Best Crime Story: देवेंद्र को जहां सहानुभूति और आत्मीयता की जरूरत थी, वहीं ममता को धैर्य और विश्वास  की. आखिर  ऐसा क्या हुआ  था कि न उसे सिंपथी मिली   और न वह धैय से काम ले  सकी. कुछ दिनों पहले कानपुर के एक नामीगिरामी इंजीनियरिंग संस्थान के गर्ल्स हौस्टल में कुछ ज्यादा ही चहलपहल थी, क्योंकि अगले दिन रविवार होने की वजह से संस्थान में छुट्टी थी. अधिकतर लड़कियां हौस्टल के बरामदे में बैठी गपशप कर रही थीं तो कुछ अगले दिन पिकनिक मनाने का प्रोग्राम बना रही थीं. अचानक किसी लड़की के चीखने की आवाज ने सभी को चौंका दिया.

लड़कियां यह जानने की कोािशश करने लगीं कि चीख की आवाज आई कहां से. काजोल, ज्योति और निशा अपनेअपने कमरे से निकल कर बाहर आईं. काजोल ने कहा, ‘‘शायद आवाज कमरा नंबर 212 से आई है.’’

वह कमरा एमटेक की छात्रा ममता शुक्ला का था. ज्योति और निशा ने ममता को आवाज दे कर दरवाजा खटखटाया. लेकिन कमरे के अंदर से कोई जवाब नहीं आया. दरवाजा अंदर से बंद था. तब तक कई अन्य लड़कियां वहां आ गई थीं. उन में से एक लड़की ने कहा, ‘‘रोशनदान से झांक कर देखो कि ममता दरवाजा क्यों नहीं खोल रही है.’’

कुछ लड़कियां एक मेज उठा लाईं. मेज पर कुरसी रख कर 2 लड़कियों ने उसे मजबूती से पकड़ लिया. दीप्ति ने कुरसी पर खड़े हो कर दरवाजे के ऊपर लगे रोशनदान से अंदर झांका. लेकिन कमरे के अंदर कुछ दिखाई नहीं पड़ा. तब दीप्ति ने रोशनदान का शीशा तोड़ दिया और अंदर हाथ डाल कर दरवाजे की सिटकनी खोल दी. दरवाजा खुलते ही काजोल और ज्योति कमरे के अंदर गईं. अंदर का दृश्य देख कर वे स्तब्ध रह गईं. तब तक दीप्ति और अन्य कई लड़कियां भी अंदर पहुंच गईं. अंदर का हाल देख कर सभी डर गईं. दीप्ति ने सभी लड़कियों को कमरे से बाहर निकाल कर दरवाजा बाहर से बंद कर दिया. उस ने निशा और ज्योति को दरवाजे के बाहर रुकने को कहा और खुद काजोल के साथ वार्डन को सूचना देने चल पड़ी.

सूचना मिलते ही वार्डन डा. आर.पी. अस्थाना, मुख्य सुरक्षा अधिकारी डी.पी. गोयल, सहायक मुख्य सुरक्षा अधिकारी आर.एन. श्रीवास्तव के साथ कमरे पर आ पहुंचे. वार्डन श्री अस्थाना ने सुरक्षा अधिकारियों के साथ कमरे में प्रवेश किया. कमरे की दक्षिणी दीवार के पास फर्श पर ममता पड़ी थी. उस से थोड़ी दूरी पर एक युवक पड़ा था. फर्श पर ढेर सी उल्टी पड़ी थी. वार्डन श्री अस्थाना ने फौरन सुरक्षा अधिकारी को भेज कर संस्थान के हेल्थ सेंटर से डा. एस.के. तिवारी को बुलवाया. डा. तिवारी ने ममता का परीक्षण कर के उसे मृत घोषित कर दिया. युवक बेहोश था. उसे होश में लाने का प्रयास किया गया तो थोड़ी देर में वह होश में आ गया.

युवक ने अपना नाम देवेंद्र सिंह बताया. उस ने यह भी बताया कि वह ममता से प्रेम करता था. प्रेम में निराश हो कर उस ने ममता को जहर दे दिया था और खुद भी जहर खा लिया था. वार्डन श्री अस्थाना ने आर.एन. श्रीवास्तव के साथ देवेंद्र को अस्पताल भिजवा दिया. फिर एक सिक्योरिटी गार्ड को लिखित सूचना दे कर कोतवाली भेज दिया. सिक्योरिटी गार्ड कोतवाली पहुंचा तो उस समय कोतवाली प्रभारी इंसपेक्टर इंद्रनाथ अपने कक्ष में बैठे थे. गार्ड ने वार्डन द्वारा दी गई लिखित सूचना उन्हें दे दी. सूचना पढ़ कर इंसपेक्टर ने रिपोर्ट लिखने का आदेश दिया. उन्होंने अपने उच्चाधिकारियों को भी घटना की सूचना दे दी और खुद पुलिस दल के साथ घटनास्थल की ओर रवाना हो गए.

घटनास्थल पर पहुंच कर इंसपेक्टर इंद्रनाथ ने ममता के शव का निरीक्षण किया. ममता के कपड़े अस्तव्यस्त थे. उस के चेहरे पर सफेद पाउडर जमा हुआ था. शरीर पर कोई घाव का निशान नहीं था. आसपास का सामान बिखरा पड़ा था. देखने से ही लगता था कि ममता ने जान बचाने के लिए काफी संघर्ष किया था. इसी बीच तमाम पुलिस अधिकारी भी घटनास्थल पर पहुंच गए. इन अधिकारियों ने भी घटनास्थल का निरीक्षण किया. ममता के कमरे की तलाशी लेने पर पुलिस को आर्सेनिक पाउडर 500 ग्राम, आर्सेनिक पाउडर की रसीद, मिठाई, दवा के कुछ कैप्सूल, एक टेप रिकौर्डर, कैसेट, 2 मोबाइल फोन, 3 पोस्टर, जिन पर देवेंद्र ने अपनी प्रेमकथा लिखी थी. एक सीरिंज और देवेंद्र सिंह के नाम की एक चैकबुक मिली. इन सब चीजों को पुलिस ने अपने कब्जे में ले लिया. कमरे में पड़ी उल्टी को भी पुलिस ने सील कर के कब्जे में ले लिया. आवश्यक काररवाई के बाद पुलिस ने ममता के शव को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया.

इंसपेक्टर इंद्रनाथ ने इस मामले की जांच इंसपेक्टर जयकरन को सौंप दी. अभियुक्त देवेंद्र सिंह पुलिस के कब्जे में था. जयकरन ने सब से पहले उसी से पूछताछ की. देवेंद्र का कहना था कि वह ममता से प्रेम करता था. उस ने ममता को मारा नहीं था. जबकि घटनास्थल पर प्राप्त साक्ष्य कुछ और ही कह रहे थे. जांच के दौरान पूरी कहानी कुछ इस तरह प्रकाश में आई. देवेंद्र सिंह के पिता आर.के. सिंह लखनऊ स्थित सचिवालय में मुख्य प्रशासनिक अधिकारी थे. देवेंद्र के अलावा उन की 2 बेटियां थीं. देवेंद्र अकेला बेटा था, इसलिए वह मातापिता का बड़ा दुलारा था. वह देवेंद्र को किसी बात की कमी नहीं होने देते थे. इस प्यारदुलार ने देवेंद्र को जिद्दी बना दिया था. वह जिस चीज के लिए अड़ जाता, उसे ले कर ही मानता था. घर में किसी बात की कमी तो थी नहीं, इसलिए उस की हर ख्वाहिश पूरी हो जाती थी.

देवेंद्र में कई गुण भी थे. वह बहुत महत्त्वाकांक्षी तथा धुन का पक्का था. पिता उसे इंजीनियर बनाना चाहते थे. विज्ञान से पढ़ाई पूरी करने के बाद देवेंद्र इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षा की तैयारी में जुट गया. वह मेहनती तो था ही. इलाहाबाद के मोतीलाल नेहरू इंजीनियरिंग कालेज में बीटेक के लिए उसे चुन लिया गया. वह लखनऊ से इलाहाबाद चला गया और वहां हौस्टल में रह कर पढ़ाई करने लगा. नया सत्र शुरू हुआ था, इसलिए कालेज में इंट्रोडक्शन चल रहा था. पुराने छात्र नए लड़केलड़कियों की खिंचाई कर रहे थे. ऐसे में देवेंद्र की मुलाकात एक लड़की से हुई, जिस ने उसी साल बीटेक में प्रवेश लिया था. लड़की का नाम था ममता शुक्ला. ममता आकर्षक व्यक्तित्व की स्वामिनी थी. पहली मुलाकात में ही देवेंद्र ममता से बहुत प्रभावित हुआ.

ममता के पिता महिपाल शुक्ला लखनऊ में रेलवे विभाग में अभियंता थे. श्री शुक्ल की 3 बेटियां थीं. उन में ममता दूसरे नंबर पर थी. चूंकि देवेंद्र भी लखनऊ का रहने वाला था, इसलिए ममता और देवेंद्र में मित्रता हो गई. देवेंद्र जब लखनऊ जाता, ममता उसे अपने भी काम सौंप देती. इस तरह वह ममता के घर भी आनेजाने लगा. कुछ ही दिनों में वे अच्छे दोस्त बन गए. उसी बीच ममता बीमार पड़ गई. इलाहाबाद में देवेंद्र के सिवा उस का कोई अन्य आत्मीय नहीं था. उस समय देवेंद्र ने बड़ी लगन से ममता की देखभाल की. कुछ ही दिनों में ममता स्वस्थ हो गई. देवेंद्र की सेवा ने ममता का दिल जीत लिया. वह देवेंद्र से प्रेम करने लगी. देवेंद्र तो मन ही मन ममता को पहले से ही चाहता था.

दोनों प्यार की राह पर चल पड़े. उन की मुलाकातें ही नहीं होने लगीं, बल्कि दोनों की फोन पर लंबीलंबी बातें भी होने लगीं. जल्दी ही उन का प्रेम चर्चा का विषय बन गया. न जाने कैसे  इस बात की खबर ममता के घर वालों तक पहुंच गई. महिपाल शुक्ला को यह बात नागवार गुजरी. ममता किसी अन्य जाति के लड़के से संबंध जोड़े, यह उन्हें पसंद नहीं था. लेकिन जवान बेटी से खुल कर कुछ कह भी नहीं सकते थे. हां, अप्रत्यक्ष रूप से उन्होंने ममता को कई बार अवश्य टोका. लेकिन ममता ने उस पर ध्यान नहीं दिया. ममता जब भी लखनऊ आती, देवेंद्र के घर अवश्य जाती. देवेंद्र के परिवार वाले ममता को बहुत मानते थे, खासतौर पर उस की मां. वह ममता को अपनी बहू बनाने के लिए बहुत लालायित थीं.

देवेंद्र ने बीटेक पूरा कर लिया तो लखनऊ आ गया. उसे ममता से दूर होने का बहुत दुख हुआ. लेकिन मजबूरी थी. लखनऊ और इलाहाबाद के बीच ज्यादा फासला नहीं था. इसलिए वह बीचबीच में इलाहाबाद का चक्कर लगा लेता था. ममता भी छुट्टी मिलते ही लखनऊ अपने घर पहुंच जाती थी. कुछ समय बाद देवेंद्र को भारत इलैक्ट्रौनिक्स लिमिटेड, गाजियाबाद में नौकरी मिल गई. अब देवेंद्र   का ममता से मिलना और कम हो गया. सिर्फ फोन से वह ममता से दिल की बातें कर लेता था. इसी दौरान एक ऐसी घटना घट गई, जिस ने ममता और संजय को बेचैन कर दिया.

उन दिनों ममता की छुट्टियां चल रही थीं. वह लखनऊ में थी. देवेंद्र व्यस्तता के कारण काफी दिनों तक ममता से मिलने नहीं आ सका था. इसलिए एक दिन ममता खुद उस के घर जा पहुंची. ममता को देख कर देवेंद्र की मां बहुत खुश हुईं. उन्होंने ममता को अपने पास बिठा कर कहा, ‘‘बेटी, मुझे तुम से कुछ जरूरी बात करनी है.’’

‘‘कहिए आंटीजी, क्या बात है?’’ ममता ने उत्सुकता से पूछा.

‘‘बेटी, जब तक बच्चा छोटा होता है, मां उसे अपने आंचल तले हर बुराई से दूर रखती है. लेकिन उस के बड़े होने पर मांबाप का नियंत्रण कम हो जाता है. फिर वह अपनी जिंदगी में दखल पसंद नहीं करता.’’

‘‘आंटीजी, मैं समझी नहीं. आप कहना क्या चाहती हैं?’’

‘‘ममता, देवेंद्र में एक बहुत बड़ा अवगुण है, जो शायद तुम्हें नहीं मालूम. वह नशीली दवाएं खाने लगा है. मैं तो उसे समझासमझा कर थक गई. वह मेरी एक नहीं सुनता. लेकिन बेटी, मुझे विश्वास है कि अगर तुम समझाओगी तो वह जरूर मान जाएगा.’’

यह सुन कर ममता सन्न रह गई. देवेंद्र ऐसा होगा, उस ने सपने में भी नहीं सोचा था. उस के निश्छल एवं भावुक हृदय को गहरी ठेस लगी. आंखों में आंसू भर आए. वह उसी वक्त अपने घर लौट आई. दिन भर अपने कमरे में पड़ी रोती रही. शाम को जब महिपाल शुक्ला घर लौटे तो बेटी का उतरा चेहरा देख कर उन्होंने पूछा, ‘‘ममता, बहुत सुस्त हो, तबीयत तो ठीक है न?’’

ममता ने पिता की बात पर कोई जवाब नहीं दिया. बस गुमसुम बैठी रही. श्री शुक्ला दिन भर के थके थे, इसलिए उन्होंने ज्यादा पूछताछ नहीं की. वह अपने कमरे में चले गए. 2 दिनों बाद रविवार को नौकर ने आ कर कहा, ‘‘बिटिया, देवेंद्र बाबू आए हैं.’’

देवेंद्र का नाम सुनते ही ममता उत्तेजित हो गई. भावावेश में वह नौकर को डांटते हुए बोली, ‘‘उन से कह दो, यहां से चले जाएं. मैं उन का मुंह नहीं देखना चाहती.’’ नौकर सिर झुका कर चला गया.

फिर देवेंद्र खुद वहां आ गया. उसे देखते ही ममता उठ कर कमरे से बाहर जाने लगी तो उस ने उस का हाथ पकड़ कर बिठाते हुए कहा, ‘‘क्या बात है, सरकार के तेवर बदलेबदले से हैं?’’

‘‘छोड़ो देवेंद्र, मुझे तुम्हारा मजाक हर समय अच्छा नहीं लगता.’’ ममता उस का हाथ झटक कर बोली.

‘‘लो छोड़ दिया, पर इतना तो बता दो, बंदे से खता क्या हुई है?’’

‘‘गलती तुम से नहीं, मुझ से हुई है, वरना तुम्हारे फरेब को पहले ही समझ लेती.’’

‘‘ममता, तुम्हें गलतफहमी हो गई है.’’

‘‘नहीं देवेंद्र, अब मेरी आंखें खुल गई हैं.’’

‘‘लेकिन मैं ने किया क्या है, पहले यह तो बताओ.’’

‘‘देवेंद्र, तुम ड्रग्स लेते हो. यह बात तुम ने मुझे कभी नहीं बताई.’’ ममता कांपते स्वर में बोली. यह सुन कर देवेंद्र को झटका लगा. अगले क्षण खुद को संभालते हुए बोला, ‘‘यह तुम से किस ने कहा?’’

‘‘तुम्हारी मम्मी ने मुझे बताया है. देवेंद्र, आज से हमारा रिश्ता खत्म. मैं तुम से शादी नहीं कर सकती.’’

‘‘ऐसा न कहो ममता, मैं तुम्हारे बिना जी नहीं सकता.’’ देवेंद्र भावुक हो गया. वह बहुत देर तक ममता को समझाता रहा कि वह सारी बुरी आदतें छोड़ देगा. लेकिन ममता पर उस का कोई असर नहीं हुआ. अंत में देवेंद्र उठ कर चला गया. उस के जाने के बाद ममता ने यह बात घर में सब को बता दी. महिपाल शुक्ला मन ही मन आश्वस्त हुए कि चलो यह कांटा अपने आप ही निकल गया. घर में छुट्टियां बिता कर ममता इलाहाबाद आ गई. इस बीच देवेंद्र ने कई बार ममता से मिलने की कोशिश की. लेकिन ममता उस के सामने नहीं आई. उस के इस तरह रूठ जाने से देवेंद्र बहुत परेशान था. वह ममता को लगातार फोन भी करता रहा, पर उस का नंबर देखते ही ममता फोन काट देती. बाद में उस ने अपना नंबर ही बदल लिया. वह ममता से मिलने कई बार इलाहाबाद भी गया, लेकिन वहां भी ममता ने उस से सीधे मुंह बात नहीं की.

प्यार के बदले उपेक्षा मिलने के बावजूद देवेंद्र ममता को भूल नहीं सका. वह उस के पीछे लगा रहा. उसे समझाता रहा. उसे विश्वास था कि एक न एक दिन ममता का गुस्सा शांत हो जाएगा. फिर वह उसे पहले की तरह चाहने लगेगी. लेकिन उस का सोचना गलत निकला. ममता उस से दूर होती गई. वह पागलों की तरह उस के इर्दगिर्द मंडराता रहा. अब वह नशा भी कुछ ज्यादा ही करने लगा था. कहा जाता है कि उस ने एक बार आत्महत्या करने की भी कोशिश की थी. कुछ दिनों बाद देवेंद्र पर एक और कहर टूटा. उसे कहीं से पता चला कि ममता किसी हरिहर तिवारी नामक लड़के से प्रेम करने लगी थी. ममता ऐसा करेगी, उसे यकीन नहीं हुआ. वह ममता से मिलने इलाहाबाद जा पहुंचा. उसे देखते ही ममता बोली, ‘‘देवेंद्र, मैं ने कितनी बार कहा कि तुम मुझ से मिलने मत आया करो.’’

‘‘ममता, मैं तुम से कुछ पूछने आया हूं.’’ देवेंद्र ने गंभीर स्वर में कहा.

‘‘अब क्या पूछना बाकी है?’’

‘‘ममता, क्या यह सच है कि तुम किसी और को चाहने लगी हो?’’

‘‘क्यों, आप को कोई ऐतराज है क्या?’’

‘‘ममता, तुम ऐसा नहीं कर सकतीं. तुम मेरी हो, मेरी ही रहोगी.’’

ममता चिल्ला कर बोली, ‘‘देवेंद्र, होश की दवा करो. मैं तुम्हारी बांदी नहीं हूं, जो तुम्हारे हुक्म की तामील करूं. फिर तुम मुझे राकेने वाले होते कौन हो? क्या अधिकार है मुझ पर तुम्हारा? सुनना ही चाहते हो तो सुन लो, मैं हरि से प्रेम करती हूं और उसी से शादी भी करूंगी.’’

देवेंद्र का खून खौल उठा. वह गुस्से से आगे बढ़ा, फिर कुछ सोच कर पीछे हट गया. तभी ममता की कुछ सहेलियां वहां आ गईं. देवेंद्र उठ कर चला गया.  इस के बाद से देवेंद्र के विचार बदलने लगे. उसे लगा कि अब वह ममता को कभी नहीं पा सकेगा. धीरेधीरे ममता के प्रति देवेंद्र का प्यार नफरत में बदलने लगा. उसे जब भी ममता के अंतिम शब्द याद आते, वह पागल हो उठता. उस के मन में प्रतिशोध की लहरें उठने लगतीं. उस ने कई बार ममता को धमकी दी कि वह उस से विवाह कर ले, वरना अंजाम अच्छा नहीं होगा. लेकिन ममता ने उस की धमकियों की परवाह नहीं की. अंत में उस ने ममता से बदला लेने के लिए एक खतरनाक योजना बना डाली.

ममता का बीटेक पूरा हो गया था. उस के पिता चाहते थे कि ममता एमटेक करे. इसलिए ममता ने कानपुर के उस संस्थान में प्रवेश ले लिया और वहीं हौस्टल में रहने लगी. चूंकि देवेंद्र हर वक्त ममता की टोह में रहा करता था, इसलिए उसे सारी जानकारी थी. दिसंबर महीने में देवेंद्र ने अपनी योजना के अनुसार, लखनऊ के अमीनाबाद से 5 सौ ग्राम आर्सेनिक पाउडर खरीदा. फिर उसी शाम वह अपनी मारुति आल्टो कार से ममता से मिलने के लिए रवाना हो गया. रास्ते में उस ने मिठाई भी खरीद ली थी. 15 दिसंबर की दोपहर 3 बजे देवेंद्र कानपुर पहुंच गया और अपने एक दोस्त के घर ठहरा. आराम करने के बाद देवेंद्र गर्ल्स हौस्टल पहुंचा. ममता का कमरा ढूंढ़ने में उसे खास दिक्कत नहीं हुई.

लेकिन कमरे में ताला लगा देख कर वह सोच में पड़ गया, आखिर ममता कहां चली गई? उस ने हौस्टल में पूछा तो पता चला कि वह अपनी सहेली के घर गई है. पर वह किस सहेली के घर, कहां गई है, यह कोई नहीं बता सका. वहां से निराश हो कर देवेंद्र ममता के परिचितों के यहां चक्कर काटने लगा. काफी भागदौड़ के बाद उसे ममता के बारे में पता चल गया. ममता अपनी सहेली सुष्मिता के यहां गई थी. सुष्मिता ममता के साथ पढ़ती थी. इसलिए देवेंद्र भी उस से परिचित था. वह उसी दिन सुष्मिता के घर जा पहुंचा. वहां उस की मुलाकात सुष्मिता के पिता डा. डी.एन. मेहरा से हुई. उस ने डा. मेहरा को बताया कि वह ममता का दोस्त है और उस से मिलना चाहता है तो उन्होंने ममता को बुलवा दिया. अचानक उसे देख कर ममता हैरान रह गई. उस ने तीखे स्वर में पूछा, ‘‘यहां क्यों आए हो?’’

उस ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘ममता, मैं तुम्हें लेने आया हूं. मैं ने घूमने का प्रोग्राम बनाया है. बस तुम जल्दी तैयार हो जाओ.’’

‘‘मुझे तुम्हारे साथ कहीं नहीं जाना. तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम इसी वक्त यहां से चले जाओ.’’

‘‘नहीं, तुम को चलना ही पड़ेगा. आज मैं तुम्हें साथ लिए बगैर नहीं जाऊंगा.’’ कह कर देवेंद्र ने ममता का हाथ पकड़ लिया. ममता चिल्ला पड़ी. शोर सुन कर डा. मेहरा आ गए. उन्हें देवेंद्र की बदतमीजी पर बड़ा क्रोध आया. उन्होंने आगे बढ़ कर ममता को छुड़ाया और उसे डांट कर घर से बाहर निकाल दिया.

अगले दिन ममता अपने हौस्टल आ गई. वह पिछले दिन की घटना से काफी परेशान थी. कुछ देर बाद उस की सहेलियां उसे बुलाने आईं. लेकिन ममता ने तबीयत खराब होने का बहाना बना कर क्लास में जाने से इनकार कर दिया. लड़कियों के जाने के बाद वह कमरा बंद कर के बिस्तर पर लेट गई. सोचतेसोचते ही उस की आंख लग गई. करीब साढ़े 11 बजे किसी ने दरवाजा खटखटाया. ममता ने उठ कर दरवाजा खोला तो चौंक पड़ी. सामने देवेंद्र खड़ा था. ममता की भृकुटि तन गई. उस ने गुस्से से पूछा, ‘‘अब यहां क्या लेने आए हो?’’

देवेंद्र ने धीमे से कहा, ‘‘ममता, मैं तुम से कुछ बात करना चाहता हूं.’’

‘‘देवेंद्र प्लीज, तुम यहां से चले जाओ. मैं कुछ सुनना नहीं चाहती हूं.’’

‘‘नहीं ममता, आज तो तुम्हें सुनना ही पड़ेगा.’’ कहते हुए देवेंद्र कमरे के अंदर आ गया. उस की इस जबरदस्ती पर ममता को बड़ा क्रोध आया. लेकिन कुछ बोली नहीं. अपना सामान रखने के बाद देवेंद्र ने भीतर से दरवाजा बंद कर दिया. फिर कुरसी पर बैठ कर बोला, ‘‘तुम ने सुष्मिता के घर मेरे साथ बड़ा बुरा सुलूक किया.’’

ममता ने उस की बात का जवाब देने के बजाय पूछा, ‘‘देवेंद्र, तुम इस तरह मुझे क्यों तंग कर रहे हो? आखिर तुम चाहते क्या हो?’’

‘‘यह तुम अच्छी तरह जानती हो.’’ देवेंद्र ने कहा.

‘‘लेकिन अब वह संभव नहीं है.’’

‘‘मैं नहीं मानता ममता, तुम्हें मैं अपना कर ही रहूंगा. कुछ पा कर खो देना मेरी फितरत में नहीं है.’’

‘‘यह तुम्हारी भूल है देवेंद्र, ऐसा कभी नहीं होगा.’’

‘‘एक बार फिर सोच लो ममता.’’

‘‘मैं ने खूब सोच लिया है. तुम से शादी कर के मैं अपना जीवन नष्ट नहीं कर सकती,’’ ममता उठते हुए बोली, ‘‘अपनी बात कह चुके हो तो जा सकते हो.’’

‘‘अरे तुम तो नाराज हो गई. बैठो तो सही. देखो, मैं तुम्हारे लिए मिठाई लाया हूं.’’ देवेंद्र ने हंसते हुए कहा.

‘‘मुझे नहीं खानी तुम्हारी मिठाई.’’ ममता ने रूखे स्वर में कहा.

लेकिन देवेंद्र नहीं माना. वह खुद ही उठ कर पानी भी ले आया. फिर उस के बहुत जोर देने पर ममता ने मिठाई खा ली. दोनों काफी देर तक बैठे बातें करते रहे. बातों का सिलसिला अंत में फिर शादी पर आ कर अटक गया. देवेंद्र ने ममता को बहुत समझाया, पर वह अपने पर अड़ी रही. तब देवेंद्र उग्र हो उठा. वह बोला, ‘‘ममता, तुम मेरी हो, मेरी ही रहोगी. हमें कोई अलग नहीं कर सकता.’’

इस के बाद उस ने बलपूर्वक ममता के मुंह में आर्सेनिक का घोल उड़ेल दिया. ममता ने बचाव के लिए बहुत हाथपांव मारे, चीखीचिल्लाई. पर देवेंद्र की पकड़ से छूट न सकी. इस हाथापाई में थोड़ा सा घोल ममता के चेहरे पर भी छलक गया. धीरेधीरे ममता पर जहर का असर होने लगा. उस की पलकें बंद होने लगीं. ममता के अचेत होने तक संजय भी होश खो बैठा. वह पागलों की तरह दीवार पर लगे पोस्टरों पर अपनी प्रेमकथा लिखने लगा. कुछ समय बाद उस की भी हालत ममता जैसी होने लगी. वह भी जमीन पर गिर पड़ा. तभी हौस्टल की लड़कियां आ कर दरवाजा पीटने लगी थीं.

कथा लिखे जाने तक देवेंद्र जेल में था. उस की जमानत नहीं हो सकी थी. वह प्यार का अधिकार पाने के लिए बेचैन था. लेकिन यह नहीं समझ पाया कि प्यार कोई वस्तु नहीं, जिसे जबरदस्ती हासिल किया जा सके. Best Crime Story

(कथा सत्य घटना पर आधारित है. कुछ पात्रों एवं स्थान के नाम बदल दिए गए हैं.)

 

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