live in Partner निकली शादीशुदा

ऋषभ सिंह और रिया के बीच 2-4 मुलाकातों में ही प्यार के बीज अंकुरित हो गए. ऋषभ रहने वाला प्रतापगढ़ का था, लेकिन लखनऊ में किराए पर फ्लैट ले कर पढ़ाई कर रहा था. उस के पिता सिंचाई विभाग में क्लर्क थे और बड़ा भाई प्रतापगढ़ में ही एक प्राइवेट स्कूल चलाता था. ऋषभ ने एमएससी तक की पढ़ाई की थी और एसएससी की तैयारी कर रहा था.

रिया और ऋषभ के बीच जैसेजैसे प्यार गहराता गया, वे एकांत में भी मिलने लगे. रिया ऋषभ के कमरे पर भी आनेजाने लगी. उसी दौरान ऋषभ को रिया के शराब पीने की आदत के बारे में भी मालूम हुआ. रिया शराब पीने के लिए क्लब जाती थी. ऋषभ को भी शराब पीने का शौक था, इसलिए ऋषभ ने उस की इस कमजोरी में अपने शौक को शामिल कर दिया. गाहे बगाहे दोनों शराब के लिए साथसाथ क्लब जाने लगे.

दोनों के एक साथ पीने पिलाने का एक असर यह हुआ कि वे एकदूसरे की अच्छाइयों और कमजोरियों से भी वाकिफ हो गए. वे आपस में बेहद प्यार करने लगे थे. रिया ने ऋषभ में एक जिम्मेदार मर्द की खूबियों के अलावा भविष्य में सरकारी नौकरीशुदा मर्द की पत्नी होने के सपने देखे. ऋषभ प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने के लिए प्रतापगढ़ से लखनऊ आ गया था. वहीं के सुशांत गोल्फ सिटी में स्थित एक फ्लैट में रह रहा था.

बात 17 अगस्त, 2023 की शाम की है. करीब 3 बजे थे. उस दिन उस का मन कुछ उखड़ाउखड़ा था, लेकिन अपने दोस्त अमनजीत को ले कर फ्लैट में आया था. कालबेल दबाने वाला ही था कि उसे ध्यान आया कि वह तो पिछले कई दिनों से खराब है. अचानक उस का एक हाथ हैंडल पर चला गया और दूसरे हाथ से दरवाजे पर थपकी देने लगा. हैंडल के घूमते ही दरवाजा खुल गया. उस ने सोचा कि शायद भीतर की कुंडी ठीक से नहीं लगी होगी.

फ्लैट के अंदर पैर रखते ही उस ने दोस्त को ड्राइंगरूम में बिठा दिया और ‘रिया… रिया’ आवाज लगाई. कुछ सेकेंड तक रिया की आवाज नहीं आई, तब वह बोला, ”रिया! कहां हो तुम? देखो, आज मेरे साथ कौन आया है?’‘

फिर भी रिया की कोई आवाज नहीं आई. तब अमनजीत की ओर मुंह कर धीरे से बोला, ”शायद अपने कमरे में सो रही है…देखता हूं.’‘

इसी के साथ वह सीधा रिया के बेडरूम में चला गया. वहां रिया को बेसुध सोई हुई देख कर उसे नींद से जगाना ठीक नहीं समझा. जबकि सच तो यह था कि वह उसे जगाने की हिम्मत नहीं जुटा पाया था. इस का कारण बीती रात रिया के साथ हुई उस की तीखी नोकझोंक थी. साधारण सी बात पर शुरू हुई नोकझोंक में जितना ऋषभ ने रिया को भलाबुरा कहा था, उस से कहीं अधिक जलीकटी बातें रिया ने सुना दी थीं. एक तरह से रिया ने अपना पूरा गुस्सा उस पर उतार दिया था. इस कारण वह रात को न तो ठीक से खाना खा पाया था और न ही सो पाया था.

सुबह होने पर ऋषभ ने रिया को नाराजगी के मूड में ही पाया. गुमसुम बनी रसोई का काम निपटाने लगी थी. इस दौरान न तो ऋषभ ने रिया से एक भी शब्द बोला और न ही रिया ने अपनी जुबान खोली. उस ने अनमने भाव से नाश्ता किया. ऋषभ बीती रात से ले कर सुबह तक की यादों से तब बाहर निकला, जब अमन ने आवाज लगाई, ”ऋषभ! क्या हुआ सब ठीक तो है न! रिया कहीं गई है क्या?’‘

”अरे नहीं यार, अभी वह सो रही है, लगता है गहरी नींद में है! किसी को नींद से जगाना ठीक नहीं होता.’‘ ऋषभ वहीं से तेज आवाज में बोला.

”कोई बात नहीं तुम यहां आ जाओ.’‘ अमन बोला और ऋषभ ने बेडरूम का दरवाजा खींच कर बंद कर दिया. संयोग से दरवाजे के हैंडल पर उस का हाथ तेजी से लग गया और दरवाजा खट की तेज आवाज के साथ बंद हो गया. इसी खटाक की आवाज में रिया की नींद भी खुल गई.

रिया और ऋषभ में क्यों होता था झगड़ा

ऋषभ ड्राइंगरूम में अमन के पास आ गया था. कुछ सेकेंड में ही रिया भी आंखें मलती हुई किचन में चली गई थी. किचन में जाते हुए उस की नजर अमनजीत पर भी पड़ गई थी. अमनजीत ने भी उसे देख लिया था और तुरंत बोल पड़ा, ”भाभीजी नमस्ते! कैसी हैं!’‘

थोड़ी देर में ही रिया ने एक ट्रे में पानी भरे 2 गिलास ला कर अमनजीत की ओर बढ़ा दिए थे. अमनजीत ने भी पानी पी कर खाली गिलास ट्रे में रख दिया था. रिया अमनजीत से परिचित थी और यह भी जानती थी कि वह ऋषभ का जिगरी दोस्त है. इस कारण उस के मानसम्मान में कोई कमी नहीं रखती थी. अमन से औपचारिक बातें करने के बाद दोबारा किचन में चली गई.

कुछ मिनटों में ही रिया अमन और ऋषभ के पास 3 कप चाय ट्रे में ले कर उन के सामने स्टूल पर बैठ गई थी. वास्तव में अमन को ऋषभ के साथ आया देख कर रिया कुछ अच्छा महसूस कर रही थी. वह भी बीती रात से ले कर कुछ समय पहले तक के मानसिक तनाव से उबरना चाह रही थी.

चाय का कप उठा कर मुसकराते हुए अमन की ओर बढ़ा दिया. अमन कप पकड़ता हुआ बोला, ”भाभीजी, आप ठीक तो हैं न! कैसा हाल बना रखा है, लगता है सारी रात ठीक से सो नहीं पाईं?’‘

रिया चुप बनी रही. ऋषभ भी चुप रहा. कुछ सेकेंड बाद रिया धीमी आवाज में बोली, ”यह अपने दोस्त से पूछो, तुम्हारे सामने तो बैठे हैं.’‘

”क्यों भाई ऋषभ,’‘ अमन दोस्त की ओर मुखातिब हो कर बोला.

”अरे, यह क्या बोलेंगे. इन्होंने तो मेरी जिंदगी में भूचाल ला दिया है…अब बाकी बचा ही क्या है. इसे तुम ही समझाओ.’‘ रिया थोड़ी तल्ख आवाज में बोली.

”क्या बात हो गई. तुम दोनों के बीच फिर कुछ तकरार हुई है क्या?’‘ अमनजीत बोला.

”तकरार की बात करते हो, युद्ध हुआ है युद्ध. बातों का युद्ध.’‘ रिया नाराजगी के साथ बोली.

थोड़ी सांस ले कर फिर बोलना शुरू किया, ”कई साल मेरे साथ गुजारने के बाद कहता है कि शादी नहीं कर सकता. इस के चक्कर में मैं ने अपने घर वालों को छोड़ दिया. …और अब यह कह रहा है कि शादी नहीं कर सकता, अब तुम्हीं बताओ कि मैं कहां जाऊं? क्या करूं? जहर खा लूं क्या, इस के नाम का?’‘

”भाभी जी ऐसा नहीं कहते. जान लेनेदेने की बात तो दिमाग में आने ही न दें.’‘ अमन ने रिया को समझाने की कोशिश की.

”यही तो मेरी जिंदगी बन गई है. कहां तो मुझ पर बड़ा प्यार उमड़ता था. कहता था, तुम्हारे बिना नहीं रह सकता, एक पल भी नहीं गुजार सकता. जल्द शादी कर लेंगे, अपनी नई दुनिया बसाएंगे. कहां गईं वे प्यार की बातें? कहां गए वायदे…जिस के भरोसे मैं बैठी रही.’‘

रिया ने जब अपने मन की भड़ास पूरी तरह से निकाल ली तब अमन ऋषभ सिंह से बोला, ”क्यों भाई ऋषभ, ये क्या सुन रहा हूं? रिया जो कह रही है क्या वह सही है? अगर हां तो तुम्हें इस की भावनाओं के साथ खिलवाड़ नहीं करना चाहिए था.’‘

ऋषभ अपने दोस्त की बातें चुपचाप सुनता रहा. उस की जुबान से एक शब्द नहीं निकल रहा था. उस की चुप्पी देख कर अमन फिर बोलने लगा, ”तुम रिया से शादी क्यों नहीं कर रहे हो? उस की उपेक्षा कर तुम एक औरत की जिंदगी के साथ खिलवाड़ कर रहे हो… देखो भलाई इसी में है कि तुम जितनी जल्द हो सके, रिया से शादी कर लो और इसे समाज में सिर उठा कर चलने का मानसम्मान दो.’‘

मानसम्मान की बात सुनते ही ऋषभ बिफर पड़ा. कड़वेपन के साथ बोला, ”तुम किस मान सम्मान की बात कर रहे हो, इस ने आज तक मेरा सम्मान किया है? …भरी पार्टी में शराब पी कर मेरी इज्जत की धज्जियां उड़ा चुकी है. शादी की बात करते हो! इसे तो शादी के बाद मेरे मम्मीपापा के साथ रहना भी पसंद नहीं है. उस के लिए साफ मना कर चुकी है…तो इस के साथ कैसे शादी कर सकता हूं?’‘

अमन को ऋषभ की बातों में दम नजर आया. वह इस सच्चाई से अनजान था. अजीब दुविधा में फंसा अमन समझ नहीं पा रहा था कि आखिर वह किस का पक्ष ले और किसे कितना समझाए? फिर भी उस रोज अमन ने दोनों को सही राह पर चलने और जल्द से जल्द किसी सम्मानजनक नतीजे पर पहुंचने की सलाह दी.

किस ने मारी थी रिया को गोली

थोड़ी देर बाद अमन ने बोझिल मन से दोनों से विदा ली और अपने घर चला गया. उस के जाते ही दोनों फिर उलझ गए. तूतूमैंमैं होने लगी. दोनों एकदूसरे पर आरोप मढऩे लगे कि उन के आपसी झगड़े के बीच अमन को क्यों लाया? इसी बात पर उन दोनों में काफी समय तब बहस होती रही. वे चीखचीख कर बातें कर रहे थे. उन की आवाजें अपार्टमेंट के दूसरे फ्लैटों में भी जा रही थीं, लेकिन उन के पास कोई भी ऐसा नहीं था, जो उन्हें झगडऩे से रोक सके. उन को शांत कर सके या उन्हें समझाबुझा सके. पड़ोसियों के लिए तो उन के झगड़े आए दिन की बात हो चुकी थी.

कुछ देर बाद उसी फ्लैट से गोली चलने का आवाज आई और अचानक एकदम से शांति छा गई. अपार्टमेंट के लोग भी एकदम से चौंक गए थे. किसी ने अपने घरों की खिड़कियां खोल लीं तो कोई तुरंत बालकनी में आ गए. उन में से कुछ लोग भाग कर उस फ्लैट के दरवाजे पर भी आए, लेकिन वहां उन के पैर ठिठक गए, क्योंकि उन के फ्लैट नंबर 203 पर बाहर से ताला लगा हुआ था.

उन्हें यह समझ में नहीं आया कि थोड़ी देर पहले इस फ्लैट से आवाजें आ रही थीं तो बाहर ताला कैसे लगा है? अंदर गोली चलने की वारदात हुई. उस में कोई जख्मी हो सकता है या किसी की मौत भी हो सकती है? थोड़ी देर पहले तो वहां 3 लोग थे. उन्होंने तुरंत पुलिस को खबर कर दी. जबकि कुछ पड़ोसियों के पास रिया के मायके का मोबाइल नंबर था. उन्होंने तुरंत इस की सूचना उन्हें दे दी.

थोड़े समय में ही पुलिस की टीम पहुंच गई. उन में एसएचओ अतुल कुमार श्रीवास्तव, एसएसआई ज्ञानेंद्र कुमार, एसआई दीपक कुमार पांडेय, नरेंद्र कुमार कनौजिया, संतोष कुमार गौड़ और महिला सिपाही दीपा चौधरी थी. एसएचओ अतुल कुमार के सामने फ्लैट का ताला तोड़ा गया. पुलिस टीम ड्राइंगरूम होती हुई बेडरूम में चली गई. रिया फर्श पर खून से लथपथ पड़ी थी. चारों ओर खून फैल चुका था. पुलिस की शुरुआती जांच में पता चल गया कि रिया की मौत हो चुकी है. उसे 2 गोलियां मारी गई थीं. एक माथे पर, जबकि दूसरी सीने पर.

ऋषभ क्यों बना प्रेमिका का कातिल

घटनास्थल का मुआयना करने के बाद इंसपेक्टर श्रीवास्तव ने इस की सूचना डीसीपी विनीत जायसवाल और एडीसीपी (दक्षिणी) शशांक सिंह को दे दी. वे फोरैंसिक टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. उन्हें वहां 4 जिंदा कारतूस और 4 खोखे भी मिले. पुलिस ने रिया के कमरे की गहन खोजबीन की. इसी बीच लखनऊ सदर कैंट निवासी रिया के पापा शिवशक्ति गुप्ता भी पत्नी गीता गुप्ता के साथ वहां पहुंच गए.

उन्होंने पुलिस को बताया कि उन की बेटी रिया विभूतिखंड स्थित एक कंपनी में काम करती थी. वहीं उस की मुलाकात ऋषभ सिंह से हुई थी. वह उसी के साथ रहती थी. उस वक्त फ्लैट में कोई नहीं था. निश्चित तौर पर ऋषभ ही रिया की मौत का गुनहगार हो और उस की हत्या के बाद फरार हो गया हो.

पुलिस ने जरूरी काररवाई पूरी कर शव पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. इसी के साथ 18 अगस्त, 2023 को भादंवि की धारा 302, आम्र्स एक्ट की धारा 3/25 का मामला दर्ज कर लिया गया. मामले की विवेचना का कार्य इंसपेक्टर ने संभाल लिया. उन की पहली काररवाई ऋषभ को गिरफ्तार करने की थी. इस में पुलिस को जल्द सफलता मिल गई. वह लुलु मौल के पास पार्क में दबोच लिया गया.

उसे थाने ला कर पूछताछ की तो बगैर किसी विरोध या नाटकीयता के ऋषभ सिंह ने अपना जुर्म कुबूल कर लिया. इस का कारण उस ने रिया की बेवफाई बताया. इस मामले में ऋषभ के दोस्त अमनजीत का नाम भी शामिल हो गया था. पूछताछ में उस ने रिया की हत्या की जो कहानी बताई, उस में चरित्रहीनता, लिवइन रिलेशन में रहते हुए जीवन को अपनी मरजी से जीने की जिज्ञासा भी उजागर हो गई. वह इस प्रकार से सामने आई—

क्यों बहके रिया के पैर

रिया लखनऊ कैंट के ओल्ड गोता बाजार स्थित मकान में रहने वाले शिवशक्ति गुप्ता की बेटी थी. गुप्ता का एक छोटा परिवार था. पत्नी के अलावा इकलौती संतान के रूप में रिया ही थी. गुप्ता बीमार रहते थे, जिस से परिवार की जिम्मेदारी पत्नी गीता पर आ गई थी. मम्मी की देखरेख में रिया ने पढ़ाई की थी, लेकिन वह फैशनपरस्त थी. बिंदास किस्म का आचरण और चालचलन था. कोई भी उस की अदा पर मर मिटने को तत्पर रहता था. बोलचाल से ले कर चलनेफिरने तक से सैक्स अपील का एहसास करवा देती थी.

उस पर सोशल मीडिया का भी चस्का लग चुका था. फेसबुक पर दोस्ती करना, रील बनाना और फैंसी कपड़ों में इंस्टाग्राम पर फोटो और वीडियो पोस्ट करने में माहिर थी. जबकि उस की मम्मी उसे समाज की मानमर्यादा को ध्यान में रख कर रहने की सलाह दिया करती थीं. मम्मी की हर हिदायत को वह बेवजह की रोकटोक और लड़की पर अंकुश लगाना ही समझती थी. उसे हमेशा लगता था कि मम्मी उस की आजादी में खलल डाल रही हैं.

धीरेधीरे मम्मी भी उस की आदतों से ऊब गई और उसे अपने हाल पर छोड़ दिया. अपनी जिद, पसंद और पारिवारिक परिस्थितियों के चलते रिया काफी स्वच्छंद हो गई थी. खुलेपन की जिंदगी के मजे लेने को आतुर रहती थी. बहुत जल्द ही उसे एक चस्का नए लोगों से संपर्क बनाने और उन से दोस्ती करने का भी लग गया था. वह कइयों से फोन पर मीठीमीठी बातें करने लगी थी. इसी बीच 2019 में उस की एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी भी लग गई. कुछ दिनों में ही उस ने साथ काम करने वाले कई युवकों को अपना दीवाना बना लिया था. उन्हीं में पुष्पेंद्र सिंह बत्रा भी था. वह सदर कैंट का रहने वाला था.

रिया उस के साथ घुलमिल गई. पुष्पेंद्र उसे अपना दिल दे बैठा. रिया भी उसे बेहद प्यार करने लगी. बहुत जल्द ही उन्होंने शादी करने का फैसला भी कर लिया. उन की लवमैरिज को घर वालों ने भी स्वीकार लिया. इसे संयोग ही कहें कि उन की शादी के कुछ दिनों बाद ही कोरोना का दौर आ गया और लौकडाउन का असर उन की जिंदगी पर भी पडऩे लगा. वैवाहिक जिंदगी की मिठास में कमी आने लगी. खासकर रिया की आजादी और मौजमस्ती की स्वच्छंद रहने की आदतों पर इस का असर पड़ गया. करीब 2 साल के लौकडाउन में रिया एक बच्ची की मां भी बन गई. उस के बाद रिया का यौवन और उभर गया था. साथ ही उस में खुलापन बढ़ गया था.

दूसरी तरफ रिया की कई आदतें पति पुष्पेंद्र और उस के घर वालों को पसंद नहीं थी. रिया की आजाद खयाली और गैरमर्दों के साथ दोस्ती करना पसंद नहीं था. वह इस के लिए उसे हमेशा टोकता रहता था. कई बार इस बात पर दोनों के बीच नोकझोंक भी हो जाती थी. एक दिन पुष्पेंद्र रिया की आदतों से ऊब गया और उस से तलाक ले लिया. रिया अपनी छोटी बेटी को ले कर मायके आ गई. उस की मां पर फिर से नई जिम्मेदारी आ गई. रिया का इस पर कोई असर नहीं हुआ. उस ने फिर से कंपनी जौइन कर ली.

औफिस आतेजाते एक बार रिया ऋषभ सिंह से टकरा गई. ऋषभ को रिया की खूबसूरती भा गई थी, जबकि रिया को ऋषभ के बात करने का सलीकेदार तरीका और स्टाइलिश लाइफस्टाइल पसंद आ गई थी. उन्होंने लिवइन में रहने का फैसला ले लिया. इस के बाद वह सुशांत गोल्फ सिटी के क्रिस्टल पैराडाइज अपार्टमेंट में 203 नंबर का फ्लैट किराए पर ले कर रहने लगा. रिया ने ऋषभ से अपने दिल की सारी बातें कीं, लेकिन तलाकशुदा बीवी होने की बात छिपा ली.

बहुत जल्द ही ऋषभ को रिया की वैसी आदतों की भी जानकारी हो गई, जो उसे अच्छी नहीं लगती थीं. इंस्टाग्राम के जरिए रिया की गैरमर्दों के साथ मौजमस्ती की एक तरह से पोल खुल गई, जो उस के साथ रहते हुए भी जारी थी. उस की शर्मसार करने वाली फूहड़ और अश्लील वीडियो को देख कर ऋषभ ने विरोध जताया तो वह उल्टे उस की कमजोरियों का हवाला देने लगी और अपनी आदत को सही ठहराने लगी. जबकि ऋषभ रिया के साथ शादी करने का मन बना चुका था और उस के साथ अच्छी जिंदगी जीना चाहता था.

रिया की गलत आदतों से तंग आ कर ऋषभ ने उसे समझाने की बहुत कोशिश की, लेकिन रिया अपनी जिद पर अड़ी रही. जब भी उन के बीच इसे ले कर नोकझोंक होती रिया एक ही राग अलापती, ”मुझ से शादी कब करोगे?’‘

बगैर बताए घर से घंटों गायब रहने के बारे में पूछने पर वह ऋषभ को ही भलाबुरा कहने लगती थी. इस कारण ऋषभ उस से नाराज रहने लगा था और उस के साथ शादी करने का जुनून भी उतर चुका था. ऋषभ सिंह ने जब रिया की हकीकत का पता किया, तब यह जान कर उस के पैरों तले की जमीन जैसे खिसक गई कि वह न केवल तलाकशुदा है, बल्कि एक बच्ची की मां भी है. इस सच ने ऋषभ की जिंदगी में भूचाल ला दिया था. उस के बाद उस का रिया के प्रति विचार और व्यवहार बदलने लगा था.

रिया का भी अपना एक प्रोफेशनल करिअर था. उस ने मेकअप डिजाइन में डिप्लोमा कर रखा था. इस फील्ड में अपना करिअर बनाने के लिए लुलु माल के एक भव्य मेकअप सैलून खोलना चाहती थी, किंतु पैसे नहीं थे. उस ने पैसे के लिए ऋषभ पर दबाव बनाना शुरू किया. जबकि ऋषभ की आर्थिक स्थिति इस लायक बिलकुल नहीं थी. एक रोज ऋषभ ने रिया को रात में बीएमडब्लू कार में एक अधेड़ व्यक्ति के साथ जाते देखा. देर रात नशे की हालत में वापस लौटने पर उस के बारे में पूछने पर सफाई देते हुए उस ने ताना दिया, ”चाहे जैसे भी हो, मुझे सैलून के लिए पैसे जुटाने हैं. तुम तो पैसे देते नहीं तो मुझे ही कुछ करना पड़ेगा. जो मैं तो करूंगी ही.’‘

इतना सुनते ही ऋषभ के तनबदन में आग लग गई. उस रोज तो ऋषभ ने जैसेतैसे कर खुद को संभाला, लेकिन 16 अगस्त की रात को तो हद ही हो गई. रिया अपने एक दोस्त की पार्टी में गई हुई थी. साथ में ऋषभ भी था. पार्टी में रिया ने अपने दोस्तों के साथ छक कर शराब पी और जम कर डांस भी किया. यह देख कर ऋषभ बौखला गया. उस ने पार्टी में ही उसे समझाने की कोशिश की. दोस्तों के साथ अभद्रता और अश्लील हरकतों वाला डांस करने से मना किया. अपनी मर्यादा में रहते हुए पार्टी एंजौय करने की सलाह दी, जबकि रिया नशे में धुत थी.

वह ऋषभ को ही ताने देने लगी. उस से वहीं उलझ गई. यहां तक कह डाला कि वह उस की कोई गुलाम नहीं है, जो जब देखो तब उसे मानमर्यादा का पाठ पढ़ाता रहता है. वह दोनों भारी मन से घर आ गए, लेकिन आते ही फिर उलझ गए. एकदूसरे पर तीखे आरोप लगाने लगे. गुस्से में ऋषभ भी बोला, ”मेरे साथ रहना है तो ढंग से रहो, वरना मुझे छोड़ कर चली जाओ.’‘

यह सुनते ही रिया का गुस्सा भी सातवें आसमान पर चढ़ गया था. वह बोली, ”चली जाऊं? क्यों चली जाऊं मैं…कई महीनों तक मेरे शरीर के साथ खेला और अब कहते हो चली जाओ, मेरा पीछा छोड़ दो. इस का खामियाजा तो तुम्हें भुगतना पड़ेगा. मैं कोर्ट जाऊंगी, तुम्हारे खिलाफ रेप का मुकदमा करूंगी. फिर सड़ते रहना जिंदगी भर जेल में.’‘

इस धमकी के साथ रिया ने तुरंत अपने एक परिचित वकील को भी फोन मिला दिया. रोती हुई बोलने लगी. ऋषभ की शिकायत करती हुई उस के खिलाफ तगड़ा केस बनाने को बोली. यह सुन कर ऋषभ बुरी तरह से घबरा गया. उसे मालूम था कि एक बार शिकायत दर्ज हो गई तो उस की गिरफ्तारी तय है…और उस की जमानत भी नहीं होगी. उस रात वह सो भी नहीं पाया और सुबह होते ही सीधा अपने दोस्त अमनजीत के पास चला गया. उस से रिया के बारे में सारी बतों बता दीं.

अमनजीत ने ऋषभ सिंह को शांत रहने को कहा और रिया को समझाने के मकसद से उस के घर आ गया. लेकिन बात नहीं बनी, जबकि उस ने दोनों को काफी समझाने की कोशिश की. बात बिगड़ती देख अमनजीत वापस अपने घर आ गया. उस के निकलते ही दोनों के बीच फिर तकरार शुरू हो गई. ऋषभ ने गुस्से में तमंचा निकाल लिया. वह काफी तैश में आ गया था. उस ने तड़ातड़ रिया पर गोलियां दाग दीं. उस के बाद फ्लैट में ताला लगा कर लुलु मौल चला गया.

ऋषभ से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उसे न्यायालय में पेश किया. वहां से उसे जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक विवेचना जारी थी.

Murdered : ममेरे भाई को ही घर में गड्ढा खोद दफना दिया

शादीशुदा संतोष का दिल अपने दोस्त की बहन रेखा पर आ गया. उसे पाने के लिए उस ने एक चाल चली. उस चाल में उस की मनोकामना तो पूरी हो गई पर रामकुमार बेवजह मारा गया. सुबह के करीब साढ़े 10 बजे रायबरेली के पुलिस अधीक्षक राजेश पांडेय जैसे ही अपने कार्यालय के सामने गाड़ी से उतरे, बूढ़ा चंद्रपाल यादव अपनी पत्नी जनकदुलारी के साथ उन के सामने हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया. उन के चेहरों से ही लग रहा था कि उन पर कोई भारी विपत्ति आई है. चंद्रपाल ने कांपते स्वर में कहा, ‘‘साहब, पिछले एक महीने से हमारा जवान बेटा रामकुमार लापता है. हम ने उसे बहुत ढूंढ़ा, थाने में गुमशुदगी भी दर्ज कराई, लेकिन कुछ पता नहीं चला. हर तरफ से निराश हो कर अब आप के पास आया हूं.’’

बात पूरी होते ही पतिपत्नी फफकफफक कर रोने लगे. पुलिस अधीक्षक राजेश पांडेय ने चंद्रपाल का हाथ थाम कर सांत्वना देते हुए कहा, ‘‘आप अंदर आइए, हम से जो हो सकेगा, हम आप की मदद करेंगे.’’

एसपी साहब ने वहां खड़े संतरी को उन्हें अंदर ले कर आने का इशारा किया. साहब का इशारा पाते ही एक सिपाही दोनों को अंदर ले गया. पांडेयजी ने दोनों को प्यार और सम्मान के साथ बैठा कर उन की पूरी बात सुनी. चंद्रपाल यादव उत्तर प्रदेश के जिला रायबरेली, थाना भदोखर के गांव बेलहिया का रहने वाला था. वैसे तो इस गांव में सभी जाति के लोग रहते हैं, लेकिन यादवों की संख्या कुछ ज्यादा है. गांव के ज्यादातर लोगों की रोजीरोटी खेतीकिसानी पर निर्भर है. चंद्रपाल के परिवार में पत्नी जनकदुलारी के अलावा 2 बेटे थे श्यामकुमार तथा रामकुमार और एक बेटी थी श्यामा. श्यामकुमार और श्यामा की शादी हो चुकी थी. श्यामा अपनी ससुराल में रहती थी. जबकि श्यामकुमार अपने परिवार के साथ मांबाप से अलग रहता था. एक तरह से रामकुमार ही मांबाप के बुढ़ापे का सहारा था.

14 जनवरी, 2013 की रात रामकुमार खापी कर घर में सोया था, लेकिन सुबह को वह गायब मिला. 15 जनवरी की सुबह से ही चंद्रपाल ने 23 वर्षीय रामकुमार की तलाश शुरू कर दी, लेकिन काफी खोजबीन के बाद भी उस के बारे में कुछ पता नहीं चला. कोई रास्ता न देख चंद्रपाल ने थाना भदोखर में उस की गुमशुदगी दर्ज करा दी. पुलिस ने 2-4 दिन इधरउधर देखा, उस के बाद वह भी शांत हो कर बैठ गई. धीरेधीरे महीना भर से ज्यादा बीत गया. जब रामकुमार का कुछ पता नहीं चला तो गांव वालों ने चंद्रपाल को शहर जा कर कप्तान साहब से मिलने की सलाह दी. इसी के बाद चंद्रपाल पत्नी के साथ पुलिस अधीक्षक राजेश पांडेय से मिलने आया था. एसपी साहब ने उसे सांत्वना देते हुए कहा था कि वे लोग परेशान न हों. वह जल्द से जल्द उन के बेटे के बारे में पता लगवाने की कोशिश करेेंगे.

पुलिस अधीक्षक के इस आश्वासन पर चंद्रपाल और उस की पत्नी जनकदुलारी को काफी राहत महसूस हुई. इस के बाद पुलिस ने नए सिरे से छानबीन शुरू की. पुलिस अधीक्षक राजेश पांडेय के निर्देश पर थाना भदोखर पुलिस, क्राइम ब्रांच और सर्विलांस सेल सभी सक्रिय हो गए. उन दिनों थाना भदोखर के थानाप्रभारी आर.पी. रावत थे. वह अपनी पुलिस टीम के साथ रामकुमार की खोज में लग गए. यह देख कर पुलिस से नाउम्मीद हो चुके चंद्रपाल को लगा कि शायद अब उन के बेटे के बारे में पता चल जाएगा. लेकिन पुलिस की तत्परता के बावजूद दिन पर दिन बीतते जा रहे थे. रामकुमार का कहीं कोई पता नहीं चल पा रहा था. धीरेधीरे पुलिस ने लाख युक्ति लगाई, लेकिन कोई भी युक्ति काम नहीं आई. गांव वालों की ही नहीं, पुलिस की भी समझ में नहीं आ रहा था कि रामकुमार को जमीन खा गई या आसमान निगल गया.

रामकुमार के पता न चल पाने से पुलिस अधीक्षक भी हैरान थे. उन की भी समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर उस के बारे में पता क्यों नहीं चल रहा है. गांव में उस की किसी से कोई दुश्मनी भी नहीं थी. गांव वालों के अनुसार, वह अपने काम से काम रखने वाला लड़का था. उस की शादी भी नहीं हुई थी. उस का चालचरित्र भी ऐसा नहीं था कि उस बारे में कुछ ऐसावैसा सोचा जाता. हर कोई रामकुमार को ले कर परेशान था कि उसी बीच कुछ ऐसा हुआ कि रामकुमार के लापता होने का रहस्य अपनेआप खुल गया.

26 जुलाई की रात इतनी ज्यादा बारिश हुई कि बेलहिया गांव में पानी ही पानी भर गया. चंद्रपाल के घर में भी पानी भर गया था. घर का पानी निकालने के लिए चंद्रपाल नाली बना रहा था तो जनकदुलारी ने कहा, ‘‘रामू के बप्पा रामू के कमरे में भी पानी भर गया है. उस में रखा तख्त सरका देते तो मैं वहां का पानी भी बाहर निकाल देती.’’

रामकुमार का अपना अलग कमरा था. जब से वह गायब हुआ था, जनकदुलारी उस कमरे में कम ही जाती थी. क्योंकि उस में रामकुमार का सारा सामान रखा था, जिसे देख कर उसे बेटे की याद आ जाती थी. इसी वजह से चंद्रपाल का भी उस कमरे में जाने का मन नहीं करता था. इसलिए उस ने टालने वाले अंदाज में कहा, ‘‘ऐसे ही काम चल जाए तो चला लो, मेरा उस कमरे में जाने का मन नहीं करता.’’

‘‘मन तो मेरा भी नहीं करता. लेकिन कच्ची दीवार है. पानी भरा रहेगा तो दीवारें गिर सकती हैं.’’

चंद्रपाल तख्त हटाने के लिए कमरे में पहुंचा तो उस ने देखा तख्त के नीचे की मिट्टी अंदर धंसी हुई है. वहां गढ्ढा सा बना हुआ था. उस गड्ढे को देख कर चंद्रपाल को हैरानी हुई, क्योंकि वह कोठरी काफी पुरानी थी. उस की जमीन काफी मजबूत थी. उस में इस तरह का गड्ढा खुदबखुद नहीं हो सकता था. बहरहाल उस ने जैसे ही तख्त हटवाया, उसे जो दिखाई दिया, उस से उस की आंखें खुली की खुली रह गईं. गड्ढे की धंसी हुई मिट्टी में सड़ागला एक इंसानी हाथ दिखाई दे रहा था. चंद्रपाल ने जल्दीजल्दी हाथों से मिट्टी हटानी शुरू की तो थोड़ी ही देर में उस के बेटे रामकुमार की लाश निकल आई.

