Hindi stories: नरगिस जो सोच कर दिलशाद बेगम का कोठा छोड़ कर भागी थी, जब उसे वैसा ही माहौल भाई के घर में भी मिला तो उसे लगा, इस से अच्छा तो दिलशाद बेगम का कोठा ही था. अंतर सिर्फ इतना है कि यहां डांस को आर्ट कहा जाता है और वहां मुजरा.

सिसिगरेट का लंबा कश खींच कर गुलजार खां बोला, ‘‘दिलशाद बेगम, मैं तुम से फिर कह रहा हूं, शरीफों का खून बड़ा बेएतबार होता है. किसी दिन खट्टा खाओगी. मेरी मेहनत बेकार जाएगी.’’

‘‘गुलजार खां, उसे पढ़ने का शौक था, मैं ने पढ़ने बैठा दिया. बस, इतनी सी बात है. आंखें दिखाते ही सिर से पांव तक कांप जाती है.’’

‘‘मगर तुम यह क्यों भूल जाती हो कि पढ़नेलिखने से अच्छाईबुराई में तमीज करना आ जाता है. जिस दिन ऐसा हो गया, समझो, गई हाथ से.’’

‘‘समझ में नहीं आता, तुम्हारी इस बात पर हंसूं या कहकहे लगाऊं. जितने तमाशाई हमारे यहां आते हैं, माशाअल्लाह सब पढ़ेलिखे होते हैं. अच्छे खानदानों से भी होते होंगे, लेकिन सफेद कपड़े पहन कर कीचड़ में आ जाते हैं. नरगिस कीचड़ में कमल सी है.’’

‘‘तमाशा देखना अलग बात है, तमाशा बनना अलग. वे सब तमाशा देखने आते हैं, तमाशा बनने नहीं. नरगिस की बात और है.’’

‘‘पैदा किए की तो खैर मोहब्बत होती ही है, मगर पालने की मोहब्बत भी कम नहीं होती. 4 साल की उम्र से पाला है उसे.’’

‘‘बेचारी तुम्हीं को अपनी मां समझती है,’’ गुलजार खां ने दांत निकालते हुए कहा. फिर एकदम संजीदा हो गया, ‘‘अच्छा, यह बताओ, तुम से उस ने कभी अपने बाप का नाम पूछा है?’’

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