Hindi Stories: प्रतिमा ने जिस मौजमस्ती का जीवन जीने के लिए प्रवीण नाईक से शादी की थी, वह सास ऊषा नाईक और जेठानीडा. नेहा नाईक के रहते संभव नहीं था. इस कांटे को दूर करने के लिए उस ने जो किया, वह गुनाहों की प्रतिमा बन गई. पर्यटकों के लिए स्वर्ग कहे जानेवाले गोवा के जिला वास्कोडिगामा शहर से मांगोर हिल जाने वाले रास्ते के बाईं ओर पहाडि़यों से घिरा मायामोले इलाका यहां का अत्यंत पौश इलाका माना जाता है. यहां एक से बढि़या एक मकान, फार्महाऊस और बहुमंजिली इमारतें हैं. पौश इलाका होने की वजह से यहां उच्च और संभ्रांत लोग रहते हैं. इन्हीं में एक परिवार नामदेव नाईक का भी था, जो एक खूबसूरत इमारत के डुप्लेक्स फ्लैट में रहता था.
कुछ दिनों पहले बीमारी की वजह से नामदेव नाईक का निधन हो गया तो उन के पीछे परिवार में पत्नी ऊषा नाईक, 2 बेटे सिद्धार्थ नाईक, प्रवीण नाईक और उन की बहुएं डा. नेहा नाईक तथा प्रतिमा नाईक रहती थीं. सिद्धार्थ एवं नेहा की 6 महीने की एक बेटी भी थी. परिवार संपन्न और खुशहाल था. घर में किसी चीज की कोई कमी नहीं थी. सिद्धार्थ नाईक और प्रवीण नाईक, दोनों भाई मर्चेंट नेवी में नौकरी करते थे. नौकरी की वजह से दोनों भाइयों का ज्यादातर समय समुद्र के बीच बीतता था. साल में एक या 2 बार दोनों भाई बारीबारी से छुट्टियां ले कर घर आते थे. उन की अनुपस्थिति में घर की सारी जिम्मेदारियां मां ऊषा नाईक निभाती थीं.
29 जनवरी, 2015 की रात 3, साढ़े 3 बजे जब इमारत के सभी लोग सो रहे थे, तभी दरवाजा पीटने और चीखनेचिल्लाने के शोर से सभी की आंखें खुल गईं. शोर सुन कर घबराए लोग अपनेअपने फ्लैटों का दरवाजा खोल कर बाहर आए तो ऊषा नाईक की छोटी बहू प्रतिमा नाईक को बदहवास हालत में रोतेबिलखते देख कर हैरान रह गए. वह जेठानी की दुधमुंही बच्ची को सीने से चिपटाए जोरजोर से रोते हुए कह रही थी, ‘‘मेरी मदद करो. डाकुओं ने मेरे घर को लूट लिया. मेरी सास और जेठानी को मार डाला. उन्होंने मुझे भी मारापीटा, वे मुझे भी मारना चाहते थे, लेकिन संयोग से मैं बच गई.’’
प्रतिमा नाईक जो कह रही थी, उसे सुन कर इमारत में रहने वालों के होश उड़ गए. सोसायटी के सचिव बाबूराव नाईक को साथ ले कर कुछ लोग ऊषा नाईक के फ्लैट पर पहुंचे तो वहां की स्थिति देख कर सभी की आंखें हैरत से फटी की फटी रह गईं. घर का सारा सामान बिखरा पड़ा था. ऊषा की लाश बैडरूम में तो डा. नेहा की लाश उन के बैडरूम में पड़ी थी. लूट और 2-2 हत्याओं का मामला था. अब तक पूरी सोसायटी के लोग एकत्र हो चुके थे. सोसायटी के सचिव बाबूराव नाईक ने घटना की सूचना ऊषा के दोनों बेटों, सिद्धार्थ और प्रवीण को देने के साथसाथ पुलिस कंट्रोल रूम को भी दे दी थी. पुलिस कंट्रोल रूम ने यह सूचना वायरलेस पर प्रसारित की तो थाना वास्कोडिगामा पुलिस को तो घटना की जानकारी हो ही गई थी, इसी के साथ अधिकारियों को भी घटना की जानकारी हो गई थी.