रामकुमार की लाश निकलते ही चंद्रपाल बदहवास सा चिल्लाने लगा. उस की चीखपुकार सुन कर जनकदुलारी और आसपड़ोस के लोग भी आ गए. रामकुमार की सड़ीगली लाश देख कर घर में कोहराम मच गया. गांव वाले भी हैरान थे. बहरहाल रामकुमार की लाश मिलने की सूचना थाना भदोखर पुलिस को दे दी गई. वहां से यह सूचना पुलिस अधीक्षक राजेश पांडेय को दी गई.

पुलिस के लिए यह सूचना हैरान करने वाली थी. आननफानन में थाना भदोखर के थानाप्रभारी रामराघव सिंह सिपाही कन्हैया सिंह और अमरचंद्र शुक्ला को साथ ले कर गांव बेलहिया आ पहुंचे. थोड़ी ही देर में पुलिस अधीक्षक राजेश पांडेय भी फौरेंसिक टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. पुलिस ने सावधानी से लाश गड्ढे से बाहर निकाली. वह पूरी तरह से सड़गल चुकी थी. लाश के साथ लाल रंग का एक दुपट्टा मिला, जिसे पुलिस ने कब्जे में ले लिया. इस के बाद अन्य काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए रायबरेली भेज दिया.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पता चला कि रामकुमार की हत्या गला दबा कर की गई थी. महीनों पहले हुई हत्या का मामला था, इसलिए पुलिस के लिए यह चुनौती जैसी थी. हत्या की कोई वजह नजर नहीं आ रही थी. लाश घर के अंदर मिली थी, साफ था हत्या घर के अंदर ही की गई थी. ऐसी स्थिति में इस मामले में घरवालों का ही हाथ हो सकता था. लेकिन घर में सिर्फ बूढ़े मांबाप थे. वे अपने बेटे की हत्या क्यों करते? जबकि वही उन का सहारा था. वैसे भी वह ऐसा नहीं था कि मांबाप उस से परेशान होते. पुलिस ने हत्यारों तक पहुंचने के लिए जब चंद्रपाल और जनकदुलारी से विस्तारपूर्वक पूछताछ की तो उन्होंने एक बात ऐसी बताई, जिस पर पुलिस को संदेह हुआ. पतिपत्नी ने पुलिस को बताया था कि जिस रात रामकुमार गायब हुआ था, उस रात उन का रिश्ते का एक भांजा संतोष आया हुआ था.

वह पंजाब से एक लड़की साथ लाया था, जिस की शादी वह रामकुमार से कराना चाहता था. पुलिस ने जब चंद्रपाल से उन के उस भांजे संतोष के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि वह पंजाब के अंबाला शहर में रहता है. पुलिस को उस पर संदेह हो रहा था, इसलिए पुलिस उस से ही नहीं, उस लड़की से भी पूछताछ करना चाहती थी, जो उस के साथ आई थी. पुलिस अधीक्षक राजेश पांडेय ने चंद्रपाल के भांजे संतोष और उस के साथ आई लड़की को रायबरेली लाने के लिए एक पुलिस टीम अंबाला भेज दी. पुलिस ने दोनों को रायबरेली ला कर पूछताछ की तो 11 महीने पुराने रामकुमार हत्याकांड से पर्दा उठ गया. उन दोनों ने रामकुमार की हत्या की जो कहानी पुलिस को सुनाई थी, वह इस प्रकार थी.

रायबरेली के ही थाना डलमऊ के गांव ठाकुरद्वारा का रहने वाला दिनेश कुमार अपने साले संतोष कुमार के साथ पंजाब के अंबाला शहर में रहता था. वहां दोनों एक साइकिल बनाने की फैक्ट्री में नौकरी करते थे. दोनों ने पंजाबी बाग मोहल्ले में किराए का एक कमरा ले रखा था, जिस में वे एक साथ रहते थे. उसी मोहल्ले में पटना की साधु बस्ती का रहने वाला रमेश कुमार यादव भी रहता था. वह कृषिकार्य की मशीनें बनाने के कारखाने में काम करता था. रमेश के साथ उस का परिवार भी रहता था. रमेश के परिवार में पत्नी सुधा, 10 साल का बेटा राजू और 20 साल की बहन रेखा थी.

एक मोहल्ले में रहने की वजह से और एक ही जाति का होने की वजह से दिनेश और रमेश की पहले जानपहचान हुई, जो बाद में दोस्ती में बदल गई. बीच में दिनेश के साले संतोष की नौकरी छूट गई तो रमेश ने उसे अपनी फैक्ट्री में नौकरी दिलवा दी थी. इस के बाद संतोष से भी रमेश की दोस्ती हो गई थी. अकसर सभी एकसाथ बैठते और एकदूसरे का सुखदुख बांटते. ऐसे में ही एक दिन रमेश ने कहा, ‘‘भाई दिनेश, सब तो ठीक है. मुझे चिंता रेखा की है. समझ में नहीं आ रहा कि उस की शादी कहां करूं, क्योंकि गांव से अब मेरा कोई रिश्ता नहीं रह गया है.’’

‘‘रमेश भाई, परदेश में आप ने हमारी बहुत मदद की है. मैं इस मामले में आप की मदद कर सकता हूं. दरअसल संतोष के एक मामा हैं चंद्रपाल. वह रायबरेली के नजदीक बेलहिया गांव में रहते हैं. उन का खातापीता परिवार है. उन के पास खेती की ठीकठाक जमीन है. उन का बेटा रामकुमार आप की बहन रेखा के लिए एकदम ठीक है. जातिबिरादरी भी एक है. आप कहें तो बात चलाऊं?’’ दिनेश ने कहा.

‘‘दिनेश भाई, तुम कह तो ठीक रहे हो. लेकिन परेशानी यह है कि मेरी बहन कई सालों से यहां शहर में हमारे साथ रह रही है. वह गांव में कैसे रहेगी?’’ रमेश ने अपनी परेशानी बताई तो दिनेश ने कहा, ‘‘रमेश भाई, आप भी कैसी बात करते हैं. न जाने कितने लोगों को आप ने नौकरी दिलवाई है. शादी के बाद बहनोई को भी यहीं बुला लेना. उस के बाद आप की बहन यहीं रहेगी.’’

दिनेश की बात रमेश को सही लगी. इस के बाद उस ने अपनी पत्नी सुधा से बात की तो उस ने भी हामी भर दी. इस के बाद तो दिनेश और संतोष से रमेश की और भी गहरी दोस्ती हो गई. रमेश की बहन रेखा की उम्र बामुश्किल 20 साल थी. उस का गोल चेहरा, बोलती आंखें किसी को भी अपनी ओर आकर्षित कर सकती थीं. संतोष तो उसे देख कर पागल सा हो गया था. अब वह अकसर रमेश के घर आनेजाने लगा. उस की पत्नी को वह भाभी कहता था. अगर रेखा वहां होती तो वह उस की शादी की बात छेड़ देता. वह अपने मामा के बेटे रामकुमार की खूब तारीफें करता था. ऐसी ही बातों के बीच एक दिन सुधा ने कहा, ‘‘आप मेरी ननद को तो देख ही रहे हैं इस का दूल्हा भी इस जैसा है कि नहीं? अगर दूल्हा सुंदर न हुआ तो रेखा उस के साथ नहीं जाएगी. बारात को बिना दुल्हन के ही जाना होगा.’’

‘‘ऐसा नहीं होगा भाभीजी, रामकुमार भी कम सुंदर नहीं है. एकदम हीरो लगता है. लड़कियां उस पर जान छिड़कती हैं.’’

‘‘अच्छा तो यह बताओ कि वह मेरी रेखा को पसंद कर लेगा या नहीं?’’ सुधा ने हंसते हुए पूछा.

‘‘रेखा भी कहां कम है,’’ संतोष ने रेखा की ओर तिरछी नजरों से देखते हुए कहा, ‘‘एकदम हीरोइन लगती है. अगर मैं शादीशुदा न होता तो खुद ही इस से शादी कर लेता.’’

रेखा का दीवाना हो चुका संतोष रेखा की तारीफों के कसीदे काढ़ने लगा. दरअसल वह किसी भी तरह रेखा के नजदीक जाना चाहता था. दिलफेंक संतोष जानता था कि लड़कियों को अपनी तारीफ अच्छी लगती है. इसीलिए वह उस की तारीफ कर के उसे अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश कर रहा था. दरअसल वह किसी भी तरह रेखा को पाने के सपने देखने लगा था और किसी भी तरह अपने उसी सपने को पूरा करने का तानाबाना बुन रहा था. रमेश, दिनेश और संतोष जब भी मिलते, रेखा की शादी को ले कर चर्चा जरूर होती. ऐसे में ही एक दिन दिनेश और संतोष ने रमेश की रायबरेली के रहने वाले अपने रिश्तेदार चंद्रपाल से बात भी कराई. इस के बाद संतोष ने कहा, ‘‘मामा, आप चिंता न करें. अगले सप्ताह मैं आ रहा हूं. अपने साथ आप की होने वाली बहू को भी ले आऊंगा. आप लोग उसे अपने घर रख कर कायदे से देख लीजिएगा.’’

चंद्रपाल अपने बेटे रामकुमार के लिए लड़की तलाश ही रहा था. संतोष और दिनेश ने इस रिश्ते की बात की तो उस ने हामी भर दी. संतोष रमेश का विश्वस्त था. उस ने जब रेखा को दिखाने के लिए उसे अपने साथ रायबरेली स्थित अपने गांव ले जाने की बात की तो वह इनकार नहीं कर सका. दिसंबर, 2012 के आखिरी सप्ताह में संतोष रेखा को साथ ले कर अपने गांव जाने के लिए रवाना हुआ. रास्ते में उस ने रेखा को अकेली पा कर उस से खूब प्यारभरी बातें कीं. बहाने से उस के संवेदनशील अंगों को भी छुआ. लेकिन रेखा सब कुछ जानते हुए भी अनजान बनी रही. इस से संतोष की हिम्मत बढ़ गई. घर जा कर उस ने रेखा को अपनी पत्नी रमा और 3 साल की बेटी सुमन से मिलवाया. संतोष ने रमा को बताया कि रेखा को वह बेलहिया के रहने वाले मामा के बेटे रामकुमार से शादी कराने के लिए लाया है.

रमा को इस में क्या परेशानी हो सकती थी. उस ने रेखा की खूब आवभगत की. लेकिन घर मे रहते हुए रेखा और संतोष एकदूसरे से कुछ ज्यादा ही खुल गए. एक दिन मौका मिलने पर संतोष ने रेखा को बांहों में भर लिया. थोड़ी नानुकुर के बाद रेखा ने भी स्वयं को उसे समर्पित कर दिया. इस के बाद जब भी मौका मिलता, संतोष और रेखा अपनी इच्छा पूरी करते. संतोष और रेखा मिलते तो थे सब की नजरें बचा कर, लेकिन उन के हावभाव से रमा को उन पर शक हो गया. इस की एक वजह यह थी कि रमा को अपने पति की फितरत पता थी. उस ने रेखा को अपने घर में रखने से मना किया तो संतोष ने उसे अपने मामा चंद्रपाल के यहां बेलहिया पहुंचा दिया. अपनी होने वाली ससुराल देख कर और होने वाले पति से मिल कर रेखा खुश थी. संतोष ने वहां पहुंच कर चंद्रपाल से कहा था,

‘‘मामा, तुम्हारी होने वाली बहू ले आया हूं. कुछ दिन रख कर देख लो. मैं 10 दिन बाद अंबाला जाऊंगा, तब इसे साथ ले जाऊंगा.’’

चंद्रपाल ने रेखा को अपने घर में रख लिया. रामकुमार अपनी होने वाली पत्नी से बातचीत तो करता था, लेकिन संतोष की तरह कभी उस के नजदीक जाने की कोशिश नहीं की थी. वह सोचता था कि जो काम शादी के बाद होता है, उसे शादी के बाद ही होना चाहिए. रेखा को मामा के यहां छोड़ कर संतोष अपने घर तो लौट गया, लेकिन जल्दी ही उसे रेखा की याद सताने लगी. 2-3 दिन तो उस ने किसी तरह बिताए, लेकिन जब उस से नहीं रहा गया तो वह मामा के घर आ गया. रेखा चंद्रपाल के यहां घर के अंदर वाले कमरे में लेटती थी, जबकि रामकुमार अपनी मां जनकदुलारी के साथ वाले कमरे में सोता था. संतोष के सोने की व्यवस्था रामकुमार वाले कमरे में की गई थी.

रात में जब संतोष को लगा कि रामकुमार सो गया है तो वह चुपके से उठा और रेखा के कमरे में जा पहुंचा. रेखा ने उसे मना किया तो उस ने कहा, ‘‘यहां सभी घोड़े बेच कर सो रहे हैं, इसलिए चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है. तुम्हें पता होना चाहिए कि इतनी दूर मैं सिर्फ तुम से मिलने आया हूं.’’

रेखा मान गई तो संतोष उस के साथ शारीरिक संबंध बनाने लगा. इसी बीच अचानक रामकुमार की आंख खुल गई तो उसे रेखा के कमरे में फुसफुसाने की आवाज सुनाई दी. उस ने संतोष का बिस्तर टटोला तो वह गायब था. रामकुमार सारा माजरा समझ गया, वह उठ कर सीधे रेखा के कमरे में जा पहुंचा. उस ने वहां जो देखा, उसे देख कर उसे गुस्सा तो बहुत आया, लेकिन उस ने उस गुस्से को जब्त कर के सिर्फ इतना ही कहा, ‘‘तुम लोगों पर भरोसा कर के मैं ने शादी के लिए हामी भर दी थी. लेकिन यह सब देख कर मेरा इरादा बदल गया है. निश्चिंत रहो, मैं यह बात किसी से नहीं बताऊंगा. तुम लोग चुपचाप अपने घर चले जाना.’’

उन दोनों को चेतावनी दे कर रामकुमार अपने बिस्तर पर आ कर लेट गया. रामकुमार की इस धमकी से रेखा और संतोष सन्न रह गए. उन की समझ में नहीं आ रहा था कि वे क्या करें. पलभर सोचविचार कर के रेखा बोली, ‘‘तुम शादीशुदा हो, इसलिए मैं तुम्हारे साथ नहीं रह सकती. चिंता की बात यह है कि अंबाला लौट कर हम भैयाभाभी को क्या जवाब देंगे कि रामकुमार शादी क्यों नहीं करना चाहता? अगर रामकुमार ने यह बात सब को बता दी तो हम किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहेंगे.’’

सुन कर संतोष परेशान हो उठा. वह कुछ सोच कर बोला, ‘‘अगर रामकुमार न रहे तो किसी को पता ही नहीं चलेगा कि रात में क्या हुआ था. इस का हल अब यही है कि उसे खत्म कर दें. इस से सारा झंझट ही खत्म हो जाएगा.’’

‘‘मार तो देंगे, लेकिन उस की लाश का क्या करेंगे?’’ रेखा ने चिंता जाहिर की तो संतोष बोला, ‘‘उस की चिंता करने की जरूरत नहीं है. मैं ने इस बारे में भी सोच लिया है.’’

उस समय रात के करीब 12 बज रहे थे. रेखा और संतोष दबे पांव रामकुमार के कमरे में पहुंचे. तब तक वह सो गया था. संतोष ने रेखा का दुपट्टा ले कर फुर्ती से रामकुमार के गले में डाला और जल्दी से कस दिया. रामकुमार छटपटा कर मर गया. इस के बाद दोनों लाश को उसी कमरे में ले आए, जहां थोड़ी देर पहले रंगरलियां मना रहे थे. उन्होंने तख्त हटा कर वहां 3 फुट गहरा गड्ढा खोदा और उस में लाश डाल कर मिट्टी भर दी. सारा काम निपटा कर संतोष ने कहा,  ‘‘रेखा हमें यहां 3-4 दिन रुकना पड़ेगा. अन्यथा लोग हम पर शंका करेंगे. जब मामला शांत हो जाएगा, उस के बाद अंबाला चले जाएंगे.’’

‘‘लेकिन लाश से बदबू आने लगेगी तो हमारा राज खुल जाएगा.’’ रेखा ने आशंका व्यक्त की.

‘‘तुम बेकार ही परेशान हो रही हो. आज मुझे किसी ने यहां आते देखा तो है नहीं. केवल रामकुमार जानता था, वह रहा नहीं. कल मैं 5-6 किलो नमक ले आऊंगा. उसे डाल देंगे तो लाश गल जाएगी और बदबू नहीं आएगी.’’ कह कर संतोष रात में ही अपने गांव चला गया. सुबह किसी ने रामकुमार की ओर ज्यादा ध्यान नहीं दिया. लेकिन जैसेजैसे समय बीता, उस की तलाश शुरू हुई. शाम होतेहोते पूरे गांव में खबर फैल गई कि रामकुमार गायब है. रेखा भी घर वालों के साथ रामकुमार की तलाश में लगी थी.

चंद्रपाल ने संतोष को रामकुमार के गायब होने की बात बताई तो वह भी उस की तलाश के बहाने बेलहिया आ गया. जब सब सो गए तो वह रेखा के कमरे में गया और रामकुमार की लाश पर पड़ी मिट्टी हटा कर अपने साथ लाया नमक उस पर डाल कर ठीक से मिट्टी फैला कर गड्ढा बंद कर दिया. इस के बाद उस के ऊपर तख्त डाल दिया. उस कमरे में अंधेरा रहता था, इसलिए किसी का भी इस ओर ध्यान नहीं गया कि वहां गड्ढा खोदा गया है. घर में अब रामकुमार की मां जनकदुलारी ही रह गई थी. ऐसे में उन्हें किसी का डर नहीं था. इसलिए संतोष रामकुमार की लाश के ऊपर पड़े तख्त पर रेखा के साथ हर रात रंगरलियां मनाने लगा. चूंकि उन्हें इस के बाद इस तरह का मौका फिर मिलने वाला नहीं था. इसलिए इस का वे भरपूर लाभ उठा रहे थे.

रामकुमार का जब कई दिनों तक पता नहीं चला तो चंद्रपाल ने थाना भदोखर में उस की गुमशुदगी दर्ज करा दी. पुलिस ने भी 2-4 दिनों तक राजकुमार को इधरउधर खोजा. जब उस के बारे में कुछ पता नहीं चला तो पुलिस भी सुस्त पड़ गई. अब तक सभी को यकीन हो गया था कि रामकुमार घर छोड़ कर कहीं चला गया है. उधर जब संतोष को पूरा यकीन हो गया कि गांव और घर वालों ने रामकुमार को लापता मान लिया है तो वह रेखा को ले कर वापस अंबाला चला गया. वहां उस ने रामकुमार के गायब होने की बात बता कर रेखा और रामकुमार की शादी वाली बात खत्म कर दी.

बाद में संतोष को रेखा से भी डर लगने लगा कि कहीं वह किसी से सच्चाई न बता दे. इस से बचने के लिए उस ने रेखा की शादी भोपाल के कटरा सुल्तान के रहने वाले रामगोपाल यादव से करा दी. रामगोपाल उसी के साथ नौकरी करता था. इस के बाद संतोष निश्चिंत हो गया, क्योंकि उस ने फंसने के सारे रास्ते साफ कर दिए थे. वह समयसमय पर फोन कर के रामकुमार के पिता चंद्रपाल से उस का हालचाल लेता रहता था. लेकिन रामकुमार की लाश मिली तो पुलिस ने चंद्रपाल से विस्तार से पूछताछ की. उस ने उस रात घर में रेखा और संतोष के होने की बात बता कर उन के बारे में भी सारी बातें बता दी थीं.

पुलिस को रेखा और संतोष पर संदेह हुआ तो अंबाला जा कर दोनों को पकड़ लिया. पहले तो वे आनाकानी करते रहे, लेकिन पुलिस ने अंतत: सच्चाई उगलवा ही ली. रेखा और संतोष ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया तो थाना भदोखर पुलिस ने दोनों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर उन्हें अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

— कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित है.

 

Doctor के दोस्त के साथ भागी बेवफा पत्नी

लवली से शादी करते समय सुरेंद्र ने शायद यह नहीं सोचा था कि जो औरत एक बार पति और बच्चों को छोड़ सकती है, वह दोबारा भी यही कर सकती है. पढ़ाई पूरी कर के रोजीरोटी की तलाश में डा. बिस्वास अपने एक दोस्त की मदद से पश्चिम बंगाल से उत्तर प्रदेश के जिला बरेली आ गया था. यहां वह किसी गांव में क्लिनिक खोल कर प्रैक्टिस करना चाहता था. अपने साथ वह पत्नी और बच्चों को भी ले आया था. डा. बिस्वास का वह दोस्त बरेली के कस्बा मीरगंज मे अपनी क्लिनिक चला रहा था. उसी की मदद से डा. बिस्वास ने मीरगंज से यही कोई 5 किलोमीटर दूर स्थित गांव हुरहुरी में अपना क्लीनिक खोल लिया था.

गांव हुरहुरी में न कोई क्लिनिक थी न कोई डाक्टर. इसलिए बीमार होने पर गांव वालों को इलाज के लिए 5 किलोमीटर दूर भी दोरगंज जाना पड़ता था. इसलिए डा. बिस्वास ने हुरहुरी में अपना क्लिनिक खोला तो गांव वालों ने उस का स्वागत ही नहीं किया, बल्कि क्लीनिक खोलने में उस की हर तरह से मदद भी की. डा. बिस्वास को बवासीर, भगंदर जैसी बीमारियों को ठीक करने में महारत हासिल थी. इसी के साथ वह छोटीमोटी बीमारियों का भी इलाज करता था. सम्मानित पेशे से जुड़ा होने की वजह से गांव वाले उस का बहुत सम्मान करते थे.

इस की एक वजह यह भी थी कि उस ने गांव वालों को एक बड़ी चिंता से मुक्त कर दिया था. गांव वाले किसी भी समय उस के यहां आ कर दवा ले सकते थे. गांव में जाटों की बाहुल्यता थी. धीरेधीरे डा. बिस्वास गांव वालों के बीच इस तरह घुलमिल गया, जैसे वह इसी गांव का रहने वाला हो. गांव वालों ने भी उसे इस तरह अपना लिया था, जैसे वह उन्हीं के गांव में पैदा हो कर पलाबढ़ा हो. डा. बिस्वास की पत्नी लवली घर के कामकाज निपटा कर उस की मदद के लिए क्लिनिक में आ जाती थी. वह एक नर्स की तरह क्लिनिक में काम करती थी. क्लिनिक में आने वाला हर कोई उसे भाभी कहता था. इस तरह जल्दी ही वह पूरे गांव की भाभी बन गई. वह काफी विनम्र थी, इसलिए गांव के लोग उस से काफी प्रभावित थे.

गांव के लोग अकसर खाली समय में डा. बिस्वास की क्लिनिक में आ कर बैठ जाते और गपशप करते हुए अपना समय पास करते. उन्हीं बैठने वालों में एक सुरेंद्र सिंह भी था. सुरेंद्र हुरहुरी के रहने वाले चौधरी रामचरण सिंह का बेटा था. सुरेंद्र सिंह जाट और संपन्न परिवार का था. डा. बिस्वास को इस गांव में क्लिनिक खोले लगभग 2 साल हो चुके थे. गांव के लगभग सभी लोगों से उस के मधुर संबंध थे. लेकिन सुरेंद्र सिंह से उस की कुछ ज्यादा ही पटती थी. इसी का नतीजा था कि सुरेंद्र डा. बिस्वास के घर भी आताजाता था. डा. बिस्वास को कभी शहर से दवा मंगानी होती थी तो वह उसे शहर भी भेज देता था. इस के अलावा भी उसे किसी तरह की मदद की जरूरत होती थी तो वह सुरेंद्र को ही याद करता था.

अन्य लोगों की तरह सुरेंद्र भी लवली को भाभी कहता था. कभीकभी सुरेंद्र डाक्टर की गैरमौजूदगी में भी उस के घर आ जाता तो लवली पति के इस दोस्त की खूब खातिर करती. सुरेंद्र जवान भी था और अविवाहित भी. शायद यही वजह थी कि डा. बिस्वास के यहां आनेजाने में दोस्ती की सीमाओं को लांघने के विचार उस के मन में आने लगे. खूबसूरत लवली की मुसकान और सेवाभाव का वह गलत अर्थ लगा कर उस के घर कुछ ज्यादा ही आनेजाने लगा. जबकि डा. बिस्वास उस पर उसी तरह विश्वास करते रहे. उस के मन में क्या है, यह वह समझ नहीं पाए. डा. बिस्वास को अपने दोस्त सुरेंद्र पर इतना विश्वास था कि अगर पत्नी को कुछ खरीदने के लिए बरेली जाना होता तो वह उसे उस के साथ भेज देता था. सुरेंद्र के लिए यह बढि़या मौका होता था. उसे अकेले में लवली से बात करने का मौका तो मिलता ही था, उस के साथ घूमनेफिरने का भी मौका मिलता था.

सुरेंद्र और लवली जब भी बरेली जाते बस से जाते थे. ऐसे में वह लवली से सट कर बैठता. बगल में बैठ कर वह लवली से इस तरह हरकतें करता, जैसे वह उस की पत्नी हो. लवली उन की इन हरकतों पर ज्यादा ध्यान नहीं देती थी. फिर भी जल्दी ही उसे उस के मन की बात का पता चल गया. सुरेंद्र इतना खराब भी नहीं था कि वह उसे झिड़क देती. उस की शक्लसूरत तो ठीकठाक थी ही, खातेपीते घर का भी था. शरीर से भी हृष्टपुष्ट था. कुल मिला कर वह इस तरह का था कि कोई चालू किस्म की औरत उसे पसंद कर लेती. इन्हीं सब वजहों से लवली को भी सुरेंद्र अच्छा लगता था. इस की एक वजह यह थी कि वह एक प्यार करने वाला लड़का था. उस की हरकतों ने लवली के मन के आकर्षण को और बढ़ा दिया था. इसलिए लवली कभी भी उस की किसी हरकत का विरोध नहीं करती थी. फिर तो सुरेंद्र की हिम्मत बढ़ती गई. इस के बावजूद वह अपने मन की बात लवली से कह नहीं पा रहा था.

एक दिन सुरेंद्र लवली के साथ शौपिंग करने बरेली गई तो जल्दी ही उस का काम खत्म हो गया. फुरसत मिलने पर सुरेंद्र ने कहा, ‘‘भाभीजी, अभी तो घर जाने में काफी समय है. अगर आप कहें तो चल कर फिल्म ही देख लें.’’ लवली भला क्यों मना करती. उस ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘अगर तुम्हारा दिल फिल्म देखने को कर रहा है तो मना कर के मैं उसे क्यों तोड़ूं. चलो तुम्हारे साथ मैं भी फिल्म देख लूंगी. वैसे भी यहां आने के बाद हौल में फिल्म देखने का मौका बिलकुल नहीं मिला है.’’

लवली के हां करते ही सुरेंद्र ने टिकटें खरीदीं और उस के साथ फिल्म देखने के लिए अंदर जा बैठा. फिल्म शुरू हुई. फिल्म में प्रेम का दृश्य आया तो अंधेरे में ही सुरेंद्र ने लवली का हाथ पकड़ कर चूम लिया. लवली ने इस का विरोध करने के बजाय उस का हाथ अपने हाथ में ले कर दबा दिया. फिल्म खत्म हुई. दोनों बाहर आए तो उन के चेहरे खिले हुए थे. अब दोनों ही इस तरह चल रहे थे, जैसे प्रेमीप्रेमिका हों. सुरेंद्र ने लवली को फिल्म तो दिखाई ही, बढि़या रेस्तरां में खाना भी खिलाया. वह उस के लिए कोई बढि़या सा उपहार भी खरीदना चाहता था, लेकिन लवली ने कहा, ‘‘सब कुछ आज ही कर दोगे तो फिर आगे क्या करोगे.’’

दिल की बात जुबान पर आ जाने से लवली भी खुश थी और सुरेंद्र भी. दोनों के ही दिलों से बहुत बड़ा बोझ उतर गया था. लवली डाक्टर के 2 बच्चों की मां थी, लेकिन वह डाक्टर से संतुष्ट नहीं थी. शायद इस की वजह लवली की महत्त्वाकांक्षा थी. वैसे भी वह डा. बिस्वास के साथ ज्यादा खुश नहीं थी. इस की वजह यह थी कि डाक्टर की कमाई उतनी नहीं थी, जितनी उस की अपेक्षाएं थीं, शायद इसीलिए उस ने सुरेंद्र का हाथ थाम लिया था. लवली का मन भटका तो डा. बिस्वास में उसे कमियां ही कमियां नजर आने लगी थीं. दिल पागल होता है तो अच्छाइयां भी बुरी नजर आती हैं. ऐसा ही लवली के साथ भी हुआ था.

सुरेंद्र ने लवली के दिल में अपने लिए जगह तो बना ली थी. लेकिन वह जो चाहता था, वह हासिल नहीं हुआ था. इस के लिए वह मौका तलाश रहा था. लेकिन उसे मौका नहीं मिल रहा था. उसी बीच डा. बिस्वास को सूचना मिली कि गांव में उन की मां की तबीयत खराब है. मां को देखने जाना जरूरी था, इसलिए डा. बिस्वास गांव चला गया. पत्नी और बच्चों को वह इसलिए नहीं ले गया कि उन के जाने से क्लिनिक में ताला लग जाता. इसीलिए लवली को उस ने हुरहुरी में ही छोड़ दिया.

सुरेंद्र के लिए यह सुनहरा मौका था. घर में लवली अकेली रह गई थी. अब वह उस से कुछ भी कह सकता था और उस की इच्छा होने पर उस के साथ कुछ भी कर सकता था. गांव में सुरेंद्र को ही डा. बिस्वास अपना सब से करीबी मानता था, इसलिए पत्नी और बच्चों की जिम्मेदारी उसे ही सौंप गया था. इस जिम्मेदारी को निभाने के लिए सुरेंद्र ने लवली के पास आ कर कहा था, ‘‘किसी भी चीज की जरूरत हो, बेझिझक कहना.’’

लवली ने एक आंख दबा कर कहा, ‘‘डा. साहब तो गांव जा रहे हैं. अब हमें अपनी सभी जरूरतें तुम्हें ही बतानी पड़ेंगी.’’

सुबह सुरेंद्र ने क्लिनिक खुलवाई तो रात को बंद भी उसी ने करवाई. क्लिनिक बंद करा कर वह जाने लगा तो लवली ने कहा, ‘‘रुको, खाना खा कर जाना. वैसे भी अकेली बोर हो रही हूं.’’

बच्चे खा कर जल्दी ही सो गए थे. उस के बाद लवली और सुरेंद्र ने खाना खाया. इस बीच दोनों दुनियाजहान की बातें करते रहे. कामों से फुरसत हो कर लवली सुरेंद्र के पास आई तो उस ने उसे बांहों में भल लिया. तब लवली ने कहा, ‘‘सुरेंद्र, तुम तो जानते ही हो कि मैं शादीशुदा ही नहीं, 2 बच्चों की मां भी हूं. तुम्हारा यह प्यार मेरे शरीर तक तो ही सीमित नहीं रहेगा?’’

‘‘मैं तुम्हारे शरीर से नहीं, तुम से प्यार करता हूं. मैं तुम्हें वही इज्जत दूंगा, जो एक पत्नी को मिलती है. मैं तुम्हें रानी बना कर रखूंगा. तुम्हें तो पता ही है कि मेरे पास किसी चीज की कमी नहीं है.’’ सुरेंद्र ने कहा.

‘‘क्या तुम मुझ से विवाह करोगे?’’

‘‘क्यों नहीं. मैं ने तुम से प्यार किया है तो विवाह भी करूंगा.’’ कह कर सुरेंद्र ने अपने प्यार की मुहर लवली के कपोलों पर लगा दी. सुरेंद्र की मजबूत बांहों में लवली पिघलने लगी थी. वह भी उस से लिपट गई. तब उस ने न पति के बारे में सोचा, न बच्चों के बारे में.

डा. विश्वास के वापस आतेआते उस की गृहस्थी में सेंध लग चुकी थी. दोस्त और पत्नी ने डा. बिस्वास के विश्वास को खत्म कर दिया था. डाक्टर तो अपने काम में लगा रहता था, ऐसे में लवली को प्रेमी से मिलने में कोई परेशानी नहीं होती थी. दोनों दिन में न मिल पाते तो रात में डाक्टर के सो जाने के बाद मिल लेते थे. सुरेंद्र और लवली का यह संबंध ज्यादा दिनों तक न तो गांव वालों से छिपा रह सका न डा. बिस्वास से. पत्नी के बेवफा हो जाने से डाक्टर हैरान तो हुआ ही, परेशान भी हो उठा. उसे पत्नी से ऐसी उम्मीद नहीं थी. जब गांव के कई लोगों ने उसे टोका तो एक दिन उस ने लवली से पूछा, ‘‘मैं जो सुन रहा हूं क्या वह सच है?’’

‘‘तुम क्या सुन रहे हो. मुझे कैसे पता चलेगा. इसलिए मैं क्या बताऊं कि तुम ने जो सुना है, वह सच है या झूठ?’’

‘‘तुम जानती हो कि तुम्हें और सुरेंद्र को ले कर गांव में खूब चर्चा हो रही है. मेरे खयाल से यह ठीक नहीं है. अगर तुम अपनी सीमा में रहो तो तुम्हारे लिए भी ठीक रहेगा और मेरे लिए भी.’’ डा. बिस्वास ने चेताया.

‘‘यह झूठ है. गांव वालों की बातों में आ कर मुझ पर शक करने लगे. मैं तुम्हारी सगी हूं या गांव वाले?’’ लवली बोली.

