन का कहना था कि बच्चे की पूंछ तत्काल कटवा देनी चाहिए, वरना यह पूंछ उस के लिए भारी परेशानी बन जाएगी. उन्होंने इसे चाइल्ड एब्यूज का मामला माना है. तर्कशील सोसायटी वालों ने भी आ कर इकबाल कुरैशी को उन्हें समझाया कि वे अंधविश्वास को बढ़ावा दे रहे हैं. लेकिन उस समय किसी ने किसी की बात पर ध्यान नहीं दिया. तब घर के सभी लोग इस बात पर अड़े रहे कि उन के यहां पवनपुत्र का अवतार हुआ है. कहा जाता है कि अपने देश में आज शिक्षण व चिकित्सा संस्थानों से कई गुना ज्यादा धार्मिकस्थल हैं. कहा तो यह भी जाता है कि इन्हीं की वजह से इस से देश की अर्थव्यवस्था प्रभावित होने लगी है. क्योंकि अधिकांश लोग धर्म के मामले में संवेदनशील तो हैं ही, धर्मांध की तरह व्यवहार भी करते हैं.

यही वजह है कि कुकुरमुत्तों की तरह कथित धर्मस्थल पनपने लगे हैं. ऐसे में हनुमानजी के इस कथित अवतार वाला यह नया कथित धर्मस्थल भी न केवल अस्तित्व में आ गया, बल्कि धर्मभीरू लोगों के आकर्षण और उन की अंधश्रद्धा का केंद्र भी बन गया. झंडे लहरा उठे, घंटियां बजने लगीं. हनुमानजी के विभिन्न स्वरूपों वाले चित्रों का सहारा लिया जाने लगा. भीड़ जुट रही थी, पैसा बरस रहा था. लेकिन 2 साल बीततेबीतते स्थिति यह बन गई कि बालाजी नामक इस बालक की पूंछ की लंबाई 7 इंच पर पहुंच कर रुक गई. इसी के साथ बच्चे के जिस्म के सारे निशान मिट गए. इसी के साथ तमाम अंगों का विकास रुकने लगा. इस के अलावा उसे अन्य कई तरह की परेशानियां भी होने लगीं. तब उसे डाक्टरों के पास ले जाया गया.

डाक्टरों ने उस की परेशानियों का इलाज करते हुए बताया कि इस सब की वजह बच्चे के जिस्म पर उगी पूंछ है. लेकिन उन्होंने पूंछ काटने में अपनी असमर्थता जाहिर कर दी. बच्चे की पूंछ कटवाने को ले कर परिवार में 2 राय थी. पूंछ के कटते ही सारा खेल खत्म हो जाता, लेकिन कुछ समय बाद इस विकृति ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया. बच्चा देखने में अपनी उम्र से छोटा तो लग ही रहा था, उस के निचले अंगों में खासी परेशानी होने लगी. वह चलनेफिरने में अक्षम होने लगा. हाजत होने के साथ पेशाब तुरंत निकल जाती. फिर भी जैसेतैसे समय आगे सरकता गया और अजीब शारीरिक परेशानियों से ग्रस्त बच्चे को हनुमानजी का अवतार कहते धर्म की दुकानदारी चलती रही.

यहां एक बात बताना जरूरी होगा कि एक ढोंगी तांत्रिक ने इस बच्चे के जन्म के बाद उस की मां की मौत हो जाने की ‘भविष्यवाणी’ की थी. मगर मां को तो कुछ नहीं हुआ, बच्चा 4 साल का हुआ तो उस के पिता की मौत जरूर हो गई. इस के बाद बच्चे की मां ने दूसरा निकाह कर लिया. खैर, बच्चे के भीतर पैदा हुए विकारों में बढ़ोत्तरी होती जा रही थी. धर्मभीरु लोग उस के आगे हाथ जोड़ कर खड़े आशीर्वाद की दरकार कर रहे होते और उस की पेशाब निकल कर उन भक्तों की ओर बढ़ने लगती. धीरेधीरे लोगों के मनों में यह धारणा बैठने लगी कि बच्चे के केवल पूंछ निकल आने से ही उसे भगवान कह कर कहीं उन्हें मूर्ख तो नहीं बनाया जा रहा. उन का विश्वास डगमगाने लगा. बच्चा पहले ही से बीमार लग रहा था, अब अभिभावक भी उसे बीमार कह कर पेशाब निकलने की बात कहने लगे.

