Motivational Story: मानवी की हिम्मत की दाद देनी होगी कि तमाम सामाजिक बाधाएं पार करते हुए वह कालेज की प्रिंसिपल बनने के साथसाथ अभिनेत्री और लेखिका भी है…
पुरुष से महिला बनी देश की पहली ट्रांसजेंडर मानवी बंद्योपाध्याय ने 10 जून, 2015 को जब नदिया जिले के कृष्णानगर महिला कालेज की प्रिंसिपल का कार्यभार संभाला तो एक बार वह फिर चर्चा में आ गईं. चर्चा में आएं भी क्यों नहीं, किसी ट्रांसजेंडर की इस महत्त्वपूर्ण पद पर नियुक्ति का यह देश का ही नहीं, संभवत: दुनिया का पहला मामला है. मानवी को यह सम्मानजनक पद इतनी आसानी से नहीं मिला, बल्कि बचपन से ले कर अब तक उन्हें तमाम तरह की परेशानियों से जूझना पड़ा. समाज के लोगों ने उन्हें तरहतरह से प्रताडि़त किया. उन का जीना तक दूभर कर दिया, लेकिन मानवी ने हर समस्या का डट कर मुकाबला किया. आइए जानें, दुनिया भर में चर्चा का विषय बनीं मानवी बंद्योपाध्याय आखिर हैं कौन?
मानवी का जन्म एक लड़के के रूप में पश्चिम बंगाल के 24 परगना जिले के नेहारी कस्बा में एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था. 2 बेटियों के बाद बेटे के जन्म पर मातापिता फूले नहीं समा रहे थे. उन्होंने उस का नाम सोमनाथ बंद्योपाध्याय रखा. बेटा 5 साल का हुआ तो पिता ने उसे स्कूल भेजना शुरू किया. मोहल्ले के अन्य लड़कों की तरह सोमनाथ भी मछली पकड़ने जाता, पेड़ पर चढ़ता और फुटबाल खेलता. इन सब के अलावा वह पढ़ाई में भी होशियार था.
उस की एक आदत थोड़ा हट कर थी. वह लड़कों के कपड़े पहनने के बजाय लड़कियों के कपड़े पहनना पसंद करता था. उसे जब भी मौका मिलता, वह अपनी बहनों की फ्रौक पहन लेता या मां की साड़ी लपेट लेता. उस की इस हरकत पर घर वाले हंसते. वह अपने लिए भी फ्रौक लाने की जिद करता. इस पर मांबाप उसे समझाते कि वह लड़का है, इसलिए लड़कों के कपड़े पहने. उन्होंने बेटे की इस आदत को गंभीरता से नहीं लिया.
सोमनाथ कुछ और बड़ा हुआ तो उस ने डांस सीखने की इच्छा जाहिर की. घर वालों ने समझाया कि डांस तो लड़कियों का शौक है, तुम्हें सीखना है तो कुछ और सीखो. पर वह नहीं माना. वह जिद पर अड़ गया कि डांस ही सीखेगा. वह डांस भी लड़कों की तरह नहीं, बल्कि लड़कियों की तरह करता था. उस के डांस पर लोग हंसते थे. घर वाले उसे लड़कियों की तरह डांस करने के लिए मना करते. वह नहीं मानता तो उसे डांटा जाता. लेकिन मांबाप की डांट का उस पर कोई असर नहीं पड़ता था.
सोमनाथ को न जाने क्यों लगता था कि वह लड़का नहीं, लड़की है. लेकिन उस के मन की बात को कोई भी समझने को तैयार नहीं था. सोमनाथ ज्योंज्यों बड़ा होता गया, त्योंत्यों उसे लड़कियों का साथ प्यारा लगने लगा. गलीमोहल्ले, स्कूल सभी जगह उस की दोस्ती लड़कियों से ही होती थी. उस की इस आदत से उस के घर वाले परेशान रहते थे. वे उसे मनोचिकित्सक के पास भी ले गए, पर वहां इस का कोई हल नहीं निकला. लेकिन तमाम दुविधा के बीच उस की पढ़ाई जारी रही.
सोमनाथ के हावभाव, चलने का ढंग, बातचीत का तरीका, सबकुछ लड़कियों की तरह था. अकसर कमरा बंद कर के वह डे्रसिंग टेबल के आदमकद आईने के सामने अपनी मां के कपड़े पहन कर खुद को निहारता. मां के कपड़े पहन कर उस के दिल को बड़ी शांति मिलती. वह बहुत खुश होता. जाधवपुर विश्वविद्यालय से प्रथम श्रेणी में एमए करने के बाद एमफिल की डिग्री ली. सोमनाथ की इच्छा प्रोफेसर बनने की थी, इसलिए कल्याणी यूनिवर्सिटी से पीएचडी करने लगे. पीएचडी करने को लिए उन्होंने जो विषय चुना, वह सब से अलग था. उन का विषय था बांग्ला भाषा और साहित्य में थर्डजेंडर. मां और बहनों ने पढ़ाई में उन का काफी सहयोग किया था.
उसी दौरान उन की झाड़ग्राम विवेकानंद कालेज में प्राध्यापक के पद पर नौकरी लग गई. सोमनाथ बंद्योपाध्याय देखने में भले ही एक युवक थे, लेकिन उन के दिल और दिमाग में क्या है, इसे कोई नहीं जानता था. उन्हें अपने पुरुष रूप से प्यार नहीं था, क्योंकि दिल और दिमाग से वह पूरी तरह महिला थे. उन्हें खुद को मर्द के बजाय औरत के रूप में देखना ज्यादा अच्छा लगता था. मगर यह काम इतना आसान नहीं था. क्या कोई मर्द से पूरी तरह औरत बन सकता है? इस प्रश्न का वह जवाब ढूंढने में लग गए.
यह जानने के लिए सोमनाथ ने कालेज की लाइबे्ररी में रखी सैकड़ों किताबें छान मारीं. इन किताबों को पढ़ने के बाद भी मन को संतुष्टि नहीं मिली तो अलीपुर नेशनल लाइबे्ररी, कोलकाता के अलावा देशी और विदेशी मैडिकल जरनलों में अपने जेहन में उभरे सवाल का हल ढूंढा. और तो और सैक्सोलौजी, ट्रांससैक्स सर्जरी और प्लास्टिक सर्जरी के लेखों में भी अपनी जिज्ञासा का हल ढूंढने की कोशिश की. एक दिन वह अपनी जिज्ञासा का समाधान पाने के लिए एक मनोचिकित्सक के पास जा पहुंचे.
सोमनाथ अब कोई नासमझ नहीं थे. इसलिए मनोचिकित्सक उन की बात सुनने के बाद समझ गए कि सोमनाथ का यह फैसला दिल से लिया हुआ है. यानी यह मानसिक तौर पर पूरी तरह से महिला हैं. इसलिए उन्होंने उन्हें सलाह दी कि इस इच्छा को ज्यादा समय तक दबाए रखना ठीक नहीं है. क्योंकि अधिक दिनों तक इसे अपने दिल में दबा कर रखा गया तो आत्महत्या करने तक की नौबत आ सकती है. सोमनाथ के मन में जो भी उथलपुथल हो रही थी, उसे उन्होंने सार्वजनिक करने का फैसला कर लिया. वह क्लास में एक महिला की तरह बात करने लगे.
महिला बनने की उन की इच्छा तीव्र होती गई. वह महिला की तरह रहने भी लगे. और तो और साड़ी पहन कर क्लास में जाने लगे. उन के इस रूप को देख कर साथी प्राध्यापक चौंके. उन के कई साथी तो उन की खिल्ली उड़ाने लगे. कुछ प्राध्यापकों ने उन के खिलाफ प्रिंसिपल के कान भरे. वह कहने लगे कि सोमनाथ बंद्योपाध्याय की वजह से कालेज की बदनामी हो रही है. लोग कहते हैं कि कालेज में हिजड़ा पढ़ाता है. छात्रों पर भी इस का गलत प्रभाव पड़ेगा. ऐसे किन्नर प्राध्यापक की जगह इस कालेज में नहीं होनी चाहिए.
इस पर कालेज के प्रिंसिपल ने सोमनाथ से कहा कि उन की नियुक्ति कालेज में एक पुरुष के रूप में हुई है न कि महिला के रूप में. इसलिए वह मर्दों के कपड़े पहन कर ही स्कूल आएं. अगर उन्हें औरतों के कपड़े पहनने का शौक है तो वह इन्हें अपने घर पर पहनें, क्योंकि इस से कालेज की बदनामी हो रही है. सोमनाथ ने प्रिंसिपल की इन बातों पर ध्यान नहीं दिया. वह गीदड़ भभकी में नहीं आए. उन्होंने भी कह दिया कि उन्हें क्या पहनना है, क्या नहीं, इस बात को वह अच्छी तरह से समझते हैं. कोई भी उन के कपड़े पहनने की आजादी पर रोक नहीं लगा सकता. उधर उन की पढ़ाई से छात्र खुश थे, इसलिए उन्होंने उन के बदले रूप पर कोई ऐतराज नहीं किया.
प्रिंसिपल को जब लगा कि सोमनाथ उन की बात नहीं मान रहे हैं तो उन्होंने उन्हें स्टाफ क्वार्टर से निकाल दिया. वह किराए के मकान में रहने लगे तो वहां भी उन पर हमला कराया गया. न्याय पाने के लिए उन्होंने राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग की शरण ली. लेकिन उन्हें कहीं से भी न्याय नहीं मिला. उधर मोहल्ले के लोग भी उन की मजाक उड़ाते हुए फबितयां कसते थे. इन सब बातों के होते हुए भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी. उन्होंने फैसला कर रखा था कि भले ही लोग उन के बारे में कुछ भी कहें, वह अपने दिल की बात पूरी कर के ही रहेंगे. उसी दौरान न्यूयार्क के माउंट सेनाय हौस्पिटल ऐंड रिसर्च इंस्टीट्यूट से प्रकाशित जरनल की एक प्रति उन के हाथ लग गई. वह प्रति हाथ में आते ही उन्हें जैसे एक नई दिशा मिल गई. उन्हें पता चल गया कि पुरुष से नारी बना जा सकता है.
उन्हें पता चला कि बोस्टन की वेनस, न्यूजर्सी की ऐना, टेक्सर की ऐंजेलिना पहले हरमोपोडाइट (उभयलिंग जिस के शरीर में पुरुष और नारी दोनों के यौनांग मौजूद होते हैं) थीं. ये तीनों भी ट्रांससैक्स सर्जरी के जरिए हरमोपोडाइट से एक पूर्ण नारी बनीं थीं. महत्त्वपूर्ण जानकारी मिलने के बाद सोमनाथ के चेहरे पर आशा की किरणें चमकने लगीं. उन्हें लगा कि उन की ख्वाहिश अब पूरी हो सकती है. ट्रांससैक्स के संबंध में उन्होंने डाक्टरों के जितने भी लेख पढ़े थे, उन सब की उन्होंने फोटोकौपी करा कर रख ली थी.
उसी दौरान उन्हें पता चला कि ट्रांससैक्स सर्जन डा. मनोज खन्ना विदेश से पढ़ाई कर के कोलकाता लौटे हैं. डा. खन्ना ने भले ही ट्रांससैक्स की डिग्री हासिल की थी, लेकिन उन्हें ट्रांससैक्स की सर्जरी का अनुभव नहीं था. सोमनाथ ने डा. खन्ना से मुलाकात कर अपने मन की बात बताई. उन के पास जितने भी लेख थे, वे सब भी उन्हें दिखाए. सोमनाथ की औरत बनने की इच्छा जानकर डा. खन्ना चौंके. उन की ख्वाहिश ने डा. खन्ना को उन का औपरेशन करने के लिए मजबूर कर दिया.
डा. खन्ना का यह पहला औपरेशन था और यह सफल रहा. उन्होंने सोमनाथ बंद्योपाध्याय को पांव से ले कर सिर तक औरत में तबदील कर दिया. इस काम में प्लास्टिक सर्जन डा. मुरारी मुखर्जी की भूमिका भी महत्त्वपूर्ण रही. डा. खन्ना ने औपरेशन के जरिए सोमनाथ में जहां नारी यौनांग प्रतिस्थापित किया, वहीं डा. मुरारी मुखर्जी ने औपरेशन से नारी सौंदर्य के प्रतीक सुडौल स्तन तैयार किए. उन्होंने सोमनाथ के दोनों हाथ लड़कियों की तरह कोमल बनाए.
इस के बाद बारी आई उन के हारमोंस को बदलने की. हारमोंस स्पेशलिस्ट की मदद से सोमनाथ की त्वचा से मर्दों जैसे रोएं साफ करने के बाद उन की दाढ़ीमूंछों के निशान भी हमेशा के लिए खत्म कर दिए गए. काम यहीं खत्म नहीं हुआ, हेयर ट्रांसप्लांटेशन के जरिए सिर पर उगे काले लंबे घुंघराले बालों ने सोमनाथ को खूबसूरत नारी में तब्दील कर दिया. यह सारा काम बेहद पेचीदा था, मगर सफल रहा. इस सफलता पर डाक्टर भी खुश थे. संपूर्ण नारी बनने के बाद सोमनाथ ने खुद को आदमकद आईने के सामने निहारा तो उन की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. नारी बनने के बाद उन्होंने अपना नाम मानवी बंद्योपध्याय रख लिया.
उस वक्त मानवी झाड़ग्राम विवेकानंद कालेज में प्राध्यापक थीं. घने घुंघराले बाल, गोरी रंगत, कसे बदन वाली मानवी बेहद खूबसूरत लग रही थीं. तब उन की उम्र 40 साल के करीब थी, लेकिन अपने कसे बदन की वजह से वह 27-28 साल की दिखती थीं. उन्हें देख कर कोई भी मर्द आकर्षित हुए बिना नहीं रह सकता था. मानवी को गाने का भी शौक था. इस के अलावा वह एक अच्छी अदाकारा भी थीं. पहली मंजिल हासिल करने के बाद उन की दूसरी जंग शुरू हुई, वह जंग थी यूनिवर्सिटी से. उन के सारे शैक्षणिक प्रमाण पत्रों में सोमनाथ बंद्योपध्याय नाम था.
पीएचडी भी वह इसी नाम से कर रही थीं. लेकिन वह पीएचडी की डिग्री मानवी बंद्योपाध्याय के नाम से लेना चाहती थीं. इस के लिए उन्होंने एफिडेविट और अपने मैडिकल सर्टिफिकेट भी यूनिवर्सिटी में जमा कराए. लेकिन यूनिवर्सिटी के नजरिए से वे काफी नहीं थे. मानवी अपने बूढ़े मांबाप के साथ रहती थीं. उन का नारी बनना उन की मां को हरगिज मंजूर नहीं था. तनाव और मानसिक दबाव की वजह से वह दिल की मरीज बन गईं. मोहल्ले और पासपड़ोस के लोगों ने भी मानवी का पुरुष से नारी बन जाना नहीं कबूला. इतना ही नहीं, रिश्तेदारों, मोहल्ले वालो और सहकर्मियों ने भी उन्हें अपने से अलग कर दिया. पर मानवी ने इन बातों की कोई परवाह नहीं की.
सन 2005 में मानवी के जीवन में अभिजीत नाम के एक युवक ने प्यार की दस्तक दी. वह मानवी की खूबसूरती पर मर मिटा. उन दिनों मानवी झाड़ग्राम के विवेकानंद कालेज में प्राध्यापिका थीं. उम्र का तकाजा था, इसलिए पहले प्यार की दस्तक ने उन्हें बेचैन कर दिया और 2005 में ही मानवी और अभिजीत शादी के बंधन में बंध गए. लेकिन शादी हुए एक महीना भी नहीं हुआ था कि मानवी की वैवाहिक जिंदगी में ऐसा तनाव आया कि संबंध तलाक तक पहुंच गए. मानवी से शादी कर के अभिजीत बहुत खुश था. उसे तो जैसे चांद मिल गया था.
उन्होंने अपने हनीमून के लिए झाड़ग्राम के ही राजा वीरेंद्र विजय मल्लादार के आलीशान महल को चुना. सालपियाल के घने जंगल से घिरे इस महल में उन की मोहब्बत ने भरपूर अंगड़ाई ली. अभिजीत को पा कर मानवी भी खुश थीं कि दुनिया से जूझने के लिए उन्हें एक साथी मिल गया था. प्यार के उन्हीं लम्हों के दौरान मानवी ने धीरेधीरे अपनी बीती जिंदगी की दर्दभरी दास्तान पति को सुना दी. उन्होंने अनूठे चिकित्सा विज्ञान की करामात भी बता दी थी. तब उन्हें क्या पता था कि उन की यही कहानी उसी के लिए मुसीबत बन जाएगी.
मानवी की दास्तान सुनने के बाद अभिजीत गुमसुम सा हो गया. कुछ देर पहले अभिजीत एकदम सामान्य था तो अब उसे क्या हो गया? यह बात मानवी ने उस से पूछी तो वह बात को टालने की कोशिश करने लगा. मानवी ने जिद की तो अभिजीत ने मन की बात कह दी, ‘‘मानवी, मुझे अब खुद से ही घृणा हो रही है. मुझे पता नहीं था कि तुम पहले मर्द थीं.’’
यह सुन कर मानवी घबरा गईं कि उस का पति यह किस तरह की बातें कर रहा है? वह बोलीं, ‘‘मैं ने शादी से पहले आप को जो पत्र लिखा था, उस में अपने ट्रांससैक्स का जिक्र किया था न?’’
‘‘मैं तो उसे मजाक समझ रहा था. मुझे क्या पता था कि वह हकीकत है.’’ अभिजीत ने कहा.
‘‘अभिजीत, मैं तुम्हें बहुत प्यार करती हूं. मेरे प्यार में रत्ती भर संदेह नहीं है. तभी तो मैं ने तुम्हें अपने अतीत से अवगत कराया था. मैं भी तन और मन से आम औरतों की तरह ही हूं. मुझे लगता है कि तुम्हें कोई गलतफहमी हो रही है.’’
‘‘नहीं, मुझे गलतफहमी नहीं, दुख हो रहा है, क्योंकि मैं ने ही प्यार की शुरुआत की थी.’’ अभिजीत बुझे मन से बोला.
‘‘अभिजीत, मैं तुम्हें किसी भी तरह की शिकायत का मौका नहीं दूंगी. मेरा विश्वास करो.’’ मानवी ने उसे समझाया.
उस की बात का अभिजीत ने कोई जवाब नहीं दिया. उस की चुप्पी के बाद मानवी ने भी बात आगे बढ़ानी उचित नहीं समझी.
अभिजीत पढ़ालिखा होने के बावजूद दकियानूसी विचारों वाला था. उस के दिमाग में पत्नी के प्रति नफरत पैदा हो गई. दोनों के बीच कहासुनी शुरू हो गई. इतना ही नहीं, वह मानवी से व्यावहारिक रूप से भी उखड़ाउखड़ा रहने लगा. उन के पारिवारिक रिश्तों पर भी बर्फ जमने लगी. मनमुटाव से होती हुई बात हाथापाई तक पहुंच गई. इस का नतीजा यह निकला कि शादी के डेढ़ महीने बाद ही उन दोनों के बीच तलाक हो गया.
शादीशुदा जिंदगी खत्म होने के बाद मानवी फिर से लोगों का मजाक बन गई. पति द्वारा दी गई जलालत से उबर कर वह जीने की ख्वाहिश लिए फिर से मैदान में उतर पड़ी. अभिजीत से शादी के बाद मानवी ने सोचा था कि उसे दुखदर्द बांटने वाला हमसफर मिल गया है. लेकिन तलाक के बाद उस की समझ आ गया कि खुद को नारी के रूप में स्थापित करने के लिए उसे अकेले ही जंग लड़नी पड़ेगी. वह अदालत, चुनाव आयोग, विश्वविद्यालय जैसे सरकारी प्रतिष्ठानों में अपने नारी होने के कागजातों को ले कर चक्कर काटने लगी.
मानवी ने कसम खा ली थी कि वह सफलता न मिलने तक अपनी जंग जारी रखेगी. अपने हक के लिए उन्होंने कोर्ट की शरण ली. लंबी लड़ाई लड़ने के बाद सन 2005 में आखिर अदालत ने मानवी के नारीत्व को स्वीकृति दे दी. अदालत की स्वीकृति मानवी की बहुत बड़ी जीत थी. जिला निर्वाचन अधिकारी के औफिस में दरख्वास्त दे कर उन्होंने निर्वाचन सूची में अपना नाम और लिंग बदलवाने की मांग की. अदालत के आदेश को जिला निर्वाचन अधिकारी भी नकार नहीं सकते थे. मजबूरन जिला निर्वाचन अधिकारी ने मतदाता सूची में सोमनाथ बंद्योपाध्याय की जगह उन का नया नाम मानवी बंद्योपाध्याय, लिंग – स्त्री दर्ज कर लिया. मतदाता परिचयपत्र में भी मानवी नारी बन गई.
इस तरह सामाजिक न्याय पाने के लिए उन्होंने अदालत के ही नहीं, मानवाधिकार आयोग के भी दरवाजे खटखटाए. इस बीच उन्होंने ‘अबा मनाव’ नाम की पत्रिका भी निकाली. इस के जरिए उन्होंने ट्रांसजेंडरों की व्यथा समाज के सामने रखी. उन्होंने एंडलेस बांडेज नाम का उपन्यास भी लिखा है, जो खूब चर्चित हुआ है. चुनाव आयोग के बाद पश्चिम बंगाल सरकार के शिक्षा विभाग ने भी नौकरी के रिकौर्ड में सोमनाथ की जगह मानवी कर दिया. मानवी के पास कोलकाता की तापसी मंडल और 24 परगना की तिस्ता आईं. इन दोनों ने भी पुरुष से नारी बनने की लड़ाई छेड़ी हुई थी. वे अपनी लड़ाई में मानवी को भी शामिल करना चाहती थीं.
मानवी ने अपनी सामाजिक जिम्मेदारी को समझते हुए दोनों को हर तरह से सहयोग करने का वादा किया. इन तीनों के संघर्ष के बाद कोलकाता महानगर में पुरुष से नारी बनी महिलाओं का ‘मानवी’ नाम का संगठन ही तैयार हो गया. मानवी की इस जंग का एक युवक बहुत कायल हुआ. उस युवक का नाम था विश्वजीत. एक प्रशंसक के रूप में विश्वजीत ने उस के जीवन में दस्तक दी. मानवी भी उस से बहुत प्रभावित हुई. बाद में यही विश्वजीत उन का हमसफर बन गया. लेकिन मानवी ने उस से शादी नहीं की. वह उस के साथ लिविंग टूगेदर में रह रही है.
उधर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मानवी को पश्चिम बंगाल ट्रांसजेंडर विकास बोर्ड का उपाध्यक्ष नियुक्त किया है. उन की शिक्षा और काबिलियत को देखते हुए हाल ही में उन्हें कृष्णानगर महिला कालेज का प्रिंसिपल नियुक्त किया गया है. मानवी की यह सब से बड़ी उपलब्धि है, क्योंकि वह देश की पहली ट्रांसजेंडर कालेज प्रिंसिपल बन गई हैं. मानवी का कहना है, ‘‘इस पद पर नियुक्ति हो जाने के बाद मेरी जिम्मेदारी अब और बढ़ गई है. मेरे जैसे लोगों के लिए संघर्ष की शुरुआत परिवार से होती है, क्योंकि सब से पहले तो परिवार में कहा जाने लगता है कि यह बच्चा हिजड़ा है. इसे घर से बाहर कर दो.’’
यानी बाहर वालों से पहले घर वाले ही उस बच्चे का मानसिक उत्पीड़न करना शुरू कर देते हैं. ऐसे में वह बच्चा स्कूल तो नहीं पहुंच पाता, साथ ही वह परिवार के प्यार से भी वंचित रह जाता है. इसी कुंठा के चलते उस का जीवन बेकार हो जाता है. मानवी का कहना है, ‘‘मेरे लिए कालेज प्रिंसिपल की जिम्मेदारी मिलना बहुत बड़ी बात है. मेरी कोशिश रहेगी कि मैं अपने छात्रों को बेहतरीन शिक्षा और संस्कार दूं.’’
वह ट्रांसजेंडर लोगों की शिक्षा के लिए भी कुछ करना चाहती हैं. अनगिनत यातनाएं सहने के बाद मानवी सम्मानजनक मुकाम पर पहुंची हैं. अपने लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए संघर्ष किया. उन के बारे में कौन क्या कह रहा है, इस बात पर उन्होंने गौर नहीं किया. अगर वह लोगों की बातों में उलझ जातीं तो शायद तकलीफों के पहाड़ को पार नहीं कर पातीं. बहरहाल जो लोग पहले उन का मजाक उड़ाते थे, उन पर हंसते हुए तरहतरह की बातें करते थे, आज वही लोग उन की सफलता पर उन्हें बधाइयां दे रहे हैं.