लवली ने भले ही अपने ऊपर लगे आरोप को नकार दिया था, लेकिन डा. बिस्वास को उस की बात पर विश्वास नहीं हुआ. फलस्वरूप वह तनाव में रहने लगा. सब से ज्यादा चिंता उसे अपने बच्चों की थी. अब अकसर पतिपत्नी में लड़ाईझगड़ा और मारपीट होने लगी. इस के बावजूद लवली ने सुरेंद्र से मिलना बंद नहीं किया. इस की एक वजह यह भी थी कि सुरेंद्र उसे शादी का भरोसा दे रहा था. शायद इसीलिए उसे न पति की परवाह रह गई थी, न ही बच्चों की. अब उसे सिर्फ अपने सुख की परवाह रह गई थी.

हालात बेकाबू होते देख डा. बिस्वास गांव लौटने की सोचने लगा. जहां उस का घर था और अपने लोग भी थे. लेकिन लवली वापस जाने के लिए तैयर नहीं थी. इसलिए उस ने सुरेंद्र से साफ कह दिया, ‘‘जो कुछ भी करना है, जल्दी कर लो वरना डाक्टर मुझे जबरदस्ती कोलकाता ले कर चला जाएगा. तब मैं उसे मना भी नहीं कर पाऊंगी. क्योंकि बिना विवाह के मैं तुम्हारे साथ रह भी नहीं सकती.’’

लवली के दबाव डालने पर सुरेंद्र लवली को ले कर बरेली में रहने ही नहीं लगा, बल्कि कोर्टमैरिज भी कर ली. पत्नी और दोस्त के विश्वासघात से डा. बिस्वास टूट गया. वह गांव वालों के सामने फूटफूट कर रो पड़ा. गांव वालों को उस से सहानुभूति तो थी, लेकिन कोई कुछ नहीं कर पाया. सुरेंद्र के पिता रामचरण सिंह और भाई महेंद्र को भी उस की यह हरकत पसंद नहीं आई, लेकिन उस की दबंगई के आगे उन की भी एक न चली. डा. बिस्वास की दुनिया लुट चुकी थी. जिसे सुख देने के लिए वह घरपरिवार छोड़ कर इतनी दूर आया था, जब वही छोड़ कर चली गई तो उस के लिए यहां रहना मुश्किल हो गया. वह अपने बच्चों को ले कर अपने गांव लौट गया. यह करीब 17 साल पहले की बात है.

डा. बिस्वास गांव छोड़ कर चला गया तो सुरेंद्र लवली को ले कर गांव आ गया. लेकिन घर वालों ने उसे साथ नहीं रखा. उस के हिस्से की जमीन दे कर उसे अलग कर दिया. सुरेंद्र ने लवली के साथ अपनी गृहस्थी अलग बसा ली और आराम से रहने लगा. लवली अब सुरेंद्र की प्रेमिका नहीं, पत्नी थी. इसलिए सुरेंद्र अब उसे अपने हिसाब से रखना चाहता था, जबकि लवली सीमाओं में बंध कर नहीं रहना चाहती थी. लवली सुरेंद्र के 2 बच्चों, वीरेंद्र और तृप्ति की मां बन गई थी. इस के बावजूद वह जिस तरह रहती आई थी, उसी तरह रहना चाहती थी. सुरेंद्र लवली को अपने हिसाब से रखने लगा तो उसे लगा कि उस की आजादी खत्म हो रही है. वह बंदिशों में रहने वाली नहीं थी. डा. बिस्वास ने कभी उसे बंदिशों में रखा भी नहीं था, इसलिए सुरेंद्र की ये बंदिशें उसे खल रही थीं.

अब लवली को अपना यह यार अखरने लगा था. उसे ज्यादा परेशानी हुई तो एक दिन उस ने सुरेंद्र से कह भी दिया, ‘‘मैं तुम्हारी खरीदी हुई गुलाम नहीं कि जो तुम कहोगे, मैं वही करूंगी. मैं उन औरतों में नहीं हूं, जो पति की अंगुली पकड़ कर चलती हैं. मेरी भी अपनी इच्छाएं हैं. मैं अपने हिसाब से जीना चाहती हूं.’’

लवली की ये बातें सुरेंद्र को बिलकुल अच्छी नहीं लगीं. अब उसे लगा कि दूसरे की पत्नी को अपनी पत्नी बना कर उस ने बड़ी गलती की है. लेकिन उसे अपनी मर्दानगी पर विश्वास था, इसलिए उसे लगता था कि वह जिस तरह चाहेगा, पत्नी को रखेगा. लेकिन उस का यह विश्वास तब टूट गया, जब लवली ने उस की मरजी के खिलाफ मीरगंज के एक निजी अस्पताल में नर्स की नौकरी कर ली. लवली ने घर के बाहर कदम रखा तो उस की लोगों से जानपहचान बढ़ने लगी. उन में से कुछ लोगों से उस की दोस्ती भी हो गई, तो वे उस से मिलने हुरहुरी तक आने लगे. सुरेंद्र और उस के भाइयों ने इस का विरोध किया. लेकिन लवली अब खुद अपने पैरों पर खड़ी थी, इसलिए उस ने किसी की एक नहीं सुनी.

सुरेंद्र ने लवली को समझाया भी और धमकाया भी, लेकिन उस पर कोई असर नहीं हुआ. वह उस की कोई भी बात मानने को तैयार नहीं थी. सुरेंद्र और उस के भाइयों ने ज्यादा रोकटोक की तो लवली ने मीरगंज के मोहल्ला मुगरा में एक कमरा किराए पर लिया और उसी में बच्चों के साथ रहने लगी. बच्चे भी अब तक काफी बड़े हो गए थे. बेटा वीरेंद्र 16 साल का था तो बेटी तृप्ति 14 साल की. लवली पति से अलग अकेली रहने लगी तो उस के दोस्तों की संख्या लगातार बढ़ने लगी. पत्नी की इन हरकतों से सुरेंद्र परेशान रहने लगा था. लेकिन अपने दिल का दर्द किसी से कह नहीं सकता था. घर वालों ने भी कह दिया था कि उस ने जैसा किया है, वही भोगे. यह भी सच है कि जो औरत एक बार पति और बच्चों को छोड़ सकती है, परिस्थिति बनने पर उसे दूसरे पति और बच्चों को छोड़ने में कोई परेशानी नहीं होगी.

सुरेंद्र तनाव में रहने लगा था, क्योंकि उस की परेशानी दिनोंदिन बढ़ती ही जा रही थी. इस की एक वजह यह भी थी कि लवली के पास जिन लोगों का आनाजाना था, वे रसूखदार लोग थे. अब सुरेंद्र लवली से डरने लगा था. इसी चिंता में वह शराब पीने लगा. सुरेंद्र जब भी लवली से मिलने मीरगंज जाता. दोनों का झगड़ा जरूर होता. तब बच्चे मां का ही पक्ष लेते. पत्नी और बच्चों की इन हरकतों से वह महसूस करता कि सब कुछ होते हुए भी उस के पास कुछ नहीं है. उसे चिंता बच्चों की थी. उसे लगता था कि अगर यही हाल रहा तो उस के बच्चे बरबाद हो जाएंगे. इसलिए बच्चों का हवाला दे कर भी उस ने लवली को समझाने की कोशिश की थी, इस पर भी वह नहीं मानी थी.

लवली मीरगंज में रहती थी, जबकि सुरेंद्र गांव में रहता था. सुरेंद्र के भाइयों ने उसे सलाह दी कि अगर उसे अपनी पत्नी और बच्चों पर कंट्रोल रखना है तो वह उन के साथ रहे. घर वालों की यह सलाह सुरेंद्र को उचित लगी. उस ने तय किया कि वह जमीन बेच कर मीरगंज में मकान बनवा ले और उसी में पत्नी और बच्चों के साथ रहे. उसी बीच लवली की दोस्ती मुगरा मोहल्ले से जुड़े मोहल्ला शिवपुरी के रहने वाले 20 वर्षीय शिब्बू उर्फ शिवम से हो गई. शिवम के पिता की मौत हो चुकी थी, जो तहसील मिलक के सरकारी अस्पताल में नौकरी करते थे. पिता की मौत के बाद मृतक आश्रित कोटे में उसे वार्डब्याय की नौकरी मिल गई थी. लवली नर्स थी, जबकि शिवम वार्डब्वाय इसी आधार पर दोनों की जानपहचान हो गई थी. उन का मिलनाजुलना होने लगा तो एकदूसरे के घर भी आनेजाने लगे.

घर आनेजाने में ही दोनों में नाजायज संबंध बन गए. जबकि दोनों की उम्र में जमीन आसमान का अंतर था. लवली 40 साल की थी तो शिवम 20 साल का. सुरेंद्र ने अपनी एक जमीन 13 लाख रुपए में बेच कर मीरगंज की टीचर कालोनी में 7 लाख रुपए में एक प्लौट खरीद कर बाकी बचे पैसों से मकान बनवाना शुरू कर दिया. लवली समझ गई कि मकान बन जाने के बाद उसे सुरेंद्र के साथ ही रहना पड़ेगा. तब उसे शिवम से मिलने में परेशानी होगी. जबकि लवली अब शिवम के बिना नहीं रह सकती थी. सुरेंद्र को लवली के नए दोस्त शिवम के बारे में पता नहीं था. लेकिन मकान बनवाने के दौरान उस ने शिवम को लवली के कमरे पर आतेजाते देखा तो उस के बारे में पूछा. लवली ने ऐसे ही कह दिया, ‘‘लड़का ही तो है. आ जाता है तो इस में परेशानी क्या है?’’

सुरेंद्र को लगा कि जब सभी एक साथ रहने लगेंगे तो सब ठीक हो जाएगा, लेकिन यह सुरेंद्र की भूल थी, क्योंकि लवली कुछ और ही सोच रही थी. एक बार फिर बहक चुकी लवली अब किसी भी कीमत पर पति की बंदिशों में नहीं रहना चाहती थी. लेकिन उसे यह भी पता था कि सुरेंद्र के पैसे और मकान पर उसे तभी हक मिलेगा, जब वह उस के साथ रहे. फिर तो जल्दी ही वह यह सोचने लगी कि अगर सुरेंद्र नाम का यह कांटा निकल जाए तो वह आजाद भी हो जाएगी और इस की सारी प्रौपर्टी भी उस की हो जाएगी. इस के बाद उस ने अपने नए प्रेमी शिवम से बात कर के सुरेंद्र को ठिकाने लगाने की योजना बना डाली. उसे पैसे का लालच तो दिया ही था, साथ ही यह भी कहा था कि सुरेंद्र के न रहने पर वे दोनों चैन से एक साथ रह सकेंगे.

सुरेंद्र को ठिकाने लगाना शिवम के अकेले के वश का नहीं था. मदद के लिए उस ने अपने दोस्तों ललित और सनी से बात की. दोस्ती की खातिर वे दोनों भी उस की मदद के लिए तैयार हो गए. ललित मीरगंज के ही रहने वाले धाकनलाल का बेटा था तो सनी मिलक के रहने वाले छतरपाल का. सुरेंद्र अपने बन रहे नए मकान पर ही रहता था. ऐसे में उसे ठिकाने लगाना कोई मुश्किल काम नहीं था. वह रोजाना शराब पीता ही था. इसलिए उसे मारना और आसान था. सुरेंद्र ने सपने में भी नहीं सोचा था कि लवली उस की हत्या भी करवा सकती है, इसलिए वह निश्चिंत था. 25 अक्तूबर की रात उस का खाना ले कर लवली आई. सुरेंद्र ने शराब पी कर खाना खाया. लवली ने भी उस के साथ ही खाना खाया था. काफी रात तक वह उस के साथ बातें करती रही. सुरेंद्र को नींद आने लगी तो वह कमरे पर आ गई.

सुबह सुरेंद्र के मकान पर काम करने वाले मिस्त्री और मजदूर आए तो पता चला कि सुरेंद्र की मौत हो गई. किसी ने पुलिस को खबर कर दी तो थोड़ी ही देर में चौकीइंचार्ज राजू राव आ पहुंचे. उन्होंने लाश का निरीक्षण किया. उस के गले पर दबाए जाने के निशान साफ नजर आ रहे थे. इस का मतलब था कि उस की गला घोंट कर हत्या की गई थी. चौकीइंचार्ज राजू राव ने घटना की सूचना थानाप्रभारी जितेंद्र कौशल को दी. सूचना मिलते ही थानाप्रभारी जितेंद्र कौशल भी क्षेत्राधिकारी धर्म सिंह के साथ आ पहुंचे. सुरेंद्र की हत्या की सूचना पत्नी और भाइयों को भी मिल चुकी थी. भाइयों ने आते ही कहा था कि उस के भाई की हत्या उस की पत्नी लवली ने ही कराई है.

लवली भी वहां मौजूद थी. उस के हावभाव से साफ लग रहा था कि उसे पति की हत्या का कोई गम नहीं है. उस की आंखों में आंसू भी नहीं थे. यह सब देख कर पुलिस को मृतक सुरेंद्र के भाइयों की बात सच लगी. पुलिस ने सुरेंद्र की लाश पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दी और लवली को साथ ले कर थाने आ गई. पूछताछ में लवली यही कहती रही कि उसे कुछ नहीं पता. रात में वह उसे खाना खिला कर अच्छाभला छोड़ कर आई थी. सुरेंद्र के भाई हरपाल सिंह द्वारा दी गई तहरीर के आधार पर पुलिस ने अपराध संख्या 655/2013 पर सुरेंद्र की हत्या का मुकदमा लवली और उस के अज्ञात साथियों के खिलाफ दर्ज कर लिया था.

हत्या के इस मामले की जांच चौकी इंचार्ज राजू राव को सौंपी गई. उन्हें अपने मुखबिरों से पता चला कि इधर कुछ दिनों से शिवपुरी का रहने वाला शिवम का लवली के यहां कुछ ज्यादा ही आनाजाना था. इस के बाद लवली के मोबाइल की काल डिटेल्स चैक की गई तो उस में आखिरी फोन शिवम का था. यह फोन उसी रात किया गया था, जिस रात सुरेंद्र की हत्या हुई थी. लवली से शिवम के बारे में पूछा गया तो उस ने उस के बारे में भी कुछ नहीं बताया. तब पुलिस ने शिवम को उस के मोबाइल की लोकेशन के आधार पर 26 अक्तूबर को बरेली के रेलवे स्टेशन से गिरफ्तार कर लिया. शिवम को गिरफ्तार कर के थाने लाया गया तो वहां लवली को देख कर वह समझ गया कि अब सारा खेल खत्म हो चुका है. इसलिए बिना किसी हीलाहवाली के उस ने लवली के साथ के अपने अवैध संबंधों को स्वीकार करते हुए सुरेंद्र की हत्या की पूरी कहानी बता दी.

शिवम ने कहा, ‘‘लवली के कहने पर ही मैं ने अपने दोस्तों ललित और सनी की मदद से गला दबा कर सुरेंद्र की हत्या की थी. पुलिस ने शिवम की निशानदेही पर ललित और सनी के घरों पर छापा मार कर गिरफ्तार करना चाहा. लेकिन वे फरार हो चुके थे. इस के बाद पुलिस ने लवली और शिवम को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. थाना मीरगंज पुलिस ललित और सनी की तलाश कर रही है. कथा लिखे जाने तक दोनों पुलिस के हाथ नहीं लगे थे.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

extramarital affair : नेहा ने तैयार किया मौत का काकटेल

2 बच्चों की मां नेहा शर्मा का हंसताखेलता परिवार था. पति प्रतीक शर्मा को मैडिकल स्टोर से अच्छी कमाई हो रही थी, इस के बावजूद भी पति के दोस्त आयुष शर्मा से नेहा के अवैध संबंध हो गए. इस के बाद प्रेमी के साथ मिल कर नेहा ने ऐसी खौफनाक साजिश रची कि…

अपने प्रेमी के साथ मिल कर पति की मौत की साजिश रचने के बाद नेहा के व्यवहार में बदलाव आ गया. अब वह पति की किसी भी बात का बुरा नहीं मानती. प्रतीक कटाक्ष करता या फिर जलीकटी बातें कहता तो नेहा गुस्सा करने के बजाय हंस कर टाल देती. वह प्रतीक को रिझाती और उस से मीठीमीठी बातें करती. यही नहीं प्रतीक रात को घर लौटता तो नेहा कमरे में उस के साथ बैठती और अपने हाथों से जाम तैयार करती.

पत्नी के इस बदले व्यवहार से प्रतीक का गुस्सा ठंडा पड़ गया. वह नेहा के साथ अच्छा बरताव करने लगा. उस की बात भी मानने लगा. आयुष का घर आना और नेहा से बात करना प्रतीक को कचोटता तो था, लेकिन वह विरोध नहीं करता था. आयुष से उस की दोस्ती बरकरार थी. कभीकभी आयुष के जोर देने पर दोनों की महफिल भी जमती थी.

नेहा आयुष के प्यार में इतनी अधिक दीवानी हो गई थी कि उस ने पति की हत्या करा कर आयुष के साथ जीवन बिताने का निश्चय कर लिया था. वह जब भी फोन पर बात करती, आयुष को पति की हत्या के लिए उकसाती थी. उसे अब और ज्यादा इंतजार बरदाश्त नहीं हो रहा था. अत: उस ने एक बार फिर आयुष के साथ कान से कान जोड़ कर हत्या का प्लान बनाया.

प्लान के मुताबिक नेहा ने पति से मायके जाने की इच्छा जताई तो वह राजी हो गया. 6 मार्च, 2024 को प्रतीक नेहा व बच्चों को छोडऩे अपनी निजी ब्रेजा कार से ससुराल के लिए निकला. देर शाम प्रतीक अपनी ससुराल न्यू कालोनी कुम्हार टोला लालबाग फैजाबाद पहुंचा. वहां बीवीबच्चों को छोड़ कर प्रतीक 7 मार्च को वापस कानपुर आ गया.

इस बीच नेहा फोन के जरिए आयुष के संपर्क में थी. उस ने फोन पर बता दिया था कि प्रतीक उसे 1-2 दिन में लेने फैजाबाद आएगा. वह भी उस के साथ आ जाए. इस के बाद आयुष मैडिकल स्टोर पर पहुंचा. वहां दोनों बातें करते रहे. दुकान बंद करने के बाद आयुष और प्रतीक ने साथ बैठ कर शराब पी. आयुष दवा सप्लायर था. उस के कई अन्य दोस्त भी थे. इन्हीं में से किसी ने उसे बताया था कि अगर 2 अलगअलग तरह की शराब में कोल्ड ड्रिंक मिला कर उस में 11 नींद की गोलियां मिला दी जाएं तो वह 24 घंटे बाद जहरीली शराब हो जाती है. आयुष ने इसी तरीके को अपनाया और जहरीली शराब बना कर सुरक्षित रख ली.

पत्नी ने पति को कैसे लगाया ठिकाने

8 मार्च, 2024 की शाम प्रतीक जब अपनी कार से पत्नी व बच्चों को लाने फैजाबाद के लिए निकला तो आयुष भी साथ हो लिया. प्रतीक व आयुष देर रात अयोध्या पहुंचे. यहां उन्होंने रामपथ पर होटल में एक रूम लिया, फिर वहां दोनों ने खूब शराब पी. रात भर होटल में रुकने के बाद 9 मार्च की सुबह 10 बजे प्रतीक और आयुष कुम्हार टोला स्थित नेहा के मायके पहुंचे. नेहा व उस की मां ने प्रतीक व आयुष का खूब स्वागत किया. दोपहर का भोजन करने के बाद प्रतीक व आयुष नेहा को साथ ले कर कानपुर रवाना हुए. लखनऊ पहुंचने पर नेहा ने प्रतीक से आग्रह किया कि वह लखनऊ घूमना चाहती है. आयुष ने भी नेहा की बात का समर्थन किया.

पत्नी व दोस्त की बात मान कर प्रतीक ने रात में लखनऊ में रुकने का मन बना लिया. प्रतीक ने चारबाग रेलवे स्टेशन के सामने होटल आशीर्वाद में डबलबैड वाला रूम बुक कराया और उसी में सब लोग ठहर गए. आयुष जानता था कि प्रतीक शराब का आदी है. वह ड्रिंक जरूर करेगा. इस के लिए वह तैयार भी था. उस ने एक दिन पहले ही मौत का काकटेल तैयार कर लिया था. रात 10 बजे प्रतीक ने शराब की डिमांड की तो आयुष ने साथ लाई गई शराब की बोतल निकाली फिर उस बोतल को खूब हिलाया ताकि जहर ऊपर आ जाए. इस के बाद नेहा और आयुष ने मिल कर यही शराब प्रतीक को पिला दी.

शराब पीने के एक घंटे बाद प्रतीक बेहोश हो गया और रात 12 बजे उस की मौत हो गई. इस के बाद नेहा ने रोनेधोने का नाटक शुरू किया और आयुष ने होटल मैनेजर की मदद से इमरजेंसी काल कर एंबुलैंस बुला ली. आयुष और नेहा प्रतीक को एंबुलैंस से हजरतगंज स्थित जिला अस्पताल ले गए. वहां डाक्टरों ने प्रतीक को देखते ही मृत घोषित कर दिया.

चूंकि प्रतीक की मौत संदिग्ध परिस्थितियों में हुई थी, अत: अस्पताल से सूचना थाना हजरतगंज पुलिस को दी गई. सूचना पाते ही पुलिस अस्पताल आ गई. पुलिस ने पूछताछ की तो नेहा ने बताया कि मृतक उस का पति प्रतीक शर्मा है. आयुष ने बताया कि मृतक उस का भाई है. वह कानपुर में रहता है. होटल आशीर्वाद में ठहरे थे. ड्रिंक के बाद भाई प्रतीक की तबियत बिगड़ी तो उसे जिला अस्पताल लाए. यहां डाक्टरों ने उन्हें मृत बताया. पूछताछ के बाद पुलिस ने प्रतीक के शव का पोस्टमार्टम हाउस भेज दिया. दूसरे रोज मृतक प्रतीक के शव का पोस्टमार्टम हुआ. पोस्टमार्टम के बाद शव को आयुष को सौंप दिया गया. उस के बाद नेहा और आयुष प्रतीक के शव को गुलाल घाट ले गए और वहां विद्युत शवदाह गृह में शव को सुपुर्द ए खाक कर दिया.

12 मार्च को नेहा अपने बच्चों के साथ किदवई नगर स्थित अपनी ससुराल आ गई और आयुष अपने हंसपुरम आवास विकास में घर चला गया. नेहा और बच्चों के साथ अपने बेटे प्रतीक को न देख कर पुनीत शर्मा का माथा ठनका. उन्होंने पूछा, ”बहू, प्रतीक कहां है? वह तुम्हारे साथ ही गया था?’’

”पापाजी, फैजाबाद से कानपुर लौटते समय रास्ते में कार खराब हो गई थी. वह बाराबंकी में कार ठीक करा रहे हैं. 2-3 दिन में वापस आने को कहा है.’’

बहू की बात उन्हें अटपटी तो लगी, लेकिन उन्होंने कुछ कहा नहीं. इस के बाद उन्होंने अनेक बार प्रतीक को काल की, लेकिन काल रिसीव नहीं हुई.

प्रतीक का मोबाइल नेहा के पास ही था. कई काल आई तो नेहा को लगा कि ससुरजी शक कर रहे हैं. अत: शातिर नेहा ने प्रतीक के मोबाइल से ससुर को मैसेज भेजा कि वह बाराबंकी में है और कार ठीक करा रहा है. सब ठीक है. 2 दिन में वापस आ जाएगा. चिंता न करें. ऐसा ही मैसेज नेहा ने प्रतीक के मोबाइल फोन से अपने फोन पर भी भेजा. इस मैसेज को पढ़ कर पुनीत को कुछ राहत महसूस हुई. लेकिन 2 दिन बीत जाने के बाद भी जब प्रतीक वापस घर नहीं आया और फोन से भी बात नहीं हुई तो पुनीत कुमार शर्मा के मन में बेटे को ले कर गलत विचार आने लगे. इन का उत्तर पाने के लिए उन्होंने नेहा से प्रश्नों की बौछार शुरू कर दी. इन प्रश्नों से नेहा घबरा गई और उसे पकड़े जाने का डर सताने लगा.

घबराई नेहा ने इस बाबत आयुष से बात की, फिर दोनों ने शहर छोडऩे का फैसला किया. 16 मार्च को नेहा ने ससुर पुनीत शर्मा से कहा कि बेटे को बुखार है. वह उसे दवा दिलाने डाक्टर के पास जा रही है. दवा के बहाने नेहा 5 साल की बेटी व 3 साल के बेटे को साथ ले कर घर से निकली, फिर वापस नहीं लौटी. नेहा और आयुष कानपुर से जयपुर पहुंचे, वहां पर रिंगस स्थित मयूर पैलेस में कमरा ले कर रहने लगे. पैसे खत्म होने के बाद उन्होंने वहीं किराए का कमरा ले लिया और वहीं रहने लगे. आर्थिक परेशानी के चलते नेहा ने अपने आभूषण तक बेच दिए थे.

इधर जब नेहा कई दिनों तक घर वापस नहीं आई तो पुनीत कुमार शर्मा घबरा उठेे. उन्होंने नेहा की तलाश हर संभावित स्थान पर की, लेकिन उस का कुछ भी पता न चला. बेटाबहू के लापता होने की खबर पड़ोसियों को भी हो गई थी. वे तरहतरह की चर्चाएं करने लगे थे. खासकर महिलाएं चटखारे ले कर बतियाने लगीं. बेहद परेशान पुनीत कुमार शर्मा 21 मार्च, 2024 को थाना नौबस्ता पहुंचे. उस समय वहां इंसपेक्टर जगदीश प्रसाद पांडेय मौजूद थे. पुनीत ने उन्हें सारी बात विस्तार से बताई और बेटे, बहू व उस के 2 मासूम बच्चों की गुमशुदगी दर्ज करने तथा उन्हें खोजने की गुहार लगाई.

पुनीत की बात गौर से सुनने के बाद एसएचओ जगदीश पांडेय ने पुनीत के बेटे प्रतीक, बहू नेहा व उस के मासूम बच्चों की गुमशुदगी दर्ज कर ली और जल्द ही उन्हें खोजने का आश्वासन दिया. लेकिन इसी बीच होली का त्यौहार आ गया. कानपुर में 8 दिन तक गजब का होली का हुड़दंग रहता है. अत: पुलिस त्यौहार में उलझ गई और गुमशुदगी रिपोर्ट पर पुलिस कुछ नहीं कर सकी. वैसे भी पतिपत्नी का मामला था, सो पुलिस सुस्त बनी रही. जब 15 दिन तक बेटेबहू व बच्चों का कुछ भी पता न चला तो पुनीत कुमार शर्मा ने रविंद्र कुमार (डीसीपी साउथ) को अपनी पीड़ा बताई. चूंकि मामला एक अफसर के बेटेबहू से संबंधित था. सो उन्होंने इस मामले को गंभीरता से लिया और जांच के लिए एक पुलिस टीम एडीसीपी अंकिता शर्मा की निगरानी में गठित कर दी.

इस टीम में एसएचओ (नौबस्ता) जगदीश प्रसाद पांडेय, बसंत विहार चौकी इंचार्ज छत्रपाल सिंह, एसआई राधा किशन, महिला एसआई पूजा सिंह, हैडकांस्टेबल राजवीर व हरगोविंद को शामिल किया गया.

पुलिस को इस तरह मिला आरोपियों का सुराग

गठित पुलिस टीम ने सब से पहले गुमशुदगी दर्ज कराने वाले पुनीत कुमार शर्मा से पूछताछ की और जानकारी जुटाई. उस के बाद टीम ने नेहा और उस के पति प्रतीक के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स निकलवाई. नेहा की काल डिटेल्स से पता चला कि वह एक नंबर पर लगभग हर रोज बात करती थी. इस नंबर की टीम ने जांच कराई तो पता चला कि यह नंबर हंसपुरम आवास विकास निवासी आयुष शर्मा का है. पुलिस टीम ने पुनीत कुमार से आयुष शर्मा के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि आयुष शर्मा उन के बेटे प्रतीक का दोस्त है. वह दवा सप्लाई का काम करता है. उस का घर में भी आनाजाना था. नेहा को वह भाभी कहता था. दोनों के बीच मधुर संबंध थे.

पुलिस टीम आयुष के हंसपुरम आवास विकास स्थित घर पहुंची तो वह घर पर नहीं था. घर वालों ने बताया कि 20 दिन से वह घर नहीं आया. एसआई छत्रपाल ने उस को काल लगाई तो उस ने काल रिसीव कर ली. एसआई ने उस से प्रतीक के बारे में बात की तो उस ने बताया कि प्रतीक उस का दोस्त है. लेकिन एक माह से वह उस से नहीं मिला. शायद वह इंदौर में है. उस पर लाखों रुपया कर्ज है. इन दिनों वह बेहद परेशान है. लेकिन आयुष की बात तब गलत साबित हुई, जब पुलिस टीम ने आयुष, नेहा और प्रतीक के मोबाइल फोन सर्विलांस पर लिए. सर्विलांस के जरिए लोकेशन ट्रेस की गई तो वह जयपुर (राजस्थान) के रिंगस की मिली. इस से स्पष्ट था कि तीनों साथ थे.

पुलिस टीम ने सारी जानकारी एडीसीपी अंकिता शर्मा को दी, फिर इजाजत ले कर पुलिस टीम जयपुर रवाना हो गई. 16 अप्रैल को पुलिस टीम ने रिंगस के एक मकान पर छापा मार कर आयुष नेहा को हिरासत में लेे लिया. नेहा के बच्चे भी उस के साथ थे. मकान में वह एक कमरा किराए पर ले कर रह रहे थे. पुलिस टीम उन को ले कर कानपुर आ गई. नेहा मूलरूप से उत्तर प्रदेश के फैजाबाद (अयोध्या) शहर की रहने वाली थी. नेहा के पिता अमृतलाल शर्मा फैजाबाद के लालबाग की न्यू कालोनी कुम्हार टोला में रहते थे. परिवार में पत्नी कनक शर्मा के अलावा बेटी नेहा व बेटा आलोक थे. अमृतलाल शर्मा प्राइवेट नौकरी कर अपने परिवार का पालनपोषण करते थे.

नेहा खूबसूरत थी. कुदरत ने उसे रूपयौवन से नवाजा था. जब उस ने जवानी की डगर पर कदम रखा तो उस का अंगअंग फूलों की तरह खिल उठा. उस की झील सी गहरी आंखें किसी को भी मंत्रमुग्ध कर लेती थीं. जो उसे एक बार देख लेता, देखता ही रह जाता. नेहा फैशनपरस्त चंचल स्वभाव की थी. उस ने विद्यामंदिर डिग्री कालेज से बीएड की पढ़ाई की थी. अमृतलाल शर्मा बेटी की चंचलता और फैशनपरस्ती से परेशान रहते थे. इसलिए वह जल्द से जल्द उस का विवाह कर उसे ससुराल भेजना चाहते थे. वह उस के लिए उचित लड़का खोजने लगे. अमृतलाल शर्मा नेहा की शादी संपन्न घर में करना चाहते थे, ताकि उसे अभावों से जूझना न पड़े. वह यह भी चाहते थे कि परिवार सीमित हो. काफी भागदौड़ के बाद एक रिश्तेदार के माध्यम से उन्हें बेटी के लिए प्रतीक पसंद आ गया.

प्रतीक के पिता पुनीत कुमार शर्मा कानपुर शहर के किदवई नगर में रहते थे. उन के परिवार में पत्नी मीना के अलावा इकलौता बेटा प्रतीक शर्मा था. पुनीत कुमार शर्मा भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) में अफसर थे. लेकिन वह रिटायर हो चुके थे. उन का अपना आलीशान मकान था. उन की आर्थिक स्थिति मजबूत थी. उन का बेटा प्रतीक पढ़ालिखा था. संपन्न घर और पढ़ालिखा लड़का देख कर अमृतलाल शर्मा ने प्रतीक को अपनी बेटी नेहा के लिए पसंद कर लिया था. इस के बाद 10 फरवरी, 2017 को अमृतलाल ने नेहा का विवाह प्रतीक शर्मा के साथ धूमधाम से कर दिया.

खूबसूरत पत्नी पा कर प्रतीक जहां खुश था, वहीं अच्छा घरवर पा कर नेहा भी अपने भाग्य पर इतरा उठी थी. सुंदर बहू पा कर पुनीत कुमार व उन की पत्नी मीना भी सुखद महसूस कर रहे थे. घर में किसी चीज का अभाव नहीं था और प्रतीक भी नेहा का पूरा खयाल रखता था, सो नेहा को कोई शिकवाशिकायत नहीं थी. वह पति की सेवा तो करती ही थी, सासससुर की दिनचर्या का भी पूरा खयाल रखती थी. अत: वे दोनों खुश थे. हंसीखुशी से जीवन के 5 साल बीत गए. इन सालों में नेहा ने एक बेटी और एक बेटे को जन्म दिया. समय बीतते पारिवारिक बोझ बढ़ा तो प्रतीक को आर्थिक चिंता सताने लगी. पापा रिटायर्ड थे और वह खुद कोई ठोस कारोबार नहीं कर रहा था. प्रतीक को मैडिकल लाइन की अच्छी जानकारी थी. वह मैडिकल स्टोर खोलना चाहता था. इस बाबत उस ने अपने पापा से विचारविमर्श किया तो उन्होंने उसे इजाजत दे दी.

पति के दोस्त से नेहा के कैसे हुए संबंध

वर्ष 2023 के जनवरी माह में प्रतीक ने गौशाला स्थित वैदिक अस्पताल के पास एक मैडिकल स्टोर खोल लिया. मैडिकल स्टोर ठीक चले, इस के लिए प्रतीक ने अनेक डाक्टरों से संपर्क किया. डाक्टरों द्वारा लिखे परचे जब उस की दुकान पर आने लगे तो धीरेधीरे मैडिकल स्टोर पर दवाओं की बिक्री होने लगी. मैडिकल स्टोर पर ही एक रोज प्रतीक की मुलाकात आयुष शर्मा से हुई. आयुष शर्मा औनलाइन दवाओं की सप्लाई करता था. आयुष अपने पिता विनोद शर्मा के साथ नौबस्ता के हंसपुरम की आवास विकास कालोनी में रहता था. वह तेजतर्रार युवक था. दवा व्यापार से वह अच्छा पैसा कमाता था. साथ ही ठाटबाट से रहता था.