जब भगवान ही बीमार पड़ गए तो भक्तों का क्या भला करेंगे, यह सोच कर बच्चे के दर्शन के लिए आने वाले लोग कम होने लगे. भीड़ छंटी तो चढ़ावा भी कम हो गया. आखिर एक स्थिति ऐसी आ गई कि तमाम लोगों का वहां आना बंद हो गया. इसी के साथ आय का अच्छाखासा स्रोत बंद हो गया. बालाजी के परिवार वालों के पास जो जमापूंजी थी, वह धीरेधीरे खत्म होने लगी. बच्चे की हालत अलग से बिगड़ती जा रही थी. बहरहाल, किसी के कहने पर बालाजी को मोहाली स्थित फोर्टिस अस्पताल ले जाया गया. फरवरी, 2015 में न्यूरोसर्जरी विभाग के डायरैक्टर डा. आशीष पाठक ने बालाजी की गहन जांच की तो पाया कि कथित पूंछ की वजह से बच्चे की रीढ़ की हड्डी में बदलाव आने लगा था, जो उस के लिए बहुत खतरनाक हो सकता था.

डा. पाठक के अनुसार, बच्चा क्लबफुट डिफौर्मिटी का शिकार हो गया था. उन्होंने बच्चे को यूरोलौजिस्ट के पास भेजा, जहां डा. मनीष आहूजा ने उसे क्लीन इंटरिमिटैंट केथेराइजेशन सिखाते हुए उस का ब्लैडर पूरी तरह खाली करवाया. 3 महीनें तक बच्चे को दवाएं देते हुए उस के टेस्ट किए गए. इकबाल कुरैशी ने पहले ही अपनी मजबूरी डाक्टरों को बता दी थी कि बच्चे का इलाज कराने के लिए उन के पास पैसे नहीं है. इस के बाद अस्पताल से जुड़ी एक गैरसरकारी संस्था ने उस के इलाज का खर्च अपने ऊपर ले लिया.

डा. आशीष पाठक के बताए अनुसार, यह एक निहायत जटिल एवं कठिन औपरेशन था. मगर उन्होंने अपनी टीम के योग्य सदस्यों की मदद से 7 घंटे तक जटिल सर्जरी कर के बच्चे की पूंछ हटा कर उसे भगवान से आम इंसान बना दिया. महीना भर बालाजी को औब्जर्वेशन में रखने के बाद डा. पारुल व डा. आहूजा ने 1 जुलाई, 2015 को एक संवाददाता सम्मेलन का आयोजन कर पत्रकारों के सामने पेश किया. बच्चे से पत्रकारों ने खूब बातें कीं. डाक्टरों को विश्वास है कि बालाजी पर किया जा रहा उन का उपचार पूरी तरह कामयाब रहेगा. Suspense Story

Hindi Stories: अंजानों पर विश्वास का नतीजा

Hindi Stories: संजय गुप्ता सोनू की फितरत समझ नहीं पाए और उस पर विश्वास कर के उस का पुलिस वेरीफिकेशन भी नहीं कराया. शातिर सोनू ने इसी का फायदा उठा कर ऐसा क्या कर डाला कि अब संजय गुप्ता को पछतावा हो रहा है.

उत्तर प्रदेश का नोएडा शहर देश की राजधानी दिल्ली की सीमा से सटे तेजी से विकसित व्यावसायिक नगर के रूप में जाना जाता है. यह शहर एशिया के बड़े औद्योगिक उपनगरों में से एक है. यहां की अधिकांश जमीनों पर बड़ीबड़ी इमारतें बन गईं हैं. विकास की पगडंडियों के बीच यहां रहने वालों की अपनीअपनी जिंदगियां हैं. सेक्टर-41 की कोठी नंबर बी-169 में रहने वाले संजय गुप्ता की पत्नी श्रीमती राखी गुप्ता अच्छी चित्रकार थीं. उन्होंने सैंकड़ों पेंटिंगें बनाई थीं. यह उन का पेशा नहीं, बल्कि शौक था, जिसे पूरा करने के लिए वह कैनवास पर जिंदगी के रंगों को अक्सर उकेरा करती थीं. अभिव्यक्ति के अपने मायने होते हैं, उसे प्रदर्शित करने का सभी का अपना अलगअलग अंदाज होता है.

उस दिन भी सफेद कैनवास पर अपनी अंगुलियों से ब्रश के जरिए जो चित्र उन्होंने उकेरा था, वह एक खुशहाल परिवार का था, जिस में पतिपत्नी और उन के 2 बच्चे प्रसन्न मुद्रा में नजर आ रहे थे. सभी की बांहें एकदूसरे के गले में थीं. ब्रश को किनारे रख कर राखी पेंटिंग को निहारने लगीं. काफी देर तक अपलक निहारने के बाद उन की आंखों में अचानक आंसू छलक आए. आंसुओं ने लुढ़क कर अपना सफर शुरू किया तो राखी ने साड़ी के पल्लू से उन के वजूद को मिटाने की कोशिश की. सोफे पर बैठे संजय की नजर पत्नी पर गई तो नजदीक जा कर उन के कंधे पर हाथ रख कर बोले, ‘‘तुम बारबार परेशान क्यों हो जाती हो?’’