मामला शहर की पौश कालोनी के एक उच्च और सभ्रांत परिवार से जुड़ा था, जिस में 2 लोगों की हत्याएं हो गई थीं, इसलिए सूचना मिलते ही थाना वास्कोडिगामा के सीनियर इंसपेक्टर सागर इकोसकर तुरंत सहायक इंसपेक्टर शैलेष नार्वेकर, संतोष देसाई, उदय परब, रामआसरे, रवि देसाई को साथ ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए थे. थाना पुलिस के पहुंचने के थोड़ी देर बाद ही आईजी सुनील गर्ग, पुलिस कमिश्नर शेखर प्रभु देसाई, एडिशनल पुलिस कमिश्नर लौरेस डिसूजा प्रेस फोटोग्राफर, फिंगरप्रिंट ब्यूरो और डाग स्क्वायड के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए थे. पुलिस टीम के पहुंचने तक पूरी इमारत के लोग मृतका ऊषा के फ्लैट पर इकट्ठा हो गए थे.
सभी लोग परेशान थे. नाईक परिवार की छोटी बहू प्रतिमा की हालत तो बहुत ज्यादा खराब थी. उस के सिर पर किसी भारी चीज की चोट लगी थी, जिस से उस के सिर में बड़ा सा गुम्मड़ निकल आया था. पड़ोसी उसे सांत्वना दे कर संभाल रहे थे. वह इस तरह तड़प रही थी, जैसे उसे अंदरूनी चोटें भी लगी थीं. पुलिस ने उसे इलाज के लिए अस्पताल भिजवा दिया और छोटी बच्ची को संभालने के लिए पड़ोसियों के हवाले कर दिया. प्रतिमा को अस्पताल भिजवा कर थाना पुलिस मामले की जांच में जुट गई. अलमारी और शोकेस खुले पड़े थे. उस में रखा सामान कमरे में बिखरा पड़ा था.
अलमारी का लौकर खाली पड़ा था, इस का मललब उस में रखा सामान गायब था. उस में क्या रखा था, यह बताने वाला उस समय वहां कोई नहीं था. फ्लैट की लौबी के सोफे पर ऊषा नाईक की लाश पड़ी थी. डा. नेहा नाईक की लाश उन के बैडरूम में बेड पर पड़ी थी. लाशों के निरीक्षण से पुलिस को पता चला कि सासबहू की हत्याएं एक ही तरह से की गई थीं. उन के गले में रस्सी डाल कर कस दिया गया था. वह रस्सी भी पुलिस को फ्लैट से मिल गई थी. फर्श पर लालमिर्ची का पाउडर बिखरा था. पुलिस अधिकारियों के साथ आए जासूसी कुत्ते को लाशों को सुंघा कर छोड़ा गया तो पहले वह फ्लैट में ही घूमता रहा. कई चक्कर लगा कर वह फ्लैट से बाहर निकला तो भ्रमित सा हो गया.
इस तरह कुत्ते से पुलिस को कोई मदद नहीं मिल सकी. पुलिस ने घटनास्थल की औपचारिक काररवाई निपटा कर दोनों लाशें पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दीं और थाने आ कर लूट और हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया. मामला गंभीर था, इसलिए मामले की जांच की जिम्मेदारी थानाप्रभारी इंसपेक्टर सागर इकोसकर ने स्वयं संभाली. शुरुआती जांच में स्पष्ट हो चुका था कि मामला लूटपाट में हत्याओं का था. लूट के लिए लुटेरों ने 2 निर्दोष महिलाओं की हत्या कर दी थी. सोचने की बात यह थी कि अत्यंत सुरक्षित फ्लैट में लुटेरों ने प्रवेश कैसे किया? जांच में फ्लैट के दरवाजों और खिड़कियों के लौक सुरिक्षत पाए गए थे. जिस फ्लैट में वारदात हुई थी, वह ग्राउंड फ्लोर पर था. उस का एक दरवाजा आगे और एक पीछे की ओर था. पीछे वाले दरवाजे की ओर गहरी खाई थी, इसलिए उधर से लुटेरों के आने का कोई चांस नहीं था.
इसी तरह की बातें सागर इकोसकर को परेशान कर रही थीं. उन के दिमाग में जो भी सवाल घूम रहे थे, उन के जवाब परिवार में एकमात्र बची प्रत्यक्षदर्शी प्रतिमा ही दे सकती थी. इसलिए प्राथमिक इलाज के बाद उसे पूछताछ के लिए थाने ले आया गया. इस पूछताछ में प्रतिमा नाईक ने बताया कि इस घर में आए अभी उसे 8 महीने ही हुए हैं. इसलिए इस घर के बारे में उसे ज्यादा कुछ नहीं मालूम. उस की सास ऊषा नाईक और जेठानी डा. नेहा नाईक अपनी 6 महीने की बेटी के साथ ग्राउंड फ्लोर पर अलगअलग कमरों में सोती थीं. उस का कमरा फर्स्ट फ्लोर पर था, इसएिल वह फर्स्ट फ्लोर पर सोती थी.