मैडिकल स्टोर पर आयुष का आनाजाना शुरू हुआ तो प्रतीक की उस से दोस्ती हो गई. चूंकि दोनों एक ही जातिबिरादरी के थे और हमउम्र भी थे, अत: दिन पर दिन उन का दोस्ती बढ़ती गई. दोनों खानेपीने के भी शौकीन थे. सो आए दिन उन की महफिल सजने लगी. दोनों के बीच दोस्ती गहरी हुई तो एक रोज प्रतीक आयुष को अपने घर लाया. यहां आयुष की नजर प्रतीक की खूबसूरत पत्नी नेहा पर पड़ी. नेहा पहली ही नजर में आयुष के दिल में रचबस गई. इस के बाद वह अकसर नेहा से मिलने आने लगा.

चूंकि आयुष हृष्टपुष्ट और सजीला युवक था, बातें भी लच्छेदार करता था. नेहा भी उस की बातों में रुचि लेने लगी थी. धीरेधीरे नेहा आयुष की ओर आकर्षित होने लगी. वह उस के घर आने का इंतजार भी करने लगी. मैडिकल स्टोर पर जाने के लिए प्रतीक सुबह 9 बजे घर से निकलता, फिर देर रात ही घर लौटता. नेहा की सास पूजापाठ में व्यस्त रहती थी और ससुर पुनीत बेटे का हाथ बंटाने मैडिकल स्टोर पर चले जाते थे. इस बीच नेहा घर में अकेली रहती थी. ऐसे ही समय आयुष उस से मिलने आता था. दोस्ती के नाते वह नेहा को भाभी कहता था. नेहा की खूबसूरती पर वह फिदा था और मन ही मन उस से प्यार करता था. प्रतीक की अपेक्षा आयुष स्मार्ट व बलिष्ठ था, सो नेहा भी उस की दीवानी हो गई.

एक रोज आयुष नेहा के घर आया तो वह किसी सोच में डूबी थी. उस की यह हालत देख कर आयुष बोला, ”क्या बात है भाभी, तुम इतनी उदास क्यों हो? भैया से झगड़ा हुआ है क्या?’’

”नहीं, ऐसा कुछ नहीं है. मैं तो अपनी किस्मत को कोस रही हूं, जो तुम्हारे भैया जैसा पति मिला, वह तो कमाने में इतने व्यस्त हो गए हैं कि बीवीबच्चों की तरफ ध्यान ही नहीं देते.’’

”सो तो है भाभी, प्रतीक भैया कारोबार में इतने व्यस्त रहते हैं कि उन्हें पत्नी व बच्चों का खयाल ही नहीं रहता. अरे, काम की भी एक हद होती है. दुकान का काम दुकान में और घर का काम घर में अच्छा लगता है.’’ नेहा से हमदर्दी जताते हुए आयुष बोला.

आयुष ने नेहा से सहानुभूति जताई तो वह मुसकरा कर उसे एकटक ताकने लगी. आयुष के मन में क्या है, यह तो वह पहले से जानती थी, सिर्फ संकोच ही उसे रोके था. नेहा की निगाह को देखते हुए आयुष मदहोश होने लगा. नेहा अचानक बोली, ”बैठ जाओ आयुष. खड़े क्यों हो?’’

आयुष के लिए इतना इशारा काफी था. वह सोफे पर बैठने के बजाय नेहा के बैड पर बैठ गया. उस ने अपना हाथ नेहा की जांघ पर रखा तो फिर वही हुआ, जिस की दोनों को तमन्ना थी. आयुष ने नेहा की देह का पोरपोर चूमते हुए उस के यौवन में गोता लगाने शुरू कर दिए. नेहा भी उस का भरपूर साथ दे रही थी. कुछ देर बाद पसीने में डूबे दोनों अलग हुए तो उन के चेहरों पर असीम सुख की अनुभूति थी. शारीरिक सुख की भूखी नेहा को आयुष का साथ मिला तो उसे कुछ खयाल ही नहीं रहा. वह यह भी भूल गई कि वह शादीशुदा और 2 मासूम बच्चों की मां है. उस की एक मर्यादा है. लेकिन एक बार मर्यादा टूटी तो फिर दोनों अकसर अपनी मन की करने लगे. प्रतीक मैडिकल स्टोर चला जाता तो दोपहर में किसी न किसी बहाने आयुष आ जाता था और नेहा के साथ रंगरलियां मना कर चला जाता था. प्रतीक का दोस्त होने के नाते घरवाले उस के आनेजाने पर ऐतराज नहीं करते थे.

प्रेमी के साथ कातिल क्यों बनी नेहा

आयुष से अनैतिक संबंध बनाने के बाद नेहा पति प्रतीक की उपेक्षा करने लगी. जबकि वह उस की मौजूदगी में खूब हंसीमजाक करती और बतियाती थी. घरवालों ने पहले तो इस ओर ध्यान नहीं दिया पर पड़ोसियों में कानाफूसी शुरू हुई तो बात प्रतीक के कानों तक पहुंची. प्रतीक ने तो सपने में भी नहीं सोचा था कि उस की पत्नी इतना नीचे गिर जाएगी. उस ने नेहा से सवाल किया, ”यह आयुष मेरी गैरमौजूदगी में यहां क्यों आता है? तुम दोनों के बीच क्या चल रहा है?’’

नेहा डरने व लजाने के बजाय त्योरियां चढ़ा कर बोली, ”आयुष तुम्हारा दोस्त है. तुम्हीं उसे घर ले कर आए थे. में तो उसे बुलाने नहीं गई थी. अब जब वह घर आ जाता है तो मैं उसे कैसे मना करूं. तुम्हें ऐतराज है तो उसे मना कर दो. वैसे लगता है, पड़ोसियों ने तुम्हारे कान भरे हैं, इसलिए मेरे चरित्र पर अंगुली उठा रहे हो.’’

नेहा ने जिस बेबाकी से जवाब दिया था, उस से प्रतीक को लगा कि पड़ोसी बेवजह नेहा पर आरोप लगा रहे हैं. वैसे भी प्रतीक ने उसे आयुष के साथ आंखों से तो देखा नहीं था, इसलिए वह चुप हो गया. एक रोज आयुष दवाई सप्लाई करने प्रतीक के मैडिकल स्टोर पर आया तो उस ने नेहा से नजदीकियों के बारे में आयुष से पूछा. इस पर आयुष दोस्ती की दुहाई देते हुए बोला, ”तुम्हें गलतफहमी हुई है. मैं तो भाभी को मां की तरह मानता हूं.’’

आयुष के इस जवाब से प्रतीक के दिमाग में जो शक था, वह दूर हो गया. वह मान बैठा कि नेहा और आयुष के बीच ऐसावैसा कुछ भी नहीं है. उन की दोस्ती पर भी कोई फर्क नहीं पड़ा. वे साथ खातेपीते और उठतेबैठते रहे. इधर नेहा ने प्रतीक के शक करने पर सावधानी बरतनी शुरू कर दी. उस ने आयुष को दोपहर में घर आने को मना कर दिया. अब उसे जिस रोज मिलना होता, उस रोज वह घर से बाजार जाने का बहाना कर निकलती, फिर किसी होटल में रूम बुक कर वहीं फोन कर आयुष को बुला लेती. होटल रूम में घंटा 2 घंटा आयुष के साथ रंगरलियां मना कर वापस लौट आती.

लेकिन सावधानी के बावजूद एक रोज प्रतीक के एक दोस्त ने नेहा को आयुष की बाइक पर बाजार में देख लिया. उस ने इस की चुगली प्रतीक से कर दी. प्रतीक के दिमाग में तब शक का कीड़ा कुलबुलाने लगा. दिमागी उलझन के चलते प्रतीक शराब के ठेके पर गया. वहां उस ने जम कर शराब पी. फिर देर शाम लडख़ड़ाते कदमों से घर आया. उस ने नेहा से आयुष के साथ जाने को ले कर जवाब सवाल किया तो नेहा भड़क गई. प्रतीक को भी गुस्सा आ गया. उस ने नेहा की जम कर पिटाई कर दी.इस के बाद तो यह सिलसिला ही चल पड़ा. प्रतीक बातबेबात नेहा से उलझता और फिर जवाब देने पर उस की पिटाई करता. पति की शराबखोरी और मारपीट से नेहा परेशान हो उठी. उस के अंदर पति के प्रति नफरत पैदा हो गई. आयुष को भी प्रतीक द्वारा प्रेमिका नेहा की पीटना गलत लगता था. अत: वह भी प्रतीक से मन ही मन घृणा करने लगा था.

नेहा और आयुष की लगभग हर रोज फोन पर बातें होती थीं. पति के द्वारा पीटे जाने की जानकारी वह आयुष को फोन पर ही देती थी. उन्हीं दिनों एक रोज नेहा और आयुष मोतीझील उद्यान पहुंचे. मोतीझील की मखमली घास पर बैठी नेहा अपने प्रेमी से रस भरी बातें कर रही थी. बातें करतेकरते वह अचानक गंभीर हो गई. उस ने भरपूर नजरों से प्रेमी को देखा, फिर बोली, ”आयुष, सचसच बताना, क्या तुम मुझ से हकीकत में प्यार करते हो या फिर मात्र शारीरिक प्यार ही है?’’

”नेहा भाभी, मैं तुम से बेहद प्यार करता हूं. जब से तुम्हें देखा है, तब से तुम मेरे दिल में रचबस गई हो. तुम्हारे लिए मैं हमेशा बेचैन रहता हूं.’’

आयुष की बात सुन कर नेहा का चेहरा खिल उठा. वह मुसकराते हुए बोली, ”आयुष, मुझे भी तुम पसंद हो. तुम्हारा साथ पाने को मैं भी सदैव लालायित रहती हूं. लेकिन…’’

”लेकिन क्या भाभी?’’ आयुष ने अचकचा कर पूछा.

”यही कि हम प्यार भले ही एकदूसरे से करते हैं, लेकिन एक कभी नहीं हो सकते.’’

”क्यों भाभी? हम एक क्यों नहीं हो सकते?’’

”इसलिए कि एक तो मैं शादीशुदा और 2 मासूम बच्चों की मां हूं. दूसरे हम दोनों के प्यार में बाधक मेरा पति प्रतीक है.’’

”भाभी, प्यार में बाधा मुझे बरदाश्त नहीं. तुम्हारा प्यार पाने के लिए मैं हर बाधा दूर करने को तैयार हूं. फिर वह चाहे तुम्हारा पति ही क्यों न हो. लेकिन बाधा दूर करने में तुम्हें मेरा साथ देना होगा.’’

”ठीक है आयुष, तुम्हारा साथ पाने को मैं अपना सिंदूर मिटाने को राजी हूं.’’

इस तरह योजना बना कर उन दोनों ने प्रतीक को बड़ी आसानी से रास्ते से हटा दिया था. उन दोनों से पूछताछ के बाद प्रतीक की लव क्राइम की जो कहानी निकल कर सामने आई, वह इस प्रकार थी—

17 अप्रैल, 2024 को एडीसीपी अंकिता शर्मा ने नेहा और आयुष से पूछताछ की तो उन दोनों ने प्रतीक की हत्या करने व शव को विद्युत शवदाह गृह में खाक करने की जानकारी दी. आयुष शर्मा ने बताया कि प्रतीक उस का दोस्त था. घर आतेजाते उस के नाजायज संबंध दोस्त की पत्नी नेहा से हो गए. कुछ समय बाद प्रतीक पत्नी पर शक करने लगा और उसे मारनेपीटने लगा. प्रतीक मिलन में बाधक बनने लगा तो हम दोनों ने उस की हत्या की योजना बनाई. योजना के तहत चारबाग (लखनऊ) के आशीर्वाद होटल में उसे जहरीली शराब पिलाई, जिस से उस की मौत हो गई. उस के बाद उसे जिला अस्पताल ले गए, जहां डाक्टरों ने मौत की पुष्टि की. पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के बाद उसे सौंपा. बाद में उन दोनों ने दाह संस्कार कर दिया.

चूंकि नेहा व आयुष ने प्रतीक की हत्या का जुर्म कुबूल कर लिया था. अत: थाना नौबस्ता पुलिस ने मृतक के पिता पुनीत कुमार शर्मा की तहरीर पर भादंवि की धारा 328/302/120बी के तहत नेहा व आयुष के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया और दोनों को विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया. हजरतगंज पुलिस ने इस मामले में कोई काररवाई इसलिए नहीं की थी, क्योंकि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का कारण स्पष्ट नहीं था. शक के आधार पर जांच के लिए विसरा सुरक्षित कर लिया था.

18 अप्रैल, 2024 को थाना नौबस्ता पुलिस ने आरोपी नेहा तथा आयुष शर्मा को कानपुर कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जिला जेल भेज दिया गया. नेहा के दोनों बच्चे अपने दादादादी की अभिरक्षा में पल रहे थे.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

 

Crime Update : चार बच्चों की मां ट्यूशन टीचर के साथ हुई फरार

रुखसाना ने कम उम्र में मर्दों की लत लगा कर जो गलती की, वह शादी ही नहीं, 4 बच्चों की मां बनने के बाद भी नहीं छूटी. उसी का नतीजा है कि आज वह पति की हत्या के आरोप में जेल में है. खटखट की आवाज से असलम की आंख खुली तो आंखों की कड़वाहट से ही वह समझ गया कि अभी सवेरा नहीं हुआ  है. लाइट जला कर उस ने समय देखा तो रात के 2 बज रहे थे. उतनी रात को कौन गया? असलम सोच ही रहा था कि दोबारा खटखट की आवाज आई. वह झट से उठा. रात का मामला था, इसलिए बिना पूछे दरवाजा खोलना ठीक नहीं था. उस ने पूछा, ‘‘कौन?’’

बाहर से सहमी सी आवाज आई, ‘‘भाईजान, मैं रुखसाना.’’

रुखसाना का नाम सुन कर उस ने झट से दरवाजा खोल दिया. क्योंकि वह उस की पड़ोसन थी. सामने खड़ी रुखसाना से उस ने पूछा, ‘‘भाभीजी आप, सब खैरियत तो है?’’

‘‘माफ कीजिएगा भाईजान, आप को इतनी रात को तकलीफ दी.’’ रुखसाना ने कहा तो असलम बोला,‘‘जाबिरभाई और बच्चे तो ठीक हैं ?’’

‘‘असलमभाई, मुझे लगता है, मेरे घर कोई अनहोनी हो गई है. काफी देर पहले जाबिर टौयलेट के लिए ऊपर गए थे. लेकिन अभी तक वह नीचे नहीं आए हैं. मेरा जी घबरा रहा है.’’

‘‘नीचे नहीं आए, क्या मतलब? मैं समझा नहीं?’’ असलम ने हैरानी से कहा.

‘‘आज उन की तबीयत ठीक नहीं थी. शाम को भी देर से आए थे. खाना खाने के बाद दवा ली और सो गए. थोड़ी देर बाद वह टौयलेट जाने के लिए उठे. नीचे वाला टौयलेट खराब था, इसलिए मैं ने उन्हें ऊपर जाने को कहा. वह ऊपर वाले फ्लोर पर चले गए. जबकि मैं लेटी ही रही. काफी देर हो गई और वह ऊपर से नीचे नहीं आए तो मेरा जी घबराने लगा. इसलिए मैं आप के पास गई.’’

‘‘आप ने ऊपर जा कर नहीं देखा?’’ असलम ने पूछा.

‘‘जा रही थी, लेकिन सीढि़यों के दरवाजे की दूसरी ओर से कुंडी बंद थी, इसलिए जा नहीं सकी. मैं ने कई आवाजें दीं. दूसरी ओर से कोई जवाब नहीं मिला. मुझे लगता है, कोई गड़बड़ हो गई है?’’ रुखसाना ने भर्राई आवाज में कहा.

‘‘आप परेशान मत होइए भाभीजान. चलिए मैं देखता हूं.’’ कह कर असलम अपनी पत्नी के साथ रुखसाना के घर की ओर चल पड़ा. रुखसाना, उस का बेटा साजिद, असलम और उस की पत्नी ऊपर जाने के लिए सीढि़यों पर चढ़ने लगे. ऊपर जाने वाले दरवाजे की कुंडी दूसरी ओर से बंद थी, इसलिए सभी को वहीं रुकना पड़ा. असलम ने वहीं से कई आवाजें लगाईं, लेकिन दूसरी ओर से कोई जवाब नहीं मिला. सभी नीचे उतरने लगे तो एकाएक असलम की नजर बालकनी पर चली गई. उसे लगा, वहां चादर में लिपटा कुछ पड़ा है. उस ने उस ओर इशारा कर के कहा, ‘‘भाभीजान, उधर देखिए, वह क्या पड़ा है?’’

रुखसाना ने उधर देखा. उस का बेटा साजिद वहां भाग कर पहुंचा. उस में से खून बह रहा था. उस ने झुक कर चादर हटाई. इस के बाद एकदम से चीखा, ‘‘अम्मी. यह तो अब्बू हैं.’’

रुखसाना चीखी, ‘‘या खुदा यह क्या हो गया? जाबिर तुम्हारा यह हाल किस ने किया?’’ 

साजिद भी जोरजोर से रोने लगा था. असलम ने अपने मोबाइल फोन से पुलिस कंट्रोल रूम को सूचना दी. फिर तो थोड़ी ही देर में पीसीआर की गाड़ी वहां पहुंच गई. पीसीआर पुलिस ने चादर हटाई तो उस में खून से सनी जाबिर की लाश लिपटी थी. पीसीआर पुलिस ने संबंधित थाना जीटीबी एन्क्लेव को घटना के बारे में सूचित किया. कुछ देर बाद थाना जीटीबी एन्क्लेव के थानाप्रभारी नरेंद्र सिंह चौहान और इंसपेक्टर एटीओ राकेश कुमार दोहाना पुलिस बल के साथ घटनास्थल पर पहुंचे.

घटनास्थल का मुआयना करने के दौरान ही पुलिस को खून सना एक चाकू मिला. पुलिस ने उसे कब्जे में ले लिया, क्योंकि हत्या उसी से की गई थी. पुलिस ने पूछताछ की तो रुखसाना ने वही बातें बताईं, जो वह असलम को पहले ही बता चुकी थी. स्थिति को देखते हुए पुलिस उस से ज्यादा पूछताछ नहीं कर सकी. लेकिन घटनास्थल के हालात से साफ था कि यह हत्या लूटपाट की वजह से नहीं हुई थी. क्योंकि घर का सारा सामान जस का तस था. चूंकि मकान में आनेजाने का एक ही दरवाजा था, इसलिए पुलिस ने अंदाजा लगाया कि हत्या किसी जानकार ने की है या फिर इस में घर के किसी सदस्य का हाथ है. पुलिस परिवार वालों और रिश्तेदारों के नामपते तथा फोन नंबर ले रही थी, तभी क्राइम टीम और फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट ने कर अपनी काररवाई निपटा ली. इस के बाद लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया गया.

थाना जीटीबी एन्क्लेव में उसी दिन यानी 16 जून, 2013 को जाबिर की हत्या का यह मुकदमा अज्ञात लोगों के खिलाफ दर्ज कर लिया गया. इस के बाद मामले के खुलासे के लिए डीसीपी वी.वी. चौधरी एवं स्पेशल सेल के डीसीपी संजीव कुमार यादव ने स्पेशल सेल के इंसपेक्टर अत्तर सिंह यादव के नेतृत्व में एक पुलिस टीम गठित की, जिस में सबइंसपेक्टर प्रवीण कुमार, संदीप कुमार, हेडकांस्टेबल संजीव, दिलावर, सुरेश और राजवीर को शामिल किया गया.

पुलिस को पता था कि जाबिर के मकान में आनेजाने के लिए एक ही दरवाजा था, इसलिए हत्यारा उसी दरवाजे से आया होगा और जाबिर की हत्या कर के उस की लाश को चादर में लपेट कर उसी दरवाजे से बाहर गया होगा. जाबिर का हत्यारा या तो जानपहचान का था या फिर घर का ही कोई सदस्य था. पुलिस ने सभी नंबरों को सर्विलांस पर लगा दिया था. इसी के साथ मुखबिरों को भी सतर्क कर दिया था. पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पता चला था कि जाबिर के शरीर पर चाकू के 32 वार किए गए थे. पुलिस जांच में क्या हुआ, यह जानने से पहले आइए थोड़ा जाबिर और रुखसाना के बारे में जान लें.

जाबिर और रुखसाना उत्तर प्रदेश के जिला बदायूं के गांव रमजानपुर के रहने वाले थे. जाबिर 30-32 साल का रहा होगा, तभी उसे 15 साल की रुखसाना से प्यार हो गया था. इस की वजह यह थी कि जवानी की दहलीज पर कदम रखते ही वह फूल की तरह महक उठी थी, जिस पर भंवरे मंडराने लगे थे. रुखसाना के घर से निकलते ही चाहने वाले उस के पीछे लग जाते थे. कोई उसे परी कहता तो कोई जन्नत की हूर तो कोई अप्सरा तो कोई दिल की रानी. वह फूल कर कुप्पा हो जाती. फिर तो जल्दी ही वह जाने कितनों के दिलों की रानी बन गई. उस के ये प्रेमी उसे घुमानेफिराने और मौज कराने लगे. ये लड़के उसे ऐसे ही नहीं मौज करा रहे थे, वे उस के शरीर से अपनी एकएक पाई वसूल रहे थे.

रुखसाना को भी इस में मजा रहा था. धीरेधीरे वह इस की आदी हो गई. हालत यह हो गई कि जब तक वह किसी लड़के से शारीरिक संबंध बना लेती, उस का मन बेचैन रहता. उस के ऐसे ही यारों में एक जाबिर भी था. जाबिर उस से उम्र में बड़ा जरूर था, लेकिन शारीरिक संबंधों की आदी बन चुकी रुखसाना के लिए अब उम्र के कोई मायने नहीं रह गए थे. जाबिर भी उसी मोहल्ले में रहता था, जिस मोहल्ले में रुखसाना रहती थी. वह नौशे मियां का बेटा था. जाबिर अन्य लड़कों से थोड़ा अलग था. दरअसल वह उस के दिल का राजा बनना चाहता था. रुखसाना को वह अपनी बीवी बनाना चाहता था. लेकिन लाख कोशिशों के बाद रुखसाना इस के लिए तैयार नहीं थी. इस की वजह यह थी कि वह उम्र में उस से काफी बड़ा था. रुखसाना का कहना था कि मौजमस्ती की बात दूसरी है और बीवी बन कर रहने की बात दूसरी.

रुखसाना की हरकतों से सारा गांव वाकिफ था. गांव वालों से इस बात की जानकारी उस के मातापिता को हुई तो उन्होंने उसे मारापीटा और समझाया भी. आखिर मांबाप की बात रुखसाना की समझ में गई. इसलिए वह जाबिर से निकाह के लिए राजी हो गई. जाबिर तो उस के लिए पागल था ही, इसलिए रुखसाना के हामी भरते ही उस ने अपने अब्बू नौशे मियां से कहा, ‘‘अब्बू, मैं रुखसाना से निकाह करना चाहता हूं.’’

जाबिर की बात सुन कर नौशे मियां हैरान रह गए. क्योंकि रुखसाना अब तक गांव में इस कदर बदनाम हो चुकी थी कि निकाह की छोड़ो, कोई भला आदमी उस से बातचीत करना भी पसंद नहीं करता था. ऐसी लड़की से जाबिर निकाह की बात कर रहा था. नौशे मियां की गांव में अच्छी इज्जत थी. उन्होंने इस निकाह के लिए साफ मना कर दिया. लेकिन जाबिर ने तो इरादा पक्का कर लिया था, इसलिए उस ने कहा, ‘‘अगर मेरा निकाह रुखसाना से नहीं  किया गया तो मैं आत्महत्या कर लूंगा.’’

मजबूरन नौशे मियां को राजी होना पड़ा. रुखसाना के घर वालों की ओर से इनकार का सवाल ही नहीं था. क्योंकि उन की बदनाम बेटी से और कौन शादी करता. इस तरह जाबिर और रुखसाना का निकाह हो गया. निकाह के बाद रुखसाना पूरी तरह बदल गई थी. वह पति की ही नहीं, सासससुर और देवर की सेवा पूरे लगन से करने लगी थी. घर के सारे कामों की जिम्मेदारी ले ली थी. नौशे मियां के पास काफी जमीन थी. उसी पर खेती कर के वह अपने परिवार का भरणपोषण कर रहे थे. जाबिर गांव में रह कर पिता की मदद करता था. समय के साथ जाबिर 4 बच्चों का बाप बन गया. परिवार बढ़ा तो जिम्मेदारी और खर्च बढ़ा. जाबिर को लगा कि अब गांव में गुजारा नहीं होगा तो गांव छोड़ कर वह दिल्ली चला गया.

दिल्ली के दिलशाद गार्डेन में उस ने कबाड़ी का काम शुरू किया. कबाड़ी का काम नाम से भले ही छोटा है, लेकिन अगर मेहनत से किया जाए तो इस काम में मोटी कमाई है. जाबिर ने मन लगा कर मेहनत की. जिस का उसे फायदा भी मिला. उस की ठीकठाक कमाई होने लगी. वह जरूरत भर का पैसा रख कर बाकी गांव भेज देता था. जाबिर की कमाई बढ़ी तो उस ने रहने के लिए एक जनता फ्लैट खरीद लिया. अपना मकान हो गया तो गांव से वह अपना परिवार ले आया. बच्चों का उस ने यहीं एडमिशन करा दिया. अब समय आराम से गुजरने लगा.

जाबिर ने देखा कि कबाड़ी के काम में पैसा तो खूब है, लेकिन इज्जत नहीं है. अगर वह इसी तरह कबाड़ी का काम करता रहा तो उस के बच्चों की शादी ठीकठाक घरों में नहीं हो सकेगी. उस ने कबाड़ी का काम बंद कर दिया और स्टील वर्क्स का काम शुरू कर दिया. इस काम में भी उस ने मन लगा कर मेहनत की. उस की मेहनत रंग लाई और उस के पास सब कुछ हो गया. वह दिन में मेहनत करता और रात को चैन की नींद सोता. जाबिर अपने अब्बू को दिल्ली लाना चाहता था. लेकिन नौशे मियां ने दिल्ली आने से साफ मना कर दिया. तब जाबिर ने उन की मदद के लिए एक नौकर रख दिया. इस नौकर का नाम भी जाबिर था.

वह नौशे मियां के साथ उन के खेतों पर काम करता था. समय निकाल कर जाबिर कभीकभार पिता से मिलने रमजानपुर जाता और एकाध दिन रह कर चला जाता था. काम बढ़ा तो जाबिर की व्यस्तता भी बढ़ गई. जिस की वजह से वह पत्नी और बच्चों को समय कम दे पाता था. अब तक रुखसाना 30 साल की हो गई थी तो जाबिर 45 साल का. दिन भर काम कर के जाबिर बुरी तरह थक जाता तो देर रात घर आने पर उसे बिस्तर ही दिखाई देता था. वह जल्दी से खाना खा कर सो जाता. जबकि भरपूर जवान रुखसाना को उस की नजदीकी की जरूरत होती थी. पति के सो जाने से उस के अरमान दिल में ही रह जाते थे

रुखसाना चाहती थी कि पति घर आए तो उस से बातें करे, प्यार करे. उस के बच्चों को समय दे. लेकिन ऐसा नहीं हो रहा था, जिस की वजह से वह खीझने लगी थी. उसे लगता था कि जाबिर को जैसे पत्नी और बच्चों को जरूरत ही नहीं है. बस उसे पैसे चाहिए. उस के अरमानों और भावनाओं की उसे कोई परवाह नहीं है. ऐसे में अगर औरत जवान हो तो वह क्या करे? इस स्थिति में उसे उम्र के लंबे अंतराल का खयाल आया और उसे अपनी गलती का अहसास हुआ. वह देखती थी कि लोग अभी भी उसे चाहतभरी नजरों से ताकते हैं, जबकि पति उस की ओर ध्यान ही नहीं देता. पति की इस बेरुखी से उस का मन बहकने लगा तो उस की नजरें किसी मर्द को तलाशने लगीं.

रुखसाना के बच्चों को एक सरदार ट्यूशन पढ़ाने आता था. वह हट्टाकट्टा गठीले बदन का कुंवारा नौजवान था. रुखसाना का दिल उसी पर गया. क्योंकि वही उस के सब से करीब था. रुखसाना ने उसे लटकेझटके दिखाए तो सरदार को समझते देर नहीं लगी कि उस के मन में क्या है. फिर एक दिन रुखसाना ने उसे मौका दिया तो उस सरदार ने खुशीखुशी उस की इच्छा पूरी कर दी. सरदार ने उसे इस तरह खुश किया कि वह उस की दीवानी हो गई. रुखसाना उस की इस कदर दीवानी हुई कि उसे लगने लगा कि वह सरदार के बिना जी नहीं पाएगी. कुछ ऐसा ही सरदार को भी लगने लगा तो एक दिन वह रुखसाना को भगा ले गया. यह सन 2008 की बात है. रुखसाना को पति की चिंता थी, बच्चों की. इसलिए सरदार के साथ जाने के बाद उस ने उन की कोई खबर नहीं ली

पत्नी की बेवफाई से जाबिर को गहरा आघात लगा. लेकिन इस आघात को बच्चों की परवरिश में लग कर उस ने भुला दिया. फिर भी वह रुखसाना की तलाश करता रहा. 5 महीने बाद उसे किसी से पता चला कि रुखसाना अपने प्रेमी के साथ पंजाब में रह रही है. पत्नी को वापस लाने के लिए वह पंजाब गया. सचमुच वहां रुखसाना उस सरदार के साथ रवीना कौर नाम से रह रही थी. रुखसाना आने को तैयार नहीं थी. लेकिन उस की असलियत जब सरदार के घर वालों को पता चली तो उन्होंने जबरदस्ती उसे जाबिर के साथ भेज दिया.

जाबिर को अब रुखसाना पर यकीन नहीं रह गया था. इसलिए उस ने उसे पिता के पास गांव पहुंचा दिया. 4 बच्चों की मां बनने के बाद भी रुखसाना के रुखसार में कोई कमी नहीं आई थी. साथ ही उस के अरमान भी पहले जैसे ही चिंगारी की तरह थे, जिसे सिर्फ हवा देने की जरूरत थी. आखिर गांव में जाबिर ने पिता की मदद के लिए जाबिर नाम के जिस नौकर को रखा था, उस ने हवा देने का काम किया. उसे देखते ही रुखसाना की आग भड़क उठी. उन के पास मौका ही मौका था. जाबिर घर का नौकर था, इसलिए उस का अंदर तक आनाजाना थारुखसाना ने इसी का फायदा उठाया और नौकर जाबिर को बिस्तर का साथी बना लिया.

रुखसाना का जब मन होता, नौकर जाबिर के साथ हमबिस्तर हो जाती. पहले तो यह काम बहुत चोरीछिपे होता रहा, लेकिन धीरेधीरे वे लापरवाह होते गए. गांव वालों को संदेह हुआ तो लोग उन पर नजर रखने लगे. जब उन्हें यकीन हो गया कि सचमुच कुछ गड़बड़ है तो उन्होंने इस बारे में नौशे मियां से बात की. उन्होंने फोन कर के सारी बात बेटे को बता दी. अगले ही दिन जाबिर गांव पहुंचा और पहले तो उस ने रुखसाना की जम कर पिटाई की, उस के बाद तुरंत नौकर को भगा दिया. 4-5 दिन गांव में रह कर जाबिर दिल्ली चला गया. दिल्ली आते समय उस ने रुखसाना पर नजर रखने की जिम्मेदारी भाई दिलशाद को सौंपी थी. भाई के कहने पर दिलशाद उस पर रातदिन नजर रखने लगा.

रुखसाना की आदत बिगड़ चुकी थी. अब वह सुधरने वाली नहीं थी. वह बिना मर्द के बिलकुल नहीं रह सकती थी. लेकिन देवर की वजह से वह किसी मर्द तक पहुंच नहीं पा रही थी. पिछले साल मई महीने में अचानक दिलशाद की करंट लगने से मौत हो गई. गांव वालों का कहना था कि यह सब रुखसाना ने अपने पुराने प्रेमी असरुद्दीन से करवाया था. इस की वजह यह थी कि असरुद्दीन उन दिनों गांव में ही था. जबकि वह सूरत में रहता था. वह रुखसाना का बचपन का प्रेमी था. बहरहाल सच्चाई कुछ भी रही हो, सुबूत होने की वजह से पुलिस केस नहीं बना. पुलिस केस भले ही नहीं बना, लेकिन गांव वाले इस बात को ले कर काफी गुस्से में थे. इसलिए घर वालों ने असरुद्दीन को सूरत भेज दिया. वह सूरत तो चला गया, लेकिन वह वहां भी नहीं बच सका. दिलशाद के भतीजे ताहिर ने चाचा की मौत का बदला लेने के लिए सूरत में ही उस की हत्या कर दी.