‘‘मेरा दुख तुम जानते हो, फिर भी…’’

‘‘हम कोशिश तो कर रहे हैं. इस तरह हिम्मत नहीं हारते, एक दिन हमारा बेटा अवश्य ठीक हो जाएगा.’’

‘‘पता नहीं कैसा संयोग है. मेरा फूल सा बेटा बिस्तर पर पड़ा है. इंजीनियर बनना था, कितने सपने थे हमारे. काश, इस की जगह मेरी यह हालत हो जाती.’’

‘‘मैं तुम्हारा दर्द समझता हूं राखी. लेकिन इस तरह परेशान होने से भी तो काम नहीं चलेगा.’’ संजय ने कहा.

‘‘फिर भी मैं ने कभी नहीं सोचा था कि हमारा होनहार बेटा इस हाल में होगा. मैं मां हूं, इस का दर्द महसूस करती हूं. वह सब जानतासमझता है, लेकिन अपनी वेदना व्यक्त करने में नाकाम है. जब उस की आंखों में छटपटाती बेबसी देखती हूं तो तड़प कर रह जाती हूं. हर पल इसी के बारे में सोचती रहती हूं. मुझे जिंदगी में कुछ नहीं चाहिए, बस मेरा बेटा ठीक हो जाए.’’ कहने के साथ ही राखी फफक कर रो पड़ीं.

‘‘भरोसा रखो, एक दिन सब ठीक हो जाएगा.’’ संजय ने प्यार से समझाया तो राखी ने हर बार की तरह उस दिन भी सुखद उम्मीदों के साथ अपने दिल को समझाने की नाकाम कोशिश की.

यह एक कड़वी हकीकत है कि जिंदगी कई बार इंसान के साथ बहुत सख्ती से पेश आती है. बेबसी तब तूफान की तरह और भी बढ़ जाती है, जब उसे संभालने की सभी कोशिशें नाकाम हो जाती हैं. इस दर्द को वह शख्स बखूबी महसूस कर सकता है, जो इस से रूबरू हुआ हो. संजय गुप्ता और उन की पत्नी भी पलपल ऐसी पीड़ा से गुजर रहे थे, जहां उन की कोशिशों को ग्रहण सा लग गया था. संजय गुप्ता रियल एस्टेट कारोबार से जुड़े थे. वह मूलरूप से उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के रहने वाले थे, लेकिन वर्षों पहले वह वहां से चले आए थे. वह अहमदाबाद में इंडियन स्पेस रिसर्च और्गेनाइजेशन (इसरो) में वैज्ञानिक थे, परंतु कई सालों पहले नौकरी छोड़ कर वह नोएडा में प्रौपर्टी का काम करने लगे थे.

बच्चों को उन्होंने शुरू से ही साथ रखा था. उन के परिवार में पत्नी राखी के अलावा 2 बच्चे थे, जिन में बड़ा बेटा जितार्थ और उस से छोटी बेटी स्मिति. दोनों ही बच्चे पढ़ने में होनहार थे. स्मिति दिल्ली के एक फैशन इंस्टीट्यूट में फैशन डिजाइनिंग का कोर्स कर रही थी, जबकि जितार्थ मणिपाल यूनिवर्सिटी से इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा था. संजय के पास किसी चीज की कमी नहीं थी. एक साल पहले तक उन की जिंदगी बहुत खुशहाल थी. किसी की हंसतीखेलती जिंदगी में कब गमों का दरिया बहने लगे, इस बात को कोई नहीं जानता.

3 मार्च, 2013 को गुप्ता परिवार में भी ऐसा ही एक दरिया बह निकला. संजय को सूचना मिली कि उन का बेटा गोवा में एक रोड ऐक्सीडेंट का शिकार हो गया है. संजय वहां पहुंचे. जितार्थ को बे्रन हेमरेज हुआ था. लंबे उपचार के बाद वह हेमरेज से उबरा जरूर, लेकिन उस के चलनेफिरने, बोलने की शक्ति जाती रही.  जितार्थ स्थाई रूप से बिस्तर पर पड़ गया. वह कब तक ऐसा ही रहेगा, इस का जवाब किसी के पास नहीं था. संजय और उन की पत्नी पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था. संजय बेटे को नोएडा ले आए और बेहतर से बेहतर इलाज कराया. लेकिन उस की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ.