घटना की रात तीनों ने साथसाथ खाना खाया था. खाना खाने के बाद सभी ने एकएक गिलास दूध पिया. उस समय तक रात के साढ़े 9 बज गए थे. सभी लोग बैठे टीवी देख रहे थे, तभी उस की जेठानी की बेटी रोने लगी तो वह प्रतिमा और सास को गुडनाइट कह कर बेटी के साथ सोने चली गईं. डा. नेहा के जाने के बाद प्रतिमा भी फर्स्ट फ्लोर के अपने कमरे में सोने चली गई. ऊषा नाईक काफी देर तक टीवी देखती थीं, इसलिए वह बैठीं टीवी देखती रहीं. रात ढाई बजे के करीब अचानक उस की आंख खुली तो उसे ग्राउंड फ्लोर से उठापटक की आवाजें आती सुनाई दीं. ये कैसी आवाजें हैं, यह जानने के लिए प्रतिमा अपने कमरे से निकल कर नीचे आई तो वहां का नजारा देख कर सन्न रह गई.
4-5 नकाबपोश ऊषा नाईक और डा. नेहा को पकड़ कर उन के गले में रस्सी का फंदा डाल कर कस रहे थे. उन की मदद के लिए प्रतिमा आगे बढ़ी तो नकाबपोशों ने उसे भी पकड़ लिया और उस की पिटाई करने लगे. लुटेरों में किसी ने उस के सिर पर डंडे से मार दिया, जिस से उस की आंखों के सामने अंधेरा छा गया. वह संभल पाती, लुटेरों ने उस के गले में रस्सी डाल कर कस दिया. गला कसने से प्रतिमा बेहोश हो गई. इस के बाद घर में क्या हुआ, उसे पता नहीं. यह संयोग था कि वह मरी नहीं. थोड़ी देर बाद उसे होश आया तो उस का सब कुछ खत्म हो चुका था. उस की सास ऊषा नाईक और जेठानी डा. नेहा की मौत हो चुकी थी. बच्ची जोरजोर से रो रही थी. प्रतिमा ने उसे उठा कर कर सीने से लगाया और फ्लैट के बाहर आ कर सारी बातें पड़ोसियों को बताईं.
प्रतिमा के बताए अनुसार, घर में लगभग 20 लाख रुपए के गहने थे. नकद के बारे में उसे पता नहीं था. प्रतिमा के बयान के आधार पर सागर इकोसकर ने मामले को अपराध क्रमांक 20/15 पर भादंवि की धारा 449/307/302/201डी, 120बी और 34 के तहत दर्ज कर के अब तक की जांच की जानकारी आईजी सुनील गर्ग और एसपी शेखर प्रभु देसाई को दी. इन अधिकारियों ने सागर इकोसकर को कुछ जरूरी दिशानिर्देश दे कर उन की मदद के लिए साऊथ गोवा के सातों थाने की पुलिस को लगा दिया. सागर इकोसकर ने सहयोगियों के साथ पूरे मामले पर गंभीरता से मंथन किया तो उन्हें जांच में मिले तथ्यों और प्रतिमा के बयानों में काफी अंतर नजर आया. उन के जेहन में कुछ ऐसे सवाल उभर कर आए, जो उन्हें बेचैन करने लगे थे.
पहली बात तो यह थी कि लुटेरे उस फ्लैट के अंदर कैसे पहुंचे? दूसरी बात यह कि अगर लुटेरों ने प्रतिमा की सास और जेठानी को मार दिया था तो प्रतिमा को क्यों छोड़ दिया? तीसरी बात यह कि उन की सुरक्षित अलमारी को बिना किसी तोड़फोड़ के कैसे खोला गया? चौथी सब से अहम बात यह थी कि मृतका ऊषा नाईक और डा. नेहा नाईक ने मरते समय किसी तरह का विरोध क्यों नहीं किया था? जब कि आमतौर पर मरते समय आदमी अपनी जान बचाने के लिए आखिरी समय तक संघर्ष करता है. डा. नेहा नाईक के बैड पर बिछी चादर एकदम ठीकठाक थी. उसी तरह ऊषा नाईक जिस सोफे पर मरी पड़ी थीं, उस सोफे का कवर भी जस का तस था. इस का मतलब यह था कि मरने वालों को मरने से पहले बेहोश किया गया था और ऐसा काम घर का ही कोई कर सकता था.
सभी सवालों पर जब गहराई से विचार किया गया तो शक के दायरे में प्रतिमा आ गई. इस की वजह यह थी कि परिवार में सिर्फ 4 लोग थे, जिन में 2 लोगों को मार दिया गया था. 6 महीने की बच्ची किसी तरह की साजिश कर नहीं सकती थी. अब सिर्फ प्रतिमा बचती थी. लेकिन समस्या यह थी कि मामला एक प्रतिष्ठित परिवार का था, इसलिए सीधे प्रतिमा पर हाथ नहीं डाला जा सकता था. असलियत का पता लगाने के लिए सागर इकोसकर और उन के सहयोगी प्रतिमा के बारे में जानकारी जुटाने में जुट गए. इस के बाद प्रतिमा के बारे में पुलिस को जो जानकारी मिली, वह काफी चौंका देने वाली थी.
सारी जानकारी जुटा कर पुलिस ने प्रतिमा नाईक को दोबारा पूछताछ के लिए थाने बुलाया तो वह पुलिस के एक भी सवाल का सही और संतोषजनक जवाब नहीं दे सकी. पुलिस के सवालों के आगे मजबूर हो कर अंतत: उस ने खुद ही अपना अपराध स्वीकार कर लिया. इस के बाद उस ने सास और जेठानी की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह कुछ इस प्रकार थी. 27 वर्षीया प्रतिमा जितनी खूबसूरत थी, उतनी ही महत्त्वाकांक्षी भी थी. गोलमटोल चेहरा, जवानी से भरपूर यौवन, कजरारी आंखों वाली प्रतिमा अपने मातापिता और 3 बहनों के साथ वास्कोवयना के मांगोर हिल स्थित अंबा बाई मंदिर के पास हिल क्रौस्ट इमारत की पहली मंजिल पर रहती थी.
एक साधारण परिवार में पैदा हुई प्रतिमा के सपने बहुत बड़े थे. वह ज्यादा पढ़ीलिखी नहीं थी, लेकिन वह जिंदगी अमीरों जैसी जीना चाहती थी. प्रतिमा की एक बहन ने 2 साल पहले किसी अमीर घर के लड़के से प्रेम विवाह कर लिया था और ठाठ से रह रही थी. बहन की ही तरह वह भी प्रेम विवाह कर के ठाठ से जिंदगी जीना चाहती थी. लेकिन वह ससुराल इस तरह की चाहती थी, जहां सिर्फ उस की चले. वह अपनी मनमर्जी की जिंदगी जी सके. उसे कोई रोकनेटोकने वाला न हो. उस का अपना जीवनसाथी भी इस तरह का हो, जो उस की हर इच्छा पूरी कर सके. और यह सब सारे गुण उसे प्रवीण नाईक में दिखाई दिए थे.
9 महीने पहले प्रतिमा ने प्रवीण नाईक को अपने एक दोस्त के यहां पार्टी में देखा तो देखती ही रह गई. सभ्य, सुशील, गोरेचिट्टे, लंबेचौड़े, स्वस्थ, सुंदर प्रवीण नाईक को देख कर प्रतिमा को लगा कि वह जो चाहती है, वह सब कुछ इस आदमी में है. इस के बाद वह उस से जानपहचान बनाने के लिए उस के इर्दगिर्द मंडराने लगी. प्रवीण उस बीच छुट्टी पर आया था और दोस्त के बुलाने पर उस के यहां पार्टी में चला गया था. प्रतिमा का आगेपीछे घूमना प्रवीण को अच्छा लगा. उस के लिए यह एक सुखद अहसास था, जो उसे बहुत अच्छा लगा था. बाद में जब उस के दोस्त ने उन का परिचय कराया तो दोनों एकदूसरे के काफी नजदीक आ गए.
इस के बाद दोनों की मुलाकातें शुरू हुईं तो प्रतिमा ने जल्दी ही प्रवीण को अपनी अदाओं से इस तरह आकर्षित कर लिया कि वह उस की हर बात के लिए राजी रहने लगा. वह उसे अपने घर पर भी ले जाने लगा. प्रतिमा ने प्रवीण का घर और उस की आर्थिक स्थिति को देखा तो वह उस से जल्द ही जल्द शादी करने के बारे में सोचने लगी. क्योंकि शादी के बाद ही प्रवीण का सब कुछ उस का अपना हो सकता था. वह प्रवीण पर विवाह के लिए दबाव बनाने लगी. प्रवीण मां और भाईभाभी से बात करने के बहाने विवाह को कुछ दिनों के लिए टालना चाहता था, लेकिन प्रतिमा इस के लिए तैयार नहीं थी. क्योंकि वह जल्दी से जल्दी प्रवीण की दुलहन बन कर उस की संपत्ति पर राज करना चाहती थी.
आखिर प्रतिमा की जिद के आगे प्रवीण को झुकना पड़ा. उस की मां और भाईभाभी राजी नहीं थे, लेकिन किसी तरह उन्हें मना कर प्रवीण ने प्रतिमा से शादी कर ली. इस तरह प्रवीण की दुलहन बन कर प्रतिमा कामत पैलेस में आ गई. आते ही सब से पहले उस ने अपने घूमनेफिरने के लिए प्रवीण से एक कार खरीदवाई. प्रवीण के पास पैसों की कहां कमी थी. उस ने उस के एक बार कहने पर कार खरीद दी. प्रतिमा के हाथों की मेहंदी भी नहीं छूटी थी कि उस ने एक काम ऐसा कर डाला कि घर के सभी लोगों की नजरों से वह उतर गई. अपनी जेठानी डा. नेहा के लाखों के गहनों पर प्रतिमा की नजर पड़ी तो अपने विवाह के एक सप्ताह बाद ही जेठानी की अनुमति ले कर वह उस के कमरे में सोने गई तो उसी बीच उन के सारे गहनों पर हाथ साफ कर दिया.
प्रतिमा आजाद खयाल की युवती थी. पति से तोहफे में मिली कार से वह अपने दोस्तों और सहेलियों को अकसर घुमाते हुए पार्टियां दिया करती थी. घर में रहती तो ज्यादातर अपने मोबाइल फोन से चिपकी रहती. यह सब उस की सास ऊषा नाईक और जेठानी डा. नेहा नाईक को पसंद नहीं था. डा. नेहा नाईक के गहनों की चोरी का राज खुला तो घर में काफी हंगामा हुआ. प्रतिमा की तरफ अंगुलियां उठीं तो खुद को निर्दोष साबित करने के लिए उस ने जहर खा कर आत्महत्या करने की कोशिश की. उस के इस नाटक से घर वाले डर गए और अपनी इज्जत की खातिर इस मामले को घर में ही रफादफा कर दिया.
उन गहनों को प्रतिमा पहन तो सकती नहीं थी, इसलिए उस ने उन्हें बेचने की योजना बनाई. इस योजना में उस ने अपनी एक सहेली के पति और अपने एक मुंहबोले भाई अभिजीत कोरगांवकर को शामिल किया. जेठानी के सारे गहने उन्हें सौंपते हुए उस ने कहा कि इन्हें बेच कर वे अपने हिस्से का पैसा ले कर उस के हिस्से का पैसा उस के खाते में डाल देंगे. अभिजीत कोरगांवकर वास्कोवयना में रहता था और किसी की कार चलाता था. उस ने वही किया, जैसा प्रतिमा ने उस से कहा था. प्रवीण जब तक घर में रहा, प्रतिमा मौजमस्ती करती रही. प्रवीण के जाते ही प्रतिमा को उस घर में घुटन सी महसूस होने लगी, क्योंकि घर में हुई चोरी की वजह से घर के किसी आदमी को उस पर विश्वास नहीं रह गया था. हर कोई उसे संदेह की नजरों से देखता था.
प्रतिमा की हर हरकत और काम पर उस की सास ऊषा नाईक और जेठानी डा. नेहा नजर रखती थीं. उसे कहीं भी आनेजाने, हर किसी से मिलने का हिसाब देना पड़ता था. उसे बताना पड़ता था कि वह कहां, क्यों और किस से मिलने गई थी. प्रतिमा पर लगने वाली यही पाबंदियां ऊषा नाईक और डा. नेहा नाईक के लिए काल बन गईं, क्योंकि सास और जेठानी उस की मौजमस्ती की जिंदगी में बाधा बन गई थीं. एक तो सास और जेठानी की रोजरोज की टोकाटाकी, दूसरे पति से लंबी दूरी उस से सहन नहीं हो रही थी. उसे लगने लगा कि ऐसी जिंदगी से क्या फायदा, जिस की जवानी और शबाब दोनों में घुन लग जाए.