गांव वाले रुखसाना के कारनामों से परेशान हो गए तो उन्होंने जाबिर को फोन कर के उसे अपने साथ दिल्ली ले जाने को कहा. उन का कहना था कि वे इस गंदगी को गांव में नहीं रहने देंगे. क्योंकि इस की वजह से खूनखराबा भी होने लगा है. गांव वालों के कहने पर जाबिर रुखसाना को दिल्ली ले आया. रुखसाना ने पति से वादा किया था कि अब वह ऐसा कोई काम नहीं करेगी, जिस से उस के मानसम्मान को ठेस पहुंचे. लेकिन रुखसाना मानी नहीं. उस ने  ठान लिया था कि अब वह जाबिर के साथ नहीं रहेगी. फिर उस ने पति से छुटकारा पाने के लिए जो योजना बनाई, वह बहुत ही खतरनाक थी

पुलिस को पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पता चल गया था कि हत्या में रुखसाना का हाथ है. फिर भी पुलिस ने उसे गिरफ्तार नहीं किया था. दरअसल उसी के माध्यम से पुलिस असली हत्यारों तक पहुंचना चाहती थी. अगर पुलिस उसे पकड़ लेती तो असली हत्यारे छिप जाते. इंसपेक्टर अत्तर सिंह यादव ने मुखबिरों की मदद से नंदनगरी के गगन सिनेमा के पास से जानेआलम उर्फ टिंकू, आमिर हुसैन और हनीफ उर्फ काला को पकड़ा. थाने ला कर तीनों से पूछताछ की गई तो पता चला कि रुखसाना ने ही 4 लाख रुपए की सुपारी दे कर जाबिर की हत्या कराई थी. हत्यारों के पकड़े जाने के बाद पुलिस रुखसाना के घर पहुंची तो पता चला कि वह घर से गायब हो चुकी है. शायद उसे हत्यारों के पकड़े जाने की भनक लग चुकी थी.

पुलिस रुखसाना की तलाश कर रही थी कि तभी अलाउद्दीन उर्फ आले पुलिस के हाथ लग गया. इस के बाद 4 नवंबर, 2013 को पुलिस ने रुखसाना को भी उस समय गिरफ्तार कर लिया, जब वह अपने घर जरूरी सामान लेने आई थी. इस के बाद पुलिस को नौकर जाबिर अली, कमर और शानू की तलाश थी. गिरफ्तारी के बाद पूछताछ में रुखसाना ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया था. इस के बाद उस ने जाबिर की हत्या की जो कहानी पुलिस को सुनाई, वह इस प्रकार थी.

गांव में रहने के दौरान जब उस के संबंध नौकर जाबिर अली से बने थे तो इस का खुलासा होने पर उस का शौहर जाबिर उस के साथ बुरी तरह मारपीट करने लगा था. तब रुखसाना ने तय कर लिया था कि अब वह उसे ठिकाने लगवा कर ही रहेगी. नौकर जाबिर से उस की फोन पर बात होती रहती थी. उस ने उस से बात की तो उस ने रुखसाना की मुलाकात अलाउद्दीन उर्फ आले से कराई. उस ने आले को 4 लाख रुपए देने की बात की तो वह जाबिर की हत्या करने के लिए तैयार हो गया.

अलाउद्दीन नौकर जाबिर का दोस्त था और रमजानपुर का ही रहने वाला था. आले अपराधी प्रवृत्ति का था. उस ने गांव के ही अब्बन की हत्या तलवार से काट कर की थी. चूंकि आले को गांव वालों से जान का खतरा था, इसलिए वह जेल से छूटने के बाद पत्नी मुनीजा के साथ गांव बीकमपुर में रहने लगा था. आले कामकाज के नाम पर दिल्ली की फैक्ट्रियों से कौपर डस्ट की चोरी कर के कबाडि़यों को बेचता था. दिल्ली में रहते हुए ही उस की जानपहचान 26 वर्षीय हनीफ उर्फ काला से हुई. वह भी रमजानपुर का ही रहने वाला था. काफी समय से वह गाजियाबाद के भोपुरा में रहता था. वह चोरी का माल तो खरीदता ही था, खुद भी चोरी करता था. आले ने जाबिर की हत्या करने पर 4 लाख रुपए मिलने की बात बता कर उसे भी योजना में शामिल कर लिया था. हनीफ को लगा कि वह आले के साथ मिल कर इस योजना को अंजाम नहीं दे पाएगा, इसलिए उस ने अपने दोस्तों कमर, आमिर हुसैन, शानू और जानेआलम उर्फ टिंकू को भी अपने साथ मिला लिया.

पूरी योजना तैयार कर के सभी 15 जून, 2013 को रुखसाना के घर पहुंचे. रुखसाना ने सभी को घर में ही अलगअलग जगहों पर छिपा दिया. रात में क्या होना है, रुखसाना को पता ही था, इसलिए उस ने जाबिर के रात के खाने में बेहोशी की दवा मिला दी, जिसे खा कर जाबिर सो गया. लेकिन थोड़ी देर बाद उसे टौयलेट आई तो रुखसाना ने उसे ऊपर वाले टौयलेट में जाने को कहा. क्योंकि नीचे वाले टौयलेट में कमर छिप कर बैठा था. जबकि टिंकू कमरे में ही चाकू लिए छिपा था. जाबिर सीढि़यां चढ़ने लगा, तभी कमर ने उसे पीछे से पकड़ लिया तो टिंकू ने उस पर चाकू से लगातार कई वार कर दिए. जाबिर का मुंह दबा था, इसलिए वह चीख भी नहीं सका और छटपटा कर मर गया.

खून बहुत ज्यादा बह रहा था, इसलिए उसे रोकने के लिए लाश को चादर में लपेट कर बालकनी में डाल दिया. इस के बाद वे सभी चले गए. उन के जाने के बाद रुखसाना ने इधरउधर फैले खून को साफ किया और असलम के घर जा कर जाबिर के ऊपर जा कर वापस आने की बात बताई.

पूछताछ के बाद पुलिस ने रुखसाना को अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. 4 लोगों को पुलिस पहले ही जेल भेज चुकी थी. पुलिस को अभी नौकर जाबिर, कमर और शानू की तलाश है. कथा लिखे जाने तक इन में से एक भी अभियुक्त पुलिस के हाथ नहीं लगा था.

   —कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

  

Murder Story : भतीजे के इश्क में मारी गई पति के हाथों फरहीन

निकाह के 3 साल बाद जब 28 वर्षीय फरहीन बानो को बच्चा नहीं हुआ तो वह पति गुलफाम की मर्दानगी पर ही सवाल उठाने लगी. इसी दौरान पति से बगावत कर अपनी उम्र से छोटे भतीजे आमिर से संबंध बना लिए. उस से उसे बच्चा तो नहीं मिला, लेकिन उस के जीवन में ऐसा कुछ हो गया कि…

गुलफाम ने बीवी को बेवफाई का सबक सिखाने के लिए पूरी योजना बनाई. उस ने अपनी खतरनाक योजना में घर के किसी सदस्य को शामिल नहीं किया. योजना के तहत वह इटावा के कटरा बाजार गया और 200 रुपए में एक तेज धार वाला बांका खरीद लाया और झोले में रख दिया. 3 सितंबर, 2024 की सुबह 10 बजे गुलफाम झोले में छिपा कर रखा गया बांका ले कर घर से निकला, फिर उझैदी स्थित शराब ठेके पर पहुंचा. वहां उस ने शराब पी, फिर कुछ देर तक बकझक करता रहा. 

लगभग 12 बजे गुलफाम नशे की हालत में अपनी ससुराल नई बस्ती कटरा शमशेर खां, इटावा पहुंचा. उस समय उस की पत्नी फरहीन बानो अपनी बहन रूबी की मासूम बेटी जोया से बातचीत कर रही थी. उस के मां व भाई काम पर गए थे और बहन रूबी पड़ोस में किसी काम से गई थी. शौहर गुलफाम को नशे की हालत में देख कर फरहीन सिहर उठी. वह वहां से उठ कर कमरे में चली गई तो पीछे से गुलफाम भी कमरे में पहुंच गया और उस ने कमरा अंदर से बंद कर लिया. फिर वह बोला, ”फरहीन, मैं तुम्हें आखिरी बार मनाने आया हूं. बोलो, मेरे साथ घर चलोगी या नहीं.’’
मैं एक बार नहीं सौ बार कह चुकी हूं कि मैं तुम्हारे साथ नही जाऊंगी. पता नही क्यों बेशर्म बन कर यहां कुत्ते की तरह पूंछ हिलाते हुए चले आते हो?’’ फरहीन गुस्से से बोली. 

यह तुम्हारा आखिरी फैसला है?’’ गुलफाम ने पूछा.

हां, यह मेरा आखिरी फैसला है.’’ फरहीन ने जवाब दिया. 

तो अब मेरा फैसला भी सुन ले. यदि तू मेरी बीवी बन कर नहीं रह सकती तो मैं तुझे किसी और की बीवी भी नही बनने दूंगा. तुझ जैसी बेवफा औरत को आज मैं सबक सिखा कर ही दम लूंगा.’’ कह कर गुलफाम ने झोले से बांका निकाल लिया. उस का गुस्सा सातवें आसमान पर था. 

शौहर के रूप में साक्षात मौत देख कर फरहीन बचाओ…बचाओचीखने लगी. उस की चीख सुन कर उस की बहन रूबी आ गई. अब तक गुलफाम हमलावर हो चुका था. उस ने बांके से कई वार फरहीन के सिर, गरदन व शरीर के अन्य हिस्सों पर किए. बचाव में फरहीन के दोनों हाथों की अंगुलियां भी कट गई थीं और वह खून से लथपथ हो कर जमीन पर गिर गई थी. बहन रूबी ने यह सब नजारा खिड़की से देखा था. उस ने सोचा गुलफाम भाग न जाए, इसलिए उस ने कमरे का दरवाजा बाहर से बंद कर दिया और फिर मां, भाइयों व पुलिस को सूचना दी. 

सूचना पाते ही सदर कोतवाल विक्रम सिंह कुछ पुलिसकर्मियों को ले कर मौके पर पहुंच गए. हमलावर गुलफाम कमरे में बंद था. पुलिस ने उसे बाहर निकाला. कोतवाल विक्रम सिंह ने उसे आला कत्ल बांका सहित हिरासत में ले लिया. फोरैंसिक टीम को भी मौके पर बुला लिया और सूचना वरिष्ठ अधिकारियों को भी दे दी. फोरैंसिक टीम ने घटनास्थल से साक्ष्य एकत्र किए. कुछ देर में एसएसपी (इटावा) संजय कुमार वर्मा, एएसपी अमरनाथ त्रिपाठी और डीएसपी अमित कुमार सिंह भी घटनास्थल पर पहुंच गए.

पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का निरीक्षण किया. कमरे के अंदर एक युवती मरणासन्न स्थिति में पड़ी थी. वहां मौजूद तहमीदा ने बताया कि वह उस की बेटी फरहीन बानो है और हमलावर गुलफाम उस का दामाद है. फरहीन के शरीर पर आधा दरजन घाव थे. पुलिस अधिकारियों ने फरहीन बानो को तत्काल जिला अस्पताल पहुंचाया, जहां इलाज के दौरान उस की मौत हो गई. एसएसपी संजय कुमार वर्मा ने घटना की प्रत्यक्षदर्शी गवाह मृतका की बहन रूबी से पूछताछ की तो उस ने बताया कि वह पड़ोस में गई थी. बहन के चीखने की आवाज सुन कर वह घर आई तो कमरे में गुलफाम उस की बहन पर हमलावर था. वह बांके से प्रहार कर रहा था. गुलफाम बहन की हत्या कर भाग न जाए, इसलिए उस ने बाहर से कमरे को बंद कर दिया.

पुलिस आरोपी गुलफाम को थाने ले आई. उस से वारदात के बारे में पूछताछ की तो उस ने पत्नी फरहीन बानो की हत्या की जो कहानी बताई, वह अवैध संबंधों की चाशनी में सराबोर निकली

तहमीदा पर टूट पड़ा दुखों का पहाड़

उत्तर प्रदेश के जिला औरैया का एक कस्बा है- दिबियापुर. रेलवे में यह फफूंद स्टेशन के नाम से जाना जाता है. इसी कस्बे के नहर पुल के समीप लाल मोहम्मद वारिसी सपरिवार रहते थे. उस के परिवार में बीवी तहमीदा बानो के अलावा 4 बेटे नासिर, वाजिद, वारिस, साबिर तथा 4 बेटियां वहीदा, फरहीन, रूबी व शमीम थीं. लाल मोहम्मद कबाड़ का धंधा करते थे. इसी से ही वह अपने भारीभरकम परिवार का पालनपोषण करता था.

लाल मोहम्मद के बच्चे जब बड़े हुए तो वे भी उस के धंधे में हाथ बंटाने लगे. इस से उन की आमदनी बढ़ी और परिवार खुशहाल जीवन व्यतीत करने लगा. वारिसी परिवार के ही कुछ लोग उन से जलते थे, जिस से वे लोग अकसर बातबेबात झगड़ते रहते थे. बेटियों को भी तंग करते थे. आखिर परेशान हो कर लाल मोहम्मद के परिवार ने वहां से हट जाने का निश्चय कर लिया. वर्ष 2017 में उन्होंने दिबियापुर कस्बा छोड़ दिया और इटावा शहर आ गए. यहां उन्होंने सदर कोतवाली क्षेत्र के नई बस्ती कटरा शमशेर खां मोहल्ले में एक मकान किराए पर ले लिया और सपरिवार रहने लगे. 

अब तक उन के बच्चे जवान हो चुके थे. इसलिए वह अपना कारोबार करने लगे थे. 2 बेटे नासिर व वाजिद अलग हो गए थे. वे अपना घर बसा कर अलग रहने लगे. लाल मोहम्मद बड़ी बेटी वहीदा का भी निकाह कर चुके थे. वहीदा से छोटी फरहीन बानो थी. वह अपनी अन्य बहनों से ज्यादा खूबसूरत तथा निपुण थी. वह ज्यादा पढ़ीलिखी तो नहीं थी, लेकिन उस की बातों से लोग यही समझते थे कि वह अच्छीखासी पढ़ीलिखी है. हालांकि 5 जमात पास करने के बाद फरहीन बानो आगे पढऩा चाहती थी, लेकिन अम्मी तहमीदा ने साफ मना कर दिया था. उस के बाद उस ने भी चुप्पी साध ली और अम्मी के घरेलू काम में हाथ बंटाने लगी थी. 

फरहीन बानो शरीर से स्वस्थ व चेहरेमोहरे से खूबसूरत दिखती थी. वह जब भी घर से हाटबाजार के लिए निकलती, हमउम्र लड़के उसे देख कर फिकरे कसते, लेकिन फरहीन बानो उन आवारा लड़कों को लिफ्ट नहीं देती थी. लाल मोहम्मद व उस की बीवी तहमीदा वारिसी को भी अहसास हो गया था कि उन की बेटी जवान हो गई है, अत: वह उस के योग्य लड़के की तलाश में जुट गए. लेकिन इसी बीच लाल मोहम्मद गंभीर बीमार पड़ गए. उसी दौरान उन की मृत्यु हो गई.

शौहर की मौत के बाद परिवार की जिम्मेदारी तहमीदा वारिसी पर आ गई. वह अपने बेटे वारिस व साबिर की मदद से परिवार को संभालने लगी. तहमीदा वारिसी को जवान बेटी फरहीन बानो के निकाह की चिंता सता रही थी. वह इज्जत के साथ उस के हाथ पीले कर उसे ससुराल भेज देना चाहती थी. इस के लिए वह जीजान से जुटी थी. एक रोज एक करीबी रिश्तेदार ने तहमीदा वारिसी को गुलफाम के बारे में बताया. गुलफाम को तहमीदा ने देखा तो उसे अपनी बेटी फरहीन बानो के लिए पसंद कर लिया. गुलफाम उत्तर प्रदेश के ही शहर इटावा की सदर कोतवाली के मोहल्ला उझैदी में रहता था. गल्ला मंडी में वह सब्जी का ठेला लगाता था. फेरी लगा कर भी सब्जी बेचता था. उस के मांबाप का इंतकाल हो चुका था. बस भाई अनवर था, जो परिवार के साथ अलग मकान में रहता था. 

न सासससुर के तानों का झंझट था और न ही जेठजेठानी के झगड़ों का. गुलफाम भी स्वस्थ और कमाऊ था. तहमीदा वारिसी ने सोचा कि ससुराल जाते ही उस की बेटी घर की मालकिन बन जाएगी. अत: अगस्त 2018 की 13 तारीख को तहमीदा वारिसी ने फरहीन बानो का निकाह गुलफाम के साथ कर दिया.
फरहीन बानो निकाह के बाद गुलफाम की जीनत बन कर अपनी ससुराल आ गई. ससुराल आते ही फरहीन ने घर संभाल लिया. गुलफाम हर तरह से बीवी का खयाल रखता था. वह जिस चीज की डिमांड करती, गुलफाम उसे पूरा करता था. वह उसे कभीकभी सैरसपाटे के लिए भी ले जाता. 

गुलफाम मेहनती इंसान था. वह सुबह उठ कर सब्जीमंडी जाता और 8 बजे के आसपास सब्जी खरीद कर वापस आता. फिर मियांबीवी मिल कर ठेले पर सब्जी सजाते. उस के बाद नाश्ता कर गुलफाम सब्जी का ठेला ले कर फेरी पर निकल जाता. शौहर के जाने के बाद फरहीन बानो घर का काम निपटाती, फिर खाना पका कर शौहर के लौटने का इंतजार करने लगती. गुलफाम लगभग 2 बजे वापस लौटता फिर दोनों साथ बैठ कर खाना खाते और खूब बातें करते. 

फरहीन बानो पति से क्यों करने लगी नफरत

इस तरह हंसीखुशी व मौजमस्ती से 3 साल बीत गए. लेकिन इन सालों में फरहीन बानो को कोई औलाद नहीं हुई. औलाद का सुख पाना हर औरत के लिए सौभाग्य की बात होती है. लेकिन फरहीन बानो वंचित थी. उस के मन में सवाल उठने लगे कि आखिर वह इस सुख से क्यों वंचित है. वह यह भी सोचने लगी कि जरूर उस के शौहर में ही कोई कमी है. फरहीन बानो अब उदास रहने लगी. उस का स्वभाव भी चिड़चिड़ा हो गया. वह शौहर से लडऩेझगडऩे भी लगी.

पत्नी को उदास व स्वभाव में परिवर्तन देख कर गुलफाम सोच में पड़ गया. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि फरहीन उदास क्यों रहती है और क्यों बातबात पर झगड़ती है. आखिर जब उस से नहीं रहा गया तो उस ने पूछा, ”फरहीन, मैं तुम्हारा हर तरह से खयाल रखता हूं, फिर तुम मुझ से बेरुखी से पेश क्यों आती हो?’’

फरहीन बानो शौहर को घूरते हुए बोली, ”सुखसाधन से कोई औरत संतुष्ट नहीं होती, उसे तो संतुष्टि तब मिलती है जब उस की गोद भरती है. हमारी शादी को 3 साल से ज्यादा का समय हो गया है, लेकिन हमारी अभी भी कोई औलाद नहीं है. घरपरिवार की औरतें ताने कसती हैं. वे मुझे बांझ समझने लगी हैं.’’

बीवी की बात सुन कर गुलफाम भी भड़क उठा, ”इस में मेरा क्या दोष है. खुदा जब चाहेगा, तभी औलाद होगी. मुझे विश्वास है कि वह जरूर हम पर रहम करेगा. तुम परेशान न हो. रही बात औरतों के तानों की तो तुम उस पर ध्यान मत दिया करो.’’

फरहीन गुस्से से बोली, ”खुदा को बीच में मत लाओ. सारा दोष तुम्हारा ही है. तुम मर्द होते तो एक नहीं, 2 औलाद हमारी गोद में अब तक होतीं. तुम अपना इलाज कराओ. दुआ ताबीज लो. वरना हमारी तुम्हारे साथ नहीं बनेगी.’’

फरहीन ने मर्दानगी पर चोट की तो गुलफाम भी भड़क उठा, ”मुझ में कोई कमी नही है. जो भी कमी है, वह सब तुझ में है. इसलिए न मैं इलाज कराऊंगा और न ही किसी फकीर के पास दुुआताबीज के लिए जाऊंगा. तुझे ही अपना इलाज कराना होगा.’’

इस के बाद तो आए दिन फरहीन और गुलफाम के बीच औलाद न होने को ले कर तकरार होने लगी. कभीकभी तकरार इतनी अधिक बढ़ जाती कि दोनों के बीच हाथापाई हो जाती. गुस्से में गुलफाम शराब के ठेके पर जाता और जम कर शराब पी कर लौटता. धीरेधीरे गुलफाम की शराब पीने की लत पड़ गई. वह पक्का शराबी बन गया. अभी तक फरहीन और गुलफाम के बीच औलाद को ले कर ही झगड़ा होता था, लेकिन अब शराब पीने को ले कर भी झगड़ा होने लगा. कभीकभी झगड़ा इतना बढ़ जाता कि गुलफाम फरहीन को जानवरों की तरह पीट देता. फरहीन समझ गई कि वह शराबी व नाकाबिल शौहर से कभी औलाद का सुख नहीं पाएगी. अत: वह शौहर से नफरत करने लगी. 

इन्हीं दिनों फरहीन बानो के घर आमिर का आनाजाना शुरू हुआ. रिश्ते में आमिर फरहीन का भतीजा था. वह भी नई बस्ती कटरा शमशेर खां मोहल्ले में रहता था. आमिर शरीर से हृष्टपुष्ट तथा सजीला युवक था. वह जो कमाता था, अपनी ही फैशनपरस्ती में खर्च करता था. फरहीन को वह बुआ कहता था. उम्र में वह फरहीन से छोटा था.

फरहीन को किस तरह हुआ भतीजे से प्यार

28 साल की बुआ फरहीन बानो से आमिर की खूब पटती थी. बुआभतीजे के बीच हंसीठिठोली भी होती थी. आमिर को बुआ की सुंदरता और अल्हड़पन बहुत भाता था. कभीकभी वह उसे एकटक प्यार भरी नजरों से देखा करता था. अपनी ओर टकटकी लगाए देखते समय जब कभी फरहीन की नजरें उस से टकरा जातीं तो दोनों मुसकरा देते थे. आमिर फरहीन के शौहर गुलफाम से ज्यादा स्मार्ट और अच्छी कदकाठी का था. इस से फरहीन का झुकाव आमिर के प्रति बढ़ता गया. 

फरहीन बानो स्वभाव से मिलनसार थी. आमिर बुआ के प्रति सम्मोहित था. जब दोनों साथ चाय पीने बैठते, तब फरहीन उस से खुल कर हंसीमजाक करती. फरहीन का यह व्यवहार धीरेधीरे आमिर को ऐसा बांधने लगा कि उस के मन में फरहीन का सौंदर्यरस पीने की कामना जागने लगी. एक दिन आमिर दोपहर को आया तो फरहीन उस के लिए थाली ले कर आई और जानबूझ कर गिराए गए आंचल को ठीक करते हुए बोली, ”लो आमिर, खाना खा लो. आज मैं ने तुम्हारी पसंद का खाना बनाया है.’’

आमिर को बुआ की यह अदा बहुत अच्छी लगी. वह उस का हाथ पकड़ कर बोला, ”बुआ, तुम भी अपनी थाली परोस लो. साथ खाने में मजा आएगा.’’

खाना खाते वक्त दोनों के बीच बातों का सिलसिला जुड़ा तो आमिर बोला, ”बुआ, तुम खूबसूरत और खिदमतगार हो. लेकिन फूफाजान तुम्हारी कद्र नहीं करते. मुझे पता है कि अभी तक तुम्हारी गोद सूनी क्यों है? वह अपनी कमजोरी की खीझ तुम पर उतारते हैं. लेकिन मैं तुम से बेइंतहा मोहब्बत करता हूं.’’

यह कह कर आमिर ने फरहीन की दुखती रग पर हाथ रख दिया था. सच में फरहीन शौहर से संतुष्ट नहीं थी. उसे न तो औलाद का सुख मिला था और न ही शारीरिक सुख, जिस से उस का मन विद्रोह कर उठा. उस का मन बेइमान हो चुका था. आखिरकार उस ने फैसला कर लिया कि अब वह असंतुष्ट नहीं रहेगी. औलाद के लिए उसे रिश्तों को तारतार क्यों न करना पड़े. उस ने यह भी तय कर लिया कि भले ही उस की कितनी भी बदनामी क्यों न हो. लेकिन वह आमिर का साथ नहीं छोड़ेगी. 

औरत जब जानबूझ कर बरबादी के रास्ते पर कदम रखती है तो उसे रोक पाना मुश्किल होता है. यही फरहीन बानो के साथ हुआ. फरहीन जवान भी थी और शौहर से असंतुष्ट भी. वह औलाद सुख भी चाहती थी. अत: उस ने भतीजे आमिर के साथ नाजायज रिश्ता बनाने का निश्चय कर लिया. आमिर वैसे भी फरहीन का दीवाना था. एक रोज सुबह 9 बजे जैसे ही गुलफाम सब्जी का ठेला ले कर फेरी के लिए निकला, तभी आमिर आ गया. फरहीन उस समय कमरे में चारपाई पर लेटी थी. कमरे में पहुंचते ही वह उस की खूबसूरती को निहारने लगा. फरहीन को आमिर की आंखों की भाषा पढऩे में देर नहीं लगी. फरहीन ने उसे करीब बैठा लिया और उस का हाथ सहलाने लगी. आमिर के शरीर में हलचल मचने लगी.

थोड़ी देर की चुप्पी के बाद होश दुरुस्त हुए तो फरहीन ने आमिर की ओर देख कर कहा, ”आमिर तुम मुझे बहुत अच्छे लगते हो, लेकिन हमारे बीच रिश्ते की दीवार है. अब मैं इस दीवार को तोडऩा चाहती हूं.’’

आमिर ललचाई नजरों से देखता हुआ बोला, ”मैं तुम्हें कभी धोखा नही दूंगा. तुम अपना बनाओगी तो तुम्हारा ही बन कर रहूंगा.’’ कह कर आमिर ने फरहीन को बाहों में भर लिया. ऐसे ही कसमेवादों के बीच संकोच की सारी दीवारें कब टूट गईं, दोनों को पता ही नहीं चला. उस दिन के बाद आमिर और फरहीन बिस्तर पर सामाजिक रिश्तों और मानमर्यादाओं की धज्जियां उड़ाने लगे. वासना की आग ने इन के इन रिश्तों को जला कर खाक कर दिया. 

आमिर अपनी बुआ की मोहब्बत में इतना अंधा हो गया कि उसे जब भी मौका मिलता, वह फरहीन से मिलन कर लेता. फरहीन भी भतीजे के पौरुष की दीवानी थी. उन के मिलन की किसी को कानोंकान खबर नहीं थी. 

इस तरह खुली बुआभतीजे के संबंधों की पोल

कहते हैं कि वासना का खेल कितनी भी सावधानी से खेला जाए, एक न एक दिन भांडा फूट ही जाता है. ऐसा ही फरहीन और आमिर के साथ भी हुआ. एक दोपहर पड़ोस में रहने वाली जेठानी खातून ने रंगरलियां मना रहे आमिर और फरहीन को चोरीछिपे देख लिया. इस के बाद तो इन की पापलीला की चर्चा पड़ोस में होने लगी. गुलफाम को जब फरहीन और उस के भतीजे आमिर के नाजायज रिश्तों की जानकारी हुई तो उस का माथा घूम गया. उस ने इस बाबत फरहीन से बात की तो उस ने नाजायज रिश्तों की बात सिरे से खारिज कर दी. उस ने कहा, ”आमिर उस का भतीजा है. कभीकभार घर आ जाता है तो उस से हंसबोल लेती हूं. चायनाश्ता करने के बाद वह चला जाता है. पड़ोसी इस का गलत मतलब निकालते हैं. उन्होंने ही तुम्हारे कान भरे हैं.’’

गुलफाम ने उस समय तो फरहीन की बात मान ली, लेकिन मन में शक पैदा हो गया. इसलिए वह चुपकेचुपके बीवी पर नजर रखने लगा. परिणामस्वरूप एक दोपहर गुलफाम ने बुआभतीजे को रंगेहाथ पकड़ लिया. आमिर तो भाग गया, लेकिन फरहीन की गुलफाम ने जम कर पिटाई की. साथ ही संबंध तोडऩे की चेतावनी दी. लेकिन इस चेतावनी का असर न तो फरहीन पर पड़ा और न ही आमिर पर. हां, इतना जरूर हुआ कि अब वे सावधानी बरतने लगे. जिस दिन गुलफाम को पता चलता कि आमिर उस के घर के चक्कर लगा रहा था. उस दिन शराब पी कर वह फरहीन को जानवरों की तरह पीटता और भद्दीभद्दी गालियां बकता. 

फरहीन शौहर की पिटाई से तंग आ चुकी थी, अत: मार्च 2024 के पहले सप्ताह में गुलफाम को बिना बताए अपने मायके नई बस्ती कटरा शमशेर खां आ गई. उस ने मां व भाइयों को आंसू बहा कर बताया कि गुलफाम शराब पी कर उसे बेतहासा पीटता था. उसे भूखाप्यासा रखता था. चरित्र पर लांछन लगाता था, जिस से उसका ससुराल में जीना दूभर हो गया था. इसलिए वह मायके आ गई. आंसू देख कर मां व भाइयों ने सहज ही उस की बातों पर भरोसा कर लिया. मां ने उसे धैर्य बंधाया और कहा कि गुलफाम जब आएगा, तब उसे सबक सिखाएगी. उसे जलील करेगी और माफी मांगने पर भी उसे ससुराल नहीं भेजेगी. 

इधर गुलफाम घर आया तो फरहीन घर पर नहीं थी. उस ने उसे फोन किया, लेकिन फरहीन ने काल रिसीव नहीं की. दूसरे ही दिन गुलफाम अपनी ससुराल जा पहुंचा. ससुराल पहुंचते ही गुलफाम की सास तहमीदा वारिसी उस पर बरस पड़ी, ”गुलफाम, तू इंसान नहीं जानवर है. तू शराब पी कर मेरी बेटी को पीटता था और उसे भूखाप्यासा रखता था. चला जा यहां से, वरना अंजाम बुरा होगा.’’

गुलफाम नरमी से बोला, ”सासू मां, फरहीन ने आप को जो कुछ बताया, वह सब सही नहीं है. फरहीन मेरी इज्जत पर धब्बा लगा रही है. भतीजे आमिर से उस के नाजायज ताल्लुकात हैं. में ने मना किया तो मुझ से ही उलझ गई. रंगेहाथ पकड़ा तो शराब के नशे में उसे पीट दिया. नाराज हो कर वह यहां आ गई.’’

गुलफाम ने लाख सफाई दी, लेकिन उस की बात पर किसी ने यकीन नहीं किया. फरहीन के भाई वारिस व साबिर ने भी गुलफाम को खूब खरीखोटी सुनाई, गालियां भी बकी. धमकी भी दी कि यहां से चला जाए वरना कुछ अनर्थ हो जाएगा. ससुराल में अपमान का घूंट पी कर गुलफाम अपने घर वापस आ गया. गम को भुलाने के लिए उस रात उस ने जम कर शराब पी. गुलफाम को अपमानित कर भगाया गया तो फरहीन मन ही मन खुश हुई. अब वह मायके में स्वच्छंद रूप से रहने लगी. भतीजा आमिर भी बेरोकटोक उस से मिलने आने लगा. आमिर अब उसे खर्च के लिए रुपए भी देने लगा. 

जिस दिन मां और भाई घर पर नहीं होते, उस दिन फरहीन फोन कर आमिर को बुला लेती और मिलन कर लेती. घर में मौका न मिलता तो आमिर के साथ होटल चली जाती.

और प्रेमी आमिर के साथ फुर्र हो गई फरहीन

एक रोज फरहीन ने बिस्तर पर मस्ती के दौरान कहा, ”आमिर, हम कब तक इस तरह छिपतेछिपाते मिलते रहेंगे. यदि तुम मुझे अपना बनाना चाहते हो तो मुझे अपने साथ कहीं और ले चलो, जहां हम खुल कर जी सकें.’’

मई 2024 में फरहीन भतीजे आशिक आमिर के साथ मायके से भाग गई. लेकिन मायके वालों ने फरहीन के भाग जाने की जानकारी उस के शौहर गुलफाम को नहीं दी. लेकिन ऐसी बातें छिपती कहां हैं? एक सप्ताह बाद ही गुलफाम को पता चल गया कि फरहीन अपने आशिक आमिर के साथ फरार हो गई है. बेटी के भाग जाने की रिपोर्ट तहमीदा वारिसी ने पुलिस में दर्ज नहीं कराई. वह अपने बेटों के साथ उस की खोज करने लगी. गुलफाम भी अपने स्तर से बीवी की तलाश में जुट गया. लेकिन सफलता नहीं मिली. 

लगभग 3 महीने बाद फरहीन घर वापस आ गई. मां ने डांटाफटकारा तो वह बोली, ”मां, मैं आमिर के साथ धार्मिक स्थानों पर माथा टेकने गई थी. अजमेर शरीफ एक महीने तक रही. दिल्ली, आगरा शहर भी घूमा. इस के बाद वापस आ गई.’’

बेटी की बात सुन कर तहमीदा को गुस्सा तो बहुत आया, लेकिन वह अपने गुस्से को पी गई और फरहीन को शराफत से रहने की नसीहत दी. उस ने आमिर को भी खूब खरीखोटी सुनाई और फरहीन से मिलने पर रोक लगा दी. इधर गुलफाम बीवी के बिना बेचैन रहता था. अधिक शराब पीने से उस का सब्जी का धंधा चौपट हो गया था. उस पर कर्ज भी चढ़ गया था. एक रोज उसे पता चला कि फरहीन वापस घर आ गई है तो वह उसे मनाने ससुराल पहुंच गया. लेकिन फरहीन ने उस के साथ जाने से साफ मना कर दिया. तहमीदा अब तक जान गई थी कि बेटी के कदम बहक गए हैं, सो वह भी चाहती थी कि वह ससुराल चली जाए. उस ने उसे समझाया भी. लेकिन फरहीन ने शौहर के साथ जाने से इंकार कर दिया. 

इस के बाद तो यह सिलसिला ही चल पड़ा. गुलफाम हर हफ्ते बीवी को मनाने ससुराल जाता. लेकिन वह उसे दुत्कार कर भगा देती. अगस्त के दूसरे सप्ताह में वह अपने बड़े भाई अनवर को भी साथ ले गया. अनवर ने फरहीन की मां व भाइयों से बात की तथा फरहीन को भी समझाया. लेकिन फरहीन राजी नहीं हुई. अपमानित हो कर गुलफाम व अनवर वापस घर आ गए. गुलफाम बखूबी जानता था कि फरहीन पर इश्क का भूत सवार है. वह भतीजे आमिर के प्यार में अंधी हो चुकी है. इसलिए वह उस के साथ आने को नानुकुर कर रही है. काफी सोचविचार के बाद गुलफाम ने सोच लिया कि वह आखिरी बार और फरहीन को मनाने जाएगा. यदि इस बार उस ने इंकार किया तो वह बरदाश्त नहीं करेगा और बेवफा बीवी को सबक सिखा कर ही रहेगा. 

इस के लिए उस ने एक बांका भी खरीद लिया था. फिर वह 3 सितंबर, 2024 को अपनी ससुराल पहुंच गया. उस ने बड़े प्यार से बीवी फरहीन को मनाने की कोशिश की, लेकिन फरहीन ने उस की एक नहीं सुनी. इतना ही नहीं, उस ने पति गुलफाम की उस दिन भी बेइज्जती की. तब गुलफाम ने बांके से वार कर उसे मौत के घाट उतार दिया. गुलफाम से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने मृतका के भाई वारिस की तहरीर पर बीएनएस की धारा 103 के तहत गुलफाम के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली और उसे विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया. 

4 सितंबर, 2024 को पुलिस ने हत्यारोपी गुलफाम को इटावा कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया गया.

कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

 

crime news : प्रेमिका बनी भाभी तो किया भाई का कत्ल

खूबसूरत खालिदा और नौशाद एकदूसरे को दिलोजान से चाहते थे, लेकिन खालिदा के घर वालों ने उस का निकाह नौशाद के भाई आफताब से कर दिया. भाभी के रूप में अपनी महबूबा को देख कर नौशाद का दिमाग खराब हो जाता था. फिर एक दिन…  

दिनों मेरी पोस्टिंग नौशहरा में थी. मेरी रिहाइश भी थाने के करीब ही थी. एसआई मशकूर हुसैन ने खबर सुनाई

नौशहरा गांव में एक कत्ल की वारदात हो गई है. मकतूल का बाप और 2 आदमी बाहर बैठे आप का इंतजार कर रहे हैं.’ मैं उन लोगों के साथ फौरन मौकाएवारदात पर जाने के लिए रवाना हो गया. मकतूल का नाम आफताब था, वह फय्याज अली का बड़ा बेटा था. उस से छोटा नौशाद उस की उम्र 20 साल थी. आफताब उस से 2 साल बड़ा था. उस की शादी एक महीने पहले ही हुई थी. मकतूल का बाप फय्याज अली छोटा जमींदार था. उस के पास 10 एकड़ जमीन थी, जिस पर बापबेटे काश्तकारी करते थे. मैं खेत में पहुंचा, जहां पर 2 छोटे कमरे बने हुए थे. बरामदे में कटे हुए गेहूं का ढेर लगा था. फय्याज के साथ मैं कमरे के अंदर पहुंच गया. मकतूल की लाश कमरे में पड़ी चारपाई के पायंते पर पड़ी थी.

मैं ने गौर से लाश की जांच की. वह औंधे मुंह पड़ा था. मुंह के करीब खून का छोटा सा तालाब बन गया था. खोपड़ी पर किसी वजनी चीज से वार किया गया था. खोपड़ी का पिछला हिस्सा काफी जख्मी था. खोपड़ी चटक गई थी. यह जख्म ही मौत की वजह था. वार बड़ी बेदर्दी से किया गया था, जिस से मारने वाले की नफरत का अंदाजा होता था. मेरे अंदाज के मुताबिक उसे सुबह 5-6 बजे मारा गया था. मैं ने कमरे की अच्छे से तलाशी ली. आला कत्ल नहीं मिला. मैं ने दूसरे कमरे की भी तलाशी ली, जहां खेती के औजार और बीज पड़े थे. काररवाई पूरी होने पर लाश मशकूर हुसैन के साथ पोस्टमार्टम के लिए सिटी अस्पताल भिजवा दी.

कमरे के बाहर अब तक काफी लोग जमा हो चुके थे. मैं ने फय्याज को तसल्ली दी. उसे यकीन दिलाया कि कातिल जल्दी ही पकड़ा जाएगा. फिर उस से पूछा, ‘‘क्या आफताब की किसी से लड़ाई थी?’’

उस ने रोते हुए जवाब दिया, ‘‘उस का कोई दुश्मन नहीं था. वह तो सब से मिलजुल कर रहता था.’’

‘‘पर फय्याज अली, लाश की हालत देख कर लगता है कि किसी ने दुश्मनी निकाली है. क्या किसी पर शक है? उस की लाश कितने बजे मिली थी?’’

‘‘हुजूर, वह सुबह 5 बजे अपने भाई के साथ खेतों पर निकल जाता था. लाश 8 बजे मिली. मैं देर से उन का नाश्ता ले कर जाता था.’’

‘‘क्या तुम आज भी 8 बजे नाश्ता ले कर निकले थे?’’

‘‘जी सरकार. आज मैं अकेले आफताब का नाश्ता लाया था, क्योंकि नौशाद बीमार घर पर पड़ा है.’’

काफी देर तक मैं अंदरबाहर की तलाशी लेता रहा. फिर फय्याज अली से पूछा, ‘‘जब तुम कमरे पर पहुंचे तो तुम ने क्या देखा?’’

‘‘जब मैं खेतों पर पहुंचा, मैं ने उसे खेत में नहीं देखा तो परेशान हो गया. वह सवेरे घर से कर डेरे से खेतों के कपड़े पहन कर काम शुरू करता था. शाम को काम खत्म कर के घर के कपड़े बदलता था. जब मैं कमरे पर पहुंचा तो वह घर के कपड़ों में ही औंधा पड़ा था. उसे कपड़े बदलने का मौका भी नहीं मिला था. शायद कातिल उस के साथ ही यहां पहुंचा हो.’’

‘‘मेरे खयाल में कातिल ने बेखबरी में मकतूल पर पीछे से वार किया है. उसे कपड़े बदलने का मौका तक नहीं मिल सका. मुझे शक है कि कातिल पहले से ही कमरे में था.’’

‘‘लेकिन दोनों कमरों के दरवाजे हम ताला लगा कर बंद करते हैं. कोई बंदा अंदर कैसे जा सकता है?’’

अचानक मेरी नजर कमरे की खिड़की पर पड़ी, जिस से आसानी से एक आदमी कमरे के अंदर सकता था. मैं ने खिड़की की तरफ इशारा करते हुए कहा, ‘‘देखो, वह खिड़की खुली हुई है. कुंडी नहीं लगी है.’’

फय्याज हैरानी से बोला, ‘‘हैरत है जनाब, हम रोज शाम को खिड़की दरवाजे याद से बंद करते हैं. कल शायद भूल हो गई और कातिल को अंदर आने का मौका मिल गया.’’

उस के बाद मैं फय्याज के साथ कमरे बंद करवा कर उस के घर पहुंचा, जहां उस की बीवी सुलताना और बहू खालिदा थीं. घर का माहौल बेहद बोझिल था. आसपड़ोस की औरतें दोनों को तसल्ली दे रही थीं. मुझे नौशाद कहीं दिखाई नहीं दिया. मैं ने उस के बारे में पूछा तो पता लगा कि वह रिश्तेदारी में मौत की खबर देने गया है. औरतें कुछ बताने की हालत में नहीं थींमैं बाहर गया. सामने किराने की एक दुकान थी. मैं वहां पहुंच गया. मैं ने दुकानदार अली से कहा, ‘‘तुम्हारी दुकान के सामने ही रहने वाले फय्याज का कत्ल हो गया है. तुम्हारा इस बारे में क्या खयाल है?’’

उस ने बड़ी ही उदासी से कहा, ‘‘बहुत अफसोसजनक घटना है. आफताब बहुत अच्छा लड़का और कबड्डी का अच्छा खिलाड़ी था.’’

‘‘चाचा, मुझे लगता है कि यह कत्ल दुश्मनी और नफरत का नतीजा है. क्या तुम्हें कुछ अंदाजा है, कौन यह काम कर सकता है?’’

कुछ देर वह सोचता रहा फिर बोला, ‘‘सरकार, ऐसे तो मुझे कुछ अंदाजा नहीं है. अभी तो बेचारे की शादी हुई थी. बड़ा ही सीधा बंदा था और बहुत ही धीमे मिजाज का. पर मुझे याद पड़ता है कुछ अरसे पहले कबड्डी के एक मैच में विरोधी टीम के एक बंदे ने बेइमानी की थी. उस का नाम फैजी था. दोनों की खूब कहासुनी हुई थी. फैजी का एक साथी जावेद भी बहुत बढ़चढ़ कर बोल रहा था. वह तो अच्छा हुआ देखने वालों ने समझाबुझा कर मामला संभाल लिया. मैं भी वहीं था. फैजी और जावेद बड़े लड़ाकू किस्म के लड़के हैं. उस दिन आफताब खेल से बाहर निकल गया. बात खत्म हो गई.’’

‘‘यह कितने दिन पहले की बात है?’’ 

चाचा ने सोच कर कहा, ‘‘उस की शादी के बाद ये मैच हुआ था. पर थानेदार साहब, यह इतनी बड़ी बात नहीं है कि कोई किसी का कत्ल कर दे.’’

मैं ने चाचा को बहुत कुरेदा पर कोई खास जानकारी हो सकी. थाने पहुंच कर मैं ने जावेद को बुलवाया तो पता चला कि वह किसी काम से गल्ला मंडी गया है. सिपाही उस की मां से कह कर आया था कि आने पर उसे थाने भेज दे. शाम को मशकूर हुसैन शहर से वापस गया. लाश दूसरे दिन मिलने वाली थी. मौत की वजह खोपड़ी पर लगी चोट थी. मैं ने मशकूर हुसैन से पूछा, ‘‘तुम जावेद के बारे में क्या जानते हो?’’

उस ने कहा, ‘‘जावेद कबड्डी का अच्छा खिलाड़ी है. एक मैच में उस की आफताब से लड़ाई भी हुई थी, पर यह इतनी अहम बात नहीं है कि बात कत्ल तक पहुंच जाए.’’

‘‘जावेद के आने पर असली बात पता चलेगी.’’

‘‘एक बात और है सर, मेरी मालूमात के मुताबिक जावेद की बहन फरीदा की शादी आफताब से होने वाली थी. एक साल मंगनी रही फिर आफताब के घर वालों ने यह कह कर मंगनी तोड़ दी कि लड़की का चालचलन ठीक नहीं है. और फिर उस की शादी भाई की बेटी खालिदा से कर दी.’’

मैं ने कहा, ‘‘मंगनी टूटने का भी दुख और अपमान ऐसे काम को उकसा सकता है.’’

अगले दिन फिर मैं फय्याज अली के घर गया. जावेद अभी तक नहीं आया था. मैं उस के बारे में सोच रहा था. फय्याज अली के घर का माहौल वैसा ही शोकग्रस्त था. मैं मकतूल की बेवा खालिदा से मिला. वह सदमे में थी. रोरो कर उस की आंखें सुर्ख हो रही थीं. अच्छी खूबसूरत लड़की बेहाल हो रही थी. उस से कुछ पूछना बेकार था. मैं ने फय्याज से पूछा, ‘‘क्या कबड्डी के एक मैच में जावेद और आफताब की लड़ाई हुई थी?’’

उस ने बेबसी से कहा, ‘‘हां, मैं ने भी सुना था कि कुछ बेइमानी होने पर दोनों के बीच में कहासुनी हुई थी.’’

मैं ने आफताब की मां से पूछा, ‘‘आप के बेटे की मंगनी पहले जावेद की बहन फरीदा से हुई थी. फिर मंगनी क्यों तोड़ दी? हो सकता है, इस वाकये की वजह से जावेद आफताब से नफरत करने लगा हो.’’

‘‘मंगनी तो टूटी थी क्योंकि फरीदा का चालचलन अच्छा नहीं था. पर थानेदार साहब, मुझे जावेद से ज्यादा फैजी पर शक है क्योंकि कबड्डी के मैदान के साथसाथ आफताब ने उसे जिंदगी के मैदान में भी हरा दिया था. क्योंकि फैजी खालिदा से शादी करना चाहता था. वैसे हमारी फैजी से कोई सीधी रिश्तेदारी नहीं है, पर खालिदा की मां और फैजी की मां आपस में बहनें हैं

‘‘खालिदा फैजी की खालाजाद बहन है. फैजी की मां की बड़ी आरजू थी कि वह खालिदा को अपनी बहू बनाए पर खालिदा की मां ने साफ इनकार कर दिया. इस पर बहुत लड़ाई भी हुई थी. लंबी नाराजगी चल रही है और खालिदा की शादी मेरे बेटे आफताब से हो गई. इस के पहले फैजी की मां और खालिदा की मां के ताल्लुकात बहुत अच्छे थे और सदमे में फैजी के बाप को फालिज का असर हो गया.’’

सारी कहानी सुन कर मैं सोच में पड़ गया. अब फैजी और जावेद दोनों शक के घेरे में गए थे. मैं ने फय्याज अली को बताया, ‘‘लाश शाम तक जाएगी. वे लोग मय्यत का बंदोबस्त कर लें.’’ 

सब को तसल्ली दे कर मैं वहां से उठ गया. उस दिन भी नौशाद से मुलाकात हो सकी. वह काम से बाहर गया था. सुलताना से की गई मालूमात तफ्तीश को आगे बढ़ाने में कारामद थी. जब मैं बाहर निकला तो फय्याज के साथ एक अधेड़ उम्र का आदमी और एक लड़का भी था. फय्याज ने बताया, ‘‘यह मेरे भाई फिदा अली हैं और यह खालिदा का भाई सईद.’’ इन के बारे में मैं पहले ही सुन चुका था. इन लोगों से कुछ पूछना बेकार था.

दूसरे दिन जावेद मेरे सामने खड़ा था. कसरती नौजवान था. उस के चेहरे पर रूखापन और अकड़ थी. उस ने तीखे लहजे में पूछा, ‘‘थानेदार साहब, मैं ने क्या किया है जो आप ने मुझे थाने बुलाया है?’’

‘‘मुझे कुछ पूछताछ करनी है. सीधा और सही जवाब चाहिए.’’

‘‘मुझे झूठ बोलने की क्या जरूरत है. बेवजह मुझे पकड़ लाए.’’

हवलदार ने एक चांटा उसे जड़ा तो उस का दिमाग सही हो गया. धीमे लहजे में बोला, ‘‘पूछिए, क्या पूछना है?’’

‘‘वारदात के दिन तुम कहां थे? शाम तक भी घर वापस नहीं आए.’’

‘‘सरकार, मैं गल्ला मंडी गया था. कुछ काम पड़ गया, आतेआते रात हो गई. सुबह आप की खिदमत में हाजिर हूं.’’

‘‘गल्ला मंडी क्यों गए थे?’’

‘‘मुझे सब्जियों के बीज लाने थे और गेहूं के दाम भी चैक करने थे. मैं सवेरे 8 बजे घर से निकला था.’’

इस का मतलब वह आफताब की मौत के बाद घर से निकला था. मैं आंख बंद कर के उस पर यकीन नहीं कर सकता था.

‘‘तुम ने जो बीज खरीदे, उस की रसीद दिखाओ?’’ 

उस ने जेब से तुड़ीमुड़ी रसीद निकाल कर मेरे आगे कर दी. तारीख की जगह पर मुझे ओवरराइटिंग का गुमान हुआ. मैं ने रसीद दराज में रख ली.

‘‘जावेद, यह बताओ कि आफताब की मंगनी तुम्हारी बहन से हुई थी तो यह मंगनी क्यों टूट गई?’’

‘‘सरकार, उन लोगों ने मेरी बहन पर बदचलनी का इलजाम लगा कर मंगनी तोड़ दी. मुझे बहुत गुस्सा आया रंज भी हुआ. बेवजह मेरी बहन बदनाम हुई.’’

‘‘और इसी का बदला लेने के लिए गुस्से में तुम ने आफताब का कत्ल कर दिया.’’

वह घबरा कर बोला, ‘‘थानेदार साहब, गुस्सा अपनी जगह है. मैं इस बात के लिए आफताब को कत्ल नहीं कर सकता. हां, मेरी उस से लड़ाई हुई थी. उसे बुराभला कह कर मैं ने अपना गुस्सा उतार लिया था और अपने दोस्त फैजी का साथ दिया था. मैं कसम खाता हूं, मैं इस कत्ल में शामिल नहीं हूं.’’

मैं ने पलटवार किया, ‘‘तो क्या यह कत्ल फैजी ने किया है? वह खालिदा से शादी करना चाहता था, पर जब उस की शादी आफताब से हो गई तो बदला लेने के लिए उस ने आफताब को मार दिया.’’

वह जल्दी से बोला, ‘‘नहीं सरकार, फैजी ऐसा नहीं कर सकता. इतनी सी बात के लिए कोई खून नहीं कर सकता. मैं यह मानता हूं कि मेरे और फैजी के दिल में आफताब के लिए जहर भरा था, पर हम ने कत्ल की वारदात नहीं की है.’’

मैं ने धमकाते हुए कहा, ‘‘तुम शक के दायरे से बाहर नहीं हो. गांव छोड़ कर बाहर मत जाना.’’

दोपहर को पोस्टमार्टम रिपोर्ट गई और साथ ही लाश भी. लाश घर वालों के सुपुर्द कर दी गई. रिपोर्ट के मुताबिक, आफताब को 18 तारीख की सवेरे 5 और 6 बजे के बीच मारा गया था

मौत खोपड़ी चटखने से हुई. खोपड़ी के पिछले हिस्से पर लोहे की भारी चीज से वार किया गया था. यह वार बेखबरी में पीछे से किया गया थाशाम को लाश को दफना दिया गया. काफी लोग जमा हुए थे. गमी का माहौल था. दूसरे दिन मैं ने मशकूर हुसैन को जावेद की बात की सच्चाई जानने को रसीद के साथ गल्ला मंडी रवाना कर दिया. उस के बाद फैजी को थाने बुलाया. फैजी 23-24 साल का गोरा जवान था. आते ही उस ने तीखे लहजे में पूछा, ‘‘मुझे आप ने सिपाही से पकड़वा कर क्यों बुलवाया? मेरा क्या कसूर है?’’

मैं ने नरम लहजे में कहा, ‘‘तुम से कुछ पूछताछ करनी है. एक बार में सच बोल दो तो बेहतर है. मार के बाद तो सच ही निकलेगा. तुम ने आफताब का कत्ल क्यों किया?’’

वह चीखते हुए बोला, ‘‘आप यह कैसा इलजाम लगा रहे हैं. इस कत्ल में मैं शामिल नहीं हूं. खुदा की कसम, मैं ने उस का कत्ल नहीं किया. यह सरासर इलजाम है.’’

मैं ने कड़क कर कहा, ‘‘फिर बताओ किस ने कत्ल किया? तुम उस से नफरत करते थे क्योंकि तुम्हारी पसंद की लड़की की शादी आफताब से हो गई थी. उस की जीत तुम से बरदाश्त नहीं हुई. कबड्डी के मैदान में भी तुम ने उस से झगड़ा किया था.’’

‘‘यह सही है कि मैं उस से नफरत करता था, पर सच्चाई यह है कि मैं ने आफताब को नहीं मारा.’’

‘‘जब तक सही कातिल हाथ नहीं आता, शक में तुम हवालात में बंद रहोगे.’’

फैजी की गिरफ्तारी की खबर जल्दी ही गांव में फैल गई. उस की मां रोतेधोते हमारे पास पहुंच गई. कहने लगी, ‘‘मेरा बेटा बेकसूर है. सुलताना ने आप को भड़काया, इलजाम लगाया, आप ने उसे हवालात में डाल दिया. यह जुल्म है सरकार. यह बात सही है कि फैजी खालिदा से शादी करना चाहता था पर मेरी बहन ने ही मना कर दिया, मैं किसी को क्या दोष दूं.’’

मैं ने उसे समझाते हुए कहा, ‘‘देखो, अभी जांच चल रही है. फैजी शक के दायरे में आता है, इसलिए उसे बंद किया है. अगर वह बेकसूर है तो यकीन रखो, मैं उसे छोड़ दूंगा.’’

वह रोते हुए बोली, ‘‘हुजूर, उस का बाप भी फालिज में पड़ा हुआ है. बेटा जेल में बंद है, हम पर रहम करें.’’ 

मैं ने समझाबुझा कर उसे घर भेजा. इसी बीच मशकूर हुसैन गल्ला मंडी से लौट आया. उस ने बताया, ‘‘तारीख में हेरफेर किया गया है. 3 को 8 बनाया गया है. बीज 13 तारीख को खरीदे गए थे, रसीद में 18 है.’’ 

वह दूसरी रसीद भी साथ लाया था. मैं ने फौरन जावेद को बुलवाया. उसे दोनों रसीदें दिखाईं तो वह हड़बड़ा गया. कहने लगा, ‘‘मैं ने तारीख बदली है यह सच है, पर इस की वजह दूसरी है, जिसे मैं ही जानता हूं.’’

मैं ने एक चांटा लगाते हुए पूछा, ‘‘वारदात के अलावा और क्या वजह हो सकती है.’’

वह गिड़गिड़ाया, ‘‘हुजूर, बात यह है कि 13 तारीख की रसीद दिखा कर मैं ने अपने बाप से पैसे वसूल कर लिए थे. मुझे जुए की लत लग गई है. 18 को मैं गल्ला मंडी तो गया था पर कुछ खरीदा नहीं और पुरानी रसीद में तारीख बदल कर अब्बा से दोबारा पैसे वसूल कर लिए. बस इतनी सी बात है.’’

वह रोने लगा, कसमें खाने लगा. उस की बात में सच्चाई थी क्योंकि गल्ला मंडी से यही मालूम हुआ था कि वह 13 तारीख को बीज ले गया था, 18 तारीख को सिर्फ कर चला गया था. वहां से वह हनीफ के जुआ अड्डे पर गया था. पर मैं इस तरह से उसे छोड़ नहीं सकता था. मैं ने उसे भी हवालात में डलवा दिया. गल्ला मंडी की जांच एक सिपाही के जिम्मे कर दी. शाम को मैं खुद फैजी के घर चला गया. उस का बाप बाबू खां दुबलापतला, बीमार सा आदमी था. फालिज ने उसे बिस्तर से लगा दिया था. मैं ने उसे तसल्ली दी, ‘‘हौसला रखो बाबू खां. फैजी अगर बेकसूर है तो मैं तुम से वादा करता हूं कि उस का बाल भी बांका नहीं होगा.’’

उस ने कांपती आवाज में कहा, ‘‘थानेदार साहब, इंसान गलती का पुतला है. ऐसी ही संगीन गलती मेरी बीवी जाहिदा ने भी की. वह खालिदा की शादी आफताब के बजाय नौशाद से करती तो बहुत अच्छा होता.’’

बाबू खां की एक बात में हजार भेद छिपे थे. बाबू खां को समझा कर मैं लौट आया. जैसे ही मैं थाने पहुंचा, सिपाही साजिद मेरे आगे हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया और बोला, ‘‘सर, मुझ से बड़ी गलती हो गई. 18 तारीख वारदात के दिन जब हम लोग कमरों की तलाशी ले रहे थे, मुझे यह अंगूठी खिड़की के बाहर पड़ी मिली थी. मैं ने इसे जेब में रख लिया था और फिर एकदम भूल गया. आज जब ड्रैस धोने को निकाला तो यह अंगूठी हाथ लगी.’’

उस ने अंगूठी मेरी टेबल पर रख दी. गुस्सा तो मुझे बहुत आया. क्लू के होते हुए भी मैं अंधेरे में हाथपांव मार रहा था. 2 बंदों को हवालात में बिठा रखा था. मैं ने साजिद अली की अच्छी खबर ली और वार्निंग दी कि ऐसी गलती दोबारा नहीं होनी चाहिएअंगूठी अच्छीखासी महंगी थी, जिस में चौकोर माणिक जड़ा था. चारों तरफ नन्हे फिरोजे जड़े हुए थे. मैं ने जावेद और फैजी को अपने कमरे में बुलाया. दोनों के हाथ बारीकी से चैक किए. वहां किसी की अंगुली पर अंगूठी का निशान नहीं था. फिर मैं ने उन्हें अंगूठी दिखाते हुए कहा, ‘‘सचसच बताना, यह अंगूठी किस की है? क्या इसे पहचानते हो?’’

दोनों के मुंह से एक साथ निकला, ‘‘हां सरकार, यह अंगूठी नौशाद की है.’’

कच्चा वारदाती जब पुलिस के हाथ चढ़ता है तो 2 झन्नाटेदार थप्पड़ उसे सच बोलने पर मजबूर कर देते हैं. नौशाद को गिरफ्तार कर के जब मेरे सामने लाया गया, मैं ने माणिक जड़ी अंगूठी उस के सामने रख दी. थप्पड़ों से पहले ही उस के होश ठिकाने चुके थे. अंगूठी देखते ही उस का रंग उड़ चुका था. मैं ने पूछा, ‘‘यह अंगूठी तुम्हारी है ?’’

‘‘सर, यह आप को कहां से मिली?’’

‘‘जहां से तुम खिड़की के रास्ते कमरे के अंदर पहुंचे थे, वहां दीवार के पास पड़ी थी.’’

वह हक्काबक्का मेरी सूरत देख रहा था. बाबू खां का कहा हुआ एक वाक्य मेरे जहन में गूंज रहा था, ‘‘मांबाप को शादी के वक्त औलाद की पसंदनापसंद का खयाल रखना चाहिए. अगर वह खालिदा का रिश्ता आफताब के बजाय नौशाद से करती तो बहुत बेहतर होता.’’ अब इस वाक्य के पीछे छिपी कहानी पूरी तरह मेरी समझ में गई थी. नौशाद ने कांपती आवाज में कहा, ‘‘यह अंगूठी मेरी है.’’

‘‘क्या तुम खालिदा से मोहब्बत करते हो और वह भी तुम्हें पसंद करती है?’’

‘‘जी, यह सच है मैं और खालिदा एकदूसरे से बहुत मोहब्बत करते हैं.’’ उस ने थूक निगलते हुए कहा.

‘‘तो क्या अपनी पसंद और मोहब्बत को पाने के लिए सगे भाई को कत्ल कर देना चाहिए?’’ मैं ने नफरत भरे लहजे में कहते हुए एक तमाचा और मारा. यह खुदगर्जी और जुल्म की एक बदतरीन मिसाल थी. इस से पहले मैं ने नौशाद को देखा ही नहीं था, नहीं तो शायद उस की खूबसूरती देख कर मेरे दिल में शक होता. नौशाद ने रोते हुए गरदन झुका ली.

अगले एक घंटे के अंदर मैं ने उस का इकबालिया बयान ले लिया. किस्सा यूं था

खालिदा और नौशाद बेहद खूबसूरत थे. वे दोनों एकदूसरे से मोहब्बत करते थे पर खालिदा की मां ने फैजी का रिश्ता आने की वजह से उस की शादी आफताब से तय कर दी और एक हफ्ते के अंदर ही खालिदा और आफताब की शादी निपटा दी. खालिदा और नौशाद को शादी के मौके पर कुछ कहने का वक्त ही नहीं मिला. जब होश आया, जुबान खोलते, तब तक शादी हो चुकी थीखालिदा ब्याह कर उसी के घर में गई. वह ब्याह कर और कहीं जाती तो शायद नौशाद उसे भूल जाता, पर अपने ही घर में अपनी महबूबा को भाभी के रूप में देख कर नौशाद का दिमाग खराब हो गया. वह रातदिन खालिदा को देख कर जलता और सोचता कि उसे कैसे हासिल किया जाए. फिर एक दिन उस ने एक शैतानी मंसूबा बना डाला और फैसला कर लिया कि सगे भाई आफताब को रास्ते से हटा देगा.

अपने मंसूबे के मुताबिक वारदात के एक दिन पहले अपनी बीमारी का कामयाब ड्रामा रचाया और 18 तारीख की सुबह वह भाई के साथ काम करने के लिए खेतों पर नहीं गया. वह छत पर सोता था, इसलिए उस की कारगुजारी सब से छिपी रही. किसी को कानोंकान खबर भी नहीं हुई कि मकतूल के पहले चुपके से वह डेरे पर पहुंच गया. अपने मकसद को पूरा करने के लिए उस ने खिड़की की कुंडी नहीं लगाई थी. वह खिड़की के रास्ते आफताब से पहले ही कमरे में घुस कर दरवाजे के पीछे छिप कर खड़ा हो गया और आफताब का इंतजार करने लगा

जैसे ही आफताब ताला खोल कर कमरे में दाखिल हुआ, उस ने लोहे के भारी रेंचपाने से उस के सिर पर करारा वार किया. अगले ही पल किसी कटे हुए दरख्त की तरह वह जमीन पर गिर गया. उस की खोपड़ी चटख गई थीनौशाद खिड़की के रास्ते कमरे में आया था. चढ़ते वक्त उस की अंगूठी दीवार के पास गिर गई, उसे पता नहीं चला. और साजिद ने भी अंगूठी देने में देर कर दी, नहीं तो केस दूसरे दिन ही हल हो जाता. बेवजह ही फैजी और जावेद को हवालात में बंद रखा. जर, जोरू और जमीन शुरू से ही कत्ल की वजह बनते रहे हैं. दोनों ही खूबसूरत लड़की और लड़के की जिंदगी नादानी में उठाए एक कदम से बरबाद हो गई.

Love Crime : महिला को गैस नली लगाकर जला डाला जिंदा

अवैध संबंधों की राह बड़ी ढलवां होती है. दीपा ने इस राह पर एक बार कदम रखा तो वह संभल नहीं सकी. फिर इस का जो नतीजा निकला, वह बड़ा ही भयावह था. टना 18 मई, 2018 की है. माधव नगर थाने के थानाप्रभारी गगन बादल अपने औफिस में बैठे विभागीय कार्य निपटा रहे थे तभी उन्हें सूचना मिली कि थाना क्षेत्र के वल्लभ नगर में मां बादेश्वरी मंदिर के सामने रहने वाली दीपा वर्मा के घर से बड़ी मात्रा में धुआं निकल रहा है. शायद वहां आग लग गई है. यह थाना मध्य प्रदेश के जिला उज्जैन के अंतर्गत आता है

थानाप्रभारी ने यह जानकारी दमकल विभाग के अलावा एसपी सचिन अतुलकर को भी दे दी. इस के बाद वह खुद सूचना में बताए गए पते की तरफ रवाना हो गए. जब तक वह मौके पर पहुंचे, तब तक दमकल विभाग की गाड़ी भी वहां पहुंच चुकी थी. पता चला कि दीपा वर्मा के घर में आग लगी थी. इस से पहले कि आग भयावक रूप लेती, दमकलकर्मी वहां पहुंच गए थे. उन्होंने कुछ देर में आग बुझा दी. आग बुझने के बाद दमकल कर्मियों के साथ थानाप्रभारी जब उस मकान के अंदर पहुंचे तो किचिन में लिहाफ गद्दे वगैरह पड़े मिले. वह अधजले थे. उन कपड़ों से धुआं उठ रहा था

दमकलकर्मियों ने उन अधजले लिहाफगद्दों को हटाया तो वहां का नजारा देख कर पुलिस चौंक गई. क्योंकि उन लिहाफगद्दों के नीचे एक महिला का शव औंधे मुंह पड़ा हुआ था. उस की दोनों कलाइयों की नशें भी कटी हुई थीं. साथ ही उस की गरदन पर धारदार हथियार का घाव थामकान मालिक ने मृतका की पहचान 35 वर्षीय दीपा वर्मा के रूप में की. उस ने बताया कि यह 5 महीने से अशोक वर्मा के साथ इस मकान में रह रही थी. अशोक के अलावा इस के पास और भी कई युवक आते थे. कुछ ही देर में एसपी सचिन अतुलकर और एफएसल अधिकारी डा. प्रीति भी टीम के साथ मौके पर पहुंच गईं

पुलिस ने जब जांच की तो बेडरूम में खून के धब्बों के अलावा सामान भी अस्तव्यस्त मिला. बेडरूम का दरवाजा भी टूटा हुआ था. इस से यह अनुमान लगाया कि घटना से पहले दीपा और हमलावर के बीच संघर्ष हुआ होगा. इस के बाद उस की हत्या कर लाश किचिन में ले जा कर जलाने की कोशिश कीलाश को जलाने का तरीका भी अनोखा था. हत्यारे ने दीपा वर्मा की हत्या के बाद एलपीजी गैस सिलेंडर की नली चूल्हे से निकालने के बाद उसे दीपा वर्मा की जांघों के बीच डाल कर ऊपर से लिहाफगद्दे डाल दिए. फिर रैग्युलेटर से गैस औन कर के आग लगाई थी.

इस से इस बात की आशंका को बल मिला कि हत्या का मामला अवैध संबंधों से जुड़ा हो सकता है. दीपा वर्मा की हत्या की सूचना पा कर भैरवगढ़ में जेल रोड की ज्ञान टेकरी पर रहने वाला दीपा का भाई भी मौके पर पहुंच गया. उस ने दीपा के साथ लिवइन रिलेशन में रहने वाले अशोक शर्मा पर उस की हत्या का आरोप लगाया. उस का कहना था कि दीपा पिछले 8 सालों से अशोक के साथ रह रही थी. पुलिस ने दीपा के भाई की तहरीर पर हत्या का मामला दर्ज कर लिया. पुलिस ने जरूरी काररवाई कर के दीपा की लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी.

