
नंदिनी की कातिल निगाहेंक्यों जमी थीं जेठ पर
सातवें एपीसोड में बबलू को तलाशने की बात होती है. वह अपनी टीम के साथ दुख व्यक्त करते हैं कि वह एक बच्चा नहीं बचा पाए. आगे की कहानी में बबलू भागाभागा फिर रहा होता है. देवी से बात करना चाहता है, पर वह फोन काट देती है. तब वह शेख के पास जाता है. पर वह भी दुत्कार कर भगा देता है.
तब बबलू अपनी प्रेमिका और हर अपराध में सहयोगी पिंकी को अविनाश के पास भेज कर आत्मसमर्पण की बात करता है. पर वह आत्मसमर्पण कर पाता, उस के पहले ही देवी अपने सहयोगियों के साथ जा कर बबलू के गैंग की हत्या कर देती है. इसी के साथ शेख बबलू को जिंदा दफन करवा देता है. देवी की भूमिका अभिमन्यु सिंह ने की है तो अजीमुद्दीन गुलाम शेख की भूमिका अमित सियाल ने की है.
इस की जानकारी इंस्पेक्टर अविनाश को हो जाती है. उन्हें यह भी पता चल जाता है कि राकेश अग्रवाल के बेटे का अपहरण शेख ने ही करवाया था और उसी के कहने पर बबलू ने बच्चे की हत्या कर दी थी. यह सब वोटों के लिए किया गया था.
शेख रफीक गाजी के भाई इमरान गाजी को देवी मां से मिलवाता है, जो उसे पिस्टल देती है. इस के बाद इमरान गाजी कालेज का चुनाव लड़ता है और गुंडई के बल पर जीत भी जाता है. इमरान गाजी का रोल जोहैब फारुकी ने किया है. यह अपनी भूमिका में बिलकुल नहीं जमता.
आठवें और अंतिम एपीसोड में इंस्पेक्टर अविनाश शेख के घर मिलने जाते हैं, जहां शेख और अविनाश की कहासुनी होती है, जिस में दोनों ही एकदूसरे को धमकाते हैं. इस के बाद गृहमंत्री का भाई नशा कर रहा होता है तो उस की पत्नी नंदिनी उसे फोन करती है.
वह फोन नहीं उठाता तो वह अपने जेठ यानी गृहमंत्री के पास चली जाती है और सैक्स करने का औफर देती है. मंत्रीजी मजबूर हो कर उस का यह औफर स्वीकार करते हैं, क्योंकि उन का भाई पत्नी को संतुष्ट नहीं कर पा रहा था. घर की इज्जत बचाने के लिए वह उस की इच्छा पूरी करते हैं.
शेख ने क्यों की अपने अम्मीअब्बू की हत्या
दूसरी ओर इंस्पेक्टर अविनाश मिश्रा देवी मां यानी देवीकांत चतुर्वेदी को अपने औफिस बुलाते हैं. दोनों ही एकदूसरे को देख लेने की धमकी देते हैं. अविनाश उस से बबलू पांडेय के गैंग के मारे जाने के बारे में पूछते हैं. पर वह सबूत की बात करता है.
दोनों के ही पास पौलिटिकल पावर है. इसलिए देवी उल्टीसीधी बातें कर के चला जाता है. इस के बाद उस स्कूल में एक बच्चे की हत्या हो जाती है, जिस स्कूल में अविनाश का बेटा पढ़ता है. लेकिन इस का खुलासा अभी नहीं होता, शायद इस के बारे में आने वाले सीजन में दिखाया जाए.
इसी एपीसोड में शेख के बारे में फ्लैशबैक में दिखाया जाता है कि उस की बहन रुखसाना, जिस का रोल जिया सिद्दीकी ने किया है, को उस के अम्मीअब्बू बेच देते हैं तो शेख अपने अम्मीअब्बू की हत्या कर के घर में आग लगा देता है और अपनी बहन को बचाने जाता है, जहां बहन की रीढ़ में गोली लग जाती है, जिस की वजह से वह हमेशा के लिए अपाहिज हो जाती है.
