देवर के इश्क़ में – भाग 1

उत्तर प्रदेश के जिला एटा के थाना नया गांव के तहत आता है एक गांव असदपुर, जहां रामनिवास  लोधी अपने 3 बेटों, मुखराम, अनिल और भूप सिंह के साथ रहते थे. रामनिवास की खेती की कुछ जमीन थी, उसी से वह परिवार का भरणपोषण करते थे. मुखराम जब जवान और समझदार हुआ तो वह घर की आमदनी बढ़ाने के उपाय खोजने लगा.

उस के गांव के कई लड़के दिल्ली में नौकरी करते थे, वे काफी खुशहाल थे. दिल्ली जाने के बारे में उस ने भी पिता से बात की और अपने एक दोस्त के साथ दिल्ली चला गया. कुछ दिन वह दोस्त के यहां रहा. उसी के सहयोग से उसे एक फैक्ट्री में नौकरी मिल गई. बाद में वह दिल्ली के नंदनगरी इलाके में किराए का कमरा ले कर अकेला रहने लगा.

नौकरी करने के बाद मुखराम को फैक्ट्री से जो तनख्वाह मिलती थी, उस में से वह अपने खर्चे के पैसे रख कर बाकी पैसे घर भेज देता था. इस से घर के आर्थिक हालात सुधरने लगे. पैसा आया तो मुखराम बनठन कर रहने लगा. उस की शादी के लिए रिश्ते भी आने लगे. घर वालों को एटा की ही रजनी पसंद आ गई. बातचीत के बाद मुखराम की रजनी से शादी हो गई. शादी के कुछ दिनों बाद मुखराम रजनी को दिल्ली ले आया. इस तरह उन की जिंदगी हंसीखुशी से कटने लगी.

भाई को देख कर अनिल ने भी गांव की संकुचित सीमा से निकल कर दिल्ली के खुले आकाश में सांस लेने का फैसला कर लिया. एक दिन वह भी बड़े भाई मुखराम के साथ दिल्ली चला गया. भाई ने उस की भी नौकरी लगवा दी.

दोनों भाई साथ रह रहे थे, इसलिए घर वाले उन की तरफ से बेफिक्र थे. अनिल को भी दिल्ली की जिंदगी रास आ गई थी. दोनों भाई 2-4 दिनों के लिए छुट्टियों पर ही घर जाते थे. घर पर उन का छोटा भाई भूप सिंह ही रह गया था. वह पिता के साथ खेती करता था. अनिल भी कमाने लगा तो रामनिवास उस के लिए भी लड़की तलाशने लगा.

एक रिश्तेदार के जरिए फर्रुखाबाद जिले के गांव रहीसेपुर के रहने वाले सुरेश की बेटी पुष्पा का रिश्ता अनिल के लिए आया तो रामनिवास ने उस की भी शादी पुष्पा से कर दी. यह करीब 5 साल पहले की बात है. कुछ दिनों बाद पुष्पा भी अनिल के साथ दिल्ली आ गई. दोनों भाई एक ही कमरे में रहते थे. पुष्पा को यह अच्छा नहीं लगता था.

अनिल ने पुष्पा को समझाया कि महानगर की जिंदगी ऐसी ही होती है. आदमी को हालात से समझौता करना पड़ता है. पुष्पा का दिल्ली में मन लग जाए, इस के लिए अनिल ने पुष्पा को दिल्ली में खूब घुमायाफिराया. पुष्पा के लिए यह बिलकुल नया अनुभव था. उसे अच्छा तो लगा, लेकिन किराए के छोटे से कमरे में उस का मन नहीं लगा तो अनिल उसे गांव छोड़ आया.

उस बीच अनिल का छोटा भाई भूप सिंह भी अपने भाइयों के पास दिल्ली आ गया. अनिल दिल्ली में था और पुष्पा गांव में सासससुर के पास. नईनवेली दुलहन को पति के साथ रहने के बजाय तनहाई में रहना पड़ रहा था. उस की उमंगे दम तोड़ती नजर आ रही थीं. केवल मोबाइल के जरिए ही उस की पति से बात हो पाती थी.

पुष्पा अपने मन की बात पति से बताती तो वह 1-2 दिन की छुट्टी ले कर घर आ जाता.  पुष्पा मन की पूरी बात भी नहीं कह पाती थी कि अनिल वापस जाने की बात करने लगता था, क्योंकि उसे अपनी ड्यूटी भी तो देखनी थी. हर बार पुष्पा उदास मन से उसे विदा करती. एक बार पुष्पा की उदासी देख कर अनिल ने अपने मांबाप से कहा कि वह पुष्पा को दिल्ली ले जाना चाहता है. मांबाप ने इजाजत दे दी तो वह उसे एक बार फिर दिल्ली ले गया.

पुष्पा अनिल के साथ उसी एक कमरे के घर में आ गई. वह मन लगाने की कोशिश करने लगी. अनिल ने सोचा कि धीरेधीरे सब ठीक हो जाएगा, लेकिन उसी बीच पुष्पा गर्भवती हो गई. पुष्पा ने यह खुशखबरी सास गायत्री को दी तो गायत्री को लगा कि ऐसी हालत में बहू को गांव आ जाना चाहिए, क्योंकि ऐसे में काफी देखभाल की जरूरत होती है. इसलिए गायत्री ने अनिल से कह दिया कि छुट्टी मिलने पर वह बहू को गांव छोड़ जाए.

कुछ दिनों बाद पुष्पा गांव आ गई. अब सास उस की देखभाल करने लगी. समय आने पर  पुष्पा ने बेटे को जन्म दिया. बेटे के जन्म के बाद घर में खुशी छा गई. अनिल भी फूला नहीं समा रहा था. बच्चे का नाम आयुष रखा गया.

घर में पोते के आ जाने से रामनिवास और गायत्री के दिन उस के साथ अच्छे से कटने लगे. उधर अनिल का भी मन करता कि बेटा उस की नजरों के सामने रहे, ताकि वह उसे प्यार कर सके. लेकिन ऐसा संभव नहीं था. वह महीने-दो महीने में घर आता और 1-2 दिन रह कर दिल्ली चला जाता.

रामनिवास का छोटा भाई वेदराम उस के घर से कुछ दूरी पर अपने परिवार के साथ रहता था. उस का बेटा रामखिलौने अविवाहित था. रामनिवास के तीनों बेटे दिल्ली में थे, इसलिए रामखिलौने जबतब ताऊ के घर आ जाता और घर के छोटेमोटे काम कर देता.