विवाह रुपएपैसे और मौजमस्ती का वास्तविक आनंद क्या होता है? यह सास ऊषा नाईक और जेठानी डा. नेहा नाईक के रहते वह नहीं उठा सकती थी. वह ससुराल की धनदौलत पर कब्जा कर के अपने तरीके से मौजमस्ती करने के बारे में सोच रही थी. और यह सब तभी संभव हो सकता था, जब उस के रास्ते से सास और जेठानी हट जाएं. लेकिन वे जल्दी हटने वाली नहीं थीं. इसलिए इस के लिए उसे ही कुछ करना पड़ेगा. लेकिन वह क्या करे, कैसे करे, यह बात उस की समझ में नहीं आ रही थी. वह इन्हीं विचारों में खोई थी कि एक दिन टीवी प्रोग्राम के एक एपीसोड ने उस की सारी समस्या हल कर दी. उस एपीसोड में उस ने जो देखा, वही किया.
घटना की रात प्रतिमा ने सास और जेठानी के साथ खाना खाया. वह उन्हें पीने के लिए जो दूध लाई थी, उस में नींद की गोलियां मिला दी थीं, जिसे पीने के कुछ देर बाद डा. नेहा को नींद आने लगी. वह बेटी को ले कर अपने कमरे में सोने चली गईं. प्रतिमा सास ऊषा नाईक के साथ बैठी टीवी देखती रही. ऊषा नाईक जिस सोफे पर बैठी थीं, टीवी देखतेदेखते उसी पर लुढ़क गईं. उन के लुढ़कते ही प्रतिमा ने उठ कर टीवी बंद कर दिया. घर में सन्नाटा छा गया. प्रतिमा कपड़ा सुखाने वाली नायलौन की रस्सी काट लाई और सास के गले में लपेट कर कस दिया. बेहोशी की हालत में वह मर गईं. इस के बाद वैसा ही जेठानी के साथ किया.
सास और जेठानी की हत्या करने के बाद प्रतिमा ने अलमारी खोल कर उस के लौकर में रखे सारे गहने और नकदी निकाल कर एक कपड़े में बांध दिया. घर में लूट हुई है, यह दिखाने के लिए अलमारी का सारा सामान पूरे कमरे में फैला दिया. डौग स्क्वायड को भ्रमित करने के लिए उस ने कमरे के फर्श पर लालमिर्च पाउडर फैला दिया. अपने हिसाब से हत्या के सारे सबूतों को मिटा कर के वह आराम करने के लिए लेट गई. रात लगभग 2 बजे प्रतिमा ने अभिजीत कोरगांवकर को फोन कर के सारी बात बताई और उसे घर के पास बुलाया. वह आया तो उस ने गहनों और नकदी की पोटली उसे दे कर वापस भेज दिया.
अभिजीत के जाने के बाद प्रतिमा ने खुद को निर्दोष साबित करने के लिए अपने सिर पर एक भारी लकड़ी से जोर से प्रहार किया, जिस से उस के सिर पर गुम्मड़ निकल आया. गले पर नायलौन की रस्सी लपेट कर ऐसा निशान बनाया कि पुलिस का ध्यान लुटेरों की ओर चला जाए. अपने बचने की पूरी तैयारी करने के बाद उस ने मृतका डा. नेहा की बेटी को सीने से लगा कर जो किया, वह आप ऊपर पढ़ ही चुके हैं. प्रतिमा नाईक से पूछताछ के बाद इंसपेक्टर इकोसकर ने 3 फरवरी, 2015 को अभिजीत कोरगांवकर को भी गिरफ्तार कर लिया. उस की निशानदेही पर 10 लाख रुपए कीमत के गहने और नकदी बरामद कर ली.
उस ज्वैलर्स को भी गिरफ्तार कर लिया गया, जिस ने 8 महीने पहले अभिजीत कोरगांवकर से प्रतिमा द्वारा दिए गए गहनों को खरीदा था. सारे सबूत जुटा कर सभी को मैट्रोपौलिटन मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक प्रतिमा और अभिजीत जेल में थे. पुलिस मामले की जांच कर रही थी. पुलिस को शक है कि नाईक परिवार में हुई हत्याओं और लूट में प्रतिमा अकेली नहीं थी. उस ने पुलिस को गुमराह किया है, उस रात उस के साथ फ्लैट में जरूर कोई और था, वह उस का मुंहबोला भाई भी हो सकता है. लेकिन जांच पूरी हुए बगैर इस बारे में निश्चित रूप से कुछ कहा नहीं जा सकता. Hindi Stories
—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित






