Crime News: कविता रैना की हत्या पुलिस के लिए एक पहेली बन गई थी. इस पहेली को सुलझाने में 4 आईपीएस अधिकारी, 5 थानों की पुलिस, क्राइम ब्रांच और 200 पुलिस कर्मचारी लगे. आज तक का यह सब से महंगा और जटिल केस अब मध्य प्रदेश पुलिस अकादमी में पढ़ाया जाएगा.
कविता रैना की हत्या इंदौर पुलिस के लिए मिस्ट्री बन कर रह गई थी. एक ऐसा रहस्य, जिस का कोई भी सिरा ढूंढे नहीं मिल रहा था. सिरा मिला तो लेकिन 107 दिन बाद, वह भी तब जब 5 आईपीएस अफसरों सहित 200 पुलिस कर्मियों ने खानापीना भूल कर 20-20 घंटे काम किया. 177 लोगों से गहन पूछताछ की, डेढ़ लाख मोबाइल फोनों की काल डिटेल्स की छानबीन की गई.
20 से ज्यादा बार मर्डर का ट्रायल किया गया. 1500 से ज्यादा मकानों और लगभग 200 गोदामों का चप्पाचप्पा छाना गया. 117 बुलेट मोटरसाइकिलों और 150 कारों को जांचा परखा गया. 100 से ज्यादा सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखी गई. 5 थानों की पुलिस के साथसाथ क्राइम ब्रांच को भी लगाया गया. यहां तक कि अजय देवगन, तब्बू स्टारर फिल्म ‘दृश्यम’ को कई बार इसलिए देखा गया कि कहीं हत्यारे ने फिल्म के नायक की तरह ही कोई दांव न खेला हो.
कविता रैना की हत्या की कहानी सुलझी तो लेकिन इंदौर पुलिस के लिए एक ऐसा इतिहास बन कर जो अब पुलिस अकादमी में पढ़ाया जाएगा. अपने पति संजय रैना, सास कांता रैना और 2 बच्चों बेटे ध्रुव और बेटी यशस्वी के साथ 81/2 सेक्टर-बी, मित्रबंधु नगर में रहती थीं कविता रैना. मित्रबंधु नगर इंदौर के कनाडि़या रोड पर है. कविता के पति संजय रैना एमिल फार्मास्युटिकल कंपनी में एरिया सेल्स मैनेजर थे. पहले कविता भी एक स्कूल में पढ़ाती थीं, लेकिन बच्चों की जिम्मेदारी बढ़ जाने की वजह से उन्होंने 2 साल पहले पढ़ाना छोड़ दिया था. फिलहाल वह घर में रह कर महिलाओं के ब्लाउज वगैरह सिलने का काम करती थीं. ब्लाउज सिलने में उन्हें एक्सपर्ट माना जाता था.
कविता के पति संजय रैना अधिकांशत: कंपनी के कामों में व्यस्त रहते थे. इसलिए घरबार के छोटेमोटे काम भी कविता को करने होते थे. इस के लिए उन्होंने एक्टिवा स्कूटी ले रखी थी. कविता की बेटी यशस्वी एक कान्वेंट स्कूल में पहली क्लास में पढ़ती थी. वह रोजाना स्कूल बस से आतीजाती थी. बस स्टाप बहुत ज्यादा दूर नहीं था. कविता सुबह को बेटी को स्कूटी से ले जा कर बस में बैठा आती थीं और दोपहर को खुद ही बस स्टाप से ले आती थीं.
24 अगस्त, 2015 की दोपहर को डेढ़ बजे यशस्वी की बस मित्रबंधु नगर के शर्मा स्वीट्स के सामने वाले स्टाप पर आकर रुकी तो अन्य बच्चों के साथ यशस्वी भी उतर गई. सभी बच्चों की मां या घर का कोई सदस्य उन्हें लेने आए थे, लेकिन यशस्वी की मां कविता रैना वहां नहीं आई थीं.
पिछले 3 सालों में ऐसा कभी नहीं हुआ था कि मां यशस्वी को लेने स्टाप पर नहीं आई हों. मां को वहां न देख यशस्वी रुंआसी हो गई. कविता के पड़ोस में ही रहने वाली जया अपने बच्चे को लेने बस स्टाप पर आई थीं. उन्होंने यशस्वी को रुंआसी खड़ी देखा तो उसे समझाया, ‘‘हो सकता है तुम्हारी मां किसी काम में उलझ गई हों, चलो मैं तुम्हें घर छोड़ दूंगी.’’
जया आंटी पड़ोस में ही रहती थीं. यशस्वी उन्हें जानती थी, इसलिए वह उन के साथ घर आ गई. यशस्वी को अकेला आया देख दादी कांता रैना ने पूछा, ‘‘तेरी मां नहीं पहुंची स्टाप पर? यहां से तो वह एक दस पर ही निकल गई थी.’’
‘‘मां वहां नहीं थीं, मैं आंटी के साथ आ गई.’’ यशस्वी ने बताया तो दादी बोली, ‘‘चल कोई बात नहीं, हो सकता है किसी काम में उलझ गई हो.’’ कांता रैना पोती की ड्रैस वगैरह चेंज कराने में लग गईं. बात वहीं समाप्त हो गई.
चूंकि कविता घर के कामों से बाहर जाती रहती थीं, इसलिए कांता रैना ने तो यह बात आसानी से मान ली कि वह किसी काम में उलझ गई होगी, लेकिन यह बात यशस्वी के गले नहीं उतर रही थी. इस की वजह यह थी कि 3 सालों में ऐसा कभी नहीं हुआ था कि मां उसे लेने स्टाप पर न पहुंची हों. संजय रैना उस दिन एक मीटिंग के सिलसिले में सुबह ही घर से निकल गए थे. उन्होंने नाश्ता तक नहीं किया था. दोपहर को लंच करने वह घर आए तो यशस्वी ने उन्हें बताया कि मां उसे लेने न तो बसस्टाप पर पहुंचीं और न ही अभी तक लौटी हैं. यह जान कर संजय रैना हैरान रह गए. उन्होंने कविता के मोबाइल पर फोन किया तो पता चला उन का मोबाइल घर में ही है. तब तक कविता को गए 2 घंटे हो चुके थे.
संजय को चिंता हुई तो वह खाना छोड़ कर कविता को ढूंढने निकल पड़े. उन्होंने कविता को हर जगह ढूंढा, लेकिन उन का कोई पता नहीं चला. रिश्तेदारों और परिचितों को फोन भी किए पर कविता के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली. हर ओर से निराश हो कर उन्होंने थाना कनाडि़या में कविता की गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखा दी. पुलिस ने गुमशुदगी की रिपोर्ट तो दर्ज कर ली, लेकिन संजय जानते थे कि हालफिलहाल कुछ होने वाला नहीं है. इसलिए वह रिश्तेदारों और मित्रों के साथ कविता को खोजते रहे. कविता को लापता हुए 2 दिन हो गए लेकिन उन का कहीं कोई पता न चला.
इस से सब ने अनुमान लगाया कि कविता के साथ कोई अनहोनी हो गई है. 26 अगस्त को देवास के पास एक युवती की जली हुई लाश मिली तो पुलिस ने शिनाख्त के लिए संजय रैना को भी बुलाया क्योंकि उन्होंने पत्नी की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करा रखी थी. लाश पहचानने की स्थिति में नहीं थी. कपड़े वगैरह भी नहीं थे. संजय ने अनुमान से ही कह दिया कि हो सकता है वह उन की पत्नी की लाश हो. पुलिस ने इसे सत्य मान कर उन से हस्ताक्षर भी करवा लिए. यह खबर सुन कर संजय के घर में कोहराम मच गया. पूरा परिवार रोनेधोने लगा. तभी खबर आई कि थाना भंवर कुआं क्षेत्र में 3 इमली चौराहे के पास वाले गंदे नाले में 2 बोरों में एक महिला की 6 टुकड़ों में कटी लाश मिली है.
दरअसल, कचरा बीनने वाले 2 लड़कों ने नाले में 2 बोरे पड़े देखे थे, जिन में से बदबू आ रही थी. उन्होंने यह बात लोगों को बताई और लोगों ने पुलिस को. सूचना मिलते ही थाना भंवरकुआं के थानाप्रभारी राजेंद्र सोनी पुलिस टीम के साथ वहां जा पहुंचे जहां बोरे पड़े थे. दोनों बोरों को नाले से निकाल कर खुलवाया गया तो उन में एक औरत की नग्न लाश निकली. आश्चर्यजनक बात यह थी कि लाश 6 टुकड़ों में कटी हुई थी. इस के अलावा मृतका के सीने पर चाकुओं के 2 निशान भी थे. साथ ही सिर पर भी एक घाव था. पुलिस ने लाश के टुकड़ों को जोड़ा ताकि मृतका की पहचान कराई जा सके.
पुलिस ने लाश को पहचानने के लिए संजय रैना को भी बुलाया. उन्होंने लाश के टुकड़े देखे तो हाथ पर गुदे टैटू और कंधे के तिल को देख कर बताया कि लाश उन की पत्नी कविता की है. पुलिस ने फोरेंसिक एक्सपर्ट सुधीर शर्मा को भी बुला रखा था. उन्होंने लाश को सूक्ष्म यत्रों से देख कर बताया कि मृतका की हत्या 24 अगस्त को ही कर दी गई थी. जबकि उस के शरीर को काफी बाद में इलेक्ट्रिक कटर से काटा गया था. यह बात लाश के कटने के निशानों और हड्डियों के काटने की शेप से पता चली.
प्राथमिक काररवाई के बाद लाश के टुकड़ों को पोस्टमार्टम के लिए एमवाई अस्पताल भेज दिया गया. इस के साथ ही थाना भंवरकुआं में अज्ञात लोगों के विरुद्ध हत्या का केस दर्ज कर लिया गया. एक सीधीसादी पारिवारिक गृहणी के साथ इस तरह का पाशविक कृत्य किसी के गले नहीं उतर रहा था. मित्रबंधु नगर के निवासी इसे ले कर बहुत गुस्से में थे. उन का गुस्सा पुलिस पर भी था क्योंकि गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज होने के बाद भी उस ने कोई खास काररवाई नहीं की थी.
यही वजह थी कि पोस्टमार्टम के बाद जब कविता का शव मिल गया तो मित्रबंधु नगर के लागों ने शव को बंगाली चौराहे पर रख कर चक्का जाम कर दिया. इस पर डीआईजी संतोष कुमार, एसपी (पूर्व) ओ.पी. त्रिपाठी, एसपी (पश्चिम) डी. कल्याण चक्रवर्ती, एसपी (सिटी) शशिकांत कनकने और एडीशनल एसपी (क्राइम ब्रांच) विनयपाल ने बंगाली चौराहे पर आ कर लोगों को समझाया. साथ ही आश्वासन भी दिया कि जल्दी ही हत्यारों को पकड़ लिया जाएगा.
पुलिस के अनुरोध और आश्वासन पर लोगों ने धरना खत्म कर दिया. उसी दिन कविता का अंतिम संस्कार कर दिया गया. पुलिस का अनुमान था कि कविता रैना के साथ सामूहिक दुष्कर्म किया गया होगा और उस के बाद उन की हत्या कर दी गई होगी. लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई तो पुलिस की यह धारणा गलत साबित हुई. कविता के साथ कोई दुष्कर्म नहीं हुआ था. उन की मौत सिर पर लगी गंभीर चोट और सीने पर हुए चाकू के वारों से हुई थी. रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि कविता की लाश के टुकड़े चाकू वगैरह से नहीं बल्कि इलेक्ट्रिक कटर से किए गए थे. अलबत्ता सीने पर चाकू के 2 निशान जरूर पाए गए.
इस से पुलिस को संदेह हुआ कि ऐसा काम कोई करीबी ही कर सकता था. इस की वजह यह थी कि कविता की हत्या और शरीर के टुकड़े किसी एकांत जगह पर ही किए जा सकते थे और ऐसी जगह वह किसी करीबी के साथ ही जा सकतीं थीं. यह किसी प्रेम प्रसंग का मामला भी हो सकता था और पतिपत्नी के झगड़ों का प्रतिफल भी. संभावना यही थी कि इस के पीछे कविता के पति संजय रैना का हाथ हो सकता है.
पुलिस की प्राथमिक पूछताछ में यह बात सामने आई कि घटना वाले दिन कविता अपनी बेटी यशस्वी को बस स्टाप से लाने के लिए 1 बज कर 10 मिनट पर घर से निकली थीं. यशस्वी की बस स्टाप पर 1 बज कर 40 मिनट पर आई थी. जब बस स्टाप पर पहुंची थी तब कविता वहां नहीं थीं. इस का मतलब कविता के गायब होने का रहस्य 1 बज कर 10 मिनट से 1 बज कर 40 मिनट के बीच ही छिपा था. घर से बस स्टाप के बीच ज्यादा दूरी नहीं थी. पुलिस ने इस सवा किलोमीटर के रास्ते पर तमाम लोगों से पूछताछ की, लेकिन किसी ने भी ऐसा कुछ नहीं बताया जिस से यह माना जाता कि कविता का अपहरण हुआ था.
पुलिस ने बस स्टाप के सामने वाली दुकान शर्मा स्वीट्स पर लगे सीसीटीवी कैमरे की फुटेज भी देखी, लेकिन कविता कहीं नजर नहीं आईं. इस से अनुमान लगाया गया कि वह किसी परिचित के साथ ही गई होंगी, बाद में उसी ने उन का कत्ल कर दिया होगा. इसी के मद्देनजर पुलिस ने सब से पहले कविता के पति संजय रैना को शक के दायरे में रख कर पूछताछ करने का मन बनाया. इस की वजह यह थी कि संजय ने एक गलत लाश की पहचान अपनी पत्नी के रूप में कर दी थी.
पूछताछ से पहले संजय रैना की घटना वाले दिन की गतिविधियों के बारे में पता लगाया गया. साथ ही उन की काल डिटेल्स भी निकलवाई गई. पासपड़ोस के लोगों और उन के परिचितों से भी पूछताछ की गई. पूछताछ में संजय रैना की मां कांता रैना को भी शामिल किया गया. इस पूछताछ में पता चला कि कविता रैना घरेलू महिला थीं. उन के और संजय के बीच किसी बात को ले कर कोई मतभेद नहीं था. कविता की किसी से कोई दुश्मनी या झगड़ा भी नहीं था. वह मिलनसार महिला थीं. कांता रैना ने बताया कि कविता घर पर ब्लाउज सिलने का काम करती थीं.
घटना वाले दिन उन्हें 2 ब्लाउज सिल कर शाम तक देने थे, इसलिए यशस्वी को ले कर उन्हें जल्दी लौट आना चाहिए था, लेकिन वह नहीं लौटी थीं. इस पूछताछ में यह बात भी निकल कर आई कि संजय को कोई मनोरोग था, जिस के लिए वह खुद इंजेक्शन लिया करते थे. इस बारे में संजय रैना से बात की गई तो उन्होंने बताया कि उन्हें कुछ समय पहले मानसिक प्रौब्लम हुई थी. डाक्टर ने उन्हें इंजेक्शन लगाना सिखा कर घर पर ही इंजेक्शन लगाने को कहा था. उन्होंने डाक्टर के पेपर भी पुलिस को दिखाए. इस से पुलिस संतुष्ट हो गई.
संजय रैना की घटना वाले दिन की गतिविधियों और उन की काल डिटेल्स में पुलिस को कुछ संदिग्ध नहीं मिला. पुलिस ने संजय के 2 सहकर्मियों पीयूष और विक्रांत परमार से भी पूछताछ की, जो कभीकभी उन के घर आया करते थे. लेकिन इस का भी कोई नतीजा नहीं निकला. इस बीच बड़नगर से कविता के पिता रामनारायण जालवाल, मां तेजूबाई, दोनों भाई लखन व ठाकुर तथा दोनों बहनें सुनीता और सीमा भी आ चुके थे. पुलिस ने रामनारायण, तेजूबाई और उन के बेटों से अलग पूछताछ की. उन का कहना था कि संजय रैना से कविता को कोई शिकायत नहीं थी. दोनों के बीच खूब प्यार था. यह संभव नहीं है कि संजय ने कविता को कोई नुकसान पहुंचाया हो.
पुलिस ने बहन सीमा और उस के पति ओमप्रकाश कुमावत से भी अलग से पूछताछ की. ओमप्रकाश कुमावत का पालदा में एंब्रायडरी का काम था. ओमप्रकाश और सीमा को उन के घर पालदा भी ले जाया गया. लेकिन इस से कोई नतीजा नहीं निकला. जब कहीं से कोई बात न बनी तो डीआईजी संतोष कुमार ने एएसपी देवेंद्र पाटीदार, सीएसपी बिट्टू सहगल, सीएसपी पारुल बेलापुरकर, शशिकांत कनकने, एएसपी विनयपाल और इंसपेक्टर सोमा मलिक के नेतृत्व में पुलिस की 8 टीमें बनाईं. इन आठों टीमों को अलगअलग जिम्मेदारियां सौंपी गईं.
जांच के जो अहम बिंदू तय किए गए उन में मुख्य थे, उस सवा किलोमीटर रास्ते की हर नजरिए से गहन जांच करना जो कविता के घर और स्कूल बस के स्टाप के बीच था. क्योंकि कविता उसी रास्ते से लापता हुई थीं. साथ ही एक टीम को उस रास्ते में पड़ने वाली दुकानों या मकानों में लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज भी खंगालनी थीं.
एक टीम को संजय रैना और कविता के करीबियों से पूछताछ की जिम्मेदारी सौंपी गई तो एक को उन लोगों का पता लगाने की जिम्मेदारी दी गई जो कविता के संपर्क में रहते थे. एक टीम को कविता के चरित्र या किसी प्रेमप्रसंग वगैरह का भी पता लगाने को कहा गया. एक टीम इस काम पर भी लगाई गई कि वह कविता के बस स्टाप के बीच पड़ने वाले सभी मोबाइल टावरों के संपर्क में आने वाले मोबाइल फोनों के नंबर एकत्र करे और कालडिटेल्स से उन में संदिग्ध नंबर ढूंढे.
एक टीम को उस टीचर जो 2 साल पहले कविता के साथ पढ़ाती थी और उस स्कूल के संचालक से भी पूछताछ की जिम्मेदारी सौंपी गई, जिस के स्कूल में ये दोनों पढ़ाती थीं. दूसरी टीम को यशस्वी को बस स्टाप से लाने वाली महिला और उस महिला से पूछताछ की जिम्मेदारी सौंपी गई जिस ने कविता को बस स्टाप की ओर जाते देखा था. साथ ही उस महिला से भी पूछताछ करने को कहा गया जिस के ब्लाउजों का आर्डर कविता को उसी दिन शाम तक देना था.
पुलिस टीम ने पता लगाया तो जानकारी मिली कि कविता अपनी पड़ोसी निशा यादव के साथ रेहान अली के स्कूल में पढ़ाती थीं. वहां से पहले कविता ने पढ़ाना छोड़ा था और फिर एक साल बाद निशा ने. कविता के स्कूल की नौकरी छोड़ने की वजह यह थी कि एक तो उन की बेटी यशस्वी स्कूल जाने लगी थी और उसे बस स्टाप पर छोड़ने और लेने जाना होता था. दूसरे वह बहुत अच्छे ब्लाउज सिलना जानती थी और स्कूल के वेतन से ज्यादा पैसे घर पर ही कमा सकती थीं.
पुलिस ने निशा और स्कूल संचालक दोनों से पूछताछ की. उन दोनों ने बताया कि उन के बीच किसी तरह का कोई मतभेद या विवाद नहीं था. कविता ने अपनी मर्जी से नौकरी छोड़ी थी. नौकरी छोड़ने के बाद रेहान अली से उन का कोई संपर्क नहीं रहा था. निशा से भी कविता का किसी तरह का कोई मतभेद नहीं था. जिस महिला सुमित्रा यादव ने कविता को बसस्टाप की ओर जाते देखा था, उस का कहना था कि घर से स्टाप तक का ज्यादातर रास्ता सुनसान रहता था, उस ने कविता को वैभवनगर कौर्नर पर पीपल के पेड़ के पास देखा था.
पीपल के पेड़ के आगे बस स्टाप तक भीड़भाड़ रहती थी इसलिए उस से आगे कविता के अपहरण की कोई संभावना नहीं थी. यह बात बताने वाली सुमित्रा यादव निशा की सास थी. पुलिस उसे वैभव नगर के कौर्नर वाले पीपल के पेड़ के पास तक भी ले गई. पुलिस ने नंदिनी नागर नाम की उस महिला से भी पूछताछ की जिस के ब्लाउज के और्डर कविता को शाम तक देने थे. उस ने बताया कि वह कविता से केवल ब्लाउज सिलवाती थी, इस से अलावा उन से उस का कोई संबंध या संपर्क नहीं था. रक्षाबंधन पास था. इसलिए उस ने कविता से शाम तक ब्लाउज देने को कहा था.
संजय रैना ने बताया था कि जिस दिन कविता गायब हुई थी उस दिन एक काली स्कार्पियो उन के घर के सामने से गुजरी थी, थोड़ी देर बाद वह तेजी से वापस लौट गई थी. साथ ही उस दिन एक बोलेरो को भी कालोनी में घूमते देखा गया था. हो सकता है, उन गाडि़यों में बैठे लोग स्थित का जायजा लेने आए हों. इस पर पुलिस ने उस इलाके के मकानों के आगे लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखीं और उस स्कार्पियो व बोलेरो को पहचानने की कोशिश की.
इस के अलावा उस शर्मा स्वीट्स के कैमरे की फुटेज भी दोबारा देखी गई जिस के सामने स्कूल का बस स्टाप था. उस फुटेज में कविता तो कहीं नजर आईं अलबत्ता वहां 2 बाइकों पर सवार 4 युवक और एक संदिग्ध वैन जरूर खड़ी दिखाई दी. पुलिस ने उन मोटर साइकिल सवारों, वैन और स्कार्पियो की खोजबीन शुरू की. पुलिस ने उन टावरों के अंतर्गत आने वाले 7000 मोबाइल नंबरों की काल डिटेल्स की भी गहनता से जांच की जो कविता के घर से यशस्वी के बस स्टाप के बीच पड़ते थे. घटना वाले दिन कविता के मोबाइल पर महज 2 फोन काल आई थीं. इन में एक उन के पति संजय की थी और दूसरी एक बुटीक से आई थी.
पूछताछ में संजय ने बताया कि उस दिन वह काम के सिलसिले में सुबह ही घर से निकल गए थे, इसलिए उन्होंने फोन कर के पत्नी से कहा था कि दोपहर का खाना घर आ कर ही खाएंगे. जिस शृंगार बुटिक से फोन आया था, वह मीना नाम की महिला का था, जो वैभवनगर बस स्टाप के निकट था. पूछताछ में उस ने बताया कि कविता ने एक सूट सिलने को दिया था, उसी के लिए उसे फोन किया गया था.
कविता के घर के सामने ही एक यादव का घर था, जो शादियों में शामियाने वगैरह लगाने का काम करता था, उस के पास उत्तर प्रदेश और बिहार के दर्जन भर से ज्यादा लड़के काम करते थे. पुलिस ने संदेह के आधार पर उन सभी लड़कों को हिरासत में ले कर पूछताछ की और उन के मोबाइल चेक किए. लेकिन वे सब निर्दोष थे.
इस के अलावा कविता से मिलने वालों, गैस सिलेंडर सप्लाई करने वाले, प्लंबर, इलेक्ट्रिशियन, कूड़ा उठाने वाले, दूध वाले, सब्जी वाले, फेरी वालों और इलाके के धोबी तक से पूछताछ की गई. संजय रैना का परिवार पहले भागीरथपुरा में किराए के मकान में रहता था. 4 साल पहले यह परिवार मित्रबंधु नगर में अपने मकान में शिफ्ट हो गया था. पुलिस ने भागीरथपुरा से मित्रबंधु नगर तक कविता के जानपहचान वालों को खोजखोज कर पूछताछ की.
जांच में यह बात भी सामने आई कि कविता पिछले एक साल में 177 लोगों से मिली थीं, जिन में परिचित व रिश्तेदार भी थे और ऐसे लोग भी, जिन से कविता का कोई काम पड़ा था. इन सभी 177 लोगों से पूछताछ के बाद भी पुलिस के हाथ कुछ नहीं लगा. पूछताछ में यह भी पता चला कि 28 जुलाई को कविता जब अपनी सास और बेटी के साथ एक्टिवा से पलासिया चौराहे के पास से गुजर रही थीं तो एक बुलेट मोटरसाइकिल वाले ने पीछे से आ कर उन की एक्टिवा को टक्कर मार दी थी. कविता ने उसे खूब खरीखोटी सुनाई. उस वक्त बात वहीं समाप्त हो गई.
लेकिन कविता जब पत्रकार कालोनी के चौराहे पर पहुंचीं तो उसी बाइक वाले ने फिर से उन की एक्टिवा में टक्कर मार दी. इस बार कविता, उन की सास कांता और बेटी यशस्वी गिर गई. बाइक सवार शराब पिए हुए था. कविता को गुस्सा आया तो उन्होंने उस की चप्पल से पिटाई कर दी. लोगों ने भी इस मामले में उन का ही साथ दिया. यह बात सामने आई तो पुलिस ने सोचा कि कहीं उस मोटरसाइकिल वाले ने ही रंजिशन उन का अपहरण कर के उन की हत्या न कर दी हो. इस के बाद पुलिस ने शहर के 117 बुलेट मोटरसाइकिल चलाने वालों की जांच की. लेकिन उन में कोई भी संदिग्ध नहीं निकला.
अभी कारों और बुलेट मोटरसाइकिलों की जांच चल ही रही थी कि 30 अगस्त को कविता की एक्टिवा एमपी09एस एएस5271 पुलिस को मिल गई. यह एक्टिवा पिछले 7 दिन से नौलखा बस स्टैंड की पार्किंग में खड़ी थी. पुलिस ने पार्किंग की देखभाल करने वाले से पूछताछ की तो उस ने बताया कि स्कूटी को 24 अगस्त को रात साढ़े 8 बजे राजू नाम का एक व्यक्ति खड़ा कर गया था. पर्ची लेते वक्त उस ने 30 रुपए दे कर तीसरे दिन आने को कहा था, लेकिन वह लौट कर नहीं आया.
पार्किंग के केयरटेकर ने बताया कि उस ने राजू से स्कूटी लौक न करने को कहा था ताकि जरूरत होने पर उसे दूसरी जगह खड़ा किया जा सके. लेकिन राजू नहीं माना और स्कूटी को लौक कर के चाबी अपने साथ ले गया. पार्किंग में बाहर की ओर सीसीटीवी कैमरा लगा था. उम्मीद थी कि उस की सीसीटीवी फुटेज में राजू का चेहरा दिखाई दे सकता है. लेकिन यहां भी पुलिस को मात खानी पड़ी. सीसीटीवी कैमरे के सामने एक लाइट लगी थी, जिस की वजह से राजू का फोटो नहीं आ पाया था. अलबत्ता पार्किंग के केयरटेकर से पूछ कर उस का स्केच जरूर बनवाया जा सकता था. पुलिस ने यही काम कर लेना बेहतर समझा.
इस काम में टेक्नीकल और साइंटिफिक टीमें भी लगी थीं. उन्होंने जब एक्टिवा की जांच की तो उस पर खून के धब्बे पाए गए. इस से अनुमान लगाया गया कि कविता की लाश के टुकड़े उसी की एक्टिवा पर रख कर नाले में फेंके गए होंगे. लेकिन पुलिस की समझ में यह बात नहीं आ रही थी कि हत्यारे को कविता की एक्टिवा को इस तरह सुरक्षित रखने की क्या जरूरत थी? क्योंकि वह चाहता तो काम हो जाने के बाद कविता के कपड़ों और जेवरों की तरह एक्टिवा को भी गायब कर सकता था या फिर उसे कहीं दूर दूसरी जगह खड़ा कर सकता था.
इस से अनुमान लगाया गया कि हत्यारे ने बसस्टैंड पर एक्टिवा यह सोच कर खड़ी की होगी कि पुलिस यह सोचे कि कविता बस में बैठ कर कहीं गई होंगी. लेकिन कविता की लाश मिलने से पुलिस की यह सोच न बन सकी. कविता की लाश के टुकड़े नग्नावस्था में मिले थे. जबकि घर से जाते समय वह पीले रंग की साड़ी ब्लाउज और कुछ गहने पहने हुए थीं.
इस से अनुमान लगाया गया कि हत्यारे ने उन के कपड़े जला दिए होंगे और गहने अपने पास रख लिए होंगे. एक्टिवा को सुरक्षित जगह खड़ा करना भी हत्यारे की मानसिकता को दर्शा रहा था. यानी वह कविता के गहनों और एक्टिवा का मोह पाले हुए था. इस से पुलिस को एक बार फिर कविता के करीबियों पर शक हुआ. इस के लिए गोपनीय और खुले दोनों ही रूप से कविता के कई करीबी लोगों की जांच की गई. लेकिन परिणाम कुछ नहीं निकला.
इस बीच पुलिस टीमें 6 पीएसटीएन (पब्लिक स्विच्ड टेलीफोन नेटवर्क) के माध्यम से डेढ़ लाख से ज्यादा मोबाइल फोनों का डाटा खंगाल चुकी थी. केवल इतना ही नहीं बल्कि हत्यास्थल की तलाश में इमली चौराहे से ले कर नेमावर रोड तक 6 किलोमीटर के दायरे में सारे मकान और गोदाम भी छान लिए गए थे.
