लौकेट का रहस्य – भाग 5

इस बीच मैं हवालात जा कर जीते से लौकेट उतरवा लाया था. वह लौकेट मैं ने वली खां के सामने रख कर पूछा, ‘‘ध्यान से देख कर बताओ, ये लौकेट किस का है?’’

वली खां ने जब उस लौकेट को गौर से देखा तो उस के चेहरे का रंग बदल गया. वह हकला कर बोला, ‘‘जनाब, यह तो मेरी बीवी रजिया का लौकेट है.’’

‘‘बीवी को इसे तुम ने ही दिया होगा. कहां से आया यह तुम्हारे पास?’’

‘‘जी, मेरी वालिदा ने बनवाया था. इस के अलावा और भी गहने थे?’’

मैं ने कहा, ‘‘तुम्हारी वालिदा ने बनवाया था या तुम ने डाके में छीना था?’’

‘‘डाका…कैसा डाका…यह आप क्या कह रहे हैं जनाब?’’ उस का मुंह हैरत से खुला रह गया.

‘‘वही डाका जो तुम ने 5 साल पहले अमृतसर में मेहता सेठ के घर डाला था और तुम्हारी गोली लगने से मेहता की मौत हो गई थी.’’

थानेदार बख्शी हैरानी से देख रहा था. उस की नजर में वली खां एक शरीफ इंसान था. पर मैं पूरे दावे के साथ कह सकता था कि वह एक नामीगिरामी डाकू था. मैं ने करीब खड़े हवलदार नादिर से कहा, ‘‘वली खां को हथकड़ी लगा कर इस के सही ठिकाने पर पहुंचाओ.’’

वली खां को हवालात में बंद कर दिया गया. पूछताछ के दौरान पता चला कि उस का नाम वली खां नहीं, बल्कि अब्दुल सत्तार था. चोरीडकैती और अपहरण उस का मुख्य धंधा था. जामनगर में वह नाम बदल कर रह रहा था.

मैं और थानेदार बख्शी अभी वली खां से पूछताछ कर ही रहे थे कि एक सिपाही घबराया हुआ आया. उस ने हमें अलग ले जा कर बताया कि हवालाती जीते की जान खतरे में है. वली खां ने सिपाही कीमतीलाल को रिश्वत दे कर एक खत अपने दोस्त शेरू तक पहुंचाने के लिए भेजा है. वली खां ने खत में लिखा है कि वह उस की बीवी का काम तमाम कर दे और फरार हो जाए.

बख्शी ने सिपाही से पूछा, ‘‘शेरू कहां है?’’

सिपाही ने बताया, ‘‘मुझे नहीं पता, लेकिन कीमतीलाल को पता होगा. वह खत ले कर उसी के पास गया है.’’

थानेदार बख्शी ने गुस्से में पूछा, ‘‘तुम्हें यह सब कैसे मालूम हुआ?’’

सिपाही ने डरते हुए कहा, ‘‘पहले वली खां ने यह पेशकश मेरे सामने रखी थी. उस ने अपनी जांघों के बीच कुछ रुपए छिपा कर रखे थे. वह मुझे 2 सौ रुपयों का लालच देता रहा. मैं नहीं माना तो उस ने कीमतीलाल को फंसा लिया.’’

थानेदार बख्शी ने पूछा, ‘‘उस हरामी को हवालात में कागज कलम किस ने दिया?’’

‘‘जी, यह कीमतीलाल का ही काम है.’’

सिपाही का चेहरा बता रहा था कि वह सच बोल रहा था. मैं ने थानेदार से कहा, ‘‘बख्शी, हमें फौरन कुछ करना होगा. तुम थाने में रहो, मैं जा कर देखता हूं.’’

बख्शी के रोकने के बावजूद मैं थाने से निकल गया. 2 सिपाही मेरे साथ थे. उन में से एक के पास बंदूक थी. हम लगभग भागतेभागते नीम वाली गली तक पहुंचे. गली के मोड़ पर मैं ने रुक कर देखा. वली खां का तिमंजिला मकान मेरी नजरों के सामने था.

मकान के आसपास कोई हलचल नहीं थी. सिपाहियों के साथ मैं एक करीबी दुकान में जा घुसा. दुकानदार ने हमारे लिए कुर्सियां लगवा कर चाय मंगवा दी. वहीं बैठ कर हम वली खां के मकान पर नजर रखे हुए थे. लगभग आधेपौने घंटे बाद जब हम मायूस हो कर लौटने की सोच रहे थे, तभी अचानक एक टमटम गली में दाखिल हुई और सीधे वली खां के मकान के सामने जा रुकी. टमटम से शेरू उतरा. उस ने अपने शरीर को काले रंग की एक चादर से ढक रखा था. वह तेजी से दरवाजे की ओर बढ़ा तो मैं ने दौड़ कर उसे पीछे से जा दबोचा.

शेरू को गिरफ्तार कर लिया गया. तलाशी के दौरान उस के पास से एक भरे हुए रिवाल्वर के अलावा वह खत भी बरामद हुआ, जो वली खां ने हवालात से भेजा था.

उस खत में लिखा था, ‘‘शेरे, मैं पकड़ा गया हूं. पुलिस तुझे ढूंढ़ रही है. बेहतर है तू यहां से भाग जा. लेकिन भागने से पहले मेरा एक काम कर देना. मैं नहीं चाहता कि मेरे बाद रजिया जिंदा रहे. उसे खत्म कर देना. वह इस वक्त घर में अकेली है. तख्तपोश के नीचे मेरा रिवाल्वर पड़ा है. वह ले जाना, लेकिन कोशिश करना कि गोली न चलानी पड़े. अगर खुद न जा सको तो जुमे या दीनू को भेज कर ये काम करवा देना. खुदा हाफिज, तुम्हारा सरदार यार.’’

शेरू के अलावा जुमा और दीनू भी गिरफ्तार कर लिए गए. इस के बाद तफ्तीश और अदालती काररवाई का लंबा सिलसिला शुरू हुआ. जीते को मैं ने रिहा कर दिया. उस पर कोई इलजाम नहीं था. वह अपहरण व मारपीट के मामले में मुद्दई था.

रजिया एक ऐसी औरत थी, जो एक ही वक्त में 2 अलगअलग दिशाओं में सफर कर रही थी. उस के मांबाप ने उस का हाथ ऐसे शख्स को सौंप दिया था, जो बाहर से कुछ और, अंदर से कुछ और था. रजिया काफी हद तक अपने शौहर की हकीकत समझ गई थी. वह जान गई थी कि उस का शौहर अपराध की अंधेरी दुनिया से ताल्लुक रखता था. वह भीतर ही भीतर कुढ़ती रहती थी. लेकिन शौहर की हकीकत कभी उस के होंठों तक नहीं आई थी.

जिस तरह पानी अपना रास्ता खुद तलाश लेता है, उसी तरह जज्बात भी अपने इजहार का कोई न कोई तरीका ढूंढ़ लेते हैं. रजिया के भी दबे हुए जज्बात ने अपने इजहार का रास्ता तलाश कर लिया था. लोग उस पर अंगुलियां उठाते थे, मगर वह सब कुछ जानतेसमझते हुए अनजान और ढीठ बनी हुई थी.

वह जीते से बेपनाह मोहब्बत करती थी और उस मोहब्बत को चाह कर भी कोई मुनासिब नाम नहीं दे पाती थी. वह उसे धक्के दे कर घर से भी निकालती थी और फिर उस की एक झलक पाने के लिए बेचैन भी रहती थी. वह एक मजबूर औरत थी.

यह तय था कि वली खां और उस के साथियों को उम्रकैद होगी. रजिया द्वारा अदालत में दी गई दरख्वास्त पर उस के और वली खां के बीच तलाक अमल लाया गया. रजिया और जीते की प्रेमकहानी का यह बड़ा ही सुखद अंजाम था. दोनों ने शादी कर के वह कस्बा हमेशा के लिए छोड़ दिया.

यह बात अपनी जगह सच है कि कई बार छोटी सी घटना से इंसान की जिंदगी का रुख और दिशाएं बदल जाती हैं. इसी तरह कडि़यों से कडि़यां जुड़ कर कभीकभी बड़े खुलासे हो जाते हैं. अगर अखबार बेचने वाला जीता रईसजादी पम्मी के इशारों को नजरअंदाज न करता और उस पर चोरी का इलजाम न लगता तो शायद वली खां जैसे डाकू और उस के साथियों के चेहरे बेनकाब न होते.

लौकेट का रहस्य – भाग 4

जीते को साथ ले कर हम उसी वक्त उस मकान पर गए, जहां उसे कैद रखा गया था. वह मकान वली खां के दोस्त शेरू का था. वहां वाकई एक कमरे की जाली टूटी हुई थी. वहां ऐसे सुबूत भी थे, जिस से साबित होता था कि उसे उसी जगह कैद कर के रखा गया था. वली खां और शेरू दोनों गायब थे.

मेरी हिदायत पर थानेदार बख्शी ने अपने स्टाफ से उन्हें तलाश करने को कहा. लेकिन कुछ किया जाता, इस से पहले ही शाम करीब 7 बजे वे दोनों खुद ही थाने आ गए. उन के साथ एक सरकारी अफसर भी था. उस ने बताया कि इन दोनों का भागने का कोई इरादा नहीं था. वे केवल डर की वजह से थाने नहीं आए थे.

मैं ने वली खां से कहा कि वह अपनी सफाई में कुछ कहना चाहता है तो कह दे. इस पर उस ने जेब से कुछ खत निकाल कर हमारे सामने रख दिए. वे खत क्या थे, गालियों का पुलिंदा था. उन में ऐसी ऐसी गालियां लिखी थीं जो मैं ने कभी नहीं सुनी थीं. खत लिखने वाले ने कोशिश की थी कि वली खां और उस की बीवी को जितना ज्यादा हो सके, जलील किया जाए.

वली खां ने रुआंसे हो कर कहा, ‘‘जनाब, कुछ खत तो बरदाश्त से बाहर थे, इसलिए मैं ने फाड़ कर फेंक दिए थे.’’

उन खतों को पढ़ कर किसी भी शरीफ आदमी का दिमाग घूम सकता था. वली खां ने बताया कि ये गंदगी उस के घर में 3 महीने से फेंकी जा रही है. उस का मानना था कि ये काम जीते के अलावा और कोई नहीं कर सकता.

वली खां ने यह भी बताया कि मजबूर हो कर वह अमृतसर गया और जीते से मिल कर उसे समझाने की कोशिश की. लेकिन वह उल्टे उसे ही डरानेधमकाने लगा. इस पर उस का दिमाग घूम गया. वह उसे टैक्सी में डाल कर यहां ले आया. वली खां ने माना कि उस ने जीते को 4-5 दिन शेरू के घर में रखा था. वह सिर्फ यह चाहता था कि वह उन मियांबीवी की जिंदगी से निकल जाए.

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वली खां के साथ आए सरकारी अफसर ने भी कहा कि वली खां शरीफ आदमी है. अगर जीता उस की इज्जत को न ललकारता तो यह वाकया कभी न होता. मैं ने वली खां और शेरू को गिरफ्तार न कर के उन्हें तफ्तीश के दायरे में रखा. जीते को हवालात में रखना जरूरी था, क्योंकि अगर उसे छोड़ा जाता तो वह फिर से वली खां के घर जा कर हंगामा कर सकता था. हम ने डाक्टर बुला कर उस की मरहमपट्टी करा दी थी.

जीते को हवालात में छोड़ कर मैं उस के घर पहुंचा और उस के पिता सुरजीत से मुलाकात की. मैं काफी देर तक सुरजीत से जीते के बारे में बातें करता रहा. जब मैं उस के पास से उठने लगा तो दरवाजे के पीछे से चूडि़यों की खनक सुनाई दी. एक औरत जल्दी से अंदर आई थी और मुझे देख कर ठिठक गई थी. वह जवान औरत थी. उस के हाथ में एक छोटा सा लिफाफा था. वह असमंजस में थी कि आगे जाए या वापस लौट जाए.

लेकिन लौटने के बजाए वह हिम्मत कर बोली, ‘‘सुरजीत चचा, ये दवा खा लो. बस 2 दिन और खानी है.’’

सुरजीत ने उसे घूर कर देखते हुए कहा, ‘‘रजिया तुझे कितनी बार कहा है, यहां मत आया कर. रही दवा की बात तो मुझे एक बार ही ला कर दे दे. मैं खुद ही खा लिया करूंगा. बिना वजह रिश्तेदारी मत बना हम से. हम पहले ही बहुत दुखी हैं.’’

रजिया ने दवा वाला लिफाफा सुरजीत के सामने रखते हुए कहा, ‘‘आज तो खा लो, कल बाकी दवा भिजवा दूंगी.’’

सुरजीत ने दवा ले कर मजबूरी में कहा, ‘‘जा, पानी ले कर आ.’’

वह मुझे उलझन भरी नजरों से देख कर बाहर चली गई. मैं समझ गया कि यह वही रजिया है, जो इस फसाद की जड़ है. उस के बाहर जाते ही सुरजीत बोला, ‘‘पागल है यह लड़की, हम सब को भी पागल बना रखा है. यह सोच कर बहाने से दवा देने आई है कि शायद जीता घर पर हो. एक तरफ उसे धक्के दे कर घर से निकालती है, दूसरी तरफ उस की दीवानी हुई फिरती है. पता नहीं क्या चाहती है यह नादान लड़की.’’

रजिया पानी ले आई. जब वह सुरजीत को दवा खिला कर जाने लगी तो मैं ने उसे आवाज दे कर रोक लिया. वह ठिठक गई. सुरजीत ने उस से मेरा परिचय करवाते हुए बताया कि इन इंसपेक्टर साहब ने जीते की बहुत मदद की है.

मेरा परिचय सुन कर वह डर गई. फिर संभल कर बोली, ‘‘जी फरमाइए.’’

मैं ने कहा, ‘‘मैं तुम से कुछ जरूरी बातें करना चाहता हूं. तुम्हारा शौहर घर में ही है?’’

‘‘जी नहीं,’’ वह बोली, ‘‘वह शेरू के साथ थाने गए हैं.’’

‘‘चलो ठीक है, यहीं बात कर लेते हैं.’’ मैं ने सुरजीत की ओर देख कर कहा, ‘‘आप हमें चंद मिनट दीजिए.’’

मेरी बात समझ कर वह उठ खड़ा हुआ और जातेजाते बोला, ‘‘इंसपेक्टर साहब, वाहेगुरु के वास्ते इसे समझाएं. इस के दिमाग से यह जुनून निकाल दें. इसे समझाएं कि न अपना घर उजाड़े और न हमें बरबाद करे.’’

सुरजीत बाहर चला गया तो मैं ने रजिया को सामने पड़ी कुरसी पर बैठने को कहा. वह वाकई खूबसूरत औरत थी. मैं ने उस से पूछा, ‘‘बीबी, तुम जानती हो कि तुम्हारी वजह से कितना हंगामा हो रहा है? आखिर तुम चाहती क्या हो?’’

उस ने सिर झुका लिया. उस के होंठ कांपने लगे. वह कुछ कहना चाहती थी, पर कह नहीं पा रही थी. मैं ने कहा, ‘‘तुम्हारा शौहर शरीफ आदमी है. तुम से बेपनाह मोहब्बत भी करता है. फिर तुम यह खेल क्यों खेल रही हो?’’

मेरी बात सुन कर उस की आंखों से आंसू निकल आए. मैं ने बहुत कोशिश की कि वह अपने दिल की बात बताए. लेकिन वह अपने होंठों को सी कर बैठ गई. आखिर मैं ने कहा, ‘‘खामोश रहने से काम नहीं चलेगा. यह मत भूलो कि तुम्हारा व्यवहार तुम्हें अदालत तक भी ले जा सकता है और जेल भी.’’

उस ने रोतेरोते सिर्फ इतना कहा, ‘‘मैं बेबस हूं.’’

वह टस से मस नहीं हुई. बस खामोश बैठी आंसू बहाती रही. निस्संदेह वह कोई अहम बात छिपा रही थी. अपनी आंखें पोंछने के बाद उस ने कानों पर गिरे अपने बालों को पीछे किया तो मेरी निगाह उस के कान के झुमके पर पड़ी. मैं ने उस झुमके को गौर से देखा तो चौंका. इतनी देर में रजिया ने अपने कानों पर ओढ़नी डाल दी थी. मैं ने कहा, ‘‘बीबी, जरा कानों से ओढ़नी हटाओ.’’

वह मेरी बात नहीं समझी. जब मैं ने दूसरी बार गुस्से से कहा तो उस ने ओढ़नी हटाई. मैं ने आगे हो कर उस के झुमके का मुआयना किया. शक की कोई गुंजाइश नहीं थी. यह उस लौकेट के साथ का उसी डिजाइन का झुमका था जो जीते के गले में था. मैं ने पूछा, ‘‘बीबी, यह झुमका तुम्हें कहां से मिला?’’

‘‘मेरी शादी का है.’’ उस ने बताया.

‘‘मांबाप ने दिया था?’’

‘‘नहीं, ससुराल की तरफ से मिला था.’’

‘‘इस के साथ का और कोई जेवर भी है तुम्हारे पास?’’

‘‘जी नहीं, बस झुमके ही हैं.’’

‘‘देखो बीबी, मैं जो भी पूछूं, सचसच बताना वरना तुम सब बहुत बड़ी मुसीबत में फंस जाओगे.’’

रजिया मेरी बातों से पहले ही परेशान नजर आ रही थी. जब मैं ने मुसीबत की बात कही तो वह घबरा गई. कहने लगी, ‘‘पता नहीं, आप क्या पूछना चाहते हैं. बेहतर होगा आप मेरे शौहर से बात कर लें.’’

‘‘घबराने की कोई बात नहीं है. सच बोलोगी तो मैं हर तरह से मदद करूंगा. लेकिन झूठ बोला तो मैं तुम्हें नहीं बचा पाऊंगा.’’

उस के चेहरे का रंग पीला पड़ गया. वह ऐसे सिमट कर बैठ गई जैसे खुद में ही छिपने की कोशिश कर रही हो. मैं ने कहा, ‘‘इस झुमके के साथ का एक लौकेट मैं ने जीते के गले में देखा है. वह कहां से आया?’’

उस ने सिर झुका कर जवाब दिया, ‘‘वह लौकेट उसे मैं ने दिया था.’’

‘‘तुम्हारे शौहर को मालूम है?’’

‘‘जी नहीं.’’

‘‘क्या तुम यह जानती हो कि तुम्हारे शौहर के पास ये जेवर कहां से आए?’’

वह सादगी से बोली, ‘‘ये जेवर शादी से पहले के हैं.’’

मैं ने रजिया से कुछ सवाल और पूछे फिर उसे घर जाने की इजाजत देते हुए कहा कि न तो वह घर से बाहर कहीं जाएगी और न इस बात का जिक्र किसी से करेगी. वहां से फारिग हो कर मैं थाने पहुंचा. मैं ने थानेदार से कहा कि वह एक सिपाही भेज कर शेरू को बुलाए. साथ ही मैं ने एक एएसआई को यह कह कर भेज दिया कि वली खां जहां भी मिले उसे फौरन मेरे पास ले आए. लगभग आधे घंटे बाद एएसआई वली खां को ले आया. वह थोड़ी देर पहले ही थाने से गया था.

लौकेट का रहस्य – भाग 3

जीते के बारे में यह जानकारी मिलने के बाद मैं ने फैसला किया कि मुझे खुद ही जामनगर जा कर हकीकत मालूम करनी चाहिए. थाने का चार्ज मैं ने सबइंसपेक्टर नदीम को सौंपा और अगले दिन जामनगर के लिए रवाना हो गया.

जामनगर एक छोटा सा कस्बा था. मैं सीधा कस्बे के थाने में पहुंचा. वहां का थानेदार बख्शी मेरा पुराना दोस्त था. मैं ने उस से जीते के बाप सुरजीत के बारे में पूछा.

उस ने बताया कि वह सुरजीत को बहुत अच्छी तरह जानता है. वह निहायत ही शरीफ आदमी है और नीम वाली गली में रहता है. उस ने एक आदमी भेज कर नीम वाली गली से शेखू नाम के एक मुखबिर को बुलवा लिया. वह काफी होशियार आदमी था. इलाके के हर आदमी के बारे में उसे पूरी जानकारी थी. वह मुझे सुरजीत व उस के परिवार के बारे में बताने लगा.

उस की बातों से पता चला कि सुरजीत को नशे की लत है. उस ने शराबखोरी में अपनी पूरी जमीनजायदाद गंवा दी थी. इसी वजह से घर में क्लेश रहता था. सुरजीत अपने बेटे जीते से बहुत प्यार करता था. प्यार तो वह अपनी बीवी व छोटे बेटे से भी बहुत करता था, पर उस का जीते के साथ कुछ अधिक ही लगाव था.

लेकिन पिता की शराब की लत की वजह से जीता घर छोड़ कर अमृतसर आ गया था, ताकि पढ़लिख कर किसी काबिल बन जाए तो अपनी मां और छोटे भाई को भी अपने पास बुला ले.

शेखू ने जो कुछ बताया, उस के अनुसार नीम वाली गली में ही वली खां का घर था. वली खां का चौबारा सुरजीत के चौबारे से मिला हुआ था. दोनों परिवारों का एकदूसरे के घर काफी आनाजाना था. जब वली खां की शादी हुई, तब जीते की उम्र बमुश्किल 16 साल थी. उसे वली खां की बीवी रजिया से बहुत लगाव हो गया था. वली खां से भी उस की गहरी छनती थी. वह हर वक्त वली खां के घर में घुसा रहता था.

वक्त धीरेधीरे गुजरता रहा. हालांकि रजिया और वली खां की उम्र में खासा अंतर था. फिर भी कस्बे की बड़ी बूढि़यां उन पर अंगुली उठाने लगीं. उन्हें जीते का इस तरह रजिया से चिपके रहना पसंद नहीं था. सुरजीत ने बेटे को समझाया, पर वह बाज नहीं आया. मजबूरी में उसे उस के मामा के घर भेज दिया गया. साथ ही वली खां को भी समझा दिया गया कि वह अपनी जवान बीवी को इतनी आजादी न दे.

जीते के जाने के बाद यह मामला शांत हो गया. लेकिन थोड़े दिनों बाद जीते की मां बीमार पड़ गई. उस की देखभाल के लिए जीते को घर लौटना पड़ा. कुछ महीने बीमार रहने के बाद उस की मां चल बसी. मां की बीमारी और मौत के कारण जीते की पढ़ाई छूट गई. अब वह फिर से रजिया के घर में घुसा रहने लगा. उन्हीं दिनों वली खां रोजगार के सिलसिले में पेशावर चला गया. उस के जाने के बाद रजिया और भी आजाद हो गई.

फिर एक दिन पता चला कि रजिया ने जीते को धक्के दे कर घर से बाहर निकाल दिया और जीते ने गुस्से में नीला थोथा खा लिया. हकीम ने बड़ी मुश्किल से उस की जान बचाई थी. इस घटना से सभी हैरान थे. बाद में जो हकीकत सामने आई, वह यह थी कि जीते ने रजिया के साथ छेड़छाड़ की थी.

यह बात किसी तरह वली खां को भी पता चल गई थी. वह पहले ही लोगों की बातें सुनसुन कर भरा बैठा था. पेशावर से वापस आ कर वह जीते की जान के पीछे पड़ गया. फिर अचानक एक दिन जीता चुपचाप कहीं चला गया. काफी दिनों तक उस का कोई पता नहीं चला. बाद में किसी ने बताया कि वह अमृतसर में है.

जीते की पूरी कहानी सुनने के बाद मैं ने मुखबिर से पहला सवाल यह किया कि वली खां और उस की बीवी अब कहां है? उस ने बताया, ‘‘यहीं कस्बे में ही रहते हैं. वली खां अभी हफ्ता भर पहले ही पेशावर से आया है.’’

मैं ने पूछा, ‘‘मियांबीवी में इन दिनों कोई ताजा झगड़ा तो नहीं हुआ?’’

वह इनकार में सिर हिलाने लगा. फिर कुछ सोच कर बोला, ‘‘झगड़े से आप का क्या मतलब?’’

मैं ने कहा, ‘‘तुम मेरे मतलब की छोड़ो. जो कुछ तुम्हें पता है वह बताओ.’’

वह गहरी सांस ले कर बोला, ‘‘पिछले दिनों मुझे दीनू डाकिया मिला था. उस ने बताया कि वली खां के नाम कहीं से कुछ खत आते हैं. उन में वली खां और रजिया के नाम बड़ी गंदीगंदी गालियां लिखी होती हैं. वली खां इस बात से बहुत परेशान है.’’

मेरे दिमाग में बिजली सी कौंधी. मैं ने सोचा, खत कोई भी लिखता हो, लेकिन वली खां का ध्यान सब से पहले अपनी बीवी के आशिक जीते की तरफ ही गया होगा. उसे जीते का अमृतसर का पता भी मालूम था. संभव था उसी ने भाड़े के गुंडों से जीते को उठवा लिया हो. अगर वाकई ऐसा था तो जीते की जान को खतरा था.

मैं ने शेखू से पूछा, ‘‘क्या वली खां पेशावर से आने के बाद कस्बे से बाहर गया था?’’

वह कुछ देर सोचता रहा, फिर बोला, ‘‘मैं ठीक से नहीं बता सकता. पर इतना जानता हूं कि वह ज्यादातर अपने घर में ही रहता है. हां, कभीकभी अपने दोस्त शेरू के पास जरूर चला जाता है.’’

हम अभी बातें कर ही रहे थे कि एक सिपाही दौड़ता हुआ थाने आया और उस ने थानेदार को बताया, ‘‘जनाब, उधर नीम वाली गली में बड़ा हंगामा हो रहा है. जीता जख्मी हालत में पड़ा चीखपुकार कर रहा है.’’

मैं ने चौंक कर थानेदार बख्शी की ओर देखा. मेरा आशय समझ कर वह बोला, ‘‘आइए, चल कर देखते हैं.’’

हम थाने से निकल कर नीम वाली गली में पहुंचे. गली में लोगों का हुजूम लगा था. वे लोग किसी को संभालने की कोशिश कर रहे थे. मैं ने गौर से देखा, वह जीता ही था.  उस के होंठ सूजे हुए थे. चेहरे पर कई जगह नील निशान थे और खून रिस रहा था. उस की कमीज भी फटी हुई थी.

पुलिस को देख कर लोग हटने लगे. मुझे देख जीता गुहार लगाने लगा, ‘‘ये देखो थानेदारजी, क्या हाल किया है इन्होंने मेरा. मैं ने क्या बिगाड़ा है किसी का? क्यों लोग मुझे जीने नहीं देते?’’

थानेदार बख्शी ने पूछा, ‘‘तुम्हारी यह हालत किस ने की है?’’

जीते ने रोते हुए बताया, ‘‘मुझे वली खां और उस के गुंडों ने उठा लिया था. 5 दिन भूखाप्यासा बांध कर रखा.’’

उस ने अपना दायां हाथ दिखाया. उस की 3 अंगुलियां टूट गई थीं. पिंडलियों पर डंडों की मार के निशान थे, जहां से खून रिस रहा था.

मैं ने जीते को सांत्वना दे कर चुप करवाया और उसे भीड़ से निकाल कर थाने ले आया. वह बारबार एक ही बात कहे जा रहा था, ‘‘थानेदार साहब, मैं ने किसी को बदनाम नहीं किया. इन लोगों ने खुद ही बदनामी का इंतजाम किया है, मुझे अमृतसर से उठा लाए. 5 दिन बांध कर मेरी हड्डियां तोड़ते रहे. अब मैं भी वही करूंगा जो मेरा मन चाहेगा. मैं रजिया के बिना नहीं रह सकता. मैं उस से शादी करूंगा. अगर वह मुझे न मिली तो मैं उसी के दरवाजे पर खुदकुशी कर लूंगा.’’

थानेदार बख्शी ने उसे गुस्से से डांटा, ‘‘ओए मजनूं की औलाद, होश की दवा कर. अभी सारा भूत उतार दूंगा.’’

मैं ने थानेदार को इशारा कर के मना किया. क्योंकि जितना मैं इस मामले को जानता था, थानेदार बख्शी को पता नहीं था. वैसे भी जीता इस वक्त मुद्दई की हैसियत रखता था. उसे अगवा किया गया था. कैद में रख कर उसे यातनाएं दी गई थीं. मैं ने उस से घटना के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि उसे टैक्सी में डाल कर पहले जालंधर ले जाया गया.

वहां रात भर रखने के बाद उसे जामनगर ला कर एक अंधेरे मकान में बंद कर दिया गया. फिर रस्सियों से बांध कर भूखाप्यासा रखा गया. वली खां और उस के दोस्त शेरू ने उसे बहुत मारा था. शायद वे लोग उसे जान से ही मार डालते, लेकिन आज सुबह वे कमरे की एक खिड़की बंद करना भूल गए. जीते ने किसी तरह लोहे की जाली तोड़ी और वहां से निकल भागा.

लौकेट का रहस्य – भाग 2

जगजीत उर्फ जीते की कहानी मैं ने गौर से सुनी. उस से कुछ सवाल पूछने के बाद मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि उस की बातों में जरा भी झूठ की मिलावट नहीं है. कुसूर यकीनन उस लड़की का था. अब सवाल यह था कि खातेपीते रईस घर की लड़की ने आखिर हौकर से ही नजरें क्यों लड़ाईं?

मैं ने सोचा कि जब किसी लड़की का दिल किसी पर आता है तो वह ऊंचनीच नहीं देखती. हो सकता है बग्गा की बेटी के साथ भी यही रहा हो. जीते ने उस के प्रति जो बेरुखी दिखाई थी, वह उस से बेचैन हो गई होगी. संभव है उस ने अपने भाई की मोटरसाइकिल अपने किसी चाहने वाले से चोरी करवा दी हो. अगर ऐसा नहीं भी हुआ होगा तो उस ने मौके का फायदा उठाया होगा और मोटरसाइकिल चोरी होने पर जानबूझ कर शक की सुई जीते की ओर मोड़ दी होगी.

घटनास्थल देखने के बहाने मैं उसी दिन बग्गा की कोठी पर पहुंचा. मैं ने नौकरों और घर वालों से पूछताछ की. पम्मी भी वहीं मौजूद थी. वह खूबसूरत थी. साथ ही चालाक भी नजर आ रही थी. उस ने भी अपने बयान में वही बताया, जो उस के पिता और भाई ने बताया था.

अभी मैं कोठी में पूछताछ कर ही रहा था कि मोटरसाइकिल की पहेली हल हो गई. थाने से हवलदार बिलाल शाह चोरी की उसी मोटरसाइकिल पर सवार हो कर वहां आ गया. उस ने बताया कि मोटरसाइकिल नहर के पास से बरामद हुई है. चोर भी पकड़ा गया था. जीते ने ठीक ही कहा था. उसे सबक सिखाने के लिए पम्मी ने ही यह चोरी करवाई थी. कहने को तो यह केस यहीं खत्म हो गया था, पर हकीकत में खत्म नहीं हुआ था, बल्कि इस के बहाने एक नया मामला सामने आ गया था.

थाने आ कर जब मैं जीते को रिहा करने के लिए कागजी काररवाई कर रहा था, तभी जामातलाशी की एक चीज देख कर मैं बुरी तरह चौंका. मैं ने जीते को एक कागज पर दस्तखत करने के लिए कहा. वह दस्तखत करने के लिए मेज पर झुका तो उस के गले का लौकेट लटक कर मेरी आंखों के सामने लहराने लगा. हालांकि यह लौकेट जीते के गले में मैं पहले भी देख चुका था.

सोने के उस तिकोने लौकेट के बीचोबीच ‘ॐ’ बना हुआ था. उस के ऊपर वाले कोने पर एक लाल रंग का नग व नीचे के 2 कोनों पर सफेद नग जड़े थे. मुझे लगा कि उस लौकेट को मैं पहले भी कहीं देख चुका हूं. लेकिन याद नहीं आ रहा था कि कहां देखा है. मैं ने दिमाग पर जोर डाला तो सब कुछ याद आ गया.

करीब 5 साल पहले मेहता सेठ के घर डकैती पड़ी थी. इस डकैती में मेहता सेठ की गोली लगने से मौत हो गई थी. इस वारदात में कीमती जेवरात बच गए थे, क्योंकि वे तिजोरी के एक भीतरी खाने में पड़े थे. डकैतों ने केवल वही जेवर लूटे थे, जो मेहता की बीवी ने उस वक्त पहन रखे थे.

लूटे गए जेवरों में सोने की चूडि़यां, झुमके, लौकेट व एक अंगूठी थी. जो लौकेट लूटा गया था, उसी डिजाइन का एक लौकेट तिजोरी में रखा हुआ था. मेहता की बीवी ने वह लौकेट तिजोरी से निकाल कर मुझे दिखाते हुए बताया था कि जो लौकेट डाकू ले गए हैं, वह हूबहू ऐसा ही था.

तफ्तीश के लिए मैं उस लौकेट को मेहता की बीवी से ले आया था. बाद में वह लौकेट महीनों तक मेरी दराज में पड़ा रहा था. मैं ने उसे सैकड़ों बार देखा था. बाद में कोई सुराग न मिलने की वजह से इस केस की फाइल बंद कर दी थी और मैं ने लौकेट वापस लौटा दिया था.

गौर से देखने के बाद मैं ने जीते से पूछा, ‘‘जीते, बड़ा खूबसूरत लौकेट पहने हो. तुम्हारा ही है या किसी ने दिया है?’’

‘‘जी…हां, जी…नहीं…’’ उस ने घबरा कर हां और ना दोनों कहा तो मैं ने पूछा, ‘‘क्या मतलब, तुम्हारा नहीं है?’’

‘‘जी नहीं, यह मुझे राह चलते बाजार में पड़ा मिला था. यह कीचड़ से सना हुआ था. मैं ने धो कर काले धागे में डाल कर पहन लिया.’’

‘‘इस का मतलब यह तुम्हारे पास गैरकानूनी है?’’ मैं ने उस की आंखों में आंखें डाल कर कहा तो वह घबरा गया. अचानक उस का हाथ गले की तरफ बढ़ा. वह लौकेट उतारना चाहता था. मैं ने उसे रोकते हुए कहा, ‘‘अब रहने दो. लेकिन आइंदा ध्यान रखना कि गुमशुदा चीज मिलने का मतलब यह नहीं होता कि उसे अपने पास रख लिया जाए. तुम्हें पता है, गुमशुदा चीजों से कभीकभी काम के कई सुराग मिल जाते हैं.’’

बहरहाल, मैं ने उसे समझा कर वापस भेज दिया. चूंकि उस लौकेट को मैं ने पहचान लिया था, इसलिए यह जरूरी हो गया था कि मैं जीते की निगरानी करवाऊं. क्योंकि उस लौकेट से 5 साल पुरानी डकैती और हत्या का रहस्य खुल सकता था. मैं ने उस की निगरानी का काम बिलाल शाह को सौंप दिया. बिलाल शाह ने 4 रोज बाद मुझे बताया कि जीते और बग्गा की लड़की पम्मी का मामला अभी खत्म नहीं हुआ, बल्कि और भी ज्यादा भड़क गया है.

‘‘कैसे?’’ मैं ने पूछा तो बिलाल शाह ने बताया, ‘‘सच्ची बात छिपी नहीं रहती है जी. जीते ने तो उसी दिन से बग्गा के घर अखबार डालना बंद कर दिया था. अब तो वह उस इलाके में भी नहीं जाता. लेकिन बग्गा की लड़की बड़ी तेज निकली. परसों शाम वह उस के बुकस्टाल पर जा धमकी. बुकस्टाल पर जीते का कोई बुजुर्ग रिश्तेदार बैठता है. उस के सामने वह जीते को खींच कर अपने साथ ले गई. एक होटल में उस ने चाय वगैरह मंगवाई और जीते के सामने रो कर कहने लगी कि उस से बहुत बड़ी गलती हो गई है और वह माफी चाहती है.

वह किसी भी तरह से जीते का पीछा नहीं छोड़ना चाहती थी. आखिर जीते ने अपना पीछा छुड़ाने के लिए हाथ जोड़ कर कहा, ‘‘बीबी, मैं ने तुझे माफ किया. मेरे वाहेगुरु ने भी तुझे माफ किया.’’

लेकिन यह बात छिपी नहीं रह सकी. बग्गा के बेटे के एक दोस्त ने दोनों को देख लिया था. उस ने जा कर यह बात पम्मी के भाई को बता दी. उस का भाई अपने दोस्तों के साथ बुकस्टाल पर पहुंचा और जीते को उठा कर एक पार्क में ले गया. उस ने धमकी दी कि वह अपनी खैरियत चाहता है तो शहर छोड़ कर चला जाए. लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हुई. आज सवेरे कुछ लोगों ने जीते को अगवा कर लिया है.’’

जीते का गायब होना मामूली बात नहीं थी. उस से बड़ी बात यह थी कि उस के गले में वह लौकेट था, जो देरसवेर मुझे 5 साल पुरानी डकैती की वारदात का सुराग दे सकता था. मैं ने पम्मी और उस के भाई को बुला कर पूछताछ की. पम्मी के भाई ने स्वीकार किया कि उस ने जीते को धमकी जरूर दी थी, पर उस के अपहरण के बारे में उसे कोई जानकारी नहीं है.

मैं ने जीते के रिश्तेदार से भी इस के बारे में जानकारी एकत्र करने की नीयत से कुरेद कुरेद कर सवाल पूछे. उस ने बताया कि जीते ने किसी वजह से नाराज हो कर अपना घर छोड़ा था और उस का वापस जाने का कोई इरादा नहीं था. साथ ही यह भी कि वह यहीं अपनी पढ़ाई पूरी कर के सरकारी नौकरी करना चाहता था. वैसे वह अच्छे खातेपीते घर का है, पर इन दिनों उस का परिवार आर्थिक संकट से जूझ रहा है. उस के पिता जामनगर में ही क्लर्क की नौकरी करते हैं.

लौकेट का रहस्य – भाग 1

उस दिन सुबह जब मैं थाने पहुंचा तो थाने के अहाते में काले रंग की एक कार खड़ी हुई थी. कार के पास 4 लोग खड़े थे, जिन में एक ड्राइवर था. सलामदुआ के बाद अधेड़ व्यक्ति ने अपना  नाम महेश बग्गा बताया. महेश बिजनैसमैन थे और शहर के बाहर अजनाला रोड पर उन की सरिया मिल थी.

अमृतसर के पौश इलाके सिविल लाइंस में उन की आलीशान कोठी थी. उन्होंने बताया कि आज सुबह कोठी से उन के बेटे की नई मोटरसाइकिल चोरी हो गई है. उन का 22-23 साल का वह खूबसूरत जवान बेटा भी साथ था, जिस की मोटरसाइकिल चोरी हुई थी.

उस ने कहा, ‘‘मैं सैर पर जाने के लिए सुबह 5 बजे उठ जाता हूं. आज उठ कर जाने के लिए तैयार हुआ तो गैराज में मोटरसाइकिल नहीं थी. मैं ने घर वालों से पूछा, पर किसी को कुछ पता नहीं था. पड़ोसी ने बताया कि उस ने सुबह करीब पौने 5 बजे मोटरसाइकिल स्टार्ट होने की आवाज सुनी थी.’’

उस ने आगे बताया, ‘‘हमारे यहां हौकर सुबह 5 बजे अखबार डालता है. वह ज्यादातर बाहर से ही अखबार फेंकता था. पिछले कई दिनों से बारिश हो रही थी, इसलिए मैं ने दादीजी से कहा था कि वह सुबह पूजापाठ के लिए उठती हैं तो अंदर से दरवाजा खोल दिया करें, ताकि हौकर अखबार अंदर आ कर बरामदे में डाल सके. वह ऐसा ही करने लगा था.

आज का अखबार बरामदे में पड़ा हुआ था. इस का मतलब करीब 5 बजे हौकर जीता अंदर आया था. मेरी बहन पम्मी का कहना है कि चंद रोज पहले वह मोटरसाइकिल पर झुका हुआ कुछ कर रहा था. उसे देख कर वह ठिठक गया था.

झेंप कर कहने लगा, ‘पैट्रोल गिर रहा था, मैं ने बंद कर दिया है.’ लेकिन जब पम्मी ने देखा तो वहां पैट्रोल गिरने का कोई निशान नहीं था. पम्मी ने उसी दिन मुझ से कहा भी था, ‘भैया, मोटरसाइकिल नई है, अंदर रखा करें.’ मगर मैं ने ही ध्यान नहीं दिया था.’’

मामला कोई खास नहीं था. मैं ने बग्गा और उस के बेटे की तहरीर पर कच्ची रिपोर्ट लिखा दी और 2 सिपाहियों को इस निर्देश के साथ भेज दिया कि न्यूज एजेंसी जा कर हौकर जीते का पता करें. आधे घंटे बाद दोनों सिपाही जीते को थाने ले आए.

जगजीत उर्फ जीता 17-18 साल का खूबसूरत लड़का था. वह नजरें झुका कर मेरे सामने खड़ा हो गया. वह बेहद डरा हुआ था. मैं ने उस से नामपता पूछा तो उस ने बताया कि वह कस्बा जामपुर का रहने वाला है और यहां अमृतसर में अपने एक दूर के रिश्तेदार के पास रहता है. सुबह कालेज जाता है, शाम को बच्चों को ट्यूशन पढ़ाता है और तड़के अखबार बांटता है.

मैं ने आवाज को थोड़ी सख्त कर के उस से पूछा, ‘‘जीते, तुम ने आज सुबह बग्गा साहब की कोठी से जो मोटरसाइकिल उठाई है, वह कहां है?’’

वह हकला कर बोला, ‘‘इंसपेक्टर साहब, यह आप क्या कह रहे हैं? यह मुझ पर सरासर झूठा इलजाम है. मैं मेहनतमजदूरी कर के चार पैसे कमाता हूं और अपनी पढ़ाई करता हूं.’’

मैं अभी जीते से बात कर ही रहा था कि न्यूज एजेंसी का मालिक और उस का वह रिश्तेदार भी आ गया, जिस के पास वह रहता था. मैं ने उन से कहा, ‘‘इस की खैरियत चाहते हो तो चोरी का माल बरामद करवा दो, वरना सब को रगड़ा लगेगा.’’

लेकिन मेरे डरानेधमकाने के बावजूद भी कोई नतीजा नहीं निकला. जीते ने स्वीकार किया कि वह 5 बजे के करीब कोठी में अखबार डालने के लिए दाखिल जरूर हुआ था, लेकिन उस ने मोटरसाइकिल को छुआ तक नहीं था. उस ने यह भी बताया कि उस वक्त मोटरसाइकिल अपनी जगह मौजूद थी.

पूछताछ में यह बात सामने आई कि जीता पिछले 4-5 दिनों से पैदल घूम कर अखबार डाल रहा था. यह बात शक पैदा करने वाली थी. मैं ने इस की वजह पूछी तो जीते की जगह उस का रिश्तेदार बोला, ‘‘इस की साइकिल कई दिनों से खराब पड़ी है जी, इसलिए इसे पैदल घूमना पड़ता है.’’

मैं ने एक हवलदार से कहा कि वह जीते को ले जा कर थोड़ा शक दूर कर ले. हवलदार ने हवालात में ले जा कर जीते के कसबल निकाल दिए. हवलदार जब उसे मेरे सामने लाया तो वह बुरी तरह कांप रहा था. उस ने हाथ जोड़ कर मुझ से कहा, ‘‘साहब, मैं आप से अकेले में बात करना चाहता हूं.’’

मैं समझ गया कि वह बग्गा और उस के बेटे से कुछ छिपाना चाहता है. इसलिए मैं ने उसे हवालात में भेज दिया, ताकि उस से वहीं बात कर सकूं.

करीब एक घंटा बाद मैं ने जीते से पूछताछ की. उस की आंखों में मर्दाना कशिश थी. डीलडौल भी अच्छा था. अगर उस का संबंध किसी रईस घर से होता, जिस्म पर अच्छा लिबास होता तो राह चलती औरतें उसे मुड़ कर जरूर देखतीं.

वह कहने लगा, ‘‘साहब, मैं गरीब इंसान हूं. सच भी बोलूंगा तो लोग झूठ समझेंगे. लेकिन मेरी जो बेइज्जती हुई है, उस से मेरा मन खून के आंसू रो रहा है. इसलिए अब मैं कुछ नहीं छिपाऊंगा. पिछले 2-3 महीनों से बग्गा साहब की लड़की पम्मी मेरे साथ अश्लील हरकतें कर रही थी. जब मैं सुबह लगभग 5 बजे अखबार फेंकने जाता था, तब वह पायजामा बनियान पहने अपने घर के पार्क में एक्सरसाइज करती मिलती थी.

उस वक्त मुझे दूसरे घरों में अखबार डालने की जल्दी होती थी, लेकिन वह बेवजह की कोई न कोई बात छेड़ कर मुझे रोक लेती थी. बाद में उस ने मुझे फूल देने शुरू कर दिए. वह शरारत करती और फिर बेवजह हंसती रहती. मैं उस से जितना बचने की कोशिश करता था, वह उतना ही सिर चढ़ती जा रही थी. मैं डरता था कि कहीं किसी दिन कोई मुसीबत खड़ी न हो जाए. आखिर वही हुआ, जिस का मुझे डर था.’’

मैं ने कहा, ‘‘मैं समझा नहीं, क्या तुम यह कहना चाहते हो कि तुम्हें फंसाया जा रहा है?’’

‘‘हां साहब, यही कहना चाहता हूं. मुझे नहीं मालूम कि मोटरसाइकिल चोरी हुई है या नहीं. लेकिन पम्मी ने मुझ पर यह जो इलजाम लगाया है कि कुछ रोज पहले मैं मोटरसाइकिल से छेड़छाड़ कर रहा था, बिलकुल गलत है. ऐसा लगता है, मुझे दोषी ठहराने में पम्मी का ही हाथ है. हो सकता है, उस ने अपने किसी चाहने वाले से मोटरसाइकिल गायब करवा दी हो.’’

‘‘तुम यकीन के साथ ऐसा कैसे कह सकते हो?’’

उस ने इधरउधर देखा, फिर संभल कर बोला, ‘‘साहब, कहना नहीं चाहिए पर वह लड़की बहुत तेज है. पिछले इतवार को उस का भाई सैर के लिए नहीं निकला था. इसलिए वह बड़ी निडर दिख रही थी.

मैं अंदर अखबार डालने गया तो वह पिछले लौन की तरफ से आ गई. कहने लगी, ‘सिर्फ अखबार ही बेचते हो या वहां कुछ जानपहचान भी है?’

मैं ने जवाब में कहा, ‘हां, थोड़ीबहुत जानपहचान है.’ इस पर वह मुझे एक फोटो दिखाते हुए बोली, ‘मेरी सहेली की है, इसे अखबार में छपवा दो.’

वह एक औरत की अर्धनग्न तसवीर थी. शायद उस ने किसी मैगजीन से काटी थी. मैं ने उस की तरफ देखा तो वह शरारत से मुसकरा रही थी. मैं ने उस से कहा, ‘‘आप पढ़ीलिखी अच्छे घर की लड़की हैं. ऐसी हरकत करते हुए आप को शरम आनी चाहिए.’’

इस पर वह छूटते ही बोली, ‘‘सारी शरम तो तुम जैसे लड़के ले गए. लड़कियों के लिए कुछ बचा ही नहीं.’’

मैं वापस जाने लगा तो वह पीछे से मेरी कमीज पकड़ कर बोली, ‘‘बड़े नखरे हैं तुम्हारे. बातें तो बड़ीबड़ी करते हो, एक छोटी सी तसवीर नहीं छपवा सकते.’’

मैं ने उस से कहा, ‘‘अपने पिताजी को दे देना, वह बड़े आदमी हैं, छपवा देंगे.’’

मेरी बात सुन वह गुस्से से लाल हो कर मुझे घूरने लगी. फिर बदतमीज कह कर पांव पटकती हुई वहां से चली गई. मैं ने सोचा था कि महीना पूरा होते ही वहां अखबार डालना छोड़ दूंगा, लेकिन इस से पहले ही यह मामला हो गया.

दर्द का एक ही रंग : कौन सा दर्द छिपा था उन आंखों में?

जब तक बीजी और बाबूजी जिंदा थे और सुमन की शादी नहीं हुई थी, तब तक सुरेश और वंदना को बेऔलाद होने की उदासी का अहसास इतना गहरा नहीं था. घर की रौनक उदासी के अहसास को काफी हद तक हलका किए रहती थी. लेकिन सुमन की शादी के बाद पहले बाबूजी, फिर जल्दी ही बीजी की मौत के बाद हालात एकदम से बदल गए. घर में ऐसा सूनापन आया कि सुरेश और वंदना को बेऔलाद होने का अहसास कटार की तरह चुभने लगा. उन्हें लगता था कि ठीक समय पर कोई बच्चा गोद न ले कर उन्होंने बहुत बड़ी गलती की.

लेकिन इसे गलती भी नहीं कहा जा सकता था. अपनी औलाद अपनी ही होती है, इस सोच के साथ वंदना और सुरेश आखिर तक उम्मीद का दामन थामे रहे. लेकिन उन की उम्मीद पूरी नहीं हुई. कई रिश्तेदार अपना बच्चा गोद देने को तैयार भी थे, लेकिन उन्होंने ही मना कर दिया था. उम्मीद के सहारे एकएक कर के 22 साल बीत गए.

अब घर काटने को दौड़ता था. भविष्य की चिंता भी सताने लगी थी. इस मामले में सुरेश अपनी पत्नी से अधिक परेशान था. आसपड़ौस के किसी भी घर से आने वाली बच्चे की किलकारी से वह बेचैन हो उठता था. बच्चे के रोने से उसे गले लगाने की ललक जाग उठती थी. सुबह सुरेश और वंदना अपनीअपनी नौकरी के लिए निकल जाते थे. दिन तो काम में बीत जाता था. लेकिन घर आते ही सूनापन घेर लेता था. सुरेश को पता था कि वंदना जितना जाहिर करती है, उस से कहीं ज्यादा महसूस करती है.

कभीकभी वंदना के दिल का दर्द उस की जुबान पर आ भी जाता. उस वक्त वह अतीत के फैसलों की गलती मानने से परहेज भी नहीं करती थी. वह कहती, ‘‘क्या तुम्हें नहीं लगता कि अतीत में किए गए हमारे कुछ फैसले सचमुच गलत थे. सभी लोग बच्चा गोद लेने को कहते थे, हम ने ऐसा उन की बात मान कर गलती नहीं की?’’

‘‘फैसले गलत नहीं थे वंदना, समय ने उन्हें गलत बना दिया.’’ कह कर सुरेश चुप हो जाता.

ऐसे में वंदना की आंखों में एक घनी उदासी उतर आती. वह कहीं दूर की सोचते हुए सुरेश के सीने पर सिर रख कर कहती, ‘‘आज तो हम दोनों साथसाथ हैं, एकदूसरे को सहारा भी दे सकते हैं और हौसला भी. मैं तो उस दिन के खयाल से डर जाती हूं, जब हम दोनों में से कोई एक नहीं होगा?’’

‘‘तब भी कुछ नहीं होगा. किसी न किसी तरह दिन बीत जाएंगे. इसलिए ज्यादा मत सोचा करो.’’ सुरेश पत्नी को समझाता, लेकिन उस की बातों में छिपी सच्चाई को जान कर खुद भी बेचैन हो उठता.

भविष्य तो फिलहाल दीवार पर लिखी इबारत की तरह एकदम साफ था. सुरेश को लगता था कि वंदना भले ही जुबान से कुछ न कहे, लेकिन वह किसी बच्चे को गोद लेना चाहती है. घर के सूनेपन और भविष्य की चिंता ने सुरेश के मन को भी भटका दिया था. उसे भी लगता था कि घर की उदासी और सूनेपन में वंदना कहीं डिप्रैशन की शिकार न हो जाए.

लेकिन एक बड़ा सवाल यह भी था कि उम्र के इस पड़ाव पर किसी बच्चे को गोद लेना क्या समझदारी भरा कदम होगा? सुरेश 50 की उम्र पार कर चुका था, जबकि वंदना भी अगले साल उम्र के 50वें साल में कदम रखने जा रही थी. ऐसे में क्या वे बच्चे का पालनपोषण ठीक से कर पाएंगे?

काफी सोचविचार और जद्दोजहद के बाद सुरेश ने महसूस किया कि अब ऐसी बातें सोचने का समय नहीं, निर्णय लेने का समय है. बच्चा अब उस की और वंदना की बहुत बड़ी जरूरत है. वही उन के जीवन की नीरसता, उदासी और सूनेपन को मिटा सकता है.

सुरेश ने इस बारे में वंदना से बात की तो उस की बुझी हुई आंखों में एक चमक सी आ गई. उस ने पूछा, ‘‘क्या अब भी ऐसा हो सकता है?’’

‘‘क्यों नहीं हो सकता, हम इतने बूढ़े भी नहीं हो गए हैं कि एक बच्चे को न संभाल सकें.’’ सुरेश ने कहा.

बच्चे को गोद लेने की उम्मीद में वंदना उत्साह से भर उठी. लेकिन सवाल यह था कि बच्चा कहां से गोद लिया जाए. किसी अनाथालय से बच्चा गोद लेना असान नहीं था. क्योंकि गोद लेने की शर्तें और नियम काफी सख्त थे. रिश्तेदारों से भी अब कोई उम्मीद नहीं रह गई थी. किसी अस्पताल में नाम लिखवाने से भी महीनों या वर्षों लग सकते थे.

ऐसे में पैसा खर्च कर के ही बच्चा जल्दी मिल सकता था. मगर बच्चे की चाहत में वे कोई गलत और गैरकानूनी काम नहीं करना चाहते थे. जब से दोनों ने बच्चे को गोद लेने का मन बनाया था, तब से वंदना इस मामले में कुछ ज्यादा ही बेचैन दिख रही थी. शायद उस के नारी मन में सोई ममता शिद्दत से जाग उठी थी.

एक दिन शाम को सुरेश घर लौटा तो पत्नी को कुछ ज्यादा ही जोश और उत्साह में पाया. वह जोश और उत्साह इस बात का अहसास दिला रहा था कि बच्चा गोद लेने के मामले में कोई बात बन गई है. उस के पूछने की नौबत नहीं आई, क्योंकि वंदना ने खुद ही सबकुछ बता दिया.

वंदना के अनुसार, वह जिस स्कूल में पढ़ाती थी, उस स्कूल के एक रिक्शाचालक जगन की बीवी को 2 महीने पहले दूसरी संतान पैदा हुई थी. उस के 2 बेटे हैं. जगन अपनी इस दूसरी संतान को रखना नहीं चाहता था. वह उसे किसी को गोद देना चाहता था.

‘‘उस के ऐसा करने की वजह?’’ सुरेश ने पूछा, तो वंदना खुश हो कर बोली, ‘‘वजह आर्थिक हो सकती है. मुझे पता चला है, जगन पक्का शराबी है. जो कमाता है, उस का ज्यादातर हिस्सा पीनेपिलाने में ही उड़ा देता है. शराब की लत की वजह से उस का परिवार गरीबी झेल रहा है. मैं ने तो यह भी सुना है कि शराब की ही वजह से जगन ने ऊंचे ब्याज पर कर्ज भी ले रखा है. कर्ज न लौटा पाने की वजह से लेनदार उसे परेशान कर रहे हैं.

सुनने में आया है कि एक दिन उस का रिक्शा भी उठा ले गए थे. उन्होंने बड़ी मिन्नतों के बाद उस का रिक्शा वापस किया था. मुझे लगता है, जगन अपना यह दूसरा बच्चा किसी को गोद दे कर जिम्मेदारी से छुटकारा पाना चाहता है. इसी बहाने वह अपने सिर पर चढ़ा कर्ज भी उतार देगा.’’

‘‘इस का मतलब वह अपनी मुसीबतों से निजात पाने के लिए अपने बच्चे का सौदा करना चाहता है?’’ सुरेश ने व्यंग्य किया.

‘‘कोई भी आदमी बिना किसी स्वार्थ या मजबूरी के अपना बच्चा किसी दूसरे को क्यों देगा?’’ वंदना ने कहा तो सुरेश ने पूछा, ‘‘जगन की बीवी भी बच्चा देने के लिए तैयार है?’’

‘‘तैयार ही होगी. बिना उस के तैयार हुए जगन यह सब कैसे कर सकता है?’’

वंदना की बातें सुन कर सुरेश सोच में डूब गया. उसे सोच में डूबा देख कर वंदना बोली, ‘‘अगर तुम्हें  ऐतराज न हो तो मैं जगन से बच्चे के लिए बात करूं?’’

‘‘बच्चा गोद लेने का फैसला हम दोनों का है. ऐसे में मुझे ऐतराज क्यों होगा?’’ सुरेश बोला.

‘‘मैं जानती हूं, फिर भी मैं ने एक बार तुम से पूछना जरूरी समझा.’’

2 दिनों बाद वंदना ने सुरेश से कहा, ‘‘मैं ने स्कूल के चपरासी माधोराम के जरिए जगन से बात कर ली है. वह हमें अपना बच्चा पूरी लिखापढ़ी के साथ देने को राजी है. लेकिन इस के बदले 15 हजार रुपए मांग रहा है. मेरे खयाल से यह रकम ज्यादा नहीं है?’’

‘‘नहीं, बच्चे न तो बिकाऊ होते हैं और न उन की कोई कीमत होती है.’’

‘‘मैं जगन से उस का पता ले लूंगी. हम दोनों कल एकसाथ चल कर बच्चा देख लेंगे. तुम कल बैंक से कुछ पैसे निकलवा लेना. मेरे खयाल से इस मौके को हमें हाथ से नहीं जाने देना चाहिए.’’ वंदना ने बेसब्री से कहा.

उस की बात पर सुरेश ने खामोशी से गर्दन हिला दी.

अगले दिन सुरेश शाम को वापस आया तो वंदना तैयार बैठी थी. सुरेश के आते ही उस ने कहा, ‘‘मैं चाय बनाती हूं. चाय पी कर जगन के यहां चलते हैं.’’

कुछ देर में वंदना 2 प्याले चाय ला कर एक प्याला सुरेश को देते हुए बोली, ‘‘वैसे तो अभी पैसों की जरूरत नहीं लगती. फिर भी तुम ने बैंक से पैसे निकलवा लिए हैं या नहीं?’’

‘‘हां.’’ सुरेश ने चाय की चुस्की लेते हुए उत्साह में कहा.

चाय पी कर दोनों घर से निकल पड़े. आटोरिक्शा से दोनों जगन के घर जा पहुंचे. जगन का घर क्या 1 गंदी सी कोठरी थी, जो काफी गंदी बस्ती में थी. उस के घर की हालत बस्ती की हालत से भी बुरी थी. छोटे से कमरे में एक टूटीफूटी चारपाई, ईंटों के बने कच्ची फर्श पर एक स्टोव और कुछ बर्तन पड़े थे. कुल मिला कर वहां की हर चीज खामेश जुबान से गरीबी बयां कर रही थी.

जगन का 5 साल का बेटा छोटे भाई के साथ कमरे के कच्चे फर्श पर बैठा प्लास्टिक के एक खिलौने से खेल रहा था, जबकि उस की कुपोषण की शिकार पत्नी तीसरे बच्चे को छाती से चिपकाए दूध पिला रही थी. इसी तीसरे बच्चे को जगन सुरेश और वंदना को देना चाहता था. जगन ने पत्नी से बच्चा दिखाने के लिए मांगा.

पत्नी ने खामोश नजरों से पहले जगन को, उस के बाद सुरेश और वंदना को देखा, फिर कांपते हाथों से बच्चे को जगन को थमा दिया. उसी समय सुरेश के मन में शूल सा चुभा. उसे लगा, वह और वंदना बच्चे के मोह में जो करने जा रहे हैं, वह गलत और अन्याय है.

जगन ने बच्चा वंदना को दे दिया. बच्चा, जो एक लड़की थी सचमुच बड़ी प्यारी थी. नाकनक्श तीखे और खिला हुआ साफ रंग था. वंदना के चेहरे के भावों से लगता था कि बच्ची की सूरत ने उस की प्यासी ममता को छू लिया था.

बच्ची को छाती से चिपका कर वंदना ने एक बार उसे चूमा और फिर जगन को देते हुए बोली, ‘‘अब से यह बच्ची हमारी हुई जगन. लेकिन हम इसे लिखापढ़ी के बाद ही अपने घर ले जाएंगे. कल रविवार है. परसों कचहरी खुलने पर किसी वकील के जरिए सारी लिखापढ़ी कर लेंगे. एक बात और कह दूं, बच्चे के मामले में तुम्हारी बीवी की रजामंदी बेहद जरूरी है. लिखापढ़ी के कागजात पर तुम्हारे साथसाथ उस के भी दस्तखत होंगे.’’

‘‘हम सबकुछ करने को तैयार हैं.’’ जगन ने कहा.

‘‘ठीक है, हम अभी तुम्हें कुछ पैसे दे रहे हैं, बाकी के सारे पैसे तुम्हें लिखापढ़ी के बाद बच्चा लेते समय दे दूंगी.’’

जगन ने सहमति में गर्दन हिला दी. इस के बाद वंदना ने सुरेश से जगन को 3 हजार रुपए देने के लिए कहा. वंदना के कहने पर उस ने पर्स से 3 हजार रुपए निकाल कर जगन को दे दिए.

जगन को रुपए देते हुए सुरेश कनखियों से उस की पत्नी को देख रहा था. वह बच्चे को सीने से कस कर चिपकाए जगन और सुरेश को देख रही थी. सुरेश को जगन की पत्नी की आंखों में नमी और याचना दिखी, जिस से सुरेश का मन बेचैन हो उठा.

जगन के घर से आते समय सुरेश पूरे रास्ते खामोश रहा. बच्चे को सीने से चिपकाए जगन की पत्नी की आंखें सुरेश के जेहन से निकल नहीं पा रही थीं, सारी रात सुरेश ठीक से सो नहीं सका. जगन की पत्नी की आंखें उस के खयालों के इर्दगिर्द चक्कर काटती रहीं और वह उलझन में फंसा रहा.

अगले दिन रविवार था. दोनों की ही छुट्टी थी. वंदना चाहती थी कि बच्चे को गोद लेने के बारे में किसी वकील से पहले ही बात कर ली जाए. इस बारे में वह सुरेश से विस्तार से बात करना चाहती थी. लेकिन नाश्ते के समय उस ने उसे उखड़ा हुआ सा महसूस किया.

उस से रहा नहीं गया तो उस ने पूछा, ‘‘मैं देख रही हूं कि जगन के यहां से आने के बाद से ही तुम खामोश हो. तुम्हारे मन में जरूर कोई ऐसी बात है, जो तुम मुझ से छिपा रहे हो?’’

सुरेश ने हलके से मुसकरा कर चाय के प्याले को होंठों से लगा लिया. कहा कुछ नहीं. तब वंदना ही आगे बोली. ‘‘हम एक बहुत बड़ा फैसला लेने जा रहे हैं. इस फैसले को ले कर हम दोनों में से किसी के मन में किसी भी तरह की दुविधा या बात नहीं होनी चाहिए. मैं चाहती हूं कि अगर तुम्हारे मन में कोई बात है तो मुझ से कह दो.’’

चाय का प्याला टेबल पर रख कर सुरेश ने एक बार पत्नी को गहरी नजरों से देखा. उस के बाद आहिस्ता से बोला, ‘‘जगन के यहां हम दोनों एक साथ, एक ही मकसद से गए थे वंदना. लेकिन तुम बच्चे को देख रही थी और मैं उसे जन्म देने उस की मां को. इसलिए मेरी आंखों ने जो देखा, वह तुम नहीं देख सकीं. वरना तुम भी अपने सीने में वैसा ही दर्द महसूस करती, जैसा कि मैं कर रहा हूं.’’

वंदना की आंखों में उलझन और हैरानी उभर गई. उस ने कहा, ‘‘तुम क्या कहना चाहते हो, मैं समझी नहीं?’’

सुरेश के होठों पर एक फीकी मुसकराहट फैल गई. वह बोला, ‘‘जगन के यहां से आने के बाद मैं लगातार अपने आप से ही लड़ रहा हूं वंदना. बारबार मुझे लग रहा है कि जगन से उस का बच्चा ले कर हम एक बहुत बड़ा गुनाह करने जा रहे हैं. मैं ने तुम्हारी आंखों में औलाद के न होने का दर्द देखा है. मगर मुझे जगन की बीवी की आंखों में जो दर्द दिखा, वह शायद तुम्हारे इस दर्द से भी कहीं बड़ा था. इन दोनों दर्दों का एक ही रंग है, वजह भले ही अलगअलग हो.’’

बहुत दिनों से खिले हुए वंदना के चेहरे पर एकाएक निराशा की बदली छा गई. उस ने उदासी से कहा, ‘‘लगता है, तुम ने बच्चे को गोद लेने का इरादा बदल दिया है?’’

‘‘मैं ने बच्चा गोद लेने का नहीं, जगन के बच्चे को गोद लेने का इरादा बदल दिया है.’’

‘‘क्यों?’’ वंदना ने झल्ला कर पूछा.

‘‘जगन एक तरह से अपना कर्ज उतारने के लिए बच्चा बेच रहा है. वंदना यह फैसला उस का अकेले का है. इस में उस की पत्नी की रजामंदी बिलकुल नहीं है. जब वह बच्चे को अपने सीने से अलग कर के तुम्हें दे रही थी. तब मैं ने उस की उदास आंखों में जो तड़प और दर्द देखा था, वह मेरी आत्मा को आरी की तरह काट रहा है. हमें औलाद का दर्द है. अपने इस दर्द को दूर करने के लिए हमें किसी को भी दर्द देने का हक नहीं है.’’

सुरेश की इस बात पर वंदना सोचते हुए बोली, ‘‘हम बच्चा लेने से मना भी कर दें तो क्या होगा? जगन किसी दूसरे से पैसे ले कर उसे बच्चा दे देगा. हम जैसे तमाम लोग बच्चे के लिए परेशान हैं.’’

‘‘अगर हम बच्चा नहीं लेते तो किसी दूसरे को भी जगन को बच्चा नहीं देने देंगे.’’

‘‘वह कैसे?’’ वंदना ने पूछा.

‘‘जगन अपना कर्ज उतारने के लिए बच्चा बेच रहा है. अगर हम उस का कर्ज उतार दें तो वह बच्चा क्यों बेचेगा? पैसे देने से पहले हम उस से लिखवा लेंगे कि वह अपना बच्चा किसी दूसरे को अब नहीं देगा. इस के बाद अगर वह शर्त तोड़ेगा तो हम पुलिस की मदद लेंगे. साथ ही हम बच्चा गोद लेने की कोशिश भी करते रहेंगे. मैं कोई ऐसा बच्चा गोद नहीं लेना चाहता, जिस के पीछे देने वाले की मजबूरी और जन्म देने वाली मां का दर्द और आंसू हो.’’

सुरेश ने जब अपनी बात खत्म की, तो वंदना उसे टुकरटुकर ताक रही थी.

‘‘ऐसे क्या देख रही हो?’’ सुरेश ने पूछा तो वह मुसकरा कर बोली, ‘‘देख रही हूं कि तुम कितने महान हो, मुझे तुम्हारी पत्नी होने पर गर्व है.’’

सुरेश ने उस का हाथ अपने हाथों में ले कर हलके से दबा दिया. उसे लगा कि उस की आत्मा से एक बहुत बड़ा बोझ उतर गया है.

कागज के टुकड़े की चोरी – भाग 3

जब वह घर पहुंचा तो गिलोरिया मौजूद नहीं थी. उस ने यह सोचते हुए जेब से कागज निकाला कि उस की उम्मीद के विपरीत जल्दी काम पूरा हो गया. लेकिन कागज खोल कर देखा तो उस की उम्मीदों पर पानी फिर गया. वह किसी पुरानी डायरी का कागज नहीं था. उस का साइज भी अलग था. निक ने मायूसी के साथ सिर को झटका और कागज को फाड़ने का इरादा किया.

तभी उस की नजर कागज पर लिखे हुए पते पर पड़ी. लिखा था : पाल गिलबर्ट, कमोडोर रेस्टोरेंट, कोस्ट रोड.

निक कुछ देर तक सोचता रहा. फिर वह कार में बैठ कर कोस्ट रोड की तरफ रवाना हो गया.

कमोडोर रेस्टोरेंट समुद्र के किनारे एक छोटा सा रेस्तरां था. काउंटर के पीछे एक मोटी सी औरत एप्रिन बांधे खड़ी थी. रेस्टोरेंट करीब करीब खाली पड़ा था. एक कोने में कुछ शिपमैन बैठे थे. निक ने काउंटर के पास पड़े एक स्टूल पर बैठ कर कौफी का आर्डर दिया. औरत ने कौफी का कप भर कर उस के सामने रख दिया और जिज्ञासा भरी नजरों से उस की ओर देखने लगी.

‘‘तुम शायद पहली बार यहां आए हो?’’ औरत ने पूछा तो निक बोला, ‘‘हां, दरअसल मेरे एक दोस्त ने बताया था कि यहां सी-फूड बहुत अच्छा मिलता है.’’

‘‘थैंक्स, क्या नाम है तुम्हारे दोस्त का?’’

निक ने थोड़ा रुक कर कहा, ‘‘माइकल गार्नर.’’

‘‘माइकल गार्नर?’’ औरत ने थोड़ा चौंकते हुए पूछा, ‘‘तुम उसे कैसे जानते हो?’’

‘‘हमारी मुलाकात एक बिजनैस फंक्शन के दौरान हुई थी.’’ निक आंख दबाते हुए बोला, ‘‘हमारी लाइन एक ही है. उम्मीद है, तुम मेरा मतलब समझ गई होगी.’’

वह औरत भौएं सिकोड़ कर निक को घूरने लगी. एक लंबी चुप्पी के बाद उस ने पूछा, ‘‘क्या तुम्हें माइकल ने भेजा है?’’

सुन कर निक चौंका, लेकिन उस ने जाहिर नहीं होने दिया. उस ने थोड़ा सा ड्रामा करने का फैसला किया. वह कौफी की चुस्कियां लेते हुए बोला, ‘‘माइकल ने पाल गिलबर्ट का नाम लिया था.’’

‘‘पाल मेरा पति है और बिलकुल बुद्धू है. मैं खुद माइकल से बात करना चाहती थी लेकिन परेशानी यह है कि वह कभी सामने नहीं आता. मैं ने आज तक उस की शक्ल नहीं देखी. वह पाल की सादगी से नाजायज फायदा उठा रहा है.’’

निक बड़ी मुश्किल से उस की बात को पचा गया. वह सोचने लग. अगर इस औरत ने माइकल की शक्ल नहीं देखी तो इस का मतलब माइकल ने कभी इस रेस्टोरेंट में कदम नहीं रखा था.

‘‘तुम माइकल के बजाय मुझ से बात कर सकती हो.’’ निक ने कहा, ‘‘मुझे निकोलस कहते हैं.’’

औरत धीमे स्वर में बोली, ‘‘माइकल से कह देना कि हम सिर्फ एक हजार डौलर के लिए इतना बड़ा खतरा मोल नहीं ले सकते.’’

‘‘मेरे ख्याल में तो एक हजार डौलर बहुत होते हैं.’’ निक ने अंधेरे में तीर चलाया. उसे इस बात की कोई जानकारी नहीं थी कि वह औरत किस मामले की बात कर रही है.

‘‘असल खतरा तो हम मोल लेते हैं. अगर कभी छापा पड़ गया तो माइकल का क्या नुकसान होगा? ज्यादा से ज्यादा एक पैकेज पकड़ा जाएगा. सारी मुसीबत तो हम पर आ पड़ेगी.’’

निक ने गहरी सांस ली. एक बात साफ हो गई थी कि मामला स्मगलिंग से संबंधित था.

‘‘मैं माइकल से बात करुंगा,’’ निक ने कहा, ‘‘तुम्हारे खयाल में कितने पैसे ठीक रहेंगे?’’

‘‘कम से कम 3 हजार डौलर.’’

‘‘यह तो बहुत ज्यादा हैं. बहरहाल, माइकल से बात करुंगा. मैं पैकेज के बारे में पूछना चाहता था.’’

‘‘मेरा खयाल है, यह बात माइकल को मालूम होनी चाहिए. आखिरी सूचना के अनुसार जहाज 15 तारीख को रात के किसी समय बंदरगाह पहुंचेगा. इस का मतलब डिलीवरी 16 या 17 तारीख को होगी.’’

निक ने कौफी का आखिरी घूंट लिया, पैसे निकाल कर काउंटर पर रखे और जाने के लिए खड़ा हो गया. जातेजाते उस ने कहा, ‘‘ओ.के. मिसेज गिलबर्ट. फिर मुलाकात होगी.’’

बाहर निकलकर निक अपनी कार में जा बैठा जो रेस्टोरेंट से कुछ दूरी पर सड़क के दूसरी ओर खड़ी थी. कुछ देर तक वह ड्राइविंग सीट पर बैठा परिस्थितियों पर विचार करता रहा. जाहिर था कोई चीज पानी के जहाज पर स्मगल कर के कमोडोर रेस्टोरेंट में पहुंचाई जाती थी और वहां से माइकल का कोई कारिंदा उसे वसूल कर लेता था और इस थोड़ी सी सेवा के बदले पाल गिलबर्ट एक हजार डौलर कमा लेता था. सौदा ज्यादा बुरा नहीं था.

निक ने इंजन स्टार्ट कर के कार को गियर में डाल दिया. उसी समय उस ने कमोडोर रेस्टोरेंट के सामने एक स्टेशन वैगन को रुकते हुए देखा. उस की ड्राइविंग सीट पर नारमन बैठा था. उस समय उस की आंख पर काली पट्टी के बजाय धूप का चश्मा था. निक ने अर्थपूर्ण भाव में सिर हिलाया और रुके बगैर बढ़ गया.

अगले दिन जब निक ने माइकल गार्नर के घर की कालबेल बजाई तो एक 30-32 साल की औरत ने दरवाजा खोला. वह वैलडे्रस्ड और आकर्षक औरत थी. उस ने सवालिया नजरों से निक और गिलोरिया की ओर देखा. निक के कंधे पर कैमरे लटक रहे थे. जबकि गिलोरिया एक मुस्तैद फीचर राइटर लग रही थी.

‘‘सौरी, मिस्टर माइकल घर पर नहीं हैं.’’ औरत ने उन दोनों को देखते ही कहा.

यह बात निक और गिलोरिया को पहले से ही मालूम थी. सच तो यह था कि उन्हें इस मौके के लिए डेढ़ घंटे तक इंतजार करना पड़ा था. वो औरत उस घर की हाउसकीपर थी. निक ने जेब से एक कार्ड निकाल कर उस औरत के हाथ में दिया.

उस कार्ड के अनुसार निक घरेलू नौकरों की एक संस्था का प्रतिनिधि था. विजिटिंग कार्ड उस ने फौरी तौर पर आर्डर दे कर तैयार करवाए थे.

‘‘मैं किसी संस्था की सदस्य नहीं बनना चाहती.’’ औरत ने कार्ड वापस करते हुए कहा तो निक 5 डौलर का नोट निकाल कर औरत की ओर बढ़ाते हुए बोला, ‘‘हम तुम्हें संस्था का सदस्य बनाने नहीं आए. हम घरों में काम करने वाले नौकरों के बारे में सर्वे कर रहे हैं और तुम से कुछ सवाल करना चाहते हैं.’’

औरत असमंजस की नजरों से नोट की तरफ देखने लगी.

‘‘हम तुम्हारा ज्यादा समय नहीं लेंगे. कुछ सवाल करेंगे और कुछ फोटो खींचेंगे. ज्यादा से ज्यादा 15-20 मिनट लगेंगे. ये फोटो महिलाओं की मैगजीन में प्रकाशित की जाएंगी.’’

ऐसा क्या था रहस्य छिपा था उस कागज के टुकड़े में? जानने के लिए पढ़ें इस Fiction Crime Story का अगला भाग… 

बारिश वाला प्यार : कौन थी वो? – भाग 3

कल सुबह जब शायनी औफिस आई तो बहुत खुश थी बोली, “मां, बौस कह रहे थे अगर मैं ने उन की कंपनी को कौन्ट्रेक्ट दिलवा दिया तो जल्द ही मुझे प्रमोशन मिलेगी.’‘

उस के थोड़ी ही देर में शायनी का मैसेज आया कि आज कौन्ट्रेक्ट के लिए एक बहुत बड़े सेठ अवस्थी से मिलने जाना है. आज बहुत लेट हो जाएगी और मैं उस का इंतजार न कर के सो जाऊं, कल सुबह बात कर लेंगे. जैसे ही मैं ने अवस्थी नाम पढ़ा, मुझे घबराहट महसूस हुई. मैं ने शायनी को पूछा कि मीटिंग कब और कहां है तो उस ने मुझे बताया कि मीटिंग ओबराय होटल में रात को 10 बजे है.

यह सुन कर मेरा मन घबरा गया. उस समय अभी सुबह के 11 ही बजे थे और मैं उसी समय टैक्सी पकड़ कर मुंबई के लिए निकल पड़ी. मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि कैसे अपनी बेटी को उस दरिंदे से बचाऊं जो कि उसी का ही खून है.

मैं जैसे ही होटल पहुंची, लगभग 11 बज रहे थे. मैं पूरे रास्ते शायनी को फोन करती रही, मगर आज अचानक शायद उस का फोन खराब हो गया था. मैं ने रिसैप्शन पर अवस्थी का रूम पूछा तो उन्होंने बताने से इंकार कर दिया, बोले सर की मीटिंग चल रही है. मुझे कुछ आइडिया था ही कि शायद रूम का पता रिसैप्शन पर न बताएं, इसलिए एक शैंपेन की बोतल और केक भी रास्ते से ले कर साथ रख लिया था.

तब मैं ने एक नाटक रचा. उस केक और शैंपेन की बोतल को दिखा कर रिसैप्शन पर बैठी एक महिला से रिक्वेस्ट की कि अवस्थीजी मेरे पति हैं और वो बिजनैस में इतने बिजी रहते हैं कि अपना जन्मदिन तक भूल गए. मैं उन्हें सरप्राइज देने आई हूं.

इस तरह उन्हें यकीन दिला कर मैं रूम तक गई, लेकिन रूम के बाहर ‘डू नाट डिस्टर्ब’ का बोर्ड लटकता देख वेटर अंदर जाने से मना करने लगा. तब मैं ने वेटर को चुप रहने का इशारा कर के दरवाजा खटखटाया तो अंदर से बहुत ही गुस्से भरी आवाज आई, “कौन बदतमीज है. बाहर डू नाट डिस्टर्ब का बोर्ड नहीं दिखाई दिया.’‘

“सर, आप के लिए सरप्राइज है, प्लीज़ ओपन द डोर, प्लीज सर. इट्स ए ह्यूज सरप्राइज.’‘ मैं ने कहा.

सेठ तो वैसे ही लड़कियों का दीवाना था, सुरीली आवाज सुन कर दरवाजा खोल दिया. अब तक मैं वेटर को वापस भेज चुकी थी, सेठ के दरवाजा खोलते ही उसे नाइट गाउन में देख कर मेरा दिमाग झन्ना उठा और उसे धक्का दे कर मैं ट्रौली ले कर अंदर चली गई. अचानक इस तरह के व्यवहार की उम्मीद न होते हुए सेठ हड़बड़ा गया.

गुस्से से चिल्लाने लगा, “कौन हो तुम और इस तरह से अंदर क्यों आई?’‘

मुझे देखते ही शायनी मुझ से लिपट गई और रोने लगी बोली, “अच्छा हुआ आप आ गईं, वरना आज मैं कहीं की न रहती.”

मैं ने देखा 1-2 जगह से उस के कपड़े फटे हुए थे, जिन्हें देखते ही मुझे पुरानी सारी बातें याद आने लगीं. उस वक्त मुझे कुछ होश नहीं था. कुछ सोचने के बाद शीतल फिर से बोलने लगी कि अचानक मैं ने शैंपेन की बोतल उठाई और जोर से सेठ के सिर पर दे मारी. उस के सिर से खून की धारा बहने लगी. मैं लगातार उस पर वार कर रही थी और वह कुछ ही देर में ठंडा हो गया.

शायनी ने जब मुझे झिंझोड़ा तब मुझे होश आया कि मैं ने क्या किया. मगर, मुझे इस बात का बिलकुल भी अफसोस नहीं था और न है. मैं ने एक राक्षस को मारा है, एक पिता के हाथ से बेटी को अपवित्र होने से बचाया. धरती का थोड़ा सा बोझ कम कर दिया आज मैं ने. अब चाहे कानून मुझे फांसी दे दे, लेकिन मेरे मन में शांति है आज इंतकाम ले लिया मैं ने. इतना कह कर शीतल ने एक ठंडी सांस ली.

“इस समय आप की बेटी कहां है?’‘

“उसे मैं ने उसी समय टैक्सी में योगेश के पास भेज दिया था.’‘

“हां कुछ देर पहले एक गोरी, लंबी सी नीली ड्रेस में लड़की बारिश में भागते हुए होटल से बाहर आई और टैक्सी में बैठ कर चली गई.’‘

“हां, वो मेरी बेटी थी.’‘

आज मुंबई न्यूज की सब से बड़ी खबर, ‘देवता कहलाने वाला राक्षस अपनी ही बेटी को बेआबरू करने चला था, लेकिन बेटी की मां ने उस का कत्ल कर के बेटी को भी बचाया और अपना इंतकाम भी लिया,’ चर्चा का विषय बनी रही.

इस के बाद राहुल ने अपने दोस्त अमन को फोन किया, “हैलो अमन, मिल गया.’‘

“कौन, खूनी?’‘ अमन ने पूछा.

“नहीं, बारिश वाला प्यार.’‘

राहुल को अब उस लड़की का नाम भी पता चल चुका था, जो उस के दिल को पहली ही नजर में घायल कर गई थी. राहुल ने शीतल को भरोसा दिया कि वह अपने स्तर से उस की जमानत कराने का प्रयास करेगा. उस ने उस के मुंहबोले भाई का फोन नंबर भी ले लिया.

पुलिस ने शीतल से पूछताछ करने के बाद उसे जेल भेज दिया था. इस के बाद राहुल ने योगेश से संपर्क किया. फिर राहुल ने योगेश को अपने जानकार सीनियर वकील अवनीश गोयल से मिलवाया. अब राहुल ने अपने स्तर से मृतक सेठ अवस्थी की कुंडली खंगाल कर उस की अय्याशी के सारे सबूत इकट्ठे किए. अनाथ आश्रम की संचालिका और कई भुक्तभोगी लड़कियों ने भी सेठ अवस्थी के खिलाफ गवाही दी.

पुलिस हत्या के इस केस का न तो कोई चश्मदीद गवाह पेश कर सकी और न ही पुख्ता सबूत. इस का नतीजा यह हुआ कि कोर्ट ने शीतल को बाइज्जत बरी कर दिया.

शीतल राहुल के अहसान को कैसे भुला सकती थी. बाद में उसे पता चला कि राहुल उस की बेटी शायनी को दिल से चाहता है. यह बात उस ने शायनी से पूछी तो उस ने भी हां कर दी. इस के बाद शीतल और योगेश ने शायनी और राहुल का विवाह करा दिया. राहुल अपने बारिश वाले प्यार को पा कर फूला नहीं समा रहा था.