पुलिस ने दीपा के साथ लिवइन रिलेशन में रहने वाले अशोक के बारे में जानकारी हासिल की. पता चला कि अशोक पहले से शादीशुदा है. उस की ब्याहता गांव में रहती है. वह दीपा के पास 1-2 दिन में चक्कर लगाता था. उधर 3 डाक्टरों के पैनल ने दीपा का पोस्टमार्टम किया जिस में चौंकाने वाली बात यह सामने आई कि दीपा को जिंदा ही जलाया गया था. मरने से पहले दीपा के साथ बलात्कार किया गया था या नहीं इस की जांच के लिए उस की स्लाइड बना कर सागर जिले की लैबोरेटरी भेज दीमामला गंभीर था इसलिए एसपी सचिन अतुलकर ने थाना माधव नगर के थानाप्रभारी गगन बादल के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई. एसआई बी.एस. मंडलोई, संजय राजपूत आदि के साथ साइबर सेल प्रभारी इंसपेक्टर दीपिका शिंदे और संतोष राव को उन की टीम में शामिल किया गया

इंसपेक्टर शिंदे ने सब से पहले अशोक को पूछताछ के लिए बुलाया. अशोक ने बताया कि वह पिछले 8 सालों से दीपा के संपर्क में था. इसलिए वह अब उसे क्यों मारेगा. साथ ही उस ने बताया कि मेरी गैरमौजूदगी में दीपा दूसरे कई युवकों को अपने पास बुलाती और उन के साथ मौजमस्ती करती थी. उस ने उसे कई बार समझाया लेकिन दीपा ने अपनी आदत नहीं बदली थी. अशोक ने दीपा के पे्रमियों के नाम भी पुलिस को बता दिए. उन में 2 को पुलिस ने पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया. उन दोनों से पूछताछ में दीपा के एक और प्रेमी धर्मेंद्र गहलोत का नाम सामने आया. धर्मेंद्र देवास रोड पर रहता था. इंसपेक्टर दीपिका शिंदे और थानाप्रभारी गगन बादल दोनों टीम के साथ धर्मेंद्र के घर जा धमके

संयोग से धर्मेंद्र घर पर ही मौजूद था. उस के दोनों हाथ की अंगुलियों में ताजे घाव थे. इंसपेक्टर शिंदे उस की चोट देखते ही समझ गईं कि दीपा वर्मा का कातिल उन के हाथ लग चुका है. इसलिए उन्होंने उस से सीधे सवाल किया, ‘‘दीपा को तूने क्यों मारा.’’

धर्मेंद्र को ऐसी उम्मीद नहीं थी कि पुलिस इतनी जल्दी उस तक पहुंच जाएगी. इंसपेक्टर शिंदे का सवाल सुन कर वह हतप्रभ सा रह गया. वह इधरउधर की बातें करने लगा. तभी पुलिस ने उस के घर की तलाशी ली तो घर में छिपा कर रखे खून सने कपड़े और दीपा के दोनों मोबाइल फोन मिल गए. इस के बाद धर्मेंद्र के पास छिपाने के लिए कुछ भी नहीं बचा था. सो उस ने चुपचाप अपना जुर्म कबूल कर लिया.

उस से पूछताछ के बाद दीपा वर्मा की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार निकली

दीपा वर्मा का परिवार उज्जैन का रहने वाला था. भैरवगढ़ इलाके में जेल रोड की ज्ञान टेकरी पर दीपा की मां अपने 2 बेटों के साथ रहती थी. दीपा बेहद खूबसूरत और चंचल स्वभाव की थी. उस के इस स्वभाव को निमंत्रण समझ कर मोहल्ले के युवक उस की गली के चक्कर लगाने लगे थे. बेटी के पैर बहक जाएं, इसलिए महज 14 साल की उम्र में उस के पिता ने दीपा की शादी देवास के जलाल खेड़ी में रहने वाले राकेश वर्मा के साथ कर दी थी. इस तरह खेलनेकूदने की उम्र में ही दीपा पति के साथ वयस्कों की दुनिया देख चुकी थीपति राकेश उस की सुंदरता का कायल था. उम्र बढ़ने के साथ दीपा ने जब जवानी में कदम रखा तो उस की शारीरिक जरूरतें पहले से ज्यादा बढ़ गईं. लेकिन अब तक राकेश वर्मा को घरपरिवार की चिंता सताने लगी थी. इसलिए राकेश रोजीरोटी के चक्कर में यहांवहां भटकने लगा था, इस से परेशान हो कर दीपा ने इधरउधर ताकाझांकी शुरू कर दी

राकेश को जब पता चला तो वह शराब पी कर उस के साथ मारपीट करने लगा. पति की ज्यादती से दीपा बहुत परेशान हो गई थी. शादी के 10 साल बाद 24 साल की दीपा गुस्से में पति को छोड़ कर मायके में कर रहने लगीअपना गुजारा करने के लिए उस ने फ्रीगंज इलाके में फाल, पीको की दुकान कर ली. मायके में कर कुछ समय तक तो दीपा की जिंदगी आराम से कटी लेकिन फिर उसे अपनी शारीरिक जरूरतें महसूस होने लगींयूं तो दीपा चाहती तो उस के बचपन के दीवाने अब भी मोहल्ले में मौजूद थे, जो उसे अभी भी ललचाई नजरों से घूरते रहते थे. लेकिन दीपा अब बच्ची नहीं थी. उस की आंखों को अब ऐसे मर्द की तलाश थी, जो उस की दैहिक के अलावा दूसरी तमाम जरूरतें भी पूरी कर सके.

एक दिन उस की मुलाकात अशोक से हुई तो दीपा ने अशोक के लिए अपने दिल की लगाम ढीली छोड़ दी. राजनीति में दखल रखने वाला अशोक वर्मा शादीशुदा और एक बच्चे का पिता था. लेकिन उस के पास इतना पैसा था कि वह दीपा की जिंदगी भर तमाम जरूरतें पूरी कर सकता था. दीपा का रूप उस के दिल को भा चुका था. इसलिए दीपा को राजी देख उस ने उस के सामने साथ रहने का प्रस्ताव रखा, जिसे दीपा ने तुरंत स्वीकार कर लियातब अशोक ने दीपा को किराए का मकान दिला कर घर की तमाम जरूरतें भी पूरी कर दीं. जिस के बाद दीपा अशोक के साथ बिना शादी किए ही पत्नी की तरह रहने लगी. यह करीब 8 साल पहले की बात है

अशोक राजनीति में भी दखल रखता था. उस के पास पैसा भी खूब था, इसलिए दीपा को काम करने की जरूरत नहीं रह गई थी. फिर भी समय काटने के लिए उस ने फाल लगाने और पीको करने का काम बंद नहीं किया था. लेकिन ऐसे मामले में वही हुआ जो होता हैदीपा के साथ 4-5 साल गुजारने के बाद अशोक का मन उस से भर गया. हालांकि वह अपने वादे से तो नहीं मुकरा, वह दीपा की हर आर्थिक जरूरत पूरी करता रहा. पर दीपा के पास उस का आनाजाना जरूर कम हो गया. अब वह 1-2 दिन बाद दीपा के पास आता. लेकिन दीपा जिस मिट्टी से बनी थी उस के चलते उसे रोजाना पुरुष संग की जरूरत थी. इसलिए अशोक की गैरमौजूदगी का फायदा उठा कर उस ने कई दूसरे युवकों से दोस्ती कर ली. वह उन्हें रात के अंधेरे में अपने घर बुलाने लगी. लेकिन ऐसी बातें छिपती कहां हैं

यानी अशोक को यह बात पता चल गई. अशोक ने उसे बहुत समझाया, पर उस ने अपनी आदत नहीं बदली. अशोक की गैरमौजूदगी में दूसरे युवक दीपा के घर में कर रात गुजारने लगे. अशोक तो दीपा का दीवाना था इसलिए उस के बदचलन होने के बावजूद भी उस ने दीपा का साथ नहीं छोड़ा. जिस मकान में दीपा की हत्या हुई वह मकान इसी साल जनवरी के महीने में अशोक ने ही किराए पर ले कर उसे रहने के लिए दिया था. कोई 3 साल पहले धर्मेंद्र की पत्नी दीपा की दुकान पर अपनी साड़ी पर फाल लगवाने के लिए साड़ी दे कर चली गई थी. बाद में धर्मेंद्र दीपा की दुकान पर वह साड़ी लेने गया था. तभी दीपा से उस की पहली मुलाकात हुई थीवैसे दीपा धर्मेंद्र से उम्र में काफी बड़ी थी. लेकिन उस की खूबसूरती देख कर धर्मेंद्र का मन पागल हो गया. इसलिए उस के हाथ से साड़ी लेते समय उस ने जानबूझ कर उस की अंगुलियों को छू दिया

ऐसा कर के धर्मेंद्र को इस बात का डर था कि कहीं वह बुरा मान जाए. लेकिन दीपा काफी बोल्ड थी. उस ने सीधे कहा, ‘‘बड़े हिम्मत वाले हो जो पहली ही मुलाकात में अंगुली पकड़ रहे हो. इस बार अंगुली पकड़ी है तो लगता है अगली बार सीधे पहुंचा पकड़ोगे.’’ 

यह सुन कर धर्मेंद्र झेंप गया तो वह जोर से हंस दी. जिस के बाद दोनों की दोस्ती हो गई और फोन पर बातें होने लगीं. धर्मेंद्र दीपा से मिलना चाहता था. लेकिन उस से कहने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था. 10-15 दिन बाद एक रोज खुद दीपा ने ही कहा कि कब तक फोन पर बातें कर के आग भड़काते रहोगे, मिलोगे नहीं क्या?

‘‘मिलना तो चाहता हूं पर कहां मिलूं. यह बात समझ में नहीं रही है. अच्छा तुम एक काम करो, कल महाकाल मंदिर जाओ, वहीं मिलते हैं.’’ धर्मेंद्र बोला.

‘‘क्यों, मेरे साथ वहां क्या भजन करना है, जो मंदिर में बुला रहे हो. तुम सीधे मेरे घर जाओ, वहीं घंटा बजाएंगे.’’ कहते हुए दीपा ने अपने घर का पता बता दिया

उसी दिन शाम को धर्मेंद्र दीपा के किराए वाले मकान में पहुंच गया. दोनों ने एकांत का लाभ उठाते हुए अपनी हसरतें पूरी कीं. जल्द ही दीपा ने धर्मेंद्र को अपनी अदाओं से वश में कर लियाइस के बाद धर्मेंद्र उस पर काफी पैसे भी लुटाने लगा था. दीपा से मिलनेजुलने में दिक्कत हो इसलिए धर्मेंद्र ने उस के पति अशोक से भी दोस्ती बना ली थी. जब मन होता दोनों शराब और चिकन की पार्टी भी करते. लेकिन कुछ समय बाद ही धर्मेंद्र को पता चल गया कि अशोक दीपा का पति नहीं है, बल्कि वह उस के साथ रखैल बन कर रह रही है. इतना ही नहीं दूसरे और युवकों के साथ भी दीपा के संबंध होने की जानकारी धर्मेंद्र को लग गई. यहां तक कि धर्मेंद्र जिन दोस्तों को दीपा के यहां ले गया था, उन के साथ भी दीपा ने अवैध संबंध बना लिए थे

धर्मेंद्र ने दीपा को समझाया कि वह ऐसा करे लेकिन उस ने उलटे धर्मेंद्र से ही मिलना बंद कर दिया. धर्मेंद्र उस से मिलने की चाहत व्यक्त करता तो वह किसी किसी बहाने से उसे टाल देती थी. धर्मेंद्र की पत्नी को भी यह जानकारी मिल गई कि उस का पति दीपा नाम की किसी महिला के पास जाता है. धर्मेंद्र पत्नी से लगातार झूठ बोलता रहा. जब उस ने दीपा से मिलना नहीं छोड़ा तो वह उस से झगड़ने लगीएक दिन धर्मेंद्र दीपा के पास गया तो वहां पर उस के 2 दोस्त कुक्कू और रवि मिले. दीपा ने उस दिन धर्मेंद्र को घर से बाहर निकाल कर दरवाजा बंद कर दिया था.

धर्मेंद्र अपने घर वापस गया लेकिन उस की नजरों के सामने दीपा की कुक्कू और रवि के साथ अय्याशी की तसवीरें किसी फिल्म की तरह चलती रहीं. इसलिए सुबह होते ही वह फिर से दीपा के घर पहुंचा. उस समय दीपा अकेली थीकुक्कू और रवि के साथ मस्ती करने के फेर में रात भर शायद वह सोई नहीं थी. इसलिए अपनी नींद में खलल पड़ने से वह धर्मेंद्र पर नाराज होते हुए को उलटासीधा बोलने लगी. यह देख कर धर्मेंद्र का खून खौल उठा और उस ने दीपा की पिटाई की. गुस्से में उस ने उस की दोनों कलाइयों की नसें भी काट दीं, जिस से कमरे में खून फैल गया और वह बेहोश हो गई. अब वह उसे जीवित नहीं छोड़ना चाहता था.

लिहाजा वह उसे खींच कर रसोई में ले गया और उस की सलवार निकाल कर उस ने एलपीजी सिलेंडर का पाइप गैस चूल्हे से निकाल कर उस की दोनों जांघों के बीच फंसा कर ऊपर से लिहाफ, दरी, गद्दा डाल कर रैग्युलेटर से गैस चालू कर दी, फिर आग लगा कर वह वहां से चला गया. उस ने सोचा कि सिलेंडर फटने के बाद लोग इसे दुर्घटना समझेंगे और वह बच जाएगा. लेकिन जब मकान में धुआं निकलना शुरू ही हुआ था, तभी पड़ोसी राकेश वर्मा ने इस की सूचना पुलिस को दे दी. धर्मेंद्र से पूछताछ के बाद पुलिस ने उसे न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया. बैडरूम का दरवाजा कैसे टूटा, यह बात पुलिस पता नहीं लगा सकी

उज्जैन के आईजी राकेश गुप्ता ने केस का खुलासा करने वाली पुलिस टीम के कार्य की सराहना करते हुए पुरस्कृत करने की घोषणा की.

   (कथा में कुछ नाम परिवर्तित हैं)

Love Crime : विवाहिता के प्यार में 4 हत्याएं

सरकारी टीचर सुनील गौतम अपनी पत्नी पूनम भारती और 2 बेटियों के साथ अमेठी में रहता था. वह अपने काम से काम रखता था. फिर एक दिन किसी ने सुनील, उस की पत्नी और दोनों बेटियों को घर में घुस कर गोलियों से भून डाला. आखिर कौन था हत्यारा और क्यों की उस ने ये हत्याएं?

चंदन वर्मा ने 12 सितंबर, 2024 को अपने वाट्सऐप पर लिखा, ‘5 लोग मरने वाले हैं. मैं जल्दी कर के दिखाऊंगा (5 people are going to die. I will show you soon.)उस का इशारा अपनी प्रेमिका पूनम व उस के परिवार, स्वयं और पूनम के भाई सोनू की तरफ था. चंदन वर्मा ने इस के लिए अवैध पिस्टल का इंतजाम तो कर लिया था, लेकिन गोलियों का इंतजाम नहीं हो पा रहा था. इस के लिए उस ने जानपहचान के अपराधियों से संपर्क किया और 10 राउंड गोलियों वाली मैगजीन मुंहमांगी कीमत पर खरीद कर रख ली, लेकिन यह इंतजाम करने में उसे 15 दिन का समय लग गया था. 

3 अक्तूबर, 2024 को नवरात्रि का प्रथम दिन था. जगहजगह पंडाल सजे थे. चंदन वर्मा पिस्टल में मैगजीन लोड कर शाम करीब साढ़े 6 बजे बाइक से अमेठी के मंदिर रोड अहोरवा चौराहा स्थित मुन्ना अवस्थी के मकान पर पहुंचा. इसी मकान में पूनम अपने पति सुनील व 2 बच्चों के साथ किराए पर रहती थी. चंदन वर्मा ने घर से करीब 50 मीटर दूर स्थित दीपक की मोबाइल शाप के सामने अपनी बाइक खड़ी कर दी. उस ने दीपक से कहा कि वह मंदिर दर्शन करने जा रहा है. जल्दी ही वापस आ जाएगा. 

इस के बाद वह पूनम के घर पहुंचा. पूनम उस समय घर पर ही थी. वह पति व बच्चों से बतिया रही थी. चंदन वर्मा को देख कर पूनम व सुनील सहम गए. चंदन वर्मा ने जेब से 10-10 के 2 नोट निकाले. उस ने एक नोट सुनील की बेटी 5 वर्षीया सृष्टि के हाथ में तथा दूसरा नोट 2 वर्षीया समीक्षा के हाथ में थमा दिया. इस के बाद वह पूनम की तरफ मुखातिब होते हुए बोला, ”पूनम, तुम मेरे साथ चलो. तुम्हारे बिना मैं जी नहीं पाऊंगा.’’

यह सुनते ही पूनम बोली, ”तुम पागल हो गए हो क्या? मैं अपने पति व बच्चों को छोड़ कर भला कैसे जा सकती हूं. तुम ने तो मेरा जीना हराम कर दिया है. चले जाओ यहां से वरना मैं पुलिस बुला लूंगी.’’

पूनम की धमकी सुन कर चंदन का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया. उस ने लोडेड पिस्टल निकाली और 2 गोलियां पूनम के सीने में दाग दीं. सुनील सामने आया तो उस पर भी 3 गोलियां दाग दीं. इस के बाद उस ने सृष्टि और मासूम समीक्षा पर भी एकएक गोली चला दी. सभी खून से लथपथ हो कर जमीन पर बिछ गए. कुछ क्षण बाद ही सभी ने दम तोड़ दिया. चारों को मौत के घाट उतारने के बाद चंदन वर्मा ने सुसाइड करने के लिए खुद को गोली मारनी चाही. लेकिन पिस्टल की स्प्रिंग निकल कर गिर गई, जिस से गोली नहीं चली. इस के बाद वह डर गया और बाइक मोबाइल की दुकान पर ही छोड़ कर घर के पीछे के रास्ते से फरार हो गया.

अवस्थी निवास में ही रोड पर अमित मैडिकल स्टोर था. इस के संचालक रामनारायन यादव ने जब लगातार गोलियों के चलने की आवाज सुनी तो वह घबरा गए. लगभग 100 मीटर की दूरी पर देवी पंडाल सजा था. वहां पुलिस तैनात थी. रामनारायन पुलिस के पास तेज कदमों से पहुंचे और गोलियां चलने की जानकारी दी. यह खबर सुन कर 2 सिपाही मकान के अंदर दाखिल हुए तो वहां 4 लाशें बिछी देख कर उन्होंने पुलिस कंट्रोल रूम को सूचना दे दी.  4 हत्याओं की सूचना मिलते ही अमेठी के शिवरतनगंज थाने की पुलिस अधिकारियों के होश उड़ गए. कुछ देर बाद ही अमेठी के एसपी अनूप कुमार सिंह, एएसपी हरेंद्र सिंह तथा डीएम निशा अनंत घटनास्थल पहुंच गईं. शिवरतनगंज थाने की पुलिस पहले से ही वहां मौजूद थी. सूचना पर मीडियाकर्मियों का भी जमावड़ा लग गया. 

पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का निरीक्षण किया तो उन के माथे पर बल पड़ गए और वे सिहर उठे. घर के अंदर 4 लाशें खून से लथपथ पड़ी थीं. अधिकारियों ने जानकारी जुटाई तो पता चला कि इस मकान में शिक्षक सुनील कुमार गौतम अपनी पत्नी पूनम व 2 बेटियों के साथ किराए पर रहते थे. इन्हीं की गोली मार कर हत्या की गई थी. 

सुनील कुमार व उन की पत्नी पूनम के शव नल के पास पड़े थे, जबकि दोनों बेटियों के शव जीने के पास पड़े थे. मृतक सुनील की उम्र 34 वर्ष के आसपास तथा पूनम की उम्र 30 वर्ष के आसपास थी. उन की बेटियों की उम्र क्रमश: 5 वर्ष और 2 वर्ष थी. निरीक्षण के बाद पुलिस अधिकारियों ने वारदात की सूचना मृतकों के घर वालों को दे दी. 

मुख्यमंत्री योगी क्यों हुए सक्रिय

इसी बीच प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को दलित परिवार की हत्या की जानकारी हुई तो उन्होंने शोक संवेदना प्रकट की और पुलिस के आला अधिकारियों को तत्काल घटनास्थल पर पहुंचने का आदेश दिया. आदेश पाते ही आईजी (अयोध्या जोन) प्रवीण कुमार तथा एडीजी (लखनऊ जोन) एस.वी. शिरोडकर घटनास्थल (अमेठी) पहुंच गए. उन्होंने घटनास्थल का निरीक्षण किया और घटना के संबंध में एसपी अनूप कुमार सिंह से जानकारी हासिल की. 

उन्होंने निरीक्षण और साक्ष्य जुटाने में जुटी फोरैंसिक टीम से भी जानकारी ली. घटनास्थल से टीम ने कारतूस के 9 खोखे, एक जिंदा कारतूस तथा बाइक बरामद की. अब तक सूचना पा कर मृतक सुनील के पिता रामगोपाल गौतम घटनास्थल पर आ चुके थे. बेटाबहू व नातिनों के शवों को देख कर वह बदहवास हो गए. पूछताछ में रामगोपाल ने पुलिस अधिकारियों को बताया कि इस घटना को अंजाम उस के बेटे सुनील के दोस्त चंदन वर्मा ने दिया है, जो रायबरेली के मटिया इलाके में रहता है.

घटनास्थल की जांच और पूछताछ के बाद पुलिस अधिकारियों ने चारों शवों को पोस्टमार्टम हेतु अमेठी के जिला अस्पताल भिजवा दिया. इस के बाद रामगोपाल की तहरीर पर शिवरतनगंज थाने में बीएनएस की धारा 103 (1) के तहत चंदन वर्मा के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा दी. चूंकि मामला दलित परिवार की सामूहिक हत्या का था, अत: पुलिस अधिकारियों ने चंदन वर्मा को गिरफ्तार करने के लिए एसटीएफ की 4 टीमें लगा दीं. ये टीमें आरोपी की टोह में लग गईं. 

पुलिस ने रात में ही चारों शवों का पोस्टमार्टम करा दिया. सीएमओ अंशुमान सिंह की देखरेख में डा. विवेक चौधरी व डा. अभय गोयल की टीम ने पोस्टमार्टम किया. पूनम को 2, सुनील को 3 तथा बेटियों को 1-1 गोली मारी गई थी. पोस्टमार्टम के बाद शव सुनील के पिता रामगोपाल को सौंप दिए गए. 4 अक्तूबर, 2024 की सुबह पुलिस सुरक्षा में चारों शव मृतक शिक्षक सुनील के पैतृक गांव सुदामापुर (रायबरेली) पहुंचे तो गांव मेें कोहराम मच गया. पूरा गांव शवों को देखने उमड़ पड़ा. शवों को देख कर सुनील की मां राजवती तथा पूनम की मां कृष्णावती बदहवास हो गईं. पूजा व सोनू भी बहनबहनोई का शव देख कर बिलख पड़ी थीं. भीड़ में गम व रोष था. वहां पुलिस विरोधी नारे भी गूंजने लगे थे. 

राजनीतिक लाभ पाने की क्यों मची होड़

इस घटना को ले कर राजनीतिक गलियारे में भी भूचाल आ गया था. सब से पहले अमेठी के सांसद किशोरी लाल शर्मा सुदामापुर गांव पहुंचे. उन्होंने मृतक के पिता रामगोपाल को धैर्य बंधाया और राहुल गांधी से उन की मोबाइल पर बात कराई. राहुल गांधी ने कानूनव्यवस्था पर सवाल उठाते हुए रामगोपाल को हरसंभव मदद का आश्वासन दिया. भाजपा के राज्यमंत्री मयंकेश्वर शरण तथा ऊंचाहार के विधायक मनोज पांडेय भी सुदामापुर गांव पहुंचे. उन्होंने पीडि़त परिवार को हरसंभव मदद का भरोसा दिया. यही नहीं, इन दोनो नेताओं ने अंतिम संस्कार के बाद पीडि़त परिवार की मुलाकात लखनऊ ले जा कर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से कराई. 

रामगोपाल गौतम ने मुख्यमंत्री सेे आर्थिक मदद, आवास व बड़े बेटे को सरकारी नौकरी दिलाने की मांग की. मुख्यमंत्री ने सभी मांगों को पूर्ण करने का आश्वासन दिया. इधर एसटीएफ की एक टीम को पता चला कि आरोपी चंदन वर्मा प्रयागराज में है. अत: एसटीएफ की टीम प्रयागराज पहुंच गई. लेकिन वहां पता चला कि वह बस से दिल्ली की ओर रवाना हो चुका है. सर्विलांस के जरिए एसटीएफ की टीम ने उस का पीछा किया और 4 अक्तूबर की अपराह्नï पौने 3 बजे उसे नोएडा के जेवर टोल प्लाजा से गिरफ्तार कर लिया. रात 11 बजे अमेठी के एसपी अनूप सिंह ने प्रैसवार्ता की और इस चौहरे हत्याकांड का खुलासा कर दिया.

5 अक्तूबर, 2024 की सुबहसुबह पुलिस टीम आरोपी चंदन वर्मा को ले कर हत्या में इस्तेमाल पिस्टल बरामद कराने को ले जा रही थी. इस दौरान मोहनगंज थाना क्षेत्र के पियरे विंध्या दीवान नहर पटरी पर पहुंचने पर चंदन वर्मा ने फुरती से थानेदार मदन वर्मा की रिवौल्वर छीन ली और फायर करते हुए भागने की कोशिश करने लगा. पुलिस की जवाबी फायरिंग में उस के पैर में गोली लगी. वह घायल हो गया. पुलिस ने उसे सीएचसी सिंहपुर में भरती कराया. इस मामले की रिपोर्ट थानेदार मदन वर्मा ने थाना मोहनगंज में बीएनएस की धारा 109 के तहत चंदन वर्मा के खिलाफ दर्ज कराई. 

6 अक्तूबर, 2024 की शाम ऊंचाहार क्षेत्र के विधायक मनोज पांडेय, प्रभारी मंत्री राकेश सचान के साथ सुदामापुर गांव पहुंचे. वहां उन्होंने मृतक शिक्षक सुनील कुमार के पिता रामगोपाल गौतम व मां राजवती से मुलाकात की. उन्होंने उन्हें 5 लाख रुपए का चैक दिया. उन्होंने मुख्यमंत्री आवास योजना के तहत एक आवास, 5 बीघा कृषि भूमि का पट्टा आवंटन तथा परिजनों को आयुष्मान व अंत्योदय कार्ड दिए. इस के अलावा अत्याचार से उत्पीडि़त राशि 33 लाख रुपए का चैक भी सौंपा. साथ ही मृतक के भाई को मृतक आश्रित कोटे से सरकारी नौकरी दिलाने का आश्वासन दिया. 

आरोपी चंदन वर्मा से पूछताछ करने के बाद इस चौहरे हत्याकांड के पीछे की जो कहानी सामने आई, वह बहुत हैरान कर देने वाली निकली.

हंसमुख स्वभाव की पूनम ने संभाली घर की जिम्मेदारी

सुनील कुमार के पिता राम गोपाल गौतम उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले के सुदामापुर गांव के रहने वाले थे. उन के परिवार में पत्नी राजवती के अलावा 2 बेटे सोनू, सुनील व एक बेटी रूपा थी. राम गोपाल गरीब किसान थे. उन के पास मात्र एक बीघा जमीन थी. इस कम उपजाऊ भूमि से उन के परिवार का भरणपोषण नहीं हो पाता था. अत: वह मेहनतमजदूरी कर किसी तरह परिवार का गुजारा करते थे. रामगोपाल गौतम के दोनों बेटे सोनू व सुनील जब बड़े हुए तो वह भी पिता के साथ मेहनत मजदूरी करने लगे. रामगोपाल अपने बेटों को अच्छे स्कूल में नहीं पढ़ा सके. बड़ा बेटा सोनू तो पढऩे में कमजोर था, लेकिन छोटा बेटा सुनील पढऩे में तेज था. वह मेहनतमजदूरी के साथ पढ़ाई भी करता था. 

चूंकि गांव में मजदूरी कम मिलती थी, इसलिए सोनू का मन गांव में नहीं लगता था. गांव के कुछ लड़के मुंबई में काम करते थे. सोनू भी उन्हीं के साथ मुंबई चला गया और वहीं काम करने लगा. अब वह गांव में तीजत्यौहारों पर ही आता और कुछ दिन तक रुक कर वापस चला जाता था. सुनील पहले बीए करने के बाद सरकारी नौकरी पाने की कोशिश में जुट गया था. अब तक रामगोपाल बड़े बेटे सोनू व बेटी रूपा की शादी कर चुके थे. सब से छोटा सुनील था. वह 20 वर्ष की उम्र पार कर चुका था. अत: रामगोपाल उस की शादी करना चाहते थे. 

एक रोज कृष्णावती अपनी बेटी पूनम भारती का रिश्ता लेकर रामगोपाल के घर आई. कृष्णावती रायबरेली के उत्तर पारा बेला भेला गांव की रहने वाली थी. परिवार में पति राजाराम भारती के अलावा 2 बेटे मोनू व भानू के अलावा 2 बेटियां पूजा व पूनम थीं. बड़ी बेटी पूजा की शादी हो चुुकी थी. छोटी बेटी पूनम थी. वह पढ़ीलिखी व दिखने में सुंदर थी. कृष्णावती ने सुनील को देखा तो उस ने अपनी बेटी पूनम भारती के लिए उसे पसंद कर लिया. उस के बाद पूनम और सुनील ने भी एकदूसरे को देखा और फिर दोनों शादी के लिए राजी हो गए. दोनों परिवारों की रजामंदी के बाद कृष्णावती ने 12 अप्रैल, 2016 को पूनम का विवाह सुनील कुमार के साथ कर दिया. 

वर्ष 2018 में उत्तर प्रदेश सरकार ने 41,250 पदों पर पुलिस भरती निकाली. सुनील ने भी सिपाही पद पर भरती के लिए आवेदन किया. इस के बाद वह जीजान से तैयारी में जुट गया. सुनील की मेहनत रंग लाई. उस का चयन सिपाही पद पर हो गया था. ट्रेनिंग के बाद उसे नियुक्ति मिल गई. इन्हीं दिनों उसे एक और खुशी मिली. पूनम ने एक बेटी को जन्म दिया, जिस का नाम उस ने सृष्टि रखा. सृष्टि के जन्म से उस का घरआंगन किलकारियों से गूंजने लगा था. उस के मातापिता भी खुश थे. 

सुनील पुलिस में भरती तो हो गया था, लेकिन उसे वह नौकरी रास नहीं आ रही थी. क्योंकि एक तो वह परिवार को ज्यादा समय नहीं दे पा रहा था और दूसरे उसे पुलिसिया भाषा अच्छी नहीं लगती थी. पुलिस की नौकरी से मन हटा तो वह शिक्षा विभाग में नौकरी खोजने लगा. बीएड तो वह कर ही चुका था, फिर उस ने बीए शिक्षक पात्रता परीक्षा भी पास कर ली. जब शिक्षक की वैकेंसी निकली तो उस ने भी आवेदन कर दिया. 

शहर जा कर क्यों उडऩे लगी पूनम भारती

10 दिसंबर, 2020 को सुनील कुमार की बेसिक शिक्षा विभाग में शिक्षक की नौकरी लग गई. उस की पहली तैनाती रायबरेली में बेसिक शिक्षा अधिकारी के कार्यालय में हुई. शिक्षा विभाग में नौकरी पाने के बाद सुनील ने सिपाही पद से इस्तीफा दे दिया. शिक्षा विभाग में नौकरी मिलने पर घर में एक बार फिर खुशी की लहर दौड़ गई. सुनील कुमार का गांव सुदामापुर, रायबरेली से 35 किलोमीटर दूर था. नौकरी के लिए उसे रोजाना अपडाउन करना पड़ता था. इस में पैसा तो खर्च होता ही था, समय की बरबादी भी होती थी. इसलिए उस ने रायबरेली के मटिया इलाके में 2 कमरे वाला मकान किराए पर लिया और पत्नी पूनम भारती और बेटी सृष्टि के साथ रहने लगा.

पूनम भारती गांव से शहर आई तो उस के रंगढंग ही बदल गए. वह खूब सजसंवर कर रहने लगी और स्वच्छंद हो कर बाजारहाट घूमने लगी. पति की जिस दिन छुट्टी होती, उस दिन वह बेटी को साथ ले कर पति के साथ सैरसपाटे के लिए निकल जाती. रेस्टोरेंट में खाना खाती. सुनील पत्नी की हर बात मान लेता था. एक तरह से वह सुनील को अपनी अंगुलियों पर नचाने लगी थी. सुनील कुमार गौतम ने मटिया इलाके के जिस मकान में कमरा किराए पर लिया था, उसी मकान के पीछे वाले भाग में चंदन वर्मा नामक युवक किराए पर रहता था. 25-26 वर्षीय चंदन वर्मा मैकेनिकल इंजीनियर था. वह अस्पतालों की एक्सरे, सीटी स्कैन और दूसरी अन्य मशीनों की मरम्मत करता था. इस में उस की अच्छीखासी कमाई हो जाती थी. 