लिहाजा डाक्टरों की सलाह पर वह उसे घर ले आए. घर के एक कमरे में उस के लिए बैड लगवा दिया गया. वह कोमा जैसी स्थिति में था. सभी दैनिक क्रियाएं वह बिस्तर पर ही करता था. बेटे को ले कर संजय भी परेशान थे और राखी भी. बेटा स्थाई रूप से बिस्तर पर पड़ गया था. उस की देखभाल जरूरी थी, इसलिए संजय ने अक्टूबर, 2014 में उस के लिए नर्सिंग का काम जानने वाले 2 अटेंडैंट रख लिए, क्योंकि 24 घंटे किसी एक अटेंडैंट को घर पर रखा नहीं जा सकता था. दोनों अटेंडैंट की ड्यूटी 12-12 घंटे की हुआ करती थी. सुबह 9 बजे से रात 9 बजे तक अटेंडैंट सोनू जितार्थ की देखभाल करता था तो रात 9 बजे से सुबह 9 बजे तक रहता दूसरा लड़का था. सोनू ने खुद को बदायूं का रहने वाला बताया था. नोएडा में वह मोरना में कहीं किराए पर रहता था.

संजय के पास दौलतशोहरत सब कुछ था, लेकिन बेटे के लिए वह कुछ नहीं कर पा रहे थे. बेटे को ले कर राखी अक्सर परेशान हो जाती थीं. उस दिन भी वह चित्रकारी करतेकरते बेटे के बारे में सोच कर रोने लगी थीं. संजय ने किसी तरह समझा कर उन्हें चुप कराया था. उन का परिवार जिस कोठी में रह रहा था, वह सीमा खन्ना की थी. सीमा खन्ना ग्राउंड फ्लोर पर रहती थीं, जबकि संजय का परिवार पहली मंजिल पर किराए पर रहता था.

बेटे की वजह से राखी पूरे वक्त घर पर ही रहती थीं. वह संवेदनशील महिला थीं. खाली वक्त में वह ऐसे बच्चों को ट्यूशन पढ़ा दिया करती थीं, जो पैसे दे कर ट्यूशन नहीं पढ़ सकते थे. ये बच्चे 3 से साढ़े 3 बजे के बीच राखी के यहां आते थे. राखी का सोचना था कि शिक्षा जीवन का प्राथमिक आधार है, इसलिए सभी को शिक्षित होना चाहिए. राखी गरीबों की मदद के लिए हमेशा तत्पर रहती थीं. मेल नर्स सोनू के आने के बाद संजय सुबह अपने औफिस चले जाते थे. बेटी स्मिति कालेज चली जाती थी. सुबह घर में एक नौकरानी सुनीता काम करने आती थी. 12 बजे तक वह भी चली जाती थी.

इस के बाद घर में राखी गुप्ता, मेल अटेंडैंट सोनू और बेटा जितार्थ ही रह जाते थे. रोज की लगभग यही दिनचर्या थी. किसी शहर के विकास के बीच अपराध की भी अपनी एक चाल होती है. आम दिनों की भांति 6 अप्रैल, 2015 को भी सेक्टर-41 शांत था. लोगों की आवाजाही और उन के काम जारी थे. राजेंद्र प्रसाद के 2 बच्चे राखी के यहां ट्यूशन पढ़ने आते थे. लगभग 3 बजे बच्चे कोठी की पहली मंजिल पर पहुंचे तो दरवाजा खुला हुआ था. वे रोज आते थे, इसलिए उन्हें लगा कि राखी मैडम दरवाजा बंद करना भूल गई होंगी.

वे अंदर दाखिल हुए तो वहां का नजारा देख कर बुरी तरह डर गए. वे उलटे पांव सीधे अपने घर पहुंचे और उन्होंने वहां जो देखा था, पिता राजेंद्र प्रसाद को बताया. बच्चों की बात से वह हैरान रह गए. राजेंद्र तुरंत संजय के घर पहुंचे और पूरी बात मकान मालकिन सीमा खन्ना और आसपास के लोगों को बताई. आपस में विचारविमर्श कर के कुछ लोग हिम्मत कर के पहली मंजिल पर पहुंचे तो वहां की हालत देख कर उन के पैरों तले से जमीन खिसक गई. 45 वर्षीया राखी गुप्ता खून से लथपथ फर्श पर पड़ी थीं. उन के आसपास खून ही खून फैला था. किसी ने उन की नब्ज टटोली तो वह थम चुकी थी. उन का बीमार बेटा जितार्थ भी नीचे पड़ा था. लेकिन वह ठीक था.

सीमा खन्ना ने तुरंत इस मामले की खबर संजय गुप्ता को दी तो वह कुछ ही देर में घर आ गए. राखी की मौत हो चुकी थी. किसी ने उन की गर्दन और शरीर के अन्य हिस्सों पर नुकीली चीज से प्रहार किए थे. जितार्थ चूंकि बिस्तर से गिर गया था, इसलिए वह दर्द से छटपटा रहा था. उस के सिर में चोट लगी थी. उसे तुरंत अस्पताल पहुंचाया गया. इस बीच पुलिस को भी घटना की सूचना दे दी गई थी. सूचना पा कर कोतवाली सेक्टर-39 के थानाप्रभारी धर्मेंद्र चौहान तुरंत पुलिस बल के साथ मौके पर आ पहुंचे. मामला हत्या का था, इसलिए उन्होंने इस की सूचना अपने आला अधिकारियों को दे दी. सूचना पा कर एसएसपी डा. प्रीतिंदर सिंह और एएसपी विजय ढुल भी मौके पर आ पहुंचे थे.