घर में किसी के न होने से पुष्पा भी रामखिलौने से ही अपनी जरूरत का सामान मंगवाती थी. वह जब भी उस के घर आता,  पुष्पा उसे चायनाश्ता करा देती थी. पुष्पा की नजदीकी रामखिलौने की जवान उमंगों को हवा दे रही थी, इसलिए उस का नजरिया भाभी के प्रति बदल रहा था. नजरिया बदला तो उस का वहां आनाजाना बढ़ गया.

एक दिन रामखिलौने ताऊ के घर आया तो पुष्पा अकेली थी. रामखिलौने को लगा कि भाभी से अपने दिल की बात कहने का यह अच्छा मौका है.  पुष्पा उस के लिए चाय बना कर लाई तो चाय पीते हुए उस ने कहा, ‘‘भाभी भैया कितना निर्दयी है कि उसे न तो तुम्हारी परवाह है और न ही छोटे से बच्चे की. बीवीबच्चे को यहां छोड़ कर वह दिल्ली में आराम से बैठा है.’’

इस के बाद रामखिलौने कुछ देर पुष्पा की तारीफ करता रहा. वह तो चला गया, पर उस की बातों ने पुष्पा के मन में चिंगारी लगा दी, जो धीरेधीरे सुलगने लगी थी. अब उसे अपनी जेठानी से जलन होने लगी, जो दिल्ली में अपने पति के पास रह रही थी. तनहाई के उन उदास दिनों में उसे लगने लगा कि रामखिलौने ही एक ऐसा आदमी है, जो उस के दर्द को समझता है.

एक दिन रामखिलौने आयुष के लिए कपड़े ले आया. पुष्पा के मना करने के बाद भी वह जबरदस्ती उसे थमा गया. अब वह आयुष के बहाने पुष्पा के नजदीक आने कोशिश करने लगा था. उस के जाने के बाद पुष्पा देर तक उस के बारे में सोचती रही. उसे लगा कि रामखिलौने अच्छा इंसान है, जो उस के बारे में चिंतित रहता है. जबकि पति को उस की जरा भी परवाह नहीं है. धीरेधीरे उस का झुकाव रामखिलौने की तरफ होने लगा.

बीवी की आशनाई लायी बर्बादी

संगीता के प्यार की झंकार

बीवी की आशनाई लायी बर्बादी – भाग 3

रमाकांती ने भले ही पति के शक को झूठा करार दिया था, लेकिन उस के मन में यह बात हमेशा घूमती रहती थी. एक दिन रामचंद्र थोड़ा जल्दी घर आ गया. उसे बच्चे रास्ते में खेलते मिले तो उस ने सोचा कि रमाकांती बाजार गई होगी. उस ने बच्चों से पूछा, ‘‘मम्मी कहीं गई है क्या?’’

‘‘नहीं, घर में हैं.’’ बेटे ने जवाब दिया.

रामचंद्र कमरे पर पहुंचा. उसे यह देख कर ताज्जुब हुआ कि उस के कमरे का दरवाजा अंदर से बंद है. उसने दस्तक दी तो कुछ देर बाद दरवाजा सूरज ने खोला. उस समय वह सिर्फ लुंगी पहने था. अचानक रामचंद्र को देख कर उस की घिग्घी बंध गई. रामंचद्र फुर्ती से कमरे में घुसा तो रमाकांती को जिस हालत में देखा, उस का खून खौल उठा.

रमाकांती बिस्तर पर चादर लपेटे पड़ी थी. रामचंद्र ने आगे बढ़ कर चादर खींची तो उस के शरीर पर एक भी कपड़ा नहीं था. रामचंद्र उसे खा जाने वाली नजरों से घूरते हुए बोला, ‘‘बदजात औरत, मुझे धोखा दे कर तू यह गुल खिला रही है?’’

रंगेहाथों से पकड़े जाने पर रमाकांती और सूरज का चेहरा सफेद पड़ गया. रमाकांती ने फटाफट कपड़े पहने और अपने किए की माफी मांगने लगी, जबकि सूरज मौका देख कर भाग गया. रामचंद्र ने उसे माफ करने के बजाय उस की जम कर पिटाई की. इस के बाद

रमाकांती और सूरज कुछ दिन तो शांत रहे लेकिन जब उन से दूरियां बर्दाश्त नहीं हुई तो वे पहले की ही तरह फिर चोरीछिपे मिलने लगे. अब रामचंद्र को पत्नी पर भरोसा नहीं रह गया था, इसलिए आए दिन दोनों में लड़ाईझगड़ा होने लगा.

रामचंद्र ने चुपचाप अंबाला के बल्लूपुर में दूसरा कमरा किराए पर ले लिया और परिवार के साथ उसी में रहने चला गया. लेकिन रमाकांती ने अपने आशिक सूरज को अपना वह ठिकाना भी बता दिया था, इसलिए सूरज वहां भी उस से मिलने जाने पहुंचने लगा.

रमाकांती पूरी तरह सूरज के रंग में रंग चुकी थी. वह उसी के साथ जिंदगी बिताने के सपने देखने लगी थी. उसे इस की भी फिक्र नहीं थी कि उस के जाने के बाद उस के बच्चों का क्या होगा? वह अपने इस नाजायज संबंध में डूब कर इस कदर अंधी हो चुकी थी कि उस के अलावा उसे कुछ और दिखाई ही नहीं दे रहा था.

वह सूरज के साथ भागने के चक्कर में रहने लगी. उस के व्यवहार और हरकतों से रामचंद्र को उस के मन की बात का पता चल गया, इसलिए उस ने फैक्ट्री जाना बंद कर दिया. वह हर समय रमाकांती को अपनी नजरों के सामने रखने लगा. जब कई दिन बीत गए और रामचंद्र फैक्ट्री नहीं गया तो एक दिन रमाकांती ने कहा, ‘‘तुम फैक्ट्री जाओ, मैं कहीं नहीं जाऊंगी. क्यों मेरी वजह से अपनी रोज की दिहाड़ी को लात मार रहे हो?’’

रामचंद्र किसी भी हाल में फैक्ट्री जाने को तैयार नहीं था. रमाकांती भी कम नहीं थी, इसलिए उस ने किसी तरह रामचंद्र को विश्वास में ले कर फैक्ट्री जाने को राजी कर लिया. रामचंद्र फैक्ट्री चला गया तो रमाकांती ने सूरज को उस के जाने की खबर दे दी.

थोड़ी देर में सूरज किसी की मोटरसाइकिल ले कर रमाकांती के कमरे पर पहुंच गया. रमाकांती अपने सामान का बैग ले कर उस की मोटरसाइकिल पर बैठने लगी तो उस के बच्चे उसे घेर कर शोर मचाने लगे, ‘‘सूरज अंकल, हमारी मम्मी को भगा कर ले जा रहे हैं.’’

बच्चों का शोर सुन कर आसपास के लोग इकट्ठा हो गए. सूरज और रमाकांती को देख कर ही वे सारा माजरा समझ गए. उन्होंने रमाकांती को मोटरसाइकिल से उतार कर कमरे के अंदर भेज दिया और सूरज को भगा दिया. इस के बाद रामचंद्र को इस बात की सूचना दे दी.

कुछ देर में रामचंद्र आ गया. पड़ोसियों ने उसे समझाया कि वह अपनी पत्नी को ले कर यहां से चला जाए अन्यथा किसी दिन बेमौत मारा जाएगा. इस के बाद रामचंद्र ने सारा सामान पैक किया और रमाकांती तथा बच्चों को ले कर रेलवे स्टेशन पर आ गया. वहां से वह ट्रेन से चंडीगढ़ गया, जहां से वह चंडीगढ़लखनऊ सुपरफास्ट ट्रेन से हरदोई आ गया.

22 अगस्त की सुबह 7 बजे वह हरदोई स्टेशन पर उतरा. वहां से उस ने आटो किया और परिवार के साथ बिलग्राम चुंगी पर पहुंचा. वहां उस ने एक कबाड़ी की दुकान से डेढ़ सौ रुपए का बांका खरीदा, जिसे उस ने अपनी पीठ पर बनियान के नीचे छिपा लिया. उस के ऊपर उस ने अपना बैग टांग लिया, जिस से वह किसी को नजर नहीं आया. वहीं से एक दुकान से उस ने मीठी गटियां खरीदी और बस से अपने गांव हैबतपुर आ गया.

मकान का दरवाजा खोल कर सब अंदर पहुंचे. कुछ देर बाद बच्चे बाहर खेलने चले गए तो रमाकांती घर की साफसफाई करने लगी. उस समय लगभग 12 बज रहे थे. रामचंद्र ने रमाकांती को बुलाया और चारपाई पर बगल में बैठा कर गटियां खाने को दीं. इसी के साथ वह उस से हंसहंस कर बातें करने लगा.

रात भर जागने की वजह से रमाकांती को नींद आ गई. वह चारपाई पर लेट कर सो गई. उस के सोते ही रामचंद्र ने पीठ पर छिपा कर रखा बांका आहिस्ता से निकाला और पूरी ताकत से रमाकांती की गर्दन पर वार कर दिया. एक ही वार में उस का सिर धड़ से अलग हो गया.

रमाकांती को मौत के घाट उतार कर रामचंद्र एक हाथ में रमाकांती का सिर और दूसरे हाथ में रक्तरंजित बांका ले कर थाना बिलग्राम की ओर पैदल ही चल पड़ा. उस के घर से निकलते वक्त गांव वालों की नजर उस पर पड़ी तो पूरे गांव में हड़कंप मच गया. गांव वालों ने यह बात चौकीदार कमलेश को बताई तो उस ने इस की सूचना फोन द्वारा थानाकोतवाली बिलग्राम को दे दी.

रामचंद्र 2 किलोमीटर दूर पुंसेड़ा गांव तक ही पहुंचा था कि सीओ बिलग्राम विजय त्रिपाठी वहां पहुंच गए. उन्होंने रामचंद्र से सिर और बांका देने को कहा तो उस ने कहा कि वह दोनों चीजें सिर्फ कोतवाल को ही देगा.

कुछ देर में इंसपेक्टर श्याम बहादुर सिंह भी वहां पहुंच गए. रामचंद्र ने रमाकांती का सिर और हत्या में प्रयुक्त रक्तरंजित बांका उन के हवाले कर दिया. इस के बाद रामचंद्र को हिरासत में ले लिया गया.  कोतवाली ला कर रामचंद्र से पूछताछ की गई तो उस ने रमाकांती की हत्या की पूरी कहानी सुना दी. इस के बाद चौकीदार कमलेश की ओर से रामचंद्र के खिलाफ उस की पत्नी की हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया गया.

23 अगस्त को रामचंद्र को सीजेएम की अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. 30 अगस्त को रामचंद्र ने दोपहर 12 बजे के करीब जिला कारागार की अपनी बैरक के बाहर अंगौछे से फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली.

इस तरह एक औरत की चरित्रहीनता की वजह से एक भरापूरा परिवार बरबाद हो गया. उसी की वजह से बच्चे अनाथों की तरह जिंदगी बिताने को मजबूर हैं.

रिश्तों की कब्र खोदने वाला क्रूर हत्यारा

बीवी की आशनाई लायी बर्बादी – भाग 2

एक दिन सूरज रमाकांती के कमरे पर पहुंचा तो उस समय वह अकेली थी. कमरे के बाहर से ही उस ने पूछा, ‘‘भाभी, भाई साहब घर पर नहीं हैं क्या?’’

‘‘तुम अच्छी तरह जानते हो कि इस समय वह घर पर नहीं होते, फिर भी पूछ रहे हो?’’ रमाकांती ने सूरज की आंखों में आंखें डाल कर कहा तो वह इस तरह झेंप गया, जैसे उस की कोई चोरी पकड़ी गई हो. सच भी यही था. वह जानबूझ कर ऐसे समय में आया था. उस ने झेंप मिटाते हुए कहा, ‘‘तुम तो बहुत पारखी हो भाभी.’’

‘‘औरत की नजरें मर्द के मन को बड़ी जल्दी पहचान लेती हैं देवरजी.’’ रमाकांती ने इठलाते हुए कहा, ‘‘अंदर आ कर बैठो, मैं तुम्हारे लिए चाय बनाती हूं.’’

सूरज पलंग पर बैठते हुए बोला, ‘‘भाभीजी, तुम ने मेरी चोरी पकड़ ली, लेकिन यह तो बताओ कि मेरा इस तरह आना तुम्हें बुरा तो नहीं लगा?’’

‘‘अगर बुरा लगा होता तो तुम्हें अंदर बुला कर चाय क्यों पिलाती?’’ रमाकांती ने एक आंख दबा कर मुसकराते हुए कहा.

‘‘बुरा न मानो तो एक बात कहूं भाभी?’’ सूरज ने सूखे होंठों पर जीभ फेरते हुए कहा.

‘‘कहो,’’ रमाकांती तिरछी नजरों से उसे घूरते हुए बोली, ‘‘अपनों की बात का भी कोई बुरा मानता है.’’

‘‘भाभी, तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो. इसीलिए मेरा मन तुम्हें बारबार देखने को मचलता रहता है.’’

‘‘भला मुझ में ऐसी कौन सी बात है, जो तुम्हारा मन मुझे बारबार देखने को मचलता है.’’ रमाकांती ने तिरछी चितवन का तीर चलाते हुए कहा.