गृहमंत्री राकेश अग्रवाल से मिलने उन के घर जाते हैं और उन से बताते हैं उन के बेटे की हत्या अजीमुद्दीन गुलाम शेख ने करवाई है. तब अग्रवाल इंस्पेक्टर अविनाश से मिलते हैं और कहते हैं कि पैसा चाहे जितना लगे, पर वह शेख को गिड़गिड़ाते हुए, चीखते हुए, जान की भीख मांगते हुए सुनना और मरते हुआ देखना चाहते हैं.
इलेक्शन के लिए देवी और शेख हथियार मंगाते हैं, जो राज्य में सभी जगह बाहुबलियों के पास भिजवा दिए जाते हैं. इसी बीच छात्र नेता इमरान गाजी अविनाश के पिता की पिटाई कर देता है.
आगे क्या हुआ, श्रीप्रकाश शुक्ला को कैसे मारा गया, शेख और देवी का क्या हुआ, यह देखने के लिए अगले सीजन का इंतजार करना होगा.
रणदीप हुड्डा
रणदीप हुड्डा का जन्म 20 अगस्त, 1976 को हरियाणा के रोहतक में डा. रणबीर हुड्डा और आशा हुड्डा के घर हुआ था. रणदीप के पिता डा. रणबीर हुड्डा सर्जन हैं तो मां सामाजिक कार्यकर्ता.
रणदीप का ज्यादातर समय अपनी दादी के साथ रोहतक में ही बीता, क्योंकि उस के मातापिता का अधिकतर समय यात्रा में ही बीतता था. वे ज्यादातर मध्यपूर्व में ही रहते थे. उन की बड़ी बहन अंजलि सांगवान एमबीबीएस डाक्टर हैं और छोटा भाई संदीप हुड्डा एक सौफ्टवेयर इंजीनियर है.
रणदीप की पढ़ाई मोतीलाल नेहरू स्कूल औफ स्पोट्र्स हरियाणा के एक बोर्डिंग स्कूल से हुई, जहां उस ने तैराकी और घुड़सवारी में राष्ट्रीय स्तर पर पदक जीते. इस के बाद उसे थिएटर में रुचि पैदा हुई तो वह स्कूल के नाटकों में हिस्सा लेने लगा. घर वाले चाहते थे कि वह डाक्टर बने, इसलिए उस का दाखिला दिल्ली पब्लिक स्कूल आर.के. पुरम में करा दिया गया.
स्कूली पढ़ाई पूरी कर के रणदीप आस्ट्रेलिया चला गया, जहां उस ने व्यवसाय प्रबंधन और मानव संसाधन प्रबंधन में मास्टर डिग्री ली और इस बीच उस ने चीनी रेस्त्रां, कार धोने, वेटर के रूप में और 2 साल तक टैक्सी ड्राइवर के रूप में काम किया. फिर वह दिल्ली आ गया, जहां एक एयरलाइन के विपणन विभाग में काम करने के साथ मौडलिंग और शौकिया थिएटर में काम करना शुरू किया.
नाटक ‘टू टीच हिज ओन’ के अभ्यास के दौरान निर्देशक मीरा नायर ने अपनी आगामी फिल्म में एक भूमिका के लिए औडिशन देने को हुड्डा से संपर्क किया.
फिल्मों के अलावा रणदीप हुड्डा सुष्मिता सेन के साथ अपने संबंधों को ले कर सुर्खियों में आया, लेकिन बाद में उस का यह संबंध टूट गया. हुड्डा की फिल्मों के अलावा सामाजिक कार्यों में भी रुचि है.
उर्वशी रौतेला
उर्वशी रौतेला 25 फरवरी, 1994 को हरिद्वार में एक गढ़वाली राजपूत मीरा रौतेला और मनवर सिंह रौतेला परिवार में पैदा हुई थी. उस का परिवार कोटद्वार में रहता था, इसलिए उर्वशी की पढ़ाई कोटद्वार के सेंट जोसेफ कौन्वेंट स्कूल में हुई. कालेज की पढ़ाई उस ने दिल्ली के गार्गी कालेज से की.
उर्वशी 15 साल की थी, तभी उसे विल्स लाइफस्टाइल फैशन इंडिया फैशन वीक में ब्रेक मिला. उस ने मिस टीन इंडिया 2009 का खिताब भी जीता. एक युवा मौडल के रूप में उस ने लक्मे फैशन वीक, अमेजन फैशन वीक, बौंबे फैशन वीक और दुबई फैशन वीक के लिए शो स्टौपर के रूप में रैंप वाक किया.