पुलिस ने मौकामुआयना किया तो हत्या की वजह समझ में नहीं आई. लेकिन यह जरूर लगा कि कातिल का मकसद सिर्फ राखी की हत्या करना नहीं था. क्योंकि थोड़ी नकदी और राखी का मोबाइल गायब था लेकिन घर में रखे अन्य लाखों रुपए बच गए थे. हालांकि जिस लौकर में नकदी रखी थी, उसे तोड़ने की कोशिश जरूर की गई थी. राखी पर किसी नुकीली चीज से प्रहार किए गए थे, लेकिन हत्या में प्रयुक्त वह नुकीली चीज मौके से बरामद नहीं हुई थी. पुलिस ने डौग स्क्वायड और फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट की टीम को मौके पर बुलवा लिया था. चौंकाने वाली बात यह थी कि मेल अटेंडैंट सोनू लापता था, जबकि उस समय उसे ड्यूटी पर होना चाहिए था.

पुलिस ने निरीक्षण के बाद पूछताछ शुरू की, ‘‘सब से पहले इस घटना की जानकारी किसे हुई?’’

‘‘मुझे साहब.’’ राजेंद्र प्रसाद ने आगे बढ़ कर कहा.

‘‘कैसे?’’ पुलिस ने पूछा तो जवाब में राजेंद्र प्रसाद ने अपने बच्चों के वहां ट्यूशन पढ़ने आने की बात बता दी.

पुलिस ने संजय गुप्ता से भी पूछताछ की. इस पूछताछ में उन्होंने किसी से भी अपनी दुश्मनी होने से इनकार कर दिया. जितार्थ घटना का चश्मदीद तो था, लेकिन वह कुछ भी बताने लायक नहीं था. हैरानी की बात यह थी कि पड़ोस में भी किसी को घटना के बारे में कुछ पता नहीं चला था. वैसे भी आजकल शहरी जीवनशैली में लोगों की दुनिया अपने तक ही सिमट गई है. संजय गुप्ता के सेक्टर-2 स्थित अपने औफिस चले जाने के बाद घर में कुल 3 लोग ही रह जाते थे. एक राखी गुप्ता, दूसरा उन का 22 वर्षीया बेटा जितार्थ और तीसरा 25 वर्षीय अटेंडैंट सोनू. मकान के जिस हिस्से में संजय गुप्ता का परिवार रहता था, उस में मुख्य दरवाजे पर जाली वाला दरवाजा भी लगा हुआ था.

जाहिर है, अंजान आदमी के लिए दरवाजा नहीं खोला जा सकता था. पुलिस ने सोनू के मोबाइल पर फोन किया तो वह बंद था. इस से उस पर शक हुआ. जबकि संजय यह मानने को तैयार नहीं थे कि सोनू इस तरह हत्या कर सकता है. हत्या के बाद जिस तरह वह गायब था, उसी से संदेह हो रहा था. मकान मालकिन सीमा खन्ना ने पुलिस को बताया कि उन्होंने सोनू को चुपचाप जाते देखा था. उस की तलाश में एक पुलिस टीम मोरना भेजी गई तो उस के मकान मालिक ने बताया कि 1 अप्रैल को वह उन का घर छोड़ कर चला गया था. सवाल यह था कि अगर सोनू ने राखी की हत्या की थी तो इस की वजह क्या थी?

इस बीच पुलिस ने राखी गुप्ता के शव का पंचनामा तैयार कर पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया और संजय गुप्ता की तहरीर पर सोनू के खिलाफ राखी की हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया गया. दिनदहाड़े हुई हत्या की इस घटना से समूचे इलाके में हड़कंप मच गया था. लोग पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाने लगे थे. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में राखी के शरीर पर नुकीली चीज के 8 घाव पाए गए थे. ये घाव उन के गले, हाथ और कंधे पर थे. ये संभवत: किसी सर्जिकल चीज के थे. मैडिकल ट्रीटमेंट के कुछ सामान जितार्थ के कमरे में रहते थे. हाथों पर घाव पाए जाने से एक बात साफ थी कि राखी ने मरने से पहले संघर्ष किया था. दूसरी ओर गिरने की वजह से जितार्थ के सिर में चोट आई थी. डाक्टरों ने उस का सीटी स्कैन कराया. वह नौर्मल था.