‘‘यह पूछो कि तुम में क्या नहीं है. हिरनी जैसी चंचल आंखें, उन में थोड़ी उदासी, गठा हुआ बदन और होंठों पर अप्सराओं जैसी मादक मुसकान,’’ सूरज ने मस्का लगाते हुए कहा, ‘‘काश, तुम मेरी किस्मत में लिखी होती तो मैं तुम्हें रानी बना कर रखता.’’

‘‘यह सब कहने की बातें हैं देवरजी. पहले ‘वह’ भी ऐसा ही कहते थे. सारे मर्द एक जैसे होते हैं. बाहर से कुछ और अंदर से कुछ और.’’ रमाकांती ने ताना मारा.

‘‘मैं भाई साहब की तरह नहीं हूं. उन्हें तुम्हारी कद्र करना ही नहीं आता,’’ सूरज ने मौके का फायदा उठाते हुए कहा, ‘‘उन्हें तुम्हारे सुख की जरा भी परवाह नहीं रहती. वह सिर्फ अपने बारे में सोचते हैं.’’

‘‘तुम्हें कैसे पता?’’ रमाकांती ने भौंहें सिकोड़ कर कहा.

‘‘भाभी, इंसान की आंखों से ही उस के दिल की बात का पता चल जाता है. मुझे तुम्हारी आंखों से ही तुम्हारे दिल के दर्द का पता चल गया है.’’

सूरज की इन बातों से रमाकांती को मजा आने लगा था. इसी चक्कर में वह चाय भी बनाना भूल गई. अचानक खयाल आया तो बोली, ‘‘तुम्हारी बातों में पड़ कर मैं तो चाय बनाना ही भूल गई.’’

‘‘रहने दो भाभी, बस तुम्हें देख लिया, आत्मा तृप्त हो गई. अब मैं चलता हूं.’’ कह कर सूरज चला तो गया, लेकिन रमाकांती की हसरतों को हवा दे गया.

रमाकांती अब सूरज की चढ़ती जवानी के सपने देखने लगी. दूसरी ओर सूरज भी उसे अपनी कल्पनाओं की रानी बनाने लगा. इस के बाद सूरज और रमाकांती के बीच होने वाला हंसीमजाक छेड़छाड़ तक पहुंच गया. सूरज जब भी रमाकांती के कमरे पर आता, उस के बच्चों के लिए कुछ न कुछ ले कर आता. ऐसे में एक दिन रमाकांती ने उसे टोका, ‘‘तुम्हें बच्चों की खुशी का तो इतना खयाल रहता है, कभी भाभी की खुशी के बारे में भी सोचते हो?’’

अपनी बात कह कर रमाकांती एक आंख दबा कर मुसकराई तो सूरज उस का इशारा समझ गया कि वह क्या चाहती है. बात यहां तक पहुंच गई तो वह उचित मौके की तलाश में रहने लगा.

एक दिन सूरज ऐसे समय पर रमाकांती के कमरे पर पहुंचा, जब उस के बच्चे कमरे पर नहीं थे. आसपास के कमरों में रहने वाले भी इधरउधर थे. उस के कमरे में आते ही रमाकांती ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘आज यह मत पूछना कि भाई साहब हैं या नहीं? मुझे पता है कि तुम यहां क्यों आए हो.’’

‘‘तुम्हीं ने तो बुलाया था?’’ सूरज हंस कर बोला.

‘‘अरे, मैं ने तुम्हें कब बुलाया?’’

सूरज आगे बढ़ कर बोला, ‘‘अच्छा भाभी, सचसच बताना, जब भी मैं तुम से बात करता हूं, तुम्हारी आंखों की चाहत मुझे बुलाती है या नहीं?’’

इतना कह कर सूरज ने रमाकांती का हाथ पकड़ लिया और अपना मुंह उस के मंह के पास ले जा कर बोला, ‘‘उन्हीं के बुलाने पर आया हूं.’’

‘‘दिल की बात कहने का अंदाज तो तुम्हारा बहुत अच्छा है,’’ रमाकांती ने प्यार से उस के गाल पर चपत लगा कर कहा, ‘‘हाथ छोड़ो तो चाय बना कर लाऊं.’’

‘‘इस तनहाई में चाय पीने का नहीं, कुछ और ही पीने का मन हो रहा है. बोलो पिलाओगी न?’’

‘‘मैं ने कब मना किया है,’’ रमाकांती ने अपना सिर उस के सीने पर रख कर कहा, ‘‘पहले दरवाजा तो बंद कर लो.’’

रमाकांती का खुला आमंत्रण पा कर सूरज की बांछें खिल उठीं. इस के बाद वहां जो हुआ, वह किसी भी लिहाज से सही नहीं था. रमाकांती की जिस्म की आग ने सारी मर्यादाओं को जला कर राख कर दिया.

उस दिन के बाद इस का सिलसिला सा चल निकला. जब भी मौका मिलता, सूरज और रमाकांती एकदूसरे की बांहों में समा जाते. लेकिन इस के लिए सूरज को रमाकांती के कमरे पर आना पड़ता था.

रामचंद्र की गैरमौजूदगी में सूरज का रमाकांती के कमरे पर बारबार आना आसपड़ोस वालों को अखरने लगा. उन की समझ में आ गया कि सूरज और रमकांती के बीच गलत संबंध है. इन दोनों के संबंधों की चर्चा होने लगी तो उड़तेउड़ते यह बात रामचंद्र के कानों तक भी पहुंची. लेकिन उसे इस बात पर यकीन नहीं हुआ.

जब लोग रामचंद्र पर ताने कसने लगे तो एक दिन उस ने रमाकांती से पूछा, ‘‘मैं ने सुना है कि मेरी गैरमौजूदगी में सूरज यहां आता है?’’

‘‘हां, कभीकभी आ जाता है बच्चों से मिलने के लिए.’’ रमाकांती ने कहा.

‘‘तुम्हें पता होना चाहिए कि मोहल्ले वाले तुम दोनों को ले कर तरहतरह की बातें कर हैं?’’

‘‘लोगों का क्या, वे किसी को खुश थोड़े ही देख सकते हैं, इसीलिए मनगढ़ंत कहानी रचते रहते हैं. तुम्हें लगता है कि मैं ऐसा नीच काम कर सकती हूं?’’ रमाकांती ने सवाल किया तो रामचंद्र शर्मिंदा हो गया. उसे लगा कि उसने पत्नी पर शक कर के ठीक नहीं किया.

लेकिन सच्चाई को कितना भी छिपाया जाए, वह छिपती नहीं. रामचंद्र को शक तो हो ही गया था, एकदो बार उस ने पत्नी की पिटाई भी की, लेकिन रमाकांती हमेशा यह सिद्ध करने में सफल रही कि उस का शक झूठा है.

बीवी की आशनाई लायी बर्बादी – भाग 1

उत्तर प्रदेश के हरदोई-कानपुर मार्ग पर हरदोई जिला मुख्यालय से 27 किलोमीटर की दूरी पर एक  कस्बा है बिलग्राम. यहां हरदोई का थाना कोतवाली भी है. इसी कोतवाली क्षेत्र में एक गांव है हैबतपुर. यह गांव बिलग्राम से 4 किलोमीटर पहले ही मुख्य मार्ग पर स्थित है. इसी गांव में रामभजन सक्सेना का परिवार रहता था. मेहनतमजदूरी कर के गुजरबसर करने वाले रामभजन के परिवार में पत्नी सुमित्रा देवी के अलावा 4 बेटे और 4 बेटियां थीं.

रामभजन ने अपने दूसरे नंबर के बेटे रामचंद्र का विवाह लगभग 12 साल पहले हरदोई के ही थानाकोतवाली शहर के अंतर्गत आने वाले गांव पोखरी की रहने वाली रमाकांती से कर दिया था. उस के पिता गंगाराम की मौत हो चुकी थी. उस के 6 भाई और 2 बहनें थीं. भाईबहनों में वह सब से छोटी थी. उस के भाइयों ने मिलजुल कर उस की शादी रामचंद्र से कर दी थी.

रमाकांती ससुराल आई तो उसे ससुराल में रामचंद्र के साथ गृहस्थी बसाने में कोई परेशानी नहीं हुई, क्योंकि ससुराल में सभी अलगअलग अपनेअपने घरों में रहते थे. रामचंद्र भी अन्य भाइयों की तरह मेहनतमजदूरी कर के गुजरबसर कर रहा था. इसलिए रमाकांती के लिए जैसे हालात मायके में थे, वैसे ही ससुराल में भी मिले. रमाकांती एक के बाद एक कर के तीन बेटियों और 2 बेटों यानी 5 बच्चों की मां बनी. इस समय उस की बड़ी बेटी 10 साल की है तो छोटा बेटा 1 साल का.

रामचंद्र का जिस हिसाब से परिवार बढ़ा, उस हिसाब से आमदनी नहीं बढ़ पाई, इसलिए उसे गुजरबसर में परेशानी होने लगी. गांव में मेहनतमजदूरी से इतना पैसा नहीं मिल पाता था कि वह परिवार का खर्चा उठा सकता. जब वह हर तरह से कोशिश कर के हार गया तो उस ने परिवार सहित कहीं बाहर जा कर काम करने का विचार किया.

उस ने जानपहचान वालों से बात की कि वह ऐसे कौन से शहर जाए, जहां उसे आसानी से काम मिल जाए. उस के गांव के कुछ लोग अंबाला में रहते थे. उन्होंने उसे अंबाला चलने की सलाह दी तो वह उन्हीं के साथ पत्नी और बच्चों को ले कर अंबाला चला गया.

वहां उसे लालू मंडी स्थित सिलाई का धागा बनाने वाली एक फैक्ट्री में नौकरी मिल गई, जहां उसे 3 सौ रुपए रोज मिलते थे. पास की ही एक अन्य सिलाई धागा फैक्ट्री में उस ने रमाकांती को भी नौकरी दिला दी. फैक्ट्री के पास ही उस ने एक मकान में किराए का एक कमरा ले लिया और उसी में पत्नीबच्चों के साथ रहने लगा. वह मकान चंडीगढ़ के रहने वाले किसी सरदार का था. मकान काफी बड़ा था, जिस में तमाम किराएदार रहते थे. अंबाला में पतिपत्नी इतना कमा लेते थे कि उन की आसानी से गुजरबसर होने लगी.

रमाकांती सुबह से दोपहर तक की शिफ्ट में काम करती थी. इस के बाद वह कमरे पर आ जाती और बच्चों के साथ रहती. जबकि रामचंद्र 12 घंटे की ड्यूटी करता था. वह सुबह जल्दी निकलता तो घर आने में रात के 9 बज जाते थे.

कोई भी आदमी सुबह से ले कर देर रात तक मेहनत करेगा तो जाहिर है, वह थक कर चूर हो जाएगा. रामचंद्र भी जब घर लौट कर आता तो उस का भी वही हाल होता था. घर पहुंच कर वह खाना खाता और चारपाई पर लेट कर खर्राटे भरने लगता. जबकि 5 बच्चों की मां बनने के बाद भी रमाकांती की हसरतें जवान थीं. उस का मन हर रात पति से मिलने को होता, जबकि रामचंद्र की थकान उस की इच्छाओं का गला घोंट देती थी. वह हर रात पति की बांहों में गुजारना चाहती, जबकि पति के सो जाने की वजह से यह संभव नहीं हो पाता था.

जिस मकान में रामचंद्र परिवार के साथ किराए पर रहता था, उसी मकान में सूरज भी एक कमरा किराए पर ले कर रह रहा था.  बिहार के रहने वाले 25 वर्षीय सूरज की अभी शादी नहीं हुई थी. वह भी धागा बनाने वाली उसी फैक्ट्री में नौकरी करता था, जिस में रामचंद्र करता था. एक ही मकान में रहने की वजह से सूरज और रमाकांती में परिचय हो गया था. जब भी दोनों का आमनासामना होता, एकदूसरे को देख कर मुसकरा देते. धीरेधीरे दोनों में बातचीत भी होने लगी.

सूरज कुंवारा था, इसलिए उस का महिलाओं की ओर आकर्षित होना स्वाभाविक ही था. इसी आकर्षण की वजह से 5 बच्चों की मां रमाकांती के शारीरिक कसाव और आंखों की कशिश में वह ऐसा डूबा कि उस के आगे उसे बाकी की सारी औरतें बेकार लगने लगीं. वह जब भी उसे देखता उस की कामनाएं अंगड़ाइयां लेने लगतीं. रमाकांती पर उस का मन डोला तो वह उसे अपनी कल्पनाओं की दुल्हन मान कर उस के बारे में न जाने क्याक्या सोचने लगा.

रमाकांती पर दिल आते ही सूरज उस पर डोरे डालने लगा. जल्दी ही रमाकांती को भी उस के मन की बात पता चल गई. उसे एक ऐसे मर्द की चाहत थी भी, जो रामचंद्र की जगह ले सके. इसलिए उस का भी झुकाव सूरज की ओर हो गया. जब सूरज ने रमाकांती की आंखों में प्यास देखी तो वह उस के आगेपीछे चक्कर लगाने लगा.

सूरज रामचंद्र के घर भी आनेजाने लगा. वह रमाकांती को भाभी कहता था. इसी रिश्ते की आड़ में वह हंसीमजाक भी करने लगा. इसी हंसीमजाक में कभीकभी वह मन की बात भी कह जाता.

किसी एक की नहीं हुई अनारकली

रिश्तों की कब्र खोदने वाला क्रूर हत्यारा – भाग 4

मांबाप के कत्ल की ठीक तारीख तो उदयन नहीं बता पाया, पर उस ने बताया कि यह कोई 5-6 साल पहले की बात है. उस दिन बारिश हो रही थी. पापा चिकन लेने बाजार गए थे और मम्मी कमरे में अलमारी में कपड़े रख रही थीं. हत्या के 2 हफ्ते पहले उस ने एक इंगलिश चैनल पर ‘वाकिंग डैथ’ नामक सीरियल देख कर मातापिता की हत्या की योजना बनाई थी. हत्या के दिन उदयन ने सुंदरनगर के ही गायत्री मैडिकल स्टोर्स से नींद की गोलियां खरीद ली थीं.

अलमारी में कपड़े सहेज कर रखती इंद्राणी को उदयन ने धक्का दे कर पलंग पर ढकेल दिया. इंद्राणी की बूढ़ी हड्डियों में दम नहीं था, वह अपने हट्टेकट्टे बेटे का ज्यादा विरोध नहीं कर पाईं. कुछ ही देर में उदयन ने उन का गला घोंट दिया.

लगभग आधे घंटे बाद बी.के. दास चिकन ले कर घर आए और इंद्राणी के बारे में पूछा तो उदयन ने सहज भाव से उन्हें बताया कि मां ऊपर कपड़े रख रही हैं. इस बात से संतुष्ट हो कर उन्होंने उदयन से चाय बनाने को कहा तो वह चाय बना लाया और उन के कप में नींद की 5 गोलियां मिला दीं.

चाय पीने के बाद बी.के. दास नींद की आगोश में चले गए तो उदयन ने उन की गला घोंट कर हत्या कर दी. अब समस्या लाशों को ठिकाने लगाने की थी. उन दिनों सुंदरनगर इलाके में कंस्ट्रक्शन का काम जोरों पर चल रहा था. उदयन ने बगल में काम करने वाले एक मजदूर को बुलाया और लौन के दोनों कोनों में गड्ढे खुदवा लिए. देर रात उस ने अपने जन्मदाताओं की लाशें घसीट कर गड्डों में डालीं और उन्हें हमेशा के लिए दफना दिया.

इस के बाद किसी ने बी.के. दास और उन की पत्नी इंद्राणी दास को नहीं देखा और न ही उन के बारे में कोई पूछने वाला था. उदयन की मौसी प्रिया चटर्जी ने जरूर एकाध बार उस के घर आ कर पूछा तो उदयन ने उन्हें टरकाऊ जवाब दे दिया.

भोपाल पुलिस उदयन को ले कर राजधानी एक्सप्रैस से 6 फरवरी को करीब 11 बजे रायपुर पहुंची और सुंदरनगर जा कर उस लौन की खुदाई शुरू करवा दी, जहां उदयन ने अपने मांबाप की कब्र बनाई थी. 3 घंटे की खुदाई के बाद लगभग 6 फुट नीचे से दोनों की खोपडि़यां निकलीं. साथ ही इंद्राणी के कपड़े, सोने की 4 चूडि़यां, चेन, एक ताबीज और बी.के. दास की पैंटशर्ट, बेल्ट और ताबीज भी कब्रों से मिले.

इस बंगले के मौजूदा मालिक हरीश पांडेय हैं, जो खुदाई होते वक्त वहां मौजूद थे. उन्होंने यह मकान उदयन से सुरेंद्र दुआ नाम के ब्रोकर के जरिए खरीदा था. 1800 वर्गफीट पर बने इस मकान का सौदा 30 लाख रुपए में हुआ था जोकि उन्हें सस्ता लगा था. हरीश ने जब यह मकान खरीदा था तब यहां बगीचा नहीं था, बल्कि खाली जमीन थी, जिस पर उन्होंने काली मिट्टी डाल कर गार्डन बनवा लिया था. उस वक्त उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उदयन के मांबाप की कब्रें यहां बनी हुई हैं.

दोपहर ढाई बजे तक खुदाई का काम पूरा हो गया और सारे सबूत मिल गए. रायपुर पुलिस ने उदयन के खिलाफ मांबाप की हत्या का मामला दर्ज कर लिया. उदयन अब चर्चा के साथसाथ शोध का भी विषय बन गया था. 3 राज्यों मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल की पुलिस ने उस के खिलाफ हत्या, अपहरण व धोखाधड़ी जैसे दरजन भर मामले दर्ज किए हैं. रायपुर से उसे बांकुरा पुलिस बंगाल ले गई, फिर उसे वापस रायपुर लाया गया. जाहिर है, सब कुछ साफ होने तक उदयन रिमांड पर भोपाल, रायपुर और कोलकाता के बीच झूलता रहेगा.

7 फरवरी को जब उसे बांकुरा पुलिस ने सीजेएम अरुण कुमार नंदी की अदालत में पेश किया गया तो वहां गणतंत्र समनाधिकार नारी मुक्ति ने विरोध प्रदर्शन करते हुए उस पर पत्थर बरसाए. उदयन की कहानी खत्म सी हो गई है, पर जिज्ञासाएं और सवाल अभी भी बाकी हैं, जिन में से कुछ के जवाब मिल गए हैं और कुछ के मिलना शेष हैं.

अपनी मां इंद्राणी का मृत्यु प्रमाणपत्र बनवाने के लिए उस ने 8 फरवरी, 2013 को इटारसी नगर पालिका में रजिस्ट्रेशन फार्म भरा था. इस में उस ने मां की मौत 3 फरवरी, 2013 को 66 वर्ष की उम्र में होना लिखा था. इंद्राणी का स्थाई पता उस ने रायपुर का ही लिखाया था और अस्थाई पता द्वारा हेलिना दास, गांधीनगर, इटारसी लिखवाया था. इस आधार पर उसे इंद्राणी का डेथ सर्टिफिकेट मिल गया था जबकि पिता बी.के. दास का मृत्यु प्रमाणपत्र उस ने इंदौर जा कर बनवाया था.

जल्द ही साबित हो गया कि उदयन अव्वल दरजे का खुराफाती और चालाक शख्स भी था जो संयुक्त खाते से अपनी मां की पेंशन निकाल रहा था. इस बारे में फेडरल बैंक के कुछ अधिकारी शक के दायरे में हैं. इंद्राणी पेंशनभोगी कर्मचारी थीं. हर पेंशनभोगी को साल में एक बार अपने जीवित होने का प्रमाणपत्र बैंक को देना होता है. आमतौर पर पेंशनधारी खुद बैंक जा कर अपने जीवित होने का प्रमाण दे कर आते हैं.

अस्वस्थता, नि:शक्तता या किसी दूसरी वजह से बैंक जाने में असमर्थ पेंशनर्स को डाक्टरी हेल्थ सर्टिफिकेट देना पड़ता है. कैसे हर साल उदयन अपनी मां के जीवित होने का प्रमाणपत्र बैंक को दे रहा था, यह गुत्थी अभी पूरी तरह नहीं सुलझी है. लेकिन साफ दिख रहा है कि उदयन से किसी बैंक कर्मचारी की मिलीभगत थी.

हालांकि जनवरी 2012 में उस ने मां के जीवित होने का प्रमाण पत्र डिफेंस कालोनी, दिल्ली के डाक्टर एस.के. सूरी से लिया था, जिस की जांच ये पंक्तियां लिखे जाने तक चल रही थीं. अगर शुरू में ही फेडरल बैंक कर्मचारियों ने सख्ती बरती होती तो इंद्राणी की मौत का राज वक्त रहते खुल जाता.

सब कुछ साफ होने के बाद यह भी उजागर हुआ कि उदयन मांबाप की हत्या के बाद अय्याश हो गया था. नशे के साथसाथ उसे अलगअलग लड़कियों से सैक्स करने की लत भी लग गई थी. अपनी हवस बुझाने के लिए वह कालगर्ल्स के पास भी जाता था या फिर उन्हें होटलों में बुला कर ऐश करता था. फेसबुक पर उस के सौ से भी ज्यादा एकाउंट थे, जिन की प्रोफाइल में खुद को वह बड़ा कारोबारी बता कर लड़कियों को फांसता था.

उदयन की एकदो नहीं, बल्कि 40 गर्लफ्रैंड थीं जो उस की हवस पूरी करने के काम आती थीं. इन में कई अच्छे घरों की लड़कियां भी शामिल थीं. उदयन का प्यार दिखावा भर होता था. साल छह महीने में ही एक लड़की से उस का जी भर जाता था और उसे वह बासी लगने लगती थी. फिर किसी न किसी बहाने वह उसे छोड़ देता था. अभी तक 14 ऐसी लड़कियों की पहचान हो चुकी है, जिन के उदयन के साथ अंतरंग संबंध थे. 2 गायब युवतियों को पुलिस ढूंढ रही है, शक यह है कि कहीं उदयन ने इसी तर्ज पर और भी कत्ल तो नहीं किए.

शराब और ड्रग्स के आदी उदयन ने मांबाप का पैसा जम कर अय्याशियों में उड़ाया. ऐसा मामला पहले न मनोवैज्ञानिकों ने देखा है, न ही वकीलों ने और न ही उन पुलिस वालों ने जिन का वास्ता कई अनूठे अपराधियों से पड़ता है. सब के सब उदयन दास की हकीकत जान कर हैरान हैं.

दास दंपति ने हाड़तोड़ मेहनत कर के जो पैसा कमाया था. शायद यह सोच कर कि बुढ़ापा आराम से बेटेबहू और पोते के साथ गुजरेगा. लेकिन उसी बेटे ने उन का बेरहमी से अर्पणतर्पण कर डाला और उन की अस्थियां तक लेने से मना कर दिया.

उदयन की परवरिश का मामला एक गंभीर विषय है जिस पर काफी सोचसमझ कर बोलने और सोचने की जरूरत है, क्योंकि हत्या जैसे संगीन जुर्म की वजह बचपन के एकाकीपन, किशोरावस्था की हिंसा और युवावस्था की क्रूरता को नहीं ठहराया जा सकता.

 

रिश्तों की कब्र खोदने वाला क्रूर हत्यारा – भाग 3

उदयन के पड़ोसियों की नजर में वह अजीबोगरीब यानी असामान्य व्यक्ति था, जो खुद को दुनिया से छिपा कर रखना चाहता था. दरअसल, वह अपनी बुनी एक काल्पनिक दुनिया में रहता था और उसे ही सच मान बैठा था. यानी व्यवहारिकता से उस का कोई सरोकार नहीं रह गया था. सुबहसुबह जब साकेतनगर में रहने वाले संभ्रांत और धनाढ्य लोगों के घरों से नाश्ता बनने की खुशबू आती थी, तब उदयन के घर से गांजे की गंध आ रही होती थी.

उदयन की कोई नियमित या तयशुदा दिनचर्या नहीं थी. वह अकसर शराब के नशे में धुत रहता था. पड़ोसियों के लिए वह एक रहस्य था. कभीकभार बात भी करता था तो खुद को इंटेलीजेंस ब्यूरो का अफसर बताता था. साथ ही जल्द ही अमेरिका शिफ्ट होने की बात भी करता था.

वह ऐसा शायद इसलिए करता था कि लोग उस की शाही जिंदगी के बारे में ज्यादा सिर न खपाएं. महंगी कारों का मालिक उदयन कभीकभार आटोरिक्शा में भी आताजाता दिखता था और रिक्शाचालक को 25-30 रुपए की जगह 500 रुपए थमा दिया करता था. नजदीक की दुकान से वह मैगी दूध बिस्किट जैसे आइटम लाता रहता था और दुकानदार को एकमुश्त भुगतान करता था.

पुलिस वालों ने जब उस के मांबाप के बारे में पूछा तो वह खामोश रहा. इस खामोशी में एक और तूफान छिपा हुआ था. आकांक्षा के कत्ल और लाश बरामदगी में उलझी पुलिस को इतना ही पता चला था कि उदयन के पिता का नाम बी.के. दास है और वे भोपाल के भेल के रिटायर्ड अफसर हैं और मां इंद्राणी भी सरकारी कर्मचारी रह चुकी हैं.

जब आकांक्षा की लाश बरामद हो गई और उदयन ने जुर्म कबूल लिया तो पुलिस का ध्यान उदयन से जुड़ी दूसरी बातों पर गया. काफी बवंडर मच जाने के बाद भी उस का कोई हमदर्द या दोस्त तो क्या कोई सगासंबंधी भी सामने नहीं आया, यह एक हैरानी की बात थी.

रिमांड पर लेने के बाद पुलिस ने जब सख्ती बरती तो उदयन बारबार बयान बदलता रहा. जब उस के दिल्ली आईआईटी से पढ़ने की बात भी झूठी निकली तो पुलिस वालों का माथा ठनका कि यह हत्यारा पागल ही नहीं बल्कि शातिर भी है. जब उस के मांबाप के फोन नंबर मांगे गए तो पहले तो वह मुकर गया कि उन के नंबर उस के पास नहीं हैं. लेकिन फिर दबाव पड़ने पर उस ने मां इंद्राणी का एक नंबर दिया जो बंद जा रहा था.

2 मकानों के किराए और मां की पेंशन से रईसी से जिंदगी गुजारने वाला उदयन कह रहा था कि उस की मां अमेरिका में है. लेकिन अब उस की बातें बयान और चेहरा साफसाफ चुगली कर रहे थे कि वह झूठ बोल रहा है. लिहाजा पुलिस ने उस के साथ सख्ती की, जो कामयाब रही.

उस की मां इंद्राणी दास डीएसपी नहीं थी, जैसा कि उस ने आकांक्षा और पड़ोसियों को बताया था. उस की मां भोपाल में सांख्यिकी विभाग में अधिकारी थीं और शिवाजीनगर के जी टाइप सरकारी क्वार्टर 122/43 में रहती थीं. पति के रायपुर शिफ्ट होने के बाद वह भी उन के साथ रायपुर चली गई थीं.

दरअसल, उदयन की कोशिश यह थी कि पुलिस वालों का ध्यान और काररवाई आकांक्षा के कत्ल में ही उलझ कर रह जाए. कह सकते हैं कि यह अहसास या उम्मीद इस चालाक कातिल को थी कि उसे आकांक्षा का हत्यारा साबित करना कानूनन उतना आसान काम नहीं है, जितना कि दिख रहा है.

गलत नहीं कहा जाता कि पुलिस की मार पत्थरों से भी मुंह खुलवा देती है, फिर उदयन साइको या शातिर ही सही था तो हाड़मांस का पुतला ही, जो 48 घंटे में ही टूट गया. इस के बाद सामने आई एक और कहानी, जिसे सुन कर पुलिस वालों के भी तिरपन कांप उठे. अब तक देश भर की दिलचस्पी इस साइको किलर में और बढ़ गई थी, जिस के कारनामों से अखबार भरे पड़े थे. जबकि न्यूज चैनल्स का तो वह हीरो बन गया था. 8 नवंबर को नोटबंदी के बाद यह दूसरी घटना थी, जिस पर आम लोग तरहतरह से अपनी प्रतिक्रियाएं दे रहे थे.

4 फरवरी को उदयन ने न केवल मान लिया बल्कि बता भी दिया कि उस ने अपने मांबाप की भी हत्या की थी और उन्हें रायपुर वाले घर के लौन में दफना दिया था. यानी रिश्तों की कब्र खोदने की उस की सनक या बीमारी काफी पुरानी थी. बहरहाल, फिर से एक नई कहानी इस तरह उभर कर सामने आई.

उदयन अपने मांबाप का एकलौता बेटा था. चूंकि मांबाप दोनों कामकाजी थे, इसलिए उसे कम ही वक्त दे पाते थे. बचपन से ही वह उद्दंड प्रवृत्ति का था. शुरुआती पढ़ाई के लिए उसे भोपाल के नामी सेंट जोसेफ को-एड स्कूल में दाखिला दिलाया गया था.

पढ़ाईलिखाई में उस का मन नहीं लगता था और वह अकसर अकेले रहना पसंद करता था. ये वे समस्याएं थीं जो आमतौर पर उन कामकाजी अभिभावकों के बच्चों के सामने पेश आती हैं, जिन्हें पैसों की कोई कमी नहीं होती. उदयन जब सातवीं कक्षा में था तब उस ने स्कूल में दीवार पर मारमार कर एक सहपाठी का सिर फोड़ दिया था, जिस की वजह से उसे स्कूल से निकाल दिया गया था.

संभ्रांत बंगाली दास परिवार जहांजहां भी रहा, लोगों से कटा ही रहा. इधर उदयन की शैतानियां इतनी बढ़ गई थीं कि मांबाप उसे पारिवारिक समारोहों में भी नहीं ले जाते थे. वे लोग उसे काबू में रखने के लिए बातबात पर डांटतेडपटते रहते थे.

मेरे मांबाप हिटलर सरीखे थे, अपनी कहानी सुनाते हुए उस ने यह बात जोर दे कर पुलिस को बताई. उदयन के हिंसक और असामान्य व्यवहार के बावजूद उस के पिता बी.के. दास की इच्छा थी कि बेटा गणित पढ़े और इंजीनियर बने. लेकिन बेटे की इस मनोदशा को वे नहीं समझ पाए थे कि वह उन से मरनेमारने की हद तक नफरत करने लगा है.

भोपाल से रिटायर होने के बाद बी.के. दास ने रायपुर में अपनी खुद की फैक्ट्री खोल ली थी. अपने सेवाकाल के दौरान दोहरी कमाई के चलते वे खासी जायदाद बना चुके थे. यानी वे एक अच्छे निवेशक जरूर थे पर अच्छे पिता नहीं बन पाए थे. रायपुर के पौश इलाके सुंदरनगर में एनसीसी औफिस के पास भी उन्होंने पत्नी के नाम से एक शानदार मकान बनवाया था और वहीं रहने लगे थे. उदयन का दाखिला भी उन्होंने वहीं के एक स्कूल में करा दिया था. जैसेतैसे 12वीं पास करने के बाद उदयन का दाखिला एक प्राइवेट कालेज में करा दिया गया.

उदयन ने कभी अपने कैरियर और जिंदगी के बारे में नहीं सोचा. उलटे कालेज में आ कर वह नशे का भी आदी हो गया था. यहां भी उस का कोई दोस्त नहीं था और मातापिता भी किसी से संपर्क नहीं रखते थे. यानी पूरा परिवार एकाकी जीवन जीने का आदी हो चला था.

पढ़ाई के बारे में पूछने पर वह मातापिता से साफ झूठ बोल जाता था. जब पढ़ाई खत्म होने का वक्त आया तो उस ने घर में झूठ बोल दिया कि उसे डिग्री मिल गई है. डिग्री मिल गई तो कहीं नौकरी करो, पिता के यह कहने पर उदयन को लगने लगा कि पढ़ाई का झूठ अब छिपने वाला नहीं है. मांबाप नहीं मानेंगे, यह सोच कर उदयन ने एक खतरनाक फैसला ले लिया. उस ने सोच लिया कि क्यों न मांबाप दोनों को ठिकाने लगा दिया जाए, फिर कोई रोकनेटोकने नहीं वाला होगा. करोड़ों की जायदाद व दौलत भी उस की हो जाएगी. उस ने ऐसा ही किया भी.

                                                                                                                                         क्रमशः