अधिकारी गूगल पर एक एक मकान या गोदाम को टिक करते और पुलिस टीम उस जगह की जांच करती. इस तरह पुलिस ने 1500 मकान और 200 गोदाम छाने. लेकिन कहीं से कुछ नहीं मिला. लाश के टुकड़े जिन बोरियों में मिले थे, उन का प्रिंट तो धुंधला था लेकिन यह पता चल गया था कि उन में से एक बोरी चाय की पत्ती की थी और दूसरी कैमिकल की. इस बात को ध्यान में रख कर पालदा औद्योगिक क्षेत्र की फैक्ट्रियों और गोदामों की सर्चिंग की गई.
इन्वेस्टीगेशन के दौरान ही पुलिस की निगाह महेश बैरागी पर जम गई. महेश बैरागी उस मीनाबाई का पति था, जिसे कविता ने 18 जुलाई 2015 को अपना सूट सिलने के लिए दिया था. महेश बैरागी अपनी पत्नी मीनाबाई और 2 बच्चों तनिष्क और तेजस के साथ मूसाखेड़ी क्षेत्र के आलोकनगर में रहता था. साथ में उस की साली पूजा भी रहती थी. महेश के बारे में पता चला कि पहले मूसाखेड़ी चौराहे पर उस की मोबाइल रिचार्ज की दुकान थी. बाद में उस ने मोबाइल रिचार्ज की दुकान बंद कर दी थी.
मीनाबाई ने वैभवनगर मेन रोड पर शृंगार बुटिक के नाम से लेडीज कपडे़ सिलने की दुकान खोल रखी थी. कभीकभी वहां महेश भी बैठा करता था. बाद में 20 अगस्त से उस ने वहीं पास में साडि़यों की दुकान खोल ली थी. ताज्जुब की बात यह थी कि 28 अगस्त को उस ने वह दुकान बंद कर दी थी. घटना वाले दिन कविता के फोन पर शृंगार बुटिक से ही फोन किया गया था. हालांकि पुलिस ने मीनाबाई और महेश बैरागी से पहले भी पूछताछ की थी. इतना ही नहीं महेश बैरागी हर धरनेप्रदर्शन में भी शामिल हुआ था और एक 2 बार कविता के घर शोक जताने भी गया था. कई बार वह कविता के घर वालों के साथ थाने भी आया था.
पुलिस ने जब मीना से पूछा कि घटना वाले दिन वह 12 बजे से 2 बजे के बीच कहां थी, तो वह संतोषजनक जवाब नहीं दे पाई. कविता को उस ने कब फोन किया था, यह भी वह ठीक से नहीं बता पाई. इस से पुलिस को महेश बैरागी पर शक हुआ. वैसे भी उस का पिछला रिकौर्ड कुछ ठीक नहीं था. संदेह हुआ तो पुलिस ने महेश बैरागी को थाने बुला कर पूछताछ की. उस से लगातार 20-22 दिन तक पूछताछ की जाती रही. लेकिन वह पुलिस के सवालों के सही जवाब देता रहा. वैसे भी उसे किडनी की बीमारी थी, जिस से वह परेशान हो जाता था. इसलिए पुलिस उसे गिरफ्तार नहीं कर सकी.
पुलिस की टीमें कविता की हत्या के मामले में लगातार 107 दिन तक पूछताछ करती रही. पुलिस ने कोई भी ऐसा एंगल नहीं छोड़ा, जहां जरा सी भी संभावना रही हो. 177 लोगों से गहन पूछताछ की गई. करीब 100 सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखी गईं. 1500 मकान और 200 गोदाम छाने गए, लेकिन नतीजा कोई नहीं निकला.
कहते हैं, पाप सिर चढ़ कर बोलता है. अपराधी चाहे कितना भी शातिर क्यों न हो कोई न कोई गलती कर ही बैठता है. इस मामले में भी ऐसा ही हुआ. कविता के मर्डर के 107 दिन बाद पुलिस को एक लीड मिली. एक किराना व्यापारी ने पुलिस को बताया कि उस ने अपनी दुकान के बाहर सीसीटीवी कैमरा लगवा रखा है. महेश बैरागी उस के पास आया था और 24 अगस्त की फुटेज मांग रहा था. यह पता चलते ही 9 दिसंबर, 2015 को पुलिस ने महेश बैरागी को उस के मूसाखेड़ी क्षेत्र के आलोक नगर से उठा लिया. थाने ला कर उस से सख्ती से पूछताछ की गई तो उस ने मान लिया कि कविता का कत्ल उस ने ही किया था.
महेश बैरागी ने बताया कि कविता रैना के घर से 400 मीटर की दूरी पर उस की पत्नी मीना का बुटिक था. कविता पर उस की निगाहें कई महीने से जमी थीं. उसे उम्मीद तब बंधी जब 18 जुलाई को कविता ने उस की पत्नी मीनाबाई के बुटिक पर अपनी नेट की साड़ी से सूट सिलवाने को दिया था. इस के बाद कविता सूट के चक्कर में बुटिक पर आने लगी थी. वह तभी आती थीं जब बेटी को लेने बस स्टाप पर आती थीं. महेश बैरागी कोशिश करता था कि जब वह आएं तो बुटिक पर मौजूद रहे. मीना को वह किसी न किसी बहाने वहां से भेज देता था. इस तरह महेश कविता को एक महीने तक टालता रहा. उस ने उन्हें डिलीवरी के लिए 18 अगस्त की डेट दी थी.
महेश बैरागी कई महीने से कविता को देख रहा था और उन पर उस का दिल आ गया था. कविता से उस की जो बातें हुई थीं, उस से उसे पता चला कि वह सूट कम और साड़ी ज्यादा पहनती थीं. इसी बात को ध्यान में रख कर उस ने 20 अगस्त को पत्नी के बुटिक के पास ही साड़ी की दुकान खोल ली. उसे उम्मीद थी कि कविता साड़ी देखने के लिए उस की दुकान पर जरूर आएगी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ.
महेश बैरागी यह जानता था कि कविता दोपहर में अपनी बेटी को लेने बस स्टाप पर आती हैं. उसी समय वह मीनाबाई के बुटिक पर भी आती हैं. उस ने कविता को 18 अगस्त की सूट की डिलीवरी डेट थी. इसलिए बहाने से उस ने अपनी पत्नी मीनाबाई को घर भेज दिया और खुद बुटिक पर बैठ गया. उस दिन करीब एक बज कर 20 मिनट पर कविता आईं तो उस ने कह दिया, ‘‘आप का सूट अभी तैयार नहीं हुआ है, सिलने के लिए कारीगर के पास गया हुआ है. 2-4 दिन में सिल जाएगा तो हम आप को फोन कर देंगे.’’
इसी बहाने उस ने कविता का मोबाइल नंबर भी ले लिया. उस दिन कविता लौट कर बस स्टाप पर चली गईं. बाद में वह बेटी को ले कर घर चली गईं. 24 अगस्त को महेश बैरागी ने अपनी साड़ी की दुकान नहीं खोली. इस की जगह वह बुटिक पर बैठ गया. वहां 2 लोगों का कोई काम नहीं था, इसलिए मीनाबाई घर चली गई. उस के जाते ही महेश ने कविता के मोबाइल पर काल कर के कहा, ‘‘आप का सूट तैयार है, आ कर ले लीजिएगा.’’
सूट के चक्कर में ही कविता घर से 10 मिनट पहले निकलीं. उन्होंने सोचा था कि पहले सूट लेंगी और फिर बस स्टाप से बेटी को. इसलिए पहले वह मीनाबाई के बुटिक पर पहुंची. वहां महेश बैरागी बैठा था. कविता ने सूट के बारे में पूछा तो वह बोला, ‘‘आप का सूट तो तैयार है, लेकिन आप को मेरे साथ आईडीए कालोनी चलना पड़ेगा. सूट कारीगर के पास है.’’
सूट सिलने के लिए दिए हुए एक महीने से ज्यादा हो गया था. कैसा बना है, यह देखने की भी उत्सुकता थी. यशस्वी की बस के आने में थोड़ा समय था. इसलिए कविता ने चलने के लिए हां कर दी. कविता की स्वीकृति मिलते ही महेश ने अपनी मोटरसाइकिल उठा ली. कविता के पास स्कूटी थी ही. दरअसल, महेश ने पहले ही पूरी तैयारी कर रखी थी. आजादनगर की आईडीए कालोनी में उस के एक दोस्त टीकम देवड़ा का फ्लैट था. इस फ्लैट की एक चाबी महेश बैरागी के पास रहती थी.
आईडीए कालोनी के फ्लैट नंबर एफ-20 के पास पहुंच कर महेश बैरागी ने अपनी मोटर साइकिल खड़ी कर दी. कविता ने भी स्कूटी स्टैंड पर लगा दी. इस के बाद महेश कविता को फ्लैट नंबर एफ-20 में ले गया. फ्लैट में जरूरत का सारा सामान था. महेश ने कविता से कहा, ‘‘आप बैठिए, मैं कारीगर को बुलाता हूं.’’
कविता सोफे पर बैठ गईं तो महेश ने दरवाजे की कुंडी बंद कर दी और कविता के पास आ कर घुटनों के बल बैठते हुए बोला, ‘‘मैं आप को बहुत चाहने लगा हूं. आप की खूबसूरती ने मेरी रातों की नींद उड़ा दी है. प्लीज एक बार मेरी इच्छा पूरी कर दो. जिंदगी भर आप की सेवा करूंगा.’’
यह सुनते ही कविता आगबबूला हो गईं. इस के बावजूद महेश बैरागी ने उन के साथ हाथापाई और छेड़छाड़ करने की कोशिश की. लेकिन जब कविता ने काबू न दिया तो महेश बैरागी ने कमरे में पड़ा लोहे का पाइप उठा कर उन के सिर पर दे मारा. वार जोरदार था. कविता के सिर से खून निकलने लगा और वह वहीं ढेर हो गईं. अब स्थिति करो या मरो की हो गई थी. अपनी जान बचाने के लिए कविता को ठिकाने लगाना जरूरी था. इस के लिए महेश बैरागी ने पहले से तैयार चाकू से उन के सीने पर 2 वार किए. फलस्वरूप कविता की इहलीला खत्म हो गई.
कविता मर चुकी थीं. बैरागी जानता था कि कविता के घर न पहुंचने पर खोजबीन भी होगी और बात पुलिस तक भी पहुंचेगी. इसलिए उस ने वहां से अपनी मोटरसाइकिल हटाना जरूरी समझा. फ्लैट का ताला बंद कर के उस ने कविता की एक्टिवा ओट में खड़ी कर दी और अपनी बाइक ले कर दुकान पर चला गया.
महेश बैरागी ने कविता का कत्ल तो कर दिया, लेकिन उस की समझ में यह नहीं आ रहा था कि लाश को कैसे ठिकाने लगाए. शाम तक वह इसी मुद्दे पर सोचता रहा. सोचविचार कर उस ने एक इलेक्ट्रिक कटर का इंतजाम किया. 24 की रात को टीकमदेवड़ा के फ्लैट पर पहुंच कर सब से पहले उस ने कविता के सारे कपड़े उतार कर जलाए और उन की राख टायलेट पौट में डाल कर फ्लश कर दी. जेवर उस ने अपने पास रख लिए.
इस के बाद उस ने घर से साथ लाए इलेक्ट्रिक कटर से कविता की लाश के 6 टुकड़े किए और फ्लैट में पड़ी 2 बोरियों में भर दिए. तत्पश्चात वह दोनों बोरों को बारीबारी से कविता की स्कूटी पर रख कर इमली चौराहे के पास वाले नाले में फेंक आया. फ्लैट से खून वगैरह उस ने साफ कर दिया था. 24 अगस्त की रात साढ़े 8 बजे महेश बैरागी कविता की स्कूटी ले कर नौलखा बस स्टैंड पहुंचा और अपना नाम राजू बता कर 3 दिन के लिए स्कूटी पार्किंग में खड़ी कर दी. पार्किंग के केयरटेकर के कहने के बावजूद उस ने स्कूटी की चाबी अपने पास ही रखी. ऐसा उस ने इसलिए किया ताकि बाद में पता चलने पर पुलिस यही समझे कि कविता स्कूटी वहां खड़ी कर के किसी के साथ बस में बैठ कर कहीं चली गई होंगी.
2 दिन बाद यानी 26 अगस्त को जब कविता की लाश के टुकड़े मिल गए और लोगों ने बंगाली चौराहे पर धरनाप्रदर्शन किया तो वह उस में भी शामिल हुआ. इतना ही नहीं बल्कि वह कविता के घर और उन के घर वालों के साथ थाने भी गया. जब महेश बैरागी ने अपना जुर्म कबूल कर लिया तो पुलिस ने उसे 10 दिसंबर, 2015 को जिला न्यायालय के कोर्ट नंबर 14 में न्यायाधीश संजय श्रीवास्तव की अदालत पर पेश कर के 15 दिसंबर तक के पुलिस कस्टडी रिमांड पर लिया ताकि उस से विस्तृत पूछताछ की जा सके. इस के साथ ही इस साजिश में शामिल महेश बैरागी की पत्नी मीनाबाई और दोस्त टीकम देवड़ा को भी गिरफ्तार कर लिया. उन दोनों पर साक्ष्य छिपाने का आरोप था.
महेश बैरागी की निशानदेही पर उस के घर से कविता का वह सूट, जिस की वजह से उन की जान गई थी, भी बरामद हो गया. साथ ही वह लोहे का पाइप और चाकू भी बरामद कर लिया गया, जिस से कविता की हत्या की गई थी. लाश के टुकड़े करने वाला इलेक्ट्रिक कटर भी बरामद हो गया. पुलिस ने टीकम के फ्लैट से खून के नमूने भी उठाए. साथ ही महेश का खून ले कर डीएनए जांच के लिए भी भेजा. इस के अलावा उस से 3 सिम भी बरामद हुए.
टीकम देवड़ा के बारे में पता चला कि जिस फ्लैट में कविता की हत्या की गई थी, उस में वह पिछले 2 सालों से किराए पर रह रहा था. वह सुबह को चोईथराम सब्जीमंडी में और शाम को मूसाखेड़ी सब्जीमंडी में पौलीथिन सप्लाई करने का काम करता था. दोपहर में वह घर में ही रहता था. उस के घर कोई नहीं आताजाता था. इसी से अनुमान लगाया गया कि वह इस अपराध में बराबर का भागीदार रहा होगा. जबकि मीनाबाई को हत्या से जुड़ी सूचनाएं छुपाने का अपराधी माना गया.
महेश बैरागी के बारे में पता चला कि उस की पत्नी मीना उस की सगी मौसी की बेटी थी. उस से उस ने प्रेमविवाह किया था. यह जानकारी भी मिली कि वह अय्याश तबीयत का था और क्रिमनल माइंडेड भी. उस की दूसरी मौसी की बेटी रेखा, जो बेटमा की रहने वाली थी, 2009 में उस के घर से गायब हो गई थी. रेखा अपने पति हेमंत उर्फ बबलू के साथ महेश के घर रह रही थी. उन दोनों को महेश ने ही बुला कर अपने साथ रखा था. रेखा की गुमशुदगी संयोगितागंज थाने में दर्ज हुई थी. पुलिस को मिली जानकारी के अनुसार उस वक्त महेश ने पुलिस को मिठाई के डिब्बे पर लिखा एक पत्र सौंपा था. उस ने बताया था कि वह रेखा का लिखा पत्र है. इस पत्र में लिखा था कि वह अपनी मर्जी से वसीम के साथ जा रही है.
बाद में जब पुलिस ने वसीम से इस सिलसिले में बात की तो उस ने बताया कि रेखा से उस का कोई संबंध नहीं था. अलबत्ता रेखा के पति बबलू ने महेश पर संदेह जाहिर करते हुए कहा था कि रेखा ने उसे सुहागरात को ही बता दिया था कि महेश के साथ उस के पुराने संबंध हैं. जिस दिन रेखा गायब हुई थी उस दिन महेश बबलू को चायपत्ती बेचने के काम के सिलसिले में बागली (देवास) ले गया था. बहाना बना कर वह स्वयं घर लौट आया था. जबकि बबलू को उस ने रात को वहीं रुकने को कहा था. उस समय महेश बैरागी की पत्नी मीना ने भी अपने पति पर शक जाहिर किया था, लेकिन बाद में वह पलट गई थी और वसीम का नाम ले दिया था. अब पुलिस एक बार फिर रेखा के गायब होने वाली फाइल खोलने की सोच रही है. रेखा की मां माया को अब भी महेश बैरागी पर ही शक है.
महेश बैरागी पर शर्मा नाम के एक व्यक्ति का मकान हड़पने का भी आरोप है. यह आलोक नगर का वही मकान है, जिस में वह पत्नी और बच्चों के साथ रहता था. यह मकान उस ने किराए पर लिया था और बाद में फर्जी दस्तावेज बनवा कर मकान पर कब्जा कर लिया था. मकान मालिक को उस ने मारपीट कर भगा दिया था. अब पुलिस उस के खिलाफ मकान पर जबरन कब्जा करने का भी केस दर्ज करेगी. सन 2012 में संयोगितागंज थाने की पुलिस ने उस के आलोकनगर वाले घर से उसे अश्लील सीडी बनाते हुए भी पकड़ा था. बाद में 2013 में वह एक महिला से अश्लील बात करने के आरोप में भी पकड़ा गया था.
बहरहाल, जितना जटिल कविता मर्डर केस था, उतना ही जटिल महेश बैरागी का करेक्टर भी है. उस की पूरी हकीकत विस्तृत जांच के बाद ही सामने आएगी. Crime News