रौतेला ने इंडियन प्रिंसेज 2011 और मिस एशियन सुपर मौडल 2011 का खिताब भी जीता. उस ने मिस टूरिज्म क्वीन औफ द ईयर 2011 का खिताब भी जीता है, जो चीन में हुआ था. वह यह खिताब जीतने वाली पहली भारतीय महिला बनी.
इसी बीच उसे फिल्म ‘इश्कजादे’ का औफर मिला था, पर उस ने इस औफर को ठुकरा दिया था. क्योंकि उस का ध्यान मिस यूनिवर्स प्रतियोगिता पर था. उस ने भारत की ओर से इस प्रतियोगिता का प्रतिनिधित्व जरूर किया, पर उसे स्थान नहीं मिला.
रौतेला ने अपने हिंदी फिल्म करिअर की शुरुआत ‘सिंह साब द ग्रेट’ से की, जिस में उस ने सनी देओल के साथ मुख्य भूमिका निभाई थी. फिर तो धीरेधीरे उसे फिल्मों में काम मिलने लगा और वह व्यस्त होती गई.
मंत्रीजी के बेडरूम में क्यों गई थी नंदिनी
इस के बाद शुरू होता है फिल्मी ड्रामा. इंस्पेक्टर अविनाश के पास एक महिला का फोन आता है, जो उन्हें बताती है कि बिट्टू चौबे ऋषिकेश में छिपा है. बाद में पता चला कि यह सूचना बिट्टू चौबे की पत्नी ने ही दी थी. इंस्पेक्टर अविनाश अपनी टीम के साथ ऋषिकेश पहुंच जाते हैं और फिल्मी स्टाइल में बिट्टू चौबे को मार गिराते हैं.
यहां एक नौटंकी यह होती है कि पति के एनकाउंटर के बाद अचानक उस की पत्नी घटनास्थल पर पहुंच जाती है और पति की लाश देख कर फूटफूट कर रोने लगती है. तब इंस्पेक्टर अविनाश उस के हाथों में कुछ रुपए थमाते हैं. यहां पता चलता है कि किरण कौशिक की हत्या शूटर बिट्टू चौबे ने ही की थी.
इस के बाद राज्य के डीजीपी समर प्रताप सिंह एसटीएफ टीम के साथ खुशी सेलिब्रेट कर रहे होते हैं तो अचानक उन्हें याद आता है कि इस बात को राज्य के गृहमंत्री को भी बताना चाहिए. वह गृहमंत्री को फोन करते हैं तो फोन उन के छोटे भाई की पत्नी नंदिनी उठाती है.
डीजीपी मंत्रीजी से बात कराने को कहते हैं तो नंदिनी फोन ले कर मंत्रीजी के कमरे के सामने जाती है. उस समय मंत्रीजी पूरे जोश के साथ सैक्स कर रह होते हैं, जिस का अहसास नंदिनी को हो जाता है. वह उदास हो जाती है, क्योंकि उस का नशेड़ी पति कभी उस के साथ सैक्स नहीं करता था. इस की वजह यह थी कि नशे की लत की वजह से वह सैक्स करने लायक ही नहीं रह गया था.
नंदिनी मंत्रीजी का दरवाजा खटखटाती है तो मंत्रीजी बेमन से गाउन पहन कर दरवाजा खोलते है. वह उन्हें फोन थमाती है तो वह फोन ले कर अंदर चले जाते हैं. पर उस समय नंदिनी का मन सैक्स के लिए बेचैन हो उठा था, इसलिए वह मंत्रीजी के कमरे के बाहर ही खड़ी रहती है. नंदिनी की भूमिका में आयशा एस. मेमन है, जो खूबसूरत भी है और सैक्सी भी.
सेलिब्रेशन के दौरान ही इंस्पेक्टर अविनाश की टीम के सदस्य बलजीत सिंह को अपनी पत्नी की याद आती है, जिस से उन की अधिक शराब पीने की वजह से लड़ाई हो गई थी. बलजीत की पत्नी सुमन डाक्टर है. बलजीत का रोल शालीन भनोट ने किया है, जो एक युवा कलाकार है. वह उसे फोन करता है, पर वह फोन नहीं उठाती, जिस से वह दुखी हो जाता है. अविनाश उसे समझाते हैं.
भाटी को किस ने लगाया जहर का इंजेक्शन
अगले दृश्य में गुड्डू अंसारी का जिक्र आता है, जो अवैध हथियार सप्लाई करता था. एसटीएफ यानी इंस्पेक्टर अविनाश मिश्रा की टीम गुड्डू अंसारी की शुगर मिल पर पहुंचती है, जहां हथियारों से भरा ट्रक पकड़ा जाता है.
मुठभेड़ में गुड्डू अंसारी और उस के गैंग के सारे सदस्य मारे जाते हैं. लेकिन गुड्डू के यहां हथियार खरीदने आया भाटी फिल्मी स्टाइल में भाग निकलता है तो अविनाश मिश्रा उसे फिल्मी स्टाइल में ही पकड़ते हैं और ला कर उसे इंट्रोगेशन रूम में बंद कर देते हैं.
भाटी से पूछताछ चल रही होती है कि स्पैशल सेल का अधिकारी दासगुप्ता अपनी टीम के साथ एसटीएफ के औफिस पहुंच जाता है और बवाल कर देता है. उसी बीच पूछताछ के दौरान भाटी की मौत हो जाती है, जिस से इंस्पेक्टर अविनाश सकते में आ जाते हैं. अपनी टीम पर वह चिल्लाते हैं.
इस की बड़ी वजह यह थी कि उन्हें जो जानना था, वह जान नहीं पाए थे. दूसरी वजह इस से एसटीएफ की बड़ी बदनामी हुई, क्योंकि उस की मौत एसटीएफ की हिरासत में हुई थी. इसी वजह से रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में इनक्वायरी के आदेश हो गए. पूरी टीम को जांच का सामना करना पड़ता है.
पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पता चला कि भाटी की मौत जहर से हुई थी, जिस में भाटी को चाय पिलाने वाले कांस्टेबल लक्ष्मीकांत को सस्पेंड कर दिया जाता है. पर बाद में पता चलता है कि भाटी को जहर इंजेक्शन से दिया गया था, इसलिए लक्ष्मीकांत का सस्पेंशन खत्म हो जाता है. लक्ष्मीकांत की भूमिका में वी. शांतनु है.
बीचबीच में पारिवारिक ड्रामा भी चलता रहता है. अंत में दिखाया जाता है कि अजीमुद्दीन गुलाम शेख किसी डाक्टर को फोन कर के कहता है कि आप ने काम को बहुत अच्छी तरह अंजाम दिया है, जिस के लिए मैं आप को नजराना भिजवा रहा हूं और फिर एक बैग में रुपए भर कर वह अपने आदमी से भिजवाता है.
एसटीएफ क्यों बनी थी बाराती
चौथे एपीसोड की शुरुआत बड़े ही भयानक दृश्य से होती है. एक आदमी को बांध कर रखा जाता है, जिस का पूरा शरीर खून से लथपथ है. शेख यानी अजीमुद्दीन गुलाम शेख उस के शरीर में ड्रिल मशीन चला कर उसे टौर्चर करता है और अंत में उस की हत्या कर देता है. पर यहां यह नहीं बताया गया कि शेख उस के साथ ऐसा क्यों करता है?
इस के बाद इंस्पेक्टर अविनाश एक नाचने वाली यानी मीटू पंजाबन के यहां जाते हैं, जहां उन्हें मुजफ्फरनगर के नामी बदमाश रफीक गाजी के बारे में पता चलता है. यहां पर मीटू पंजाबन का रोल आकांक्षा पुरी ने किया है. पर साथ ही यह भी पता चलता है कि पूरा गांव उस की मदद के लिए खड़ा रहता है. तब इंस्पेक्टर अविनाश मिश्रा अपनी टीम को बाराती बना कर रफीक के गांव जाते हैं और उसे पकड़ कर जंगल में लाते हैं, जहां उस का एनकाउंटर कर देते हैं.
रफीक गाजी के अंतिम संस्कार में शेख पहुंचता है और मुसलिमों को भड़काता है, खासकर रफीक के छोटे भाई को बदला लेने के लिए उकसाता है. रफीक से मुठभेड़ में बलजीत को गोली लग जाती है.
इस के बाद शेख गृहमंत्री वीरभूषण से मिलता है और उन्हें धमकी देता है कि वह एसटीएफ को थोड़ा काबू में रखें, क्योंकि ज्यादातर उसी के सपोर्टर मारे जा रहे हैं. जब वह बाहर निकलने लगता है तो व्यवसायी राकेश अग्रवाल मिल जाता है, जिन से पैसों के लेनदेन की बात होती है.
दूसरी ओर अविनाश की टीम श्रीप्रकाश शुक्ला को ठिकाने लगाने की बात करती है. तभी पता चलता है कि भाटी ने एसटीएफ औफिस से जो फोन किया था, वह कोई देवी है.
चौथे एपीसोड में ही लक्ष्मीकांत ड्यूटी पर वापस आता है. इस के बाद इंस्पेक्टर अविनाश मिश्रा देवी यानी देवीकांत चतुर्वेदी से मिलने उस के घर यानी विशाल मठ जाते हैं, जहां कस्टडी में मारे गए भाटी को ले कर चर्चा होती है, साथ ही इंस्पेक्टर अविनाश भाटी को ले कर देवी को धमकी भी देते हैं.
40 बच्चों का क्यों किया था अपहरण
पांचवें एपीसोड की शुरुआत डीजीपी समर प्रताप सिंह के घर से पारिवारिक ड्रामे से होती है. इस के बाद गृहमंत्री के घर का पारिवारिक ड्रामा दिखाया जाता है, जिस में वह अपने छोटे भाई शशि की पत्नी नंदिनी को पिस्टल देते हुए राजनीति में आने को कहते हैं.
दूसरी ओर देवी शेख के घर जाता है और राजनीति की बातें करते हुए इंस्पेक्टर अविनाश के बारे में कहता है कि गृहमंत्री ने उसे उन के पीछे लगा रखा है. शेख और गृहमंत्री अपनीअपनी बिसात बिछाने में लगे हैं.
इसी एपीसोड में अग्रवाल के बेटे गट्टू का अपहरण हो जाता है, जिस की जांच एसटीएफ को सौंप दी जाती है. इस में इंस्पेक्टर अविनाश मिश्रा जेल में बंद एक अपराधी की मदद लेते हैं. पर इस मामले में इंस्पेक्टर अविनाश फेल हो जाते हैं.
बबलू पांडेय नाम का अपराधी फिरौती भी ले जाता है और बच्चे की हत्या भी कर देता है, जिस का इंस्पेक्टर अविनाश को काफी मलाल होता है. शेख अग्रवाल के यहां उन के बेटे के अंतिम संस्कार में आता है और लोगों को सरकार के खिलाफ भड़काता है.
छठें एपीसोड में इंस्पेक्टर अविनाश का बेटा स्कूल से घर नहीं आता. इस के बाद पूरा पुलिस बल अविनाश के बेटे की तलाश में लग जाता है. तभी पता चलता है कि 40 बच्चों को ट्रक में भर कर तस्करी के लिए ले जाया जा रहा है.
अविनाश मिश्रा की टीम उन बच्चों को आजाद कराती है. अविनाश मिश्रा ड्राइवर को मार देते हैं. घर लौट कर आते हैं तो थोड़ी देर में उन का बच्चा आ जाता है. इस के बाद वह बबलू पांडेय के पीछे पड़ जाते हैं. बबलू इस से घबरा कर अपने आका शेख से मदद मांगता है. पर वह मदद करने के बजाय उसे दुत्कार कर भगा देता है.
बीचबीच में पारिवारिक ड्रामा चलता है. अस्पताल में भरती बलजीत का इलाज उस की पत्नी सुमन कर रही होती है. वह उस से संबंध सुधारने की कोशिश करता है.
दूसरी ओर बेटे की पुलिस की नौकरी से नफरत करने वाले अविनाश के पिता उसे धिक्कारते हैं कि राकेश अग्रवाल के बेटे की जगह उन का पोता वरुण भी हो सकता था. इसी के साथ फ्लैशबैक में इंस्पेक्टर अविनाश का बचपन दिखाया जाता है.
कहानी आगे बढ़ती है तो कानपुर में एक बहुत ही दुखद घटना घट जाती है, जिस में एक 3 बदमाश घर में घुस कर लूटपाट तो करते ही हैं, साथ ही घर की 3 महिलाओं के साथ दुष्कर्म भी करते हैं. इस घटना से पूरा प्रदेश सिहर उठता है.
मामला एसटीएफ को सौंपा जाता है तो इंस्पेक्टर अविनाश अपनी टीम के साथ बदमाशों की खोज में लग जाते हैं. एक बदमाश का स्केच बनवा कर आखिर वह बदमाशों तक पहुंच ही जाते हैं और तीनों बदमाशों को मार गिराते हैं.
लेखक: राहुल शुक्ला, समीर अरोड़ा, उत्कर्ष खुराना, संजय मासूम
निर्देशक: नीरज पाठक
कलाकार: रणदीप हुड्डा, अभिमन्यु सिंह, उर्वशी रौतेला, अमित सियाल, फ्रेडी दारूवाला, गोविंद नामदेव, जाकिर हुसैन, किरण कुमार, राहुल मित्रा, वरुण मिश्रा, वी शांतनु, प्रवीण सिंह सिसोदिया, आयशा एस. मेमन, संदीप चटर्जी, आकांक्षा पुरी आदि.
यह वेब सीरीज एक एंटरटेनिंग थ्रिलर है. उत्तर प्रदेश के सुपरकौप कहे जाने वाले अविनाश मिश्रा के किरदार में रणदीप हुड्डा ने खुद को बहुत ही शानदार तरीके से ढालने की कोशिश की है. उत्तर प्रदेश की भाषा भी वह अच्छी तरह बोल लेता है.
जियो सिनेमा पर 8 एपीसोड में रिलीज हुई वेब सीरीज ‘इंस्पेक्टर अविनाश’ के साथ उत्तर प्रदेश के एनकाउंटर स्पैशलिस्ट अविनाश मिश्रा एक बार फिर चर्चा में आ गए हैं. उत्तर प्रदेश के हमीरपुर में पैदा हुए अविनाश मिश्रा साल 1982 में पुलिस में भरती हुए थे.
एसटीएफ का गठन होने से ले कर साल 2009 तक वह एसटीएफ में रहे. डिप्टी एसपी के पद से वह रिटायर हुए थे. उन के पिता स्वतंत्रता सेनानी थे. वह बिलकुल नहीं चाहते थे कि बेटा पुलिस की नौकरी में जाए. लेकिन अविनाश मिश्रा की जिद थी पुलिस में जाने की. उन में अपराधियों के सफाए का जुनून था.
उत्तर प्रदेश के अपराधों से परिचय कराने वाली इस सीरीज के लेखकों ने सच्ची घटनाओं पर कहानी लिखने की कोशिश तो की है, पर देखा जाए तो वह बढिय़ा कहानी लिख नहीं पाए. जबकि इस के एक लेखक संजय मासूम ने मनोहर कहानियां के संपादकीय विभाग में कई सालों तक काम भी किया है और उन्होंने कई हिट फिल्मों के डायलौग भी लिखे हैं.
अगर किसी के जीवन पर कहानी लिखी जा रही है तो उस के जीवन की एकएक घटना को बारीकी से देखना और लिखना चाहिए. यह कोई फिल्म तो थी नहीं कि समय का बंधन था, इसलिए इसे और विस्तार से लिखा जा सकता था, जिस से सीरीज और ज्यादा रोमांचक और दर्शनीय बना जाती.
सीरीज में ऐसी तमाम कमियां हैं, जो दर्शकों को सीरीज में अधूरी सी लगती हैं और उस के रोमांच को भी कम करती हैं. साथ ही उसे सोचने पर मजबूर करती हैं कि उस का क्या हुआ होगा?
इंस्पेक्टर अविनाश जब बिट्टू चौबे का एनकाउंटर करते हैं तो अविनाश उस की पत्नी के हाथों में कुछ रुपए थमाते हैं, वह भी भीड़ के सामने. यह सीन तो बिलकुल हजम नहीं होता. डायरेक्टर को यहां पर ध्यान देना चाहिए था. वह उस की मदद अलग तरह से भी करवा सकते थे.
इस के अलावा जब भाटी की मौत होती है और यह पता चलता है कि उसे इंजेक्शन से जहर दिया गया था तो इस बात को बीच में छोड़ देना एक तेजतर्रार पुलिस वाले के लिए अच्छा नहीं लगता.
बबलू पांडेय की प्रेमिका पिंकी को लापता कर देना भी सोचने को मजबूर करता है, जबकि अग्रवाल के बेटे के अपहरण की वह एक मजबूत गवाह और कड़ी थी. उसी ने इंस्पेक्टर अविनाश की बबलू पांडेय से बात भी कराई थी. इसी तरह इंस्पेक्टर अविनाश का बेटा लापता होता है और फिर अचानक घर वापस आ जाता है, पर यहां यह नहीं बताया जाता कि वह कहां था.
इसी तरह की सीरीज में और भी तमाम कमियां हैं, जो एक सत्यकथा को झूठा साबित करने की कोशिश करती हैं.
इस ओर न तो डायरेक्टर ने ध्यान दिया, न लेखकों ने. इस सीरीज ने दर्शकों को अपनी ओर खींचा जरूर है, लेकिन लेखकों और डायरेक्टर ने बारीकी से एकएक बात पर ध्यान दिया होता तो शायद यह सीरीज और ज्यादा लोकप्रिय होती और मील का पत्थर भी साबित होती, साथ ही एक जीवित चरित्र को और लोकप्रियता दिलाती. इस में ऐसे तमाम दृश्य हैं, जो सत्य लगने के बजाय सिनेमाई लगते हैं, जो एक सत्यकथा को झूठा साबित करते हैं.
पहले एपीसोड की शुरुआत में ही यानी प्रस्तावना में इंस्पेक्टर अविनाश का आतंक दिखाया गया है. एक थाने में अचानक एक माफिया सरगना महाकाल सिंह उपस्थित होता है, जिसे देख कर सारे पुलिस वाले घबरा जाते हैं. लेकिन पता चलता है कि वह माफिया थाने पर अटैक करने नहीं, बल्कि आत्मसमर्पण करने आया था. उस का कहना था कि जेल में रह कर वह जिंदा तो रहेगा, क्योंकि बाहर अविनाश मिश्रा उसे जीने नहीं देगा.
महाकाल सिंह की भूमिका किसी छोटेमोटे कलाकार ने की है. इस के बाद इंस्पेक्टर अविनाश मिश्रा ने एक माफिया नेता का एनकाउंटर गंगा में डुबकी लगा कर किया.
क्यों बनानी पड़ी एसटीएफ
कहानी में आगे न्यायालय परिसर में इंस्पेक्टर अविनाश मिश्रा को दिखाया जाता है, जहां उन के जिंदाबाद के नारे लग रहे होते हैं. न्यायालय में वह इसलिए आए हैं, क्योंकि उन पर 3 लड़कों के फरजी एनकाउंटर का आरोप था. उन्होंने न्यायालय में जज के सामने स्वीकार भी किया कि उन्होंने ही ये एनकाउंटर किए थे और मौकाएवारदात पर वह शराब पी कर गए थे.
इसी के बाद फ्लैशबैक में सीरीज शुरू होती है. इंस्पेक्टर अविनाश मिश्रा की भूमिका रणदीप हुड्डा ने की है. जैसा कि रणदीप के बारे में कहा जाता है कि वह एक अच्छा कलाकार है, उसी तरह उस ने इंस्पेक्टर अविनाश की भूमिका बखूबी निभाई भी है.
उस समय उत्तर प्रदेश में गुंडों का आतंक था. हालात यह थे कि एक माफिया (श्रीप्रकाश शुक्ला) ने तो मुख्यमंत्री की हत्या की सुपारी ले ली थी. ऐसे में राज्य के मुख्यमंत्री गृहमंत्री की उपस्थिति में पुलिस अधिकारियों की मीटिंग करते हैं.
मुख्यमंत्री की भूमिका में जहां किरण कुमार है, वहीं गृहमंत्री की भूमिका फ्रेडी दारूवाला ने की है. ये दोनों कलाकार भले ही मंझे हुए हैं, पर मुख्यमंत्री की भूमिका में न तो किरण कुमार ही जमता है और न ही गृहमंत्री की भूमिका में फ्रेडी दारूवाला. ये दोनों ही कलाकार नौटंकी करते लगते हैं.
मीटिंग में प्रदेश के डीजीपी समर प्रताप सिंह एक ऐसी पुलिस फोर्स गठित करने की बात करते हैं, जो प्रदेश के अपराधियों को काबू कर सके और उन्हें उन के किए की सजा दे सके.
डीजीपी समर प्रताप सिंह की भूमिका में जाकिर हुसैन है. वह सीरीज में दिखाई तो कम दिया है. इस के बाद स्पैशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) का गठन होता है, जिस में इंस्पेक्टर अविनाश मिश्रा को प्रभारी बनाया जाता है. इसी के बाद अपराधियों को काबू करने का मिशन शुरू होता है.
पहले एपीसोड में अयोध्या में आरडीएक्स पहुंचाने और एक मंदिर में बम रखने की घटना दिखाई जाती है. इंस्पेक्टर अविनाश की टीम पहले तो उन आतंकियों को चलती ट्रेन से पकड़ती है, उस के बाद मंदिर परिसर में रखे बमों को निष्क्रिय करती है. वैसे यह सब फिल्मी अंदाज में दिखाया जाता है.
इसी बीच धर्म को बढ़ावा देने वाली एक घटना दिखाई जाती है कि एक आतंकी, जो मंदिर में छिपा था, पुलिस के बीच से भागता है. पर जब इंस्पेक्टर अविनाश उसे फिल्मी अंदाज में पकड़ते हैं तो वह कहता है कि बस एक मिनट बाकी है. पूरी पुलिस फोर्स बम की तलाश में लग जाती है.
जब सभी ऊपरी मंजिल पर पहुंचते हैं तो देखते हैं कि बिजली के बौक्स के पास एक बंदर एक तार को पकड़ कर दांत से काट रहा है. उसे केला फेंक कर भगाया जाता है तो बम निष्क्रिय करने वाला एक्सपर्ट बताता है कि बंदर ने तो पहले ही तार काट कर बम निष्क्रिय कर दिया है. सभी श्रद्धा से बंदर की ओर देखते हैं.
यहां यह दृश्य फिल्मी लगता है, पर इस दृश्य को डाल कर जहां आस्था को भुनाने की कोशिश की गई लगती है. वहीं लोगों को आस्तिक बनाने की भी कोशिश की गई है.
दूसरे एपीसोड में शुरुआत में अविनाश मिश्रा को एक मुखबिर बरकत से मिलते दिखाया जाता है. तब इंस्पेक्टर अविनाश कहते हैं कि यही मुखबिर हमारी ताकत हैं, तंत्र हैं और मायाजाल हैं. इस के बाद एक दृश्य दिखाया जाता है, जिस में एक आदमी अपनी ही पत्नी के साथ जबरदस्ती सैक्स करता है. बाद में पता चलता है कि उस का नाम बिट्टू चौबे है, जो एक शूटर है. बिट्टू चौबे की भूमिका में रेश लांबा है, जो सचमुच में एक शूटर लगता है.
इस के बाद विपक्ष के एक कद्दावर नेता की बेटी किरन कौशिक की हत्या हो जाती है. इस मामले की जांच जो इंस्पेक्टर देवी कर रहा है, उस के साथ डीजीपी अविनाश मिश्रा को भी इस मामले की जांच करने के लिए कहते हैं. इंस्पेक्टर अविनाश को काल डिटेल्स से पता चलता है कि किरण का संबंध विधायक जगजीवन यादव से था. जगजीवन यादव की भूमिका में राहुल मित्रा है. यह कोई बहुत चर्चित कलाकार नहीं है.
जगजीवन यादव पर शक करने की वजह यह थी कि किरण और उस के बीच रात को लंबीलंबी बातें होती थीं. अविनाश जगजीवन यादव के पास पहुंच जाते हैं. उसे उस की असलियत बता कर धमकाते हैं. बदले में विधायक भी धमकी देता है. तब विधायक का एक आदमी इंस्पेक्टर को अलग ले जा कर फाइल दबाने की बात करता है. इस के बदले इंस्पेक्टर अविनाश अपने मुखबिर बरकत की मदद करने को कहते हैं.