चंदन वर्मा के पिता मायाराम वर्मा मूलरूप से अंबेडकर नगर के टांडा के रहने वाले थे. उस के 7 भाई और थे. मायाराम 1990 के दशक में अपने भाइयों के साथ टांडा छोड़ कर रायबरेली आ गए थे. रायबरेली के तेलिया कोट मोहल्ले में वह भाइयों के साथ अवधेश गुप्ता के मकान में किराए पर रहने लगे थे. साल 2010 में मायाराम वर्मा अपने परिवार के साथ रायबरेली छोड़ कर दिल्ली चले गए, लेकिन उस के अन्य भाई उस के साथ नहीं गए. उन भाइयों ने तेलिया कोट में ही जमीन खरीद कर अपने घर बना लिए. दिल्ली जाने के बाद भाइयों ने मायाराम से दूरियां बना ली. 

लेकिन वर्ष 2019 के नवंबर माह में मायाराम फिर रायबरेली आ गए. इस बार उन्होंने तेलिया कोट के बजाय मटिया इलाके में कमरा किराए पर लिया, जो तेलिया कोट से 2 किलोमीटर दूर था. यहां पर वह अपनी पत्नी व बेटे चंदन के साथ रहने लगा. चूंकि चंदन वर्मा अच्छा कमाता था, अत: उस को कोई चिंता नहीं थी. चूंकि शिक्षक सुनील कुमार गौतम व चंदन वर्मा एक ही मकान में किराएदार थे, अत: उन दोनों के बीच जल्द ही जानपहचान हो गई. धीरेधीरे जानपहचान दोस्ती में बदल गई. सुनील से मिलने के बहाने चंदन वर्मा का पूनम के घर आनाजाना शुरू हो गया. खूबसूरत पूनम पहली ही नजर में चंदन के दिल में रचबस गई थी. नजदीकियां बढ़ाने को वह उस के करीब आने की कोशिश करने लगा था. 

पूनम की बेटी सृष्टि अब तक 2 साल की हो चुकी थी. चंदन वर्मा उसे खिलाने के बहाने अपने साथ ले जाता और खूब लाड़प्यार करता. उसे कभी चौकलेट तो कभी खिलौने ला कर देता. चंदन जब कभी पूनम की गोद से सृष्टि को अपनी गोद में लेता तो जानबूझ कर उस के नाजुक अंगों को छेड़ देता. पूनम तब बनावटी गुस्सा दिखाती फिर हंस कर टाल देती. चंदन पूनम की खूबसूरती की भी खूब तारीफ करता और उसे अपनी लच्छेदार बातों से रिझाने की कोशिश करता. साथ ही वह उस के नजदीक जाने की कोशिश करता. 

घर आतेजाते चंदन वर्मा और पूनम भारती की नजदीकियां बढऩे लगीं. पूनम को भी चंदन के दिल की बात का आभास हो गया था. वह भी उस की ओर आकर्षित होने लगी थी. दोनों के बीच अब हंसीमजाक भी होने लगा था. चंदन ऐसे समय पूनम से मिलने आता था, जब सुनील घर पर नहीं होता था. 

चंदन की बांहों में ऐसे समा गई पूनम

एक दिन चंदन आया तो पूनम सजधज कर बाजार जाने की तैयारी कर रही थी. उस की खूबसूरती देख कर चंदन मचल उठा. उस ने पूनम को बांहों में भर लिया और बोला, ”भाभी, मैं तुम से बेहद प्यार करता हूं. तुम्हारे बिना अब रहा नहीं जाता.’’

चंदन, यह दीवानापन छोड़ो और अब चुपचाप चले जाओ. कहीं मास्टर साहब आ गए तो पता नहीं क्या सोचेंगे.’’ पूनम ने उस की आंखों में झांकते हुए कहा. 

भाभी, मैं चला तो जाऊंगा, लेकिन खाली हाथ नहीं जाऊंगा. आज तो तुम्हारा प्यार ले कर ही जाऊंगा.’’ कहते हुए उस ने पूनम को फिर से बाहों में कैद कर लिया. पूनम ने उस की बांहों से छूटने का बनावटी विरोध किया. उस के बाद स्वयं सहयोग करने लगी. फिर तो उस रोज दोनों के बीच मर्यादा की दीवार ढह गई.

मर्यादा की दीवार टूटी तो पूनम को अपने किए पर पछतावा हुआ था, लेकिन जो नहीं होना चाहिए था, वह हो चुका था. लेकिन पछतावे के बावजूद पूनम के कदम नहीं रुके. जब भी पूनम और चंदन को मौका मिलता, वे सुनील के साथ विश्वासघात करने से नहीं चूकते थे. पूनम और चंदन जो भी करते थे, पूरी चौकसी से करते थे, लेकिन उन के ये संबंध ज्यादा दिनों तक छिपे नहीं रह सके. एक दिन सुनील को पूनम के मोबाइल पर वाट्सऐप चैट दिखी. उसे यकीन हो गया कि दोनों के बीच नाजायज रिश्ता है. उस ने पूनम और चंदन दोनों को समझाया, लेकिन चंदन नहीं माना. वह किसी न किसी बहाने उस के घर आ जाता. 

12 मार्च, 2021 को सुनील कुमार गौतम का तबादला अमेठी हो गया. अमेठी जिले के सिंहपुर ब्लौक के पनहौना प्राथमिक विद्यालय में उसे शिक्षक पद पर तैनाती मिली. दरअसल, सुनील ने अपना परिवार टूटने से बचाने के लिए रायबरेली से दूर अपना ट्रांसफर खुद कराया था, ताकि चंदन वर्मा वहां आजा न सके.  तबादले के बाद सुनील ने रायबरेली वाला कमरा खाली कर दिया और जुलाई, 2024 में अमेठी में मुन्ना अवस्थी के मकान में परिवार के साथ रहने लगा. अमेठी में कुछ माह तो सुकून से बीते, उस के बाद चंदन वर्मा फिर चोरीछिपे वहां आने लगा. पूनम और चंदन के बीच हर रोज मोबाइल फोन पर वीडियो कालिंग के जरिए बात होती. दोनों खूब बतियाते. 

पूनम के प्यार में चंदन वर्मा इतना अंधा हो गया था कि वह पूनम को अपनी पत्नी बनाने का ख्वाब देखने लगा था. वह जो कमाता था, उस का आधा भाग पूनम पर खर्च करता था. उस ने अपने घर के जेवर तक पूनम को दे दिए थे. वह पूनम से कहता भी था कि इस मास्टर को छोड़ दो और उस की बीवी बन जाओ, लेकिन पूनम राजी नहीं होती थी. अप्रैल 2024 में सुनील कुमार ने मकान बनाने के लिए अमेठी में 2 बिस्वा जमीन खरीदी. जमीन की लिखापढ़ी में गवाह की जरूरत थी. पूनम के कहने पर सुनील ने चंदन वर्मा को गवाह बना लिया. इस के बाद चंदन का बेधड़क घर में आनाजाना फिर बढ़ गया. हालांकि चंदन का घर आना सुनील को कांटे की तरह चुभता था. 

सुनील क्यों डरने लगा पत्नी के प्रेमी से

एक रोज सुनील शाम को स्कूल से घर आया तो चंदन घर में मौजूद था. वह पूनम से बतिया रहा था. यह देख कर उस का खून खौल उठा. उस के जाने के बाद सुनील ने पूनम को आड़े हाथों लिया और कहा कि वह चंदन को लिफ्ट न दे. उस से दूरियां बनाए ताकि उस का परिवार न बिखरे. पति की बात मान कर पूनम ने चंदन को लिफ्ट देना बंद कर दिया. वह अब न तो उस से मोबाइल फोन पर बात करती और न ही वीडियो काल पर. इस पर वह घर आ कर पूनम को धमकाता कि वह बात नहीं करेगी तो वह सिर में गोली मार कर आत्महत्या कर लेगा. पूनम तब डर जाती और उस की बात मान लेती. 

अब तक सुनील 2 बेटियों का बाप बन चुका था. बड़ी बेटी सृष्टि 5 साल की थी और छोटी बेटी समीक्षा डेढ़ वर्ष की थी. चंदन वर्मा दबंग था. उस के संबंध अपराधियों से भी थे. शराब पीना तथा दबंगई दिखाना उस का शौक था. वह अपने चाचा के घर तेलिया कोट में भी दबंगई दिखाता था. हालांकि वे लोग चंदन से ज्यादा संपर्क नहीं रखते थे. चंदन पूनम को धमकाता कि मास्टर को छोड़ कर उस से ब्याह रचा ले, अन्यथा तुम्हारे कुछ आपत्तिजनक फोटो मेरे मोबाइल में हैं. मैं उन्हें वायरल कर दूंगा. फिर तुम और मास्टर किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहोगे. 

चंदन वर्मा की धमकी से पूनम और सुुनील डरेसहमे रहने लगे. सुनील ने पूनम से कहा भी कि वह चंदन के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा दे. लेकिन पूनम उस सनकी और दबंग चंदन के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज नहीं करा सकी. 18 अगस्त, 2024 को पूनम की बड़ी बेटी सृष्टि की तबियत खराब थी. वह उसे डाक्टर को दिखाने सुनील के साथ रायबरेली के सुमित्रा हौस्पिटल गई. बेटी को दिखाने के बाद जब वह वापस घर आ रही थी तो रास्ते में उसे चंदन मिल गया. वह पूनम को छेडऩे लगा और साथ चलने का दबाव बनाने लगा. 

सुनील ने विरोध किया तो वह उस से भिड़ गया. पहले उस ने जातिसूचक गालियां बकीं, फिर 4-5 थप्पड़ सुनील के गाल पर जड़ दिए. दोनों को जान से मारने की धमकी भी दी. सुनील के सब्र का बांध अब टूट चुका था, अत: वह पूनम को साथ ले कर सीधा सदर कोतवाली पहुंच गया और पूनम से रिपोर्ट दर्ज कराने को कहा. पूनम अब भी रिपोर्ट दर्ज कराने को राजी नहीं थी, लेकिन पति के कहने पर किसी तरह वह राजी हुई. इस के बाद पूनम ने तहरीर दी. तहरीर के आधार पर कोतवाली पुलिस ने चंदन वर्मा के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 74, 115(2) तथा 352 के तहत रिपोर्ट दर्ज कर ली. 

दूसरे रोज पुलिस ने चंदन वर्मा को गिरफ्तार कर लिया. सप्ताह भर के भीतर ही उस की जमानत हो गई. जमानत पर छूटने के बाद चंदन वर्मा ने फिर नौटंकी शुरू की. उस ने आत्महत्या का प्रयास किया. अस्पताल से छुट्टी मिली तो उस ने पूनम व सुनील से माफी मांग ली और भविष्य में ऐसी गलती न करने का वादा किया. लेकिन वह अपनी जुबान से पलट गया. वह फिर पूनम तक पहुंचने का प्रयास करने लगा. वह पूनम से मोबाइल फोन पर बात करने का प्रयास करता, लेकिन पूनम उस की काल रिसीव ही नहीं करती. इस से उस का गुस्सा बढ़ गया. 

उस ने पूनम की उस के साथ खिंची आपत्तिजनक तसवीरें उस के मायके वालों तथा ससुराल वालों को भेज दीं. यही नहीं, उस ने पूनम की मां कृष्णावती व भाई सोनू को भी धमकाया कि वे पूनम को समझा दें. वह उस की बन जाए, अन्यथा अंजाम बुरा होगा. पूनम की बेरुखी से चंदन वर्मा को गहरा आघात पहुंचा था. वह समझ गया था कि पूनम उस के हाथ से फिसल गई है. उस का दिन का चैन और रात की नींद हराम हो गई थी. आखिर उस ने फैसला किया कि वह पूनम व उस के परिवार को मिटा देगा. इस के लिए वह योजना बनाने लगा. अपनी योजना उस ने किसी अन्य के साथ साझा नहीं की. 

फिर 12 सितंबर, 2024 को उस ने न सिर्फ पूनम बल्कि उस के पति सुनील और दोनों बच्चों की गोली मार कर हत्या कर दी. 5 अक्तूबर, 2024 को उपचार के बाद पुलिस ने चंदन वर्मा से विस्तार से पूछताछ करने के बाद उसे जिला सत्र न्यायाधीश के आवास पर पेश किया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया गया.  दरअसल, उसे न्यायाधीश के समक्ष कोर्ट में पुलिस को पेश करना था, लेकिन कोर्ट में जनता व वकीलों में भारी रोष था. अनहोनी की आशंका को देखते हुए पुलिस को अपनी रणनीति बदलनी पड़ी.

 

 

शारीरिक संबंध बनाने के बाद की बेटी से शादी

देश ही नहीं विदेश में भी सभी रिश्ते आज कलंकित हो गए हैं. स्टीवन ने अपनी सगी बेटी कैटी के साथ सिर्फ शारीरिक संबंध बनाए बल्कि उस से शादी तक कर ली. इस के बाद जो हुआ उस की किसी ने शायद कल्पना भी नहीं की होगी…   

13 अप्रैल, 2018 की सुबह अमेरिका में पश्चिमी कनेक्टिकट के ग्रामीण इलाके से नौर्थ कैरोलिना पुलिस को एक महिला ने फोन किया. उस ने कहा कि नाइटडेल में स्टीवन वाल्टर प्लाडल नाम के एक व्यक्ति ने अपनी दूसरी पत्नी कैटी और उस के अबोध बेटे की जान ले ली है. इस के अलावा उस ने एंथोनी फ्यूस्को नाम के व्यक्ति को भी मार दिया हैफोन करने वाली महिला ने अपना नाम अलायशा प्लाडल बताते हुए कहा कि वह हत्यारे की पहली पत्नी है. उस ने यह भी बताया कि इस हत्या की जानकारी उसे फोन पर प्लाडल ने ही दी थी. उसी दिन पुलिस को ग्रेसी नाम की महिला ने भी फोन कर खबर दी थी कि उस का बेटा स्टीवन प्लाडल अपने बेटे बेन्निट की हत्या कर घर से फरार हो गया है. ग्रेसी ने यह जानकारी फोन कर के अलायशा को भी दे दी थी.

यह सुन कर पुलिस को हैरत हुई, क्योंकि नाइटडेल में प्लाडल ने अपने 7 महीने के बेटे बेन्निट की हत्या की थी और वहां से 965 किलोमीटर की दूरी पर स्थित कनेक्टिकट जा कर उस ने 2 हत्याओं को अंजाम दिया था. यह सब कैसे हुआ होगा, इस सवाल का जवाब पुलिस के लिए भी जानना जरूरी था. सूचना मिलते ही पुलिस नाइटडेल स्थित स्टीवन प्लाडल के घर पहुंची, जहां बैडरूम से 7 महीने के बच्चे बेन्निट की रक्तरंजित लाश मिली. दूसरी ओर पश्चिमी कनेक्टिकट की पुलिस ने वहां के ग्रामीण इलाके न्यू मिल्फोर्ड में पिकअप ट्रक के भीतर से एक युवती और एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति की लाश बरामद की. दोनों जगहों की पुलिस ने हत्या से संबंधित आवश्यक तहकीकात शुरू की. इस सनसनीखेज तिहरे हत्याकांड की पूरी वारदात के तारों को जोड़ने के क्रम में कई चौंकाने वाली जानकारियां सामने आईं.

पुलिस लेफ्टिनेंट लारेंस ऐश के अनुसार कनेक्टिकट के न्यू मिल्फोर्ड में पिकअप ट्रक के अंदर 12 अप्रैल की सुबह करीब पौने 9 बजे खिड़की से गोली मारी गई थी, जिस से 20 वर्षीय युवती कैटी और उस के दत्तक पिता एंथोनी फ्यूस्को की घटनास्थल पर ही मौत हो गई थी. वहां से कुछ दूर ही न्यूयार्क के डोबर में पुलिस को स्टीवन प्लाडल की होंडा मिनी वैन भी मिल गई. पुलिस ने उस गाड़ी की जांच की तो उस के अंदर भी एक आदमी की लाश पड़ी थी. बाद में उस की शिनाख्त स्टीवन प्लाडल के रूप में हुई. यह वही शख्स था, जिस ने इन 3 हत्याओं को अंजाम दिया था. पुलिस ने अनुमान लगाया कि स्टीवन ने खुदकुशी की होगी.

अब पुलिस के सामने उन हत्याओं के साथसाथ आत्महत्या की वारदात और उस की वजहों की भी जांच करनी थी. संबंधित घटनाओं के तार को एकदूसरे के साथ जोड़ते हुए पुलिस ने गहन तहकीकात शुरू कीजैसेजैसे जांच का सिलसिला आगे बढ़ा, वैसेवैसे पुलिस को चौंकाने वाली कई ऐसी बातें मालूम हुईं, जिस में अनैतिक रिश्ता, यौनाकर्षण की अंधता और असामाजिकता के पहलू शामिल थेप्राथमिक जांच में मालूम हुआ कि हत्या करने वाले 43 वर्षीय स्टीवन प्लाडल ने कैटी नाम की अपनी उस पत्नी की हत्या कर दी थी, जो उस की ही सगी बेटी थी. हालांकि 20 वर्षीय कैटी का लालनपालन 56 वर्षीय दत्तक फ्यूस्को दंपति द्वारा किया गया था. स्टीवन ने उस का पालनपोषण करने वाले पिता एंथोनी फ्यूस्को को भी मौत के घाट उतार दिया था.

अनैतिक रिश्तों में उलझी हुई इस कहानी की मीडिया में जोरशोर से चर्चा फरवरी, 2017 में शुरू हुई थी. तब बापबेटी (स्टीवन प्लाडल और कैटी) के बीच नाजायज संबंधों को ले कर घरपरिवार, सगेसंबंधी से ले कर समाज में चौतरफा निंदा होने से अलायशा प्लाडल को काफी गहरा सदमा लगा थाअलायशा स्टीवन प्लाडल की पहली पत्नी थी. उसे हैरत हुई कि उस की पीठ पीछे कब और किस तरह से दोनों के बीच नाजायज संबंध पनप गए. यह उस के मनमस्तिष्क को गहरे आघात मिलने जैसी बात थी, क्योंकि उस की बेटी कैटी अपने ही पिता से गर्भवती थी. और तो और, उस का पति स्टीवन अपनी जैविक बेटी के साथ शादी करने की जिद पर भी अड़ा हुआ था.

अलायशा ने कैटी का भले ही बचपन से लालनपालन नहीं किया हो और उसे अपनी आंखों के सामने बालपन से किशोर और युवावस्था में जाते नहीं देखा हो, लेकिन वह अपनी सगी बेटी की हर खुशी और सुरक्षा को ले कर चिंतित रहती थी. अलायशा को जब बापबेटी के अनैतिक रिश्ते और विवाह की बात मालूम हुई, तब उस ने इस का पुरजोर विरोध जताया. इस बात को ले कर परिवार में विवाद इस कदर बढ़ गया कि मामला घर से ले कर अदालत तक जा पहुंचा. इस के चलते अलायशा ने पति स्टीवन प्लाडल से मार्च, 2017 में तलाक ले लिया. इस के अलावा अपनी 8 और 12 साल की 2 अन्य बेटियों को ले कर पति का घर छोड़ने का फैसला ले लिया. अपने साथ उस ने कैटी को भी ले जाना चाहा, लेकिन उस ने साथ जाने से मना कर दिया. उस के लाख समझाने के बावजूद कैटी अपने पिता के साथ ही रहने की जिद पर अड़ी रही

वैसे अलायशा ने जब घर छोड़ा था, तब प्लाडल अपने बैडरूम में जमीन पर सोया हुआ था. अलायशा के जाने के बाद स्टीवन प्लाडल मानो आजाद हो गया था और उस ने वही किया जो उस के दिल में था. जल्द ही स्टीवन प्लाडल ने अपनी सगी बेटी कैटी के साथ 20 जुलाई, 2017 को एक झील के किनारे छोटे से समारोह में शादी रचा ली. उस समय कैटी गर्भवती थी. यह अनोखी शादी थी. उन की गैरकानूनी शादी के गवाह बनने वालों में कैटी को गोद लेने वाले मातापिता यानी फ्यूस्को दंपति मुख्य अतिथि थे. साथ में प्लाडल की मां ग्रेसी प्लाडल ने भी इस समारोह में हिस्सा लिया था. इस मौके पर उन्होंने एक ग्रुप फोटो भी खिंचवाया था. इस शादी को ले कर चाहे जितनी भी नकारात्मक बातें हुई हों, प्लाडल और कैटी दांपत्य जीवन गुजारने की कसम खा चुके थे. इस के साथ ही दोनों प्रैस, वेब या इलैक्ट्रौनिक मीडिया के लिए अनोखे अवैध रिश्ते की रोचक खबर भी बन गए थे. वे समाजशास्त्रियों के लिए भी एक शोध का विषय बन गए थे.

खैर, कैटी ने सितंबर, 2017 में बेन्निट को जन्म दिया. इस की जानकारी कैटी की मां अलायशा को तब हुई, जब उसे समाचारपत्र में यह खबर पढ़ने को मिली. उस ने इस की सूचना पुलिस को दी और उन के खिलाफ एक रिपोर्ट भी दर्ज करवा दी. दोनों पर गंभीर आरोप लगाया कि उन की शादी अवैध और गैरकानूनी है, जो सामाजिक संस्कार और कायदेकानून के अनुसार भी गलत है. अलायशा द्वारा दर्ज करवाई गई प्राथमिकी पर पुलिस ने काररवाई करते हुए दोनों को जनवरी 2018 में गिरफ्तार कर लिया. मामला अदालत में जा पहुंचा और प्लाडल पर नाबालिग रिश्तेदार के साथ व्यभिचार करने का आरोप लगाया गया. भले ही उन के यौन संबंध आपसी सहमति से बने थे और उन्होंने परिवार के कुछ लोगों की उपस्थिति में विवाह किया था, लेकिन अमेरिकी कानून के मुताबिक उन की शादी दूसरे देशों के कानून की तरह ही अनैतिक और गैरकानूनी करार दे दी गई

नौर्थ कैरोलिना स्थित नाइटडेल में एर्लस्टन कोर्ट द्वारा उन पर कानूनी काररवाई की गई. हालांकि बाद में स्टीवन और कैटी 20 फरवरी को 28 हजार डौलर के बांड पर इस शर्त के साथ रिहा कर दिए गए कि वे आपस में फिर कभी नहीं मिलेंगे. इसी के साथ बच्चे बेन्निट को उस की दादी ग्रेसी प्लाडल के पास रखने का अदालती आदेश भी जारी किया गया. ग्रेसी अपने बेटे स्टीवन प्लाडल के साथ ही रहती थी. इस फैसले से 72 वर्षीया ग्रेसी पर बच्चे की देखभाल की जिम्मेदारी गई थी. बावजूद इस के अदालत ने प्लाडल को बेन्निट से मिलने या उस के घर के पास के शहर कैरी से भी दूर रहने की हिदायत दी थी. साथ ही अलायशा और उस की 8 12 साल की दोनों बेटियों की सुरक्षा के आदेश भी अदालत ने दिए. अलायशा कैटी के बचपन की तसवीर दिखाती हुई कहती है, ‘‘मुझे अफसोस है कि मैं अपनी बेटी और उस के बच्चे को नहीं बचा सकी.’’

इतना बोलते ही उस की आंखों में आंसू बह निकले. उस की नजरों में 7 माह के अबोध बच्चे को प्लाडल की बुजुर्ग मां के हवाले करना एक गलत निर्णय था, जो नहीं किया जाना चाहिए था. यही उस की मौत का कारण बनीइस के साथ ही अलायशा अपनी दूसरी 2 बेटियों को ले कर संतोष व्यक्त करती है, ‘‘अब मैं सोचती हूं कि हमारी दोनों बेटियां कितनी भाग्यशाली हैं, जो उस जुनूनी हत्यारे से बच गईं. अगर वे अपनी दादी और पिता के पास होतीं तो वह उन्हें भी मार डालता.’’

अलायशा के अनुसार, स्टीवन अपने घर पर 4 बंदूकें रखता था. उसे शुरू से ही बंदूकें रखने का शौक था. संभवत: युवावस्था में उस ने औनलाइन बंदूक खरीदी थी. वैसे वह पेशे से एक कुशल बढ़ई था, लेकिन एक अच्छा शूटर भी था

बंदूकों का इस्तेमाल वह निशानेबाजी का करतब दिखाने के लिए करता था. ऐसा कर के वह कैटी को भी काफी इंप्रैस कर चुका था, जबकि उस का गुस्सा बहुत ही खराब था. जब भी गुस्से में आता, तब उस पर पागलपन सवार हो जाता था. वह गुस्से में घर की चीजों को नष्ट करने लगता था. यहां तक कि घर की दीवारों में छेद करना शुरू कर देता था. लेकिन उस का कोई आपराधिक रिकौर्ड नहीं था. अलायशा और प्लाडल के मिलने की भी कहानी कुछ कम रोमांचक नहीं थी. दोनों की मुलाकात इंटरनेट के जरिए सन 1995 में हुई थी. उन दिनों इंटरनेट पर चैटिंग ही डेटिंग की पहली सीढ़ी हुआ करती थी. तब अलायशा मात्र 15 साल की थी और टेक्सास के सैन एंटोनिया में अपने मातापिता के साथ रहती थी. उस वक्त 20 वर्षीय प्लाडल न्यूयार्क में रहता था. उन की प्रेम कहानी इंटरनेट पर चैटिंग और लव लैटर के जरिए परवान चढ़ी थी.

हालांकि अलायशा के मातापिता को यह सब जरा भी पसंद नहीं था. दूसरी तरफ स्टीवन अलायशा से मिलने के लिए बेताब रहता था. एक दिन वह अलायशा से मिलने के लिए टेक्सास आया. चैटिंग के बाद उन की पहली डेटिंग काफी सुखद एहसास दे गई. उन के प्रेम को पंख मिल गए और वे रोमांस की भावना से भर गए. उस के बाद वह अलायशा से मिलने लगातार आता रहा. इस तरह से उन के बीच शुरू हुए प्रेम संबंध में एक दिन उन पर सैक्स हावी हो गया. अलायशा 16 साल की उम्र में गर्भवती हो गई थी. उस ने 17वें साल में एक बच्ची कैटी को जन्म दिया. यह सब दोनों के विवाह के पहले ही हो गया. बाद में दोनों ने शादी तो कर ली लेकिन स्टीवन कैटी को पा कर खुश नहीं हुआ. वह उसे अलग करना चाहता था. बच्ची कैटी को जरा भी पसंद नहीं करता था और हमेशा उसे नुकसान पहुंचाने की कोशिश में रहता था. उसे दूर करने को ले कर कई बार हिंसक भी बन गया था. अंतत: अलायशा ने 8 माह की कैटी को खुद से दूर करना ही बेहतर समझा.

कैटी को बचपन में ही प्लाडल दंपति से फ्यूस्को दंपति ने सन 1998 में गोद ले लिया था. एंथोनी फ्यूस्को उस के दत्तक पिता थे. कैटी ने जब होश संभाला, तब उसे मालूम हुआ कि वह जिस परिवार में रह रही है, वह उस का अपना नहीं है. उस के जैविक मातापिता कोई और हैं. जिन के पास रह रही है, उन्होंने उसे गोद ले रखा है. इस बात को ले कर कैटी के मन में ऊहापोह और संशय की स्थिति बनी रही. उस के मन में अकसर टीस मारती कि आखिर उस के मांबाप कौन हैं? उन की क्या मजबूरी रही कि उन्होंने उसे खुद से अलग कर किसी को गोद दे दिया?

किशोरावस्था के आतेआते उस की जानने की इच्छा प्रबल हो गई कि आखिर उस के अपने मातापिता कौन हैं, कैसे हैं? कैटी खूबसूरत और काफी समझदार लड़की थी. यौवन की दहलीज पर खड़ी थी. पढ़ाई में भी अव्वल थी. आर्ट की स्टूडेंट थीदूसरी तरफ अलायशा भी अपनी पहली संतान कैटी से मिलना चाहती थी. उसे पता था कि उस के दत्तक मातापिता काफी अच्छे हैं. उधर अलायशा को भरोसा था कि उन्होंने कैटी का काफी खयाल रखा होगा. फिर भी जब वह एकांत में होती तो कैटी से मिलने की इच्छा जाग जाती थी, लेकिन आजीविका की आपाधापी में मिलना संभव नहीं हो पाता था. अलायशा और स्टीवन इंटरनेट के जरिए मिले थे तो कैटी ने भी अपने जैविक मातापिता की तलाश के लिए इंटरनेट संचालित सोशल साइट फेसबुक का सहारा लिया. फेसबुक के जरिए उस ने अपने मांबाप को तलाशना शुरू कर दिया.

इस में उसे अगस्त 2015 में सफलता मिल गई. उन से कैटी की पहली मुलाकात जून 2016 में हो गई. मां अलायशा से मिल कर जहां उस ने भावनात्मक लगाव महसूस किया, वहीं पिता स्टीवन प्लाडल को देखा तो देखती ही रह गई. स्टीवन खूबसूरत नौजवान की तरह दिखता था. उस का व्यक्तित्व काफी आकर्षक था और शारीरिक बनावट, कदकाठी और चालढाल कुछ ऐसा था कि वह अपनी उम्र से 10 साल कम का दिखता था. कैटी ने स्टीवन को पहली ही निगाह में एक आकर्षक व्यक्ति के नजरिए से देखा. उस के पहली झलक वाले व्यक्तित्व की ओर खिंचाव का एहसास हुआ, जो ठीक उस के सपनों के किसी राजकुमार की तरह था. कैटी अपने दत्तक मातापिता की इजाजत ले कर अलायशा और स्टीवन प्लाडल के साथ हेनरिको काउंटी स्थित उन के घर में रहने लगी. तब कैटी की उम्र 18 साल थी. जल्द ही उस ने नए परिवार के सदस्यों के तालमेल बिठा लिया

उसे दशकों बाद मिले मातापिता के अलावा दादी और 2 छोटी बहनों के साथ भावनात्मक लगाव काफी अच्छा लग रहा था. उसे लंबे अरसे बाद एकाकीपन दूर होने का अहसास हुआ. इसी के साथ मन में सामान्य लड़की की तरह स्वाभाविक रोमांच भी कुलांचे मार रहा था. उस ने जिस के साथ रोमांस की पहल की वह और कोई नहीं, उस का पिता स्टीवन था. उसे रिश्तों की मर्यादा का तो जरा भी खयाल आया और ही स्टीवन ने इसे लांघने का विरोध जताया. वह भी अनैतिक यौनाकर्षण में खिंचता चला गयावह नवयौवना कैटी की सुंदरता के आकर्षण की रौ में बह गया. भूल गया कि कैटी उस की सगी बेटी है. इस यौनाकर्षण के अंजाम क्या हो सकते थे, इस की उन्होंने जरा भी परवाह नहीं की. जल्द ही बापबेटी ने रिश्ते की मर्यादा को लांघते हुए यौन संबंध भी कायम कर लिया.

गलत बुनियाद वाले नए रिश्ते का अंजाम ही था कि उन्हें इसे निभाने के लिए कई बाधाएं दूर करनी पड़ीं. कैटी अनब्याही मां बनने वाली थी. अजन्मे बच्चे के भविष्य को ले कर वह चिंतित रहने लगी. इस की जानकारी उस के दत्तक मातापिता को भी हुई. यह उन की बड़ी भूल थी, जो उन्होंने कैटी को अपने जैविक मातापिता से मिलने की इजाजत दी थी, लेकिन यह भूल अब सुधारी नहीं जा सकती थी. उन के मन में सब से बड़ा सवाल कैटी के गर्भ में पलने वाले बच्चे के भविष्य और पिता के नाम को ले कर था. अंतत: स्टीवन और कैटी ने शादी करने की ठान ली. अलायशा ने विरोध करते हुए पति स्टीवन से अलग होने का निर्णय ले लिया. वह उन्हें हर हाल में एकदूसरे से अलग करना चाहती थी. अजन्मे बच्चे को ले कर उस के मन में योजना थी. फिलहाल अलायशा की पूरी कोशिश कैटी को स्टीवन से अलग करने की थी.

इस में अलायशा को आंशिक सफलता मिली और दोनों कानून की गिरफ्त में गए. कैटी और स्टीवन को अवैध विवाह के जुर्म में गिरफ्तार कर लिया गया. उन की गिरफ्तारी वहीं से हुई, जहां से अबोध बच्चे बेन्निट की लाश बरामद की थी. स्टीवन ने अपनी मां से छीन कर 7 माह के बेन्निट की हत्या कर दी और मां को वहां से भाग जाने को कहा था. उस वक्त कैटी अदालत के आदेश के मुताबिक अपने दत्तक पिता के पास थी. स्टीवन की मां ग्रेसी ने पुलिस को बताया कि उस ने पुलिस को इस की सूचना देने के लिए कहा. वह काफी गुस्से में था. कैटी और उस के दत्तक पिता को मार डालने की धमकी दे कर फरार हो गया. ग्रेसी ने बताया कि उस के सिर पर सब कुछ खत्म कर देने का भूत सवार हो चुका था

उस का हिंसक रूप और पागलपन देख कर वह डर गई थी. अगला निशाना उस ने कैटी को ही बनाया. साथ में उस के दत्तक पिता को भी मार डाला. तब तक वह गुस्से में पागल और विक्षिप्त हो चुका था. अंतत: उस ने खुद को भी गोली मार ली.

पुलिस द्वारा पूरे मामले की तहकीकात करने के बाद फाइल बंद कर दी गई. इस की वजह यह थी कि हत्या करने वाला भी आत्महत्या कर चुका था. इस की पुष्टि नाइटडेल पुलिस के चीफ लारेंस कैप्स द्वारा प्रैस कौन्फ्रैंस में कर दी गई. उन्होंने इस तरह अनैतिक संबंधों को ले कर हैरानी भी व्यक्त की. इस तरह अनैतिक रिश्ता बनाने की यह कहानी समाज और परिवार के बिगड़े स्वरूप और आनुवांशिक यौन आकर्षण के विकसित होने वाली परिस्थितियों को दर्शाती है. यह तो सत्य है कि इस तरह के संबंध समाज के लिए अहितकर ही होंगे. लोगों को ऐसी घटनाओं से सीख लेनी चाहिए.