पुलिस का सोनू तक पहुंचना जरूरी था. हैरानी की बात यह थी कि सोनू का कोई स्थाई पता या फोटो गुप्ता परिवार के पास नहीं था. संजय ने पुलिस को बताया कि सोनू का फोटो राखी के मोबाइल में था, जबकि उन के मोबाइल को वह साथ ले गया था. घटना क्यों और कैसे घटी, सोनू ही इस से परदा उठा सकता था. एसएसपी ने एएसपी विजय ढुल के निर्देशन में मामले के खुलासे के लिए 3 पुलिस टीमों को गठन किया. पुलिस ने सोनू के मोबाइल की काल डिटेल्स व लोकेशन निकलवाई. उस की आखिरी लोकेशन सेक्टर-39 की मिली थी. इस के बाद उस का मोबाइल बंद हो गया था.

पुलिस ने सोनू के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानकारी जुटानी शुरू की. पता चला कि संजय ने सोनू को अपने यहां इस के पहले काम करने वाले राजकुमार के माध्यम से नौकरी पर रखा था. पुलिस राजकुमार तक पहुंच गई. राजकुमार से पता चला कि सोनू पहले नोएडा के सेक्टर-40 स्थित एक अस्पताल में 2 साल और एक डाक्टर दंपत्ति के घर करीब एक साल तक काम कर चुका था. उसी बीच उस की उस से मुलाकात हुई थी. इस से ज्यादा उस के बारे में वह भी कुछ नहीं जानता था.

पुलिस ने उस की बताई दोनों जगहों पर जा कर पूछताछ की तो पता चला कि सोनू झगड़ालू स्वभाव का था. एक बार उस ने एक नर्स को जान से मारने की धमकी भी दी थी. हैरानी की बात यह थी कि दोनों ही जगहों पर सोनू का फोटो और पता नहीं मिल सका. इन सभी जगहों पर उसे सोनू शेख या सोनू राघव के नाम से जाना जाता था. यही उस का असली नाम था, यह भी किसी को पता नहीं था. घटना को घटे 2 दिन बीत गए, लेकिन संदिग्ध हत्यारे का कोई सुराग नहीं लग सका. पुलिस ने सोनू के फोटो की तलाश के लिए सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक का भी सहारा लिया. जिस मोबाइल नंबर का इस्तेमाल सोनू करता था, वह फर्जी आईडी पर लिया गया था. इस से उस का पता मिलने की संभावना भी खत्म हो चुकी थी.

सोनू की जो काल डिटेल्स मिली थी, उस में एक नंबर पर उस की सब से ज्यादा बातें हुई थीं. पुलिस ने उस नंबर पर बात की तो वह नंबर कर्नाटक की एक युवती रीतू (परिवर्तित नाम) का था. उस युवती ने बताया कि 2 महीने पहले मिसकाल के जरिए सोनू उस के संपर्क में आया था, तभी से उस से बातें होने लगी थीं. उस के बारे में वह ज्यादा कुछ नहीं जानती. युवती को उस ने अपना नाम सोनू शर्मा बताया था. इलेक्ट्रौनिक सर्विलांस से पुलिस को पता चला कि सोनू ने अपने मोबाइल में नए नंबर का सिम डाल लिया है. उस नंबर की लोकेशन के अनुसार, सोनू नोएडा से दिल्ली होते हुए पश्चिमी बंगाल चला गया था. उस की लोकेशन पुलिस को वहां के मुर्शिदाबाद जिले की मिल रही थी.

उस नंबर से उस ने दिल्ली के एक नंबर पर बात की थी. पुलिस उस नंबर तक पहुंची तो वह नंबर उस की मौसी का निकला. उस से पता चला कि सोनू की मां दिल्ली में ही रहती थी, लेकिन उस ने दूसरा विवाह कर लिया था, इसलिए उस का अपने परिवार से अब कोई ताल्लुक नहीं था. वह लोगों के घरों में साफसफाई का काम करती थी. उस से पुलिस को सोनू के घर का पता मिल गया. वह पश्चिम बंगाल के जिला मुर्शिदाबाद का रहने वाला था. डीआईजी रमित शर्मा पूरे मामले पर नजर रखे हुए थे. एसएसपी डा. प्रीतिंदर सिंह से उन्होंने केस की प्रगति की पूरी जानकारी ली और एक पुलिस टीम पश्चिम बंगाल रवाना करने के आदेश दिए.

एसएसपी ने थानाप्रभारी धर्मेंद्र चौहान के नेतृत्व में 9 अप्रैल को एक पुलिस टीम वहां के लिए रवाना कर दी. इस पुलिस टीम में सबइंसपेक्टर पतनीश यादव, आलोक सिंह और कांस्टेबल अशोक यादव आदि शामिल थे. अगले दिन पुलिस मुर्शिदाबाद स्थित सोनू के घर पहुंची तो वह घर पर ही मिल गया. पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया और अपने साथ नोएडा ले आई. पुलिस के लिए यकीनन यह बड़ी सफलता थी. नोएडा ला कर पुलिस ने उस से पूछताछ की तो राखी की हत्या की जो कहानी निकल कर सामने आई, वह इस प्रकार थी.

सोनू मूलरूप से पश्चिम बंगाल के जिला मुर्शिदाबाद निवासी जिल्ले का बेटा था. जिल्ले मेहनतमजदूरी किया करता था. कई सालों पहले सोनू नौकरी की तलाश में दिल्ली चला आया. कुछ दिन दिल्ली में रहने के बाद वह नोएडा आ गया और छोटेमोटे काम करने लगा. इस के बाद वह एक अस्पताल में वार्डबौय का काम करने लगा. समय के साथ वह काम सीख गया. कुछ अस्पतालों में नौकरी करने के बाद उस ने एक डाक्टर दंपत्ति के यहां भी नौकरी की. सोनू शातिर दिमाग युवक था. वह मुसलमान था, लेकिन किसी को वह अपना नाम सोनू शर्मा तो किसी को सोनू शेख तो किसी को सोनू राघव बताता था.

अपना असली नामपता वह किसी को नहीं बताता था. इस के पीछे वजह यह थी कि वह रातोरात अमीर बनने के सपने देखा करता था और किसी अच्छे मौके की तलाश में था. वह नोएडा में ही किराए का कमरा ले कर रहता था. सन 2015 में गुप्ता परिवार को जितार्थ के लिए मेल अटेंडैंट की जरूरत पड़ी तो राजकुमार ने सोनू के बारे में बताया. उन्होंने बेटे की देखभाल के लिए सोनू से बात की तो वह तैयार हो गया. इस के बाद वह उन के घर आने लगा. गुप्ता परिवार सोनू को परिवार के सदस्य की तरह मानता था. उसे 9 हजार रुपए प्रतिमाह वेतन पर रखा गया था, लेकिन 2 महीने में ही संजय ने उस की तनख्वाह बढ़ा कर 11 हजार रुपए कर दी थी.

सोनू होशियार तो था ही. वह जानता था कि सब से पहले हर किसी का विश्वास जीतना चाहिए. इसलिए उस ने बातों और काम से पूरे परिवार का विश्वास जीत लिया. वह ड्यूटी के समय जितार्थ के पास ही रहता था. इस बीच या तो टीवी वह देखता था या राखी से बातें कर लिया करता था. शुरू में तो सोनू मन लगा कर काम करता रहा. लेकिन झूठ और दिखावे की चमक बहुत लंबे समय तक बरकरार नहीं रहती. समय के साथ राखी की समझ में आने लगा कि वह दिखावा ज्यादा करता है, काम कम. संजय सोनू को 11 हजार रुपए अपने बेटे की पूरी तरह से देखभाल के लिए दे रहे थे. धीरेधीरे सोनू देखभाल में लापरवाही करने लगा. इस की भी एक वजह थी. दरअसल सोनू इस काम से परेशान हो गया था. वह अमीर बनने के सपने देखता था, लेकिन सपने पूरे होने की उसे कोई राह नहीं दिख रही थी.

3 महीने पहले सोनू का संपर्क मोबाइल के जरिए गलत नंबर लग जाने से कोलकाता की रहने वाली रीतू से हो गया, जो कर्नाटक में रहती थी. वह उस से बातें करने लगा. वह उस से आधाआधा घंटे मोबाइल पर बातें करता रहता. राखी को उस की यह लापरवाही बहुत अखरती थी. शुरूशुरू में तो उन्होंने उसे कुछ नहीं कहा, लेकिन धीरेधीरे उन्होंने सोनू को टोकना शुरू कर दिया. उस का किसी ने पुलिस वेरीफिकेशन नहीं कराया था. संजय गुप्ता ने भी यही गलती की. इस बात से सोनू खुश था.

सोनू की लापरवाही से बेटे की जान भी जा सकती थी. एक दिन राखी ने लापरवाही पर सोनू को न सिर्फ जम कर फटकरा, बल्कि उसे थप्पड़ भी मार दिया. सोनू ने आगे से लापरवाही न करने का वादा किया. वह कभी धोखा दे कर भाग न जाए, इस के लिए राखी ने अपने मोबाइल में उस का फोटो खींच लिया. कुछ समय बाद राखी ने महसूस किया कि सोनू लापरवाही के मामले में बदला नहीं है. जब देखो तब वह मोबाइल पर बातें करने में लगा रहता है. जितार्थ को प्रतिदिन दवाइयां व इंजेक्शन देने होते थे. सोनू इस में भी लापरवाही करने लगा था. सोनू की इस लापरवाही पर राखी उसे खरीखोटी सुना कर थप्पड़ जड़ दिया करती थीं. इस पर सोनू खून का घूंट पी कर रह जाता था.

वक्त के साथ सोनू को राखी का डांटना अखरने लगा. थप्पड़ को ले कर उस के मन में नफरत पैदा होने लगी. सोनू शातिर तो था ही, वह राखी को सबक सिखाने के बारे में सोचने लगा. मन ही मन उस ने सोच लिया कि एक दिन वह राखी के घर को लूट लेगा. इस से उस के थप्पड़ का बदला भी पूरा हो जाएगा और वह मालामाल भी हो जाएगा. सोनू को इस बात का डर नहीं था कि वह पकड़ा जाएगा, क्योंकि उस का रिकौर्ड किसी के पास नहीं था. उस ने अपने मन के गुस्से को जाहिर नहीं होने दिया और आराम से रहता रहा. सोनू का जितार्थ की देखभाल से मन उचट गया था.

वह काम में लापरवाही करने के साथ ही रीतू से मोबाइल पर बातें भी किया करता था. इस पर राखी की सोनू से अकसर नोंकझोंक हो जाया करती थी. सोनू ने लूटने की योजना मन ही मन बना ली थी. इसलिए 1 अप्रैल को उस ने किराए का मकान भी खाली कर दिया. इस के बाद वह उचित मौके की तलाश में रहने लगा. 6 अप्रैल को भी सोनू ने लापरवाही की और मोबाइल पर बातें करने के चक्कर में जितार्थ के गले में कफ निकालने के लिए लगने वाली नली ठीक से नहीं लगाई. इसी बीच राखी कमरे में आ गईं. यह देख कर वह भड़क गईं, ‘‘तुम से कोई भी काम ठीक से नहीं किया जाता?’’

‘‘सौरी मैडम वह…’’ सोनू अपनी बात कह पाता, उस से पहले ही राखी ने उस के गाल पर तमाचा रसीद कर दिया. सोनू पहले ही खार खाए बैठा था. उस दिन वह आगबबूला हो उठा. उस का खून खौल गया. उस ने गालियां देते हुए राखी का हाथ झटक दिया, ‘‘तुम्हारे हाथ बहुत चलते हैं, आज मैं सब से पहले इन का चलना बंद किए देता हूं.’’

कह कर सोनू ने जितार्थ की दवाइयों की ट्रे में रखा सर्जिकल चाकू उठा लिया और राखी की गर्दन पर वार कर दिया. इस अप्रत्याशित हमले से राखी तड़प उठीं. उन्होंने विरोध किया, लेकिन सोनू नौजवान था. उस ने एक के बाद एक राखी पर कई वार कर दिए. राखी नीचे गिर कर तड़पने लगीं. जितार्थ यह सब देख रहा था. वह चाह कर भी कुछ नहीं कर सकता था, लेकिन अंदर ही अंदर घुट रहा था. मां को बचाने के लिए उस ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी तो हिलने डुलने से बिस्तर से नीचे गिर गया. सोनू ने इस की परवाह नहीं की. राखी के बचने की कोई गुंजाइश न रहे, उस ने और कई वार कर दिए. राखी की मौत हो गई.

इस के बाद सोनू ने राखी का मोबाइल, घड़ी, डीवीडी व सेफ में रखे करीब 10 हजार रुपए उठा कर एक बैग में रख लिए. सोनू जानता था कि राखी के मोबाइल में उस का फोटो है, इसलिए उस ने उसे भी ले लिया था. उस ने हत्या में प्रयुक्त चाकू भी अपने पास रख लिया. हत्या के दौरान उस की कमीज पर थोड़ा खून लग गया था. लगभग साढ़े 12 बजे वह वहां से चला गया. उस ने अपना मोबाइल बंद कर दिया और चालू किया तो नया सिमकार्ड उस में डाल लिया. उस रात वह अपने दोस्त के घर रुका. इस से पहले उस ने सर्जिकल चाकू और कमीज को सेक्टर-41 में एक स्थान पर छिपा दिया था.

अगले दिन वह दिल्ली पहुंचा और कालका मेल से कोलकाता होते हुए मुर्शिदाबाद स्थित अपने घर चला गया. सोनू ने सोचा था कि उस का असली नामपता चूंकि किसी के पास नहीं है, इसलिए पुलिस पश्चिम बंगाल तक कभी नहीं पहुंच पाएगी. वह आराम से रह रहा था कि इसी बीच वह पुलिस की गिरफ्त में आ गया. पुलिस ने उस की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त चाकू और खून से सनी कमीज बरामद कर ली थी. पूछताछ और जरूरी कागजी काररवाई कर के पुलिस ने उसे अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

गुप्ता परिवार ने सोनू की फितरत को समझने की भूल कर दी. उस का पुलिस वैरीफिकेशन न करा कर भी उन्होंने भूल की. सोनू जैसे लोगों पर विश्वास और गुस्सा दोनों ही खतरनाक साबित हुए. कथा लिखे जाने तक सोनू जेल में था. 28 मई को पुलिस ने उस के खिलाफ अदालत में आरोप पत्र भी दाखिल कर दिया था. Hindi Stories

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित